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भाईयों और बहनों,

आप सबका स्‍वागत है। दो दिन बड़ी विस्‍तार से चर्चा होने वाली है। इस मंथन में से कई महत्‍वपूर्ण बाते उभरकर के आएगी जो आगे चलकर के नीति या नियम का रूप ले सकती है और इसलिए हम जितना ज्‍यादा एक लम्‍बे विजन के साथ इन चर्चाओं में अपना योगदान देंगे तो यह दो दिवसीय सम्‍मेलन अधिक सार्थक होगा। इस विषय में कुछ बातें बताने का आज मन करता है मेरा। Climate के संबंध में या Environment के संबंध में प्रारंभ से कुछ हमारी गलत अभिव्‍यक्ति रही है और हम ऐसे जैसे अपनी बात को दुनिया के आगे प्रस्‍तुत किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे हमें न Climate की परवाह है न Environment की परवाह है। और सारी दुनिया हमारी इस अभिव्‍यक्ति की गलती के कारण यह मानकार के बैठी कि विश्‍व तो Environment conscious हो रहा है। विश्‍व climate की चिंता कर रहा है कि यह देश है जो कोई अडंगे डाल रहा है और इसका मूल कारण यह नहीं है कि हमने environment को बिगाड़ने में कोई अहम भूमिका निभाई है। climate को बर्बाद करने में हमारी या हमारे पूर्वजों की कोई भूमिका रही है। हकीकत तो उल्‍टी है। हम उस परंपरा में पले है, उन नीति, नियम और बंधनों में पले-बढ़े लोग हैं, जहां प्रकृति को परमेश्‍वर के रूप माना गया है, जहां पर प्रकृति की पूजा को सार्थक माना गया है और जहां पर प्रकृति की रक्षा को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ा गया है। लेकिन हम अपनी बात किसी न किसी कारण से, एक तो हम कई वर्षों से गुलाम रहे, सदियों से गुलाम रहने के कारण एक हमारी मानसिकता भी बनी हुई है कि अपनी बात दुनिया के सामने रखते हुए हम बहुत संकोच करते हैं। ऐसा लगता है कि यार कहीं यह आगे बढ़ा हुआ विश्‍व हम Third country के लोग। हमारी बात मजाक तो नहीं बन जाएगी। जब तक हमारे भीतर एक confidence नहीं आता है, शायद इस विषय पर हम ठीक से deal नहीं कर पाएंगे।

और मैं आज इस सभागृह में उपस्थित सभी महानुभावों से आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूं हम जितने प्रकृति के विषय में संवेदनशील है। दुनिया हमारे लिए सवालिया निशान खड़ा नहीं कर सकती है। आज भी प्रति व्‍यक्ति अगर carbon emission में contribution किसी का होगा तो कम से कम contribution वालों में हम है। लेकिन उसके बाद भी आवश्‍यकता यह थी कि विश्‍व में जब climate विषय में एक चिंता शुरू हुई, भारत ने सबसे पहले इसका नेतृत्‍व करना चाहिए था। क्‍योंकि दुनिया में अधिकतम वर्ग यह है कि जो climate की चिंता औरों पर restriction की दिशा में करता रहता है, जबकि हम लोग सदियों से प्रकृति की रक्षा करते-करते जीवन विकास की यात्रा में आगे बढ़ने के पक्षकार रहे हैं। दुनिया जो आज climate के संकट से गुजर रही है, Global Warming के संकट से गुजर रही है, उसको अभी भी रास्‍ता नहीं मिल रहा है कि कैसे बचा जाए, क्‍योंकि वो बाहरी प्रयास कर रहे हैं। और मैंने कई बार कहा कि इन समस्‍या की जड़ में हम carbon emission को रोकने के लिए जो सारे नीति-नियम बना रहे हैं, विश्‍व के अंदर एक बंधनों की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन हम कोई अपनी Life Style बदलने के लिए तैयार नहीं है। समस्‍या की जड़ में मानवजात जो कि उपभोग की तरफ आगे बढ़ती चली गई है और जहां ज्‍यादा उपभोग की परंपरा है, वहां सबसे ज्‍यादा प्रकृति का नुकसान होता है, जहां पर उपभोग की प्रवृति कम है, वहां प्रकृति का शोषण भी कम होता है और इसलिए हम जब तक अपने life style के संबंध में focus नहीं करेंगे और दुनिया में इस एक बात को केंद्र बिंदु में नहीं लाएंगे हम शायद बाकी सारे प्रयासों के बावजूद भी, लेकिन यह जो बहुत आगे बढ़ चुके देश है, उनके गले उतारना जरा कठिन है। वो माने न माने हम तो इन्‍हीं बातों में पले-बढ़े लोग हैं। हमें फिर से अगर वो चीजें भूला दी गई है, तो हमें उस पर सोचना चाहिए। मैं उदाहरण के तौर पर कहता हूं आजकल दुनिया में Recycle की बडी चर्चा है और माना जाता है कि यह दुनिया में कोई नया विज्ञान आया है, नई व्‍यवस्‍था आई है। जरा हमारे यहां देखों Recycle, reuse और कम से कम उपयोग करने की हमारी प्रकृति कैसी रही है। पुराना जमाना की जरा अपने घर में दादी मां उनके जीवन को देखिए। घर में कपड़े अगर पुराने हो गए होंगे, तो उसमें से रात को बिछाने के लिए गद्दी बना देंगे। वो अब उपयोगी नहीं रही तो उसमें से भी झाडू-पौचे के लिए उस जगह का उपयोग करेंगे। यानी एक चीज को recycle कैसे करना घर में हर चीज का वो हमारे यहां सहज परंपरा थी। सहज प्रकृति थी।

मैंने देखा है गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन आम को भी इतना Recycle करते हैं, Reuse करते हैं शायद कोई बाहर सोच नहीं सकता है। कहने का तात्‍पर्य है कि कोई बाहर से borrow की हुई चीज नहीं है। लेकिन हमने दुनिया समझे उस terminology में उन चीजों को आग्रहपूर्वक रखा नहीं। विश्‍व के सामने हम अपनी बातों को ढंग से रख नहीं पाए। हमारे यहां पौधे में परमात्‍मा है। जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान के माध्‍यम से जब Laboratory में जब सिद्ध किया कि पौधे में जीव होता है, उसके बाद ही हमने जीव है ऐसा मानना तय किया, ऐसा नहीं है। हम सहस्‍त्रों वर्ष से गीता का उल्‍लेख करे, महाभारत का उल्‍लेख करे हमें तभी से मानते हुए आए हैं कि पौधे में परमात्‍मा होता है। और इसलिए पौधे की पूजा, पौधे की रक्षा यह सारी चीजें हमें परंपराओं से सिखाई गई थी। लेकिन काल क्रम में हमने ही अपने आप को कुछ और तरीके से रास्‍ते खोजने के प्रयास किए। कभी-कभी मुझे लगता है.. यहां urban secretaries बहुत बड़ी संख्‍या में है हम परंपरागत रूप से चीजों को कैसे कर सकते हैं। मैं जानता हूं मैं जो बातें बताऊंगा, ये जो so called अंग्रेजीयत वाले लोग हैं, वो उसका मजाक उड़ाएंगे 48 घंटे तक। बड़ा मजाक उड़ाएंगे, आपको भी बड़ा मनोरंजन मिलेगा टीवी पर, क्‍योंकि एक अलग सोच के लोग हैं। जैसे मैं आपको एक बात बताऊं। आपको मालूम होगा यहां से जिनका गांव के साथ जीवन रहा होगा। गांव में एक परंपरा हुआ करती थी कि जब full moon होता था, तो दादी मां बच्‍चों को चांदनी की रोशनी में सुई के अंदर धागा पिरोने के लिए प्रयास करते थे, क्‍यों eye sight तो थी, लेकिन उस चांदनी की रोशनी की अनुभूति कराते थे।

आज शायद नई पीढ़ी को पूछा जाए कि आपने चांदनी की रोशनी देखी है क्‍या? क्‍या पूर्णिमा की रात को बाहर निकले हो क्‍या? अब हम प्रकृति से इतने कट गए हैं।

अगर हमारी urban body यह तय करे, लोगों को विश्‍वास में लेकर के करें कि भई हम पूर्णिमा की रात को street light नहीं जलाएंगे। इतना ही नहीं उस दिन festival मनाएंगे पूरे शहर में, सब मोहल्‍ले में लोग स्‍पर्धा करेंगे, सुई में धागा डालने की। एक community event हो जाएगा, एक आनंद उत्‍सव हो जाएगा और पर्यावरण की रक्षा भी होगी। चीज छोटी होती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि सभी Urban Body में महीने में एक बार इस चांदनी रात का उपयोग करते हुए अगर street light बंद की जाए तो कितनी ऊर्जा बचेगी? कितनी ऊर्जा बचेगी तो कितना emission हम कम करेंगे? लेकिन यही चीज इस carbon emission के हिसाब से रखोगे, तो यह जो so called अपने आप को पढ़ा-लिखा मानता हैं, वो कहे वाह नया idea है, लेकिन वही चींज हमारी गांव की दादी मां कहती वो सुई और धागे की कथा कहकर के कहेंगे, अरे क्‍या यह पुराने लोग हैं इनको कोई समझ नहीं है, देश बदल चुका है। क्‍या यह हम हमारे युवा को प्रेरित कर सकते हैं कि भई Sunday हो, Sunday on cycle मान लीजिए, हो सकता है कोई यह भी कह दें कि मोदी अब cycle कपंनियों के agent बन गया हैं। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है देश का। पता नहीं कौन क्‍या हर चीज का अर्थ निकालता है। जरूरी नहीं कि हर कोई लोग cycle खरीदने जाए, तय करे कि भई मैं सप्‍ताह में एक दिन ऊर्जा से उपयोग में आने वाले साधनों का उपयोग में नहीं करूंगा। अपनी अनुकूलता है।

