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PM Modi unveils the statue of Swami Vivekananda in Kuala Lumpur
It was Swami Vivekananda who first gave the concept of One Asia: PM
South East Asia Summit speaking of One Asia; a concept given by Swami Vivekananda: PM.
From the Vedas to Vivekananda, India's culture is rich: PM
Swami Vivekananda neither a person nor a system, it is the identity of the soul of ancient India: PM
Vivekananda is not just a name. He personifies the thousands year old Indian culture and civilization: PM
It is a great fortune for me to dedicate the statue of Swami Vivekananda on Malaysian soil: PM
Pursuit of truth got Ramakrishna Paramhans & Swami Vivekananda together. They were not looking for a teacher or a disciple: PM
Swami Vivekananda was in pursuit of the truth: PM

भाइयो और बहनों।

अभी सुप्रियान जी कह रहे थे कि हमने इस परिसर में तो विवेकानंद जी की प्रतिमा की स्था्पना की, पर हम हमारे मन-मंदिर में, हमारे हृदय में विवेकानंद जी को प्रतिस्था पित करें और मैं ये बात आपको कहूं और आप कर लेंगे।

मैं नहीं मानता हूं कि मेरे कहने से हमारे भीतर विवेकानंद प्रवेश कर सकते है और न ही किसी के प्रवचन से विवेकानंद जी हमारे भीतर प्रवेश कर सकते है। विवेकानंद, ये न किसी व्यक्ति का नाम है, विवेकानंद न किसी व्यवस्था की पहचान है, एक प्रकार से विवेकानंद सहस्त्र साल पुरानी भारत की आत्मा की पहचान है।

वेद से विवेकानंद तक हमारी एक सांस्कृतिक लंबी विरासत है और उपनिषद से ले कर के उपग्रह तक हमने हमारी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक विकास यात्रा को भी सामर्थ्य दिया है। 

उपनिषद से शुरू किया होगा, उपग्रह तक हम पहुंचे होंगे लेकिन हमारा जो मूल Pin है जो हमारी आत्मा है और सच्चे अर्थ में जो हमारी पहचान है, उसको अगर हम बरकरार रखते है तो उसका अर्थ ये हुआ कि मैं मेरे भीतर स्वामी विवेकानंद जी को जीवित रखने की कोशिश कर रहा हूं।

रामकृष्ण परमहंस और नरेन्द्र । ये दोनों के बीच की दुनिया को अगर हम समझ लें तो शायद विवेकानंद जी को समझने में सुविधा बन जाती है।

नरेन्द्र कभी गुरू की खोज में नहीं निकले थे, न ही उसे गुरू की तलाश थी, नरेन्द्र सत्य् की तलाश कर रहा था। ईश्वर है कि नहीं! उसके मन में एक आशंका थी कि परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं हो सकती है। ईश्ववर नाम का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता है और वो उस सत्य को जानने के लिए जूझ रहे थे।

और न ही रामकृष्ण परमहंस किसी शिष्य की तलाश में थे। मैं गुरू परम्परा की भावना , मेरे बाल कुछ शिष्यों की परंपरा अगर है। और मैं जो आश्रम प्रतिस्थापित करूं और उसको कोई चलाता रहे, रामकृष्ण देव के मन में भी ऐसे किसी शिष्या की तलाश नहीं थी ऐसी कोई मनीषा नहीं थी।

एक गुरू जिसको शिष्यो की खोज नहीं थी, एक शिष्य जिसको गुरू की खोज नहीं थी, लेकिन कमाल देखिए, एक सत्य को समर्पित था और दूसरा सत्य को खोजना चाहता था और उसी सत्य की तलाश में दोनों को जोड़ के रख दिया।

और ये अगर हम समझ लें तो फिर सत्य की तलाश क्या हो सकती है, सत्य के रास्ते पे चलना कितना कठिन हो सकता है और उसमें भी कैसे सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वो विवेकानंद जी के जीवन से हम जान सकते है।

हम विवेकानंद जी के उस कालखंड का विचार करें जहां पर धर्म का प्रभाव, पूजा पद्धति की विधि का प्रभाव, rituals का माहात्मय । धर्म गुरुओं का माहात्मय, धर्मग्रथों का माहात्मय। ये चरम सीमा पर था। उस समय एक नौजवान उन सारी परम्पराओं से भाग जाने की बात करे, इसकी आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता है।

एक बहुत बड़ा वर्ग ये मानता था कि भगवान के पास घंटो तक बैठे रहे, पूजा-पाठ करते रहे, आरती-धूप करते रहे, फूल चढ़ाते रहे, नए-नए प्रसाद चढ़ाते रहे तो जीवन के पाप धूल जाते है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। एक चरम सीमा का आनंद प्राप्त, करने का अवसर मिल जाता है। ये सोच बनी पड़ी हुई थी और उस समय विवेकानंद डंके की चोट पर कहते थे कि जन सेवा ये प्रभु सेवा। सामान्य मानवी जो आपके सामने जिंदा है, जो दुख और दर्द से पीड़ित है, उसकी सेवा करो, ईश्वर अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

उन्होंने जब कलकत्ते की धरती पर नौजवानों से पूछा कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता क्या होता है, हमें क्या करना चाहिए तब उन्होंने कहा ये सब छोड़ो, जाओ फुटबॉल खेलो, मस्ती से फुटबॉल खेलो पूरी तरह से अपने आप को झोंक दो, हो सकता है तुम्हें रास्ता मिल जाएगा। उस समय हम गुलामी के कालखंड में जी रहे थे, कोई सोच भी नहीं सकता था भारत कभी आजाद हो सकता है लेकिन स्वामी विवेकानंद एक दीर्घ दृष्टा थे और वो कहते थे, अपने जीवन के काल में कहा था कि मैं, मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं, मैं मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं कि मेरी भारत मां उठ खड़ी हुई है, वो जगत गुरू के स्थान पर विराजमान मैं देख रहा हूं, मैं एक दिनमान भारत माता मैं देख रहा हूं और वो दिन बहुत निकट होगा । ये भाव जगत स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन काल में अपनी आंखों से देखा था और वो हिंदुस्तान को प्रेरित करने का प्रयास करते थे।

