PM Modi unveils the statue of Swami Vivekananda in Kuala Lumpur
It was Swami Vivekananda who first gave the concept of One Asia: PM
South East Asia Summit speaking of One Asia; a concept given by Swami Vivekananda: PM.
From the Vedas to Vivekananda, India's culture is rich: PM
Swami Vivekananda neither a person nor a system, it is the identity of the soul of ancient India: PM
Vivekananda is not just a name. He personifies the thousands year old Indian culture and civilization: PM
It is a great fortune for me to dedicate the statue of Swami Vivekananda on Malaysian soil: PM
Pursuit of truth got Ramakrishna Paramhans & Swami Vivekananda together. They were not looking for a teacher or a disciple: PM
Swami Vivekananda was in pursuit of the truth: PM

भाइयो और बहनों।

अभी सुप्रियान जी कह रहे थे कि हमने इस परिसर में तो विवेकानंद जी की प्रतिमा की स्था्पना की, पर हम हमारे मन-मंदिर में, हमारे हृदय में विवेकानंद जी को प्रतिस्था पित करें और मैं ये बात आपको कहूं और आप कर लेंगे।

मैं नहीं मानता हूं कि मेरे कहने से हमारे भीतर विवेकानंद प्रवेश कर सकते है और न ही किसी के प्रवचन से विवेकानंद जी हमारे भीतर प्रवेश कर सकते है। विवेकानंद, ये न किसी व्यक्ति का नाम है, विवेकानंद न किसी व्यवस्था की पहचान है, एक प्रकार से विवेकानंद सहस्त्र साल पुरानी भारत की आत्मा की पहचान है।

वेद से विवेकानंद तक हमारी एक सांस्कृतिक लंबी विरासत है और उपनिषद से ले कर के उपग्रह तक हमने हमारी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक विकास यात्रा को भी सामर्थ्य दिया है। 

उपनिषद से शुरू किया होगा, उपग्रह तक हम पहुंचे होंगे लेकिन हमारा जो मूल Pin है जो हमारी आत्मा है और सच्चे अर्थ में जो हमारी पहचान है, उसको अगर हम बरकरार रखते है तो उसका अर्थ ये हुआ कि मैं मेरे भीतर स्वामी विवेकानंद जी को जीवित रखने की कोशिश कर रहा हूं।

रामकृष्ण परमहंस और नरेन्द्र । ये दोनों के बीच की दुनिया को अगर हम समझ लें तो शायद विवेकानंद जी को समझने में सुविधा बन जाती है।

नरेन्द्र कभी गुरू की खोज में नहीं निकले थे, न ही उसे गुरू की तलाश थी, नरेन्द्र सत्य् की तलाश कर रहा था। ईश्वर है कि नहीं! उसके मन में एक आशंका थी कि परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं हो सकती है। ईश्ववर नाम का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता है और वो उस सत्य को जानने के लिए जूझ रहे थे।

और न ही रामकृष्ण परमहंस किसी शिष्य की तलाश में थे। मैं गुरू परम्परा की भावना , मेरे बाल कुछ शिष्यों की परंपरा अगर है। और मैं जो आश्रम प्रतिस्थापित करूं और उसको कोई चलाता रहे, रामकृष्ण देव के मन में भी ऐसे किसी शिष्या की तलाश नहीं थी ऐसी कोई मनीषा नहीं थी।

एक गुरू जिसको शिष्यो की खोज नहीं थी, एक शिष्य जिसको गुरू की खोज नहीं थी, लेकिन कमाल देखिए, एक सत्य को समर्पित था और दूसरा सत्य को खोजना चाहता था और उसी सत्य की तलाश में दोनों को जोड़ के रख दिया।

और ये अगर हम समझ लें तो फिर सत्य की तलाश क्या हो सकती है, सत्य के रास्ते पे चलना कितना कठिन हो सकता है और उसमें भी कैसे सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वो विवेकानंद जी के जीवन से हम जान सकते है।

हम विवेकानंद जी के उस कालखंड का विचार करें जहां पर धर्म का प्रभाव, पूजा पद्धति की विधि का प्रभाव, rituals का माहात्मय । धर्म गुरुओं का माहात्मय, धर्मग्रथों का माहात्मय। ये चरम सीमा पर था। उस समय एक नौजवान उन सारी परम्पराओं से भाग जाने की बात करे, इसकी आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता है।

एक बहुत बड़ा वर्ग ये मानता था कि भगवान के पास घंटो तक बैठे रहे, पूजा-पाठ करते रहे, आरती-धूप करते रहे, फूल चढ़ाते रहे, नए-नए प्रसाद चढ़ाते रहे तो जीवन के पाप धूल जाते है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। एक चरम सीमा का आनंद प्राप्त, करने का अवसर मिल जाता है। ये सोच बनी पड़ी हुई थी और उस समय विवेकानंद डंके की चोट पर कहते थे कि जन सेवा ये प्रभु सेवा। सामान्य मानवी जो आपके सामने जिंदा है, जो दुख और दर्द से पीड़ित है, उसकी सेवा करो, ईश्वर अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

उन्होंने जब कलकत्ते की धरती पर नौजवानों से पूछा कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता क्या होता है, हमें क्या करना चाहिए तब उन्होंने कहा ये सब छोड़ो, जाओ फुटबॉल खेलो, मस्ती से फुटबॉल खेलो पूरी तरह से अपने आप को झोंक दो, हो सकता है तुम्हें रास्ता मिल जाएगा। उस समय हम गुलामी के कालखंड में जी रहे थे, कोई सोच भी नहीं सकता था भारत कभी आजाद हो सकता है लेकिन स्वामी विवेकानंद एक दीर्घ दृष्टा थे और वो कहते थे, अपने जीवन के काल में कहा था कि मैं, मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं, मैं मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं कि मेरी भारत मां उठ खड़ी हुई है, वो जगत गुरू के स्थान पर विराजमान मैं देख रहा हूं, मैं एक दिनमान भारत माता मैं देख रहा हूं और वो दिन बहुत निकट होगा । ये भाव जगत स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन काल में अपनी आंखों से देखा था और वो हिंदुस्तान को प्रेरित करने का प्रयास करते थे।

वो एक कालखंड था जब आध्यात्म प्रधान जीवन था और वो सिर्फ भारत में नहीं एशिया के सभी देशों में समाहित था और दूसरी तरफ वो पश्चिम का विचार था, जहां अर्थ प्रधान था। आध्यात्म प्रधान जीवन और अर्थ प्रधान जीवन के बीच एक शताब्दियों का टकराव चल रहा था। अर्थ प्रधान जीवन ने आध्यात्म प्रधान जीवन को किनारे कर दिया था। अर्थ प्रधान जीवन जन सामान्य की आशा, आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु बन गया था और ऐसे कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने हिम्मत के साथ और 30-32 साल की आयु में पश्चिम की दुनिया में जाकर के, उस धरती पर जाकर के विश्व को आध्यत्मिकता का संदेश देने का एक सामर्थ्यवान काम किया था। जिस महापुरुष ने एशिया की आध्यात्मिक ताकत को दुनिया को पहचान कराया था और पहली बार विश्व को एशिया की अपनी धरती की एक अलग चिंतनधारा है, यहां के संस्कार अलग हैं और विश्व को देने के लिए उसके पास बहुत कुछ है। ये बात डंके की चोट पर कहने का साहस स्वामी विवेकानंद ने किया था। कल मैं यहां आसियान समिट में था आज यहां मैं South East Asia Summit में था और एक बात वहां उभरकर के सामने आती थी और वो एक आती थी कि One Asia .

One Asia का विचार लेकिन आज जो आवाज गूंज रही है उसमें आर्थिक व्यवस्था है, राजनीतिक व्यवस्था है, सरकारों के मेलजोल की व्यवस्था का चिंतन है लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि One Asia का concept आध्यात्मिक धरातल पर सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने प्रचारित किया था। मैं एक पुरानी घटना आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। ..

After Swami Vivekananda introduced the East and Asia to the West, Scholars and philosophers like Okakura, Karinzo from Japan, Rabindranath Tagore, Mahrishi Aurbindo, Anand Kumar Swami and Vinoy Sarkar were inspired by Swami Vivekananda. OkaKura invited Swami Vivekananda to Japan and also sent him a cheque of Rs 300. He came to Calcutta and met Swami Vivekananda on 1st February 1902 and both went to Bodh Gaya together. OkaKura is the symbol of Asianism. In his book, ‘Ideals of the East’ by Okakura, the manuscripts were edited by Sister Nivedita, the foremost western disciple of Swami Vivekananda. The very first sentence, this is one important thing I want to tell you. The very first sentence is “Asia is one.” The idea of Asian unity is clearly Swami Vivekananda’s concept. In his next book, Okakura began by saying “Brothers and sisters of Asia”, echoing Swami Vivekananda’s speech at Parliament of Religions.

