डॉ अविनाश जी, डॉ मालकोंडैया जी और उपस्थित सभी महानुभाव, आज उपस्थित सभी जिन महानुभावों को सम्‍मानित करने का मुझे सौभाग्‍य मिला है, उन सब का मैं हृदय से अभिनंदन करता हूं, बधाई देता हूं। उनका क्षेत्र ऐसा है कि वे न तो प्रेस कॉन्‍फ्रेस कर सकते हैं, और न ही दुनिया को यह बता सकते हैं कि वे क्‍या रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च पूरी हो जाने के बाद भी, उन्‍हें दुनिया के सामने अपनी बात खुले रूप से रखने का अधिकार नहीं होता। यह अपने आप में बड़ा कठिन काम है। लेकिन यह तब संभव होता है, जब कोई ऋषि मन से इस कार्य से जूझता है। हमारे देश में हजारों सालों पहले वेदों की रचना हुई और यह आज भी मानव जाति को प्रेरणा देते हैं। लेकिन किसको पता है कि वेदों की रचना किसने की? वे ऋषि भी तो वैज्ञानिक थे, वैज्ञानिक तरीके से समाज जीवन का दर्शन करते थे, दिशा देते थे। वैज्ञानिकों का भी वैसा ही योगदान है। वे एक लेबोरेटरी में तपस्‍या करते हैं। अपने परिवार तक की देखभाल भूल कर, अपने आप को समर्पित कर देते हैं। और तब जाकर मानव कल्‍याण के लिए कुछ चीज दुनिया के सामने प्रस्‍तुत होती है। ऐसी तपस्‍या करने वाले और देश की ताकत को बढ़ावा देने वाले, मानव की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्‍प रखने वाले ये सभी वैज्ञानिक अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं।

बहुत तेजी से दुनिया बदल रही है। युद्ध के रूप-रंग बदल चुके हैं, रक्षा और संहार के सभी पैरामीटर बदल चुके हैं। टेकनोलॉजी जैसे जीवन के हर क्षेत्र को प्री-डोमिनंट्ली ड्राइव कर रही है , पूरी तरह जीवन के हर क्षेत्र में बदल रही है, वैसे ही सुरक्षा के क्षेत्र में भी है और गति इतनी तेज है कि हम एक विषय पर काँसेपचुलाइज़ करते हैं, तो उससे पहले ही दो-कदम आगे कोई प्रॉडक्ट निकल आता है और हम पीछे-के-पीछे रह जाते हैं। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज जो मैं देख रहा हूं, वो यह है कि हम समय से पहले काम कैसे करे? अगर दुनिया 2020 में इन आयुद्धों को लेकर आने वाली है, तो क्‍या हम 2018 में उसके लिए पूरा प्रबंध करके मैदान में आ सकते हैं? विश्‍व में हमारी स्‍वीकृति, हमारी मांग, ‘किसी ने किया, इसलिए हम करेंगे’ उस में नहीं है| हम विज़ुलाइज़ करें कि जगत ऐसे जाने वाला है और हम इस प्रकार से चलें, तो हो सकता है कि हम लीडर बन जाए और डीआरडीओ को स्थिति को रेस्पोंड करना होगा, डीआरडीओ ने प्रो-एक्टिव होकर एजेंडा सेट करना है। हमें ग्‍लोबल कम्‍युनिटी के लिए एजेंडा सेट करना है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास टेलेंट नहीं है, या हमारे पास रिसोर्स नहीं है। लेकिन हमने इस पर ध्‍यान नहीं दिया है क्योंकि हमारे स्वभाव में ‘अरे चलो चलता है क्या तकलीफ़ है’, ये एटीटियूड है ।