वो एक कालखंड था जब आध्यात्म प्रधान जीवन था और वो सिर्फ भारत में नहीं एशिया के सभी देशों में समाहित था और दूसरी तरफ वो पश्चिम का विचार था, जहां अर्थ प्रधान था। आध्यात्म प्रधान जीवन और अर्थ प्रधान जीवन के बीच एक शताब्दियों का टकराव चल रहा था। अर्थ प्रधान जीवन ने आध्यात्म प्रधान जीवन को किनारे कर दिया था। अर्थ प्रधान जीवन जन सामान्य की आशा, आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु बन गया था और ऐसे कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने हिम्मत के साथ और 30-32 साल की आयु में पश्चिम की दुनिया में जाकर के, उस धरती पर जाकर के विश्व को आध्यत्मिकता का संदेश देने का एक सामर्थ्यवान काम किया था। जिस महापुरुष ने एशिया की आध्यात्मिक ताकत को दुनिया को पहचान कराया था और पहली बार विश्व को एशिया की अपनी धरती की एक अलग चिंतनधारा है, यहां के संस्कार अलग हैं और विश्व को देने के लिए उसके पास बहुत कुछ है। ये बात डंके की चोट पर कहने का साहस स्वामी विवेकानंद ने किया था। कल मैं यहां आसियान समिट में था आज यहां मैं South East Asia Summit में था और एक बात वहां उभरकर के सामने आती थी और वो एक आती थी कि One Asia .

One Asia का विचार लेकिन आज जो आवाज गूंज रही है उसमें आर्थिक व्यवस्था है, राजनीतिक व्यवस्था है, सरकारों के मेलजोल की व्यवस्था का चिंतन है लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि One Asia का concept आध्यात्मिक धरातल पर सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने प्रचारित किया था। मैं एक पुरानी घटना आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। ..

After Swami Vivekananda introduced the East and Asia to the West, Scholars and philosophers like Okakura, Karinzo from Japan, Rabindranath Tagore, Mahrishi Aurbindo, Anand Kumar Swami and Vinoy Sarkar were inspired by Swami Vivekananda. OkaKura invited Swami Vivekananda to Japan and also sent him a cheque of Rs 300. He came to Calcutta and met Swami Vivekananda on 1st February 1902 and both went to Bodh Gaya together. OkaKura is the symbol of Asianism. In his book, ‘Ideals of the East’ by Okakura, the manuscripts were edited by Sister Nivedita, the foremost western disciple of Swami Vivekananda. The very first sentence, this is one important thing I want to tell you. The very first sentence is “Asia is one.” The idea of Asian unity is clearly Swami Vivekananda’s concept. In his next book, Okakura began by saying “Brothers and sisters of Asia”, echoing Swami Vivekananda’s speech at Parliament of Religions.

मैं ये इसलिए कह रहा था कि जो उस समय इस प्रकार के Philosopher विवेकानंद जी के प्रभाव में थे, उन्होंने जो विवेकानंद जी से मंत्र पाया था वो Asia is One ये मंत्र पाया था। आज 100 साल के बाद आर्थिक, राजनीतिक कारणों से One Asia की चर्चा हो रही है लेकिन उस समय आध्यात्मिक एकात्मता के आधार पर विवेकानंद जी ये देख पाते थे कि ये भूमि है जो विश्व को संकटों से बाहर निकाल सकती है और आज दुनिया जिन दो संकटों से जूझ रही है अगर उन दो संकटों के समाधान का रास्ता कोई दे सकता है तो एशिया की धरती से ही निकल सकता है।

और इसलिए आज विश्व कह रहा है Climate change और Global warming की बात, आज विश्व कह रहा है Terrorism की चर्चा, यही तो धरती है जहां भगवान बुद्ध का संदेश मिला, यही तो धरती है जहां हिंदुत्व का संदेश मिला और इसी धरती से ये बातें उभर करके आ गई हैं जहां पर ये कहा गया एकम सत, विपरा बहुधा विधंति, Truth is One, Wise call it in different ways ये जो मूल मंत्र हैं वो सबको एक रखना, जोड़ने की ताकत देता है और इसलिए जब Terrorism की बात आती है तो उसका समाधान इसमें holier than thou की कल्पना ही नहीं है, हर सत्य को स्वीकार किया जाता है और जब हर सत्य को स्वीकार किया जाता है तब conflict के लिए अवकाश नहीं होता है और जब conflict के लिए अवकाश नहीं है तो संघर्ष की संभावना नहीं है और जहां संघर्ष नहीं है वहां Terrorism के रास्ते पर जाना का कोई कारण नहीं बनता है। 


आज विश्व Global Warming की चर्चा करता है। हम वो लोग हैं जिसने पौधे में परमात्मा देखा था, हम जितने भी ईश्वर की कल्पना की है हर ईश्वर के साथ कोई न कोई प्राकृतिक जीवन जुड़ा हुआ है। किसी न किसी वृक्ष के साथ उन्होंने साधना की है, किसी न किसी पशु-पक्षी को उन्होंने पालन किया है। ये सहज संदेश हमारी परंपरा में रहा हुआ है। हम प्रकृति के शोषण का पक्षकार नहीं रहे हैं, हम nature के साथ मित्रतापूर्ण गुजारा करने की सबक ले करके चले हुए लोग है। वही संस्कृति है जो ग्लोबल वार्मिंग से मानवजाति को बचा सकती है।

मुझे लगता है कि स्वा्मी विवेकानंद जी ने हमें ये जो रास्तेे दिखाएं है। उन रास्तों को अगर हम परिपूर्ण करते है तो हमें हमारे भीतर कोई नए विवेकानंद को प्रतिस्थापित करने की जरूरत नहीं है। उनकी कही हुई एक बात को ले करके भी हम चल पाते है मैं समझता हूं हम आने वाली शताब्दियों तक मानवजात की सेवा करने के लिए कुछ न कुछ योगदान करके जा सकते है।

आज मुझे यहां एक योग की पुस्तक का भी लोकापर्ण करने का अवसर मिला है और वो भी हमारे सरकार के साथ ही श्रीमान शाहू ने यहां की भाषा में योग की पुस्तक की रचना की है। वे स्वयं सरकारी अधिकारी है लेकिन योग के प्रति उनका समर्पण है। मुझे खुशी हुई उनकी उस किताब का लोकापर्ण करते हुए। आज विश्व योग के प्रति आकर्षित हुआ है। हर कोई तनाव मुक्त जीवन का रास्ता खोज रहा है और उसको लगता है उसकी खिड़की योग से खुलती है और इसलिए हर कोई उस खिड़की में झांकने की कोशिश करता है।

