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भाईयों और बहनों,

आप सबका स्‍वागत है। दो दिन बड़ी विस्‍तार से चर्चा होने वाली है। इस मंथन में से कई महत्‍वपूर्ण बाते उभरकर के आएगी जो आगे चलकर के नीति या नियम का रूप ले सकती है और इसलिए हम जितना ज्‍यादा एक लम्‍बे विजन के साथ इन चर्चाओं में अपना योगदान देंगे तो यह दो दिवसीय सम्‍मेलन अधिक सार्थक होगा। इस विषय में कुछ बातें बताने का आज मन करता है मेरा। Climate के संबंध में या Environment के संबंध में प्रारंभ से कुछ हमारी गलत अभिव्‍यक्ति रही है और हम ऐसे जैसे अपनी बात को दुनिया के आगे प्रस्‍तुत किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे हमें न Climate की परवाह है न Environment की परवाह है। और सारी दुनिया हमारी इस अभिव्‍यक्ति की गलती के कारण यह मानकार के बैठी कि विश्‍व तो Environment conscious हो रहा है। विश्‍व climate की चिंता कर रहा है कि यह देश है जो कोई अडंगे डाल रहा है और इसका मूल कारण यह नहीं है कि हमने environment को बिगाड़ने में कोई अहम भूमिका निभाई है। climate को बर्बाद करने में हमारी या हमारे पूर्वजों की कोई भूमिका रही है। हकीकत तो उल्‍टी है। हम उस परंपरा में पले है, उन नीति, नियम और बंधनों में पले-बढ़े लोग हैं, जहां प्रकृति को परमेश्‍वर के रूप माना गया है, जहां पर प्रकृति की पूजा को सार्थक माना गया है और जहां पर प्रकृति की रक्षा को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ा गया है। लेकिन हम अपनी बात किसी न किसी कारण से, एक तो हम कई वर्षों से गुलाम रहे, सदियों से गुलाम रहने के कारण एक हमारी मानसिकता भी बनी हुई है कि अपनी बात दुनिया के सामने रखते हुए हम बहुत संकोच करते हैं। ऐसा लगता है कि यार कहीं यह आगे बढ़ा हुआ विश्‍व हम Third country के लोग। हमारी बात मजाक तो नहीं बन जाएगी। जब तक हमारे भीतर एक confidence नहीं आता है, शायद इस विषय पर हम ठीक से deal नहीं कर पाएंगे।

और मैं आज इस सभागृह में उपस्थित सभी महानुभावों से आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूं हम जितने प्रकृति के विषय में संवेदनशील है। दुनिया हमारे लिए सवालिया निशान खड़ा नहीं कर सकती है। आज भी प्रति व्‍यक्ति अगर carbon emission में contribution किसी का होगा तो कम से कम contribution वालों में हम है। लेकिन उसके बाद भी आवश्‍यकता यह थी कि विश्‍व में जब climate विषय में एक चिंता शुरू हुई, भारत ने सबसे पहले इसका नेतृत्‍व करना चाहिए था। क्‍योंकि दुनिया में अधिकतम वर्ग यह है कि जो climate की चिंता औरों पर restriction की दिशा में करता रहता है, जबकि हम लोग सदियों से प्रकृति की रक्षा करते-करते जीवन विकास की यात्रा में आगे बढ़ने के पक्षकार रहे हैं। दुनिया जो आज climate के संकट से गुजर रही है, Global Warming के संकट से गुजर रही है, उसको अभी भी रास्‍ता नहीं मिल रहा है कि कैसे बचा जाए, क्‍योंकि वो बाहरी प्रयास कर रहे हैं। और मैंने कई बार कहा कि इन समस्‍या की जड़ में हम carbon emission को रोकने के लिए जो सारे नीति-नियम बना रहे हैं, विश्‍व के अंदर एक बंधनों की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन हम कोई अपनी Life Style बदलने के लिए तैयार नहीं है। समस्‍या की जड़ में मानवजात जो कि उपभोग की तरफ आगे बढ़ती चली गई है और जहां ज्‍यादा उपभोग की परंपरा है, वहां सबसे ज्‍यादा प्रकृति का नुकसान होता है, जहां पर उपभोग की प्रवृति कम है, वहां प्रकृति का शोषण भी कम होता है और इसलिए हम जब तक अपने life style के संबंध में focus नहीं करेंगे और दुनिया में इस एक बात को केंद्र बिंदु में नहीं लाएंगे हम शायद बाकी सारे प्रयासों के बावजूद भी, लेकिन यह जो बहुत आगे बढ़ चुके देश है, उनके गले उतारना जरा कठिन है। वो माने न माने हम तो इन्‍हीं बातों में पले-बढ़े लोग हैं। हमें फिर से अगर वो चीजें भूला दी गई है, तो हमें उस पर सोचना चाहिए। मैं उदाहरण के तौर पर कहता हूं आजकल दुनिया में Recycle की बडी चर्चा है और माना जाता है कि यह दुनिया में कोई नया विज्ञान आया है, नई व्‍यवस्‍था आई है। जरा हमारे यहां देखों Recycle, reuse और कम से कम उपयोग करने की हमारी प्रकृति कैसी रही है। पुराना जमाना की जरा अपने घर में दादी मां उनके जीवन को देखिए। घर में कपड़े अगर पुराने हो गए होंगे, तो उसमें से रात को बिछाने के लिए गद्दी बना देंगे। वो अब उपयोगी नहीं रही तो उसमें से भी झाडू-पौचे के लिए उस जगह का उपयोग करेंगे। यानी एक चीज को recycle कैसे करना घर में हर चीज का वो हमारे यहां सहज परंपरा थी। सहज प्रकृति थी।

मैंने देखा है गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन आम को भी इतना Recycle करते हैं, Reuse करते हैं शायद कोई बाहर सोच नहीं सकता है। कहने का तात्‍पर्य है कि कोई बाहर से borrow की हुई चीज नहीं है। लेकिन हमने दुनिया समझे उस terminology में उन चीजों को आग्रहपूर्वक रखा नहीं। विश्‍व के सामने हम अपनी बातों को ढंग से रख नहीं पाए। हमारे यहां पौधे में परमात्‍मा है। जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान के माध्‍यम से जब Laboratory में जब सिद्ध किया कि पौधे में जीव होता है, उसके बाद ही हमने जीव है ऐसा मानना तय किया, ऐसा नहीं है। हम सहस्‍त्रों वर्ष से गीता का उल्‍लेख करे, महाभारत का उल्‍लेख करे हमें तभी से मानते हुए आए हैं कि पौधे में परमात्‍मा होता है। और इसलिए पौधे की पूजा, पौधे की रक्षा यह सारी चीजें हमें परंपराओं से सिखाई गई थी। लेकिन काल क्रम में हमने ही अपने आप को कुछ और तरीके से रास्‍ते खोजने के प्रयास किए। कभी-कभी मुझे लगता है.. यहां urban secretaries बहुत बड़ी संख्‍या में है हम परंपरागत रूप से चीजों को कैसे कर सकते हैं। मैं जानता हूं मैं जो बातें बताऊंगा, ये जो so called अंग्रेजीयत वाले लोग हैं, वो उसका मजाक उड़ाएंगे 48 घंटे तक। बड़ा मजाक उड़ाएंगे, आपको भी बड़ा मनोरंजन मिलेगा टीवी पर, क्‍योंकि एक अलग सोच के लोग हैं। जैसे मैं आपको एक बात बताऊं। आपको मालूम होगा यहां से जिनका गांव के साथ जीवन रहा होगा। गांव में एक परंपरा हुआ करती थी कि जब full moon होता था, तो दादी मां बच्‍चों को चांदनी की रोशनी में सुई के अंदर धागा पिरोने के लिए प्रयास करते थे, क्‍यों eye sight तो थी, लेकिन उस चांदनी की रोशनी की अनुभूति कराते थे।

