डॉ अविनाश जी, डॉ मालकोंडैया जी और उपस्थित सभी महानुभाव, आज उपस्थित सभी जिन महानुभावों को सम्‍मानित करने का मुझे सौभाग्‍य मिला है, उन सब का मैं हृदय से अभिनंदन करता हूं, बधाई देता हूं। उनका क्षेत्र ऐसा है कि वे न तो प्रेस कॉन्‍फ्रेस कर सकते हैं, और न ही दुनिया को यह बता सकते हैं कि वे क्‍या रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च पूरी हो जाने के बाद भी, उन्‍हें दुनिया के सामने अपनी बात खुले रूप से रखने का अधिकार नहीं होता। यह अपने आप में बड़ा कठिन काम है। लेकिन यह तब संभव होता है, जब कोई ऋषि मन से इस कार्य से जूझता है। हमारे देश में हजारों सालों पहले वेदों की रचना हुई और यह आज भी मानव जाति को प्रेरणा देते हैं। लेकिन किसको पता है कि वेदों की रचना किसने की? वे ऋषि भी तो वैज्ञानिक थे, वैज्ञानिक तरीके से समाज जीवन का दर्शन करते थे, दिशा देते थे। वैज्ञानिकों का भी वैसा ही योगदान है। वे एक लेबोरेटरी में तपस्‍या करते हैं। अपने परिवार तक की देखभाल भूल कर, अपने आप को समर्पित कर देते हैं। और तब जाकर मानव कल्‍याण के लिए कुछ चीज दुनिया के सामने प्रस्‍तुत होती है। ऐसी तपस्‍या करने वाले और देश की ताकत को बढ़ावा देने वाले, मानव की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्‍प रखने वाले ये सभी वैज्ञानिक अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं।

बहुत तेजी से दुनिया बदल रही है। युद्ध के रूप-रंग बदल चुके हैं, रक्षा और संहार के सभी पैरामीटर बदल चुके हैं। टेकनोलॉजी जैसे जीवन के हर क्षेत्र को प्री-डोमिनंट्ली ड्राइव कर रही है , पूरी तरह जीवन के हर क्षेत्र में बदल रही है, वैसे ही सुरक्षा के क्षेत्र में भी है और गति इतनी तेज है कि हम एक विषय पर काँसेपचुलाइज़ करते हैं, तो उससे पहले ही दो-कदम आगे कोई प्रॉडक्ट निकल आता है और हम पीछे-के-पीछे रह जाते हैं। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज जो मैं देख रहा हूं, वो यह है कि हम समय से पहले काम कैसे करे? अगर दुनिया 2020 में इन आयुद्धों को लेकर आने वाली है, तो क्‍या हम 2018 में उसके लिए पूरा प्रबंध करके मैदान में आ सकते हैं? विश्‍व में हमारी स्‍वीकृति, हमारी मांग, ‘किसी ने किया, इसलिए हम करेंगे’ उस में नहीं है| हम विज़ुलाइज़ करें कि जगत ऐसे जाने वाला है और हम इस प्रकार से चलें, तो हो सकता है कि हम लीडर बन जाए और डीआरडीओ को स्थिति को रेस्पोंड करना होगा, डीआरडीओ ने प्रो-एक्टिव होकर एजेंडा सेट करना है। हमें ग्‍लोबल कम्‍युनिटी के लिए एजेंडा सेट करना है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास टेलेंट नहीं है, या हमारे पास रिसोर्स नहीं है। लेकिन हमने इस पर ध्‍यान नहीं दिया है क्योंकि हमारे स्वभाव में ‘अरे चलो चलता है क्या तकलीफ़ है’, ये एटीटियूड है ।

दूसरा जो मुझे लगता है, डीआरडीओ का कंट्रीब्‍यूशन कम नहीं है। इसका कंट्रीब्‍यूशन बहुत महत्‍वपूर्ण है और इसे जितनी बधाई दी जाए, वह कम है। आज इस क्षेत्र में लगे हुए छोटे-मोटे हर व्‍यक्ति अभिनंदन के अधिकारी है। लेकिन कभी उन्‍हें वैज्ञानिक तरीके से भी सोचने की आवश्‍यकता है। अभी मैं अविनाश जी से चर्चा कर रहा था। डीआरडीओ और डीआरडीओ से जुड़े हुए प्राइवेट इंडिविजुअल और कंपनीज़, इनको तो हम अवॉर्ड दे रहे हैं और अच्छा भी है,लेकिन भविष्य के लिए मुझे लगता है आवश्यकता है कि डीआरडीओ एक दूसरी कैटेगिरी के अवार्ड की व्‍यवस्‍था करे, जिसका डीआरडीओ से कोई लेना देना नहीं होगा। जिसने डीआरडीओ के साथ कभी कोई काम नहीं किया है, लेकिन इस फील्‍ड में रिसर्च करने में उन्‍होंने कोई दूसरा कॉन्‍ट्रीब्‍यूशन किया है, किसी प्रोफेसर के रूप में, आईटी के क्षेत्र में। ऐसे लोगों को भी खोजा जाए, परखा जाए तो हमें एक टेलेंट जो आउट ऑफ डीआरडीओ है उनका भी पूल बनाने की हमें संभावना खोजनी चाहिए और इसलिए हमें उस दिशा में सोचना चाहिए।

