मेरे अटल जी

Published By : Admin | August 17, 2018 | 09:09 IST

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है। 

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।   

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।  

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। आंधियों में भी दीये जलाने की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं...हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी” 

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे - स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष हैयह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

 

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए। उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।  

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध। 

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

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ভারতের ঐক্য ও অগ্রগতির জন্য নিবেদিত একটি জীবন
July 06, 2026

আজ, ৬ই জুলাই, সেই অগণিত মানুষের জন্য একটি বিশেষ দিন যারা জাতীয়তাবাদ ও নিঃস্বার্থ সেবার আদর্শকে লালন করেন। আমরা ডঃ শ্যামা প্রসাদ মুখোপাধ্যায়ের ১২৫তম জন্মবার্ষিকী পালন করছি; তাঁর জীবন 'ভারতমাতা'-র প্রতি অটল নিষ্ঠা ও সাহসিকতার এক কালজয়ী দৃষ্টান্ত হয়ে আছে। আধুনিক ভারতের খুব কম নেতাই ডঃ শ্যামাপ্রসাদ মুখোপাধ্যায়ের মতো মেধা, জনসেবা এবং নৈতিক দৃঢ়তার এমন এক অপূর্ব ও গভীর সমন্বয়ের মূর্ত প্রতীক হতে পেরেছিলেন।

তরুণ শ্যামাপ্রসাদ এমন এক পরিবেশে জন্মগ্রহণ করেছিলেন যা সহজেই তাঁকে একটি সুরক্ষিত ও আরামদায়ক জীবন এনে দিতে পারত। তাঁর পিতা, স্যার আশুতোষ মুখোপাধ্যায়, ছিলেন তৎকালীন যুগের অন্যতম প্রধান শিক্ষাবিদ ও বুদ্ধিজীবী। অথচ, ভাগ্য যখন তাঁর সামনে সুযোগ-সুবিধাপূর্ণ জীবনের পথ উন্মুক্ত করেছিল, তখন তাঁর বিবেক তাঁকে ত্যাগ ও দেশসেবার পথে চালিত করেছিল। তিনি দৃঢ়ভাবে বিশ্বাস করতেন যে, ঔপনিবেশিকতা, সাম্প্রদায়িকতা ও মানবিক সংকটের মতো সমসাময়িক অস্থিরতার সময়ে তিনি কেবল নীরব দর্শক হয়ে থাকতে পারেন না। এই যাত্রাপথে তাঁকে গভীর ব্যক্তিগত শোকের সম্মুখীন হতে হয়েছিল - যার মধ্যে ছিল নিজের শিশুপুত্র ও পরবর্তীকালে স্ত্রীর অকালপ্রয়াণ। তবুও, এই মর্মান্তিক ঘটনাগুলো কেবল তাঁর সংকল্পকে আরও দৃঢ় এবং সেবার প্রতি তাঁর অটল নিষ্ঠাকে আরও শক্তিশালী করেছিল।

ডঃ শ্যামাপ্রসাদ মুখোপাধ্যায়ের জনজীবনকে যদি কোনো একটি আদর্শ সবচেয়ে বেশি সংজ্ঞায়িত করে থাকে, তবে তা হলো ভারতের অখণ্ডতা। দেশভাগের চরম অস্থিরতার সময়েও তিনি অবিচল ছিলেন যাতে পশ্চিমবঙ্গ ভারতের অবিচ্ছেদ্য অংশ হিসেবে টিকে থাকে। কয়েক বছর পর, সেই একই দৃঢ় বিশ্বাস তাঁকে জম্মু ও কাশ্মীরের দিকে ধাবিত করেছিল। কারাবাস তাঁকে দমাতে পারেনি এবং নিঃসঙ্গতাও তাঁর মনোবল কমাতে পারেনি। বন্দিদশাতেই তাঁর জীবনের আকস্মিক সমাপ্তি ঘটে - সেই অগণিত মানুষের থেকে বহু দূরে, যাদের স্বার্থরক্ষাকে তিনি নিজের জীবনের ব্রত হিসেবে গ্রহণ করেছিলেন। ইতিহাসে এমন কিছু মুহূর্ত আসে যখন কোনো ব্যক্তির চূড়ান্ত আত্মত্যাগ রাজনীতির গণ্ডি পেরিয়ে জাতীয় স্মৃতির অংশ হয়ে ওঠে। ডঃ মুখোপাধ্যায়ের শেষ যাত্রাও ছিল তেমনই এক মুহূর্ত। আচার্য বিনোবা ভাবে বলেছিলেন যে, ডঃ মুখোপাধ্যায় এমন এক আদর্শের জন্য নিজেকে উৎসর্গ করেছিলেন যার ওপর তাঁর গভীর আস্থা ছিল। বহু বছর পর, ২০১৯ সালে ৩৭০ ও ৩৫(ক) অনুচ্ছেদ রদ করার বিষয়টি ছিল তাঁর সেই আত্মবলিদানের প্রতি যথার্থ শ্রদ্ধাঞ্জলি।