आज शायद नई पीढ़ी को पूछा जाए कि आपने चांदनी की रोशनी देखी है क्‍या? क्‍या पूर्णिमा की रात को बाहर निकले हो क्‍या? अब हम प्रकृति से इतने कट गए हैं।

अगर हमारी urban body यह तय करे, लोगों को विश्‍वास में लेकर के करें कि भई हम पूर्णिमा की रात को street light नहीं जलाएंगे। इतना ही नहीं उस दिन festival मनाएंगे पूरे शहर में, सब मोहल्‍ले में लोग स्‍पर्धा करेंगे, सुई में धागा डालने की। एक community event हो जाएगा, एक आनंद उत्‍सव हो जाएगा और पर्यावरण की रक्षा भी होगी। चीज छोटी होती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि सभी Urban Body में महीने में एक बार इस चांदनी रात का उपयोग करते हुए अगर street light बंद की जाए तो कितनी ऊर्जा बचेगी? कितनी ऊर्जा बचेगी तो कितना emission हम कम करेंगे? लेकिन यही चीज इस carbon emission के हिसाब से रखोगे, तो यह जो so called अपने आप को पढ़ा-लिखा मानता हैं, वो कहे वाह नया idea है, लेकिन वही चींज हमारी गांव की दादी मां कहती वो सुई और धागे की कथा कहकर के कहेंगे, अरे क्‍या यह पुराने लोग हैं इनको कोई समझ नहीं है, देश बदल चुका है। क्‍या यह हम हमारे युवा को प्रेरित कर सकते हैं कि भई Sunday हो, Sunday on cycle मान लीजिए, हो सकता है कोई यह भी कह दें कि मोदी अब cycle कपंनियों के agent बन गया हैं। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है देश का। पता नहीं कौन क्‍या हर चीज का अर्थ निकालता है। जरूरी नहीं कि हर कोई लोग cycle खरीदने जाए, तय करे कि भई मैं सप्‍ताह में एक दिन ऊर्जा से उपयोग में आने वाले साधनों का उपयोग में नहीं करूंगा। अपनी अनुकूलता है।

समाज मैं जो life style की बात करता हूं हम पर्यावरण की रक्षा में इतना बड़ा योगदान दें सकते हैं। सहज रूप से दे सकते हैं और थोड़ा सा प्रयास करना पड़ता है। एक शिक्षक के जीवन को मैं बराबर जानता हूं। मैं जब गुजरात में मुख्‍यमंत्री था तो उन पिछड़े इलाकों में चला जाता था, जून महीने में कि जहां पर girl child education बहुत कम हो। 40-44 डिग्री Temperature रहा करता था जून महीने में और मैं ऐसे गांव में जाकर तीन दिन रहता था। जब तक मैं मुख्‍यमंत्री रहा वो काम regularly करता था। एक बार मैं समुद्री तट के एक गांव में गया। एक भी पेड़ नहीं था, पूरे गावं में कहीं पर नहीं, लेकिन जो स्‍कूल था, वो घने जंगलों में जैसे कोई छोटी झोपड़ी वाली स्‍कूल हो, ऐसा माहौल था। तो मेरे लिए आश्‍चर्य था। मैंने कहा कि यार कहीं एक पेड़ नहीं दिखता, लेकिन स्‍कूल बड़ी green है, क्‍या कारण है। तो वहां एक teacher था, उस teacher का initiative इतना unique initiative था, उसने क्‍या किया – कहीं से भी bisleri की बोतल मिलती थी खाली, उठाकर ले आता था, पेट्रोल पम्‍प पर oil के जो टीन खाली होते थे वो उठाकर ले आता था और लाकर के students को एक-एक देता था, साफ करके खुद और उनको कहता था कि आपकी माताजी जो kitchen में बर्तन साफ करके kitchen का जो पानी होता है, वो पानी इस बोतल में भरकर के रोज जब स्‍कूल में आओगे तो साथ लेकर के आओ। और हमें भी हैरानी थी कि सारे बच्‍चे हाथ में यह गंदा दिखने वाला पानी भरकर के क्‍यों आते हैं। उसने हर बच्‍चे को पेड़ दे दिया था और कह दिया था कि इस बोतल से daily तुम्‍हें पानी डालना है। Fertilizer भी मिल जाता था। एक व्‍यक्ति के अभिरत प्रयास का परिणाम था कि वो पूरा स्‍कूल का campus एकदम से हरा-भरा था। कहना का तात्‍पर्य है कि इन चीजों के लिए समाज का जो सहज स्‍वभाव है, उन सहज स्‍वभाव को हम कितना ज्‍यादा प्रेरित कर सकते हैं, करना चाहिए।

मैं एक बार इस्राइल गया था, इस्राइल में रेगिस्‍तान में कम से कम बारिश, एक-एक बूंद पानी का कैसे उपयोग हो, पानी का recycle कैसे हो, समुद्री की पानी से कैसे sweet water बनाया जाए, इन सारे विषयों में काफी उन्‍होंने काम किया है। काफी प्रगति की है। इस्राइल तो इस समय एक अभी भी रेगिस्‍तान है जहां हरा-भरा होना बाकी है और एक है पूर्णतय: उन्‍होंने रेगिस्‍तान को हरा-भरा बना दिया है।

बेन गुरियन जो इस्राइल के राष्‍ट्रपिता के रूप में माने जाते हैं, तो मैं जब इस्राइल गया था तो मेरा मन कर गया कि उनका जो निवासा स्‍थान है वो मुझे देखना है, उनकी समाधि पर जाना है। तो मैंने वहां की सरकार को request की थी बहुत साल पहले की बात है। तो मैं गया, उनका घर उस रेगिस्‍तान वाले इलाके में ही था, वहीं रहते थे वो। और दो चीजें मेरे मन को छू गई – एक उनके bedroom में महात्‍मा गांधी की तस्‍वीर थी। वे सुबह उठते ही पहले उनको प्रणाम करते थे और दूसरी विशेषता यह थी कि उनकी जो समाधि थी, उन समाधि के पास एक टोकरी में पत्‍थर रखे हुए थे। सामान्‍य रूप से इतने बड़े महापुरूष के वहां जाएंगे तो मन करता है कि फूल रखें वहां, नमन करे। लेकिन चूंकि उनको green protection करना है, greenery की रक्षा करनी है। फूल-फल इसको नष्‍ट नहीं करना, यह संस्‍कार बढ़ाने के लिए बेन बुरियन की समाधि पर अगर आपको आदर करना है तो क्‍या करना होता था उस टोकरी में से एक पत्‍थर उठाना और पत्‍थर रखना और शाम को वो क्‍या करते थे सारे पत्‍थर इकट्ठे करके के फिर टोकरी में रख देते थे। अब देखिए environment की protection के लिए किस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को लोग विकसित करते हैं। हम अपने आपसे बाकी सारी बातों के साथ-साथ हम अपने जीवन में इन चीजों को कैसे लाए उसके आधार पर हम इसको बढ़ावा दे सकते हैं। हमारे स्‍कूलों में, इन सब में किस प्रकार से एक माहौल बनाया जाए प्रकृति रक्षा, प्रकृति पूजा, प्रकृति संरक्षण यह सहज मानव प्रकृति का हिस्‍सा कैसे बने, उस दिशा में हमको जाना होगा। और हम वो लोग है जिनका व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता। यही जिनके जीवन का आदर्श रहा है। जहां व्‍येन तक्‍तेन मुंजिता का आदर्श रहा हो, वहां पर हमें प्रकृति का शोषण करने का अधिकार नहीं है। हमें प्रकृति का दोहन करने से अधिक प्रकृति को उपयोग, दुरूपयोग करने का हक नहीं मिलता है। दुनिया में प्रकृत‍ि का शोषण ही प्रवृति है, भारत में प्रकृति को दोहन एक संस्‍कार है। शोषण ही हमारी प्रवृति नहीं है और इसलिए विश्‍व इस संकट से जो गुजर रहा है, मैं अभी भी मानता हूं कि दुनिया को इस क्षेत्र में बचाने के लिए नेतृत्‍व भारत ने करना चाहिए। और उस दिमाग से भारत ने अपनी योजनाएं बनानी चाहिए। दुनिया climate change के लिए हमें guide करे और हम दुनिया को follow करें। दुनिया parameter तय करे और हम दुनिया को follow करे, ऐसा नहीं है। सचमुच में इस विषय में हमारी हजारों साल से वो विरासत है, हम विश्‍व का नेतृत्‍व कर सकते हैं, हम विश्‍व का मार्गदर्शन कर सकते हैं और विश्‍व को इस संकट से बचाने के लिए भारत रास्‍ता प्रशस्‍त कर सकता है। इस विश्‍वास के साथ इस conference से हम निकल सकते हैं। हम दुनिया की बहुत बड़ी सेवा करेंगे। उस विजन के साथ हम अपनी व्‍यवस्‍थाओं के प्रति जो भी समयानुकूल हम बदलाव लाना है, हम बदलाव लाए। जैसे अभी अब यह तो हम नहीं कहेंगे..