मैं ये इसलिए कह रहा था कि जो उस समय इस प्रकार के Philosopher विवेकानंद जी के प्रभाव में थे, उन्होंने जो विवेकानंद जी से मंत्र पाया था वो Asia is One ये मंत्र पाया था। आज 100 साल के बाद आर्थिक, राजनीतिक कारणों से One Asia की चर्चा हो रही है लेकिन उस समय आध्यात्मिक एकात्मता के आधार पर विवेकानंद जी ये देख पाते थे कि ये भूमि है जो विश्व को संकटों से बाहर निकाल सकती है और आज दुनिया जिन दो संकटों से जूझ रही है अगर उन दो संकटों के समाधान का रास्ता कोई दे सकता है तो एशिया की धरती से ही निकल सकता है।

और इसलिए आज विश्व कह रहा है Climate change और Global warming की बात, आज विश्व कह रहा है Terrorism की चर्चा, यही तो धरती है जहां भगवान बुद्ध का संदेश मिला, यही तो धरती है जहां हिंदुत्व का संदेश मिला और इसी धरती से ये बातें उभर करके आ गई हैं जहां पर ये कहा गया एकम सत, विपरा बहुधा विधंति, Truth is One, Wise call it in different ways ये जो मूल मंत्र हैं वो सबको एक रखना, जोड़ने की ताकत देता है और इसलिए जब Terrorism की बात आती है तो उसका समाधान इसमें holier than thou की कल्पना ही नहीं है, हर सत्य को स्वीकार किया जाता है और जब हर सत्य को स्वीकार किया जाता है तब conflict के लिए अवकाश नहीं होता है और जब conflict के लिए अवकाश नहीं है तो संघर्ष की संभावना नहीं है और जहां संघर्ष नहीं है वहां Terrorism के रास्ते पर जाना का कोई कारण नहीं बनता है। 


आज विश्व Global Warming की चर्चा करता है। हम वो लोग हैं जिसने पौधे में परमात्मा देखा था, हम जितने भी ईश्वर की कल्पना की है हर ईश्वर के साथ कोई न कोई प्राकृतिक जीवन जुड़ा हुआ है। किसी न किसी वृक्ष के साथ उन्होंने साधना की है, किसी न किसी पशु-पक्षी को उन्होंने पालन किया है। ये सहज संदेश हमारी परंपरा में रहा हुआ है। हम प्रकृति के शोषण का पक्षकार नहीं रहे हैं, हम nature के साथ मित्रतापूर्ण गुजारा करने की सबक ले करके चले हुए लोग है। वही संस्कृति है जो ग्लोबल वार्मिंग से मानवजाति को बचा सकती है।

मुझे लगता है कि स्वा्मी विवेकानंद जी ने हमें ये जो रास्तेे दिखाएं है। उन रास्तों को अगर हम परिपूर्ण करते है तो हमें हमारे भीतर कोई नए विवेकानंद को प्रतिस्थापित करने की जरूरत नहीं है। उनकी कही हुई एक बात को ले करके भी हम चल पाते है मैं समझता हूं हम आने वाली शताब्दियों तक मानवजात की सेवा करने के लिए कुछ न कुछ योगदान करके जा सकते है।

आज मुझे यहां एक योग की पुस्तक का भी लोकापर्ण करने का अवसर मिला है और वो भी हमारे सरकार के साथ ही श्रीमान शाहू ने यहां की भाषा में योग की पुस्तक की रचना की है। वे स्वयं सरकारी अधिकारी है लेकिन योग के प्रति उनका समर्पण है। मुझे खुशी हुई उनकी उस किताब का लोकापर्ण करते हुए। आज विश्व योग के प्रति आकर्षित हुआ है। हर कोई तनाव मुक्त जीवन का रास्ता खोज रहा है और उसको लगता है उसकी खिड़की योग से खुलती है और इसलिए हर कोई उस खिड़की में झांकने की कोशिश करता है।

यूनाइटेड नेशन ने अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस के रूप में 21 जून को स्वीकार किया। दुनिया के 177 देशों ने उसको को-स्पोंसर किया और दुनिया के सभी देशों ने 21 जून को योग का दिवस मनाया। मानवजात जो कि अपने मानसिक समाधान का रास्ता तलाश रही है। Holistic health care की तरफ आगे बढ़ रही है। तब उसको लगता है कि योग एक ऐसी सरल विद्या है जिसको अगर हम दिन के आधा-पौना घंटा भी लगा ले तो हम अपने मन, बुद्धि, शरीर को एक दिशा में चला सकते है। आज हमारे लिए ये चुनौती नहीं है कि हम दुनिया को समझाएं कि योग क्या है, हमारे सामने चुनौती ये है कि सारा विश्व अच्छे योग टीचरों की मांग कर रहा है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि हम Perfect योग teacher को कैसे दें ताकि इस विद्या का सही स्वरूप आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे और जो भी इसका लाभ उठाएं, उसको सचमुच में, उसका जो मकसद हो, मकसद पूरा करने में काम हो और इसलिए जितना अधिक आधुनिक भाषा में हम योग को प्रचारित करें, जितनी अधिक योग को आधुनिक भाषा में प्रतिपादित करें और खुद योग के जीवन को जीकर के दुनिया के सामने प्रस्तुत करें और अधिकतम योग के teacher तैयार करें, hobby के रूप में तैयार करें भले profession के रूप में न तैयार कर सकें। दिन में हम 50 काम करते हैं, एक घंटे योगा के लिए जो भी सीखने आएगा, हम सिखाएंगे।

ये पूरा हम एशिया के वायुमंडल में लाते हैं तो विश्व की जो अपेक्षा है, उस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए उत्तम योग teacher हम दुनिया को दे सकते हैं। मैं स्वामी सूपरयानंद जी का बहुत आभारी हूं कि आज मुझे इस पवित्र स्थान पर आने का अवसर मिला, विवेकानंद जी की प्रतिमा का लोकापर्ण करने का अवसर मिला और मुझे विश्वास है कि इस धरती पर आने वाले विश्व के सभी लोगों को यहां से कोई प्रेरणा मिलती रहेगी। इसी एक शुभकामना के साथ आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ନମସ୍କାର ।

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ପୁଣିଥରେ ଆପଣମାନଙ୍କ ସହ ଯୋଡ଼ିହୋଇ ମୋତେ ବହୁତ ଖୁସି ଲାଗୁଛି । ଦେଶର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳରେ ଆମ ଦେଶର ଲୋକେ ଦେଶ ହିତ, ସମାଜର ହିତ ପାଇଁ ଏଭଳି ଚମତ୍କାର କରୁଛନ୍ତି ଯେ ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଶୁଣିଲେ ଆମକୁ ନୂତନ ପ୍ରେରଣା ମିଳୁଛି । ଆଜିର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଆରମ୍ଭ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସରେ ଦେଶର ଏଭଳି ଗୋଟିଏ ଉପଲବ୍ଧିରୁ କରୁଛି । କିଛିଦିନ ପୂର୍ବେ ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡର ରାଞ୍ଚିରେ ଜାତୀୟ ସିନିୟର ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଫେଡେରେସନ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୋଇଥିଲା । ଏଥିରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ପ୍ରାୟ ୮୦୦ ଖେଳାଳି ଅଂଶଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ । ଏଥିରେ ଚାରୋଟି ଭିନ୍ନ ଇଭେଣ୍ଟରେ ଚାରୋଟି ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ସିଂ, ବିଶାଳ ଟିକେ, ତେଜସ୍ୱୀନ ଶଙ୍କର, ଦେବ୍ ମୀଣା ଏବଂ କୂଲଦୀପ କୁମାର । ଏହି ବନ୍ଧୁମାନେ ବିଭିନ୍ନ ଶ୍ରେଣୀରେ ନୂତନ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କଲେ । ସର୍ବପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗୋଟିଏ ଘଟଣା, ଯାହା ସାରାଦେଶରେ ଚର୍ଚ୍ଚିତ ହୋଇଛି ତାହା ହେଉଛି ୧୦୦ ମିଟର ରେସ୍ । ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତା । ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ପୁରୁଷ ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଯେଉଁ ଦୁଇ କ୍ରୀଡ଼ାବିତ୍ ଏହି ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଲେ ସେମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ଗୁରିନ୍ଦରବୀର୍ ସିଂ ଏବଂ ଅନିମେଷ କୁଜୁର । ମୁଁ ଭାବିଲି, ଏଥର ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହି ଦୁଇ ଖେଳାଳିଙ୍କ ସହ କଥା ହେବା ।

(ଫୋନ୍ କଲ୍)

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ: ଅନିମେଷ ଜୀ ନମସ୍କାର । ଗୁରୀନ୍ଦରବୀର ଆପଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନମସ୍କାର । ସତଶ୍ରୀ ଅକାଲ୍ ।

