डॉ अविनाश जी, डॉ मालकोंडैया जी और उपस्थित सभी महानुभाव, आज उपस्थित सभी जिन महानुभावों को सम्‍मानित करने का मुझे सौभाग्‍य मिला है, उन सब का मैं हृदय से अभिनंदन करता हूं, बधाई देता हूं। उनका क्षेत्र ऐसा है कि वे न तो प्रेस कॉन्‍फ्रेस कर सकते हैं, और न ही दुनिया को यह बता सकते हैं कि वे क्‍या रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च पूरी हो जाने के बाद भी, उन्‍हें दुनिया के सामने अपनी बात खुले रूप से रखने का अधिकार नहीं होता। यह अपने आप में बड़ा कठिन काम है। लेकिन यह तब संभव होता है, जब कोई ऋषि मन से इस कार्य से जूझता है। हमारे देश में हजारों सालों पहले वेदों की रचना हुई और यह आज भी मानव जाति को प्रेरणा देते हैं। लेकिन किसको पता है कि वेदों की रचना किसने की? वे ऋषि भी तो वैज्ञानिक थे, वैज्ञानिक तरीके से समाज जीवन का दर्शन करते थे, दिशा देते थे। वैज्ञानिकों का भी वैसा ही योगदान है। वे एक लेबोरेटरी में तपस्‍या करते हैं। अपने परिवार तक की देखभाल भूल कर, अपने आप को समर्पित कर देते हैं। और तब जाकर मानव कल्‍याण के लिए कुछ चीज दुनिया के सामने प्रस्‍तुत होती है। ऐसी तपस्‍या करने वाले और देश की ताकत को बढ़ावा देने वाले, मानव की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्‍प रखने वाले ये सभी वैज्ञानिक अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं।

बहुत तेजी से दुनिया बदल रही है। युद्ध के रूप-रंग बदल चुके हैं, रक्षा और संहार के सभी पैरामीटर बदल चुके हैं। टेकनोलॉजी जैसे जीवन के हर क्षेत्र को प्री-डोमिनंट्ली ड्राइव कर रही है , पूरी तरह जीवन के हर क्षेत्र में बदल रही है, वैसे ही सुरक्षा के क्षेत्र में भी है और गति इतनी तेज है कि हम एक विषय पर काँसेपचुलाइज़ करते हैं, तो उससे पहले ही दो-कदम आगे कोई प्रॉडक्ट निकल आता है और हम पीछे-के-पीछे रह जाते हैं। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज जो मैं देख रहा हूं, वो यह है कि हम समय से पहले काम कैसे करे? अगर दुनिया 2020 में इन आयुद्धों को लेकर आने वाली है, तो क्‍या हम 2018 में उसके लिए पूरा प्रबंध करके मैदान में आ सकते हैं? विश्‍व में हमारी स्‍वीकृति, हमारी मांग, ‘किसी ने किया, इसलिए हम करेंगे’ उस में नहीं है| हम विज़ुलाइज़ करें कि जगत ऐसे जाने वाला है और हम इस प्रकार से चलें, तो हो सकता है कि हम लीडर बन जाए और डीआरडीओ को स्थिति को रेस्पोंड करना होगा, डीआरडीओ ने प्रो-एक्टिव होकर एजेंडा सेट करना है। हमें ग्‍लोबल कम्‍युनिटी के लिए एजेंडा सेट करना है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास टेलेंट नहीं है, या हमारे पास रिसोर्स नहीं है। लेकिन हमने इस पर ध्‍यान नहीं दिया है क्योंकि हमारे स्वभाव में ‘अरे चलो चलता है क्या तकलीफ़ है’, ये एटीटियूड है ।