अच्‍छा, कुछ लोगों ने मान लिया कि पर्यावरण की रक्षा और विकास दोनों कोई आमने-सामने है। यह सोच मूलभूत गलत है। दोनों को साथ-साथ चलाया जा सकता है। दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ do’s and don’ts होते हैं, इसका पालन होना चाहिए। अगर वो पालन होता है तो हम उसकी रखवाली भी करते हैं और उसके लिए कोई चीजें, जैसे अभी हमने कोयले की खदानें उसकी नीलामी की, लेकिन उसके साथ-साथ उनसे जो पहले राशि ली जाती थी environment protection के लिए वो चार गुना बढ़ा दी, क्‍योंकि वो एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। आवश्‍यक है तो वो भी बदलाव किया। हमारी यह कोशिश रहनी चाहिए कि हम इस प्रकार से बदलाव लाने की दिशा में कैसे प्रयास करे और अगर हम प्रयास करते तो परिणाम मिल सकता है। दूसरी बात है, ज्‍यादातर भ्रम हमारे यहां बहुत फैलाया जाता है। अभी Land Acquisition Bill की चर्चा हुई है। इस Land Acquisition Bill में कहीं पर भी एक भी शब्‍द वनवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, आदिवासियों की जमीन के संबंध में नहीं है, Forest Land के संबंध में नहीं है। वो जमीन, उसके मालिक, Land Acquisition bill के दायरे में आते ही नहीं है, लेकिन उसके बावजूद भी जिनको इन सारी चीजों की समझ नहीं है। वो चौबीसों घंटे चलाते रहते हैं। पता ही नहीं उनको कहीं उल्‍लेख तक नहीं है। उनको भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं समझता हूं कि समाज का गुमराह करने का इस प्रकार का प्रयास आपके लिए कोई छोटी बात होगी, आपके राजनीतिक उसूल होंगे लेकिन उसके कारण देश को कितना नुकसान होता है और कृपा करके ऐसे भ्रम फैलाना बंद होना चाहिए, सच्‍चाई की धरा पर पूरी debate होनी चाहिए। उसमें पक्ष विपक्ष हो सकता है, उसमें कुछ बुरा नहीं है, लोकतंत्र है। लेकिन आप जो सत्‍य कहना चाहते हो, उसमें दम नहीं है, इसलिए झूठ कहते रहो। इससे देश नहीं चलता है और इसलिए मैं विशेष रूप से वन विभाग से जुड़े हुए मंत्री और अधिकारी यहां उपस्थित हैं तो विशेष रूप से इस बात का उल्‍लेख करना चाहता हूं कि Land Acquisition Act के अंदर कहीं पर जंगल की जमीन, आदिवासियों की जमीन उसका कोई संबंध नहीं है। उस दायरे में वो आता नहीं है, हम सबको मालूम है कि उसका एक अलग कानून है, वो अलग कानूनों से protected है। इस कानून का उसके साथ कोई संबंध नहीं है, लेकिन झूठ फैलाया जा रहा है और इसलिए मैं चाहूंगा कि कम से कम और ऐसे मित्रों से प्रार्थना करूंगा कि देशहित में कम से कम ऐसे झूठ को बढ़ावा देने में आप शिकार न हो जाएं यह मेरा आग्रह रहेगा।

