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PM Modi unveils the statue of Swami Vivekananda in Kuala Lumpur
It was Swami Vivekananda who first gave the concept of One Asia: PM
South East Asia Summit speaking of One Asia; a concept given by Swami Vivekananda: PM.
From the Vedas to Vivekananda, India's culture is rich: PM
Swami Vivekananda neither a person nor a system, it is the identity of the soul of ancient India: PM
Vivekananda is not just a name. He personifies the thousands year old Indian culture and civilization: PM
It is a great fortune for me to dedicate the statue of Swami Vivekananda on Malaysian soil: PM
Pursuit of truth got Ramakrishna Paramhans & Swami Vivekananda together. They were not looking for a teacher or a disciple: PM
Swami Vivekananda was in pursuit of the truth: PM

भाइयो और बहनों।

अभी सुप्रियान जी कह रहे थे कि हमने इस परिसर में तो विवेकानंद जी की प्रतिमा की स्था्पना की, पर हम हमारे मन-मंदिर में, हमारे हृदय में विवेकानंद जी को प्रतिस्था पित करें और मैं ये बात आपको कहूं और आप कर लेंगे।

मैं नहीं मानता हूं कि मेरे कहने से हमारे भीतर विवेकानंद प्रवेश कर सकते है और न ही किसी के प्रवचन से विवेकानंद जी हमारे भीतर प्रवेश कर सकते है। विवेकानंद, ये न किसी व्यक्ति का नाम है, विवेकानंद न किसी व्यवस्था की पहचान है, एक प्रकार से विवेकानंद सहस्त्र साल पुरानी भारत की आत्मा की पहचान है।

वेद से विवेकानंद तक हमारी एक सांस्कृतिक लंबी विरासत है और उपनिषद से ले कर के उपग्रह तक हमने हमारी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक विकास यात्रा को भी सामर्थ्य दिया है। 

उपनिषद से शुरू किया होगा, उपग्रह तक हम पहुंचे होंगे लेकिन हमारा जो मूल Pin है जो हमारी आत्मा है और सच्चे अर्थ में जो हमारी पहचान है, उसको अगर हम बरकरार रखते है तो उसका अर्थ ये हुआ कि मैं मेरे भीतर स्वामी विवेकानंद जी को जीवित रखने की कोशिश कर रहा हूं।

रामकृष्ण परमहंस और नरेन्द्र । ये दोनों के बीच की दुनिया को अगर हम समझ लें तो शायद विवेकानंद जी को समझने में सुविधा बन जाती है।

नरेन्द्र कभी गुरू की खोज में नहीं निकले थे, न ही उसे गुरू की तलाश थी, नरेन्द्र सत्य् की तलाश कर रहा था। ईश्वर है कि नहीं! उसके मन में एक आशंका थी कि परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं हो सकती है। ईश्ववर नाम का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता है और वो उस सत्य को जानने के लिए जूझ रहे थे।

और न ही रामकृष्ण परमहंस किसी शिष्य की तलाश में थे। मैं गुरू परम्परा की भावना , मेरे बाल कुछ शिष्यों की परंपरा अगर है। और मैं जो आश्रम प्रतिस्थापित करूं और उसको कोई चलाता रहे, रामकृष्ण देव के मन में भी ऐसे किसी शिष्या की तलाश नहीं थी ऐसी कोई मनीषा नहीं थी।

एक गुरू जिसको शिष्यो की खोज नहीं थी, एक शिष्य जिसको गुरू की खोज नहीं थी, लेकिन कमाल देखिए, एक सत्य को समर्पित था और दूसरा सत्य को खोजना चाहता था और उसी सत्य की तलाश में दोनों को जोड़ के रख दिया।

और ये अगर हम समझ लें तो फिर सत्य की तलाश क्या हो सकती है, सत्य के रास्ते पे चलना कितना कठिन हो सकता है और उसमें भी कैसे सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वो विवेकानंद जी के जीवन से हम जान सकते है।

हम विवेकानंद जी के उस कालखंड का विचार करें जहां पर धर्म का प्रभाव, पूजा पद्धति की विधि का प्रभाव, rituals का माहात्मय । धर्म गुरुओं का माहात्मय, धर्मग्रथों का माहात्मय। ये चरम सीमा पर था। उस समय एक नौजवान उन सारी परम्पराओं से भाग जाने की बात करे, इसकी आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता है।

एक बहुत बड़ा वर्ग ये मानता था कि भगवान के पास घंटो तक बैठे रहे, पूजा-पाठ करते रहे, आरती-धूप करते रहे, फूल चढ़ाते रहे, नए-नए प्रसाद चढ़ाते रहे तो जीवन के पाप धूल जाते है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। एक चरम सीमा का आनंद प्राप्त, करने का अवसर मिल जाता है। ये सोच बनी पड़ी हुई थी और उस समय विवेकानंद डंके की चोट पर कहते थे कि जन सेवा ये प्रभु सेवा। सामान्य मानवी जो आपके सामने जिंदा है, जो दुख और दर्द से पीड़ित है, उसकी सेवा करो, ईश्वर अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

उन्होंने जब कलकत्ते की धरती पर नौजवानों से पूछा कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता क्या होता है, हमें क्या करना चाहिए तब उन्होंने कहा ये सब छोड़ो, जाओ फुटबॉल खेलो, मस्ती से फुटबॉल खेलो पूरी तरह से अपने आप को झोंक दो, हो सकता है तुम्हें रास्ता मिल जाएगा। उस समय हम गुलामी के कालखंड में जी रहे थे, कोई सोच भी नहीं सकता था भारत कभी आजाद हो सकता है लेकिन स्वामी विवेकानंद एक दीर्घ दृष्टा थे और वो कहते थे, अपने जीवन के काल में कहा था कि मैं, मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं, मैं मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं कि मेरी भारत मां उठ खड़ी हुई है, वो जगत गुरू के स्थान पर विराजमान मैं देख रहा हूं, मैं एक दिनमान भारत माता मैं देख रहा हूं और वो दिन बहुत निकट होगा । ये भाव जगत स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन काल में अपनी आंखों से देखा था और वो हिंदुस्तान को प्रेरित करने का प्रयास करते थे।

वो एक कालखंड था जब आध्यात्म प्रधान जीवन था और वो सिर्फ भारत में नहीं एशिया के सभी देशों में समाहित था और दूसरी तरफ वो पश्चिम का विचार था, जहां अर्थ प्रधान था। आध्यात्म प्रधान जीवन और अर्थ प्रधान जीवन के बीच एक शताब्दियों का टकराव चल रहा था। अर्थ प्रधान जीवन ने आध्यात्म प्रधान जीवन को किनारे कर दिया था। अर्थ प्रधान जीवन जन सामान्य की आशा, आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु बन गया था और ऐसे कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने हिम्मत के साथ और 30-32 साल की आयु में पश्चिम की दुनिया में जाकर के, उस धरती पर जाकर के विश्व को आध्यत्मिकता का संदेश देने का एक सामर्थ्यवान काम किया था। जिस महापुरुष ने एशिया की आध्यात्मिक ताकत को दुनिया को पहचान कराया था और पहली बार विश्व को एशिया की अपनी धरती की एक अलग चिंतनधारा है, यहां के संस्कार अलग हैं और विश्व को देने के लिए उसके पास बहुत कुछ है। ये बात डंके की चोट पर कहने का साहस स्वामी विवेकानंद ने किया था। कल मैं यहां आसियान समिट में था आज यहां मैं South East Asia Summit में था और एक बात वहां उभरकर के सामने आती थी और वो एक आती थी कि One Asia .