समाज मैं जो life style की बात करता हूं हम पर्यावरण की रक्षा में इतना बड़ा योगदान दें सकते हैं। सहज रूप से दे सकते हैं और थोड़ा सा प्रयास करना पड़ता है। एक शिक्षक के जीवन को मैं बराबर जानता हूं। मैं जब गुजरात में मुख्‍यमंत्री था तो उन पिछड़े इलाकों में चला जाता था, जून महीने में कि जहां पर girl child education बहुत कम हो। 40-44 डिग्री Temperature रहा करता था जून महीने में और मैं ऐसे गांव में जाकर तीन दिन रहता था। जब तक मैं मुख्‍यमंत्री रहा वो काम regularly करता था। एक बार मैं समुद्री तट के एक गांव में गया। एक भी पेड़ नहीं था, पूरे गावं में कहीं पर नहीं, लेकिन जो स्‍कूल था, वो घने जंगलों में जैसे कोई छोटी झोपड़ी वाली स्‍कूल हो, ऐसा माहौल था। तो मेरे लिए आश्‍चर्य था। मैंने कहा कि यार कहीं एक पेड़ नहीं दिखता, लेकिन स्‍कूल बड़ी green है, क्‍या कारण है। तो वहां एक teacher था, उस teacher का initiative इतना unique initiative था, उसने क्‍या किया – कहीं से भी bisleri की बोतल मिलती थी खाली, उठाकर ले आता था, पेट्रोल पम्‍प पर oil के जो टीन खाली होते थे वो उठाकर ले आता था और लाकर के students को एक-एक देता था, साफ करके खुद और उनको कहता था कि आपकी माताजी जो kitchen में बर्तन साफ करके kitchen का जो पानी होता है, वो पानी इस बोतल में भरकर के रोज जब स्‍कूल में आओगे तो साथ लेकर के आओ। और हमें भी हैरानी थी कि सारे बच्‍चे हाथ में यह गंदा दिखने वाला पानी भरकर के क्‍यों आते हैं। उसने हर बच्‍चे को पेड़ दे दिया था और कह दिया था कि इस बोतल से daily तुम्‍हें पानी डालना है। Fertilizer भी मिल जाता था। एक व्‍यक्ति के अभिरत प्रयास का परिणाम था कि वो पूरा स्‍कूल का campus एकदम से हरा-भरा था। कहना का तात्‍पर्य है कि इन चीजों के लिए समाज का जो सहज स्‍वभाव है, उन सहज स्‍वभाव को हम कितना ज्‍यादा प्रेरित कर सकते हैं, करना चाहिए।

मैं एक बार इस्राइल गया था, इस्राइल में रेगिस्‍तान में कम से कम बारिश, एक-एक बूंद पानी का कैसे उपयोग हो, पानी का recycle कैसे हो, समुद्री की पानी से कैसे sweet water बनाया जाए, इन सारे विषयों में काफी उन्‍होंने काम किया है। काफी प्रगति की है। इस्राइल तो इस समय एक अभी भी रेगिस्‍तान है जहां हरा-भरा होना बाकी है और एक है पूर्णतय: उन्‍होंने रेगिस्‍तान को हरा-भरा बना दिया है।

बेन गुरियन जो इस्राइल के राष्‍ट्रपिता के रूप में माने जाते हैं, तो मैं जब इस्राइल गया था तो मेरा मन कर गया कि उनका जो निवासा स्‍थान है वो मुझे देखना है, उनकी समाधि पर जाना है। तो मैंने वहां की सरकार को request की थी बहुत साल पहले की बात है। तो मैं गया, उनका घर उस रेगिस्‍तान वाले इलाके में ही था, वहीं रहते थे वो। और दो चीजें मेरे मन को छू गई – एक उनके bedroom में महात्‍मा गांधी की तस्‍वीर थी। वे सुबह उठते ही पहले उनको प्रणाम करते थे और दूसरी विशेषता यह थी कि उनकी जो समाधि थी, उन समाधि के पास एक टोकरी में पत्‍थर रखे हुए थे। सामान्‍य रूप से इतने बड़े महापुरूष के वहां जाएंगे तो मन करता है कि फूल रखें वहां, नमन करे। लेकिन चूंकि उनको green protection करना है, greenery की रक्षा करनी है। फूल-फल इसको नष्‍ट नहीं करना, यह संस्‍कार बढ़ाने के लिए बेन बुरियन की समाधि पर अगर आपको आदर करना है तो क्‍या करना होता था उस टोकरी में से एक पत्‍थर उठाना और पत्‍थर रखना और शाम को वो क्‍या करते थे सारे पत्‍थर इकट्ठे करके के फिर टोकरी में रख देते थे। अब देखिए environment की protection के लिए किस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को लोग विकसित करते हैं। हम अपने आपसे बाकी सारी बातों के साथ-साथ हम अपने जीवन में इन चीजों को कैसे लाए उसके आधार पर हम इसको बढ़ावा दे सकते हैं। हमारे स्‍कूलों में, इन सब में किस प्रकार से एक माहौल बनाया जाए प्रकृति रक्षा, प्रकृति पूजा, प्रकृति संरक्षण यह सहज मानव प्रकृति का हिस्‍सा कैसे बने, उस दिशा में हमको जाना होगा। और हम वो लोग है जिनका व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता। यही जिनके जीवन का आदर्श रहा है। जहां व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता का आदर्श रहा हो, वहां पर हमें प्रकृति का शोषण करने का अधिकार नहीं है। हमें प्रकृति का दोहन करने से अधिक प्रकृति को उपयोग, दुरूपयोग करने का हक नहीं मिलता है। दुनिया में प्रकृत‍ि का शोषण ही प्रवृति है, भारत में प्रकृति को दोहन एक संस्‍कार है। शोषण ही हमारी प्रवृति नहीं है और इसलिए विश्‍व इस संकट से जो गुजर रहा है, मैं अभी भी मानता हूं कि दुनिया को इस क्षेत्र में बचाने के लिए नेतृत्‍व भारत ने करना चाहिए। और उस दिमाग से भारत ने अपनी योजनाएं बनानी चाहिए। दुनिया climate change के लिए हमें guide करे और हम दुनिया को follow करें। दुनिया parameter तय करे और हम दुनिया को follow करे, ऐसा नहीं है। सचमुच में इस विषय में हमारी हजारों साल से वो विरासत है, हम विश्‍व का नेतृत्‍व कर सकते हैं, हम विश्‍व का मार्गदर्शन कर सकते हैं और विश्‍व को इस संकट से बचाने के लिए भारत रास्‍ता प्रशस्‍त कर सकता है। इस विश्‍वास के साथ इस conference से हम निकल सकते हैं। हम दुनिया की बहुत बड़ी सेवा करेंगे। उस विजन के साथ हम अपनी व्‍यवस्‍थाओं के प्रति जो भी समयानुकूल हम बदलाव लाना है, हम बदलाव लाए। जैसे अभी अब यह तो हम नहीं कहेंगे..

अच्‍छा, कुछ लोगों ने मान लिया कि पर्यावरण की रक्षा और विकास दोनों कोई आमने-सामने है। यह सोच मूलभूत गलत है। दोनों को साथ-साथ चलाया जा सकता है। दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ do’s and don’ts होते हैं, इसका पालन होना चाहिए। अगर वो पालन होता है तो हम उसकी रखवाली भी करते हैं और उसके लिए कोई चीजें, जैसे अभी हमने कोयले की खदानें उसकी नीलामी की, लेकिन उसके साथ-साथ उनसे जो पहले राशि ली जाती थी environment protection के लिए वो चार गुना बढ़ा दी, क्‍योंकि वो एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। आवश्‍यक है तो वो भी बदलाव किया। हमारी यह कोशिश रहनी चाहिए कि हम इस प्रकार से बदलाव लाने की दिशा में कैसे प्रयास करे और अगर हम प्रयास करते तो परिणाम मिल सकता है। दूसरी बात है, ज्‍यादातर भ्रम हमारे यहां बहुत फैलाया जाता है। अभी Land Acquisition Bill की चर्चा हुई है। इस Land Acquisition Bill में कहीं पर भी एक भी शब्‍द वनवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, आदिवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, Forest Land के संबंध में नहीं है। वो जमीन, उसके मालिक, Land Acquisition bill के दायरे में आते ही नहीं है, लेकिन उसके बावजूद भी जिनको इन सारी चीजों की समझ नहीं है। वो चौबीसों घंटे चलाते रहते हैं। पता ही नहीं उनको कहीं उल्‍लेख तक नहीं है। उनको भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं समझता हूं कि समाज का गुमराह करने का इस प्रकार का प्रयास आपके लिए कोई छोटी बात होगी, आपके राजनीतिक उसूल होंगे लेकिन उसके कारण देश को कितना नुकसान होता है और कृपा करके ऐसे भ्रम फैलाना बंद होना चाहिए, सच्‍चाई की धरा पर पूरी debate होनी चाहिए। उसमें पक्ष विपक्ष हो सकता है, उसमें कुछ बुरा नहीं है, लोकतंत्र है। लेकिन आप जो सत्‍य कहना चाहते हो, उसमें दम नहीं है, इसलिए झूठ कहते रहो। इससे देश नहीं चलता है और इसलिए मैं विशेष रूप से वन विभाग से जुड़े हुए मंत्री और अधिकारी यहां उपस्थित हैं तो विशेष रूप से इस बात का उल्‍लेख करना चाहता हूं कि Land Acquisition Act के अंदर कहीं पर जंगल की जमीन, आदिवासियों की जमीन उसका कोई संबंध नहीं है। उस दायरे में वो आता नहीं है, हम सबको मालूम है कि उसका एक अलग कानून है, वो अलग कानूनों से protected है। इस कानून का उसके साथ कोई संबंध नहीं है, लेकिन झूठ फैलाया जा रहा है और इसलिए मैं चाहूंगा कि कम से कम और ऐसे मित्रों से प्रार्थना करूंगा कि देशहित में कम से कम ऐसे झूठ को बढ़ावा देने में आप शिकार न हो जाएं यह मेरा आग्रह रहेगा।