दूसरा जो मुझे लगता है, डीआरडीओ का कंट्रीब्‍यूशन कम नहीं है। इसका कंट्रीब्‍यूशन बहुत महत्‍वपूर्ण है और इसे जितनी बधाई दी जाए, वह कम है। आज इस क्षेत्र में लगे हुए छोटे-मोटे हर व्‍यक्ति अभिनंदन के अधिकारी है। लेकिन कभी उन्‍हें वैज्ञानिक तरीके से भी सोचने की आवश्‍यकता है। अभी मैं अविनाश जी से चर्चा कर रहा था। डीआरडीओ और डीआरडीओ से जुड़े हुए प्राइवेट इंडिविजुअल और कंपनीज़, इनको तो हम अवॉर्ड दे रहे हैं और अच्छा भी है,लेकिन भविष्य के लिए मुझे लगता है आवश्यकता है कि डीआरडीओ एक दूसरी कैटेगिरी के अवार्ड की व्‍यवस्‍था करे, जिसका डीआरडीओ से कोई लेना देना नहीं होगा। जिसने डीआरडीओ के साथ कभी कोई काम नहीं किया है, लेकिन इस फील्‍ड में रिसर्च करने में उन्‍होंने कोई दूसरा कॉन्‍ट्रीब्‍यूशन किया है, किसी प्रोफेसर के रूप में, आईटी के क्षेत्र में। ऐसे लोगों को भी खोजा जाए, परखा जाए तो हमें एक टेलेंट जो आउट ऑफ डीआरडीओ है उनका भी पूल बनाने की हमें संभावना खोजनी चाहिए और इसलिए हमें उस दिशा में सोचना चाहिए।

तीसरा मेरा एक आग्रह है कि हम कितने ही रिसर्च क्‍यों न करें, लेकिन आखिरकार चाहे जल सेना हो, थल सेना हो, या नौसेना हो सबसे पहले नाता सैनिक का है, क्‍योंकि उसी से उसका गुजारा होता है और ऑपरेट भी उसी को करना है। लेकिन सेना के जवान और अफसर जो रोजमर्रा की उस जिंदगी को जीते हैं, काम करते वक्‍त उसके मन में भी बड़े इनोवेटिव आइडियाज आते हैं। जब वो किसी चीज को उपयोग करता है तो उसे लगता है कि इसकी बजाय ऐसा होता तो अच्‍छा होता। उसको लगता है कि लेफ्ट साइड दरवाजा खुलता है तो राइट साइड होता तो और अच्‍छा होता। यह कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं होगा। क्‍या हम कभी हमारे तीनों बलों को, जल सेना, थल सेना और नौसेना उनमें से भी जो आज सेवा में रत है, उनको कहा जाए कि आप में कोई इनोवेटिव आइडियाज होंगे तो उनको भी शामिल किया जाएगा। आप जैसे अपना काम करते हैं। जैसे एजुकेशन में बदलाव कैसे आ रहा है। एक टीचर जो अच्‍छे प्रयोगकर्ता है, उनके आगे चलकर आइडियाज, इंस्‍टीट्यूशन में बदल कर आने वाली पीढि़यों के लिए काम आता है। वैसे ही सेना में काम करने वाले टेकनिकल पर्सन और सेवा में रत लोग हैं। हो सकता है पहाड़ में चलने वाली गाड़ी रेगिस्‍तान में न चले तो उसके कुछ आइडियाज होंगे। हमें इसको प्रमोट करना चाहिए और एक एक्‍सटेंशन ऑफ डीआरडीओ टाइप, हमें इवोल्‍व करना चाहिए। अगर यह हम इवोल्‍व करते हैं तो हमारे तीनों क्षेत्रों में काम करने वाले इस प्रकार के टेलेंट वाले जो फौजी है, अफसर है मैं मानता हूं, वे हमें ज्‍यादा प्रेक्टिकल सोल्‍यूशन दे सकते हैं या हमें वो स्‍पेसिफिक रिसर्च करने के लिए वो आइडिया दे सकते हैं कि इस समस्‍या का समाधान डीआरडीओ कर सकता है। उस पर हमें सोचना चाहिए।

चौथा, जो मुझे लगता है - कि हम डीआरडीओ के माध्‍यम से समाज में किस प्रकार से देशभर में इस क्षेत्र में रूचि रखने वाली अच्छे विश्‍वविद्यालयों की पहचान करें, और एक साल के लिए विशेष रूप से इन साइंटिस्‍टों को उन विश्‍वविद्यालयों के साथ अटैच करें? उन विश्‍वविद्यालयों के छात्रों के साथ डायलॉग हों, मिलना-जुलना हो, साल में आठ-दस सिटिंग हों। तो वहाँ जो हमारे नौजवान हैं उनके लिए साइंटिस्‍ट एक बहुत बड़ी इंस्पिरेशन बन जाएगा। जो सोचता था कि मैं अपना करियर यह बनाऊंगा, वो सोचता है कि इन्होने अपना जीवन खपा दिया, चलो मैं भी अपने कैरियर के सपने छोड़ दूँ और इसमे अपना जीवन खपा दूँ तो, हो सकता है वो देश को कुछ देकर जाए।

