PM Modi unveils the statue of Swami Vivekananda in Kuala Lumpur
It was Swami Vivekananda who first gave the concept of One Asia: PM
South East Asia Summit speaking of One Asia; a concept given by Swami Vivekananda: PM.
From the Vedas to Vivekananda, India's culture is rich: PM
Swami Vivekananda neither a person nor a system, it is the identity of the soul of ancient India: PM
Vivekananda is not just a name. He personifies the thousands year old Indian culture and civilization: PM
It is a great fortune for me to dedicate the statue of Swami Vivekananda on Malaysian soil: PM
Pursuit of truth got Ramakrishna Paramhans & Swami Vivekananda together. They were not looking for a teacher or a disciple: PM
Swami Vivekananda was in pursuit of the truth: PM

भाइयो और बहनों।

अभी सुप्रियान जी कह रहे थे कि हमने इस परिसर में तो विवेकानंद जी की प्रतिमा की स्था्पना की, पर हम हमारे मन-मंदिर में, हमारे हृदय में विवेकानंद जी को प्रतिस्था पित करें और मैं ये बात आपको कहूं और आप कर लेंगे।

मैं नहीं मानता हूं कि मेरे कहने से हमारे भीतर विवेकानंद प्रवेश कर सकते है और न ही किसी के प्रवचन से विवेकानंद जी हमारे भीतर प्रवेश कर सकते है। विवेकानंद, ये न किसी व्यक्ति का नाम है, विवेकानंद न किसी व्यवस्था की पहचान है, एक प्रकार से विवेकानंद सहस्त्र साल पुरानी भारत की आत्मा की पहचान है।

वेद से विवेकानंद तक हमारी एक सांस्कृतिक लंबी विरासत है और उपनिषद से ले कर के उपग्रह तक हमने हमारी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक विकास यात्रा को भी सामर्थ्य दिया है। 

उपनिषद से शुरू किया होगा, उपग्रह तक हम पहुंचे होंगे लेकिन हमारा जो मूल Pin है जो हमारी आत्मा है और सच्चे अर्थ में जो हमारी पहचान है, उसको अगर हम बरकरार रखते है तो उसका अर्थ ये हुआ कि मैं मेरे भीतर स्वामी विवेकानंद जी को जीवित रखने की कोशिश कर रहा हूं।

रामकृष्ण परमहंस और नरेन्द्र । ये दोनों के बीच की दुनिया को अगर हम समझ लें तो शायद विवेकानंद जी को समझने में सुविधा बन जाती है।

नरेन्द्र कभी गुरू की खोज में नहीं निकले थे, न ही उसे गुरू की तलाश थी, नरेन्द्र सत्य् की तलाश कर रहा था। ईश्वर है कि नहीं! उसके मन में एक आशंका थी कि परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं हो सकती है। ईश्ववर नाम का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता है और वो उस सत्य को जानने के लिए जूझ रहे थे।

और न ही रामकृष्ण परमहंस किसी शिष्य की तलाश में थे। मैं गुरू परम्परा की भावना , मेरे बाल कुछ शिष्यों की परंपरा अगर है। और मैं जो आश्रम प्रतिस्थापित करूं और उसको कोई चलाता रहे, रामकृष्ण देव के मन में भी ऐसे किसी शिष्या की तलाश नहीं थी ऐसी कोई मनीषा नहीं थी।

एक गुरू जिसको शिष्यो की खोज नहीं थी, एक शिष्य जिसको गुरू की खोज नहीं थी, लेकिन कमाल देखिए, एक सत्य को समर्पित था और दूसरा सत्य को खोजना चाहता था और उसी सत्य की तलाश में दोनों को जोड़ के रख दिया।

और ये अगर हम समझ लें तो फिर सत्य की तलाश क्या हो सकती है, सत्य के रास्ते पे चलना कितना कठिन हो सकता है और उसमें भी कैसे सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वो विवेकानंद जी के जीवन से हम जान सकते है।

हम विवेकानंद जी के उस कालखंड का विचार करें जहां पर धर्म का प्रभाव, पूजा पद्धति की विधि का प्रभाव, rituals का माहात्मय । धर्म गुरुओं का माहात्मय, धर्मग्रथों का माहात्मय। ये चरम सीमा पर था। उस समय एक नौजवान उन सारी परम्पराओं से भाग जाने की बात करे, इसकी आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता है।