One Asia का विचार लेकिन आज जो आवाज गूंज रही है उसमें आर्थिक व्यवस्था है, राजनीतिक व्यवस्था है, सरकारों के मेलजोल की व्यवस्था का चिंतन है लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि One Asia का concept आध्यात्मिक धरातल पर सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने प्रचारित किया था। मैं एक पुरानी घटना आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। ..

After Swami Vivekananda introduced the East and Asia to the West, Scholars and philosophers like Okakura, Karinzo from Japan, Rabindranath Tagore, Mahrishi Aurbindo, Anand Kumar Swami and Vinoy Sarkar were inspired by Swami Vivekananda. OkaKura invited Swami Vivekananda to Japan and also sent him a cheque of Rs 300. He came to Calcutta and met Swami Vivekananda on 1st February 1902 and both went to Bodh Gaya together. OkaKura is the symbol of Asianism. In his book, ‘Ideals of the East’ by Okakura, the manuscripts were edited by Sister Nivedita, the foremost western disciple of Swami Vivekananda. The very first sentence, this is one important thing I want to tell you. The very first sentence is “Asia is one.” The idea of Asian unity is clearly Swami Vivekananda’s concept. In his next book, Okakura began by saying “Brothers and sisters of Asia”, echoing Swami Vivekananda’s speech at Parliament of Religions.

मैं ये इसलिए कह रहा था कि जो उस समय इस प्रकार के Philosopher विवेकानंद जी के प्रभाव में थे, उन्होंने जो विवेकानंद जी से मंत्र पाया था वो Asia is One ये मंत्र पाया था। आज 100 साल के बाद आर्थिक, राजनीतिक कारणों से One Asia की चर्चा हो रही है लेकिन उस समय आध्यात्मिक एकात्मता के आधार पर विवेकानंद जी ये देख पाते थे कि ये भूमि है जो विश्व को संकटों से बाहर निकाल सकती है और आज दुनिया जिन दो संकटों से जूझ रही है अगर उन दो संकटों के समाधान का रास्ता कोई दे सकता है तो एशिया की धरती से ही निकल सकता है।

और इसलिए आज विश्व कह रहा है Climate change और Global warming की बात, आज विश्व कह रहा है Terrorism की चर्चा, यही तो धरती है जहां भगवान बुद्ध का संदेश मिला, यही तो धरती है जहां हिंदुत्व का संदेश मिला और इसी धरती से ये बातें उभर करके आ गई हैं जहां पर ये कहा गया एकम सत, विपरा बहुधा विधंति, Truth is One, Wise call it in different ways ये जो मूल मंत्र हैं वो सबको एक रखना, जोड़ने की ताकत देता है और इसलिए जब Terrorism की बात आती है तो उसका समाधान इसमें holier than thou की कल्पना ही नहीं है, हर सत्य को स्वीकार किया जाता है और जब हर सत्य को स्वीकार किया जाता है तब conflict के लिए अवकाश नहीं होता है और जब conflict के लिए अवकाश नहीं है तो संघर्ष की संभावना नहीं है और जहां संघर्ष नहीं है वहां Terrorism के रास्ते पर जाना का कोई कारण नहीं बनता है। 


आज विश्व Global Warming की चर्चा करता है। हम वो लोग हैं जिसने पौधे में परमात्मा देखा था, हम जितने भी ईश्वर की कल्पना की है हर ईश्वर के साथ कोई न कोई प्राकृतिक जीवन जुड़ा हुआ है। किसी न किसी वृक्ष के साथ उन्होंने साधना की है, किसी न किसी पशु-पक्षी को उन्होंने पालन किया है। ये सहज संदेश हमारी परंपरा में रहा हुआ है। हम प्रकृति के शोषण का पक्षकार नहीं रहे हैं, हम nature के साथ मित्रतापूर्ण गुजारा करने की सबक ले करके चले हुए लोग है। वही संस्कृति है जो ग्लोबल वार्मिंग से मानवजाति को बचा सकती है।

मुझे लगता है कि स्वा्मी विवेकानंद जी ने हमें ये जो रास्तेे दिखाएं है। उन रास्तों को अगर हम परिपूर्ण करते है तो हमें हमारे भीतर कोई नए विवेकानंद को प्रतिस्थापित करने की जरूरत नहीं है। उनकी कही हुई एक बात को ले करके भी हम चल पाते है मैं समझता हूं हम आने वाली शताब्दियों तक मानवजात की सेवा करने के लिए कुछ न कुछ योगदान करके जा सकते है।

आज मुझे यहां एक योग की पुस्तक का भी लोकापर्ण करने का अवसर मिला है और वो भी हमारे सरकार के साथ ही श्रीमान शाहू ने यहां की भाषा में योग की पुस्तक की रचना की है। वे स्वयं सरकारी अधिकारी है लेकिन योग के प्रति उनका समर्पण है। मुझे खुशी हुई उनकी उस किताब का लोकापर्ण करते हुए। आज विश्व योग के प्रति आकर्षित हुआ है। हर कोई तनाव मुक्त जीवन का रास्ता खोज रहा है और उसको लगता है उसकी खिड़की योग से खुलती है और इसलिए हर कोई उस खिड़की में झांकने की कोशिश करता है।

यूनाइटेड नेशन ने अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस के रूप में 21 जून को स्वीकार किया। दुनिया के 177 देशों ने उसको को-स्पोंसर किया और दुनिया के सभी देशों ने 21 जून को योग का दिवस मनाया। मानवजात जो कि अपने मानसिक समाधान का रास्ता तलाश रही है। Holistic health care की तरफ आगे बढ़ रही है। तब उसको लगता है कि योग एक ऐसी सरल विद्या है जिसको अगर हम दिन के आधा-पौना घंटा भी लगा ले तो हम अपने मन, बुद्धि, शरीर को एक दिशा में चला सकते है। आज हमारे लिए ये चुनौती नहीं है कि हम दुनिया को समझाएं कि योग क्या है, हमारे सामने चुनौती ये है कि सारा विश्व अच्छे योग टीचरों की मांग कर रहा है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि हम Perfect योग teacher को कैसे दें ताकि इस विद्या का सही स्वरूप आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे और जो भी इसका लाभ उठाएं, उसको सचमुच में, उसका जो मकसद हो, मकसद पूरा करने में काम हो और इसलिए जितना अधिक आधुनिक भाषा में हम योग को प्रचारित करें, जितनी अधिक योग को आधुनिक भाषा में प्रतिपादित करें और खुद योग के जीवन को जीकर के दुनिया के सामने प्रस्तुत करें और अधिकतम योग के teacher तैयार करें, hobby के रूप में तैयार करें भले profession के रूप में न तैयार कर सकें। दिन में हम 50 काम करते हैं, एक घंटे योगा के लिए जो भी सीखने आएगा, हम सिखाएंगे।

ये पूरा हम एशिया के वायुमंडल में लाते हैं तो विश्व की जो अपेक्षा है, उस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए उत्तम योग teacher हम दुनिया को दे सकते हैं। मैं स्वामी सूपरयानंद जी का बहुत आभारी हूं कि आज मुझे इस पवित्र स्थान पर आने का अवसर मिला, विवेकानंद जी की प्रतिमा का लोकापर्ण करने का अवसर मिला और मुझे विश्वास है कि इस धरती पर आने वाले विश्व के सभी लोगों को यहां से कोई प्रेरणा मिलती रहेगी। इसी एक शुभकामना के साथ आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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माझ्या प्रिय देशबांधवानो, नमस्कार !