यही हमारा काम है संस्‍कार-संक्रमण का कि एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन, हमारे इस सामर्थ को कैसे परकोलेट भी करे और डिवेल्प भी करें और जब तक हम मैकेनिज्‍म नहीं बनाएंगे ये संभव नहीं है। यूनिवर्सिटी में हम कन्‍वोकेशन में किसी साइंटिस्‍ट को बुला लें वो एक बात है, लेकिन हम उनके टेलेंट, उनकी तपस्या और उनके योगदान को किस प्रकार से उनके साथ जोड़ें वो आपके बहुत काम आएगा।

क्‍या इन साइंटिस्टों को सेना के लोगों के साथ इन्‍टरेक्‍शन करने का मौका मिलता है ? क्‍योंकि इन्होंने इतनी बड़ी रिसर्च की है। सेना के जवान को मिलने से रक्षा का विश्‍वास पैदा होता है। क्‍या कभी सेना के जवान ने उस ऋषि को देखा है, जिसने उसकी रक्षा के लिए 15 साल लेबोरिटी में जिदंगी गुजारी है। जिस दिन सेना में काम करने वाला व्‍यक्ति उस ऋषि को और उस साइंटिस्‍ट को देखेगा, आप कल्पना कर सकतें हैं उस ऑनर का फल कैसा होगा और इसलिए हमारी पूरी व्‍यवस्‍था एक दायरे से बाहर निकाल करके जिस में ह्यूमन टच हो, एक इंस्पिरेशन हो, उस दिशा में उसको कैसे ले जा सके। मैं मानता हूं कि अभी जिन लोगों का सम्‍मान हुआ, उनसे इंटरेक्‍ट करके देंखे, आपको अनुभव होगा कि इस फंक्‍शन से उनका भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि वो काम करने वाले को भी प्रेरणा देगा और जिसने उनके लिए काम किया है उन जवानो का भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि अच्छा हमारे लिए इतना काम होता है । उसी प्रकार से डीआरडीओ को कुछ लेयर बनाने चाहिए ऐसा मुझे लगता है हालाँकि इसमें मेरा ज्‍यादा अध्‍ययन नहीं है पर एक तो है हाईटेक की तरफ जाना और बहुत बड़ा नया इनोवेशन करना है लेकिन एट द सेम टाइम रोजमर्रा की जिदंगी जीने वाला जो हमारा फौजी है, उसकी लाइफ में कम्‍फर्ट आए। ऐसे साधनों की खोज, उसका निर्माण यह एक ऐसा अवसर है। आज उसका वाटर बैग जो तीन सौ ग्राम का है तो उतना ही अच्छा बैग डेढ सौ ग्राम का कैसे बने, ताकि उसको वजन कम धोना पड़े । आज उसके जूते कितने वेट के हैं, पहाड़ों में एक तकलीफ रहती है, तो रेगिस्‍तान में दूसरी तकलीफ होती है, इसमें भी बहुत रिसर्च करना है। क्या इस दिशा में कभी रिसर्च होता ? क्‍या कभी जूते बनाने वाली कंपनी और डीआरडीओ के साथ इनका इन्‍टरफेस होता है। क्‍या ये रिसर्च करके देते हैं। ये लोग डीआरडीओ को एक लैब से बाहर निकल करके और जो उनकी रोजमर्रा की जिदंगी है। अब देखिए हम इतने इनोवेशन के साथ लोग आएंगे, इतनी नई चीजें देंगे। जो हमारी समय की सेना के जवानों के लिए बहुत ही कम्‍फर्टेबल व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध करा सकते हैं, बहुत लाभ कर सकता है। इस दिशा में क्‍या कुछ सोचा जा सकता है।

एक और विषय मेरे मन में आता है - आज डीआरडीओ के साथ करीब 50 लेबो‍रेट्री भिन्‍न- भिन्‍न क्षेत्रों में काम कर रही हैं क्‍या हम तय कर सकते हैं कि मल्‍टी-टैलेंट का उपयोग करने वाली पांच लैब हम ढूंढे 50 में से और हम एक फ़ैसला करेंगें कि 5 लैब ऐसी होंगी, जिसमें नीचे से ऊपर एक भी व्‍यक्ति 35 साल से ऊपर की उम्र का नहीं होगा। सब के सब विलो 35 होंगे। अल्‍टीमेट डिसिजन लेने वाले भी 35 साल से नीचे के होंगे। एक बार हिम्‍मत के साथ हिन्‍दुस्तान की यंगेस्‍ट टीम को हम अवसर दें, और उन्हें बतायें कि दुनिया आगे बढ़ रही है, आप बताओ। मैं विश्‍वास के साथ कहता हूं कि इस देश के टेलेंट में दम है, वो हमें बहुत कुछ नई चीजें दे सकता है।