दूसरा जो मुझे लगता है, डीआरडीओ का कंट्रीब्‍यूशन कम नहीं है। इसका कंट्रीब्‍यूशन बहुत महत्‍वपूर्ण है और इसे जितनी बधाई दी जाए, वह कम है। आज इस क्षेत्र में लगे हुए छोटे-मोटे हर व्‍यक्ति अभिनंदन के अधिकारी है। लेकिन कभी उन्‍हें वैज्ञानिक तरीके से भी सोचने की आवश्‍यकता है। अभी मैं अविनाश जी से चर्चा कर रहा था। डीआरडीओ और डीआरडीओ से जुड़े हुए प्राइवेट इंडिविजुअल और कंपनीज़, इनको तो हम अवॉर्ड दे रहे हैं और अच्छा भी है,लेकिन भविष्य के लिए मुझे लगता है आवश्यकता है कि डीआरडीओ एक दूसरी कैटेगिरी के अवार्ड की व्‍यवस्‍था करे, जिसका डीआरडीओ से कोई लेना देना नहीं होगा। जिसने डीआरडीओ के साथ कभी कोई काम नहीं किया है, लेकिन इस फील्‍ड में रिसर्च करने में उन्‍होंने कोई दूसरा कॉन्‍ट्रीब्‍यूशन किया है, किसी प्रोफेसर के रूप में, आईटी के क्षेत्र में। ऐसे लोगों को भी खोजा जाए, परखा जाए तो हमें एक टेलेंट जो आउट ऑफ डीआरडीओ है उनका भी पूल बनाने की हमें संभावना खोजनी चाहिए और इसलिए हमें उस दिशा में सोचना चाहिए।

तीसरा मेरा एक आग्रह है कि हम कितने ही रिसर्च क्‍यों न करें, लेकिन आखिरकार चाहे जल सेना हो, थल सेना हो, या नौसेना हो सबसे पहले नाता सैनिक का है, क्‍योंकि उसी से उसका गुजारा होता है और ऑपरेट भी उसी को करना है। लेकिन सेना के जवान और अफसर जो रोजमर्रा की उस जिंदगी को जीते हैं, काम करते वक्‍त उसके मन में भी बड़े इनोवेटिव आइडियाज आते हैं। जब वो किसी चीज को उपयोग करता है तो उसे लगता है कि इसकी बजाय ऐसा होता तो अच्‍छा होता। उसको लगता है कि लेफ्ट साइड दरवाजा खुलता है तो राइट साइड होता तो और अच्‍छा होता। यह कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं होगा। क्‍या हम कभी हमारे तीनों बलों को, जल सेना, थल सेना और नौसेना उनमें से भी जो आज सेवा में रत है, उनको कहा जाए कि आप में कोई इनोवेटिव आइडियाज होंगे तो उनको भी शामिल किया जाएगा। आप जैसे अपना काम करते हैं। जैसे एजुकेशन में बदलाव कैसे आ रहा है। एक टीचर जो अच्‍छे प्रयोगकर्ता है, उनके आगे चलकर आइडियाज, इंस्‍टीट्यूशन में बदल कर आने वाली पीढि़यों के लिए काम आता है। वैसे ही सेना में काम करने वाले टेकनिकल पर्सन और सेवा में रत लोग हैं। हो सकता है पहाड़ में चलने वाली गाड़ी रेगिस्‍तान में न चले तो उसके कुछ आइडियाज होंगे। हमें इसको प्रमोट करना चाहिए और एक एक्‍सटेंशन ऑफ डीआरडीओ टाइप, हमें इवोल्‍व करना चाहिए। अगर यह हम इवोल्‍व करते हैं तो हमारे तीनों क्षेत्रों में काम करने वाले इस प्रकार के टेलेंट वाले जो फौजी है, अफसर है मैं मानता हूं, वे हमें ज्‍यादा प्रेक्टिकल सोल्‍यूशन दे सकते हैं या हमें वो स्‍पेसिफिक रिसर्च करने के लिए वो आइडिया दे सकते हैं कि इस समस्‍या का समाधान डीआरडीओ कर सकता है। उस पर हमें सोचना चाहिए।

