मेरे अटल जी

Published By : Admin | August 17, 2018 | 09:09 IST

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है। 

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।   

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।  

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। आंधियों में भी दीये जलाने की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं...हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी” 

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे - स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष हैयह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

 

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए। उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।  

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध। 

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

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ଭାରତର ଏକତା ଏବଂ ପ୍ରଗତି ପାଇଁ ଉତ୍ସର୍ଗୀକୃତ ଜୀବନ
July 06, 2026

ରାଷ୍ଟ୍ରବାଦ ଓ ନିଃସ୍ୱାର୍ଥ ସେବାର ଆଦର୍ଶରେ ବିଶ୍ୱାସ କରୁଥିବା ଅଗଣିତ ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ଆଜିର ଦିନ, ୬ ଜୁଲାଇର ବିଶେଷ ମହତ୍ୱ ରହିଛି । ଆମେ ଡକ୍ଟର ଶ୍ୟାମା ପ୍ରସାଦ ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କ ୧୨୫ତମ ଜନ୍ମବାର୍ଷିକୀ ପାଳନ କରୁଛେ । ତାଙ୍କ ଜୀବନ ସାହସ ଏବଂ ମା’ ଭାରତୀ ପ୍ରତି ଅତୁଟ ସମର୍ପଣର ଏକ ଚିରସ୍ଥାୟୀ ଉଦାହରଣ ହୋଇ ରହିଛି । ଆଧୁନିକ ଭାରତରେ ଏପରି ନେତା ବିରଳ ଯାହାଙ୍କ ଠାରେ ଡକ୍ଟର ଶ୍ୟାମା ପ୍ରସାଦ ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କ ଭଳି ବୁଦ୍ଧିମତ୍ତା, ଜନସେବା ଏବଂ ନୈତିକ ଦୃଢ଼ତାର ଏତେ ଗଭୀର ସଂଗମ ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଥିବ।

ଡକ୍ଟର ଶ୍ୟାମା ପ୍ରସାଦ ମୁଖାର୍ଜୀ ଏପରି ଏକ ପରିସ୍ଥିତିରେ ଜନ୍ମଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ ଯେଉଁଠି ସେ ଚାହିଁଥିଲେ ସୁରକ୍ଷିତ ଏବଂ ଆରାମଦାୟକ ଜୀବନଯାପନ ଅତିବାହିତ କରିପାରିଥାନ୍ତେ । ତାଙ୍କ ପିତା ସାର୍‌ ଆଶୁତୋଷ ମୁଖାର୍ଜୀ ତତ୍କାଳୀନ ସମୟର ଜଣେ ଅଗ୍ରଣୀ ଶିକ୍ଷାବିତ୍‌ ଏବଂ ବୁଦ୍ଧିଜୀବୀ ଥିଲେ। ଭାଗ୍ୟ ତାଙ୍କ ଆଗରେ ବିଶେଷାଧିକାରର ମାର୍ଗ ରଖିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ଅନ୍ତରାତ୍ମା ତାଙ୍କୁ ବଳିଦାନ ଏବଂ ରାଷ୍ଟ୍ର ସେବା ଦିଗରେ ଆଗେଇ ନେଇଥିଲା । ଉପନିବେଶବାଦ, ସାମ୍ପ୍ରଦାୟିକତା, ମାନବୀୟ ଆହ୍ୱାନ ହେଉ କିମ୍ବା ଅନ୍ୟ କୌଣସି ସମସ୍ୟା ନିଜ ସମୟର ଅସ୍ଥିରତାକୁ ଦେଖି ସେ କେବଳ ଜଣେ ମୂକ ଦର୍ଶକ ସାଜିପାରିବେ ନାହିଁ ବୋଲି ତାଙ୍କ ମନରେ ବିଶ୍ୱାସ ଦୃଢ଼ ହୋଇଥିଲା। ଏହି ଯାତ୍ରା ସମୟରେ ତାଙ୍କୁ ଗୁରୁତର ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ଦୁଃଖର ସାମ୍ନା କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥିଲା। ପ୍ରଥମେ ତାଙ୍କର ନବଜାତ ଶିଶୁ ଏବଂ ପରେ ତାଙ୍କ ପତ୍ନୀ ପ୍ରାଣ ହରାଇଥିଲେ। କିନ୍ତୁ ଏହି ସବୁ ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ଧକ୍କା ତାଙ୍କର ସଂକଳ୍ପକୁ ଆହୁରି ଗଭୀର କରିଥିଲା ଏବଂ ସେବା ପ୍ରତି ତାଙ୍କର ଅତୁଟ ପ୍ରତିବଦ୍ଧତାକୁ ଅଧିକ ମଜବୁତ କରିଥିଲା ।