 

दोन दिवसांपूर्वीची काही अद्भुत छायाचित्रे, काही अविस्मरणीय क्षणांच्या ताज्या आठवणी आताही माझ्या डोळ्यांसमोर आहेत. त्यामुळे, यावेळच्या ‘मन की बात’ ची सुरुवात याच क्षणांनी करुया. टोक्यो ऑलिंपिक मध्ये भारतीय खेळाडूंना तिरंगा घेऊन चालतांना बघून केवळ मीच नाही, तर संपूर्ण देश रोमांचित झाला होता. त्याक्षणी, संपूर्ण देशाने जणू एकत्र येत, आपल्या या योद्ध्यांना म्हटले -

विजयी भव ! विजयी भव !

जेव्हा हे खेळाडू भारतातून गेले, त्याआधी मला त्यांच्याशी बोलण्याची, त्यांचे आयुष्य जाणून घेण्याची आणि देशालाही ते सांगण्याची संधी मिळाली होती. हे खेळाडू, आयुष्यातील अनेक आव्हानांवर मात करत, इथे पोहोचले आहेत.

आज त्यांच्याजवळ आपले प्रेम आणि सर्वांच्या पाठिंब्याची ताकद आहे- त्यामुळे चला, आपण सगळे मिळून आपल्या या सर्व खेळाडूंना शुभेच्छा देऊया, त्यांचा उत्साह वाढवूया. सोशल मीडियावर देखील ऑलिंपिक खेळाडूंना पाठिंबा देण्यासाठी आता व्हिक्टरी पंच कॅम्पेन म्हणजेच विजयी ठोसा अभियान सुरु झाले आहे. आपणही आपल्या चमू सोबत आपला व्हिक्टरी पंच शेयर करा, भारतासाठी चीयर करा !

 मित्रांनो, जो देशासाठी तिरंगा हातात घेतो, त्याच्या सन्मानार्थ आपल्या भावना अभिमानाने उचंबळून येणं स्वाभाविक आहे. देशभक्तीची हीच भावना आपल्या सर्वांना एकमेकांशी बांधून ठेवते. उद्या, म्हणजेच 26 जुलै रोजी, ‘कारगिल विजय दिवस’ही आहे. कारगिलचे युद्ध भारतीय सैन्याच्या शौर्य आणि संयमाचे असे प्रतीक आहे, जे संपूर्ण जगाने पहिले आहे. यावर्षी हा गौरवास्पद दिवस देखील अमृत महोत्सवाच्या दरम्यान साजरा केला जाणार आहे, त्यामुळे तो आणखीनच विशेष आहे. माझी अशी विनंती आहे की तुम्ही सर्वांनी कारगिल युद्धाची रोमांचकारी कथा नक्की वाचा. कारगिलच्या योद्ध्यांना आपण सर्व आधी वंदन करूया.

मित्रांनो

यावर्षी, 15 ऑगस्ट रोजी देश आपल्या स्वातंत्र्याच्या 75 व्या वर्षात प्रवेश करत आहे. आपले हे खूप मोठे भाग्य आहे की जे स्वातंत्र्य मिळवण्यासाठी , देशाने कित्येक शतके वाट पहिली, त्या देशाच्या स्वातंत्र्याला 75 वर्षे पूर्ण होत असतांनाच्या क्षणांचे आपण साक्षीदार बनणार आहोत.

आपल्याला आठवत असेल, स्वातंत्र्याचा हा अमृत महोत्सव आपण 12 मार्चपासून महात्मा गांधींच्या साबरमती आश्रमातून केली होती. याच दिवशी, बापूंच्या दांडी यात्रेचे पुनरुज्जीवन करण्यात आले होते. तेव्हापासून, जम्मू-काश्मीर पासून ते पुडदूचेरीपर्यंत, गुजरातपासून ते ईशान्येकडील राज्यांपर्यंत अमृत महोत्सवासही संबंधित कार्यक्रम होत आहेत. अशा अनेक घटना, ज्यांचे योगदान तर खूप आहेच, मात्र त्यांची म्हणावी तेवढी चर्चा झाली नाही,- आज लोक त्यांच्याविषयीही जाणून घेत आहेत. आता जसे की मोईरांग डे चेच बघा ना! माणिपूरची छोटीशी वस्ती मोईरांग, कधीकाळी नेताजी सुभाषचंद्र बोस यांच्या भारतीय राष्ट्रीय लष्कर म्हणजे आयएनएचे प्रमुख केंद्र होते. इथे स्वातंत्र्याच्या पहिल्याच लढाईआधी, आयएनएच्या शौकत मलिक जी यांनी भारताचा झेंडा फडकवला होता. या अमृत महोत्सवादरम्यान, 14 एप्रिल रोजी याच मोईरांग मध्ये पुन्हा एकदा तिरंगा फडकवण्यात आला. असे कितीतरी स्वातंत्र्य संग्राम सैनिक आणि महापुरुष आहेत ,ज्यांचे आपण यानिमित्ताने स्मरण करत आहोत. सरकार आणि सामाजिक संस्थांकडूनही सातत्याने याच्याशी संबंधित कार्यक्रम आयोजित केले जात आहेत. यंदाच्या 15 ऑगस्टलाही असेच एक आयोजन होणार आहे. हा एक प्रयत्न आहे- राष्ट्रगीताशी संबंधित.  सांस्कृतिक मंत्रालयाचा प्रयत्न आहे की त्या दिवशी, जास्तीत जास्त भारतीयांनी एकाच वेळी राष्ट्रगीत गायचे. यासाठी एक संकेतस्थळ देखील तयार करण्यात आले आहे- Rashtragaan.in

 

