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Entire world is now discussing global warming and ways to mitigate it: PM Modi
Two landmark initiatives emerged in #COP21. India & France played key roles in those: PM
International Solar Alliance will impact generations in a big way: PM Modi
US, India, France took initiative of innovation; let is innovate and protect our environment: PM
India expressed keenness on solar alliance. France was very helpful, did everything possible to bring all nations together: PM
Solar alliance to ensure that the world gets more energy: PM Modi

मंच पर वि‍राजमान फ्रांस के राष्‍ट्रपति‍ श्रीमान ओलांद फ्रांस से आए हुए Senior Ministers हरि‍याणा के Governor श्री, मुख्‍यमंत्री श्री, श्रीमान पीयुष गोयल जी फ्रांस का Delegation और वि‍शाल संख्‍या में आए हुए प्‍यारे भाइयों और बहनों!

पि‍छले एक वर्ष से सारी दुनि‍याँ में इस बात की चर्चा थी कि‍ Global Warming के सामने दुनि‍याँ कौन से कदम उठाए कि‍न बातों का संकल्‍प करे? और उसकी पूर्ति‍ के लिए कौन से रास्‍ते अपनाएं? पेरि‍स में होने वाली COP 21 के संबंध में पूरी दुनि‍याँ में एक उत्‍सुकता थी, संबधि‍त सारे लोग अपने-अपने तरीके से उस पर प्रभाव पैदा करने का प्रयास कर रहे थे, और करीब-करीब दो सप्‍ताह तक दुनि‍याँ के सभी देशों ने मि‍ल करके, इन वि‍षयों के जो जानकार लोग हैं वो वि‍श्‍व के सारे वहॉं इकट्ठे आए चर्चाएं की और इस बड़े संकट के सामने मानव जाति‍ की रक्षा कैसे करें, उसके लि‍ए संकल्‍पबद्ध हो करके आगे बढ़े।

COP 21 के नि‍र्णयों के संबंध में तो वि‍श्‍व में भली- भॉंति‍ बातें पहुँची हैं लेकि‍न पेरि‍स की धरती पर एक तरफ जब COP 21 की चर्चाएं चल रहीं थीं तब दो महत्‍त्‍वपूर्ण initiatives लि‍ए गए। इन दोनों महत्‍त्‍वपूर्ण initiatives में भारत और फ्रांस ने बहुत ही महत्‍त्‍वपूर्ण भमि‍का नि‍भाई है एक initiative एक तरफ तो Global Warming की चिन्‍ता है, मानवजाति‍ को पर्यावरण के संकटों से रक्षित करना है और दूसरी तरफ मानवजाति‍ के आवश्‍यकताओं की पूर्ति‍ भी करनी है। जो Developing Countries हैं उन्‍हें अभी वि‍कास की नई ऊँचाइयों को पार करना बाकी है और ऊर्जा के बि‍ना वि‍कास संभव नहीं होता है। एक प्रकार से ऊर्जा वि‍कास यात्रा का अहमपूर्ण अंग बन गयी है। लेकि‍न अगर fossil fuel से ऊर्जा पैदा करते हैं तो Global Warming की चिन्‍ता सताती है और अगर ऊर्जा पैदा नहीं करते हैं तो, न सि‍र्फ अंधेरा छा जाता है जि‍न्‍दगी अंधेरे में डूब जाती है। और ऐसी दुवि‍धा में से दुनियाँ को बचाने का क्‍या रास्‍ता हो सकता है? और तब जा करके अमेरि‍का, फ्रांस भारत तीनों ने मि‍लकरके एक initiative लि‍या है और वो initiative है innovation का। नई खोज हो, नए संसाधन नि‍र्माण हों, हमारे वैज्ञानि‍क, हमारे Technicians हमारे Engineers वो नई चीजें ले करके आएं जोकि‍ पर्यावरण पर प्रभाव पैदा न करती हों। Global Warming से दुनि‍याँ को बचाने का रास्‍ता दि‍खती हों और ऐसे साधनों को वि‍कसि‍त करें जो affordable हो sustainable हो और गरीब से गरीब व्‍यक्‍ति‍ की पहुँच में हो। तो innovation के लि‍ए एक बहुत बड़ा अभि‍यान चलाने की दि‍शा में अमेरि‍का, फ्रांस और भारत दुनि‍याँ के ऐसी सभी व्‍यवस्‍थाओं को साथ ले करके आगे बढ़ने का बड़ा महत्‍तवपूर्ण निर्णय कि‍या उसको launch कि‍या गया। President Obama, President Hollande और मैं और UN General Secretary और Mr. Bill Gates , हम लोग उस समारोह में मौजूद थे और एक नया initiative प्रारंभ कि‍या। दूसरा एक महत्‍त्‍वपर्ण निर्णय हुआ है जि‍सका आने वाले दसकों तक मानव जीवन पर बड़ा ही प्रभाव रहने वाला है।

