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डॉ अविनाश जी, डॉ मालकोंडैया जी और उपस्थित सभी महानुभाव, आज उपस्थित सभी जिन महानुभावों को सम्‍मानित करने का मुझे सौभाग्‍य मिला है, उन सब का मैं हृदय से अभिनंदन करता हूं, बधाई देता हूं। उनका क्षेत्र ऐसा है कि वे न तो प्रेस कॉन्‍फ्रेस कर सकते हैं, और न ही दुनिया को यह बता सकते हैं कि वे क्‍या रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च पूरी हो जाने के बाद भी, उन्‍हें दुनिया के सामने अपनी बात खुले रूप से रखने का अधिकार नहीं होता। यह अपने आप में बड़ा कठिन काम है। लेकिन यह तब संभव होता है, जब कोई ऋषि मन से इस कार्य से जूझता है। हमारे देश में हजारों सालों पहले वेदों की रचना हुई और यह आज भी मानव जाति को प्रेरणा देते हैं। लेकिन किसको पता है कि वेदों की रचना किसने की? वे ऋषि भी तो वैज्ञानिक थे, वैज्ञानिक तरीके से समाज जीवन का दर्शन करते थे, दिशा देते थे। वैज्ञानिकों का भी वैसा ही योगदान है। वे एक लेबोरेटरी में तपस्‍या करते हैं। अपने परिवार तक की देखभाल भूल कर, अपने आप को समर्पित कर देते हैं। और तब जाकर मानव कल्‍याण के लिए कुछ चीज दुनिया के सामने प्रस्‍तुत होती है। ऐसी तपस्‍या करने वाले और देश की ताकत को बढ़ावा देने वाले, मानव की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्‍प रखने वाले ये सभी वैज्ञानिक अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं।

बहुत तेजी से दुनिया बदल रही है। युद्ध के रूप-रंग बदल चुके हैं, रक्षा और संहार के सभी पैरामीटर बदल चुके हैं। टेकनोलॉजी जैसे जीवन के हर क्षेत्र को प्री-डोमिनंट्ली ड्राइव कर रही है , पूरी तरह जीवन के हर क्षेत्र में बदल रही है, वैसे ही सुरक्षा के क्षेत्र में भी है और गति इतनी तेज है कि हम एक विषय पर काँसेपचुलाइज़ करते हैं, तो उससे पहले ही दो-कदम आगे कोई प्रॉडक्ट निकल आता है और हम पीछे-के-पीछे रह जाते हैं। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज जो मैं देख रहा हूं, वो यह है कि हम समय से पहले काम कैसे करे? अगर दुनिया 2020 में इन आयुद्धों को लेकर आने वाली है, तो क्‍या हम 2018 में उसके लिए पूरा प्रबंध करके मैदान में आ सकते हैं? विश्‍व में हमारी स्‍वीकृति, हमारी मांग, ‘किसी ने किया, इसलिए हम करेंगे’ उस में नहीं है| हम विज़ुलाइज़ करें कि जगत ऐसे जाने वाला है और हम इस प्रकार से चलें, तो हो सकता है कि हम लीडर बन जाए और डीआरडीओ को स्थिति को रेस्पोंड करना होगा, डीआरडीओ ने प्रो-एक्टिव होकर एजेंडा सेट करना है। हमें ग्‍लोबल कम्‍युनिटी के लिए एजेंडा सेट करना है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास टेलेंट नहीं है, या हमारे पास रिसोर्स नहीं है। लेकिन हमने इस पर ध्‍यान नहीं दिया है क्योंकि हमारे स्वभाव में ‘अरे चलो चलता है क्या तकलीफ़ है’, ये एटीटियूड है ।

