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भाईयों और बहनों,

आप सबका स्‍वागत है। दो दिन बड़ी विस्‍तार से चर्चा होने वाली है। इस मंथन में से कई महत्‍वपूर्ण बाते उभरकर के आएगी जो आगे चलकर के नीति या नियम का रूप ले सकती है और इसलिए हम जितना ज्‍यादा एक लम्‍बे विजन के साथ इन चर्चाओं में अपना योगदान देंगे तो यह दो दिवसीय सम्‍मेलन अधिक सार्थक होगा। इस विषय में कुछ बातें बताने का आज मन करता है मेरा। Climate के संबंध में या Environment के संबंध में प्रारंभ से कुछ हमारी गलत अभिव्‍यक्ति रही है और हम ऐसे जैसे अपनी बात को दुनिया के आगे प्रस्‍तुत किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे हमें न Climate की परवाह है न Environment की परवाह है। और सारी दुनिया हमारी इस अभिव्‍यक्ति की गलती के कारण यह मानकार के बैठी कि विश्‍व तो Environment conscious हो रहा है। विश्‍व climate की चिंता कर रहा है कि यह देश है जो कोई अडंगे डाल रहा है और इसका मूल कारण यह नहीं है कि हमने environment को बिगाड़ने में कोई अहम भूमिका निभाई है। climate को बर्बाद करने में हमारी या हमारे पूर्वजों की कोई भूमिका रही है। हकीकत तो उल्‍टी है। हम उस परंपरा में पले है, उन नीति, नियम और बंधनों में पले-बढ़े लोग हैं, जहां प्रकृति को परमेश्‍वर के रूप माना गया है, जहां पर प्रकृति की पूजा को सार्थक माना गया है और जहां पर प्रकृति की रक्षा को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ा गया है। लेकिन हम अपनी बात किसी न किसी कारण से, एक तो हम कई वर्षों से गुलाम रहे, सदियों से गुलाम रहने के कारण एक हमारी मानसिकता भी बनी हुई है कि अपनी बात दुनिया के सामने रखते हुए हम बहुत संकोच करते हैं। ऐसा लगता है कि यार कहीं यह आगे बढ़ा हुआ विश्‍व हम Third country के लोग। हमारी बात मजाक तो नहीं बन जाएगी। जब तक हमारे भीतर एक confidence नहीं आता है, शायद इस विषय पर हम ठीक से deal नहीं कर पाएंगे।

और मैं आज इस सभागृह में उपस्थित सभी महानुभावों से आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूं हम जितने प्रकृति के विषय में संवेदनशील है। दुनिया हमारे लिए सवालिया निशान खड़ा नहीं कर सकती है। आज भी प्रति व्‍यक्ति अगर carbon emission में contribution किसी का होगा तो कम से कम contribution वालों में हम है। लेकिन उसके बाद भी आवश्‍यकता यह थी कि विश्‍व में जब climate विषय में एक चिंता शुरू हुई, भारत ने सबसे पहले इसका नेतृत्‍व करना चाहिए था। क्‍योंकि दुनिया में अधिकतम वर्ग यह है कि जो climate की चिंता औरों पर restriction की दिशा में करता रहता है, जबकि हम लोग सदियों से प्रकृति की रक्षा करते-करते जीवन विकास की यात्रा में आगे बढ़ने के पक्षकार रहे हैं। दुनिया जो आज climate के संकट से गुजर रही है, Global Warming के संकट से गुजर रही है, उसको अभी भी रास्‍ता नहीं मिल रहा है कि कैसे बचा जाए, क्‍योंकि वो बाहरी प्रयास कर रहे हैं। और मैंने कई बार कहा कि इन समस्‍या की जड़ में हम carbon emission को रोकने के लिए जो सारे नीति-नियम बना रहे हैं, विश्‍व के अंदर एक बंधनों की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन हम कोई अपनी Life Style बदलने के लिए तैयार नहीं है। समस्‍या की जड़ में मानवजात जो कि उपभोग की तरफ आगे बढ़ती चली गई है और जहां ज्‍यादा उपभोग की परंपरा है, वहां सबसे ज्‍यादा प्रकृति का नुकसान होता है, जहां पर उपभोग की प्रवृति कम है, वहां प्रकृति का शोषण भी कम होता है और इसलिए हम जब तक अपने life style के संबंध में focus नहीं करेंगे और दुनिया में इस एक बात को केंद्र बिंदु में नहीं लाएंगे हम शायद बाकी सारे प्रयासों के बावजूद भी, लेकिन यह जो बहुत आगे बढ़ चुके देश है, उनके गले उतारना जरा कठिन है। वो माने न माने हम तो इन्‍हीं बातों में पले-बढ़े लोग हैं। हमें फिर से अगर वो चीजें भूला दी गई है, तो हमें उस पर सोचना चाहिए। मैं उदाहरण के तौर पर कहता हूं आजकल दुनिया में Recycle की बडी चर्चा है और माना जाता है कि यह दुनिया में कोई नया विज्ञान आया है, नई व्‍यवस्‍था आई है। जरा हमारे यहां देखों Recycle, reuse और कम से कम उपयोग करने की हमारी प्रकृति कैसी रही है। पुराना जमाना की जरा अपने घर में दादी मां उनके जीवन को देखिए। घर में कपड़े अगर पुराने हो गए होंगे, तो उसमें से रात को बिछाने के लिए गद्दी बना देंगे। वो अब उपयोगी नहीं रही तो उसमें से भी झाडू-पौचे के लिए उस जगह का उपयोग करेंगे। यानी एक चीज को recycle कैसे करना घर में हर चीज का वो हमारे यहां सहज परंपरा थी। सहज प्रकृति थी।

मैंने देखा है गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन आम को भी इतना Recycle करते हैं, Reuse करते हैं शायद कोई बाहर सोच नहीं सकता है। कहने का तात्‍पर्य है कि कोई बाहर से borrow की हुई चीज नहीं है। लेकिन हमने दुनिया समझे उस terminology में उन चीजों को आग्रहपूर्वक रखा नहीं। विश्‍व के सामने हम अपनी बातों को ढंग से रख नहीं पाए। हमारे यहां पौधे में परमात्‍मा है। जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान के माध्‍यम से जब Laboratory में जब सिद्ध किया कि पौधे में जीव होता है, उसके बाद ही हमने जीव है ऐसा मानना तय किया, ऐसा नहीं है। हम सहस्‍त्रों वर्ष से गीता का उल्‍लेख करे, महाभारत का उल्‍लेख करे हमें तभी से मानते हुए आए हैं कि पौधे में परमात्‍मा होता है। और इसलिए पौधे की पूजा, पौधे की रक्षा यह सारी चीजें हमें परंपराओं से सिखाई गई थी। लेकिन काल क्रम में हमने ही अपने आप को कुछ और तरीके से रास्‍ते खोजने के प्रयास किए। कभी-कभी मुझे लगता है.. यहां urban secretaries बहुत बड़ी संख्‍या में है हम परंपरागत रूप से चीजों को कैसे कर सकते हैं। मैं जानता हूं मैं जो बातें बताऊंगा, ये जो so called अंग्रेजीयत वाले लोग हैं, वो उसका मजाक उड़ाएंगे 48 घंटे तक। बड़ा मजाक उड़ाएंगे, आपको भी बड़ा मनोरंजन मिलेगा टीवी पर, क्‍योंकि एक अलग सोच के लोग हैं। जैसे मैं आपको एक बात बताऊं। आपको मालूम होगा यहां से जिनका गांव के साथ जीवन रहा होगा। गांव में एक परंपरा हुआ करती थी कि जब full moon होता था, तो दादी मां बच्‍चों को चांदनी की रोशनी में सुई के अंदर धागा पिरोने के लिए प्रयास करते थे, क्‍यों eye sight तो थी, लेकिन उस चांदनी की रोशनी की अनुभूति कराते थे।

आज शायद नई पीढ़ी को पूछा जाए कि आपने चांदनी की रोशनी देखी है क्‍या? क्‍या पूर्णिमा की रात को बाहर निकले हो क्‍या? अब हम प्रकृति से इतने कट गए हैं।