यूनाइटेड नेशन ने अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस के रूप में 21 जून को स्वीकार किया। दुनिया के 177 देशों ने उसको को-स्पोंसर किया और दुनिया के सभी देशों ने 21 जून को योग का दिवस मनाया। मानवजात जो कि अपने मानसिक समाधान का रास्ता तलाश रही है। Holistic health care की तरफ आगे बढ़ रही है। तब उसको लगता है कि योग एक ऐसी सरल विद्या है जिसको अगर हम दिन के आधा-पौना घंटा भी लगा ले तो हम अपने मन, बुद्धि, शरीर को एक दिशा में चला सकते है। आज हमारे लिए ये चुनौती नहीं है कि हम दुनिया को समझाएं कि योग क्या है, हमारे सामने चुनौती ये है कि सारा विश्व अच्छे योग टीचरों की मांग कर रहा है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि हम Perfect योग teacher को कैसे दें ताकि इस विद्या का सही स्वरूप आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे और जो भी इसका लाभ उठाएं, उसको सचमुच में, उसका जो मकसद हो, मकसद पूरा करने में काम हो और इसलिए जितना अधिक आधुनिक भाषा में हम योग को प्रचारित करें, जितनी अधिक योग को आधुनिक भाषा में प्रतिपादित करें और खुद योग के जीवन को जीकर के दुनिया के सामने प्रस्तुत करें और अधिकतम योग के teacher तैयार करें, hobby के रूप में तैयार करें भले profession के रूप में न तैयार कर सकें। दिन में हम 50 काम करते हैं, एक घंटे योगा के लिए जो भी सीखने आएगा, हम सिखाएंगे।

ये पूरा हम एशिया के वायुमंडल में लाते हैं तो विश्व की जो अपेक्षा है, उस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए उत्तम योग teacher हम दुनिया को दे सकते हैं। मैं स्वामी सूपरयानंद जी का बहुत आभारी हूं कि आज मुझे इस पवित्र स्थान पर आने का अवसर मिला, विवेकानंद जी की प्रतिमा का लोकापर्ण करने का अवसर मिला और मुझे विश्वास है कि इस धरती पर आने वाले विश्व के सभी लोगों को यहां से कोई प्रेरणा मिलती रहेगी। इसी एक शुभकामना के साथ आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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ଗୁଜରାଟର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ସହିତ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଭାବ ବିନିମୟ
August 03, 2021
ସେୟାର
 
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ପୂର୍ବରୁ ଶସ୍ତା ରାସନ ଯୋଜନାର ପରିସର ଓ ବଜେଟ ବଢି ବଢି ଚାଲି ଥିବାବେଳେ ତୁଳନାତ୍ମକ ଭାବେ କ୍ଷୁଧା ଓ ଅପପୁଷ୍ଟି ହାର ହ୍ରାସ ପାଉ ନଥିଲା : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବକଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାରେ ଏବେ ହିତାଧିକାରୀମାନେ ପୂର୍ବାପେକ୍ଷା ପ୍ରାୟ ଦୁଇଗୁଣ ରାସନ ପାଉଛନ୍ତି: ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ମହାମାରୀ ସମୟରେ ଦେଶର ୮୦କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକ ମାଗଣାରେ ରାସନ (ଖାଦ୍ୟ) ସାମ୍ରଗୀ ପାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ସରକାରଙ୍କୁ ଏଥିପାଇଁ ୨ଲକ୍ଷ କୋଟି ଟଙ୍କାରୁ ଅଧିକ ଖର୍ଚ୍ଚ କରିବାକୁ ପଡୁଛି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଦେଶରେ ଶତାବ୍ଦୀର ସର୍ବବୃହତ ମହାମାରୀ ସତ୍ତ୍ୱେ କୌଣସି ଲୋକ ଭୋକିଲା ନାହାନ୍ତି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗରିବଙ୍କ ସଶକ୍ତୀକରଣକୁ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଅଗ୍ରାଧିକାର ଦିଆଯାଉଛି: ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ଆମ ଖେଳାଳିମାନଙ୍କର ନୂଆ ବିଶ୍ୱାସ ନୂଆ ଭାରତର ନମୁନା ହୋଇଛି : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
୫୦କୋଟି ଡୋଜ ଟିକା ଦେଇ ଏକ ନୂଆ ମାଇଲଖୁଣ୍ଟ ସ୍ଥାପନ ଦିଗରେ ଦେଶ ଆଗେଇ ଚାଲିଛି : ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ଆଜାଦିର ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ପାଳନ ଅବସରରେ ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣପାଇଁ ଆସନ୍ତୁ ସମସ୍ତେ ପବିତ୍ର ଶପଥ ନେବା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ନମସ୍କାର! ଗୁଜରାଟର ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ବିଜୟ ରୂପାଣୀ ମହାଶୟ, ଉପ-ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ନିତୀନ ଭାଇ ପଟେଲ ମହାଶୟ, ସଂସଦରେ ମୋର ସାଥୀ ଏବଂ ଗୁଜରାଟ ଭାଜପା ଅଧ୍ୟକ୍ଷ ଶ୍ରୀମାନ ସି.ଆର ପଟେଲ ମହାଶୟ, ପିଏମ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ସମସ୍ତ ହିତାଧୀକାରୀ, ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ!

ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ଗୁଜରାଟ ବିକାଶ ଏବଂ ବିଶ୍ୱାସର ଯେଉଁ ଅନବରତ ଧାରା ଆରମ୍ଭ କଲା, ତାହା ରାଜ୍ୟକୁ ନୂତନ ଶୀଖରକୁ ନେଇ ଯାଉଛି । ଗୁଜରାଟ ସରକାର ଆମର ଭଉଣୀ, ଆମର କୃଷକ, ଆମର ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଜନାକୁ ସେବା ଭାବ ସହିତ ଏହି ମାଟିକୁ ନେଇ ଆସିଛନ୍ତି । ଆଜି ଗୁଜରାଟର ଲକ୍ଷ-ଲକ୍ଷ ପରିବାରଙ୍କୁ ପିଏମ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନା ମାଧ୍ୟମରେ ଏକ ସଙ୍ଗେ ମାଗଣ ରାସନ ବିତରଣ କରାଯାଉଛି । ଏହି ମାଗଣା ରାସନ ବୈଶ୍ୱିକ ମହାମାରୀର ଏହି ସମୟରେ ଗରିବଙ୍କର ଚିନ୍ତାକୁ କମ୍ କରୁଛି, ସେମାନଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ବଢ଼଼ାଉଛି। ଏହି ଯୋଜନା ଆଜିଠାରୁ ପ୍ରାରମ୍ଭ ହେଉନାହିଁ, ଯୋଜନା ବିଗତ ଏକ ବର୍ଷ ଧରି ପ୍ରାୟତଃ ଚାଲୁ ରହିଛି ଫଳରେ ଏହି ଦେଶର କୌଣସି ଗରିବ ଭୋକରେ ଶୋଇ ଯାଆନ୍ତୁ ନାହିଁ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଗରିବଙ୍କ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଏଥିପାଇଁ ବିଶ୍ୱାସ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଛି। ଏହି ବିଶ୍ୱାସ, ଏଥିପାଇଁ ଆସିଛି କାରଣ ସେମାନଙ୍କୁ ଲାଗୁଛି ଯେ ଆହ୍ୱାନ ହୁଏତ କେତେ ବଡ଼ ହେଉ ନା କାହିଁକି, ଦେଶ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି। କିଛି ସମୟ ପୂର୍ବରୁ ମୋତେ କିଛି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ସହିତ କଥାବାର୍ତା କରିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା, ସେହି ଚର୍ଚ୍ଚା ସମୟରେ ମୁଁ ଅନୁଭବ କଲି ଯେ ଏକ ନୂତନ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଭରି ହୋଇ ରହିଛି ।

