मेरे अटल जी

Published By : Admin | August 17, 2018 | 09:09 IST

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है। 

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।   

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।  

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। आंधियों में भी दीये जलाने की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं...हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी” 

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे - स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष हैयह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

 

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए। उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।  

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध। 

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

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भारताच्या एकात्मतेसाठी आणि प्रगतीसाठी समर्पित जीवन
July 06, 2026

आज सहा जुलै, राष्ट्रवाद आणि निस्वार्थ सेवेचा आदर्श मानणाऱ्या, त्यांची जपणूक करणाऱ्या सर्व लोकांसाठी आजचा दिवस विशेष आहे. आज डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यांची 125वी जयंती आहे. भारत मातेच्या सेवेप्रती कटिबद्धता आणि धैर्य यांचे ते कालातीत मूर्तिमंत उदाहरण आहेत. आधुनिक भारताच्या इतिहासात, असे अगदी कमी लोक आहेत, ज्यांच्यात बुद्धीमत्ता, सार्वजनिक सेवाभाव आणि नैतिक दृढनिश्चय यांचा संगम आढळतो, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी त्यांच्यापैकीच एक आहेत.

श्यामाप्रसाद मुखर्जी यांचा जन्म अशा परिस्थितीत झाला होता, जिथे, त्यांना सहज एक आरामदायी आणि सुरक्षित आयुष्य मिळू शकले असते. त्यांचे पिता, सर आशुतोष मुखर्जी, त्या काळातील एक आघाडीचे शिक्षणतज्ज्ञ आणि प्रखर बुद्धिवादी होते. नियतीने त्यांना, एक अत्यंत उच्चभ्रू, सुखासीन आयुष्य दिले असले, तरी त्यांच्यातील विवेकाने, त्यांना देशसेवा आणि त्यागाचा मार्ग दाखवला. त्या काळातील अत्यंत अस्थिर परिस्थितीत आपण केवळ बघ्याची भूमिका घेऊ शकत नाही, असा कौल त्यांच्या मनाने त्यांना दिला. मग ती वसाहतवादी शक्तींशी लढाई असो, जातीवाद, धर्मभेद किंवा मग मानवतेसमोरची आव्हाने असोत, अथवा इतर काही. त्यांच्या या प्रवासात त्यांना वैयक्तिक आयुष्यात अनेक संकटे, दु:खाचा सामना करावा लागला, यात अगदी त्यांचं बाळ आणि नंतर त्यांच्या पत्नीचे झालेले देहावसान, अशा अपार दु:खाच्या प्रसंगांचा त्यांना सामना करावा लागला. मात्र अशा सगळ्या दु:खांनी, त्यांचा दृढनिश्चय अधिक वाढवला आणि देशाची सेवा करण्याची कटिबद्धता अधिक दृढ केली.

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यांच्या सार्वजनिक जीवनातील एक आदर्श, जो या सगळ्या गुणांच्या वर होता, असे सांगायचे झाले, तर तो आदर्श गुण ठरेल, अखंड भारताप्रती त्यांची निष्ठा! फाळणीच्या गदारोळात, हिंसाचारातही, पश्चिम बंगाल हा भारताचा अविभाज्य घटक राहील, यासाठी ते पाय घट्ट रोवून उभे राहिले. काही वर्षांनी, त्यांच्या याच अखंडतेच्या ध्यासाने, ते जम्मू आणि काश्मीरला गेले. तिथे झालेला तुरुंगवास ही त्यांना त्यांच्या ध्येयापासून परावृत्त करु शकला नाही. मात्र, याच तुरुंगवासात त्यांचा अकाली मृत्यू झाला. तुरुंगावासात, अशा ठिकाणी..एकटेपणात.. ज्या लाखो लोकांचं आयुष्य त्यांनी स्वतःचे आयुष्य बनवले होते, अशा सगळ्या मोलाच्या माणसांपसून दूर. इतिहासात असे काही क्षण येतात, जेव्हा एखाद्या व्यक्तीच्या सर्वोच्च बलिदानामुळे ती व्यक्ती राजकारणाच्या पलीकडे जाते आणि त्यांचे कर्तव्य, एका राष्ट्रीय स्मृती ठरतात. आचार्य विनोबा भावे एकदा असे म्हणाले होते की, ज्या तत्वावर श्यामाप्रसाद मुखर्जी यांचा दृढविश्वास होता, त्यासाठी त्यांनी आपल्या स्वतःचे बलिदान दिले. या घटनेनंतर अनेक वर्षांनी, कलम 370 आणि अनुच्छेद 35 (अ) हटवणे (2019 चा कायदा), ही त्यांच्या बलिदानाला दिलेली सर्वोच्च मानवंदना होती.