तीसरा मेरा एक आग्रह है कि हम कितने ही रिसर्च क्‍यों न करें, लेकिन आखिरकार चाहे जल सेना हो, थल सेना हो, या नौसेना हो सबसे पहले नाता सैनिक का है, क्‍योंकि उसी से उसका गुजारा होता है और ऑपरेट भी उसी को करना है। लेकिन सेना के जवान और अफसर जो रोजमर्रा की उस जिंदगी को जीते हैं, काम करते वक्‍त उसके मन में भी बड़े इनोवेटिव आइडियाज आते हैं। जब वो किसी चीज को उपयोग करता है तो उसे लगता है कि इसकी बजाय ऐसा होता तो अच्‍छा होता। उसको लगता है कि लेफ्ट साइड दरवाजा खुलता है तो राइट साइड होता तो और अच्‍छा होता। यह कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं होगा। क्‍या हम कभी हमारे तीनों बलों को, जल सेना, थल सेना और नौसेना उनमें से भी जो आज सेवा में रत है, उनको कहा जाए कि आप में कोई इनोवेटिव आइडियाज होंगे तो उनको भी शामिल किया जाएगा। आप जैसे अपना काम करते हैं। जैसे एजुकेशन में बदलाव कैसे आ रहा है। एक टीचर जो अच्‍छे प्रयोगकर्ता है, उनके आगे चलकर आइडियाज, इंस्‍टीट्यूशन में बदल कर आने वाली पीढि़यों के लिए काम आता है। वैसे ही सेना में काम करने वाले टेकनिकल पर्सन और सेवा में रत लोग हैं। हो सकता है पहाड़ में चलने वाली गाड़ी रेगिस्‍तान में न चले तो उसके कुछ आइडियाज होंगे। हमें इसको प्रमोट करना चाहिए और एक एक्‍सटेंशन ऑफ डीआरडीओ टाइप, हमें इवोल्‍व करना चाहिए। अगर यह हम इवोल्‍व करते हैं तो हमारे तीनों क्षेत्रों में काम करने वाले इस प्रकार के टेलेंट वाले जो फौजी है, अफसर है मैं मानता हूं, वे हमें ज्‍यादा प्रेक्टिकल सोल्‍यूशन दे सकते हैं या हमें वो स्‍पेसिफिक रिसर्च करने के लिए वो आइडिया दे सकते हैं कि इस समस्‍या का समाधान डीआरडीओ कर सकता है। उस पर हमें सोचना चाहिए।

चौथा, जो मुझे लगता है - कि हम डीआरडीओ के माध्‍यम से समाज में किस प्रकार से देशभर में इस क्षेत्र में रूचि रखने वाली अच्छे विश्‍वविद्यालयों की पहचान करें, और एक साल के लिए विशेष रूप से इन साइंटिस्‍टों को उन विश्‍वविद्यालयों के साथ अटैच करें? उन विश्‍वविद्यालयों के छात्रों के साथ डायलॉग हों, मिलना-जुलना हो, साल में आठ-दस सिटिंग हों। तो वहाँ जो हमारे नौजवान हैं उनके लिए साइंटिस्‍ट एक बहुत बड़ी इंस्पिरेशन बन जाएगा। जो सोचता था कि मैं अपना करियर यह बनाऊंगा, वो सोचता है कि इन्होने अपना जीवन खपा दिया, चलो मैं भी अपने कैरियर के सपने छोड़ दूँ और इसमे अपना जीवन खपा दूँ तो, हो सकता है वो देश को कुछ देकर जाए।

