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भाईयों और बहनों,

आप सबका स्‍वागत है। दो दिन बड़ी विस्‍तार से चर्चा होने वाली है। इस मंथन में से कई महत्‍वपूर्ण बाते उभरकर के आएगी जो आगे चलकर के नीति या नियम का रूप ले सकती है और इसलिए हम जितना ज्‍यादा एक लम्‍बे विजन के साथ इन चर्चाओं में अपना योगदान देंगे तो यह दो दिवसीय सम्‍मेलन अधिक सार्थक होगा। इस विषय में कुछ बातें बताने का आज मन करता है मेरा। Climate के संबंध में या Environment के संबंध में प्रारंभ से कुछ हमारी गलत अभिव्‍यक्ति रही है और हम ऐसे जैसे अपनी बात को दुनिया के आगे प्रस्‍तुत किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे हमें न Climate की परवाह है न Environment की परवाह है। और सारी दुनिया हमारी इस अभिव्‍यक्ति की गलती के कारण यह मानकार के बैठी कि विश्‍व तो Environment conscious हो रहा है। विश्‍व climate की चिंता कर रहा है कि यह देश है जो कोई अडंगे डाल रहा है और इसका मूल कारण यह नहीं है कि हमने environment को बिगाड़ने में कोई अहम भूमिका निभाई है। climate को बर्बाद करने में हमारी या हमारे पूर्वजों की कोई भूमिका रही है। हकीकत तो उल्‍टी है। हम उस परंपरा में पले है, उन नीति, नियम और बंधनों में पले-बढ़े लोग हैं, जहां प्रकृति को परमेश्‍वर के रूप माना गया है, जहां पर प्रकृति की पूजा को सार्थक माना गया है और जहां पर प्रकृति की रक्षा को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ा गया है। लेकिन हम अपनी बात किसी न किसी कारण से, एक तो हम कई वर्षों से गुलाम रहे, सदियों से गुलाम रहने के कारण एक हमारी मानसिकता भी बनी हुई है कि अपनी बात दुनिया के सामने रखते हुए हम बहुत संकोच करते हैं। ऐसा लगता है कि यार कहीं यह आगे बढ़ा हुआ विश्‍व हम Third country के लोग। हमारी बात मजाक तो नहीं बन जाएगी। जब तक हमारे भीतर एक confidence नहीं आता है, शायद इस विषय पर हम ठीक से deal नहीं कर पाएंगे।

और मैं आज इस सभागृह में उपस्थित सभी महानुभावों से आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूं हम जितने प्रकृति के विषय में संवेदनशील है। दुनिया हमारे लिए सवालिया निशान खड़ा नहीं कर सकती है। आज भी प्रति व्‍यक्ति अगर carbon emission में contribution किसी का होगा तो कम से कम contribution वालों में हम है। लेकिन उसके बाद भी आवश्‍यकता यह थी कि विश्‍व में जब climate विषय में एक चिंता शुरू हुई, भारत ने सबसे पहले इसका नेतृत्‍व करना चाहिए था। क्‍योंकि दुनिया में अधिकतम वर्ग यह है कि जो climate की चिंता औरों पर restriction की दिशा में करता रहता है, जबकि हम लोग सदियों से प्रकृति की रक्षा करते-करते जीवन विकास की यात्रा में आगे बढ़ने के पक्षकार रहे हैं। दुनिया जो आज climate के संकट से गुजर रही है, Global Warming के संकट से गुजर रही है, उसको अभी भी रास्‍ता नहीं मिल रहा है कि कैसे बचा जाए, क्‍योंकि वो बाहरी प्रयास कर रहे हैं। और मैंने कई बार कहा कि इन समस्‍या की जड़ में हम carbon emission को रोकने के लिए जो सारे नीति-नियम बना रहे हैं, विश्‍व के अंदर एक बंधनों की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन हम कोई अपनी Life Style बदलने के लिए तैयार नहीं है। समस्‍या की जड़ में मानवजात जो कि उपभोग की तरफ आगे बढ़ती चली गई है और जहां ज्‍यादा उपभोग की परंपरा है, वहां सबसे ज्‍यादा प्रकृति का नुकसान होता है, जहां पर उपभोग की प्रवृति कम है, वहां प्रकृति का शोषण भी कम होता है और इसलिए हम जब तक अपने life style के संबंध में focus नहीं करेंगे और दुनिया में इस एक बात को केंद्र बिंदु में नहीं लाएंगे हम शायद बाकी सारे प्रयासों के बावजूद भी, लेकिन यह जो बहुत आगे बढ़ चुके देश है, उनके गले उतारना जरा कठिन है। वो माने न माने हम तो इन्‍हीं बातों में पले-बढ़े लोग हैं। हमें फिर से अगर वो चीजें भूला दी गई है, तो हमें उस पर सोचना चाहिए। मैं उदाहरण के तौर पर कहता हूं आजकल दुनिया में Recycle की बडी चर्चा है और माना जाता है कि यह दुनिया में कोई नया विज्ञान आया है, नई व्‍यवस्‍था आई है। जरा हमारे यहां देखों Recycle, reuse और कम से कम उपयोग करने की हमारी प्रकृति कैसी रही है। पुराना जमाना की जरा अपने घर में दादी मां उनके जीवन को देखिए। घर में कपड़े अगर पुराने हो गए होंगे, तो उसमें से रात को बिछाने के लिए गद्दी बना देंगे। वो अब उपयोगी नहीं रही तो उसमें से भी झाडू-पौचे के लिए उस जगह का उपयोग करेंगे। यानी एक चीज को recycle कैसे करना घर में हर चीज का वो हमारे यहां सहज परंपरा थी। सहज प्रकृति थी।

मैंने देखा है गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन आम को भी इतना Recycle करते हैं, Reuse करते हैं शायद कोई बाहर सोच नहीं सकता है। कहने का तात्‍पर्य है कि कोई बाहर से borrow की हुई चीज नहीं है। लेकिन हमने दुनिया समझे उस terminology में उन चीजों को आग्रहपूर्वक रखा नहीं। विश्‍व के सामने हम अपनी बातों को ढंग से रख नहीं पाए। हमारे यहां पौधे में परमात्‍मा है। जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान के माध्‍यम से जब Laboratory में जब सिद्ध किया कि पौधे में जीव होता है, उसके बाद ही हमने जीव है ऐसा मानना तय किया, ऐसा नहीं है। हम सहस्‍त्रों वर्ष से गीता का उल्‍लेख करे, महाभारत का उल्‍लेख करे हमें तभी से मानते हुए आए हैं कि पौधे में परमात्‍मा होता है। और इसलिए पौधे की पूजा, पौधे की रक्षा यह सारी चीजें हमें परंपराओं से सिखाई गई थी। लेकिन काल क्रम में हमने ही अपने आप को कुछ और तरीके से रास्‍ते खोजने के प्रयास किए। कभी-कभी मुझे लगता है.. यहां urban secretaries बहुत बड़ी संख्‍या में है हम परंपरागत रूप से चीजों को कैसे कर सकते हैं। मैं जानता हूं मैं जो बातें बताऊंगा, ये जो so called अंग्रेजीयत वाले लोग हैं, वो उसका मजाक उड़ाएंगे 48 घंटे तक। बड़ा मजाक उड़ाएंगे, आपको भी बड़ा मनोरंजन मिलेगा टीवी पर, क्‍योंकि एक अलग सोच के लोग हैं। जैसे मैं आपको एक बात बताऊं। आपको मालूम होगा यहां से जिनका गांव के साथ जीवन रहा होगा। गांव में एक परंपरा हुआ करती थी कि जब full moon होता था, तो दादी मां बच्‍चों को चांदनी की रोशनी में सुई के अंदर धागा पिरोने के लिए प्रयास करते थे, क्‍यों eye sight तो थी, लेकिन उस चांदनी की रोशनी की अनुभूति कराते थे।