चौथा, जो मुझे लगता है - कि हम डीआरडीओ के माध्‍यम से समाज में किस प्रकार से देशभर में इस क्षेत्र में रूचि रखने वाली अच्छे विश्‍वविद्यालयों की पहचान करें, और एक साल के लिए विशेष रूप से इन साइंटिस्‍टों को उन विश्‍वविद्यालयों के साथ अटैच करें? उन विश्‍वविद्यालयों के छात्रों के साथ डायलॉग हों, मिलना-जुलना हो, साल में आठ-दस सिटिंग हों। तो वहाँ जो हमारे नौजवान हैं उनके लिए साइंटिस्‍ट एक बहुत बड़ी इंस्पिरेशन बन जाएगा। जो सोचता था कि मैं अपना करियर यह बनाऊंगा, वो सोचता है कि इन्होने अपना जीवन खपा दिया, चलो मैं भी अपने कैरियर के सपने छोड़ दूँ और इसमे अपना जीवन खपा दूँ तो, हो सकता है वो देश को कुछ देकर जाए।

यही हमारा काम है संस्‍कार-संक्रमण का कि एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन, हमारे इस सामर्थ को कैसे परकोलेट भी करे और डिवेल्प भी करें और जब तक हम मैकेनिज्‍म नहीं बनाएंगे ये संभव नहीं है। यूनिवर्सिटी में हम कन्‍वोकेशन में किसी साइंटिस्‍ट को बुला लें वो एक बात है, लेकिन हम उनके टेलेंट, उनकी तपस्या और उनके योगदान को किस प्रकार से उनके साथ जोड़ें वो आपके बहुत काम आएगा।

क्‍या इन साइंटिस्टों को सेना के लोगों के साथ इन्‍टरेक्‍शन करने का मौका मिलता है ? क्‍योंकि इन्होंने इतनी बड़ी रिसर्च की है। सेना के जवान को मिलने से रक्षा का विश्‍वास पैदा होता है। क्‍या कभी सेना के जवान ने उस ऋषि को देखा है, जिसने उसकी रक्षा के लिए 15 साल लेबोरिटी में जिदंगी गुजारी है। जिस दिन सेना में काम करने वाला व्‍यक्ति उस ऋषि को और उस साइंटिस्‍ट को देखेगा, आप कल्पना कर सकतें हैं उस ऑनर का फल कैसा होगा और इसलिए हमारी पूरी व्‍यवस्‍था एक दायरे से बाहर निकाल करके जिस में ह्यूमन टच हो, एक इंस्पिरेशन हो, उस दिशा में उसको कैसे ले जा सके। मैं मानता हूं कि अभी जिन लोगों का सम्‍मान हुआ, उनसे इंटरेक्‍ट करके देंखे, आपको अनुभव होगा कि इस फंक्‍शन से उनका भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि वो काम करने वाले को भी प्रेरणा देगा और जिसने उनके लिए काम किया है उन जवानो का भी इंस्पिरेशन हाई हो जाएगा कि अच्छा हमारे लिए इतना काम होता है । उसी प्रकार से डीआरडीओ को कुछ लेयर बनाने चाहिए ऐसा मुझे लगता है हालाँकि इसमें मेरा ज्‍यादा अध्‍ययन नहीं है पर एक तो है हाईटेक की तरफ जाना और बहुत बड़ा नया इनोवेशन करना है लेकिन एट द सेम टाइम रोजमर्रा की जिदंगी जीने वाला जो हमारा फौजी है, उसकी लाइफ में कम्‍फर्ट आए। ऐसे साधनों की खोज, उसका निर्माण यह एक ऐसा अवसर है। आज उसका वाटर बैग जो तीन सौ ग्राम का है तो उतना ही अच्छा बैग डेढ सौ ग्राम का कैसे बने, ताकि उसको वजन कम धोना पड़े । आज उसके जूते कितने वेट के हैं, पहाड़ों में एक तकलीफ रहती है, तो रेगिस्‍तान में दूसरी तकलीफ होती है, इसमें भी बहुत रिसर्च करना है। क्या इस दिशा में कभी रिसर्च होता ? क्‍या कभी जूते बनाने वाली कंपनी और डीआरडीओ के साथ इनका इन्‍टरफेस होता है। क्‍या ये रिसर्च करके देते हैं। ये लोग डीआरडीओ को एक लैब से बाहर निकल करके और जो उनकी रोजमर्रा की जिदंगी है। अब देखिए हम इतने इनोवेशन के साथ लोग आएंगे, इतनी नई चीजें देंगे। जो हमारी समय की सेना के जवानों के लिए बहुत ही कम्‍फर्टेबल व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध करा सकते हैं, बहुत लाभ कर सकता है। इस दिशा में क्‍या कुछ सोचा जा सकता है।

एक और विषय मेरे मन में आता है - आज डीआरडीओ के साथ करीब 50 लेबो‍रेट्री भिन्‍न- भिन्‍न क्षेत्रों में काम कर रही हैं क्‍या हम तय कर सकते हैं कि मल्‍टी-टैलेंट का उपयोग करने वाली पांच लैब हम ढूंढे 50 में से और हम एक फ़ैसला करेंगें कि 5 लैब ऐसी होंगी, जिसमें नीचे से ऊपर एक भी व्‍यक्ति 35 साल से ऊपर की उम्र का नहीं होगा। सब के सब विलो 35 होंगे। अल्‍टीमेट डिसिजन लेने वाले भी 35 साल से नीचे के होंगे। एक बार हिम्‍मत के साथ हिन्‍दुस्तान की यंगेस्‍ट टीम को हम अवसर दें, और उन्हें बतायें कि दुनिया आगे बढ़ रही है, आप बताओ। मैं विश्‍वास के साथ कहता हूं कि इस देश के टेलेंट में दम है, वो हमें बहुत कुछ नई चीजें दे सकता है।

अब आजकल साईबर सिक्‍योरिटी की बहुत बड़ी लड़ाई हैं। मैं मानता हूं कि वो 20-25 साल का नौजवान बहुत अच्छे ढंग से यह करके दे देगा हमें। क्‍योंकि उसका विकास इस दिशा में हुआ है, क्‍योंकि ये चीजें तुरंत उसके ध्‍यान में आतीं हैं। क्या हम पांच लैब टोटली डेडीकेटड टू 35 ईयर्स बना सकते हैं? डिसिजन मैकिंग प्रोसेस आखिर तक 35 से नीचे के लोगों के हाथों में दे दी जाए। हम रिस्‍क ले लेंगे। हमने बहुत रिस्‍क लिए हैं। एक रिस्‍क और ले लेंगे। आप देखिए एक नई हवा की जरूरत है। एक फ्रेश एयर की जरूरत है। और फ्रेश एयर आएगी। हमें लाभ होगा।

डिफेंस सिक्‍योरिटी को लेकर हमे हमारे सामान्‍य स्‍टुडेंट्स को भी तैयार करना चाहिए। क्‍या कभी हमने सरकार के द्वारा, स्‍कूलों के द्वारा किए गये साइन्स फेयर में कहा है, कि यह साइंस फेयर 2015 विल बी टोटली डेडीकेटड टू डिफेंस रिलेटिड इश्यूस? सब नौजवान खोजेगे, टीचर इन्‍ट्रेस्‍ट लेंगें, स्‍टडीज होंगीं, प्रोजैक्‍ट रिपोर्ट बनेंगे। लाखों की तादात में हमारे स्‍टूडेंस की इन्वाल्वमेंट, डिफेन्स टेक्‍नोलॉजी एक बहुत बड़ा काम हैं, डिफेंस रिसर्च बहुत बड़ा काम है, यह सोचने की खिड़की खुल जाएगी। हो सकता है दो-चार लोग ऐसे भी निकल आएं जिनको मन कर जाए की चलो इसको हम करियर बनायें अपना। हमने देखा है कि आजकल टेक्निकल यूनि‍वर्सिटीज की एक ग्‍लोबल रॉबोट ओलंपिक होता है। राष्ट्र स्तर का भी होता है। क्‍या हम उसको स्‍पेशली डीआरडीओ से लिंक करके रोबोट कॅंपिटिशन टोटली डेडीकेटड टू डिफेन्स बना सकते हैं?

अब देखिए ये जो नौजवान रॉबोर्ट के द्वारा फुटबाल खेलते हैं, रॉबोर्ट के द्वारा क्रिकेट खेलते हैं, वो सब उसमें मज़ा भी लेते हैं, और उसका कॉम्पीटिशन भी होता है। लेकिन उसको 2-3 स्टेप आगे हम सोच सकते हैं। एक नये तरीके से, नयी सोच के साथ, और सभी लोगों को जोड़ कर के हम इस पूरी व्यवस्था को विकसित करें और साथ साथ, समय की माँग है, दुनिया हमारा इंतज़ार नहीं करेगी। हमें ही समय से पहले दौड़ना पड़ेगा और इसलिए, हम जो भी सोचें, जो भी करें, जी- जान से जुट कर के समय से पहले करने का संकल्प करें। वरना कोई प्रॉजेक्ट कन्सीव हुआ 1992 में, और 2014 में "हा, अभी थोड़े दिन लगेंगे" की हालत में होगा, तो ये दुनिया बहुत आगे बढ़ जाएगी। इसलिए, आज डीआरडीओ से संबंधित सभी प्रमुख लोगों से मिलने का मुझे अवसर मिला है, जो इतना उत्तम काम करते हैं, और जिनमें पोटेन्षियल है। लोग कहते हैं कि मोदी जी आपकी सरकार से लोगों को बहुत अपेक्षायें हैं। जो करेगा उसी से तो अपेक्षा होती है, जो नहीं करेगा उस से कौन अपेक्षा करेगा? तो डीआरडीओ से भी मेरी अपेक्षा क्यों है? मेरी अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि डीआरडीओ में करने का सामर्थ्य है, ये मैं भली-भाँति अनुभव करता हूँ। आपके अंदर वो सामर्थ्य है और आपने कर के दिखाया है और इसलिए मुझे विश्वास है कि आप लोग यह कर सकते हैं ।

फिर एक बार सभी वैज्ञानिक महोदयो को देश की सेवा करने के लिए उत्तम योगदान करने के लिए, बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूँ, बहुत बधाई देता हूँ। धन्यवाद।

Explore More
শ্রী রাম জন্মভূমি মন্দিরের ধ্বজারোহণ উৎসবে প্রধানমন্ত্রীর বক্তব্যের বাংলা অনুবাদ

জনপ্রিয় ভাষণ

শ্রী রাম জন্মভূমি মন্দিরের ধ্বজারোহণ উৎসবে প্রধানমন্ত্রীর বক্তব্যের বাংলা অনুবাদ
Rs 6,000 Crore Earned, 12.33 Crore Sq Ft Freed: Inside Government's Big Clean-Up

Media Coverage

Rs 6,000 Crore Earned, 12.33 Crore Sq Ft Freed: Inside Government's Big Clean-Up
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
মহাকাশ-বিষয়ক স্টার্টআপগুলোর প্রধান নির্বাহীদের সঙ্গে প্রধানমন্ত্রীর মতবিনিময়ের বিবরণ
August 23, 2026
মহাকাশ খাতে নীতিগত ধারাবাহিকতা, বিশ্বব্যাপী সুযোগ এবং ভারতের ক্রমবর্ধমান সক্ষমতার ওপর গুরুত্বারোপ করলেন প্রধানমন্ত্রী
আমাদের এমন এক পরিবেশ গড়ে তুলতে হবে যাতে বিশ্বজুড়ে মানুষ তাদের ভবিষ্যৎ গড়ার লক্ষ্যে ভারতের দিকে তাকিয়ে থাকে: প্রধানমন্ত্রী
আমরা খরচের দিক থেকে খুবই প্রতিযোগিতামূলক, প্রতিভা নিয়ে কোনো প্রশ্নই ওঠে না, এবং আমাদের দেশবাসীর ঝুঁকি নেওয়ার ক্ষমতা অনেক বেশি। আর সেই কারণেই আমরা খুব দ্রুত নিজেদের প্রতিষ্ঠিত করতে পারব: প্রধানমন্ত্রী

প্রধানমন্ত্রী – আপনারা একটি নতুন ক্ষেত্রে সাহস দেখিয়েছেন। সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণ বিষয় হলো, আপনারা সরকারের ওপর আস্থা রেখেছেন। আমার একটিই বিশ্বাস সবসময় ছিল যে, আমরা যে সিদ্ধান্তই নিই না কেন, তাতে আমাদের অবিচল থাকা উচিত এবং বারবার তা পরিবর্তন করা উচিত নয়, যাতে কেউ যদি ঝুঁকি নিতে চায়, তারা এই আশ্বাস পেতে পারে যে আমার ভুলের কারণে কিছু ভুল হলেও সমস্যা নেই, কিন্তু কেউ আমাকে পরিত্যাগ করবে না। আর আস্থা স্থাপনের জন্য এটাই ছিল আমাদের প্রচেষ্টা।

সিইও – আমরা ভারতের প্রথম স্পেস টেক ইউনিকর্ন। গত ১৮ জুলাই, আমরা সফলভাবে স্যাটেলাইট নিক্ষেপকারী ভারতের প্রথম বেসরকারি রকেট উৎক্ষেপণ করেছি। আর এটা তো সবে শুরু। সাধারণত আমরা বলি যে, এটা স্কাইরুটের জন্য কেবল একটি প্রস্তুতি পর্ব। আগামী বছরের মাঝামাঝি নাগাদ আমরা প্রতি মাসে একটি করে উৎক্ষেপণ করব। এছাড়াও, এই ক্ষেত্রটি উন্মুক্ত করার জন্য আমি আপনাকে ধন্যবাদ জানাই, স্যার। তিনটি কারখানা তৈরি করা হয়েছে। প্রতি মাসে একটি রকেট উৎক্ষেপণের সক্ষমতা ইতিমধ্যেই রয়েছে। আর এটা তো কেবল শুরু। এই মুহূর্তে, আমার ভবিষ্যৎ স্বপ্ন হলো প্রতি সপ্তাহে একটি এবং দিনে একাধিক উৎক্ষেপণ করা।

সিইও – আমরা এমন একটি ইঞ্জিন তৈরি করেছি যা বিশ্বের অন্যতম উন্নত। স্যার, আমরা এইমাত্র এটি তৈরি করেছি এবং এর পরীক্ষা চলছে।

প্রধানমন্ত্রী – বিনিয়োগকারীদের কি তাদের ওপর আস্থা আছে?

সিইও – স্যার, প্রথম উৎক্ষেপণের পর থেকে স্কাইরুট আরও উন্নত হয়েছে।

প্রধানমন্ত্রী – আচ্ছা। এই রুটটি কি আপনাদের জন্য উপকারী?

সিইও – এটি খুবই উপকারী প্রমাণিত হচ্ছে।

প্রধানমন্ত্রী – বিশ্ব এখন নিশ্চয়ই ভারতীয় স্টার্টআপগুলোর দিকে তাকিয়ে আছে। এই ক্ষেত্রে কারা আছে? কারণ যখন কোনো যুগান্তকারী সাফল্য আসে, মানুষ সঙ্গে সঙ্গে তা লক্ষ্য করে।

সিইও – আমার মনে হয়, মহাকাশ শিল্প উন্মুক্ত হওয়ার পর থেকে আমরা একটি অত্যন্ত ইতিবাচক প্রবণতা দেখেছি। মার্কিন যুক্তরাষ্ট্র এবং ইউরোপে থাকা আমাদের অনেক নাগরিক ফিরে এসে আমাদের সঙ্গে কাজ করতে চাইছেন।

প্রধানমন্ত্রী – আমাদের অনেক মানুষের সঙ্গে সংযোগ স্থাপন করতে হবে, এবং মেহতা যেমনটা বলেছেন, যারা বিদেশে গিয়েছিলেন তারা এখন ফিরে আসছেন। আমি বিশ্বাস করি, আমাদের এমন একটি আবহ তৈরি করা উচিত যাতে সারা বিশ্বের মানুষ অনুভব করে যে, এই ক্ষেত্রে জীবিকা নির্বাহ করতে চাইলে তাদের ভারতে আসা উচিত। কোনো ভারতীয় স্টার্টআপে যোগ দিন। কোনো ভারতীয় মহাকাশ সংস্থায় যোগ দিন। আমি দৃঢ়ভাবে বিশ্বাস করি যে আপনারা চুম্বকের মতো সমগ্র প্রতিভাপুলকে আকর্ষণ করতে পারেন, এবং এটি আমাদের জন্য একটি গুরুত্বপূর্ণ শক্তি হয়ে উঠতে পারে।

সিইও – আমাদের লক্ষ্য হলো আগামী ১৮ মাসের মধ্যে একটি বিশ্বব্যাপী গ্রাউন্ড স্টেশন নেটওয়ার্ক স্থাপন করা।

সিইও – আমরা স্যাটেলাইট ইঞ্জিন তৈরি করি, যা মহাকাশে স্যাটেলাইটকে এক স্থান থেকে অন্য স্থানে চালিত করে। স্যার, এগুলো ৫ থেকে ১৫ বছর পর্যন্ত টেকে। আমরা বিশ্বব্যাপী খুব ভালো সাড়া পেয়েছি, এবং ভারতীয় কোম্পানিগুলো যে এখন রপ্তানির জন্য সরকারি সহায়তা পাচ্ছে, তার পেছনে আপনাদের প্রচেষ্টাও একটি গুরুত্বপূর্ণ কারণ।

প্রধানমন্ত্রী – আমরা খরচের দিক থেকে খুবই প্রতিযোগিতামূলক, প্রতিভা নিয়ে কোনো প্রশ্নই ওঠে না, এবং আমাদের দেশবাসীর ঝুঁকি নেওয়ার ক্ষমতা অনেক বেশি। আর সেই কারণেই আমরা খুব দ্রুত নিজেদের প্রতিষ্ঠিত করতে পারব।

সিইও – এই রোবোটিক মহাকাশযানটি মহাকাশে যাবে, অচল স্যাটেলাইটটিকে সরাসরি ধরে ফেলবে এবং কক্ষপথ থেকে সরিয়ে দেবে।

সিইও – আমরাই প্রথম ভারতীয় কোম্পানি যারা মহাকাশে একটি ফুয়েল স্টেশন স্থাপনের লক্ষ্য নিয়ে ডকিং আন্ডার রিফুয়েলিং প্রযুক্তিতে কাজ করছি।

সিইও – আমার নাম অন্তরীক্ষ, আমার সহ-প্রতিষ্ঠাতা মনিকাও এখানে আছেন। স্যার, আমরা ভারতের প্রথম স্পেস ফার্মা স্টার্টআপ। আমরা এমন স্যাটেলাইট তৈরি করছি যা মহাকাশে যেতে, ওষুধ তৈরি করতে এবং মহাকাশ থেকে তা ফিরিয়ে আনতে পারবে।

প্রধানমন্ত্রী – আপনার নাম অন্তরীক্ষ। এর আগে আপনার পরিবারের কোনো সদস্য কি এর সঙ্গে জড়িত ছিলেন?

সিইও – হ্যাঁ, স্যার, না, আমার মা-ই আমাদের এই নাম রেখেছেন, স্যার।

সিইও – একটি উৎক্ষেপণের পর, আমরা গত এক মাসে আটটি উৎক্ষেপণ চুক্তি পেয়েছি।

প্রধানমন্ত্রী – ঠিক আছে, ঠিক আছে।

সিইও – এবং বেশিরভাগই আন্তর্জাতিক।

সিইও – স্যার, এই মুহূর্তে আমরা ১০ লক্ষ অংশীদারের সঙ্গে এই উদ্ভাবনটি চালু করার পরিকল্পনা করছি।

সিইও – স্যার, এটা আপনার জন্যই, যাতে এটি একটি স্মৃতি হয়ে থাকে।

প্রধানমন্ত্রী – ওয়াও।

সিইও – বেসরকারি খাতের জন্য আপনারা যে দ্বার উন্মোচন করেছেন, বেসরকারি স্যাটেলাইটের মাধ্যমে ভারতের সৌন্দর্য দৃশ্যমান হচ্ছে।