अब आजकल साईबर सिक्‍योरिटी की बहुत बड़ी लड़ाई हैं। मैं मानता हूं कि वो 20-25 साल का नौजवान बहुत अच्छे ढंग से यह करके दे देगा हमें। क्‍योंकि उसका विकास इस दिशा में हुआ है, क्‍योंकि ये चीजें तुरंत उसके ध्‍यान में आतीं हैं। क्या हम पांच लैब टोटली डेडीकेटड टू 35 ईयर्स बना सकते हैं? डिसिजन मैकिंग प्रोसेस आखिर तक 35 से नीचे के लोगों के हाथों में दे दी जाए। हम रिस्‍क ले लेंगे। हमने बहुत रिस्‍क लिए हैं। एक रिस्‍क और ले लेंगे। आप देखिए एक नई हवा की जरूरत है। एक फ्रेश एयर की जरूरत है। और फ्रेश एयर आएगी। हमें लाभ होगा।

डिफेंस सिक्‍योरिटी को लेकर हमे हमारे सामान्‍य स्‍टुडेंट्स को भी तैयार करना चाहिए। क्‍या कभी हमने सरकार के द्वारा, स्‍कूलों के द्वारा किए गये साइन्स फेयर में कहा है, कि यह साइंस फेयर 2015 विल बी टोटली डेडीकेटड टू डिफेंस रिलेटिड इश्यूस? सब नौजवान खोजेगे, टीचर इन्‍ट्रेस्‍ट लेंगें, स्‍टडीज होंगीं, प्रोजैक्‍ट रिपोर्ट बनेंगे। लाखों की तादात में हमारे स्‍टूडेंस की इन्वाल्वमेंट, डिफेन्स टेक्‍नोलॉजी एक बहुत बड़ा काम हैं, डिफेंस रिसर्च बहुत बड़ा काम है, यह सोचने की खिड़की खुल जाएगी। हो सकता है दो-चार लोग ऐसे भी निकल आएं जिनको मन कर जाए की चलो इसको हम करियर बनायें अपना। हमने देखा है कि आजकल टेक्निकल यूनि‍वर्सिटीज की एक ग्‍लोबल रॉबोट ओलंपिक होता है। राष्ट्र स्तर का भी होता है। क्‍या हम उसको स्‍पेशली डीआरडीओ से लिंक करके रोबोट कॅंपिटिशन टोटली डेडीकेटड टू डिफेन्स बना सकते हैं?

अब देखिए ये जो नौजवान रॉबोर्ट के द्वारा फुटबाल खेलते हैं, रॉबोर्ट के द्वारा क्रिकेट खेलते हैं, वो सब उसमें मज़ा भी लेते हैं, और उसका कॉम्पीटिशन भी होता है। लेकिन उसको 2-3 स्टेप आगे हम सोच सकते हैं। एक नये तरीके से, नयी सोच के साथ, और सभी लोगों को जोड़ कर के हम इस पूरी व्यवस्था को विकसित करें और साथ साथ, समय की माँग है, दुनिया हमारा इंतज़ार नहीं करेगी। हमें ही समय से पहले दौड़ना पड़ेगा और इसलिए, हम जो भी सोचें, जो भी करें, जी- जान से जुट कर के समय से पहले करने का संकल्प करें। वरना कोई प्रॉजेक्ट कन्सीव हुआ 1992 में, और 2014 में "हा, अभी थोड़े दिन लगेंगे" की हालत में होगा, तो ये दुनिया बहुत आगे बढ़ जाएगी। इसलिए, आज डीआरडीओ से संबंधित सभी प्रमुख लोगों से मिलने का मुझे अवसर मिला है, जो इतना उत्तम काम करते हैं, और जिनमें पोटेन्षियल है। लोग कहते हैं कि मोदी जी आपकी सरकार से लोगों को बहुत अपेक्षायें हैं। जो करेगा उसी से तो अपेक्षा होती है, जो नहीं करेगा उस से कौन अपेक्षा करेगा? तो डीआरडीओ से भी मेरी अपेक्षा क्यों है? मेरी अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि डीआरडीओ में करने का सामर्थ्य है, ये मैं भली-भाँति अनुभव करता हूँ। आपके अंदर वो सामर्थ्य है और आपने कर के दिखाया है और इसलिए मुझे विश्वास है कि आप लोग यह कर सकते हैं ।