दूसरा जो मुझे लगता है, डीआरडीओ का कंट्रीब्‍यूशन कम नहीं है। इसका कंट्रीब्‍यूशन बहुत महत्‍वपूर्ण है और इसे जितनी बधाई दी जाए, वह कम है। आज इस क्षेत्र में लगे हुए छोटे-मोटे हर व्‍यक्ति अभिनंदन के अधिकारी है। लेकिन कभी उन्‍हें वैज्ञानिक तरीके से भी सोचने की आवश्‍यकता है। अभी मैं अविनाश जी से चर्चा कर रहा था। डीआरडीओ और डीआरडीओ से जुड़े हुए प्राइवेट इंडिविजुअल और कंपनीज़, इनको तो हम अवॉर्ड दे रहे हैं और अच्छा भी है,लेकिन भविष्य के लिए मुझे लगता है आवश्यकता है कि डीआरडीओ एक दूसरी कैटेगिरी के अवार्ड की व्‍यवस्‍था करे, जिसका डीआरडीओ से कोई लेना देना नहीं होगा। जिसने डीआरडीओ के साथ कभी कोई काम नहीं किया है, लेकिन इस फील्‍ड में रिसर्च करने में उन्‍होंने कोई दूसरा कॉन्‍ट्रीब्‍यूशन किया है, किसी प्रोफेसर के रूप में, आईटी के क्षेत्र में। ऐसे लोगों को भी खोजा जाए, परखा जाए तो हमें एक टेलेंट जो आउट ऑफ डीआरडीओ है उनका भी पूल बनाने की हमें संभावना खोजनी चाहिए और इसलिए हमें उस दिशा में सोचना चाहिए।

तीसरा मेरा एक आग्रह है कि हम कितने ही रिसर्च क्‍यों न करें, लेकिन आखिरकार चाहे जल सेना हो, थल सेना हो, या नौसेना हो सबसे पहले नाता सैनिक का है, क्‍योंकि उसी से उसका गुजारा होता है और ऑपरेट भी उसी को करना है। लेकिन सेना के जवान और अफसर जो रोजमर्रा की उस जिंदगी को जीते हैं, काम करते वक्‍त उसके मन में भी बड़े इनोवेटिव आइडियाज आते हैं। जब वो किसी चीज को उपयोग करता है तो उसे लगता है कि इसकी बजाय ऐसा होता तो अच्‍छा होता। उसको लगता है कि लेफ्ट साइड दरवाजा खुलता है तो राइट साइड होता तो और अच्‍छा होता। यह कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं होगा। क्‍या हम कभी हमारे तीनों बलों को, जल सेना, थल सेना और नौसेना उनमें से भी जो आज सेवा में रत है, उनको कहा जाए कि आप में कोई इनोवेटिव आइडियाज होंगे तो उनको भी शामिल किया जाएगा। आप जैसे अपना काम करते हैं। जैसे एजुकेशन में बदलाव कैसे आ रहा है। एक टीचर जो अच्‍छे प्रयोगकर्ता है, उनके आगे चलकर आइडियाज, इंस्‍टीट्यूशन में बदल कर आने वाली पीढि़यों के लिए काम आता है। वैसे ही सेना में काम करने वाले टेकनिकल पर्सन और सेवा में रत लोग हैं। हो सकता है पहाड़ में चलने वाली गाड़ी रेगिस्‍तान में न चले तो उसके कुछ आइडियाज होंगे। हमें इसको प्रमोट करना चाहिए और एक एक्‍सटेंशन ऑफ डीआरडीओ टाइप, हमें इवोल्‍व करना चाहिए। अगर यह हम इवोल्‍व करते हैं तो हमारे तीनों क्षेत्रों में काम करने वाले इस प्रकार के टेलेंट वाले जो फौजी है, अफसर है मैं मानता हूं, वे हमें ज्‍यादा प्रेक्टिकल सोल्‍यूशन दे सकते हैं या हमें वो स्‍पेसिफिक रिसर्च करने के लिए वो आइडिया दे सकते हैं कि इस समस्‍या का समाधान डीआरडीओ कर सकता है। उस पर हमें सोचना चाहिए।

चौथा, जो मुझे लगता है - कि हम डीआरडीओ के माध्‍यम से समाज में किस प्रकार से देशभर में इस क्षेत्र में रूचि रखने वाली अच्छे विश्‍वविद्यालयों की पहचान करें, और एक साल के लिए विशेष रूप से इन साइंटिस्‍टों को उन विश्‍वविद्यालयों के साथ अटैच करें? उन विश्‍वविद्यालयों के छात्रों के साथ डायलॉग हों, मिलना-जुलना हो, साल में आठ-दस सिटिंग हों। तो वहाँ जो हमारे नौजवान हैं उनके लिए साइंटिस्‍ट एक बहुत बड़ी इंस्पिरेशन बन जाएगा। जो सोचता था कि मैं अपना करियर यह बनाऊंगा, वो सोचता है कि इन्होने अपना जीवन खपा दिया, चलो मैं भी अपने कैरियर के सपने छोड़ दूँ और इसमे अपना जीवन खपा दूँ तो, हो सकता है वो देश को कुछ देकर जाए।

