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डॉ अविनाश जी, डॉ मालकोंडैया जी और उपस्थित सभी महानुभाव, आज उपस्थित सभी जिन महानुभावों को सम्‍मानित करने का मुझे सौभाग्‍य मिला है, उन सब का मैं हृदय से अभिनंदन करता हूं, बधाई देता हूं। उनका क्षेत्र ऐसा है कि वे न तो प्रेस कॉन्‍फ्रेस कर सकते हैं, और न ही दुनिया को यह बता सकते हैं कि वे क्‍या रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च पूरी हो जाने के बाद भी, उन्‍हें दुनिया के सामने अपनी बात खुले रूप से रखने का अधिकार नहीं होता। यह अपने आप में बड़ा कठिन काम है। लेकिन यह तब संभव होता है, जब कोई ऋषि मन से इस कार्य से जूझता है। हमारे देश में हजारों सालों पहले वेदों की रचना हुई और यह आज भी मानव जाति को प्रेरणा देते हैं। लेकिन किसको पता है कि वेदों की रचना किसने की? वे ऋषि भी तो वैज्ञानिक थे, वैज्ञानिक तरीके से समाज जीवन का दर्शन करते थे, दिशा देते थे। वैज्ञानिकों का भी वैसा ही योगदान है। वे एक लेबोरेटरी में तपस्‍या करते हैं। अपने परिवार तक की देखभाल भूल कर, अपने आप को समर्पित कर देते हैं। और तब जाकर मानव कल्‍याण के लिए कुछ चीज दुनिया के सामने प्रस्‍तुत होती है। ऐसी तपस्‍या करने वाले और देश की ताकत को बढ़ावा देने वाले, मानव की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्‍प रखने वाले ये सभी वैज्ञानिक अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं।

बहुत तेजी से दुनिया बदल रही है। युद्ध के रूप-रंग बदल चुके हैं, रक्षा और संहार के सभी पैरामीटर बदल चुके हैं। टेकनोलॉजी जैसे जीवन के हर क्षेत्र को प्री-डोमिनंट्ली ड्राइव कर रही है , पूरी तरह जीवन के हर क्षेत्र में बदल रही है, वैसे ही सुरक्षा के क्षेत्र में भी है और गति इतनी तेज है कि हम एक विषय पर काँसेपचुलाइज़ करते हैं, तो उससे पहले ही दो-कदम आगे कोई प्रॉडक्ट निकल आता है और हम पीछे-के-पीछे रह जाते हैं। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज जो मैं देख रहा हूं, वो यह है कि हम समय से पहले काम कैसे करे? अगर दुनिया 2020 में इन आयुद्धों को लेकर आने वाली है, तो क्‍या हम 2018 में उसके लिए पूरा प्रबंध करके मैदान में आ सकते हैं? विश्‍व में हमारी स्‍वीकृति, हमारी मांग, ‘किसी ने किया, इसलिए हम करेंगे’ उस में नहीं है| हम विज़ुलाइज़ करें कि जगत ऐसे जाने वाला है और हम इस प्रकार से चलें, तो हो सकता है कि हम लीडर बन जाए और डीआरडीओ को स्थिति को रेस्पोंड करना होगा, डीआरडीओ ने प्रो-एक्टिव होकर एजेंडा सेट करना है। हमें ग्‍लोबल कम्‍युनिटी के लिए एजेंडा सेट करना है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास टेलेंट नहीं है, या हमारे पास रिसोर्स नहीं है। लेकिन हमने इस पर ध्‍यान नहीं दिया है क्योंकि हमारे स्वभाव में ‘अरे चलो चलता है क्या तकलीफ़ है’, ये एटीटियूड है ।

दूसरा जो मुझे लगता है, डीआरडीओ का कंट्रीब्‍यूशन कम नहीं है। इसका कंट्रीब्‍यूशन बहुत महत्‍वपूर्ण है और इसे जितनी बधाई दी जाए, वह कम है। आज इस क्षेत्र में लगे हुए छोटे-मोटे हर व्‍यक्ति अभिनंदन के अधिकारी है। लेकिन कभी उन्‍हें वैज्ञानिक तरीके से भी सोचने की आवश्‍यकता है। अभी मैं अविनाश जी से चर्चा कर रहा था। डीआरडीओ और डीआरडीओ से जुड़े हुए प्राइवेट इंडिविजुअल और कंपनीज़, इनको तो हम अवॉर्ड दे रहे हैं और अच्छा भी है,लेकिन भविष्य के लिए मुझे लगता है आवश्यकता है कि डीआरडीओ एक दूसरी कैटेगिरी के अवार्ड की व्‍यवस्‍था करे, जिसका डीआरडीओ से कोई लेना देना नहीं होगा। जिसने डीआरडीओ के साथ कभी कोई काम नहीं किया है, लेकिन इस फील्‍ड में रिसर्च करने में उन्‍होंने कोई दूसरा कॉन्‍ट्रीब्‍यूशन किया है, किसी प्रोफेसर के रूप में, आईटी के क्षेत्र में। ऐसे लोगों को भी खोजा जाए, परखा जाए तो हमें एक टेलेंट जो आउट ऑफ डीआरडीओ है उनका भी पूल बनाने की हमें संभावना खोजनी चाहिए और इसलिए हमें उस दिशा में सोचना चाहिए।

तीसरा मेरा एक आग्रह है कि हम कितने ही रिसर्च क्‍यों न करें, लेकिन आखिरकार चाहे जल सेना हो, थल सेना हो, या नौसेना हो सबसे पहले नाता सैनिक का है, क्‍योंकि उसी से उसका गुजारा होता है और ऑपरेट भी उसी को करना है। लेकिन सेना के जवान और अफसर जो रोजमर्रा की उस जिंदगी को जीते हैं, काम करते वक्‍त उसके मन में भी बड़े इनोवेटिव आइडियाज आते हैं। जब वो किसी चीज को उपयोग करता है तो उसे लगता है कि इसकी बजाय ऐसा होता तो अच्‍छा होता। उसको लगता है कि लेफ्ट साइड दरवाजा खुलता है तो राइट साइड होता तो और अच्‍छा होता। यह कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं होगा। क्‍या हम कभी हमारे तीनों बलों को, जल सेना, थल सेना और नौसेना उनमें से भी जो आज सेवा में रत है, उनको कहा जाए कि आप में कोई इनोवेटिव आइडियाज होंगे तो उनको भी शामिल किया जाएगा। आप जैसे अपना काम करते हैं। जैसे एजुकेशन में बदलाव कैसे आ रहा है। एक टीचर जो अच्‍छे प्रयोगकर्ता है, उनके आगे चलकर आइडियाज, इंस्‍टीट्यूशन में बदल कर आने वाली पीढि़यों के लिए काम आता है। वैसे ही सेना में काम करने वाले टेकनिकल पर्सन और सेवा में रत लोग हैं। हो सकता है पहाड़ में चलने वाली गाड़ी रेगिस्‍तान में न चले तो उसके कुछ आइडियाज होंगे। हमें इसको प्रमोट करना चाहिए और एक एक्‍सटेंशन ऑफ डीआरडीओ टाइप, हमें इवोल्‍व करना चाहिए। अगर यह हम इवोल्‍व करते हैं तो हमारे तीनों क्षेत्रों में काम करने वाले इस प्रकार के टेलेंट वाले जो फौजी है, अफसर है मैं मानता हूं, वे हमें ज्‍यादा प्रेक्टिकल सोल्‍यूशन दे सकते हैं या हमें वो स्‍पेसिफिक रिसर्च करने के लिए वो आइडिया दे सकते हैं कि इस समस्‍या का समाधान डीआरडीओ कर सकता है। उस पर हमें सोचना चाहिए।

चौथा, जो मुझे लगता है - कि हम डीआरडीओ के माध्‍यम से समाज में किस प्रकार से देशभर में इस क्षेत्र में रूचि रखने वाली अच्छे विश्‍वविद्यालयों की पहचान करें, और एक साल के लिए विशेष रूप से इन साइंटिस्‍टों को उन विश्‍वविद्यालयों के साथ अटैच करें? उन विश्‍वविद्यालयों के छात्रों के साथ डायलॉग हों, मिलना-जुलना हो, साल में आठ-दस सिटिंग हों। तो वहाँ जो हमारे नौजवान हैं उनके लिए साइंटिस्‍ट एक बहुत बड़ी इंस्पिरेशन बन जाएगा। जो सोचता था कि मैं अपना करियर यह बनाऊंगा, वो सोचता है कि इन्होने अपना जीवन खपा दिया, चलो मैं भी अपने कैरियर के सपने छोड़ दूँ और इसमे अपना जीवन खपा दूँ तो, हो सकता है वो देश को कुछ देकर जाए।