फिर एक बार सभी वैज्ञानिक महोदयो को देश की सेवा करने के लिए उत्तम योगदान करने के लिए, बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूँ, बहुत बधाई देता हूँ। धन्यवाद।

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ಕೊರಿಯಾ ಗಣರಾಜ್ಯದ ಅಧ್ಯಕ್ಷರೊಂದಿಗಿನ ಜಂಟಿ ಪತ್ರಿಕಾ ಹೇಳಿಕೆಯ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ ಪ್ರಧಾನಮಂತ್ರಿ ಅವರ ಪತ್ರಿಕಾ ಹೇಳಿಕೆಯ ಇಂಗ್ಲಿಷ್ ಅನುವಾದ.
April 20, 2026

ಗೌರವಾನ್ವಿತ ಅಧ್ಯಕ್ಷ ಲೀ,

ಎರಡೂ ದೇಶಗಳ ಗಣ್ಯ ಪ್ರತಿನಿಧಿಗಳೇ,

ಮಾಧ್ಯಮ ಮಿತ್ರರೇ,

ನಮಸ್ಕಾರ!

ಅಧ್ಯಕ್ಷ ಲೀ ಅವರನ್ನು ಭಾರತಕ್ಕೆ ಅವರ ಮೊದಲ ಭೇಟಿಯಲ್ಲಿ ಸ್ವಾಗತಿಸಲು ನನಗೆ ತುಂಬಾ ಸಂತೋಷವಾಗಿದೆ. ಅವರ ಜೀವನವು ಅಭ್ಯುದಯ, ಸೇವೆ ಮತ್ತು ಸಮರ್ಪಣೆಯ ಸ್ಪೂರ್ತಿದಾಯಕ ಉದಾಹರಣೆಯಾಗಿ ನಿಂತಿದೆ. ಅವರು ಎದುರಿಸಿದ ಪ್ರತಿಯೊಂದು ಸವಾಲು ಜನರಿಗೆ ಸೇವೆ ಸಲ್ಲಿಸುವ ಅವರ ಸಂಕಲ್ಪವನ್ನು ಮತ್ತಷ್ಟು ಬಲಪಡಿಸಿದೆ. ಇದು ಭಾರತಕ್ಕೆ ಅವರ ಮೊದಲ ಭೇಟಿಯಾಗಿದ್ದರೂ, ನಮ್ಮ ಮೊದಲ ಭೇಟಿಯಿಂದಲೇ ಅವರ ದೇಶದ ಮೇಲಿನ ಪ್ರೀತಿ ಮತ್ತು ಬಾಂಧವ್ಯ ಸ್ಪಷ್ಟವಾಗಿದೆ.

 

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಎಂಟು ವರ್ಷಗಳ ಅಂತರದ ನಂತರ ಕೊರಿಯಾ ಅಧ್ಯಕ್ಷರ ಭಾರತ ಭೇಟಿ ಬಹಳ ಮಹತ್ವದ್ದಾಗಿದೆ. ಪ್ರಜಾಪ್ರಭುತ್ವ ಮೌಲ್ಯಗಳು, ಮಾರುಕಟ್ಟೆ ಆರ್ಥಿಕತೆ ಮತ್ತು ಕಾನೂನಿನ ಆಡಳಿತದ ಗೌರವವು ನಮ್ಮ ಎರಡೂ ರಾಷ್ಟ್ರಗಳ ಡಿಎನ್‌ಎಯಲ್ಲಿ ಆಳವಾಗಿ ಹುದುಗಿದೆ. ಇಂಡೋ-ಪೆಸಿಫಿಕ್ ಪ್ರದೇಶದ ಬಗ್ಗೆ ನಮಗೆ ಸಾಮಾನ್ಯ ಸಮಾನ ದೃಷ್ಟಿಕೋನವಿದೆ. ಈ ಹಂಚಿಕೆಯ ತತ್ವಗಳ ಆಧಾರದ ಮೇಲೆ, ಕಳೆದ ದಶಕದಲ್ಲಿ ನಮ್ಮ ಸಂಬಂಧವು ಹೆಚ್ಚು ಕ್ರಿಯಾತ್ಮಕ ಮತ್ತು ವ್ಯಾಪಕವಾಗಿದೆ.