या संकेतस्थळाच्या मदतीने आपण राष्ट्रगीत गाऊन ते ध्वनिमुद्रित करु शकाल आणि या अभियानात सहभागी होऊ शकाल. मला आशा आहे, आपण या विशेष उपक्रमात नक्की सहभागी व्हाल. अशाच प्रकारचे अनेक अभियान, अनेक उपक्रम आपल्याला येत्या  काळात बघायला मिळणार आहेत. “अमृत महोत्सव’ हा कुठल्या सरकारचा कार्यक्रम नाही, तर हा कोट्यवधी भारतवासियांचा कार्यक्रम आहे. प्रत्येक स्वतंत्र आणि कृतज्ञ भारतीयाने आपल्या स्वातंत्र्यसैनिकांना केलेले हे वंदन आहे. या महोत्सवाच्या मूळ भावनेचा विस्तार तर बराच मोठा आहे. –ही भावना आहे, आपल्या स्वातंत्र्यसैनिकांच्या मार्गावरुन चालणे, त्यांच्या स्वप्नातल्या देशाची उभारणी करणे. जशाप्रकारे, देशाला स्वातंत्र्य मिळवून देण्यासाठी ते सगळे झपाटलेले लोक एकत्र होऊन लढले होते, तसेच आपल्याला देशाच्या विकासासाठी एकत्र यायचे आहे. आपल्याला देशासाठी जगायचे आहे, देशासाठी काम करायचे आहे. आणि या प्रवासात अगदी छोटी छोटी कामेदेखील मोठा प्रभाव पाडू शकतात. आपली दैनंदिन कामे करतांनाही आपण राष्ट्र निर्मितीचे काम करु शकतो. जसे की ‘व्होकल फॉर लोकल’. आपल्या देशातील स्थानिक उद्योजक, कलाकार, शिल्पकार, विणकर यांना आधार देणे, हे आपल्या रोजच्या सवयीचा भाग बनले पाहिजे. सात ऑगस्ट रोजी येणारा ‘राष्ट्रीय हातमाग दिवस’ आपल्यासाठी अशी एक संधी आहे ज्यावेळी आपण प्रयत्नपूर्वक हे काम करु शकतो. राष्ट्रीय हातमाग दिनामागेही खूप मोठी ऐतिहासिक पार्श्वभूमी आहे.याच दिवशी, 1905 साली स्वदेशी आंदोलनाची सुरुवात झाली होती.  

मित्रांनो,

आपल्या देशातील ग्रामीण आणि आदिवासी भागात, हातमाग, उत्पन्नाचे एक महत्त्वाचे साधन आहे. हे एक असे क्षेत्र आहे, ज्याच्याशी, लाखों महिला, लाखो विणकर, लाखो शिल्पकार जोडलेले आहेत. आपले छोटे छोटे प्रयत्न, वीणकरांमध्ये एक नवी उमेद जागवू शकतात. आपण स्वतः काही ना काही तरी खरेदी करा, आणि आपले अनुभव इतरांनाही सांगा. जेव्हा आपण स्वातंत्र्याचा अमृत महोत्सव साजरा करत आहोत, अशावेळी एवढे काम करणे आपली निश्चितच जबाबदारी आहे, मित्रांनो !

आपण पहिले असेल 2014 पासूनच आपल्या ‘मन की बात’ मध्ये आपण नेहमीच खादीवर चर्चा करतो. आपल्याच प्रयत्नांमुळे आज देशात खादीची विक्री कित्येक पटीने वाढली आहे. कोणी कधी विचार केला असेल का, की खादीच्या कुठल्या दुकानात एकाच दिवशी, एक कोटींपेक्षा अधिक विक्री होऊ शकते ! मात्र, आपण हे देखील करुन दाखवले आहे. आपण जेव्हाही कधी खादीचे कोणतेही उत्पादन खरेदी करता, तेव्हा त्याचा लाभ, आपल्या गरीब  वीणकर बंधू-भगिनींना होतो.

यामुळेच, खादीची खरेदी करणे एकप्रकारे लोकसेवाही आहे आणि देशसेवाही आहे. माझी आपल्याला आग्रही विनंती आहे, की आपण सर्व, माझे प्रिय बंधू-भगिनी, ग्रामीण भागात तयार होणाऱ्या हातमागाच्या वस्तू जरूर खरेदी करा. आणि त्या वस्तू #MyHandloomMyPride वर शेयर करा.  

मित्रांनो, जेव्हा आपण स्वातंत्र्य आंदोलन आणि खादीविषयी बोलतो आहोत, त्यावेळी बापूंचे स्मरण होणे स्वाभाविक आहे. जसे बापूंच्या नेतृत्वाखाली ‘भारत छोडो आंदोलन’ झाले होते, तसेच आज प्रत्येक भारतीयाला ‘भारत जोडो’ आंदोलनाचे नेतृत्व करायचे आहे. हे आपले कर्तव्य आहे, की आपण आपले काम अशाप्रकारे करावे, जे विविधतांनी भरलेल्या आपल्या भारताला एकत्र आणण्यासाठी उपयुक्त ठरेल. चल तर मग, आपण अमृत महोत्सवानिमित्त हा अमृत संकल्प  घेऊया, की देशच कायम आपली सर्वात मोठी ‘आस्था’ आणि सर्वात मोठी प्राथमिकता असेल. “Nation First, Always First”, हा मंत्र घेऊनच आपल्याला पुढे वाटचाल करायची आहे.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो, आज मी ‘मन की बात’ ऐकणाऱ्या माझ्या युवा मित्रांचे विशेष आभार मानू इच्छितो. अगदी काही दिवसांपूर्वी, माय गव्ह च्या वतीने ‘मन की बात’ च्या श्रोत्यांविषयी एक अध्ययन करण्यात आले होते. या अध्ययनात असे आढळले की ‘मन की बात’ साठी संदेश आणि सूचना पाठवणाऱ्या लोकांमध्ये प्रामुख्याने कोणते लोक आहेत?

 तर अध्ययनातून ही माहिती पुढे आली की, मला संदेश आणि सूचना पाठवणाऱ्या लोकांमध्ये सुमारे 75 टक्के लोक 35 वर्षांपेक्षा कमी वयाचे आहेत. म्हणजेच, भारताच्या युवा शक्तिच्या सूचना ‘मन की बात’ ला दिशा देत आहेत. मी हा खूप चांगला संकेत आहे, असे मानतो. ‘मन की बात’ हे एक असे माध्यम आहे, जिथे सकारात्मकता आहे, संवेदनशीलता आहे. ‘मन की बात’ मध्ये आपण अनेक सकारात्मक गोष्टी करतो. या कार्यक्रमांचे स्वरूप एकोप्याचे आहे. सकारात्मक विचार आणि सूचनांसाठी, भारताच्या युवकांची सक्रियता मला आनंदीत करते आहे. मला याचाही आनंद आहे, की मन की बात च्या माध्यमातून मला युवकांचे मन जाणण्याची देखील संधी मिळते आहे.

मित्रांनो, आपल्याकडून मिळालेल्या सूचना, हीच ‘मन की बात’ ची खरी ताकद आहे. आपल्या सूचनाच, ‘मन की बात’ च्या माध्यमातून भारताची विविधता प्रकट करत असतात. भारतवासियांच्या सेवा आणि त्यागाचा सुगंध, चारी दिशांना पसरवत असतात. आपल्या परिश्रमी युवकांची संशोधने सर्वाना प्रेरित करत असतात. ‘मन की बात’ मध्ये आपण कितीतरी प्रकारच्या कल्पना पाठवत असता.आपण सर्वांवर तर चर्चा करु शकत नाही, मात्र त्यातील बहुतांश कल्पना मी संबंधित विभागांना नक्कीच पाठवत असतो. जेणेकरुन, त्या कल्पना प्रत्यक्षात अमलात आणल्या जाव्यात.