यही हमारा काम है संस्‍कार-संक्रमण का कि एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन, हमारे इस सामर्थ को कैसे परकोलेट भी करे और डिवेल्प भी करें और जब तक हम मैकेनिज्‍म नहीं बनाएंगे ये संभव नहीं है। यूनिवर्सिटी में हम कन्‍वोकेशन में किसी साइंटिस्‍ट को बुला लें वो एक बात है, लेकिन हम उनके टेलेंट, उनकी तपस्या और उनके योगदान को किस प्रकार से उनके साथ जोड़ें वो आपके बहुत काम आएगा।

क्‍या इन साइंटिस्टों को सेना के लोगों के साथ इन्‍टरेक्‍शन करने का मौका मिलता है ? क्‍योंकि इन्होंने इतनी बड़ी रिसर्च की है। सेना के जवान को मिलने से रक्षा का विश्‍वास पैदा होता है। क्‍या कभी सेना के जवान ने उस ऋषि को देखा है, जिसने उसकी रक्षा के लिए 15 साल लेबोरिटी में जिदंगी गुजारी है। जिस दिन सेना में काम करने वाला व्‍यक्ति उस ऋषि को और उस साइंटिस्‍ट को देखेगा, आप कल्पना कर सकतें हैं उस ऑनर का फल कैसा होगा और इसलिए हमारी पूरी व्‍यवस्‍था एक दायरे से बाहर निकाल करके जिस में ह्यूमन टच हो, एक इंस्पिरेशन हो, उस दिशा में उसको कैसे ले जा सके। मैं मानता हूं कि अभी जिन लोगों का सम्‍मान हुआ, उनसे इंटरेक्‍ट करके देंखे, आपको अनुभव होगा कि इस फंक्‍शन से उनका भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि वो काम करने वाले को भी प्रेरणा देगा और जिसने उनके लिए काम किया है उन जवानो का भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि अच्छा हमारे लिए इतना काम होता है । उसी प्रकार से डीआरडीओ को कुछ लेयर बनाने चाहिए ऐसा मुझे लगता है हालाँकि इसमें मेरा ज्‍यादा अध्‍ययन नहीं है पर एक तो है हाईटेक की तरफ जाना और बहुत बड़ा नया इनोवेशन करना है लेकिन एट द सेम टाइम रोजमर्रा की जिदंगी जीने वाला जो हमारा फौजी है, उसकी लाइफ में कम्‍फर्ट आए। ऐसे साधनों की खोज, उसका निर्माण यह एक ऐसा अवसर है। आज उसका वाटर बैग जो तीन सौ ग्राम का है तो उतना ही अच्छा बैग डेढ सौ ग्राम का कैसे बने, ताकि उसको वजन कम धोना पड़े । आज उसके जूते कितने वेट के हैं, पहाड़ों में एक तकलीफ रहती है, तो रेगिस्‍तान में दूसरी तकलीफ होती है, इसमें भी बहुत रिसर्च करना है। क्या इस दिशा में कभी रिसर्च होता ? क्‍या कभी जूते बनाने वाली कंपनी और डीआरडीओ के साथ इनका इन्‍टरफेस होता है। क्‍या ये रिसर्च करके देते हैं। ये लोग डीआरडीओ को एक लैब से बाहर निकल करके और जो उनकी रोजमर्रा की जिदंगी है। अब देखिए हम इतने इनोवेशन के साथ लोग आएंगे, इतनी नई चीजें देंगे। जो हमारी समय की सेना के जवानों के लिए बहुत ही कम्‍फर्टेबल व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध करा सकते हैं, बहुत लाभ कर सकता है। इस दिशा में क्‍या कुछ सोचा जा सकता है।

एक और विषय मेरे मन में आता है - आज डीआरडीओ के साथ करीब 50 लेबो‍रेट्री भिन्‍न- भिन्‍न क्षेत्रों में काम कर रही हैं क्‍या हम तय कर सकते हैं कि मल्‍टी-टैलेंट का उपयोग करने वाली पांच लैब हम ढूंढे 50 में से और हम एक फ़ैसला करेंगें कि 5 लैब ऐसी होंगी, जिसमें नीचे से ऊपर एक भी व्‍यक्ति 35 साल से ऊपर की उम्र का नहीं होगा। सब के सब विलो 35 होंगे। अल्‍टीमेट डिसिजन लेने वाले भी 35 साल से नीचे के होंगे। एक बार हिम्‍मत के साथ हिन्‍दुस्तान की यंगेस्‍ट टीम को हम अवसर दें, और उन्हें बतायें कि दुनिया आगे बढ़ रही है, आप बताओ। मैं विश्‍वास के साथ कहता हूं कि इस देश के टेलेंट में दम है, वो हमें बहुत कुछ नई चीजें दे सकता है।