आज यह भी यहां बताया गया कि Tiger की संख्‍या बढ़ी है। करीब 40% वृद्धि हुई है। अच्‍छा लगता है सुनकर के वरना दुनिया में Tiger की संख्‍या कम होती जा रही है और दो-तिहाई संख्‍या हमारे पास ही है तो एक हमारा बहुत बड़ा गौरव है और यह गौरव मानवीय संस्‍कृति का भी द्योतक होता है। इन दोनों को जोड़कर हमें इस चीज का गौरव करना चाहिए। और विश्‍व को इस बात का परिचय होना चाहिए कि हम किस प्रकार की मानवीय संस्‍कृतियों को लेकर के जीते हैं कि जहां पर इतनी तेज गति से tiger की जनसंख्‍या का विकास हो रहा है। हमारे पूरब के इलाके में खासकर के हाथी को लेकर के रोज नई खबरें आती है। हा‍थी को लेकर के परेशानियां आती है। अभी मैं कोई एक science magazine पढ़ रहा था। बड़ी interesting चीज मैंने पहली बार पढ़ी, आप लोग तो शायद उसके जानकारी होगी। जब खेत में हाथियों का झुंड आ जाता है, तो बड़ी परेशानी रहती कैसे निकालना है, यह forest department के लोग भांति-भांति के सशत्र लेकर पहुंच जाते हैं और दो-दो दिन तक हो हल्‍ला हो जाता है। मैंने एक science magazine पढ़ा, कहीं पर लोगों ने प्रयोग किया है बड़ा ही Interesting प्रयोग लगा मुझे। वे अपने खेत के बाढ़ पर या पैड है उस पर Honey Bee को भी Developed करते हैं मधुमक्‍खी को रखते हैं और जब हाथी के झुंड आते हैं तो मधुमक्‍खी एक Special प्रकार की आवाज करती है और हाथी भाग जाता है। अब ये चीजे जो हैं कहीं न कहीं सफल हुई हैं आज भी शायद हमारे यहां हो सकता है कुछ इलाकों में करते भी होंगे। हमें इस प्रकार की व्‍यवस्‍थाओं को भी समझना होगा ताकि हमें हाथियों से संघर्ष करना पड़ सके। मानव और हाथी के बीच जो संघर्ष के जो समाचार आते हैं, उससे हम कैसे बचें। हम हाथी की भी देखभाल करें, अपने खेत की भी देखभाल कर सकें। अगर ऐसे सामान्‍य व्‍यवस्‍थाएं विकसित हो सकती है और अगर यह सत्‍य है तो मैंने कहीं पढ़ा था, लेकिन किसी प्रत्‍यक्ष मेरी किसान से बात हुई नहीं है लेकिन मैं कभी असम की तरफ जाऊंगा तो पूछूंगा सबसे बात करूंगा कि क्‍या है जानकारी लाने का प्रयास करूंगा मैं, लेकिन आपसे में उस दिशा में काम करने वाले जहां हाथी की जनसंख्‍या हैं और गांवों में कभी-कभी चली आती हैं तो उनके लिए शायद हो सकता है कि ये अगर इस प्रकार का प्रयोग हुआ हो तो यह काम आ सकता है। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि यह जगत सब समस्‍याओं से जुड़ा हुआ होगा हम ही पहली बार गुजर रहे हैं ऐसा थोड़ी है और हरेक ने अपने-अपने तरीके से उसके उपाय खोजे होंगे। उनको फिर से एक बार वैज्ञानिक तरीके से वैज्ञानिक तराजू से देखा जाए कि हम इन चीजों को कैसे फिर से एक बार प्रयोग में ला सकते हैं। थोड़ा उसे Modify करके उसे प्रयोग में ला सकते हैं। इन दिनों जब पर्यावरण की रक्षा की बात आती है, तो ज्‍यादातर कारखानें और ऊर्जा उसके आस-पास चर्चा रहती है। भारत उस अर्थ में ईश्‍वर की कृपा वाला राष्‍ट्र रहा है कि जिसके पास Maximum solar Radiation वाली संभावना वाला देश है। इसका हमें Maximum उपयोग कैसे करना है और इसलिए सरकार ने Initiative लिया है कि हम Solar Energy हम Wind Energy Biomass Energy उस पर कितना ज्‍यादा बल दें ताकि हम जो विश्‍व की चिंता है उसमें हम मशरूफ हों। लेकिन मजा देखिए, जो दुनिया Climate के लिए Lead करती है, दुनिया को पाठ पढ़ाती है अगर हम उनको कहें कि हम Nuclear Energy में आगे जाना चाहते हैं कि Nuclear Energy Environment protection का एक अच्‍छा रास्‍ता है और हम उनको जब कहते हैं कि Nuclear Energy के लिए आवश्‍यक Fuel दो तो मना कर देते हैं यानी हम दुनिया की इतनी बड़ी सेवा करना चाहते हैं लेकिन आप सेवा करों यह नियम पालन करो व‍ह नियम पालन करो। मैं दुनिया के सभी उस देशवासियों से यह निवेदन करना चाहूंगा कि भारत जैसा देश जिस प्रकार से नेतृत्‍व करने के लिए तैयार है Environment protection के लिए Civil Nuclear की तरफ हमारा बल है। हम Nuclear Energy पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, हम उसे करने के लिए तैयार हैं क्‍योंकि हमें पता है कि पर्यावरण की रक्षा में अच्‍छे सा अच्‍छा रास्‍तों में महत्‍वपूर्ण है। लेकिन वही लोग जो हमें Environment के लिए भाषण देते हैं वो Nuclear के लिए Fuel देने के लिए तैयार नहीं है। ये दो तराजू से दुनिया नहीं चल सकती है और इसलिए विश्‍व पर हमें भी यह दबाव पैदा करना पड़ेगा और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में यह दबाव दिखने वाला है, लोग अनुभव करेंगे हम Solar Energy की तरफ जा रहे हैं। Biomass की तरफ जा रहे हैं। लेकिन मैं Urban Bodies को कहना चाहूंगा अगर हम स्‍वच्‍छ भारत की चर्चा करें तो भी और अगर हम Environment की चर्चा करें तो भी। Waste Water & Solid waste Management की दिशा में हम लोंगों को आग्रहपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। Public Private Partnership Model को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। Solid Waste Management की ओर हमने पूरा ध्‍यान देना चाहिए। और आज Waste Wealth का एक सबसे बड़ा Business है। Waste में से Wealth create करना एक बहुत बड़ा Entrepreneurship शुरू हुआ है। हम अपने Urban Bodies में इसको कैसे जोड़े। Urban Bodies में Waste में से Wealth को create पैदा करने में स्‍पेशल फोकस करें। और आप देखिए कि बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। एक छोटा सा प्रयोग है मैं Urban Bodies से आग्रह करूंगा मान लीजिए हम हिंदुस्‍तान में पांच सौ शहर पकड़े, जहां एक लाख से ज्‍यादा आबादी है और वहां पर हम तय करें अब देखिए आज जो शहर का कूड़ा-कचरा फेंकने के लिए जो जगह जमीन की जो जरूरत है हजारों एकड़ भूमि की जरूरत पड़ेगी अगर ये कचरों के ढेर करने हैं तो अब गमिल लाओंगे कहां से और अब जमीन नहीं हैं तो क्‍या मतलब है कि कूड़ा-कचरा पड़ा रहेगा क्‍या और इसलिए हमारे लिए उस पर Process करना Recycle करना Waste Management करना यह अनिवार्य हो गया है। अब वैज्ञानिक के तरीके उपलब्‍ध हैं अगर हम Urban Body Waste Water Treatment करें और पानी को ठीक करके अगर किसानों को वापिस दे वरना एक समय ऐसा आएगा शहर और गांव के बीच संघर्ष होगा पानी के लिए। गांव कहेगा कि मैं शहर को पानी नहीं देने दूंगा और शहर बिना पानी मरेगा। लेकिन जो अगर शहर पानी प्रयोग करता है उसको Recycle करके गांव को वापस दे देता है खेतों में तो यह संघर्ष की नौबत नहीं आएगी और एक प्रकार से Treated Water होगा तो Fertilizer की दृष्टि से उपयोग इस प्रकार से पानी को इस प्रकार से बनाकर दिया जा सकता है। और Urban Body जो होता है उसके गांव जो होते हैं वो ज्‍यादातर सब्‍जी की खेती करते हैं और वही सब्‍जी उनके शहर के अंदर बिकने के लिए आती हैं रोजमर्रा की उनकी आजीविका उससे चलती है। हम इन्‍हीं को Solid Waste Management करके Solid Waste में से हम मानव Fertilizer बनाएं और वो Fertilizer हम उनको दें तो Organic सब्‍जी शहर में आएगी कि नहीं आएगी। इतनी बड़ी मात्रा में अगर हम Fertilizer देते हैं शहरों के कूड़े-कचरों से बनाया हुआ तो अच्‍छी Quality का विपुल मात्रा में सब्‍जी शहर में आएगी तो सस्‍ती सब्‍जी मिलेगी या नहीं मिलेगी? सस्‍ती सब्‍जी गरीब से गरीब व्‍यक्ति खाएगा तो Nutrition के Problem का Solution होगा कि नहीं होगा। Vegetable Sufficient खाएगा तो Health सेक्‍टर का बजट कम होगा कि नहीं होगा। एक प्रयास कितने ओर चीजों पर इफैक्‍ट कर सकता है इसका अगर हम एक Integrated approach करें तो हम हमारे गांवों को भी बचा सकते हैं हमारे शहरों को भी बचा सकते हैं। कभी-कभार अज्ञान का भी कारण होता है। हमारे यहां देखा है कि फसल होने के बाद अब जैसे Cotton है Cotton लेने के बाद बाकी जो है उसको जला देते हैं। लेकिन उसी को अगर टुकड़े कर करके खेत में डाल दें तो वहीं चीज Nutrition के रूप में काम आती है Fertilizer के रूप में काम आती है। मैंने एक प्रयोग देखा था केले की खेती हमारे यहां हो रही थी तब केला उतारे के बाद केला देने की क्षमता जब कम हो जाती है तो वो जो पेड़ का हिस्‍सा होता है उसके टुकड़े कर कर के उन्‍हें जमीन में डाले और मैंने अनुभव किया कि उसके अंदर इतना Water Content होता है केले के Waste Part में कि 90 दिन तक आपको फसल को पानी नहीं देना पड़ता है वो उसी में से फसल पानी ले लेती है। अब हम थोड़ा सा इनका प्रयोग चीजों को सीखें, समझें। इसको अगर Popular करें तो हम पानी को भी बचा सकते हैं, फसल को भी बचा सकते हैं। हम चीजों को किस प्रकार से और इसके लिए बहुत बड़ा आधुनिक से आधुनिक बड़ा विज्ञान की जरूरत होती है ऐसा नहीं है। सहज समझ का विषय होता है इनको हम जितना आगे बढ़ाएंगे हम इन चीजों को कर सकते हैं। Urban Body आग्रहपूर्वक Public Private Partnership Model उसमें Vibrating Gap funding का भी रास्‍ता निकल सकता है। आप जो इन Waste खेतों के किसानों को उसके कारण अगर Chemical Fertilizer का उपयोग कम होता है तो Chemical Fertilizer में से जो सब्सिडी बचेगी मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं वो सब्सिडी जो बचेगी वो Vibrating Gap Funding के लिए शहरों को दे देंगे, यानी आपके देश में से Wealth Create होगी और जो आप खाद्य तैयार करोगे वो खाद्य उपयोग करने के कारण Chemical Fertilizer की सब्सिडी बचेगी वो आपको मिलेगी। आप गैस पैदा करोगे, गैस दोगो तो जितनी मात्रा में गैसा पैदा करोगे जो गैस सिलेंडर की जो सब्सिडी है वो बचेगी तो वो सब्सिडी हम आपको Transfer करेंगे आपके Vibrating Gap Funding में काम आएगी। हम एक उसका Finance का Model कर सकते हैं, लेकिन भारत सरकार, राज्‍य सरकार और Local Self Government ये तीनों मिल करके हम Environment को Priority देते हुए हमारे नगरों को स्‍वच्‍छ रखते हुए, वहां के कूड़े-कचरे को Waste में Wealth Create करें और बहुत Entrepreneur मिले हैं। उनको हम कैसे प्रयोग में हम करें मैंने एक जगह देखा है जहां पर Waste में से ईंटे बना रहे हैं और इतनी बढि़या ईंटे मजबूत बन रही हैं कि बहुत काम आ रही है। आपने देखा होगा पहले जहां पर बिजली के थर्मल प्‍लांट हुआ करते थे वहां पर बाहर कोयले की Ash जो होता है उसके ढेर लगे रहते थे। आज Recycle और Chemical में से ईंटे बनने के कारण सीमेंट में उपयोग आने के कारण वो निकलते ही Contract हो जाता है और दो-दो साल का Contract और निकलते ही हम उठाएंगे यानी कि जो किसी पर्यावरण को बिगाड़ने के लिए संकट था वो ही आज Property में Convert हो गया है हम थोड़ा इस दिशा में प्रयास करें, initiative लें, हम इसमें काफी मदद कर सकते हैं और मेरा सबसे आग्रह है कि हम इन चीजों को बल मानते हुए आने वाले दिशों में दो दिन जब आप चर्चा करेंगे। गंगा की सफाई उसके साथ जुड़ा हुआ है गंगा के किनारे पर रहने वाले, गंगा किनारे के गांव और शहर मैं उन संबंधित राज्‍य सरकारों से आग्रह करूंगा इसमें कोई Comprise मत कीजिए। बैंकों से हम आग्रह करेंगे उनको हम कम दर से लोन दें। लेकिन Approved Plant उनमें वो लगाये जाएं Sewerage Treatment plant किये जाएं। एक बार हमने सफलतापूर्वक ढाई हजार किलोमीटर लम्‍बी गंगा के अंदर जाने वाले प्रदूषण को रोक लिया पूरे दुनिया के सामने और पूरे हिंदुस्‍तान के सामने एक नया विश्‍वास पैदा कर सकता है कि हम सामान्‍य अपने तौर तरीकों से पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं। यह विश्‍वास पैदा करने के लिए Model की तरह इस काम को खड़ा करना और ये एक बार काम खड़ा हो गया तो और काम अपने आप खड़े हो जाएंगे। एक विश्‍वास पैदा करने की आवश्‍यकता है और किया जा सकता है। एक बार हम किसी चीज को हाथ लगाएं पीछे लग जाएं परिणाम मिल सकता है और मैं चाहूंगा ज्‍यादातर इन पांच राज्‍यों से कि जो गंगा के किनारे की उनकी जिम्‍मेवारी है छह हजार के करीब गांव है, एक सौ 18000 किलोमीटर हैं कोई आठ सौ के करीब Industries हैं जो Pollution के लिए तैयार है इसको Target करते हुए एक बार गंगा के किनारे पर हम तय कर ले वहां से कोई भी दूषित पानी या कूड़ा-कचरा गंगा में जाने नहीं देंगे। आप देखिए अपने आप में बदलाव शुरू हो जाएगा। फिर तो गंगा की अपनी ताकत भी है खुद को साफ रखने की। और वो हमने आगे निकल जाएगी लेकिन हम तय करे कि हम गंदा नहीं करेंगे तो गंगा को साफ करने के लिए तो हमें गंदा नहीं करना पड़ेगा गंगा अपना खुद कर सकती है। लेकिन हम गंदा न करे इतना तो संकल्‍प करना पड़ेगा और उस काम को ले करके आप जब यहां पर बैठे है जो गंगा किनारे को जो इस विभाग के मंत्री हैं वो विशेष रूप से आधा-पौना घंटा बैठ करके उन चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जाए। विशेष रूप से चर्चा करें मेरा आग्रह रहेगा फिर एक बार मैं इस प्रयास का स्‍वागत करता हूं और मुझे विश्‍वास है कि इस सपने के साथ फिर एक बार मैं दोहराता हूं ये एक ऐसा विषय है जो हमारी बपौती है, हमारा डीएनए है। हमारे पूर्वजों ने इन मानव जाति की बहुत बड़ी सेवा की है। विश्‍व का नेतृत्‍व हमारे पास ही होना चाहिए Climate के मुद्दे पर ये मिजाज होना चाहिए। पूरे विश्‍व को हम दिखा सकते हैं कि यह हमारा विषय है। हमारी परंपरा है। दुनिया को हम सीखा सकते हैं इतनी ताकत के साथ हम यहां से निकले यही अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं धन्‍यवाद।