यही हमारा काम है संस्‍कार-संक्रमण का कि एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन, हमारे इस सामर्थ को कैसे परकोलेट भी करे और डिवेल्प भी करें और जब तक हम मैकेनिज्‍म नहीं बनाएंगे ये संभव नहीं है। यूनिवर्सिटी में हम कन्‍वोकेशन में किसी साइंटिस्‍ट को बुला लें वो एक बात है, लेकिन हम उनके टेलेंट, उनकी तपस्या और उनके योगदान को किस प्रकार से उनके साथ जोड़ें वो आपके बहुत काम आएगा।

क्‍या इन साइंटिस्टों को सेना के लोगों के साथ इन्‍टरेक्‍शन करने का मौका मिलता है ? क्‍योंकि इन्होंने इतनी बड़ी रिसर्च की है। सेना के जवान को मिलने से रक्षा का विश्‍वास पैदा होता है। क्‍या कभी सेना के जवान ने उस ऋषि को देखा है, जिसने उसकी रक्षा के लिए 15 साल लेबोरिटी में जिदंगी गुजारी है। जिस दिन सेना में काम करने वाला व्‍यक्ति उस ऋषि को और उस साइंटिस्‍ट को देखेगा, आप कल्पना कर सकतें हैं उस ऑनर का फल कैसा होगा और इसलिए हमारी पूरी व्‍यवस्‍था एक दायरे से बाहर निकाल करके जिस में ह्यूमन टच हो, एक इंस्पिरेशन हो, उस दिशा में उसको कैसे ले जा सके। मैं मानता हूं कि अभी जिन लोगों का सम्‍मान हुआ, उनसे इंटरेक्‍ट करके देंखे, आपको अनुभव होगा कि इस फंक्‍शन से उनका भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि वो काम करने वाले को भी प्रेरणा देगा और जिसने उनके लिए काम किया है उन जवानो का भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि अच्छा हमारे लिए इतना काम होता है । उसी प्रकार से डीआरडीओ को कुछ लेयर बनाने चाहिए ऐसा मुझे लगता है हालाँकि इसमें मेरा ज्‍यादा अध्‍ययन नहीं है पर एक तो है हाईटेक की तरफ जाना और बहुत बड़ा नया इनोवेशन करना है लेकिन एट द सेम टाइम रोजमर्रा की जिदंगी जीने वाला जो हमारा फौजी है, उसकी लाइफ में कम्‍फर्ट आए। ऐसे साधनों की खोज, उसका निर्माण यह एक ऐसा अवसर है। आज उसका वाटर बैग जो तीन सौ ग्राम का है तो उतना ही अच्छा बैग डेढ सौ ग्राम का कैसे बने, ताकि उसको वजन कम धोना पड़े । आज उसके जूते कितने वेट के हैं, पहाड़ों में एक तकलीफ रहती है, तो रेगिस्‍तान में दूसरी तकलीफ होती है, इसमें भी बहुत रिसर्च करना है। क्या इस दिशा में कभी रिसर्च होता ? क्‍या कभी जूते बनाने वाली कंपनी और डीआरडीओ के साथ इनका इन्‍टरफेस होता है। क्‍या ये रिसर्च करके देते हैं। ये लोग डीआरडीओ को एक लैब से बाहर निकल करके और जो उनकी रोजमर्रा की जिदंगी है। अब देखिए हम इतने इनोवेशन के साथ लोग आएंगे, इतनी नई चीजें देंगे। जो हमारी समय की सेना के जवानों के लिए बहुत ही कम्‍फर्टेबल व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध करा सकते हैं, बहुत लाभ कर सकता है। इस दिशा में क्‍या कुछ सोचा जा सकता है।

एक और विषय मेरे मन में आता है - आज डीआरडीओ के साथ करीब 50 लेबो‍रेट्री भिन्‍न- भिन्‍न क्षेत्रों में काम कर रही हैं क्‍या हम तय कर सकते हैं कि मल्‍टी-टैलेंट का उपयोग करने वाली पांच लैब हम ढूंढे 50 में से और हम एक फ़ैसला करेंगें कि 5 लैब ऐसी होंगी, जिसमें नीचे से ऊपर एक भी व्‍यक्ति 35 साल से ऊपर की उम्र का नहीं होगा। सब के सब विलो 35 होंगे। अल्‍टीमेट डिसिजन लेने वाले भी 35 साल से नीचे के होंगे। एक बार हिम्‍मत के साथ हिन्‍दुस्तान की यंगेस्‍ट टीम को हम अवसर दें, और उन्हें बतायें कि दुनिया आगे बढ़ रही है, आप बताओ। मैं विश्‍वास के साथ कहता हूं कि इस देश के टेलेंट में दम है, वो हमें बहुत कुछ नई चीजें दे सकता है।