मित्रांनो, मी आज आपल्याला साई-प्रनीथ यांच्या प्रयत्नाविषयी सांगणार आहे. साई-प्रनीथ जी, एक सॉफ्टवेअर इंजिनियर आहेत, आंध्रप्रदेशचे रहिवासी आहेत. गेल्या वर्षी त्यांनी पहिले की त्यांच्या भागात खराब हवामानामुळे अनेक शेतकऱ्यांचे खूप नुकसान झाले. हवामान शास्त्र विषयात त्यांना पूर्वीपासूनच रस होता, आणि म्हणूनच, त्यांनी आपल्या या रुचिचा आणि कौशल्याचा वापर शेतकऱ्यांच्या कल्याणासाठी घेण्याचा निर्णय घेतला. ते आता वेगवेगळ्या डेटा स्त्रोतांकडून हवामानाचा डेटा विकत घेतात, त्याचे विश्लेषण करतात आणि स्थानिक भाषेत, वेगवेगळ्या माध्यमांच्या मदतीने शेतकऱ्यांपर्यंत आवश्यक ती माहिती पोचवतात. हवामानाच्या माहितीशिवाय, प्रणीथजी वेगवेगळ्या हवामानात लोकांनी काय करायला हवे, याचेही मार्गदर्शन करतात. विशेषतः पूरापासून संरक्षण करण्यासाठी किंवा वादळ  आणि वीज पडल्यावर, त्यापासून कसे संरक्षण करायचे, याची माहितीही ते लोकांना देतात.

मित्रांनो,

एकीकडे, या तरुण सॉफ्टवेअर अभियंत्याचा हा प्रयत्न मनाला स्पर्शून जाणारा आहे. तर दुसरीकडे आमच्या एका मित्राकडून होणारा तंत्रज्ञानाचा वापरही, आपल्याला थक्क करुन सोडेल.

 हे मित्र आहेत, ओडिशाच्या संबलपूर जिल्ह्यात एका गावात राहणारे श्री इसाक मुंडा जी. ईसाक जी एकेकाळी रोजंदारी स्वरुपात काम करत होते, मात्र आता ते इंटरनेटवर गाजत आहेत. त्यांच्या यू ट्यूब चॅनेल मधून ते उत्तम पैसे कमावत आहेत. ते आपल्या व्हिडिओ मधून स्थानिक पदार्थ, पारंपरिक स्वयंपाक बनवण्याच्या पद्धती, आपले गाव, आपली जीवनशैली, कुटुंब आणि आहारविहाराच्या सवयी, अशा गोष्टी दाखवत असतात. एक YouTuber म्हणून त्यांनी आपला प्रवास, मार्च 2020 पासून सुरु केला होता. त्यावेळी, त्यांनी ओडिशातीळ सुप्रसिद्ध स्थानिक पदार्थ, ‘पखाल’ शी संबंधित, एक व्हिडिओ पोस्ट केला होता. तेव्हापासून त्यांनी शेकडो व्हिडिओ पोस्ट केले आहेत. त्यांचा हा प्रयत्न अनेक कारणांनी सर्वात वेगळा आहे. विशेषतः यासाठी की या उपक्रमामुळे शहरात राहणाऱ्या लोकांना ती जीवनशैली बघण्याची संधी मिळते, ज्याविषयी त्यांना विशेष काही माहिती नसते. ईसाक मुंडा जी संस्कृती आणि पदार्थ या दोघांना एकत्रित घेऊन, त्याचा उत्सव साजरा करतात आणि त्यातून आपल्या सर्वांना प्रेरणाही देतात.

मित्रांनो, आता आपण जेव्हा तंत्रज्ञानाविषयी बोलतो आहोत, तेव्हा मी आणखी एका रोचक विषयावर चर्चा करु इच्छितो.

आपण अलीकडेच वाचले असेल, पहिले असेल की आयआयटी मद्रास च्या माजी विद्यार्थ्यानी स्थापन केलेल्या एक स्टार्ट-अप ने एक थ्री-डी प्रिंटेड हाऊस तयार केले आहे. या थ्री-डी प्रिंटिंग ने घराची निर्मिती कशी शक्य झाली? तर, या स्टार्ट अप ने सर्वात आधी, थ्री-डी प्रिंटर मध्ये एक त्रिमीतीय चित्र भरले आणि एका विशिष्ट प्रकारच्या काँक्रीटच्या माध्यमातून, थरावर थर चढवत, एक  थ्री-डी संरचना तयार केली. आपल्याला हे जाणून अत्यंत आनंद होईल, की देशात अशाप्रकारचे अनेक प्रयोग सुरु आहेत. एक काळ असा होता, जेव्हा छोट्या छोट्या बांधकामालाही कित्येक वर्षे लागत असत. मात्र, आता तंत्रज्ञानामुळे भारतातील परिस्थिति बदलली आहे. काही काळापूर्वी, आपण जगभरातील अशा नवोन्मेषी कंपन्यांना आमंत्रित करण्यासाठी एक जागतिक गृहनिर्माण तंत्रज्ञान आव्हान स्पर्धा आयोजित केली होती. हा देशातील अशा वेगळ्या प्रकारचा पहिलाच प्रयोग होता, ज्याला आम्ही लाईट हाऊस प्रयोग असे नाव दिले होते. सध्या देशात सहा विविध ठिकाणी, लाईट हाऊस प्रकल्पांवर अत्यंत वेगाने काम सुरु आहे. या लाईट हाऊस प्रकल्पांमध्ये अत्याधुनिक तंत्रज्ञान आणि अभिनव कार्यपद्धतींचा वापर केला जातो. यामुळे बांधकामाचा कालावधी कमी होतो. त्यासोबतच, जी घरे तयार होतात, ती अधिक टिकावू, किफायतशीर आणि आरामदायी असतात. मी अलिकडेच, ड्रोन च्या माध्यमातून या प्रकल्पांचा आढावा घेतला आणि त्यांच्या कामाची प्रगती देखील प्रत्यक्ष पाहिली.

इंदौरच्या प्रकल्पात विटा आणि सीमेंट काँक्रीटच्या भिंतीच्या ऐवजी प्री- फॅब्रिकेटेड सँडविच पॅनल सिस्टिमचा वापर केला जात आहे. राजकोट इथे, लाईट हाऊस फ्रेंच तंत्रज्ञानाच्या मदतीने तयार केले जात आहेत. ज्यात, बोगद्याच्या माध्यमातून, मोनोलिथिक काँक्रीट बांधकाम तंत्रज्ञानाचा वापर केला जात आहे. या तंत्रज्ञानाने तयार झालेली घरे, संकटांचा सामना करण्यासाठी अधिक सक्षम असतील. चेन्नईत, अमेरिका आणि फिनलंडचे तंत्रज्ञान, प्री-कास्ट काँक्रीट सिस्टिमचा  वापर होत आहे. त्यामुळे घरे लवकर बनतील आणि त्यासाठी खर्च देखील कमी येईल. रांची इथे जर्मनीच्या थ्री-डी बांधकाम तंत्रज्ञानाचा वापर करुन घरे बांधली जाणार आहेत. यात प्रत्येक खोली वेगवगेळया जागी बनवली जाईल.  आणि त्यानंतर हे पूर्ण बांधकाम एकमेकांशी जोडले जाईल. अगरतला इथे न्यूझीलैंड च्या तंत्रज्ञानाचा वापर करत पोलादी चौकटी वापरुन घरे बनवली जात आहेत, ही घरे मोठ्या भूकंपाचाही सामना करु शकतील. तसेच, लखनौ इथे, कॅनडाच्या तंत्रज्ञानाचा वापर केला जात आहेत, यात प्लास्टर आणि पेंटची गरज पडत नाही. आणि जलद गतीने घरे तयार करण्यासाठी आधीपासूनच तयार असलेल्या भिंतींचा वापर केला जात आहे.