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‘ચલતા હૈ’ નું વલણ છોડી દઈને ‘બદલ સકતા હૈ’ વિચારવાનો સમય પાકી ગયો છે: વડાપ્રધાન મોદી

લોકપ્રિય ભાષણો

‘ચલતા હૈ’ નું વલણ છોડી દઈને ‘બદલ સકતા હૈ’ વિચારવાનો સમય પાકી ગયો છે: વડાપ્રધાન મોદી
Big dip in terrorist incidents in Jammu and Kashmir in last two years, says government

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રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિ 2020ના એક વર્ષ પૂર્ણ થવા પર પ્રધાનમંત્રીના પ્રવચનનો મૂળપાઠ
July 29, 2021
શેર
 
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આ અવસરે બહુવિધ મહત્વની પહેલ શરૂ કરી
રાષ્ટ્રીય વિકાસના ‘મહાયજ્ઞ’માં એનઈપી બહુ મોટું પરિબળ: પ્રધાનમંત્રી
નવી શિક્ષણ નીતિ આપણા યુવાઓને ખાતરી આપે છે કે દેશ સંપૂર્ણપણે એમની અને એમની આકાંક્ષાઓની સાથે છે: પ્રધાનમંત્રી
નિખાલસતા અને દબાણની ગેરહાજરી નવી શિક્ષણ નીતિની મહત્વની વિશેષતાઓ: પ્રધાનમંત્રી
8 રાજ્યોમાં 14 ઇજનેરી કૉલેજો 5 ભારતીય ભાષાઓમાં શિક્ષણ આપવાનું શરૂ કરી રહી છે: પ્રધાનમંત્રી
સૂચનાના માધ્યમ તરીકે માતૃભાષા ગરીબ, ગ્રામીણ અને આદિવાસી પૃષ્ઠભૂમિના વિદ્યાર્થીઓમાં આત્મવિશ્વાસ રેડશે: પ્રધાનમંત્રી

રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિ 2020ના એક વર્ષ પૂર્ણ થવા પર પ્રધાનમંત્રીના પ્રવચનનો મૂળપાઠ
 

નમસ્કાર, કાર્યક્રમમાં મારી સાથે જોડાઈ રહેલા કેબિનેટના મારા સાથી સહયોગીગણ, રાજ્યોના માનનીય રાજ્યપાલ, તમામ સન્માનિત મુખ્યમંત્રીઓ, નાયબ મુખ્યમંત્રીઓ, રાજય સરકારના મંત્રીગણ, ઉપસ્થિત શિક્ષણવિદો, અધ્યાપકગણ, તમામ અભિભાવક અને મારા પ્રિય યુવાન સાથીઓ.


