मेरे अटल जी

Published By : Admin | August 17, 2018 | 09:09 IST

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है। 

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।   

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।  

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। आंधियों में भी दीये जलाने की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं...हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी” 

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे - स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष हैयह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

 

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए। उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।  

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध। 

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

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ਭਾਰਤ ਦੀ ਏਕਤਾ ਅਤੇ ਪ੍ਰਗਤੀ ਲਈ ਸਮਰਪਿਤ ਜੀਵਨ
July 06, 2026

ਅੱਜ, 6 ਜੁਲਾਈ ਦਾ ਦਿਨ ਰਾਸ਼ਟਰਵਾਦ ਅਤੇ ਨਿਰਸਵਾਰਥ ਸੇਵਾ ਦੇ ਆਦਰਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਮੰਨਣ ਵਾਲੇ ਅਣਗਿਣਤ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਖ਼ਾਸ ਦਿਨ ਹੈ। ਅਸੀਂ ਡਾ. ਸ਼ਿਆਮਾ ਪ੍ਰਸਾਦ ਮੁਖਰਜੀ ਦੀ 125ਵੀਂ ਜਨਮ ਵਰ੍ਹੇਗੰਢ ਮਨਾ ਰਹੇ ਹਾਂ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜੀਵਨ ਮਾਂ ਭਾਰਤੀ ਪ੍ਰਤੀ ਹੌਸਲੇ ਅਤੇ ਅਟੁੱਟ ਵਚਨਬੱਧਤਾ ਦੀ ਸਦੀਵੀ ਮਿਸਾਲ ਹੈ। ਆਧੁਨਿਕ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਡਾ. ਸ਼ਿਆਮਾ ਪ੍ਰਸਾਦ ਮੁਖਰਜੀ ਵਰਗੇ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਨੇਤਾ ਹੋਏ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਬੁੱਧੀ, ਲੋਕ ਸੇਵਾ ਅਤੇ ਨੈਤਿਕ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਦਾ ਅਜਿਹਾ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਸੁਮੇਲ ਦੇਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਹੈ।

ਨੌਜਵਾਨ ਸ਼ਿਆਮਾ ਪ੍ਰਸਾਦ ਦਾ ਜਨਮ ਅਜਿਹੇ ਹਾਲਾਤ ਵਿੱਚ ਹੋਇਆ ਸੀ, ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਸਾਨੀ ਨਾਲ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਅਤੇ ਆਰਾਮਦਾਇਕ ਜੀਵਨ ਦੇ ਸਕਦੇ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪਿਤਾ, ਸਰ ਆਸ਼ੂਤੋਸ਼ ਮੁਖਰਜੀ, ਆਪਣੇ ਵੇਲੇ ਦੇ ਉੱਘੇ ਸਿੱਖਿਆ ਸ਼ਾਸਤਰੀਆਂ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸਨ। ਕਿਸਮਤ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਅੱਗੇ ਸੁੱਖ-ਸਹੂਲਤਾਂ ਵਾਲਾ ਰਸਤਾ ਰੱਖਿਆ ਸੀ, ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਜ਼ਮੀਰ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕੁਰਬਾਨੀ ਅਤੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੇਵਾ ਦੇ ਰਾਹ ਵੱਲ ਤੋਰਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪੱਕਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਆਪਣੇ ਸਮੇਂ ਦੀਆਂ ਉੱਥਲ-ਪੁਥਲ ਭਰੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਦੇ ਮੂਕ ਦਰਸ਼ਕ ਨਹੀਂ ਬਣ ਸਕਦੇ, ਭਾਵੇਂ ਉਹ ਬਸਤੀਵਾਦ, ਫਿਰਕੂਵਾਦ ਜਾਂ ਮਾਨਵਤਾਵਾਦੀ ਚੁਣੌਤੀਆਂ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਲੜਾਈ ਹੀ ਕਿਉਂ ਨਾ ਹੋਵੇ। ਇਸ ਸਫ਼ਰ ਦੌਰਾਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਬਹੁਤ ਡੂੰਘੇ ਨਿੱਜੀ ਦੁੱਖ ਵੀ ਝੱਲੇ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਛੋਟੇ ਬੱਚੇ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪਤਨੀ ਦੀ ਮੌਤ ਸ਼ਾਮਲ ਸੀ। ਪਰ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੁੱਖਾਂ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਇਰਾਦਾ ਹੋਰ ਪੱਕਾ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਸੇਵਾ ਕਰਨ ਦੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਟੁੱਟ ਵਚਨਬੱਧਤਾ ਹੋਰ ਮਜ਼ਬੂਤ ਕੀਤੀ।

