उपस्थित सभी महानुभाव,

आप सबको क्रिसमस के पावन पर्व की बुहत-बहुत शुभकामनाएं। ये आज सौभाग्य है कि 25 दिसंबर, पंडित मदन मोहन मालवीय जी की जन्म जयंती पर, मुझे उस पावन धरती पर आने का सौभाग्य मिला है जिसके कण-कण पर पंडित जी के सपने बसे हुए हैं। जिनकी अंगुली पकड़ कर के हमें बड़े होने का सौभाग्य मिला, जिनके मार्गदर्शन में हमें काम करने का सौभाग्य मिला ऐसे अटल बिहारी वाजपेयी जी का भी आज जन्मदिन है और आज जहां पर पंडित जी का सपना साकार हुआ, उस धरती के नरेश उनकी पुण्यतिथि का भी अवसर है। उन सभी महापुरुषों को नमन करते हुए, आज एक प्रकार से ये कार्यक्रम अपने आप में एक पंचामृत है। एक ही समारोह में अनेक कार्यक्रमों का आज कोई-न-कोई रूप में आपके सामने प्रस्तुतिकरण हो रहा है। कहीं शिलान्यास हो रहा है तो कहीं युक्ति का Promotion हो रहा है तो Teachers’ Training की व्यवस्था हो रही है तो काशी जिसकी पहचान में एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि यहां कि सांस्कृतिक विरासत उन सभी का एक साथ आज आपके बीच में उद्घाटन करने का अवसर मुझे मिला है। मेरे लिए सौभाग्य की बात है।

मैं विशेष रूप से इस बात की चर्चा करना चाहता हूं कि जब-जब मानवजाति ने ज्ञान युग में प्रवेश किया है तब-तब भारत ने विश्व गुरू की भूमिका निभाई है और 21वीं सदी ज्ञान की सदी है मतलब की 21वीं सदी भारत की बहुत बड़ी जिम्मेवारियों की भी सदी है और अगर ज्ञान युग ही हमारी विरासत है तो भारत ने उस एक क्षेत्र में विश्व के उपयोगी कुछ न कुछ योगदान देने की समय की मांग है। मनुष्य का पूर्णत्व Technology में समाहित नहीं हो सकता है और पूर्णत्व के बिना मनुष्य मानव कल्याण की धरोहर नहीं बन सकता है और इसलिए पूर्णत्व के लक्ष्य को प्राप्त करना उसी अगर मकसद को लेकर के चलते हैं तो विज्ञान हो, Technology हो नए-नए Innovations हो, Inventions हो लेकिन उस बीच में भी एक मानव मन एक परिपूर्ण मानव मन ये भी विश्व की बहुत बड़ी आवश्यकता है।

हमारी शिक्षा व्यवस्था Robot पैदा करने के लिए नहीं है। Robot तो शायद 5-50 वैज्ञानिक मिलकर शायद लेबोरेटरी में पैदा कर देंगे, लेकिन नरकर्णी करे तो नारायण हो जाए। ये जिस भूमि का संदेश है वहां तो व्यक्तित्व का संपूर्णतम विकास यही परिलक्षित होता है और इसलिए इस धरती से जो आवाज उठी थी, इस धरती से जो संस्कार की गंगा बही थी उसमें संस्कृति की शिक्षा तो थी लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था शिक्षा की संस्कृति और आज कहीं ऐसा तो नहीं है सदियों से संजोयी हुई हमारी शैक्षिक परंपरा है, जो एक संस्कृतिक विरासत के रूप में विकसित हुई है। वो शिक्षा की संस्कृति तो लुप्त नहीं हो रही है? वो भी तो कहीं प्रदूषित नहीं हो रही है? और तब जाकर के आवश्यकता है कि कालवाह्य चीजों को छोड़कर के उज्जवलतम भविष्य की ओर नजर रखते हुए पुरानी धरोहर के अधिष्ठान को संजोते हुए हम किस प्रकार की व्यवस्था को विकसित करें जो आने वाली सदियों तक मानव कल्याण के काम आएं।

