मेरे अटल जी

Published By : Admin | August 17, 2018 | 09:09 IST

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है। 

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।   

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।  

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। आंधियों में भी दीये जलाने की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं...हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी” 

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे - स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष हैयह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

 

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए। उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।  

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध। 

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

Explore More
Today, the entire country and entire world is filled with the spirit of Bhagwan Shri Ram: PM Modi at Dhwajarohan Utsav in Ayodhya

பிரபலமான பேச்சுகள்

Today, the entire country and entire world is filled with the spirit of Bhagwan Shri Ram: PM Modi at Dhwajarohan Utsav in Ayodhya
Economic Survey 2026: Mobile Manufacturing Drives India Electronics Exports To Rs 5.12 Lakh Crore

Media Coverage

Economic Survey 2026: Mobile Manufacturing Drives India Electronics Exports To Rs 5.12 Lakh Crore
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
காசி-தமிழ் சங்கமம் மற்றும் 'ஏக் பாரத், ஸ்ரேஷ்ட பாரத்'-திற்கு (ஒரு பாரதம், வலுவான பாரதம்) அஞ்சலி
January 15, 2026

1026-ம் ஆண்டு நடத்தப்பட்ட சோம்நாத் மீதான முதல் தாக்குதலின் ஆயிரம் ஆண்டுகள் நிறைவடைந்ததைக் குறிக்கும் வகையில் சில நாட்களுக்கு முன் நடைபெற்ற சோம்நாத் சுயமரியாதை விழாவில் பங்கேற்க நான் புனித பூமியான சோம்நாத் சென்றிருந்தேன். வரலாறு, கலாச்சாரம், இந்திய மக்களின் நீடித்த மனவுணர்வு ஆகியவற்றின் மீது பகிரப்பட்ட மரியாதையால் ஒன்றுகூடிய இந்த நினைவு நிகழ்வில் இந்தியா முழுவதிலுமிருந்து மக்கள் கலந்து கொண்டனர். இந்த நிகழ்ச்சியின் போது, சௌராஷ்டிரா-தமிழ் சங்கமத்தின் போது சோம்நாத்துக்கு வந்திருந்த சிலரையும், காசி-தமிழ் சங்கமத்தின் போது காசிக்கு வந்திருந்த சிலரையும் நான் சந்தித்தேன். இதுபோன்ற நிகழ்வுகளுக்கு அவர்கள் அளித்த பாராட்டு வார்த்தைகள் என்னை நெகிழச்செய்தன. எனவே, இந்த விஷயத்தில் சில எண்ணங்களை நான் பகிர்ந்து கொள்ள நினைத்தேன்.

தமிழ் கற்காமல் இருப்பது என் வாழ்க்கையின் மிகப்பெரிய வருத்தம் என்று மனதின் குரல் நிகழ்ச்சியின் போது நான் கூறியிருந்தேன். அதிர்ஷ்டவசமாக, கடந்த சில ஆண்டுகளில், இந்தியா முழுவதும் தமிழ்க் கலாச்சாரத்தை மேலும் பிரபலப்படுத்தவும், 'ஒரே பாரதம், உன்னத பாரதம்' என்ற உணர்வை ஆழப்படுத்தவும் எங்கள் அரசுக்கு பல வாய்ப்புகள் கிடைத்துள்ளன. அத்தகைய முயற்சிக்கு ஒரு சிறந்த உதாரணம் காசி-தமிழ் சங்கமம். நமது பண்பாட்டில், சங்கம் அல்லது சங்கமம் ஒரு சிறப்பிடத்தைப் பெற்றுள்ளது. இந்த வெளிச்சத்தில் பார்க்கும்போது, காசி-தமிழ் சங்கமம் உண்மையில் தனித்துவ முயற்சியாக விளங்குகிறது. இது இந்தியாவின் பல மரபுகளில் வாழும் ஒற்றுமையைக் கொண்டாடுகிறது. அதே நேரத்தில் அவற்றின் தனித்துவ அடையாளங்களை மதிக்கிறது.

