PM Modi unveils the statue of Swami Vivekananda in Kuala Lumpur
It was Swami Vivekananda who first gave the concept of One Asia: PM
South East Asia Summit speaking of One Asia; a concept given by Swami Vivekananda: PM.
From the Vedas to Vivekananda, India's culture is rich: PM
Swami Vivekananda neither a person nor a system, it is the identity of the soul of ancient India: PM
Vivekananda is not just a name. He personifies the thousands year old Indian culture and civilization: PM
It is a great fortune for me to dedicate the statue of Swami Vivekananda on Malaysian soil: PM
Pursuit of truth got Ramakrishna Paramhans & Swami Vivekananda together. They were not looking for a teacher or a disciple: PM
Swami Vivekananda was in pursuit of the truth: PM

भाइयो और बहनों।

अभी सुप्रियान जी कह रहे थे कि हमने इस परिसर में तो विवेकानंद जी की प्रतिमा की स्था्पना की, पर हम हमारे मन-मंदिर में, हमारे हृदय में विवेकानंद जी को प्रतिस्था पित करें और मैं ये बात आपको कहूं और आप कर लेंगे।

मैं नहीं मानता हूं कि मेरे कहने से हमारे भीतर विवेकानंद प्रवेश कर सकते है और न ही किसी के प्रवचन से विवेकानंद जी हमारे भीतर प्रवेश कर सकते है। विवेकानंद, ये न किसी व्यक्ति का नाम है, विवेकानंद न किसी व्यवस्था की पहचान है, एक प्रकार से विवेकानंद सहस्त्र साल पुरानी भारत की आत्मा की पहचान है।

वेद से विवेकानंद तक हमारी एक सांस्कृतिक लंबी विरासत है और उपनिषद से ले कर के उपग्रह तक हमने हमारी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक विकास यात्रा को भी सामर्थ्य दिया है। 

उपनिषद से शुरू किया होगा, उपग्रह तक हम पहुंचे होंगे लेकिन हमारा जो मूल Pin है जो हमारी आत्मा है और सच्चे अर्थ में जो हमारी पहचान है, उसको अगर हम बरकरार रखते है तो उसका अर्थ ये हुआ कि मैं मेरे भीतर स्वामी विवेकानंद जी को जीवित रखने की कोशिश कर रहा हूं।

रामकृष्ण परमहंस और नरेन्द्र । ये दोनों के बीच की दुनिया को अगर हम समझ लें तो शायद विवेकानंद जी को समझने में सुविधा बन जाती है।

नरेन्द्र कभी गुरू की खोज में नहीं निकले थे, न ही उसे गुरू की तलाश थी, नरेन्द्र सत्य् की तलाश कर रहा था। ईश्वर है कि नहीं! उसके मन में एक आशंका थी कि परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं हो सकती है। ईश्ववर नाम का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता है और वो उस सत्य को जानने के लिए जूझ रहे थे।

और न ही रामकृष्ण परमहंस किसी शिष्य की तलाश में थे। मैं गुरू परम्परा की भावना , मेरे बाल कुछ शिष्यों की परंपरा अगर है। और मैं जो आश्रम प्रतिस्थापित करूं और उसको कोई चलाता रहे, रामकृष्ण देव के मन में भी ऐसे किसी शिष्या की तलाश नहीं थी ऐसी कोई मनीषा नहीं थी।

एक गुरू जिसको शिष्यो की खोज नहीं थी, एक शिष्य जिसको गुरू की खोज नहीं थी, लेकिन कमाल देखिए, एक सत्य को समर्पित था और दूसरा सत्य को खोजना चाहता था और उसी सत्य की तलाश में दोनों को जोड़ के रख दिया।

और ये अगर हम समझ लें तो फिर सत्य की तलाश क्या हो सकती है, सत्य के रास्ते पे चलना कितना कठिन हो सकता है और उसमें भी कैसे सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वो विवेकानंद जी के जीवन से हम जान सकते है।

हम विवेकानंद जी के उस कालखंड का विचार करें जहां पर धर्म का प्रभाव, पूजा पद्धति की विधि का प्रभाव, rituals का माहात्मय । धर्म गुरुओं का माहात्मय, धर्मग्रथों का माहात्मय। ये चरम सीमा पर था। उस समय एक नौजवान उन सारी परम्पराओं से भाग जाने की बात करे, इसकी आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता है।