यही हमारा काम है संस्‍कार-संक्रमण का कि एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन, हमारे इस सामर्थ को कैसे परकोलेट भी करे और डिवेल्प भी करें और जब तक हम मैकेनिज्‍म नहीं बनाएंगे ये संभव नहीं है। यूनिवर्सिटी में हम कन्‍वोकेशन में किसी साइंटिस्‍ट को बुला लें वो एक बात है, लेकिन हम उनके टेलेंट, उनकी तपस्या और उनके योगदान को किस प्रकार से उनके साथ जोड़ें वो आपके बहुत काम आएगा।

क्‍या इन साइंटिस्टों को सेना के लोगों के साथ इन्‍टरेक्‍शन करने का मौका मिलता है ? क्‍योंकि इन्होंने इतनी बड़ी रिसर्च की है। सेना के जवान को मिलने से रक्षा का विश्‍वास पैदा होता है। क्‍या कभी सेना के जवान ने उस ऋषि को देखा है, जिसने उसकी रक्षा के लिए 15 साल लेबोरिटी में जिदंगी गुजारी है। जिस दिन सेना में काम करने वाला व्‍यक्ति उस ऋषि को और उस साइंटिस्‍ट को देखेगा, आप कल्पना कर सकतें हैं उस ऑनर का फल कैसा होगा और इसलिए हमारी पूरी व्‍यवस्‍था एक दायरे से बाहर निकाल करके जिस में ह्यूमन टच हो, एक इंस्पिरेशन हो, उस दिशा में उसको कैसे ले जा सके। मैं मानता हूं कि अभी जिन लोगों का सम्‍मान हुआ, उनसे इंटरेक्‍ट करके देंखे, आपको अनुभव होगा कि इस फंक्‍शन से उनका भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि वो काम करने वाले को भी प्रेरणा देगा और जिसने उनके लिए काम किया है उन जवानो का भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि अच्छा हमारे लिए इतना काम होता है । उसी प्रकार से डीआरडीओ को कुछ लेयर बनाने चाहिए ऐसा मुझे लगता है हालाँकि इसमें मेरा ज्‍यादा अध्‍ययन नहीं है पर एक तो है हाईटेक की तरफ जाना और बहुत बड़ा नया इनोवेशन करना है लेकिन एट द सेम टाइम रोजमर्रा की जिदंगी जीने वाला जो हमारा फौजी है, उसकी लाइफ में कम्‍फर्ट आए। ऐसे साधनों की खोज, उसका निर्माण यह एक ऐसा अवसर है। आज उसका वाटर बैग जो तीन सौ ग्राम का है तो उतना ही अच्छा बैग डेढ सौ ग्राम का कैसे बने, ताकि उसको वजन कम धोना पड़े । आज उसके जूते कितने वेट के हैं, पहाड़ों में एक तकलीफ रहती है, तो रेगिस्‍तान में दूसरी तकलीफ होती है, इसमें भी बहुत रिसर्च करना है। क्या इस दिशा में कभी रिसर्च होता ? क्‍या कभी जूते बनाने वाली कंपनी और डीआरडीओ के साथ इनका इन्‍टरफेस होता है। क्‍या ये रिसर्च करके देते हैं। ये लोग डीआरडीओ को एक लैब से बाहर निकल करके और जो उनकी रोजमर्रा की जिदंगी है। अब देखिए हम इतने इनोवेशन के साथ लोग आएंगे, इतनी नई चीजें देंगे। जो हमारी समय की सेना के जवानों के लिए बहुत ही कम्‍फर्टेबल व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध करा सकते हैं, बहुत लाभ कर सकता है। इस दिशा में क्‍या कुछ सोचा जा सकता है।

एक और विषय मेरे मन में आता है - आज डीआरडीओ के साथ करीब 50 लेबो‍रेट्री भिन्‍न- भिन्‍न क्षेत्रों में काम कर रही हैं क्‍या हम तय कर सकते हैं कि मल्‍टी-टैलेंट का उपयोग करने वाली पांच लैब हम ढूंढे 50 में से और हम एक फ़ैसला करेंगें कि 5 लैब ऐसी होंगी, जिसमें नीचे से ऊपर एक भी व्‍यक्ति 35 साल से ऊपर की उम्र का नहीं होगा। सब के सब विलो 35 होंगे। अल्‍टीमेट डिसिजन लेने वाले भी 35 साल से नीचे के होंगे। एक बार हिम्‍मत के साथ हिन्‍दुस्तान की यंगेस्‍ट टीम को हम अवसर दें, और उन्हें बतायें कि दुनिया आगे बढ़ रही है, आप बताओ। मैं विश्‍वास के साथ कहता हूं कि इस देश के टेलेंट में दम है, वो हमें बहुत कुछ नई चीजें दे सकता है।

अब आजकल साईबर सिक्‍योरिटी की बहुत बड़ी लड़ाई हैं। मैं मानता हूं कि वो 20-25 साल का नौजवान बहुत अच्छे ढंग से यह करके दे देगा हमें। क्‍योंकि उसका विकास इस दिशा में हुआ है, क्‍योंकि ये चीजें तुरंत उसके ध्‍यान में आतीं हैं। क्या हम पांच लैब टोटली डेडीकेटड टू 35 ईयर्स बना सकते हैं? डिसिजन मैकिंग प्रोसेस आखिर तक 35 से नीचे के लोगों के हाथों में दे दी जाए। हम रिस्‍क ले लेंगे। हमने बहुत रिस्‍क लिए हैं। एक रिस्‍क और ले लेंगे। आप देखिए एक नई हवा की जरूरत है। एक फ्रेश एयर की जरूरत है। और फ्रेश एयर आएगी। हमें लाभ होगा।

डिफेंस सिक्‍योरिटी को लेकर हमे हमारे सामान्‍य स्‍टुडेंट्स को भी तैयार करना चाहिए। क्‍या कभी हमने सरकार के द्वारा, स्‍कूलों के द्वारा किए गये साइन्स फेयर में कहा है, कि यह साइंस फेयर 2015 विल बी टोटली डेडीकेटड टू डिफेंस रिलेटिड इश्यूस? सब नौजवान खोजेगे, टीचर इन्‍ट्रेस्‍ट लेंगें, स्‍टडीज होंगीं, प्रोजैक्‍ट रिपोर्ट बनेंगे। लाखों की तादात में हमारे स्‍टूडेंस की इन्वाल्वमेंट, डिफेन्स टेक्‍नोलॉजी एक बहुत बड़ा काम हैं, डिफेंस रिसर्च बहुत बड़ा काम है, यह सोचने की खिड़की खुल जाएगी। हो सकता है दो-चार लोग ऐसे भी निकल आएं जिनको मन कर जाए की चलो इसको हम करियर बनायें अपना। हमने देखा है कि आजकल टेक्निकल यूनि‍वर्सिटीज की एक ग्‍लोबल रॉबोट ओलंपिक होता है। राष्ट्र स्तर का भी होता है। क्‍या हम उसको स्‍पेशली डीआरडीओ से लिंक करके रोबोट कॅंपिटिशन टोटली डेडीकेटड टू डिफेन्स बना सकते हैं?

अब देखिए ये जो नौजवान रॉबोर्ट के द्वारा फुटबाल खेलते हैं, रॉबोर्ट के द्वारा क्रिकेट खेलते हैं, वो सब उसमें मज़ा भी लेते हैं, और उसका कॉम्पीटिशन भी होता है। लेकिन उसको 2-3 स्टेप आगे हम सोच सकते हैं। एक नये तरीके से, नयी सोच के साथ, और सभी लोगों को जोड़ कर के हम इस पूरी व्यवस्था को विकसित करें और साथ साथ, समय की माँग है, दुनिया हमारा इंतज़ार नहीं करेगी। हमें ही समय से पहले दौड़ना पड़ेगा और इसलिए, हम जो भी सोचें, जो भी करें, जी- जान से जुट कर के समय से पहले करने का संकल्प करें। वरना कोई प्रॉजेक्ट कन्सीव हुआ 1992 में, और 2014 में "हा, अभी थोड़े दिन लगेंगे" की हालत में होगा, तो ये दुनिया बहुत आगे बढ़ जाएगी। इसलिए, आज डीआरडीओ से संबंधित सभी प्रमुख लोगों से मिलने का मुझे अवसर मिला है, जो इतना उत्तम काम करते हैं, और जिनमें पोटेन्षियल है। लोग कहते हैं कि मोदी जी आपकी सरकार से लोगों को बहुत अपेक्षायें हैं। जो करेगा उसी से तो अपेक्षा होती है, जो नहीं करेगा उस से कौन अपेक्षा करेगा? तो डीआरडीओ से भी मेरी अपेक्षा क्यों है? मेरी अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि डीआरडीओ में करने का सामर्थ्य है, ये मैं भली-भाँति अनुभव करता हूँ। आपके अंदर वो सामर्थ्य है और आपने कर के दिखाया है और इसलिए मुझे विश्वास है कि आप लोग यह कर सकते हैं ।