ଡକ୍ଟର ଶ୍ୟାମା ପ୍ରସାଦ ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କ ସାର୍ବଜନୀନ ଜୀବନକୁ ପରିଭାଷିତ କରିଥିବା ଏକମାତ୍ର ଆଦର୍ଶ ଥିଲା ଭାରତର ଅଖଣ୍ଡତା । ବିଭାଜନର ଅସ୍ଥିରତାପୂର୍ଣ୍ଣ ସମୟରେ ସେ ଦୃଢ଼ତାର ସହ ଛିଡ଼ା ହୋଇଥିଲେ, ଯାହାଫଳରେ ପଶ୍ଚିମବଙ୍ଗ ଭାରତର ଅଭିନ୍ନ ଅଙ୍ଗ ହୋଇରହିବା ସୁନିଶ୍ଚିତ ହୋଇଥିଲା । କିଛି ବର୍ଷ ପରେ ଏହି ଦୃଢ଼ ବିଶ୍ୱାସ ତାଙ୍କୁ ଜାମ୍ମୁ-କାଶ୍ମୀର ଆଡ଼କୁ ଆଗେଇ ନେଇଥିଲା। ଜେଲରେ ବନ୍ଦୀ ହେବା ସତ୍ତ୍ୱେ ତାଙ୍କର ଦୃଢ଼ ସଂକଳ୍ପ ଅତୁଟ ରହିଥିଲା ଏବଂ ନିସଂଗତା ତାଙ୍କର ମନୋବଳକୁ ଭାଙ୍ଗି ପାରିନଥିଲା। କାରାବାସରେ ହିଁ ତାଙ୍କର ଜୀବନ ଦୀପ ଅକସ୍ମାତ୍‌ ଲିଭି ଯାଇଥିଲା। ଶେଷ ସମୟରେ ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ସେହି ଅଗଣିତ ଲୋକଙ୍କ ଠାରୁ ଦୂରରେ ଥିଲେ ଯେଉଁମାନଙ୍କ ଲକ୍ଷ୍ୟକୁ ସେ ଆପଣାଇ ନେଇଥିଲେ । ଇତିହାସରେ ଏପରି ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଆସିଥାଏ ଯେତେବେଳେ କୌଣସି ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କର ଅନ୍ତିମ ବଳିଦାନ ରାଜନୀତି ଠାରୁ ଊର୍ଦ୍ଧ୍ୱକୁ ଯାଇ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ସ୍ମୃତିର ଏକ ଅଂଶବିଶେଷ ପାଲଟିଯାଏ। ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କ ଅନ୍ତିମ ଯାତ୍ରା ମଧ୍ୟ ଏପରି ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ। ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ବିନୋବା ଭାବେ କହିଥିଲେ, ‘‘ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ସେହି ଲକ୍ଷ୍ୟ ପାଇଁ ନିଜର ବଳିଦାନ ଦେଇଥିଲେ ଯେଉଁଥିରେ ତାଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ରହିଥିଲା। ଅନେକ ବର୍ଷ ପରେ ୨୦୧୯ରେ ଅନୁଚ୍ଛେଦ ୩୭୦ ଓ ୩୫ (ଏ) ଉଚ୍ଛେଦ ତାଙ୍କ ବଳିଦାନ ପାଇଁ ସବୁଠୁ ଉପଯୁକ୍ତ ଶ୍ରଦ୍ଧାଞ୍ଜଳି ଥିଲା।

ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କ ପାଇଁ ଭାରତ ଏବଂ ଭାରତୀୟ ମୂଲ୍ୟବୋଧ ସର୍ବୋପରି ଥିଲା। ସେ ଏପରି ପ୍ରତିଷ୍ଠାନ ଗଢ଼ିଥିଲେ ଏବଂ ଏଭଳି ପ୍ରଣାଳୀ ବିକଶିତ କରିଥିଲେ, ଯାହା ତତ୍କାଳୀନ ସମୟର ପାରମ୍ପରିକ ଚିନ୍ତାଧାରାର ବିପରୀତ ଥିଲା । ସେ କଲିକତା ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟର ସବୁଠୁ କମ୍‌ ବୟସ୍କ କୁଳପତି ହୋଇଥିଲେ। ନିଜର ଅଭିନବ ଶୈଳୀରେ ସେ ଏପରି ସକାରାତ୍ମକ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଆଣିଥିଲେ ଯାହା ଦେଶଭକ୍ତିପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଭବିଷ୍ୟତ ଆଧାରିତ ଥିଲା। ଶିକ୍ଷାବିତ୍‌ ମାନଙ୍କର ଏକ ସମ୍ମିଳନୀରେ ଉଦବୋଧନ ଦେଇ ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ଗୋଟିଏ ଭଲ କଥା କହିଥିଲେ: ‘‘ଶିକ୍ଷାନୁଷ୍ଠାନକୁ କେବଳ କିଛି କିରାଣୀ ଏବଂ କମ୍‌ ବେତନ ପାଉଥିବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ପ୍ରସ୍ତୁତି କାରଖାନା ରୂପେ ଦେଖିବା ଭୁଲ। ଆମକୁ ଏପରି ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀଙ୍କୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରିବାକୁ ହେବ ଯେଉଁମାନେ ଆମର ସ୍ୱୟଂଶାସିତ ଅନୁଷ୍ଠାନ-ଯଥା ନଗର ନିଗମ, ପ୍ରାନ୍ତୀୟ ଏବଂ କେନ୍ଦ୍ରୀୟ ବିଧାନସଭାର ନେତୃତ୍ୱ ନେଇପାରିବେ। ଏଥିସହିତ ଆର୍ଥିକ, ବାଣିଜ୍ୟିକ ଏବଂ ଔଦ୍ୟୋଗିକ ଭଳି ଜୀବନର ବିଭିନ୍ନ କ୍ଷେତ୍ରରେ କାର୍ଯ୍ୟ ପରିଚାଳନା କରିପାରିବେ ।’’

ତାଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ, କଲିକତା ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ ପାଠାଗାର ଭିତ୍ତିଭୂମିର ଉନ୍ନତି, ବିଜ୍ଞାନ ଗବେଷଣା ବୃଦ୍ଧି, କଳାକୃତି ଅଧ୍ୟୟନକୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହନ ଏବଂ କୃଷିରେ ପାଠ୍ୟକ୍ରମ ପ୍ରଚଳନ କରିବା ଭଳି ଅଭିନବ ପଦକ୍ଷେପ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲା। ସେ କ୍ରୀଡା, ଶିକ୍ଷକ ତାଲିମ ଏବଂ ଛାତ୍ର କଲ୍ୟାଣ ଭଳି କ୍ଷେତ୍ରଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରତି ଧ୍ୟାନ ଦେଇଥିଲେ। ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀ ଏବଂ ପୂର୍ବତନ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗର୍ବର ଭାବନା ସୃଷ୍ଟି କରିବା ପାଇଁ, ସେ ୨୪ ଜାନୁଆରୀକୁ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟର ପ୍ରତିଷ୍ଠା ଦିବସ ଭାବରେ ପାଳନ କରିବାର ଏକ ପରମ୍ପରା ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲେ। ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ ପାଇଁ ଏକ ଗୀତ ରଚନା କରିବା ଲାଗି ସେ ଅନ୍ୟ କେହି ନୁହେଁ ସ୍ୱୟଂ ଗୁରୁଦେବ ଟାଗୋରଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କରିଥିଲେ ।

ଏପରି ମନୋଭାବର ଆଉ ଏକ ଉଦାହରଣ ତାଙ୍କ ଜୀବନର ଶେଷ ଭାଗରେ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥିଲା। ଏହି ସମୟରେ ସେ ଭାରତୀୟ ଜନସଂଘ ଗଠନ କରିବାକୁ ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେଇଥିଲେ। ତତ୍କାଳୀନ ସମୟରେ କଂଗ୍ରେସ ଦଳ ସର୍ବବ୍ୟାପୀ ଥିଲା । ଆମର ସାଂସ୍କୃତିକ ମୂଳଦୁଆ ସହ ଜଡିତ ରହି ଭାରତର ପ୍ରଗତି ପାଇଁ ଏକ ବିକଳ୍ପ ସ୍ୱର ଉତ୍ତୋଳନ କରିବାର ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି ବୋଲି ସେ ଅନୁଭବ କରିଥିଲେ । ଦଳର ପ୍ରତୀକ ସ୍ୱରୂପ ଦୀୟା ବା ମାଟି ଦୀପକୁ ଗ୍ରହଣ କରିବା ଉପଯୁକ୍ତ ନିଷ୍ପତ୍ତି ଥିଲା। ଦୀପ ସାମାନ୍ୟ ହୋଇପାରେ କିନ୍ତୁ ଏହା ନିଜ ଠାରୁ ବହୁ ଦୂରରେ ଥିବା ଅନ୍ଧକାରକୁ ଦୂର କରିବାର ସାମର୍ଥ୍ୟ ରଖିଥାଏ। ଜନସଂଘ ଠିକ୍‌ ଏହିପରି ଭାବରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଥିଲା ।