एक बहुत बड़ा वर्ग ये मानता था कि भगवान के पास घंटो तक बैठे रहे, पूजा-पाठ करते रहे, आरती-धूप करते रहे, फूल चढ़ाते रहे, नए-नए प्रसाद चढ़ाते रहे तो जीवन के पाप धूल जाते है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। एक चरम सीमा का आनंद प्राप्त, करने का अवसर मिल जाता है। ये सोच बनी पड़ी हुई थी और उस समय विवेकानंद डंके की चोट पर कहते थे कि जन सेवा ये प्रभु सेवा। सामान्य मानवी जो आपके सामने जिंदा है, जो दुख और दर्द से पीड़ित है, उसकी सेवा करो, ईश्वर अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

उन्होंने जब कलकत्ते की धरती पर नौजवानों से पूछा कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता क्या होता है, हमें क्या करना चाहिए तब उन्होंने कहा ये सब छोड़ो, जाओ फुटबॉल खेलो, मस्ती से फुटबॉल खेलो पूरी तरह से अपने आप को झोंक दो, हो सकता है तुम्हें रास्ता मिल जाएगा। उस समय हम गुलामी के कालखंड में जी रहे थे, कोई सोच भी नहीं सकता था भारत कभी आजाद हो सकता है लेकिन स्वामी विवेकानंद एक दीर्घ दृष्टा थे और वो कहते थे, अपने जीवन के काल में कहा था कि मैं, मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं, मैं मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं कि मेरी भारत मां उठ खड़ी हुई है, वो जगत गुरू के स्थान पर विराजमान मैं देख रहा हूं, मैं एक दिनमान भारत माता मैं देख रहा हूं और वो दिन बहुत निकट होगा । ये भाव जगत स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन काल में अपनी आंखों से देखा था और वो हिंदुस्तान को प्रेरित करने का प्रयास करते थे।

वो एक कालखंड था जब आध्यात्म प्रधान जीवन था और वो सिर्फ भारत में नहीं एशिया के सभी देशों में समाहित था और दूसरी तरफ वो पश्चिम का विचार था, जहां अर्थ प्रधान था। आध्यात्म प्रधान जीवन और अर्थ प्रधान जीवन के बीच एक शताब्दियों का टकराव चल रहा था। अर्थ प्रधान जीवन ने आध्यात्म प्रधान जीवन को किनारे कर दिया था। अर्थ प्रधान जीवन जन सामान्य की आशा, आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु बन गया था और ऐसे कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने हिम्मत के साथ और 30-32 साल की आयु में पश्चिम की दुनिया में जाकर के, उस धरती पर जाकर के विश्व को आध्यत्मिकता का संदेश देने का एक सामर्थ्यवान काम किया था। जिस महापुरुष ने एशिया की आध्यात्मिक ताकत को दुनिया को पहचान कराया था और पहली बार विश्व को एशिया की अपनी धरती की एक अलग चिंतनधारा है, यहां के संस्कार अलग हैं और विश्व को देने के लिए उसके पास बहुत कुछ है। ये बात डंके की चोट पर कहने का साहस स्वामी विवेकानंद ने किया था। कल मैं यहां आसियान समिट में था आज यहां मैं South East Asia Summit में था और एक बात वहां उभरकर के सामने आती थी और वो एक आती थी कि One Asia .

One Asia का विचार लेकिन आज जो आवाज गूंज रही है उसमें आर्थिक व्यवस्था है, राजनीतिक व्यवस्था है, सरकारों के मेलजोल की व्यवस्था का चिंतन है लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि One Asia का concept आध्यात्मिक धरातल पर सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने प्रचारित किया था। मैं एक पुरानी घटना आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। ..

After Swami Vivekananda introduced the East and Asia to the West, Scholars and philosophers like Okakura, Karinzo from Japan, Rabindranath Tagore, Mahrishi Aurbindo, Anand Kumar Swami and Vinoy Sarkar were inspired by Swami Vivekananda. OkaKura invited Swami Vivekananda to Japan and also sent him a cheque of Rs 300. He came to Calcutta and met Swami Vivekananda on 1st February 1902 and both went to Bodh Gaya together. OkaKura is the symbol of Asianism. In his book, ‘Ideals of the East’ by Okakura, the manuscripts were edited by Sister Nivedita, the foremost western disciple of Swami Vivekananda. The very first sentence, this is one important thing I want to tell you. The very first sentence is “Asia is one.” The idea of Asian unity is clearly Swami Vivekananda’s concept. In his next book, Okakura began by saying “Brothers and sisters of Asia”, echoing Swami Vivekananda’s speech at Parliament of Religions.