फिर एक बार सभी वैज्ञानिक महोदयो को देश की सेवा करने के लिए उत्तम योगदान करने के लिए, बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूँ, बहुत बधाई देता हूँ। धन्यवाद।

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October 05, 2022
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PM dedicates AIIMS Bilaspur to the nation
PM inaugurates Government Hydro Engineering College at Bandla
PM lays foundation stone of Medical Device Park at Nalagarh
PM lays foundation stone of project for four laning of National Highway worth over Rs 1690 crores
“Fortunate to have been a part of Himachal Pradesh's development journey”
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“Himachal plays a crucial role in 'Rashtra Raksha', and now with the newly inaugurated AIIMS at Bilaspur, it will also play pivotal role in 'Jeevan Raksha'”
“Ensuring dignity of life for all is our government's priority”
“Happiness, convenience, respect and safety of women are the foremost priorities of the double engine government”
“Made in India 5G services have started, and the benefits will be available in Himachal very soon”

 ଜୋ ମାତା ନେଣା ଦେବିୟା ରୀ, ଜୋ ବଜିଏ ବାୱେ ରୀ ।

ବିଳାସପୁରବାସୀ... ଆଜି ଧନ୍ୟ ହୋଇଗଲି, ଆଜି... ମୋର... ଦଶହରାରେ, ଏହି ପାବନ ଅବସରରେ ମାତା ନେଣା ଦେବିୟା ରେ, ଆଶୀର୍ବାଦ ଯୋଗୁ, ଆପଣଙ୍କ ସହରରେ ଦର୍ଶନ କରିବାର ସୌଭାଗ୍ୟ ମିଳିଲା! ଆପଣଙ୍କ ସହରରେ ଯେଉଁ, ମୋର ରାମ ରାମ । ଏଠାରେ ଏମ୍ସ ପାଇଁ ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା ।

ହିମାଚଳର ରାଜ୍ୟପାଳ ଶ୍ରୀ ରାଜେନ୍ଦ୍ର ଆର୍ଲେକର ଜୀ, ହିମାଚଳର ଲୋକପ୍ରିୟ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀମାନ ଜୟରାମ ଠାକୁର ଜୀ, ଭାରତୀୟ ଜନତା ପାର୍ଟିର ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଅଧ୍ୟକ୍ଷ, ମୁଁ ସମସ୍ତଙ୍କ ମାର୍ଗଦର୍ଶକ ଏବଂ ଏହି ଧରିତ୍ରୀର ସନ୍ତାନ, ଶ୍ରୀମାନ ଜେପି ନଡ୍ଡା ଜୀ, କେନ୍ଦ୍ର ମନ୍ତ୍ରିମଣ୍ଡଳରେ ମୋର ସହଯୋଗୀ ଏବଂ ଆମର ସାଂସଦ ଶ୍ରୀ ଅନୁରାଗ ଠାକୁର ଜୀ, ହିମାଚଳ ଭାଜପାର ଅଧ୍ୟକ୍ଷ ଏବଂ ସଂସଦରେ ମୋର ସହଯୋଗୀ ସୁରେଶ କଶ୍ୟପ ଜୀ, ସଂସଦରେ ମୋର ସାଥି କିଶନ କପୁର ଜୀ, ଭଉଣୀ ଇନ୍ଦୁ ଗୋସ୍ୱାମୀ ଜୀ, ଡକ୍ଟର ସିକନ୍ଦର କୁମାର ଜୀ, ଅନ୍ୟ ମନ୍ତ୍ରୀଗଣ, ସାଂସଦ ଏବଂ ବିଧାୟକଗଣ ଏବଂ ବହୁ ସଂଖ୍ୟାରେ ମୋତେ ଏବଂ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେବା ପାଇଁ ଆସିଥିବା ମୋର ପ୍ରିୟ ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ! ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ବିଜୟା ଦଶମୀ ଅବସରରେ ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା ।

ଏହି ପର୍ବ ସମସ୍ତ ଅଶୁଭକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ଅମୃତ କାଳ ପାଇଁ ଯେଉଁ ପଞ୍ଚ ପ୍ରାଣର ସଂକଳ୍ପ ଦେଶ ନେଇଛି, ତା’ ଉପରେ ଚାଲିବା ପାଇଁ ନୂତନ ଶକ୍ତି ଦେବ, ମୋର ସୌଭାଗ୍ୟ ଏହି କି ଯେ ବିଜୟା ଦଶମୀ ଅବସରରେ ହିମାଚଳ ପ୍ରଦେଶର ଲୋକମାନଙ୍କ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ, ଶିକ୍ଷା, ରୋଜଗାର ଏବଂ ଭିତ୍ତିଭୂମିର ହଜାର ହଜାର, କୋଟି କୋଟି ଟଙ୍କାର ପ୍ରକଳ୍ପ, ଏହାକୁ ଉପହାର ଦେବାର ଅବସର ମିଳିଛି । ଆଉ ଏହା ମଧ୍ୟ ସଂଯୋଗ ଦେଖନ୍ତୁ । ବିଜୟା ଦଶମୀ ଥିବ ଏବଂ ବିଜୟର ବିଗୁଲର ଅବସର ଥିବ । ଏହା ଭବିଷ୍ୟତର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦୃଷ୍ଟିକୋଣର ଆରମ୍ଭ ନେଇ ଆସିଛି । ବିଳାସପୁରକୁ ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ସେବା ଦୁଇଟି ଉପହାର ମିଳିଛି । କହଲୁରା ରୀ.... ବଂଦଲେ ଧାରା ଉପ୍ପର, ହାଇଡ୍ରୋ କଲେଜ... କନେ ଥିଲ୍ଲେ ଏମ୍ସ... ହୁଣ ଏଥି ରୀ ପେହଚାନ ହୁଣୀ!

ଭାଇ ଏବଂ ଭଉଣୀମାନେ,

ଏଠାରେ ବିକାଶର ଯୋଜନାଗୁଡ଼ିକୁ ଆପଣଙ୍କୁ ଦେଇଦେବା ପରେ, ଯେମିତି ଜୟରାମ ଜୀ କହିଲେ, ଆହୁରି ଗୋଟିଏ ସାଂସ୍କୃତିକ ଐତିହ୍ୟର ସାକ୍ଷୀ ହେବାକୁ ଯାଉଛି ଏବଂ ବହୁବର୍ଷ ପରେ ମୋତେ ପୁଣିଥରେ କୁଲ୍ଲୁ ଦଶହରାରେ ଅଂଗଶ୍ରହଣ କରିବାକୁ ସୌଭାଗ୍ୟ ମିଳିବ । ଶହ ଶହ ଦେବୀ-ଦେବତାମାନଙ୍କ ସହିତ ଭଗବାନ ରଘୁନାଥ ଜୀଙ୍କର ଯାତ୍ରାରେ ସାମିଲ ହୋଇ ମୁଁ ଦେଶ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଆଶୀର୍ବାଦ ମାଗିବି । ଏବଂ ଆଜି ଯେତେବେଳେ ଏଠାରେ ବିଳାସପୁରକୁ ଆସିଛି ସେତେବେଳେ ପୁରୁଣା ସ୍ମୃତିଗୁଡ଼ିକ ମନେପଡ଼େ ତାହା ହେବା ବହୁତ ସ୍ୱାଭାବିକ ଅଟେ । ସେତେବେଳେ ମଧ୍ୟ ଗୋଟିଏ ସମୟ ଥିଲା, ଏଠାରେ ପାଦରେ ବୁଲୁଥିଲି । କେତେବେଳେ ମୁଁ, ଧୂମଲ ଜୀ ନଡ୍ଡା ଜୀ, ପାଦରେ ଚାଲି ଚାଲି ଏଠିକାର ମାର୍କେଟକୁ ବାହାରି ପଡୁଥିଲେ । ଆମେ ଗୋଟିଏ ବହୁତ ବଡ଼ ରଥଯାତ୍ରାର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଏହି ବିଳାସପୁର ଗଳି ଦେଇ ଯାଇଥିଲୁ । ଏବଂ ସେତେବେଳେ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣ ଜୟନ୍ତୀ ରଥଯାତ୍ରା ଏହି ବାଟ ଦେଇ ଏବଂ ତାହା ପୁଣି ମେନ ମାର୍କେଟରୁ ବାହାରିଥିଲା ଏବଂ ସେଠାରେ ଜନସଭା ହୋଇଥିଲା । ଏବଂ ଅନେକ ଥର ମୋର ଏଠାକୁ ଆସିବା ହେଲା, ଆପଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରହିବା ମଧ୍ୟ ହୋଇଛି ।