दुनि‍याँ में कई प्रकार के संगठन चल रहे हैं। OPEC countries का संगठन है G-20 है G-4 है, SAARC है, European Union है, ASEAN Countries हैं, कई प्रकार के संगठन दुनि‍याँ में बने हुए हैं। भारत ने एक वि‍चार रखा वि‍श्‍व के सामने कि‍ अगर Petroleum पैदावार करने वाले देश इकट्ठे हो सकते हैं, African countries एक हो सकते हैं, European Countries एक हो सकते हैं, क्‍यों न दुनि‍याँ में ऐसे देशों का संगठन खड़ा कि‍या जाए जि‍न देशों ने 300 दि‍वस से ज्‍यादा वर्ष में सूर्य का प्रकाश प्राप्‍त होता है।

ये सूर्य, ये बहुत बड़ी शक्‍ति‍ का स्रोत है सारे जीवन को चलाने में, सृष्‍टि‍ को चलाने में सूर्य की अहम् भूमि‍का है। क्‍यों न हम उसको एक ताकत के रूप में स्‍वीकार करके वि‍श्‍व कल्‍याण का रास्‍ता खोजें। 300 से अधि‍क दि‍वस, सूर्य का लाभ मि‍लता है ऐसे दुनि‍या में करीब-करीब 122 देश हैं। और इसलि‍ए वि‍चार आया क्‍यों न हम 122 देशों का जो कि‍ सूर्य शक्‍ति‍ से प्रभावि‍त हैं उनका एक संगठन गढ़ें। भारत ने इच्‍छा प्रकट की फ्रांस के राष्‍ट्रपति‍ जी ने मेरी पूरी मदद की, हम कंधे से कंधा मि‍लाकरके चले, दुनि‍याँ के देशों का संपर्क कि‍या और नवंबर महीने में पेरि‍स में जब conference चल रही थी, 30 नवंबर को दुनि‍याँ के सभी राष्‍ट्रों के मुखि‍या उस समारोह में मौजूद थे और एक International Solar Alliance इस नाम की संस्‍था का जन्‍म हुआ।

उसमें इस बात का भी निर्णय हुआ कि‍ इसका Global Secretariat ‍हि‍न्‍दुस्‍तान में रहेगा। ये International Solar Alliance इसका Headquarter गुड़गॉंव में बन रहा है। ये हरि‍याणा ‘कुरूक्षेत्र’ की धरती है, गीता का संदेश जहॉं से दि‍या, उस धरती से वि‍श्‍व कल्‍याण का एक नया संदेश इस Solar Alliance के रूप में हम पहुँचा रहे हैं।

बहुत कम लोगों को अंदाज होगा कि‍ आज ये जो घटना घट रही है उसका मानवजाति‍ पर कि‍तना बड़ा प्रभाव पैदा होने वाला है, इस बात को वही लोग समझ सकते हैं जो छोटे-छोटे Island पर बसते हैं, छोटे-छोटे Island Countries हैं और जि‍नके ऊपर ये भय सता रहा है कि‍ समुंदर के अगर पानी की ऊँचाई बढ़ती है तो पता नहीं कब उनका देश डूब जाएगा, पता नहीं वो इस सृष्‍टि‍ से समाप्‍त हो जाएंगे, दि‍न रात इन छोटे-छोटे देशों को चि‍न्‍ता हो रही है। जो देश समुद्र के कि‍नारे पर बसे हैं, उन देशों को चि‍न्‍ता हो रही है कि‍ अगर Global Warming के कारण समुद्र की सतह बढ़ रही है तो पता नहीं हमारे मुम्‍बई का क्‍या होगा, चेन्‍नई का क्‍या होगा? और दुनि‍याँ के ऐसे कई देश होंगे जि‍नके ऐसे बड़े-बड़े स्‍थान जो समु्द्र के कि‍नारे पर हैं उनके भाग्‍य का क्‍या होगा? सारा वि‍श्‍व चि‍न्‍ति‍त है। और मैं पि‍छले एक साल में, ये Island Countries हैं जो छोटे-छोटे उनके बहुत से नेताओं से मि‍ला हूँ, उनकी पीड़ा को मैंने भली-भॉंति‍ समझा है। क्‍या भारत इस कर्तव्‍य को नहीं नि‍भा सकता?