आज शायद नई पीढ़ी को पूछा जाए कि आपने चांदनी की रोशनी देखी है क्‍या? क्‍या पूर्णिमा की रात को बाहर निकले हो क्‍या? अब हम प्रकृति से इतने कट गए हैं।

अगर हमारी urban body यह तय करे, लोगों को विश्‍वास में लेकर के करें कि भई हम पूर्णिमा की रात को street light नहीं जलाएंगे। इतना ही नहीं उस दिन festival मनाएंगे पूरे शहर में, सब मोहल्‍ले में लोग स्‍पर्धा करेंगे, सुई में धागा डालने की। एक community event हो जाएगा, एक आनंद उत्‍सव हो जाएगा और पर्यावरण की रक्षा भी होगी। चीज छोटी होती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि सभी Urban Body में महीने में एक बार इस चांदनी रात का उपयोग करते हुए अगर street light बंद की जाए तो कितनी ऊर्जा बचेगी? कितनी ऊर्जा बचेगी तो कितना emission हम कम करेंगे? लेकिन यही चीज इस carbon emission के हिसाब से रखोगे, तो यह जो so called अपने आप को पढ़ा-लिखा मानता हैं, वो कहे वाह नया idea है, लेकिन वही चींज हमारी गांव की दादी मां कहती वो सुई और धागे की कथा कहकर के कहेंगे, अरे क्‍या यह पुराने लोग हैं इनको कोई समझ नहीं है, देश बदल चुका है। क्‍या यह हम हमारे युवा को प्रेरित कर सकते हैं कि भई Sunday हो, Sunday on cycle मान लीजिए, हो सकता है कोई यह भी कह दें कि मोदी अब cycle कपंनियों के agent बन गया हैं। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है देश का। पता नहीं कौन क्‍या हर चीज का अर्थ निकालता है। जरूरी नहीं कि हर कोई लोग cycle खरीदने जाए, तय करे कि भई मैं सप्‍ताह में एक दिन ऊर्जा से उपयोग में आने वाले साधनों का उपयोग में नहीं करूंगा। अपनी अनुकूलता है।

समाज मैं जो life style की बात करता हूं हम पर्यावरण की रक्षा में इतना बड़ा योगदान दें सकते हैं। सहज रूप से दे सकते हैं और थोड़ा सा प्रयास करना पड़ता है। एक शिक्षक के जीवन को मैं बराबर जानता हूं। मैं जब गुजरात में मुख्‍यमंत्री था तो उन पिछड़े इलाकों में चला जाता था, जून महीने में कि जहां पर girl child education बहुत कम हो। 40-44 डिग्री Temperature रहा करता था जून महीने में और मैं ऐसे गांव में जाकर तीन दिन रहता था। जब तक मैं मुख्‍यमंत्री रहा वो काम regularly करता था। एक बार मैं समुद्री तट के एक गांव में गया। एक भी पेड़ नहीं था, पूरे गावं में कहीं पर नहीं, लेकिन जो स्‍कूल था, वो घने जंगलों में जैसे कोई छोटी झोपड़ी वाली स्‍कूल हो, ऐसा माहौल था। तो मेरे लिए आश्‍चर्य था। मैंने कहा कि यार कहीं एक पेड़ नहीं दिखता, लेकिन स्‍कूल बड़ी green है, क्‍या कारण है। तो वहां एक teacher था, उस teacher का initiative इतना unique initiative था, उसने क्‍या किया – कहीं से भी bisleri की बोतल मिलती थी खाली, उठाकर ले आता था, पेट्रोल पम्‍प पर oil के जो टीन खाली होते थे वो उठाकर ले आता था और लाकर के students को एक-एक देता था, साफ करके खुद और उनको कहता था कि आपकी माताजी जो kitchen में बर्तन साफ करके kitchen का जो पानी होता है, वो पानी इस बोतल में भरकर के रोज जब स्‍कूल में आओगे तो साथ लेकर के आओ। और हमें भी हैरानी थी कि सारे बच्‍चे हाथ में यह गंदा दिखने वाला पानी भरकर के क्‍यों आते हैं। उसने हर बच्‍चे को पेड़ दे दिया था और कह दिया था कि इस बोतल से daily तुम्‍हें पानी डालना है। Fertilizer भी मिल जाता था। एक व्‍यक्ति के अभिरत प्रयास का परिणाम था कि वो पूरा स्‍कूल का campus एकदम से हरा-भरा था। कहना का तात्‍पर्य है कि इन चीजों के लिए समाज का जो सहज स्‍वभाव है, उन सहज स्‍वभाव को हम कितना ज्‍यादा प्रेरित कर सकते हैं, करना चाहिए।

मैं एक बार इस्राइल गया था, इस्राइल में रेगिस्‍तान में कम से कम बारिश, एक-एक बूंद पानी का कैसे उपयोग हो, पानी का recycle कैसे हो, समुद्री की पानी से कैसे sweet water बनाया जाए, इन सारे विषयों में काफी उन्‍होंने काम किया है। काफी प्रगति की है। इस्राइल तो इस समय एक अभी भी रेगिस्‍तान है जहां हरा-भरा होना बाकी है और एक है पूर्णतय: उन्‍होंने रेगिस्‍तान को हरा-भरा बना दिया है।

बेन गुरियन जो इस्राइल के राष्‍ट्रपिता के रूप में माने जाते हैं, तो मैं जब इस्राइल गया था तो मेरा मन कर गया कि उनका जो निवासा स्‍थान है वो मुझे देखना है, उनकी समाधि पर जाना है। तो मैंने वहां की सरकार को request की थी बहुत साल पहले की बात है। तो मैं गया, उनका घर उस रेगिस्‍तान वाले इलाके में ही था, वहीं रहते थे वो। और दो चीजें मेरे मन को छू गई – एक उनके bedroom में महात्‍मा गांधी की तस्‍वीर थी। वे सुबह उठते ही पहले उनको प्रणाम करते थे और दूसरी विशेषता यह थी कि उनकी जो समाधि थी, उन समाधि के पास एक टोकरी में पत्‍थर रखे हुए थे। सामान्‍य रूप से इतने बड़े महापुरूष के वहां जाएंगे तो मन करता है कि फूल रखें वहां, नमन करे। लेकिन चूंकि उनको green protection करना है, greenery की रक्षा करनी है। फूल-फल इसको नष्‍ट नहीं करना, यह संस्‍कार बढ़ाने के लिए बेन बुरियन की समाधि पर अगर आपको आदर करना है तो क्‍या करना होता था उस टोकरी में से एक पत्‍थर उठाना और पत्‍थर रखना और शाम को वो क्‍या करते थे सारे पत्‍थर इकट्ठे करके के फिर टोकरी में रख देते थे। अब देखिए environment की protection के लिए किस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को लोग विकसित करते हैं। हम अपने आपसे बाकी सारी बातों के साथ-साथ हम अपने जीवन में इन चीजों को कैसे लाए उसके आधार पर हम इसको बढ़ावा दे सकते हैं। हमारे स्‍कूलों में, इन सब में किस प्रकार से एक माहौल बनाया जाए प्रकृति रक्षा, प्रकृति पूजा, प्रकृति संरक्षण यह सहज मानव प्रकृति का हिस्‍सा कैसे बने, उस दिशा में हमको जाना होगा। और हम वो लोग है जिनका व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता। यही जिनके जीवन का आदर्श रहा है। जहां व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता का आदर्श रहा हो, वहां पर हमें प्रकृति का शोषण करने का अधिकार नहीं है। हमें प्रकृति का दोहन करने से अधिक प्रकृति को उपयोग, दुरूपयोग करने का हक नहीं मिलता है। दुनिया में प्रकृत‍ि का शोषण ही प्रवृति है, भारत में प्रकृति को दोहन एक संस्‍कार है। शोषण ही हमारी प्रवृति नहीं है और इसलिए विश्‍व इस संकट से जो गुजर रहा है, मैं अभी भी मानता हूं कि दुनिया को इस क्षेत्र में बचाने के लिए नेतृत्‍व भारत ने करना चाहिए। और उस दिमाग से भारत ने अपनी योजनाएं बनानी चाहिए। दुनिया climate change के लिए हमें guide करे और हम दुनिया को follow करें। दुनिया parameter तय करे और हम दुनिया को follow करे, ऐसा नहीं है। सचमुच में इस विषय में हमारी हजारों साल से वो विरासत है, हम विश्‍व का नेतृत्‍व कर सकते हैं, हम विश्‍व का मार्गदर्शन कर सकते हैं और विश्‍व को इस संकट से बचाने के लिए भारत रास्‍ता प्रशस्‍त कर सकता है। इस विश्‍वास के साथ इस conference से हम निकल सकते हैं। हम दुनिया की बहुत बड़ी सेवा करेंगे। उस विजन के साथ हम अपनी व्‍यवस्‍थाओं के प्रति जो भी समयानुकूल हम बदलाव लाना है, हम बदलाव लाए। जैसे अभी अब यह तो हम नहीं कहेंगे..

अच्‍छा, कुछ लोगों ने मान लिया कि पर्यावरण की रक्षा और विकास दोनों कोई आमने-सामने है। यह सोच मूलभूत गलत है। दोनों को साथ-साथ चलाया जा सकता है। दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ do’s and don’ts होते हैं, इसका पालन होना चाहिए। अगर वो पालन होता है तो हम उसकी रखवाली भी करते हैं और उसके लिए कोई चीजें, जैसे अभी हमने कोयले की खदानें उसकी नीलामी की, लेकिन उसके साथ-साथ उनसे जो पहले राशि ली जाती थी environment protection के लिए वो चार गुना बढ़ा दी, क्‍योंकि वो एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। आवश्‍यक है तो वो भी बदलाव किया। हमारी यह कोशिश रहनी चाहिए कि हम इस प्रकार से बदलाव लाने की दिशा में कैसे प्रयास करे और अगर हम प्रयास करते तो परिणाम मिल सकता है। दूसरी बात है, ज्‍यादातर भ्रम हमारे यहां बहुत फैलाया जाता है। अभी Land Acquisition Bill की चर्चा हुई है। इस Land Acquisition Bill में कहीं पर भी एक भी शब्‍द वनवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, आदिवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, Forest Land के संबंध में नहीं है। वो जमीन, उसके मालिक, Land Acquisition bill के दायरे में आते ही नहीं है, लेकिन उसके बावजूद भी जिनको इन सारी चीजों की समझ नहीं है। वो चौबीसों घंटे चलाते रहते हैं। पता ही नहीं उनको कहीं उल्‍लेख तक नहीं है। उनको भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं समझता हूं कि समाज का गुमराह करने का इस प्रकार का प्रयास आपके लिए कोई छोटी बात होगी, आपके राजनीतिक उसूल होंगे लेकिन उसके कारण देश को कितना नुकसान होता है और कृपा करके ऐसे भ्रम फैलाना बंद होना चाहिए, सच्‍चाई की धरा पर पूरी debate होनी चाहिए। उसमें पक्ष विपक्ष हो सकता है, उसमें कुछ बुरा नहीं है, लोकतंत्र है। लेकिन आप जो सत्‍य कहना चाहते हो, उसमें दम नहीं है, इसलिए झूठ कहते रहो। इससे देश नहीं चलता है और इसलिए मैं विशेष रूप से वन विभाग से जुड़े हुए मंत्री और अधिकारी यहां उपस्थित हैं तो विशेष रूप से इस बात का उल्‍लेख करना चाहता हूं कि Land Acquisition Act के अंदर कहीं पर जंगल की जमीन, आदिवासियों की जमीन उसका कोई संबंध नहीं है। उस दायरे में वो आता नहीं है, हम सबको मालूम है कि उसका एक अलग कानून है, वो अलग कानूनों से protected है। इस कानून का उसके साथ कोई संबंध नहीं है, लेकिन झूठ फैलाया जा रहा है और इसलिए मैं चाहूंगा कि कम से कम और ऐसे मित्रों से प्रार्थना करूंगा कि देशहित में कम से कम ऐसे झूठ को बढ़ावा देने में आप शिकार न हो जाएं यह मेरा आग्रह रहेगा।