ହିମାଚଳର ଏହି ଭୂମିରେ କାମ କରିବାରେ ମୋତେ ନିରନ୍ତର ହିମାଚଳର ବିକାଶ ଯାତ୍ରାର ସହଯୋଗୀ ହେବାର ଅବସର ମିଳିଛି । ଏବଂ ମୁଁ ଏବେ ଶୁଣୁଥିଲି, ଅନୁରାଗ ଜୀ ବହୁତ ଜୋର ଜୋରରେ କହୁଥିଲେ, ଏହା ମୋଦୀ ଜୀ କରିଛନ୍ତି, ଏହା ମୋଦୀ ଜୀ କରିଛନ୍ତି, ଏହା ମୋଦୀ ଜୀ କରିଛନ୍ତି । ଏହା ମୋଦୀ ଜୀ କରିଛନ୍ତି ଏବଂ ଆମର ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଜୟରାମ ଜୀ ମଧ୍ୟ କହୁଥିଲେ, ମୋଦୀ ଜୀ କରିଛନ୍ତି, ମୋଦୀ ଜୀ କରିଛନ୍ତି । କିନ୍ତୁ ମୁଁ ସତ କହୁଛି, ସତ କହିବି କିଏ କରିଛନ୍ତି, କହିବି? ଏହା ଯାହା କିଛି ହେଉଛି ତାହା ଆପଣ କରିଛନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ କାରଣରୁ ହୋଇପାରିଛି। ଯଦି ଆପଣ ଦିଲ୍ଲୀରେ କେବଳ ମୋଦୀ ଜୀଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେବା ପାଇଁ ଏବଂ ହିମାଚଳର ମୋଦୀ ଜୀଙ୍କ ସାଥିମାନଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ ନ ଦେବେ ତେବେ ଏହି ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ସେମାନେ ବାଧା ସୃଷ୍ଟି କରିଥାନ୍ତେ । ଏହା ଜୟରାମ ଜୀ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଟିମ୍ ଯିଏକି ଯେଉଁ କାମ ଦିଲ୍ଲୀରୁ ମୁଁ ନେଇ ଆସିଥାଏ, ତାହାକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଏହି ଲୋକମାନେ କରିଥାନ୍ତି, ଏଥିପାଇଁ ହେଉଛି । ଏବଂ ଏହା ଯଦି ଏପରି ହୋଇପାରିଛି ତେବେ ଆପଣଙ୍କର ଗୋଟିଏ ଭୋଟର ଶକ୍ତି ଅଟେ, ଯଦି ଟନେଲ ତିଆରି ହୋଇପାରିଛି ତାହା ଆପଣଙ୍କର ଗୋଟିଏ ଭୋଟର ତାକତ ଅଟେ, ହାଇଡ୍ରୋ ଇଞ୍ଜିନିୟରିଂ କଲେଜ ହୋଇଛି ତେବେ ଏହା ଆପଣଙ୍କ ଭୋଟର ତାକତ ଅଟେ, ଯଦି ମେଡିକାଲ ଡିଭାଇସ ପାର୍କ ତିଆରି ହେଉଛି ତେବେ ଏହା ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କର ଗୋଟିଏ ଭୋଟର ତାକତ ଅଟେ ଏବଂ ସେଥିପାଇଁ ଆଜି ମୁଁ ହିମାଚଳର ଅପେକ୍ଷାକୁ ଧ୍ୟାନରେ ରଖି ଗୋଟିଏ ପରେ ଗୋଟିଏ ବିକାଶର କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛି ।

ବିକାଶକୁ ନେଇ ଆମେ ଦେଶରେ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଗୋଟିଏ ବିକୃତ ଚିନ୍ତାଧାରା ଉପରେ ଦବି ଯିବାର ଦେଖିଛି । ଏହି ଭାବନା କ’ଣ ଥିଲା? ଭଲ ସଡ଼କ ହେବ ତେବେ କିଛି ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ଏବଂ କିଛି ବଡ଼ ବଡ଼ ସହରରେ ହେବ, ଦିଲ୍ଲୀର ଆଖପାଖରେ ହେବ । ଭଲ ଶିକ୍ଷା ସଂସ୍ଥାନ ହେବ, ତେବେ ବହୁତ ବଡ଼ ବଡ଼ ସହରରେ ହେବ, ଭଲ ଡାକ୍ତରଖାନା ହେବ ତେବେ ତାହା ଦିଲ୍ଲୀରେ ହିଁ ହୋଇପାରିବ, ବାହାରେ କେଉଁଠି ହୋଇ ମଧ୍ୟ ପାରିବ ନାହିଁ । ଉଦ୍ୟୋଗ କାରବାର ହେବ ତେବେ ମଧ୍ୟ ବଡ଼ ବଡ଼ ସ୍ଥାନରେ ଲାଗିବ ଏବଂ ବିଶେଷ କରି ଦେଶର ପାହାଡ଼ିଆ ପ୍ରଦେଶରେ ମୌଳିକ ସୁବିଧାମାନ ସବୁଠାରୁ ଶେଷରେ, ବହୁ ବହୁ ବର୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅପେକ୍ଷା କରିବା ପରେ ପହଂଚୁଥିଲା। ସେହି ପୁରୁଣା ବିଚାରଧାରାର ପରିଣାମ ଏମିତି ହେଲା ଯେ ଏଥିରେ ଦେଶରେ ବିକାଶର ଏକ ବଡ଼ ଅସନ୍ତୁଳନତା ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଗଲା । ଏହି କାରଣରୁ ଦେଶର ଗୋଟିଏ ବଡ଼ ଅଂଶ, ସେଠିକାର ଲୋକମାନେ ଅସୁବିଧାରେ, ଅଭାବରେ ରହିଲେ ।

ଗତ ୮ ବର୍ଷରେ ଦେଶ ଏବେ ସେହି ପୁରୁଣା ଚିନ୍ତାଧାରାକୁ ପଛରେ ପକାଇ, ନୂତନ ଚିନ୍ତାଧାରା, ଆଧୁନିକ ଚିନ୍ତାଧାରା ସହିତ ଆଗକୁ ବଢୁଛି । ବର୍ତ୍ତମାନ ଦେଖନ୍ତୁ, ଦୀର୍ଘ ସମୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏବଂ ମୁଁ ଯେତେବେଳେ ଏଠାରେ ଥିଲି, ମୁଁ ଲଗାତାର ଦେଖୁଥିଲି, ଏଠାରେ ଗୋଟିଏ ୟୁନିଭର୍ସିଟିରୁ ହିଁ ରୋଜଗାର ହେଉଥିଲା । ଚିକିତ୍ସା ହେଉ କିମ୍ବା ପୁଣି ମେଡିକାଲର ପାଠପଢ଼ା, ଆଇଜିଏମସି ଶିମଲା ଏବଂ ଟାଟା ମେଡିକାଲ କଲେଜ ଉପରେ ହିଁ ନିର୍ଭର କରିବାକୁ ପଡୁଥିଲା । ବଡ଼ ରୋଗର ଚିକିତ୍ସା ହେଉ କିମ୍ବା ପୁଣି ଶିକ୍ଷା କିମ୍ବା ରୋଜଗାର, ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ ଏବଂ ଦିଲ୍ଲୀ ଯିବା ସେତେବେଳେ ହିମାଚଳ ପାଇଁ ମଜବୁରୀ ହୋଇ ଯାଉଥିଲା । କିନ୍ତୁ ଗତ ଆଠ ବର୍ଷରେ ଆମର ଡବଲ ଇଞ୍ଜିନର ସରକାର ହିମାଚଳର ବିକାଶର ଗାଥାକୁ ନୂତନ ଅଧିକତମ ସୀମାରେ ପହଞ୍ଚାଇ ଦେଇଥିଲେ । ଆଜି ହିମାଚଳରେ ସେଣ୍ଟ୍ରାଲ ୟୁନିଭର୍ସିଟି ମଧ୍ୟ ଅଛି, ଆଇଆଇଟି ମଧ୍ୟ ଅଛି, ଟ୍ରିପଲ ଆଇଟି ମଧ୍ୟ ଅଛି, ଇଣ୍ଡିଆନ ଇନଷ୍ଟିଚୁ୍ୟଟ ଅଫ ମ୍ୟାନେଜମେଣ୍ଟ (ଆଇଆଇଏମ) ଭଳି ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ସଂସ୍ଥାନ ମଧ୍ୟ ଅଛି । ଦେଶରେ ମେଡିକାଲ ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ବିଭାଗରେ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ସଂସ୍ଥାନ, ଏମ୍ସ ମଧ୍ୟ ବର୍ତ୍ତମାନ ବିଳାସପୁର ଏବଂ ହିମାଚଳର ଜନତାଙ୍କର ଗୌରବକୁ ବଢ଼ାଉଛି ।