ਜੇ ਕੋਈ ਅਜਿਹਾ ਆਦਰਸ਼ ਸੀ, ਜਿਸ ਨੇ ਡਾ. ਸ਼ਿਆਮਾ ਪ੍ਰਸਾਦ ਮੁਖਰਜੀ ਦੇ ਜਨਤਕ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਪ੍ਰਭਾਸ਼ਿਤ ਕੀਤਾ, ਤਾਂ ਉਹ ਭਾਰਤ ਦੀ ਅਖੰਡਤਾ ਸੀ। ਦੇਸ਼ ਦੀ ਵੰਡ ਦੀ ਉੱਥਲ-ਪੁਥਲ ਦੌਰਾਨ ਉਹ ਇਸ ਗੱਲ ਨੂੰ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਡਟੇ ਰਹੇ ਕਿ ਪੱਛਮੀ ਬੰਗਾਲ ਭਾਰਤ ਦਾ ਅਨਿੱਖੜਵਾਂ ਅੰਗ ਬਣਿਆ ਰਹੇ। ਕੁਝ ਸਾਲਾਂ ਬਾਅਦ, ਇਹੀ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜੰਮੂ-ਕਸ਼ਮੀਰ ਲੈ ਗਿਆ। ਜੇਲ੍ਹ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਰੋਕ ਨਹੀਂ ਸਕੀ ਅਤੇ ਇਕਾਂਤਵਾਸ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਇਰਾਦਾ ਕਮਜ਼ੋਰ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਿਆ। ਨਜ਼ਰਬੰਦੀ ਦੌਰਾਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜੀਵਨ ਅਚਾਨਕ ਖਤਮ ਹੋ ਗਿਆ; ਉਹ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਅਣਗਿਣਤ ਲੋਕਾਂ ਤੋਂ ਬਹੁਤ ਦੂਰ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੱਕਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਲੜਾਈ ਬਣਾ ਲਿਆ ਸੀ। ਇਤਿਹਾਸ ਵਿੱਚ ਅਜਿਹੇ ਪਲ ਆਉਂਦੇ ਹਨ, ਜਦੋਂ ਕਿਸੇ ਵਿਅਕਤੀ ਦੀ ਆਖਰੀ ਕੁਰਬਾਨੀ ਰਾਜਨੀਤੀ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਉੱਠ ਕੇ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਯਾਦ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਦੀ ਆਖਰੀ ਯਾਤਰਾ ਅਜਿਹਾ ਹੀ ਪਲ ਹੈ। ਅਚਾਰੀਆ ਵਿਨੋਬਾ ਭਾਵੇ ਨੇ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਨੇ ਉਸ ਉਦੇਸ਼ ਲਈ ਆਪਣੀ ਜਾਨ ਕੁਰਬਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤੀ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਅਥਾਹ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਸੀ। ਸਾਲਾਂ ਬਾਅਦ, 2019 ਵਿੱਚ ਧਾਰਾ 370 ਅਤੇ 35(ਏ) ਨੂੰ ਹਟਾਉਣਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਨੂੰ ਸੱਚੀ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸੀ।

ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਨੇ ਭਾਰਤ ਅਤੇ ਭਾਰਤੀ ਕਦਰਾਂ-ਕੀਮਤਾਂ ਨੂੰ ਪਹਿਲ ਦਿੱਤੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਹ ਕੰਮ ਅਜਿਹੀਆਂ ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਦੀ ਉਸਾਰੀ ਕਰਕੇ ਅਤੇ ਅਜਿਹੇ ਸਿਸਟਮ ਤਿਆਰ ਕਰਕੇ ਕੀਤਾ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੀ ਰਵਾਇਤੀ ਸੋਚ ਨੂੰ ਬਦਲ ਕੇ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ। ਉਹ ਕਲਕੱਤਾ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਘੱਟ ਉਮਰ ਦੇ ਵਾਈਸ ਚਾਂਸਲਰ ਬਣੇ। ਆਪਣੇ ਵਿਲੱਖਣ ਅੰਦਾਜ਼ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਅਜਿਹੇ ਸਕਾਰਾਤਮਕ ਬਦਲਾਅ ਲਿਆਂਦੇ ਜੋ ਦੇਸ਼ ਭਗਤੀ ਨਾਲ ਭਰੇ ਅਤੇ ਭਵਿੱਖਮੁਖੀ ਸਨ। ਸਿੱਖਿਆ ਮਾਹਰਾਂ ਦੀ ਇੱਕ ਕਾਨਫਰੰਸ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਨੇ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕਿਹਾ ਸੀ, “ਵਿੱਦਿਅਕ ਅਦਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਕਲਰਕ ਅਤੇ ਘੱਟ ਤਨਖ਼ਾਹ ਵਾਲਾ ਸਟਾਫ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਾਲੀਆਂ ਫੈਕਟਰੀਆਂ ਵਜੋਂ ਦੇਖਣਾ ਗਲਤ ਹੈ। ਸਾਨੂੰ ਅਜਿਹੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਤਿਆਰ ਕਰਨੇ ਪੈਣਗੇ, ਜੋ ਨਗਰ ਨਿਗਮਾਂ, ਸੂਬਾਈ ਅਤੇ ਕੇਂਦਰੀ ਵਿਧਾਨ ਸਭਾਵਾਂ ਵਰਗੀਆਂ ਸਾਡੀਆਂ ਸਵੈ-ਸ਼ਾਸਨ ਵਾਲੀਆਂ ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਨੂੰ ਅਗਵਾਈ ਦੇਣ ਦੇ ਸਮਰੱਥ ਹੋਣ ਤੇ ਨਾਲ ਹੀ ਜੀਵਨ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਖੇਤਰਾਂ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਵਿੱਤੀ, ਵਪਾਰਕ ਅਤੇ ਉਦਯੋਗਿਕ ਮਾਮਲਿਆਂ ਦਾ ਸੰਚਾਲਨ ਕਰ ਸਕਣ।”

ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਕਲਕੱਤਾ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਨੇ ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ ਦੇ ਬੁਨਿਆਦੀ ਢਾਂਚੇ ਵਿੱਚ ਸੁਧਾਰ ਕਰਨ, ਵਿਗਿਆਨ ਦੇ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਖੋਜ ਨੂੰ ਹੁਲਾਰਾ ਦੇਣ, ਪੁਰਾਤਨ ਵਸਤਾਂ ਦੇ ਅਧਿਐਨ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਕਰਨ ਅਤੇ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਕੋਰਸ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਵਰਗੇ ਕਈ ਵਿਲੱਖਣ ਉਪਰਾਲੇ ਕੀਤੇ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਖੇਡਾਂ, ਅਧਿਆਪਕਾਂ ਦੀ ਸਿਖਲਾਈ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੀ ਭਲਾਈ ਵਰਗੇ ਖੇਤਰਾਂ ਵੱਲ ਵੀ ਧਿਆਨ ਖਿੱਚਿਆ। ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਅਤੇ ਸਾਬਕਾ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਵਿੱਚ ਮਾਣ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ 24 ਜਨਵਰੀ ਨੂੰ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਸਥਾਪਨਾ ਦਿਵਸ ਵਜੋਂ ਮਨਾਉਣ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਕੀਤੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਗੁਰੂਦੇਵ ਟੈਗੋਰ ਨੂੰ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਲਈ ਗੀਤ ਲਿਖਣ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਵੀ ਕੀਤੀ।

ਇਸ ਜਜ਼ਬੇ ਦੀ ਇੱਕ ਹੋਰ ਮਿਸਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਅਗਲੇ ਪੜਾਅ ਵਿੱਚ ਦੇਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲਦੀ ਹੈ, ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਭਾਰਤੀ ਜਨ ਸੰਘ ਬਣਾਉਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ। ਅਜਿਹੇ ਸਮੇਂ ਜਦੋਂ ਕਾਂਗਰਸ ਪਾਰਟੀ ਦਾ ਹਰ ਪਾਸੇ ਬੋਲਬਾਲਾ ਸੀ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤਾ ਕਿ ਸਾਡੀਆਂ ਸੱਭਿਆਚਾਰਕ ਜੜ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਰਹਿੰਦਿਆਂ ਭਾਰਤ ਦੀ ਤਰੱਕੀ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਨ ਲਈ ਬਦਲਵੀਂ ਆਵਾਜ਼ ਦਾ ਹੋਣਾ ਬਹੁਤ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਪਾਰਟੀ ਦਾ ਚੋਣ ਨਿਸ਼ਾਨ ‘ਦੀਵਾ’, ਭਾਵ ਮਿੱਟੀ ਦਾ ਦੀਵਾ ਸ਼ਾਇਦ ਬਿਲਕੁਲ ਢੁਕਵਾਂ ਸੀ। ਇਕੱਲਾ ਦੀਵਾ ਭਾਵੇਂ ਛੋਟਾ ਲੱਗਦਾ ਹੋਵੇ, ਪਰ ਉਸ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਆਲੇ-ਦੁਆਲੇ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਦੂਰ ਤੱਕ ਹਨੇਰਾ ਦੂਰ ਕਰਨ ਦੀ ਤਾਕਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਜਨ ਸੰਘ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸਰਗਰਮ ਸਾਲਾਂ ਦੌਰਾਨ ਅਤੇ ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਬਿਲਕੁਲ ਇਹੀ ਕੰਮ ਕੀਤਾ।

ਭਾਰਤ ਦੇ ਪਹਿਲੇ ਉਦਯੋਗ ਅਤੇ ਸਪਲਾਈ ਮੰਤਰੀ ਵਜੋਂ ਡਾ. ਸ਼ਿਆਮਾ ਪ੍ਰਸਾਦ ਮੁਖਰਜੀ ਦਾ ਕਾਰਜਕਾਲ ਅਜਿਹੇ ਨੇਤਾ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਵਿਕਾਸ ਦੀ ਸੋਚ ਬਹੁਤ ਹੀ ਵਿਆਪਕ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖਤਾਵਾਦੀ ਸੀ। ਉਹ ਉਦਯੋਗ ਨੂੰ ਨਵੇਂ ਆਜ਼ਾਦ ਹੋਏ ਦੇਸ਼ ਲਈ ਸਵੈ-ਮਾਣ, ਮੌਕੇ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਬਹਾਲ ਕਰਨ ਦੇ ਸਾਧਨ ਵਜੋਂ ਦੇਖਦੇ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦੌਲਤ ਦੀ ਸਿਰਜਣਾ ਅਤੇ ਉਤਪਾਦਾਂ ਦੇ ਮੁੱਲ ਵਾਧੇ (ਵੈਲਿਊ ਅਡੀਸ਼ਨ) ਦਾ ਸਤਿਕਾਰ ਕੀਤਾ। ਦਾਮੋਦਰ ਵੈਲੀ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ, ਸਿੰਦਰੀ ਖਾਦ ਪਲਾਂਟ ਅਤੇ ਮਜ਼ਬੂਤ ਉਦਯੋਗਿਕ ਨੀਤੀ ਵਰਗੀਆਂ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਪਹਿਲਕਦਮੀਆਂ ਰਾਹੀਂ ਆਧੁਨਿਕ ਉਦਯੋਗਿਕ ਭਾਰਤ ਦੀ ਨੀਂਹ ਰੱਖਣ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਇਆ ਕਿ ਭਾਰਤ ਦੀਆਂ ਰਵਾਇਤੀ ਤਾਕਤਾਂ ਨੂੰ ਅਣਗੌਲਿਆ ਨਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ। ਹੱਥ-ਖੱਡੀਆਂ, ਘਰੇਲੂ ਉਦਯੋਗਾਂ, ਕਾਰੀਗਰਾਂ ਅਤੇ ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਵਰਕਰਾਂ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਵਚਨਬੱਧ ਹਮਾਇਤੀ ਮਿਲਿਆ।