हम दुनिया के किसी भी महापुरुष का अगर जीवन चरित्र पढ़ेंगे, तो दो बातें बहुत स्वाभाविक रूप से उभर कर के आती हैं। अगर कोई पूछे कि आपके जीवन की सफलता के कारण तो बहुत एक लोगों से एक बात है कि एक मेरी मां का योगदान, हर कोई कहता है और दूसरा मेरे शिक्षक का योगदान। कोई ऐसा महापुरुष नहीं होगा जिसने ये न कहा हो कि मेरे शिक्षक का बुहत बड़ा contribution है, मेरी जिंदगी को बनाने में, अगर ये हमें सच्चाई को हम स्वीकार करते हैं तो हम ये बहुमूल्य जो हमारी धरोहर है इसको हम और अधिक तेजस्वी कैसे बनाएं और अधिक प्राणवान कैसे बनाएं और उसी में से विचार आया कि, वो देश जिसके पास इतना बड़ा युवा सामर्थ्य है, युवा शक्ति है।

आज पूरे विश्व को उत्तम से उत्तम शिक्षकों की बहुत बड़ी खोट है, कमी है। आप कितने ही धनी परिवार से मिलिए, कितने ही सुखी परिवार से मिलिए, उनको पूछिए किसी एक चीज की आपको आवश्यकता लगती है तो क्या लगती है। अरबों-खरबों रुपयों का मालिक होगा, घर में हर प्रकार का सुख-वैभव होगा तो वो ये कहेगा कि मुझे अच्छा टीचर चाहिए मेरे बच्चों के लिए। आप अपने ड्राइवर से भी पूछिए कि आपकी क्या इच्छा है तो ड्राइवर भी कहता है कि मेरे बच्चे भी अच्छी शिक्षी ही मेरी कामना है। अच्छी शिक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के दायरे में नहीं आती। Infrastructure तो एक व्यवस्था है। अच्छी शिक्षा अच्छे शिक्षकों से जुड़ी हुई होती है और इसलिए अच्छे शिक्षकों का निर्माण कैसे हो और हम एक नए तरीके से कैसे सोचें?

आज 12 वीं के बीएड, एमएड वगैरह होता है वो आते हैं, ज्यादातर बहुत पहले से ही जिसने तय किया कि मुझे शिक्षक बनना है ऐसे बहुत कम लोग होते हैं। ज्यादातर कुछ न कुछ बनने का try करते-करके करके हुए आखिर कर यहां चल पड़ते हैं। मैं यहां के लोगों की बात नहीं कर रहा हूं। हम एक माहौल बना सकते हैं कि 10वीं,12वीं की विद्यार्थी अवस्था में विद्यार्थियों के मन में एक सपना हो मैं एक उत्तम शिक्षक बनना चाहता हूं। ये कैसे बोया जाए, ये environment कैसे create किया जाए? और 12वीं के बाद पहले Graduation के बाद law faculty में जाते थे और वकालत धीरे-धीरे बदलाव आया और 12वीं के बाद ही पांच Law Faculty में जाते हैं और lawyer बनकर आते हैं। क्या 10वीं और 12वीं के बाद ही Teacher का एक पूर्ण समय का Course शुरू हो सकता है और उसमें Subject specific मिले और जब एक विद्यार्थी जिसे पता है कि मुझे Teacher बनना है तो Classroom में वो सिर्फ Exam देने के लिए पढ़ता नहीं है वो अपने शिक्षक की हर बारीकी को देखता है और हर चीज में सोचता है कि मैं शिक्षक बनूंगा तो कैसे करूंगा, मैं शिक्षक बनूंगा ये उसके मन में रहता है और ये एक पूरा Culture बदलने की आवश्यकता है।

उसके साथ-साथ भले ही वो विज्ञान का शिक्षक हो, गणित का शिक्षक हो उसको हमारी परंपराओं का ज्ञान होना चाहिए। उसे Child Psychology का पता होना चाहिए, उसको विद्यार्थियों को Counselling कैसे करना चाहिए ये सीखना चाहिए, उसे विद्यार्थियों को मित्रवत व्यवहार कैसे करना है ये सीखाना चाहिए और ये चीजें Training से हो सकती हैं, ऐसा नहीं है कि ये नहीं हो सकता है। सब कुछ Training से हो सकता है और हम इस प्रकार के उत्तम शिक्षकों को तैयार करें मुझे विश्वास है कि दुनिया को जितने शिक्षकों की आवश्यकता है, हम पूरे विश्व को, भारत के पास इतना बड़ा युवा धन है लाखों की तादाद में हम शिक्षक Export कर सकते हैं। Already मांग तो है ही है हमें योग्यता के साथ लोगों को तैयार करने की आवश्यकता है और एक व्यापारी जाता है बाहर तो Dollar या Pound ले आता है लेकिन एक शिक्षक जाता है तो पूरी-पूरी पीढ़ी को अपने साथ ले आता है। हम कल्पना कर सकते हैं कितना बड़ा काम हम वैश्विक स्तर पर कर सकते हैं और उसी एक सपने को साकार करने के लिए पंड़ित मदन मोहन मालवीय जी के नाम से इस मिशन को प्रारंभ किया गया है। और आज उसका शुभारंभ करने का मुझे अवसर मिला है।