मैं ये इसलिए कह रहा था कि जो उस समय इस प्रकार के Philosopher विवेकानंद जी के प्रभाव में थे, उन्होंने जो विवेकानंद जी से मंत्र पाया था वो Asia is One ये मंत्र पाया था। आज 100 साल के बाद आर्थिक, राजनीतिक कारणों से One Asia की चर्चा हो रही है लेकिन उस समय आध्यात्मिक एकात्मता के आधार पर विवेकानंद जी ये देख पाते थे कि ये भूमि है जो विश्व को संकटों से बाहर निकाल सकती है और आज दुनिया जिन दो संकटों से जूझ रही है अगर उन दो संकटों के समाधान का रास्ता कोई दे सकता है तो एशिया की धरती से ही निकल सकता है।

और इसलिए आज विश्व कह रहा है Climate change और Global warming की बात, आज विश्व कह रहा है Terrorism की चर्चा, यही तो धरती है जहां भगवान बुद्ध का संदेश मिला, यही तो धरती है जहां हिंदुत्व का संदेश मिला और इसी धरती से ये बातें उभर करके आ गई हैं जहां पर ये कहा गया एकम सत, विपरा बहुधा विधंति, Truth is One, Wise call it in different ways ये जो मूल मंत्र हैं वो सबको एक रखना, जोड़ने की ताकत देता है और इसलिए जब Terrorism की बात आती है तो उसका समाधान इसमें holier than thou की कल्पना ही नहीं है, हर सत्य को स्वीकार किया जाता है और जब हर सत्य को स्वीकार किया जाता है तब conflict के लिए अवकाश नहीं होता है और जब conflict के लिए अवकाश नहीं है तो संघर्ष की संभावना नहीं है और जहां संघर्ष नहीं है वहां Terrorism के रास्ते पर जाना का कोई कारण नहीं बनता है। 


आज विश्व Global Warming की चर्चा करता है। हम वो लोग हैं जिसने पौधे में परमात्मा देखा था, हम जितने भी ईश्वर की कल्पना की है हर ईश्वर के साथ कोई न कोई प्राकृतिक जीवन जुड़ा हुआ है। किसी न किसी वृक्ष के साथ उन्होंने साधना की है, किसी न किसी पशु-पक्षी को उन्होंने पालन किया है। ये सहज संदेश हमारी परंपरा में रहा हुआ है। हम प्रकृति के शोषण का पक्षकार नहीं रहे हैं, हम nature के साथ मित्रतापूर्ण गुजारा करने की सबक ले करके चले हुए लोग है। वही संस्कृति है जो ग्लोबल वार्मिंग से मानवजाति को बचा सकती है।

मुझे लगता है कि स्वा्मी विवेकानंद जी ने हमें ये जो रास्तेे दिखाएं है। उन रास्तों को अगर हम परिपूर्ण करते है तो हमें हमारे भीतर कोई नए विवेकानंद को प्रतिस्थापित करने की जरूरत नहीं है। उनकी कही हुई एक बात को ले करके भी हम चल पाते है मैं समझता हूं हम आने वाली शताब्दियों तक मानवजात की सेवा करने के लिए कुछ न कुछ योगदान करके जा सकते है।

आज मुझे यहां एक योग की पुस्तक का भी लोकापर्ण करने का अवसर मिला है और वो भी हमारे सरकार के साथ ही श्रीमान शाहू ने यहां की भाषा में योग की पुस्तक की रचना की है। वे स्वयं सरकारी अधिकारी है लेकिन योग के प्रति उनका समर्पण है। मुझे खुशी हुई उनकी उस किताब का लोकापर्ण करते हुए। आज विश्व योग के प्रति आकर्षित हुआ है। हर कोई तनाव मुक्त जीवन का रास्ता खोज रहा है और उसको लगता है उसकी खिड़की योग से खुलती है और इसलिए हर कोई उस खिड़की में झांकने की कोशिश करता है।