एक बहुत बड़ा वर्ग ये मानता था कि भगवान के पास घंटो तक बैठे रहे, पूजा-पाठ करते रहे, आरती-धूप करते रहे, फूल चढ़ाते रहे, नए-नए प्रसाद चढ़ाते रहे तो जीवन के पाप धूल जाते है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। एक चरम सीमा का आनंद प्राप्त, करने का अवसर मिल जाता है। ये सोच बनी पड़ी हुई थी और उस समय विवेकानंद डंके की चोट पर कहते थे कि जन सेवा ये प्रभु सेवा। सामान्य मानवी जो आपके सामने जिंदा है, जो दुख और दर्द से पीड़ित है, उसकी सेवा करो, ईश्वर अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

उन्होंने जब कलकत्ते की धरती पर नौजवानों से पूछा कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता क्या होता है, हमें क्या करना चाहिए तब उन्होंने कहा ये सब छोड़ो, जाओ फुटबॉल खेलो, मस्ती से फुटबॉल खेलो पूरी तरह से अपने आप को झोंक दो, हो सकता है तुम्हें रास्ता मिल जाएगा। उस समय हम गुलामी के कालखंड में जी रहे थे, कोई सोच भी नहीं सकता था भारत कभी आजाद हो सकता है लेकिन स्वामी विवेकानंद एक दीर्घ दृष्टा थे और वो कहते थे, अपने जीवन के काल में कहा था कि मैं, मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं, मैं मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं कि मेरी भारत मां उठ खड़ी हुई है, वो जगत गुरू के स्थान पर विराजमान मैं देख रहा हूं, मैं एक दिनमान भारत माता मैं देख रहा हूं और वो दिन बहुत निकट होगा । ये भाव जगत स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन काल में अपनी आंखों से देखा था और वो हिंदुस्तान को प्रेरित करने का प्रयास करते थे।

वो एक कालखंड था जब आध्यात्म प्रधान जीवन था और वो सिर्फ भारत में नहीं एशिया के सभी देशों में समाहित था और दूसरी तरफ वो पश्चिम का विचार था, जहां अर्थ प्रधान था। आध्यात्म प्रधान जीवन और अर्थ प्रधान जीवन के बीच एक शताब्दियों का टकराव चल रहा था। अर्थ प्रधान जीवन ने आध्यात्म प्रधान जीवन को किनारे कर दिया था। अर्थ प्रधान जीवन जन सामान्य की आशा, आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु बन गया था और ऐसे कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने हिम्मत के साथ और 30-32 साल की आयु में पश्चिम की दुनिया में जाकर के, उस धरती पर जाकर के विश्व को आध्यत्मिकता का संदेश देने का एक सामर्थ्यवान काम किया था। जिस महापुरुष ने एशिया की आध्यात्मिक ताकत को दुनिया को पहचान कराया था और पहली बार विश्व को एशिया की अपनी धरती की एक अलग चिंतनधारा है, यहां के संस्कार अलग हैं और विश्व को देने के लिए उसके पास बहुत कुछ है। ये बात डंके की चोट पर कहने का साहस स्वामी विवेकानंद ने किया था। कल मैं यहां आसियान समिट में था आज यहां मैं South East Asia Summit में था और एक बात वहां उभरकर के सामने आती थी और वो एक आती थी कि One Asia .

One Asia का विचार लेकिन आज जो आवाज गूंज रही है उसमें आर्थिक व्यवस्था है, राजनीतिक व्यवस्था है, सरकारों के मेलजोल की व्यवस्था का चिंतन है लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि One Asia का concept आध्यात्मिक धरातल पर सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने प्रचारित किया था। मैं एक पुरानी घटना आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। ..

After Swami Vivekananda introduced the East and Asia to the West, Scholars and philosophers like Okakura, Karinzo from Japan, Rabindranath Tagore, Mahrishi Aurbindo, Anand Kumar Swami and Vinoy Sarkar were inspired by Swami Vivekananda. OkaKura invited Swami Vivekananda to Japan and also sent him a cheque of Rs 300. He came to Calcutta and met Swami Vivekananda on 1st February 1902 and both went to Bodh Gaya together. OkaKura is the symbol of Asianism. In his book, ‘Ideals of the East’ by Okakura, the manuscripts were edited by Sister Nivedita, the foremost western disciple of Swami Vivekananda. The very first sentence, this is one important thing I want to tell you. The very first sentence is “Asia is one.” The idea of Asian unity is clearly Swami Vivekananda’s concept. In his next book, Okakura began by saying “Brothers and sisters of Asia”, echoing Swami Vivekananda’s speech at Parliament of Religions.