आज पूरे विश्व में भारत के Handicraft तरफ लोगों का ध्यान है, आकर्षण है लेकिन हमारी इस पुरानी पद्धतियों से बनी हुई चीजें Quantum भी कम होता है, Wastage भी बहुत होता है, समय भी बहुत जाता है और इसके कारण एक दिन में वो पांच खिलौने बनाता है तो पेट नहीं भरता है लेकिन अगर Technology के उपयोग से 25 खिलौने बनाता है तो उसका पेट भी भरता है, बाजार में जाता है और इसलिए आधुनिक विज्ञान और Technology को हमारे परंपरागत जो खिलौने हैं उसका कैसे जोड़ा जाए उसका एक छोटा-सा प्रदर्शन मैंने अभी उनके प्रयोग देखे, मैं देख रहा था एक बहुत ही सामान्य प्रकार की टेक्नोलोजी को विकसित किया गया है लेकिन वो उनके लिए बहुत बड़ी उपयोगिता है वरना वो लंबे समय अरसे से वो ही करते रहते थे। उसके कारण उनके Production में Quality, Production में Quantity और उसके कारण वैश्विक बाजार में अपनी जगह बनाने की संभावनाएं और हमारे Handicrafts की विश्व बाजार की संभावनाएं बढ़ी हैं। आज हम उनको Online Marketing की सुविधाएं उपलब्ध कराएं। युक्ति, जो अभियान है उसके माध्यम से हमारे जो कलाकार हैं, काश्तकारों को ,हमारे विश्वकर्मा हैं ये इन सभी विश्वकर्माओं के हाथ में हुनर देने का उनका प्रयास। उनके पास जो skill है उसको Technology के लिए Up-gradation करने का प्रयास। उस Technology में नई Research हो उनको Provide हो, उस दिशा में प्रयास बढ़ रहे हैं।

हमारे देश में सांस्कृतिक कार्यक्रम तो बहुत होते रहते हैं। कई जगहों पर होते हैं। बनारस में एक विशेष रूप से भी आरंभ किया है। हमारे टूरिज्म को बढ़ावा देने में इसकी बहुत बड़ी ताकत है। आप देखते होंगे कि दुनिया ने, हम ये तो गर्व करते थे कि हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने हमें योग दिया holistic health के लिए preventive health के लिए योग की हमें विरासत मिली और धीरे-धीरे दुनिया को भी लगने लगा योग है क्या चीज और दुनिया में लोग पहुंच गए। नाक पकड़कर के डॉलर भी कमाने लग गए। लेकिन ये शास्त्र आज के संकटों के युग में जी रहे मानव को एक संतुलित जीवन जीने की ताकत कैसे मिले। योग बहुत बड़ा योगदान कर सकता है। मैं सितंबर में UN में गया था और UN में पहली बार मुझे भाषण करने का दायित्व था। मैंने उस दिन कहा कि हम एक अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाएं और मैंने प्रस्तावित किया था 21 जून। सामान्य रूप से इस प्रकार के जब प्रस्ताव आते हैं तो उसको पारित होने में डेढ़ साल, दो साल, ढ़ाई साल लग जाते हैं। अब तक ऐसे जितने प्रस्ताव आए हैं उसमें ज्यादा से ज्यादा 150-160 देशों नें सहभागिता दिखाई है। जब योग का प्रस्ताव रखा मुझे आज बड़े आनंद और गर्व के साथ कहना है और बनारस के प्रतिनिधि के नाते बनारस के नागरिकों को ये हिसाब देते हुए, मुझे गर्व होता है कि 177 Countries Co- sponsor बनी जो एक World Record है। इस प्रकार के प्रस्ताव में 177 Countries का Co- sponsor बनना एक World Record है और जिस काम में डेढ़-दो साल लगते हैं वो काम करीब-करीब 100 दिन में पूरा हो गया। UN ने इसे 21 जून को घोषित कर दिया ये भी अपने आप में एक World Record है।

हमारी सांस्कृतिक विरासत की एक ताकत है। हम दुनिया के सामने आत्मविश्वास के साथ कैसे ले जाएं। हमारा गीत-संगीत, नृत्य, नाट्य, कला, साहित्य कितनी बड़ी विरासत है। सूरज उगने से पहले कौन-सा संगीत, सूरज उगने के बाद कौन-सा संगीत यहां तक कि बारीक रेखाएं बनाने वाला काम हमारे पूर्वजों ने किया है और दुनिया में संगीत तो बहुत प्रकार के हैं लेकिन ज्यादातर संगीत तन को डोलाते हैं बहुत कम संगीत मन को डोलाते हैं। हम उस संगीत के धनी हैं जो मन को डोलाता है और मन को डोलाने वाले संगीत को विश्व के अंदर कैसे रखें यही प्रयासों से वो आगे बढ़ने वाला है लेकिन मेरे मन में विचार है क्या बनारस के कुछ स्कूल, स्कूल हो, कॉलेज हो आगे आ सकते हैं क्या और बनारस के जीवन पर ही एक विषय पर ही एक स्कूल की Mastery हो बनारस की विरासत पर, कोई एक स्कूल हो जिसकी तुलसी पर Mastery हो, कोई स्कूल हो जिसकी कबीर पर हो, ऐसी जो भी यहां की विरासत है उन सब पर और हर दिन शाम के समय एक घंटा उसी स्कूल में नाट्य मंच पर Daily उसका कार्यक्रम हो और जो Tourist आएं जिसको कबीर के पास जाना है उसके स्कूल में चला जाएगा, बैठेगा घंटे-भर, जिसको तुलसी के पास जाना है वो उस स्कूल में जाए बैठेगा घंटे भर , धीरे-धीरे स्कूल टिकट भी रख सकता है अगर popular हो जाएगी तो स्कूल की income भी बढ़ सकती है लेकिन काशी में आया हुआ Tourist वो आएगा हमारे पूर्वजों के प्रयासों के कारण, बाबा भोलेनाथ के कारण, मां गंगा के कारण, लेकिन रुकेगा हमारे प्रयासों के कारण। आने वाला है उसके लिए कोई मेहनत करने की जरूरत नहीं क्योंकि वो जन्म से ही तय करके बैठा है कि जाने है एक बार बाबा के दरबार में जाना है लेकिन वो एक रात यहां तब रुकेगा उसके लिए हम ऐसी व्यवस्था करें तब ऐसी व्यवस्था विकसित करें और एक बार रात रुक गया तो यहां के 5-50 नौजवानों को रोजगार मिलना ही मिलना है। वो 200-500-1000 रुपए खर्च करके जाएगा जो हमारे बनारस की इकॉनोमी को चलाएगा और हर दिन ऐसे हजारों लोग आते हैं और रुकते हैं तो पूरी Economy यहां कितनी बढ़ सकती है लेकिन इसके लिए ये छोटी-छोटी चीजें काम आ सकती हैं।

हमारे हर स्कूल में कैसा हो, हमारे जो सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, परंपरागत जो हमारे ज्ञान-विज्ञान हैं उसको तो प्रस्तुत करे लेकिन साथ-साथ समय की मांग इस प्रकार की स्पर्धाएं हो सकती हैं, मान लीजिए ऐसे नाट्य लेखक हो जो स्वच्छता पर ही बड़े Touchy नाटक लिखें अगर स्वच्छता के कारण गरीब को कितना फायदा होता है आज गंदगी के कारण Average एक गरीब को सात हजार रुपए दवाई का खर्चा आता है अगर हम स्वच्छता कर लें तो गरीब का सात हजार रुपए बच जाता है। तीन लोगों का परिवार है तो 21 हजार रुपए बच जाता है। ये स्वच्छता का कार्यक्रम एक बहुत बड़ा अर्थ कारण भी उसके साथ जुड़ा हुआ है और स्वच्छता ही है जो टूरिज्म की लिए बहुत बड़ी आवश्यकता होती है। क्या हमारे सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाट्य मंचन में ऐसे मंचन, ऐसे काव्य मंचन, ऐसे गीत, कवि सम्मेलन हो तो स्वच्छता पर क्यों न हो, उसी प्रकार से बेटी बचाओ भारत जैसा देश जहां नारी के गौरव की बड़ी गाथाएं हम सुनते हैं। इसी धरती की बेटी रानी लक्ष्मीबाई को हम याद करते हैं लेकिन उसी देश में बटी को मां के गर्भ में मार देते हैं। इससे बड़ा कोई पाप हो नहीं सकता है। क्या हमारे नाट्य मंचन पर हमारे कलाकारों के माध्यम से लगातार बार-बार हमारी कविताओं में, हमारे नाट्य मंचों पर, हमारे संवाद में, हमारे लेखन में बेटी बचाओ जैसे अभियान हम घर-घर पहुंच सकते हैं।