ବିଳାସପୁର ଏମ୍ସ ଆହୁରି ପରିବର୍ତ୍ତନରେ ମଧ୍ୟ ଏକ ପ୍ରତୀକ ଅଟେ ଏବଂ ଏମ୍ସ ଭିତରେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଗ୍ରୀନ ଏମ୍ସ ଭାବରେ ପରିଚିତ ହେବ । ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବରେ ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ ପ୍ରେମୀ ଏମ୍ସ, ପ୍ରକୃତି ପ୍ରେମୀ ଏମ୍ସ । ବର୍ତ୍ତମାନ ଆମର ସମସ୍ତ ସାଥୀମାନେ କହିଲେ, ପୂର୍ବ ସରକାର ଶିଳାନ୍ୟାସର ପ୍ରସ୍ତର ଲଗାଉଥିଲେ ଏବଂ ନିର୍ବାଚନ ବାହାରିବା ପରେ ଭୁଲି ଯାଉଥିଲେ । ଆଜି ମଧ୍ୟ ହିମାଚଳକୁ ଯିବେ, ଆମର ଧୁମଲ ଜୀ ଗୋଟିଏ ଥର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ କରିଥିଲେ । କେଉଁଠି କେଉଁଠି ପଥର ପଡ଼ିଥିଲା ତାକୁ ଖୋଜିବାକୁ ଏବଂ ବହୁତଗୁଡ଼ିଏ ଏମିତି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ଯେଉଁଠି ଶିଳାନ୍ୟାସ ହୋଇଥିଲା, କାମ ହୋଇ ନ ଥିଲା ।

ମୋର ମନେ ଅଛି ମୁଁ ଗୋଟିଏ ଥର ରେଳବାଇର ରିଭୁ୍ୟ କରୁଥିଲି, ଆପଣଙ୍କର ଉନା ନିକଟେ ଗୋଟିଏ ରେଲୱେ ଲାଇନ ବିଛାଇବାର ଥିଲା । ୩୫ ବର୍ଷ ପୂର୍ବରୁ ନିର୍ଣ୍ଣୟ ହୋଇଥିଲା, ୩୫ ବର୍ଷ ପୂର୍ବରୁ ପାର୍ଲାମେଣ୍ଟରେ ଘୋଷଣା ହୋଇଥିଲା । କିନ୍ତୁ ପୁଣି ଫାଇଲ ବଡ଼ । ହିମାଚଳକୁ କିଏ ପଚାରିବ ଭାଇ । କିନ୍ତୁ ଇଏ ତ ହିମାଚଳର ପୁଅ ଏବଂ ହିମାଚଳକୁ ଭୁଲିପାରିବ ନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ଆମର ସରକାରଙ୍କ ପରିଚୟ ଏହା ଯେ ଯେଉଁ ପ୍ରକଳ୍ପର ଶିଳାନ୍ୟାସ କରିଥାନ୍ତି, ତାହାର ଲୋକାର୍ପଣ ମଧ୍ୟ କରିଥାନ୍ତି । ଅଟକିବା, ଝୁଲିବା, ପଥଭ୍ରଷ୍ଟ ହେବା, ସେ ସମୟ ଚାଲିଗଲା ସାଥୀମାନେ!

ସାଥୀମାନେ,

ରାଷ୍ଟ୍ରର ରକ୍ଷାରେ ସବୁବେଳେ ହିମାଚଳର ବହୁତ ବଡ଼ ଯୋଗଦାନ ରହିଛି, ଯେଉଁ ହିମାଚଳ ପୁରା ଦେଶରେ ରାଷ୍ଟ୍ରର ରକ୍ଷାରେ ବୀରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଜଣାଯାଇଛି ସେହି ହିମାଚଳ ଏବେ ଏହି ଏମ୍ସ ପରେ ଜୀବନ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ନିର୍ବାହ କରିବ । ୨ଠ୧୪ ମସିହା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ହିମାଚଳରେ କେବଳ ୩ଟି ମେଡିକାଲ, କଲେଜ ଥିଲା, ସେଥିମଧ୍ୟରୁ ୨ଟି ସରକାରୀ ଥିଲା । ଗତ ୮ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ୫ଟି ନୂତନ ସରକାରୀ ମେଡିକାଲ କଲେଜ ହିମାଚଳରେ ତିଆରି ହୋଇଛି । ୨ଠ୧୪ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅଣ୍ଡର ଏବଂ ପୋଷ୍ଟ ଗ୍ରାଜୁଏଟଙ୍କୁ ମିଶାଇ କେବଳ ୫ଠଠ ବିଦ୍ୟାର୍ଥୀ ପଢ଼ି ପାରୁଥିଲେ । ଆଜି ଏହି ସଂଖ୍ୟା ୧୨ଠଠରୁ ଅଧିକ, ଅର୍ଥାତ ଦୁଇଗୁଣରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ହୋଇଯାଇଛି । ଏମ୍ସରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବର୍ଷ ଅନେକ ନୂଆ ଡାକ୍ତର ହେବେ, ନର୍ସିଂ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଯୁବକମାନେ ଏଠାରେ ଟ୍ରେନିଂ ପାଇବେ, ଏବଂ ମୋତେ ଜୟରାମ ଜୀଙ୍କ ଟିମକୁ, ଜୟରାମ ଜୀଙ୍କୁ, ଭାରତ ସରକାରଙ୍କ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ମନ୍ତ୍ରୀ ଏବଂ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ମନ୍ତ୍ରଣାଳୟକୁ ବିଶେଷ ଭାବେ କୃତଜ୍ଞତା ଜଣାଉଛି । ଯେତେବେଳେ ନଡ୍ଡା ଜୀ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ମନ୍ତ୍ରୀ ଥିଲେ, ସେହି ସମୟରେ ଆମେ ନିର୍ଣ୍ଣୟ ନେଇଥିଲୁ ସେତେବେଳେ ନଡ୍ଡା ଜୀଙ୍କ ଉପରେ ବହୁତ ବଡ଼ ଦାୟିତ୍ୱ ଆସିଗଲା, ମୁଁ ଶିଳାନ୍ୟାସ ମଧ୍ୟ କରିଥିଲେ । ଏହି ଅବଧିରେ କରୋନାର ଭୟଙ୍କର ମହାମାରୀ ଆସିଲା ଏବଂ ଆମେ ଜାଣିଛୁ ଯେ ହିମାଚଳର ଲୋକ ହିମାଚଳର କୌଣସି ମଧ୍ୟ କନଷ୍ଟ୍ରକସନର କାମ କରିଥାଏ ସେତେବେଳେ ବହୁତ ଅସୁବିଧା ଆସିଥାଏ, ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ଜିନିଷ ପାହାଡ଼ ଉପରକୁ ଆଣିବା କେତେ କଷ୍ଟକର ହୋଇଥାଏ । ଯେଉଁ କାମ ତଳେ ଗୋଟିଏ ଘଣ୍ଟାରେ ହୋଇଥାଏ, ତାହାକୁ ସେଠାରେ ପାହାଡ଼ରେ କରିବା ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ଦିନ ଲାଗି ଯାଇଥାଏ । ତାହା ପରେ ମଧ୍ୟ, କରୋନାର କଠିନ ସମୟ ଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ମଧ୍ୟ ଭାରତ ସରକାରଙ୍କ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ମନ୍ତ୍ରଣାଳୟ ଏବଂ ଜୟରାମ ଜୀଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ସରକାରଙ୍କ ଟିମ ମିଳିତ ଭାବେ ଯେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ କଲେ, ଆଜି ଏମ୍ସ ଦଣ୍ଡମାନ, ଏମ୍ସ କାମ କରିବା ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଇଛି ।

ମେଡିକାଲ କଲେଜ ନୁହେଁ, ଆମେ ଆଉ ଏକ ଦିଗରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବା, ଔଷଧ ଏବଂ ଜୀବନରକ୍ଷକ ଟିକାର ନିର୍ମାତା ଭାବରେ ମଧ୍ୟ ହିମାଚଳର ଭୂମିକାର ବହୁତ ଅଧିକ ବିସ୍ତାର କରାଯାଉଛି । ବଲ୍କ ଟ୍ରଗ୍ସ ପାର୍କ ପାଇଁ ଦେଶରେ କେବଳ ତିନୋଟି ରାଜ୍ୟକୁ ବିଛାଯାଇଛି ଏବଂ ସେଥିରୁ ଗୋଟିଏ ଏମିତି କେଉଁ ରାଜ୍ୟ ଅଛି ଭାଇ, କେଉଁ ରାଜ୍ୟ ଅଛି? ହିମାଚଳ ଅଟେ, ଆପଣଙ୍କୁ ଗର୍ବ ଲାଗୁଛି କି ନାହିଁ? ଏହା ଆପଣଙ୍କ ପିଲାମାନଙ୍କର ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଭବିଷ୍ୟତର ଶିଳାନ୍ୟାସ ଅଟେ କି ନୁହେଁ? ଏହା ଆପଣଙ୍କର ପିଲାମାନଙ୍କର ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଭବିଷ୍ୟତର ଗ୍ୟାରେଣ୍ଟି କି ନୁହେଁ? ଆମେ କାମ ବଡ଼ ଦୃଢ଼ତାର ସହିତ କରିଥାଉ ଏବଂ ଆଜିର ପିଢ଼ି ପାଇଁ ମଧ୍ୟ କରିଥାଉ, ଆଗାମୀ ପିଢ଼ି ପାଇଁ ମଧ୍ୟ କରିଥାଉ ।