मित्रांनो, आज देशात हे सगळे जे प्रयोग होत आहेत, ते प्रकल्प मूळ, इनक्युबेशन केंद्र म्हणून कामी येतील. यामुळे आमचे गृहनिर्माण नियोजनकर्ते, स्थापत्यतज्ञ, अभियंते आणि विद्यार्थी नवे तंत्रज्ञान समजू  शकतील आणि त्याचे प्रत्यक्ष प्रयोगही करु शकतील. मी मुद्दामच या सगळ्या गोष्टी, युवकांना सांगतो आहे, जेणेकरुन आमचे युवक, राष्ट्रहितासाठी तंत्रज्ञानाच्या नवनवीन क्षेत्रांना प्रोत्साहन देऊ शकतील.

 मी या गोष्टी विशेषत आपल्या युवकांसाठी सांगत आहे , जेणेकरून आपले  युवक राष्ट्रहितासाठी  तंत्रज्ञानाच्या नवनवीन क्षेत्रांकडे प्रोत्साहित होऊ शकतील .  माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

 तुम्ही इंग्रजीत एक म्हण ऐकली असेल – “To Learn is to Grow” अर्थात  शिकणं म्हणजेच  पुढे जाणे आहे.  जेव्हा आपण काही नवीन शिकतो , तेव्हा आपल्यासाठी प्रगतीचे नवनवीन मार्ग आपोआप खुले होतात.  जेव्हा कधी  काहीतरी वेगळं नवीन करण्याचा प्रयत्न झाला आहे,  मानवतेसाठी नवीन कवाडे खुली झाली आहेत,  एका नवीन युगाचा प्रारंभ झाला आहे . आणि तुम्ही पाहिलं असेल,  जेव्हा काही नवीन घडते,  तेव्हा त्याचा परिणाम प्रत्येकालाच आश्चर्यचकित करतो. आता जसे की मी  तुम्हाला विचारलं की असं कोणते  राज्य आहे , ज्याचा संबंध तुम्ही सफरचंदाशी जोडाल?  सर्वांनाच माहित आहे , तुमच्या मनात सर्वप्रथम हिमाचल प्रदेश , जम्मू-काश्मीर , उत्तराखंडचे नाव येईल. मात्र  जेव्हा मी म्हणेन की या यादीत तुम्ही मणिपूरला देखील जोडा तेव्हा कदाचित तुम्हाला आश्चर्य वाटेल . काही तरी नवीन करण्याची उर्मी घेऊन युवकांनी मणिपूरमध्ये ही कामगिरी करून दाखवली आहे.  सध्या मणिपूरच्या उखरुल जिल्ह्यात सफरचंदाची शेती मोठ्या प्रमाणात सुरू आहे. इथले शेतकरी आपल्या बागांमध्ये सफरचंद पिकवत  आहेत. सफरचंद पिकवण्यासाठी इथल्या  लोकांनी खास हिमाचल प्रदेशात जाऊन प्रशिक्षण देखील घेतले आहे. यापैकीच एक आहेत  टी एस रिंगफामी योंग . योंग हे व्यवसायाने एरोनॉटिकल इंजिनीअर आहेत . त्यांनी पत्नी टी.एस. एंजेल यांच्या मदतीने सफरचंदाची शेती केली आहे . त्याचप्रमाणे अवुन्गशी शिमरे ऑगस्टीना  यांनी देखील आपल्या बागांमध्ये सफरचंदाचे  उत्पादन घेतले आहे . अवुन्गशी दिल्लीमध्ये नोकरी करत होत्या . ही नोकरी सोडून त्या आपल्या गावात परत गेल्या आणि सफरचंदाची शेती सुरू केली. मणिपूरमध्ये आज असे अनेक सफरचंद उत्पादक आहेत, ज्यांनी काही वेगळे आणि नवीन करून दाखवले आहे.

 मित्रांनो आपल्या आदिवासी समुदायात बोरे  खूप लोकप्रिय आहेत.  आदिवासी समुदायाचे लोक नेहमीच बोरांची  शेती करतात . मात्र कोविड -19 महामारी नंतर याची शेती विशेष  वाढली आहे. त्रिपुराच्या उनाकोटी येथील असेच 32 वर्षांचे युवक मित्र आहेत विक्रमजीत चकमा. त्यांनी बोरांची लागवड  करून खूप नफा कमावला आणि आता ते लोकांना बोरांचे पीक घेण्यासाठी  देखील प्रेरित करत आहेत.  राज्य सरकार देखील अशा लोकांच्या मदतीसाठी पुढे आले आहे सरकारकडून यासाठी अनेक विशेष बागा तयार केल्या जात आहेत, जेणेकरून बोरांच्या लागवडी संबंधित लोकांची मागणी पूर्ण करता येईल. शेती मध्ये संशोधन होत आहे,  तर शेतीच्या इतर दुय्यम उत्पादनांमध्ये देखील सर्जनशीलता पाहायला मिळत आहे.

मित्रांनो मला उत्तर प्रदेशच्या लखीमपुर-खीरी मध्ये करण्यात आलेल्या एका प्रयत्नाबद्दल माहिती समजली आहे . कोविडच्या काळात लखीमपुर-खिरी  मध्ये एक अनोखा उपक्रम हाती घेण्यात आला. तिथल्या महिलांना केळ्याच्या तणांपासून फायबर बनवण्याचे प्रशिक्षण देण्याचं काम सुरू करण्यात आले आहे . कचऱ्यापासून टिकाऊ सर्वोत्तम वस्तू  बनवण्याचा मार्ग. केळ्यांचे तण कापून मशीनच्या मदतीने हे फायबर तयार केलं जातं , जे ज्यूट  प्रमाणे असतं .  या फायबरपासून  हॅन्ड बॅग,  सतरंजी असे कितीतरी वस्तू बनवल्या जातात .

 यामुळे एक तर पिकांचा कचर्‍याचा वापर सुरू झाला आहे आणि दुसरीकडे गावात राहणाऱ्या आपल्या भगिनी आणि मुलींना उत्पन्नाचे एक साधन देखील मिळाले आहे . बनाना फायबरच्या या कामात एका स्थानिक महिलेची  रोजची 400 ते 600 रुपये कमाई होते.  लखीमपुर-खीरी मध्ये शेकडो एकर जमिनीवर केळ्याची शेती होते . केळ्यांचे पीक घेतल्यानंतर  साधारणपणे शेतकऱ्यांना तण फेकण्यासाठी वेगळा खर्च करावा लागत होता . आता त्यांचे पैसे देखील वाचतात.  म्हणजेच आम के आम , गुठलियो  के दाम ही म्हण इथे अगदी चपखल बसते.