ಮತ್ತು ಇಂದು, ಅಧ್ಯಕ್ಷ ಲೀ ಅವರ ಭೇಟಿಯೊಂದಿಗೆ, ಈ ವಿಶ್ವಾಸಾರ್ಹ ಪಾಲುದಾರಿಕೆಯನ್ನು ಭವಿಷ್ಯದ ಪಾಲುದಾರಿಕೆಯಾಗಿ ಪರಿವರ್ತಿಸಲು ನಾವು ಸಜ್ಜಾಗಿದ್ದೇವೆ. ಚಿಪ್‌ಗಳಿಂದ ಹಡಗುಗಳವರೆಗೆ, ಪ್ರತಿಭೆಯಿಂದ ತಂತ್ರಜ್ಞಾನದವರೆಗೆ ಮತ್ತು ಪರಿಸರದಿಂದ ಶಕ್ತಿಯವರೆಗೆ, ಎಲ್ಲಾ ವಲಯಗಳಲ್ಲಿ ಸಹಕಾರಕ್ಕಾಗಿ ನಾವು ಹೊಸ ಅವಕಾಶಗಳನ್ನು  ಕಂಡುಕೊಳ್ಳುತ್ತೇವೆ. ಒಟ್ಟಾಗಿ, ನಮ್ಮ ಎರಡೂ ರಾಷ್ಟ್ರಗಳ ಪ್ರಗತಿ ಮತ್ತು ಸಮೃದ್ಧಿಯನ್ನು ನಾವು ಖಚಿತಪಡಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತೇವೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಭಾರತ ಮತ್ತು ಕೊರಿಯಾ ನಡುವಿನ ದ್ವಿಪಕ್ಷೀಯ ವ್ಯಾಪಾರ ಇಂದು ಇಪ್ಪತ್ತೇಳು ಶತಕೋಟಿ ಡಾಲರ್‌ಗಳನ್ನು ತಲುಪಿದೆ. ಇದನ್ನು 2030ರ ವೇಳೆಗೆ ಐವತ್ತು ಶತಕೋಟಿ ಡಾಲರ್‌ಗಳಿಗೆ ಕೊಂಡೊಯ್ಯಲು ನಾವು ಇಂದು ಹಲವಾರು ಪ್ರಮುಖ ನಿರ್ಧಾರಗಳನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಂಡಿದ್ದೇವೆ.

ಎರಡೂ ದೇಶಗಳ ನಡುವಿನ ಹಣಕಾಸಿನ ಹರಿವನ್ನು ಸುಗಮಗೊಳಿಸಲು, ನಾವು ಭಾರತ-ಕೊರಿಯಾ ಹಣಕಾಸು ವೇದಿಕೆಯನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದ್ದೇವೆ. ವ್ಯಾಪಾರ ಸಹಕಾರವನ್ನು ಬಲಪಡಿಸಲು, ನಾವು ಕೈಗಾರಿಕಾ ಸಹಕಾರ ಸಮಿತಿಯನ್ನು ಸ್ಥಾಪಿಸಿದ್ದೇವೆ. ನಿರ್ಣಾಯಕ ತಂತ್ರಜ್ಞಾನಗಳು ಮತ್ತು ಪೂರೈಕೆ ಸರಪಳಿಗಳಲ್ಲಿ ಸಹಯೋಗವನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸಲು, ನಾವು ಆರ್ಥಿಕ ಭದ್ರತಾ ಸಂವಾದವನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸುತ್ತಿದ್ದೇವೆ.

ಕೊರಿಯನ್ ಕಂಪನಿಗಳು, ವಿಶೇಷವಾಗಿ ಸಣ್ಣ ಮತ್ತು ಮಧ್ಯಮ ಗಾತ್ರದ ಕಂಪನಿಗಳು, ಭಾರತಕ್ಕೆ ಪ್ರವೇಶಿಸಲು ಅನುಕೂಲವಾಗುವಂತೆ, ನಾವು ಕೊರಿಯನ್ ಕೈಗಾರಿಕಾ ವಸಾಹತನ್ನು (ಪಟ್ಟಣವನ್ನು)  ಸಹ ಸ್ಥಾಪಿಸುತ್ತೇವೆ. ಇದಲ್ಲದೆ, ಮುಂದಿನ ವರ್ಷದೊಳಗೆ, ನಾವು ಭಾರತ-ಕೊರಿಯಾ ವ್ಯಾಪಾರ ಒಪ್ಪಂದವನ್ನು ಮೇಲ್ದರ್ಜೆಗೇರಿಸುತ್ತೇವೆ.