ସେହିଭଳି ଭାବରେ ମେଡିକାଲ ଡିଭାଇସ ପାର୍କ ପାଇଁ ୪ଟି ରାଜ୍ୟକୁ ବଛାଯାଇଛି, ଯେଉଁଠାରେ ଆଜି ମେଡିକାଲରେ ଟେକ୍ନୋଲୋଜୀର ଭରପୂର ଉପଯୋଗ ହେଉଛି । ବିଶେଷ ଭାବରେ ଉପକରଣର ଆବଶ୍ୟକତା ପଡ଼ିଥାଏ, ତାହାକୁ ତିଆରି କରିବା ପାଇଁ ଦେଶରେ ୪ଟି ରାଜ୍ୟ ବଛାଯାଇଛି, ଏତେ ବଡ଼ ଭାରତ ବର୍ଷ, ଏତେ ବଡ଼ ଜନସଂଖ୍ୟା, ହିମାଚଳ ହେଉଛି ମୋର ଗୋଟିଏ ଛୋଟ ରାଜ୍ୟ, କିନ୍ତୁ ଏହା ବୀରମାନଙ୍କର ଭୂମି ଅଟେ ଏବଂ ମୁଁ ଏଠିକାର ରୁଟି ଖାଇଛି, ମୋତେ କରଜ ମଧ୍ୟ ଶୁଝିବାକୁ ଅଛି ଏବଂ ସେଥିପାଇଁ ଚତୁର୍ଥ ମେଡିକାଲ ଡିଭାଇସ୍ ପାର୍କ କେଉଁଠାରେ ତିଆରି ହେଉଛି, ଆପଣଙ୍କ ହିମାଚଳରେ ତିଆରି ହେଉଛି ସାଥୀମାନେ । ବିଶ୍ୱରୁ ବଡ଼ ବଡ଼ ଲୋକମାନେ ଏଠାକୁ ଆସିବେ । ନାଲାଗଡ଼ରେ ଏହି ମେଡିକାଲ ଡିଭାଇସ ପାର୍କର ଶିଳାନ୍ୟାସ ଏହାର ଏକ ଅଂଶ ଅଟେ । ଏହି ଡିଭାଇସ ପାର୍କର ନିର୍ମାଣ ପାଇଁ ହଜାର ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କାର ନିବେଶ ଏଠାରେ ହେବ । ଏହା ସହ ଜଡ଼ିତ ଅନେକ ଛୋଟ ଏବଂ ଲଘୁ ଉଦ୍ୟୋଗ ଆଖ ପାଖରେ ବିକଶିତ ହେବ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଏଠିକାର ହଜାର ହଜାର ଯୁବଗୋଷ୍ଠୀଙ୍କୁ ରୋଜଗାର ଅବସର ମିଳିବ ।

ସାଥୀମାନେ,

ହିମାଚଳର ଆଉ ଏକ ପକ୍ଷ ରହିଛି, ଯେଉଁଠାରେ ଏଠାରେ ବିକାଶର ଅନନ୍ତ ସମ୍ଭାବନା ଲୁଚି ରହିଛି, ଏହି ପକ୍ଷ ଅଟେ ମେଡିକାଲ ଟୁରିଜିମର । ଏଠିକାର ଆସୁଥିବା ପବନ, ଏଠିକାର ମୌସମ, ଏଠିକାର ବାତାବରଣ, ଏଠିକାର ଜଡ଼ିବୁଟି, ଏଠିକାର ଭଲ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ପାଇଁ ବହୁତ ଉପଯୁକ୍ତ ବାତାବରଣ । ଆଜି ଭାରତ ମେଡିକାଲ ଟୁରିଜିମକୁ ନେଇ ବିଶ୍ୱରେ ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ ଆକର୍ଷଣର କେନ୍ଦ୍ର ହେବାକୁ ଯାଉଛି । ଯେତେବେଳେ ଦେଶ ଏବଂ ଦୁନିଆର ଲୋକମାନେ ଭାରତରେ ମେଡିକାଲ ଚିକିତ୍ସା ପାଇଁ ଆସିବାକୁ ଚାହିଁବେ ସେତେବେଳେ ଏଠିକାର ପ୍ରାକୃତିକ ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଏତେ ବଢ଼ିଆ ଯେ ଏଠାକୁ ଆସିବେ । ଏକ ପ୍ରକାରରେ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ଆରୋଗ୍ୟର ଲାଭ ମଧ୍ୟ ହେବ ଏବଂ ପର୍ଯ୍ୟଟନର ମଧ୍ୟ ଲାଭ ହେବ । ହିମାଚଳରେ ଦୁଇଟି ହାତରେ ଲଡୁ ରହିଛି ।

ସାଥୀମାନେ,

କେନ୍ଦ୍ର ସରକାରଙ୍କର ପ୍ରୟାସ ରହିଛି ଯେ ଗରିବ ଏବଂ ମଧ୍ୟମ ବର୍ଗର ଚିକିତ୍ସା, ତା’ ଉପରେ ଖର୍ଚ୍ଚ ଅତି କମ ହେଉ, ଏଠାରେ ଚିକିତ୍ସା ମଧ୍ୟ ଭଲ ମିଳୁ ଏବଂ ଏଥିପାଇଁ ତାଙ୍କୁ ଦୂରକୁ ଯିବାକୁ ନ ପଡୁ । ସେଥିପାଇଁ ଆଜି ଏମ୍ସ ମେଡିକାଲ କଲେଜ, ଜିଲ୍ଲା ହସ୍ପିଟାଲରେ କ୍ରିଟିକାଲ କେୟାର ସୁବିଧାମାନ ଏବଂ ଗାଁରେ ହେଲଥ ଏଣ୍ଡ ୱେଲନେସ ସେଣ୍ଟର ତିଆରି କରିବାରେ ସିମଲେସ ସଂଯୋଗୀକରଣ ଉପରେ ଆମେ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛୁ । ତା’ ଉପରେ ଧ୍ୟାନ ଦିଆଯାଉଛି । ଆୟୁଷ୍ମାନ ଯୋଜନା ଅନ୍ତର୍ଗତ ହିମାଚଳର ଅଧିକାଂଶ ପରିବାରକୁ ୫ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମାଗଣା ଚିକିତ୍ସାର ସୁବିଧା ମିଳିପାରୁଛି ।

ଏହି ଯୋଜନା ଅନ୍ତର୍ଗତ ବର୍ତ୍ତମାନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଦେଶରେ ୩ କୋଟି ୬ଠ ଲକ୍ଷ ଗରୀବ ରୋଗୀ ମାଗଣାରେ ଚିକିତ୍ସା ପାଇସାରିଛନ୍ତି ଏବଂ ସେଥିରୁ ଦେଢ଼ ଲକ୍ଷ ଲାଭାର୍ଥୀ ମୋର ହିମାଚଳର ମୋର ପରିବାରଗଣ ଅଟନ୍ତି । ଦେଶରେ ଏହି ସମସ୍ତ ସାଥୀମାନଙ୍କ ଚିକିତ୍ସା ଉପରେ ସରକାର ବର୍ତ୍ତମାନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ୪୫ ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କାରୁ ଅଧିକ ଖର୍ଚ୍ଚ କରିସାରିଛନ୍ତି । ଯଦି ଆୟୁଷ୍ମାନ ଭାରତ ଯୋଜନା ନ ଥାନ୍ତା । ତେବେ ଏହା ପାଖାପାଖି ଦୁଇଗୁଣ ଅର୍ଥାତ ପ୍ରାୟତଃ ୯ଠ ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କାର ଯେଉଁ ରୋଗୀ ଥିଲେ, ସେହି ପରିବାରକୁ ନିଜ ପକେଟରୁ ଦେବାକୁ ପଡ଼ିଥାନ୍ତା । ଅର୍ଥାତ ଏତେ ବଡ଼ ସଞ୍ଚୟ ମଧ୍ୟ ଗରୀବ ଏବଂ ମଧ୍ୟମ ବର୍ଗର ପରିବାରକୁ ଉତ୍ତମ ମାନର ଚିକିତ୍ସା ସହିତ ମିଳିଛି ।