ଅନିମେଷ, ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର, ନମସ୍କାର ସାର ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଚ୍ଛା ଭାଇ ଆପଣମାନେ ତ ବହୁତ ବଡ଼ ଉପଲବଧି ହାସଲ କରିଛନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ଯୋଡ଼ି ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି । ଆମେ ସଙ୍ଗୀତରେ ତ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ଦେଖିଥିଲୁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ତ ଆହ୍ୱାନରେ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ହେଉଛି । ଜଣେ ଗୋଟିଏ ଆହ୍ୱାନ ଦେଉଛି, ଅନ୍ୟ ଜଣକ ଏହାକୁ ଗ୍ରହଣ କରୁଛି । ପୁଣି ତୃତୀୟ ଥର ହେଉଛି । ଆପଣଙ୍କ ବିଷୟଟି ଖୁବ୍ କୌତୁହଳପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଚାହୁଁଛି ଯେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ଆପଣମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣନ୍ତୁ । ଆପଣମାନେ କରିଦେଖାଇଥିବା ପରାକ୍ରମ ସମ୍ପର୍କରେ ଜାଣନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର ନମସ୍କାର । ମୋ ନାଁ ଅନିମେଷ କୁଜୁର୍ । ମୁଁ ୨୦୦ ମିଟର ଓ ୪୦୦ ମିଟରର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡଧାରୀ ଏବଂ ମୁଁ ଛତିଶଗଡ଼ର ବାସିନ୍ଦା ଆଉ ଏବେ ମୁଁ ଓଡ଼ିଶା ତରଫରୁ ଖେଳୁଛି । ଗତବର୍ଷ ମୁଁ ଏସୀୟ ପଦକ ଆଉ ବିଶ୍ୱ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ ଖେଳ ପଦକ ପାଇଥିଲି ଆଉ ସ୍କୁଲ ଛାଡ଼ିବା ପରେ ୨୦୨୧ରେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ସ୍କୁଲରୁ ପାସ୍ କରିଥିଲି । ମୁଁ ସୈନିକ ସ୍କୁଲ ଅମ୍ବିକାପୁରରୁ ପାସ୍ କରିଛି ଆଉ ଆଗରୁ ମୁଁ ଫୁଟବଲ ଖେଳୁଥିଲି । ମୋ ବାପା ମା’ କୋଭିଡ୍ ସମୟରେ ମୋତେ ଖେଳକୁଦ ପାଇଁ ଟିକିଏ ଅନୁମତି ଦେଉଥିଲେ କି ମୁଁ ଟିକେ ବାହାରେ ଯାଇ ଖେଳାବୁଲା କରିବି । କୋଭିଡ୍ ସରିବା ପରେ ମୋ ସହିତ ଫୁଟବଲ୍ ଖେଳୁଥିବା ସାଙ୍ଗମାନେ ମୋତେ କହିଲେ ଯେ, “ରାଜ୍ୟ ସମ୍ମିଳନୀ ହେଉଛି, ତୁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କର” ଆଉ ମୁଁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କଲି, କିନ୍ତୁ ସେଠି ଜାତୀୟ ସ୍ତର ପାଇଁ ଚୟନ ହେବ ସେକଥା ମୁଁ ଜାଣିନଥିଲି । ସେଠୁ ମୁଁ ଜାତୀୟକୁ ସିଲେକ୍ଟ ହେଲି ଆଉ ଆଜି ମୁଁ ଆନ୍ତର୍ଜାତିକ ସ୍ତରରେ ଭାରତର ପ୍ରତିନିଧିତ୍ୱ କରୁଛି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଉ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଜୀ ? ଆପଣଙ୍କ ଖବର କ’ଣ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର୍ । ମୋ ନାଁ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଆଉ ମୁଁ ଭାରତୀୟ ନୌସେନାର ଜଣେ Patty Officer। ମୁଁ ଭାରତର ସବୁଠାରୁ ଦ୍ରୁତ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟର । ଏଥର ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟରରେ ୧୦.୦୯ର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କରିଛି । ୧୦.୧୦ର ସୀମା ତଳକୁ ଯିବାରେ ମୁଁ ପ୍ରଥମ ଭାରତୀୟ । ମୁଁ ଉଭୟ ଟ୍ରାକ୍ ଓ ୟୁନିଫର୍ମରେ ନିଜ ଦେଶର ସେବା କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛି । ମୋ ବାପା ଓ ଜେଜେବାପା ଦୁହେଁ ଖେଳାଳି ଥିଲେ । ଆମ ଭାରତୀୟ ସଂସ୍କୃତିରେ ପର୍ବପର୍ବାଣୀ ଯେମିତିକି ଦୀପାବଳୀ, ନୂଆବର୍ଷ ଆଦି ସମୟରେ ଆମେ ନିଜ ଘରକୁ ସଫାସୁତୁରା କରିଥାଉ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ମୋ ବାପାଙ୍କ ଟ୍ରଫି ଓ ମେଡ଼ାଲଗୁଡ଼ିକ ମୁଁ ସଫା କରୁଥିଲି ମୋତେ ବହୁତ ଭଲ ଲାଗୁଥିଲା । ମୁଁ ବହୁତ ଖୁସି ହେଉଥିଲି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ କୌଣସି ଟ୍ରଫି ବା ମେଡାଲ ସଫା କରୁଥିଲି କିମ୍ବା କୌଣସି ଫଟୋ ଦେଖୁଥିଲି ତାହା ବିଷୟରେ ମୁଁ ବାପାଙ୍କୁ ପଚାରୁଥିଲି ସେତେବେଳେ ସେ ତାଙ୍କ କାହାଣୀ ଶୁଣାଉଥିଲେ । “ମୁଁ ସେଠିକି ଖେଳିବାକୁ ଯାଇଥିଲି । ସେଇଠି ମୁଁ ଏହି ଜାତୀୟ ପଦକ ପାଇଲି, ଏଥିରେ ମୁଁ ମୋ ଦଳକୁ ଜିତାଇଥିଲି ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ମୁଁ ବି କିଛି ଗୋଟେ ଖେଳ ଖେଳିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ସେ ସକାଳୁ ସକାଳୁ ଦୌଡ଼ିବାକୁ ଯାଉଥିଲେ । ମୋତେ ତାଙ୍କ ସାଙ୍ଗରେ ନେଇଯିବାକୁ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଲି । ସେ ମୋତେ ବି ସାଙ୍ଗରେ ନେବା ଆରମ୍ଭ କରିଦେଲେ । ଖେଳ ବିଷୟରେ ସେ ଯାହାସବୁ ଶିଖିଥିଲେ ସେସବୁ ସେ ମୋତେ ଶିଖାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ । ତେଣୁ ମୋର ଆଗ୍ରହ ବଢ଼ିଚାଲିଲା । ମୁଁ ଉସେନ ବୋଲ୍ଟଙ୍କର ବିଶ୍ୱରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବା ଦେଖିଲି । ଗୋଟିଏ କୌତୁକିଆ କାହାଣୀ ରହିଛି । ଥରେ ମୁଁ ଟିଭି ଦେଖୁଥିଲି, ମା’ ଟିଭି ବନ୍ଦ କରି କହିଲେ “ପୁଅ, ପାଠ ପଢ଼ିବା ସମୟ ହେଲାଣି, ତୁ ପାଠ ପଢ଼ ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଥିଲି ଯେ ଆପଣ ସିନା ମୋତେ ଟିଭି ଦେଖିବାକୁ ଦେଉନାହାଁନ୍ତି କିନ୍ତୁ ଦିନେ ଆପଣ ଟିଭିରେ ମୋତେ ଖୋଜି କହିବେ ହେଇ ଦେଖ ଗୁରିନ୍ଦର ଦୌଡ଼ୁଛି । ତେଣୁ ମୋ ମା’ ଯେତେବେଳେ ଟିଭି ପରଦାରେ ମୋତେ ଦୌଡ଼ୁଥିବା ଦେଖନ୍ତି ସେତେବେଳେ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଖୁସି ଲାଗେ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବାଃ ବାଃ ବାଃ । ଆପଣଙ୍କ କଥା ତ ବଡ଼ ଚମତ୍କାର!