अब आजकल साईबर सिक्‍योरिटी की बहुत बड़ी लड़ाई हैं। मैं मानता हूं कि वो 20-25 साल का नौजवान बहुत अच्छे ढंग से यह करके दे देगा हमें। क्‍योंकि उसका विकास इस दिशा में हुआ है, क्‍योंकि ये चीजें तुरंत उसके ध्‍यान में आतीं हैं। क्या हम पांच लैब टोटली डेडीकेटड टू 35 ईयर्स बना सकते हैं? डिसिजन मैकिंग प्रोसेस आखिर तक 35 से नीचे के लोगों के हाथों में दे दी जाए। हम रिस्‍क ले लेंगे। हमने बहुत रिस्‍क लिए हैं। एक रिस्‍क और ले लेंगे। आप देखिए एक नई हवा की जरूरत है। एक फ्रेश एयर की जरूरत है। और फ्रेश एयर आएगी। हमें लाभ होगा।

डिफेंस सिक्‍योरिटी को लेकर हमे हमारे सामान्‍य स्‍टुडेंट्स को भी तैयार करना चाहिए। क्‍या कभी हमने सरकार के द्वारा, स्‍कूलों के द्वारा किए गये साइन्स फेयर में कहा है, कि यह साइंस फेयर 2015 विल बी टोटली डेडीकेटड टू डिफेंस रिलेटिड इश्यूस? सब नौजवान खोजेगे, टीचर इन्‍ट्रेस्‍ट लेंगें, स्‍टडीज होंगीं, प्रोजैक्‍ट रिपोर्ट बनेंगे। लाखों की तादात में हमारे स्‍टूडेंस की इन्वाल्वमेंट, डिफेन्स टेक्‍नोलॉजी एक बहुत बड़ा काम हैं, डिफेंस रिसर्च बहुत बड़ा काम है, यह सोचने की खिड़की खुल जाएगी। हो सकता है दो-चार लोग ऐसे भी निकल आएं जिनको मन कर जाए की चलो इसको हम करियर बनायें अपना। हमने देखा है कि आजकल टेक्निकल यूनि‍वर्सिटीज की एक ग्‍लोबल रॉबोट ओलंपिक होता है। राष्ट्र स्तर का भी होता है। क्‍या हम उसको स्‍पेशली डीआरडीओ से लिंक करके रोबोट कॅंपिटिशन टोटली डेडीकेटड टू डिफेन्स बना सकते हैं?

अब देखिए ये जो नौजवान रॉबोर्ट के द्वारा फुटबाल खेलते हैं, रॉबोर्ट के द्वारा क्रिकेट खेलते हैं, वो सब उसमें मज़ा भी लेते हैं, और उसका कॉम्पीटिशन भी होता है। लेकिन उसको 2-3 स्टेप आगे हम सोच सकते हैं। एक नये तरीके से, नयी सोच के साथ, और सभी लोगों को जोड़ कर के हम इस पूरी व्यवस्था को विकसित करें और साथ साथ, समय की माँग है, दुनिया हमारा इंतज़ार नहीं करेगी। हमें ही समय से पहले दौड़ना पड़ेगा और इसलिए, हम जो भी सोचें, जो भी करें, जी- जान से जुट कर के समय से पहले करने का संकल्प करें। वरना कोई प्रॉजेक्ट कन्सीव हुआ 1992 में, और 2014 में "हा, अभी थोड़े दिन लगेंगे" की हालत में होगा, तो ये दुनिया बहुत आगे बढ़ जाएगी। इसलिए, आज डीआरडीओ से संबंधित सभी प्रमुख लोगों से मिलने का मुझे अवसर मिला है, जो इतना उत्तम काम करते हैं, और जिनमें पोटेन्षियल है। लोग कहते हैं कि मोदी जी आपकी सरकार से लोगों को बहुत अपेक्षायें हैं। जो करेगा उसी से तो अपेक्षा होती है, जो नहीं करेगा उस से कौन अपेक्षा करेगा? तो डीआरडीओ से भी मेरी अपेक्षा क्यों है? मेरी अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि डीआरडीओ में करने का सामर्थ्य है, ये मैं भली-भाँति अनुभव करता हूँ। आपके अंदर वो सामर्थ्य है और आपने कर के दिखाया है और इसलिए मुझे विश्वास है कि आप लोग यह कर सकते हैं ।

