परिवर्तन करने के लिए अपने अंतर्गत आने वाले सभी पुलिस स्टेशनों की एक सूची बनाएं, आप व्यक्ति को बदल भी सकते हैं और नहीं भी लेकिन निश्चित रूप से आप सिस्टम और वातावरण को बदल सकते हैं: आईपीएस अधिकारियों से प्रधानमंत्री मोदी
पीएम मोदी ने हमारे पुलिस स्टेशनों की संस्कृति को बदलने और इन्हें सामाजिक विश्वास के केंद्र बनाने पर जोर दिया
हमने कभी अपने पुलिस स्टेशनों की संस्कृति पर जोर दिया है, हमारे पुलिस स्टेशन सामाजिक विश्वास के केंद्र कैसे बनने चाहिए: आईपीएस अधिकारियों से प्रधानमंत्री

नमस्कार!

दीक्षांत परेड समारोह में मौजूद केंद्रीय परिषद के मेरे सहयोगी श्री अमित शाह जी, डॉ. जितेंद्र सिंह जी, जी. किशन रेड्डी जी, सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के अधिकारी गण और युवा जोश से भारतीय पुलिस सेवा को नेतृत्व देने के लिए तैयार 71 आर आर के मेरे सभी युवा साथियों!

वैसे मैं लगातार आपके यहां से निकलने वाले सब साथियों को रूबरू में दिल्‍ली में मिलता था। मेरा सौभाग्‍य रहता था कि मेरे निवास स्‍थान पर सबको बुलाता था, गप्‍पें-गोष्‍ठी भी करता था। लेकिन कोरोना के कारण जो परिस्थितियां पैदा हुई हैं, उसके कारण मुझे ये मौका गंवाना पड़ रहा है। लेकिन मुझे पक्‍का विश्‍वास है कि कार्यकाल के दौरान कभी न कभी आप लोगों से भेंट हो ही जाएगी।

साथियों,

लेकिन एक बात निश्चित है कि अब तक आप एक ट्रेनी के रूप में काम करते हैं, आपको लगता है कि एक शेल्‍टर हैएकprotective environment में आप काम कर रहे हैं। आपको लगता है कि गलती करेंगे तो साथी भी है, संभालेगा, आपके ट्रेनिंग देने वाले लोग हैं वो भी संभाल लेंगे। लेकिन रातों-रात स्थिति बदल जाएगी। जैसे ही यहां से आप बाहर निकलोगे, आप protective environment में नहीं होंगे। सामान्‍य मानवी आपको, नए हो अनुभव अभी हुआ नहीं है, कुछ नहीं समझेगा। वो तो ये समझेगा कि भई आप तो यूनिफॉर्म में हैं, आप तो साहब हैं, मेरा ये काम क्‍यों नहीं हो रहा है। अरे आप तो साहब हैं, आप ऐसा कैसे करते हो? यानी आपकी तरफ देखने का नजरिया बिल्‍कुल बदल जाएगा।

ऐसे समय आप किस प्रकार से अपने आपको प्रस्‍तुत करते हैं, कैसे आप अपने आपको वहां से कार्यरत करते हैं, इसको बहुत बारीकी से देखा जाएगा।

मैं चाहूंगा कि आप इसमें शुरू के कालखंड में जितने over conscious रहें, जरूर रहें क्‍योंकि First impression is the last impression. अगर आपकी एक छवि शुरू में ऐस बन गई कि भई ये इस प्रकार के अफसर हैं, फिर आप कहीं पर भी ट्रांसफर करोगे, वो आपकी छवि आपके साथ travel करती जाएगी। तो आपको उसमें से बाहर आने में बहुत समय जाएगा। आप बहुत carefully ये कोशिश कीजिए।

दूसरा, समाज व्‍यवस्‍था का एक दोष रहता है। हम भी जब चुन करके दिल्‍ली में आते हैं तो दो-चार लोग हमारे आसपास ऐसे ही चिपक जाते हैं, पता ही नहीं होता कि कौन हैं। और थोड़े ही दिन में सेवा करने लग जाते हैं; साहब गाड़ी की जरूरत हो तो बता देनाव्‍यवस्‍था कर दूंगा। पानी की जरूरत हो तो बोलिए साहब। ऐसा करो, अभी तो आप खाना नहीं होगा, ये भवन का खाना अच्‍छा नहीं है, चलिएवहां खाना है मैं ले आऊं क्‍या? पता ही नहीं होता ये सेवादान कोन हैं। आप भी जहां जाएंगे जरूर ऐसी एक टोली होगी जो, शुरू में आपको भी जरूरत होती है कि भई नए हैं, इलाका नया है, और अगर उस चक्‍कर में फंस गए तो फिर निकलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। आप कष्‍ट हो शुरू में तो कष्‍ट, नया इलाका है तो नया इलाका, अपनी आंखों से, अपने कान से, अपने‍ दिमाग से चीजों को समझने का प्रयास कीजिए। शुरू में जितना हो सके तो अपने कान को फिल्‍टर लगा दीजिए।

आपको लीडरशिप में success होना है तो शुरू में आपके कान को फिल्‍टर लगा दीजिए। मैं ये नहीं कहता हूं कान को ताला लगाइए। मैं फिल्‍टर लगाने के‍ लिए कह रहा हूं। इससे क्‍या होगा कि जो जरूरी चीजें हैं जो आपके career के लिए आपकी ड्यूटी के लिए एक इंसान के नाते वो फिल्‍टर की हुई चीजें जब आपके दिमाग में जाएंगी आपको बहुत काम आएंगी। सारा कूड़ा-कचरा, वरना तो आप देखिए कोई भी जाता है तो लोग उसको एक dustbin मान लेते हैं। और जितना बड़ा आदमी, उतना बड़ा dustbin मानते हैं और कूड़ा-कचरा फेंकते ही चले जाते हैं। और हम भी उस कूड़े-कचरे को संपत्ति मान लेते हैं।हम अपने मन-मंदिर को जितना साफ रखेंगे, उतना फायदा होगा।

दूसरा एक विषय है-क्‍या कभी हमने अपने थाने के कल्‍चर पर बल दिया है। हमारा थाना एक सामाजिक विश्‍वास का केंद्र कैसे बने, उसका environment, आज थाना देखिए स्‍वच्‍छता का भाव होता है, ये ठीक है। कुछ इलाकों में थाने बहुत पुराने हैं, जर्जर हैं, ये मैं जानता हूं, लेकिन साफ-सुथरा रखना तो कोई मुश्किल काम नहीं है।

हम तय करें कि मैं जहां जाऊंगा मेरे हाथ के नीचे 50-100-200, जो भी थाने होंगे उसमें ये 12-15 चीजें मैं कागज पर तय करूंगा, ये बिल्‍कुल पक्‍का कर दूंगा। व्‍यक्ति को मैं बदल पाऊं, न बदल पाऊं, व्‍यवस्‍था को मैं बदल सकता हूं। मैं environment को बदल सकता हूं। क्‍या आपकी priority में ये चीज हो सकती है। और आप देखिए फाइलें कैसे रखना, चीजें कैसे रखना, कोई आएं तो बुलाना, बिठाना, ये छोटी-छोटी चीजें आप कर लीजिए।

कुछ पुलिस के लोग जब नए ड्यूटी पर जाते हैं तो उनको लगता है मेरा रौब पहले मैं दिखाऊं। लोगों को मैं डरा दूं, मैं लोगों में एक अपना हुक्‍म छोड़ दूं। और जोanti-social elementहैं वो तो मेरे नाम से ही कांपने चाहिए। ये जो सिंघम वाली फिल्‍में देखकर जो बड़े बनते हैं, उनके दिमाग में ये भर जाता है। और उसके कारण करने वाले काम छूट जाते हैं। आप, आपके हाथ के नीचे अगर 100-200 लोग हैं, 500 लोग हैं उनमें क्‍वालिटी में चेंज कैसे आए, एक अच्‍छी टीम कैसे बने, आपकी सोच के अनुसार अच्‍छा, आप देखिए, आपको देखने का तरीका बदल जाएगा।

सामान्‍य मानवी पर प्रभाव पैदा करना है, कि सामान्‍य मानवी में प्रेम का सेतु जोड़ना है, तय कर लीजिए। अगर आप प्रभाव पैदा करेंगे तो उसकी उम्र बहुत कम होती है। लेकिन प्रेम का सेतु जोड़ेंगे तो रिटायर हो जाएंगे तब भी जहां आपकी पहली ड्यूटी रही होगी, वहां के लोग आपको याद करेंगे कि 20 साल पहले ऐसा एक नौजवान अफसर हमारे यहां आया था, भाषा तो नहीं जानता था, लेकिन जो उसका व्‍यवहार था लोगों के दिलों को जीत लिया था। आप एक बार जन-सामान्‍य के दिल को जीत लेंगे, सब बदल जाएगा।

एक पुलिसिंग में मान्‍यता है, मैं जब नया-नया सीएम बना तो गुजरात में दिवाली के बाद नया साल होता है। तो हमारे यहां एक फंक्‍शन छोटा सा होता है जिसमें पुलिस के लोगों से दिवाली मिलन का कार्यक्रम होता है और मुख्‍यमंत्री उसमें regular जाते हैं, मैं भी जाता हूं। जब मैं जाता था, पहले जो मुख्‍यमंत्री जाते थे वो जा करके मंच पर बैठते थेऔर कुछ बोलते थे और शुभकामनाएं देकर निकल जाते थे। मैं वहां जितने लोगों को मिलता था, तो मैं शुरू में जब गया तो वहां जो पुलिस के अधिकारी थे, उन्‍होंने मुझे रोका। बोले, आप सबसे हाथ क्‍यों मिला रहे हैं, मत मिलाइए। अब उसमें कांस्‍टेबल भी होते थे, छोटे-मोटे हर प्रकार के मुलाजिम होते थे और करीब 100-150 का gathering होता था। मैंने कहा क्‍यों? अरे बोले, साहब आपके तो हाथ ऐसे होते हैं कि आप हाथ मिलाते-मिलाते हों तो शाम को आपके हाथ में सूजन आ जाएगी और treatment करनी पड़ेगी। मैंने कहा, ये क्‍या सोचा आपने? वो भी समझता है कि मैं जिससे मिल रहा हूं उसका हाथ बड़ा सामान्‍य है तो मैं उससे उसी प्रकार से मिलूंगा। लेकिन एक सोच, पुलिस डिपार्टमेंट में ऐसा ही होगा। वो गाली बोलेगा, तू-तू फटकार करेगा, ये कल्‍पना गलत है जी।

इस कोरोना कालखंड के अंदर ये जो यूनिफॉर्म में जो बनी-बनाई छवि है, वो पुलिस real में नहीं है। वो भी एक इंसान है। वो भी अपनी ड्यूटी मानवता के हित के लिए कर रहा है। ये इस जन-सामान्‍य में भरेगा हमारे अपने व्‍यवहार से। हम अपने व्‍यवहार से ये पूरा character कैसे बदल सकते हैं?

उसी प्रकार से मैंने देखा है कि आमतौर पर political leaders और पुलिस का सबसे पहला मुकाबला हो जाता है। और जब यूनिफॉर्म में होते हैं तो उसको ऐसा लगता है कि मैं ऐसा करूँगा तो मेरा बराबर जमेगा और 5-50 ताली बजाने वो तो मिल ही जाते हैं।

हमें भूलना नहीं चाहिए कि हम एक democratic व्‍यवस्‍था हैं। लोकतंत्र में दल कोई भी हो, जन प्रतिनिधि का एक बड़ा महत्‍व होता है। जन-प्रतिनिधि का सम्‍मान करने का मतलब है लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्‍मान करना। उसके साथ हमारे differencesहो तो भी एक तरीका होता है। उस तरीके को हमें अपनाना चाहिए। मैं मेरा अपना अनुभव बता रहा हूं। मैं जब नया-नया मुख्‍यमंत्री बना तो ये जो आपको ट्रेनिंग दे रहे हैं ना अतुल, वो उस समय मुझे ट्रेनिंग दे रहे थे।और मैं उनके अंडर में ट्रेंड हुआ हूं। क्‍योंकि वो मेरे security in charge थे।CM Security के।

तो एक दिन क्‍या हुआ मुझे ये पुलिस, तामझाम, मुझे mentally मैं फिट नही होता। मुझे बड़ा अटपटा लगता है, लेकिन मजबूरन मुझे उसमें रहना पड़ता था। और कभी-कभी मैं कानून-नियम तोड़कर कार से उतर जाता था, भीड़ में उतरकर लोगों से हाथ मिला लेता था। तो एक दिन अतुल करवल ने मेरे से टाइम लिया। मेरे चैंबर में मिलने आए। शायद उनको याद है कि नहीं मुझे मालूम नहीं, और उन्‍होंने अपनी नाराजगी मुझे प्रकट की। काफी जूनियर थे वो, मैं आज से 20 साल पहले की बात कर रहा हूं।

उन्‍होंने अपने मुख्‍यमंत्री के सामने आंख में आंख मिला करके अपनी नाराजगी व्‍यक्‍त की। उन्‍होंने कहा, साहब आप ऐसे नहीं जा सकते, कार में से आप अपनी मर्जी से नहीं उतर सकते, आप ऐसे भीड़ में नहीं जा सकते।मैंन कहा, भाई मेरी जिंदगी के तुम मालिक हो क्‍या? ये तुम तय करोगे क्‍यामुझे क्‍या करना है क्‍या नहीं? वो जरा भी हिले नहीं, मैं उसके सामने बोल रहा हूं आज। वो जरा भी हिले नहीं, डिगे नहीं उन्‍होंने मुझे साफ कहा कि साहब आप व्‍यक्तिगत नहीं हैं। आप राज्‍य की संपत्ति हैं। और मेरी इस संपत्ति को संभालना जिम्‍मेदारी है। आपको नियमों का पालन करना होगा, ये मेरा आग्रह रहेगा और मैं नियमों का पालन करवाऊंगा।

मैं कुछ नहीं बोला। लोकतंत्र का सम्‍मान भी था, जनप्रतिनिधि का सम्‍मान भी था लेकिन अपनी ड्यूटी के संबंध में बहुत ही polite wordमें अपनी बात बताने का तरीका भी था। मेरे जीवन के वो बिल्‍कुल शुरूआती कालखंड थे मुख्‍यमंत्री के नाते। वो घटना आज भी मेरे मन पर स्थिर क्‍यों है? क्‍योंकि एक पुलिस अफसर ने जिस तरीके से और जिस दृढ़ता से और लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि के महत्‍व को समझते हुए बात रखी थी, मैं मानता हूं हर पुलिस का जवान ये काम कर सकता है, हर कोई कर सकता है। हमें इन बातों को देखना होगा।

एक और विषय है –देखिए इन दिनों टेक्‍नोलॉजी ने बहुत बड़ी मदद की है। ज्‍यादातर हमें जो काम पहले हमारीConstabulary level की जो information होती थी, intelligence होती थी, उसी से पुलिसिंग का काम अच्‍छे ढंग से होता था। दुभाग्‍य से उसमें थोड़ी कमी आई है। इसमें कभी भी compromise मत होने देना। Constabulary level की intelligence पुलिसिंगके लिए बहुत आवश्‍यक होती है जी, इसमें कमी मत आने देना। आपको अपनी assets, अपने रिसोर्सस, इसको जितना पनपा सकते हैं पनपाएं, पर थाने के लोगों को बल देना चाहिए, उनको प्रोत्‍साहित करना चाहिए। लेकिन इन दिनों टेक्‍नोलॉजी इतनी बड़ी मात्रा में सरलता से उपलब्‍ध है, इतने दिनों जितने भी क्राइम detect होते हैं, उसमें टेक्‍नोलॉजी बहुत मदद कर रही है। चाहेसीसीटीवी कैमरा फुटेज हों, या मोबाइल ट्रेकिंग हो, आपको बहुत बड़ी मदद करते हैं।अच्छी चीज है लेकिन इन दिनों जितने पुलिस के लोग suspend होते हैं, उसका कारण भी टेक्‍नोलॉजी है। क्‍योंकि वो कहीं बदतमीजी कर देते हैं, कहीं गुस्‍सा कर देते हैं, कहीं बैलेंस खो देते हैं, कभी आवश्‍यकता से अधिक कुछ कर देते हैं और दूर कोई वीडियो उतारता है, पता ही नहीं होता है। फिर वो वीडियो वायरल हो जाता है। फिर इतना बड़ा मीडिया का प्रेशर बन जाता है और वैसे भी पुलिस के खिलाफ बोलने के लिए ज्‍यादा लोग मिल ही जाते हैं। आखिरकार सिस्‍टम को कुछ दिन के लिए तो उनको suspend करना ही पड़ता है। पूरे career में धब्‍बा लग जाता है।

जैसे टेक्‍नोलॉजी मदद कर रही है, टेक्‍नोलॉजी मुसीबत भी कर रही है। पुलिस को सबसे ज्‍यादा कर रही है। आपको trained करना होगा लोगों को। टेक्‍नोलॉजी को सकारात्‍मक अच्‍छे से अच्‍छा, ज्‍यादा से ज्‍यादा उपयोग कैसे हो, इस पर बल देना चाहिए। और मैंने देखा कि आपकी पूरी बैच में टेक्‍नोलॉजी के background वाले लोग बहुत हैं। आज information की कमी नहीं है जी। आज information का analysis और उसमें से सही चीज निकालना, big data और artificial intelligence, social media, ये चीजें अपने-आप में आपके एक नए हथियार बन गए हैं। आपको अपनी एक टोली बनानी चाहिए। अपने साथ काम करने वाले लोग, उनको जोड़ना चाहिए। और जरूरी नहीं है कि हर कोई बढ़ी टेक्‍नोलॉजी का एक्‍सपर्ट हो।

मैं एक उदाहरण बताता हूं। जब मैं सीएम था तो मेरी सिक्‍युरिटी में एक कांस्‍टेबल था। कांस्‍टेबल या थोड़ा उससे ऊपर का होगा, मुझे याद नहीं है। भारत सरकार, यूपीए गर्वनमेंट थी और एक email, वो email correct नहीं हो रहा था। और भारत सरकार के लिए ये चिंता का विषय था इस मामले में। तो ये चीजें अखबार में भी आईं। मेरी टोली में एक सामान्‍य 12वं कक्षा पढ़ा हुआ एक नौजवान था, उसनेउसमें रुचि ली। और आप हैरान हो जाएंगे, उसने उसको correct किया और उस समय शायद गृहमंत्री चिदम्‍बरम जी थे, उन्‍होंने उसको बुलाया, उसको सर्टिफिकेट दिया। यानी कि कुछ ही ऐसे लोग होते हैं जिनके पास विधा होती है।

हमें इनको ढूंढना चाहिए, इनका उपयोग करना चाहिए और उनको काम में लगाना चाहिए। अगर ये आप करते हैं तो आप देखिए कि आपके नए शस्‍त्र बन जाएंगे, ये आपकी नई शक्ति बन जाएगी। अगर आपके पास 100 पुलिस का बल है, इन साधनों पर अगर आपकी ताकत आ गई, information के analysis में टेक्‍नोलॉजी का उपयोग किया; आप 100 नहीं रह जाएंगे हजारों में तब्‍दील हो जाएंगे इतनी ताकत बढ़ जाएगी, आप उस पर बल दीजिए।

दूसरा, आपने देखा होगा कि पहले natural calamities होती थीं, बहुतबाढ़ आ गई, भूकंप आ गया, कोई बहुत बड़ा एक्‍सीडेंट हो गया, साइक्‍लोन आ गया। तो आमतौर पर फौज के लोग वहां पहुंचते थे। और लोगों को भी लगता था भई चलिए ये फौज के लोग आ गए हैं, अब इस मुसीबत में से निकलने के लिए हमको बहुत बड़ी मदद मिल जाएगी, ये बड़ा स्‍वाभाविक बन गया था। पिछले कुछ वर्षों में SDRF और NDRFके कारण हमारे पुलिस बल के ही जवान हैं, उन्‍होंने जो काम किया है, और जिस प्रकार से टीवी का ध्‍यान भी उन्‍हीं लोगों पर, उनका स्‍पेशल यूनिफॉर्म बन गया है, और पानी में भी दौड़ रहे हैं, मिट्टी में भी दौड़ रहे हैं, पत्‍थरों पर काम कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी शिलाएं उठा रहे हैं। इसने एक नई पहचान बना दी है पुलिस विभाग की।

मैं आप सबसे आग्रह करूंगा कि आप अपने इलाके में अपने क्षेत्र में SDRF और NDRFके काम के‍ लिए जितनी ज्‍यादा टोलियां आप तैयार कर सकते हैं आपको करनी चाहिए। आपके पुलिस बेड़े में भी और उस इलाके के लोगों में भी।

अगर आप natural calamitiesमें जनता की मदद करने में पुलिस बल की क्‍योंकि ड्यटी तो आपकी आ ही जाती है, लेकिन ये अगर महारत है तो बड़ी आसानी से इस ड्यूटी को आप संभाल सकते हैं और इन दिनों इसकी requirement बढ़ती चली जा रही है। और through NDRF, through SDRF आप पूरे पुलिस बेड़े की एक नई छवि, एक नई पहचान आज देश में बन रही है।

गर्व के साथ आज देश कह रहा है कि देखिए भई इस संकट की घड़ी में पहुंच गए, इमारत गिर गई, लोग दबे थे, पहुंच गए उन्‍होने निकाला।

मैं चाहूंगा कि अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें आप लीडरशिप दे सकते हैं। आपने देखा होगा trainingका बहुत बड़ा महत्‍व होता है। हम training को कभी कम मत आंकें। ज्‍यादातर हमारे देश में सरकारी मुलाजिम के लिए trainingको punishment माना जाता है। ट्रेनिंग यानी कोई निकम्‍मा अफसर होगा तो उसको ट्रेनिंग के काम में लगाया होगा, ऐसा impression बन जाता है। हमने ट्रेनिंग को इतना नीचे कर दिया है, वो हमारी सारी good governance की समस्‍याओं की जड़ में है और उसमें से हमको बाहर आना होगा।

देखिए मैं अतुल करवाल की दोबारा तारीफ करना चाहूंगा आज। अतुल को उसका, वो भी technology background के हैं, एवरेस्‍ट हो आए हैं, बड़े साहसिक हैं। उनके लिए पुलिस में कोई भी पद प्राप्‍त करना मैं नहीं मानता हूं मुश्किल है। लेकिन आज से कुछ साल पहले भी उन्‍होंने हैदराबाद में ट्रेनिंग के काम को खुद ने choice से लिया था और वहां आकर काम किया था। इस बार भी उन्‍होंने खुद ने choice से कहा कि मुझे तो ट्रेनिंग का काम दीजिए और वो आज वहां आए हैं। इसकी बहुत बड़ी अहमियत होती है जी। मैं चाहूंगा कि इसको महत्‍व दिया जाए।

और इसलिए भारत सरकार ने एक मिशन कर्मयोगी, अभी दो दिन पहले ही कैबिनेट ने उसको मंजूर किया है। हम बहुत बड़ी प्रतिष्‍ठा देना चाहते हैं इस ट्रेनिग की activity को। एक मिशन कर्मयोगी के रूप में देना चाहते हैं।

मुझे लगता है कि इसको करना चाहिए और आगे बढ़ाना चाहिए। मैं एक अपना अनुभव और बताना चाहता था। मैं गुजरात एक 72 घंटे का capsule बनाया था मैंनेट्रेनिंग का और सरकारी अफसरों को तीन-तीन दिन के लिए सब प्रकार के मुलाजिम के लिए ट्रेनिंग थी 72 घंटे की। और बाद में मैं खुद उनका फीडबैक लेता था क्‍या अनुभव हुआ।

जब शुरू का कालखंड था तो एक 250 लोग, जिन्‍होंने ट्रेनिंग ली थी, मैंने उनकी मीटिंग की, पूछा भई कैसा रहा इन 72 घंटे में? ज्‍यादातर लोगों ने कहा, साहब 72 घंटों को जरा बढ़ाना चाहिए, हमारी लिए बहुत उपयोगी होता है। कुछ लोगों ने कहा, उसमें एक पुलिस वाला खड़ा हुआ था। उससे मैंने पूछा कि भई आपका क्‍या अनुभव है?तो उसने मुझे कहा, साहब इस 72 घंटे में मैं अब तक पुलिसवाला था, इस 72 घंटे ने मुझे इंसान बना दिया। इन शब्‍दों की बहुत बड़ी ताकत थी। वो कहता है कि मुझे कोई मानता ही नहीं था कि मैं इंसान हूं, सब लोग यही देखते थे कि मैं पुलिसवाला हूं। इस 72 घंटे की ट्रेनिंग में मैंने अनुभव किया कि मैं सिर्फ पुलिस नहीं हूं, मैं एक इंसान हूं।

देखिए, ट्रेनिंग की ये ताकत होती है। हमें ट्रेनिंग की लगातार, अब जैसे आपके यहां परेड, आपको पक्‍का करना चाहिए परेड के जो घंटे हैं एक मिनट कम नहीं होने देंगे। आप अपने स्‍वास्‍थ्‍य की‍ जितनी चिंता करें, अपने साथियों को हमेशा पूछते रहिए, स्‍वास्‍थ्‍य कैसा है, एक्‍सरसाइज करे हो नही करते हो, weight कंट्रोल रखते हो कि नहीं रखते हो, मेडिकल चेकअप कराते हो नहीं कराते हो। इन सारी चीजों पर बल दीजिए क्‍योंकि आपका क्षेत्र ऐसा है कि जिसमें physical fitness सिर्फ यूनिफॉर्म में अच्‍छे दिखने के लिए नहीं है, आपकी ड्यूटी ही ऐसी है कि आपको इसको करना पड़ेगा और इसमें आपको नेतृत्‍व देना पड़ेगा। और हमारे यहां शास्‍त्रों में कहा गया है कि

यत्, यत् आचरति, श्रेष्ठः,

तत्, तत्, एव, इतरः, जनः,

सः, यत्, प्रमाणम्, कुरुते, लोकः,

तत्, अनुवर्तते।

अर्थात श्रेष्ठ लोग जिस तरह का आचरण दिखाते हैं, बाकी लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं

मुझे विश्वास है कि आप उन श्रेष्‍ठ जनों की श्रेणी में हैं, आप उस श्रेष्‍ठता को सिद्ध करने की श्रेणी में हैं, आपको एक अवसर मिला है, साथ-साथ एक जिम्‍मेदारी मिली है। और जिस प्रकार की चुनौतियों से आज मानव जाति गुजर रही है, उस मानव जाति की रक्षा के लिए हमारे देश के तिरंगे की आन-बान-शान के लिए, भारत के संविधान के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ सेवा परमो धर्म:; रूल की अपनी एक महत्‍ता है लेकिन रोल, इसकी विशेष महत्‍ता है।

मैं rule based काम करूंगा कि role based काम करूंगा। अगर हमारा role based ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण मानेंगे तो rule तो अपने-आप फोलो हो जाएंगे। और हमारा रोल perfectly हमने पालन किया तो लोगों में विश्‍वास और बढ़ जाएगा।

मैं फिर एक बार आप सब को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और मुझे विश्‍वास है कि खाकी का सम्‍मान बढ़ाने में आपकी तरफ से कोई कमी नहीं रहेगी। मेरी तरफ से भी आपकी, आपके परिवारजनों की, आपके सम्‍मान की जो कुछ भी जिम्‍मेदारियां निभाने की हैं, उसमें कभी कमी नहीं आने दूंगा। इसी विश्‍वास के साथ आज के इस शुभ अवसर पर अनेक-अनेक शुभकामनाएं देते हुए आपको मैं शुभास्‍तेबंधा कहता हूं!

धन्यवाद !

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स्वर साधना, मनोकामना, आराधना। एक बहुत ही शुभ शुरुआत के बाद। अच्छा होता आप ही का कार्यक्रम चलता। आप सबको नमस्कार।

रिपब्लिक टीवी नेटवर्क के सभी दर्शक और अब तो बहुत सारी भाषाओं में भी है, तो उन सबको भी मेरा प्रणाम! मैं इस समिट में हिस्सा लेने आए सभी साथियों का भी अभिनंदन करता हूं। 24 घंटे चलने वाले चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज इसका बहुत बड़ा महत्व होता है। और आजकल तो दुनिया में ही, पूरी दुनिया में कहीं पर भी नजर डालो, पूरी दुनिया ब्रेकिंग न्यूज के मोड पर ही है, और इतनी भागदौड़ में आप सभी, इस समिट को होस्ट कर रहे हैं, इसका हिस्सा बने हैं। और इसलिए आप विशेष बधाई के पात्र हैं। और इस बार आपकी चर्चा का विषय भी उतना ही अहम है...Great Power India: Nation First...

साथियों,

हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है...यतो धर्मस्ततो जयः ! यानि जय का, शक्ति का, मूल धर्म है। और धर्म यानि ड्यूटी, धर्म यानि जस्टिस, धर्म यानि समभाव, धर्म यानि संवाद, धर्म यानि संवेदना और यही तो नेशन फर्स्ट की भावना में भी समाहित है। भारत, अपनी पावर को इसी लैंस से देखता है, इसी तराज़ू पर तौलता है।

साथियों,

भारत की एक और विशेषता है और अब तो दुनिया ने भी मान लिया है। हम किसी क्षणिक घटना पर उतावले होने वाले देश नहीं है, हम वो हैं जिसने विकास और विनाश, देखा भी झेला भी है। हम वो देश हैं, जिसके जेहन में युगों की मेमरी चिप लगी हुई है, हम युगों की मेमरी चिप वाले नेशन हैं। और इसलिए भारत आज जो कर रहा है, और ये मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ, भारत जो कर रहा है वो आने वाले एक हज़ार वर्ष का फ्यूचर लिखने वाला है। और यही दुनिया के लिए सबसे बड़ी भारत की गारंटी है। भारत, Fast-Growing Economy भी है। एक Credible Economy भी है। और भारत, rising power के साथ-साथ और अभी आप तो ढेर सारी डिक्शनरी लेकर बैठ गए थे, सुपर पावर तक ले गए। लेकिन मैं इतना जरूर कहूँगा कि भारत Reliable power है। मैं अभी दो-तीन दिन पहले G7 समिट से लौटा हूं और दुनिया का हर नेता हर देश इस बात को भली-भांति समझता है कि आज के भारत के लिए नेशन फर्स्ट ही सबसे बड़ा मंत्र है, सबसे बड़ा सिद्धांत है।

साथियों,

कुछ दिन पहले ही, हमारी सरकार को 12 साल पूरे हो चुके हैं। उसके लिए भी अर्नब ने आपको तालियाँ बजाने के लिए मजबूर कर दिया। पिछले बारह वर्षों की जो भी सिद्धियां देश की रही हैं, उनके मूल में अगर आप तराजू से तौलोगे, हर निर्णय, हर कदम, हर प्रयास उनके मूल में राष्ट्र प्रथम की भावना ही केंद्र में है। स्वच्छ भारत अभियान से लेकर मेक इन इंडिया खादी खरीदने पर जोर स्थानीय वस्तुएं खरीदने पर जोर ये सारे Initiative इसलिए सफल हुए क्योंकि देश की जनता ने देश को सबसे ऊपर रखते हुए अपना कर्तव्य निभाया। देश के नागरिकों को मैं सलाम करता हूँ।

साथियों,

यहां हमारे साथी श्रीधर वेंबु जी बैठे हैं। जब हमारे उद्यमी नेशन फर्स्ट की भावना के साथ चलते हैं, जब वो देश की आवश्यकताओं को समझते हुए अपने लक्ष्य बनाते हैं तो संस्थाएं भी बनती हैं और देश भी समृद्ध होता है। श्रीधर वेंबु जी ने क्या काम किया है, शायद यहाँ बातों में कितना निकला होगा मुझे मालूम नहीं, लेकिन अभी मैं फ़्रांस में vivatech में गया था, करीब डेढ़ 2 लाख नौजवान वहाँ होंगे, चलने के लिए भी मैं और फ्रांस के राष्ट्रपति अलग अलग स्टॉल पर जा रहे थे, देखने के लिए भई नौजवानों ने क्या काम किया है। तो हम जोहो के स्टॉल पर गए, मैं हैरान था जी, और गर्व होता था कि जोहो के स्टाल पर यूरोप के नौजवानों की जो भीड़ लगी थी और वो समझना चाहते है कि क्या है ये दुनिया में नई चीज, भारत में शायद उतनी चर्चा नहीं होगी, जितनी मैंने वहाँ फ्रांस में देखी, बधाई हो आपको।

साथियों,

सरकार की नीति और निर्णयों में नेशन फर्स्ट का क्या प्रभाव होता है, इसका एक उदाहरण हमारा आदिवासी क्षेत्र है। मैं आज कोई फिलोस्फी झाड़ने वाला नहीं हूँ, कुछ बातें जो हुई है वो हल्की फुल्की बता दूंगा और उससे आप अंदाज लगा लेंगे कि काम कैसे होता है। मैं आदिवासी क्षेत्र की बात करता हूँ। भारत के 10 करोड़ से अधिक आबादी की चर्चा, मतलब कि आदिवासी समाज की चर्चा और हम सबको पता है कि दशकों से माओवादी आतंक वहाँ अपने डेरा तंबू डालकर बैठ हुआ था। जहां 21वीं सदी में भी इन आतंकियों ने एक भी सुविधा पहुंचने नहीं दी, सरकारी एक वेहिकल नहीं गुजर सकता था वहाँ से। गोलियों से भून दिया जाता था। अनेक सरकारें आई-गईं, कई पीढ़ियां आई-गईं, लगता था कि हिंसा का ये दुर्भाग्य ऐसे ही रहेगा। आप कल्पना कर सकते हैं, 2004 से 2014 के बीच, मैं उस दस साल का हिसाब बताता हूँ, 2004 से 2014 के बीच माओवादी आंतक के कारण, 17 हज़ार से भी अधिक हिंसक घटनाएं हुईं थीं। और करीब-करीब 7 हज़ार से ज्यादा जानें गईं थी।

साथियों,

आज आपके लिए वन लाइन न्यूज होगा या टीवी पर आधे घंटे डिबेट होगी कि माओवाद आतंकवाद खत्म हो गया, चीजें ऐसी नहीं होती। उसके लिए खपना पड़ता है और इसलिए मैं बताना चाहता हूँ। और इसलिए मैं बताना चाहता हूं और आजकल जो लोग, कुछ लोग संविधान दिखाते रहते हैं, लेकिन जब ये लोग सरकार में थे और नक्सल प्रभावित इलाकों में संविधान का नाम लेने पर गोली मार दी जाती थी और तब ये लोग चुप बैठे थे, तब उनके हाथो में संविधान नहीं दिखता था, कांप रहे थे उनके हाथ। उस दर्दनाक स्थिति से कांग्रेस को कोई खास फर्क नहीं पड़ता था।

साथियों,

2014 के बाद, हालात को बदलने के लिए हम राष्ट्र प्रथम के भाव से आगे बढ़े, हम निकल पड़े। बोलते नहीं थे, बताते भी नहीं थे, करते जरूर थे। हमने संकल्प लिया कि नक्सलवाद-माओवाद को जड़ से उखाड़ फेकेंगे और आज पूरा देश नतीजा देख रहा है, आज देश में माओवादी आतंक, अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है।

और साथियों,

कई बार अंतिम परिणाम इतना बड़ा और व्यापक होता है कि उसके पीछे की मेहनत पर ध्यान नहीं जाता। रिपब्लिक टीवी के दर्शकों को मैं खासतौर पर इसके बारे में बताना चाहता हूं।

साथियों,

जिन नक्सल प्रभावित इलाकों में दिन में जाने से भी, यानी सामान्य मानवी डरा रहता था, उसको लगता था कहीं अपहरण हो जाएगा तो, कभी वसूली का डर रहता था, कभी साथ में जो कुछ भी है वो लूट लेने का डर रहता था। और जहां पर विकास की बात बोल तक नहीं सकते थे आप, लेकर के जा नहीं सकते थे, सब नामुमकिन था, ऐसे क्षेत्रों में हम हम विकास का संकल्प लेकर आगे बढ़े। वहां बीते 12 वर्षों में हमारी सरकार ने 12 हज़ार किलोमीटर से अधिक की सड़कें बनाईं। और कई बार तो हमने देखा, कई बार तो हमने देखा कि सड़क बनाने के जो हमारा साजो सामान होता है उसको जला दिया जाता था। कांट्रेक्टर को भगा दिया जाता था। अगर 25 लोग रोड पर काम करते तो 200 लोग पुलिस सुरक्षा रखते थे ताकि काम चले। यह सब इसलिए करते थे- तय किया था।

साथियों,

साढ़े 9 हज़ार से अधिक मोबाइल टावर बनाए। एक टावर नहीं लगने और लगा हुआ टावर तोड़ देते थे। क्योंकि उनको हमेशा वहां आक्रोश पैदा करना था। करीब 45,000 गांव में मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंचाई। नक्सल प्रभावित जिलों में 1800 से अधिक बैंक ब्रांच खोली गई। करीब 75,000 बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट और 6000 से अधिक नए पोस्ट ऑफिस बनाए गए। सिर्फ बम, बंदूक और गोली के सहारे काम नहीं किया है साथियों, हमने दिलों को जीतने के लिए, ईश्वर ने जो भी शक्ति दी थी उसको खपाया था।

साथियों,

हम बुलंद इरादों के साथ नक्सल प्रभावित इलाकों में जनसामान्य की आशा, आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए जा रहे थे। आप हैरान हो जाएंगे एक मशहूर नक्सली, करोड़ों रुपए का इनाम थे उसके, उसकी मां के पास हम पहली बार राशन कार्ड लेकर गए। बेटा अपनी मां को राशन कार्ड लेने नहीं देता था, आतंकवाद अपना चलाने के लिए। इतनी घटनाएं हैं, मैं हैरान था। और सरकार चुप बैठी थी, उनको संविधान उस समय तो दिखता नहीं था। लेकिन इन सारे प्रयासों का परिणाम यह आया कि जन सामान्य में एक विश्वास का नया दौर आया। आज आप देखिए बस्तर जैसे इलाकों में बम बंदूक नहीं बस्तर ओलंपिक्स की धूम है। और अब तक इस ओलंपिक के दो एडिशन हो चुके हैं। पहली बार डेढ़ लाख से अधिक युवाओं ने और दूसरी बार करीब 4 लाख युवाओं ने बस्तर ओलंपिक्स में हिस्सा लिया। यानी जहां कभी टेरर था, वहां टैलेंट को अवसर मिल रहा है, वहां स्पोर्ट्स फल-फूल रहा है।

साथियों,

12 वर्षों के इस सेवाकाल की एक और बड़ी सिद्धि रही है, यह सिद्धि है, निराशा से निकलकर आशा-आकांक्षा सबसे भरे भारत का निर्माण।

साथियों,

नक्सल कहीं और होगा लेकिन घटनाओं की पीड़ा हिंदुस्तान के हर कोने में होती थी और जिस समय नक्सल खत्म होने की बातें आने लगी तो विश्वास सिर्फ नक्सली इलाके का नहीं, हिंदुस्तान के कोने-कोने में जगने लगा। 2014 से पहले के 10 वर्षों में जो कांग्रेस सरकार चली, उससे नाराजगी केवल गवर्नेंस की नहीं थी। तब देश की निराशा इससे कहीं अधिक थी, देश उम्मीद खो चुका था, लोगों को लगता था कि कुछ हो ही नहीं सकता, कुछ बदल ही नहीं सकता।

साथियों,

पिछले 12 वर्षों में भारत ने उसी निराशा को आशा में बदला है और मुझे इस बात का सबसे ज्यादा संतोष है। आज हर किसी को यह लगता है कि थोड़ी और मेहनत करेंगे, तो यह हो सकता है। वो दिन चले गए जब एक ही बात सुनाई देती थी, कतई नहीं हो सकता, कतई नहीं हो सकता, वो जमाना चला गया, आज ये होकर रहेगा। ये जो भाव आया है यही भारत की असली सिद्धि है, और यही रियल पावर है। चुनौतियां तो आज भी बहुत है और हमेशा रहेगी और चुनौतियां बहुरूपिया होती है, वो नए-नए अवतार में सामने आती रहती है, अरे आएगी, जिस रूप में आएगी, जंग उससे भी लड़ लेंगे जी और जीत भी लेंगे। लेकिन यह हो सकता है और हम यह करके रहेंगे, जब इस भाव से देश आगे बढ़ता है, तब सपने पूरे होते हैं।

साथियों,

मैं यहां भारत के 100 से ज्यादा जिलों और 500 से ज्यादा ब्लॉक्स की चर्चा करना चाहूंगा। यह विकास के हर पैरामीटर पर पीछे छूट गए थे और पहले की सरकार ने इन पर पिछड़ा होने का ठप्पा लगा दिया था, यह तो बैकवर्ड डिस्ट्रिक्ट है, ये तो बैकवर्ड इलाका है। हमने देश के इस बहुत बड़े क्षेत्र को पिछड़ेपन की निराशा से बाहर निकालकर डेवलपमेंट की एस्पिरेशन जगाई। सबसे पहले तो हमने पहचान ही बदल दी, हमने कहा ये एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट है, ये एस्पिरेशनल ब्लॉक है, हमने एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट का प्रोग्राम बनाया, एस्पिरेशनल ब्लॉक का प्रोग्राम बनाया और सरकार ने विकास के हर पैरामीटर पर बहुत बारीकी से काम शुरू किया। इस डिस्ट्रिक्ट में ये तीन पहलू है, पहले उसमें से बाहर निकलो। यहां छह पहलू है, पहले इसमें से बाहर निकलो। बड़ा फोकस वे में काम शुरू किया। आज यह एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट और ब्लॉक्स राज्य की ओवरऑल ग्रोथ को आगे बढ़ाने का काम करने लगे हैं। जो पहले ग्रोथ को पीछे खींचते थे, इन एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट में बहुत बड़ी आबादी गरीब थी, अभाव में थी। बीते वर्षों में 25 करोड़ गरीबों ने गरीबी को परास्त किया है। तो इसमें इन एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट की एक बहुत बड़ी भूमिका है।

साथियों,

हम देखते हैं कि जब एक व्यक्ति बीमारी से मुक्त होता है, तो सिर्फ घर का वो व्यक्ति ठीक होता है ऐसा नहीं है। जब एक व्यक्ति बीमारी से मुक्त होता है, तो पूरा परिवार ठीक हो जाता है। ऐसे ही, जब घर का कोई एक बेटा-बेटी कुछ अचीव करता है, तो सिर्फ वो व्यक्ति अचीव करके नहीं आता, वो पूरा परिवार, पूरा परिवार अचीवमेंट से भर जाता है, विश्वास बदल जाता है। ऐसे ही, जब कोई गरीबी से बाहर आता है, तो सम्पूर्ण समाज का फायदा होता है, देश का फायदा होता है। 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं, निओ मिडिल क्लास में आए हैं, तो इसका फायदा केवल उन परिवारों तक नहीं रहता, बल्कि मिडिल क्लास का भी इसमें फायदा होता है। क्योंकि यह नया कंज्यूमर है, जो इकोनॉमी को ड्राइव करता है, उससे अल्टीमेटली मिडिल क्लास के लिए अवसर बनते हैं। यानी गरीबी कम होना केवल वेलफेयर का ही विषय नहीं है, यह अवसरों के विस्तार की गाथा है, नई एस्पिरेशंस की प्रेरणा है।

साथियों,

पिछले 12 वर्ष में जो इतना विशाल मिडिल क्लास देश में तैयार हुआ है, वो सरकार की बहुत बड़ी प्राथमिकता रहा है। मिडिल क्लास की Ease of Living के लिए सरकार ने हर स्तर पर काम किया है। अब जैसे अपने घर का सपना है। हर मिडिल क्लास परिवार की एक इच्छा रहती है कि भई खुद का घर हो, हर किसी को पूछोगे एक मन में रहता है मेरा अपना घर हो। 2014 में अगर किसी परिवार को अपना घर खरीदना होता था, तो होम लोन डबल डिजिट के इंटरेस्ट रेट पर मिलता था। लेकिन आज किसी भी बैंक से होम लोन 7-8 परसेंट के रेट पर मिल जाता है। पहले लोन लेना भी किसी युद्ध जीतने जैसा था, युद्ध जीतने में जितनी ताकत लगती थी, उतनी लोन लेने में लगती थी। आज यह घर बैठे ही संभव हो पा रहा है। मैं यहीं की बात बताता हूं, यह दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले लोग जानते हैं कि कैसे शहरी मिडिल क्लास के हजारों घर अधूरे अटके हुए थे। पैसे दे दिए थे, पूरे जिंदगी भर की कमाई बिल्डर को दे दी थी। उसने भी बढ़िया-बढ़िया पम्पलेट दिखाए, सपने दिखाए। अभी किराए पर घर में रहते हैं, तो किराया भी देना है, घर जल्दी मिलेगा। उधर किराया रहता है, घर मिल नहीं रहा, घर बन नहीं रहा, यह बहुत बुरा हाल था। इन अधूरे घरों को पूरा करने के लिए हमने 25 हजार करोड़ रुपए का स्पेशल फंड बनाया। और आपको जानकर खुशी होगी कि देश में बरसों से अटके करीब 60 हजार घरों को डिलीवरी किया जा चुका है।

साथियों,

एक और चीज है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है। यह जरूरत है, कनेक्टिविटी की, ट्रांसपोर्ट की। आज आप सोशल मीडिया में देखिए, दुनियाभर से जो भी टूरिस्ट आता है, भारत आता है, वो हमारे मेट्रो सिस्टम को देखकर हैरान रह जाता है।

साथियों,

वर्ष 2014 में करीब 28 लाख लोग, हर रोज मेट्रो से सफर करते थे। आज करीब एक करोड़ अठाइस लाख लोग हर रोज मेट्रो से सफर कर रहे हैं। अब वंदे भारत, नमो भारत और अमृत भारत जैसी हाई स्पीड ट्रेन्स देश को कनेक्ट कर रही हैं। अच्छी सड़कों, अच्छे हाईवे से, समय तो बच ही रहा है, गाड़ियों की मैंटेनेंस पर होने वाला खर्चा भी कम हुआ है। बीते वर्षों में एयरपोर्ट्स की संख्या डबल हुई है। इससे कई छोटे-छोटे शहरों में भी मिडिल क्लास को हवाई यात्रा की सुविधा पहली बार मिली है।

साथियों,

पिछले 12 साल, मिडिल क्लास के लिए कमाई के साथ-साथ बचत के भी रहे हैं। 2013-14 में, लगभग 2 लाख रुपए तक की आय होने पर टैक्स लगता था, आप सबको वो नसीब रहा होगा। और यह टैक्स मिडिल क्लास देता रहता था। आज 12 लाख रुपए तक की आय पर कोई टैक्स नहीं है। यानी टैक्स फ्री इनकम कई गुणा बढ़ गई है।

साथियों,

GST रिफॉर्म्स के कारण भी मिडिल क्लास को बहुत सुविधा हुई है। टैक्स फाइलिंग का समय और खर्चा भी बच गया है। क्योंकि यह बहुत ही आसान हो गया है। घर बैठे ही ITR फाइल हो रहे हैं, अगर कोई सेटलमेंट का इश्यू है, तो वो फेसलेस हो रहा है।

साथियों,

मिडिल क्लास परिवारों में एक बड़ा खर्चा डायबिटीज या ऐसी लाइफस्टाइल से जुड़े इलाज का भी रहता है। जन औषधि केंद्रों पर 80 परसेंट डिस्काउंट पर ऐसी दवाएं मिल रही हैं। अगर आपका पहले हजार रुपया खर्चा होता था, तो आज 200 रुपये में काम हो जाता है, 800 रुपये बच रहा है और इससे बीते वर्षों में करीब 40 हज़ार करोड़ रुपए की बचत देश के अनेक परिवारों की हुई है। मिडिल क्लास के बजट का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्गों के इलाज पर भी जाता है। आज 70 वर्ष से ऊपर के हर नागरिक के लिए 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज उपलब्ध है।

साथियों,

एक सामान्य स्वभाव है कि जब कोई सुविधा लगातार मिलती है, तो इंसान पहले की परेशानी भूल जाता है। अब 2 लाख रुपये पर आप टैक्स देते थे, अब 12 लाख तक नहीं देना पड़ रहा, लेकिन जब मैं कहूं, तब ताली बजती है। और बस में, ट्रेन में थोड़ी देर भी अगर कुछ मुसीबत आ गई, तो ढेर सारी गालियां देना शुरू हो जाते हैं और यही क्‍लास सबसे ज्यादा बोलता है।

साथियों,

मैंने जैसा कहा ना कि भई पुरानी तकलीफे भूल जाता है आदमी। आप लोगों को आज ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट से जुड़ी परेशानियां बिल्कुल याद नहीं होंगी। पहले ड्राइविंग लाइसेंस लेना होता था, तो कितनी दिक्कत होती थीं, पासपोर्ट लेना होता था, तो क्‍या-क्‍या कुछ नहीं करना पड़ता था, कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। आज ड्राइविंग लाइसेंस लेना भी आसान हुआ है और तत्काल पासपोर्ट भी औसतन 3 दिन में ही मिल जाता है।

साथियों,

मैं जानता हूं, हमारी सरकार जिस तरह काम कर रही है, उसने देश के लोगों की एस्पिरेशन बहुत बढ़ा दी है। एक काम हुआ, तो लोगों की डिमांड वहीं खत्म नहीं हो जाती है। वो उससे भी बेहतर काम चाहते है, उससे भी अपग्रेड सुविधा चाहते हैं। अगर पहले डिमांड नई सड़क की थी, तो सड़क बनने के बाद लोग पूछते हैं, मेट्रो कब आएगी? पहले अपेक्षा होती थी कि ट्रेन समय पर पहुंच जाए, ट्रेन में बैठने की साफ-सुथरी जगह मिल जाए। आज डिमांड है कि हमारे रूट पर वंदे भारत क्यों नहीं चल रही है?

साथियों,

कुछ लोगों को ये असंतोष लगता है, यह एस्पिरेशन है, हमारे देश में एक फौज ऐसी है, उसको लगता है कि यह सब मामला कुछ गड़बड़ है। लेकिन लोग आखिरकार यह अपेक्षाएं किसके पास करेंगे भई, जो करता है, उससे ही करेंगे ना! सामान्‍य लोग हीनहीं, पूरी कांग्रेस पार्टी कहती है कि जरा मोदी जी, यह हो जाना चाहिए, यह होना चाहिए, कहते रहते हैं ना! उनको भरोसा है, करेगा तो ये ही करेगा!

साथियों,

एस्पिरेशंस वहीं होती है, जहां लोगों को लगता है कि सपने पूरे हो सकते हैं। और भारत के युवाओं की, भारत के गरीब और मिडिल क्लास की यही एस्पिरेशन है। आज भाजपा-एनडीए सरकारों की ऊर्जा बनी हुई है।

साथियों,

एक तरफ, देश का बहुत बड़ा वर्ग एस्पिरेशनल है, तो दूसरी तरफ, राजनीति की एक टोली है, जिसका जीवन मंत्र बन गया है- ऑलवेज अगेंस्ट! यह टोली, क्रॉनिक डिससैटिस्फैक्शन यानी स्थाई असंतोष से भरी हुई है। आज मैं रिपब्लिक टीवी के दर्शकों को जरा इस टोली के लक्षण बताने जा रहा हूं। Symptoms पता चलेगा, तो आपको समझ आ जाएगा कि मैं क्या कह रहा हूं। आप आसानी से पहचान लेंगे। जैसे मैं उदाहरण देता हूं, आप समझ जाएंगे। इनको आप अक्सर कहते सुनेंगे, अरे फलां जगह तो चौबीस घंटे बिजली आती है, यहां क्यों नहीं? और अगले ही दिन ये लोग डैम्स का, सोलर पार्क का, थर्मल का, न्यूक्लियर प्लांट का विरोध करने के लिए ढपली लेकर के आ जाएंगे। यानी पहले दिन बिजली क्‍यों नहीं और दूसरे दिन तुम हाइड्रो पावर का डैम क्यों बना रहे हो, यह जमात ऐसी है। यह वो लोग हैं, जो खनिजों के खनन का विरोध करते थे, लेकिन आज पूछते हैं कि भारत का रेयर अर्थ मिनरल्स भंडार कहां है, सप्लाई चेन कहां है? और भारत में फलाने देश की तरह, इलेक्ट्रिक व्हीकल का इकोसिस्टम क्यों नहीं है? यह वही लोग हैं, जो कभी डेटा या आटा, इसकी डिबेट चलाते थे। पहले डाटा कि आटा, डाटा कि आटा, बड़ा मजा आता था। आज यही लोग पूछते हैं कि बताओ मोदी जी, AI में क्या काम हुआ? हद देखिए, एक सांस में कहते हैं, एक ही सांस में कहते हैं कि AI में यह होना चाहिए था, वो होना चाहिए था, हुआ क्यों नहीं? लेकिन दूसरी सांस में वही लोग कहते मिलेंगे, अरे यह डेटा सेंटर क्यों बना रहे हो? यह सेमीकंडक्टर प्लांट क्यों लगा रहे हो? और फिर यह लोग उसके 100 नुकसान गिनाने के लिए घंटे-घंटे भर सोशल मीडिया के स्‍क्रीन पर दिखेंगे, टीवी डिबेट पर दिखेंगे, अखबारों में भरे रहेंगे।

साथियों,

यह लोग करप्शन को लेकर दुनियाभर के इंडेक्स उठाकर लाते हैं, भारत को कटघरे में खड़ा करते हैं, इनके इकोसिस्टम का मीडिया भी 24-24 घंटे उछालता रहता है, लेकिन जब करप्शन के विरुद्ध एक्शन होता है, जब कार्रवाई होती है, तो यही लोग चिल्लाते हैं, सबसे पहले हल्ला मचाने का काम कौन करते हैं, यही गलत हो रहा है, फलाना गया ढीकना गया, रेड कर दी, जांच कर दी, harass कर दिया। सवाल उठाए जाते हैं, कार्रवाई ऐसे क्यों हो रही है, वैसे क्यों नहीं, अब क्यों हो रही है, तब क्यों नहीं, A पर क्यों हो रही है, B पर क्यों नहीं हो रही है, यही उनका खेल है।

साथियों,

इन लोगों का कैरेक्टर समझना देश के लिए बहुत जरूरी है। खासतौर पर मेरे देश के युवाओं को इनको पहचानने की जरूरत है और हमारी जेन जी को तो बहुत जल्दी समझना चाहिए, जल्दी समझो वरना अब सूर्यवंशी आया है, वो तेज गति से समझाता है।

साथियों,

यह लोग एक तरफ कहेंगे कि देश की सेनाओं को छूट नहीं है, हथियार नहीं मिल रहे हैं, लेकिन जब सरकार कोई डिफेंस डील करेगी, कोई आधुनिक हथियार खरीदती है, तो सबसे पहले आकर कहते हैं कि यह क्यों खरीदा? यह दुनिया भर में भारत की कूटनीति पर सवाल करेंगे, लेकिन जब भारत कूटनीति के लिए, सुरक्षा के लिए कहीं कोई इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बनाने लगेगा, तो यह लोग ढोल-ढपली लेकर हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं।

साथियों,

आज भारत जिस अहम कालखंड में है, इसमें ऐसे लोगों को पहचानना होगा, उनके कुतर्क को समझना होगा और उनसे सतर्क रहना बहुत जरूरी होगा। और आज दुर्भाग्य से, आज देश के मुख्य विपक्षी दल, कांग्रेस पर, ऐसे ही लोगों का कब्जा हो गया है। कांग्रेस कभी नेशन फर्स्ट की बात करेगी, यह सोचना भी अब झूठे सपने जैसा हो गया है। कल्पना ही नहीं कर सकते क्या कभी कांग्रेस में यह फिर से आएगी बात, जो गांधी जी के जमाने में थी।

साथियों,

आज दुनिया पुरानी धाराओं को चैलेंज कर रही है, डिसरप्शन्स की स्केल बहुत बड़ी हो गई है, लेकिन इसका एक और पक्ष है। यह चुनौतियां, नए अवसर भी ला रही है। भारत के हर युवा, हर उद्यमी, हर इनोवेटर, हर स्टार्टअप को, इन्हीं अवसरों पर फोकस करना है और इसमें सरकार, नेशन फर्स्ट की भावना के साथ पूरी तरह देश के लोगों के साथ है। भारत आज रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार हो चुका है। यह गति आगे और तेज होगी, मैं रिपब्लिक टीवी के इस मंच से देशवासियों से फिर कहूंगा कि हमारा सपना जितना बड़ा है, हमारे प्रयास भी उतने ही विराट होंगे और 140 करोड़ देशवासियों का यही साझा प्रयास, विकसित भारत बनाकर रहेगा। और आप सब लोग, मैं विश्वास से कहता हूं, अपनी आंखों से विकसित भारत देखने वाले हैं। आने वाली पीढ़ियों तक इंतजार करना पड़े, इस प्रकार से मैं काम नहीं करता, आप खुद अपनी आंखों से देखकर के जाएंगे। इसी विश्वास के साथ, मैं फिर एक बार रिपब्लिक टीवी को, उसके दर्शकों को और आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं! बहुत-बहुत धन्यवाद!