अब आजकल साईबर सिक्‍योरिटी की बहुत बड़ी लड़ाई हैं। मैं मानता हूं कि वो 20-25 साल का नौजवान बहुत अच्छे ढंग से यह करके दे देगा हमें। क्‍योंकि उसका विकास इस दिशा में हुआ है, क्‍योंकि ये चीजें तुरंत उसके ध्‍यान में आतीं हैं। क्या हम पांच लैब टोटली डेडीकेटड टू 35 ईयर्स बना सकते हैं? डिसिजन मैकिंग प्रोसेस आखिर तक 35 से नीचे के लोगों के हाथों में दे दी जाए। हम रिस्‍क ले लेंगे। हमने बहुत रिस्‍क लिए हैं। एक रिस्‍क और ले लेंगे। आप देखिए एक नई हवा की जरूरत है। एक फ्रेश एयर की जरूरत है। और फ्रेश एयर आएगी। हमें लाभ होगा।

डिफेंस सिक्‍योरिटी को लेकर हमे हमारे सामान्‍य स्‍टुडेंट्स को भी तैयार करना चाहिए। क्‍या कभी हमने सरकार के द्वारा, स्‍कूलों के द्वारा किए गये साइन्स फेयर में कहा है, कि यह साइंस फेयर 2015 विल बी टोटली डेडीकेटड टू डिफेंस रिलेटिड इश्यूस? सब नौजवान खोजेगे, टीचर इन्‍ट्रेस्‍ट लेंगें, स्‍टडीज होंगीं, प्रोजैक्‍ट रिपोर्ट बनेंगे। लाखों की तादात में हमारे स्‍टूडेंस की इन्वाल्वमेंट, डिफेन्स टेक्‍नोलॉजी एक बहुत बड़ा काम हैं, डिफेंस रिसर्च बहुत बड़ा काम है, यह सोचने की खिड़की खुल जाएगी। हो सकता है दो-चार लोग ऐसे भी निकल आएं जिनको मन कर जाए की चलो इसको हम करियर बनायें अपना। हमने देखा है कि आजकल टेक्निकल यूनि‍वर्सिटीज की एक ग्‍लोबल रॉबोट ओलंपिक होता है। राष्ट्र स्तर का भी होता है। क्‍या हम उसको स्‍पेशली डीआरडीओ से लिंक करके रोबोट कॅंपिटिशन टोटली डेडीकेटड टू डिफेन्स बना सकते हैं?

अब देखिए ये जो नौजवान रॉबोर्ट के द्वारा फुटबाल खेलते हैं, रॉबोर्ट के द्वारा क्रिकेट खेलते हैं, वो सब उसमें मज़ा भी लेते हैं, और उसका कॉम्पीटिशन भी होता है। लेकिन उसको 2-3 स्टेप आगे हम सोच सकते हैं। एक नये तरीके से, नयी सोच के साथ, और सभी लोगों को जोड़ कर के हम इस पूरी व्यवस्था को विकसित करें और साथ साथ, समय की माँग है, दुनिया हमारा इंतज़ार नहीं करेगी। हमें ही समय से पहले दौड़ना पड़ेगा और इसलिए, हम जो भी सोचें, जो भी करें, जी- जान से जुट कर के समय से पहले करने का संकल्प करें। वरना कोई प्रॉजेक्ट कन्सीव हुआ 1992 में, और 2014 में "हा, अभी थोड़े दिन लगेंगे" की हालत में होगा, तो ये दुनिया बहुत आगे बढ़ जाएगी। इसलिए, आज डीआरडीओ से संबंधित सभी प्रमुख लोगों से मिलने का मुझे अवसर मिला है, जो इतना उत्तम काम करते हैं, और जिनमें पोटेन्षियल है। लोग कहते हैं कि मोदी जी आपकी सरकार से लोगों को बहुत अपेक्षायें हैं। जो करेगा उसी से तो अपेक्षा होती है, जो नहीं करेगा उस से कौन अपेक्षा करेगा? तो डीआरडीओ से भी मेरी अपेक्षा क्यों है? मेरी अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि डीआरडीओ में करने का सामर्थ्य है, ये मैं भली-भाँति अनुभव करता हूँ। आपके अंदर वो सामर्थ्य है और आपने कर के दिखाया है और इसलिए मुझे विश्वास है कि आप लोग यह कर सकते हैं ।