ড. মুখার্জি সর্বদা ভারত ও ভারতীয় মূল্যবোধকে সর্বোচ্চ অগ্রাধিকার দিয়েছেন। তিনি এমন সব প্রতিষ্ঠান গড়ে তুলে এবং ব্যবস্থা প্রবর্তন করে তা করেছিলেন, যা তৎকালীন প্রথাগত ধ্যান-ধারণাকে চ্যালেঞ্জ জানিয়েছিল। তিনি কলকাতা বিশ্ববিদ্যালয়ের সর্বকনিষ্ঠ উপাচার্য হয়েছিলেন। নিজস্ব অনন্য শৈলীতে তিনি এমন সব ইতিবাচক পরিবর্তন এনেছিলেন যা ছিল দেশপ্রেমমূলক ও দূরদর্শী। শিক্ষাবিদদের এক সম্মেলনে ভাষণদানকালে ড. মুখার্জি চমৎকারভাবে বলেছিলেন, “শিক্ষা প্রতিষ্ঠানগুলোকে কেবল সম্ভাব্য করণিক বা স্বল্প বেতনের কর্মী তৈরির কারখানা হিসেবে দেখা ভুল। আমাদের এমন সব শিক্ষার্থী গড়ে তুলতে হবে যারা আমাদের স্বায়ত্তশাসিত প্রতিষ্ঠান - যেমন পৌরসভা, প্রাদেশিক ও কেন্দ্রীয় আইনসভা - পরিচালনায় নেতৃত্ব দিতে সক্ষম হবে; পাশাপাশি যারা জীবনযাত্রার বিভিন্ন ক্ষেত্র - যেমন অর্থ, বাণিজ্য ও শিল্প - পরিচালনার দায়িত্বও নিতে পারবে।”

তাঁর নেতৃত্বে কলকাতা বিশ্ববিদ্যালয় বেশ কিছু অনন্য উদ্যোগ গ্রহণ করেছিল; এর মধ্যে উল্লেখযোগ্য হলো গ্রন্থাগারের পরিকাঠামো উন্নয়ন, বিজ্ঞানের ক্ষেত্রে গবেষণার প্রসার, প্রত্নতাত্ত্বিক নিদর্শন বা শিল্পকর্মের অধ্যয়নে উৎসাহ প্রদান এবং কৃষি বিষয়ক পাঠ্যক্রম চালু করা। তিনি খেলাধুলা, শিক্ষক প্রশিক্ষণ এবং ছাত্রকল্যাণের মতো বিষয়গুলোর প্রতিও বিশেষ দৃষ্টি দিয়েছিলেন। শিক্ষার্থী ও প্রাক্তন শিক্ষার্থীদের মধ্যে গর্ববোধ জাগিয়ে তোলার লক্ষ্যে তিনি ২৪ জানুয়ারি তারিখটিকে বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রতিষ্ঠাবার্ষিকী হিসেবে পালন করার প্রথা চালু করেন। বিশ্ববিদ্যালয়ের জন্য একটি গান রচনার অনুরোধ নিয়ে তিনি স্বয়ং গুরুদেব রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরের শরণাপন্ন হয়েছিলেন।