ଭାରତର ପ୍ରଥମ ଶିଳ୍ପ ଏବଂ ଯୋଗାଣ ମନ୍ତ୍ରୀ ଭାବରେ ଡକ୍ଟର ଶ୍ୟାମା ପ୍ରସାଦ ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟକାଳ ଜଣେ ରାଜନେତା ଭାବେ ତାଙ୍କ ବ୍ୟକ୍ତିତ୍ୱକୁ ପରିପ୍ରକାଶ କରିଥିଲା। ବିକାଶକୁ ନେଇ ତାଙ୍କର ଧାରଣା ଅତ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟାପକ ଏବଂ ମାନବୀୟ ଥିଲା। ନୂଆ କରି ସ୍ୱାଧୀନ ହୋଇଥିବା ଗୋଟିଏ ରାଷ୍ଟ୍ରର ମର୍ଯ୍ୟାଦା, ସୁଯୋଗ ଏବଂ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ଫେରାଇ ଆଣିବା ଲାଗି ସେ ଶିଳ୍ପକୁ ଏକ ମାଧ୍ୟମ ରୂପେ ଦେଖୁଥିଲେ । ସେ ସମ୍ପତ୍ତି ସୃଷ୍ଟି ଏବଂ ମୂଲ୍ୟ ବୃଦ୍ଧିକୁ ସମ୍ମାନ କରୁଥିଲେ। ଦାମୋଦର ଭ୍ୟାଲି କର୍ପୋରେସନ, ସିନ୍ଦ୍ରି ସାର କାରଖାନା ଏବଂ ଏକ ଦୃଢ଼ ଶିଳ୍ପ ନୀତି ଭଳି ଅଗ୍ରଣୀ ପଦକ୍ଷେପ ମାଧ୍ୟମରେ ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ଆଧୁନିକ ଶିଳ୍ପ ସମ୍ପନ୍ନ ଭାରତର ମୂଳଦୁଆ ଗଢ଼ିଥିଲେ । ଅନୁରୂପ ଭାବେ ସେ ଭାରତର ପାରମ୍ପରିକ ଶକ୍ତିକୁ ମଧ୍ୟ କେବେ ଅବହେଳା କରିନଥିଲେ । ହସ୍ତତନ୍ତ, କୁଟୀର ଶିଳ୍ପ, କାରିଗର ଏବଂ ବୟନ ଶ୍ରମିକଙ୍କ କଲ୍ୟାଣ ପାଇଁ ସେ ଉଲ୍ଲେଖନୀୟ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଯାଇଛନ୍ତି ।

ଏଠାରେ, ମୁଁ ଏକ ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ଅଭିଜ୍ଞତା ବାଣ୍ଟିବାକୁ ଚାହେଁ । ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ଯେଉଁ ସିନ୍ଦ୍ରି ପ୍ଲାଣ୍ଟକୁ ଆତ୍ମନିର୍ଭରଶୀଳତାର ସ୍ପଷ୍ଟ ଦୃଷ୍ଟିକୋଣ ସହିତ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିବା ପାଇଁ କାମ କରିଥିଲେ ସେହି ଶିଳ୍ପାନୁଷ୍ଠାନକୁ ଅନେକ ଦଶନ୍ଧି ଧରି ଦେଶ ଚଳାଉଥିବା ଲୋକମାନେ ଅଣଦେଖା କରିଥିଲେ। ଆମ ସରକାରଙ୍କୁ ଏହାର ପୁନରୁଦ୍ଧାରରେ ଯୋଗଦାନ ଦେବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିବାରୁ ମୁଁ ଗୌରବାନ୍ୱିତ ମନେ କରୁଛି । ଏପରି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ରହିବା ପ୍ରକୃତରେ ସବୁଠାରୁ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ମୁହୂର୍ତ୍ତ ମଧ୍ୟରୁ ଅନ୍ୟତମ ଥିଲା।