डॉ. मुखर्जी यांनी, कायमच भारताला आणि भारतीय मूल्यांना प्रथमस्थानी ठेवले. त्यासाठी त्यांनी त्या काळातील प्रचलित विचारसरणींना छेद देणाऱ्या संस्था उभारून आणि सक्षम व्यवस्था घडवून हे सिद्ध केले. ते कलकत्ता विद्यापीठाचे सर्वांत तरुण कुलगुरू बनले. आपल्या वैशिष्ट्यपूर्ण कार्यशैलीद्वारे त्यांनी देशभक्तीची प्रेरणा देणारे आणि भविष्याची दृष्टी असलेले सकारात्मक बदल घडवून आणले. शिक्षणतज्ज्ञांच्या एका परिषदेला संबोधित करताना डॉ. मुखर्जी यांनी अतिशय समर्पक शब्दांत म्हटले होते की, शैक्षणिक संस्थांकडे संभाव्य कारकून आणि अल्प वेतनावर काम करणारे कर्मचारी तयार करणारे कारखाने म्हणून पाहणे चुकीचे आहे. नगरपालिका, प्रांतीय आणि केंद्रीय विधिमंडळे यांसारख्या आपल्या स्वशासित संस्थांना नेतृत्व देण्यास सक्षम असलेले, तसेच वित्तीय, व्यापारी आणि औद्योगिक अशा जीवनाच्या विविध क्षेत्रांतील कामकाजाचे संचालन करू शकणारे विद्यार्थी घडविणे आवश्यक आहे.

त्यांच्या नेतृत्वाखाली कलकत्ता विद्यापीठाने ग्रंथालयाच्या पायाभूत सुविधांमध्ये सुधारणा करणे, विज्ञान विषयातील संशोधनाला चालना देणे, पुरावस्तूंच्या अध्ययनाला प्रोत्साहन देणे तसेच कृषी विषयातील अभ्यासक्रम सुरू करणे, अशा अनेक वैशिष्ट्यपूर्ण उपक्रमांची अंमलबजावणी केली. त्यांनी क्रीडा, शिक्षक प्रशिक्षण आणि विद्यार्थी कल्याण यांसारख्या क्षेत्रांकडेही विशेष लक्ष वेधले. विद्यार्थी आणि माजी विद्यार्थ्यांमध्ये विद्यापीठाबद्दल अभिमानाची भावना निर्माण व्हावी, यासाठी त्यांनी 24 जानेवारी हा दिवस विद्यापीठाचा स्थापना दिन म्हणून साजरा करण्याची परंपरा सुरू केली. विद्यापीठासाठी गीत रचण्याची विनंती त्यांनी थेट गुरुदेव रवींद्रनाथ टागोर यांनाच केली होती.

त्यांच्या आयुष्याच्या उत्तरार्धात त्यांनी भारतीय जनसंघाची स्थापना करण्याचा निर्णय घेतला, त्यातूनही हीच भावना दिसून येते. त्या काळात काँग्रेस पक्षाचे सगळीकडे वर्चस्व असताना, भारताच्या प्रगतीसाठी आपल्या सांस्कृतिक मुळांशी जोडलेले राहून पर्यायी आवाज उभा राहणे अधिक आवश्यक असल्याचे त्यांना वाटत होते. कदाचित म्हणूनच त्या पक्षाचे निवडणूक चिन्ह मातीचा दिवा होते. एक दिवा दिसायला साधा वाटू शकतो; मात्र स्वतःच्या मर्यादेपेक्षा कितीतरी अधिक अंधार दूर करण्याची क्षमता त्याच्यामध्ये असते. जनसंघाने आपल्या कार्यरत असलेल्या काळात आणि त्यानंतरही नेमके हेच कार्य केले.

भारताचे पहिले उद्योग आणि पुरवठा मंत्री म्हणून डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी यांचा कार्यकाळ हा विकासाविषयी अत्यंत व्यापक आणि मानवतावादी दृष्टिकोन असलेल्या एका नेत्याचे दर्शन घडवतो. नव्याने स्वतंत्र झालेल्या राष्ट्राचा सन्मान, संधी आणि आत्मविश्वास पुनर्स्थापित करण्याचे साधन म्हणून त्यांनी उद्योगांकडे पाहिले. संपत्तीची निर्मिती आणि मूल्यवर्धन यांचा त्यांनी आदर केला. दामोदर व्हॅली कॉर्पोरेशन, सिंद्री खत प्रकल्प आणि भक्कम औद्योगिक धोरण यांसारख्या अग्रणी उपक्रमांद्वारे आधुनिक औद्योगिक भारताचा पाया रचत असतानाच, भारताच्या पारंपरिक सामर्थ्याकडे दुर्लक्ष होणार नाही, याचीही त्यांनी खात्री केली. हातमाग, कुटीर उद्योग, कारागीर आणि वस्त्रोद्योगातील कामगार यांनाही त्यांच्यामध्ये तितकाच कटिबद्ध पुरस्कर्ता लाभला.