তাঁর এই মানসিকতার আরেকটি উদাহরণ পাওয়া যায় তাঁর জীবনের পরবর্তী পর্যায়ে, যখন তিনি ‘ভারতীয় জনসংঘ’ গঠনের সিদ্ধান্ত নেন। এমন এক সময়ে যখন কংগ্রেস দলের সর্বব্যাপী প্রভাব ছিল, তখন তিনি অনুভব করেছিলেন যে ভারতের অগ্রগতির পক্ষে কথা বলার জন্য এবং একই সঙ্গে আমাদের সাংস্কৃতিক শেকড়ের সঙ্গে সংযোগ বজায় রাখার জন্য একটি বিকল্প কণ্ঠস্বরের প্রয়োজনীয়তা অত্যন্ত বেশি। দলের প্রতীক হিসেবে মাটির প্রদীপ বা ‘দিয়া’-কে বেছে নেওয়াটা সম্ভবত অত্যন্ত যথার্থ ছিল। একটি প্রদীপ হয়তো দেখতে সাধারণ মনে হতে পারে, কিন্তু তার চারপাশের অনেক দূর পর্যন্ত অন্ধকার দূর করার ক্ষমতা তার থাকে। সক্রিয় থাকাকালীন সময়ে এবং তার পরেও জনসংঘ ঠিক এই কাজটিই করেছিল।

ভারতের প্রথম শিল্প ও সরবরাহ মন্ত্রী হিসেবে ড. শ্যামাপ্রসাদ মুখার্জির কার্যকাল এমন এক রাষ্ট্রনায়কের পরিচয় তুলে ধরে, যার উন্নয়ন-ভাবনা ছিল অত্যন্ত ব্যাপক ও মানবিক। তিনি শিল্পকে নবীন স্বাধীন একটি জাতির মর্যাদা, সুযোগ ও আত্মবিশ্বাস পুনরুদ্ধারের মাধ্যম হিসেবে বিবেচনা করতেন। তিনি সম্পদ সৃষ্টি এবং মূল্য সংযোজনের বিষয়টিকে যথাযথ গুরুত্ব দিতেন। দামোদর ভ্যালি কর্পোরেশন ও সিন্দ্রি সার কারখানার মতো অগ্রগামী উদ্যোগ এবং একটি বলিষ্ঠ শিল্পনীতির মাধ্যমে আধুনিক শিল্প-ভারতের ভিত্তি স্থাপনের পাশাপাশি, তিনি এটাও নিশ্চিত করেছিলেন যেন ভারতের ঐতিহ্যবাহী শক্তিগুলো অবহেলিত না হয়। তাঁতশিল্প, কুটির শিল্প, কারিগর এবং বস্ত্রশিল্পের কর্মীদের কাছে তিনি ছিলেন একজন অত্যন্ত নিবেদিতপ্রাণ সমর্থক।

এখানে আমি একটি ব্যক্তিগত অভিজ্ঞতার কথা উল্লেখ করতে চাই। আত্মনির্ভরশীলতার সুনির্দিষ্ট লক্ষ্য নিয়ে ড. মুখার্জি যে সিন্দ্রি কারখানাটি গড়ে তোলার জন্য কাজ করেছিলেন, পরবর্তী কয়েক দশক ধরে যারা দেশ পরিচালনা করেছেন, তাঁরা সেটিকে উপেক্ষা করেছিলেন। আমি গর্বিত যে, আমাদের সরকার এই কারখানাটির পুনরুজ্জীবনে অবদান রাখার সুযোগ পেয়েছে। সেই কর্মসূচিতে উপস্থিত থাকতে পারাটা সত্যিই অত্যন্ত বিশেষ একটি মুহূর্ত ছিল।

ভারতের সভ্যতার ঐতিহ্যে দীর্ঘকাল ধরেই আলাপ-আলোচনা ও মতবিনিময়ের সংস্কৃতিকে গুরুত্ব দেওয়া হয়েছে। ড. মুখার্জি এই গণতান্ত্রিক চেতনারই মূর্ত প্রতীক ছিলেন। তিনি পণ্ডিত নেহরুর মন্ত্রিসভায় যোগ দিয়েছিলেন এই বিশ্বাস থেকে যে, স্বাধীনতার পরবর্তী প্রাথমিক বছরগুলোতে জাতি গঠনের কাজ রাজনৈতিক মতপার্থক্যের ঊর্ধ্বে। তিনি নিষ্ঠা ও গঠনমূলক মানসিকতা নিয়ে দায়িত্ব পালন করেছিলেন। কিন্তু যখন তিনি অনুভব করলেন যে জাতীয় স্বার্থে ভিন্ন কোনো পদক্ষেপ নেওয়া প্রয়োজন, তখন তিনি মর্যাদার সঙ্গে পদত্যাগ করেন এবং নিজেকে সেই রাজনৈতিক কাজে পুরোপুরি নিয়োজিত করেন যা তিনি দেশের জন্য অপরিহার্য বলে মনে করতেন।