यूनाइटेड नेशन ने अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस के रूप में 21 जून को स्वीकार किया। दुनिया के 177 देशों ने उसको को-स्पोंसर किया और दुनिया के सभी देशों ने 21 जून को योग का दिवस मनाया। मानवजात जो कि अपने मानसिक समाधान का रास्ता तलाश रही है। Holistic health care की तरफ आगे बढ़ रही है। तब उसको लगता है कि योग एक ऐसी सरल विद्या है जिसको अगर हम दिन के आधा-पौना घंटा भी लगा ले तो हम अपने मन, बुद्धि, शरीर को एक दिशा में चला सकते है। आज हमारे लिए ये चुनौती नहीं है कि हम दुनिया को समझाएं कि योग क्या है, हमारे सामने चुनौती ये है कि सारा विश्व अच्छे योग टीचरों की मांग कर रहा है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि हम Perfect योग teacher को कैसे दें ताकि इस विद्या का सही स्वरूप आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे और जो भी इसका लाभ उठाएं, उसको सचमुच में, उसका जो मकसद हो, मकसद पूरा करने में काम हो और इसलिए जितना अधिक आधुनिक भाषा में हम योग को प्रचारित करें, जितनी अधिक योग को आधुनिक भाषा में प्रतिपादित करें और खुद योग के जीवन को जीकर के दुनिया के सामने प्रस्तुत करें और अधिकतम योग के teacher तैयार करें, hobby के रूप में तैयार करें भले profession के रूप में न तैयार कर सकें। दिन में हम 50 काम करते हैं, एक घंटे योगा के लिए जो भी सीखने आएगा, हम सिखाएंगे।

ये पूरा हम एशिया के वायुमंडल में लाते हैं तो विश्व की जो अपेक्षा है, उस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए उत्तम योग teacher हम दुनिया को दे सकते हैं। मैं स्वामी सूपरयानंद जी का बहुत आभारी हूं कि आज मुझे इस पवित्र स्थान पर आने का अवसर मिला, विवेकानंद जी की प्रतिमा का लोकापर्ण करने का अवसर मिला और मुझे विश्वास है कि इस धरती पर आने वाले विश्व के सभी लोगों को यहां से कोई प्रेरणा मिलती रहेगी। इसी एक शुभकामना के साथ आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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ആദരണീയനും എന്റെ സുഹൃത്തുമായ പ്രസിഡന്റ്,

ഇരുരാജ്യങ്ങളിലെയും പ്രതിനിധികളേ,

മാധ്യമ സുഹൃത്തുക്കളേ,

നമസ്‌കാരം!

താഷ്‌കൻ്റിൽ എനിക്കും എൻ്റെ പ്രതിനിധി സംഘത്തിനും നൽകിയ ഊഷ്‌മളവും ഹൃദ്യവുമായ സ്വീകരണത്തിന് ഉസ്‌ബെക്കിസ്ഥാനിലെ പ്രസിഡൻ്റിനോടും ജനങ്ങളോടും ഞാൻ ആത്മാർത്ഥമായി നന്ദി പറയുന്നു.

ഇത് എൻ്റെ നാലാമത്തെ ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാൻ സന്ദർശനമാണ്. അത് നമ്മുടെ ബന്ധങ്ങളുടെ അടുപ്പം, നമ്മുടെ അടുത്ത ഏകോപനം, നമ്മുടെ ആഴത്തിലുള്ള സൗഹൃദം എന്നിവയെ പ്രതിഫലിപ്പിക്കുന്നു.

ഒരു ദശാബ്ദത്തോളമായി പ്രസിഡൻ്റിനൊപ്പം പ്രവർത്തിക്കാനുള്ള അവസരം എനിക്ക് ലഭിച്ചിട്ടുണ്ട്. ഇക്കാലയളവിൽ പത്തിലധികം തവണ അദ്ദേഹത്തെ കാണാൻ അവസരം ലഭിച്ചിട്ടുണ്ട്.