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ହଁ ସାର୍ । ଆମର ହେଉଛି ଏକ ମଧ୍ୟବିତ୍ତ ପରିବାର, ମୋ ବାପା ଭଲିବଲ ଖେଳୁଥିଲେ ହେଲେ ଘରର ସମସ୍ୟାଗୁଡ଼ିକ ଯୋଗୁଁ ସେ ନିଜର ଖେଳାଖେଳି ଛାଡ଼ିଦେଲେ । ତାଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନ ଅସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ରହିଗଲା । ତେଣୁ ସେ ମୋ ଭିତରେ ସେହି ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିଲେ ଯେ, ସେହି ସ୍ୱପ୍ନକୁ ମୋ ପୁଅ ପୂରଣ କରିବ । ମୁଁ ତାଙ୍କ ସହିତ ଅନେକ ଥର କଥା ହୋଇଥିଲି । ତାଙ୍କଠୁ ଶୁଣୁଥିଲି ମିଲଖା ସିଂ କେତେ ପରିଶ୍ରମ କରୁଥିଲେ, ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ଦିନେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନକୁ ପୂରଣ କରିବି । ସେତେବେଳେ ସେ କହୁଥିଲେ ଯେ ସ୍ୱପ୍ନ ସେମିତି ପୂରଣ ହୋଇଯାଏନି, ତାହାପାଇଁ କଠିନ ପରିଶ୍ରମ କରିବାକୁ ପଡିଥାଏ । ମିଲଖା ସିଂ ଜୀ ରକ୍ତବାନ୍ତି କରୁଥିଲେ, ଖରାରେ ଦୌଡ଼ୁଥିଲେ । ଦିନସାରା ତାଲିମ ନେଉଥିଲେ । ଏହି କଥାଗୁଡ଼ିକ ମୋତେ ପ୍ରେରିତ କରୁଥିଲା । ମୋ ବାପା ମୋତେ ପ୍ରେରଣା ଦେଉଥିଲେ ଯେ, ଏହାଦ୍ୱାରା ମୁଁ ମୋ ଦେଶ ପାଇଁ ପଦକ ଆଣିପାରିବି । ଆଉ ପୁଣି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟର ରେସକୁ ନିଜ ଇଭେଣ୍ଟ ଭାବେ ଚୟନ କଲି ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତେ ମୋତେ ସେଥିପାଇଁ ମନା କରି କହିଥିଲେ ଯେ ୧୦୦ ମିଟର ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଇଭେଣ୍ଟ ନୁହେଁ । ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ୧୦୦ ମିଟର ପାଇଁ ତିଆରି ହୋଇନାହିଁ । ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଉ ମୋ ବାପା କହୁଥିଲୁ ଯେ, ଏବେ ଗୁରିନ୍ଦର ଆଉ ମୁଁ ଏହାକୁ ବାଛିଛୁ ଆଉ ଏଥିରେ ପଛଘୁଞ୍ଚା ଦେବାର ନାହିଁ । ଆମେ ଯାହାକୁ ଅସମ୍ଭବ ବୋଲି ଭାବୁଛୁ ତାହା ଆମେ କରି ଦେଖାଇବୁ । ବାପା କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହା କରି ଦେଖାଇବୁ, ତୋ ଉପରେ ମୋର ବିଶ୍ୱାସ ରହିଛି । ବାପା ଯେତେବେଳେ ମୋ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ କଲେ ତାଙ୍କର ସେହି ବିଶ୍ୱାସକୁ ମୁଁ ନିଜର ସାହସରେ ପରିଣତ କରିଦେଲି । ଆଉ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟ କହୁଛି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରନ୍ତୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ, ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛନ୍ତି ଆଉ ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣ ଦୁହେଁ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଛନ୍ତି । ୧୦୦ ମିଟର ରେସରେ ଦୌଡ଼ିବା, ଯାହା ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କହିଲେ ଯେ ଲୋକେ କହନ୍ତି ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ଏଥିପାଇଁ ଗଢ଼ା ହୋଇନାହିଁ । ଏତେ କଷ୍ଟ ହୋଇଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ଆପଣ ଏହି କାମ କରି ଦେଖାଇଲେ । ଆପଣ ଦୁଇଜଣଙ୍କଠାରୁ ମୁଁ ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଆଉ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହିଁବେ ଯେ, ଏହା କିଭଳି ଉତ୍ସାହ ଥିଲା, କ’ଣ ଜିଦ୍ଦି ଥିଲା, କ’ଣ ଭାବିଥିଲେ, ଆଉ କ’ଣ କରୁଥିଲେ? ଏହା କେତେ କଷ୍ଟ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆଜ୍ଞା, ମୁଁ ଗୁରିନ୍ଦର, ଆରମ୍ଭରେ ଏହା ଖୁବ୍ ସଂଘର୍ଷପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ କରୁଛି କି ନାହିଁ ସେ ବିଷୟରେ ବହୁତ ଥର ସନ୍ଦେହ ମଧ୍ୟ ହେଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ ଜିନିଷକୁ ବାଛିଲି କାରଣ ସବୁବେଳେ ଆପଣ ଜିଣିନଥାନ୍ତି, ବେଳେବେଳେ ଆପଣ ଶିଖିଥାନ୍ତି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ହାରୁଥିଲି, ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଠିକ୍ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିପାରୁନଥିଲି, କୌଣସି ଆଘାତ ଲାଗୁଥିଲା ସେତେବେଳେ ମୋ ଘର ଲୋକେ ମୋତେ ସହଯୋଗ କରି କହୁଥିଲେ ଯେ ଦିନେଅଧେ ବେଳ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା କିମ୍ବା ବର୍ଷେ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା ସେଥିରେ ସାରାଜୀବନ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ ନାହିଁ । ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିବା ବନ୍ଦ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ । ମୋ କୋଚ୍ ବି ମୋତେ ଏହି କଥା କହିଲେ ଯେ ଯଦି ତୁ ନ କରିପାରିବୁ ତାହାଲେ ଆଉ କେହି ପାରିବ ନାହିଁ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ଆମ ନିଜ ଲୋକ, ଆମ ଆଖପାଖର ଲୋକ ଆମକୁ ଉତ୍ସାହିତ କରନ୍ତି ତେବେ ମନୋବଳ କେବେହେଲେ ଭାଙ୍ଗେନାହିଁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଅନିମେଷ ଜୀ ...

ଅନିମେଷ : ସାର, ୨୦୨୧ରେ ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କଲି ମୋତେ ତ ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ, ଦେଖ୍ ଇଏ ଗୋଟିଏ ନୂଆ କ୍ଷେତ୍ର ତୁ କରିପାରିବୁ କି ନାହିଁ? ସେତେବେଳେ ମୁଁ କହୁଥିଲି ଯେ ଯଦି ଏ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ବାଛିଛି ତାହାଲେ ଯେମିତି ହେଲେ ବି କରିବି । ମୋ ବାପା ମଧ୍ୟ କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହି କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେଣୁ କେବେହେଲେ ପଛକୁ ଚାହିଁବୁ ନାହିଁ । କାରଣ ଅନେକ ଲୋକ ବହୁତ କଥା କରିବା ଭାବନ୍ତି କିନ୍ତୁ ବହୁତ କମ ଲୋକ କରିଦେଖାନ୍ତି । ତୁ ଏ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେବେ ଏଥିରେ ଦୃଢ଼ ହୋଇ ରହିବୁ, ଏଥିରେ ଆଗେଇ ଚାଲିବୁ । ତୋତେ ଆମେ ପରିବାର ତରଫରୁ ଆର୍ଥିକ ଆଉ ଅନ୍ୟ ସବୁ ପ୍ରକାର ସହଯୋଗ ଓ ସୁବିଧାସୁଯୋଗ ଯୋଗାଇବୁ, କେବଳ ତୁ ପରିଶ୍ରମ କର ଆଉ ଭାରତକୁ ଦେଖାଇଦେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୌଡ଼ିପାରନ୍ତି କାରଣ ମୋତେ ବି ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଜିନ୍ ୧୦ କିମ୍ବା ୧୦.୧ରୁ କମ୍ ଦୌଡ଼ିବା କିମ୍ବା ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରିବା ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ଆମେ ଦୁହେଁ ପ୍ରମାଣିତ କରିଦେଇଛୁ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମପାଇଁ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ କଠିନ ନୁହେଁ । ଆମେ ସବୁକିଛି କରିପାରୁ । ତେଣୁ ସାର୍ ଏହି ସବୁକଥା ମୋତେ ବହୁତ ପ୍ରେରଣା ଯୋଗାଇଥାଏ ଆଉ ଆମେ ଯେମିତି ତାଲିମ ଗ୍ରହଣ କରିଚାଲିଛୁ ଆଉ ସମୟ ଭଙ୍ଗ କରିଚାଲିଛୁ ଏହାଦେଖି ଅନ୍ୟମାନେ ଅନୁଭବ କରୁଛନ୍ତି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମେ ଆହୁରି ପରିଶ୍ରମ କରିବା । ଏବେ ଆମ ଦୁହିଁଙ୍କ ଚୟନ ରାଜ୍ୟଗୋଷ୍ଠୀ ଖେଳ ପାଇଁ ହୋଇଛି । ସେଠାରେ ହେବାକୁ ଥିବା ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ଆମେ ଆହୁରି ଭଲ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିବୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଠିକ୍ ଅଛି, ଶୁଣ । ମୋ ମନରେ ବି କୌତୁହଳ ରହିଛି । ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ମନରେ ବି ଥିବ । ମୁଁ ଶୁଣିଛି ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଭଲ ସାଙ୍ଗ । ଆପଣ ଉଭୟ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିଛନ୍ତି ଯେ ଯଦି ତୁ ମୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବୁ ତେବେ ମୁଁ ବି ତୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବି । କଥା କ’ଣ, ପ୍ରଥମେ ଅନିମେଷ କୁହନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର୍, ପ୍ରଥମ ୧୦.୧୮ ରେକର୍ଡ ଥିଲା ଯାହା ମୁଁ ହିଁ କରିଥିଲି । ଏବଂ ତା’ପରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ରେ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଭାଇ ୧୦.୧୭ କରି ତାହାକୁ ଭାଙ୍ଗିଥିଲେ । ତା’ପରେ ପୁଣିଥରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍-୨ରେ ୧୦.୧୫ କରି ମୁଁ ତାଙ୍କର ସେହି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲି । ତା’ପରେ ଯେତେବେଳେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ ହେଲା ସେତେବେଳେ ଆମେ ଦୁହେଁ ଖୁସି ଥିଲୁ । ଯାହାହେଉ ଠିକ୍ ଅଛି, ଆଜି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲା ଏବଂ ଆମେ ଦୁହେଁ ଏହା ଭାଙ୍ଗିଲୁ । ପ୍ରତିଯୋଗିତା ସମୟରେ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା ରହେ କିନ୍ତୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଆମେ ବହୁପୂର୍ବରୁ କରିଥିଲୁ । ଏହାପୂର୍ବରୁ ଆମେ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ପାଇଁ ସାଉଦି ଆରବ ଯାଇଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ ରୁମମେଟ୍ ଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ କଥାହେଉଥିଲୁ ଯେ ଇଣ୍ଡିଆର ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟିଂକୁ ବହୁ ଆଗକୁ ନେବାର ଅଛି ଏବଂ ଏସବୁ ଜିନିଷ ଆମ ହାତରେ ହିଁ ଅଛି । ଆମେ ଯାହା କରିବା ତାହା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା କରିବ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କିଛି କହିବେ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆମେ ଦୁହେଁ ନିଷ୍ପତ୍ତି କରିଥିଲୁ ଯେ ଆମେ ଖୁବ୍ ଭଲ ଦୌଡ଼ିବୁ । ସାର୍ ଯେତେବେଳେ ବି ଜଣଙ୍କୁ ଅନ୍ୟ ଜଣଙ୍କର ସାହାଯ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ ହୁଏ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପର ସହ ଛିଡ଼ାହେଉ । ଯେମିତିକି ଏବେ ରେକର୍ଡ କରିବା ପୂର୍ବରୁ ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ରେକର୍ଡ କଲି, ତା’ପରେ ଅନିମେଷ କହିଲେ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରୁଥିଲୁ ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଅନିମେଷକୁ ବତାଉଥିଲି, ଅନିମେଷ, ଏବେ ସେହି ବ୍ଲକଟି ଠିକ୍ ଅଛି । ସେଇଠି ଯାଇ ବସ । ସେଠାରେ ଯାଇ ଷ୍ଟ୍ରାଇଡ୍ କର । ଆମେ ଦୁହେଁ ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରିବା । ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ ଠିକ୍ ହେବ । ତେବେ ଜଣେ ଅନ୍ୟଜଣକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ । ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କଲେ, ଜଣେ ଉନ୍ନତ କଲେ ଅନ୍ୟଜଣେ ମଧ୍ୟ ଉନ୍ନତ କରିଥାନ୍ତି । ହଁ, ସାଙ୍ଗ ବି ଦରକାର । କିନ୍ତୁ ସାର୍ ଆମେ ଯେତେବେଳେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ବାହାରେ ଥାଉ, ପ୍ରତିଯୋଗିତାରୁ ବାହାରେ ଥାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ସାଙ୍ଗ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ଭିତରକୁ ଯାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପରର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀ ହୋଇଯାଉ । ସେତେବେଳେ ଭାବୁ ଯେ ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି, ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଯେଉଁ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା କରିଛନ୍ତି ତାହା ଦେଶର ସମ୍ମାନ ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଭବିଷ୍ୟତରେ ଦେଶକୁ ସେହି ଜାଗାରେ ପହଞ୍ଚାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଆଉ ଏକ ସକାରାତ୍ମକ ସ୍ପିରିଟ୍ ସହ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ମତରେ ଆପଣଙ୍କର ଏ ଯେଉଁ ସ୍ପୋର୍ଟସମ୍ୟାନ ସ୍ପିରିଟ୍ ଅଛି, ଖେଳିବା ହେଉ, ପରସ୍ପରକୁ ଚୁନୌତି ଦେବା ହେଉ, ଆଉ ପୁଣି ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉ, ଅବା ଆଗକୁ ଯିବାପାଇଁ ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବା ହେଉ, ସତରେ ଆପଣମାନେ ଅଦ୍ଭୁତ କାମ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ତରଫରୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ, ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା। ମୋର ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱାସ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଦେଶର ନାଁ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ କରିବେ । ଆପଣ ଏପରି ପରିଶ୍ରମ କରିଚାଲନ୍ତୁ । ବହୁତ ଉନ୍ନତି କରିବେ । ମୋର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର

ଅନିମେଷ : ଧନ୍ୟବାଦ ସାର୍, ଆପଣଙ୍କୁ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ସମ୍ପ୍ରତି ଦେଶର ଅଧିକାଂଶ ଭାଗରେ ବହୁତ ଗ୍ରୀଷ୍ମପ୍ରବାହ ହେଉଛି । ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଖରା, ଗରମ ପବନ ଏପରି ପାଣିପାଗରେ ନିଜର ଧ୍ୟାନ ରଖିବା ଖୁବ୍ ଜରୁରୀ । ପାଣି ପିଅନ୍ତୁ । ଖରାରେ ଯଦି ଯିବାର ହୁଏ ତେବେ ଦେଖିଚାହିଁ ବାହାରନ୍ତୁ । ଖରାକୁ ଆଖି ଆଗରେ ରଖି ସରକାରଙ୍କର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ବିଭାଗର ଯେଉଁ ମାର୍ଗଦର୍ଶିକା ଜାରି କରିଛନ୍ତି ତାକୁ ଆଦୌ ଭୁଲନ୍ତୁ ନାହିଁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମର ଏଠି ଗରମ ସହ ଲଢ଼ିବାର ଉପାୟ ଅନେକ ଥର ରୋଷେଇରେ ବି ମିଳିଥାଏ । ଆପଣମାନେ ଦେଖିଥିବେ ଯେମିତି ଗରମ ବଢ଼ି ବଢ଼ି ଚାଲେ, ସେମିତି ଘରର ରୋଷେଇର ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ରୋଷେଇର ପ୍ରକାର ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । କେଉଁଠି ମାଠିଆରୁ ପାଣି ଆସେ, କେଉଁଠି ଦହି ବସାହୁଏ, ଆଉ କେଉଁଠି କଞ୍ଚା ଆମ୍ବକୁ ଶିଝାଯାଏ - ଆଉ ତା’ପରେ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ସମୟ । ଦେଶୀ ପାନୀୟ ସହ ଆପଣମାନେ ବି ପରିଚିତ । ଯଦି ଆପଣ ଉତ୍ତର-ଭାରତ ଯିବେ ତେବେ ଆପଣଙ୍କୁ ଅନେକ ସ୍ଥାନରେ ଆମ୍ବପଣା, କଞ୍ଚା ଆମ୍ବର ସ୍ୱାଦ ମିଳିବ ଏବଂ ଏହାଛଡ଼ା ଗରମରୁ ନିସ୍ତାର ମଧ୍ୟ ମିଳିବ । ପଞ୍ଜାବ-ହରିୟାଣା ଗଲେ ଲସି ପାଇବେ । ବଡ଼ ବଡ଼ ଗିଲାସବାଲା ଲସି । ରାଜସ୍ଥାନ ଓ ଗୁଜରାଟରେ ଘୋଳଦହି ସତେଯେମିତି ସବୁ ଭୋଜନର ସାଥୀ ହୋଇଯାଏ । ବିହାର, ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡ ଓ ପୂର୍ବ ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶରେ ସତ୍ତୁ ସରବତ – ତା’ କଥା ତ ନିଆରା – ପେଟ ପୁରିବ, ବଳ ବି ଦେବ । କୋଙ୍କଣ ଓ ଗୋଆରେ କୋକମ ସରବତ, ସୋଲ କଢ଼ି । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତରେ ପାନକମ, ନୀର ମୋର, ସାମ୍ବରମ୍ ଓ ଓଡ଼ିଶାରେ ବେଲପଣା । ଏସବୁ କେବଳ ପାନୀୟ ନୁହେଁ, ଏହା ହେଉଛି ଭାରତର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳର ପରମ୍ପରାର ଅଂଶବିଶେଷ ମଧ୍ୟ । ଆଉ ଏହାରି ଭିତରେ ‘ଏକ ଭାରତ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’ର ଝଲକ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଆଉ ଗୋଟିଏ କଥା ନିଶ୍ଚୟ ମନେରଖିବେ, ଏଥିରୁ ଅଧିକାଂଶ ଜିନିଷ ଆମ ରୋଷେଇଘରୁ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଛି, ଆମ ବିଲବାଡ଼ିରୁ ବାହାରିଛି । ଏହା କୌଣସି ବଡ଼ ବ୍ରାଣ୍ଡିଂ ନୁହେଁ । କିନ୍ତୁ ପିଢ଼ୀ ପିଢ଼ୀର ଅନୁଭବ ଏହା ଭିତରେ ସମାହିତ ହୋଇରହିଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଗରମରେ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ଖୁବ୍ ଆନନ୍ଦ ଉଠାନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଆସିବା ସମୟ ଆଉ ଏକ ଚର୍ଚ୍ଚା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଘରେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଏ, ଆଉ ତାହା ହେଉଛି ଆମ୍ବ । ଆମ୍ବ ସାଧାରଣ ଚର୍ଚ୍ଚାର ବିଷୟ ପାଲଟିଯାଏ । ଭାରତରେ ବୋଧହୁଏ ଏପରି କୌଣସି ଘର ନ ଥିବ ଯେଉଁଠି ଗରମ ଦିନେ ଆମ୍ବର କଥା ପଡୁନଥିବ । ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅଞ୍ଚଳର ନିଜସ୍ୱ ଆମ୍ବ, ନିଜସ୍ୱ ସ୍ୱାଦ ଓ ନିଜସ୍ୱ ସୁଗନ୍ଧ ରହିଛି । ମହାରାଷ୍ଟ୍ର ଓ କୋଙ୍କଣର ହାପୁସ୍, ଆଲଫୋନ୍ସୋ । ଗୁଜୁରାଟର କେସର, ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ଦଶହରି, ଓ ମୋ କାଶିର ଲଙ୍ଗଡା – ଏମାନେ ତ ଆମ୍ବ ଭିତରେ ରାଜା । ଦେଖିବାକୁ ଗଲେ ଲଙ୍ଗଡା ଆମ୍ବର ଏକ ବିଶେଷତ୍ୱ ରହିଛି - ପାଚିବା ପରେ ମଧ୍ୟ ତା’ର ରଙ୍ଗ ସବୁଜ ଦେଖାଯାଏ । ବିହାରର ଜର୍ଦ୍ଦାଲୁ – ବାସ୍ନାରୁ ଯାହାକୁ ଦୂରରୁ ଥାଇ ଚିହ୍ନିହୁଏ । ଚୌଷା, ମାଲଦା - ପ୍ରତ୍ୟେକ ନାଁ ସହ ଲୋକମାନଙ୍କ ସ୍ମୃତି ଜଡ଼ିତ । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତ ଯାଆନ୍ତୁ, ସେଠି ବେଗନ୍ ପଲ୍ଲୀ, ତୋତାପୁରୀ, ନିଲମ୍, ମଲଗୋବା, ବେଙ୍ଗଲରେ ହିମସାଗର, ଓଡ଼ିଶା ଓ ଆନ୍ଧ୍ରପ୍ରଦେଶରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେଖା ପାଇବେ । ଅର୍ଥାତ୍ ସ୍ଥାନ ବଦଳିବା ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ଆମ୍ବର ରଙ୍ଗ, ରୂପ ଓ ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ଆଉ ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ୍ବର ଏହି ଯାତ୍ରା ଏବେ ଗାଁରୁ ବିଶ୍ୱ ବଜାର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଂଚିପାରିଛି । ଆଜି ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଜରିଆରେ ଆମ୍ବ ଚାଷ ସହ ଜଡ଼ିତ ମୋ କୃଷକ ଭାଇଭଉଣୀଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରିବି । ଆପଣ ଦେଶର କୃଷିଭିତ୍ତିକ ଅର୍ଥନୀତି ପାଇଁ ଜଣେ ସାଧାରଣ ଚାଷୀ ନୁହଁନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ସ୍ଥାନ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର । ଏହିପରି ଲାଗି ରୁହନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗରମ ଦିନେ ଏମିତି ତ ସ୍କୁଲ ଛୁଟି ହୋଇଥାଏ । କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏପରି ଏକ କ୍ଲାସର କଥା କହିବି ଯେଉଁଠି ଆପଣ ପ୍ରବେଶ ନେବାପାଇଁ ମନ କରିବେ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏପରି ଏକ ସ୍ଥିତିର କଳ୍ପନା କରନ୍ତୁ – ଏପରି ଏକ ସ୍କୁଲ ଯେଉଁଠି ପିଲା ବି ଆସନ୍ତି, ଯୁବକମାନେ ବି ଆସନ୍ତି ଓ ବୟସ୍କମାନେ ବି ଆସନ୍ତି । ଯେଉଁଠି କିଛି ଫିସ ନାହିଁ । କୌଣସି ବଡ କୋଠା ନାହିଁ, କୌଣସି ଶ୍ରେଣୀଗୃହ ମଧ୍ୟ ନାହିଁ । ଆଉ ସବୁଠାରୁ ମଜାକଥା ହେଲା ଏହି କ୍ଲାସ ନଦୀରେ ହିଁ ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହା କୌଣସି କାହାଣୀ ନୁହେଁ । ଏହା ହେଉଛି ଏକ ସତପ୍ରୟାସ । କେରଳମର ଆଲୁୱାରେ, ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀ ଏପରି ଏକ ସ୍ବିମିଂଗ କ୍ଲବ ଚଳାଉଛନ୍ତି ଯେଉଁଠାରେ ବର୍ତ୍ତମାନ ସୁଦ୍ଧା ୧୫ ହଜାରରୁ ଊର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ଲୋକ ପହଁରା ଶିଖିସାରିଲେଣି । ସାଜି ଜୀ ଦିବ୍ୟାଙ୍ଗ ପିଲାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପହଁରା ଶିଖାଇଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ପଛରେ ଏକ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଲୁଚିରହିଛି । କିଛିବର୍ଷ ତଳେ ଏକ ନୌକା ଦୁର୍ଘଟଣାରେ ଅନେକ ଛାତ୍ର ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରିଥିଲେ । ଏହି ଘଟଣା ସାଜି ଜୀଙ୍କୁ ଖୁବ୍ ଆନ୍ଦୋଳିତ କରିଥିଲା । ସେ ଚିନ୍ତା କଲେ, ଯଦି ପିଲାମାନେ ପହଁରା ଜାଣିଥାନ୍ତେ, ତେବେ ବୋଧହୁଏ କିଛି ଜୀବନ ବଞ୍ଚିଯାଇଥାନ୍ତା, ବାସ୍, ଏହିଠାରୁ ଆରମ୍ଭ ହେଲା ଏହି ଅଭିଯାନ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀଙ୍କ ଜୀବନ ଆମକୁ ବହୁତ ବଡ଼ ଶିକ୍ଷା ଦିଏ । ସେବା କରିବା ପାଇଁ ବହୁତ ବଡ଼ ସାଧନ ଦରକାର ହୁଏନାହିଁ । ଦରକାର ହୁଏ ସଦିଚ୍ଛା ଓ ନିରନ୍ତର ପ୍ରୟାସ । ଏହା ବଳରେ ହଜାର ହଜାର ଲୋକଙ୍କ ଜୀବନରେ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଅଣାଯାଇପାରେ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ବିଗତ ଦିନରେ ମୋତେ ୟୁରୋପର ନେଦରଲାଣ୍ଡସ୍ ଯିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା । ସେଠି ମୁଁ ଅନେକ ମିଟିଂରେ ସାମିଲ ହେଲି । ଆଉ ସେତେବେଳେ ଏପରି ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଆସିଲା, ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କୁ ଗର୍ବିତ କରିଥିଲା । ନେଦରଲାଣ୍ଡସରେ ଆୟୋଜିତ ଏକ ବିଶେଷ ସମାରୋହରେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ପ୍ରାଚୀନ ତାମ୍ରଫଳକ ଭାରତକୁ ଫେରାଇ ଦିଆଗଲା । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ନେଦରଲାଣ୍ଡର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକକୁ ନେଇ ଦେଶବିଦେଶରୁ ମୋ ପାଖକୁ ନିରନ୍ତର ବାର୍ତ୍ତା ଆସିବାରେ ଲାଗିଛି । ଲୋକମାନେ ଆନନ୍ଦ ପ୍ରକାଶ କରୁଛନ୍ତି । ଗର୍ବ ବ୍ୟକ୍ତ କରୁଛନ୍ତି । ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର ତାମିଲ ସମୁଦାୟ ମଧ୍ୟରେ ଏହାକୁ ନେଇ ଖୁବ୍ ଉତ୍ସାହ ପରିଲକ୍ଷିତ ହେଉଛି।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଖୁବ ଜିଜ୍ଞାସା ରହିଛି । ସେଥିପାଇଁ ଆଜି ମୁଁ ଏହାସହ ଜଡ଼ିତ କିଛି କଥା ଆପଣମାନଙ୍କୁ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରୁ ୨୧ଟି ବଡ଼ ଓ ୩ଟି ଛୋଟ ତାମ୍ରଫଳକ ରହିଛି । ଏହା ମୁଖ୍ୟତଃ ରାଜା ରାଜେନ୍ଦ୍ର ଚୋଳ-ପ୍ରଥମଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ନିଜ ପିତା ରାଜା ରାଜରାଜା ଚୋଳଙ୍କ ଏକ ବଚନକୁ ପୂରଣ କରିବା ସହ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିରେ ଆନଇମଙ୍ଗଲମ୍ ଗାଁକୁ ଏକ ବୌଦ୍ଧବିହାରକୁ ଦାନ ଦେଇଥିବାର ଉଲ୍ଲେଖ ରହିଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକରେ ଚୋଳବଂଶର ଉପଲବଧିର ବର୍ଣ୍ଣନା ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଏଥିରୁ ଜଣାପଡ଼େ ଯେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସାମୁଦ୍ରିକ ଶକ୍ତି କେତେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଥିଲା । ଏଥିରୁ ଦକ୍ଷିଣ ପୂର୍ବ ଏସିଆ ଦେଶମାନଙ୍କ ସହ ଚୋଳ ଶାସକଙ୍କ ସମ୍ପର୍କ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଜଣାପଡ଼େ ।

ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସମୃଦ୍ଧ ଇତିହାସ ଓ ସଂସ୍କୃତିକୁ ନେଇ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଗର୍ବିତ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ ସରକାର ଭାରତର ଏପରି ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟର ସଂରକ୍ଷଣ ପାଇଁ ନିରନ୍ତର ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରତ । ଏହି କ୍ରମରେ ‘ଜ୍ଞାନଭାରତମ୍ ଅଭିଯାନ’ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଛତିଶଗଡ଼ର ମହ୍ଲାରରେ ମଧ୍ୟ ଏକ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଅନୁସନ୍ଧାନ କରାଯାଇଛି । ସେଠାରୁ ତିନୋଟି ଦୁର୍ଲ୍ଲଭ ତାମ୍ରଫଳକ ମିଳିଛି । ଏଗୁଡ଼ିକ ପାଣ୍ଡୁବଂଶୀ ରାଜବଂଶର ମହର୍ଷି ବାଲାର୍ଜୁନଙ୍କ ଶାସନକାଳ ସହ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ମତ ପ୍ରକାଶ ପାଉଛି । ବିଶେଷଜ୍ଞଙ୍କ ମତରେ ଏହି ଶିଳାଲେଖ ଷଷ୍ଠ-ସପ୍ତମ ଶତାବ୍ଦୀର । ୧୪୦୦-୧୫୦୦ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରାଚୀନ ବ୍ରାହ୍ମୀଲିପି ଓ ପାଲି ଭାଷାରେ ଲିଖିତ । ଏଥିରୁ ସେ ସମୟର ଶାସନ ବ୍ୟବସ୍ଥା, ଧର୍ମ ଓ ସଂସ୍କୃତି ବିଷୟରେ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ତଥ୍ୟ ମିଳୁଛି । 