आज यह भी यहां बताया गया कि Tiger की संख्‍या बढ़ी है। करीब 40% वृद्धि हुई है। अच्‍छा लगता है सुनकर के वरना दुनिया में Tiger की संख्‍या कम होती जा रही है और दो-तिहाई संख्‍या हमारे पास ही है तो एक हमारा बहुत बड़ा गौरव है और यह गौरव मानवीय संस्‍कृति का भी द्योतक होता है। इन दोनों को जोड़कर हमें इस चीज का गौरव करना चाहिए। और विश्‍व को इस बात का परिचय होना चाहिए कि हम किस प्रकार की मानवीय संस्‍कृतियों को लेकर के जीते हैं कि जहां पर इतनी तेज गति से tiger की जनसंख्‍या का विकास हो रहा है। हमारे पूरब के इलाके में खासकर के हाथी को लेकर के रोज नई खबरें आती है। हा‍थी को लेकर के परेशानियां आती है। अभी मैं कोई एक science magazine पढ़ रहा था। बड़ी interesting चीज मैंने पहली बार पढ़ी, आप लोग तो शायद उसके जानकारी होगी। जब खेत में हाथियों का झुंड आ जाता है, तो बड़ी परेशानी रहती कैसे निकालना है, यह forest department के लोग भांति-भांति के सशत्र लेकर पहुंच जाते हैं और दो-दो दिन तक हो हल्‍ला हो जाता है। मैंने एक science magazine पढ़ा, कहीं पर लोगों ने प्रयोग किया है बड़ा ही Interesting प्रयोग लगा मुझे। वे अपने खेत के बाढ़ पर या पैड है उस पर Honey Bee को भी Developed करते हैं मधुमक्‍खी को रखते हैं और जब हाथी के झुंड आते हैं तो मधुमक्‍खी एक Special प्रकार की आवाज करती है और हाथी भाग जाता है। अब ये चीजे जो हैं कहीं न कहीं सफल हुई हैं आज भी शायद हमारे यहां हो सकता है कुछ इलाकों में करते भी होंगे। हमें इस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को भी समझना होगा ताकि हमें हाथियों से संघर्ष करना पड़ सके। मानव और हाथी के बीच जो संघर्ष के जो समाचार आते हैं, उससे हम कैसे बचें। हम हाथी की भी देखभाल करें, अपने खेत की भी देखभाल कर सकें। अगर ऐसे सामान्‍य व्‍यवस्‍थाएं विकसित हो सकती है और अगर यह सत्‍य है तो मैंने कहीं पढ़ा था, लेकिन किसी प्रत्‍यक्ष मेरी किसान से बात हुई नहीं है लेकिन मैं कभी असम की तरफ जाऊंगा तो पूछूंगा सबसे बात करूंगा कि क्‍या है जानकारी लाने का प्रयास करूंगा मैं, लेकिन आपसे में उस दिशा में काम करने वाले जहां हाथी की जनसंख्‍या हैं और गांवों में कभी-कभी चली आती हैं तो उनके लिए शायद हो सकता है कि ये अगर इस प्रकार का प्रयोग हुआ हो तो यह काम आ सकता है। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि यह जगत सब समस्‍याओं से जुड़ा हुआ होगा हम ही पहली बार गुजर रहे हैं ऐसा थोड़ी है और हरेक ने अपने-अपने तरीके से उसके उपाय खोजे होंगे। उनको फिर से एक बार वैज्ञानिक तरीके से वैज्ञानिक तराजू से देखा जाए कि हम इन चीजों को कैसे फिर से एक बार प्रयोग में ला सकते हैं। थोड़ा उसे Modify करके उसे प्रयोग में ला सकते हैं। इन दिनों जब पर्यावरण की रक्षा की बात आती है, तो ज्‍यादातर कारखानें और ऊर्जा उसके आस-पास चर्चा रहती है। भारत उस अर्थ में ईश्‍वर की कृपा वाला राष्‍ट्र रहा है कि जिसके पास Maximum solar Radiation वाली संभावना वाला देश है। इसका हमें Maximum उपयोग कैसे करना है और इसलिए सरकार ने Initiative लिया है कि हम Solar Energy हम Wind Energy Biomass Energy उस पर कितना ज्‍यादा बल दें ताकि हम जो विश्‍व की चिंता है उसमें हम मशरूफ हों। लेकिन मजा देखिए, जो दुनिया Climate के लिए Lead करती है, दुनिया को पाठ पढ़ाती है अगर हम उनको कहें कि हम Nuclear Energy में आगे जाना चाहते हैं कि Nuclear Energy Environment protection का एक अच्‍छा रास्‍ता है और हम उनको जब कहते हैं कि Nuclear Energy के लिए आवश्‍यक Fuel दो तो मना कर देते हैं यानी हम दुनिया की इतनी बड़ी सेवा करना चाहते हैं लेकिन आप सेवा करों यह नियम पालन करो व‍ह नियम पालन करो। मैं दुनिया के सभी उस देशवासियों से यह निवेदन करना चाहूंगा कि भारत जैसा देश जिस प्रकार से नेतृत्‍व करने के लिए तैयार है Environment protection के लिए Civil Nuclear की तरफ हमारा बल है। हम Nuclear Energy पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, हम उसे करने के लिए तैयार हैं क्‍योंकि हमें पता है कि पर्यावरण की रक्षा में अच्‍छे सा अच्‍छा रास्‍तों में महत्‍वपूर्ण है। लेकिन वही लोग जो हमें Environment के लिए भाषण देते हैं वो Nuclear के लिए Fuel देने के लिए तैयार नहीं है। ये दो तराजू से दुनिया नहीं चल सकती है और इसलिए विश्‍व पर हमें भी यह दबाव पैदा करना पड़ेगा और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में यह दबाव दिखने वाला है, लोग अनुभव करेंगे हम Solar Energy की तरफ जा रहे हैं। Biomass की तरफ जा रहे हैं। लेकिन मैं Urban Bodies को कहना चाहूंगा अगर हम स्‍वच्‍छ भारत की चर्चा करें तो भी और अगर हम Environment की चर्चा करें तो भी। Waste Water & Solid waste Management की दिशा में हम लोंगों को आग्रहपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। Public Private Partnership Model को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। Solid Waste Management की ओर हमने पूरा ध्‍यान देना चाहिए। और आज Waste Wealth का एक सबसे बड़ा Business है। Waste में से Wealth create करना एक बहुत बड़ा Entrepreneurship शुरू हुआ है। हम अपने Urban Bodies में इसको कैसे जोड़े। Urban Bodies में Waste में से Wealth को create पैदा करने में स्‍पेशल फोकस करें। और आप देखिए कि बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। एक छोटा सा प्रयोग है मैं Urban Bodies से आग्रह करूंगा मान लीजिए हम हिंदुस्‍तान में पांच सौ शहर पकड़े, जहां एक लाख से ज्‍यादा आबादी है और वहां पर हम तय करें अब देखिए आज जो शहर का कूड़ा-कचरा फेंकने के लिए जो जगह जमीन की जो जरूरत है हजारों एकड़ भूमि की जरूरत पड़ेगी अगर ये कचरों के ढेर करने हैं तो अब गमिल लाओंगे कहां से और अब जमीन नहीं हैं तो क्‍या मतलब है कि कूड़ा-कचरा पड़ा रहेगा क्‍या और इसलिए हमारे लिए उस पर Process करना Recycle करना Waste Management करना यह अनिवार्य हो गया है। अब वैज्ञानिक के तरीके उपलब्‍ध हैं अगर हम Urban Body Waste Water Treatment करें और पानी को ठीक करके अगर किसानों को वापिस दे वरना एक समय ऐसा आएगा शहर और गांव के बीच संघर्ष होगा पानी के लिए। गांव कहेगा कि मैं शहर को पानी नहीं देने दूंगा और शहर बिना पानी मरेगा। लेकिन जो अगर शहर पानी प्रयोग करता है उसको Recycle करके गांव को वापस दे देता है खेतों में तो यह संघर्ष की नौबत नहीं आएगी और एक प्रकार से Treated Water होगा तो Fertilizer की दृष्टि से उपयोग इस प्रकार से पानी को इस प्रकार से बनाकर दिया जा सकता है। और Urban Body जो होता है उसके गांव जो होते हैं वो ज्‍यादातर सब्‍जी की खेती करते हैं और वही सब्‍जी उनके शहर के अंदर बिकने के लिए आती हैं रोजमर्रा की उनकी आजीविका उससे चलती है। हम इन्‍हीं को Solid Waste Management करके Solid Waste में से हम मानव Fertilizer बनाएं और वो Fertilizer हम उनको दें तो Organic सब्‍जी शहर में आएगी कि नहीं आएगी। इतनी बड़ी मात्रा में अगर हम Fertilizer देते हैं शहरों के कूड़े-कचरों से बनाया हुआ तो अच्‍छी Quality का विपुल मात्रा में सब्‍जी शहर में आएगी तो सस्‍ती सब्‍जी मिलेगी या नहीं मिलेगी? सस्‍ती सब्‍जी गरीब से गरीब व्‍यक्ति खाएगा तो Nutrition के Problem का Solution होगा कि नहीं होगा। Vegetable Sufficient खाएगा तो Health सेक्‍टर का बजट कम होगा कि नहीं होगा। एक प्रयास कितने ओर चीजों पर इफैक्‍ट कर सकता है इसका अगर हम एक Integrated approach करें तो हम हमारे गांवों को भी बचा सकते हैं हमारे शहरों को भी बचा सकते हैं। कभी-कभार अज्ञान का भी कारण होता है। हमारे यहां देखा है कि फसल होने के बाद अब जैसे Cotton है Cotton लेने के बाद बाकी जो है उसको जला देते हैं। लेकिन उसी को अगर टुकड़े कर करके खेत में डाल दें तो वहीं चीज Nutrition के रूप में काम आती है Fertilizer के रूप में काम आती है। मैंने एक प्रयोग देखा था केले की खेती हमारे यहां हो रही थी तब केला उतारे के बाद केला देने की क्षमता जब कम हो जाती है तो वो जो पेड़ का हिस्‍सा होता है उसके टुकड़े कर कर के उन्‍हें जमीन में डाले और मैंने अनुभव किया कि उसके अंदर इतना Water Content होता है केले के Waste Part में कि 90 दिन तक आपको फसल को पानी नहीं देना पड़ता है वो उसी में से फसल पानी ले लेती है। अब हम थोड़ा सा इनका प्रयोग चीजों को सीखें, समझें। इसको अगर Popular करें तो हम पानी को भी बचा सकते हैं, फसल को भी बचा सकते हैं। हम चीजों को किस प्रकार से और इसके लिए बहुत बड़ा आधुनिक से आधुनिक बड़ा विज्ञान की जरूरत होती है ऐसा नहीं है। सहज समझ का विषय होता है इनको हम जितना आगे बढ़ाएंगे हम इन चीजों को कर सकते हैं। Urban Body आग्रहपूर्वक Public Private Partnership Model उसमें Vibrating Gap funding का भी रास्‍ता निकल सकता है। आप जो इन Waste खेतों के किसानों को उसके कारण अगर Chemical Fertilizer का उपयोग कम होता है तो Chemical Fertilizer में से जो सब्सिडी बचेगी मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं वो सब्सिडी जो बचेगी वो Vibrating Gap Funding के लिए शहरों को दे देंगे, यानी आपके देश में से Wealth Create होगी और जो आप खाद्य तैयार करोगे वो खाद्य उपयोग करने के कारण Chemical Fertilizer की सब्सिडी बचेगी वो आपको मिलेगी। आप गैस पैदा करोगे, गैस दोगो तो जितनी मात्रा में गैसा पैदा करोगे जो गैस सिलेंडर की जो सब्सिडी है वो बचेगी तो वो सब्सिडी हम आपको Transfer करेंगे आपके Vibrating Gap Funding में काम आएगी। हम एक उसका Finance का Model कर सकते हैं, लेकिन भारत सरकार, राज्‍य सरकार और Local Self Government ये तीनों मिल करके हम Environment को Priority देते हुए हमारे नगरों को स्‍वच्‍छ रखते हुए, वहां के कूड़े-कचरे को Waste में Wealth Create करें और बहुत Entrepreneur मिले हैं। उनको हम कैसे प्रयोग में हम करें मैंने एक जगह देखा है जहां पर Waste में से ईंटे बना रहे हैं और इतनी बढि़या ईंटे मजबूत बन रही हैं कि बहुत काम आ रही है। आपने देखा होगा पहले जहां पर बिजली के थर्मल प्‍लांट हुआ करते थे वहां पर बाहर कोयले की Ash जो होता है उसके ढेर लगे रहते थे। आज Recycle और Chemical में से ईंटे बनने के कारण सीमेंट में उपयोग आने के कारण वो निकलते ही Contract हो जाता है और दो-दो साल का Contract और निकलते ही हम उठाएंगे यानी कि जो किसी पर्यावरण को बिगाड़ने के लिए संकट था वो ही आज Property में Convert हो गया है हम थोड़ा इस दिशा में प्रयास करें, initiative लें, हम इसमें काफी मदद कर सकते हैं और मेरा सबसे आग्रह है कि हम इन चीजों को बल मानते हुए आने वाले दिशों में दो दिन जब आप चर्चा करेंगे। गंगा की सफाई उसके साथ जुड़ा हुआ है गंगा के किनारे पर रहने वाले, गंगा किनारे के गांव और शहर मैं उन संबंधित राज्‍य सरकारों से आग्रह करूंगा इसमें कोई Comprise मत कीजिए। बैंकों से हम आग्रह करेंगे उनको हम कम दर से लोन दें। लेकिन Approved Plant उनमें वो लगाये जाएं Sewerage Treatment plant किये जाएं। एक बार हमने सफलतापूर्वक ढाई हजार किलोमीटर लम्‍बी गंगा के अंदर जाने वाले प्रदूषण को रोक लिया पूरे दुनिया के सामने और पूरे हिंदुस्‍तान के सामने एक नया विश्‍वास पैदा कर सकता है कि हम सामान्‍य अपने तौर तरीकों से पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं। यह विश्‍वास पैदा करने के लिए Model की तरह इस काम को खड़ा करना और ये एक बार काम खड़ा हो गया तो और काम अपने आप खड़े हो जाएंगे। एक विश्‍वास पैदा करने की आवश्‍यकता है और किया जा सकता है। एक बार हम किसी चीज को हाथ लगाएं पीछे लग जाएं परिणाम मिल सकता है और मैं चाहूंगा ज्‍यादातर इन पांच राज्‍यों से कि जो गंगा के किनारे की उनकी जिम्‍मेवारी है छह हजार के करीब गांव है, एक सौ 18000 किलोमीटर हैं कोई आठ सौ के करीब Industries हैं जो Pollution के लिए तैयार है इसको Target करते हुए एक बार गंगा के किनारे पर हम तय कर ले वहां से कोई भी दूषित पानी या कूड़ा-कचरा गंगा में जाने नहीं देंगे। आप देखिए अपने आप में बदलाव शुरू हो जाएगा। फिर तो गंगा की अपनी ताकत भी है खुद को साफ रखने की। और वो हमने आगे निकल जाएगी लेकिन हम तय करे कि हम गंदा नहीं करेंगे तो गंगा को साफ करने के लिए तो हमें गंदा नहीं करना पड़ेगा गंगा अपना खुद कर सकती है। लेकिन हम गंदा न करे इतना तो संकल्‍प करना पड़ेगा और उस काम को ले करके आप जब यहां पर बैठे है जो गंगा किनारे को जो इस विभाग के मंत्री हैं वो विशेष रूप से आधा-पौना घंटा बैठ करके उन चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जाए। विशेष रूप से चर्चा करें मेरा आग्रह रहेगा फिर एक बार मैं इस प्रयास का स्‍वागत करता हूं और मुझे विश्‍वास है कि इस सपने के साथ फिर एक बार मैं दोहराता हूं ये एक ऐसा विषय है जो हमारी बपौती है, हमारा डीएनए है। हमारे पूर्वजों ने इन मानव जाति की बहुत बड़ी सेवा की है। विश्‍व का नेतृत्‍व हमारे पास ही होना चाहिए Climate के मुद्दे पर ये मिजाज होना चाहिए। पूरे विश्‍व को हम दिखा सकते हैं कि यह हमारा विषय है। हमारी परंपरा है। दुनिया को हम सीखा सकते हैं इतनी ताकत के साथ हम यहां से निकले यही अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं धन्‍यवाद।