 मित्रांनो एकीकडे बनाना फायबर पासून वस्तू  बनवल्या जात आहेत  तर दुसरीकडे केळ्याच्या पिठापासून डोसे आणि गुलाबजाम सारखे स्वादिष्ट पदार्थ देखील तयार होत आहेत.  कर्नाटकच्या उत्तर कन्नड आणि दक्षिण कन्नड जिल्ह्यांमध्ये महिला हे वैशिष्ट्यपूर्ण कार्य करत आहेत.

त्याची सुरुवात देखील कोरोना काळातच  झाली . या महिलांनी  केळ्याचा पिठापासून केवळ डोसा ,  गुलाबजाम सारखे पदार्थ नुसते बनवले नाहीत तर त्याची  छायाचित्रे देखील सोशल मीडियावर शेअर केली आहेत . जेव्हा जास्तीत जास्त लोकांना या पीठाबाबत समजले  तेव्हा  त्यांची मागणी आणखी वाढली आणि  या महिलांचे उत्पन्न देखील. लखीमपुर-खीरी प्रमाणेच इथेही ही नावीन्यपूर्ण कल्पना महिलाच राबवत आहेत.

मित्रांनो अशी  उदाहरणे  आयुष्यात काही तरी नवीन करण्याची प्रेरणा देतात . तुमच्या आसपास देखील असे अनेक लोक असतील.  जेव्हा तुमचं कुटुंब मनातल्या गुजगोष्टी सांगत असेल तेव्हा तुम्ही या गोष्टीदेखील तुमच्या गप्पांमध्ये समाविष्ट करा.

कधीतरी वेळ काढून मुलांबरोबर असे उपक्रम पहायला जा आणि  संधी मिळाली तर स्वतःदेखील असं काहीतरी करून दाखवा. आणि हो आणि हे सगळं तुम्ही माझ्याबरोबर NamoApp किंवा  MyGov वर  शेअर केलं तर मला खूप छान वाटेल.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,  आपल्या संस्कृत ग्रंथांमध्ये एक श्लोक आहे-

आत्मार्थम् जीव लोके अस्मिन्, को न जीवति मानवः |

        परम् परोपकारार्थम्, यो जीवति स जीवति ||

अर्थात स्वतःसाठी या जगात प्रत्येक जण जगत असतो मात्र वास्तवात खरेतर ती व्यक्ती जगत असते जी परोपकारासाठी जगते.  भारत मातेच्या सुपुत्रांच्या परोपकारी प्रयत्नांच्या गोष्टी हीच तर आहे मन की बात. आज देखील अशाच काही अन्य मित्रांबाबत आपण बोलणार आहोत . एक मित्र चंदीगड शहरातलेआहेत.  चंदीगड मध्ये मी देखील काही वर्ष राहिलो आहे . खूपच आनंदी आणि सुंदर शहर आहे.  तिथे राहणारे लोक देखील दिलदार आहेत . आणि हो, तुम्ही जर खाण्याचे शौकीन असाल तर इथे तुम्हाला आणखी मजा येईल. या चंदिगडमधील सेक्टर 29 मध्ये संजय राणा फुड स्टॉल चालवतात.

आणि सायकलवर  छोले भटूरे विकतात.  एक दिवस त्यांची मुलगी रिद्धिमा आणि भाची रिया एक कल्पना घेऊन त्यांच्याकडे आल्या.  दोघींनीही त्यांना कोविड लस  घेणाऱ्यांना मोफत छोले-भटूरे खायला द्यायला  सांगितलं. ते  आनंदाने तयार झाले आणि त्यांनी लगेच हे उत्तम आणि नेक कार्य सुरु केले. संजय राणा यांचे छोले-भटूरे मोफत खाण्यासाठी तुम्हाला दाखवावे लागेल कि तुम्ही त्यादिवशी लस घेतलेली आहे.  लसीकरणाचा संदेश दाखवला की लगेचच  ते तुम्हाला स्वादिष्ट छोले-भटूरे देतील. असे म्हणतात समाजाच्या कल्याणासाठी काम करण्यासाठी पैशांपेक्षा जास्त सेवाभाव, कर्तव्य भावनेची अधिक गरज असते . आपले संजय भाऊ हेच सिद्ध करत आहे.

मित्रांनो अशाच आणखी एका कामाची चर्चा मला करायची आहे. हे काम  तामिळनाडूच्या निलगिरी मध्ये होत आहे. तिथे राधिका शास्त्री यांनी एम्बुरेक्स प्रकल्पाची सुरुवात केली आहे.  डोंगराळ भागातल्या रुग्णांना उपचारासाठी सहजपणे वाहतुकीचे  साधन उपलब्ध करून देणे हा या प्रकल्पाचा  उद्देश आहे. राधिका कून्नूरमध्ये एक कॅफे चालवतात . त्यांनी आपल्या कॅफेच्या सहकाऱ्यांच्या मदतीने एम्बुरेक्स साठी निधी जमा केला. निलगिरी डोंगरावर आज सहा एम्बुरेक्स कार्यरत आहे आणि दुर्गम भागातल्या आपत्कालीन स्थितीत रुग्णांसाठी उपयुक्त ठरत आहेत. एम्बुरेक्समध्ये स्ट्रेचर,  ऑक्सीजन सिलेंडर , फर्स्ट एड बॉक्स यासारख्या अनेक गोष्टींची व्यवस्था केली आहे.

मित्रांनो संजय असोत किंवा राधिका , त्यांच्या उदाहरणातून असं दिसून येतं की आपण आपलं कार्य आपला व्यवसाय , नोकरी करता करता सेवाकार्य  देखील करू शकतो.

 मित्रांनो काही दिवसांपूर्वी एक खूपच रोचक आणि खूपच भावनिक घटना घडली, ज्यामुळे  भारत जॉर्जिया मैत्रीला बळकटी मिळाली.  या कार्यक्रमात भारताने सेंट क्वीन केटेवानच्या  होली रेलिक म्हणजेच त्यांचे पवित्र स्मृतिचिन्ह जॉर्जियाचे  सरकार आणि तिथल्या जनतेकडे सुपूर्द केले. यासाठी आपले परराष्ट्रमंत्री स्वतः तिथे गेले होते . अतिशय भावनिक वातावरणात झालेल्या कार्यक्रमात जॉर्जियाचे राष्ट्रपती,  पंतप्रधान अनेक धर्मगुरू आणि मोठ्या संख्येने जॉर्जियाची जनता उपस्थित होती. या कार्यक्रमात भारताची प्रशंसा करताना जे गौरवोद्गार काढण्यात आले ते कायम स्मरणात  राहतील . या एका कार्यक्रमाने दोन्ही देशांबरोबरच गोवा आणि जॉर्जिया  दरम्यान संबंध देखील अधिक दृढ केले आहेत. असं यासाठी कारण सेंट क्वीन केटेवान यांचे हे अवशेष  २००५ मध्ये गोव्याच्या सेंट ऑगस्टीन चर्च येथे सापडले होते .