अगर हमारी urban body यह तय करे, लोगों को विश्‍वास में लेकर के करें कि भई हम पूर्णिमा की रात को street light नहीं जलाएंगे। इतना ही नहीं उस दिन festival मनाएंगे पूरे शहर में, सब मोहल्‍ले में लोग स्‍पर्धा करेंगे, सुई में धागा डालने की। एक community event हो जाएगा, एक आनंद उत्‍सव हो जाएगा और पर्यावरण की रक्षा भी होगी। चीज छोटी होती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि सभी Urban Body में महीने में एक बार इस चांदनी रात का उपयोग करते हुए अगर street light बंद की जाए तो कितनी ऊर्जा बचेगी? कितनी ऊर्जा बचेगी तो कितना emission हम कम करेंगे? लेकिन यही चीज इस carbon emission के हिसाब से रखोगे, तो यह जो so called अपने आप को पढ़ा-लिखा मानता हैं, वो कहे वाह नया idea है, लेकिन वही चींज हमारी गांव की दादी मां कहती वो सुई और धागे की कथा कहकर के कहेंगे, अरे क्‍या यह पुराने लोग हैं इनको कोई समझ नहीं है, देश बदल चुका है। क्‍या यह हम हमारे युवा को प्रेरित कर सकते हैं कि भई Sunday हो, Sunday on cycle मान लीजिए, हो सकता है कोई यह भी कह दें कि मोदी अब cycle कपंनियों के agent बन गया हैं। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है देश का। पता नहीं कौन क्‍या हर चीज का अर्थ निकालता है। जरूरी नहीं कि हर कोई लोग cycle खरीदने जाए, तय करे कि भई मैं सप्‍ताह में एक दिन ऊर्जा से उपयोग में आने वाले साधनों का उपयोग में नहीं करूंगा। अपनी अनुकूलता है।

समाज मैं जो life style की बात करता हूं हम पर्यावरण की रक्षा में इतना बड़ा योगदान दें सकते हैं। सहज रूप से दे सकते हैं और थोड़ा सा प्रयास करना पड़ता है। एक शिक्षक के जीवन को मैं बराबर जानता हूं। मैं जब गुजरात में मुख्‍यमंत्री था तो उन पिछड़े इलाकों में चला जाता था, जून महीने में कि जहां पर girl child education बहुत कम हो। 40-44 डिग्री Temperature रहा करता था जून महीने में और मैं ऐसे गांव में जाकर तीन दिन रहता था। जब तक मैं मुख्‍यमंत्री रहा वो काम regularly करता था। एक बार मैं समुद्री तट के एक गांव में गया। एक भी पेड़ नहीं था, पूरे गावं में कहीं पर नहीं, लेकिन जो स्‍कूल था, वो घने जंगलों में जैसे कोई छोटी झोपड़ी वाली स्‍कूल हो, ऐसा माहौल था। तो मेरे लिए आश्‍चर्य था। मैंने कहा कि यार कहीं एक पेड़ नहीं दिखता, लेकिन स्‍कूल बड़ी green है, क्‍या कारण है। तो वहां एक teacher था, उस teacher का initiative इतना unique initiative था, उसने क्‍या किया – कहीं से भी bisleri की बोतल मिलती थी खाली, उठाकर ले आता था, पेट्रोल पम्‍प पर oil के जो टीन खाली होते थे वो उठाकर ले आता था और लाकर के students को एक-एक देता था, साफ करके खुद और उनको कहता था कि आपकी माताजी जो kitchen में बर्तन साफ करके kitchen का जो पानी होता है, वो पानी इस बोतल में भरकर के रोज जब स्‍कूल में आओगे तो साथ लेकर के आओ। और हमें भी हैरानी थी कि सारे बच्‍चे हाथ में यह गंदा दिखने वाला पानी भरकर के क्‍यों आते हैं। उसने हर बच्‍चे को पेड़ दे दिया था और कह दिया था कि इस बोतल से daily तुम्‍हें पानी डालना है। Fertilizer भी मिल जाता था। एक व्‍यक्ति के अभिरत प्रयास का परिणाम था कि वो पूरा स्‍कूल का campus एकदम से हरा-भरा था। कहना का तात्‍पर्य है कि इन चीजों के लिए समाज का जो सहज स्‍वभाव है, उन सहज स्‍वभाव को हम कितना ज्‍यादा प्रेरित कर सकते हैं, करना चाहिए।

मैं एक बार इस्राइल गया था, इस्राइल में रेगिस्‍तान में कम से कम बारिश, एक-एक बूंद पानी का कैसे उपयोग हो, पानी का recycle कैसे हो, समुद्री की पानी से कैसे sweet water बनाया जाए, इन सारे विषयों में काफी उन्‍होंने काम किया है। काफी प्रगति की है। इस्राइल तो इस समय एक अभी भी रेगिस्‍तान है जहां हरा-भरा होना बाकी है और एक है पूर्णतय: उन्‍होंने रेगिस्‍तान को हरा-भरा बना दिया है।

बेन गुरियन जो इस्राइल के राष्‍ट्रपिता के रूप में माने जाते हैं, तो मैं जब इस्राइल गया था तो मेरा मन कर गया कि उनका जो निवासा स्‍थान है वो मुझे देखना है, उनकी समाधि पर जाना है। तो मैंने वहां की सरकार को request की थी बहुत साल पहले की बात है। तो मैं गया, उनका घर उस रेगिस्‍तान वाले इलाके में ही था, वहीं रहते थे वो। और दो चीजें मेरे मन को छू गई – एक उनके bedroom में महात्‍मा गांधी की तस्‍वीर थी। वे सुबह उठते ही पहले उनको प्रणाम करते थे और दूसरी विशेषता यह थी कि उनकी जो समाधि थी, उन समाधि के पास एक टोकरी में पत्‍थर रखे हुए थे। सामान्‍य रूप से इतने बड़े महापुरूष के वहां जाएंगे तो मन करता है कि फूल रखें वहां, नमन करे। लेकिन चूंकि उनको green protection करना है, greenery की रक्षा करनी है। फूल-फल इसको नष्‍ट नहीं करना, यह संस्‍कार बढ़ाने के लिए बेन बुरियन की समाधि पर अगर आपको आदर करना है तो क्‍या करना होता था उस टोकरी में से एक पत्‍थर उठाना और पत्‍थर रखना और शाम को वो क्‍या करते थे सारे पत्‍थर इकट्ठे करके के फिर टोकरी में रख देते थे। अब देखिए environment की protection के लिए किस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को लोग विकसित करते हैं। हम अपने आपसे बाकी सारी बातों के साथ-साथ हम अपने जीवन में इन चीजों को कैसे लाए उसके आधार पर हम इसको बढ़ावा दे सकते हैं। हमारे स्‍कूलों में, इन सब में किस प्रकार से एक माहौल बनाया जाए प्रकृति रक्षा, प्रकृति पूजा, प्रकृति संरक्षण यह सहज मानव प्रकृति का हिस्‍सा कैसे बने, उस दिशा में हमको जाना होगा। और हम वो लोग है जिनका व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता। यही जिनके जीवन का आदर्श रहा है। जहां व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता का आदर्श रहा हो, वहां पर हमें प्रकृति का शोषण करने का अधिकार नहीं है। हमें प्रकृति का दोहन करने से अधिक प्रकृति को उपयोग, दुरूपयोग करने का हक नहीं मिलता है। दुनिया में प्रकृत‍ि का शोषण ही प्रवृति है, भारत में प्रकृति को दोहन एक संस्‍कार है। शोषण ही हमारी प्रवृति नहीं है और इसलिए विश्‍व इस संकट से जो गुजर रहा है, मैं अभी भी मानता हूं कि दुनिया को इस क्षेत्र में बचाने के लिए नेतृत्‍व भारत ने करना चाहिए। और उस दिमाग से भारत ने अपनी योजनाएं बनानी चाहिए। दुनिया climate change के लिए हमें guide करे और हम दुनिया को follow करें। दुनिया parameter तय करे और हम दुनिया को follow करे, ऐसा नहीं है। सचमुच में इस विषय में हमारी हजारों साल से वो विरासत है, हम विश्‍व का नेतृत्‍व कर सकते हैं, हम विश्‍व का मार्गदर्शन कर सकते हैं और विश्‍व को इस संकट से बचाने के लिए भारत रास्‍ता प्रशस्‍त कर सकता है। इस विश्‍वास के साथ इस conference से हम निकल सकते हैं। हम दुनिया की बहुत बड़ी सेवा करेंगे। उस विजन के साथ हम अपनी व्‍यवस्‍थाओं के प्रति जो भी समयानुकूल हम बदलाव लाना है, हम बदलाव लाए। जैसे अभी अब यह तो हम नहीं कहेंगे..

अच्‍छा, कुछ लोगों ने मान लिया कि पर्यावरण की रक्षा और विकास दोनों कोई आमने-सामने है। यह सोच मूलभूत गलत है। दोनों को साथ-साथ चलाया जा सकता है। दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ do’s and don’ts होते हैं, इसका पालन होना चाहिए। अगर वो पालन होता है तो हम उसकी रखवाली भी करते हैं और उसके लिए कोई चीजें, जैसे अभी हमने कोयले की खदानें उसकी नीलामी की, लेकिन उसके साथ-साथ उनसे जो पहले राशि ली जाती थी environment protection के लिए वो चार गुना बढ़ा दी, क्‍योंकि वो एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। आवश्‍यक है तो वो भी बदलाव किया। हमारी यह कोशिश रहनी चाहिए कि हम इस प्रकार से बदलाव लाने की दिशा में कैसे प्रयास करे और अगर हम प्रयास करते तो परिणाम मिल सकता है। दूसरी बात है, ज्‍यादातर भ्रम हमारे यहां बहुत फैलाया जाता है। अभी Land Acquisition Bill की चर्चा हुई है। इस Land Acquisition Bill में कहीं पर भी एक भी शब्‍द वनवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, आदिवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, Forest Land के संबंध में नहीं है। वो जमीन, उसके मालिक, Land Acquisition bill के दायरे में आते ही नहीं है, लेकिन उसके बावजूद भी जिनको इन सारी चीजों की समझ नहीं है। वो चौबीसों घंटे चलाते रहते हैं। पता ही नहीं उनको कहीं उल्‍लेख तक नहीं है। उनको भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं समझता हूं कि समाज का गुमराह करने का इस प्रकार का प्रयास आपके लिए कोई छोटी बात होगी, आपके राजनीतिक उसूल होंगे लेकिन उसके कारण देश को कितना नुकसान होता है और कृपा करके ऐसे भ्रम फैलाना बंद होना चाहिए, सच्‍चाई की धरा पर पूरी debate होनी चाहिए। उसमें पक्ष विपक्ष हो सकता है, उसमें कुछ बुरा नहीं है, लोकतंत्र है। लेकिन आप जो सत्‍य कहना चाहते हो, उसमें दम नहीं है, इसलिए झूठ कहते रहो। इससे देश नहीं चलता है और इसलिए मैं विशेष रूप से वन विभाग से जुड़े हुए मंत्री और अधिकारी यहां उपस्थित हैं तो विशेष रूप से इस बात का उल्‍लेख करना चाहता हूं कि Land Acquisition Act के अंदर कहीं पर जंगल की जमीन, आदिवासियों की जमीन उसका कोई संबंध नहीं है। उस दायरे में वो आता नहीं है, हम सबको मालूम है कि उसका एक अलग कानून है, वो अलग कानूनों से protected है। इस कानून का उसके साथ कोई संबंध नहीं है, लेकिन झूठ फैलाया जा रहा है और इसलिए मैं चाहूंगा कि कम से कम और ऐसे मित्रों से प्रार्थना करूंगा कि देशहित में कम से कम ऐसे झूठ को बढ़ावा देने में आप शिकार न हो जाएं यह मेरा आग्रह रहेगा।

आज यह भी यहां बताया गया कि Tiger की संख्‍या बढ़ी है। करीब 40% वृद्धि हुई है। अच्‍छा लगता है सुनकर के वरना दुनिया में Tiger की संख्‍या कम होती जा रही है और दो-तिहाई संख्‍या हमारे पास ही है तो एक हमारा बहुत बड़ा गौरव है और यह गौरव मानवीय संस्‍कृति का भी द्योतक होता है। इन दोनों को जोड़कर हमें इस चीज का गौरव करना चाहिए। और विश्‍व को इस बात का परिचय होना चाहिए कि हम किस प्रकार की मानवीय संस्‍कृतियों को लेकर के जीते हैं कि जहां पर इतनी तेज गति से tiger की जनसंख्‍या का विकास हो रहा है। हमारे पूरब के इलाके में खासकर के हाथी को लेकर के रोज नई खबरें आती है। हा‍थी को लेकर के परेशानियां आती है। अभी मैं कोई एक science magazine पढ़ रहा था। बड़ी interesting चीज मैंने पहली बार पढ़ी, आप लोग तो शायद उसके जानकारी होगी। जब खेत में हाथियों का झुंड आ जाता है, तो बड़ी परेशानी रहती कैसे निकालना है, यह forest department के लोग भांति-भांति के सशत्र लेकर पहुंच जाते हैं और दो-दो दिन तक हो हल्‍ला हो जाता है। मैंने एक science magazine पढ़ा, कहीं पर लोगों ने प्रयोग किया है बड़ा ही Interesting प्रयोग लगा मुझे। वे अपने खेत के बाढ़ पर या पैड है उस पर Honey Bee को भी Developed करते हैं मधुमक्‍खी को रखते हैं और जब हाथी के झुंड आते हैं तो मधुमक्‍खी एक Special प्रकार की आवाज करती है और हाथी भाग जाता है। अब ये चीजे जो हैं कहीं न कहीं सफल हुई हैं आज भी शायद हमारे यहां हो सकता है कुछ इलाकों में करते भी होंगे। हमें इस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को भी समझना होगा ताकि हमें हाथियों से संघर्ष करना पड़ सके। मानव और हाथी के बीच जो संघर्ष के जो समाचार आते हैं, उससे हम कैसे बचें। हम हाथी की भी देखभाल करें, अपने खेत की भी देखभाल कर सकें। अगर ऐसे सामान्‍य व्‍यवस्‍थाएं विकसित हो सकती है और अगर यह सत्‍य है तो मैंने कहीं पढ़ा था, लेकिन किसी प्रत्‍यक्ष मेरी किसान से बात हुई नहीं है लेकिन मैं कभी असम की तरफ जाऊंगा तो पूछूंगा सबसे बात करूंगा कि क्‍या है जानकारी लाने का प्रयास करूंगा मैं, लेकिन आपसे में उस दिशा में काम करने वाले जहां हाथी की जनसंख्‍या हैं और गांवों में कभी-कभी चली आती हैं तो उनके लिए शायद हो सकता है कि ये अगर इस प्रकार का प्रयोग हुआ हो तो यह काम आ सकता है। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि यह जगत सब समस्‍याओं से जुड़ा हुआ होगा हम ही पहली बार गुजर रहे हैं ऐसा थोड़ी है और हरेक ने अपने-अपने तरीके से उसके उपाय खोजे होंगे। उनको फिर से एक बार वैज्ञानिक तरीके से वैज्ञानिक तराजू से देखा जाए कि हम इन चीजों को कैसे फिर से एक बार प्रयोग में ला सकते हैं। थोड़ा उसे Modify करके उसे प्रयोग में ला सकते हैं। इन दिनों जब पर्यावरण की रक्षा की बात आती है, तो ज्‍यादातर कारखानें और ऊर्जा उसके आस-पास चर्चा रहती है। भारत उस अर्थ में ईश्‍वर की कृपा वाला राष्‍ट्र रहा है कि जिसके पास Maximum solar Radiation वाली संभावना वाला देश है। इसका हमें Maximum उपयोग कैसे करना है और इसलिए सरकार ने Initiative लिया है कि हम Solar Energy हम Wind Energy Biomass Energy उस पर कितना ज्‍यादा बल दें ताकि हम जो विश्‍व की चिंता है उसमें हम मशरूफ हों। लेकिन मजा देखिए, जो दुनिया Climate के लिए Lead करती है, दुनिया को पाठ पढ़ाती है अगर हम उनको कहें कि हम Nuclear Energy में आगे जाना चाहते हैं कि Nuclear Energy Environment protection का एक अच्‍छा रास्‍ता है और हम उनको जब कहते हैं कि Nuclear Energy के लिए आवश्‍यक Fuel दो तो मना कर देते हैं यानी हम दुनिया की इतनी बड़ी सेवा करना चाहते हैं लेकिन आप सेवा करों यह नियम पालन करो व‍ह नियम पालन करो। मैं दुनिया के सभी उस देशवासियों से यह निवेदन करना चाहूंगा कि भारत जैसा देश जिस प्रकार से नेतृत्‍व करने के लिए तैयार है Environment protection के लिए Civil Nuclear की तरफ हमारा बल है। हम Nuclear Energy पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, हम उसे करने के लिए तैयार हैं क्‍योंकि हमें पता है कि पर्यावरण की रक्षा में अच्‍छे सा अच्‍छा रास्‍तों में महत्‍वपूर्ण है। लेकिन वही लोग जो हमें Environment के लिए भाषण देते हैं वो Nuclear के लिए Fuel देने के लिए तैयार नहीं है। ये दो तराजू से दुनिया नहीं चल सकती है और इसलिए विश्‍व पर हमें भी यह दबाव पैदा करना पड़ेगा और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में यह दबाव दिखने वाला है, लोग अनुभव करेंगे हम Solar Energy की तरफ जा रहे हैं। Biomass की तरफ जा रहे हैं। लेकिन मैं Urban Bodies को कहना चाहूंगा अगर हम स्‍वच्‍छ भारत की चर्चा करें तो भी और अगर हम Environment की चर्चा करें तो भी। Waste Water & Solid waste Management की दिशा में हम लोंगों को आग्रहपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। Public Private Partnership Model को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। Solid Waste Management की ओर हमने पूरा ध्‍यान देना चाहिए। और आज Waste Wealth का एक सबसे बड़ा Business है। Waste में से Wealth create करना एक बहुत बड़ा Entrepreneurship शुरू हुआ है। हम अपने Urban Bodies में इसको कैसे जोड़े। Urban Bodies में Waste में से Wealth को create पैदा करने में स्‍पेशल फोकस करें। और आप देखिए कि बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। एक छोटा सा प्रयोग है मैं Urban Bodies से आग्रह करूंगा मान लीजिए हम हिंदुस्‍तान में पांच सौ शहर पकड़े, जहां एक लाख से ज्‍यादा आबादी है और वहां पर हम तय करें अब देखिए आज जो शहर का कूड़ा-कचरा फेंकने के लिए जो जगह जमीन की जो जरूरत है हजारों एकड़ भूमि की जरूरत पड़ेगी अगर ये कचरों के ढेर करने हैं तो अब गमिल लाओंगे कहां से और अब जमीन नहीं हैं तो क्‍या मतलब है कि कूड़ा-कचरा पड़ा रहेगा क्‍या और इसलिए हमारे लिए उस पर Process करना Recycle करना Waste Management करना यह अनिवार्य हो गया है। अब वैज्ञानिक के तरीके उपलब्‍ध हैं अगर हम Urban Body Waste Water Treatment करें और पानी को ठीक करके अगर किसानों को वापिस दे वरना एक समय ऐसा आएगा शहर और गांव के बीच संघर्ष होगा पानी के लिए। गांव कहेगा कि मैं शहर को पानी नहीं देने दूंगा और शहर बिना पानी मरेगा। लेकिन जो अगर शहर पानी प्रयोग करता है उसको Recycle करके गांव को वापस दे देता है खेतों में तो यह संघर्ष की नौबत नहीं आएगी और एक प्रकार से Treated Water होगा तो Fertilizer की दृष्टि से उपयोग इस प्रकार से पानी को इस प्रकार से बनाकर दिया जा सकता है। और Urban Body जो होता है उसके गांव जो होते हैं वो ज्‍यादातर सब्‍जी की खेती करते हैं और वही सब्‍जी उनके शहर के अंदर बिकने के लिए आती हैं रोजमर्रा की उनकी आजीविका उससे चलती है। हम इन्‍हीं को Solid Waste Management करके Solid Waste में से हम मानव Fertilizer बनाएं और वो Fertilizer हम उनको दें तो Organic सब्‍जी शहर में आएगी कि नहीं आएगी। इतनी बड़ी मात्रा में अगर हम Fertilizer देते हैं शहरों के कूड़े-कचरों से बनाया हुआ तो अच्‍छी Quality का विपुल मात्रा में सब्‍जी शहर में आएगी तो सस्‍ती सब्‍जी मिलेगी या नहीं मिलेगी? सस्‍ती सब्‍जी गरीब से गरीब व्‍यक्ति खाएगा तो Nutrition के Problem का Solution होगा कि नहीं होगा। Vegetable Sufficient खाएगा तो Health सेक्‍टर का बजट कम होगा कि नहीं होगा। एक प्रयास कितने ओर चीजों पर इफैक्‍ट कर सकता है इसका अगर हम एक Integrated approach करें तो हम हमारे गांवों को भी बचा सकते हैं हमारे शहरों को भी बचा सकते हैं। कभी-कभार अज्ञान का भी कारण होता है। हमारे यहां देखा है कि फसल होने के बाद अब जैसे Cotton है Cotton लेने के बाद बाकी जो है उसको जला देते हैं। लेकिन उसी को अगर टुकड़े कर करके खेत में डाल दें तो वहीं चीज Nutrition के रूप में काम आती है Fertilizer के रूप में काम आती है। मैंने एक प्रयोग देखा था केले की खेती हमारे यहां हो रही थी तब केला उतारे के बाद केला देने की क्षमता जब कम हो जाती है तो वो जो पेड़ का हिस्‍सा होता है उसके टुकड़े कर कर के उन्‍हें जमीन में डाले और मैंने अनुभव किया कि उसके अंदर इतना Water Content होता है केले के Waste Part में कि 90 दिन तक आपको फसल को पानी नहीं देना पड़ता है वो उसी में से फसल पानी ले लेती है। अब हम थोड़ा सा इनका प्रयोग चीजों को सीखें, समझें। इसको अगर Popular करें तो हम पानी को भी बचा सकते हैं, फसल को भी बचा सकते हैं। हम चीजों को किस प्रकार से और इसके लिए बहुत बड़ा आधुनिक से आधुनिक बड़ा विज्ञान की जरूरत होती है ऐसा नहीं है। सहज समझ का विषय होता है इनको हम जितना आगे बढ़ाएंगे हम इन चीजों को कर सकते हैं। Urban Body आग्रहपूर्वक Public Private Partnership Model उसमें Vibrating Gap funding का भी रास्‍ता निकल सकता है। आप जो इन Waste खेतों के किसानों को उसके कारण अगर Chemical Fertilizer का उपयोग कम होता है तो Chemical Fertilizer में से जो सब्सिडी बचेगी मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं वो सब्सिडी जो बचेगी वो Vibrating Gap Funding के लिए शहरों को दे देंगे, यानी आपके देश में से Wealth Create होगी और जो आप खाद्य तैयार करोगे वो खाद्य उपयोग करने के कारण Chemical Fertilizer की सब्सिडी बचेगी वो आपको मिलेगी। आप गैस पैदा करोगे, गैस दोगो तो जितनी मात्रा में गैसा पैदा करोगे जो गैस सिलेंडर की जो सब्सिडी है वो बचेगी तो वो सब्सिडी हम आपको Transfer करेंगे आपके Vibrating Gap Funding में काम आएगी। हम एक उसका Finance का Model कर सकते हैं, लेकिन भारत सरकार, राज्‍य सरकार और Local Self Government ये तीनों मिल करके हम Environment को Priority देते हुए हमारे नगरों को स्‍वच्‍छ रखते हुए, वहां के कूड़े-कचरे को Waste में Wealth Create करें और बहुत Entrepreneur मिले हैं। उनको हम कैसे प्रयोग में हम करें मैंने एक जगह देखा है जहां पर Waste में से ईंटे बना रहे हैं और इतनी बढि़या ईंटे मजबूत बन रही हैं कि बहुत काम आ रही है। आपने देखा होगा पहले जहां पर बिजली के थर्मल प्‍लांट हुआ करते थे वहां पर बाहर कोयले की Ash जो होता है उसके ढेर लगे रहते थे। आज Recycle और Chemical में से ईंटे बनने के कारण सीमेंट में उपयोग आने के कारण वो निकलते ही Contract हो जाता है और दो-दो साल का Contract और निकलते ही हम उठाएंगे यानी कि जो किसी पर्यावरण को बिगाड़ने के लिए संकट था वो ही आज Property में Convert हो गया है हम थोड़ा इस दिशा में प्रयास करें, initiative लें, हम इसमें काफी मदद कर सकते हैं और मेरा सबसे आग्रह है कि हम इन चीजों को बल मानते हुए आने वाले दिशों में दो दिन जब आप चर्चा करेंगे। गंगा की सफाई उसके साथ जुड़ा हुआ है गंगा के किनारे पर रहने वाले, गंगा किनारे के गांव और शहर मैं उन संबंधित राज्‍य सरकारों से आग्रह करूंगा इसमें कोई Comprise मत कीजिए। बैंकों से हम आग्रह करेंगे उनको हम कम दर से लोन दें। लेकिन Approved Plant उनमें वो लगाये जाएं Sewerage Treatment plant किये जाएं। एक बार हमने सफलतापूर्वक ढाई हजार किलोमीटर लम्‍बी गंगा के अंदर जाने वाले प्रदूषण को रोक लिया पूरे दुनिया के सामने और पूरे हिंदुस्‍तान के सामने एक नया विश्‍वास पैदा कर सकता है कि हम सामान्‍य अपने तौर तरीकों से पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं। यह विश्‍वास पैदा करने के लिए Model की तरह इस काम को खड़ा करना और ये एक बार काम खड़ा हो गया तो और काम अपने आप खड़े हो जाएंगे। एक विश्‍वास पैदा करने की आवश्‍यकता है और किया जा सकता है। एक बार हम किसी चीज को हाथ लगाएं पीछे लग जाएं परिणाम मिल सकता है और मैं चाहूंगा ज्‍यादातर इन पांच राज्‍यों से कि जो गंगा के किनारे की उनकी जिम्‍मेवारी है छह हजार के करीब गांव है, एक सौ 18000 किलोमीटर हैं कोई आठ सौ के करीब Industries हैं जो Pollution के लिए तैयार है इसको Target करते हुए एक बार गंगा के किनारे पर हम तय कर ले वहां से कोई भी दूषित पानी या कूड़ा-कचरा गंगा में जाने नहीं देंगे। आप देखिए अपने आप में बदलाव शुरू हो जाएगा। फिर तो गंगा की अपनी ताकत भी है खुद को साफ रखने की। और वो हमने आगे निकल जाएगी लेकिन हम तय करे कि हम गंदा नहीं करेंगे तो गंगा को साफ करने के लिए तो हमें गंदा नहीं करना पड़ेगा गंगा अपना खुद कर सकती है। लेकिन हम गंदा न करे इतना तो संकल्‍प करना पड़ेगा और उस काम को ले करके आप जब यहां पर बैठे है जो गंगा किनारे को जो इस विभाग के मंत्री हैं वो विशेष रूप से आधा-पौना घंटा बैठ करके उन चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जाए। विशेष रूप से चर्चा करें मेरा आग्रह रहेगा फिर एक बार मैं इस प्रयास का स्‍वागत करता हूं और मुझे विश्‍वास है कि इस सपने के साथ फिर एक बार मैं दोहराता हूं ये एक ऐसा विषय है जो हमारी बपौती है, हमारा डीएनए है। हमारे पूर्वजों ने इन मानव जाति की बहुत बड़ी सेवा की है। विश्‍व का नेतृत्‍व हमारे पास ही होना चाहिए Climate के मुद्दे पर ये मिजाज होना चाहिए। पूरे विश्‍व को हम दिखा सकते हैं कि यह हमारा विषय है। हमारी परंपरा है। दुनिया को हम सीखा सकते हैं इतनी ताकत के साथ हम यहां से निकले यही अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं धन्‍यवाद।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀଙ୍କ 'ମନ କି ବାତ' ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ବିଚାର ଏବଂ ଅନ୍ତର୍ଦୃଷ୍ଟି ପଠାନ୍ତୁ !
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ଲୋକପ୍ରିୟ ଅଭିଭାଷଣ