അദ്ദേഹത്തിന്റെ ശുഭാത്മക ചിന്തയും ഭാവിയിലേക്കുള്ള കാഴ്ചപ്പാടും തുടർച്ചയായ പഠന മനോഭാവവും ശരിക്കും പ്രചോദനം നൽകുന്നതാണ്. ഇന്ത്യയോടുള്ള അദ്ദേഹത്തിന്റെ ആഴത്തിലുള്ള സൗഹൃദത്തിനും നമ്മുടെ ബന്ധത്തോടുള്ള അദ്ദേഹത്തിന്റെ അചഞ്ചലമായ പ്രതിബദ്ധതയ്ക്കും ഞാൻ അദ്ദേഹത്തെ ആത്മാർത്ഥമായി പ്രശംസിക്കുന്നു.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാൻ മധ്യേഷ്യയുടെ ഹൃദയഭാഗത്തും ഈ മേഖലയുമായുള്ള ഇന്ത്യയുടെ ഇടപെടലിന്റെ കേന്ദ്രത്തിലുമാണ്. ഇന്ത്യയും ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാനും കാഴ്ചപ്പാടുകളുടെയും അഭിലാഷങ്ങളുടെയും ആഴത്തിലുള്ള സംയോജനം പങ്കിടുന്നു. "യാംഗി ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാൻ", "വികസിത് ഭാരത് 2047" എന്നിവയുടെ കാതൽ നമ്മുടെ യുവത്വം, നവീനാശയം, എല്ലാവരെയും ഉൾക്കൊള്ളുന്ന വളർച്ച, ആധുനിക സാങ്കേതികവിദ്യ എന്നിവയാണ്. ഈ പങ്കിട്ട ദർശനത്താൽ നയിക്കപ്പെടുന്ന ഞങ്ങൾ ഇരു രാജ്യങ്ങളിലെയും ജനങ്ങളുടെ ക്ഷേമത്തിനും സമൃദ്ധിക്കും വേണ്ടി പ്രവർത്തിക്കുന്നു.

ഈ വർഷം നമ്മുടെ തന്ത്രപരമായ പങ്കാളിത്തത്തിന്റെ 15-ാം വാർഷികമാണ്. ഈ പ്രത്യേക അവസരത്തിൽ, നമ്മുടെ ബന്ധത്തെ സമഗ്രമായ ഒരു തന്ത്രപ്രധാന പങ്കാളിത്തത്തിന്റെ തലത്തിലേക്ക് ഉയർത്താൻ ഞങ്ങൾ തീരുമാനിച്ചു.

ഇന്ന് ഈ പുതിയ ചട്ടക്കൂടിൽ നമ്മുടെ പങ്കാളിത്തം കൂടുതൽ വർദ്ധിപ്പിക്കാനും വ്യക്തമായ ഫലങ്ങളോടെ മുന്നോട്ട് കൊണ്ടുപോകുകയും ചെയ്യുന്നതിനുള്ള ഒരു അഭിലാഷകരമായ അജണ്ട ഞങ്ങൾ തയ്യാറാക്കിയിട്ടുണ്ട്.

നമ്മുടെ ഉഭയകക്ഷി വ്യാപാരം ഒരു ബില്യൺ ഡോളർ കടന്നു. 2030-ഓടെ ഉഭയകക്ഷി വ്യാപാരത്തിൽ അഞ്ച് ബില്യൺ ഡോളറിൻ്റെ ലക്ഷ്യം ഞങ്ങൾ ഇപ്പോൾ നിശ്ചയിച്ചിട്ടുണ്ട്. ഇത് നേടുന്നതിന്, വിപണി പ്രാപ്യത, കണക്റ്റിവിറ്റി, ബാങ്കിംഗ്, പേയ്‌മെൻ്റ് സംവിധാനങ്ങൾ എന്നിവയുമായി ബന്ധപ്പെട്ട പ്രശ്‌നങ്ങൾ ഞങ്ങൾ വ്യവസ്ഥാപിതമായി പരിഹരിക്കും.

അടിസ്ഥാന സൗകര്യ വികസനത്തിൽ ഇരു കൂട്ടർക്കും പ്രയോജനകരമായ സഹകരണം വർദ്ധിപ്പിക്കുന്നതിന് ഞങ്ങൾ ഒരുമിച്ച് പ്രവർത്തിക്കും. ഡിജിറ്റൽ പൊതു അടിസ്ഥാന സൗകര്യങ്ങൾ, നിർമിത ബുദ്ധി, നിർണായക ധാതുക്കൾ, ശുദ്ധമായ ഊർജ്ജം, ബഹിരാകാശം, ആണവോർജ്ജം എന്നിവയിലെ സഹകരണം നമ്മുടെ ബന്ധത്തെ ഭാവിക്ക് അനുയോജ്യമാക്കുന്നു.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

കൃഷിയിലും ആരോഗ്യ സംരക്ഷണത്തിലുമുള്ള നമ്മുടെ ശക്തികൾ പരസ്പര പൂരകമാണ്. ഉദ്യാനകൃഷിയിലെ ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാന്റെ വൈദഗ്ധ്യവും ഇന്ത്യയുടെ ആധുനിക കാർഷിക രീതികളും സംയോജിപ്പിക്കുന്നതിലൂടെ, ഇരു രാജ്യങ്ങളുടെയും ഭക്ഷ്യസുരക്ഷയ്ക്ക് നാം സംഭാവന നൽകും.

ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാന്റെ ഔഷധ സസ്യങ്ങളും ആയുർവേദത്തിലുള്ള ഇന്ത്യയുടെ വൈദഗ്ധ്യവും സ്വാഭാവികമായ സംയോജനമാണ്. പരമ്പരാഗത വൈദ്യശാസ്ത്രത്തിൽ ഇന്ന് എത്തിയ കരാർ ഈ മേഖലയിലെ നമ്മുടെ സംയുക്ത ശ്രമങ്ങൾക്ക് കൂടുതൽ പ്രചോദനം നൽകും.

നമ്മുടെ പങ്കാളിത്തം രണ്ട് തലസ്ഥാനങ്ങളിൽ മാത്രമായി ഒതുങ്ങുന്നില്ലെന്ന് ഉറപ്പാക്കുക എന്നതാണ് ഞങ്ങളുടെ ശ്രമം. അതിനാൽ, നമ്മുടെ നഗരങ്ങളും സംസ്ഥാനങ്ങളും തമ്മിൽ പങ്കാളിത്തം സ്ഥാപിക്കുന്നതിനായി ഞങ്ങൾ പ്രവർത്തിക്കുന്നു. നഗര മാനേജ്മെന്റ്, വ്യവസായം, വിദ്യാഭ്യാസം, ടൂറിസം, സംസ്കാരം തുടങ്ങിയ മേഖലകളിൽ സുസ്ഥിരമായ നേരിട്ടുള്ള ബന്ധങ്ങൾ വളർത്തിയെടുക്കാൻ ഈ പങ്കാളിത്തങ്ങൾ സഹായിക്കും.

നമ്മുടെ ഇരു രാജ്യങ്ങളും തമ്മിലുള്ള അടുത്ത പ്രതിരോധ, സുരക്ഷാ സഹകരണം നമ്മുടെ ബന്ധത്തിന് അടിവരയിടുന്ന ആഴത്തിലുള്ള പരസ്പര വിശ്വാസത്തെ പ്രതിഫലിപ്പിക്കുന്നു. മുന്നോട്ട് പോകുമ്പോൾ, നമ്മുടെ ഇരു രാജ്യങ്ങളുടെയും പ്രതിരോധ വ്യവസായങ്ങൾ തമ്മിലുള്ള നേരിട്ടുള്ള ബന്ധം, സഹ-ഉല്പാദനം, സഹ-വികസനം എന്നിവ പ്രോത്സാഹിപ്പിക്കും.

ഭീകരത, തീവ്രവാദം, വിഘടനവാദം എന്നിവ മുഴുവൻ മേഖലയ്ക്കും ഗുരുതരമായ വെല്ലുവിളികൾ ഉയർത്തുന്നുവെന്ന് ഞങ്ങൾ വിശ്വസിക്കുന്നു.

അവരോട് സഹിഷ്ണുതയില്ലാത്ത നയം സ്വീകരിക്കാനുള്ള ഞങ്ങളുടെ പങ്കിട്ട ദൃഢനിശ്ചയം അചഞ്ചലമായിരുന്നു, ഇനിയും അങ്ങനെ തന്നെ തുടരും.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

നമ്മുടെ ബന്ധത്തിന്റെ ആഴമേറിയ വേരുകൾ നമ്മുടെ പങ്കിട്ട പൈതൃകത്തിലാണ്. ഇന്ന്, ഈ ബന്ധങ്ങൾ കൂടുതൽ ശക്തിപ്പെടുത്തുന്നതിന് ഞങ്ങൾ പ്രത്യേക ഊന്നൽ നൽകി.

ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാന്റെ ബുദ്ധമത പൈതൃക കേന്ദ്രങ്ങളുടെ സംരക്ഷണത്തിനായി ഞങ്ങൾ ഒരുമിച്ച് പ്രവർത്തിക്കും. നമ്മുടെ രണ്ട് രാജ്യങ്ങളിലെയും യുവാക്കൾ, പ്രത്യേകിച്ച് വിദ്യാർത്ഥികൾ, പ്രൊഫഷണലുകൾ എന്നിവർ തമ്മിലുള്ള വിനിമയം പ്രോത്സാഹിപ്പിക്കുന്നത് ഞങ്ങൾക്ക് ഉയർന്ന മുൻഗണനയാണ്. ഇന്ന് ഇരു രാജ്യങ്ങളും തമ്മിലുള്ള ടൂറിസം പ്രോത്സാഹിപ്പിക്കുന്നതിനുള്ള ഒരു സഹകരണ പരിപാടിയിൽ ഞങ്ങൾ ധാരണയിലെത്തി. ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാനിൽ ഹിന്ദി ഭാഷ പ്രോത്സാഹിപ്പിക്കുന്നതിനായി ഇന്ന് ഞങ്ങൾ സ്കോളർഷിപ്പുകൾ പ്രഖ്യാപിക്കാൻ പോകുന്നു എന്നതിൽ എനിക്ക് സന്തോഷമുണ്ട്.

നമ്മുടെ സഹകരണത്തിന്റെ ഒരു പ്രധാന മേഖലയായി കായികരംഗവും ഉയർന്നുവരുന്നു. കഴിഞ്ഞ വർഷം, 20 വയസ്സുള്ള ഉസ്ബെക്ക് ഗ്രാൻഡ്മാസ്റ്റർ സിൻഡറോവ് ഗോവയിൽ നടന്ന FIDE ലോകകപ്പ് നേടി. നവംബറിൽ ഇന്ത്യയുടെ 20 വയസ്സുള്ള ചെസ് ചാമ്പ്യൻ ഗുകേഷിനെ നേരിടാൻ അദ്ദേഹം ഒരുങ്ങുകയാണ്. ഈ രണ്ട് യുവതാരങ്ങളും ചെസ്സ്ബോർഡിൽ ഏറ്റുമുട്ടുമ്പോൾ, ലോകം മുഴുവൻ ഈ ആവേശകരമായ മത്സരം വീക്ഷിക്കും. അടുത്ത മാസം സമർഖണ്ഡിൽ നടക്കുന്ന ചെസ് ഒളിമ്പ്യാഡിന് ഞാൻ എന്റെ ആശംസകൾ നേരുന്നു. വരും കാലങ്ങളിൽ, കുറാഷ്, കബഡി തുടങ്ങിയ പരമ്പരാഗത കായിക വിനോദങ്ങളും നമ്മുടെ കായിക പങ്കാളിത്തത്തിന് പുതിയ ഊർജ്ജം നൽകും.

ഇന്നത്തെ ചർച്ചകൾ നമ്മുടെ ബന്ധങ്ങളുടെ ഭാവിക്ക് വ്യക്തമായ ഒരു ഗതി നിശ്ചയിച്ചിട്ടുണ്ട്. ശക്തമായ ഇന്ത്യ-ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാൻ പങ്കാളിത്തം മധ്യേഷ്യയിൽ സമാധാനത്തിനും പുരോഗതിക്കും സമൃദ്ധിക്കും കരുത്തുറ്റ ഒരു ശക്തിയായിരിക്കും.

ബഹുമാന്യരേ,

നിങ്ങളുടെ സൗഹൃദത്തിനും ഇന്ന് നമ്മൾ നടത്തിയ ഫലപ്രദമായ ചർച്ചകൾക്കും ഒരിക്കൽ കൂടി ഞാൻ വളരെ നന്ദി പറയുന്നു.

രണ്ട് ദിവസത്തിനുള്ളിൽ, ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാൻ അതിന്റെ സ്വാതന്ത്ര്യത്തിന്റെ 35-ാം വാർഷികം ആഘോഷിക്കും. ഇന്ത്യയിലെ 1.4 ബില്യൺ ജനങ്ങളുടെ പേരിൽ, ഈ അവസരത്തിൽ നിങ്ങൾക്കും ഉസ്ബെക്കിസ്ഥാനിലെ എല്ലാ പൗരന്മാർക്കും എന്റെ ഊഷ്മളമായ അഭിനന്ദനങ്ങളും ആശംസകളും അറിയിക്കുന്നു.

വളരെ നന്ദി.