ସାଥୀମାନେ,

ମୋ ପାଇଁ ଆହୁରି ଗୋଟିଏ ସନ୍ତୋଷର ବିଷୟ ହେଉଛି । ସରକାରଙ୍କ ଏହି ପ୍ରକାରର ଯୋଜନା ଓ ଅଧିକ ଲାଭ ଆମର ମା’ମାନଙ୍କୁ, ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ଏବଂ ଝିଅମାନଙ୍କୁ ମିଳୁଛି । ଏବଂ ଆମେ ଜାଣୁ, ଆମ ମା’ ଏବଂ ଭଉଣୀମାନଙ୍କର ସ୍ୱଭାବ ଅଛି ଯେ, ଯେତେ ଯନ୍ତ୍ରଣା ହେଉ ନା କାହିଁକି, ଶରୀରରେ କେତେ କଷ୍ଟ ହେଉଥାଉ, କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ପରିବାରରେ କାହାକୁ କୁହନ୍ତି ନାହିଁ । ସେ ସହ୍ୟ ମଧ୍ୟ କରିଥାନ୍ତି, କାମ ମଧ୍ୟ କରିଥାନ୍ତି, ପୁରା ପରିବାରର ଯତ୍ନ ମଧ୍ୟ ନେଇଥାନ୍ତି, କାରଣ ତାଙ୍କ ମନରେ ରହିଥାଏ ଯେ ଯଦି ରୋଗ ବିଷୟରେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଜଣାପଡ଼ିବ, ପିଲାମାନଙ୍କୁ ଜଣାପଡ଼ିବ ତେବେ ସେମାନେ କରଜ କରି ମଧ୍ୟ ମୋର ଚିକିତ୍ସା କରାଇବେ, ଏବଂ ମା’ ଭାବନ୍ତି, ମୁଁ ନିଜେ ଅସୁସ୍ଥତାରେ କିଛି ସମୟ ବାହାର କରିବି, କିନ୍ତୁ ମୁଁ ପିଲାମାନଙ୍କୁ ଋଣଗ୍ରସ୍ତ ହେବାକୁ ଦେବି ନାହିଁ, ମୁଁ ଡାକ୍ତରଖାନା ଯାଇ ଟଙ୍କା ଖର୍ଚ୍ଚ କରିବି ନାହିଁ । ଏହି ମାଆମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କିଏ କରିବ? କ’ଣ ମୋର ମାଆମାନେ ଏହି ପ୍ରକାରର କଷ୍ଟକୁ ଚୁପଚାପ ସହିବେ । ଏଇ ପୁଅ କେଉଁ କାମର ଆରେ, ସେହି ଭାବନାରେ ଆୟୁଷ୍ମାନ ଭାରତ ଯୋଜନାର ଜନ୍ମ ହେଲା, ଯାହାକି ମାଆମାନଙ୍କୁ, ଭଉଣୀମାନଙ୍କ ଅସୁସ୍ଥତା ସହ ବଂଚିବାକୁ ପଡ଼ିବ ନାହିଁ । ଜୀବନରେ କିଭଳି ବାଧ୍ୟତାମୂଳକ ଭାବେ ବଂଚିବାକୁ ପଡ଼ିବ ନାହିଁ । ଆୟୁଷ୍ମାନ ଭାରତ ଯୋଜନା ଅଧିନରେ ଲାଭ ପାଉଥିବା ମା’ ଭଉଣୀମାନେ ୫ଠ ପ୍ରତିଶତରୁ ଅଧିକ ଅଛନ୍ତି । ଆମର ମା’ମାନେ - ଭଉଣୀମାନେ ଏବଂ ଝିଅମାନେ ଅଛନ୍ତି ।

ସାଥୀମାନେ,

ଶୌଚାଳୟ ନିର୍ମାଣ କରିବାରେ ସ୍ୱଚ୍ଛ ଭାରତ ଅଭିଯାନ ହେଉ, ମାଗଣା ଗ୍ୟାସ ସଂଯୋଗ ଯୋଗାଇଦେବା ପାଇଁ ଉଜ୍ୱାଲା ଯୋଜନା ହେଉ, ମାଗଣା ସାନିଟାରୀ ନାପକିନ ଯୋଗାଇଦେବା ଅଭିଯାନ ହେଉ, ମାତୃବନ୍ଦନ ଯୋଜନା ଅନ୍ତର୍ଗତ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗର୍ଭବତୀ ମହିଳାଙ୍କୁ ପୋଷକ ଆହର ପାଇଁ ହଜାରେ ଟଙ୍କା ସହାୟତା ହେଉ, କିମ୍ବା ବର୍ତ୍ତମାନ ହର ଘର ଜଲ ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କ ଘରେ ପହଂଚାଇବା ପାଇଁ ଆମର ଅଭିଯାନ ହେଉ, ଏହା ମୋର ମା ଏବଂ ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ସଶକ୍ତ କରିବା କାମ ଆମେ ଗୋଟିଏ ପରେ ଗୋଟିଏ କାର୍ଯ୍ୟ ଜାରି ରଖିଛୁ, ମା’ମାନଙ୍କୁ, ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ, ଝିଅମାନଙ୍କର ସୁବିଧା, ସମ୍ମାନ, ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ଏହା ଡବଲ ଇଞ୍ଜିନ ସରକାରଙ୍କ ସବୁଠାରୁ ବହୁତ ବଡ଼ ପ୍ରାଥମିକତା ଅଟେ ।

କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଯାହା ବି କିଛି ଯୋଜନାମାନ ତିଆରି କରିଛନ୍ତି, ତାକୁ ଜୟରାମ ଜୀ ଏବଂ ତାଙ୍କର ପୁରା ଟିମ, ତାଙ୍କ ସରକାର ସେମାନଙ୍କୁ ଅତି ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ତାହାକୁ ଏହି ଭୂମିକୁ ଆଣିଛନ୍ତି ଏବଂ ତାହା ପରିସର ମଧ୍ୟ ବିସ୍ତାର କରିଛନ୍ତି। ହର ଘର ନଲ ସେ ଜଲ ପହଂଚାଇବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଏଠାରେ କେତେ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ହୋଇଛି, ଏହା ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କ ସାମ୍ନାରେ ଅଛି, ଗତ ୭ ଦଶନ୍ଧି ମଧ୍ୟରେ ହିମାଚଳରେ ଦିଆଯାଇଥିବା ଟ୍ୟାପ ସଂଯୋଗର ସଂଖ୍ୟାକୁ ଆମେ ଦୁଇଗୁଣରୁ ଅଧିକ କେବଳ ଗତ ୩ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ଆମେ ଦେଇସାରିଛୁ, ଆମେ ଲୋକଙ୍କୁ ଭେଟି ମଧ୍ୟ ସାରିଛୁ । ଏହି ତିନି ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ସାଢ଼େ ଆଠ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ନୂତନ ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ ଜଳର ସୁବିଧା ମିଳିପାରିଛି ।

ଭାଇ ଏବଂ ଭଉଣୀମାନେ,

ଅନ୍ୟ ଏକ ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଦେଶ ଜୟରାମ ଜୀ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଦଳକୁ ବହୁତ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛି । ଏହି ପ୍ରଶଂସା ସାମାଜିକ ସୁରକ୍ଷାକୁ ନେଇ କେନ୍ଦ୍ର ସରକାରଙ୍କ ଉଦ୍ୟମକୁ ବିସ୍ତାର କରିଥିବାରୁ ଏହି ପ୍ରଶଂସା ଦିଆଯାଉଛି । । ଆଜି ହିମାଚଳରେ କୌଣସି ପରିବାର ନାହିଁ, ଯେଉଁଠାରେ କୌଣସି ନା କୌଣସି ସଦସ୍ୟଙ୍କୁ ପେନସନ ସୁବିଧା ମିଳିନାହିଁ । ବିଶେଷ ଭାବରେ ଯେଉଁ ସାଥିମାନେ ବେସାହାରା ଅଛି, ଯାହାଙ୍କୁ ବଡ଼ ରୋଗ ହୋଇଯାଇଛି, ଏଭଳି ପରିବାରକୁ ପେନସନ ଏବଂ ଚିକିତ୍ସା ଖର୍ଚ୍ଚ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସହାୟତା ଯୋଗାଇଦେବା ପ୍ରୟସା ପ୍ରଶଂସନୀୟ ଅଟେ । ହିମାଚଳ ପ୍ରଦେଶର ହଜାର ହଜାର ପରିବାର ମଧ୍ୟ ୱାନ ରାଙ୍କ, ୱାନ ପେନସନ କାର୍ଯ୍ୟକାରୀ ହେବା ଦ୍ୱାରା ମଧ୍ୟ ବହୁତ ବଡ଼ ଲାଭ ପାଇଛନ୍ତି ।

ସାଥୀମାନେ,

ହିମାଚଳ ସୁଯୋଗର ଏକ ପ୍ରଦେଶ ଅଟେ । ଏବଂ ମୁଁ ଆଉଥରେ ଜୟରାମ ଜୀଙ୍କୁ କୃତଜ୍ଞତା ଜଣାଉଛି । ସାରା ଦେଶରେ ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟ ଚାଲିଛି । କିନ୍ତୁ ଆପଣଙ୍କ ଜୀବନର ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ହିମାଚଳ ହେଉଛି ଦେଶର ପ୍ରଥମ ରାଜ୍ୟ ଯିଏ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ଟିକାକରଣ ସମାପ୍ତ କରିଛି । ଏହା ଚାଲିଛି, ଏହା ଚାଲିଥାଏ, ଏହା କୌଣସି ବିଷୟ ନୁହେଁ; ଯଦି ଆପଣ ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେଇଛନ୍ତି, ତେବେ ଆପଣଙ୍କୁ ତାହା କରିବାକୁ ପଡ଼ିବ ।