फिर एक बार सभी वैज्ञानिक महोदयो को देश की सेवा करने के लिए उत्तम योगदान करने के लिए, बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूँ, बहुत बधाई देता हूँ। धन्यवाद।

Explore More
अयोध्येत श्री राम जन्मभूमी मंदिर ध्वजारोहण उत्सवात पंतप्रधानांनी केलेले भाषण

लोकप्रिय भाषण

अयोध्येत श्री राम जन्मभूमी मंदिर ध्वजारोहण उत्सवात पंतप्रधानांनी केलेले भाषण
‘Cheese from India makes its mark globally’: PM Modi lauds Indian winners at Mundial do Queijo

Media Coverage

‘Cheese from India makes its mark globally’: PM Modi lauds Indian winners at Mundial do Queijo
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
कोरियाच्या राष्ट्राध्यक्षांसोबत घेतलेल्या संयुक्त पत्रकार परिषदेदरम्यान पंतप्रधानांनी केलेले निवेदन
April 20, 2026

माननीय राष्ट्राध्यक्ष ली महोदय,

दोन्ही देशातील मान्यवर प्रतिनिधी,

माध्यम क्षेत्रातील मित्रांनो,

नमस्कार !

राष्ट्राध्यक्ष ली यांच्या भारताच्या पहिल्या भेटीचे स्वागत करताना मला अत्यंत आनंद होत आहे. त्यांचे जीवन हे चिकाटी, सेवा आणि समर्पणाचे एक प्रेरणादायी उदाहरण आहे. त्यांनी प्रत्येक आव्हानाचा सामना करताना जनतेची सेवा करण्याचा आपला निर्धार अधिकच दृढ केला आहे. जरी हा त्यांचा भारताचा पहिलाच दौरा असला तरी, आपल्या पहिल्या भेटीपासूनच भारताबद्दलचा त्यांचा स्नेह आणि आपुलकी स्पष्टपणे दिसून आली आहे.

 

मित्रांनो,

आठ वर्षांच्या कालावधीनंतर कोरियाच्या राष्ट्राध्यक्षांचा हा भारत दौरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण आहे. लोकशाही मूल्ये, बाजारपेठ आधारित अर्थव्यवस्था आणि कायद्याच्या राज्याचा आदर ही समान तत्वे आपल्या दोन्ही राष्ट्रांच्या मूलभूत विचारात खोलवर रुजलेली आहेत. हिंद-प्रशांत महासागर प्रदेशाबाबतही आपला दृष्टिकोन समान आहे. या समान तत्त्वांच्या आधारावर गेल्या दशकात आपल्या द्विपक्षीय संबंधांना अधिक गतिमान आणि व्यापक स्वरूप प्राप्त झाले आहे.

आणि आज, राष्ट्राध्यक्ष ली यांच्या भेटीने आपण या विश्वासार्ह भागीदारीला एका भविष्यवेधी भागीदारीत रूपांतरित करण्यास सज्ज आहोत. चिप्सपासून जहाजांपर्यंत, कौशल्यापासून तंत्रज्ञानापर्यंत, आणि पर्यावरणापासून ऊर्जेपर्यंत सर्व क्षेत्रांमध्ये सहकार्याच्या नवीन संधी आपण निर्माण करू. दोन्ही राष्ट्रांची प्रगती आणि समृद्धी सुनिश्चित करण्यासाठी आपण एकत्र येऊन काम करू.

मित्रांनो,

भारत आणि कोरिया यांच्यातील द्विपक्षीय व्यापार आज 27 अब्ज डॉलर्सवर पोहोचला आहे. 2030 पर्यंत हा व्यापार 50 अब्ज डॉलर्सपर्यंत नेण्यासाठी आज अनेक महत्त्वाचे निर्णय घेण्यात आले आहेत.

दोन्ही देशांमधील आर्थिक व्यवहार सुलभ करण्यासाठी आपण भारत-कोरिया वित्तीय मंच सुरू केला आहे. व्यावसायिक सहकार्य अधिक दृढ करण्यासाठी औद्योगिक सहकार्य समितीची स्थापना करण्यात आली आहे. महत्त्वपूर्ण तंत्रज्ञान आणि पुरवठा साखळीमधील सहकार्य वाढवण्यासाठी आर्थिक सुरक्षा संवाद सुरू केला जात आहे.