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଅଥବା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ପ୍ରତି ବିଶେଷ ଆକର୍ଷଣ ଥାଏ । ଆଜି ବି ଆମ ଦେଶରେ ଶହଶହ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣାଗାର ରହିଛି । ଏଠାରେ ଅଦ୍ଭୁତ ଗାଣିତିକ ଉଦ୍ଭାବନ ହୋଇଛି । ନାଭିଗେସନ୍ ହେଉ, ପଞ୍ଜିକା ହେଉ କିମ୍ବା ଆମର ପର୍ବପର୍ବାଣୀ, ଏସବୁର ସମ୍ପର୍କ ଆକାଶ ଏବଂ ତାରାମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି । ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଆମ ଦେଶରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁଗରେ କୌତୂହଳ ସୃଷ୍ଟି କରିଆସିଛି ତାକୁ ଆବିଷ୍କାର କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରେରିତ କରିଛି ତଥା ଆଜିର ଯୁବକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ ନେଇ ବହୁତ ଉତ୍ସାହ ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଥିବେ ଆଜିକାଲି ସାରାଦେଶରେ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଦ୍ରୁତ ବେଗରେ ଲୋକପ୍ରିୟ ହେଉଛନ୍ତି । ବଡ଼ ସହରଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଛୋଟ ପଡ଼ା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ, ସ୍କୁଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ପାର୍କ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହାର ଗତିବିଧି ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ମୋତେ ବାଙ୍ଗାଲୋର ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମିକାଲ୍ ସୋସାଇଟି ସମ୍ପର୍କରେ ସୂଚନା ମିଳିଛି । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଅଧିବେଶନ ଆୟୋଜିତ ହେଉଛି । ଏହି ସଂସ୍ଥା ଗ୍ରାମାଞ୍ଚଳରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନକୁ ଲୋକପ୍ରିୟ କରିବାର ଅଭିଯାନ ଆରମ୍ଭ କରିଛି । ‘ଖଗୋଳ ମଣ୍ଡଳ’ ନାମକ ଏକ ଦଳ ୩୦ ଘଣ୍ଟାର ଗୋଟିଏ ଅଭିନବ ପାଠ୍ୟକ୍ରମ ଆରମ୍ଭ କରିଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ରାତିରେ ତାରାମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବା ସ୍ୱତଃ ଗୋଟିଏ ଅଦ୍ଭୁତ ଅନୁଭବ ହୋଇଥାଏ । ଆଷ୍ଟ୍ରୋ କେରଳ ନାମକ ଗୋଟିଏ ସଂସ୍ଥା ରାତ୍ରି ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଶିବିର ଏବଂ କର୍ମଶାଳା ଆୟୋଜିତ କରେ । ଏଠାରେ ଯୁବବନ୍ଧୁମାନେ ଟେଲିସ୍କୋପ ତିଆରି କରିବା ଏବଂ ତାରା ମାନଚିତ୍ରର ପ୍ରୟୋଗ ଶିଖନ୍ତି । ରାଜକୋଟର ବିଗ୍ ବ୍ୟାଙ୍ଗ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଗିରର ଜଙ୍ଗଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି କଚ୍ଛର ରଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅନେକ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଇଭେଣ୍ଟ ଆୟୋଜିତ କରିଛନ୍ତି । ‘ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଦ୍ୟା ପରିସଂସ୍ଥା’ ମଧ୍ୟ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନର ପୁରୁଣା ସଂସ୍ଥାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗୋଟିଏ । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ସୁବିଧା ସହିତ ବହି, ଲାଇବ୍ରେରୀ ଏବଂ ଟେଲିସ୍କୋପ ଲାଇବ୍ରେରୀର ସୁବିଧା ମଧ୍ୟ ଅଛି । ମୁଁ ଆଇଏସଏଏସି (ଆଇସାକ୍) ସମ୍ପର୍କରେ ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହେଁ । ଏହା ଏକ ଛାତ୍ର-ନେତୃତ୍ୱାଧୀନ ଦେଶବ୍ୟାପୀ ନେଟୱାର୍କ,, ଯାହା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଏବଂ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ କ୍ଲବକୁ ପରସ୍ପର ମଧ୍ୟରେ ଯୋଡ଼ିଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ ନିଜର ହବି ପାଇଁ ସମୟ ବାହାର କରିବା ଏବଂ ସବୁବେଳେ କିଛି ନା କିଛି ନୂଆ ଶିଖିବା ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ । ମୁଁ ଯୁବକମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କରିବି ଯେ ସେମାନେ କୌଣସି ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ସହିତ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ, ଏବଂ ଏହି ଛୁଟିରେ କୌଣସି ପ୍ଲାନେଟୋରିୟମ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ଯାଆନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମକୁ ଯେଉଁମାନେ ଟିଭିରେ ଦେଖୁଛନ୍ତି, ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ କହିବି – ଗୋଟିଏ ଭିଡିଓକୁ ନିଶ୍ଚିତ ଦେଖନ୍ତୁ । ଏହି ଭିଡିଓ ବିଗତ ଦିନରେ ଖୁବ୍ ଚର୍ଚ୍ଚାରେ ଥିଲା । ଏଥିରେ କିଛି ଲୋକ ଖୁବ୍ ଧୈର୍ଯ୍ୟର ସହିତ, ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଇବାର ଚେଷ୍ଟା କରୁଥିଲେ । ଏହା ଜାଣି ଆପଣ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହେବେ ଯେ ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରେ ପାଖାପାଖି ୧୩ ଘଣ୍ଟା ଲାଗିଲା ଏବଂ ପରିଶେଷରେ ସେହି ଡଲଫିନ୍ ବଞ୍ଚିଗଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରଥମ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ନେଇଥିଲା । ଘଟଣାଟି ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର । ସେଠାରେ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ କେନାଲରେ ଫଶିଯାଇଥିଲା । ଏହି ସମୟରେ ‘ନମାମି ଗଙ୍ଗେ ଅଭିଯାନ’ରେ ତିଆରି ହୋଇଥିବା ଏହି ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ତା’ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ଆଶାର କିରଣ ନେଇ ପହଞ୍ଚିଲା । ତା’ପରେ ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ତାକୁ ବାହାରକୁ ଅଣାଗଲା । ତା’ର ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟପରୀକ୍ଷା କରାଗଲା, ତା’ର ଚିକିତ୍ସା କରାଗଲା ଏବଂ ଏହାପରେ ତାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ଭାବେ ରାପ୍ତି ନଦୀରେ ଛାଡ଼ିଦିଆଗଲା । ଯଦି କହିବା ଏହିଭଳି ଭାବରେ ଗୋଟିଏ ଜୀବନ ପୁଣି ନିଜ ଘରକୁ ଫେରିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ବହୁତ ଅନନ୍ୟ । ଏହାକୁ ଗୋଟିଏ ଚଳମାନ ଚିକିତ୍ସାଳୟ ଭଳି ତିଆରି କରାଯାଇଛି । ଏଥିରେ ଡଲଫିନ୍କୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖିବାର ବ୍ୟବସ୍ଥା ଅଛି । ଅମ୍ଳଜାନର ସୁବିଧା ଅଛି, ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଷ୍ଟ୍ରେଚର ଅଛି, ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ଉପକରଣ ଅଛି, ଅର୍ଥାତ୍ ଯଦି କୌଣସି ଡଲଫିନ୍ ଆହତ ହୋଇଯାଏ, କେନାଲରେ ଫଶିଯାଏ ବା ନଦୀରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ, ତେବେ ଯଥାଶୀଘ୍ର ତାକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରାଯାଇପାରିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି, ତେବେ ଆମେ ଖାଲି ଗୋଟିଏ ପ୍ରଜାତିକୁ ବଞ୍ଚାଉନାହୁଁ, ଆମେ ଗଙ୍ଗାର ଜୈବ ବିବିଧତାକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । ନଦୀର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନତନ୍ତ୍ରକୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ଆଗାମୀ ପିଢ଼ୀ ପାଇଁ ପ୍ରକୃତିର ଗୋଟିଏ ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । 