 

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಇಂದು, ನಾವು ಮುಂದಿನ ದಶಕದ ಯಶೋಗಾಥೆಗಳಿಗೆ ಅಡಿಪಾಯ ಹಾಕುತ್ತಿದ್ದೇವೆ. ಎ.ಐ., ಸೆಮಿಕಂಡಕ್ಟರ್‌ಗಳು ಮತ್ತು ಮಾಹಿತಿ ತಂತ್ರಜ್ಞಾನದಲ್ಲಿ ನಮ್ಮ ಪಾಲುದಾರಿಕೆಯನ್ನು ಮತ್ತಷ್ಟು ಗಾಢವಾಗಿಸಲು, ನಾವು ಭಾರತ-ಕೊರಿಯಾ ಡಿಜಿಟಲ್ ಸೇತುವೆಯನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸುತ್ತಿದ್ದೇವೆ. ಹಡಗು ನಿರ್ಮಾಣ, ಸುಸ್ಥಿರತೆ, ಉಕ್ಕು ಮತ್ತು ಬಂದರುಗಳಂತಹ ಕ್ಷೇತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ನಾವು ತಿಳುವಳಿಕಾ ಒಡಂಬಡಿಕೆಗಳಿಗೆ  ಸಹಿ ಹಾಕುತ್ತಿದ್ದೇವೆ.

ಸಂಸ್ಕೃತಿ ಮತ್ತು ಸೃಜನಶೀಲ ಕೈಗಾರಿಕೆಗಳಲ್ಲಿ ಪರಸ್ಪರ ಸಹಕಾರದ ಮೂಲಕ, ನಾವು ಚಲನಚಿತ್ರ, ಅನಿಮೇಷನ್ ಮತ್ತು ಗೇಮಿಂಗ್‌ನಲ್ಲಿಯೂ ಹೊಸ ಮೈಲಿಗಲ್ಲುಗಳನ್ನು ಸ್ಥಾಪಿಸುತ್ತೇವೆ. ಇಂದಿನ ವ್ಯಾಪಾರ ವೇದಿಕೆಯು ಈ ಅವಕಾಶಗಳನ್ನು ಸ್ಪಷ್ಟ ಫಲಿತಾಂಶಗಳಾಗಿ ಪರಿವರ್ತಿಸಲು ವೇದಿಕೆಯಾಗಿ ಕಾರ್ಯನಿರ್ವಹಿಸುತ್ತದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಭಾರತ ಮತ್ತು ಕೊರಿಯಾ ಸಾವಿರಾರು ವರ್ಷಗಳ ಹಿಂದಿನ ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕ ಸಂಬಂಧಗಳನ್ನು ಹಂಚಿಕೊಂಡಿವೆ. ಎರಡು ಸಹಸ್ರಮಾನಗಳ ಹಿಂದಿನ ಅಯೋಧ್ಯೆಯ ರಾಜಕುಮಾರಿ ಸುರಿರತ್ನ ಮತ್ತು ಕೊರಿಯಾದ ರಾಜ ಕಿಮ್ ಸುರೋ ಅವರ ಕಥೆಯು ನಮ್ಮ ಹಂಚಿಕೆಯ ಪರಂಪರೆಯ ಭಾಗವಾಗಿದೆ.

ಇಂದು, ಕೆ-ಪಾಪ್ ಮತ್ತು ಕೆ-ನಾಟಕಗಳು ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಹೆಚ್ಚು ಜನಪ್ರಿಯವಾಗುತ್ತಿವೆ. ಅದೇ ರೀತಿ, ಕೊರಿಯಾದಲ್ಲಿಯೂ ಭಾರತೀಯ ಸಿನಿಮಾ ಮತ್ತು ಸಂಸ್ಕೃತಿಯ ಮನ್ನಣೆ ಬೆಳೆಯುತ್ತಿದೆ. ಅಧ್ಯಕ್ಷ ಲೀ ಸ್ವತಃ ಭಾರತೀಯ ಸಿನಿಮಾದ ಅಭಿಮಾನಿಯಾಗಿರುವುದು ನಮಗೆ ಸಂತೋಷ ತಂದಿದೆ. ಈ ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕ ಸಂಪರ್ಕವನ್ನು ಮತ್ತಷ್ಟು ಬಲಪಡಿಸಲು, ನಾವು 2028 ರಲ್ಲಿ ಭಾರತ-ಕೊರಿಯಾ ಸ್ನೇಹ ಉತ್ಸವವನ್ನು ಆಯೋಜಿಸುತ್ತೇವೆ.

ಅದೇ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ಜನರಿಂದ ಜನರಿಗೆ ಸಂಬಂಧಗಳನ್ನು ಮತ್ತಷ್ಟು ಬಲಪಡಿಸಲು, ನಾವು ಶಿಕ್ಷಣ, ಸಂಶೋಧನೆ ಮತ್ತು ಪ್ರವಾಸೋದ್ಯಮದಲ್ಲಿ ಸಹಕಾರವನ್ನು ಉತ್ತೇಜಿಸುತ್ತೇವೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಜಾಗತಿಕ ಉದ್ವಿಗ್ನತೆಯ ಈ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ಭಾರತ ಮತ್ತು ಕೊರಿಯಾ ಒಟ್ಟಾಗಿ ಶಾಂತಿ ಮತ್ತು ಸ್ಥಿರತೆಯ ಸಂದೇಶವನ್ನು ರವಾನಿಸುತ್ತವೆ. ಇಂದು ಕೊರಿಯಾ ಅಂತರರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಸೌರ ಒಕ್ಕೂಟ ಮತ್ತು ಇಂಡೋ-ಪೆಸಿಫಿಕ್ ಸಾಗರ ಉಪಕ್ರಮಕ್ಕೆ ಸೇರುತ್ತಿರುವುದು ನಮಗೆ ಸಂತೋಷ ತಂದಿದೆ. ನಮ್ಮ ಹಂಚಿಕೆಯ ಪ್ರಯತ್ನಗಳ ಮೂಲಕ, ನಾವು ಶಾಂತಿಯುತ, ಪ್ರಗತಿಪರ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲರನ್ನೂ ಒಳಗೊಂಡ ಇಂಡೋ-ಪೆಸಿಫಿಕ್‌ಗೆ ಕೊಡುಗೆ ನೀಡುವುದನ್ನು ಮುಂದುವರಿಸುತ್ತೇವೆ.

 

ಸಮಕಾಲೀನ ಜಾಗತಿಕ ಸವಾಲುಗಳನ್ನು ಎದುರಿಸಲು ಜಾಗತಿಕ ಸಂಸ್ಥೆಗಳಲ್ಲಿ ಸುಧಾರಣೆಗಳು ಅಗತ್ಯವೆಂದು ನಾವು ಒಪ್ಪುತ್ತೇವೆ.

ಘನತೆವೆತ್ತರೇ,

ಸುಮಾರು ನೂರು ವರ್ಷಗಳ ಹಿಂದೆ, ಭಾರತದ ಮಹಾನ್ ಕವಿ ರವೀಂದ್ರನಾಥ ಟ್ಯಾಗೋರ್ ಅವರು ಕೊರಿಯಾವನ್ನು "ಪೂರ್ವದ ದೀಪ" ಎಂದು ಕರೆದರು. ಇಂದು, 2047ರ ವೇಳೆಗೆ ಅಭಿವೃದ್ಧಿ ಹೊಂದಿದ ಭಾರತದ ನಮ್ಮ ದೃಷ್ಟಿಕೋನವನ್ನು ಸಾಕಾರಗೊಳಿಸುವತ್ತ ನಾವು ಕೆಲಸ ಮಾಡುತ್ತಿರುವಾಗ, ಕೊರಿಯಾ ಈ ಪ್ರಯಾಣದಲ್ಲಿ ಪ್ರಮುಖ ಪಾಲುದಾರನಾಗಿ ನಿಂತಿದೆ.

 

ನಮ್ಮ ಪಾಲುದಾರಿಕೆಯ ಮೂಲಕ, ನಮ್ಮ ಎರಡು ರಾಷ್ಟ್ರಗಳ ಮಾತ್ರವಲ್ಲದೆ ಇಡೀ ಪ್ರಪಂಚದ ಪ್ರಗತಿ ಮತ್ತು ಸಮೃದ್ಧಿಗೆ ದಾರಿ ಮಾಡಿಕೊಡೋಣ.

ತುಂಬಾ ಧನ್ಯವಾದಗಳು.