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ଗୋଆରେ କୋଭିଡ ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ହିତାଧିକାରୀ ଓ ସ୍ବସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ସହ ମତ ବିନିମୟ ଅବସରରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଉଦବୋଧନ
September 18, 2021
ସେୟାର
 
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ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ୧୦୦% ପ୍ରଥମ ଡୋଜ୍ ପ୍ରଦାନ ପୂରଣ ଲାଗି ଗୋଆକୁ ପ୍ରଶଂସା କଲେ
ଏହି ଉପଲକ୍ଷେ ଶ୍ରୀ ମନୋହର ପାରିକରଙ୍କ ସେବାଗୁଡ଼ିକୁ ସ୍ମରଣ କଲେ
‘ସବକା ସାଥ, ସବକା ବିକାଶ, ସବକା ବିଶ୍ୱାସ ଓ ସବକା ପ୍ରୟାସ’ର ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଫଳାଫଳ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି ଗୋଆ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ମୁଁ ଅନେକ ଜନ୍ମଦିନ ଦେଖିସାରିଲିଣି ଏବଂ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ସର୍ବଦା ସାଧାରଣ ବିବେଚନା କରିଥାଏ କିନ୍ତୁ, ମୋର ସମସ୍ତ ବର୍ଷଗୁଡ଼ିକରେ, ଗତକାଲି ଏଭଳି ଏକ ଦିନ ଥିଲା ଯାହା ମୋତେ ଆବେଗିକ ଭାବେ ପ୍ରଭାବିତ କରିଥିଲା, କାରଣ ୨.୫ କୋଟି ଲୋକଙ୍କ ଟିକାକରଣ ହୋଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ ୧୫ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ପରିଚାଳନା କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ ୨୬ ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଏବଂ ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ୪୨୫ରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ଦିଆଯାଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି ଯାହା କି ‘ଏକ ଭାରତ- ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’କୁ ପ୍ରତିପାଦିତ କରୁଛି, ମୋ ମନରେ ଅନେକ ଆନନ୍ଦ ଭରିଦେଇଛି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆ କେବଳ ଦେଶର ଏକ ରାଜ୍ୟ ନୁହେଁ, ବରଂ ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ଏକ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଚିହ୍ନ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ଗୋଆର ଉର୍ଜାବାନ ତଥା ଲୋକପ୍ରିୟ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ମନ୍ତ୍ରିମଣ୍ଡଳରେ ମୋର ସାଥୀ, ଗୋଆର ସୁପୁତ୍ର ଶ୍ରୀପଦ ନାୟକ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାରଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀ ପରିଷଦରେ ମୋର ସହକର୍ମୀ ଡକ୍ଟର ଭାରତୀ ପାୱାର ମହାଶୟା, ଗୋଆର ସମସ୍ତ ମନ୍ତ୍ରୀଗଣ, ସାଂସଦ ଏବଂ ବିଧାୟକ, ଅନ୍ୟ ଜନ ପ୍ରତିନିଧି, ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ !

ଗୌୟଚ୍ୟା ମ୍ହଜା ମୋଗାଲ ଭାବା ବହିଣିନୋ, ତୁମଚେ ଅଭିନନ୍ଦନ।

ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଶ୍ରୀ ଗଣେଶ ପର୍ବର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାବନା । ଆସନ୍ତାକାଲି ଅନନ୍ତ ଚତର୍ଦ୍ଦଶୀର ପବିତ୍ର  ଅବସରରେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ବାପ୍ପାଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେବା, ଆମେ ମଧ୍ୟ ଆମ ହାତରେ ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ବାନ୍ଧିବା। ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ଅର୍ଥାତ ଜୀବନରେ ସୁଖ-ସମୃଦ୍ଧି, ଦୀର୍ଘ ଜୀବନର ଆଶୀର୍ବାଦ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ ଏହି ପବିତ୍ର ଦିନ ପୂର୍ବରୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ନିଜ ହାତରେ, ବାହୁରେ ଜୀବନ ରକ୍ଷା ସୂତ୍ର,  ଅର୍ଥାତ୍ ଟିକା ନେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଶେଷ କରିଛନ୍ତି । ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଗ୍ୟ ବ୍ୟକ୍ତି ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଟିକା ନେଇ ସାରିଛନ୍ତି । କରୋନା ବିରୋଧରେ ଲଢେଇରେ ଏହା ହେଉଛି ଏକ ବଡ କାର୍ଯ୍ୟ। ଏଥିପାଇଁ ଗୋଆର ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ଏପରି ଏକ ରାଜ୍ୟ, ଯେଉଁଠାରେ ଭାରତର ବିବିଧତାର ଶକ୍ତି ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ। ପୂର୍ବ ଏବଂ ପଶ୍ଚିମର ସଂସ୍କୃତି, ଚାଲିଚଳନୀ, ଖାଦ୍ୟପେୟ ଏଠାରେ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରେ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ । ଏଠାରେ ଗଣେଶୋତ୍ସବ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରାଯାଏ, ଦୀପାବଳୀ ମଧ୍ୟ ଧୂମଧାମରେ  ପାଳନ କରାଯାଏ ଏବଂ ଖ୍ରୀଷ୍ଟମାସ ସମୟରେ ଗୋଆର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଆହୁରି ବୃଦ୍ଧି ପାଇଥାଏ । ଏହାସବୁ କରିବା ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆ ନିଜର ପରମ୍ପରା ନିର୍ବାହ କରିଥାଏ। ଏକ ଭାରତ-ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତର ଭାବନାକୁ ନିରନ୍ତର ସୁଦୃଢ କରୁଥିବା ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି, କେବଳ ମୋତେ ନୁହେଁ, ବରଂ ସମଗ୍ର ଦେଶକୁ ଖୁସି ଦେଇଥାଏ ଏବଂ ଗର୍ବରେ ଭରି ଦେଇଥାଏ।

ଏହି ଗୁରୁତ୍ବପୂର୍ଣ୍ଣ ଅବସରରେ, ମୋର ବନ୍ଧୁ, ସଚ୍ଚୋଟ କର୍ମାଯାଗୀ, ସ୍ବର୍ଗତ ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ମନେ ପଡିବା ସ୍ୱାଭାବିକ କଥା । 100 ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ ସଙ୍କଟ ସହିତ ଗୋଆ ଯେଉଁଭଳି ଭାବରେ ମୁକାବିଲା କରିଛି, ପାରିକର ମହାଶୟ ଆଜି ଆମ ଗହଣରେ ଥାଆନ୍ତେ, ତେବେ ସେମ ମଧ୍ୟ ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ, ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ଉପଲବ୍ଧି ପାଇଁ ବହୁତ ଗର୍ବି କରିଥାନ୍ତେ।