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നടന്നു പോയിക്കോളും എന്ന മനോഭാവം മാറ്റാനുള്ള സമയമാണിത്, മാറ്റം വരുത്താനാവും എന്ന് ചിന്തിക്കുക: പ്രധാനമന്ത്രി മോദി

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നടന്നു പോയിക്കോളും എന്ന മനോഭാവം മാറ്റാനുള്ള സമയമാണിത്, മാറ്റം വരുത്താനാവും എന്ന് ചിന്തിക്കുക: പ്രധാനമന്ത്രി മോദി
Dreams take shape in a house: PM Modi on PMAY completing 3 years

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Whenever it has been about national good, the Rajya Sabha has risen to the occasion: PM
November 18, 2019
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The Rajya Sabha gives an opportunity to those away from electoral politics to contribute to the nation and its development: PM
Whenever it has been about national good, the Rajya Sabha has risen to the occasion and made a strong contribution: PM
Our Constitution inspires us to work for a Welfare State. It also motivates us to work for the welfare of states: PM Modi

आदरणीय सभापति जी और सम्‍मानीय गृह, आपके माध्‍यम से इस 250वें सत्र के निमित्‍त मैं यहां मौजूद सभी सासंदों को बहुत-बहुत बधाई देता हूं, लेकिन इस 250 सत्रों के दरम्‍यान ये जो यात्रा चली है, अब तक जिन-जिन ने योगदान दिया है, वे सभी अभिनंदन के अधिकारी हैं, मैं उनका भी आदरपूर्वक स्‍मरण करता हूं।