அத்தகைய சங்கமத்தை நடத்துவதற்குக் காசியை விட சிறந்த இடம் எதுவாக இருக்க முடியும்? பழங்காலத்திலிருந்தே நாகரிகத்தின் நங்கூரமாகத் திகழ்ந்து வரும் அதே காசிக்கு... ஆயிரக்கணக்கான ஆண்டுகளாக, எல்லா இடங்களிலிருந்தும் மக்கள் அறிவையும், வாழ்க்கை அனுபவத்தையும், மோட்சத்தையும் தேடி வந்துள்ளனர்.

தமிழ் மக்களுடனும் கலாச்சாரத்துடனும் காசியின் தொடர்பு மிகவும் ஆழமானது. காசியில் உறைந்துள்ள பகவான் விஸ்வநாதர் தமிழ்நாட்டின் ராமேஸ்வரத்தில் உறைகிறார். தமிழ்நாட்டில் உள்ள தென்காசி, தெற்கின் காசி அல்லது தட்சிண காசி என்று அழைக்கப்படுகிறது. துறவி குமரகுருபர சுவாமிகள் தனது ஆன்மீகம், புலமை மற்றும் நிறுவனக் கட்டுமானம் மூலம் காசிக்கும் தமிழ்நாட்டிற்கும் இடையே நீடித்த தொடர்பை உருவாக்கினார். தமிழ்நாட்டின் மிகச்சிறந்த புதல்வர்களில் ஒருவரான மகாகவி சுப்பிரமணிய பாரதி, காசியில் அறிவுசார் வளர்ச்சி மற்றும் ஆன்மீக விழிப்புணர்வுக்கான இடத்தைக் கண்டார். அவரது தேசியவாதம் ஆழமாகி, அவரது கவிதை கூர்மையானது. சுதந்திரமான, ஒன்றுபட்ட இந்தியா பற்றிய அவரது பார்வை தெளிவான வடிவம் பெற்றது இங்குதான். காசிக்கும் தமிழ்நாட்டிற்கும் நெருக்கமான பிணைப்பை எடுத்துக்காட்டும் இதுபோன்ற பல நிகழ்வுகள் உள்ளன.

காசி-தமிழ் சங்கமத்தின் முதல் நிகழ்வு 2022-ல் நடைபெற்றது. தொடக்க விழாவில் கலந்து கொண்டதை நான் நினைத்துப்பார்க்கிறேன். தமிழ்நாட்டிலிருந்து அறிஞர்கள், கைவினைஞர்கள், மாணவர்கள், விவசாயிகள், எழுத்தாளர்கள், தொழில் வல்லுநர்கள் மற்றும் பலர் காசி, பிரயாக்ராஜ் மற்றும் அயோத்திக்கு பயணம் செய்தனர்.

அடுத்தடுத்த நிகழ்வுகள் இந்த முயற்சியின் அளவையும் ஆழத்தையும் விரிவுபடுத்தின. புதிய கருப்பொருள்கள், புதுமையான வடிவங்கள் மற்றும் ஆழமான ஈடுபாட்டை அறிமுகம் செய்வதே இதன் நோக்கமாக இருந்தது. சங்கமம், அதன் முக்கிய உணர்வில் வேரூன்றி தொடர்ந்து மேம்படுவதை இது உறுதி செய்தது. 2023-ம் ஆண்டின் இரண்டாவது நிகழ்வில், மக்களுக்கு மொழி ஒரு தடையாக மாறாமல் இருப்பதை உறுதி செய்ய தொழில்நுட்பம் பெரிய அளவில் பயன்படுத்தப்பட்டது. மூன்றாவது நிகழ்வில், இந்திய அறிவுமுறைகள் மீது கவனம் செலுத்தப்பட்டது. அதே நேரத்தில், கல்வி சார்ந்த விவாதங்கள், கலாச்சார நிகழ்ச்சிகள், கண்காட்சிகள் மற்றும் கலந்துரையாடல்கள் அதிக அளவிலான பங்கேற்புக்கு எடுத்துக்காட்டாக விளங்கின. ஆயிரக்கணக்கான மக்கள் இந்த நிகழ்வுகளில் பங்கேற்றனர்.

