ಶೇರ್
 
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भाईयों और बहनों,

आप सबका स्‍वागत है। दो दिन बड़ी विस्‍तार से चर्चा होने वाली है। इस मंथन में से कई महत्‍वपूर्ण बाते उभरकर के आएगी जो आगे चलकर के नीति या नियम का रूप ले सकती है और इसलिए हम जितना ज्‍यादा एक लम्‍बे विजन के साथ इन चर्चाओं में अपना योगदान देंगे तो यह दो दिवसीय सम्‍मेलन अधिक सार्थक होगा। इस विषय में कुछ बातें बताने का आज मन करता है मेरा। Climate के संबंध में या Environment के संबंध में प्रारंभ से कुछ हमारी गलत अभिव्‍यक्ति रही है और हम ऐसे जैसे अपनी बात को दुनिया के आगे प्रस्‍तुत किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे हमें न Climate की परवाह है न Environment की परवाह है। और सारी दुनिया हमारी इस अभिव्‍यक्ति की गलती के कारण यह मानकार के बैठी कि विश्‍व तो Environment conscious हो रहा है। विश्‍व climate की चिंता कर रहा है कि यह देश है जो कोई अडंगे डाल रहा है और इसका मूल कारण यह नहीं है कि हमने environment को बिगाड़ने में कोई अहम भूमिका निभाई है। climate को बर्बाद करने में हमारी या हमारे पूर्वजों की कोई भूमिका रही है। हकीकत तो उल्‍टी है। हम उस परंपरा में पले है, उन नीति, नियम और बंधनों में पले-बढ़े लोग हैं, जहां प्रकृति को परमेश्‍वर के रूप माना गया है, जहां पर प्रकृति की पूजा को सार्थक माना गया है और जहां पर प्रकृति की रक्षा को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ा गया है। लेकिन हम अपनी बात किसी न किसी कारण से, एक तो हम कई वर्षों से गुलाम रहे, सदियों से गुलाम रहने के कारण एक हमारी मानसिकता भी बनी हुई है कि अपनी बात दुनिया के सामने रखते हुए हम बहुत संकोच करते हैं। ऐसा लगता है कि यार कहीं यह आगे बढ़ा हुआ विश्‍व हम Third country के लोग। हमारी बात मजाक तो नहीं बन जाएगी। जब तक हमारे भीतर एक confidence नहीं आता है, शायद इस विषय पर हम ठीक से deal नहीं कर पाएंगे।

और मैं आज इस सभागृह में उपस्थित सभी महानुभावों से आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूं हम जितने प्रकृति के विषय में संवेदनशील है। दुनिया हमारे लिए सवालिया निशान खड़ा नहीं कर सकती है। आज भी प्रति व्‍यक्ति अगर carbon emission में contribution किसी का होगा तो कम से कम contribution वालों में हम है। लेकिन उसके बाद भी आवश्‍यकता यह थी कि विश्‍व में जब climate विषय में एक चिंता शुरू हुई, भारत ने सबसे पहले इसका नेतृत्‍व करना चाहिए था। क्‍योंकि दुनिया में अधिकतम वर्ग यह है कि जो climate की चिंता औरों पर restriction की दिशा में करता रहता है, जबकि हम लोग सदियों से प्रकृति की रक्षा करते-करते जीवन विकास की यात्रा में आगे बढ़ने के पक्षकार रहे हैं। दुनिया जो आज climate के संकट से गुजर रही है, Global Warming के संकट से गुजर रही है, उसको अभी भी रास्‍ता नहीं मिल रहा है कि कैसे बचा जाए, क्‍योंकि वो बाहरी प्रयास कर रहे हैं। और मैंने कई बार कहा कि इन समस्‍या की जड़ में हम carbon emission को रोकने के लिए जो सारे नीति-नियम बना रहे हैं, विश्‍व के अंदर एक बंधनों की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन हम कोई अपनी Life Style बदलने के लिए तैयार नहीं है। समस्‍या की जड़ में मानवजात जो कि उपभोग की तरफ आगे बढ़ती चली गई है और जहां ज्‍यादा उपभोग की परंपरा है, वहां सबसे ज्‍यादा प्रकृति का नुकसान होता है, जहां पर उपभोग की प्रवृति कम है, वहां प्रकृति का शोषण भी कम होता है और इसलिए हम जब तक अपने life style के संबंध में focus नहीं करेंगे और दुनिया में इस एक बात को केंद्र बिंदु में नहीं लाएंगे हम शायद बाकी सारे प्रयासों के बावजूद भी, लेकिन यह जो बहुत आगे बढ़ चुके देश है, उनके गले उतारना जरा कठिन है। वो माने न माने हम तो इन्‍हीं बातों में पले-बढ़े लोग हैं। हमें फिर से अगर वो चीजें भूला दी गई है, तो हमें उस पर सोचना चाहिए। मैं उदाहरण के तौर पर कहता हूं आजकल दुनिया में Recycle की बडी चर्चा है और माना जाता है कि यह दुनिया में कोई नया विज्ञान आया है, नई व्‍यवस्‍था आई है। जरा हमारे यहां देखों Recycle, reuse और कम से कम उपयोग करने की हमारी प्रकृति कैसी रही है। पुराना जमाना की जरा अपने घर में दादी मां उनके जीवन को देखिए। घर में कपड़े अगर पुराने हो गए होंगे, तो उसमें से रात को बिछाने के लिए गद्दी बना देंगे। वो अब उपयोगी नहीं रही तो उसमें से भी झाडू-पौचे के लिए उस जगह का उपयोग करेंगे। यानी एक चीज को recycle कैसे करना घर में हर चीज का वो हमारे यहां सहज परंपरा थी। सहज प्रकृति थी।

मैंने देखा है गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन आम को भी इतना Recycle करते हैं, Reuse करते हैं शायद कोई बाहर सोच नहीं सकता है। कहने का तात्‍पर्य है कि कोई बाहर से borrow की हुई चीज नहीं है। लेकिन हमने दुनिया समझे उस terminology में उन चीजों को आग्रहपूर्वक रखा नहीं। विश्‍व के सामने हम अपनी बातों को ढंग से रख नहीं पाए। हमारे यहां पौधे में परमात्‍मा है। जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान के माध्‍यम से जब Laboratory में जब सिद्ध किया कि पौधे में जीव होता है, उसके बाद ही हमने जीव है ऐसा मानना तय किया, ऐसा नहीं है। हम सहस्‍त्रों वर्ष से गीता का उल्‍लेख करे, महाभारत का उल्‍लेख करे हमें तभी से मानते हुए आए हैं कि पौधे में परमात्‍मा होता है। और इसलिए पौधे की पूजा, पौधे की रक्षा यह सारी चीजें हमें परंपराओं से सिखाई गई थी। लेकिन काल क्रम में हमने ही अपने आप को कुछ और तरीके से रास्‍ते खोजने के प्रयास किए। कभी-कभी मुझे लगता है.. यहां urban secretaries बहुत बड़ी संख्‍या में है हम परंपरागत रूप से चीजों को कैसे कर सकते हैं। मैं जानता हूं मैं जो बातें बताऊंगा, ये जो so called अंग्रेजीयत वाले लोग हैं, वो उसका मजाक उड़ाएंगे 48 घंटे तक। बड़ा मजाक उड़ाएंगे, आपको भी बड़ा मनोरंजन मिलेगा टीवी पर, क्‍योंकि एक अलग सोच के लोग हैं। जैसे मैं आपको एक बात बताऊं। आपको मालूम होगा यहां से जिनका गांव के साथ जीवन रहा होगा। गांव में एक परंपरा हुआ करती थी कि जब full moon होता था, तो दादी मां बच्‍चों को चांदनी की रोशनी में सुई के अंदर धागा पिरोने के लिए प्रयास करते थे, क्‍यों eye sight तो थी, लेकिन उस चांदनी की रोशनी की अनुभूति कराते थे।

आज शायद नई पीढ़ी को पूछा जाए कि आपने चांदनी की रोशनी देखी है क्‍या? क्‍या पूर्णिमा की रात को बाहर निकले हो क्‍या? अब हम प्रकृति से इतने कट गए हैं।

अगर हमारी urban body यह तय करे, लोगों को विश्‍वास में लेकर के करें कि भई हम पूर्णिमा की रात को street light नहीं जलाएंगे। इतना ही नहीं उस दिन festival मनाएंगे पूरे शहर में, सब मोहल्‍ले में लोग स्‍पर्धा करेंगे, सुई में धागा डालने की। एक community event हो जाएगा, एक आनंद उत्‍सव हो जाएगा और पर्यावरण की रक्षा भी होगी। चीज छोटी होती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि सभी Urban Body में महीने में एक बार इस चांदनी रात का उपयोग करते हुए अगर street light बंद की जाए तो कितनी ऊर्जा बचेगी? कितनी ऊर्जा बचेगी तो कितना emission हम कम करेंगे? लेकिन यही चीज इस carbon emission के हिसाब से रखोगे, तो यह जो so called अपने आप को पढ़ा-लिखा मानता हैं, वो कहे वाह नया idea है, लेकिन वही चींज हमारी गांव की दादी मां कहती वो सुई और धागे की कथा कहकर के कहेंगे, अरे क्‍या यह पुराने लोग हैं इनको कोई समझ नहीं है, देश बदल चुका है। क्‍या यह हम हमारे युवा को प्रेरित कर सकते हैं कि भई Sunday हो, Sunday on cycle मान लीजिए, हो सकता है कोई यह भी कह दें कि मोदी अब cycle कपंनियों के agent बन गया हैं। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है देश का। पता नहीं कौन क्‍या हर चीज का अर्थ निकालता है। जरूरी नहीं कि हर कोई लोग cycle खरीदने जाए, तय करे कि भई मैं सप्‍ताह में एक दिन ऊर्जा से उपयोग में आने वाले साधनों का उपयोग में नहीं करूंगा। अपनी अनुकूलता है।

समाज मैं जो life style की बात करता हूं हम पर्यावरण की रक्षा में इतना बड़ा योगदान दें सकते हैं। सहज रूप से दे सकते हैं और थोड़ा सा प्रयास करना पड़ता है। एक शिक्षक के जीवन को मैं बराबर जानता हूं। मैं जब गुजरात में मुख्‍यमंत्री था तो उन पिछड़े इलाकों में चला जाता था, जून महीने में कि जहां पर girl child education बहुत कम हो। 40-44 डिग्री Temperature रहा करता था जून महीने में और मैं ऐसे गांव में जाकर तीन दिन रहता था। जब तक मैं मुख्‍यमंत्री रहा वो काम regularly करता था। एक बार मैं समुद्री तट के एक गांव में गया। एक भी पेड़ नहीं था, पूरे गावं में कहीं पर नहीं, लेकिन जो स्‍कूल था, वो घने जंगलों में जैसे कोई छोटी झोपड़ी वाली स्‍कूल हो, ऐसा माहौल था। तो मेरे लिए आश्‍चर्य था। मैंने कहा कि यार कहीं एक पेड़ नहीं दिखता, लेकिन स्‍कूल बड़ी green है, क्‍या कारण है। तो वहां एक teacher था, उस teacher का initiative इतना unique initiative था, उसने क्‍या किया – कहीं से भी bisleri की बोतल मिलती थी खाली, उठाकर ले आता था, पेट्रोल पम्‍प पर oil के जो टीन खाली होते थे वो उठाकर ले आता था और लाकर के students को एक-एक देता था, साफ करके खुद और उनको कहता था कि आपकी माताजी जो kitchen में बर्तन साफ करके kitchen का जो पानी होता है, वो पानी इस बोतल में भरकर के रोज जब स्‍कूल में आओगे तो साथ लेकर के आओ। और हमें भी हैरानी थी कि सारे बच्‍चे हाथ में यह गंदा दिखने वाला पानी भरकर के क्‍यों आते हैं। उसने हर बच्‍चे को पेड़ दे दिया था और कह दिया था कि इस बोतल से daily तुम्‍हें पानी डालना है। Fertilizer भी मिल जाता था। एक व्‍यक्ति के अभिरत प्रयास का परिणाम था कि वो पूरा स्‍कूल का campus एकदम से हरा-भरा था। कहना का तात्‍पर्य है कि इन चीजों के लिए समाज का जो सहज स्‍वभाव है, उन सहज स्‍वभाव को हम कितना ज्‍यादा प्रेरित कर सकते हैं, करना चाहिए।