सभापति जी, आप जब बहुत ही articulate way में दो अलग-अलग घटनाओं को जोड़ करके अभी प्रस्‍तुत कर रहे थे, मुझे जरूर लगता है कि देश में जो लोग लेखन के शौकीन हैं, वे जरूर इस पर अब गौर करेंगे, लिखेंगे कि 250 सत्र, यह अपने-आप में समय व्‍यतीत हुआ ऐसा नहीं है; एक विचार यात्रा भी रही है। जैसा आपने कहा कि कभी एक बिल ऐसा आया था तो जाते-जाते उसी के बिल्कुलअलग सा नया बिलइस प्रकार से आया। समय बदलता गया, परिस्थितियां बदलती गईं और इस सदन ने बदली हुई परिस्थितियों को आत्‍मसात करते हुए अपने को ढालने का प्रयास किया। मैं समझता हूं यह बहुत बड़ी चीज है और इसके लिए सदन के सभी सदस्‍य जिन्‍होंने तब तक काम किया, बधाई के पात्र हैं, वरना किसी को लग सकता है भई 20 साल पहले मैंने तो ये stand लिया था अब मैं stand कैसे बदल सकता हूं। लेकिन आपने जिस प्रकार से articulate करके इस बात को प्रस्‍तुत किया, वह हमारी विचार यात्रा का प्रतिबिम्‍ब है, भारत की विकास यात्रा का प्रतिबिम्‍ब है और वैश्विक परिवेश में भारत किस प्रकार से नई-नई बातों को लीड करने का सामर्थ्‍य रखता है, उसका उसमें प्रतिबिम्‍ब है। और ये काम इस सदन से हुआ है, इसलिए सदन अपने-आप में गौरव अनुभव करता है।

मेरे लिए सौभाग्‍य का विषय है कि आज इस महत्‍वपूर्ण अवसर का साक्षी बनने का और इसमें शरीक होने का मुझे अवसर मिला है। ये साफ कह सकते हम कि कभी चर्चा चल रही थी संविधान निर्माताओं के बीच में कि सदन एक हो या दो हों, लेकिन अनुभव कहता है कि संविधान निर्माताओं ने जो व्‍यवस्‍था दी, वो कितनी उपयुक्‍त रही है और कितना बढ़िया contribution किया है। अगर निचला सदन जमीन से जुड़ा हुआ है तो ऊपरी सदन दूर तक देख सकता है। और इस प्रकार से भारत की विकास यात्रा में निचले सदन से जमीन से जुड़ी हुई तत्‍कालीन चीजों का अगर प्रतिबिम्‍ब व्‍यक्‍त होता है तो यहां बैठे हुए महानुभावों से क्‍योंकि ऊपर है, ऊपर वाला जरा दूर का देख सकता है, तो दूर की दृष्टि का भी अनुभव, इन दोनों का combination इन हमारे दोनों सदनों से हमको देखने को मिलता है।

इस सदन ने कई ऐतिहासिक पल देखे हैं। इतिहास बनाया भी है और बनते हुए इतिहास को देखा भी है और जरूरत पड़ने पर उस इतिहास को मोड़ने में भी इस सदन ने बहुत बड़ी सफलता पाई है। उसी प्रकार से इस देश के गणमान्‍य दिग्‍गज महापुरुषों ने इस सदन का नेतृत्‍व किया है, इस सदन में सहभागिता की है और इसके कारण हमारे देश की इस विकास यात्रा को और आजादी के बाद की बहुत सी चीजें गढ़नी थीं। अब तो 50-60 साल के बाद बहुत सी चीजों ने शेप ले ली है, लेकिन वो शुरूआत काल में fear of unknown से हमें गुजरना पड़ता था। उस समय जिस maturity के साथ सबने नेतृत्‍व किया है, दिया है; ये अपने-आप में बहुत बड़ी बात है।

आदरणीय सभापति जी ये सदन की बड़ी विशेषता है और दो पहलू खास हैं- एक तो उसका स्‍थायित्‍व permanent कहें या eternal कहें, और दूसरा है विविधता diversity. स्‍थायित्‍व इसलिए है, eternal इसलिएहै कि लोकसभा तो भंग होती है, इसका जन्‍म हुआ न अब तक कभी भंग हुई है न भंग होना है, यानी ये eternal है। लोग आएंगे, जाएंगे लेकिन ये व्‍यवस्‍था eternal रहती है। ये अपनी उसकी एक विशेषता है। और दूसरा है विविधता- क्‍योंकि यहां राज्‍यों का प्रतिनिधित्‍व प्राथमिकता है। एक प्रकार से भारत के फेडरल स्ट्रक्चर की आत्‍मा यहां पर हर पल हमें प्रेरित करती है। भारत की विविधता, भारत के अनेकता में एकता के जो सूत्र है, उसकी सबसे बड़ी ताकत इस सदन में नजर आती है और वो समय-समय पर ये reflect भी होती रहती है। उसी प्रकार से उन विविधताओं के साथ हम जब आगे बढ़ते हैं तब, इस सदन का एक और लाभ भी है कि हर किसी के लिए चुनावी अखाड़ा पार करना बहुत सरल नहीं होता है, लेकिन देश हित में उनकी उपयोगिता कम नहीं होती है। उनका अनुभव, उनका सामर्थ्‍य उतना ही मूल्‍यवान होता है। तो ये एक ऐसी जगह है कि जहां इस प्रकार के सामर्थ्‍यवान महानुभाव, भिन्‍न-भिन्‍न क्षेत्रों के अनुभवी लोग, उनका लाभ देश के राजनीतिक जीवन को, देश के नीति-निर्धारण के अंदर उनका बहुत बड़ा लाभ मिलता है और समय-समय पर मिला है। वैज्ञानिक हों, खेल जगत के लोग हों, कला जगत के लोग हों, कलम के धनी हों, ऐसे अनेक महानुभावों का लाभ जिनके लिए चुनावी अखाड़े से निकल करके आना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन इस व्‍यवस्‍था के कारण हमारी इस बौद्धिक संपदा की भी एक richness हमें इससे प्राप्‍त हुई है।

और इन 250 सत्रों में और मैं मानता हूं इसका सबसे बड़ा उदाहरण बाबा साहेब अम्‍बेडकर स्‍वयं हैं। क्‍योंकि किसी न किसी कारण से उनको लोकसभा में पहुंचने नहीं दिया गया। लेकिन यही तो राज्‍यसभा थी जहां बाबा साहेब अम्‍बेडकर के कारण देश को बहुत लाभ मिला और इसलिए हम इस बात पर गर्व करते हैं कि ये सदन है जहां से देश को बाबा साहेब अम्‍बेडकर जैसे अनेक महापुरुषों का हमें बहुत ही लाभ मिला। ये भी देखा गया है कि एक लंबा कालखंड ऐसा था कि जहां विपक्ष जैसा कुछ खास नहीं था, विरोध भाव भी बहुत कम था- ऐसा एक बहुत बड़ा कालखंड रहा है। और उस समय जो शासन व्‍यवस्‍था में जो लोग बैठे थे उनका वो एक सौभाग्‍य रहा कि उनको इसका बहुत बड़ा सौभाग्‍य भी मिला जो आज नहीं है। आज डगर-डगर पर संघर्ष रहते हैं, डगर-डगर पर विरोध भाव व्‍यक्‍त रहता है। लेकिन उस समय जबकि विरोध पक्ष न के बराबर था, इस सदन में ऐसे बहुत ही अनुभवी और विद्वान लोग बैठे थे कि उन्‍होंने शासन व्‍यवस्‍था में कभी भी निरंकुशता नहीं आने दी। शासन में बैठे हुए लोगों को सही दिशा में जाने के लिए प्रेरित करने के कठोर काम इसी सदन में हुए हैं। ये एक यानी कितनी बड़ी सेवा हुई है, इसका हम गर्व कर सकते हैं और ये हम सबके लिए‍ स्‍मरणीय है।

आदरणीय सभापति जी, हमारे प्रथम उप-राष्‍ट्रपति जी डॉक्‍टर सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन जी ने इस सदन के संबंध में जो बात कही थी, मैं उसको आपके सामने प्रस्‍तुत करना चाहूंगा। डॉक्‍टर राधाकृष्‍णन जी ने कहा था, इसी चेयर पर बैठकर उन्‍होंने कहा था और वो आज भी उतना ही उपयुक्‍त है। और आप आदरणीय प्रणब मुखर्जी की बात का उल्‍लेख करते हों या स्‍वयं अपना दर्द व्‍यक्‍त करते हों, ये सारी बातें उसमें हैं और उस समय राधा कृष्‍णन जी ने कहा था- हमारे विचार, हमारा व्‍यवहार, और हमारी सोच ही दो सदनों वाली हमारी संसदीय प्रणाली के औचित्‍यको साबित करेगी। संविधान का हिस्‍सा बनी इस द्विसदनीय व्‍यवस्‍था की परीक्षा हमारे कामों से होगी। हम पहली बार अपनी संसदीय प्रणाली में दो सदनों की शुरूआत कर रहे हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम अपनी सोच, सामर्थ्‍य और समझ से देश को इस व्‍यवस्‍था का औचित्‍य साबित करें।

250 सत्र की यात्रा के बाद, अनुभव का इतना संपूर्ण होने के बाद वर्तमान की ओर आने वाली पीढ़ियों का दायित्‍व और बढ़ जाता है कि डॉक्‍टर राधाकृष्‍णन जी ने जो अपेक्षा की थी, कहीं हम उससे नीचे तो नहीं जा रहे हैं, क्‍या हम उन अपेक्षाओं को पूरा कर रहे हैं, या बदलते हुए युग में हम उन अपेक्षाओं को भी और अच्‍छा value addition कर रहे हैं, ये सोचने का समय है। और मुझे विश्‍वास है कि सदन की वर्तमान पीढ़ी भी और आने वाली पीढ़ी भी डॉक्‍टर राधाकृष्‍णन जी की अपेक्षाओं को पूर्ण करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहेगी और उसे आने वाले दिनों में देश को...।

अगर अब, जैसा अभी आदरणीय सभापति जी ने कहा, अगर हम पिछले 250 सत्रों की विवेचना करें तो कई महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक बिल यहां पास हुए हैं जो एक प्रकार से देश के कानून बने, देश के जीवन को चलाने का आधार बने हैं। और मैं भी पिछले अगर पांच साल का हिसाब-किताब देखूं तो मेरे लिए बड़े सौभाग्‍य की बात है कि ऐसी अनेक महत्‍वपूर्ण घटनाओं का साक्षी बनने का अवसर मुझे भी मिला है। विद्ववतापूर्ण हर किसी के विचार सुनने कामुझे सौभाग्‍य मिला है और कई बातों को नए सिरे से देखने का अवसर इसी सदन से मिला है। और इसके लिए मैं खुद लाभान्वित हुआ हूं, और मैं सबका आभारी भी हूं और ये अगर हम चीजों को अगर सीखें, समझें तो बहुत कुछ मिलता है और वो मैंने यहां अनुभव किया है। तो मेरे लिए आप सबके बीच कभी-कभी आ करके सुनने का मौका मिलता है, वो अपने-आप में एक सौभाग्‍य है।

अगर हम पिछले पांच साल की ओर देखें, यही सदन है जिसने तीन तलाक का कानून होगा कि नहीं होगा, हरेक को लगता था यहीं पर अटक जाएगा, लेकिन इसी सदन की maturity है कि उसने एक बहुत बड़ा महत्‍वपूर्ण women empowerment का काम इसी सदन में किया गया। हमारे देश में आरक्षण का विरोध करके हर पल संघर्ष के बीज बोए गए हैं। उसमें से तनाव पैदा करने के भरसक प्रयास भी किए गए हैं। लेकिन ये गर्व की बात है कि इसी सदन ने सामान्‍य वर्ग के गरीब परिवार का दस प्रतिशत आरक्षण का निर्णय किया, लेकिन देश में कहीं तनाव नहीं हुआ, विरोध भाव पैदा नहीं हुआ, सहमति का भाव बना, ये भी इसी सदन के कारण संभव हुआ है।

इस प्रकार से हम जानते हैं जीएसटी- लंबे अर्से से जो भी कोई, शासन में जिसकी जिम्‍मेदारी है, हरेक ने मेहनत की। कमियां हैं, नहीं है, सुधरनी चाहिए-नहीं सुधरनी चाहिए- ये सारी debate चलती रही लेकिन One Nation One Tax System की ओर इसी सदन ने सर्व-सम्‍मति बना करके देश को दिशा देने का काम किया है और उसी के कारण एक नए विश्‍वास के साथ विश्‍व में हम अपनी बात रख पा रहे हैं।

देश की एकता और अखंडता- इसी सदन में 1964 में जो वादे किए गए थे कि एक साल के भीतर-भीतर इस काम को कर दिया जाएगा, जो नहीं हो पाया था; वो धारा 370 और 35(ए) इसी सदन में और देश को दिशा देने का काम इस सदन में पहले किया बाद में लोकसभा ने किया है और इसलिए ये सदन अपने-आप में देश की एकता-अखंडता के लिए इतने महत्‍वपूर्ण निर्णय के अंदर इतनी जो भूमिका अदा की है, वो अपने आप में। और ये भी एक विशेषता है कि इस सदन इस बात के लिए जिस बात को याद करेगा कि संविधान के अंदर धारा 370 आई, उसको introduce करने वाले मिस्‍टर एन गोपालास्‍वामी, वो इस सदन के प‍हले नेता थे, फर्स्‍ट लीडर थे वो, तो उन्‍होंने इसको रखा था और इसी सदन ने उसको निकालने का काम भी बड़े गौरव के साथ करके- वो एक घटना अब एक इतिहास बन चुकी है, लेकिन यहीं पर हुआ है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने हमको जो दायित्‍व दिया है, हमारी प्राथमिकता है कल्‍याणकारी राज्‍य, लेकिन उसके साथ एक जिम्‍मेदारी है- राज्‍यों का कल्‍याण। यानी भारत as such हम कल्‍याणकारी राज्‍य के रूप में काम करें लेकिन at the same time हम लोगों का दायित्‍व है- राज्‍यों का भी कल्‍याण। और ये दोनों मिल करके, राज्‍य और केन्‍द्र मिल करके ही देश को आगे बढ़ा सकते हैं और उस काम को करने में इस सदन ने क्‍योंकि ये राज्‍य का representation पूरी ताकत के साथ करते हैं, बहुत बड़ी भूमिका निभाई है और हमारी संवैधानिक संस्‍थाओं को ताकत देने का भी हमने काम किया है। हमारा संघीय ढांचा, हमारा देश के विकास के लिए अहम शर्त है और राज्‍य और केंद्र सरकारें मिल करके काम करें, तभी प्रगति संभव होती है।

राज्‍यसभा इस बात को सुनिश्चित करती है कि देश में केंद्र और राज्‍य सरकारें प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। लेकिन हम प्रतिभागी बन करके, सहभागी बन करके देश को आगे ले जाने का काम करते हैं। यहां जिन विचारों का आदान-प्रदान होता है, उसका जो अर्क है, जो यहां के प्रतिनिधि अपने राज्‍य में ले जाते हैं, अपने राज्‍य की सरकारों को बताते हैं। राज्‍य की सरकारों को उसके साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करने का काम जाने-अनजाने भी सतर्क रूप में हमें करने की आवश्‍यकता होती है।

देश का विकास और राज्‍यों का विकास- ये दो अलग चीजें नहीं हैं। राज्‍य के विकास के बिना देश का विकास संभव नहीं है और देश के विकास का नक्‍शा राज्‍यों के विकास के विपरीत होगा, तो भी राज्‍य विकास नहीं कर पाएंगे। और इन बातों को ये सदन सबसे ज्‍यादा प्रतिबिम्बित करता है, जीवंतता के साथ प्रतिबिम्बित करता है। बहुत सी नीतियां केंद्र सरकार बनाती है। उस नीतियों में राज्‍यों की अपेक्षाएं, राज्‍यों की स्थिति, राज्‍यों का अनुभव, राज्‍यों की रोजमर्रा की दिक्‍कतें- उन बातों को सरकार के नीति-निर्धारण में बहुत ही सटीक तरीके से कोई ला सकता है तो ये सदन ला सकता है, इस सदन के सदस्‍य लाते हैं। और उसी का लाभ federal structure को भी मिलता है। सब काम एक साथ होने वाले नहीं हैं, कुछ काम इस पांच साल होंगे तो कुछ अगले पांच साल होंगे, लेकिन दिशा तय होती है और वो काम यहां से हो रहा है, यह अपने-आप में...।

आदरणीय सभापति जी, 2003 में जब इस सदन के 200 साल हुए थे, तब भी एक समारंभ हुआ था और तब भी सरकार एनडीए की थी और अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। तो उस 200वें सत्र के समय आदरणीय अटलजी का जो भाषण था, बड़ा interesting था। उनका बात करने का अपना एक लहजा था। उन्‍होंने कहा था कि हमारे संसदीय लोकतंत्र की शक्ति बढ़ाने के लिए second chamber मौजूद है और उन्‍होंने ये भी चेतावनी दी थी कि second house को कोई secondary house बनाने की गलती न करें। ये चेतावनी अटलजी ने दी थी कि second house को कभी भी secondary house बनाने की गलती न करें।

अटलजी की उन बातों को जब मैं पढ़ रहा था तो मुझे भी लगा कि इसको आज के संबंध में कुछ नए तरीके से अगर प्रस्‍तुत करना है तो मैं कहूंगा कि राज्‍यसभा second house है, secondary house कभी भी नहीं है और भारत के विकास के लिए इसे supportive house बने रहना चाहिए।

जब हमारी संसदीय प्रणाली के 50 साल हुए तब अटलजी का एक भाषण हुआ था, संसदीय प्रणाली के 50 साल पर और उस भाषण में बड़े कवि भाव से उन्‍होंने एक बात बताई थी। उन्‍होंने कहा था- एक नदी का प्रवाह तभी तक अच्‍छा रहता है जब तक कि उसके किनारे मजबूत होते हैं। और उन्‍होंने कहा था कि भारत का संसदीय जो प्रवाह है वो हमारा जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया है- एक किनारा लोकसभा है, दूसरा किनारा राज्‍यसभा है। ये दो मजबूत रहेंगे, तभी जा करके लोकतांत्रिक परम्‍पराओं का प्रवाह बहुत ही सटीक तरीके से आगे बढ़ेगा। ये बात आदरणीय अटलजी ने उस समय कही थी।

ये एक बात निश्चित है कि भारत federal structure है, विविधताओं से भरा हुआ है, तब ये भी अनिवार्य शर्त है कि हमें राष्‍ट्रीय दृष्टिकोण से ओझल नहीं होना है। राष्‍ट्रीय दृष्टिकोण को हमें हमेशा केंद्रवर्ती रखना ही होगा। लेकिन हमें राष्‍ट्रीय दृष्टिकोण के साथ क्षेत्रीय जो हित है इसका संतुलन भी बहुत सटीक तरीके से बनाना पड़ेगा, तभी जा करके हम उस भाव को, उस संतुलन के द्वारा आगे बढ़ा पाएंगे। और ये काम सबसे अच्‍छे ढंग से कहीं हो सकता है तो इस सदन में हो सकता है, यहां के माननीय सदस्‍यों के द्वारा हो सकता है और मुझे विश्‍वास है कि वो काम करने में हम निरंतर प्रयासरत हैं।

राज्‍यसभा एक प्रकार से checks and balance का विचार उसके मूल सिद्धांतों के लिए बहुत ही महत्‍वपूर्ण है। लेकिन checking और clogging, इसके बीच अंतर बनाए रखना बहुत आवश्‍यक होता है। Balance and blocking, इसके बीच भी हमें बैलेंस बनाए रखना बहुत आवश्‍यक होता है। एक प्रकार से हमारे अनेक महानुभाव ये बात बार-बार कहते हैं कि भई सदन चर्चा के लिए होना चाहिए, संवाद के लिए होना चाहिए, विचार-विमर्श के लिए होना चाहिए। तीखे से तीखे स्‍वर में विवाद हो, कोई उससे नुकसान होने वाला नहीं है, लेकिन आवश्‍यक है कि रुकावटों के बजाय हम संवाद का रास्‍ता चुनें।

मैं आज, हो सकता है मैं जिनका उल्‍लेख कर रहा हूं, इसके सिवाय भी लोग होंगे, लेकिन मैं दो दलों का आज मैं उल्‍लेख करना चाहूंगा- एक एनसीपी और दूसरा बीजेडी। और किसी का नाम छूट जाए तो मुझे क्षमा करना, लेकिन मैं दो का उल्‍लेख कर रहा हूं। इन दोनों दलों की विशेषता देखिए- उन्‍होंने खुद ने discipline तय किया है कि हम well में नहीं जाएंगे और मैं देख रहा हूं कि एक बार भी उनके एक भी सदस्‍य ने नि‍यम को तोड़ा नहीं है। हम सभी राजनीतिक दलों को सीखना होगा कि including my party. हम सबको सीखना होगा कि ये नियम का पालन करने के बावजूद भी न एनसीपी की राजनीतिक विकास यात्रा में कोई रुकावट आई है और बीजेडी की राजनीतिक विकास यात्रा में रुकावट आई है। मतलब well में न जा करके भी लोगों के दिल जीत सकते हैं, लोगों का विश्‍वास जीत सकते हैं। ये और इसलिए मैं समझता हूं including treasury bench हम लोगों ने ऐसी जो उच्‍च परम्‍पराएं जिन्‍होंने निर्माण की हैं, उनका कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ है, क्‍यों न हम उनसे कुछ सीखें। हमारे सामने वो मौजूद हैं और मैं चाहूंगा कि हम भी वहां बैठे तो हमने भी वो काम किया है। और इसलिए मैं इस सारे सदन के लिए कह रहा हूं कि हम एनसीपी, बीजेडी- दोनों ने जो ये बहुत उत्‍तम तरीके से इस चीज को discipline follow किया, ये जो कभी न कभी इसकी चर्चा भी होनी चा‍हिए, उनका धन्‍यवाद करना चाहिए। और मैं मानता हूं आज जब 250 सत्र कर रहे हैं तो ऐसी उत्‍तम जो घटना है, उसका जिक्र होना चाहिए और लोगों के ध्‍यान में लानी चाहिए।

मुझे विश्‍वास है कि सदन की गरिमा की दिशा में जो भी आवश्‍यक है उसको करने में सभी सदस्‍य अपनी भूमिका अदा करते रहते हैं। आपकी वेदना, व्‍यथा प्रकट होती रहती है। हम सब कोशिश करेंगे, इस 250वें सत्र पर हम सब संकल्‍प लेंगे, विशेष करके हम लोग भी लेंगे ताकि आपको कम से कम कष्‍ट हो, आपकी भावनाओं का आदर हो और आप जैसा चाहते हैं वैसा ही ये सदन चलाने में हम आपके साथी बन करके सारे discipline को follow करते हुए करने का प्रयास करें।

इस संकल्‍प के साथ मैं फिर एक बार इस महत्‍वपूर्ण पड़ाव पर सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। और जिन्‍होंने यहां तक पहुंचाया है, उन सबका धन्‍यवाद करते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।