याठिकाणी मला एक वैयक्तिक अनुभव सांगायचा आहे. आत्मनिर्भरतेच्या स्पष्ट दृष्टिकोनातून डॉ. मुखर्जी यांनी प्रयत्नपूर्वक उभारलेल्या सिंद्री खत प्रकल्पाकडे अनेक दशके देशाचे नेतृत्व करणाऱ्यांनी दुर्लक्ष केले. मला याचा अभिमान वाटतो की, आमच्या सरकारला या परंपरेच्या पुनरुज्जीवनात योगदान देण्याची संधी मिळाली. त्या कार्यक्रमात उपस्थित राहणे हा खरोखरच सर्वात विशेष क्षणांपैकी एक होता.

भारताच्या सांस्कृतिक परंपरेने फार पूर्वीपासून संवाद आणि चर्चांना महत्त्व दिले आहे. डॉ. मुखर्जी यांनी याच लोकशाही मूल्यांचे प्रतिनिधित्व केले होते. सुरुवातीच्या काळात राष्ट्र उभारणीचे कार्य राजकीय मतभेदांच्या पलीकडचे आहे, असा विश्वास बाळगून ते पंडित नेहरूंच्या मंत्रिमंडळात सामील झाले. त्यांनी प्रामाणिकपणे आणि विधायक भावनेने काम केले; परंतु जेव्हा त्यांना वाटले की राष्ट्रीय महत्त्वाच्या प्रश्नांसाठी वेगळ्या मार्गाची आवश्यकता आहे, तेव्हा त्यांनी सन्मानाने पदाचा त्याग केला आणि राष्ट्राला आवश्यक असलेल्या राजकीय कार्यासाठी स्वतःला पूर्णपणे वाहून घेतले.

75 वर्षांपूर्वी, पंडित नेहरूंनी पहिले घटनादुरुस्ती विधेयक आणले, जे अभिव्यक्ती स्वातंत्र्यावर थेट आघात करणारे होते. डॉ. मुखर्जी हे त्याच्या सर्वात कट्टर विरोधकांपैकी एक होते. काँग्रेस काय करू शकते, याची त्यांना पूर्ण जाणीव होती. आणि पुढील घडामोडींनी त्यांची भूमिका योग्य असल्याचे सिद्ध केले. ज्यांनी 75 वर्षांपूर्वी पहिले घटनादुरुस्ती विधेयक आणले, त्यांनीच 1975 मध्ये आणीबाणी लादली आणि त्यानंतर 50 वर्षांपूर्वी 42वी घटनादुरुस्ती करून उदारमतवादी लोकशाही मूल्यांच्या मुळावरच घाव घातला.

डॉ. मुखर्जी त्यांचा मानवतावादी कार्यासाठीही ओळखले जातात. 1943 मध्ये जेव्हा बंगालमध्ये भीषण दुष्काळ पडला, तेव्हा डॉ. मुखर्जींनी स्वतःला पीडितांच्या सेवेत झोकून दिले. लोकांना अन्न मिळावे, यासाठी त्यांनी अनेक उपहारगृहे आणि मदत केंद्रे उघडली जातील याची खात्री केली. एकीकडे ते आपल्या लोकांच्या दुर्दशेने अत्यंत व्यथित झाले होते, तर दुसरीकडे वसाहतवादी शासकांच्या असंवेदनशीलतेमुळे ते व्यथित झाले होते. त्यांनी ‘पंचशेर मनवंतर’ नावाचे एक पुस्तकही लिहिले, ज्यात त्यांनी आपली व्यथा मांडली. 1942 मध्ये जेव्हा मेदिनीपूरला महाचक्रीवादळाचा तडाखा बसला, तेव्हा परिस्थिती पूर्ववत करण्यासाठी त्यांनी केलेल्या प्रयत्नांची सर्वत्र प्रशंसा झाली.

कोलकाता येथील एका महाविद्यालयात बोलताना डॉ. मुखर्जी यांनी तरुणांना आवाहन केले, “तुम्ही जे काही काम हाती घ्याल, ते गांभीर्याने, सखोलपणे आणि उत्तमरित्या करा; ते कधीही अर्धवट किंवा अपूर्ण सोडू नका, आणि जोपर्यंत तुम्ही तुमचे सर्वोत्तम योगदान देत नाही, तोपर्यंत समाधानी राहू नका.”

भारत देश ‘विकसित भारता’च्या ध्येयाकडे वाटचाल करत असताना, त्यांनी ज्या मजबूत, एकसंध, आत्मविश्वासी आणि करुणामय भारतावर दृढ विश्वास ठेवला होता, तो घडवण्यासाठी दररोज प्रयत्न करणे, हीच त्यांच्या स्मृतीला वाहीलेली सर्वोत्तम आदरांजली आहे. आजच्या तरुण पिढीवर माझा पूर्ण विश्वास आहे की ते या आवाहनाला समर्थन देतील.