காசி தமிழ் சங்கமத்தின் நான்காவது ஆண்டு நிகழ்வுகள் 2025 டிசம்பர் 2 அன்று தொடங்கியது. இந்த ஆண்டு தேர்ந்தெடுக்கப்பட்ட கருப்பொருள் மிகவும் சுவாரஸ்யமானது. தமிழ் கற்கலாம் என்ற அந்த கருப்பொருள் காசியிலும் அருகில் உள்ள பகுதிகளிலும் உள்ள மக்களுக்கு அழகான தமிழ் மொழியைக் கற்றுக்கொள்ள ஒரு தனித்துவமான வாய்ப்பை வழங்கியது. தமிழ்நாட்டிலிருந்து ஆசிரியர்கள் காசிக்கு வந்தனர். காசியைச் சேர்ந்த மாணவர்கள் மிகவும் மறக்கமுடியாத அனுபவத்தைப் பெற்றனர்! இந்த முறை பல சிறப்பு நிகழ்வுகளுக்கும் ஏற்பாடுகள் செய்யப்பட்டன.

தொல்காப்பியம், 4 இந்திய மொழிகளிலும் 6 வெளிநாட்டு மொழிகளிலும் மொழிபெயர்க்கப்பட்டது.

தென்காசியில் இருந்து காசிக்கு ஒரு தனித்துவமான நிகழ்வாக அகத்திய முனிவர் வாகனப் பேரணி மேற்கொள்ளப்பட்டது. வழியில், கண் மருத்துவ முகாம்கள், சுகாதார விழிப்புணர்வு முகாம்கள், டிஜிட்டல் எழுத்தறிவு முகாம்கள் போன்ற பல்வேறு இயக்கங்கள் நடத்தப்பட்டன. கலாச்சார ஒற்றுமையின் செய்தியைப் பரப்பிய பாண்டிய மன்னர் அதி வீர பராக்கிரம பாண்டியனுக்கு இந்தப் பேரணி அஞ்சலி செலுத்தியது. நமோ படித்துறையில் கண்காட்சிகள், பனாரஸ் இந்து பல்கலைக்கழகத்தில் கல்வி அமர்வுகள், கலாச்சார நிகழ்ச்சிகள் போன்றவையும் நடைபெற்றன.

காசி தமிழ் சங்கமத்தில் எனக்கு மிகவும் மகிழ்ச்சியைத் தரும் விஷயங்களில் ஒன்று ஆயிரக்கணக்கான இளைஞர்கள் பங்கேற்பதாகும். நமது வேர்களுடன் தங்கள் தொடர்பை ஆழப்படுத்த வேண்டும் என்ற நமது இளைஞர் சக்தியின் ஆர்வத்தை இது எடுத்துக்காட்டுகிறது. இதில் நடைபெற்ற பல்வேறு கலாச்சார நிகழ்ச்சிகளின் போது தங்கள் திறமையையும் படைப்பாற்றலையும் வெளிப்படுத்த இது ஒரு சிறந்த தளமாகவும் அமைந்தது.

காசி தமிழ் சங்கமத்தின்போது மேற்கொண்ட காசி பயணத்தை மறக்கமுடியாத சிறப்பான பயணமாக மாற்ற முயற்சிகள் மேற்கொள்ளப்பட்டுள்ளன. தமிழ்நாட்டிலிருந்து உத்தரபிரதேசத்திற்கு மக்களை அழைத்துச் செல்ல இந்திய ரயில்வே சிறப்பு ரயில்களை இயக்கியது. பல ரயில் நிலையங்களில், குறிப்பாக தமிழ்நாட்டில், அவர்கள் உற்சாகப்படுத்தப்பட்டனர். ரயில் பயணத்தில் மெல்லிசைப் பாடல்கள் ஒலிக்கச் செய்ததுடன், உரையாடல்களும் நடைபெற்றன.