फिर एक बार सभी वैज्ञानिक महोदयो को देश की सेवा करने के लिए उत्तम योगदान करने के लिए, बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूँ, बहुत बधाई देता हूँ। धन्यवाद।

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আন্তর্জাতিক যোগা দিবস উপলক্ষ্যে প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ
June 21, 2021
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প্রতিটি দেশ, সমাজ এবং প্রত্যেকের সুস্বাস্থ্য প্রার্থনা করি: প্রধানমন্ত্রী
প্রধানমন্ত্রী ‘এক বিশ্ব এক স্বাস্থ্য’ ব্যবস্থা অর্জনের জন্য এম- যোগ অ্যাপের কথা ঘোষণা করেছেন
বিশ্বজুড়ে এই মহামারীর সময়ে যোগ মানুষের মধ্যে আস্থা অর্জন করতে এবং শক্তি সঞ্চয়ে সাহায্য করেছে: প্রধানমন্ত্রী
সামনের সারির করোনা যোদ্ধারা যোগকে তাঁদের রক্ষা কবচ হিসেবে ব্যবহার করেছেন এবং রোগীদের সাহায্য করেছেন: প্রধানমন্ত্রী
যোগ বিচ্ছিন্নভাবে থাকার পরিবর্তে সংঘবদ্ধভাবে থাকতে সাহায্য করে। আমরা সবাই যে এক, যোগের মাধ্যমে সেই উপলব্ধি গড়ে ওঠে: প্রধানমন্ত্রী
বিশ্বজুড়ে ‘বসুধৈব কুটুম্বকম’-এর মন্ত্র আজ সমাদৃত হচ্ছে: প্রধানমন্ত্রী
অনলাইন ক্লাসের সময় করোনার বিরুদ্ধে লড়াইয়ে যোগ শিশুদের শক্তিশালী করে তুলছে: প্রধানমন্ত্রী

নমস্কার,

আপনাদের সবাইকে সপ্তম আন্তর্জাতিক যোগা দিবস উপলক্ষ্যে অনেক অনেক শুভ কামনা জানাই।

আজ যখন গোটা বিশ্ব করোনা মহামারীর মোকাবিলা করছে, তখন যোগ একটি আশার আলোরূপে প্রতিভাত হচ্ছে।

দু’বছর ধরে বিশ্বের প্রায় সমস্ত দেশে ও ভারতে কোনো সরকারী অনুষ্ঠানের আয়োজন না হলেও যোগ দিবসের প্রতি উৎসাহ বিন্দুমাত্র হ্রাস পায়নি।

করোনা সংক্রমণ সত্ত্বেও এবারের আন্তর্জাতিক যোগ দিবসের মূল ভাবনা “সুস্থতার জন্য যোগ” কোটি কোটি মানুষের মনে যোগের প্রতি উৎসাহ আরো বাড়িয়েছে।

আমি আজ যোগ দিবস উপলক্ষ্যে কামনা করি প্রত্যেক দেশ, প্রতিটি সমাজের, প্রত্যেক ব্যক্তি সুস্থ থাকুন, আসুন সবাই মিলে মিশে পরস্পরের শক্তি হয়ে উঠি।

বন্ধুগণ,

আমাদের ঋষি মুনিরা যোগকে “সমত্বম্ ইয়োগো উচ্চতে” এই পরিভাষা দিয়েছে। তাঁরা সুখে  দুঃখে সমানভাবে থাকতে সংযমকে এক প্রকার যোগের মাপদন্ড করে রেখেছেন। আজ এই বিশ্বব্যাপী মহামারীর ত্রস্ত সময়ে যোগ এই মাপদন্ডকে প্রমাণিত করে দিয়েছে। করোনার এই দেড় বছরে ভারত সহ প্রায় সমস্ত দেশ বড় সঙ্কটের মোকাবিলা করে চলেছে।