हमारे देश में जीवनदान एक बहुत बड़ा पुण्‍य माना जाता है। आज मैं कह सकता हूँ कि‍ International Solar Alliance उस जीवनदान का पुण्‍य काम करने वाला है, जो आने वाले दशकों के बाद दुनि‍याँ पर उसका प्रभाव पैदा करने वाला है। सारा वि‍श्‍व कहता है कि‍ Temperature कम होना चाहि‍ए, लेकि‍न Temperature कम करने का रास्‍ता भी सूर्य का Temperature ही है। एक ऊर्जा से दूसरी ऊर्जा का संकट मि‍टाया जा सकता है। और इसलि‍ए वि‍श्‍व को ऊर्जा के आवश्‍यकता की पूर्ति‍ भी हो, innovation का काम भी हो और सोलर को ले करके जीवन के क्षेत्र कैसे प्रभावि‍त हों उस दि‍शा में काम करने के लि‍ए बना है।

ये बात सही है कि‍ International Solar Alliance इसका Headquarters हि‍न्‍दुस्‍तान में हो रहा है, गुडगॉंव में हो रहा है, लेकि‍न ये Institution हि‍न्‍दुस्‍तान की Institution नहीं है ये Global Institution है, ये Independent Institution है। जैसे अमेरि‍का में United Nations है, लेकि‍न वो पूरा वि‍श्‍व का है। जैसे WHO है, पूरे वि‍श्‍व का है। वैसे ही ये International Solar Alliance का Headquarter ये पूरे वि‍श्‍व की धरोहर है और ये Independent चलेगा। अलग-अलग देश के लोग इसका नेतृत्‍व करेंगे, अलग-अलग देश के लोग इसकी जि‍म्‍मेदारी संभालेंगे, उसकी एक पद्धति‍ वि‍कसि‍त होगी लेकि‍न आज उसका Secretariat बन रहा है, उस Secretariat के माध्‍यम से इस बात को हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में परंपरागत प्राकृति‍क संसाधनों उपयोग करने का बीड़ा उठाया है। भारत ने जब ये कहा कि‍ हम 175Giga Watt, Renewable Energy की तरफ जाना चाहते हैं, तब दुनि‍याँ के लि‍ए बड़ा अचरज था। भारत में Giga Watt शब्‍द भी नया है, जब हम Mega Watt से आगे सोच भी नहीं पाते थे। हम आज Giga Watt पर सोच रहे हैं और 175 Giga Watt Solar Energy, Wind Energy, Nuclear Energy, Biomass से होने वाली Energy इन सारे स्रोतों को Hydro Energy ये हम उपलब्‍ध कराना चाहते हैं और मुझे खुशी है कि‍ आज भारत 5000 MW से ज्‍यादा solar energy उसने install कर दी। ये इतने कम समय में जो काम हुआ है वो उस commitment का परिणाम है कि क्या भारत मानव जाति के कल्याण के लिए मानव जाति की रक्षा के लिए, प्रकृति की रक्षा के लिए, ये पूरी जो सृष्टि है उस पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए, भारत कोई अपना योगदान दे सकता है क्या? उस योगदान को देने के लिए ये बीड़ा उठाया है।

मैं फ्रांस के राष्ट्रपति का हृदय से आभारी हूँ कि इस चिंता के समय में global warming पर्यावरण के मुद्दे इसके समाधान के जो रास्ते है उनकी सोच भारत की सोच से बहुत मिलती जुलती है क्यों कि फ्रांस की values और भारत के values काफी समान है और इसलिए पिछले वर्ष April के महीने में हम दोनों मिले थे तो हमने तय किया था कि हम COP 21 के समय एक किताब निकालेंगे और विश्व के अंदर परंपरागत रूप से इन issues को कैसे देखा गया इस पर research करेंगे। और हम दोनों ने मिल कर के उस किताब की प्रस्तावना लिखी है और विश्व के सामने उन्ही के मूलभूत चिंतन क्या थे ये प्रस्तुत किया।

ये चीजें इसलिए हम कर रहे हैं कि मानव जाति को इस संकट से बचने के जो रस्ते खोजे जा रहे हैं, वो एक सामूहिक रूप से प्रयत्न हो, innovative रूप से प्रयत्न हो और परिणाम वो निकले जो मानव जाति की आवश्यकता है उसकी पूर्ति भी करे लेकिन प्रकृति को कोई नुकसान न हो। हम वो लोग हैं जिनके पूर्वजो ने, इस धरती से हमें प्यार करना सिखाया है। हमें कभी भी प्रकृति का शोषण करने के लिए नहीं सिखाया गया, हमें पौधे में भी परमात्मा होता है यह बचपन से सिखया गया। ये हमारी परंपरा है। अगर ये परंपरा है तो हमें विश्व को उसका लाभ पहुंचे उस दिशा में हमें कुछ कर दिखाना चाहिए और उसी के तहत आज international solar alliance का हम लोगों ने एक Secretariat का आरम्भ कर रहे हैं। और भविष्य में भव्य भवन के रूप में उसका निर्माण हो, एक स्वंत्रत इमारत तैयार हो, उसके लिए शिलन्यास भी कर रहे है और इस काम के लिए आप पधारे इसका मैं बहुत बहुत आभारी हूँ।