ଗୋଆ ବିଶ୍ୱର ସର୍ବବୃହତ ଏବଂ ଦ୍ରୁତ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ- ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଟିକା, ମାଗଣା ଟିକାର ସଫଳତାରେ ପ୍ରମୁଖ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କରିଛି । ଗତ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆରେ ପ୍ରବଳ ବର୍ଷା, ଘୂର୍ଣ୍ଣିଝଡ, ବନ୍ୟା ପରି ପ୍ରାକୃତିକ ବିପର୍ଯ୍ୟୟ ସହିତ ଖୁବ ସାହସର ସହିତ ଲଢେଇ କରିଛି। ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ବଡ଼ ସାହସର ସହିତ ଲଢିଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ କରୋନା ଟିକାକରଣର ଗତି ବଜାୟ ରଖିଥିବାରୁ ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ, ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ଦଳ, ଗୋଆର ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି।

ଏଠାରେ ଅନେକ ସାଥୀ ଯେଉଁମାନେ ସେମାନଙ୍କର ଅନୁଭୂତି ସଂପର୍କରେ ଆମ ସହିତ ମତ ବିନିମୟ କରିଛନ୍ତି, ତାହା ସ୍ପଷ୍ଟ ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଏହି ଅଭିଯାନ କେତେ କଷ୍ଟକର ଥିଲା। ଭରା  ନଦୀ ପାର ହୋଇ, ଟିକାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖି ଦୂର ଦୂରାନ୍ତରେ ପହଞ୍ଚିବା କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଭାବନା ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ, ସମାଜ ପ୍ରତି ଭକ୍ତି ଦରକାର ଏବଂ ଅପ୍ରତିମ ସାହସର ଆବଶ୍ୟକ ପଡିଥାଏ। ଆପଣ ସମସ୍ତେ ଅଟକି ନ ଯାଇ, ଥକି ନ ପଡି ମାନବିକତାର ସେବା କରୁଛନ୍ତି। ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସେବା ସଦା- ସର୍ବଦା ସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ରହିବ।

ସାଥୀଗଣ,

ସାବକା ସାଥ, ସାବକା ବିକାଶ, ସାବକା ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ ସାବକା ପ୍ରୟାସ (ସମସ୍ତଙ୍କର ସହିତ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିକାଶ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ  ସମସ୍ତଙ୍କର ପ୍ରୟାସ)- ଏହି ସମସ୍ତ କଥା କିଭଳି ଚମତ୍କାର ଫଳାଫଳ ଆଣିଥାଏ, ଏହା ଗୋଆ, ଗୋଆର ସରକାର, ଗୋଆର ନାଗରିକ, ଗୋଆର କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଆଗଧାଡିର କର୍ମଚାରୀ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି । ସାମାଜିକ ଏବଂ ଭୌଗୋଳିକ ଆହ୍ବାନର ମୁକାବିଲା ପାଇଁ ଗୋଆ ଯେଉଁ ପ୍ରକାରର ସମନ୍ୱୟ ଦେଖାଇଛି, ତାହା ବାସ୍ତବରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ପ୍ରମୋଦ ମହାଶୟ ଆପଣଙ୍କୁ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ଟିମକୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା । ରାଜ୍ୟର ଦୂର- ଦୂରାନ୍ତରେ ବସବାସ କରୁଥିବା, କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ସମସ୍ତ ସବ୍-ଡିଭିଜନରେ ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟ ଭଳି ଦ୍ରୁତଗତିରେ ଟିକାକରଣ କରାଯିବା ହେଉଛି ଏହାର ଏକ ବଡ଼ ପ୍ରମାଣ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ, ଗୋଆ ଏହାର ଗତିକୁ ହ୍ରାସ କରିବାକୁ ଦେଇ ନାହିଁ । ଏହି ସମୟରେ ଏପରିକି ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଆଲୋଚନା କରୁଛୁ, ସେତେବେଳେ ରାଜ୍ୟରେ ଦ୍ୱିତୀୟ ଡୋଜ ପାଇଁ ଟିକା ଉତ୍ସବ ଚାଲିଛି। ଏହିଭଳି ଆନ୍ତରିକ, ଏକନିଷ୍ଠ ଉଦ୍ୟମ ସହିତ ଗୋଆ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟିକାକରଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଦେଶର ଏକ ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟ ହେବା ପାଇଁ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି। ଆଉ ଏହା ମଧ୍ୟ ଏକ ଉତ୍ତମ କଥା ଯେ ଗୋଆ ନା କେବଳ ଏହାର ଜନସଂଖ୍ୟା ନୁହେଁ ଏଠାକୁ ଆସୁଥିବା ପର୍ଯ୍ୟଟକ, ବାହାରୁ ଆସୁଥିବା ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଟିକାଦାନ କରୁଛି ।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜିର ଏହି ଅବସରରେ ମୁଁ ଦେଶର ସମସ୍ତ ଡାକ୍ତର, ସ୍ବାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀ, ପ୍ରଶାସନ ସହ ଜଡିତ ଲୋକଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ ଯୋଗୁଁ ଗତକାଲି ଭାରତ ଗୋଟିଏ ଦିନରେ ଅଢେଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦେବାର ରେକର୍ଡ କରିଛି। ବିଶ୍ବର ବଡ଼ ବଡ଼ ସମୃଦ୍ଧ ଏବଂ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଥିବା ଦେଶ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରି ନାହାଁନ୍ତି । ଗତକାଲି ଆମେ ଦେଖୁଥିଲୁ କିଭଳି ଦେଶ ଆଲାରାମ ଲଗାଇ କୋୱିନ ଡ୍ୟାସବୋର୍ଡକୁ ଦେଖୁଥିଲା। ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିବା ସଂଖ୍ୟାକୁ କେଇ ଉତ୍ସାହିତ ହୋଇ ପଡୁଥିଲେ।

ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ 15 ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ 26 ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଟୀକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ଚାରି ଶହ ପଚିଶରୁ ଅଧିକ ଲୋକ ଏହି ଟିକା ନେଇଥିଲେ। ଦେଶର ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରାଯାଇଥିବା ଏକ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କେନ୍ଦ୍ରରେ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆଯାଇଛି । ଭାରତର ନିଜସ୍ୱ ଟିକା, ଟିକାକରଣ ପାଇଁ ଏତେ ବଡ଼ ନେଟୱାର୍କ, କୁଶଳୀ ମାନବ ସମ୍ବଳ, ଏହା ଭାରତର ସାମର୍ଥ୍ୟକୁ ଦର୍ଶାଉଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଗତକାଲି ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଯେଉଁ ଉପଲବ୍ଧି ମିଳିଛି ନା, ତାହା କେବଳ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱରେ ଟୀକାକରଣର ପରିସଂଖ୍ୟାନ ଆଧାରରେ ନୁହେଁ, ଭାରତ ପାଖରେ କେତେ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଅଛି ତାହାର ପରିଚୟ ବିଶ୍ବକୁ ମିଳିବାକୁ ଯାଉଛି। ଆଉ ସେଥିପାଇଁ ଏହାର ଗୌରବଗାନ କରିବା ହେଉଛି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଏବଂ ଏହା ମଧ୍ୟ ସ୍ବଭାବ ହେବା ଉଚିତ୍।

ସାଥୀଗଣ,

ମୁଁ ଆଜି ମୋର ମନର କଥା ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ବହୁତ ଜନ୍ମଦିନ ତ ଆସିଛି ଆଉ ଯାଇଛି କିନ୍ତୁ ମୁଁ ମନର ସହିତ ସବୁବେଳେ ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ଅଲିପ୍ତ ହୋଇ ରହିଛି, ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ମୁଁ ଦୂରେଇ ରହିଛି । କିନ୍ତୁ ମୋର ଏତିକି ଆୟୂଷରେ କାଲିର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ମୋତେ ବହୁତ ଭାବୁକ କରିବା ଭଳି ଥିଲା। ଜନ୍ମଦିନ ପାଳନ କରିବାର ବହୁତ ଗୁଡ଼ିଏ ଉପାୟ ରହିଛି। ଲୋକମାନେ ଭିନ୍ନ- ଭିନ୍ନ ଉପାୟରେ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରିଥାଆନ୍ତି। ଆଉ ଯଦି ପାଳନ କରନ୍ତି ତେବେ କିଛି ଯେ ଭୁଲ କରନ୍ତି ଏଭଳି ଭାବୁଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ମୁଁ ନୁହେଁ। କିନ୍ତୁ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ କାରଣରୁ, କାଲିକାର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥିଲା।

ମେଡିକାଲ କ୍ଷେତ୍ରର ଲୋକମାନେ, ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ବିଗତ ଦେଢ଼- ଦୁଇ ବର୍ଷ ଧରି ଦିନ-ରାତି ଲାଗି ପଡ଼ିଛନ୍ତି, ନିଜ ଜୀବନର ଚିନ୍ତା ନ କରି କରୋନା ସହିତ ଲଢ଼ିବାରେ ଦେଶବାସୀମାନଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି, ସେମାନେ କାଲି ଟିକାକରଣର ଯେଉଁ ରେକର୍ଡ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି, ତାହା ହେଉଛି ବହୁତ ବଡ଼ କଥା। ସମସ୍ତେ ଏଥିରେ ବହୁତ ସହଯୋଗ କରିଛନ୍ତି। ଲୋକମାନେ ଏହାକୁ ସେବା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଲେ। ଏହା ହେଉଛି ତାଙ୍କର କରୁଣା ଭାବ, କର୍ତବ୍ୟ ଭାବ, ଯେଉଁଥିପାଇଁ ଅଢ଼େଇ କୋଟି ଟିକାର ଡୋଜ ଦିଆ ଯାଇ ପାରିଲା । ଆଉ ମୁଁ ମାନୁଛି ଯେ, ଟିକାର ପ୍ରତ୍ୟେକଟି ଡୋଜ, ଗୋଟିଏ ଜୀବନକୁ ବଂଚାଇବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିଥାଏ। ଅଢ଼େଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଏତେ କମ୍ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ, ଏତେ ବଡ଼ ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳିବା, ବହୁତ ସନ୍ତୋଷ ପ୍ରଦାନ କରିଥାଏ। ଜନ୍ମଦିନମାନ ଆସିବ, ଯିବ, କିନ୍ତୁ କାଲିର ଏହି ଦିନ ମୋ ମନକୁ ଛୁଇଁ ଯାଇଛି, ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ଯାଇଛି। ମୁଁ ଯେତିକି ଧନ୍ୟବାଦ ଦେବି ତାହା କମ୍ ହେବ। ମୁଁ ହୃଦୟର ସହିତ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରୁଛି, ସମସ୍ତଙ୍କୁ କୃତଜ୍ଞତା ଜ୍ଞାପନ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଭାରତର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ, କେବଳ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ହିଁ ନୁହେଁ, ବରଂ ଗୋଟିଏ ପ୍ରକାରରେ ଅଜୀବିକାରର ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ସୁରକ୍ଷା କବଚ। ଏବେ ଆମେ ଦେଖିବା ତ ହିମାଚଳ, ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ମାମଲାରେ 100ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଗୋଆ 100 ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ ଏବଂ ଲାକ୍ଷାଦ୍ୱୀପରେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଦିଆଯାଇ ସାରିଛି। ସିକ୍କିମ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଶୀଘ୍ର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି । ଆଣ୍ଡାମାନ ନିକୋବାର, କେରଳ, ଲଦ୍ଦାଖ, ଉତରାଖଣ୍ଡ, ଦାଦରା ଏବଂ ନଗର ହାବେଳୀ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଦୂରରେ ନାହିଁ।

ସାଥୀଗଣ,

ଏହା ବହୁତ ଚର୍ଚ୍ଚାକୁ ଆସିନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ଭାରତ ନିଜର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ର ସହିତ ଜଡ଼ିତ ରାଜ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ବହୁତ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଇଛି। ପ୍ରାରମ୍ଭରେ ଆମେ କହିଲୁ ନାହିଁ କାରଣ ଏହା ଉପରେ ମଧ୍ୟ ରାଜନୀତି ହେବାକୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ଯାଇଥାଏ। କିନ୍ତୁ ଏହା ବହୁତ ଜରୁରୀ ଥିଲା ଯେ ଆମର ପର୍ଯ୍ୟଟନସ୍ଥଳ ଶୀଘ୍ରରୁ ଅତି ଶୀଘ୍ର ଖୋଲୁ । ଏବେ ଉତରାଖଣ୍ଡରେ ମଧ୍ୟ ଚାର-ଧାମ ଯାତ୍ରା ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ। ଆଉ ଏହି ସବୁ ପ୍ରୟାସ ଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବା, ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥାଏ।

ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରର ପୁନଃରୁଦ୍ଧାର କରିବାରେ ଗାଁର ଭୂମିକା ହେଉଛି ବହୁତ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ । ଆପଣ ଚିନ୍ତା କରନ୍ତୁ, ହୋଟେଲ ଶିଳ୍ପର ଲୋକ ହୁଅନ୍ତୁ, ଟ୍ୟାକ୍ସି ଡ୍ରାଇଭର ହୁଅନ୍ତୁ, ଫେରିବାଲା ହୁଅନ୍ତୁ, ଦୋକାନୀ ହୁଅନ୍ତୁ, ଯେତେବେଳେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆ ଯାଇଥିବ ତେବେ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁରକ୍ଷାର ଏକ ଭାବନା ନେଇ ଏଠାକୁ ଆସିବେ। ଏବେ ଗୋଆ ଦୁନିଆର ସେହି ହାତଗଣତି ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସ୍ଥଳୀରେ ସାମିଲ ହୋଇ ଚାଲିଛି, ଯେଉଁଠାରେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଟିକାର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳି ସାରିଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଗାମୀ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ଋତୁରେ ଏଠାରେ ପୂର୍ବଭଳି ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କାର୍ଯ୍ୟକଳାପ ହେଉ, ଦେଶ –ବିଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଏଠାରେ ଆନନ୍ଦ ନେଇ ପାରିବେ, ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର କାମନା । ଏହା ସେତେବେଳେ ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ ଯେତେବେଳେ ଆମେ କରୋନା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସାବଧାନତା ଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ସେତିକି ଧ୍ୟାନ ଦେବା, ଯେତିକି ଟିକାକରଣ ଉପରେ ଦେଉଛେ । ସଂକ୍ରମଣ କମ୍ ହୋଇଛି କିନ୍ତୁ ଏବେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଭୂତାଣୁକୁ ଆମକୁ ହାଲୁକା ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିବା ନାହିଁ। ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ଉପରେ ଯେତିକି ଗୁରୁତ୍ୱ ରହିବ, ପର୍ଯ୍ୟଟକ ସେତେ ଅଧିକ ସଂଖ୍ୟାରେ ଏଠାକୁ ଆସିବେ।

ସାଥୀଗଣ,

କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ମଧ୍ୟ ଏବେ ନିକଟରେ ବିଦେଶୀ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରିବା ପାଇଁ ଅନେକ ପଦକ୍ଷେପ ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି। ଭାରତ ଆସିବାକୁ 5 ଲକ୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟଟକଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ଭିସା ପ୍ରଦାନ କରିବାକୁ ନିଷ୍ପତି ନିଆଯାଇଛି। ଯାତ୍ରାଏବଂ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ହିତଧାରକ ମାନଙ୍କୁ 10 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ଶତ- ପ୍ରତିଶତ ସରକାରୀ ଗ୍ୟାରେଂଟି ସହିତ ଦିଆ ଯାଉଛି। ପଞ୍ଜୀକୃତ ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଗାଇଡ଼୍ ମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ 1 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଯାଇଛି। କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଆଗକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସେହି ପଦକ୍ଷେପ ଉଠାଇବା ପାଇଁ ପ୍ରତିବଦ୍ଧ, ଯାହା ଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇବାରେ ସହାୟକ ହେବ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଆକର୍ଷକ କରିବା ପାଇଁ, ସେଠାକାର କୃଷକ, ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଲୋକମାନଙ୍କର ସୁବିଧା ପାଇଁ, ଭିତିଭୂମିକୁ ଡବଲ ଇଂଜିନ ସରକାରଙ୍କର ଦୁଇଗୁଣ ଶକ୍ତି ମିଳୁଛି। ବିଶେଷ କରି ଯୋଗାଯୋଗ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଭିତିଭୂମି ଉପରେ ଗୋଆରେ ଅଦ୍ଭୂତପୂର୍ବ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ‘ମୋପା’ରେ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଥିବା ଗ୍ରୀନଫିଲ୍ଡ ଏୟାରପୋର୍ଟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ନିର୍ମାଣ ହୋଇ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଏହି ବିମାନବନ୍ଦରକୁ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ସହ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ପ୍ରାୟ 12 ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କା ବ୍ୟୟରେ 6 ଲେନର ଆଧୁନିକ ସଂଯୋଗକାରୀ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି। କେବଳ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣରେ ହିଁ ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ହଜାର ହଜାର କୋଟି କୋଟି ଟଙ୍କାର ନିବେଶ ମଧ୍ୟ ଗାଁ ମାନଙ୍କରେ ହୋଇଛି।

ଏହା ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ବହୁତ ଖୁସିର କଥା ଯେ ଉତରର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକୁ ଦକ୍ଷିଣର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକ ସହିତ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ‘ଝୁରୀ ବ୍ରିଜ’ର ଲୋକାର୍ପଣ ମଧ୍ୟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଯେମିତିକି ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି, ଏହି ବ୍ରିଜ ପଣଜୀକୁ ‘ମାର୍ଗୋ’ ସହିତ ଯୋଡ଼ୁଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଗୋଆ ମୁକ୍ତି ସଂଗ୍ରାମର ଅନନ୍ୟ ସଂଗ୍ରାମର ସାକ୍ଷୀ ‘ଅଗୌଡ଼ା’ ଦୁର୍ଗ ମଧ୍ୟ ଖୁବ ଶୀଘ୍ର ଲୋକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଖୋଲି ଦିଆଯିବ।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆର ବିକାଶର ଯେଉଁ ପରମ୍ପରା ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ଛାଡ଼ିଥିଲେ, ତାହାକୁ ମୋର ମିତ୍ର ଡ. ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ଟିମ୍ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମନୋନିବେଶର ସହିତ ଆଗକୁ ବଢାଉଛନ୍ତି। ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତକାଳରେ ଯେତେବେଳେ ଦେଶ ଆତ୍ମନିର୍ଭରତାର ନୂତନ ସଂକଳ୍ପ ସହିତ ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଛି ତେବେ ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ସଂକଳ୍ପ ନେଇଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଆତ୍ମନିର୍ଭର ଭାରତ, ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ଏହି ସଂକଳ୍ପ ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆରେ 50 ରୁ ଅଧିକ ଏହିଭଳି ଉପାଦାନ ନିର୍ମାଣ ଉପରେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ସାରିଛି। ଏହା ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଗୋଆ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଲକ୍ଷ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ, ଯୁବକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ରୋଜଗାରର ନୂତନ ଅବସର ସୃଷ୍ଟି କରିବା ପାଇଁ କେତେ ଗମ୍ଭୀରତାର ସହିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଗୋଆ କେବଳ କୋଭିଡ଼ ଟିକାକରଣରେ ଅଗ୍ରଣୀ ନୁହେଁ, ବରଂ ବିକାଶର ଅନେକ ସ୍ତରରେ ଦେଶର ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ହେଉଛି ଗୋଟିଏ। ଗୋଆର ଯେଉଁ ଗ୍ରାମୀଣ ଏବଂ ସହରୀ କ୍ଷେତ୍ର ରହିଛି, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଖୋଲା ମଳମୁକ୍ତ ହେବାରେ ଲାଗିଛି। ବିଜୁଳି ଏବଂ ପାଣି ଭଳି ମୌଳିକ ସୁବିଧାଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଗୋଆରେ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ଗୋଆ ହେଉଛି ଦେଶର ଏଭଳି ରାଜ୍ୟ ଯେଉଁଠାରେ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ବିଜୁଳିକରଣ ହୋଇ ସାରିଛି। ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ମାମଲାରେ ତ ଗୋଆ ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଛି। ଗୋଆର ଗ୍ରାମୀଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ପହଂଚାଇବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉଛି ପ୍ରଶଂସନୀୟ। ଜଳ ଜୀବନ ମିଶନ ମାଧ୍ୟମରେ ବିଗତ 2 ବର୍ଷରେ ଦେଶରେ ଏ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରାୟ 5 କୋଟି ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ସୁବିଧା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଛନ୍ତି। ଯେଉଁଭଳି ଭାବେ ଗୋଆ ଏହି ଅଭିଯାନକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇଛି ତାହା ‘ଗୁଡ଼୍ ଗଭର୍ଣ୍ଣାନ୍ସ’(ସୁ-ଶାସନ) ଏବଂ ‘ଇଜ୍ ଅଫ୍ ଲିଭିଂ’କୁ ନେଇ ଗୋଆ ସରକାରଙ୍କର ପ୍ରାଥମିକତାକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ସୁଶାସନକୁ ନେଇ ଏହି ପ୍ରତିବଦ୍ଧତା କରୋନା କାଳରେ ଗୋଆ ସରକାର ଦେଖାଇଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ପ୍ରକାରର ଆହ୍ୱାନ ଗୁଡ଼ିକ ସତ୍ୱେ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଯେଉଁ ସାହାଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଗୋଆ ପାଇଁ ପଠାଇଲେ, ତାହାକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ, ବିନା କୌଣସି ଭେଦଭାବରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ପାଖରେ ପହଂଚାଇବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଗୋଆର ଟିମ୍ କରିଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗରିବ, ପ୍ରତ୍ୟେକ କୃଷକ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ସାଥୀଙ୍କ ପାଖରେ ସାହାଯ୍ୟ ପହଂଚାଇବାରେ କୌଣସି ଅଭାବ ରଖା ଯାଇ ନାହିଁ । ମାସ- ମାସ ଧରି ଗୋଆର ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ରାସନ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଚ୍ଚୋଟତାର ସହିତ ପହଂଚାଯାଉଛି। ମାଗଣ ଗ୍ୟାସ ସିଲିଣ୍ଡର ମିଳିବା ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଅନେକ ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ଅସୁବିଧା ସମୟରେ ସାହାରା ମିଳିଛି।

ଗୋଆର କୃଷକ ପରିବାରକୁ ପିଏମ କିଷାନ ସମ୍ମାନ ନିଧି ଦ୍ୱାରା କୋଟି- କୋଟି ଟଙ୍କା ସିଧାସଳଖ ସେମାନଙ୍କର ବ୍ୟାଙ୍କ ଖାତାରେ ମିଳିଛି। କରୋନା କାଳରେ ହିଁ ଏଠାକାର ଛୋଟ- ଛୋଟ କୃଷକମାନଙ୍କୁ ମିଶନ ମୋଡରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡ ମିଳିଛି। କେବଳ ଏତିକି ନୁହେଁ, ଗୋଆର ପଶୁପାଳକଙ୍କୁ ଏବଂ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଥର ବଡ଼ ସଂଖ୍ୟାରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡର ସୁବିଧା ମିଳିଛି । ପିଏମ ସ୍ୱନିଧି ଯୋଜନା ମାଧ୍ୟମରେ ମଧ୍ୟ ଗାଁରେ ବୁଲାବିକାଳୀ ଏବଂ ଠେଲାଗାଡ଼ି ମାଧ୍ୟମରେ ବ୍ୟବସାୟ କରୁଥିବା ସାଥୀଙ୍କୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଋଣ ଦେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଚାଲୁ ରହିଛି। ଏହି ସମସ୍ତ ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକ ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଲୋକମାନଙ୍କୁ, ବନ୍ୟା ସମୟରେ ମଧ୍ୟ ବହୁତ କିଛି ସାହାଯ୍ୟ ମିଳିପାରିଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆ ହେଉଛି ଅସୀମ ସମ୍ଭାବନାଗୁଡ଼ିକର ପ୍ରଦେଶ। ଗୋଆ ଦେଶର କେବଳ ମାତ୍ର ଗୋଟିଏ ଦେଶ ନୁହେଁ, ବରଂ ହେଉଛି ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ମଧ୍ୟ ଏକ ସଶକ୍ତ ପରିଚୟ। ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର ଦାୟିତ୍ୱ ଯେ ଗୋଆର ଏହି ଭୂମିକାକୁ ଆମେ ସଂପ୍ରସାରଣ କରିବା। ଗୋଆରେ ଆଜି ଯେଉଁ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟମାନ ହେଉଛି, ସେଥିରେ ନିରନ୍ତରତା ହେଉଛି ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ। ଦୀର୍ଘ ସମୟ ପରେ ଗୋଆକୁ ରାଜନୈତିକ ସ୍ଥିରତାର, ସୁଶାସନର ଲାଭ ମିଳୁଛି।

ଏହି ନିରନ୍ତରତାକୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ଏହିଭଳି ଭାବେ ବଜାୟ ରଖିବେ, ଏହି କାମନାର ସହିତ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପୁଣିଥରେ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା। ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ସମଗ୍ର ଟିମକୁ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ସଗଲ୍ୟାଙ୍କ ଦେୱ ବରେଁ କରୁଁ

ଧନ୍ୟବାଦ!