भारत जैसा देश जहां चींटी को भी अन्न खिलाना ये हमारी परंपरा रही है, गाय को भी खिलाना, ये हमारी परंपरा रही है। उस देश में कुपोषण, हमारे बालकों को……उस देश में गर्भवती माता कुपोषित हो इससे बड़ी पीड़ा की बात क्या हो सकती है। क्या हमारे नाट्य मंचन के द्वारा, क्या हमारी सांस्कृतिक धरोहर के द्वारा से हम इन चीजों को प्रलोभन के उद्देश्य में ला सकते हैं क्या? मैं कला, साहित्य जगत के लोगों से आग्रह करूंगा कि नए रूप में देश में झकझोरने के लिए कुछ करें।

जब आजादी का आंदोलन चला था तब ये ही साहित्यकार और कलाकार थे जिनकी कलम ने देश को खड़ा कर दिया था। स्वतंत्र भारत में सुशासन का मंत्र लेकर चल रहे तब ये ही हमारे कला और साहित्य के लोगों की कलम के माध्यम से एक राष्ट्र में नवजागरण का माहौल बना सकते हैं।

मैं उन सबको निमंत्रित करता हूं कि सांस्कृतिक सप्ताह यहां मनाया जा रहा है उसके साथ इसका भी यहां चिंतन हो, मनन हो और देश के लिए इस प्रकार की स्पर्धाएं हो और देश के लिए इस प्रकार का काम हो।

मुझे विश्वास है कि इस प्रयास से सपने पूरे हो सकते हैं साथियों, देश दुनिया में नाम रोशन कर सकता है। मैं अनुभव से कह सकता हूं, 6 महीने के मेरे अनुभव से कह सकता हूं पूरा विश्व भारत की ओर देख रहा है हम तैयार नहीं है, हम तैयार नहीं है हमें अपने आप को तैयार करना है, विश्व तैयार बैठा है।

मैं फिर एक बार पंडित मदन मोहन मालवीय जी की धरती को प्रणाम करता हूं, उस महापुरुष को प्रणाम करता हूं। आपको बहुत-बुहत शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद

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প্যারিসে স্বামীনারায়ন হিন্দু মন্দিরের উদ্বোধন অনুষ্ঠানে প্রধানমন্ত্রীর ভিডিও বার্তা
September 06, 2026
It is a matter of great joy that BAPS Swaminarayan Hindu Mandir is being inaugurated in Paris: PM
This temple will surely enrich the diversity of France and energize our cultural relations: PM
India-France Strategic Partnership is special as it rests on the strong foundation of old cultural and political bonds: PM

পূজনীয় মহন্ত স্বামী, ফরাসী সরকারের সম্মানীয় অতিথিবৃন্দ, ভারতীয় সম্প্রদায়ের সদস্যবৃন্দ, বিশ্বের বিভিন্ন প্রান্তের হরিভক্ত, ভদ্রমহোদয়াগণ ও ভদ্রমহোদয়গণ- জয় স্বামীনারায়নন!
আজ ফ্রান্সের রাজধানী প্যারিসে সুবিশাল স্বামীনারায়ণ মন্দিরের উদ্বোধন হচ্ছে। এই উদ্বোধন ভারত ও ফ্রান্সের মধ্যে সাংস্কৃতিক সম্পর্কের ক্ষেত্রে নতুন এক মাইলফলক রচনা করছে। পূজনীয় সাধু-সন্ত এবং সনাতন ঐতিহ্যের মহান ধারকদের আশীর্বাদে, আজকের এই উদ্বোধনী অনুষ্ঠান ‘বসুধৈব কুটুম্বকম’—অর্থাৎ ‘ সমগ্র বিশ্ব অভিন্ন এক পরিবার’—এই মহান ভাবনার এক মিলনক্ষেত্রে পরিণত হয়েছে। ভগবান স্বামীনারায়ণের আশীর্বাদ এবং আমাদের সাধু-সন্তদের স্নেহ ও আশীর্বাদে, এ ধরণের পবিত্র আয়োজনের সঙ্গে যুক্ত থাকার সুযোগ সবসময় পাওয়ার জন্য আমি আমি নিজেকে সৌভাগ্যবান মনে করি । আজও, প্যারিসে আপনাদের মধ্যে সশরীরে উপস্থিত না থাকলেও, অন্তরের গভীর স্থল থেকে আমি নিজেকে আপনাদের সঙ্গেই থাকার আনন্দ অনুভব করছি।