ସାଥୀଗଣ,

ସ୍ୱାଧୀନତା ପରଠାରୁ ହିଁ ପ୍ରାୟତଃ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସରକାର ଗରିବଙ୍କୁ ଶସ୍ତା ଭୋଜନ ଦେବାର କଥା କହିଥିଲେ। ଶସ୍ତା ରାସନର ଯୋଜନାଗୁଡ଼ିକର ପରିସର ଏବଂ ବଜେଟ ବର୍ଷ ପରେ ବର୍ଷ ବଢ଼଼ି ଚାଲିଲା, କିନ୍ତୁ ତାହାର ଯେଉଁ ପ୍ରଭାବ ହେବା ଦରକାର ଥିଲା, ତାହା ସୀମିତ ହୋଇ ହିଁ ରହିଗଲା । ଦେଶର ଖାଦ୍ୟ ଭଣ୍ଡାର ବଢ଼଼ି ଚାଲିଲା, କିନ୍ତୁ ଖାଦ୍ୟାଭାବ ଏବଂ କୁପୋଷଣରେ ସେହି ଅନୁପାତରେ କୌଣସି ହ୍ରାସ ପାଇଲା ନାହିଁ। ଏହାର ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ କାରଣ ଥିଲା ଯେ ପ୍ରଭାବୀ ବିତରଣ ବ୍ୟବସ୍ଥା ନଥିବା ଆଉ ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ କିଛି ରୋଗ ମଧ୍ୟ ଆସିଗଲା, କିଛି ବାଟମାରଣା କରୁଥିବା କମ୍ପାନୀ ମଧ୍ୟ ଆସିଗଲେ, ସ୍ୱାର୍ଥବାଦୀ ତତ୍ୱ ମଧ୍ୟ ପ୍ରବେଶ କରିଗଲେ। ଏହି ସ୍ଥିତିକୁ ବଦଳାଇବା ପାଇଁ ବର୍ଷ 2014 ପରେ ନୂତନ ଭାବେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କରାଗଲା । ନୂତନ ଟେକ୍ନୋଲୋଜିକୁ ଏହି ପରିବର୍ତନର ମାଧ୍ୟମ କରାଗଲା। କୋଟି- କୋଟି ନକଲି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ବ୍ୟବସ୍ଥାରୁ ବାହାର କରାଗଲା। ରାସନ କାର୍ଡକୁ ଆଧାର ସହିତ ସଂଯୋଗ କରାଗଲା ଆଉ ସରକାରୀ ରାସନ ଦୋକାନରେ ଡିଜିଟାଲ ଟେକ୍ନୋଲୋଜିକୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରାଗଲା। ଆଜି ପରିଣାମ ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ରହିଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଶହେ ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ବିପତି କେବଳ ଭାରତ ଉପରେ ନୁହେଁ, ସମଗ୍ର ଦୁନିଆ ଉପରକୁ ଆସିଛି, ସମଗ୍ର ମାନବ ଜାତି ପାଇଁ ଆସିଛି । ଜୀବନ- ଜୀବିକା ଉପରକୁ ସଙ୍କଟ ଆସିଲା, କରୋନା ଲକଡାଉନର କଟକଣା ଯୋଗୁଁ କାମ ଧନ୍ଦା ସବୁକୁ ବନ୍ଦ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଲା। କିନ୍ତୁ ଦେଶ ନିଜର ନାଗରିକମାନଙ୍କୁ ଭୋକରେ ଶୋଇବାକୁ ଦେଇନାହିଁ। ଦୁର୍ଭାଗ୍ୟବଶତଃ ଦୁନିଆର ବହୁ ଦେଶର ଲୋକଙ୍କ ଉପରେ ଆଜି ସଂକ୍ରମଣ ସହିତ ମଧ୍ୟ ଖାଦ୍ୟାଭାବର ମଧ୍ୟ ଭୀଷଣ ସଙ୍କଟ ଆସିଯାଇଛି। କିନ୍ତୁ ଭାରତ ସଂକ୍ରମଣର ସଙ୍କେତ ମିଳିବାର ପ୍ରଥମ ଦିନରୁ ହିଁ, ଏହି ସଙ୍କଟକୁ ଚିହ୍ନିଲା ଆଉ ଏହା ଉପରେ କାର୍ଯ୍ୟ କଲା। ଏଥିପାଇଁ, ଆଜି ସମଗ୍ର ଦୁନିଆରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ପ୍ରଶଂସା ହେଉଛି । ବଡ଼- ବଡ଼ ବିଶେଷଜ୍ଞ ଏହି କଥାର ପ୍ରଶଂସା କରୁଛନ୍ତି ଯେ ଭାରତ ନିଜର 80 କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକଙ୍କୁ ଏହି ମହାମାରୀ ସମୟରେ ମାଗଣା ଶସ୍ୟ ଉପଲବ୍ଧ କରାଉଅଛି। ଏହା ଉପରେ 2 ଲକ୍ଷ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଟଙ୍କା ଏହି ଦେଶ ଖର୍ଚ୍ଚ କରୁଛି । ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ହେଉଛି ମାତ୍ର ଗୋଟିଏ ଯେ- ମୋ ଭାରତର କୌଣସି ଭାଇ ଭଉଣୀ, ମୋର କୌଣସି ଭାରତବାସୀ ଭୋକିଲା ନ ରୁହନ୍ତୁ । ଆଜି 2 ଟଙ୍କାରେ ଏକ କିଲୋ ଗହମ, 3 ଟଙ୍କାରେ ଏକ କିଲୋ ଚାଉଳର କୋଟା ପରେ ମଧ୍ୟ ଅତିରିକ୍ତ 5 କିଲୋ ଗହମ ଏବଂ ଚାଉଳ ମାଗଣାରେ ଦିଆଯାଉଛି । ଅର୍ଥାତ ଏହି ଯୋଜନାରେ ପୂର୍ବ ତୁଳନାରେ ରାସନକାର୍ଡ ଧାରୀଙ୍କୁ ପ୍ରାୟତଃ ଦୁଇଗୁଣା ମାତ୍ରାରେ ରାସନ ଉପଲବ୍ଧ କରାଯାଉଛି। ଏହି ଯୋଜନା ଦୀପାବଳୀ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାଲିବ, ଦୀପାବଳୀ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କୌଣସି ଗରିବଙ୍କୁ ପେଟ ଭରିବା ପାଇଁ ନିଜ ପକେଟରୁ ଟଙ୍କା କାଢ଼ିବାକୁ ପଡ଼ିବ ନାହିଁ। ଗୁଜରାଟରେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାୟତଃ ସାଢ଼େ 3 କୋଟି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ମାଗଣା ରାସନର ଲାଭ ଆଜି ମିଳୁଛି । ମୁଁ ଗୁଜରାଟ ସରକାରଙ୍କୁ ଏହି କଥା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଚାହିଁବି ଯେ, ସେ ଦେଶର ଅନ୍ୟ ଅଞ୍ଚଳରୁ ଏଠାକୁ କାମଧନ୍ଦା କରିବାକୁ ଆସିଥିବା ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଲେ। କରୋନା