मैं ये इसलिए कह रहा था कि जो उस समय इस प्रकार के Philosopher विवेकानंद जी के प्रभाव में थे, उन्होंने जो विवेकानंद जी से मंत्र पाया था वो Asia is One ये मंत्र पाया था। आज 100 साल के बाद आर्थिक, राजनीतिक कारणों से One Asia की चर्चा हो रही है लेकिन उस समय आध्यात्मिक एकात्मता के आधार पर विवेकानंद जी ये देख पाते थे कि ये भूमि है जो विश्व को संकटों से बाहर निकाल सकती है और आज दुनिया जिन दो संकटों से जूझ रही है अगर उन दो संकटों के समाधान का रास्ता कोई दे सकता है तो एशिया की धरती से ही निकल सकता है।

और इसलिए आज विश्व कह रहा है Climate change और Global warming की बात, आज विश्व कह रहा है Terrorism की चर्चा, यही तो धरती है जहां भगवान बुद्ध का संदेश मिला, यही तो धरती है जहां हिंदुत्व का संदेश मिला और इसी धरती से ये बातें उभर करके आ गई हैं जहां पर ये कहा गया एकम सत, विपरा बहुधा विधंति, Truth is One, Wise call it in different ways ये जो मूल मंत्र हैं वो सबको एक रखना, जोड़ने की ताकत देता है और इसलिए जब Terrorism की बात आती है तो उसका समाधान इसमें holier than thou की कल्पना ही नहीं है, हर सत्य को स्वीकार किया जाता है और जब हर सत्य को स्वीकार किया जाता है तब conflict के लिए अवकाश नहीं होता है और जब conflict के लिए अवकाश नहीं है तो संघर्ष की संभावना नहीं है और जहां संघर्ष नहीं है वहां Terrorism के रास्ते पर जाना का कोई कारण नहीं बनता है। 


आज विश्व Global Warming की चर्चा करता है। हम वो लोग हैं जिसने पौधे में परमात्मा देखा था, हम जितने भी ईश्वर की कल्पना की है हर ईश्वर के साथ कोई न कोई प्राकृतिक जीवन जुड़ा हुआ है। किसी न किसी वृक्ष के साथ उन्होंने साधना की है, किसी न किसी पशु-पक्षी को उन्होंने पालन किया है। ये सहज संदेश हमारी परंपरा में रहा हुआ है। हम प्रकृति के शोषण का पक्षकार नहीं रहे हैं, हम nature के साथ मित्रतापूर्ण गुजारा करने की सबक ले करके चले हुए लोग है। वही संस्कृति है जो ग्लोबल वार्मिंग से मानवजाति को बचा सकती है।

मुझे लगता है कि स्वा्मी विवेकानंद जी ने हमें ये जो रास्तेे दिखाएं है। उन रास्तों को अगर हम परिपूर्ण करते है तो हमें हमारे भीतर कोई नए विवेकानंद को प्रतिस्थापित करने की जरूरत नहीं है। उनकी कही हुई एक बात को ले करके भी हम चल पाते है मैं समझता हूं हम आने वाली शताब्दियों तक मानवजात की सेवा करने के लिए कुछ न कुछ योगदान करके जा सकते है।

आज मुझे यहां एक योग की पुस्तक का भी लोकापर्ण करने का अवसर मिला है और वो भी हमारे सरकार के साथ ही श्रीमान शाहू ने यहां की भाषा में योग की पुस्तक की रचना की है। वे स्वयं सरकारी अधिकारी है लेकिन योग के प्रति उनका समर्पण है। मुझे खुशी हुई उनकी उस किताब का लोकापर्ण करते हुए। आज विश्व योग के प्रति आकर्षित हुआ है। हर कोई तनाव मुक्त जीवन का रास्ता खोज रहा है और उसको लगता है उसकी खिड़की योग से खुलती है और इसलिए हर कोई उस खिड़की में झांकने की कोशिश करता है।