कोरियन कंपन्यांना, विशेषतः लघु आणि मध्यम उद्योगांचा (SMEs) भारतात प्रवेश सुलभ करण्यासाठी कोरियन औद्योगिक टाउनशिपची स्थापना देखील केली जात आहे. याव्यतिरिक्त, पुढील एका वर्षाच्या आत भारत-कोरिया व्यापार कराराचे अद्ययावतीकरण केले जाणार आहे.

 

मित्रांनो,

आज आपण पुढील दशकातील यशोगाथांचा पाया रचत आहोत. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर्स आणि माहिती तंत्रज्ञान या क्षेत्रांमधील आपली भागीदारी अधिक दृढ करण्यासाठी, आपण भारत-कोरिया डिजिटल सेतू  सुरू करत आहोत. त्याचप्रमाणे, जहाजबांधणी, शाश्वत विकास, पोलाद आणि बंदरे यांसारख्या क्षेत्रांमध्येही आपण सामंजस्य करारांवर स्वाक्षऱ्या करत आहोत.

संस्कृती आणि सर्जनशील उद्योगांमधील परस्पर सहकार्याद्वारे, आपण चित्रपट, ॲनिमेशन आणि गेमिंग या क्षेत्रांमध्येही नवीन मापदंड प्रस्थापित करू. आजचे व्यापार मंच या संधींचे प्रत्यक्ष परिणामांमध्ये रूपांतर करण्यासाठी एक व्यासपीठ म्हणून कार्य करेल.

मित्रांनो,

भारत आणि कोरिया यांचे सांस्कृतिक संबंध हजारो वर्षांपासूनचे आहेत. दोन सहस्रकांपूर्वीचा, अयोध्येची राजकुमारी सुरिरत्ना आणि कोरियाचे राजे किम सुरो यांची कथा आपल्या सामायिक वारशाचा एक भाग आहे.

आज, के-पॉप, कोरियन पॉप संगीत आणि के-ड्रामा अर्थात कोरियन कथा  भारतात अत्यंत लोकप्रिय होत आहेत. त्याचप्रमाणे, कोरियामध्येही भारतीय चित्रपटसृष्टी आणि संस्कृतीची ओळख आणि लोकप्रियता वाढत आहे. खुद्द राष्ट्रपती ली हे देखील भारतीय चित्रपटसृष्टीचे एक मोठे चाहते आहेत, याचा आम्हाला विशेष आनंद आहे. हा सांस्कृतिक दुवा अधिक बळकट करण्यासाठी, आपण 2028 मध्ये भारत-कोरिया मैत्री महोत्सवाचे आयोजन करणार आहोत. याच बरोबर, दोन्ही देशांतील लोकांचे एकमेकांशी असलेले परस्पर संबंध अधिक दृढ करण्यासाठी, आपण शिक्षण, संशोधन आणि पर्यटन या क्षेत्रांमधील सहकार्यालाही चालना देणार आहोत.

 

मित्रांनो,

जागतिक स्तरावरील तणावाच्या या काळात, भारत आणि कोरिया एकत्रितपणे शांतता व स्थैर्याचा संदेश देतात. आपल्याला हे सांगताना आनंद होत आहे की, आज कोरिया आंतरराष्ट्रीय सौर आघाडी आणि इंडो-पॅसिफिक महासागर उपक्रम यामध्ये सहभागी होत आहे. आपल्या सामायिक प्रयत्नांद्वारे, आपण शांततापूर्ण, प्रगतीशील आणि सर्वसमावेशक अशा हिंद-प्रशांत क्षेत्राच्या उभारणीत योगदान देत राहू.

 

सध्याच्या काळातील जागतिक आव्हानांचा सामना करण्यासाठी जागतिक संस्थांमध्ये सुधारणा होणे आवश्यक आहे, या मुद्द्यावरही आपले एकमत आहे.

माननीय महोदय,

सुमारे शंभर वर्षांपूर्वी, भारताचे महान कवी रवींद्रनाथ टागोर यांनी कोरियाचा उल्लेख पूर्वेचा दिवा (लँप ऑफ द इस्ट ) असा केला होता. आज, 2047 पर्यंत विकसित भारत घडवण्याचे आपले स्वप्न साकार करण्याच्या दिशेने आपण वाटचाल करताना या प्रवासात कोरिया एक महत्त्वाचा भागीदार म्हणून आपल्यासोबत आहे.

चला, आपल्या भागीदारीच्या माध्यमातून केवळ आपल्या दोन राष्ट्रांच्याच नव्हे, तर संपूर्ण जगाच्या प्रगतीचा आणि समृद्धीचा मार्ग आपण अधिक प्रशस्त करूया.

खूप खूप धन्यवाद !