৭৫ বছর আগে পণ্ডিত নেহরু সংবিধানের প্রথম সংশোধনী এনেছিলেন, যা ছিল বাক-স্বাধীনতার ওপর সরাসরি আঘাত। ড. মুখার্জি ছিলেন এর অন্যতম কঠোর সমালোচক। কংগ্রেস কী করতে সক্ষম, তা তিনি পুরোপুরি বুঝতে পেরেছিলেন। এবং শেষ পর্যন্ত তাঁর ধারণাই সঠিক প্রমাণিত হয়েছিল। যারা ৭৫ বছর আগে প্রথম সংশোধনী এনেছিল, তারাই ১৯৭৫ সালে জরুরি অবস্থা জারি করেছিল এবং ৫০ বছর আগে ৪২তম সংশোধনী আইন এনেছিল - যা আবারও উদার গণতান্ত্রিক মূল্যবোধের মূলে আঘাত হেনেছিল।

মানবিক কর্মকাণ্ডের জন্যও ড. মুখার্জি বিশেষভাবে স্মরণীয় হয়ে আছেন। ১৯৪৩ সালে বাংলায় যখন এক ভয়াবহ দুর্ভিক্ষ দেখা দেয়, তখন ড. মুখার্জি দুর্গত মানুষের সেবায় নিজেকে পুরোপুরি উৎসর্গ করেছিলেন। মানুষের অন্নসংস্থানের জন্য তিনি বেশ কয়েকটি ক্যান্টিন ও ত্রাণ কেন্দ্র খোলার ব্যবস্থা করেছিলেন। একদিকে যেমন তিনি তাঁর দেশের মানুষের দুর্দশা দেখে গভীরভাবে ব্যথিত হয়েছিলেন, অন্যদিকে ঔপনিবেশিক শাসকদের অসংবেদনশীলতা তাঁকে ক্ষুব্ধ ও ব্যথিত করেছিল। তিনি ‘পঞ্চাশের মন্বন্তর’ নামে একটি বইও লিখেছিলেন, যেখানে তিনি তাঁর সেই গভীর বেদনা ও ক্ষোভ প্রকাশ করেছিলেন। ১৯৪২ সালে মেদিনীপুরে যখন এক প্রবল ঘূর্ণিঝড় আঘাত হানে, তখন স্বাভাবিক অবস্থা ফিরিয়ে আনার ক্ষেত্রে তাঁর প্রচেষ্টা ব্যাপকভাবে প্রশংসিত হয়েছিল।

কলকাতার একটি কলেজে ভাষণ দেওয়ার সময় ড. মুখার্জি তরুণদের উদ্দেশে বলেছিলেন, “তোমরা যে কাজই হাতে নাও না কেন, তা অত্যন্ত গুরুত্ব ও নিষ্ঠার সঙ্গে এবং ভালোভাবে সম্পন্ন করো; কোনো কাজই কখনো অসম্পূর্ণ বা অসমাপ্ত রেখো না। যতক্ষণ না তোমরা নিজেদের সেরাটা দিয়ে কাজ শেষ করছ, ততক্ষণ কখনোই সন্তুষ্ট হয়ো না।” ভারত যখন ‘বিকশিত ভারত’-এর লক্ষ্যের দিকে এগিয়ে চলেছে, তখন তাঁর প্রতি শ্রেষ্ঠ শ্রদ্ধা নিবেদনের উপায় হলো - এমন এক শক্তিশালী, ঐক্যবদ্ধ, আত্মবিশ্বাসী ও সহানুভূতিশীল ভারত গড়ে তোলার জন্য প্রতিদিন সচেষ্ট হওয়া, যার ওপর তিনি গভীর আস্থা রাখতেন। আর আজকের তরুণ প্রজন্মের কথা বিবেচনা করলে আমি নিশ্চিত যে, তারা এই গুরুদায়িত্ব পালনে এগিয়ে আসবে এবং ঠিক সেটাই করবে।