यूनाइटेड नेशन ने अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस के रूप में 21 जून को स्वीकार किया। दुनिया के 177 देशों ने उसको को-स्पोंसर किया और दुनिया के सभी देशों ने 21 जून को योग का दिवस मनाया। मानवजात जो कि अपने मानसिक समाधान का रास्ता तलाश रही है। Holistic health care की तरफ आगे बढ़ रही है। तब उसको लगता है कि योग एक ऐसी सरल विद्या है जिसको अगर हम दिन के आधा-पौना घंटा भी लगा ले तो हम अपने मन, बुद्धि, शरीर को एक दिशा में चला सकते है। आज हमारे लिए ये चुनौती नहीं है कि हम दुनिया को समझाएं कि योग क्या है, हमारे सामने चुनौती ये है कि सारा विश्व अच्छे योग टीचरों की मांग कर रहा है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि हम Perfect योग teacher को कैसे दें ताकि इस विद्या का सही स्वरूप आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे और जो भी इसका लाभ उठाएं, उसको सचमुच में, उसका जो मकसद हो, मकसद पूरा करने में काम हो और इसलिए जितना अधिक आधुनिक भाषा में हम योग को प्रचारित करें, जितनी अधिक योग को आधुनिक भाषा में प्रतिपादित करें और खुद योग के जीवन को जीकर के दुनिया के सामने प्रस्तुत करें और अधिकतम योग के teacher तैयार करें, hobby के रूप में तैयार करें भले profession के रूप में न तैयार कर सकें। दिन में हम 50 काम करते हैं, एक घंटे योगा के लिए जो भी सीखने आएगा, हम सिखाएंगे।

ये पूरा हम एशिया के वायुमंडल में लाते हैं तो विश्व की जो अपेक्षा है, उस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए उत्तम योग teacher हम दुनिया को दे सकते हैं। मैं स्वामी सूपरयानंद जी का बहुत आभारी हूं कि आज मुझे इस पवित्र स्थान पर आने का अवसर मिला, विवेकानंद जी की प्रतिमा का लोकापर्ण करने का अवसर मिला और मुझे विश्वास है कि इस धरती पर आने वाले विश्व के सभी लोगों को यहां से कोई प्रेरणा मिलती रहेगी। इसी एक शुभकामना के साथ आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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Text of PM’s remarks during inauguration of Swaminarayan Hindu Temple in Paris
September 06, 2026

पूज्य महंत स्वामी, फ्रांस सरकार के सम्मानित प्रतिनिधिगण, उपस्थित अतिथिगण, इंडियन कम्युनिटी के मेरे साथी, देश दुनिया से जुड़े सभी हरि भक्त, देवियों और सज्जनों, जय स्वामीनारायण!

आज फ्रांस की राजधानी पेरिस में भव्य स्वामीनारायण मंदिर का लोकार्पण हो रहा है। यह लोकार्पण भारत और फ्रांस के सांस्कृतिक संबंधों का नया युग स्तंभ है। पूज्य संत जनों और सनातन परंपरा के श्रेष्ठ जनों के आशीर्वाद के साथ आज इस लोकार्पण का मंच ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के भाव का मंच बन गया है। भगवान स्वामीनारायण की कृपा और हमारे संतों का स्नेह, संतों का आशीर्वाद, मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसे पुण्य अवसरों से जुड़ने का अवसर हमेशा मिलता रहता है। आज भी मैं भले ही पेरिस में आप सबके बीच उपस्थित नहीं हूं, लेकिन मन से और हृदय से, मैं स्वयं को आपके बीच ही अनुभव कर रहा हूं।

साथियों,

आज इस अवसर पर मैं परम पूज्य प्रमुख स्वामी जी महाराज का भी श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूं। प्राचीन काल में भारत का जो सांस्कृतिक आध्यात्मिक वैभव था, उन्होंने उसके पुनर्जागरण का एक अभियान शुरू किया था। आज उसका प्रकाश यूरोप समेत पूरी दुनिया में फैल रहा है। 2024 में अबू धाबी में भव्य मंदिर का लोकार्पण हुआ था। आज वहां हजारों लोग दर्शन करने जाते हैं और अब यहां पेरिस में स्वामीनारायण मंदिर का निर्माण सृजन की यह निरंतरता, यह संतों की संकल्प शक्ति का ही प्रमाण है। मैं पुनीत कार्य के लिए पूज्य महंत स्वामी का आभार प्रकट करता हूं, मैं उनके चरणों में प्रणाम करता हूं। मैं BAPS स्वामीनारायण संस्था को और करोड़ों हरि भक्तों को इस अवसर पर हृदय की गहराई से बधाई देता हूं।