ଲକ୍ ଡାଉନ୍ କାରଣରୁ ପ୍ରଭାବିତ ହୋଇଥିବା ଲକ୍ଷ-ଲକ୍ଷ ଶ୍ରମିକଙ୍କୁ ଏହି ଯୋଜନାର ଲାଭ ମିଳିଛି। ଏଥିରେ ବହୁତ ଜଣ ସାଥୀ ଏଭଳି ଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କ ପାଖରେ ହୁଏତ ରାସନ କାର୍ଡ ହିଁ ନଥିଲା, କିମ୍ବା ତାଙ୍କର ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟର ରାସନ କାର୍ଡ ଥିଲା। ଗୁଜରାଟ ହେଉଛି ସେହି ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ ଯିଏ ସର୍ବପ୍ରଥମେ ଏକ ରାଷ୍ଟ୍ର, ଏକ ରାସନ୍ କାର୍ଡର ଯୋଜନାକୁ ଲାଗୁ କଲେ। ଏକ ରାଷ୍ଟ୍ର, ଏକ ରାସନ୍ କାର୍ଡର ଲାଭ ଗୁଜରାଟର ଲକ୍ଷ- ଲକ୍ଷ ଶ୍ରମିକ ସାଥୀମାନଙ୍କୁ ହୋଇଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଏକ ସମୟ ଥିଲା ଯେତେବେଳେ ଦେଶରେ ବିକାଶର କଥା କେବଳ ବଡ଼- ବଡ଼ ସହର ମଧ୍ୟରେ ସୀମିତ ହୋଇ ରହିଥିଲା । ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ, ବିକାଶର ଅର୍ଥ କେବଳ ମାତ୍ର ଏତିକି ଥିଲା ଯେ ବିଶେଷ- ବିଶେଷ ଅଞ୍ଚଳରେ ବଡ଼- ବଡ଼ ଫ୍ଲାଏ ଓଭର ତିଆରି କରିଦେବା, ସଡ଼କ ତିଆରି କରିଦେବା, ମେଟ୍ରୋ ହୋଇଯିବା! ଅର୍ଥାତ, ଗାଁ- ଗଣ୍ଡାରୁ ଦୂରରେ, ଆଉ ଆମ ଘର ବାହାରେ ଯେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଥିଲା, ଯାହାକି ସାଧାରଣ ନାଗରିକଙ୍କ ସହିତ ନେଣ- ଦେଣ ନଥିଲା, ତାହାକୁ ବିକାଶ ବୋଲି ମାନି ନିଆଗଲା । ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ଦେଶ ଏହି ଚିନ୍ତାଧାରାକୁ ବଦଳାଇଛି । ଆଜି ଦେଶ ଦୁଇଟି ଦିଗରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଦୁଇଟି ଧାରଣାରେ ଚାଲିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଦେଶକୁ ନୂତନ ଭିତିଭୂମିର ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି। ଭିତିଭୂମି ଉପରେ ମଧ୍ୟ ଲକ୍ଷ- ଲକ୍ଷ କୋଟି- କୋଟି ଟଙ୍କା ଖର୍ଚ୍ଚ କରାଯାଉଛି, ତାହାଦ୍ୱାରା ଲୋକମାନଙ୍କୁ ରୋଜଗାର ମଧ୍ୟ ମିଳି ପାରୁଛି, କିନ୍ତୁ ଏହା ସହିତ ହିଁ, ସାଧାରଣ ମାନବଙ୍କର ଗୁଣବତାକୁ ସୁଧାରିବା ପାଇଁ, ସହଜରେ ସହବସ୍ଥାନ ପାଇଁ ମାନଦଣ୍ଡ ମଧ୍ୟ ସ୍ଥାପିତ କରାଯାଉଛି। ଗରିବଙ୍କ ସଶକ୍ତୀକରଣ ପାଇଁ ଆଜି ସର୍ବାଧିକ ପ୍ରାଥମିକତା ଦିଆଯାଉଛି । ଯେତେବେଳେ 2 କୋଟି ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କୁ ଘର ଦିଆଯାଇଥାଏ ସେତେବେଳେ ଏହାର ଅର୍ଥ ଏହା ହୋଇଥାଏ ଯେ ସେମାନେ ଏବେ ଶୀତ, ଗରମ, ବର୍ଷା ଡରରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ବଞ୍ଚି ପାରିବେ, କେବଳ ଏତିକି ହିଁ ନୁହେଁ, ଯେତେବେଳେ ନିଜର ଘର ରହିଥାଏ ନା ତେବେ ଆତ୍ମସମ୍ମାନରେ ତାହାର ଜୀବନ ଭରି ଯାଇଥାଏ । ନୂତନ ସଂକଳ୍ପ ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇ ଯାଇଥାଏ ଆଉ ସେହି ସଂକଳ୍ପ ଗୁଡ଼ିକୁ ସାକାର କରିବା ପାଇଁ ଗରିବ ପରିବାର ସମେତ ମନପ୍ରାଣ ଦେଇ ଲାଗି ପଡ଼ନ୍ତି, ଦିନରାତି ପରିଶ୍ରମ କରନ୍ତି। ଯେତେବେଳେ 10 କୋଟି ପରିବାରଙ୍କୁ ଶୌଚ ପାଇଁ ଘର ବାହାରକୁ ଯିବାର ବାଧ୍ୟବାଧକତାରୁ ମୁକ୍ତି ମିଳିଥାଏ ତେବେ ତାହାର ଅର୍ଥ ଏହା ହୋଇଥାଏ ଯେ ତାଙ୍କ ଜୀବନସ୍ତର ଉନ୍ନତ ହୋଇଛି। ସେ ପୂର୍ବରୁ ଚିନ୍ତା କରୁଥିଲା ଯେ ସୁଖୀ ପରିବାରଗୁଡ଼ିକର ଘରେ ହିଁ ଶୌଚାଳୟ ରହିଥାଏ, ଶୌଚାଳୟ ସେହିମାନଙ୍କର ଘରେ ହିଁ ରହିଥାଏ। ଗରିବଙ୍କୁ, ବିଚରାମାନଙ୍କୁ ଅନ୍ଧାର କେବେ ହେବ ସେଥିପାଇଁ ଅପେକ୍ଷା କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ, ଖୋଲାସ୍ଥାନକୁ ଯିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ । କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ଗରିବଙ୍କୁ ଶୌଚାଳୟ ମିଳିଥାଏ ତେବେ ସିଏ ନିଜକୁ ନିଜେ ଧନୀ ଲୋକଙ୍କ ସହିତ ସମାନ ଭାବେ ନିଜକୁ ଦେଖିଥାଏ, ଏକ ନୂତନ ବିଶ୍ୱାସ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଥାଏ। ଏହିଭଳି ଭାବେ, ଯେତେବେଳେ ଦେଶର ଗରିବ ଜନ-ଧନ ଖାତା ମାଧ୍ୟମରେ ବ୍ୟାଙ୍କିଙ୍ଗ ବ୍ୟବସ୍ଥା ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଥାଏ, ମୋବାଇଲ ବ୍ୟାଙ୍କିଙ୍ଗ ମଧ୍ୟ ଗରିବଙ୍କ ହାତରେ ରହିଥାଏ ତେବେ ତାହାଙ୍କୁ ଶକ୍ତି ମିଳିଥାଏ, ତାହାଙ୍କୁ ନୂତନ ଅବସର ମିଳିଥାଏ। ଆମର ଏଠାରେ କୁହାଯାଏ –