বন্ধুগণ,

বিশ্বের অধিকাংশ দেশের জন্য যোগ দিবস আমাদের মতো শতাব্দী প্রাচীন সাংস্কৃতিক উৎসব নয়। এই কঠিন সময়ে, এতো সমস্যার মধ্যে এই বিষয়টা তাঁরা ভুলে থাকতে পারতেন, এটি উপেক্ষা করতে পারতেন। কিন্তু এর বিপরীতে বিশ্বব্যাপী মানুষের মনে যোগের প্রতি উৎসাহ আরো বৃদ্ধি পেয়েছে, যোগের প্রতি ভালোবাসা আরো বেড়েছে। বিগত দেড় বছরে বিশ্বের নানা প্রান্তে লক্ষ লক্ষ নতুন মানুষ যোগ সাধকে পরিণত হয়েছেন। যোগের প্রথম পর্যায় হল – সংযম এবং অনুশাসন। এই নতুন যোগ সাধকরা সংযম এবং অনুশাসনকে তাদের জীবনে রপ্ত করার চেষ্টা করেছেন।

বন্ধুগণ,

করোনার অদৃশ্য ভাইরাস যখন বিশ্বময় সংক্রমণ ছড়াচ্ছে, তখন কোনো দেশ তার সম্পদ, সামর্থ এবং মানসিকভাবে এর বিরুদ্ধে মোকাবিলার জন্য প্রস্তুত ছিল না। আমরা সবাই দেখেছি, এরকম কঠিন সময়ে যোগ, আত্মবলের একটা বড় মাধ্যম হয়ে উঠেছে। যোগ, জনগণের মনে ভরসা বাড়িয়েছে যে, আমরা এই সংক্রমণের বিরুদ্ধে লড়াই করতে পারি।

আমি যখন অগ্রণী যোদ্ধাদের সঙ্গে চিকিৎসক ও স্বাস্থ্যকর্মীদের সঙ্গে কথা বলেছি, তখন তাঁরা আমাকে বলেছেন যে, করোনার বিরুদ্ধে লড়াইয়ে তাঁরাও যোগের মাধ্যমে নিজেদের সুরক্ষা কবচ গড়ে তুলেছেন।

ডাক্তাররা যোগের মাধ্যমে নিজেদেরকে যেমন শক্তিশালী করেছেন, তেমনি রোগীদের দ্রুত চিকিৎসার ক্ষেত্রেও একে ব্যবহার করেছেন। আজ বিভিন্ন হাসপাতাল থেকে এরকম কত ছবি ও ভিডিও আসে, যেখানে চিকিৎসক, সেবিকা ও স্বাস্থ্যকর্মীরা রোগীদের যোগ শিক্ষা দিচ্ছেন। আবার অনেক জায়গায় রোগীরা তাদের অভিজ্ঞতার কথা অন্যদের বলছেন। প্রাণায়াম, অনুলোম – বিলোম –এর মতো ব্রিদিং এক্সারসাইজ আমাদের শ্বসনতন্ত্রকে কতটা শক্তিশালী করতে তুলতে পারে, এটাও বিশ্বের বিভিন্ন প্রান্ত থেকে বিশেষজ্ঞরা নিজেরাই বলছেন।

বন্ধুগণ,

মহান তামিল সন্ন্যাসী শ্রী থিরুভল্লভর বলেছেন,

 “নোড় নাড়ি, নোড় মুদল নাড়ি, হদুো তনিক্কুম, ভায় নাড়ি ভায় পচ্চয়ল”

 অর্থাৎ, কেউ অসুস্থ হলে আগে রোগ নির্ণয় করো, তার শিকড় পর্যন্ত যাও, রোগের কারণ কী - সেটা জানো, তারপর তার চিকিৎসা সুনিশ্চিত করো - যোগ এই পথই দেখায়। আজকাল চিকিৎসা স্বাস্থ্যেও উপাচারের পাশাপাশি “হিলিং” –এর উপর ততটাই গুরুত্ব দেওয়া হয়। এই হিলিং প্রক্রিয়ায় যোগ অত্যন্ত কার্যকরী ভূমিকা পালন করে। আমি অত্যন্ত আনন্দিত যে আজ যোগের এই দিকটা নিয়ে বিশ্বের নানা প্রান্তের বিশেষজ্ঞরা অনেক ধরণের বৈজ্ঞানিক গবেষণা করছেন।

করোনার সঙ্কটকালে যোগের মাধ্যমে আমাদের শরীরে যত উপকার হয়, তা আমাদের রোগ প্রতিরোধ ক্ষমতা বৃদ্ধির ক্ষেত্রে কী ধরণের ইতিবাচক প্রভাব ফেলে তা নিয়ে অনেক গবেষণা হচ্ছে। আজকাল আমরা দেখতে পাচ্ছি, অনেক বিদ্যালয়ে অনলাইন ক্লাসের শুরুর দিকে ছাত্রছাত্রীদের ১০ – ১৫ মিনিট ধরে প্রাণায়াম করানো হয়। এই প্রক্রিয়া করোনা প্রতিরোধের ক্ষেত্রেও শিশুদের শারীরিকভাবে প্রস্তুত করে তুলছে।