காசி தமிழ் சங்கமத்தில் பங்கேற்றவர்களுக்குக் காட்டப்பட்ட அரவணைப்புக்காகவும் சிறந்த விருந்தோம்பலுக்காகவும் காசியையும் உத்தரபிரதேசத்தையும் சேர்ந்த எனது சகோதர, சகோதரிகளைப் நான் பாராட்ட விரும்புகிறேன். தமிழ்நாட்டிலிருந்து வந்த விருந்தினர்களுக்காக பலர் தங்கள் வீடுகளின் கதவுகளைத் திறந்து வரவேற்றனர். விருந்தினர்கள் தடையற்ற சிறந்த அனுபவத்தைப் பெறுவதை உறுதிசெய்ய உள்ளூர் நிர்வாகம் 24 மணி நேரமும் உழைத்தது. வாரணாசி மக்களவைத் தொகுதியின் உறுப்பினரான நான் இதில் பெருமைப்படாமல் இருக்க முடியாது!

இந்த முறை, காசி-தமிழ் சங்கமத்தின் நிறைவு விழா ராமேஸ்வரத்தில் நடைபெற்றது. அதில் குடியரசுத் துணைத்தலைவரும் தமிழ்நாட்டின் பெருமைமிகு மைந்தருமான திரு சி.பி. ராதாகிருஷ்ணன் கலந்து கொண்டார். இந்தியாவின் ஆன்மீக மகத்துவத்தையும், தேசிய ஒருங்கிணைப்பையும் இத்தகைய தளங்கள் எவ்வாறு ஆழப்படுத்துகின்றன என்பதை எடுத்துரைத்து, மிகவும் ஊக்கமளிக்கும் உரையை அவர் நிகழ்த்தினார்.

காசி - தமிழ் சங்கமம் கலாச்சார புரிதலை வலுப்படுத்தி, மக்களிடையே பரிமாற்றங்களை வளர்க்கிறது. அத்துடன் நாட்டின் வெவ்வேறு பகுதிகளுக்கு இடையே நிலையான பிணைப்புகளை உருவாக்கி ஆரோக்கியமான விளைவுகளை இது ஏற்படுத்துகிறது. வரும் காலங்களில், இதை இன்னும் துடிப்பானதாக மாற்ற விரும்புகிறோம். மிக முக்கியமாக, இது 'ஒரே பாரதம், உன்னத பாரதம்' என்ற உணர்வை வலுவாக வளர்த்துள்ளது. இந்த உணர்வு பல நூற்றாண்டுகளாக நமது பண்டிகைகள், இலக்கியம், இசை, கலை, உணவு வகைகள், கட்டடக்கலை, அறிவுசார் அமைப்புகள் என பலவற்றின் மூலம் செழித்து வளர்ந்துள்ளது.

இந்த ஆண்டு இந்தக் காலகட்டம் இந்தியா முழுவதும் உள்ள மக்களுக்கு மிகவும் புனிதமான பண்டிகைக் காலமாகும். சூரியன், இயற்கை, விவசாயம் ஆகியவற்றுடன் தொடர்புடைய சங்கராந்தி, உத்தராயண், பொங்கல், மஹா பிஹு போன்ற பல்வேறு பண்டிகைகளை மக்கள் உற்சாகமாகக் கொண்டாடுகின்றனர். இந்தப் பண்டிகைகள் மக்களை ஒருங்கிணைத்து, நமது சமூகத்தில் நல்லிணக்க உணர்வை வலுப்படுத்துகின்றன. இந்தப் பண்டிகைகளையொட்டி மக்களுக்கு எனது வாழ்த்துகளைத் தெரிவித்துக் கொள்கிறேன். இதுபோன்ற பண்டிகைகள், நமது பகிரப்பட்ட பாரம்பரியத்தையும், கூட்டுப் பங்கேற்பையும், தேசிய ஒற்றுமையையும் வலுப்படுத்தி, தொடர்ந்து நம்மை ஊக்குவிக்கும் என்று நான் உறுதியாக நம்புகிறேன்.