मैं एक बार इस्राइल गया था, इस्राइल में रेगिस्‍तान में कम से कम बारिश, एक-एक बूंद पानी का कैसे उपयोग हो, पानी का recycle कैसे हो, समुद्री की पानी से कैसे sweet water बनाया जाए, इन सारे विषयों में काफी उन्‍होंने काम किया है। काफी प्रगति की है। इस्राइल तो इस समय एक अभी भी रेगिस्‍तान है जहां हरा-भरा होना बाकी है और एक है पूर्णतय: उन्‍होंने रेगिस्‍तान को हरा-भरा बना दिया है।

बेन गुरियन जो इस्राइल के राष्‍ट्रपिता के रूप में माने जाते हैं, तो मैं जब इस्राइल गया था तो मेरा मन कर गया कि उनका जो निवासा स्‍थान है वो मुझे देखना है, उनकी समाधि पर जाना है। तो मैंने वहां की सरकार को request की थी बहुत साल पहले की बात है। तो मैं गया, उनका घर उस रेगिस्‍तान वाले इलाके में ही था, वहीं रहते थे वो। और दो चीजें मेरे मन को छू गई – एक उनके bedroom में महात्‍मा गांधी की तस्‍वीर थी। वे सुबह उठते ही पहले उनको प्रणाम करते थे और दूसरी विशेषता यह थी कि उनकी जो समाधि थी, उन समाधि के पास एक टोकरी में पत्‍थर रखे हुए थे। सामान्‍य रूप से इतने बड़े महापुरूष के वहां जाएंगे तो मन करता है कि फूल रखें वहां, नमन करे। लेकिन चूंकि उनको green protection करना है, greenery की रक्षा करनी है। फूल-फल इसको नष्‍ट नहीं करना, यह संस्‍कार बढ़ाने के लिए बेन बुरियन की समाधि पर अगर आपको आदर करना है तो क्‍या करना होता था उस टोकरी में से एक पत्‍थर उठाना और पत्‍थर रखना और शाम को वो क्‍या करते थे सारे पत्‍थर इकट्ठे करके के फिर टोकरी में रख देते थे। अब देखिए environment की protection के लिए किस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को लोग विकसित करते हैं। हम अपने आपसे बाकी सारी बातों के साथ-साथ हम अपने जीवन में इन चीजों को कैसे लाए उसके आधार पर हम इसको बढ़ावा दे सकते हैं। हमारे स्‍कूलों में, इन सब में किस प्रकार से एक माहौल बनाया जाए प्रकृति रक्षा, प्रकृति पूजा, प्रकृति संरक्षण यह सहज मानव प्रकृति का हिस्‍सा कैसे बने, उस दिशा में हमको जाना होगा। और हम वो लोग है जिनका व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता। यही जिनके जीवन का आदर्श रहा है। जहां व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता का आदर्श रहा हो, वहां पर हमें प्रकृति का शोषण करने का अधिकार नहीं है। हमें प्रकृति का दोहन करने से अधिक प्रकृति को उपयोग, दुरूपयोग करने का हक नहीं मिलता है। दुनिया में प्रकृत‍ि का शोषण ही प्रवृति है, भारत में प्रकृति को दोहन एक संस्‍कार है। शोषण ही हमारी प्रवृति नहीं है और इसलिए विश्‍व इस संकट से जो गुजर रहा है, मैं अभी भी मानता हूं कि दुनिया को इस क्षेत्र में बचाने के लिए नेतृत्‍व भारत ने करना चाहिए। और उस दिमाग से भारत ने अपनी योजनाएं बनानी चाहिए। दुनिया climate change के लिए हमें guide करे और हम दुनिया को follow करें। दुनिया parameter तय करे और हम दुनिया को follow करे, ऐसा नहीं है। सचमुच में इस विषय में हमारी हजारों साल से वो विरासत है, हम विश्‍व का नेतृत्‍व कर सकते हैं, हम विश्‍व का मार्गदर्शन कर सकते हैं और विश्‍व को इस संकट से बचाने के लिए भारत रास्‍ता प्रशस्‍त कर सकता है। इस विश्‍वास के साथ इस conference से हम निकल सकते हैं। हम दुनिया की बहुत बड़ी सेवा करेंगे। उस विजन के साथ हम अपनी व्‍यवस्‍थाओं के प्रति जो भी समयानुकूल हम बदलाव लाना है, हम बदलाव लाए। जैसे अभी अब यह तो हम नहीं कहेंगे..

अच्‍छा, कुछ लोगों ने मान लिया कि पर्यावरण की रक्षा और विकास दोनों कोई आमने-सामने है। यह सोच मूलभूत गलत है। दोनों को साथ-साथ चलाया जा सकता है। दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ do’s and don’ts होते हैं, इसका पालन होना चाहिए। अगर वो पालन होता है तो हम उसकी रखवाली भी करते हैं और उसके लिए कोई चीजें, जैसे अभी हमने कोयले की खदानें उसकी नीलामी की, लेकिन उसके साथ-साथ उनसे जो पहले राशि ली जाती थी environment protection के लिए वो चार गुना बढ़ा दी, क्‍योंकि वो एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। आवश्‍यक है तो वो भी बदलाव किया। हमारी यह कोशिश रहनी चाहिए कि हम इस प्रकार से बदलाव लाने की दिशा में कैसे प्रयास करे और अगर हम प्रयास करते तो परिणाम मिल सकता है। दूसरी बात है, ज्‍यादातर भ्रम हमारे यहां बहुत फैलाया जाता है। अभी Land Acquisition Bill की चर्चा हुई है। इस Land Acquisition Bill में कहीं पर भी एक भी शब्‍द वनवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, आदिवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, Forest Land के संबंध में नहीं है। वो जमीन, उसके मालिक, Land Acquisition bill के दायरे में आते ही नहीं है, लेकिन उसके बावजूद भी जिनको इन सारी चीजों की समझ नहीं है। वो चौबीसों घंटे चलाते रहते हैं। पता ही नहीं उनको कहीं उल्‍लेख तक नहीं है। उनको भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं समझता हूं कि समाज का गुमराह करने का इस प्रकार का प्रयास आपके लिए कोई छोटी बात होगी, आपके राजनीतिक उसूल होंगे लेकिन उसके कारण देश को कितना नुकसान होता है और कृपा करके ऐसे भ्रम फैलाना बंद होना चाहिए, सच्‍चाई की धरा पर पूरी debate होनी चाहिए। उसमें पक्ष विपक्ष हो सकता है, उसमें कुछ बुरा नहीं है, लोकतंत्र है। लेकिन आप जो सत्‍य कहना चाहते हो, उसमें दम नहीं है, इसलिए झूठ कहते रहो। इससे देश नहीं चलता है और इसलिए मैं विशेष रूप से वन विभाग से जुड़े हुए मंत्री और अधिकारी यहां उपस्थित हैं तो विशेष रूप से इस बात का उल्‍लेख करना चाहता हूं कि Land Acquisition Act के अंदर कहीं पर जंगल की जमीन, आदिवासियों की जमीन उसका कोई संबंध नहीं है। उस दायरे में वो आता नहीं है, हम सबको मालूम है कि उसका एक अलग कानून है, वो अलग कानूनों से protected है। इस कानून का उसके साथ कोई संबंध नहीं है, लेकिन झूठ फैलाया जा रहा है और इसलिए मैं चाहूंगा कि कम से कम और ऐसे मित्रों से प्रार्थना करूंगा कि देशहित में कम से कम ऐसे झूठ को बढ़ावा देने में आप शिकार न हो जाएं यह मेरा आग्रह रहेगा।

आज यह भी यहां बताया गया कि Tiger की संख्‍या बढ़ी है। करीब 40% वृद्धि हुई है। अच्‍छा लगता है सुनकर के वरना दुनिया में Tiger की संख्‍या कम होती जा रही है और दो-तिहाई संख्‍या हमारे पास ही है तो एक हमारा बहुत बड़ा गौरव है और यह गौरव मानवीय संस्‍कृति का भी द्योतक होता है। इन दोनों को जोड़कर हमें इस चीज का गौरव करना चाहिए। और विश्‍व को इस बात का परिचय होना चाहिए कि हम किस प्रकार की मानवीय संस्‍कृतियों को लेकर के जीते हैं कि जहां पर इतनी तेज गति से tiger की जनसंख्‍या का विकास हो रहा है। हमारे पूरब के इलाके में खासकर के हाथी को लेकर के रोज नई खबरें आती है। हा‍थी को लेकर के परेशानियां आती है। अभी मैं कोई एक science magazine पढ़ रहा था। बड़ी interesting चीज मैंने पहली बार पढ़ी, आप लोग तो शायद उसके जानकारी होगी। जब खेत में हाथियों का झुंड आ जाता है, तो बड़ी परेशानी रहती कैसे निकालना है, यह forest department के लोग भांति-भांति के सशत्र लेकर पहुंच जाते हैं और दो-दो दिन तक हो हल्‍ला हो जाता है। मैंने एक science magazine पढ़ा, कहीं पर लोगों ने प्रयोग किया है बड़ा ही Interesting प्रयोग लगा मुझे। वे अपने खेत के बाढ़ पर या पैड है उस पर Honey Bee को भी Developed करते हैं मधुमक्‍खी को रखते हैं और जब हाथी के झुंड आते हैं तो मधुमक्‍खी एक Special प्रकार की आवाज करती है और हाथी भाग जाता है। अब ये चीजे जो हैं कहीं न कहीं सफल हुई हैं आज भी शायद हमारे यहां हो सकता है कुछ इलाकों में करते भी होंगे। हमें इस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को भी समझना होगा ताकि हमें हाथियों से संघर्ष करना पड़ सके। मानव और हाथी के बीच जो संघर्ष के जो समाचार आते हैं, उससे हम कैसे बचें। हम हाथी की भी देखभाल करें, अपने खेत की भी देखभाल कर सकें। अगर ऐसे सामान्‍य व्‍यवस्‍थाएं विकसित हो सकती है और अगर यह सत्‍य है तो मैंने कहीं पढ़ा था, लेकिन किसी प्रत्‍यक्ष मेरी किसान से बात हुई नहीं है लेकिन मैं कभी असम की तरफ जाऊंगा तो पूछूंगा सबसे बात करूंगा कि क्‍या है जानकारी लाने का प्रयास करूंगा मैं, लेकिन आपसे में उस दिशा में काम करने वाले जहां हाथी की जनसंख्‍या हैं और गांवों में कभी-कभी चली आती हैं तो उनके लिए शायद हो सकता है कि ये अगर इस प्रकार का प्रयोग हुआ हो तो यह काम आ सकता है। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि यह जगत सब समस्‍याओं से जुड़ा हुआ होगा हम ही पहली बार गुजर रहे हैं ऐसा थोड़ी है और हरेक ने अपने-अपने तरीके से उसके उपाय खोजे होंगे। उनको फिर से एक बार वैज्ञानिक तरीके से वैज्ञानिक तराजू से देखा जाए कि हम इन चीजों को कैसे फिर से एक बार प्रयोग में ला सकते हैं। थोड़ा उसे Modify करके उसे प्रयोग में ला सकते हैं। इन दिनों जब पर्यावरण की रक्षा की बात आती है, तो ज्‍यादातर कारखानें और ऊर्जा उसके आस-पास चर्चा रहती है। भारत उस अर्थ में ईश्‍वर की कृपा वाला राष्‍ट्र रहा है कि जिसके पास Maximum solar Radiation वाली संभावना वाला देश है। इसका हमें Maximum उपयोग कैसे करना है और इसलिए सरकार ने Initiative लिया है कि हम Solar Energy हम Wind Energy Biomass Energy उस पर कितना ज्‍यादा बल दें ताकि हम जो विश्‍व की चिंता है उसमें हम मशरूफ हों। लेकिन मजा देखिए, जो दुनिया Climate के लिए Lead करती है, दुनिया को पाठ पढ़ाती है अगर हम उनको कहें कि हम Nuclear Energy में आगे जाना चाहते हैं कि Nuclear Energy Environment protection का एक अच्‍छा रास्‍ता है और हम उनको जब कहते हैं कि Nuclear Energy के लिए आवश्‍यक Fuel दो तो मना कर देते हैं यानी हम दुनिया की इतनी बड़ी सेवा करना चाहते हैं लेकिन आप सेवा करों यह नियम पालन करो व‍ह नियम पालन करो। मैं दुनिया के सभी उस देशवासियों से यह निवेदन करना चाहूंगा कि भारत जैसा देश जिस प्रकार से नेतृत्‍व करने के लिए तैयार है Environment protection के लिए Civil Nuclear की तरफ हमारा बल है। हम Nuclear Energy पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, हम उसे करने के लिए तैयार हैं क्‍योंकि हमें पता है कि पर्यावरण की रक्षा में अच्‍छे सा अच्‍छा रास्‍तों में महत्‍वपूर्ण है। लेकिन वही लोग जो हमें Environment के लिए भाषण देते हैं वो Nuclear के लिए Fuel देने के लिए तैयार नहीं है। ये दो तराजू से दुनिया नहीं चल सकती है और इसलिए विश्‍व पर हमें भी यह दबाव पैदा करना पड़ेगा और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में यह दबाव दिखने वाला है, लोग अनुभव करेंगे हम Solar Energy की तरफ जा रहे हैं। Biomass की तरफ जा रहे हैं। लेकिन मैं Urban Bodies को कहना चाहूंगा अगर हम स्‍वच्‍छ भारत की चर्चा करें तो भी और अगर हम Environment की चर्चा करें तो भी। Waste Water & Solid waste Management की दिशा में हम लोंगों को आग्रहपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। Public Private Partnership Model को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। Solid Waste Management की ओर हमने पूरा ध्‍यान देना चाहिए। और आज Waste Wealth का एक सबसे बड़ा Business है। Waste में से Wealth create करना एक बहुत बड़ा Entrepreneurship शुरू हुआ है। हम अपने Urban Bodies में इसको कैसे जोड़े। Urban Bodies में Waste में से Wealth को create पैदा करने में स्‍पेशल फोकस करें। और आप देखिए कि बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। एक छोटा सा प्रयोग है मैं Urban Bodies से आग्रह करूंगा मान लीजिए हम हिंदुस्‍तान में पांच सौ शहर पकड़े, जहां एक लाख से ज्‍यादा आबादी है और वहां पर हम तय करें अब देखिए आज जो शहर का कूड़ा-कचरा फेंकने के लिए जो जगह जमीन की जो जरूरत है हजारों एकड़ भूमि की जरूरत पड़ेगी अगर ये कचरों के ढेर करने हैं तो अब गमिल लाओंगे कहां से और अब जमीन नहीं हैं तो क्‍या मतलब है कि कूड़ा-कचरा पड़ा रहेगा क्‍या और इसलिए हमारे लिए उस पर Process करना Recycle करना Waste Management करना यह अनिवार्य हो गया है। अब वैज्ञानिक के तरीके उपलब्‍ध हैं अगर हम Urban Body Waste Water Treatment करें और पानी को ठीक करके अगर किसानों को वापिस दे वरना एक समय ऐसा आएगा शहर और गांव के बीच संघर्ष होगा पानी के लिए। गांव कहेगा कि मैं शहर को पानी नहीं देने दूंगा और शहर बिना पानी मरेगा। लेकिन जो अगर शहर पानी प्रयोग करता है उसको Recycle करके गांव को वापस दे देता है खेतों में तो यह संघर्ष की नौबत नहीं आएगी और एक प्रकार से Treated Water होगा तो Fertilizer की दृष्टि से उपयोग इस प्रकार से पानी को इस प्रकार से बनाकर दिया जा सकता है। और Urban Body जो होता है उसके गांव जो होते हैं वो ज्‍यादातर सब्‍जी की खेती करते हैं और वही सब्‍जी उनके शहर के अंदर बिकने के लिए आती हैं रोजमर्रा की उनकी आजीविका उससे चलती है। हम इन्‍हीं को Solid Waste Management करके Solid Waste में से हम मानव Fertilizer बनाएं और वो Fertilizer हम उनको दें तो Organic सब्‍जी शहर में आएगी कि नहीं आएगी। इतनी बड़ी मात्रा में अगर हम Fertilizer देते हैं शहरों के कूड़े-कचरों से बनाया हुआ तो अच्‍छी Quality का विपुल मात्रा में सब्‍जी शहर में आएगी तो सस्‍ती सब्‍जी मिलेगी या नहीं मिलेगी? सस्‍ती सब्‍जी गरीब से गरीब व्‍यक्ति खाएगा तो Nutrition के Problem का Solution होगा कि नहीं होगा। Vegetable Sufficient खाएगा तो Health सेक्‍टर का बजट कम होगा कि नहीं होगा। एक प्रयास कितने ओर चीजों पर इफैक्‍ट कर सकता है इसका अगर हम एक Integrated approach करें तो हम हमारे गांवों को भी बचा सकते हैं हमारे शहरों को भी बचा सकते हैं। कभी-कभार अज्ञान का भी कारण होता है। हमारे यहां देखा है कि फसल होने के बाद अब जैसे Cotton है Cotton लेने के बाद बाकी जो है उसको जला देते हैं। लेकिन उसी को अगर टुकड़े कर करके खेत में डाल दें तो वहीं चीज Nutrition के रूप में काम आती है Fertilizer के रूप में काम आती है। मैंने एक प्रयोग देखा था केले की खेती हमारे यहां हो रही थी तब केला उतारे के बाद केला देने की क्षमता जब कम हो जाती है तो वो जो पेड़ का हिस्‍सा होता है उसके टुकड़े कर कर के उन्‍हें जमीन में डाले और मैंने अनुभव किया कि उसके अंदर इतना Water Content होता है केले के Waste Part में कि 90 दिन तक आपको फसल को पानी नहीं देना पड़ता है वो उसी में से फसल पानी ले लेती है। अब हम थोड़ा सा इनका प्रयोग चीजों को सीखें, समझें। इसको अगर Popular करें तो हम पानी को भी बचा सकते हैं, फसल को भी बचा सकते हैं। हम चीजों को किस प्रकार से और इसके लिए बहुत बड़ा आधुनिक से आधुनिक बड़ा विज्ञान की जरूरत होती है ऐसा नहीं है। सहज समझ का विषय होता है इनको हम जितना आगे बढ़ाएंगे हम इन चीजों को कर सकते हैं। Urban Body आग्रहपूर्वक Public Private Partnership Model उसमें Vibrating Gap funding का भी रास्‍ता निकल सकता है। आप जो इन Waste खेतों के किसानों को उसके कारण अगर Chemical Fertilizer का उपयोग कम होता है तो Chemical Fertilizer में से जो सब्सिडी बचेगी मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं वो सब्सिडी जो बचेगी वो Vibrating Gap Funding के लिए शहरों को दे देंगे, यानी आपके देश में से Wealth Create होगी और जो आप खाद्य तैयार करोगे वो खाद्य उपयोग करने के कारण Chemical Fertilizer की सब्सिडी बचेगी वो आपको मिलेगी। आप गैस पैदा करोगे, गैस दोगो तो जितनी मात्रा में गैसा पैदा करोगे जो गैस सिलेंडर की जो सब्सिडी है वो बचेगी तो वो सब्सिडी हम आपको Transfer करेंगे आपके Vibrating Gap Funding में काम आएगी। हम एक उसका Finance का Model कर सकते हैं, लेकिन भारत सरकार, राज्‍य सरकार और Local Self Government ये तीनों मिल करके हम Environment को Priority देते हुए हमारे नगरों को स्‍वच्‍छ रखते हुए, वहां के कूड़े-कचरे को Waste में Wealth Create करें और बहुत Entrepreneur मिले हैं। उनको हम कैसे प्रयोग में हम करें मैंने एक जगह देखा है जहां पर Waste में से ईंटे बना रहे हैं और इतनी बढि़या ईंटे मजबूत बन रही हैं कि बहुत काम आ रही है। आपने देखा होगा पहले जहां पर बिजली के थर्मल प्‍लांट हुआ करते थे वहां पर बाहर कोयले की Ash जो होता है उसके ढेर लगे रहते थे। आज Recycle और Chemical में से ईंटे बनने के कारण सीमेंट में उपयोग आने के कारण वो निकलते ही Contract हो जाता है और दो-दो साल का Contract और निकलते ही हम उठाएंगे यानी कि जो किसी पर्यावरण को बिगाड़ने के लिए संकट था वो ही आज Property में Convert हो गया है हम थोड़ा इस दिशा में प्रयास करें, initiative लें, हम इसमें काफी मदद कर सकते हैं और मेरा सबसे आग्रह है कि हम इन चीजों को बल मानते हुए आने वाले दिशों में दो दिन जब आप चर्चा करेंगे। गंगा की सफाई उसके साथ जुड़ा हुआ है गंगा के किनारे पर रहने वाले, गंगा किनारे के गांव और शहर मैं उन संबंधित राज्‍य सरकारों से आग्रह करूंगा इसमें कोई Comprise मत कीजिए। बैंकों से हम आग्रह करेंगे उनको हम कम दर से लोन दें। लेकिन Approved Plant उनमें वो लगाये जाएं Sewerage Treatment plant किये जाएं। एक बार हमने सफलतापूर्वक ढाई हजार किलोमीटर लम्‍बी गंगा के अंदर जाने वाले प्रदूषण को रोक लिया पूरे दुनिया के सामने और पूरे हिंदुस्‍तान के सामने एक नया विश्‍वास पैदा कर सकता है कि हम सामान्‍य अपने तौर तरीकों से पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं। यह विश्‍वास पैदा करने के लिए Model की तरह इस काम को खड़ा करना और ये एक बार काम खड़ा हो गया तो और काम अपने आप खड़े हो जाएंगे। एक विश्‍वास पैदा करने की आवश्‍यकता है और किया जा सकता है। एक बार हम किसी चीज को हाथ लगाएं पीछे लग जाएं परिणाम मिल सकता है और मैं चाहूंगा ज्‍यादातर इन पांच राज्‍यों से कि जो गंगा के किनारे की उनकी जिम्‍मेवारी है छह हजार के करीब गांव है, एक सौ 18000 किलोमीटर हैं कोई आठ सौ के करीब Industries हैं जो Pollution के लिए तैयार है इसको Target करते हुए एक बार गंगा के किनारे पर हम तय कर ले वहां से कोई भी दूषित पानी या कूड़ा-कचरा गंगा में जाने नहीं देंगे। आप देखिए अपने आप में बदलाव शुरू हो जाएगा। फिर तो गंगा की अपनी ताकत भी है खुद को साफ रखने की। और वो हमने आगे निकल जाएगी लेकिन हम तय करे कि हम गंदा नहीं करेंगे तो गंगा को साफ करने के लिए तो हमें गंदा नहीं करना पड़ेगा गंगा अपना खुद कर सकती है। लेकिन हम गंदा न करे इतना तो संकल्‍प करना पड़ेगा और उस काम को ले करके आप जब यहां पर बैठे है जो गंगा किनारे को जो इस विभाग के मंत्री हैं वो विशेष रूप से आधा-पौना घंटा बैठ करके उन चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जाए। विशेष रूप से चर्चा करें मेरा आग्रह रहेगा फिर एक बार मैं इस प्रयास का स्‍वागत करता हूं और मुझे विश्‍वास है कि इस सपने के साथ फिर एक बार मैं दोहराता हूं ये एक ऐसा विषय है जो हमारी बपौती है, हमारा डीएनए है। हमारे पूर्वजों ने इन मानव जाति की बहुत बड़ी सेवा की है। विश्‍व का नेतृत्‍व हमारे पास ही होना चाहिए Climate के मुद्दे पर ये मिजाज होना चाहिए। पूरे विश्‍व को हम दिखा सकते हैं कि यह हमारा विषय है। हमारी परंपरा है। दुनिया को हम सीखा सकते हैं इतनी ताकत के साथ हम यहां से निकले यही अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं धन्‍यवाद।

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18 ವರ್ಷಕ್ಕಿಂತ ಮೇಲ್ಪಟ್ಟ ಎಲ್ಲಾ ಭಾರತೀಯ ನಾಗರಿಕರಿಗೆ ಉಚಿತ ಲಸಿಕೆ ನೀಡಲಿದೆ ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರ
June 07, 2021
ಶೇರ್
 
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18 ವರ್ಷಕ್ಕಿಂತ ಮೇಲ್ಪಟ್ಟ ಎಲ್ಲಾ ಭಾರತೀಯ ನಾಗರಿಕರಿಗೆ ಉಚಿತ ಲಸಿಕೆ ನೀಡಲಿದೆ ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರ
ರಾಜ್ಯಗಳೊಂದಿಗೆ ಇದ್ದ ಶೇಕಡಾ 25 ರಷ್ಟು ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಈಗ ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರ ಕೈಗೊಳ್ಳಲಿದೆ: ಪ್ರಧಾನಿ
ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರ ಲಸಿಕಾ ಕಂಪನಿಗಳು ಉತ್ಪಾದಿಸುವ ಶೇ.75ರಷ್ಟು ಲಸಿಕೆಯನ್ನು ತಾನೇ ಖರೀದಿಸಿ, ರಾಜ್ಯಗಳಿಗೆ ಉಚಿತವಾಗಿ ಪೂರೈಸಲಿದೆ: ಪ್ರಧಾನಿ
ಪ್ರಧಾನ್ ಮಂತ್ರಿ ಗರೀಬ್ ಕಲ್ಯಾಣ್ ಅನ್ನ ಯೋಜನೆಯನ್ನು ದೀಪಾವಳಿವರೆಗೆ ವಿಸ್ತರಿಸಲಾಗಿದೆ : ಪ್ರಧಾನಿ
ನವೆಂಬರ್ ವರೆಗೆ, ಪ್ರತಿ ತಿಂಗಳು 80 ಕೋಟಿ ಜನರಿಗೆ ಉಚಿತ ಆಹಾರ ಧಾನ್ಯ ನೀಡುವಿಕೆ ಮುಂದುವರಿಯಲಿದೆ :ಪ್ರಧಾನಿ
ಕೊರೋನ , ಕಳೆದ ನೂರು ವರ್ಷಗಳಲ್ಲಿ ಉಂಟಾದ ಅತಿ ಕೆಟ್ಟ ವಿಪತ್ತು: ಪ್ರಧಾನಿ
ಮುಂದಿನ ದಿನಗಳಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಪೂರೈಕೆ ಹೆಚ್ಚಾಗಲಿದೆ : ಪ್ರಧಾನಿ
ಹೊಸ ಲಸಿಕೆಗಳ ಅಭಿವೃದ್ಧಿಯ ಪ್ರಗತಿಯ ಬಗ್ಗೆ ಮಾಹಿತಿ ನೀಡಿದ್ದಾರೆ ಪ್ರಧಾನಿ
ಮಕ್ಕಳ ಲಸಿಕೆ ಮತ್ತು ಮೂಗಿಗೆ ಸಿಂಪಡಿಸುವ ಲಸಿಕೆ ಪ್ರಯೋಗ ಹಂತದಲ್ಲಿದೆ : ಪ್ರಧಾನಿ
ವ್ಯಾಕ್ಸಿನೇಷನ್ ಬಗ್ಗೆ ಆತಂಕವನ್ನು ಉಂಟುಮಾಡುವವರು ಜನರ ಜೀವನದೊಂದಿಗೆ ಆಡುತ್ತಿದ್ದಾರೆ: ಪ್ರಧಾನಿ

ಪ್ರೀತಿಯ ದೇಶವಾಸಿಗಳಿಗೆ ನನ್ನ ನಮಸ್ಕಾರಗಳು! ಕೊರೋನಾದ ಎರಡನೇ ಅಲೆಯ ವಿರುದ್ಧ ನಮ್ಮ ಹೋರಾಟ ಇನ್ನೂ ಮುಂದುವರಿಯುತ್ತಿದೆ. ವಿಶ್ವದ ಅನೇಕ ದೇಶಗಳಂತೆ, ಭಾರತವೂ ಈ ಹೋರಾಟದ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಸಾಕಷ್ಟು ನೋವನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿದೆ. ನಮ್ಮಲ್ಲಿ ಅನೇಕರು ನಮ್ಮ ಸಂಬಂಧಿಕರು ಮತ್ತು ಪರಿಚಯಸ್ಥರನ್ನು ಕಳೆದುಕೊಂಡಿದ್ದಾರೆ, ಹಲವರನ್ನು ನಾವು ಕಳೆದುಕೊಂಡಿದ್ದೇವೆ. ಅಂತಹ ಎಲ್ಲ ಕುಟುಂಬಗಳಿಗೆ ನನ್ನ ಮನದಾಳದ ಸಂತಾಪ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಕಳೆದ 100 ವರ್ಷಗಳಲ್ಲಿ ಇದು ಅತಿದೊಡ್ಡ ಸಾಂಕ್ರಾಮಿಕ ಮತ್ತು ದುರಂತ ಇದಾಗಿದೆ. ಆಧುನಿಕ ಜಗತ್ತು ಇಂತಹ ಸಾಂಕ್ರಾಮಿಕ ರೋಗವನ್ನು ಈತನಕ ನೋಡಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ಅನುಭವಿಸಿರಲಿಲ್ಲ. ಇಂತಹ ಬೃಹತ್ ಜಾಗತಿಕ ಸಾಂಕ್ರಾಮಿಕ ರೋಗದ ವಿರುದ್ಧ ನಮ್ಮ ದೇಶವು ಅನೇಕ ರಂಗಗಳಲ್ಲಿ ಒಟ್ಟಾಗಿ ಹೋರಾಡಿದೆ. ಕೋವಿಡ್ ಆಸ್ಪತ್ರೆಯನ್ನು ನಿರ್ಮಿಸುವುದರಿಂದ ಹಿಡಿದು, ಆಸ್ಪತ್ರೆಗಳ ಐಸಿಯು ಹಾಸಿಗೆಗಳ ಸಂಖ್ಯೆಯನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸುವವರೆಗೆ, ಭಾರತದಲ್ಲಿ ವೆಂಟಿಲೇಟರ್‌ಗಳನ್ನು ತಯಾರಿಸುವುದರಿಂದ ಹಿಡಿದು ಪರೀಕ್ಷಾ ಪ್ರಯೋಗಾಲಯಗಳ ಬೃಹತ್ ಜಾಲವನ್ನು ರಚಿಸುವವರೆಗೆ, ಕಳೆದ ಒಂದೂವರೆ ವರ್ಷಗಳಲ್ಲಿ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಹೊಸ ಆರೋಗ್ಯ ಮೂಲಸೌಕರ್ಯವನ್ನು ರಚಿಸಲಾಗಿದೆ. ಎರಡನೇ ಅಲೆಯಿಂದಾಗಿ ಭಾರತದಲ್ಲಿ ವೈದ್ಯಕೀಯ ಆಮ್ಲಜನಕದ ಬೇಡಿಕೆ ಇದೇ ಏಪ್ರಿಲ್ ಮತ್ತು ಮೇ ತಿಂಗಳುಗಳಲ್ಲಿ ಅನಿರೀಕ್ಷಿತವಾಗಿ ಹೆಚ್ಚಾಗಿದೆ. ಭಾರತದ ಇತಿಹಾಸದಲ್ಲಿ ಎಂದಿಗೂ ವೈದ್ಯಕೀಯ ಆಮ್ಲಜನಕದ ಅಗತ್ಯವನ್ನು ಅಂತಹ ಪ್ರಮಾಣದಲ್ಲಿ ಬಳಕೆಯಾಗಲಿಲ್ಲ ಮತ್ತು ಇಂತಹ ಪರಿಸ್ಥಿತಿಯನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿಲ್ಲ. ಈ ಬೇಡಿಕೆಯನ್ನು ಈಡೇರಿಸಲು ಯುದ್ದೋಪಾದಿಯ ಹೆಜ್ಜೆಯಲ್ಲಿ ಪ್ರಯತ್ನಗಳು ಸಾಗುತ್ತಿವೆ. ಸರ್ಕಾರದ ಸಂಪೂರ್ಣ ವ್ಯವಸ್ಥೆಗಳ್ನು ಇದಕ್ಕಾಗಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳಲಾಗಿದೆ. ಆಕ್ಸಿಜನ್ ರೈಲುಗಳನ್ನು ನಿಯೋಜಿಸಲಾಯಿತು, ವಾಯುಪಡೆಯ ವಿಮಾನಗಳನ್ನು ಬಳಸಲಾಯಿತು ಮತ್ತು ನೌಕಾಪಡೆಯನ್ನು ಕೂಡಾ ನಿಯೋಜಿಸಲಾಯಿತು. ವೈದ್ಯಕೀಯ ದ್ರವ ಆಮ್ಲಜನಕದ ಉತ್ಪಾದನೆಯನ್ನು ಬಹಳ ಕಡಿಮೆ ಸಮಯದಲ್ಲಿ 10 ಪಟ್ಟು ಹೆಚ್ಚಿಸಲಾಗಿದೆ. ಪ್ರಪಂಚದ ಯಾವುದೇ ಭಾಗದಿಂದ ಯಾವದೇ ಸೌಲಭ್ಯ ಲಭ್ಯವಾಗಬಹುದೆಂಬುದನ್ನು ಅರಿತು ಪಡೆಯಲು ಅದನ್ನು ಎಲ್ಲ ಪ್ರಯತ್ನಗಳನ್ನು ಮಾಡಲಾಯಿತು. ಅಂತೆಯೇ, ಅಗತ್ಯ ಔಷಧಿಗಳ ಉತ್ಪಾದನೆಯನ್ನು ಅನೇಕ ಪಟ್ಟು ಹೆಚ್ಚಿಸಲಾಯಿತು ಮತ್ತು ವಿದೇಶದಲ್ಲಿ ಲಭ್ಯವಿದೆ ಎಂದಾದರೆ ಎಲ್ಲಿಂದಲಾದರೂ ಅವುಗಳನ್ನು ತರಲು ಬೇಕಾದ ಯಾವುದೇ ಪ್ರಯತ್ನವನ್ನೂ ಮಾಡದೆ ಬಿಡಲಿಲ್ಲ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಕೊರೋನಾದಂತಹ ಅದೃಶ್ಯ ಮತ್ತು ರೂಪಾಂತರಿತ ಶತ್ರುವಿನ ವಿರುದ್ಧದ ಹೋರಾಟದಲ್ಲಿ ಅತ್ಯಂತ ಪರಿಣಾಮಕಾರಿ ಆಯುಧವೆಂದರೆ ಕೋವಿಡ್ ಶಿಷ್ಟಾಚಾರ, ಮುಖಗವಸು ಬಳಕೆ, ಎರಡು ಗಜಗಳ ಅಂತರ ಮತ್ತು ಇತರ ಎಲ್ಲಾ ಮುನ್ನೆಚ್ಚರಿಕೆಗಳನ್ನು ಅನುಸರಿಸುವುದು. ಈ ಹೋರಾಟದಲ್ಲಿ ನಮಗೆ ರಕ್ಷಣಾತ್ಮಕ ಗುರಾಣಿಯಂತೆ ಇದೆ ಲಸಿಕೆ. ಇಂದು ಪ್ರಪಂಚದಾದ್ಯಂತ ಲಸಿಕೆಗಳ ಬೇಡಿಕೆಗೆ ಹೋಲಿಸಿದರೆ, ಅವುಗಳನ್ನು ಉತ್ಪಾದಿಸುವ ದೇಶಗಳು ಮತ್ತು ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ತಯಾರಿಸುವ ಕಂಪನಿಗಳು ಬಹಳ ಕಡಿಮೆ. ಅವುಗಳ ಸಂಖ್ಯೆಯನ್ನು ಎಣಿಸಬಹುದು. ನಾವು ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಅಭಿವೃದ್ಧಿಪಡಿಸದಿದ್ದರೆ, ಇಂದು ಭಾರತದಂತಹ ದೊಡ್ಡ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಏನಾಗಬಹುದೆಂದು ಗ್ರಹಿಸಿ. ಕಳೆದ 50-60 ವರ್ಷಗಳ ಇತಿಹಾಸವನ್ನು ನೀವು ಗಮನಿಸಿದರೆ, ಭಾರತವು ವಿದೇಶದಿಂದ ಲಸಿಕೆ ಪಡೆಯಲು ದಶಕಗಳನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತಿತ್ತು ಎಂದು ನಿಮಗೆ ತಿಳಿಯುತ್ತದೆ. ವಿದೇಶದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಕೆಲಸ ಮುಗಿದ ನಂತರವೂ ನಮ್ಮ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಹಾಕುವ ಕೆಲಸವನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಲಾಗಲಿಲ್ಲ. ಪೋಲಿಯೊ, ಸಿಡುಬು, ಅಥವಾ ಹೆಪಟೈಟಿಸ್ ಬಿ ಲಸಿಕೆಗಳು ಇರಲಿ, ದೇಶವಾಸಿಗಳು ದಶಕಗಳಿಂದ ಕಾಯುತ್ತಿದ್ದರು. ದೇಶವಾಸಿಗಳು 2014 ರಲ್ಲಿ ನಮಗೆ ಸೇವೆ ಸಲ್ಲಿಸಲು ಅವಕಾಶ ನೀಡಿದಾಗ, ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ವ್ಯಾಪ್ತಿಯು ಕೇವಲ 60 ಪ್ರತಿಶತದಷ್ಟಿತ್ತು. ಮತ್ತು ನಮ್ಮ ದೃಷ್ಟಿಯಲ್ಲಿ, ಇದು ಬಹಳ ಕಳವಳಕಾರಿ ಸಂಗತಿಯಾಗಿದೆ.ಭಾರತದ ರೋಗನಿರೋಧಕ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮದ ಪ್ರಗತಿಯಲ್ಲಿರುವ ದರವು ದೇಶವು 100% ಲಸಿಕೆ ವ್ಯಾಪ್ತಿಯ ಗುರಿಯನ್ನು ಸಾಧಿಸಲು ಸುಮಾರು 40 ವರ್ಷಗಳನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಂಡಿದೆ. ಈ ಸಮಸ್ಯೆಯನ್ನು ಪರಿಹರಿಸಲು ನಾವು ಸಂಕಲ್ಪಯೋಜನೆ (ಮಿಷನ್) ಇಂದ್ರಧನುಷ್ ಅನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದೆವು. ಮಿಷನ್ ಇಂದ್ರಧನುಷ್ ಮೂಲಕ ಯುದ್ದೋಪಾದಿಯ ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಹಾಕುವ ಕೆಲಸವನ್ನು ಕೈಗೊಳ್ಳಲಾಗಿದೆ ಮತ್ತು ಅಗತ್ಯವಿರುವವರಿಗೆ ಲಸಿಕೆ ಹಾಕುವ ಪ್ರಯತ್ನ ಮಾಡಬೇಕು ಎಂದು ನಾವು ನಿರ್ಧರಿಸಿದೆವು. ನಾವು ಸಂಕಲ್ಪ ಆಧಾರದಲ್ಲಿ (ಮಿಷನ್ ಮೋಡ್‌ನಲ್ಲಿ) ಕೆಲಸ ಮಾಡಿದ್ದೇವೆ ಮತ್ತು ಲಸಿಕೆ ವ್ಯಾಪ್ತಿಯು ಕೇವಲ 5-6 ವರ್ಷಗಳಲ್ಲಿ ಶೇಕಡಾ 60 ರಿಂದ 90 ಕ್ಕೆ ಏರಿದೆ. ಅಂದರೆ, ನಾವು ಲಸಿಕೆ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮದ ವೇಗವನ್ನು ತೀವ್ರ ಗತಿಯಲ್ಲಿ ಹೆಚ್ಚಿಸಿದ್ದೇವೆ.  

ಭಾರತದ ಲಸಿಕೆ ಅಭಿಯಾನದ ಒಂದು ಭಾಗವಾಗಿ ನಾವು ಅನೇಕ ಹೊಸ ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಮಾಡಿದ್ದೇವೆ. ಎಂದಿಗೂ ಲಸಿಕೆ ಪಡೆಯದ ಮಕ್ಕಳು, ಬಡವರು ಮತ್ತು ಬಡವರ ಮಕ್ಕಳ ಬಗ್ಗೆ ಕಾಳಜಿ ವಹಿಸಿದ್ದರಿಂದ ನಾವು ಇದನ್ನು ಮಾಡಿದ್ದೇವೆ. ಕೊರೋನವೈರಸ್ ಹೊಸತಾಗಿ ಬಂದಿರುವ ಆ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ ನಾವು 100% ಲಸಿಕೆ ವ್ಯಾಪ್ತಿಯತ್ತ ಸಾಗುತ್ತಿದ್ದೆವು. ಇಷ್ಟು ದೊಡ್ಡ ಜನಸಂಖ್ಯೆಯನ್ನು ಭಾರತವು ಹೇಗೆ ರಕ್ಷಿಸಲು ಸಾಧ್ಯವಾಗುತ್ತದೆ ಎಂಬ ಆತಂಕ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಮಾತ್ರವಲ್ಲದೆ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿಯೂ ಇತ್ತು. ಆದರೆ ಸ್ನೇಹಿತರೇ, ಉದ್ದೇಶವು ಶುದ್ಧವಾಗಿದ್ದಾಗ, ನೀತಿ ಸ್ಪಷ್ಟವಾಗಿರುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ನಿರಂತರ ಶ್ರಮವಿದೆ, ಉತ್ತಮ ಫಲಿತಾಂಶಗಳನ್ನೂ ಸಹ ನಿರೀಕ್ಷಿಸಲಾಗಿದೆ. ಪ್ರತಿ ಆತಂಕವನ್ನು ನಿರ್ಲಕ್ಷಿಸಿ, ಭಾರತವು ಒಂದು ವರ್ಷದೊಳಗೆ ಒಂದಲ್ಲ ಎರಡು 'ಮೇಡ್ ಇನ್ ಇಂಡಿಯಾ' ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಬಿಡುಗಡೆ ಮಾಡಿತು. ಭಾರತವು ಅಭಿವೃದ್ಧಿ ಹೊಂದಿದ ದೇಶಗಳ ಹಿಂದೆ ಇಲ್ಲ, ಮುಂದಿದೆ ಎಂದು ನಮ್ಮ ದೇಶ ಮತ್ತು ದೇಶದ ವಿಜ್ಞಾನಿಗಳು ತೋರಿಸಿಕೊಟ್ಟಿದ್ದಾರೆ. ಇಂದು ನಾನು ನಿಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ಮಾತನಾಡುವಾಗ, ದೇಶದಲ್ಲಿ ಈ ತನಕ 23 ಕೋಟಿಗೂ ಹೆಚ್ಚು ಲಸಿಕೆ ಪ್ರಮಾಣವನ್ನು ನೀಡಲಾಗಿದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಇದರಲ್ಲಿ ಒಂದು विश्वासेन सिद्धि ನಂಬಿಕೆ ಇದೆ. ಅಂದರೆ, ನಮ್ಮಲ್ಲಿ ನಂಬಿಕೆ ಇರುವಾಗ ನಮ್ಮ ಪ್ರಯತ್ನಗಳಲ್ಲಿ ನಾವು ಖಂಡಿತಾ ಯಶಸ್ಸನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತೇವೆ. ನಮ್ಮ ವಿಜ್ಞಾನಿಗಳು ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಬಹಳ ಕಡಿಮೆ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಅಭಿವೃದ್ಧಿಪಡಿಸಲು ಸಾಧ್ಯವಾಗುತ್ತದೆ ಎಂಬ ವಿಶ್ವಾಸ ನಮಗಿತ್ತು. ಈ ನಂಬಿಕೆಯಿಂದಾಗಿ, ನಮ್ಮ ವಿಜ್ಞಾನಿಗಳು ತಮ್ಮ ಸಂಶೋಧನಾ ಕಾರ್ಯಗಳಲ್ಲಿ ನಿರತರಾಗಿದ್ದಾಗ, ನಾವು ಲಾಜಿಸ್ಟಿಕ್ಸ್ ಮತ್ತು ಇತರ ಸಿದ್ಧತೆಗಳನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದ್ದೇವೆ. ಕಳೆದ ವರ್ಷ ಏಪ್ರಿಲ್‌ನಲ್ಲಿ ಕೆಲವೇ ಸಾವಿರ ಕೊರೋನಾ ಪ್ರಕರಣಗಳು ಇದ್ದಾಗ, ಅದೇ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಕಾರ್ಯಪಡೆ ರಚನೆಯಾಯಿತು ಎಂಬುದು ನಿಮಗೆಲ್ಲರಿಗೂ ಚೆನ್ನಾಗಿ ತಿಳಿದಿದೆ. ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ತಯಾರಿಸುವ ಭಾರತೀಯ ಕಂಪನಿಗಳಿಗೆ ಸರ್ಕಾರ ಎಲ್ಲ ರೀತಿಯಲ್ಲೂ ಬೆಂಬಲ ನೀಡಿತು. ಲಸಿಕೆ ತಯಾರಕರಿಗೆ ಚಿಕಿತ್ಸಾ ( ಕ್ಲಿನಿಕಲ್) ಪ್ರಯೋಗಗಳಲ್ಲಿ ಸಹಾಯ ಮಾಡಲಾಯಿತು, ಸಂಶೋಧನೆ ಮತ್ತು ಅಭಿವೃದ್ಧಿಗೆ ಧನಸಹಾಯ ನೀಡಲಾಯಿತು ಮತ್ತು ಸರ್ಕಾರವು ಪ್ರತಿ ಹಂತದಲ್ಲೂ ಅವರೊಂದಿಗೆ ಭುಜದಿಂದ ಭುಜಕ್ಕೆ ಕೊಟ್ಟು ಪ್ರೋತ್ಸಾಹಿಸಿ ಜೊತೆಯಲ್ಲಿ ಸಾಗಿತು.

ಆತ್ಮನಿರ್ಭರ ಭಾರತ್ ಪ್ಯಾಕೇಜ್ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಮಿಷನ್ ಕೋವಿಡ್ ಸುರಕ್ಷದ ಮೂಲಕ ಸಹಸ್ರಾರು ಕೋಟಿ ರೂಪಾಯಿಗಳನ್ನು ಅವರಿಗೆ ಅನುಕೂಲವಾಗಲು ಲಭ್ಯಗೊಳಿಸಲಾಯಿತು.  ದೇಶದಲ್ಲಿ ದೀರ್ಘಕಾಲದವರೆಗೆ ದೂರದೃಷ್ಟಿ ಇಟ್ಟು ನಡೆಯುತ್ತಿರುವ ನಿರಂತರ ಪ್ರಯತ್ನ ಮತ್ತು ಕಠಿಣ ಪರಿಶ್ರಮ, ಮುಂದಿನ ದಿನಗಳಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆಗಳ ಪೂರೈಕೆ ಇನ್ನೂ ಹೆಚ್ಚಾಗಲಿದೆ. ಇಂದು ದೇಶದ ಏಳು ಕಂಪನಿಗಳು ವಿವಿಧ ರೀತಿಯ ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಉತ್ಪಾದಿಸುತ್ತಿವೆ. ಇನ್ನೂ ಮೂರು ಲಸಿಕೆಗಳ ಪ್ರಯೋಗವು ಮುಂದುವರಿದ ಹಂತದಲ್ಲಿ ನಡೆಯುತ್ತಿದೆ. ದೇಶದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆಗಳ ಲಭ್ಯತೆಯನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸಲು ವಿದೇಶಿ ಕಂಪನಿಗಳಿಂದ ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಖರೀದಿಸುವ ಪ್ರಕ್ರಿಯೆಯನ್ನು ಚುರುಕುಗೊಳಿಸಲಾಗಿದೆ. ಇತ್ತೀಚಿನ ದಿನಗಳಲ್ಲಿ, ಕೆಲವು ತಜ್ಞರು ನಮ್ಮ ಮಕ್ಕಳ ಬಗ್ಗೆಯೂ ಕಳವಳ ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಈ ದಿಕ್ಕಿನಲ್ಲಿಯೂ ಎರಡು ಲಸಿಕೆಗಳ ಪ್ರಯೋಗ ವೇಗವಾಗಿ ನಡೆಯುತ್ತಿದೆ. ಇದಲ್ಲದೆ, 'ನೇಸಲ್' (ಮೂಗಿನ) ಲಸಿಕೆ ಕುರಿತು ದೇಶದಲ್ಲಿಯೂ ಸಂಶೋಧನೆ ನಡೆಯುತ್ತಿದೆ. ಸಿರಿಂಜ್ ಬದಲಿಗೆ ಅದನ್ನು ಮೂಗಿಗೆ ಹಾಕಲಾಗುತ್ತದೆ. ಮುಂದಿನ ದಿನಗಳಲ್ಲಿ ಈ ಲಸಿಕೆಯಲ್ಲಿ ದೇಶವು ಯಶಸ್ವಿಯಾದರೆ, ಇದು ಭಾರತದ ಲಸಿಕೆ ಅಭಿಯಾನವನ್ನು ಇನ್ನಷ್ಟು ವೇಗಗೊಳಿಸುತ್ತದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಇಷ್ಟು ಕಡಿಮೆ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಅಭಿವೃದ್ಧಿಪಡಿಸುವುದು ಇಡೀ ಮಾನವೀಯ ಜನಾಂಗಕ್ಕೆ ಒಂದು ದೊಡ್ಡ ಸಾಧನೆಯಾಗಿದೆ. ಆದರೆ ಅದರ ಬೆಳವಣಿಗೆಯಲ್ಲಿ ಮಿತಿಗಳೂ ಇವೆ. ಲಸಿಕೆ ಅಭಿವೃದ್ಧಿಪಡಿಸಿದ ನಂತರವೂ, ವಿಶ್ವದ ಕೆಲವೇ ದೇಶಗಳಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಪ್ರಾರಂಭವಾಯಿತು, ಮತ್ತು ಅದೂ ಸಮೃದ್ಧ ದೇಶಗಳಲ್ಲಿ ಮಾತ್ರ. ಲಸಿಕೆ ಬಗ್ಗೆ ವಿಶ್ವ ಆರೋಗ್ಯ ಸಂಸ್ಥೆ ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ನೀಡಿತು. ವಿಜ್ಞಾನಿಗಳು ಲಸಿಕೆಗಾಗಿ ರೂಪರೇಖೆಯನ್ನು ಹಾಕಿದರು. ಇತರ ದೇಶಗಳ ಉತ್ತಮ ಅಭ್ಯಾಸಗಳ ಆಧಾರದ ಮೇಲೆ ಮತ್ತು ವಿಶ್ವ ಆರೋಗ್ಯ ಸಂಸ್ಥೆಯ ಮಾನದಂಡಗಳ ಪ್ರಕಾರ ಹಂತ ಹಂತವಾಗಿ ಲಸಿಕೆ ನೀಡಲು ಭಾರತ ನಿರ್ಧರಿಸಿತು. ಮುಖ್ಯಮಂತ್ರಿಗಳೊಂದಿಗೆ ನಡೆದ ವಿವಿಧ ಸಭೆಗಳಿಂದ ಪಡೆದ ಸಲಹೆಗಳು ಮತ್ತು ಸಂಸತ್ತಿನಲ್ಲಿ ವಿವಿಧ ಪಕ್ಷಗಳ ಸಹೋದ್ಯೋಗಿಗಳು ನೀಡಿದ ಹಾಗೂ ವಿವಿಧಡೆಗಳಿಂದ ಪಡೆದ ಸಲಹೆಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಕೇಂದ್ರ ಸರ್ಕಾರ ಸಂಪೂರ್ಣ ಕಾಳಜಿ ವಹಿಸಿತು. ಇದರ ನಂತರವೇ, ಕೊರೋನಾದಿಂದ ಹೆಚ್ಚು ಅಪಾಯದಲ್ಲಿರುವವರಿಗೆ ಮೊದಲ ಆದ್ಯತೆ ನೀಡಲಾಗುವುದು ಎಂದು ನಿರ್ಧರಿಸಲಾಯಿತು. ಅದಕ್ಕಾಗಿಯೇ ಆರೋಗ್ಯ ಕಾರ್ಯಕರ್ತರು, ಮುಂಚೂಣಿ ಕೆಲಸಗಾರರು, 60 ವರ್ಷಕ್ಕಿಂತ ಮೇಲ್ಪಟ್ಟ ನಾಗರಿಕರು ಮತ್ತು 45 ವರ್ಷಕ್ಕಿಂತ ಮೇಲ್ಪಟ್ಟ ಇತರ ದೀರ್ಘಕಾಲೀನ ವ್ಯಾಧಿಗಳಿಂದ ಬಳಲುತ್ತಿರುವವರು ಆಧ್ಯತೆಯಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಪಡೆದರು. ಕೊರೋನಾದ ಎರಡನೇ ಅಲೆಗೆ  ಮುಂಚಿತವಾಗಿ ನಮ್ಮ ಮುಂಚೂಣಿ ಕಾರ್ಮಿಕರಿಗೆ ಲಸಿಕೆ ನೀಡದಿದ್ದಿದ್ದರೆ ಈಗ ಏನಾಗಬಹುದಿತ್ತು ಎಂದು ನೀವು ಊಹಿಸಬಲ್ಲಿರಾ? ಊಹಿಸಿಕೊಳ್ಳಿ, ನಮ್ಮ ವೈದ್ಯರು ಮತ್ತು ಶುಶ್ರೂಷಾ ಸಿಬ್ಬಂದಿಗೆ ಲಸಿಕೆ ನೀಡದಿದ್ದರೆ ಏನಾಗುತ್ತಿತ್ತು?  ಆಸ್ಪತ್ರೆಗಳನ್ನು ಸ್ವಚ್ಛ  ಗೊಳಿಸುವ ಕೆಲಸ ಮಾಡುತ್ತಿದ್ದ ನಮ್ಮ ಸಹೋದರರು ಮತ್ತು ಸಹೋದರಿಯರು ಮತ್ತು ನಮ್ಮ ಆಂಬ್ಯುಲೆನ್ಸ್ ಚಾಲಕರಿಗೆ ಆದ್ಯತೆಯಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ನೀಡದಿದ್ದರೆ ಏನಾಗುತ್ತಿತ್ತು? ಆರೋಗ್ಯ ಕಾರ್ಯಕರ್ತರಿಗೆ ಲಸಿಕೆ ಹಾಕುವ ಕಾರಣದಿಂದಾಗಿ ಅವರು ಇತರರನ್ನು ನೋಡಿಕೊಳ್ಳಲು ಮತ್ತು ಲಕ್ಷಾಂತರ ದೇಶವಾಸಿಗಳ ಪ್ರಾಣ ಉಳಿಸಲು ಸಾಧ್ಯವಾಯಿತು. ಆದರೆ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಕೊರೋನಾ ಪ್ರಕರಣಗಳು ಕಡಿಮೆಯಾಗುತ್ತಿರುವ ಮಧ್ಯೆ, ವಿಭಿನ್ನ ಸಲಹೆಗಳು ಮತ್ತು ಬೇಡಿಕೆಗಳು ಕೇಂದ್ರ ಸರ್ಕಾರದ ಮುಂದೆ ಬರಲಾರಂಭಿಸಿದವು. ಇದನ್ನು ಕೇಳಲಾಯಿತು, ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರವು ಎಲ್ಲವನ್ನೂ ಏಕೆ ನಿರ್ಧರಿಸುತ್ತಿದೆ? ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳಿಗೆ ಏಕೆ ಅವಕಾಶ ನೀಡುತ್ತಿಲ್ಲ? ಲಾಕ್‌ಡೌನ್‌ ನ ಸಡಿಲಿಕೆಯನ್ನು ನಿರ್ಧರಿಸುವಲ್ಲಿ ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳಿಗೆ ಏಕೆ ಅವಕಾಶ ನೀಡುತ್ತಿಲ್ಲ? ಒಂದು ಸೂತ್ರದ ಗಾತ್ರವು ಏಲ್ಲಡೆಗೆ ಹೊಂದಿಕೆಯಾಗುವುದಿಲ್ಲ ಎಂಬಂತಹ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಸಹ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ. ಆರೋಗ್ಯವು ಪ್ರಾಥಮಿಕವಾಗಿ ಸಂವಿಧಾನದ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ರಾಜ್ಯ ವಿಷಯವಾಗಿರುವುದರಿಂದ, ರಾಜ್ಯಗಳು ಅಗತ್ಯ ಕಾರ್ಯಗಳನ್ನು ನಿರ್ವಹಿಸುವುದು ಉತ್ತಮ ಎಂದು ವಾದಿಸಲಾಯಿತು. ಆದ್ದರಿಂದ, ಈ ದಿಕ್ಕಿನಲ್ಲಿ ಒಂದು ಆರಂಭವನ್ನು ಮಾಡಲಾಯಿತು. ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರವು ಸಮಗ್ರ ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಯನ್ನು ರೂಪಿಸಿ ರಾಜ್ಯಗಳಿಗೆ ತಮ್ಮ ಅಗತ್ಯತೆ ಮತ್ತು ಅನುಕೂಲಕ್ಕೆ ಅನುಗುಣವಾಗಿ ಕೆಲಸ ಮಾಡುವಂತೆ ನೀಡಿತು. ಸ್ಥಳೀಯ ಮಟ್ಟದಲ್ಲಿ ಕೊರೋನಾ ಕರ್ಫ್ಯೂ ಹೇರುವುದು, ಸೂಕ್ಷ್ಮ ಧಾರಕ ವಲಯಗಳ ರಚನೆ ಮತ್ತು ಚಿಕಿತ್ಸೆಯ ವ್ಯವಸ್ಥೆ ಮಾಡುವ ಬಗ್ಗೆ ರಾಜ್ಯಗಳ ಬೇಡಿಕೆಗಳನ್ನು ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರ ಒಪ್ಪಿಕೊಂಡಿತು.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಜನವರಿ 16 ರಿಂದ ಈ ವರ್ಷದ ಏಪ್ರಿಲ್ ಅಂತ್ಯದವರೆಗೆ ಭಾರತದ ಲಸಿಕೆ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮವು ಮುಖ್ಯವಾಗಿ ಕೇಂದ್ರ ಸರ್ಕಾರದ ಮೇಲ್ವಿಚಾರಣೆಯಲ್ಲಿ ನಡೆಯಿತು. ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಉಚಿತ ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ನೀಡುವ ದಿಕ್ಕಿನಲ್ಲಿ ದೇಶ ಸಾಗುತ್ತಿತ್ತು. ದೇಶದ ನಾಗರಿಕರು ಸಹ ಶಿಸ್ತು ಕಾಪಾಡಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಿದ್ದರು ಮತ್ತು ಲಸಿಕೆ ಪಡೆಯುತ್ತಿದ್ದರು. ಏತನ್ಮಧ್ಯೆ, ಲಸಿಕೆ ಕಾರ್ಯವನ್ನು ಡಿ–ಕೇಂದ್ರೀಕೃತಗೊಳಿಸಬೇಕು ಮತ್ತು ರಾಜ್ಯಗಳಿಗೆ ಬಿಡಬೇಕು ಎಂದು ಹಲವಾರು ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳು ಮತ್ತೆ ಹೇಳಿದವು. ಹಲವಾರು ಧ್ವನಿಗಳು ಎದ್ದವು. ವ್ಯಾಕ್ಸಿನೇಷನ್ಗಾಗಿ ವಯಸ್ಸಿನ ಗುಂಪುಗಳನ್ನು ಏಕೆ ರಚಿಸಲಾಗಿದೆ? ಮತ್ತೊಂದೆಡೆ, ಯಾರಾದರೂ ವಯೋಮಿತಿಯನ್ನು ಕೇಂದ್ರ ಸರ್ಕಾರ ಏಕೆ ನಿರ್ಧರಿಸಬೇಕು ಎಂದು ಹೇಳಿದರು. ವಯಸ್ಸಾದವರಿಗೆ ಮೊದಲೇ ಲಸಿಕೆ ನೀಡಲಾಗುತ್ತಿದೆ ಎಂದು ಕೆಲವು ಧ್ವನಿಗಳು ಇದ್ದವು. ವಿವಿಧ ಒತ್ತಡಗಳನ್ನು ಸಹ ರಚಿಸಲಾಯಿತು ಮತ್ತು ದೇಶದ ಮಾಧ್ಯಮಗಳ ಒಂದು ಭಾಗವು ಅದನ್ನು ಅಭಿಯಾನದ ರೂಪದಲ್ಲಿ ನಡೆಸಿತು.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಹೆಚ್ಚಿನ ಚರ್ಚೆಯ ನಂತರ, ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳು ಸಹ ಅವರ ಪರವಾಗಿ ಪ್ರಯತ್ನಗಳನ್ನು ಮಾಡಲು ಬಯಸಿದರೆ, ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರ ಏಕೆ ಆಕ್ಷೇಪಿಸಬೇಕು? ರಾಜ್ಯಗಳ ಈ ಬೇಡಿಕೆಯನ್ನು ಗಮನದಲ್ಲಿಟ್ಟುಕೊಂಡು ಮತ್ತು ಅವರ ಮನವಿಯನ್ನು ಪರಿಗಣಿಸಿ, ಜನವರಿ 16 ರಿಂದ ಪ್ರಯೋಗವಾಗಿ ನಡೆಯುತ್ತಿರುವ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯಲ್ಲಿ ಬದಲಾವಣೆ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ. ರಾಜ್ಯಗಳು ಈ ಬೇಡಿಕೆಯನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಿರುವಾಗ ಮತ್ತು ಅವರಿಗೆ ಉತ್ಸಾಹವಿದೆ ಎಂದು ನಾವು ಭಾವಿಸಿದ್ದೇವೆ, ಆದ್ದರಿಂದ ಶೇಕಡಾ 25 ರಷ್ಟು ಕೆಲಸವನ್ನು ಅವರಿಗೆ ನೀಡೋಣ. ಇದರ ಫಲವಾಗಿ, ಶೇಕಡಾ 25 ರಷ್ಟು ಕೆಲಸವನ್ನು ಮೇ 1 ರಿಂದ ರಾಜ್ಯಗಳಿಗೆ ಹಸ್ತಾಂತರಿಸಲಾಯಿತು ಮತ್ತು ಅದನ್ನು ಪೂರ್ಣಗೊಳಿಸಲು ಅವರು ತಮ್ಮದೇ ಆದ ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಪ್ರಯತ್ನಗಳನ್ನು ರಾಜ್ಯಗಳು ಮಾಡಿದರು.

ಕ್ರಮೇಣ, ಅಂತಹ ಮಹತ್ವದ ಕಾರ್ಯದಲ್ಲಿನ ತೊಂದರೆಗಳನ್ನು ರಾಜ್ಯಗಳು ಅರಿತುಕೊಳ್ಳಲು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದರು. ಇಡೀ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆಯ ವಾಸ್ತವ ಸ್ಥಿತಿಯನ್ನು ರಾಜ್ಯಗಳು ಅರಿತುಕೊಂಡವು. ಒಂದು ಕಡೆ ಮೇ ತಿಂಗಳಲ್ಲಿ ಎರಡನೇ ಅಲೆ ಇರುವುದನ್ನು ನಾವು ಗಮನಿಸಿದ್ದೇವೆ, ಮತ್ತೊಂದೆಡೆ ಲಸಿಕೆಗಾಗಿ ಜನರಲ್ಲಿ ಆಸಕ್ತಿ ಹೆಚ್ಚುತ್ತಿದೆ ಮತ್ತು ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳು ತೊಂದರೆಗಳನ್ನು ಅನುಭವಿಸ ತೊಡಗಿದವು. ಮೇ ತಿಂಗಳಲ್ಲಿ ಎರಡು ವಾರಗಳು ಕಳೆದಂತೆ, ಕೆಲವು ರಾಜ್ಯಗಳು ಹಿಂದಿನ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯು ಉತ್ತಮವಾಗಿದೆ ಎಂದು ಬಹಿರಂಗವಾಗಿ ಹೇಳಲು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿತು. ಲಸಿಕೆ ಅನ್ನು ರಾಜ್ಯಗಳಿಗೆ ವಹಿಸಬೇಕೆಂದು ಪ್ರತಿಪಾದಿಸುತ್ತಿದ್ದವರು ಕೂಡ ತಮ್ಮ ಅಭಿಪ್ರಾಯಗಳನ್ನು ಬದಲಾಯಿಸಲು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದರು. ಸಮಯಕ್ಕೆ ಮರುಪರಿಶೀಲಿಸುವ ಬೇಡಿಕೆಯೊಂದಿಗೆ ರಾಜ್ಯಗಳು ಮತ್ತೆ ಮುಂದೆ ಬಂದಿರುವುದು ಒಳ್ಳೆಯದು. ರಾಜ್ಯಗಳ ಈ ಬೇಡಿಕೆಯ ಮೇರೆಗೆ, ದೇಶವಾಸಿಗಳು ತೊಂದರೆ ಅನುಭವಿಸಬಾರದು ಮತ್ತು ಅವರ ಲಸಿಕೆ ಸರಾಗವಾಗಿ ಮುಂದುವರಿಯಬೇಕು ಎಂದು ನಾವು ಭಾವಿಸಿದ್ದೇವೆ, ಆದ್ದರಿಂದ ನಾವು ಮೇ 1 ರ ಮೊದಲು ಜಾರಿಯಲ್ಲಿದ್ದ ಹಳೆಯ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯನ್ನು ಅಂದರೆ ಜನವರಿ 16 ರಿಂದ ಏಪ್ರಿಲ್ ಅಂತ್ಯದವರೆಗೆ ಇದ್ದ ಹಳೆಯ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯನ್ನು ಪುನಃ ಜಾರಿಗೆ ತರಲು ನಿರ್ಧರಿಸಿದ್ದೇವೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ರಾಜ್ಯಗಳೊಂದಿಗೆ ಲಸಿಕೆ ಹಾಕುವಿಕೆಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ಶೇಕಡಾ 25 ರಷ್ಟು ಕೆಲಸದ ಜವಾಬ್ದಾರಿಯನ್ನು ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರವೂ ಕೂಡಾ ವಹಿಸಲಿದೆ ಎಂದು ಇಂದು ನಿರ್ಧರಿಸಲಾಗಿದೆ. ಮುಂದಿನ ಎರಡು ವಾರಗಳಲ್ಲಿ ಈ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯನ್ನು ಜಾರಿಗೆ ತರಲಾಗುವುದು. ಈ ಎರಡು ವಾರಗಳಲ್ಲಿ ಕೇಂದ್ರ ಮತ್ತು ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳು ಒಟ್ಟಾಗಿ ಹೊಸ ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳ ಪ್ರಕಾರ ಅಗತ್ಯ ಸಿದ್ಧತೆಗಳನ್ನು ಮಾಡಿಕೊಳ್ಳುತ್ತವೆ. ಕಾಕತಾಳೀಯವಾಗಿ, ಎರಡು ವಾರಗಳ ನಂತರ, ಅಂತರರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಯೋಗ ದಿನವು, ಜೂನ್ 21 ರಂದು ಬರುತ್ತದೆ. ಜೂನ್ 21 ರಿಂದ ನಂತರ 18 ವರ್ಷಕ್ಕಿಂತ ಮೇಲ್ಪಟ್ಟ ಎಲ್ಲಾ ನಾಗರಿಕರಿಗೆ ಉಚಿತ ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ನೀಡಲು ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರವು ಎಲ್ಲಾ ರಾಜ್ಯಗಳಿಗೆ ಲಸಿಕೆ ನೀಡುತ್ತದೆ. ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರವೇ ಲಸಿಕೆ ಉತ್ಪಾದಕರಿಂದ ಒಟ್ಟು ಲಸಿಕೆ ಉತ್ಪಾದನೆಯಲ್ಲಿ ಶೇ 75 ರಷ್ಟು ಖರೀದಿಸಿ ಅದನ್ನು ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳಿಗೆ ಉಚಿತವಾಗಿ ನೀಡಲಿದೆ. ಅಂದರೆ, ದೇಶದ ಯಾವುದೇ ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರವು ಲಸಿಕೆಗಾಗಿ ಏನನ್ನೂ ಖರ್ಚು ಮಾಡಬೇಕಾಗಿಲ್ಲ. ಇಲ್ಲಿಯವರೆಗೆ, ದೇಶದ ಕೋಟಿ ಜನರಿಗೆ ಉಚಿತ ಲಸಿಕೆಗಳು ದೊರೆತಿವೆ.

ಈಗ, ಇನ್ನುಮುಂದೆ 18 ವರ್ಷ ವಯಸ್ಸಿನ ಜನರು ಸಹ ಅದರ ಭಾಗವಾಗುತ್ತಾರೆ. ಈ ಮೂಲಕ ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರ ಮಾತ್ರ ಎಲ್ಲಾ ದೇಶವಾಸಿಗಳಿಗೆ ಉಚಿತ ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ನೀಡುತ್ತದೆ. ಭಾರತ ಸರ್ಕಾರದ ಅಭಿಯಾನದಲ್ಲಿ ಸಂಪೂರ್ಣ ಉಚಿತ ಸಲಿಕೆ ಇರುತ್ತದೆ , ಅದು ಬಡವರಾಗಲಿ, ಕೆಳ ಮಧ್ಯಮ ವರ್ಗದವರಾಗಲಿ, ಮಧ್ಯಮ ವರ್ಗದವರಾಗಲಿ, ಅಥವಾ ಮೇಲ್ವರ್ಗದವರಾಗಲಿ, ಉಚಿತ ಲಸಿಕೆಯನ್ನು ಎಲ್ಲರಿಗೂ ನೀಡಲಾಗುತ್ತದೆ. ಲಸಿಕೆ ಉಚಿತವಾಗಿ ಪಡೆಯಲು ಬಯಸದ ಮತ್ತು ಖಾಸಗಿ ಆಸ್ಪತ್ರೆಯಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಪಡೆಯಲು ಬಯಸುವವರನ್ನೂ ಸಹ ನೋಡಿಕೊಳ್ಳಲಾಗಿದೆ. ದೇಶದಲ್ಲಿ 25 ಪ್ರತಿಶತದಷ್ಟು ಲಸಿಕೆ ಸಂಗ್ರಹಿಸುವ ಖಾಸಗೀಕರಣ ವಲಯದ ಆಸ್ಪತ್ರೆಗಳ ವ್ಯವಸ್ಥೆ ಅದೇ ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಮುಂದುವರಿಯಲಿದೆ. ಖಾಸಗಿ ಆಸ್ಪತ್ರೆಗಳು ಲಸಿಕೆಯ ನಿಗದಿತ ಬೆಲೆಯ ನಂತರ ಒಂದೇ ಪ್ರಮಾಣಕ್ಕೆ ( ಡೋಸ್‌ಗೆ) ಗರಿಷ್ಠ 150 ರೂ.ಗಳ ಸೇವಾ ಶುಲ್ಕವನ್ನು ವಿಧಿಸಬಹುದು. ಇದರ ಮೇಲ್ವಿಚಾರಣೆಯ ಸಂಪೂರ್ಣ ಕಾರ್ಯಹೊಣೆಗಾರಿಕೆಯು ರಾಜ್ಯ ಸರ್ಕಾರಗಳ ಬಳಿ ಇರುತ್ತದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ನಮ್ಮ ಧರ್ಮಗ್ರಂಥಗಳಲ್ಲಿ प्राप्य आपदं व्यथते, उद्योगम् अनु इच्छति प्रमत्त प्रमत्त ಇದನ್ನು ಹೇಳಲಾಗಿದೆ, ಅಂದರೆ, ವಿಪತ್ತು ಸಂಭವಿಸಿದಾಗ ವಿಜಯಶಾಲಿಗಳು ಕೈಬಿಡುವುದಿಲ್ಲ, ಆದರೆ ಸಾಹಸ ಮಾಡಿ, ಶ್ರಮವಹಿಸಿ ಮತ್ತು ಪರಿಸ್ಥಿತಿಯ ಮೇಲೆ ಜಯಗಳಿಸುತ್ತಾರೆ. 130 ಕೋಟಿಗೂ ಹೆಚ್ಚು ಭಾರತೀಯರು ಪರಸ್ಪರ ಸಹಕಾರ ಮತ್ತು ಹಗಲು ರಾತ್ರಿ ಶ್ರಮದಿಂದ ಕೊರೋನಾ ವಿರುದ್ಧ ಹೋರಾಡಿದ್ದಾರೆ. ಭವಿಷ್ಯದಲ್ಲಿ, ನಮ್ಮ ಪ್ರಯತ್ನಗಳು ಮತ್ತು ಸಹಕಾರದಿಂದ ಮಾತ್ರ ನಮ್ಮ ಪ್ರಯಾಣವನ್ನು ಬಲಪಡಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ. ನಾವು ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಪಡೆಯುವ ವೇಗವನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸುತ್ತೇವೆ ಮತ್ತು ಲಸಿಕೆ ಅಭಿಯಾನಕ್ಕೆ ಮತ್ತಷ್ಟು ಪ್ರಚೋದನೆಯನ್ನು ನೀಡುತ್ತೇವೆ. ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆ ಅಭಿಯಾನ ವೇಗವು ಇಡೀ ಪ್ರಪಂಚದಲ್ಲಿಯೇ ಅತ್ಯಂತ ವೇಗವಾಗಿದೆ, ಅನೇಕ ಅಭಿವೃದ್ಧಿ ಹೊಂದಿದ ದೇಶಗಳಿಗಿಂತ ವೇಗವಾಗಿದೆ ಎಂಬುದನ್ನು ನಾವು ನೆನಪಿನಲ್ಲಿಡಬೇಕು. ನಮ್ಮ ತಂತ್ರಜ್ಞಾನ ವೇದಿಕೆ ಕೋವಿನ್ ಅನ್ನು ಪ್ರಪಂಚದಾದ್ಯಂತ ಚರ್ಚಿಸಲಾಗುತ್ತಿದೆ. ಭಾರತದ ಈ ವೇದಿಕೆಯನ್ನು ಬಳಸಲು ಅನೇಕ ದೇಶಗಳು ಆಸಕ್ತಿ ತೋರಿಸಿವೆ. ಲಸಿಕೆಯ ಪ್ರತಿ ಡೋಸ್ ಎಷ್ಟು ಮಹತ್ವದ್ದಾಗಿದೆ ಎಂಬುದನ್ನು ನಾವೆಲ್ಲರೂ ನೋಡುತ್ತಿದ್ದೇವೆ.  ಕೇಂದ್ರ ಸರ್ಕಾರವು ಈ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯನ್ನು ಮಾಡಿದ್ದು, ಪ್ರತಿ ರಾಜ್ಯಕ್ಕೆ ಕೆಲವು ವಾರಗಳ ಮುಂಚಿತವಾಗಿ ತಿಳಿಸಲಾಗುವುದು ಮತ್ತು ಅದು ಯಾವಾಗ ಮತ್ತು ಎಷ್ಟು ಪ್ರಮಾಣವನ್ನು ಪಡೆಯಲಿದೆ ಎಂದು ತಿಳಿಸಲಾಗುವುದು. ಮಾನವೀಯತೆಯ ಈ ಪವಿತ್ರ ಕಾರ್ಯದಲ್ಲಿ, ವಾದಗಳು ಮತ್ತು ರಾಜಕೀಯ ಜಗಳಗಳಂತಹ ವಿಷಯಗಳನ್ನು ಯಾರೂ ಉತ್ತಮವಾಗಿ ಪರಿಗಣಿಸುವುದಿಲ್ಲ. ಲಸಿಕೆಗಳನ್ನು ಸಂಪೂರ್ಣ ಶಿಸ್ತಿನಿಂದ ನಿರ್ವಹಿಸಬೇಕು ಎಂಬುದು ಪ್ರತಿ ಸರ್ಕಾರ, ಸಾರ್ವಜನಿಕ ಪ್ರತಿನಿಧಿ ಮತ್ತು ಆಡಳಿತದ ಸಾಮೂಹಿಕ ಜವಾಬ್ದಾರಿಯಾಗಿದ್ದು, ಲಸಿಕೆಗಳ ಲಭ್ಯತೆಗೆ ಅನುಗುಣವಾಗಿ ನಾವು ದೇಶದ ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬ ನಾಗರಿಕರನ್ನು ತಲುಪಬಹುದು.

ಆತ್ಮೀಯ ದೇಶವಾಸಿಗಳೇ,

ಲಸಿಕೆ ಹೊರತುಪಡಿಸಿ, ಮತ್ತೊಂದು ಪ್ರಮುಖ ನಿರ್ಧಾರದ ಬಗ್ಗೆ ನಾನು ಇಂದು ನಿಮಗೆ ತಿಳಿಸಲು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ. ಕಳೆದ ವರ್ಷ, ಕೊರೋನಾದಿಂದಾಗಿ ಲಾಕ್‌ಡೌನ್ ವಿಧಿಸಬೇಕಾದಾಗ, ನಮ್ಮ ದೇಶವು 80 ಕೋಟಿಗೂ ಹೆಚ್ಚು ದೇಶವಾಸಿಗಳಿಗೆ ಎಂಟು ತಿಂಗಳ ಕಾಲ ಪ್ರಧಾನ್ ಮಂತ್ರಿ ಗರಿಬ್ ಕಲ್ಯಾಣ್ ಅನ್ನ ಯೋಜನೆ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಉಚಿತ ಪಡಿತರವನ್ನು ವ್ಯವಸ್ಥೆಗೊಳಿಸಲಾಗಿತ್ತು. ಎರಡನೇ ಅಲೆಯಿಂದಾಗಿ ಈ ವರ್ಷ ಮೇ ಮತ್ತು ಜೂನ್ ವರೆಗೆ ಆ ಯೋಜನೆಯನ್ನು ವಿಸ್ತರಿಸಲಾಯಿತು. ಇಂದು ಪ್ರಧಾನ್ ಮಂತ್ರಿ ಗರಿಬ್ ಕಲ್ಯಾಣ್ ಅನ್ನ  ಯೋಜನೆಯನ್ನು ಈಗ ಬರುವ  ದೀಪಾವಳಿ ಹಬ್ಬದವರೆಗೆ ವಿಸ್ತರಿಸಲಾಗುವುದು ಎಂದು ಕೇಂದ್ರ ಸರ್ಕಾರ ನಿರ್ಧರಿಸಿದೆ. ಸಾಂಕ್ರಾಮಿಕ ರೋಗದ ಈ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ಸರ್ಕಾರವು ಬಡವರ ಪಾಲುದಾರನಾಗಿ ಅವರ ಪ್ರತಿಯೊಂದು ಅಗತ್ಯಕ್ಕೂ ಜೊತೆಯಾಗಿ ನಿಂತಿದೆ. ಅಂದರೆ ನವೆಂಬರ್ ವರೆಗೆ ಪ್ರತಿ ತಿಂಗಳು 80 ಕೋಟಿಗೂ ಹೆಚ್ಚು ದೇಶವಾಸಿಗಳಿಗೆ ಉಚಿತ ಆಹಾರ ಧಾನ್ಯಗಳು ನಿಗದಿತ ಪ್ರಮಾಣದಲ್ಲಿ ಲಭ್ಯವಿರುತ್ತವೆ. ಈ ಪ್ರಯತ್ನದ ಉದ್ದೇಶವೆಂದರೆ ನಮ್ಮ ಬಡ ಸಹೋದರ–ಸಹೋದರಿಯರಲ್ಲಿ ಯಾರೂ, ಹಾಗೂ ಅವರ ಕುಟುಂಬಗಳು ಹಸಿವಿನಿಂದ ಮಲಗಬಾರದು ಎಂಬುದಾಗಿದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಈ ಪ್ರಯತ್ನಗಳ ಮಧ್ಯೆ, ಅನೇಕ ಭಾಗಗಳಿಂದ ಲಸಿಕೆಯ ಬಗ್ಗೆ ಗೊಂದಲ ಮತ್ತು ವದಂತಿಗಳು ಕಳವಳವನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸುತ್ತವೆ. ಈ ಕಾಳಜಿಯನ್ನು ನಾನು ನಿಮಗೆ ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸಲು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ. ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಲಸಿಕೆಗಳ ಕೆಲಸ ಪ್ರಾರಂಭವಾದಾಗಿನಿಂದ, ಕೆಲವು ಜನರು ಮಾಡಿದ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯೆಗಳು ಜನಸಾಮಾನ್ಯರ ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಅನುಮಾನಗಳನ್ನು ಸೃಷ್ಟಿಸಿದವು. ಭಾರತದ ಲಸಿಕೆ ತಯಾರಕರನ್ನು ನಿರಾಶೆಗೊಳಿಸಲು ಮತ್ತು ಅನೇಕ ಅಡೆತಡೆಗಳನ್ನು ಸೃಷ್ಟಿಸಲು ಸಹ ಪ್ರಯತ್ನಿಸಲಾಯಿತು. ಭಾರತದ ಲಸಿಕೆ ಬಂದಾಗ, ಅನೇಕ ವಿಧಾನಗಳ ಮೂಲಕ ಅನುಮಾನಗಳು ಮತ್ತು ಆತಂಕಗಳು ಮತ್ತಷ್ಟು ಹೆಚ್ಚಾದವು. ಲಸಿಕೆ ಬಳಕೆ ವಿರುದ್ಧ ವಿವಿಧ ವಾದಗಳನ್ನು ಪ್ರಚಾರ ಮಾಡಲಾಯಿತು. ಇಡೀ ದೇಶವೇ ಅವರನ್ನು ಗಮನಿಸುತ್ತಿದೆ. ಲಸಿಕೆ ಬಗ್ಗೆ ಆತಂಕ ಮೂಡಿಸುವ ಮತ್ತು ವದಂತಿಗಳನ್ನು ಹರಡುವ ಮಂದಿ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಮುಗ್ಧ ಸಹೋದರ ಸಹೋದರಿಯರ ಜೀವನದೊಂದಿಗೆ ಆಡುತ್ತಿದ್ದಾರೆ.

ಅಂತಹ ವದಂತಿಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬರು ಜಾಗರೂಕರಾಗಿರಬೇಕು. ಲಸಿಕೆ ಬಗ್ಗೆ ಜಾಗೃತಿ ಮೂಡಿಸಲು ಸಹಕರಿಸಬೇಕೆಂದು ಸಮಾಜದ ಪ್ರಬುದ್ಧ ಜನರು ಮತ್ತು ಯುವಜನರೆಲ್ಲರಿಗೂ ನಾನು ವಿನಂತಿಸುತ್ತೇನೆ. ಇದೀಗ ಕೊರೋನಾ ಕರ್ಫ್ಯೂ ಅನೇಕ ಸ್ಥಳಗಳಲ್ಲಿ ಸಡಿಲಗೊಳ್ಳುತ್ತಿದೆ, ಆದರೆ ಕೊರೋನಾ ಕಣ್ಮರೆಯಾಯಿತು ಎಂದು ಇದರ ಅರ್ಥವಲ್ಲ. ನಾವು ಜಾಗರೂಕರಾಗಿರಬೇಕು ಮತ್ತು ಕೊರೋನಾದಿಂದ ನಮ್ಮನ್ನು ತಡೆಗಟ್ಟುವ ನಿಯಮಗಳನ್ನು ನಾವು ಕಟ್ಟುನಿಟ್ಟಾಗಿ ಪಾಲಿಸಬೇಕು. ಕೊರೋನಾ ವಿರುದ್ಧದ ಈ ಯುದ್ಧದಲ್ಲಿ ನಾವೆಲ್ಲರೂ ಗೆಲ್ಲುತ್ತೇವೆ, ಭಾರತ ಗೆಲ್ಲುತ್ತದೆ ಎಂಬ ಸಂಪೂರ್ಣ ನಂಬಿಕೆ ನನಗಿದೆ. ಈ ಶುಭಾಶಯಗಳೊಂದಿಗೆ, ಎಲ್ಲಾ ದೇಶವಾಸಿಗಳಿಗೆ ತುಂಬಾ ಧನ್ಯವಾದಗಳು!