નવી રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિને એક વર્ષ પૂર્ણ થવા બદલ તમામ દેશવાસીઓ તથા ખાસ કરીને તમામ વિદ્યાર્થીઓને ખૂબ ખૂબ શુભેચ્છાઓ. છેલ્લા એક વર્ષમાં દેશના આપ તમામ મહાનુભાવો, શિક્ષકો, મુખ્ય આચાર્યો, નીતિકારોએ રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિનો અમલ કરવામાં ઘણી મહેનત કરી છે. કોરોનાના આ કાળમાં લાખો નાગરિકોથી, શિક્ષકો, રાજ્યો, સ્વાયત્ત સંસ્થાઓના સૂચનોથી લઈને ટાસ્ક ફોર્સની રચના કરીને નવી શિક્ષણ નીતિને ચરણબદ્ધ રીતે લાગુ કરવામાં આવી રહી છે. છેલ્લા એક વર્ષમાં રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિને આધાર બનાવીને ઘણા મોટા નિર્ણયો લેવામાં આવ્યા છે. આજે આ જ કડીમાં મને ઘણી બધી નવી યોજનાઓ, નવી પહેલનો પ્રારંભ કરવાનું સૌભાગ્ય પ્રાપ્ત થયું છે.

 

સાથીઓ,

આ મહત્વપૂર્ણ અવસર એવા સમયે આવ્યો છે જ્યારે દેશ તેની સ્વતંત્રતાના 75 વર્ષના અમૃત મહોત્સવની ઉજવણી કરી રહ્યો છે. આજથી થોડા દિવસ બાદ 15મી ઓગસ્ટે આપણે સ્વતંત્રતાના 75મા વર્ષમાં પ્રવેશ કરવા જઈ રહ્યા છીએ. એક રીતે નવી રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિનું અમલીકરણ આઝાદીના અમૃત મહોત્સવની ઉજવણીનો મહત્વનો હિસ્સો બની ગયો છે. આવડા મોટા મહાપર્વ વચ્ચે રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિ હેઠળ આજે શરૂ થયેલી યોજનાઓ નવા ભારતના નિર્માણમાં ઘણી મોટી ભૂમિકા અદા કરશે. ભારતના જે સોનેરી ભવિષ્યના સંકલ્પ સાથે આજે આપણે સ્વતંત્રતાનો અમૃત મહોત્સવ ઉજવી રહ્યા છીએ તે ભવિષ્ય તરફ આપણને આજની નવી પેઢી જ લઈ જશે. ભવિષ્યમાં આપણે જેટલા આગળ ધપીશું, જેટલી ઉંચાઈ પ્રાપ્ત કરીશું તે એ બાબત પર નિર્ભર કરશે કે આપણે આપણા યુવાનોને વર્તમાનમાં એટલે કે આજે કેવું શિક્ષણ પ્રદાન કરી રહ્યા છીએ, કેવી દિશાનું સિંચન કરી રહ્યા છીએ. આથી જ હું માનું છું કે ભારતની નવી રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિ રાષ્ટ્રના નિર્માણના મહાયજ્ઞમાં મોટા પાસા પૈકીનું એક છે. અને તેથી, દેશે આ શિક્ષણ નીતિને એટલી આધુનિક બનાવી છે એટલું જ ભાવિ તૈયાર રાખ્યું છે. આજે આ કાર્યક્રમમાં સંકળાયેલા મોટા ભાગના મહાનુભાવો, નવી રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિની બારીકાઈઓથી પરિચિત છે પરંતુ આ કેટલું મોટું મિશન છે તેનો અનુભવ આપણે વારંવાર યાદ કરવાનો છે.


સાથીઓ,

દેશભરમાં આપણા ઘણા યુવાન વિદ્યાર્થીઓ આ કાર્યક્રમમાં આપણી સાથે છે. જો આ સાથીઓ પાસેથી આપણે તેમની આકાંક્ષાઓ અંગે, તેમના સપનાઓ વિશે પૂછીએ તો તમે જોશો કે દરેક યુવાનના મનમાં એક નવીનતા છે, એક નવી ઉર્જા છે. આપણો યુવાન પરિવર્તન માટે સંપૂર્ણ રીતે સજ્જ છે. તે રાહ જોવા માગતો નથી. આપણે તમામ જોયું છે કે કોરોનાકાળમાં આપણી શિક્ષણ વ્યવસ્થા સામે કેવડો મોટો પડકાર આવ્યો હતો. વિદ્યાર્થીઓના અભ્યાસની સ્ટાઇલ અને જીવનશૈલી બદલાઈ ગઈ પરંતુ દેશના વિદ્યાર્થીએ ઝડપથી આ પરિવર્તનને સ્વિકારી લીધું. ઓનલાઇન અભ્યાસ હવે એક સરળ માધ્યમ બની રહ્યું છે. શિક્ષણ મંત્રાલયે પણ તેના માટે ઘણા પ્રયાસ કર્યા છે. મંત્રાલયે દીક્ષા પ્લેટફોર્મ શરૂ કર્યું, સ્વયં પોર્ટલ પર અભ્યાસક્રમ શરૂ કર્યા અને આપણા વિદ્યાર્થીઓ જોશભેર તેનો હિસ્સો બની ગયા. દિક્ષા પોર્ટલ પર મને કહેવામાં આવ્યું છે કે છેલ્લા એક વર્ષમાં 2300 કરોડથી વઘારે હિટ મળી છે જે પુરવાર કરે છે કે તે કેટલો ઉપયોગી પ્રયાસ છે. આજે પણ તેમાં દરરોજની પાંચ કરોડ હિટ મળે છે. સાથીઓ, 21મી સદીનો આજનો યુવાન પોતાની વ્યવસ્થા, પોતાની દુનિયા પોતાની રીતે જ બનાવવા માગે છે. આથી જ તેને એક્સપોઝર જોઈએ, તેને પુરાણા બંધનો, પાંજરામાંથી મુક્તિ જોઇએ છે. તમે જૂઓ કે આજે નાના નાના ગામડા, કસ્બામાંથી નીકળેલો યુવાન કેવી કેવી કમાલ કરી રહ્યો છે. આ જ અંતરિયાળ વિસ્તારો અને સામાન્ય પરિવારમાંથી આવનારો યુવાન આજે ટોક્યો ઓલિમ્પિક્સમાં દેશનો ધ્વજ લહેરાવી રહ્યો છે, ભારતની નવી ઓળખ આપી રહ્યો છે. આવા જ કરોડો યુવાનો આજે અલગ અલગ ક્ષેત્રમાં અસામાન્ય કાર્ય કરી રહ્યા છે, અસાધારણ લક્ષ્યાંકોનો પાયો રચી રહ્યા છે. કોઈ કલા અને સંસ્કૃતિના ક્ષેત્રમાં પુરાતન અને આધુનિક મિશ્રણ દ્વારા નવી વિદ્યાને જન્મ આપી રહ્યા છે, કોઈ રોબોટિક્સના ક્ષેત્રમાં એક સમયે સાઇ-ફાઇ માનવામાં આવતી કલ્પનાઓને હકીકતમાં બદલી રહ્યા છે. કોઈ આર્ટિફિશિયલ ઇન્ટેલિજન્સના ક્ષેત્રમાં માનવીય ક્ષમતાઓને નવી ઉંચાઈ પ્રદાન કરી રહ્યા છે તો કોઈ મશીન લર્નિંગમાં નવા સિમાચિહ્નની તૈયારી કરી રહ્યા છે. ટૂંકમાં તમામ ક્ષેત્રમાં ભારતનો યુવાન ઝંડો લહેરાવવા માટે આગળ ધપી રહ્યો છે. આ જ યુવાન ભારતમાં સ્ટાર્ટ અપ ઇકો સિસ્ટમની ક્રાંતિ લાવી રહ્યો છે, ઇન્ડસ્ટ્રી 4.0માં ભારતના નેતૃત્વને તૈયાર કરી રહ્યો છે અને ડિજિટલ ઇન્ડિયાને નવો વેગ આપી રહ્યો છે. તમે કલ્પના કરો કે આ યુવાન પેઢીને જયારે તેમના સપનાને અનુરૂપ વાતાવરણ મળશે તો તેની તાકાત કેટલી વધી જશે. અને તેથી જ નવી રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિ યુવાનોને ભરોસો અપાવે છે કે દેશ હવે સંપૂર્ણપણે તેમની સાથે છે. તેમના ઉત્સાહની સાથે છે. જે આર્ટિફિશિયલ ઇન્ટેલિજન્સ પ્રોગ્રામને તાજેતરમાં લોંચ કરવામાં આવ્યો છે તે આપણા યુવાનોને ભવિષ્યલક્ષી બનાવશે, AI ડ્રિવન ઇકોનોમીનો માર્ગ ખોલશે. શિક્ષણમાં આ ડિજિટલ ક્રાંતિ, સમગ્ર દેશમાં એક સાથે આવે, ગામડા અને શહેરને સમાન ડિજિટલ લર્નિંગથી સાંકળે તેનું પણ ખાસ ધ્યાન રાખવામાં આવ્યું છે.  નેશનલ ડિજિટલ એજ્યુકેશન આર્કિટેક્ચર એટલે કે એનડીઈએઆર અને નેશનલ એજ્યુકેશન ટેકનોલોજી ફોરમ એનઇએફટી આ દિશામાં સમગ્ર દેશમાં ડિજિટલ અને ટેકનોલોજી ફ્રેમવર્ક ઉપલબ્ધ કરાવવામાં મહત્વની ભૂમિકા અદા કરશે. યુવાન મન જે દિશામાં વિચારવા માગે,ખુલ્લા આકાશમાં ઉડવા માગે, દેશની નવી શિક્ષણ વ્યવસ્થા તેને એવી જ તક ઉપલબ્ધ કરાવશે.