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ଆପଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଅନେକ ଲୋକଙ୍କର ନଦୀ, ପୋଖରୀ ଅଥବା କୂଅ ପାଣି ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସ୍ମୃତି ନିଶ୍ଚୟ ଥିବ । କାହାକୁ ପୋଖରୀରେ ପହଁରିବା ମନେଥିବ, କେହି ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ସହିତ ପୋଖରୀ କୂଳରେ ଖେଳିବା ବା କାହାର ସେହି ମାଟିର ସୁଗନ୍ଧ ମଧ୍ୟ ମନେପଡୁଥିବ । ବାଲ୍ୟକାଳର ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିଗୁଡ଼ିକ ସାରାଜୀବନ ମନରେ ସାଇତା ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିକୁ ବଞ୍ଚାଇ ରଖିବାର ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରକ କଥା ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ବସ୍ତୀ ଜିଲ୍ଲାରୁ ଆସିଛି । ବସ୍ତୀର ଆକାଶଗୁପ୍ତା ନିଜ ଗାଁର ମନୋରମା ନଦୀକୁ ଦେଖି ବହୁତ ଦୁଃଖୀ ହେଉଥିଲେ । କାରଣ ଯେଉଁ ନଦୀକୁ ସେ ବାଲ୍ୟକାଳରୁ ସଫା ଏବଂ ଜୀବନ୍ତ ଦେଖିଥିଲେ, ସମୟ ପରିବର୍ତ୍ତନ ସଙ୍ଗେସଙ୍ଗେ ସେ ନଦୀରେ ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଜମା ହେବାରେ ଲାଗିଛି । ଆବର୍ଜନା ବଢ଼ିଚାଲିଥିଲା । ଶ୍ରୀମାନ ଆକାଶ ସ୍ଥିର କଲେ ଯେ ସେ ଅଭିଯୋଗ କରିବେ ନାହିଁ, ଗୋଟିଏ ନୂତନ ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିବେ । ଅଭିଯୋଗ ନୁହେଁ, ଶୁଭାରମ୍ଭ ଏକ ମନ୍ତ୍ର ହୋଇଗଲା । ସେ ନିଜର ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ସାଥୀରେ ନେଲେ । ଖାଲି ଜାଲ ଥିଲା, ଫାଉଡା ଥିଲା, ଟୋକେଇ ଥିଲା ଆଉ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଶକ୍ତି ଥିଲା କିଛି ପରିବର୍ତ୍ତନର ସଂକଳ୍ପ । ଏ ଯୁବକମାନେ ନଦୀରେ ବୁଡ଼ି ଦଳ ବାହାର କରୁଥିଲେ । ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଆବର୍ଜନା ବାହାରକୁ ଆଣୁଥିଲେ । ଅନେକ ଥର ଦିନକୁ ପ୍ରାୟ ୫୦-୬୦ କିଲୋ ଆବର୍ଜନା ନଦୀରୁ ବାହାର କରାଗଲା । ଧିରେ ଧିରେ ମନୋରମା ନଦୀର ସେହି ଅଂଶ ପୁଣି ସଫା ଦେଖାଯିବାକୁ ଲାଗିଲା । ଏହି କାମ ପ୍ରତି ଆଖପାଖର ଲୋକମାନଙ୍କ ଧ୍ୟାନ ମଧ୍ୟ ଆକର୍ଷିତ ହେଲା । ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ପ୍ରତି ସଚେତନତା ବଢ଼ିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରଣାଦାୟୀ କଥା ଗୋଆରେ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଛି । ଗୋଆର ବାଳକୃଷ୍ଣ ଅଇୟା ଜଣେ ଅବସରପ୍ରାପ୍ତ ଶିକ୍ଷକ । କିନ୍ତୁ ସମାଜ ପାଇଁ କାମ କରିବା ପାଇଁ ଆଜି ବି ତାଙ୍କର ଉତ୍ସାହ ସେହିଭଳି ରହିଛି । ତାଙ୍କୁ ମଡ୍ଡୀ-ତୋଲାପ୍ ଅଞ୍ଚଳର ପାଣିର ସମସ୍ୟା ବହୁତ କଷ୍ଟ ଦେଉଥିଲା । ସେ ମଧ୍ୟ ସମାଧାନ ପାଇଁ କାମ ଆରମ୍ଭ କଲେ । ବାଳକୃଷ୍ଣ ଜୀ ପାଇପଲାଇନ୍ ବିଛାଇବାରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କଲେ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଅନେକ ଘର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପାଣି ପହଂଚିପାରିଲା । ଯେଉଁ ପରିବାରକୁ ପାଣି ପାଇଁ ପ୍ରତିଦିନ ସଂଘର୍ଷ କରିବାକୁ ପଡୁଥିଲା, ସେମାନେ ଏହାଦ୍ୱାରା ବହୁତ ଉପକୃତ ହେଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗତ ମାସରେ ମୋର ଗୋଟିଏ ବହୁତ ଭଲ ଅନୁଭୂତି ହୋଇଥିଲା । ତା’ର ସମ୍ପର୍କ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ସହିତ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିପାଇଁ ଆଜି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସେ ବିଷୟ ଚର୍ଚ୍ଚା କରିବାକୁ ଚାହେଁ । ତାମିଲନାଡୁର ନାଗରକୋଇଲରେ ଜଣେ ଶିକ୍ଷକଙ୍କ ସହିତ ମୋର ସାକ୍ଷାତ ହୋଇଥିଲା । ପ୍ରାୟ ତିନିଦଶକ ପୂର୍ବେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ଭେଟିଥିଲି । ମୁଁ ଗିରିଜା ଅମ୍ମାଙ୍କ କଥା କହିବାକୁ ଯାଉଛି । ଏହି ସାକ୍ଷାତ ସମୟରେ କିଛି ଯୁବଛାତ୍ର ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ସହିତ ଥିଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ପ୍ରାୟ ୧୫ଟି ସ୍କୁଲ ଚଳାଉଛନ୍ତି । ସେଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ ଚେନ୍ନାଇର ଜୟଗୋପାଲ ଗରୋଡିଆ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ବହୁତ ପ୍ରମୁଖ । ତାଙ୍କର ଦେଶଭକ୍ତିର ଭାବନା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତବାସୀ ପାଇଁ ପ୍ରେରଣାଦାୟକ । ସେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଦେଶର ଅନେକ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ କିଛି କରିବାର ସଂକଳ୍ପ ନେଲେ । ସେଥିପାଇଁ ସେ ନିଜ ସମସ୍ତ ସ୍କୁଲର ପିଲାମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା ଦେଲେ । ସେ ପିଲାମାନଙ୍କୁ କହିଲେ ଯେ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସେମାନେ ପ୍ରତିଦିନ ଗୋଟିଏ ଟଙ୍କା ଦିଅନ୍ତୁ । ଅର୍ଥାତ୍ ଗୋଟିଏ ବର୍ଷରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ପିଲା ଦ୍ୱାରା ୩୬୫ ଟଙ୍କା ଜମା ହେଲା । ଏହିଭଳି ଛୋଟ ଛୋଟ ଅଂଶଦାନ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାୟ ୪୦ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ଏକତ୍ର ହେଲା । ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ଏହି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟଙ୍କାର ଚେକ୍ ମୋତେ ଅର୍ପଣ କଲେ । ତାଙ୍କସହିତ କଥାବାର୍ତ୍ତା ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ଅନୁଭବ କଲି ଯେ ମା’ ଭାରତୀଙ୍କ ପାଇଁ ତାଙ୍କର ସମର୍ପଣ ଭାବ କେତେ ଗଭୀର । ଗତବର୍ଷ ହିଁ ଚେନ୍ନାଇର ପ୍ରଥମ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ତା’ର ୫୦ ବର୍ଷ ପୂରଣ କଲା । ଦେଶର ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ସାଂସ୍କୃତିକ ଗୌରବକୁ ଆଗେଇନେବାରେ ଏହି ସ୍କୁଲ ନେଟୱାର୍କର ଭୂମିକା ବହୁତ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ମୁଁ ଏହା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେଉଛି । ଏବଂ ସେହି ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବିଶେଷ ଭାବେ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛି । ଯେଉଁମାନେ ଦେଶର ବୀର ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହିଭଳି ଯୋଗଦାନ ଦେଇଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗାଁରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସହରରେ, କିଛି ନା କିଛି ଏଭଳି ଘଟୁଛି ଯାହା ଆମକୁ ପ୍ରେରଣା ଦିଏ । ଅନେକ ଥର, ଏହି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକର ବିଶେଷ ଚର୍ଚ୍ଚା ହୁଏନାହିଁ । କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଜାଣନ୍ତି ସେତେବେଳେ ଆମର ଏହି ବିଶ୍ୱାସ ଆହୁରି ଦୃଢ଼ ଏବଂ ମଜଭୁତ ହୁଏ ଯେ ଆମର ଦେଶ ଲୋକମାନଙ୍କ ଶକ୍ତିରେ ଆଗକୁ ଚାଲିଛି । ମୋର ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ ନିଜ ଆଖପାଖର ଏହିଭଳି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକୁ ଦେଖନ୍ତୁ । ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ସମାଜ ପାଇଁ ଭଲ କାମ କରୁଛନ୍ତି ତାଙ୍କୁ ଚିହ୍ନନ୍ତୁ, ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତୁ, ତାଙ୍କଠାରୁ ଶିଖନ୍ତୁ ଏବଂ ହେଇପାରେ ତ ନିଜେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଏକ ଭଲ କାମରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ । ଆସନ୍ତା ମାସ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହିଭଳି ଆଉକିଛି ପ୍ରେରକ କଥା ସହିତ ପୁଣି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସାକ୍ଷାତ ହେବ । ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ । ନମସ୍କାର ।