বন্ধুগণ,

ভারতের ঋষিরা আমাদের শিখিয়েছেন,

ব্যায়ামাৎ লহতে স্বাস্থ্যম্,

 দীর্ঘ আয়ুষ্যম্ বলম্ সুখম

 আরোগ্যম্ পরমম্ ভাগ্যম,

 স্বাস্থ্যম্ সর্বার্থ স্বাধনম্।।”

অর্থাৎ যোগ ব্যায়ামের মাধ্যমে আমরা পাই সুস্বাস্থ্য, সামর্থ এবং দীর্ঘ সুখী জীবন। আমাদের জন্য সুস্বাস্থ্যই সবচাইতে বড় ভাগ্যের বিষয়। আর সুস্বাস্থ্যই সকল সাফল্যের মাধ্যম। ভারতের ঋষিরা যখনই স্বাস্থ্য নিয়ে কথা বলেছেন, তখন তাঁরা শুধুই শারীরিক স্বাস্থ্যের কথা বলেন নি। সেজন্য যোগের ক্ষেত্রে শারীরিক স্বাস্থ্যের পাশাপাশি মানসিক স্বাস্থ্যের উন্নতিতে এতটাই জোর দেওয়া হয়।

আমরা যখন প্রাণায়াম করি, ধ্যান করি, অন্যান্য যোগাসন করি, তখন আমরা নিজেদের অন্তর্চেতনাকে অনুভব করি। যোগের মাধ্যমে আমাদের অনুভব হয়, যে আমাদের বিচারশক্তি ও আমাদের আন্তরিক সামর্থ কেমনভাবে বৃদ্ধি পাচ্ছে! বিশ্বের কোনো সমস্যা, কোনো নেতিবাচক বিষয় আমাদের ভেঙ্গে ফেলতে পারবে না!  যোগ আমাদের “স্ট্রেস থেকে স্ট্রেন্থ” দিকে,  চাপ থেকে শক্তির দিকে, নেতিবাচকতা থেকে সৃষ্টিশীলতার পথে চালিত করে। যোগ আমাদের অবসাদ থেকে উৎসাহ উদ্দীপনার পথে, আর প্রমাদ থেকে প্রসাদের দিকে নিয়ে যায়।

বন্ধুগণ,

যোগ আমাদের প্রায় সমস্ত সমস্যার সমাধানের কথা বলে, যে সমাধানগুলি সমাধানের অসীম আন্তরিক ক্ষমতা আমাদের মধ্যেই রয়েছে। আমরা নিজেরাই মহাব্রহ্মান্ডের বৃহত্তম শক্তির উৎস। আমাদের মধ্যে এই শক্তির অসংখ্য প্রকোষ্ঠ থাকায় এর সার্বিক ক্ষমতাকে আমরা উপলদ্ধি করতে পারি না।

একটা সময় আসে যখন মানুষের জীবন ঢিমেতালে চলতে থাকে, এই প্রকোষ্ঠগুলি আমাদের পূর্ণ ব্যক্তিত্বকে বিভাজিত করে রাখে। এই বিভাজন থেকে ঐক্যের পথে রূপান্তরণের নামই যোগ। অভিজ্ঞতার মাধ্যমে একটি প্রমাণিত পথ। একটি ঐক্য চেতনার নামই যোগ। এই সময় আমার গুরুদেব রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরের কিছু কথা মনে পড়েছে। যিনি বলেছিলেন,

ঈশ্বর থেকে বিচ্ছিন্নতার মধ্যে আমাদের নিজস্বতার মানে খুঁজে পাওয়া যাবে না, খুঁজে পাওয়া যাবে যোগ ও মিলনের অসীম ঐক্যে

 প্রাচীনকাল থেকে ভারত, যে ‘বসুধৈব কুটুম্বকম’ এর মন্ত্র অনুসরণ করে আসছে, এখন সেটির সারা পৃথিবীতে গ্রহণযোগ্যতা বাড়ছে। আমরা এখন প্রত্যেকে পরস্পরের সুস্থতা কামনা করছি। এভাবে মানবতা একটি ঐক্যসূত্রে গ্রথিত হচ্ছে। যোগ আমাদের একটি সার্বিক সুস্থতা উপহার দেয়। যোগ আমাদের জীবনে আরো সুখী করে। আমি নিশ্চিত, ভবিষ্যতেও যোগ রোগ প্রতিরোধক এবং স্বাস্থ্য সুরক্ষার ক্ষেত্রে জনমানসে তার ইতিবাচক ভূমিকা পালন করে যাবে।

বন্ধুগণ,

যখন ভারত রাষ্ট্রসংঘে আন্তর্জাতিক যোগ দিবসের প্রস্তাব রেখেছিল, তখন এর পেছনে এই ভাবনাই ছিল, এই যোগ বিজ্ঞানকে গোটা বিশ্বের জন্য সুলভ করে তোলা। আজ এই লক্ষ্যে ভারত, রাষ্ট্রসংঘ এবং বিশ্ব স্বাস্থ্য সংস্থার সঙ্গে হাতে হাত মিলিয়ে একটি গুরুত্বপূর্ণ পদক্ষেপ নিয়েছে। এখন বিশ্ববাসী এম-ইয়োগা অ্যাপ –এর শক্তিতে ঋদ্ধ হতে চলেছে। এই অ্যাপে “কমন ইয়োগা প্রোটোকল” –এর ভিত্তিতে যোগ প্রশিক্ষণের অসংখ্য ভিডিও বিশ্বের ভিন্ন ভিন্ন ভাষায় দেখতে পাওয়া যাবে। এটি আধুনিক প্রযুক্তি এবং প্রাচীন বিজ্ঞানের মিলনের একটি অসাধারণ উদাহরণ। আমার দৃঢ় বিশ্বাস এই এম-ইয়োগা অ্যাপ সারা পৃথিবীতে যোগকে আরো ছড়িয়ে দিতে, ‘এক বিশ্ব, এক স্বাস্থ্য’ এর প্রচেষ্টাকে সফল করে তুলতে বড় ভূমিকা পালন করবে।

বন্ধুগণ,

গীতায় বলা হয়েছে,

তং বিদ্যাদ্ দুঃখ সংযোগ

 বিয়োগং যোগ সংগ্গিতম্”

অর্থাৎ দুঃখ থেকে বিয়োগ ও মুক্তিকেই যোগ বলা হয়। সবাইকে সঙ্গে নিয়ে চলার মানসিকতা মানবতার এই যোগ যাত্রা। যোগ যাত্রাকে আমাদের এভাবেই এগিয়ে নিয়ে যেতে হবে। যে কোনো স্থানে, যে কোনো পরিস্থিতিতে, যে কোনো বয়সী প্রত্যেক মানুষের জন্য কোনো না কোনো সমাধান যোগ থেকে পাওয়া যাবে। আজ বিশ্বে যোগের প্রতি জিজ্ঞাসা ও আগ্রহ থাকা মানুষের সংখ্যা অনেক বেড়েছে। আরো বাড়ছে। দেশ – বিদেশে যোগ প্রতিষ্ঠানগুলির সংখ্যাও ক্রমাগত বৃদ্ধি পাচ্ছে। এক্ষেত্রে যোগের যে মৌলিক তত্ত্বজ্ঞান,মৌলিক সিদ্ধান্তগুলিকে বজায় রেখে, যোগ কিভাবে প্রত্যেক মানুষের কাছে পৌঁছোবে, নিরন্তর পৌঁছতে থাকবে - এটা সুনিশ্চিত করা অত্যন্ত প্রয়োজনীয়। আর এই কাজ যোগের সংঙ্গে যুক্ত মানুষদের, যোগাচার্যদের ও যোগ প্রচারকদের একসঙ্গে মিলে মিশে করতে হবে। আমাদের নিজেদেরও যোগের সংকল্প নিতে হবে। আর প্রিয়জনদেরও এই সংকল্পের সঙ্গে যুক্ত করতে হবে। “যোগ থেকে সহযোগ পর্যন্ত” এই মন্ত্র আমাদের একটি নতুন ভবিষ্যতের পথ দেখাবে, মানবতাকে শক্তিশালী করবে।

এই শুভকামনা জানিয়ে আজ আন্তর্জাতিক যোগ দিবস উপলক্ষ্যে সমগ্র মানব জাতিকে, আপনাদের সবাইকে অনেক অনেক শুভেচ্ছা।

অনেক অনেক ধন্যবাদ।