 

સાથીઓ,

છેલ્લા એક વર્ષમાં તમે બધાએ અનુભવ્યું હશે કે રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિને કેવી રીતે દબાણમુક્ત રાખવામાં આવી છે. પોલિસી લેવલ પર જે પારદર્શકતા છે તેવી જ પારદર્શકતા વિદ્યાર્થીઓને મળી રહેલા વિકલ્પોમાં પણ છે. હવે વિદ્યાર્થીઓ કેટલો અભ્યાસ કરે, કેટલા સમય માટે ભણે તે કોઈ બોર્ડ કે યુનિવર્સિટી નક્કી નહીં કરે. આ નિર્ણયમાં વિદ્યાર્થીની પણ ભાગીદારી રહેશે. મલ્ટિપલ એન્ટ્રી અને એક્ઝિટની જે વ્યવસ્થા આજે શરૂ થઈ છે તેણે વિદ્યાર્થીને એક જ ક્લાક કે એક જ કોર્સમાં જકડાઈ રહેવાથી મજબૂરીમાંથી મુક્ત કરી દીધો છે. આધુનિક ટેકનોલોજી પર આધારિત એકેડમિક બેંક અને ક્રેડિટ આ સિસ્ટમને નવી દિશામાં વિદ્યાર્થીઓ માટે ક્રાંતિકારી પરિવર્તન લાવનાર છે. હવે દરેક યુવાન પોતાની રૂચિથી, પોતાની સુવિધાઓથી ગમે ત્યારે એક સ્ટ્રીમને પસંદ કરી શકે છે કે છોડી શકે છે. હવે કોઈ કોર્સની પસંદગી કરતી વખતે એ ડર નહીં રહે કે જો આપણો નિર્ણય ખોટો પડ્યો તો શું થશે? આવી જ રીતે સ્ટ્રક્ચર એસેસમેન્ટ ફોર એનલાઇઝિંગ લર્નિંગ લેવલ એટલે કે 'સફલ' મારફતે વિદ્યાર્થીની સમીક્ષાની પણ વૈજ્ઞાનિક વ્યવસ્થા શરૂ થઈ છે. જે વ્યવસ્થા આવનારા દિવસોમાં વિદ્યાર્થીને પરીક્ષાના ડરમાંથી પણ મુક્તિ અપાવશે. જ્યારે આ ડર યુવા માનસમાંથી નીકળી જશે તો નવા નવા કૌશલ્ય લેવાની હિંમત અને નવી નવી શોધ કરવાના નવા યુગનો પ્રારંભ થશે. સંભાવનાનો વ્યાપક વિસ્તાર થશે. આથી જ હું ફરીથી કહીશ કે આજે નવી શિક્ષણ નીતિ અંતર્ગત આ નવો કાર્યક્રમ શરૂ થઈ રહ્યો છે તેમાં ભારતનું ભાગ્ય પલટવાની ક્ષમતા છે.

 

સાથીઓ,

આપણે અને તમે દાયકાઓથી એવો માહોલ જોયો છે જ્યારે એમ માનવામાં આવતું હતું કે સારું શિક્ષણ પ્રાપ્ત કરવા માટે વિદેશ જવું પડશે. પરંતુ સારું શિક્ષણ પ્રાપ્ત કરવા માટે વિદેશી વિદ્યાર્થીઓ ભારત આવે, શ્રેષ્ઠ સંસ્થાઓ ભારત આવે તે હવે આપણે જોઈ રહ્યા છીએ. આ માહિતી ઘણી ઉત્સાહપ્રેરક છે કે દેશની 150થી વધુ યુનિવર્સિટીઓમાં આંતરરાષ્ટ્રીય બાબતો માટેની ઓફિસ શરૂ કરવામાં આવી છે. ભારતના ઉચ્ચ શિક્ષણ સંસ્થાનો, આંતરરાષ્ટ્રીય સ્તર પર રિસર્ચ અને એકેડમિકમાં વધુ આગળ વધે તેના માટે આજે નવી માર્ગદર્શિકા જારી કરવામાં આવી છે.

 

સાથીઓ,

આજે બની રહેલી સંભાવનાઓને સાકાર કરવા માટે આપણા યુવાનોએ દુનિયાથી એક ડગલું આગળ રહેવું પડશે, એક ડગલું આગળનું વિચારવું પડશે. આરોગ્ય હોય, સંરક્ષણ હોય, ઇન્ફ્રાસ્ટ્રક્ચર હોય, ટેકનોલોજી હોય દેશે તમામ દિશામાં સક્ષમ અને આત્મનિર્ભર બનવું પડશે. આત્મનિર્ભર ભારતનો આ માર્ગ સ્કીલ ડેવલપમેન્ટ અને ટેકનોલોજીથી આવે છે જેની ઉપર એનઈપીમાં ખાસ ધ્યાન રાખવામાં આવ્યું છે. મને આનંદ છે કે ગયા વર્ષે 1200થી વધુ ઉચ્ચ શિક્ષણ સંસ્થાનોમાં સ્કીલ ડેવપલમેન્ટથી સંકળાયેલા સેંકડો નવા કોર્સને મંજૂરી આપવામાં આવી છે.