বন্ধুগণ,

এই বিশেষ মুহূর্তে আমি পরম পূজ্য প্রমুখ স্বামী মহারাজকেও শ্রদ্ধার সঙ্গে স্মরণ করি। প্রাচীনযুগে ভারতের সাংস্কৃতিক ও আধ্যাত্মিক মহিমা ছিল অপরিসীম। তিনি সেই ঐতিহ্যের নবজাগরণের এক অভিযান শুরু করেছিলেন। আজ সেই ভাবনা ইউরোপ তথা সমগ্র বিশ্বে ছড়িয়ে পড়ছে। ২০২৪ সালে আবুধাবিতে বিশাল এক মন্দিরের উদ্বোধন করা হয়েছে। হাজার হাজার মানুষ আজ সেখানে দর্শনের জন্য যান। আর এখন প্যারিসে স্বামীনারায়ণ মন্দির প্রতিষ্ঠার মধ্য দিয়ে সৃষ্টির এই ধারাবাহিকতা আমাদের সাধু সন্তদের সংকল্প ও শক্তিরই প্রমাণ। এই পবিত্র কাজের জন্য আমি পূজনীয় মহন্ত স্বামীর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করি, তাঁর চরণে প্রণাম জানাই। এই উপলক্ষে আমি বিএপিএস স্বামীনারায়ণ সংস্থা এবং লক্ষ লক্ষ হরি-ভক্তকে আন্তরিক অভিনন্দন জানাই।

বন্ধুগণ,

বিএপিএস-এর মাধ্যমে বিভিন্ন দেশে যখন মন্দির প্রতিষ্ঠিত হয়, তখন ভারতের প্রাচীন আদর্শ ও মানবিক মূল্যবোধও তার সঙ্গে সঙ্গে প্রসারিত হয়। আর ভারতীয় ভাবনায় বলে: "সমানং মনঃ সহ চিত্তমেষাম্" — অর্থাৎ আমাদের মন এক হোক, আমাদের হৃদয় যুক্ত হোক। ফ্রান্সে আজ যখন এমন একটি বিশাল মন্দির নির্মিত হয়েছে, তখন সেটি ফ্রান্সের বৈচিত্র্যকে একাধারে সমৃদ্ধ করবে, আবার ভারত ও ফ্রান্সের মধ্যে সাংস্কৃতিক সম্পর্ককেও আরও প্রাণবন্ত করে তুলবে।

বন্ধুগণ,

সাম্প্রতিক বছরগুলোতে ভারত ও ফ্রান্সের সম্পর্ক নতুন এক উচ্চতায় পৌঁছেছে। আমার বন্ধু প্রেসিডেন্ট ম্যাক্রোঁর সঙ্গে যৌথভাবে দুটি দেশ একটি আন্তর্জাতিক ক্ষেত্রে বিশেষ কৌশলগত অংশীদারিত্ব গড়ে তুলছে। প্রযুক্তি, কৃত্রিম বুদ্ধিমত্তা ও প্রতিরক্ষা থেকে শুরু করে মহাকাশ গবেষণা এবং জলবায়ু বিষয়ক বিভিন্ন উদ্যোগ—প্রতিটি ক্ষেত্রেই আমরা নতুন গতি ও উৎসাহ উদ্দীপনা নিয়ে এগিয়ে চলেছি। আমরা ২০২৬ সালকে 'ভারত-ফ্রান্স উদ্ভাবন বর্ষ' হিসেবেও উদযাপন করছি। এই কৌশলগত অংশীদারিত্ব বিশেষ তাৎপর্যপূর্ণ, কারণ এটি আমাদের দীর্ঘদিনের সাংস্কৃতিক ও রাজনৈতিক সম্পর্কের শক্তিশালী ভিত্তির ওপর গড়ে উঠেছে। ফ্রান্সের মাটিতে ভারতীয় সৈন্যদের আত্মত্যাগের স্মৃতি আজও অম্লান হয়ে আছে, ইতিহাস তার সাক্ষী। যারা ভাষা নিয়ে আগ্রহী, তারা জানেন সংস্কৃত ভাষাকে জনপ্রিয় করে তোলার ক্ষেত্রে ফরাসি পণ্ডিতরা কত গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করেছিলেন। রামকৃষ্ণ পরমহংসদেব ও স্বামী বিবেকানন্দের বিষয়ে রোমাঁ রোলাঁ-র লেখা আমাদের দুই দেশের সমাজকে একে অপরের আরও কাছাকাছি নিয়ে এসেছিল। প্যারিস থেকে পুদুচেরির অরবিন্দ আশ্রম পর্যন্ত—'দ্য মাদার'-এর আধ্যাত্মিক যাত্রা অগণিত ভারতীয় ও ফরাসি অনুসন্ধিৎসু মানুষকে অনুপ্রাণিত করেছে।