ସାମର୍ଥ୍ୟ ମୂଳମ୍

ସୁଖମେବ ଲୋକେ!

ଅର୍ଥାତ, ଆମର ସାମର୍ଥ୍ୟର ଆଧାର ଆମ ଜୀବନର ସୁଖ ହିଁ ହୋଇଥାଏ। ଯେପରି ଆମେ ସୁଖ ପଛରେ ଦୌଡ଼ି ସୁଖ ହାସଲ କରି ପାରିବା ନାହିଁ ବରଂ ସେଥିପାଇଁ ଆମକୁ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ, କିଛି ହାସଲ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ। ସେପରି ହିଁ ସଶକ୍ତିକରଣ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ, ଶିକ୍ଷା, ସୁବିଧା ଏବଂ ଗରିମା ବଢ଼଼ିବା ଦ୍ୱାରା ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ କୋଟି- କୋଟି ଲୋକଙ୍କୁ ଆୟୂଷ୍ମାନ ଯୋଜନା ଯୋଗୁଁ ମାଗଣାରେ ଚିକିତ୍ସା ସୁବିଧା ମିଳେ, ସେତେବେଳେ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟରେ ସେମାନଙ୍କର ସଶକ୍ତୀକରଣ ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ଦୁର୍ବଳ ବର୍ଗର ଲୋକଙ୍କୁ ସଂରକ୍ଷଣର ସୁବିଧା ସୁନିଶ୍ଚିତ କରାଯାଇଥାଏ, ସେତେବେଳେ ଏହି ବର୍ଗଙ୍କୁ ଶିକ୍ଷାର ସଶକ୍ତୀକରଣ ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ସଡ଼କଗୁଡ଼ିକ ସହରରୁ ଗାଁଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ଯୋଡ଼ିଥାଏ, ଯେତେବେଳେ ଗରିବ ଲୋକଙ୍କୁ ମାଗଣା ଗ୍ୟାସ ସଂଯୋଗ, ମାଗଣା ବିଜୁଳି ସଂଯୋଗ ମିଳିଥାଏ ସେତେବେଳେ ଏହିସବୁ ସୁବିଧା ସେମାନଙ୍କର ସଶକ୍ତୀକରଣ କରିଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ଲୋକଙ୍କୁ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ, ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ସୁବିଧା ସବୁ ମିଳିଥାଏ ସେତେବେଳେ ସେ ନିଜର ଉନ୍ନତି ବିଷୟରେ, ଦେଶର ପ୍ରଗତି ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କରିଥାଆନ୍ତି। ଏହି ସ୍ୱପ୍ନ ସବୁକୁ ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ ଆଜି ଦେଶରେ ମୁଦ୍ରା ଯୋଜନା ରହିଛି, ସ୍ୱନିଧି ଯୋଜନା ରହିଛି। ଭାରତରେ ଏଭଳି ଅନେକ ଯୋଜନା ସବୁ ଗରିବଙ୍କୁ ସମ୍ମାନପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନର ମାର୍ଗ ଦେଉଛି, ସମ୍ମାନରୁ ସଶକ୍ତୀକରଣର ମାଧ୍ୟମ ହେଉଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଯେତେବେଳେ ସାଧାରଣ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କର ସ୍ୱପ୍ନକୁ ସୁଯୋଗ ମିଳିଥାଏ, ଯେତେବେଳେ ବ୍ୟବସ୍ଥା ସବୁ ନିଜେ ଘର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚିବାକୁ ଲାଗେ ସେତେବେଳେ କିଭଳି ଭାବେ ଜୀବନ ବଦଳିଯାଏ, ଏହାକୁ ଖୁବ ଭଲ ଭାବେ ଗୁଜରାଟ ବୁଝିଛି। କେବେ ଗୁଜରାଟର ଏକ ବଡ଼ ଅଞ୍ଚଳର ଲୋକମାନଙ୍କୁ, ମାଆ- ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ପାଣି ଭଳି ମୌଳିକ ଆବଶ୍ୟକତା ପାଇଁ କେତେ- କେତେ କିଲୋମିଟର ପାଦରେ ଚାଲି ଚାଲି  ଯିବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। ଆମର ସମସ୍ତ ମାଆ- ଭଉଣୀମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ଏହାର ସାକ୍ଷୀ। ଏହି ରାଜକୋଟକୁ ପାଣି ପାଇଁ ଟ୍ରେନ ପଠାଇବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। ରାଜକୋଟକୁ ପାଣି ପାଇଁ ଘର ବାହାରେ ଗାତ ଖୋଳି ତଳୁ ପାଇପରୁ ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ଗିନାରେ ଭରି ବାଲଟି ଭର୍ତି କରିବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଆଜି, ସର୍ଦ୍ଦାର ସରୋବର ସେତୁ ଦ୍ୱାରା, ସାଉନୀ ଯୋଜନା ଦ୍ୱାରା, କେନାଲର ନେଟୱର୍କ ଦ୍ୱାରା ସେହି କଚ୍ଛରେ ମଧ୍ୟ ମାଆ ନର୍ମଦାଙ୍କ ପାଣି ପହଞ୍ଚି ପାରୁଛି, ଯାହା କେହି କେବେ ଚିନ୍ତା ମଧ୍ୟ କରି ପାରୁ ନଥିଲେ ଆଉ ଆମର ଏଠାରେ ତ କୁହା ଯାଉଥିଲା ଯେ ମାଆ ନର୍ମଦାଙ୍କ ସ୍ମରଣ ମାତ୍ରକେ ପୂଣ୍ୟ ମିଳେ, ଆଜି ତ ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ଗୁଜରାଟର ଗାଁ- ଗାଁକୁ ଯାଉଛନ୍ତି, ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ପ୍ରତିଟି ଘରକୁ ଯାଉଛନ୍ତି, ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ଆପଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରକୁ ଆସି ଆପଣଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଉଛନ୍ତି। ଏହି ପ୍ରୟାସ ଗୁଡ଼ିକର ପରିଣାମ ହେଉଛି ଯେ ଆଜି ଗୁଜରାଟ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ପାଇପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ପାନୀୟ ଜଳ ଉପଲବ୍ଧ କରାଇବାର ଲକ୍ଷ୍ୟଠାରୁ ଏବେ ଆଉ ଅଧିକ ଦୂରରେ ନାହିଁ । ଏହି ଗତି, ସାଧାରଣ ଜନତାଙ୍କ ଜୀବନରେ ଏହି ପରିବର୍ତନ, ଏବେ ଧୀରେ- ଧୀରେ ସମଗ୍ର ଦେଶ ଅନୁଭବ କରୁଛି । ସ୍ୱାଧୀନତାର ଦଶକ- ଦଶକ ପରେ ମଧ୍ୟ ଦେଶରେ କେବଳ 3 କୋଟି ଗ୍ରାମୀଣ ପରିବାର ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ପାନୀୟ ଜଳ ସୁବିଧା ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ମିଳୁଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଆଜି ଜଳ ଜୀବନ ଅଭିଯାନ ମାଧ୍ୟମରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ କେବଳ ଦୁଇ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ, ଦୁଇ ବର୍ଷ ଭିତରେ ସାଢ଼େ 4 କୋଟିରୁ ଅଧିକ ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ୍ ପାଣି ସହିତ ସଂଯୋଗ କରାଯାଇ ସାରିଛି, ଆଉ ଏଥିପାଇଁ ମୋ ମାଆ- ଭଉଣୀମାନେ ମୋତେ ଭରପୂର ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଉଛନ୍ତି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଡବଲ ଇଂଜିନର ସରକାର ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଗୁଜରାଟ କ୍ରମାଗତ ଭାବେ ଲାଭ ଦେଖୁଛି। ଆଜି ସର୍ଦ୍ଦାର ସରୋବର ସେତୁ ଦ୍ୱାରା ବିକାଶର ନୂତନ ଧାରା ହିଁ ପ୍ରବାହିତ ହେଉ ନାହିଁ, ବରଂ ଷ୍ଟାଚ୍ୟୁ ଅଫ୍ ୟୁନିଟି ଭାବେ ବିଶ୍ୱର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଆକର୍ଷଣ ମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ ଆଜି ଗୁଜରାଟରେ ଅଛି । କଚ୍ଛରେ ସ୍ଥାପିତ ହେଉଥିବା ନବୀକରଣୀୟ ଶକ୍ତି ପାର୍କ, ଗୁଜରାଟକୁ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର ନବୀକରଣୀୟ ଶକ୍ତି ମାନଚିତ୍ରରେ ସ୍ଥାପିତ କରିବାକୁ ଯାଉଛି। ଗୁଜରାଟରେ ରେଳ ଏବଂ ବିମାନ ଯୋଗାଯୋଗର ଆଧୁନିକ ଏବଂ ଭବ୍ୟ ଭିତିଭୂମି ପ୍ରକଳ୍ପ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି। ଗୁଜରାଟର ଅହମ୍ମଦାବାଦ ଏବଂ ସୁରଟ ଭଳି ସହରଗୁଡ଼ିକରେ ମେଟ୍ରୋ ସଂଯୋଗର ସମ୍ପ୍ରସାରଣ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ହେଉଛି। ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ମେଡିକାଲ ଶିକ୍ଷାରେ ମଧ୍ୟ ଗୁଜରାଟରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ଗୁଜରାଟରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଥିବା ଉନ୍ନତ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ଭିତିଭୂମି 100 ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ମେଡିକାଲ ଜରୁରୀକାଳୀନ ପରିସ୍ଥିତିକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବାରେ ବଡ଼ ଭୂମିକା ତୁଲାଇଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୁଜରାଟ ସହିତ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ଏପରି ଅନେକ କାର୍ଯ୍ୟ ଅଛି, ଯେଉଁଥି ପାଇଁ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କର, ପ୍ରତ୍ୟେକ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ବୃଦ୍ଧି ପାଉଛି । ଆଉ ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ହିଁ ହେଉଛି ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଆହ୍ୱାନକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବା ପାଇଁ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସ୍ୱପ୍ନକୁ  ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ ହେଉଛି ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ ସୂତ୍ର । ଏବେ ଏହାର ତାଜା ଉଦାହରଣ ହେଉଛି ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ଆମ ଖେଳାଳୀମାନଙ୍କର ପ୍ରଦର୍ଶନ । ଚଳିତ ଥର ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ଭାଗନେବା ପାଇଁ ଭାରତର ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ ଖେଳାଳୀ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିଛନ୍ତି। ଏହା ସ୍ମରଣ ରଖିବାର କଥା ଯେ 100 ବର୍ଷରେ ଆସିଥିବା ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ବିପର୍ପ୍ୟୟ ସହିତ ମୁକାବିଲା କରି ଆମେ ଏହା କରି ପାରିଛେ । ଏପରି ଅନେକ ଖେଳ ଅଛି ଯେଉଁଥିରେ ଆମେ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିଛେ । କେବଳ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିନାହୁଁ ବରଂ କଡ଼ା ଟକ୍କର ମଧ୍ୟ ଦେଇଛୁ। ଆମ ଖେଳାଳୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଖେଳରେ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରୁଛନ୍ତି । ଚଳିତ ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ନୂତନ ଭାରତର ଦୃଢ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ପ୍ରତ୍ୟକ ଖେଳରେ ଦୃଷ୍ଟି ଗୋଚର ହେଉଛି । ଅଲିମ୍ପିକ୍ସ ଖେଳିବାକୁ ଯାଇଥିବା ଆମର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଖେଳାଳୀ, ନିଜଠାରୁ ଉନ୍ନତ ମାନ୍ୟତା ପ୍ରାପ୍ତ ଖେଳାଳୀମାନଙ୍କୁ, ସେମାନଙ୍କ ଦଳକୁ ଚାଲେଞ୍ଜ ଦେଉଛନ୍ତି । ଭାରତୀୟ ଖେଳାଳୀଙ୍କର ଉତ୍ସାହ, ଉଦ୍ଦିପନା ଏବଂ ହାସଲ କରିବାର ଲକ୍ଷ୍ୟ ଆଜି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ସ୍ତରରେ ରହିଛି । ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେତେବେଳେ ଆସିଥାଏ ଯେତେବେଳେ ଉପପୁକ୍ତ ପ୍ରତିଭାଙ୍କର ଚିହ୍ନଟ ହୋଇଥାଏ, ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହନ ମିଳିଥାଏ।        ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେତେବେଳେ ଆସିଥାଏ ଯେତେ ବେଳେ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଗୁଡିକ ବଦଳିଥାଏ, ପାରଦର୍ଶୀ ହୋଇଥାଏ । ଏହି ନୂତନ  ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ନ୍ୟୁ ଇଣ୍ଡିଆର ପରିଚୟ ପାଲଟିଛି । ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ଆଜି ଦେଶର କୋଣ-ଅନୁ-କୋଣରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ଛୋଟ-ଛୋଟ, ବଡ଼ ଗାଁ  ଜନବସତିରେ, ଗରିବ, ମଧ୍ୟମ ବର୍ଗର  ଯୁବ ଭାରତର ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଣରେ ଏହି ବିଶ୍ୱାସ ଆସୁଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସକୁ ଆମକୁ କରୋନା ସହିତ ଲଢେଇରେ ଏବଂ ଆମ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ ଜାରି ରଖିବାକୁ ହେବ । ବୈଶ୍ୱିକ ମହାମାରୀର ଏହି ବାତାବରଣରେ ଆମକୁ କ୍ରମାଗତ ଭାବେ ଆମର ସତର୍କତା ବଜାୟ ରଖିବାକୁ ହେବ। ଦେଶ ଆଜି 50 କୋଟି ଟିକାକରଣ ଦିଗକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି,  ଗୁଜରାଟ ମଧ୍ୟ ସାଢେ 3 କୋଟି ଡୋଜ ଟିକାର ସୋପାନ ପାଖରେ ପହଞ୍ଚୁଛି । ଆମକୁ ଟିକା ନେବାର ଅଛି, ମାସ୍କ ମଧ୍ୟ ପିନ୍ଧିବାର ଅଛି ଏବଂ ଯେତେ ସମ୍ଭବ ହେବ ଜନଗହଳି ବା ଭିଡ ଠାରୁ ଦୂରେଇ ରହିବାକୁ ହେବ । ଆମେ ବିଶ୍ୱରେ ଦେଖୁଛେ । ଯେଉଁଠାରେ ମଧ୍ୟ ମାସ୍କ ପିନ୍ଧିବା କଟକଣା ହଟାଇ ଦିଆଇଥିଲା, ସେଠାରେ ପୁଣି ମାସ୍କ ପିନ୍ଧିବାକୁ ଅନୁରୋଧ କରାଯାଉଛି। ସତର୍କତା ଏବଂ ସୁରକ୍ଷା ସହିତ ଆମକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାର ଅଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଯେତେବେଳେ ଆମେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନା ଉପରେ ଏତେ ବଡ଼ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ କରୁଛେ ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ଆଉ ଏକ ସଂକଳ୍ପ ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି ସଂକଳ୍ପ ହେଉଛି ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣ ପାଇଁ ନୂତନ ପ୍ରେରଣା ଜାଗ୍ରତ କରିବାର । ସ୍ୱାଧୀନତାର 75 ବର୍ଷରେ, ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତ ମହେତ୍ସବରେ, ଆମକୁ ଏହି ପବିତ୍ର ସଂକଳ୍ପ ନେବାର ଅଛି। ଏହି ସଂକଳ୍ପ ଗୁଡିକରେ, ଏହି ଅଭିଯାନରେ ଗରିବ-ଧନୀ, ମହିଳା-ପୁରୁଷ, ଦଳିତ-ବଞ୍ଚିତ ସମସ୍ତଙ୍କର ସମାନ ଭାବେ ଯୋଗଦାନ ରହିବ। ଗୁଜରାଟ ଆଗାମୀ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ନିଜର ସମସ୍ତ ସଂକଳ୍ପ ସିଦ୍ଧ କରୁ, ବିଶ୍ୱରେ ନିଜର ଗୌରବମୟ ପରିଚୟକୁ ଆହୁରି ସୁଦୃଢ କରୁ, ଏହି କାମନା ସହିତ ମୁଁ  ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା ଜଣାଉଛି । ପୁଣି ଥରେ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ସମସ୍ତ ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଶୁଭକାମନା!!! ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ!!!