मित्रानो, तुमच्या मनात प्रश्न निर्माण झाला असेल हे सगळं काय  आहे आणि हे सगळं केव्हा झाले?  खरं तर ही चारशे पाचशे  वर्षांपूर्वीची गोष्ट आहे .क्वीन केटेवान जॉर्जियाच्या राज परिवारातील मुलगी होती . दहा वर्षांच्या तुरुंगवासानंतर  १६२४ मध्ये ती शहीद झाली होती . एका प्राचीन पोर्तुगाल दस्तावेनुसार सेंट  क्वीन केटेवानच्या  अस्थी जुन्या गोव्याच्या सेंट ऑगस्टीन कॉन्व्हेंट मध्ये ठेवण्यात आल्या होत्या. मात्र  दीर्घकाळ असे मानले जात होते की गोव्यामध्ये दफन करण्यात आलेले तिचे अवशेष 1930 च्या भूकंपात गायब झाले होते .

भारत सरकार आणि जॉर्जियाचे इतिहासकार,  संशोधक पुरातत्व शास्त्रज्ञ  आणि जॉर्जियन चर्चच्या अनेक दशकांच्या अथक प्रयत्नानंतर 2005 मध्ये ते पवित्र अवशेष शोधण्यात यश मिळाले होते. हा विषय जॉर्जियाच्या लोकांसाठी खूपच भावनात्मक आहे . म्हणून  त्यांचं ऐतिहासिक धार्मिक आणि अध्यात्मिक भावना लक्षात घेऊन भारत सरकारने या  अवशेषांचा एक भाग जॉर्जियाच्या जनतेला  भेट देण्याचा निर्णय घेतला. भारत आणि जॉर्जियाचा सामायिक इतिहासातील  या बाबी जपून ठेवल्याबद्दल मी आज गोव्याच्या जनतेचे मनः पूर्वक आभार मानतो . गोवा अनेक महान आध्यात्मिक वारसांची भूमी आहे.  सेंट ऑगस्टीन चर्च युनेस्कोच्या जागतिक वारसा स्थळ (गोव्याचे चर्चेस आणि कॉन्व्हेंट) चा  एक भाग आहे .

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,  जॉर्जिया मधून आता मी तुम्हाला थेट सिंगापूरला घेऊन जातो , जिथे या महिन्याच्या सुरुवातीला आणखी एक गौरवशाली संधी समोर आली. पंतप्रधान आणि माझे मित्र ली सेन लुंग यांनी अलीकडेच नूतनीकरण केलेल्या सिलाट रोड गुरुद्वाराचे  उद्घाटन केलं. त्यांनी पारंपारिक पगडी देखील घातली होती . हा गुरूद्वारा  सुमारे शंभर वर्षांपूर्वी बांधण्यात आला होता. आणि तिथे  भाई महाराज यांना समर्पित स्मारक देखील आहे. भाई महाराजजी  भारताच्या स्वातंत्र्याच्या लढ्यात सहभागी झाले होते. आणि हा क्षण स्वातंत्र्याची 75 वर्ष साजरी करताना अधिक प्रेरक ठरतो. दोन्ही देशांदरम्यान लोकांमधील संबंध अशाच प्रयत्नांतून अधिक बळकट होतात. यातून हे देखील समजतं की सौहार्दपूर्ण  वातावरणात राहणे आणि एक दुसऱ्याची संस्कृती समजून घेणे  किती महत्त्वाचे आहे .

माझ्या देशबांधवांनो,  आज मन की बात मध्ये आपण अनेक विषयांवर चर्चा केली. आणखी एक विषय आहे जो माझ्या मनाच्या अत्यंत जिव्हाळ्याचा विषय आहे .

हा विषय आहे जलसंरक्षणाचा . माझं बालपण जिथे गेलं तिथे पाण्याची नेहमी टंचाई असायची. आम्ही पावसासाठी आसुसलेले असायचो आणि म्हणूनच पाण्याचा एक एक थेंब वाचवणे  आमच्या संस्कारांचा एक भाग बनला आहे . आता 'जन  भागीदारीतून जल  संरक्षण ' या मंत्राने तिथले चित्र पालटून टाकले आहे. पाण्याचा प्रत्येक  थेंब वाचवणे आणि पाणी कुठल्याही प्रकारे वाया जाणार नाही याची काळजी घेणे  हा आपल्या जीवनशैलीचा एक सहज भाग असायला हवा. आपल्या कुटुंबाची परंपरा बनायला  हवी ज्याचा  प्रत्येक सदस्यांना अभिमान वाटेल .

मित्रानो, निसर्ग आणि पर्यावरण संरक्षण भारताच्या सांस्कृतिक जीवनात  आपल्या दैनंदिन जीवनात वसलेले आहे. पाऊस हा  नेहमीच आपले विचार, आपलं  तत्वज्ञान आणि आपल्या संस्कृतीला आकार देत आला आहे. ऋतुसंहार आणि मेघदूत मध्ये महाकवी कालिदास यांनी पावसाचे खूप सुंदर वर्णन केलं आहे . साहित्यप्रेमीमध्ये या कविता आजही खूप लोकप्रिय आहेत. ऋग्वेदातील पर्जन्यसूक्त मध्ये देखील पावसाच्या सौंदर्याचे खूप सुंदर वर्णन केलं आहे. त्याचप्रमाणे श्रीमद्भागवत मध्ये देखील काव्यात्मक स्वरूपात पृथ्वी, सूर्य आणि पाऊस यामधील संबंध विस्ताराने सांगितला आहे

अष्टौ मासान् निपीतं यद्, भूम्याः च, ओद-मयम् वसु |

        स्वगोभिः मोक्तुम् आरेभे, पर्जन्यः काल आगते ||

अर्थात सूर्याने 8 महीने पाण्याच्या रूपात पृथ्वीच्या संपत्तीचा वापर केला  होता. आता पावसाळ्याच्या ऋतूत सूर्य संचित संपत्ती पृथ्वीला परत करत आहे . खरंच  पावसाचा ऋतू केवळ सुंदर आणि आनंददायी नाही तर  पोषण देणारा,  जीवन देणारा देखील असतो. पावसाचे पाणी जे आपल्याला मिळत आहे ते आपल्या भावी पिढ्यांसाठी आहे हे आपण कधीही विसरू नये .

आज माझ्या मनात हा विचार आला कि रोचक संदर्भानेच  मी आज आपली आजची मन कि बात  समाप्त करावी. तुम्हा सर्वांना आगामी सण -उत्सवांच्या खूप खूप  शुभेच्छा . सण उत्सवांच्या काळात हे जरूर लक्षात ठेवा की कोरोना  अजूनही आपल्यातून गेलेला नाही. कोरोनाशी  संबंधित नियम विसरायचे नाहीत. तुम्ही सगळे निरोगी आणि प्रसन्न रहा .  खूप खूप धन्यवाद!