आज यह भी यहां बताया गया कि Tiger की संख्‍या बढ़ी है। करीब 40% वृद्धि हुई है। अच्‍छा लगता है सुनकर के वरना दुनिया में Tiger की संख्‍या कम होती जा रही है और दो-तिहाई संख्‍या हमारे पास ही है तो एक हमारा बहुत बड़ा गौरव है और यह गौरव मानवीय संस्‍कृति का भी द्योतक होता है। इन दोनों को जोड़कर हमें इस चीज का गौरव करना चाहिए। और विश्‍व को इस बात का परिचय होना चाहिए कि हम किस प्रकार की मानवीय संस्‍कृतियों को लेकर के जीते हैं कि जहां पर इतनी तेज गति से tiger की जनसंख्‍या का विकास हो रहा है। हमारे पूरब के इलाके में खासकर के हाथी को लेकर के रोज नई खबरें आती है। हा‍थी को लेकर के परेशानियां आती है। अभी मैं कोई एक science magazine पढ़ रहा था। बड़ी interesting चीज मैंने पहली बार पढ़ी, आप लोग तो शायद उसके जानकारी होगी। जब खेत में हाथियों का झुंड आ जाता है, तो बड़ी परेशानी रहती कैसे निकालना है, यह forest department के लोग भांति-भांति के सशत्र लेकर पहुंच जाते हैं और दो-दो दिन तक हो हल्‍ला हो जाता है। मैंने एक science magazine पढ़ा, कहीं पर लोगों ने प्रयोग किया है बड़ा ही Interesting प्रयोग लगा मुझे। वे अपने खेत के बाढ़ पर या पैड है उस पर Honey Bee को भी Developed करते हैं मधुमक्‍खी को रखते हैं और जब हाथी के झुंड आते हैं तो मधुमक्‍खी एक Special प्रकार की आवाज करती है और हाथी भाग जाता है। अब ये चीजे जो हैं कहीं न कहीं सफल हुई हैं आज भी शायद हमारे यहां हो सकता है कुछ इलाकों में करते भी होंगे। हमें इस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को भी समझना होगा ताकि हमें हाथियों से संघर्ष करना पड़ सके। मानव और हाथी के बीच जो संघर्ष के जो समाचार आते हैं, उससे हम कैसे बचें। हम हाथी की भी देखभाल करें, अपने खेत की भी देखभाल कर सकें। अगर ऐसे सामान्‍य व्‍यवस्‍थाएं विकसित हो सकती है और अगर यह सत्‍य है तो मैंने कहीं पढ़ा था, लेकिन किसी प्रत्‍यक्ष मेरी किसान से बात हुई नहीं है लेकिन मैं कभी असम की तरफ जाऊंगा तो पूछूंगा सबसे बात करूंगा कि क्‍या है जानकारी लाने का प्रयास करूंगा मैं, लेकिन आपसे में उस दिशा में काम करने वाले जहां हाथी की जनसंख्‍या हैं और गांवों में कभी-कभी चली आती हैं तो उनके लिए शायद हो सकता है कि ये अगर इस प्रकार का प्रयोग हुआ हो तो यह काम आ सकता है। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि यह जगत सब समस्‍याओं से जुड़ा हुआ होगा हम ही पहली बार गुजर रहे हैं ऐसा थोड़ी है और हरेक ने अपने-अपने तरीके से उसके उपाय खोजे होंगे। उनको फिर से एक बार वैज्ञानिक तरीके से वैज्ञानिक तराजू से देखा जाए कि हम इन चीजों को कैसे फिर से एक बार प्रयोग में ला सकते हैं। थोड़ा उसे Modify करके उसे प्रयोग में ला सकते हैं। इन दिनों जब पर्यावरण की रक्षा की बात आती है, तो ज्‍यादातर कारखानें और ऊर्जा उसके आस-पास चर्चा रहती है। भारत उस अर्थ में ईश्‍वर की कृपा वाला राष्‍ट्र रहा है कि जिसके पास Maximum solar Radiation वाली संभावना वाला देश है। इसका हमें Maximum उपयोग कैसे करना है और इसलिए सरकार ने Initiative लिया है कि हम Solar Energy हम Wind Energy Biomass Energy उस पर कितना ज्‍यादा बल दें ताकि हम जो विश्‍व की चिंता है उसमें हम मशरूफ हों। लेकिन मजा देखिए, जो दुनिया Climate के लिए Lead करती है, दुनिया को पाठ पढ़ाती है अगर हम उनको कहें कि हम Nuclear Energy में आगे जाना चाहते हैं कि Nuclear Energy Environment protection का एक अच्‍छा रास्‍ता है और हम उनको जब कहते हैं कि Nuclear Energy के लिए आवश्‍यक Fuel दो तो मना कर देते हैं यानी हम दुनिया की इतनी बड़ी सेवा करना चाहते हैं लेकिन आप सेवा करों यह नियम पालन करो व‍ह नियम पालन करो। मैं दुनिया के सभी उस देशवासियों से यह निवेदन करना चाहूंगा कि भारत जैसा देश जिस प्रकार से नेतृत्‍व करने के लिए तैयार है Environment protection के लिए Civil Nuclear की तरफ हमारा बल है। हम Nuclear Energy पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, हम उसे करने के लिए तैयार हैं क्‍योंकि हमें पता है कि पर्यावरण की रक्षा में अच्‍छे सा अच्‍छा रास्‍तों में महत्‍वपूर्ण है। लेकिन वही लोग जो हमें Environment के लिए भाषण देते हैं वो Nuclear के लिए Fuel देने के लिए तैयार नहीं है। ये दो तराजू से दुनिया नहीं चल सकती है और इसलिए विश्‍व पर हमें भी यह दबाव पैदा करना पड़ेगा और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में यह दबाव दिखने वाला है, लोग अनुभव करेंगे हम Solar Energy की तरफ जा रहे हैं। Biomass की तरफ जा रहे हैं। लेकिन मैं Urban Bodies को कहना चाहूंगा अगर हम स्‍वच्‍छ भारत की चर्चा करें तो भी और अगर हम Environment की चर्चा करें तो भी। Waste Water & Solid waste Management की दिशा में हम लोंगों को आग्रहपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। Public Private Partnership Model को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। Solid Waste Management की ओर हमने पूरा ध्‍यान देना चाहिए। और आज Waste Wealth का एक सबसे बड़ा Business है। Waste में से Wealth create करना एक बहुत बड़ा Entrepreneurship शुरू हुआ है। हम अपने Urban Bodies में इसको कैसे जोड़े। Urban Bodies में Waste में से Wealth को create पैदा करने में स्‍पेशल फोकस करें। और आप देखिए कि बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। एक छोटा सा प्रयोग है मैं Urban Bodies से आग्रह करूंगा मान लीजिए हम हिंदुस्‍तान में पांच सौ शहर पकड़े, जहां एक लाख से ज्‍यादा आबादी है और वहां पर हम तय करें अब देखिए आज जो शहर का कूड़ा-कचरा फेंकने के लिए जो जगह जमीन की जो जरूरत है हजारों एकड़ भूमि की जरूरत पड़ेगी अगर ये कचरों के ढेर करने हैं तो अब गमिल लाओंगे कहां से और अब जमीन नहीं हैं तो क्‍या मतलब है कि कूड़ा-कचरा पड़ा रहेगा क्‍या और इसलिए हमारे लिए उस पर Process करना Recycle करना Waste Management करना यह अनिवार्य हो गया है। अब वैज्ञानिक के तरीके उपलब्‍ध हैं अगर हम Urban Body Waste Water Treatment करें और पानी को ठीक करके अगर किसानों को वापिस दे वरना एक समय ऐसा आएगा शहर और गांव के बीच संघर्ष होगा पानी के लिए। गांव कहेगा कि मैं शहर को पानी नहीं देने दूंगा और शहर बिना पानी मरेगा। लेकिन जो अगर शहर पानी प्रयोग करता है उसको Recycle करके गांव को वापस दे देता है खेतों में तो यह संघर्ष की नौबत नहीं आएगी और एक प्रकार से Treated Water होगा तो Fertilizer की दृष्टि से उपयोग इस प्रकार से पानी को इस प्रकार से बनाकर दिया जा सकता है। और Urban Body जो होता है उसके गांव जो होते हैं वो ज्‍यादातर सब्‍जी की खेती करते हैं और वही सब्‍जी उनके शहर के अंदर बिकने के लिए आती हैं रोजमर्रा की उनकी आजीविका उससे चलती है। हम इन्‍हीं को Solid Waste Management करके Solid Waste में से हम मानव Fertilizer बनाएं और वो Fertilizer हम उनको दें तो Organic सब्‍जी शहर में आएगी कि नहीं आएगी। इतनी बड़ी मात्रा में अगर हम Fertilizer देते हैं शहरों के कूड़े-कचरों से बनाया हुआ तो अच्‍छी Quality का विपुल मात्रा में सब्‍जी शहर में आएगी तो सस्‍ती सब्‍जी मिलेगी या नहीं मिलेगी? सस्‍ती सब्‍जी गरीब से गरीब व्‍यक्ति खाएगा तो Nutrition के Problem का Solution होगा कि नहीं होगा। Vegetable Sufficient खाएगा तो Health सेक्‍टर का बजट कम होगा कि नहीं होगा। एक प्रयास कितने ओर चीजों पर इफैक्‍ट कर सकता है इसका अगर हम एक Integrated approach करें तो हम हमारे गांवों को भी बचा सकते हैं हमारे शहरों को भी बचा सकते हैं। कभी-कभार अज्ञान का भी कारण होता है। हमारे यहां देखा है कि फसल होने के बाद अब जैसे Cotton है Cotton लेने के बाद बाकी जो है उसको जला देते हैं। लेकिन उसी को अगर टुकड़े कर करके खेत में डाल दें तो वहीं चीज Nutrition के रूप में काम आती है Fertilizer के रूप में काम आती है। मैंने एक प्रयोग देखा था केले की खेती हमारे यहां हो रही थी तब केला उतारे के बाद केला देने की क्षमता जब कम हो जाती है तो वो जो पेड़ का हिस्‍सा होता है उसके टुकड़े कर कर के उन्‍हें जमीन में डाले और मैंने अनुभव किया कि उसके अंदर इतना Water Content होता है केले के Waste Part में कि 90 दिन तक आपको फसल को पानी नहीं देना पड़ता है वो उसी में से फसल पानी ले लेती है। अब हम थोड़ा सा इनका प्रयोग चीजों को सीखें, समझें। इसको अगर Popular करें तो हम पानी को भी बचा सकते हैं, फसल को भी बचा सकते हैं। हम चीजों को किस प्रकार से और इसके लिए बहुत बड़ा आधुनिक से आधुनिक बड़ा विज्ञान की जरूरत होती है ऐसा नहीं है। सहज समझ का विषय होता है इनको हम जितना आगे बढ़ाएंगे हम इन चीजों को कर सकते हैं। Urban Body आग्रहपूर्वक Public Private Partnership Model उसमें Vibrating Gap funding का भी रास्‍ता निकल सकता है। आप जो इन Waste खेतों के किसानों को उसके कारण अगर Chemical Fertilizer का उपयोग कम होता है तो Chemical Fertilizer में से जो सब्सिडी बचेगी मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं वो सब्सिडी जो बचेगी वो Vibrating Gap Funding के लिए शहरों को दे देंगे, यानी आपके देश में से Wealth Create होगी और जो आप खाद्य तैयार करोगे वो खाद्य उपयोग करने के कारण Chemical Fertilizer की सब्सिडी बचेगी वो आपको मिलेगी। आप गैस पैदा करोगे, गैस दोगो तो जितनी मात्रा में गैसा पैदा करोगे जो गैस सिलेंडर की जो सब्सिडी है वो बचेगी तो वो सब्सिडी हम आपको Transfer करेंगे आपके Vibrating Gap Funding में काम आएगी। हम एक उसका Finance का Model कर सकते हैं, लेकिन भारत सरकार, राज्‍य सरकार और Local Self Government ये तीनों मिल करके हम Environment को Priority देते हुए हमारे नगरों को स्‍वच्‍छ रखते हुए, वहां के कूड़े-कचरे को Waste में Wealth Create करें और बहुत Entrepreneur मिले हैं। उनको हम कैसे प्रयोग में हम करें मैंने एक जगह देखा है जहां पर Waste में से ईंटे बना रहे हैं और इतनी बढि़या ईंटे मजबूत बन रही हैं कि बहुत काम आ रही है। आपने देखा होगा पहले जहां पर बिजली के थर्मल प्‍लांट हुआ करते थे वहां पर बाहर कोयले की Ash जो होता है उसके ढेर लगे रहते थे। आज Recycle और Chemical में से ईंटे बनने के कारण सीमेंट में उपयोग आने के कारण वो निकलते ही Contract हो जाता है और दो-दो साल का Contract और निकलते ही हम उठाएंगे यानी कि जो किसी पर्यावरण को बिगाड़ने के लिए संकट था वो ही आज Property में Convert हो गया है हम थोड़ा इस दिशा में प्रयास करें, initiative लें, हम इसमें काफी मदद कर सकते हैं और मेरा सबसे आग्रह है कि हम इन चीजों को बल मानते हुए आने वाले दिशों में दो दिन जब आप चर्चा करेंगे। गंगा की सफाई उसके साथ जुड़ा हुआ है गंगा के किनारे पर रहने वाले, गंगा किनारे के गांव और शहर मैं उन संबंधित राज्‍य सरकारों से आग्रह करूंगा इसमें कोई Comprise मत कीजिए। बैंकों से हम आग्रह करेंगे उनको हम कम दर से लोन दें। लेकिन Approved Plant उनमें वो लगाये जाएं Sewerage Treatment plant किये जाएं। एक बार हमने सफलतापूर्वक ढाई हजार किलोमीटर लम्‍बी गंगा के अंदर जाने वाले प्रदूषण को रोक लिया पूरे दुनिया के सामने और पूरे हिंदुस्‍तान के सामने एक नया विश्‍वास पैदा कर सकता है कि हम सामान्‍य अपने तौर तरीकों से पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं। यह विश्‍वास पैदा करने के लिए Model की तरह इस काम को खड़ा करना और ये एक बार काम खड़ा हो गया तो और काम अपने आप खड़े हो जाएंगे। एक विश्‍वास पैदा करने की आवश्‍यकता है और किया जा सकता है। एक बार हम किसी चीज को हाथ लगाएं पीछे लग जाएं परिणाम मिल सकता है और मैं चाहूंगा ज्‍यादातर इन पांच राज्‍यों से कि जो गंगा के किनारे की उनकी जिम्‍मेवारी है छह हजार के करीब गांव है, एक सौ 18000 किलोमीटर हैं कोई आठ सौ के करीब Industries हैं जो Pollution के लिए तैयार है इसको Target करते हुए एक बार गंगा के किनारे पर हम तय कर ले वहां से कोई भी दूषित पानी या कूड़ा-कचरा गंगा में जाने नहीं देंगे। आप देखिए अपने आप में बदलाव शुरू हो जाएगा। फिर तो गंगा की अपनी ताकत भी है खुद को साफ रखने की। और वो हमने आगे निकल जाएगी लेकिन हम तय करे कि हम गंदा नहीं करेंगे तो गंगा को साफ करने के लिए तो हमें गंदा नहीं करना पड़ेगा गंगा अपना खुद कर सकती है। लेकिन हम गंदा न करे इतना तो संकल्‍प करना पड़ेगा और उस काम को ले करके आप जब यहां पर बैठे है जो गंगा किनारे को जो इस विभाग के मंत्री हैं वो विशेष रूप से आधा-पौना घंटा बैठ करके उन चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जाए। विशेष रूप से चर्चा करें मेरा आग्रह रहेगा फिर एक बार मैं इस प्रयास का स्‍वागत करता हूं और मुझे विश्‍वास है कि इस सपने के साथ फिर एक बार मैं दोहराता हूं ये एक ऐसा विषय है जो हमारी बपौती है, हमारा डीएनए है। हमारे पूर्वजों ने इन मानव जाति की बहुत बड़ी सेवा की है। विश्‍व का नेतृत्‍व हमारे पास ही होना चाहिए Climate के मुद्दे पर ये मिजाज होना चाहिए। पूरे विश्‍व को हम दिखा सकते हैं कि यह हमारा विषय है। हमारी परंपरा है। दुनिया को हम सीखा सकते हैं इतनी ताकत के साथ हम यहां से निकले यही अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं धन्‍यवाद।

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ଆମକୁ ‘ଚଳେଇ ନେବା’ ମାନସିକତାକୁ ଛାଡି  'ବଦଳିପାରିବ' ମାନସିକତାକୁ ଆଣିବାକୁ ପଡ଼ିବ :ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ

ଲୋକପ୍ରିୟ ଅଭିଭାଷଣ

ଆମକୁ ‘ଚଳେଇ ନେବା’ ମାନସିକତାକୁ ଛାଡି 'ବଦଳିପାରିବ' ମାନସିକତାକୁ ଆଣିବାକୁ ପଡ଼ିବ :ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ
Big dip in terrorist incidents in Jammu and Kashmir in last two years, says government

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ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତି ୨୦୨୦ର ପ୍ରଥମ ବାର୍ଷିକୀ ଅବସରରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଉଦ୍‌ବୋଧନ
July 29, 2021
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ଏହି ଅବସରରେ ବହୁ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର କଲେ ଶୁଭାରମ୍ଭ
ଜାତୀୟ ବିକାଶର ‘ମହାଯଜ୍ଞ’ରେ ଏନଇପିର ଭୂମିକା ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ନୂତନ ଶିକ୍ଷା ନୀତି ଆମ ଯୁବପିଢ଼ିଙ୍କୁ ଏହି ଆଶ୍ୱାସନା ଦେଇଛି ଯେ ସେମାନଙ୍କ ଆକାଂକ୍ଷା ପୂରଣ କରିବା ଲାଗି ଦେଶ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ସବୁବେଳେ ରହିଛି : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ନୂଆ ଶିକ୍ଷା ନୀତିର ପ୍ରମୁଖ ବୈଶିଷ୍ଟ୍ୟ ହେଉଛି ଏହା ବେଶ ଉନ୍ମୁକ୍ତ ଏବଂ ଚାପବିହୀନ : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଆଠଟି ରାଜ୍ୟର 14ଟି ଇଞ୍ଜିନିୟରିଂ କଲେଜ ପାଞ୍ଚଟି ଭାରତୀୟ ଭାଷାରେ ଶିକ୍ଷାଦାନ ଆରମ୍ଭ କରୁଛନ୍ତି : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ମାତୃଭାଷା ମାଧ୍ୟମରେ ଶିକ୍ଷାଦାନ ଗରିବ, ଗ୍ରାମୀଣ ଓ ଜନଜାତି ବର୍ଗର ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବିଶ୍ୱାସ ଜନ୍ମାଇବ : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ନମସ୍କାର!

କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ମୋ ସହ ସାମିଲ ହୋଇଥିବା କ୍ୟାବିନେଟର ମୋର ସମସ୍ତ ସହଯୋଗୀଗଣ, ରାଜ୍ୟଗୁଡିକର ମାନନୀୟ ରାଜ୍ୟପାଳବୃନ୍ଦ, ସମସ୍ତ ସମ୍ମାନିତ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ, ଉପମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ, ରାଜ୍ୟ ସରକାରଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀଗଣ, ଉପସ୍ଥିତ ଶିକ୍ଷାବିତ୍‌, ଅଧ୍ୟାପକଗଣ, ସମସ୍ତ ଅଭିଭାବକ ଏବଂ ମୋର ପ୍ରିୟ ଯୁବ ସାଥୀଗଣ!

ନୂତନ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତିର ଏକ ବର୍ଷ ପୂରଣ ହୋଇଥିବାରୁ ସମସ୍ତ ଦେଶବାସୀ ଏବଂ ବିଶେଷକରି ସମସ୍ତ ବିଦ୍ୟାର୍ଥୀମାନଙ୍କୁ ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭେଚ୍ଛା । ଗତ ଏକ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣମାନଙ୍କ ଭଳି ଦେଶର ସମସ୍ତ ମହାନୁଭବ, ଶିକ୍ଷକଗଣ, ପ୍ରଧାନ ଆଚାର୍ଯ୍ୟଗଣ, ନୀତି ନିର୍ଦ୍ଧାରକମାନେ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତିକୁ ବାସ୍ତବ ରୂପ ଦେବାରେ ଅନେକ ପରିଶ୍ରମ କରିଛନ୍ତି । କରୋନାର ଏହି କାଳଖଣ୍ଡରେ ମଧ୍ୟ ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ନାଗରିକଙ୍କଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଶିକ୍ଷକ, ରାଜ୍ୟ, ସ୍ୱୟଂଶାସିତ ସଂସ୍ଥାର ପରାମର୍ଶ ଗ୍ରହଣ କରି, ଟାସ୍କ ଫୋର୍ସ ଗଠନ କରି ନୂତନ ଶିକ୍ଷା ନୀତିକୁ ବିଧିବଦ୍ଧ ଭାବେ କାର୍ଯ୍ୟକାରୀ କରାଯାଉଛି । ଗତ ଏକ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତିକୁ ମୂଳଦୁଆ ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରି ଅନେକ ବଡ ବଡ ନିଷ୍ପତି ନିଆଯାଇଛି । ଆଜି, ଏହି ପର୍ଯ୍ୟାୟରେ ମତେ ଅନେକ ନୂତନ ଯୋଜନା, ନୂତନ ପଦକ୍ଷେପଗୁଡିକର ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିବାର ସୌଭାଗ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ମହତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଅବସର ଏଭଳି ସମୟରେ ଆସିଛି ଯେତେବେଳେ କି ଦେଶ ସ୍ୱାଧୀନତାର ୭୫ ବର୍ଷର ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ପାଳନ କରୁଛି । ଆଜିଠାରୁ ଅଳ୍ପ କିଛିଦିନ ପରେ ୧୫ ଅଗଷ୍ଟ ଦିନ ଆମେ ସ୍ୱାଧୀନତାର ୭୫ତମ ବର୍ଷରେ ମଧ୍ୟ ପଦାର୍ପଣ କରିବାକୁ ଯାଉଛୁ । ନୂତନ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷାନୀତିର କାର୍ଯ୍ୟାନ୍ୱୟନ, ଆଜାଦୀ କେ ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବର ଏକ ପ୍ରକାର ପ୍ରମୁଖ ଅଂଶ ପାଲଟି ଯାଇଛି । ଏତେ ବଡ ମହାପର୍ବ ମଧ୍ୟରେ ‘ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତି’ ଅଧିନରେ ଆଜି ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିବା ଯୋଜନାଗୁଡିକ ନବ ଭାରତର ନିର୍ମାଣରେ ଖୁବ ବଡ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କରିବ । ଭାରତର ଯେଉଁ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣିମ ଭବିଷ୍ୟତର ସଙ୍କଳ୍ପ ସହିତ ଆଜି ଆମେ ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ପାଳନ କରୁଛୁ, ସେହି ଭବିଷ୍ୟତ ଆଡକୁ ଆମକୁ ଆଜିର ନୂତନ ପିଢୀ ହିଁ ନେଇଯିବ । ଭବିଷ୍ୟତରେ ଆମେ କେତେ ଆଗକୁ ଯିବା, କେଉଁ ଶିଖରକୁ ଛୁଇଁବା, ତାହା ଏହି କଥା ଉପରେ ନିର୍ଭର କରିବ ଯେ ଆମେ ଆମର ଯୁବପିଢୀକୁ ବର୍ତମାନ, ଅର୍ଥାତ୍ ଆଜି କିଭଳି ଶିକ୍ଷା ଦେଉଛୁ, କିଭଳି ମାର୍ଗ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରୁଛୁ । ଏଣୁ, ମୁଁ ବିଶ୍ୱାସ କରୁଛି, “ଭାରତର ନୂତନ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତି” ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣର ମହାଯଜ୍ଞରେ ମହତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଉପାଦାନଗୁଡିକ ମଧ୍ୟରୁ ଅନ୍ୟତମ । ଏବଂ ଏଥିପାଇଁ, ଦେଶ ଏହି ଶିକ୍ଷା ନୀତିକୁ ଏତେ ଆଧୁନିକ କରିଛି, ଏତେ ଭବିଷ୍ୟୋପଯୋଗୀ କରି ରଖିଛି । ଆଜି ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ଯୋଡି ହୋଇଥିବା ଅଧିକାଂଶ ମହାନୁଭବ ନୂତନ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷାନୀତିର ସମସ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମତା ବିଷୟରେ ଅବଗତ ଅଛନ୍ତି । କିନ୍ତୁ ଏହା ଯେ କେତେ ବିରାଟ ଅଭିଯାନ ଅଟେ, ଏହି ଅନୁଭବକୁ ଆମକୁ ବାରମ୍ବାର ମନେ ପକାଇବା ଉଚିତ୍ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ସମଗ୍ର ଦେଶରୁ ଆମର ଅନେକ ଯୁବ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ଆମ ସହ ସାମିଲ ଅଛନ୍ତି । ଯଦି ଆମେ ଏହି ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ସେମାନଙ୍କର ଆଂକାକ୍ଷା ବିଷୟରେ, ସ୍ୱପ୍ନ ବିଷୟରେ ପଚାରିବା, ତାହେଲେ ଆପଣମାନେ ଦେଖିବେ ଯେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁବାର ମନରେ ଏକ ନୂତନତ୍ୱ ରହିଛି, ଏକ ନୂଆ ଶକ୍ତି ରହିଛି । ଆମର ଯୁବପିଢୀ ପରିବର୍ତନ ପାଇଁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ରୂପରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରହିଛି । ସେ ଅପେକ୍ଷା କରିବାକୁ ଚାହେଁ ନାହି । ଆମେ ସମସ୍ତେ ଦେଖିଛେ, କରୋନା କାଳରେ ଆମ ଶିକ୍ଷା ବ୍ୟବସ୍ଥା ସମ୍ମୁଖରେ କିପରି ଏତେ ବଡ ଆହ୍ୱାନ ଛିଡା ହୋଇଗଲା । ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କ ପାଠପଢାର, ଜୀବନର ଶୈଳୀ ବଦଳିଗଲା । କିନ୍ତୁ ଦେଶର ବିଦ୍ୟାର୍ଥୀମାନେ ଖୁବ୍ ଶୀଘ୍ର ଏହି ପରିବର୍ତନ ସହ ନିଜକୁ ଢଳାଇ ନେଲେ । ଅନଲାଇନ୍ ଶିକ୍ଷା ଏବେ ଏକ ସହଜ ଧାରା ହେବାରେ ଲାଗିଛି । ଶିକ୍ଷା ମନ୍ତ୍ରଣାଳୟ ମଧ୍ୟ ଏଥିପାଇଁ ଅନେକ ପ୍ରୟାସ କରିଛି । ମନ୍ତ୍ରଣାଳୟ ଦୀକ୍ଷା ପ୍ଲାଟଫର୍ମ ଆରମ୍ଭ କରଛି, ସ୍ୱୟଂ ପୋର୍ଟାଲରେ ପାଠ୍ୟକ୍ରମର ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିଛି, ଏବଂ ଆମ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନେ ସମ୍ପୁର୍ଣ୍ଣ ଉତ୍ସାହର ସହିତ ଏସବୁର ଅଂଶ ପାଲଟି ଯାଇଛନ୍ତି । ମତେ କୁହାଯାଇଛି ଯେ ଗତ ୧ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ଦୀକ୍ଷା ପୋର୍ଟାଲକୁ ୨୩ଶହ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଥର ହିଟ କରିବା ଦର୍ଶାଉଛି ଏହା କେତେ ଉପଯୋଗୀ ପ୍ରୟାସ ସାବ୍ୟସ୍ତ ହୋଇଛି । ଆଜି ମଧ୍ୟ ଏଥିରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦିନ ପ୍ରାୟ ୫ କୋଟି ହିଟ କରାଯାଉଛି । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏକବିଂଶ ଶତାଦ୍ଦୀର ଆଜିର ଯୁବପିଢୀ ନିଜ ବ୍ୟବସ୍ଥା, ନିଜ ଦୁନିଆକୁ ନିଜ ଇଚ୍ଛା ଅନୁସାରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରିବାକୁ ଚାହିୁଁଛି । ଏଥିପାଇଁ, ତାକୁ ବାହାର ଦୁନିଆ ସହ ପରିଚିତ ହେବାକୁ ପଡିବ, ତାକୁ ପୁରୁଣା ଶିକୁଳି ଓ ପଞ୍ଜୁରୀରୁ ମୁକ୍ତ ହେବାକୁ ପଡିବ । ଆପଣମାନେ ଦେଖନ୍ତୁ, ଆଜି ଛୋଟ ଛୋଟ ଗାଁ ଓ ଛୋଟ ଛୋଟ ସହରରୁ ଆସୁଥିବା ଯୁବାବର୍ଗ କି କି ଚମତ୍କାର କରୁଛନ୍ତି । ଏହିସବୁ ଦୂରଦୁରରାନ୍ତ ଅଂଚଳରୁ ଏବଂ ସାଧାରଣ ପରିବାରରୁ ଆସୁଥିବା ଯୁବା ଆଜି ଟୋକିଓ ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ତ୍ରିରଙ୍ଗାର ଗୌରବ ବୃଦ୍ଧି କରୁଛନ୍ତି, ଭାରତକୁ ନୂତନ ପରିଚୟ ଦେଉଛନ୍ତି । ଏହିଭଳି କୋଟି କୋଟି ଯୁବକ ଆଜି ବିଭିନ୍ନ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଅସାଧାରଣ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି, ଅସାଧାରଣ ଲକ୍ଷ୍ୟର ଆଧାରଶୀଳା ସ୍ଥାପନ କରୁଛନ୍ତି । କିଏ କଳା ଓ ସଂସ୍କୃତି କ୍ଷେତ୍ରରେ ପୁରାତନ ଓ ଆଧୁନିକର ସମ୍ମିଶ୍ରଣରେ ନୂତନ ସାଧନର ସୃଷ୍ଟି କରୁଛନ୍ତି ତ ଆଉ କିଏ ରୋବୋଟିକ୍ସ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଏକଦା ମନଗଢା ବୈଜ୍ଞାନିକ କାହାଣୀ ଭାବେ ବିବେଚନା କରାଯାଉଥିବା ପରିକଳ୍ପନାକୁ ବାସ୍ତବ ରୂପ ଦେଉଛନ୍ତି । କିଏ ଆର୍ଟିଫିସିଆଲ ଇଂଟେଲିଜେନ୍ସ କ୍ଷେତ୍ରରେ ମାନବୀୟ କ୍ଷମତାକୁ ନୂତନ ଶିଖରରେ ପହଂଚାଉଛନ୍ତି ତ ପୁଣି କିଏ ଯାନ୍ତ୍ରିକ ଶିକ୍ଷା କ୍ଷେତ୍ରରେ ନୂତନ ମାଇଲ ସ୍ତମ୍ଭର ପ୍ରସ୍ତୁତିରେ ଲାଗିଛନ୍ତି । ଏହି ଯୁବପିଢୀ ଭାରତର ଷ୍ଟାଟ ଅପ୍ ବାତାବରଣର ବୈପ୍ଳବୀକରଣ କରୁଛନ୍ତି, ଉଦ୍ୟୋଗ ୪.୦ରେ ଭାରତର ନେତୃତ୍ୱକୁ ବିକଶିତ କରୁଛନ୍ତି, ଏବଂ ଡିଜିଟାଲ ଇଣ୍ଡିଆକୁ ନୂଆ ଗତି ପ୍ରଦାନ କରୁଛନ୍ତି । ଆପଣମାନେ କଳ୍ପନା କରନ୍ତୁ, ଏହି ଯୁବ ପିଢୀକୁ ଯେତେବେଳେ ସେମାନଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନର ଅନୁରୂପ ବାତାବରଣ ମିଳିଯିବ ତାହାହେଲେ ସେମାନଙ୍କ ଶକ୍ତି କେତେ ମାତ୍ରାରେ ବୃଦ୍ଧି ପାଇବ । ଏବଂ ଏଥିପାଇଁ ‘ନୂତନ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତି’ ଯୁବପିଢୀକୁ ଏହି ଭରସା ଦେଉଛି ଯେ ଦେଶ ଏବେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବରେ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି, ସେମାନଙ୍କ ମନୋବଳ ସହିତ ରହିଛି । ଏବେ ଯେଉଁ ଆର୍ଟିଫିସିଆଲ ଇଂଟେଲିଜେନସ୍ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଶୁଭାରମ୍ଭ କରାଯାଇଛି, ତାହା ମଧ୍ୟ ଆମ ଯୁବପିଢୀକୁ ଭବିଷ୍ୟୋନ୍ମୁଖୀ କରାଇବ, ଆର୍ଟିଫିସିଆଲ ଇଂଟେଲିଜେନ୍ସ ପରିଚାଳିତ ଅର୍ଥନୀତିର ପଥ ଉନ୍ମୁକ୍ତ କରିବ । ଶିକ୍ଷା କ୍ଷେତ୍ରରେ ଏହି ଡିଜିଟାଲ ବିପ୍ଳବ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ଏକ ସଙ୍ଗରେ ଆସିଯାଉ, ଗାଁଠାରୁ ସହର ସମାନ ଭାବରେ ଡିଜିଟାଲ ଶିକ୍ଷା ସହ ସାମିଲ ହେଉ, ଏହାର ମଧ୍ୟ ବିଶେଷ ଧ୍ୟାନ ରଖାଯାଇଛି । ଜାତୀୟ ଡିଜିଟାଲ ଶିକ୍ଷା ସ୍ଥାପତ୍ୟ ଅର୍ଥାତ୍ ଏନଡିଇଏଆର ଏବଂ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ପ୍ରଯୁକ୍ତି ଫୋରମ – ଏନ୍‌ଇଟିଏଫ ଏହି ଦିଗରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ଡିଜିଟାଲ ଏବଂ ବୈଷୟିକ ଢାଂଚା ଉପଲବ୍ଧ କରାଇବା ପାଇଁ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ନିର୍ବାହ କରିବ । ଯୁବା ମନ ଯେଉଁ ଦିଗରେ ଚିନ୍ତା କରିବାକୁ ଚାହେଁ, ଖୋଲା ଆକାଶରେ ଯେଭଳି ଉଡିବାକୁ ଚାହେଁ, ଦେଶର ନୂତନ ଶିକ୍ଷା ବ୍ୟବସ୍ଥା ଠିକ୍ ସେହିଭଳି ସୁଯୋଗ ଉପଲବ୍ଧ କରାଇବ ।

 

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗତ ଏକ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ଅନୁଭବ କରିଥିବେ ଯେ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତିକୁ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାରର ଚାପରୁ ମୁକ୍ତ ରଖାଯାଇଛି । ଯେଉଁ ଉନ୍ମୁକ୍ତତା ନୀତି ସ୍ତରରେ ରହିଛି, ସେହି ଉନ୍ମୁକ୍ତତା ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଦିଆଯାଉଥିବା ବିକଳ୍ପରେ ମଧ୍ୟ ଉପଲବ୍ଧ କରାଯାଇଛି । ଏବେ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀ କେତେ ପଢିବେ, କେତେ ସମୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପଢିବେ, ଏହା କେବଳ ବୋର୍ଡ ଏବଂ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟଗୁଡିକ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିବେ ନାହିଁ । ଏହି ନିଷ୍ପତିରେ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ସହଭାଗିତା ରହିବ । ଏକାଧିକ ପ୍ରବେଶ ଓ ପ୍ରସ୍ଥାନର ଯେଉଁ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଆଜି ଆରମ୍ଭ ହୋଇଛି, ତାହା ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଗୋଟିଏ ଶ୍ରେଣୀ ଏବଂ ଗୋଟିଏ ପାଠ୍ୟକ୍ରମ ସହ ବାଧ୍ୟତାମୂଳକ ଭାବେ ବାନ୍ଧି ହୋଇ ରହିବା ବିବଶତାରୁ ମୁକ୍ତ କରିଦେଇଛିି । ଆଧୁନିକ ପ୍ରଯୁକ୍ତିବିଦ୍ୟା ଆଧାରିତ ‘ଏକାଡେମିକ ଅଫ ବ୍ୟାଙ୍କ କ୍ରେଡିଟ’ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଦ୍ୱାରା ଏ ଦିଗରେ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀଙ୍କ ପାଇଁ ବୈପ୍ଳପବିକ ପରିବର୍ତନ ଆସିବାର ଅଛି । ଏବେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁବା ନିଜ ରୁଚି ଅନୁସାରେ, ନିଜ ସୁବିଧା ଅନୁସାରେ ଯେ କୌଣସି ସମୟରେ ଗୋଟିଏ ଶାଖାକୁ ଚୟନ କରିପାରିବେ କିମ୍ବା ଛାଡି ପାରିବେ । ଏବେ କୌଣସି ପାଠ୍ୟକ୍ରମ ଚୟନ କରିବା ସମୟରେ ଏହି ଭୟ ମଧ୍ୟ ରହିବ ନାହିଁ ଯେ ଯଦି ଆମ ନିଷ୍ପତି ଭୁଲ ହୋଇଗଲା ତେବେ କ’ଣ ହେବ? ଏହିପରି, ‘ଅଧ୍ୟୟନ ସ୍ତରର ବିଶ୍ଳେଷଣ ପାଇଁ ସଂରଚନାତ୍ମକ ଆକଳନ ଅର୍ଥାତ ‘ସଫଳ’ ଜରିଆରେ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଆକଳନର ମଧ୍ୟ ବୈଜ୍ଞାନିକ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ସାରିଛି । ଏହି ବ୍ୟବସ୍ଥା ଭବିଷ୍ୟତରେ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ପରୀକ୍ଷାର ଭୟରୁ ମଧ୍ୟ ମୁକ୍ତି ଦେବ । ଯେତେବେଳେ ଯୁବା ମାନସରୁ ଏହି ଭୟ ଦୂର ହୋଇଯିବ ସେତେବେଳେ ଯାଇ ନୂଆ ନୂଆ କୌଶଳ ଆପଣାଇବାର ସାହସ ଏବଂ ନୂଆ ନୂଆ ଅଭିନବତାର ଯୁଗ ଆରମ୍ଭ ହେବ, ସମ୍ଭାବନାର ଅସୀମ ବିସ୍ତାର ଘଟିବ । ଏଥିପାଇଁ ମୁଁ ପୁଣି ଥରେ କହିବି ଯେ ଆଜି ନୂତନ ଶିକ୍ଷା ନୀତି ମାଧ୍ୟମରେ ଯେଉଁ ନୂଆ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଶୁଭାରମ୍ଭ ହୋଇଛି, ସେଥିରେ ଭାରତର ଭାଗ୍ୟ ବଦଳାଇବାର ସାମର୍ଥ୍ୟ ରହିଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ମୁଁ-ଆପଣମାନେ ଦଶନ୍ଧି ଦଶନ୍ଧି ଧରି ଏହି ପରିବେଶ ଦେଖିଆସିଛୁ ଯେ ଯେତେବେଳେ ଭଲ ପାଠ ପଢିବା ପାଇଁ ବିଦେଶକୁ ହିଁ ଯିବାକୁ ପଡିବ ବୋଲି ବୁଝାଯାଉଥିଲା । କିନ୍ତୁ ଭଲ ପାଠପଢା ପାଇଁ ବିଦେଶରୁ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀ ଭାରତ ଆସନ୍ତୁ , ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶିକ୍ଷାନୁଷ୍ଠାନଗୁଡିକ ମଧ୍ୟ ଭାରତରେ ପହଂଚୁ, ଏସବୁ ଏବେ ଆମେ ଖୁବ ଶୀଘ୍ର ଦେଖିବାକୁ ଯାଉଛୁ । ଏହି ସୂଚନା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍ସାହଜନକ ଯେ ଦେଶର ଦେଢ ଶହରୁ ଅଧିକ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟରେ ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ବ୍ୟାପାର କାର୍ଯ୍ୟାଳୟ ସ୍ଥାପନ କରାଯାଇ ସାରିଛି । ଭାରତର ଉଚ୍ଚତର ଶିକ୍ଷା ପ୍ରତିଷ୍ଠାନଗୁଡିକ, ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ସ୍ତରରେ ଶିକ୍ଷା ଓ ଗବେଷଣା କ୍ଷେତ୍ରରେ ଆହୁରି ଆଗକୁ ବଢୁ, ଏଥିପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଆଜି ନୂତନ ମାର୍ଗଦର୍ଶିକା ଜାରି କରାଯାଇଛି । 

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆଜି ଆକାର ନେଉଥିବା ସମ୍ଭାବନାଗୁଡିକୁ ସାକାର କରିବା ପାଇଁ ଆମ ଯୁବପିଢୀକୁ ଦୁନିଆଠାରୁ ଗୋଟିଏ ପାଦ ଆଗରେ ରହିବାକୁ ପଡିବ, ଏକ ପାଦ ଆଗକୁ ଚିନ୍ତା କରିବାକୁ ହେବ । ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ହେଉ, ପ୍ରତିରକ୍ଷା ହେଉ, ମୌଳିକ ଢାଂଚା ହେଉ, ପ୍ରଯୁକ୍ତି ହେଉ, ଦେଶକୁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦିଗରେ ସକ୍ଷମ ଏବଂ ଆତ୍ମନିର୍ଭର ହେବାକୁ ପଡିବ । ‘ଆତ୍ମନିର୍ଭର ଭାରତ’ର ଏହି ପଥ କୌଶଳ ବିକାଶ ଏବଂ ପ୍ରଯୁକ୍ତି ବାଟ ଦେଇ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି । ଯାହା ଉପରେ ଏନଇପିରେ ବିଶେଷ ଗୁରୁତ୍ୱ ଦିଆଯାଇଛି । ମୁଁ ଖୁସି ଯେ ଗତ ୧ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ୧୨୦୦ରୁ ଅଧିକ ଉଚ୍ଚଶିକ୍ଷା ପ୍ରତିଷ୍ଠାନରେ କୌଶଳ ବିକାଶ ସହ ସଂଶ୍ଳିଷ୍ଟ ଶହ ଶହ ନୂଆ ପାଠ୍ୟକ୍ରମକୁ ମଞ୍ଜୁରି ପ୍ରଦାନ କରାଯାଇଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଶିକ୍ଷା ବିଷୟରେ ପୂଜ୍ୟ ବାପୁଜୀ ମହାତ୍ମାଗାନ୍ଧୀ କହୁଥିଲେ – “ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଶିକ୍ଷାକୁ ବାସ୍ତବ ଅର୍ଥରେ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ହେବା ପାଇଁ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ପରିସ୍ଥିତିକୁ ପ୍ରତିଫଳିତ କରିବାକୁ ପଡିବ ।’ ବାପୁଙ୍କ ଏହି ଦୂରଦର୍ଶୀ ଚିନ୍ତାଧାରାକୁ ସଫଳ କରିବା ପାଇଁ ସ୍ଥାନୀୟ ଭାଷାରେ, ମାତୃଭାଷାରେ ଶିକ୍ଷାର ବିଚାର ଏନଇପିରେ ରଖାଯାଇଛି । ଏବେ ଉଚ୍ଚତର ଶିକ୍ଷାରେ ‘ଅନୁଦେଶର ମାଧ୍ୟମ’ ନିମନ୍ତେ ସ୍ଥାନୀୟ ଭାଷା ମଧ୍ୟ ଏକ ବିକଳ୍ପ ହେବ । ମୁଁ ଆନନ୍ଦିତ ଯେ, ୮ଟି ରାଜ୍ୟର ୧୪ଟି ଇଞ୍ଜିନିୟରିଂ କଲେଜ, ୫ଟି ଭାରତୀୟ ଭାଷା – ହିନ୍ଦୀ, ତାମିଲ୍‌, ତେଲୁଗୁ, ମରାଠି ଏବଂ ବଙ୍ଗଳାରେ ଇଞ୍ଜିନିୟରିଂ ପାଠପଢା ଆରମ୍ଭ କରିବାକୁ ଯାଉଛନ୍ତି । ଇଞ୍ଜିନିୟରିଂ ପାଠ୍ୟକ୍ରମର ୧୧ଟି ଭାରତୀୟ ଭାଷାରେ ଅନୁବାଦ ନିମନ୍ତେ ଏକ ବ୍ୟବସ୍ଥା ମଧ୍ୟ ଉପଲବଧ କରାଯାଇ ସାରିଛି । ପ୍ରାନ୍ତୀୟ ଭାଷାରେ ନିଜର ପାଠପଢା ଆରମ୍ଭ କରିବାକୁ ଯାଉଥିବା ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ବିଶେଷଭାବେ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଇବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହାର ସବୁଠାରୁ ବଡ ଲାଭ ଦେଶର ଗରିବ ବର୍ଗକୁ, ଗାଁ ଓ ଛୋଟ ଛୋଟ ସହରରେ ରହୁଥିବା ମଧ୍ୟମ ବର୍ଗର ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀଙ୍କୁ, ଦଳିତ-ପଛୁଆ ଏବଂ ଆଦିବାସୀ ଭାଇ ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ମିଳିବ । ଏହିସବୁ ପରିବାରରୁ ଆସିଥିବା ପିଲାମାନଙ୍କୁ ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ ଭାଷା ବିଭାଜନର ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାକୁ ପଡୁଥିଲା, ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ କ୍ଷତି ଏହି ପରିବାରଗୁଡିକାର ପ୍ରତିଭାବାନ୍ ପିଲାମାନଙ୍କୁ ସହିବାକୁ ପଡୁଥିଲା । ମାତୃଭାଷାରେ ପାଠପଢିବା ଦ୍ୱାରା ଗରିବ ପିଲାମାନଙ୍କ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସରେ ବୃଦ୍ଧି ଘଟିବ, ସେମାନଙ୍କ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଓ ପ୍ରତିଭାକୁ ନ୍ୟାୟ ମିଳିପାରିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ପ୍ରାଥମିକ ଶିକ୍ଷାରେ ମଧ୍ୟ ମାତୃଭାଷାକୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରିବା କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଇଛି । ଆଜି ଯେଉଁ ‘ବିଦ୍ୟା ପ୍ରବେଶ’ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଶୁଭାରମ୍ଭ କରାଯାଇଛି, ତାହାର ମଧ୍ୟ ଏଥିରେ ବହୁତ ବଡ ଭୂମିକା ରହିଛି । ପ୍ଲେ ସ୍କୁଲର ଯେଉଁ ପରିକଳ୍ପନା ଆଜି ଯାଏ ବଡ ସହର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସିମୀତ ରହିଛି, ‘ବିଦ୍ୟା ପ୍ରବେଶ’ ମାଧ୍ୟମରେ ତାହା ଏବେ ଦୂରଦୂରାନ୍ତରେ ଥିବା ବିଦ୍ୟାଳୟଗୁଡିକ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଂଚିବ । ଗାଁ-ଗାଁରେ ବି ପହଂଚିବ । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ଭବିଷ୍ୟତରେ ସାର୍ବଜନିନ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ଭାବରେ କାର୍ଯ୍ୟକାରୀ ହେବ, ଏବଂ ରାଜ୍ୟଗୁଡିକ ମଧ୍ୟ ନିଜ ନିଜର ଆବଶ୍ୟକତା ଅନୁଯାୟୀ ଏହାକୁ କାର୍ଯ୍ୟକାରୀ କରିବେ । ଅର୍ଥାତ୍‌, ଦେଶର ଯେକୌଣସି ଭାଗରେ ପିଲା ଧନୀର ହେଉ ଅବା ଗରିବର, ହସି ଖେଳି ଯେପରି ସିଏ ପାଠ ପଢିବ ଏବଂ ଏହା ସହଜରେ ହେବ, ଏହି ଦିଗରେ ପ୍ରୟାସ କରାଯିବ । ଏବଂ ଯେତେବେଳେ ହାସ୍ୟ ସହ ଏହାର ପ୍ରାରମ୍ଭ ହେବ ତାହାହେଲେ ଆଗକୁ ସଫଳତାର ମାର୍ଗ ମଧ୍ୟ ସହଜରେ ଅତିକ୍ରମ କରାଯାଇ ପାରିବ । 

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆଜି ଆଉ ଏକ କାର୍ଯ୍ୟ ହୋଇଛି, ଯାହା ମୋ ହୃଦୟର ଅତି ନିବିଡ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ସମ୍ବେଦନଶୀଳ ମଧ୍ୟ । ଆଜି ଦେଶରେ ଏଭଳି ୩ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ପିଲା ଅଛନ୍ତି, ଯେଉଁମାନଙ୍କୁ ଶିକ୍ଷା ପାଇଁ ସାଙ୍କେତିକ ଭାଷାର ଆବଶ୍ୟକ ପଡିଥାଏ । ଏହାକୁ ହୃଦୟଙ୍ଗମ କରି ଭାରତୀୟ ସାଙ୍କେତିକ ଭାଷାକୁ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଏକ ଭାଷା ବିଷୟ ଅର୍ଥାତ୍ ଏକ ବିଷୟବସ୍ତୁର ମାନ୍ୟତା ପ୍ରଦାନ କରାଯାଇଛି । ଏବେ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନେ ଏହାକୁ ଏକ ଭାଷା ଭାବରେ ମଧ୍ୟ ପଢିପାରିବେ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଭାରତୀୟ ସାଙ୍କେତିକ ଭାଷାକୁ ଅନେକ ପ୍ରୋତ୍ସାହନ ମିଳିବ, ଆମର ଦିବ୍ୟାଙ୍ଗ ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ବହୁତ ସହାୟତା ମିଳିପାରିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣିଛନ୍ତି ଯେ, କୌଣସି ଛାତ୍ରର ସମ୍ପୁର୍ଣ୍ଣ ଅଧ୍ୟୟନ କାଳରେ, ତାର ଜୀବନରେ ସବୁଠାରୁ ବଡ ପ୍ରେରଣା ହେଉଛନ୍ତି ତାର ଅଧ୍ୟାପକ । ଆମର ଏଠି କୁହାଯାଇଛି-

ଗୁରୁ ନ ପ୍ରାପ୍ୟତେ ୟତ୍ ତତ୍‌,

ନ ଅନ୍ୟ ଅତ୍ରାପି ଲଭ୍ୟତେ ।

ଅର୍ଥାତ୍‌, ଯାହା ଗୁରୁଙ୍କ ନିକଟରୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇପାରିବ ନାହିଁ ତାହା ଅନ୍ୟ କେଉଁଠାରୁ ମଧ୍ୟ ହାସଲ ହୋଇପାରିବ ନାହିଁ । ଏହାର ଅର୍ଥ ହେଉଛି, ଏଭଳି କିଛି ମଧ୍ୟ ନାହିଁ ଯାହା ଜଣେ ଉତମ ଗୁରୁ, ଉତମ ଶିକ୍ଷକ ମିଳିଯିବା ପରେ ଦୁର୍ଲଭ ହୋଇ ରହେ । ଏଥିପାଇଁ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତିର ଗଠନଠାରୁ ନେଇ କାର୍ଯ୍ୟକାରିତା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସ୍ତରରେ ଆମ ଶିକ୍ଷକମାନେ ସକ୍ରିୟ ଭାବେ ଏହି ଅଭିଯାନର ଅଂଶ ହୋଇ ରହିଛନ୍ତି । ଆଜି ନିଷ୍ଠା ୨.୦ର ଶୁଭାରମ୍ଭ ହୋଇଛି । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ମଧ୍ୟ ଏହି ଦିଗରେ ଏକ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କରିବ । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ମାଧ୍ୟମରେ ଦେଶର ଶିକ୍ଷକମାନଙ୍କୁ ଆଧୁନିକ ଆବଶ୍ୟକତା ମୁତାବକ ପ୍ରଶିକ୍ଷଣ ମଧ୍ୟ ମିଳିବ । ଏବଂ ସେମାନେ ନିଜର ମତାମତ ମଧ୍ୟ ବିଭାଗକୁ ଦେଇପାରିବେ । ମୋର ଆପଣ ସମସ୍ତ ଶିକ୍ଷକମାନଙ୍କୁ, ବିଦ୍ୱାନମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ ଯେ ଏହିସବୁ ପ୍ରୟାସରେ ଆଗଭର ହୋଇ ଭାଗ ନିଅନ୍ତୁ, ଅଧିକରୁ ଅଧିକ ସଂଖ୍ୟାରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ । ଆପଣ ସମସ୍ତେ ଶିକ୍ଷା କ୍ଷେତ୍ରରେ ଏତେ ଅନୁଭବ ରଖିଛନ୍ତି, ବ୍ୟାପକଭାବେ ଅନୁଭବସମ୍ପନ୍ନ ଅଟନ୍ତି । ଏଥିପାଇଁ ଯେତେବେଳେ ଆପଣମାନେ ପ୍ରୟାସ କରିବେ ସେତେବେଳେ ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ପ୍ରୟାସ ରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ବହୁତ ଆଗକୁ ନେଇଯିବ । ମୁଁ ବିଶ୍ୱାସ କରୁଛି ଯେ, ଏହି କାଳଖଣ୍ଡରେ ଆମେ ଯିଏ ଯେପରି ଭୂମିକାରେ ଅଛନ୍ତି, ଆମେ ସମସ୍ତେ ସୌଭାଗ୍ୟଶାଳୀ ଯେ ଏତେ ବଡ ପରିବର୍ତନର ଆମେ ସାକ୍ଷୀ ହେଉଛୁ, ଏହି ପରିବର୍ତନରେ ସକ୍ରିୟ ଭୂମିକା ନିର୍ବାହ କରୁଛୁ । ଆପଣମାନଙ୍କ ଜୀବନରେ ଏହି ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣିମ ଅବସର ଉପନୀତ ହୋଇଛି ଯେ ଆପଣମାନେ ଦେଶର ଭବିଷ୍ୟତ ନିର୍ମାଣ କରିବେ, ଭବିଷ୍ୟତର ରୂପରେଖ ନିଜ ହାତରେ ଗଢିବେ । ମୋର ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱାସ ଅଛି ଯେ, ଆଗମୀ ଦିନରେ, ଯେଭଳି ଯେଭଳି ନୂତନ ‘ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ନୀତି’ର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ବୈଶିଷ୍ଟ୍ୟ ବାସ୍ତବରେ ପରିଣତ ହେବ, ସେଭଳି ସେଭଳି ଆମ ଦେଶ ଏକ ନୂଆ ଯୁଗକୁ ଭେଟିବ । ଯେପରି ଯେପରି ଆମେ ନିଜର ଯୁବପିଢୀକୁ ଏକ ଆଧୁନିକ ଏବଂ ଜାତୀୟ ଶିକ୍ଷା ବ୍ୟବସ୍ଥା ସହ ଯୋଡି ଚାଲିବା, ଦେଶ ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତ ସଙ୍କଳ୍ପଗୁଡିକୁ ହାସଲ କରିଚାଲିବ । ଏହି ଶୁଭକାମନା ସହିତ ମୁଁ ମୋର ଭାଷଣ ସମାପ୍ତ କରୁଛି । ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ସୁସ୍ଥ ରୁହନ୍ତୁ, ଏବଂ ନୂଆ ଶକ୍ତିର ସହ ଆଗକୁ ବଢନ୍ତୁ । ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ।