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भाईयों और बहनों,

आप सबका स्‍वागत है। दो दिन बड़ी विस्‍तार से चर्चा होने वाली है। इस मंथन में से कई महत्‍वपूर्ण बाते उभरकर के आएगी जो आगे चलकर के नीति या नियम का रूप ले सकती है और इसलिए हम जितना ज्‍यादा एक लम्‍बे विजन के साथ इन चर्चाओं में अपना योगदान देंगे तो यह दो दिवसीय सम्‍मेलन अधिक सार्थक होगा। इस विषय में कुछ बातें बताने का आज मन करता है मेरा। Climate के संबंध में या Environment के संबंध में प्रारंभ से कुछ हमारी गलत अभिव्‍यक्ति रही है और हम ऐसे जैसे अपनी बात को दुनिया के आगे प्रस्‍तुत किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे हमें न Climate की परवाह है न Environment की परवाह है। और सारी दुनिया हमारी इस अभिव्‍यक्ति की गलती के कारण यह मानकार के बैठी कि विश्‍व तो Environment conscious हो रहा है। विश्‍व climate की चिंता कर रहा है कि यह देश है जो कोई अडंगे डाल रहा है और इसका मूल कारण यह नहीं है कि हमने environment को बिगाड़ने में कोई अहम भूमिका निभाई है। climate को बर्बाद करने में हमारी या हमारे पूर्वजों की कोई भूमिका रही है। हकीकत तो उल्‍टी है। हम उस परंपरा में पले है, उन नीति, नियम और बंधनों में पले-बढ़े लोग हैं, जहां प्रकृति को परमेश्‍वर के रूप माना गया है, जहां पर प्रकृति की पूजा को सार्थक माना गया है और जहां पर प्रकृति की रक्षा को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ा गया है। लेकिन हम अपनी बात किसी न किसी कारण से, एक तो हम कई वर्षों से गुलाम रहे, सदियों से गुलाम रहने के कारण एक हमारी मानसिकता भी बनी हुई है कि अपनी बात दुनिया के सामने रखते हुए हम बहुत संकोच करते हैं। ऐसा लगता है कि यार कहीं यह आगे बढ़ा हुआ विश्‍व हम Third country के लोग। हमारी बात मजाक तो नहीं बन जाएगी। जब तक हमारे भीतर एक confidence नहीं आता है, शायद इस विषय पर हम ठीक से deal नहीं कर पाएंगे।

और मैं आज इस सभागृह में उपस्थित सभी महानुभावों से आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूं हम जितने प्रकृति के विषय में संवेदनशील है। दुनिया हमारे लिए सवालिया निशान खड़ा नहीं कर सकती है। आज भी प्रति व्‍यक्ति अगर carbon emission में contribution किसी का होगा तो कम से कम contribution वालों में हम है। लेकिन उसके बाद भी आवश्‍यकता यह थी कि विश्‍व में जब climate विषय में एक चिंता शुरू हुई, भारत ने सबसे पहले इसका नेतृत्‍व करना चाहिए था। क्‍योंकि दुनिया में अधिकतम वर्ग यह है कि जो climate की चिंता औरों पर restriction की दिशा में करता रहता है, जबकि हम लोग सदियों से प्रकृति की रक्षा करते-करते जीवन विकास की यात्रा में आगे बढ़ने के पक्षकार रहे हैं। दुनिया जो आज climate के संकट से गुजर रही है, Global Warming के संकट से गुजर रही है, उसको अभी भी रास्‍ता नहीं मिल रहा है कि कैसे बचा जाए, क्‍योंकि वो बाहरी प्रयास कर रहे हैं। और मैंने कई बार कहा कि इन समस्‍या की जड़ में हम carbon emission को रोकने के लिए जो सारे नीति-नियम बना रहे हैं, विश्‍व के अंदर एक बंधनों की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन हम कोई अपनी Life Style बदलने के लिए तैयार नहीं है। समस्‍या की जड़ में मानवजात जो कि उपभोग की तरफ आगे बढ़ती चली गई है और जहां ज्‍यादा उपभोग की परंपरा है, वहां सबसे ज्‍यादा प्रकृति का नुकसान होता है, जहां पर उपभोग की प्रवृति कम है, वहां प्रकृति का शोषण भी कम होता है और इसलिए हम जब तक अपने life style के संबंध में focus नहीं करेंगे और दुनिया में इस एक बात को केंद्र बिंदु में नहीं लाएंगे हम शायद बाकी सारे प्रयासों के बावजूद भी, लेकिन यह जो बहुत आगे बढ़ चुके देश है, उनके गले उतारना जरा कठिन है। वो माने न माने हम तो इन्‍हीं बातों में पले-बढ़े लोग हैं। हमें फिर से अगर वो चीजें भूला दी गई है, तो हमें उस पर सोचना चाहिए। मैं उदाहरण के तौर पर कहता हूं आजकल दुनिया में Recycle की बडी चर्चा है और माना जाता है कि यह दुनिया में कोई नया विज्ञान आया है, नई व्‍यवस्‍था आई है। जरा हमारे यहां देखों Recycle, reuse और कम से कम उपयोग करने की हमारी प्रकृति कैसी रही है। पुराना जमाना की जरा अपने घर में दादी मां उनके जीवन को देखिए। घर में कपड़े अगर पुराने हो गए होंगे, तो उसमें से रात को बिछाने के लिए गद्दी बना देंगे। वो अब उपयोगी नहीं रही तो उसमें से भी झाडू-पौचे के लिए उस जगह का उपयोग करेंगे। यानी एक चीज को recycle कैसे करना घर में हर चीज का वो हमारे यहां सहज परंपरा थी। सहज प्रकृति थी।

मैंने देखा है गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन आम को भी इतना Recycle करते हैं, Reuse करते हैं शायद कोई बाहर सोच नहीं सकता है। कहने का तात्‍पर्य है कि कोई बाहर से borrow की हुई चीज नहीं है। लेकिन हमने दुनिया समझे उस terminology में उन चीजों को आग्रहपूर्वक रखा नहीं। विश्‍व के सामने हम अपनी बातों को ढंग से रख नहीं पाए। हमारे यहां पौधे में परमात्‍मा है। जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान के माध्‍यम से जब Laboratory में जब सिद्ध किया कि पौधे में जीव होता है, उसके बाद ही हमने जीव है ऐसा मानना तय किया, ऐसा नहीं है। हम सहस्‍त्रों वर्ष से गीता का उल्‍लेख करे, महाभारत का उल्‍लेख करे हमें तभी से मानते हुए आए हैं कि पौधे में परमात्‍मा होता है। और इसलिए पौधे की पूजा, पौधे की रक्षा यह सारी चीजें हमें परंपराओं से सिखाई गई थी। लेकिन काल क्रम में हमने ही अपने आप को कुछ और तरीके से रास्‍ते खोजने के प्रयास किए। कभी-कभी मुझे लगता है.. यहां urban secretaries बहुत बड़ी संख्‍या में है हम परंपरागत रूप से चीजों को कैसे कर सकते हैं। मैं जानता हूं मैं जो बातें बताऊंगा, ये जो so called अंग्रेजीयत वाले लोग हैं, वो उसका मजाक उड़ाएंगे 48 घंटे तक। बड़ा मजाक उड़ाएंगे, आपको भी बड़ा मनोरंजन मिलेगा टीवी पर, क्‍योंकि एक अलग सोच के लोग हैं। जैसे मैं आपको एक बात बताऊं। आपको मालूम होगा यहां से जिनका गांव के साथ जीवन रहा होगा। गांव में एक परंपरा हुआ करती थी कि जब full moon होता था, तो दादी मां बच्‍चों को चांदनी की रोशनी में सुई के अंदर धागा पिरोने के लिए प्रयास करते थे, क्‍यों eye sight तो थी, लेकिन उस चांदनी की रोशनी की अनुभूति कराते थे।

आज शायद नई पीढ़ी को पूछा जाए कि आपने चांदनी की रोशनी देखी है क्‍या? क्‍या पूर्णिमा की रात को बाहर निकले हो क्‍या? अब हम प्रकृति से इतने कट गए हैं।

अगर हमारी urban body यह तय करे, लोगों को विश्‍वास में लेकर के करें कि भई हम पूर्णिमा की रात को street light नहीं जलाएंगे। इतना ही नहीं उस दिन festival मनाएंगे पूरे शहर में, सब मोहल्‍ले में लोग स्‍पर्धा करेंगे, सुई में धागा डालने की। एक community event हो जाएगा, एक आनंद उत्‍सव हो जाएगा और पर्यावरण की रक्षा भी होगी। चीज छोटी होती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि सभी Urban Body में महीने में एक बार इस चांदनी रात का उपयोग करते हुए अगर street light बंद की जाए तो कितनी ऊर्जा बचेगी? कितनी ऊर्जा बचेगी तो कितना emission हम कम करेंगे? लेकिन यही चीज इस carbon emission के हिसाब से रखोगे, तो यह जो so called अपने आप को पढ़ा-लिखा मानता हैं, वो कहे वाह नया idea है, लेकिन वही चींज हमारी गांव की दादी मां कहती वो सुई और धागे की कथा कहकर के कहेंगे, अरे क्‍या यह पुराने लोग हैं इनको कोई समझ नहीं है, देश बदल चुका है। क्‍या यह हम हमारे युवा को प्रेरित कर सकते हैं कि भई Sunday हो, Sunday on cycle मान लीजिए, हो सकता है कोई यह भी कह दें कि मोदी अब cycle कपंनियों के agent बन गया हैं। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है देश का। पता नहीं कौन क्‍या हर चीज का अर्थ निकालता है। जरूरी नहीं कि हर कोई लोग cycle खरीदने जाए, तय करे कि भई मैं सप्‍ताह में एक दिन ऊर्जा से उपयोग में आने वाले साधनों का उपयोग में नहीं करूंगा। अपनी अनुकूलता है।

समाज मैं जो life style की बात करता हूं हम पर्यावरण की रक्षा में इतना बड़ा योगदान दें सकते हैं। सहज रूप से दे सकते हैं और थोड़ा सा प्रयास करना पड़ता है। एक शिक्षक के जीवन को मैं बराबर जानता हूं। मैं जब गुजरात में मुख्‍यमंत्री था तो उन पिछड़े इलाकों में चला जाता था, जून महीने में कि जहां पर girl child education बहुत कम हो। 40-44 डिग्री Temperature रहा करता था जून महीने में और मैं ऐसे गांव में जाकर तीन दिन रहता था। जब तक मैं मुख्‍यमंत्री रहा वो काम regularly करता था। एक बार मैं समुद्री तट के एक गांव में गया। एक भी पेड़ नहीं था, पूरे गावं में कहीं पर नहीं, लेकिन जो स्‍कूल था, वो घने जंगलों में जैसे कोई छोटी झोपड़ी वाली स्‍कूल हो, ऐसा माहौल था। तो मेरे लिए आश्‍चर्य था। मैंने कहा कि यार कहीं एक पेड़ नहीं दिखता, लेकिन स्‍कूल बड़ी green है, क्‍या कारण है। तो वहां एक teacher था, उस teacher का initiative इतना unique initiative था, उसने क्‍या किया – कहीं से भी bisleri की बोतल मिलती थी खाली, उठाकर ले आता था, पेट्रोल पम्‍प पर oil के जो टीन खाली होते थे वो उठाकर ले आता था और लाकर के students को एक-एक देता था, साफ करके खुद और उनको कहता था कि आपकी माताजी जो kitchen में बर्तन साफ करके kitchen का जो पानी होता है, वो पानी इस बोतल में भरकर के रोज जब स्‍कूल में आओगे तो साथ लेकर के आओ। और हमें भी हैरानी थी कि सारे बच्‍चे हाथ में यह गंदा दिखने वाला पानी भरकर के क्‍यों आते हैं। उसने हर बच्‍चे को पेड़ दे दिया था और कह दिया था कि इस बोतल से daily तुम्‍हें पानी डालना है। Fertilizer भी मिल जाता था। एक व्‍यक्ति के अभिरत प्रयास का परिणाम था कि वो पूरा स्‍कूल का campus एकदम से हरा-भरा था। कहना का तात्‍पर्य है कि इन चीजों के लिए समाज का जो सहज स्‍वभाव है, उन सहज स्‍वभाव को हम कितना ज्‍यादा प्रेरित कर सकते हैं, करना चाहिए।

मैं एक बार इस्राइल गया था, इस्राइल में रेगिस्‍तान में कम से कम बारिश, एक-एक बूंद पानी का कैसे उपयोग हो, पानी का recycle कैसे हो, समुद्री की पानी से कैसे sweet water बनाया जाए, इन सारे विषयों में काफी उन्‍होंने काम किया है। काफी प्रगति की है। इस्राइल तो इस समय एक अभी भी रेगिस्‍तान है जहां हरा-भरा होना बाकी है और एक है पूर्णतय: उन्‍होंने रेगिस्‍तान को हरा-भरा बना दिया है।

बेन गुरियन जो इस्राइल के राष्‍ट्रपिता के रूप में माने जाते हैं, तो मैं जब इस्राइल गया था तो मेरा मन कर गया कि उनका जो निवासा स्‍थान है वो मुझे देखना है, उनकी समाधि पर जाना है। तो मैंने वहां की सरकार को request की थी बहुत साल पहले की बात है। तो मैं गया, उनका घर उस रेगिस्‍तान वाले इलाके में ही था, वहीं रहते थे वो। और दो चीजें मेरे मन को छू गई – एक उनके bedroom में महात्‍मा गांधी की तस्‍वीर थी। वे सुबह उठते ही पहले उनको प्रणाम करते थे और दूसरी विशेषता यह थी कि उनकी जो समाधि थी, उन समाधि के पास एक टोकरी में पत्‍थर रखे हुए थे। सामान्‍य रूप से इतने बड़े महापुरूष के वहां जाएंगे तो मन करता है कि फूल रखें वहां, नमन करे। लेकिन चूंकि उनको green protection करना है, greenery की रक्षा करनी है। फूल-फल इसको नष्‍ट नहीं करना, यह संस्‍कार बढ़ाने के लिए बेन बुरियन की समाधि पर अगर आपको आदर करना है तो क्‍या करना होता था उस टोकरी में से एक पत्‍थर उठाना और पत्‍थर रखना और शाम को वो क्‍या करते थे सारे पत्‍थर इकट्ठे करके के फिर टोकरी में रख देते थे। अब देखिए environment की protection के लिए किस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को लोग विकसित करते हैं। हम अपने आपसे बाकी सारी बातों के साथ-साथ हम अपने जीवन में इन चीजों को कैसे लाए उसके आधार पर हम इसको बढ़ावा दे सकते हैं। हमारे स्‍कूलों में, इन सब में किस प्रकार से एक माहौल बनाया जाए प्रकृति रक्षा, प्रकृति पूजा, प्रकृति संरक्षण यह सहज मानव प्रकृति का हिस्‍सा कैसे बने, उस दिशा में हमको जाना होगा। और हम वो लोग है जिनका व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता। यही जिनके जीवन का आदर्श रहा है। जहां व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता का आदर्श रहा हो, वहां पर हमें प्रकृति का शोषण करने का अधिकार नहीं है। हमें प्रकृति का दोहन करने से अधिक प्रकृति को उपयोग, दुरूपयोग करने का हक नहीं मिलता है। दुनिया में प्रकृत‍ि का शोषण ही प्रवृति है, भारत में प्रकृति को दोहन एक संस्‍कार है। शोषण ही हमारी प्रवृति नहीं है और इसलिए विश्‍व इस संकट से जो गुजर रहा है, मैं अभी भी मानता हूं कि दुनिया को इस क्षेत्र में बचाने के लिए नेतृत्‍व भारत ने करना चाहिए। और उस दिमाग से भारत ने अपनी योजनाएं बनानी चाहिए। दुनिया climate change के लिए हमें guide करे और हम दुनिया को follow करें। दुनिया parameter तय करे और हम दुनिया को follow करे, ऐसा नहीं है। सचमुच में इस विषय में हमारी हजारों साल से वो विरासत है, हम विश्‍व का नेतृत्‍व कर सकते हैं, हम विश्‍व का मार्गदर्शन कर सकते हैं और विश्‍व को इस संकट से बचाने के लिए भारत रास्‍ता प्रशस्‍त कर सकता है। इस विश्‍वास के साथ इस conference से हम निकल सकते हैं। हम दुनिया की बहुत बड़ी सेवा करेंगे। उस विजन के साथ हम अपनी व्‍यवस्‍थाओं के प्रति जो भी समयानुकूल हम बदलाव लाना है, हम बदलाव लाए। जैसे अभी अब यह तो हम नहीं कहेंगे..

अच्‍छा, कुछ लोगों ने मान लिया कि पर्यावरण की रक्षा और विकास दोनों कोई आमने-सामने है। यह सोच मूलभूत गलत है। दोनों को साथ-साथ चलाया जा सकता है। दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ do’s and don’ts होते हैं, इसका पालन होना चाहिए। अगर वो पालन होता है तो हम उसकी रखवाली भी करते हैं और उसके लिए कोई चीजें, जैसे अभी हमने कोयले की खदानें उसकी नीलामी की, लेकिन उसके साथ-साथ उनसे जो पहले राशि ली जाती थी environment protection के लिए वो चार गुना बढ़ा दी, क्‍योंकि वो एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। आवश्‍यक है तो वो भी बदलाव किया। हमारी यह कोशिश रहनी चाहिए कि हम इस प्रकार से बदलाव लाने की दिशा में कैसे प्रयास करे और अगर हम प्रयास करते तो परिणाम मिल सकता है। दूसरी बात है, ज्‍यादातर भ्रम हमारे यहां बहुत फैलाया जाता है। अभी Land Acquisition Bill की चर्चा हुई है। इस Land Acquisition Bill में कहीं पर भी एक भी शब्‍द वनवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, आदिवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, Forest Land के संबंध में नहीं है। वो जमीन, उसके मालिक, Land Acquisition bill के दायरे में आते ही नहीं है, लेकिन उसके बावजूद भी जिनको इन सारी चीजों की समझ नहीं है। वो चौबीसों घंटे चलाते रहते हैं। पता ही नहीं उनको कहीं उल्‍लेख तक नहीं है। उनको भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं समझता हूं कि समाज का गुमराह करने का इस प्रकार का प्रयास आपके लिए कोई छोटी बात होगी, आपके राजनीतिक उसूल होंगे लेकिन उसके कारण देश को कितना नुकसान होता है और कृपा करके ऐसे भ्रम फैलाना बंद होना चाहिए, सच्‍चाई की धरा पर पूरी debate होनी चाहिए। उसमें पक्ष विपक्ष हो सकता है, उसमें कुछ बुरा नहीं है, लोकतंत्र है। लेकिन आप जो सत्‍य कहना चाहते हो, उसमें दम नहीं है, इसलिए झूठ कहते रहो। इससे देश नहीं चलता है और इसलिए मैं विशेष रूप से वन विभाग से जुड़े हुए मंत्री और अधिकारी यहां उपस्थित हैं तो विशेष रूप से इस बात का उल्‍लेख करना चाहता हूं कि Land Acquisition Act के अंदर कहीं पर जंगल की जमीन, आदिवासियों की जमीन उसका कोई संबंध नहीं है। उस दायरे में वो आता नहीं है, हम सबको मालूम है कि उसका एक अलग कानून है, वो अलग कानूनों से protected है। इस कानून का उसके साथ कोई संबंध नहीं है, लेकिन झूठ फैलाया जा रहा है और इसलिए मैं चाहूंगा कि कम से कम और ऐसे मित्रों से प्रार्थना करूंगा कि देशहित में कम से कम ऐसे झूठ को बढ़ावा देने में आप शिकार न हो जाएं यह मेरा आग्रह रहेगा।

आज यह भी यहां बताया गया कि Tiger की संख्‍या बढ़ी है। करीब 40% वृद्धि हुई है। अच्‍छा लगता है सुनकर के वरना दुनिया में Tiger की संख्‍या कम होती जा रही है और दो-तिहाई संख्‍या हमारे पास ही है तो एक हमारा बहुत बड़ा गौरव है और यह गौरव मानवीय संस्‍कृति का भी द्योतक होता है। इन दोनों को जोड़कर हमें इस चीज का गौरव करना चाहिए। और विश्‍व को इस बात का परिचय होना चाहिए कि हम किस प्रकार की मानवीय संस्‍कृतियों को लेकर के जीते हैं कि जहां पर इतनी तेज गति से tiger की जनसंख्‍या का विकास हो रहा है। हमारे पूरब के इलाके में खासकर के हाथी को लेकर के रोज नई खबरें आती है। हा‍थी को लेकर के परेशानियां आती है। अभी मैं कोई एक science magazine पढ़ रहा था। बड़ी interesting चीज मैंने पहली बार पढ़ी, आप लोग तो शायद उसके जानकारी होगी। जब खेत में हाथियों का झुंड आ जाता है, तो बड़ी परेशानी रहती कैसे निकालना है, यह forest department के लोग भांति-भांति के सशत्र लेकर पहुंच जाते हैं और दो-दो दिन तक हो हल्‍ला हो जाता है। मैंने एक science magazine पढ़ा, कहीं पर लोगों ने प्रयोग किया है बड़ा ही Interesting प्रयोग लगा मुझे। वे अपने खेत के बाढ़ पर या पैड है उस पर Honey Bee को भी Developed करते हैं मधुमक्‍खी को रखते हैं और जब हाथी के झुंड आते हैं तो मधुमक्‍खी एक Special प्रकार की आवाज करती है और हाथी भाग जाता है। अब ये चीजे जो हैं कहीं न कहीं सफल हुई हैं आज भी शायद हमारे यहां हो सकता है कुछ इलाकों में करते भी होंगे। हमें इस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को भी समझना होगा ताकि हमें हाथियों से संघर्ष करना पड़ सके। मानव और हाथी के बीच जो संघर्ष के जो समाचार आते हैं, उससे हम कैसे बचें। हम हाथी की भी देखभाल करें, अपने खेत की भी देखभाल कर सकें। अगर ऐसे सामान्‍य व्‍यवस्‍थाएं विकसित हो सकती है और अगर यह सत्‍य है तो मैंने कहीं पढ़ा था, लेकिन किसी प्रत्‍यक्ष मेरी किसान से बात हुई नहीं है लेकिन मैं कभी असम की तरफ जाऊंगा तो पूछूंगा सबसे बात करूंगा कि क्‍या है जानकारी लाने का प्रयास करूंगा मैं, लेकिन आपसे में उस दिशा में काम करने वाले जहां हाथी की जनसंख्‍या हैं और गांवों में कभी-कभी चली आती हैं तो उनके लिए शायद हो सकता है कि ये अगर इस प्रकार का प्रयोग हुआ हो तो यह काम आ सकता है। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि यह जगत सब समस्‍याओं से जुड़ा हुआ होगा हम ही पहली बार गुजर रहे हैं ऐसा थोड़ी है और हरेक ने अपने-अपने तरीके से उसके उपाय खोजे होंगे। उनको फिर से एक बार वैज्ञानिक तरीके से वैज्ञानिक तराजू से देखा जाए कि हम इन चीजों को कैसे फिर से एक बार प्रयोग में ला सकते हैं। थोड़ा उसे Modify करके उसे प्रयोग में ला सकते हैं। इन दिनों जब पर्यावरण की रक्षा की बात आती है, तो ज्‍यादातर कारखानें और ऊर्जा उसके आस-पास चर्चा रहती है। भारत उस अर्थ में ईश्‍वर की कृपा वाला राष्‍ट्र रहा है कि जिसके पास Maximum solar Radiation वाली संभावना वाला देश है। इसका हमें Maximum उपयोग कैसे करना है और इसलिए सरकार ने Initiative लिया है कि हम Solar Energy हम Wind Energy Biomass Energy उस पर कितना ज्‍यादा बल दें ताकि हम जो विश्‍व की चिंता है उसमें हम मशरूफ हों। लेकिन मजा देखिए, जो दुनिया Climate के लिए Lead करती है, दुनिया को पाठ पढ़ाती है अगर हम उनको कहें कि हम Nuclear Energy में आगे जाना चाहते हैं कि Nuclear Energy Environment protection का एक अच्‍छा रास्‍ता है और हम उनको जब कहते हैं कि Nuclear Energy के लिए आवश्‍यक Fuel दो तो मना कर देते हैं यानी हम दुनिया की इतनी बड़ी सेवा करना चाहते हैं लेकिन आप सेवा करों यह नियम पालन करो व‍ह नियम पालन करो। मैं दुनिया के सभी उस देशवासियों से यह निवेदन करना चाहूंगा कि भारत जैसा देश जिस प्रकार से नेतृत्‍व करने के लिए तैयार है Environment protection के लिए Civil Nuclear की तरफ हमारा बल है। हम Nuclear Energy पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, हम उसे करने के लिए तैयार हैं क्‍योंकि हमें पता है कि पर्यावरण की रक्षा में अच्‍छे सा अच्‍छा रास्‍तों में महत्‍वपूर्ण है। लेकिन वही लोग जो हमें Environment के लिए भाषण देते हैं वो Nuclear के लिए Fuel देने के लिए तैयार नहीं है। ये दो तराजू से दुनिया नहीं चल सकती है और इसलिए विश्‍व पर हमें भी यह दबाव पैदा करना पड़ेगा और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में यह दबाव दिखने वाला है, लोग अनुभव करेंगे हम Solar Energy की तरफ जा रहे हैं। Biomass की तरफ जा रहे हैं। लेकिन मैं Urban Bodies को कहना चाहूंगा अगर हम स्‍वच्‍छ भारत की चर्चा करें तो भी और अगर हम Environment की चर्चा करें तो भी। Waste Water & Solid waste Management की दिशा में हम लोंगों को आग्रहपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। Public Private Partnership Model को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। Solid Waste Management की ओर हमने पूरा ध्‍यान देना चाहिए। और आज Waste Wealth का एक सबसे बड़ा Business है। Waste में से Wealth create करना एक बहुत बड़ा Entrepreneurship शुरू हुआ है। हम अपने Urban Bodies में इसको कैसे जोड़े। Urban Bodies में Waste में से Wealth को create पैदा करने में स्‍पेशल फोकस करें। और आप देखिए कि बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। एक छोटा सा प्रयोग है मैं Urban Bodies से आग्रह करूंगा मान लीजिए हम हिंदुस्‍तान में पांच सौ शहर पकड़े, जहां एक लाख से ज्‍यादा आबादी है और वहां पर हम तय करें अब देखिए आज जो शहर का कूड़ा-कचरा फेंकने के लिए जो जगह जमीन की जो जरूरत है हजारों एकड़ भूमि की जरूरत पड़ेगी अगर ये कचरों के ढेर करने हैं तो अब गमिल लाओंगे कहां से और अब जमीन नहीं हैं तो क्‍या मतलब है कि कूड़ा-कचरा पड़ा रहेगा क्‍या और इसलिए हमारे लिए उस पर Process करना Recycle करना Waste Management करना यह अनिवार्य हो गया है। अब वैज्ञानिक के तरीके उपलब्‍ध हैं अगर हम Urban Body Waste Water Treatment करें और पानी को ठीक करके अगर किसानों को वापिस दे वरना एक समय ऐसा आएगा शहर और गांव के बीच संघर्ष होगा पानी के लिए। गांव कहेगा कि मैं शहर को पानी नहीं देने दूंगा और शहर बिना पानी मरेगा। लेकिन जो अगर शहर पानी प्रयोग करता है उसको Recycle करके गांव को वापस दे देता है खेतों में तो यह संघर्ष की नौबत नहीं आएगी और एक प्रकार से Treated Water होगा तो Fertilizer की दृष्टि से उपयोग इस प्रकार से पानी को इस प्रकार से बनाकर दिया जा सकता है। और Urban Body जो होता है उसके गांव जो होते हैं वो ज्‍यादातर सब्‍जी की खेती करते हैं और वही सब्‍जी उनके शहर के अंदर बिकने के लिए आती हैं रोजमर्रा की उनकी आजीविका उससे चलती है। हम इन्‍हीं को Solid Waste Management करके Solid Waste में से हम मानव Fertilizer बनाएं और वो Fertilizer हम उनको दें तो Organic सब्‍जी शहर में आएगी कि नहीं आएगी। इतनी बड़ी मात्रा में अगर हम Fertilizer देते हैं शहरों के कूड़े-कचरों से बनाया हुआ तो अच्‍छी Quality का विपुल मात्रा में सब्‍जी शहर में आएगी तो सस्‍ती सब्‍जी मिलेगी या नहीं मिलेगी? सस्‍ती सब्‍जी गरीब से गरीब व्‍यक्ति खाएगा तो Nutrition के Problem का Solution होगा कि नहीं होगा। Vegetable Sufficient खाएगा तो Health सेक्‍टर का बजट कम होगा कि नहीं होगा। एक प्रयास कितने ओर चीजों पर इफैक्‍ट कर सकता है इसका अगर हम एक Integrated approach करें तो हम हमारे गांवों को भी बचा सकते हैं हमारे शहरों को भी बचा सकते हैं। कभी-कभार अज्ञान का भी कारण होता है। हमारे यहां देखा है कि फसल होने के बाद अब जैसे Cotton है Cotton लेने के बाद बाकी जो है उसको जला देते हैं। लेकिन उसी को अगर टुकड़े कर करके खेत में डाल दें तो वहीं चीज Nutrition के रूप में काम आती है Fertilizer के रूप में काम आती है। मैंने एक प्रयोग देखा था केले की खेती हमारे यहां हो रही थी तब केला उतारे के बाद केला देने की क्षमता जब कम हो जाती है तो वो जो पेड़ का हिस्‍सा होता है उसके टुकड़े कर कर के उन्‍हें जमीन में डाले और मैंने अनुभव किया कि उसके अंदर इतना Water Content होता है केले के Waste Part में कि 90 दिन तक आपको फसल को पानी नहीं देना पड़ता है वो उसी में से फसल पानी ले लेती है। अब हम थोड़ा सा इनका प्रयोग चीजों को सीखें, समझें। इसको अगर Popular करें तो हम पानी को भी बचा सकते हैं, फसल को भी बचा सकते हैं। हम चीजों को किस प्रकार से और इसके लिए बहुत बड़ा आधुनिक से आधुनिक बड़ा विज्ञान की जरूरत होती है ऐसा नहीं है। सहज समझ का विषय होता है इनको हम जितना आगे बढ़ाएंगे हम इन चीजों को कर सकते हैं। Urban Body आग्रहपूर्वक Public Private Partnership Model उसमें Vibrating Gap funding का भी रास्‍ता निकल सकता है। आप जो इन Waste खेतों के किसानों को उसके कारण अगर Chemical Fertilizer का उपयोग कम होता है तो Chemical Fertilizer में से जो सब्सिडी बचेगी मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं वो सब्सिडी जो बचेगी वो Vibrating Gap Funding के लिए शहरों को दे देंगे, यानी आपके देश में से Wealth Create होगी और जो आप खाद्य तैयार करोगे वो खाद्य उपयोग करने के कारण Chemical Fertilizer की सब्सिडी बचेगी वो आपको मिलेगी। आप गैस पैदा करोगे, गैस दोगो तो जितनी मात्रा में गैसा पैदा करोगे जो गैस सिलेंडर की जो सब्सिडी है वो बचेगी तो वो सब्सिडी हम आपको Transfer करेंगे आपके Vibrating Gap Funding में काम आएगी। हम एक उसका Finance का Model कर सकते हैं, लेकिन भारत सरकार, राज्‍य सरकार और Local Self Government ये तीनों मिल करके हम Environment को Priority देते हुए हमारे नगरों को स्‍वच्‍छ रखते हुए, वहां के कूड़े-कचरे को Waste में Wealth Create करें और बहुत Entrepreneur मिले हैं। उनको हम कैसे प्रयोग में हम करें मैंने एक जगह देखा है जहां पर Waste में से ईंटे बना रहे हैं और इतनी बढि़या ईंटे मजबूत बन रही हैं कि बहुत काम आ रही है। आपने देखा होगा पहले जहां पर बिजली के थर्मल प्‍लांट हुआ करते थे वहां पर बाहर कोयले की Ash जो होता है उसके ढेर लगे रहते थे। आज Recycle और Chemical में से ईंटे बनने के कारण सीमेंट में उपयोग आने के कारण वो निकलते ही Contract हो जाता है और दो-दो साल का Contract और निकलते ही हम उठाएंगे यानी कि जो किसी पर्यावरण को बिगाड़ने के लिए संकट था वो ही आज Property में Convert हो गया है हम थोड़ा इस दिशा में प्रयास करें, initiative लें, हम इसमें काफी मदद कर सकते हैं और मेरा सबसे आग्रह है कि हम इन चीजों को बल मानते हुए आने वाले दिशों में दो दिन जब आप चर्चा करेंगे। गंगा की सफाई उसके साथ जुड़ा हुआ है गंगा के किनारे पर रहने वाले, गंगा किनारे के गांव और शहर मैं उन संबंधित राज्‍य सरकारों से आग्रह करूंगा इसमें कोई Comprise मत कीजिए। बैंकों से हम आग्रह करेंगे उनको हम कम दर से लोन दें। लेकिन Approved Plant उनमें वो लगाये जाएं Sewerage Treatment plant किये जाएं। एक बार हमने सफलतापूर्वक ढाई हजार किलोमीटर लम्‍बी गंगा के अंदर जाने वाले प्रदूषण को रोक लिया पूरे दुनिया के सामने और पूरे हिंदुस्‍तान के सामने एक नया विश्‍वास पैदा कर सकता है कि हम सामान्‍य अपने तौर तरीकों से पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं। यह विश्‍वास पैदा करने के लिए Model की तरह इस काम को खड़ा करना और ये एक बार काम खड़ा हो गया तो और काम अपने आप खड़े हो जाएंगे। एक विश्‍वास पैदा करने की आवश्‍यकता है और किया जा सकता है। एक बार हम किसी चीज को हाथ लगाएं पीछे लग जाएं परिणाम मिल सकता है और मैं चाहूंगा ज्‍यादातर इन पांच राज्‍यों से कि जो गंगा के किनारे की उनकी जिम्‍मेवारी है छह हजार के करीब गांव है, एक सौ 18000 किलोमीटर हैं कोई आठ सौ के करीब Industries हैं जो Pollution के लिए तैयार है इसको Target करते हुए एक बार गंगा के किनारे पर हम तय कर ले वहां से कोई भी दूषित पानी या कूड़ा-कचरा गंगा में जाने नहीं देंगे। आप देखिए अपने आप में बदलाव शुरू हो जाएगा। फिर तो गंगा की अपनी ताकत भी है खुद को साफ रखने की। और वो हमने आगे निकल जाएगी लेकिन हम तय करे कि हम गंदा नहीं करेंगे तो गंगा को साफ करने के लिए तो हमें गंदा नहीं करना पड़ेगा गंगा अपना खुद कर सकती है। लेकिन हम गंदा न करे इतना तो संकल्‍प करना पड़ेगा और उस काम को ले करके आप जब यहां पर बैठे है जो गंगा किनारे को जो इस विभाग के मंत्री हैं वो विशेष रूप से आधा-पौना घंटा बैठ करके उन चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जाए। विशेष रूप से चर्चा करें मेरा आग्रह रहेगा फिर एक बार मैं इस प्रयास का स्‍वागत करता हूं और मुझे विश्‍वास है कि इस सपने के साथ फिर एक बार मैं दोहराता हूं ये एक ऐसा विषय है जो हमारी बपौती है, हमारा डीएनए है। हमारे पूर्वजों ने इन मानव जाति की बहुत बड़ी सेवा की है। विश्‍व का नेतृत्‍व हमारे पास ही होना चाहिए Climate के मुद्दे पर ये मिजाज होना चाहिए। पूरे विश्‍व को हम दिखा सकते हैं कि यह हमारा विषय है। हमारी परंपरा है। दुनिया को हम सीखा सकते हैं इतनी ताकत के साथ हम यहां से निकले यही अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं धन्‍यवाद।

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चलता है' ही मनोवृत्ती सोडायची वेळ आता आली आहे. आता आपण 'बदल सकता है' असा विचार करायला हवा : पंतप्रधान मोदी

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चलता है' ही मनोवृत्ती सोडायची वेळ आता आली आहे. आता आपण 'बदल सकता है' असा विचार करायला हवा : पंतप्रधान मोदी
Indian economy picks up pace with GST collection of Rs 1.16 lakh crore in July

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सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पोलीस अकादमी येथील प्रशिक्षणार्थी आयपीएस अधिकाऱ्यांना पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी केलेले मार्गदर्शन
July 31, 2021
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तुम्ही भाग्यवान आहात, स्वातंत्र्यप्राप्तीच्या 75 व्या वर्षात सेवेत दाखल होत आहात, पुढील 25 वर्षे तुमच्यासाठी आणि भारतासाठी महत्त्वपूर्ण आहेत: पंतप्रधान
“ते‘ स्वराज्या’साठी लढले; तुम्हाला 'सु-राज्य' घडवायचे आहे": पंतप्रधान
तांत्रिक अडथळ्यांच्या या काळात पोलिसांना सज्ज ठेवण्याचे आव्हान आहे: पंतप्रधान
तुम्ही 'एक भारत -श्रेष्ठ भारत'चे ध्वजवाहक आहात, 'राष्ट्र प्रथम, नेहमीच प्रथम' या मंत्राला नेहमी प्राधान्य द्या : पंतप्रधान
सर्वांशी मैत्रीपूर्ण संबंध ठेवा आणि गणवेशाचा सर्वोच्च सन्मान राखा : पंतप्रधान
मी महिला अधिकाऱ्यांच्या उज्ज्वल नवीन पिढीचा साक्षीदार आहे, पोलिस दलात महिलांचा सहभाग वाढवण्यासाठी आम्ही प्रयत्न केले : पंतप्रधान
महामारीच्या काळात कर्तव्य बजावताना आपले प्राण गमावलेल्या पोलिस सेवेतल्या सदस्यांना श्रद्धांजली अर्पण केली
शेजारी देशांतील अधिकारी प्रशिक्षणार्थी आपल्या देशांमधील घनिष्ठ आणि दृढ संबंध अधोरेखित करतात: पंतप्रधान

आपल्या सर्वांशी संवाद साधून मला खूप छान वाटले. दरवर्षी माझा असा प्रयत्न असतो, की आपल्यासारख्या तरुण मित्रांशी संवाद साधावा, आपले विचार जाणून घ्यावे. आपण सांगितलेल्या गोष्टी आपले प्रश्न, आपली उत्सुकता, हे सगळे मला भविष्यातल्या आव्हानांचा सामना करण्यासाठी उपयुक्त ठरतात.

मित्रांनो,

यावेळी हा संवाद अशा काळात होतो आहे, जेव्हा भारत आपल्या स्वातंत्र्याला 75 वर्षे पूर्ण झाल्यानिमित्त त्याचा अमृतमहोत्सव साजरा करत आहे. या वर्षीची 15 ऑगस्ट ही तारीख, आपल्यासोबत स्वातंत्र्याचा 75 वा वाढदिवसही घेऊन येत आहे.गेल्या 75 वर्षात, भारताने एक उत्तम पोलिस सेवा व्यवस्था निर्माण करण्याचा प्रयत्न केला आहे. पोलीस प्रशिक्षणाशी  संबंधित पायाभूत सुविधांमध्ये देखील गेल्या काही वर्षात लक्षणीय सुधारणा झाल्या आहेत. आज जेव्हा मी आपल्याशी संवाद साधतो आहे, त्यावेळी, येत्या 25 वर्षांसाठी भारतात कायदा-सुव्यवस्था उत्तम राहील हे सुनिश्चित करण्यात सहभागी होणारे युवक मला दिसताहेत. ही एक मोठी जबाबदारी आहे. आणि म्हणूनच, आता तुम्हाला एक नवी सुरुवात, एक नवा संकल्प पूर्ण करण्याचे उद्दिष्ट डोळ्यांसमोर ठेवून भविष्याची वाटचाल करायची आहेत.

मित्रांनो.

मला कल्पना नाही, की आपल्यापैकी किती लोक दांडी इथे गेले आहात, किंवा किती लोकांनी साबरमती आश्रम पाहिला आहे. मात्र, मी आज आपल्याला 1930 च्या दांडी यात्रेचे स्मरण करुन देऊ इच्छितो. गांधीजींनी मीठाचा सत्याग्रह करुन, त्याआधारे , इंग्रज सरकारचा पाया हलवण्याचा इरादा व्यक्त केला होता. त्यांनी त्यावेळी हे देखील म्हटले होते, की “जेव्हा साधने न्याय्य आणि योग्य असतात, त्यावेळी देव देखील आपली मदत करायला आपल्यासोबत असतो.”

 

 

मित्रांनो,

एका छोट्याश्या जमावाला सोबत घेऊन महात्मा गांधी साबरमती आश्रमातून बाहेर पडले होते. एकेक दिवस जात होता आणि जे लोक जिथे होते, तिथूनच मीठाच्या सत्याग्रहात सहभागी होत होते. 24 दिवसांनी ज्यावेळी गांधीजी दांडीला पोहोचले. त्यावेळी संपूर्ण देश, एकप्रकारे हा देशच त्यांच्यासोबत उठून वाटचाल करत होता, काश्मीरपासून ते कन्याकुमारी, अटक पासून ते कटक पर्यंत. संपूर्ण हिंदुस्थानात एक चेतनामय वातावरण निर्माण झाले होते. त्यावेळेची मनोभावना लक्षात घ्या, संपूर्ण जनतेची एकवटलेली इच्छा शक्ति आठवा. याच प्रेरणेने, याच ऐक्यभावनेने भारताच्या स्वातंत्र्ययुद्धाला सामूहिक शक्तिने भारुन टाकले होते. आज देशाला, तुम्हा युवकांकडून परिवर्तनाची तीच भावना, संकल्प आणि  तिच इच्छाशक्ति अपेक्षित आहे. 1930 पासून 1947 पर्यंत, देशात जी चेतना, जी प्रेरणा होती, ज्या प्रकारे देशातील युवक एकत्र होऊन पुढे आले होते, एक लक्ष्य घेऊन, युवा पिढी एकजूट झाली होती, तीच मानसिकता, तीच दृढ इच्छाशक्ति आज आपल्यामध्ये देखील अपेक्षित आहे.

आपल्या सर्वाना याच भावनेने काम करावे लागेल. हाच संकल्प मनात घ्यावा लागेल. त्या काळात देशातले लोक, विशेषतः देशातील युवक, स्वराज्यासाठी लढत होते, आज आपल्याला सुराज्यासाठी अखंड मेहनत करायची आहे. त्या काळातील लोक स्वातंत्र्यासाठी बलिदान द्यायला तयार होते. आज आपल्याला देशासाठी जगण्याची भावना घेऊन पुढे जायचे आहे. 25 वर्षानी, जेव्हा भारताच्या स्वातंत्र्याला 100 वर्षे पूर्ण होतील, त्यावेळी आपली पोलीस सेवा कशी असेल, किती सशक्त असले, हे सगळे आपल्या आजच्या कार्यावर अवलंबून आहे. आपल्याला तो पाया रचायचा आहे, ज्यावर, 2047 च्या भव्य, शिस्तबद्ध भारताची इमारत बांधली जाईल.काळाने या संकल्पपूर्तीसाठी तुमची निवड केली आहे. आणि म्हणूनच मी हे तुम्हा सर्वांचे सौभाग्य मानतो. आपण सगळे अशा काळात आपल्या कारकीर्दीची सुरुवात करत आहात, जेव्हा भारत प्रत्येक क्षेत्रात, प्रत्येक टप्प्यावर परिवर्तनाच्या प्रक्रियेतून जातो आहे. आपल्या कारकीर्दीची येणारी 25 वर्षे भारताच्या विकासातील सर्वात महत्वाची 25 वर्षे ठरणार आहेत. म्हणूनच आपली तयारी, आपली मनोवस्था, याच मोठ्या उद्दिष्टासाठी अनुकूल असायला हवी. येत्या 25 वर्षात आपण सगळे देशातील वेगवेगळ्या भागात, वेगवेगळया पदांवर काम करणार आहात. वेगवेगळ्या भूमिका पार पडणार आहात.

आपल्या सर्वांवर एक आधुनिक, प्रभावी आणि संवेदनशील पोलीस सेवा व्यवस्था निर्माण करण्याची खूप मोठी जबाबदारी आहे आणि म्हणूनच, आपल्या सर्वाना हे नेहमीच लक्षात ठेवायचे आहे की तुम्ही पुढची 25 वर्षे एका विशेष अभियानासाठी कार्यरत आहात आणि भारताने या खास कामासाठी तुमची निवड केली आहे.

मित्रांनो.

जगभरातील अनुभव आपल्याला सांगतात की जेव्हा कोणतेही राष्ट्र विकासाच्या मार्गाने पुढे वाटचाल करत असते, त्यावेळी देशाबाहेर आणि देशाच्या आतही तेवढीच आव्हाने निर्माण होतात, अशावेळी, तंत्रज्ञानाच्या उलथापालथीच्या या जगात, पोलिसिंगसाठी  सदैव तयार असणे हे आपल्यासमोरचे मोठे आव्हान आहे. गुन्ह्यांच्या नवनवीन पद्धतींना त्यापेक्षाही अभिनव अशा पद्धती शोधून काढत,त्याला आळा घालणे, हे ही तुमच्यासमोरचे आव्हान आहे. विशेषत: सायबर सुरक्षेविषयीचे नवे प्रयोग, नवी संशोधने आणि नव्या पद्धती आपल्या विकसित देखील कराव्या लागतील आणि त्यांची अंमलबजावणी देखील करावी लागेल.

 

मित्रांनो,

देशाच्या संविधानाने, देशाच्या लोकशाहीने जे अधिकार देशबांधवांना दिले आहेत, जी कर्तव्ये पूर्ण करण्याची अपेक्षा केली आहे, त्या अधिकारांचे रक्षण आणि  कर्तव्याचे पालन होईल, हे सुनिश्चित करण्यात आपली भूमिका महत्वाची आहे. आणि म्हणूनच आपल्याकडून खूप अपेक्षा केल्या जातील, आपल्या आचरणाकडे कायम लक्ष दिले जाते. आपल्यावर अनेक दबाव देखील येतील, आपल्याला केवळ पोलिस ठाणे ते पोलिस मुख्यालय, एवढ्याच मर्यादेत विचार करायचा नाही. आपल्याला प्रत्येक भूमिका, प्रत्येक घटकांची पण ओळख असायला हवी . आपण त्यांच्याशी मित्रत्वाने वागायला हवे. आणि आपल्या गणवेशाची प्रतिष्ठा आणि मर्यादा नेहमी सर्वोच्च ठेवायच्या आहेत. आणखी एक गोष्ट आपल्याला कायम लक्षात ठेवायची आहे. आपल्या सेवा, देशातल्या वेगवगेळया जिल्ह्यात असणार आहेत, शहरांत असणार आहेत. म्हणूनच एक मंत्र आपल्याला कायम लक्षात ठेवायचा आहे. कार्यरत असतांना आपण जे काही निर्णय घ्याल, त्यात देशहिताचा विचार असायलाच हवा, राष्ट्रीय दृष्टिकोन असायला हवा. आपल्या कार्यक्षेत्राची व्याप्ती आणि समस्या कदाचित नेहमीच स्थानिक असतील. अशा स्थितीत, त्यांचा सामना करताना, हा मंत्र तुम्हाला खूप उपयोगी ठरेल. आपल्याला हे कायम लक्षात ठेवायचे आहे, की आपण एक भारत, श्रेष्ठ भारताचे ध्वजवाहक देखील आहात. त्यासाठी, आपली प्रत्येक कृती, प्रत्येक हालचालीमागे, राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम हीच भावना असायला हवी.

मित्रांनो,

मी  माझ्यासमोर, तेजस्वी महिला अधिकऱ्यांची नवी पिढी देखील बघतो आहे. गेल्या काही वर्षात, पोलिस दलात, मुलींचा सहभाग वाढवण्यासाठी सातत्याने प्रयत्न केले गेले. आमच्या या मुली , पोलिस दलात, कार्यक्षमता आणि उत्तरदायित्व या सोबतच, विनम्रता, सहजता आणि संवेदनशीलता अशी मूल्ये अधिक सशक्त करत आहेत. याचप्रमाणे, 10 लाख पेक्षा अधिक लोकसंख्या असलेल्या शहरांमध्ये आयुक्तालय सुरु करण्यासाठी देखील राज्ये काम करत आहेत. आतापर्यंत 16 राज्यांमधील अनेक शहरात ही व्यवस्था लागू करण्यात आली आहे. मला विश्वास आहे की इतर ठिकाणीई याबाबत सकारात्मक पावले उचलली जातील.

मित्रांनो,

पोलीस गस्त अत्याधुनिक आणि अधिक प्रभावी करण्यासाठी, सामूहिकता आणि संवेदनशीलतेसह कार्य करणे खूप महत्वाचे आहे. या कोरोना काळातही, पोलीस सहकाऱ्यांनी परिस्थिती हाताळण्यात कशी महत्वपूर्ण भूमिका बजावली आहे ते आपण बघितलेच आहे. कोरोनाविरूद्धच्या लढाईत आमच्या पोलिसांनी देशवासियांच्या खांद्याला खांदा लावून काम केले आहे. या प्रयत्नात अनेक पोलीस कर्मचाऱ्यांना आपल्या प्राणांची आहुती द्यावी लागली. मी या सर्व जवानांना, पोलिस साथीदारांना आदरपूर्वक श्रद्धांजली अर्पण करतो आणि देशाच्या वतीने मी त्यांच्या कुटुंबीयांप्रती सहवेदना व्यक्त करतो.

 

मित्रांनो,

आज तुमच्याशी बोलताना, मी तुमच्यासोबत आणखी एक बाजू मांडू इच्छितो. आजकाल, आपण पाहतो की जिथे जिथे नैसर्गिक आपत्ती येते, कुठे पूर, कुठे चक्रीवादळ तर कुठे दरड कोसळण्याच्या घटना तेव्हा आमचे एनडीआरएफ अर्थात राष्ट्रीय आपत्ती प्रतिसाद दलाचे सहकारी तिथे पूर्ण तत्परतेने हजर असतात. आपत्तीच्या वेळी एनडीआरएफ चे नाव ऐकल्यावर लोकांमध्ये एक विश्वास निर्माण होतो. ही विश्वासार्हता एनडीआरएफने त्याच्या उत्कृष्ट कार्याद्वारे निर्माण केली आहे. आज लोकांचा विश्वास आहे की एनडीआरएफचे जवान आपत्तीच्या वेळी स्वतःचे प्राण पणाला लावूनही त्यांचे रक्षण करतील. एनडीआरएफमध्ये सुद्धा, पोलीस दलातीलच जवान असतात जे आपलेच सहकारी असतात. पण हीच भावना, तोच आदर समाजातील पोलिसांबद्दल आहे का? NDRF मध्ये पोलीस आहेत. एनडीआरएफ विषयी आदर आहे. NDRF मध्ये काम करणाऱ्या पोलीस कर्मचाऱ्यांचाही आदर केला जातो. पण समाज व्यवस्था तशी आहे का? पण का? तुम्हालाही उत्तर माहीत आहे. जनतेच्या मनात पोलिसांबद्दल नकारात्मक धारणा तयार झाली आहे, जी स्वतःच एक मोठे आव्हान आहे. कोरोना कालावधीच्या सुरुवातीला असे वाटले की ही धारणा थोडी बदलली आहे. कारण जेव्हा लोक व्हिडिओ पाहत होते, समाज माध्यमांमध्ये बघत होते की पोलीस कशाप्रकारे गरीबांची सेवा करत आहेत. भुकेल्यांना जेवण देत आहेत. कधीकधी जेवण शिजवून ते गरिबांपर्यंत पोहोचवत आहेत तेव्हा पोलिसांकडे बघण्याचा, त्यांच्याविषयी विचार करण्याचा समाजाचा दृष्टिकोन बदलत होता. पण आता पुन्हा येरे माझ्या मागल्या अशी परिस्थिती निर्माण झाली आहे. शेवटी जनतेचा विश्वास का वाढत नाही, विश्वासार्हता का वाढत नाही?

मित्रांनो,

देशाच्या सुरक्षेसाठी, कायदा आणि सुव्यवस्था राखण्यासाठी, दहशत नष्ट करण्यासाठी, आमचे पोलीस साथीदार अगदी आपल्या प्राणांचे बलिदान देतात. आपण बरेच दिवस घरी जाऊ शकत नाही, सणांच्या वेळी देखील आपल्याला सहसा आपल्या कुटुंबापासून दूर राहावे लागते. पण जेव्हा पोलिसांच्या प्रतिमेची बाब येते तेव्हा लोकांची मानसिकता बदलते. ही प्रतिमा बदलण्याची जबाबदारी पोलिस खात्यात येणाऱ्या नव्या पिढीची आहे, पोलिसांप्रतीची  ही नकारात्मक धारणा संपली पाहिजे. तुम्हालाच हे करायचे आहे. तुमचे प्रशिक्षण, तुमची विचारसरणी यांच्या बरोबरीनेच वर्षानुवर्षे चालत आलेल्या पोलीस खात्याच्या प्रस्थापित परंपरेला तुम्हाला सामोरे जावे लागणारच आहे. यंत्रणा तुम्हाला बदलते कि तुम्ही यंत्रणेला बदलता, हे  तुमचे प्रशिक्षण, तुमची इच्छाशक्ती आणि तुमचे मनोबल यावर अवलंबून असते. तुमचे हेतू काय आहेत? आपण कोणत्या आदर्शांशी जोडलेले आहात? कोणता संकल्प घेऊन तुम्ही ते आदर्श पूर्ण करण्याच्या दिशेने वाटचाल करत आहात? हेच फक्त आपल्या वागण्याबद्दल महत्त्वाचे आहे. एक प्रकारे, ही तुमच्यासाठी आणखी एक परीक्षा असेल. आणि मला खात्री आहे, तुम्हीही यात यशस्वी व्हाल, नक्कीच तुम्ही यशस्वी व्हाल.

मित्रांनो,

इथे उपस्थित असलेल्या आपल्या शेजारील देशांच्या तरुण अधिकाऱ्यांना मी माझ्या खूप खूप शुभेच्छा देखील देऊ इच्छितो. भूतान असो, नेपाळ असो, मालदीव असो, मॉरिशस असो, आपण सर्वजण फक्त शेजारीच नाही तर आपल्या विचारसरणीत आणि सामाजिक जडणघडणीतही बरेच साम्य आहे. आपण सर्व सुख -दु: खाचे साथीदार आहोत. जेव्हा जेव्हा कोणतेही संकट येते, आपत्ती येते, तेव्हा सर्वप्रथम आपणच परस्परांची मदत करतो. कोरोनाच्या काळातही आपण हे अनुभवले आहे. म्हणूनच, येत्या काळात होणाऱ्या विकासामध्येही आमची भागीदारी वाढेल हे निश्चित आहे. विशेषतः आज जेव्हा गुन्हेगारी आणि गुन्हेगार सीमेपलीकडे असतात, तेव्हा परस्पर समन्वय अधिक महत्त्वाचा असतो. मला खात्री आहे की तुम्ही सरदार पटेल अकादमीमध्ये घालवलेले हे दिवस तुम्हाला तुमचे करिअर, तुमची राष्ट्रीय आणि सामाजिक बांधिलकी आणि भारताशी मैत्री अधिक दृढ करण्यास मदत करतील. पुन्हा एकदा तुम्हाला खूप खूप शुभेच्छा! धन्यवाद !