मेरे लिए ख़ुशी की बात है कि solar alliance का निर्माण हो रहा हो आज हमें Delhi से यहाँ आना था हम by road भी आ सकते थे, helicopter से भी आ सकते थे, लकिन हम दोनों ने मिलकर तय किया कि अच्छा होगा की हम Metro से चले जाएँ और आज आप के बीच हमें Metro से आने का अवसर मिला।

मैं राष्ट्रपति जी का आभारी हूँ कि उन्होंने आज Metro में आने के लिए सहमति जताई और हम Metro का सफ़र करते करते आपके बीच पहुंचे क्योंकि वो भी एक सन्देश है क्योंकि global warming के सामने लड़ाई लड़ने के जो तरीके हैं उसमें ये भी एक तरीका है। मैं विश्वास करता हूँ कि ये प्रयास बहुत ही सुखद रहेगा। कल भारत प्रजासत्ता पर्व मनाने जा रहा है, इस प्रजसत्ता पर्व की पूर्व संध्या पर मैं देशवासियों को बहुत बहुत शुभकामनाएं देता हूँ और अधिकार और कर्तव्य इन दोनों को संतुलित करते हुए हम देश को आगे बढ़ाएंगे यही मेरी शुभकामना है।

बहुत बहुत धन्यवाद्।

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Text to PM’s Address at Constitution Day Celebrations organized by Supreme Court
November 26, 2021
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“We all may have different roles, different responsibilities, different ways of working, but the source of our faith, inspiration and energy is the same - our Constitution”
“Sabka Saath-Sabka Vikas, Sabka Vishwas-Sabka Prayas, is the most powerful manifestation of the spirit of the Constitution. Government dedicated to the Constitution, does not discriminate in development”
“India is the only country on course to achieve the goals of the Paris Agreement ahead of time. And yet, in the name of environment, various pressures are created on India. All this is the result of a colonial mentality”
“On the strong foundation of separation of power, we have to pave the path of collective responsibility, create a roadmap, determine goals and take the country to its destination”

नमस्कार !

चीफ जस्टिस एन.वी. रमन्ना जी, जस्टिस यू.यू. ललित जी, कानून मंत्री श्री किरण रिजिजू जी, जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड़ जी, अटॉर्नी जनरल श्री के.के. वेणुगोपाल जी, सुप्रीम कोर्ट बार असोशिएशन के अध्यक्ष श्री विकास सिंह जी, और देश की न्याय व्यवस्था से जुड़े देवियों और सज्जनों!

आज सुबह मैं विधायिका और कार्यपालिका के साथियों के साथ था। और अब न्यायपालिका से जुड़े आप सभी विद्वानों के बीच हूं। हम सभी की अलग-अलग भूमिकाएं, अलग-अलग जिम्मेदारियां, और काम करने के तरीके भी अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी आस्था, प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत एक ही है - हमारा संविधान! मुझे खुशी है कि आज हमारी ये सामूहिक भावना संविधान दिवस पर इस आयोजन के रूप में व्यक्त हो रही है, हमारे संवैधानिक संकल्पों को मजबूत कर रही है। इस कार्य से जुड़े सभी लोग, अभिनंदन के अधिकारी है।

माननीय,

आजादी के लिए जीने-मरने वाले लोगों ने जो सपने देखे थे, उन सपनों के प्रकाश में, और हजारों साल की भारत की महान परंपरा को संजोए हुए, हमारे संविधान निर्माताओं ने हमें संविधान दिया। सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने, भारत को अनेक मुसीबतों में झोंक दिया था। किसी युग में सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत, गरीबी-भुखमरी और बीमारी से जूझ रहा था। इस पृष्ठभूमि में, देश को आगे बढ़ाने में संविधान हमेशा हमारी मदद करता रहा है। लेकिन आज दुनिया के अन्य देशों की तुलना में देखें, तो जो देश भारत के करीब-करीब साथ ही आजाद हुए, वो आज हमसे काफी आगे हैं। यानि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, हमें मिलकर लक्ष्य तक पहुंचना है। हम सभी जानते हैं, हमारे संविधान में Inclusion पर कितना जोर दिया गया है। लेकिन ये भी सच्चाई रही है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी बड़ी संख्या में देश के लोग exclusion को भोगने के लिए मजबूर रहे हैं। वो करोड़ों लोग, जिनके घरों में शौचालय तक नहीं था, वो करोड़ों लोग जो बिजली के अभाव में अंधेरे में अपनी जिंदगी बिता रहे थे, वो करोड़ों लोग जिनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष, घर के लिए थोड़ा सा पानी जुटाना था, उनकी तकलीफ, उनका दर्द समझकर, उनका जीवन आसान बनाने के लिए खुद को खपा देना, मैं संविधान का असली सम्मान मानता हूं। और इसलिए, आज मुझे संतोष है कि देश में, संविधान की इसी मूल भावना के अनुरूप, exclusion को inclusion में बदलने का भागीरथ अभियान तेजी से चल रहा है। और इसका जो सबसे बड़ा लाभ क्या हुआ है, ये भी हमें समझना होगा। जिन 2 करोड़ से अधिक गरीबों को आज अपना पक्का घर मिला है, जिन 8 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को उज्जवला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन मिला है, जिन 50 करोड़ से अधिक गरीबों को बड़े से बड़े अस्पताल में 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज सुनिश्चित हुआ है, जिन करोड़ों गरीबों को पहली बार बीमा और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं मिली हैं, उन गरीबों के जीवन की बहुत बड़ी चिंता कम हुई है, ये योजनाएं उनके लिए बड़ा संबल बनी हैं। इसी कोरोना काल में पिछले कई महीनों से 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त अनाज सुनिश्चित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना पर सरकार 2 लाख 60 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके गरीबों को मुफ्त अनाज दे रही है। अभी कल ही हमने इस योजना को अगले वर्ष मार्च तक के लिए बढ़ा दिया है। हमारे जो Directive Principles कहते हैं - “Citizens, men and women equally, have the right to an adequate means of livelihood” वो इसी भावना का ही तो प्रतिबिंब हैं। आप सभी ये मानेंगे कि जब देश का सामान्य मानवी, देश का गरीब, विकास की मुख्यधारा से जुड़ता है, जब उसे equality और equal opportunity मिलती है, तो उसकी दुनिया पुरी तरह बदल जाती है। जब रेहड़ी, ठेले, पटरी वाला भी बैंक क्रेडिट की व्यवस्था से जुड़ता है, तो उसको राष्ट्र निर्माण में भागीदारी का ऐहसास होता है। जब दिव्यांगों को ध्यान में रखते हुए पब्लिक प्लेसेस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और दूसरी सुविधाओं का निर्माण होता है, जब उन्हें आजादी के 70 साल बाद पहली बार कॉमन साइन लैंग्वेज मिलती है, तो उनमें आत्मविश्वास जागता है। जब ट्रांसजेंडर्स को कानूनी संरक्षण मिलता है, ट्रांसजेंडर को पद्म पुरस्कार मिलते हैं, उनकी भी समाज पर, संविधान पर आस्था और मज़बूत होती है। जब तीन तलाक जैसी कुरीति के विरुद्ध कड़ा कानून बनता है, तो उन बहनों-बेटियों का संविधान पर भरोसा और सशक्त होता है, जो हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थीं।

महानुभाव,

सबका साथ-सबका विकास, सबका विश्वास-सबका प्रयास, ये संविधान की भावना का सबसे सशक्त प्रकटीकरण है। संविधान के लिए समर्पित सरकार, विकास में भेद नहीं करती और ये हमने करके दिखाया है। आज गरीब से गरीब को भी क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर तक वही एक्सेस मिल रहा है, जो कभी साधन संपन्न लोगों तक सीमित था। आज लद्दाख, अंडमान और निकोबार, नॉर्थ ईस्ट के विकास पर भी देश का उतना ही फोकस है, जितना दिल्ली और मुंबई जैसे मेट्रो शहरों पर है। लेकिन इन सबके बीच, मैं एक और बात की तरफ आपका ध्यान दिलाउंगा। आपने भी ज़रूर अनुभव किया होगा कि जब सरकार किसी एक वर्ग के लिए, किसी एक छोटे से टुकड़े के लिए कुछ करती है, तो बड़ी उदारवादी कहलाती है, उसकी बड़ी प्रशंसा होती है। कि देखो उनके लिए कुछ किया लेकिन मैं हैरान हूँ कभी कभी हम देखते हैं कोई सरकार एक राज्य के लिए कुछ करे, राज्य का भला हो, तो बड़ी वाहवाही करते हैं। लेकिन जब सरकार सबके लिए करती, हर नागरिक के लिए करती है, हर राज्य के लिए करती है, तो इसे उतना महत्व नहीं दिया जाता, उसका जिक्र तक नहीं होता। सरकार की योजनाओं से कैसे हर वर्ग का, हर राज्य का समान रूप से भला हो रहा है, इस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। पिछले सात वर्षों में हमने बिना भेदभाव के, बिना पक्षपात के, विकास को हर व्यक्ति, हर वर्ग, और देश के हर कोने तक पहुंचाने का प्रयास किया है। इस साल 15 अगस्त को मैंने गरीब कल्याण से जुड़ी योजनाओं के सैचुरेशन की बात कही और इसके लिए हम मिशन मोड पर जुटे भी हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, इस मंत्र को लेकर के कार्य करने का हमारा प्रयास है I आज इससे देश की तस्वीर कैसे बदली है ये हमें हाल के National Family Health Survey report में भी दिखाई देता है। इस रिपोर्ट के बहुत से तथ्य, इस बात को सिद्ध करते हैं कि जब नेक नीयत के साथ काम किया जाए, सही दिशा में आगे बढ़ा जाए, और सारी शक्ति जुटाकर लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया जाए तो, सुखद परिणाम अवश्य आते हैं। Gender Equality की बात करें तो अब पुरुषों की तुलना में बेटियों की संख्या बढ़ रही है। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में डिलिवरी के ज्यादा अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। इस वजह से माता मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर कम हो रही है। और भी बहुत सारे इंडिकेटर्स ऐसे हैं जिस पर हम एक देश के रूप बहुत अच्छा कर रहे है। इन सभी इंडिकेटर्स में हर परसेंटेज पॉइंट की बढ़ोतरी सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है। ये करोड़ों भारतीयों को मिल रहे उनके हक का प्रमाण है। ये बहुत आवश्यक है कि, जन कल्याण से जुड़ी योजनाओं का पूरा लाभ लोगों को मिले, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाएं समय पर पूरी हों। किसी भी कारण से हुई अनावश्यक देरी, नागरिक को उसके हक से वंचित रखती है। मैं गुजरात का रहने वाला हूँ तो मैं सरदार सरोवर डैम का उदाहरण देना चाहता हूं। सरदार पटेल ने मां नर्मदा पर इस तरह के डैम का सपना देखा था। पंडित नेहरू ने इसका शिलान्यास किया था। लेकिन ये परियोजना दशकों तक अपप्रचार में फंसी रही। पर्यावरण के नाम पर चले आंदोलन में फंसी रही। न्यायालय तक इसमें निर्णय लेने में हिचकिचाते रहे। वर्ल्ड बैंक ने भी इसके लिए पैसे देने से मना कर दिया था। लेकिन उसी नर्मदा के पानी से कच्छ में जो विकास हुआ, विकास का कार्य हुआ, आज हिन्‍दुस्‍तान के तेज गति से आगे बढ़ रहे district में कच्‍छ जिला है। कच्‍छ तो एक प्रकार से रेगिस्‍तान जैसा इलाका है, तेज गति से विकसित होने वाले क्षेत्र में उसकी जगह बन गयी। कभी रेगिस्तान के रूप में जाने वाला कच्छ, पलायन के लिए पहचाना जाने वाला कच्छ, आज एग्रो-एक्सपोर्ट की वजह से अपनी पहचान बना रहा है। इससे बड़ा ग्रीन अवार्ड और क्या हो सकता है?

माननीय,

भारत के लिए, और विश्व के अनेक देशों के लिए, हमारी अनेक पीढ़ियों के लिए, उपनिवेशवाद की बेड़ियों में जकड़े हुए जीना एक मजबूरी थी। भारत की आज़ादी के समय से, पूरे विश्व में एक post-Colonial कालखंड की शुरुआत हुई, अनेकों देश आज़ाद हुए। आज पूरे विश्व में कोई भी देश ऐसा नहीं है जो प्रकट रूप से किसी अन्य देश के उपनिवेश के रूप में exist करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उपनिवेशवादी मानसिकता, Colonial Mindset  समाप्त हो गया  है। हम देख रहे हैं कि यह मानसिकता अनेक विकृतियों को जन्म दे रही है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हमें विकासशील देशों की विकास यात्राओं में आ रही बाधाओं में दिखाई देता है। जिन साधनों से, जिन मार्गों पर चलते हुए, विकसित विश्व आज के मुकाम पर पहुंचा है, आज वही साधन, वही मार्ग, विकासशील देशों के लिए बंद करने के प्रयास किए जाते हैं। पिछले दशकों में इसके लिए अलग-अलग प्रकार की शब्दावली का जाल रचाया जाता है। लेकिन उद्देश्य एक ही रहा है - विकासशील देशों की प्रगति को रोकना। आजकल हम देखते हैं, कि पर्यावरण के विषय को भी इसी काम के लिए हाईजैक करने के प्रयास हो रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले हमने COP-26 समिट में इसका जीवंत उदाहरण देखा है। अगर absolute cumulative emissions की बात करें, तो, विकसित देशों ने मिलकर 1850 से अब तक, भारत से 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अगर हम per capita basis की बात करें तो भी विकसित देशों ने भारत के मुकाबले 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मिलकर भारत की तुलना में 11 गुना अधिक absolute cumulative emission किया है। इसमें भी per capita basis को आधार बनाएं तो अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भारत की तुलना में 20 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। फिर भी आज, आज हमें गर्व है भारत जिसकी सभ्यता और संस्कृति में ही प्रकृति के साथ जीने की प्रवृति है, जहाँ पत्थरों में, पेड़ों में, और प्रकृति के कण-कण में, जहां पत्‍थर में भगवान देखा जाता है, उसका स्वरुप देखा जाता है, जहाँ धरती को माँ के रूप में पूजा जाता है, उस भारत को पर्यावरण संरक्षण के उपदेश सुनाए जाते हैं। और हमारे लिए ये मूल्य सिर्फ़ किताबी नहीं हैं, किताबी बातें नहीं हैं। आज भारत में Lion), Tiger, Dolphin आदि की संख्या, और अनेक प्रकार की biodiversity के मानकों में लगातार सुधार हो रहा है। भारत में वन क्षेत्र बढ़ रहा है। भारत में Degraded Land का सुधार हो रहा है। गाड़ियों के ईंधन के मानकों को हमने स्वेच्छा से बढ़ाया है। हर प्रकार की renewable ऊर्जा में हम विश्व के अग्रणी देशों में हैं। और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त करने की ओर अग्रसर अगर कोई है तो एकमात्र हिन्‍दुस्‍तान है। G20 देशों के समूह में अच्‍छे से अच्‍छा काम करने वाला कोई देश है, दुनिया ने माना है वो हिन्‍दुस्‍तान है और फ़िर भी, ऐसे भारत पर पर्यावरण के नाम पर भाँति-भाँति के दबाव बनाए जाते हैं। यह सब, उपनिवेशवादी मानसिकता का ही परिणाम है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में भी ऐसी ही मानसिकता के चलते अपने ही देश के विकास में रोड़े अटकाए जाते है। कभी freedom of expression के नाम पर तो कभी किसी और चीज़ का सहारा लेकर। हमारे देश की परिस्थितियाँ, हमारे युवाओं की आकांक्षाओ, सपनों को बिना जाने समझे, बहुत सी बार दूसरे देशों के benchmark पर भारत को तौलने का प्रयास होता है और इसकी आड़ में विकास के रास्ते बंद करने की कोशिशें होती हैं। इसका नुकसान, ये जो करते हैं ऐसे लोगों को भुगतना नहीं पड़ता है। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस माँ को, जिसका बच्चा बिजली प्लांट स्थापित न होने के कारण पढ़ नहीं पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस पिता को, जो रुके हुए सड़क प्रोजेक्ट के कारण अपनी संतान को समय पर अस्पताल नहीं पहुँचा पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस मध्यम वर्गीय परिवार को जिसके लिए आधुनिक जीवन की सुविधाएं पर्यावरण के नाम पर उसकी आमदनी से बाहर पहुंचा दी गई हैं। इस कोलोनियल माइंडसेट की वजह से, भारत जैसे देश में, विकास के लिए प्रयास कर रहे देश में, करोड़ों आशाएं टूटती हैं, आकांक्षाएं दम तोड़ देती हैं। आजादी के आंदोलन में जो संकल्पशक्ति पैदा हुई, उसे और अधिक मजबूत करने में ये कोलोनियल माइंडसेट बहुत बड़ी बाधा है। हमें इसे दूर करना ही होगा। और इसके लिए, हमारी सबसे बड़ी शक्ति, हमारा सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत, हमारा संविधान ही है।

माननीय,

सरकार और न्यायपालिका, दोनों का ही जन्म संविधान की कोख से हुआ है। इसलिए, दोनों ही जुड़वां संतानें हैं। संविधान की वजह से ही ये दोनों अस्तित्व में आए हैं। इसलिए, व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो अलग-अलग होने के बाद भी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

हमारे यहाँ शास्त्रों में भी कहा गया है-

ऐक्यम् बलम् समाजस्य, तत् अभावे स दुर्बलः।

तस्मात् ऐक्यम् प्रशंसन्ति, दॄढम् राष्ट्र हितैषिण:॥

अर्थात्, किसी समाज की, देश की ताकत उसकी एकता और एकजुट प्रयासों में होती है। इसलिए, जो मजबूत राष्ट्र के हितैषी होते हैं, वो एकता की प्रशंसा करते हैं, उस पर ज़ोर देते हैं। राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि रखते हुये यही एकता देश की हर संस्था के प्रयासों में होनी चाहिए। आज जब देश अमृतकाल में अपने लिए असाधारण लक्ष्य तय कर रहा है, दशकों पुरानी समस्याओं के समाधान तलाशकर नए भविष्य के लिए संकल्प ले रहा है, तो ये सिद्धि सबके साथ से ही पूरी होगी। इसीलिए, देश ने आने वाले 25 सालों के लिए जब देश आजादी की 25वीं शताब्‍दी मनाता होगा और इसलिए ‘सबका प्रयास’ इसका देश ने आह्वान किया है। निश्चित तौर पर इस आह्वान में एक बड़ी भूमिका judiciary की भी है।

महोदय,

हमारी चर्चा में बिना भूले हुए एक बात लगातार सुनने को आती है, बार-बार उसे दोहराया जाता है - Separation of power । Separation of power की बात, न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका, अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण रही है। इसके साथ ही, आजादी के इस अमृत काल में, भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक, ये जो अमृत काल है, ये अमृत कालखंड में, संविधान की भावना के अनुरूप, Collective Resolve दिखाने की आवश्यकता है। आज देश के सामान्य मानवी के पास जो कुछ है, वो उससे ज्यादा का हकदार है। जब हम देश की आज़ादी की शताब्दी मनायेंगे, उस समय का भारत कैसा होगा, इसके लिए हमें आज ही काम करना है। इसलिए, देश की उसकी आकांक्षाओं  को पूरा करने की collective responsibility के साथ चलना बहुत ज़रूरी है। Separation of Power के मज़बूत अधिष्ठान पर हमें collective responsibility का मार्ग निर्धारित करना है, Roadmap बनाना है, लक्ष्य तय करने है और मंज़िल तक देश को पहुंचना है।

माननीय,

कोरोना काल ने justice delivery में technology के इस्तेमाल को लेकर नया भरोसा पैदा किया है। डिजिटल इंडिया के मेगा मिशन में न्यायपालिका की सहभागिता है। 18 हजार से ज्यादा कोर्ट्स का computerize होना, 98 प्रतिशत कोर्ट कॉम्प्लेक्स का वाइड एरिया नेटवर्क से जुड़ जाना, रियल टाइम में judicial data के transmission के लिए national judicial data grid का functional होना, e-court platform का लाखों लोगों तक पहुँचना, ये बताता है कि आज technology हमारे जस्टिस सिस्टम की कितनी बड़ी ताकत बन चुकी है, और आने वाले समय में हम एक advanced judiciary को काम करते हुये देखेंगे। समय परिवर्तनीय है, दुनिया बदलती रहती है, लेकिन ये बदलाव मानवता के लिए evolution का जरिया बने हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मानवता ने इन बदलावों को स्वीकार किया, और साथ ही मानवीय मूल्यों को शाश्वत बनाए रखा। न्याय की अवधारणा इन मानवीय मूल्यों का सबसे परिष्कृत विचार है। और, संविधान न्याय की इस अवधारणा की सबसे परिष्कृत व्यवस्था है। इस व्यवस्था को गतिशील और प्रगतिशील बनाए रखने का दायित्व हम सभी पर है। अपनी इन भूमिकाओं का निर्वहन हम सब पूरी निष्ठा से करेंगे, और आज़ादी के सौ साल से पहले एक नए भारत का सपना पूरा होगा। हम लगातार इन बातों से प्रेरित हैं, जिस बात के लिए हम गर्व करते हैं और वो मंत्र हमारे लिये है- संगच्छध्वं, संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। हमारे लक्ष्य समान हों, हमारे मन समान हों और हम साथ मिलकर उन लक्ष्यों को प्राप्त करें। इसी भावना के साथ मैं आज संविधान दिवस के इस पवित्र माहौल में आप सबको, देशवासियों को भी अनेकअनेक शुभकामनाएं देते हुए मेरी बात को समाप्‍त करता हूं। फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई।

बहुत बहुत धन्यवाद!