साथियों,

BAPS के माध्यम से जब अलग-अलग देश में मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा होती है, तो वहां भारत के प्राचीन विचार और मानवीय मूल्य भी साथ-साथ ही जाते हैं और भारत का विचार कहता है ‘समानं मनः सह चित्तमेषाम्’ अर्थात हमारे मन समान हो, हमारे हृदय साथ जुड़े। इसलिए आज जब फ्रांस में इतना भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ है, यह फ्रांस की विविधता को तो समृद्ध करेगा ही, इससे भारत और फ्रांस के सांस्कृतिक संबंधों को भी ऊर्जा मिलेगी।

साथियों,

बीते वर्षों में भारत और फ्रांस के संबंध नई ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। मेरे मित्र, प्रेसिडेंट मैक्रों के साथ मिलकर दोनों देश एक Special Global Strategic Partnership बना रहे हैं। Technology, AI और Defence से लेकर Space और Climate Action तक हम एक नई गति और नई ऊर्जा के साथ मिलकर के आगे बढ़ रहे हैं। हम 2026 को India-France Year of Innovation के रूप में भी सेलिब्रेट कर रहे हैं। भारत-फ्रांस की ये Strategic Partnership इसलिए भी खास है, क्योंकि ये हमारे पुराने सांस्कृतिक-राजनैतिक सम्बन्धों की मजबूत बुनियाद पर टिकी है। इतिहास गवाह है, फ्रांस में भारतीय सैनिकों के बलिदान का इतिहास आज भी मन-मंदिर में जीवित है। भाषा से जुड़े विषयों में रुचि रखने वाले लोग यह भी जानते हैं कि फ्रेंच स्कॉलर्स ने संस्कृत को लोकप्रिय बनाने में कितनी अहम भूमिका निभाई है। रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद पर रोमाँ रोलाँ की की लेखनी हमारी सोसाइटीज़ को और करीब लाई है। पेरिस से पुडुचेरी के अरबिंदो आश्रम तक 'The mother' की spiritual journey, उसने कितने ही भारतीय और फ्रेंच साधकों को inspire किया है।

साथियों,

दशकों पहले श्रील प्रभुपाद स्वामी भी फ्रांस आए थे। इस्कॉन के जरिए भारत फ्रांस के बीच आध्यात्मिक सम्बन्धों का नया अध्याय उन्होंने शुरू किया था। आज योग भी भारत-फ्रांस के people to people कनेक्ट का एक माध्यम बन चुका है। 'इंटरनेशनल योगा डे' पर एफिल टॉवर के सामने से आने वाली तस्वीरें फ्रांस में योग की लोकप्रियता का उदाहरण बनती हैं और अब BAPS के इस भव्य मंदिर के जरिए, हमारे उन सांस्कृतिक सम्बन्धों में एक नया अध्याय जुड़ रहा है।

साथियों,

इन दिनों, भारत फ्रांस Joint Ventures की संभावनाओं पर बातें होती हैं। स्वामीनारायण मंदिर ने इस संभावना में भी एक नया आयाम जोड़ा है। यह मंदिर 'मेड इन इंडिया' है और 'बिल्ट इन फ्रांस' है। इसके काफी पत्थरों को भारत में तराशा गया है। भारत की प्राचीन प्रतिभा यहाँ फ्रांस में आधुनिक इंजीनियरिंग से आकर जुड़ चुकी है। पेरिस में इस भव्य मंदिर ने आकार लिया है। इसलिए, मैं आशा करता हूँ, यह मंदिर सदियों तक भारत और फ्रांस के बीच सहयोग और संभावनाओं का भी प्रतीक बनकर उभरेगा।

साथियों,

स्वामीनारायण मंदिर हमेशा से भक्ति के साथ-साथ सेवा का माध्यम भी रहे हैं। मुझे बताया गया है, यह मंदिर भी सेवा प्रकल्पों का वैसा ही केंद्र बनेगा। मुझे विश्वास है कि यहाँ से भारतीय संस्कृति के जो स्वर निकलेंगे, उनका लाभ पूरे यूरोप में लोगों को मिलेगा। भविष्य में मुझे जब भी समय मिलेगा, मैं इस मंदिर में दर्शन करने का प्रयास अवश्य करूंगा। इन्हीं शब्दों के साथ, एक बार फिर आज के इस लोकार्पण समारोह में सम्मिलित सभी अतिथिगणों को, सभी परिवारों को, सभी हरि भक्तों को और पूरी Indian Diaspora को मेरी ओर से इस शुभारंभ पर्व की ढेरों शुभकामनाएं!

बहुत-बहुत धन्यवाद!

मर्सी बोकू!

जय स्वामीनारायण!