ଭାରତର ସଭ୍ୟତାଗତ ପରମ୍ପରାରେ ଆଲୋଚନା ଓ ବିତର୍କକୁ ଦୀର୍ଘ ଦିନ ଧରି ସମ୍ମାନ ଦିଆଯାଇ ଆସୁଛି । ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ଏହି ଗଣତାନ୍ତ୍ରିକ ଭାବନାକୁ ମୂର୍ତ୍ତିମନ୍ତ କରିଥିଲେ। ସେ ପଣ୍ଡିତ ନେହରୁଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରିମଣ୍ଡଳରେ ଯୋଗ ଦେଇଥିଲେ। କାରଣ ପ୍ରାରମ୍ଭିକ ବର୍ଷଗୁଡ଼ିକରେ ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣର କାର୍ଯ୍ୟ ରାଜନୈତିକ ମତଭେଦ ଠାରୁ ଊର୍ଦ୍ଧ୍ୱରେ ଥିଲା ବୋଲି ସେ ଚିନ୍ତା କରୁଥିଲେ। ସେ ଆନ୍ତରିକତା ଏବଂ ଗଠନମୂଳକ ମନୋଭାବ ସହିତ ସେବା କରିଥିଲେ। କିନ୍ତୁ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଗୁରୁତ୍ୱ ବହନ କରୁଥିବା ପ୍ରଶ୍ନଗୁଡ଼ିକ ପାଇଁ ଏକ ଭିନ୍ନ ପଥର ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି ବୋଲି ଯେତେବେଳେ ସେ ଅନୁଭବ କଲେ ସେତେବେଳେ ମର୍ଯ୍ୟାଦାର ସହିତ ନିଜ ପଦ ତ୍ୟାଗ କରିଥିଲେ । ଏହାପରେ ରାଷ୍ଟ୍ର ଆବଶ୍ୟକ କରୁଥିବା ରାଜନୈତିକ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଜକୁ ପୂର୍ଣ୍ଣପ୍ରାଣରେ ଉତ୍ସର୍ଗ କଲେ ।

୭୫ ବର୍ଷ ପୂର୍ବେ ପଣ୍ଡିତ ନେହରୁ ପ୍ରଥମ ସଂଶୋଧନ ଆଣିଥିଲେ, ଯାହା ବାକ୍ ସ୍ୱାଧୀନତା ଉପରେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଆକ୍ରମଣ ଥିଲା। ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ଏହାର କଠୋର ସମାଲୋଚକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଜଣେ ଥିଲେ। ସେ କଂଗ୍ରେସ କ’ଣ କରିପାରିବ ତାହା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବୁଝିପାରିଥିଲେ। ଆଉ ତାଙ୍କର ଏହି ଭାବନା ଠିକ୍‌ ଥିଲା । ୭୫ ବର୍ଷ ପୂର୍ବେ ପ୍ରଥମ ସଂଶୋଧନ ଆଣିଥିବା ଲୋକମାନେ ହିଁ ୫୦ ବର୍ଷ ପୂର୍ବେ ୧୯୭୫ ମସିହାରେ ଜରୁରୀକାଳୀନ ପରିସ୍ଥିତି ଲାଗୁ କରିଥିଲେ। ଏଥିପାଇଁ ସେମାନେ ୪୨ତମ ସଂଶୋଧନ ଆଇନ ଆଣିଥିଲେ, ଯାହା ପୁଣି ଥରେ ଉଦାର ଗଣତାନ୍ତ୍ରିକ ମୂଲ୍ୟବୋଧର ମୂଳଦୁଆ ଉପରେ ଆଘାତ କରିଥିଲା।

ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କ ମାନବୀୟ କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଅସାଧାରଣ ଥିଲା। ୧୯୪୩ ମସିହାରେ ବଙ୍ଗରେ ସବୁଠାରୁ ଭୟଙ୍କର ଦୁର୍ଭିକ୍ଷ ପଡ଼ିଥିବା ସମୟରେ ସେ ପ୍ରଭାବିତ ଲୋକଙ୍କ ସେବା କରିବାରେ ନିଜକୁ ଉତ୍ସର୍ଗ କରିଥିଲେ । ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଖାଦ୍ୟ ଯୋଗାଇବା ପାଇଁ ଅନେକ କ୍ୟାଣ୍ଟିନ୍ ଏବଂ ରିଲିଫ୍ କେନ୍ଦ୍ର ଖୋଲିବାରେ ତାଙ୍କର ମହତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ରହିଥିଲା। ଗୋଟିଏ ପଟେ ନିଜ ଲୋକଙ୍କ ଦୁର୍ଦ୍ଦଶା ଦେଖି ସେ ଗଭୀର ଭାବରେ ମର୍ମାହତ ହୋଇଥିଲେ ଏବଂ ଅନ୍ୟପଟେ, ଉପନିବେଶବାଦୀ ଶାସକଙ୍କ ସମ୍ବେଦନହୀନତା ତାଙ୍କ ମନରେ ଘୃଣା ଉତ୍ପନ୍ନ କରିଥିଲା । ସେ ‘ପଞ୍ଚଶେର ମନ୍ୱନ୍ତର’ ନାମକ ଏକ ପୁସ୍ତକ ମଧ୍ୟ ଲେଖିଥିଲେ, ଯେଉଁଥିରେ ସେ ତାଙ୍କର କ୍ଷୋଭ ପ୍ରକାଶ କରିଥିଲେ। ୧୯୪୨ ମସିହାରେ ମେଦିନୀପୁରରେ ହୋଇଥିବା ଏକ ମହାବାତ୍ୟା ସମୟରେ ସହାୟତା ଯୋଗାଇ ଦେବା ଏବଂ ସ୍ୱାଭାବିକତା ଫେରାଇ ଆଣିବାରେ ସେ ବ୍ୟାପକ ପ୍ରୟାସ କରିଥିଲେ। ତାଙ୍କର ଏହି ପ୍ରୟାସକୁ ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରଶଂସା କରାଯାଇଥିଲା।

କୋଲକାତାର ଏକ ମହାବିଦ୍ୟାଳୟରେ ଭାଷଣ ଦେବା ଅବସରରେ ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀ ଯୁବପିଢ଼ିଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ ଦେଇଥିଲେ, ‘‘ତୁମେମାନେ ଯେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛ, ତାକୁ ଗମ୍ଭୀରତାର ସହିତ, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଭଲ ଭାବରେ କର; ଏହାକୁ କେବେବି ଅଧା କିମ୍ବା ଅସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଛାଡ଼ି ଦିଅ ନାହିଁ । ନିଜର ସର୍ବୋତ୍ତମ ପ୍ରୟାସ ନକରିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହୁଅ ନାହିଁ ।’’ ଆମ ଦେଶ ଏକ ବିକଶିତ ଭାରତର ଲକ୍ଷ୍ୟ ଦିଗରେ ଅଗ୍ରସର ହେବା ସହିତ ଡକ୍ଟର ମୁଖାର୍ଜୀଙ୍କୁ ସର୍ବୋତ୍ତମ ଶ୍ରଦ୍ଧାଞ୍ଜଳି ଦେବା ଲାଗି ଆମ ପାଖରେ ଉପଯୁକ୍ତ ସୁଯୋଗ ରହିଛି । ଆସନ୍ତୁ ଆମେ ଏକ ଶକ୍ତିଶାଳୀ, ଅଖଣ୍ଡ, ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସୀ ଏବଂ କରୁଣାପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାରତ ଗଠନ କରିବା ଲାଗି ଦୈନନ୍ଦିନ ପ୍ରୟାସ କରିବା । ଏଭଳି ଏକ ଭାରତ ଗଢ଼ିବା ଲାଗି ଡକ୍ଟର ମୁର୍ଖାଜୀଙ୍କର ଦୃଢ଼ ବିଶ୍ୱାସ ରହିଥିଲା। ବର୍ତ୍ତମାନର ଯୁବପିଢ଼ିଙ୍କୁ ମୁଁ ଯେତିକି ଜାଣିଛି ସେମାନେ ଏ ସୁଯୋଗର ଲାଭ ଉଠାଇ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ ଏହି ସ୍ୱପ୍ନକୁ ସାକାର କରିବେ ବୋଲି ମୋର ବିଶ୍ୱାସ ।