સાથીઓ,

શિક્ષણના વિષયમાં પૂજ્ય બાપુ મહાત્મા ગાંધી કહેતા રહેતા હતા કે રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ ખરા અર્થમાં રાષ્ટ્રીય હોવા માટે રાષ્ટ્રીય પરિસ્થિતિઓને રિફ્લેક્ટ કરવી જોઇએ. બાપુના આ દૂરંદેશી વિચારોને પૂર્ણ કરવા માટે સ્થાનિક ભાષાઓમાં, માતૃ ભાષામાં શિક્ષણના વિચાર એનઇપીમાં રાખવામાં આવ્યા છે. હવે ઉચ્ચ શિક્ષણમાં સૂચનોના માધ્યમ માટે સ્થાનિક ભાષા પણ એક વિકલ્પ રહેશે. મને આનંદ છે કે આઠ રાજ્યમાં 14 એન્જિનિયરિંગ કોલેજ, પાંચ ભારતીય ભાષાઓ હિન્દી, તેલુગુ, તમિળ, મરાઠી અને બાંગ્લામાં એન્જિનિયરિંગનું શિક્ષણ શરૂ થઈ રહ્યું છે. એન્જિનિયરિંગના કોર્સને 11 ભારતીય ભાષાઓમાં અનુવાદ કરવા માટે એક ટુલ ડેવલપ કરવામાં આવ્યું છે. પ્રાંતીય ભાષાઓમાં પોતાનું શિક્ષણ શરૂ કરવા જઈ રહેલા વિદ્યાર્થીઓ-વિદ્યાર્થિનીઓને હું ખાસ અભિનંદન આપવા જઈ રહ્યો છું. તેનો સૌથી મોટો લાભ દેશના ગરીબ વર્ગ, ગામડામાં રહેતા મઘ્યમવર્ગના વિદ્યાર્થીઓને, દલીત તથા પછાત વર્ગના અને આદિવાસી ભાઈ બહેનોને મળશે. આ જ પરિવારમાંથી આવનારા બાળકોને સૌથી વધુ ભાષા વિભાજનનો ભોગ બનવું પડતું હતું. સૌથી વધુ નુકસાન આવા જ પરિવારના બાળકોને ભોગવવું પડતું હતું. માતૃભાષામાં અભ્યાસથી ગરીબ બાળકોનો આત્મવિશ્વાસ વધશે અને તેમના સામર્થ્ય અને પ્રતિભા સાથે ન્યાય થશે.

 

સાથીઓ,

પ્રારંભિક શિક્ષણમાં પણ માતૃભાષાને પ્રોત્સાહિત કરવાનું કાર્ય શરૂ થઈ ગયું છે. જે વિદ્યાપ્રવેશ પ્રોગ્રામ આજે લોંચ કરાયો છે તેની તેમાં સૌથી મોટી ભૂમિકા છે. પ્લે સ્કૂલનો અભિગમ મોટા શહેરો સુધી જ મર્યાદિત હતો તે વિદ્યા પ્રવેશ મારફતે હવે દૂર દૂરની સ્કુલો સુધી પહોંચશે અને રાજ્ય પોતાની જરૂરિયાતને આધારે તેને લાગું કરશે. એટલે કે દેશના તમામ હિસ્સામાં, બાળક અમીર હોય કે ગરીબ હોય પણ તેનું શિક્ષણ રમતા રમતાં હસતા હસતા જ થાય એ દિશામાં પ્રયાસ હાથ ધરાશે. અને જ્યારે પ્રારંભ હાસ્ય સાથે થશે તો આગળ જતાં સફળતાનો માર્ગ પણ આસાનીથી પૂર્ણ થશે.



સાથીઓ,

આજે અન્ય એક કાર્ય પણ થયું છે જે મારા હૃદયથી ઘણું નજીક છે. ઘણું સંવેદનશીલ છે. આજે દેશમાં ત્રણ લાખથી વધુ બાળકો એવા છે જેમને શિક્ષણ માટે સાંકેતિક ભાષાની જરૂર પડે છે. તેને સમજીને ભારતીય સાઇન લેંગ્વેજને પહેલી વાર એક ભાષાના વિષય એટલે કે એક સબ્જેક્ટનો દરજ્જો પ્રદાન કરવામાં આવ્યો છે. હવે વિદ્યાર્થી તેને એક ભાષાની રીતે પણ ભણી શકશે. તેનાથી ભારતીય સાઇન લેંગ્વેજને વેગ મળશે, આપણા દિવ્યાંગ સાથીઓને તેનાથી ઘણી મદદ મળશે.



સાથીઓ,
 


તમે જાણો છો કે કોઈ પણ વિદ્યાર્થીને સમગ્ર શિક્ષણમાં તેના જીવનની સૌથી મોટી પ્રેરણા તેના અધ્યાપક હોય છે. આપણે ત્યાં તો કહેવાય છે કે....


ગુરૌ ન પ્રાપ્યતે યત્ તત્


ન અન્ય અત્રાપિ લભ્યતે


અર્થાત જે ગુરુથી પ્રાપ્ત થઈ શકતું નથી તે અન્ય ક્યાંયથી પ્રાપ્ત થઈ શકે નહીં. એટલે કે એવું કાંઈ નથી જે સારો ગુરુ, સારો શિક્ષક મળ્યા બાદ દુર્લભ હોય. આથી જ રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિની રચનાથી લઈને તેના અમલીકરણ સુધીના દરેક તબક્કે આપણા શિક્ષકો આ અભિયાનમાં સક્રિયરૂપે હિસ્સો બનેલા છે. આજે લોંચ કરાયેલો નિષ્ઠા 2.0 પ્રોગ્રામ આ દિશામાં મહત્વની ભૂમિકા ભજવશે. આ પ્રોગ્રામ દ્વારા દેશના શિક્ષકોની આધુનિક જરૂરિયાતોને ધ્યાનમાં રાખીને તાલીમ પણ મળશે અને તેઓ પોતાના સૂચનો પણ વિભાગને આપી શકશે. તમામ શિક્ષકોને, એકેડેમિશિયનોને મારો અનુરોધ છે કે આ પ્રયાસોમાં ઉત્સાભેર ભાગ લો અને વધુને વધુ યોગદાન આપો. તમે બધા શિક્ષણ ક્ષેત્રમાં એટલો અનુભવ ધરાવો છો, વ્યાપક અનુભવ ધરાવો છો તેથી જ તમે જો પ્રયાસ કરશો તો તે પ્રયાસ દેશને ઘણો આગળ લઈ જશે. હું માનું છું કે આ કાળખંડમાં આપણે જે પણ ભૂમિકામાં છીએ, આપણે નસીબદાર છીએ કે આપણે આટલા બધા પરિવર્તનના સાક્ષી બન્યા છીએ,આ પરિવર્તનમાં સક્રિય ભૂમિકા અદા કરી રહ્યા છીએ. તમારા જીવનમાં આ સ્વર્ણિમ અવસર આવ્યો છે કે તમે દેશના ભવિષ્યનું નિર્માણ કરશો, ભવિષ્યની રૂપરેખા તમારા હાથથી તૈયાર કરશો. મને ભરોસો છે કે આવનારા સમયમાં જેમ જેમ નવી રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ નીતિમાં અલગ અલગ ફિચર્સ, વાસ્તવિકતામાં પરિવર્તિત થશે ત્યારે આપણો દેશ એક નવા યુગનો સાક્ષાત્કાર કરશે. જેમ જેમ આપણે નવી યુવાન પેઢીને એક આધુનિક અને રાષ્ટ્રીય શિક્ષણ વ્યવસ્થાથી સાંકળતા જઇશું, દેશ સ્વતંત્રતાના અમૃત સંકલ્પો પ્રાપ્ત કરતો જશે. આ જ શુભેચ્છાઓ સાથે હું મારી વાત સમાપ્ત કરું છું. તમે બધા તંદુરસ્ત રહો અને નવી ઉર્જા સાથે આગળ ધપો.


ખૂબ ખૂબ ધન્યવાદ.