ਇੱਥੇ, ਮੈਂ ਇੱਕ ਨਿੱਜੀ ਤਜਰਬਾ ਸਾਂਝਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹਾਂਗਾ। ਸਿੰਦਰੀ ਪਲਾਂਟ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਨੇ ਆਤਮ-ਨਿਰਭਰਤਾ ਦੀ ਸਪਸ਼ਟ ਸੋਚ ਨਾਲ ਸਥਾਪਤ ਕਰਨ ਲਈ ਕੰਮ ਕੀਤਾ ਸੀ, ਨੂੰ ਕਈ ਦਹਾਕਿਆਂ ਤੱਕ ਦੇਸ਼ ਚਲਾਉਣ ਵਾਲਿਆਂ ਵੱਲੋਂ ਅਣਗੌਲਿਆ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਮੈਨੂੰ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਮਾਣ ਹੈ ਕਿ ਸਾਡੀ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਇਸ ਦੀ ਮੁੜ ਸੁਰਜੀਤੀ ਵਿੱਚ ਯੋਗਦਾਨ ਪਾਉਣ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲਿਆ। ਉਸ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਣਾ ਵਾਕਈ ਸਭ ਤੋਂ ਖ਼ਾਸ ਪਲਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸੀ।

ਭਾਰਤ ਦੀ ਸੱਭਿਅਕ ਪਰੰਪਰਾ ਵਿੱਚ ਹਮੇਸ਼ਾ ਸੰਵਾਦ ਅਤੇ ਵਿਚਾਰ-ਵਟਾਂਦਰੇ ਦਾ ਸਤਿਕਾਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਨੇ ਇਹ ਲੋਕਤੰਤਰੀ ਭਾਵਨਾ ਅਪਣਾਈ। ਉਹ ਪੰਡਿਤ ਨਹਿਰੂ ਦੀ ਕੈਬਨਿਟ ਵਿੱਚ ਇਹ ਮੰਨਦਿਆਂ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਏ ਕਿ ਸ਼ੁਰੂਆਤੀ ਸਾਲਾਂ ਵਿੱਚ ਰਾਸ਼ਟਰ ਨਿਰਮਾਣ ਦਾ ਕੰਮ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਮੱਤਭੇਦਾਂ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪੂਰੀ ਇਮਾਨਦਾਰੀ ਅਤੇ ਉਸਾਰੂ ਭਾਵਨਾ ਨਾਲ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ। ਪਰ ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤਾ ਕਿ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਮਹੱਤਵ ਦੇ ਮੁੱਦਿਆਂ ਲਈ ਵੱਖਰੇ ਰਸਤੇ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪੂਰੇ ਮਾਣ-ਸਤਿਕਾਰ ਨਾਲ ਆਪਣਾ ਅਹੁਦਾ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਪੂਰੇ ਦਿਲ ਨਾਲ ਉਸ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਕੰਮ ਲਈ ਸਮਰਪਿਤ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, ਜਿਸ ਦੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਲੋੜ ਸੀ।

75 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ, ਪੰਡਿਤ ਨਹਿਰੂ ਪਹਿਲੀ ਸੋਧ ਲੈ ਕੇ ਆਏ, ਜੋ ਪ੍ਰਗਟਾਵੇ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ’ਤੇ ਸਿੱਧਾ ਹਮਲਾ ਸੀ। ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਇਸ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਆਲੋਚਕਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸਨ। ਉਹ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸਮਝਦੇ ਸਨ ਕਿ ਕਾਂਗਰਸ ਕੀ ਕੁਝ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਸੱਚ ਸਾਬਤ ਹੋਈ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ 75 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਪਹਿਲੀ ਸੋਧ ਲਿਆਂਦੀ ਸੀ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਹੀ 1975 ਵਿੱਚ ਐਮਰਜੈਂਸੀ ਲਾਈ ਅਤੇ 50 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ 42ਵਾਂ ਸੋਧ ਐਕਟ ਲਿਆਂਦਾ, ਜਿਸ ਨੇ ਮੁੜ ਉਦਾਰਵਾਦੀ ਲੋਕਤੰਤਰੀ ਕਦਰਾਂ-ਕੀਮਤਾਂ ਦੀ ਬੁਨਿਆਦ ’ਤੇ ਸੱਟ ਮਾਰੀ।

ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਆਪਣੇ ਮਨੁੱਖਤਾਵਾਦੀ ਯਤਨਾਂ ਲਈ ਵੀ ਜਾਣੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਜਦੋਂ 1943 ਵਿੱਚ ਬੰਗਾਲ ਵਿੱਚ ਸਭ ਤੋਂ ਭਿਆਨਕ ਕਾਲ ਪਿਆ, ਤਾਂ ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਨੇ ਖ਼ੁਦ ਨੂੰ ਪੀੜਤਾਂ ਦੀ ਸੇਵਾ ਵਿੱਚ ਲਾ ਦਿੱਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਖਾਣਾ ਖੁਆਉਣ ਲਈ ਕਈ ਕੈਂਟੀਨਾਂ ਅਤੇ ਰਾਹਤ ਕੇਂਦਰ ਖੋਲ੍ਹਣੇ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਏ। ਇੱਕ ਪਾਸੇ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਦੁਰਦਸ਼ਾ ਦੇਖ ਕੇ ਡੂੰਘੇ ਸਦਮੇ ਵਿੱਚ ਸਨ, ਜਦੋਂ ਕਿ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ, ਉਹ ਬਸਤੀਵਾਦੀ ਹਾਕਮਾਂ ਦੀ ਬੇਰੁਖੀ ਤੋਂ ਬੇਹੱਦ ਨਾਰਾਜ਼ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ‘ਪੰਚਾਸ਼ੇਰ ਮਨਵੰਤਰ’ ਨਾਮ ਦੀ ਕਿਤਾਬ ਵੀ ਲਿਖੀ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣਾ ਗੁੱਸਾ ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਸਾਂਝਾ ਕੀਤਾ। ਜਦੋਂ 1942 ਵਿੱਚ ਮੇਦਿਨੀਪੁਰ ਵਿੱਚ ਭਿਆਨਕ ਤੁਫ਼ਾਨ ਆਇਆ, ਤਾਂ ਹਾਲਾਤ ਆਮ ਵਾਂਗ ਕਰਨ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਦੀ ਸ਼ਲਾਘਾ ਕੀਤੀ ਗਈ।

ਕੋਲਕਾਤਾ ਦੇ ਇੱਕ ਕਾਲਜ ਵਿੱਚ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਡਾ. ਮੁਖਰਜੀ ਨੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਸੀ, “ਤੁਸੀਂ ਜੋ ਵੀ ਕੰਮ ਕਰੋ, ਉਸ ਨੂੰ ਗੰਭੀਰਤਾ ਨਾਲ, ਪੂਰੀ ਲਗਨ ਅਤੇ ਵਧੀਆ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕਰੋ; ਇਸ ਨੂੰ ਕਦੇ ਵੀ ਅੱਧ-ਵਿਚਾਲੇ ਜਾਂ ਅਧੂਰਾ ਨਾ ਛੱਡੋ, ਉਦੋਂ ਤੱਕ ਕਦੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸੰਤੁਸ਼ਟ ਨਾ ਸਮਝੋ ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਤੁਸੀਂ ਪੂਰੀ ਵਾਹ ਨਹੀਂ ਲਾ ਦਿੰਦੇ।” ਜਿਵੇਂ-ਜਿਵੇਂ ਭਾਰਤ ‘ਵਿਕਸਿਤ ਭਾਰਤ’ ਦੇ ਟੀਚੇ ਵੱਲ ਵੱਧ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸਾਡੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਇਹੀ ਹੋਵੇਗੀ ਕਿ ਅਸੀਂ ਹਰ ਰੋਜ਼ ਉਹ ਮਜ਼ਬੂਤ, ਇੱਕਜੁੱਟ, ਆਤਮ-ਵਿਸ਼ਵਾਸੀ ਅਤੇ ਸੰਵੇਦਨਸ਼ੀਲ ਭਾਰਤ ਉਸਾਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰੀਏ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਅਟੁੱਟ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਸੀ। ਅੱਜ ਦੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਦੇਖਦਿਆਂ, ਮੈਨੂੰ ਪੂਰਾ ਯਕੀਨ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਇਸ ਜ਼ੁੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਬਾਖੂਬੀ ਨਿਭਾਉਣਗੇ ਅਤੇ ਬਿਲਕੁਲ ਅਜਿਹਾ ਹੀ ਕਰਨਗੇ।