বন্ধুগণ,

কয়েক দশক আগে শ্রীল প্রভুপাদ স্বামীও ফ্রান্সে এসেছিলেন। ইসকনের মাধ্যমে তিনি ভারত ও ফ্রান্সের মধ্যে আধ্যাত্মিক সম্পর্কের নতুন এক অধ্যায়ের সূচনা করেছিলেন। যোগব্যায়ামও এখন ভারত ও ফ্রান্সের জনগণের মধ্যে পারস্পরিক সংযোগের একটি মাধ্যম হয়ে উঠেছে। আন্তর্জাতিক যোগ দিবসে আইফেল টাওয়ারের সামনে তোলা ছবিগুলো ফ্রান্সে যোগব্যায়ামের জনপ্রিয়তারই প্রমাণ। আর এখন, এই সুবিশাল বিএপিএস মন্দিরের মাধ্যমে আমাদের সাংস্কৃতিক সম্পর্কে আরও একটি নতুন অধ্যায় যুক্ত হচ্ছে।

বন্ধুগণ,

ভারত ও ফ্রান্সের যৌথ উদ্যোগ নিয়ে বর্তমানে নানা আলোচনা হচ্ছে। স্বামীনারায়ণ মন্দির এই সম্ভাবনার ক্ষেত্রে এক নতুন মাত্রা যোগ করেছে। এই মন্দিরটি ‘মেড ইন ইন্ডিয়া’ এবং ‘বিল্ট ইন ফ্রান্স’—অর্থাৎ এর নির্মাণে ভারত ও ফ্রান্স দুই দেশেরই অবদান রয়েছে। এর অনেক পাথর ভারতেই খোদাই করা হয়েছিল। এখানে ভারতের প্রাচীন শিল্পকলা ফ্রান্সের আধুনিক প্রকৌশলবিদ্যার সঙ্গে মিলিত হয়েছে। প্যারিসে এই বিশাল মন্দিরটি গড়ে উঠেছে। আশা করব, ভারত ও ফ্রান্সের মধ্যে সহযোগিতা এবং সম্ভাবনার প্রতীক হিসেবে এই মন্দির শতাব্দীর পর শতাব্দী ধরে বিবেচিত হবে।

বন্ধুগণ,

স্বামীনারায়ণ মন্দিরগুলি সব সময় ভক্তি বা উপাসনার কেন্দ্রই নয়, বরং সেবাকাজের জন্যও কেন্দ্র হয়ে উঠেছে। আমি শুনলাম, এই মন্দিরটিও সেবামূলক কাজের একটি কেন্দ্র হয়ে উঠবে। আমার দৃঢ় বিশ্বাস, এখান থেকে ভারতীয় সংস্কৃতির যে বার্তা ছড়িয়ে পড়বে, তা সমগ্র ইউরোপের মানুষের উপকারে আসবে। ভবিষ্যতে সময় পেলে, আমি অবশ্যই এই মন্দির দর্শন করার চেষ্টা করব। এই কথা বলে, এই শুভক্ষণে উপস্থিত সকল অতিথি, সকল পরিবার, সকল হরি-ভক্ত এবং প্রবাসী ভারতীয়দের আমি আবারও অনেক অনেক অভিনন্দন জানাচ্ছি।

আপনাদের অনেক ধন্যবাদ!

ম্যাসি বোকু!

জয় স্বামীনারায়ণ!