ଏଠାରେ ହାଇଡ୍ରୋରୁ ବିଦୁତ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୋଇଥାଏ, ଫଳ ଏବଂ ପନିପରିବା ପାଇଁ ଉର୍ବର ଜମି ଅଛି ଏବଂ ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ଅନ୍ତତଃ ନିଯୁକ୍ତି ସୁଯୋଗ ଦେଇଥାଏ । ଏହି ଅବସର ସମ୍ମୁଖରେ ଉନ୍ନତ ସଂଯୋଗୀକରଣର ଅଭାବ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ପ୍ରତିବନ୍ଧକ ଥିଲା । ୨ଠ୧୪ ପରଠାରୁ ହିମାଚଳ ପ୍ରଦେଶର ଉତ୍ତମ ଭିତ୍ତିଭୂମି ଗାଁ- ଗାଁ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଂଚାଇବାକୁ ଉଦ୍ୟମ ଚାଲିଛି । ଆଜି ହିମାଚଳର ରାସ୍ତା ପ୍ରଶସ୍ତ ହେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଚାରିଆଡ଼େ ଚାଲିଛି । ବର୍ତ୍ତମାନ ହିମାଚଳରେ ସଂଯୋଗ କାର୍ଯ୍ୟରେ ପ୍ରାୟ ୫ଠ ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କା ଖର୍ଚ୍ଚ କରାଯାଉଛି । ଯେତେବେଳେ ପିଞ୍ଜୋରରୁ ନାଲାଗଡ଼ ରାଜପଥ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାରି ଲେନର କାର୍ଯ୍ୟ ଶେଷ ହେବ, ସେତେବେଳେ ନାଲାଗଡ଼ ଏବଂ ବାଡ଼ିର ଶିଳ୍ପାଞ୍ଚଳ କେବଳ ଲାଭବାନ ହେବ ନାହିଁ, ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ ଏବଂ ଅମ୍ବାଲା ଠାରୁ ବିଳାସପୁର, ମାଣ୍ଡି ଏବଂ ମନାଲି ଅଭିମୁଖେ ଯାଉଥିବା ଯାତ୍ରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ସୁବିଧା ପାଇବେ । କେବଳ ଏତିକି ନୁହେଁ, ହିମାଚଳବାସୀଙ୍କୁ ଧୂଆଁମୁକ୍ତ ରାସ୍ତାରୁ ମୁକ୍ତି ଦେବା ପାଇଁ ସୁଡ଼ଙ୍ଗର ଏକ ଜାଲ ମଧ୍ୟ ବିଛାଯାଉଛି ।

ସାଥୀମାନେ,

ଡିଜିଟାଲ ସଂଯୋଗକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ହିମାଚଳରେ ଅଭୁତପୂର୍ବ କାର୍ଯ୍ୟ ହୋଇଛି । ଗତ ୮ ବର୍ଷରେ ମେଡ ଇନ ଇଣ୍ଡିଆ ମୋବାଇଲ ଫୋନ ମଧ୍ୟ ଶସ୍ତା ହୋଇପାରିଛି ଏବଂ ଗାଁ ଗାଁରେ ମଧ୍ୟ ନେଟୱାର୍କ ପହଂଚିଛି । ଉନ୍ନତ ୪ଜି ସଂଯୋଗ ହେତୁ ହିମାଚଳ ପ୍ରଦେଶ ମଧ୍ୟ ଡିଜିଟାଲ କାରବାରରେ ବହୁତ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଗତି କରୁଛି । ଯଦି କେହି ଡିଜିଟାଲ ଇଣ୍ଡିଆର ସର୍ବାଧିକ ଲାଭ ପାଉଛନ୍ତି, ତେବେ ମୋର ହିମାଚଳ ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ ଏହା ପାଇଛନ୍ତି । ମୋର ହିମାଚଳ ନାଗରିକମାନେ ଏହା ପାଇଛନ୍ତି । ଅନ୍ୟଥା ବିଲ ଭରିବା ଠାରୁ ନେଇ ବ୍ୟାଙ୍କ ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହେବା କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉ, ଆଡମିସନ ହେଉ, ଆପ୍ଲିକେସନ ହେଉ, ଏମିତି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଛୋଟ ଛୋଟ କାମ ପାଇଁ ପାହାଡ଼ରୁ ତଳକୁ ଓହ୍ଲାଇବା ଏବଂ ଅଫିସ କାମ ପାଇଁ ପାହାଡ଼ରୁ ତଳକୁ ଓହ୍ଲାଇବା ଏବଂ ଅଫିସ ଯିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହା ଗୋଟିଏ ଦିନ ଲାଗୁଥିଲା, ଗୋଟେ ଗୋଟେ ଦିନ ଲାଗୁଥିଲା, ବେଳେବେଳେ ରାତିରେ ରହିବାକୁ ପଡୁଥିଲା । ବର୍ତ୍ତମାନ ଦେଶରେ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ମେଡ ଇନ ଇଣ୍ଡିଆ ୫ଜି ସେବା ମଧ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହୋଇସାରିଛି, ଯାହାର ଲାଭ ଖୁବଶୀଘ୍ର ହିମାଚଳ ପାଇଁ ଉପଲବ୍ଧ ହେବ । ଭାରତ ଡ୍ରେନକୁ ନେଇ ଯେଉଁ ନିୟମ କରିଛି, ପରିବର୍ତ୍ତନ କରିଛି, ତାହା ପରେ ଆହୁରି ମୁଁ ହିମାଚଳକୁ ଏଥିପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଶୁଭେଚ୍ଛା ଜଣାଉଛି । ହିମାଚଳ ହେଉଛି ଦେଶର ପ୍ରଥମ ରାଜ୍ୟ, ଯାହା ରାଜ୍ୟର ଡ୍ରୋନ ନୀତି ଆପଣାଉଛି । ବର୍ତ୍ତମାନ ଡ୍ରୋନରୁ ପରିବହନ ପାଇଁ ଡ୍ରୋନର ବ୍ୟବହାର ବହୁତ ବୃଦ୍ଧି ପାଇବ ଏବଂ ଏଥିରେ କିନ୍ନର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆମର ଯଦି ଆଳୁ ମଧ୍ୟ ଅଛି; ତେବେ ଆମେ ସେଠାରୁ ଡ୍ରୋନରୁ ଉଠାଇ ବଡ଼ ମଣ୍ଡିରେ ତୁରନ୍ତ ଆଣିପାରିବା । ଆମର ଫଳ ଖରାପ ହୋଇ ଯାଉଥିଲେ, ଡ୍ରୋନରେ ଉଠାଇ ଆଣିପାରିବା । ଅନେକ ପ୍ରକାରର ଲାଭ ଆଗାମୀ ଦିନରେ ହେବ । ଏହି ପ୍ରକାରର ବିକାଶ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ପ୍ରତ୍ୟେକ ନାଗରିକଙ୍କର ସୁବିଧା ବଢ଼ିବ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ନାଗରିକ ସମୃଦ୍ଧି ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହେବ, ଏଥିପାଇଁ ଆମେ ପ୍ରୟାସରତ ଅଛୁ । ଏହି ବିକଶିତ ଭାରତ, ବିକଶିତ ହିମାଚଳ ପ୍ରଦେଶର ସଂକଳ୍ପକୁ ସିଦ୍ଧ କରିବ ।

ମୋତେ ଖୁସି ଲାଗୁଛି ବିଜୟା ଦଶମୀର ପାବନ ପର୍ବରେ ବିଜୟ ନାଦ କରିବାର ଅବସର ମିଳିଲା ଏବଂ ମୋତେ ବିଜୟର ଧ୍ୱନି ବଜାଇ ବିଜୟର ଉତ୍ସବ ମନାଇବାର ଅବସର ମିଳିଲା । ଏବଂ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କର ଏତେ ଆଶୀର୍ବାଦ ଭିତରେ ଏହିସବୁ କରିବାର ଅବସର ମିଳିଲା । ମୁଁ ପୁଣିଥରେ ଏମ୍ସ ସହିତ ସମସ୍ତ ବିକାଶ ପରିଯୋଜନା ପାଇଁ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା ଜଣାଉଛି । ଦୁଇଟି ମୁଠାକୁ ବନ୍ଦ କରି ମୋ ସହିତ କୁହନ୍ତୁ-

ଭାରତ ମାତା କି ଜୟ । ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶକ୍ତିର ସହିତ ଶବ୍ଦ ଶୁଭିବା ଦରକାର-

ଭାରତ ମାତା କି - ଜୟ!

ଭାରତ ମାତା କି - ଜୟ!

ଭାରତ ମାତା କି - ଜୟ!

ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ!