जय सोमनाथ !
जय सोमनाथ !
हर-हर महादेव !
गुजरात के मुख्यमंत्री श्रीमान भूपेंद्र भाई पटेल, उपमुख्यमंत्री भाई हर्ष संघवी जी, गुजरात सरकार के मंत्रीगण, सांसद एवं विधायकगण, अन्य सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों।
आज प्रभास पाटन का पवित्र क्षेत्र एक अद्भुत प्रभा से भरा हुआ है। महादेव का ये साक्षात्कार, ये सौन्दर्य, धरती और आसमान से हुई पुष्पवर्षा, भगवा ध्वजों की ये आभा, कला, संगीत और नृत्य की अद्भुत प्रस्तुतियां, वेदमंत्रों का उच्चार, गर्भगृह में हो रहा शिव पंचाक्षरी का अखंड पाठ और इस सबके साथ-साथ सागर की लहरों का जयघोष, ऐसा लग रहा है, जैसे ये सृष्टि एक साथ बोल रही है- जय सोमनाथ ! जय-जय सोमनाथ !
साथियों,
समय खुद जिनकी इच्छा से प्रकट होता है, जो स्वयं कालातीत हैं, जो स्वयं कालस्वरूप हैं, आज उन देवाधिदेव महादेव की विग्रह प्रतिष्ठा के हम 75 वर्ष मना रहे हैं। ये सृष्टि जिनसे सृजित होती है, जिनमें लय हो जाती है, यतो जायते पाल्यते येन विश्वं, तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ! आज हम उनके धाम के पुनर्निर्माण का उत्सव मना रहे हैं। जो हलाहल को पीकर नीलकंठ हो गए, आज उन्हीं की शरण में यहां सोमनाथ अमृत महोत्सव हो रहा है। ये सब भगवान सदाशिव की ही लीला है।

साथियों,
दादा सोमनाथ के अनन्य भक्त के रूप में, मैं कितनी ही बार यहां आया हूं, कितनी ही बार उनके सामने नतमस्तक हुआ हूं। लेकिन, आज जब मैं यहां आ रहा था, तो समय की ये यात्रा एक सुखद अनुभूति दे रही थी। अभी कुछ ही महीने पहले मैं यहां आया था। तब हम सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मना रहे थे। प्रथम विध्वंस के 1000 वर्ष बाद भी सोमनाथ के अविनाशी होने का गर्व और आज इस आधुनिक स्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष, हम केवल दो आयोजनों का हिस्सा भर नहीं, सिर्फ हिस्सा भर नहीं बने हैं, हमें हजार वर्षों की अमृत यात्रा को अनुभव करने का शिव जी ने मौका दिया है।
साथियों,
75 साल पहले, आज के ही दिन सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना, ये कोई साधारण अवसर नहीं था। अगर 1947 में भारत आजाद हुआ था, तो 1951 में सोमनाथ की प्राण प्रतिष्ठा ने भारत की स्वतंत्र चेतना का उद्घोष किया था। आज़ादी के समय, सरदार साहब ने 500 से ज्यादा रियासतों को जोड़कर एक भारत का आधुनिक स्वरूप गढ़ा था। तो साथ ही, सोमनाथ के पुनर्निर्माण से उन्होंने दुनिया को बताया था, भारत केवल आज़ाद नहीं हुआ है, भारत अपने प्राचीन गौरव को पुनः हासिल करने के मार्ग पर भी अब आगे बढ़ चुका है।
साथियों,
इसलिए, आज इस अवसर पर, मैं केवल 75 वर्षों की झांकी नहीं देख रहा हूं। मैं यहां देख रहा हूं, विनाश में सृजन के संकल्प को, जिसे सोमनाथ ने चरितार्थ किया है। मैं यहां देख रहा हूं, असत्य पर सत्य की विजय को, जिसे प्रभास-पाटन ने बार-बार जिया है। मैं यहां देख रहा हूं, हजारों वर्षों की आध्यात्मिक चेतना को, जिसने मानव मात्र के कल्याण की सीख समूचे विश्व को दी है। मैं यहां देख रहा हूं, भारत के उस अविनाशी स्वरूप को, जिसे सदियों के कुत्सित प्रयास भी न मिटा सके, न हरा सके। और मैं यहां देख रहा हूं, सोमनाथ अमृत-महोत्सव, ये केवल अतीत का उत्सव नहीं है, ये अगले एक हजार वर्षों के लिए भारत की प्रेरणा का महोत्सव भी है। मैं सभी देशवासियों को, दादा सोमनाथ के कोटि-कोटि भक्तों को इस महोत्सव की बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,
आज का दिन एक और वजह से भी विशेष है। 11 मई 1998, 1998, यानि आज के ही दिन, देश ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था। देश ने 11 मई को पहले तीन परमाणु परीक्षण किए। हमारे वैज्ञानिकों ने भारत के सामर्थ्य को, भारत की क्षमता को, वैज्ञानिकों ने दुनिया के सामने रखा, दुनिया में तूफान आ गया। भारत, उसकी ये हैसियत, कौन होता है भारत, जो परमाणु परीक्षण करें और दुनिया की आंखें लाल हो गई, दुनिया भर की शक्तियां भारत को दबोचने के लिए मैदान में उतरी। अनेक प्रकार के बंधन लग गए। आर्थिक संकट की संभावनाओं के रास्ते सारे के सारे बंद कर दिए गए। कोई भी हिल जाता। जब दुनिया भर की बड़ी-बड़ी शक्तियां इतना बड़ा आक्रमण कर दे, तो आगे के रास्ते दिखते नहीं है। लेकिन हम कोई और मिट्टी के बने हुए हैं। 11 मई के बाद दुनिया हम पर टूट पड़ी थी। 11 मई को वैज्ञानिकों ने अपना काम कर लिया था। लेकिन 13 मई को फिर दो और परमाणु परीक्षण हुए, उससे दुनिया को पता चला था कि भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी अटल है। उस समय पूरी दुनिया का दबाव भारत पर था, लेकिन अटल जी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने ये दिखाया था कि हमारे लिए राष्ट्र प्रथम है। दुनिया की कोई ताकत भारत को झुका नहीं सकती, दबाव में नहीं ला सकती।
साथियों,
देश ने पोखरण परमाणु परीक्षण को ऑपरेशन शक्ति नाम दिया था। क्योंकि, शिव के साथ शक्ति की आराधना, ये हमारी परंपरा रही है। अर्धनारीश्वर शिव स्वयं भी शक्ति के साथ ही पूर्ण होते हैं। आपको याद होगा, जब देश का मिशन चंद्रयान सफल हुआ था, तब चंद्रमा पर जहां भारत का रोवर लैंड हुआ, उस जगह का नाम भी हमने ‘शिवशक्ति पॉइंट’ रखा है। क्योंकि, हमारी आस्था में चंद्रमा शिव से जुड़ा है और शिव शक्ति से जुड़े हैं। और ये कितना सुखद है कि चंद्रमा के नाम से ही इस ज्योतिर्लिंग को हम सोमनाथ कहते हैं।
साथियों,
शिव और शक्ति की हमारी आराधना का जो विचार है, वो देश की वैज्ञानिक प्रगति के लिए भी प्रेरणा बने, आज हम ये संकल्प साकार होते देख रहे हैं। मैं इस अवसर पर, भगवान सोमनाथ के चरणों से सभी देशवासियों को ऑपरेशन शक्ति की वर्षगांठ की भी बधाई देता हूं।
साथियों,
जब मैं पिछली बार यहाँ आया था, तब मैंने कहा था- जिसके नाम में ही सोम अर्थात्, अमृत जुड़ा हो, उसे नष्ट कौन कर सकता है? इतिहास के लंबे कालखंड में इस मंदिर ने कितने ही आक्रमण झेले। महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी जैसे अनेक आक्रांता आए, लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर का वैभव मिटाने का प्रयास किया। वो सोमनाथ को एक भौतिक ढांचा मानकर उससे टकराते रहे। बार-बार इस मंदिर को, इस ढांचे को तोड़ा गया। और ये बार-बार बनता रहा, हर बार उठ खड़ा होता रहा, क्योंकि तोड़ने वालों को मालूम नहीं था, हमारे राष्ट्र का वैचारिक सामर्थ्य क्या है। हम भौतिक शरीर को नश्वर मानने वाले लोग हैं। लेकिन, हम जानते हैं, उसके भीतर बैठी आत्मा अविनाशी है। और फिर तो, शिव तो सर्वात्मा हैं। इसलिए, अलग-अलग काल में, अलग-अलग जीवों की संकल्पशक्ति में शिव प्रकट होते रहे। राजा भोज, कभी राजा भीमदेव प्रथम, कभी राजा कुमारपाल, कभी राजा महीपाल प्रथम, तो कभी राव खंगार, ऐसे अनेक शिवभक्त समय-समय पर सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाते रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे कितने मनीषी, उन्होंने प्रभास पाटन क्षेत्र की विरासत को संरक्षित किया, इसे शैव साधना और दर्शन का महान केंद्र बनाया। भाव बृहस्पति, पाशुपताचार्यों और अनेक विद्वानों ने इस तीर्थ की आध्यात्मिक परंपराओं को जीवित रखा। विशालदेव और त्रिपुरांतक जैसे व्यक्तित्वों ने यहां की बौद्धिक चेतना को सुरक्षित रखने का पुनीत कार्य किया।

साथियों,
वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील, पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर जी, बड़ौदा के गायकवाड़, जाम साहब महाराजा दिग्विजय सिंह जी, ऐसी कितनी ही महान विभूतियाँ हैं, जो सोमनाथ की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित करती थीं। मैं आज इस अवसर पर सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, श्रीमान के. एम. मुंशी जी, ऐसी सभी ज्ञात-अज्ञात दिव्यात्माओं को भी श्रद्धा पूर्वक, आदर पूर्वक नमन करता हूँ। उनका स्मरण हमें ये प्रेरणा देता है कि हमें न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाना है, बल्कि इस ज़िम्मेदारी को आने वाली पीढ़ियों के हाथों में सौंपकर भी जाना है।
साथियों,
हमारे सांस्कृतिक स्थल हजारों वर्षों से भारत की पहचान रहे हैं। इतनी समृद्ध विरासत हमें मिली है। लेकिन, आप विडम्बना देखिए, हमने दशकों तक उसके महत्व को नहीं समझा। दुनिया में ऐसे कितने ही उदाहरण हैं, जहां विदेशी हमलावरों ने राष्ट्रीय पहचान से जुड़े स्थलों को नष्ट किया। लेकिन, जब उस देश के लोगों को मौका मिला, सबने साथ आकर, अपनी पहचान को फिर से सहेजा, फिर से संवारा, पुन: प्रतिष्ठा की। लेकिन, हमारे यहाँ राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े विषयों पर भी राजनीति होती रही। सोमनाथ खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज़ादी के बाद पहले दायित्वों में से एक था कि सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार करते। इसलिए, सरदार वल्लभ भाई पटेल और डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी, उन्होंने इसके लिए इतने प्रयास किए। लेकिन, हम सब जानते हैं, उन्हें इसके लिए नेहरूजी द्वारा कितना विरोध झेलना पड़ा था। मैं आज इसके विस्तार में नहीं जाउंगा, लेकिन ये सरदार साहब की इच्छाशक्ति थी कि इतने विरोध के बावजूद सरदार साहब डिगे नहीं। सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी हुआ और देश ने सदियों के कलंक को भी धो दिया।
साथियों,
दुर्भाग्य से देश में ऐसी शक्तियां आज भी प्रभावी हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्वाभिमान से ज्यादा तुष्टिकरण जरूरी लगता है। राममंदिर निर्माण जैसे अवसरों पर भी हमने देखा है, किस तरह राम मंदिर निर्माण का भी विरोध किया गया। हमें ऐसी मानसिकता से सावधान रहना है। इस तरह की संकुचित राजनीति को हमें पीछे छोड़ना होगा। हमें विकास और विरासत को साथ लेकर के आगे बढ़ना होगा।
साथियों,
बीते वर्षों में मुझे सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में सोमनाथ दादा की सेवा का जो अवसर मिला, इस मंदिर और क्षेत्र के विकास के लिए जो ऐतिहासिक काम हुए, उस परिवर्तन को आज हम सब प्रत्यक्ष देख रहे हैं। लेकिन साथ ही, इस सेवा का मुझे व्यक्तिगत लाभ भी हुआ है। आज मुझे देश के सभी पवित्र तीर्थों के विकास का जो मौका मिल रहा है, ये भगवान सोमनाथ का ही कृपा प्रसाद है।

साथियों,
आज काशी में सदियों बाद बाबा विश्वनाथ धाम का इतना भव्य विस्तार हुआ है। आज उज्जैन में महाकाल, महालोक के विशाल दर्शन भी हमें हो रहे हैं। केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण भी हुआ है। जैसा मैंने पहले कहा, अयोध्या में 500 साल की प्रतीक्षा भी पूरी हुई है। आज वहाँ भव्य मंदिर में रामलला विराजमान हैं।
साथियों,
ऐसे कितने ही पवित्र तीर्थ, पवित्र मठ, मंदिर और क्षेत्र, उनकी जो महिमा हमने पुराणों में सुनी है, आज वहाँ हमें उस समृद्ध परंपरा के दर्शन होने लगे हैं। और, ये इतना कुछ 10-12 साल के भीतर-भीतर हुआ है।
साथियों,
हमारे सांस्कृतिक केन्द्रों की उपेक्षा देश के विकास में बड़ी बाधा रही है। क्योंकि, हमारे तीर्थ भारत की आध्यात्मिक-सामाजिक व्यवस्था के केंद्र तो हैं ही, वो देश की आर्थिक प्रगति के भी स्रोत रहे हैं। आज आप देखिए, चारधाम महामार्ग परियोजना, गोविंदघाट से हेमकुंड साहिब तक रोपवे परियोजना, करतारपुर कॉरिडोर, बौद्ध सर्किट का विकास, इनके जरिए देश में तीर्थ क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। सोमनाथ परिसर भी इसका एक सशक्त उदाहरण है। आज सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट से सैकड़ों परिवार जुड़े हैं। हजारों लोगों का जीवन इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। देश-दुनिया के कोने-कोने से जो लोग यहाँ आते हैं, वो गुजरात के बाकी हिस्सों में भी जाते हैं। इससे प्रदेश और देश में प्रगति के नए द्वार खुलते हैं।
साथियों,
हमारी आस्था हमें जीवन जीने का तरीका भी सिखाती है। क्योंकि, हम मानते हैं- सर्वं खल्विदं ब्रह्म ! अर्थात्, सृष्टि का हर एक घटक, ये सम्पूर्ण प्रकृति भी ईश्वर का ही स्वरूप है। इसलिए, हमारी आस्था नदियों में भी है, वृक्षों में भी है। हम जंगलों को भी श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। हम पर्वतों में भी पवित्रता का भाव रखते हैं। और, आज जब दुनिया प्राकृतिक जीवनशैली की ओर लौट रही है, हमें हमारी इस शक्ति को भी पहचानना होगा। हमें हमारे तीर्थों और मंदिरों के विकास के साथ-साथ उनकी गरिमा के लिए जागरूक होना होगा। हम ऐसा जीवन अपनाएं, जिससे प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा हो। साथ ही, हम हमारे पुण्य स्थलों को पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण के रूप में विकसित करें। हमें इन संकल्पों को अपनी आस्था से जोड़कर जीना होगा।

साथियों,
जब नई पीढ़ियां अपने इतिहास, अपनी आस्था और अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ती हैं, तब राष्ट्र का आत्मबल और मजबूत होता है। आज भारत जिस आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, उसमें हमारी इस सांस्कृतिक निरंतरता की भी बहुत बड़ी भूमिका है। आधुनिक और विरासत, आधुनिकता हो या विरासत हो, भारत में इसे कोई अलग नहीं कर सकता, भारत में एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, ये साथ-साथ आगे बढ़ने वाली शक्तियां हैं, एक दूसरे में प्राण पूरने वाली शक्तियां है। सोमनाथ हमें याद दिलाता है कि कोई भी राष्ट्र तभी लंबे समय तक मजबूत रह सकता है, जब वो अपनी जड़ों से जुड़ा रहे। जब हम अपनी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनके हाथों में सुपुर्द करें। 75 वर्ष पहले, जब ये पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर में, 75 वर्ष पहले प्राण प्रतिष्ठा हुई थी, तब भारत ने एक नई चेतना यात्रा शुरू की थी। आज, 75 वर्ष बाद, वही यात्रा और अधिक व्यापक रूप में हमारे सामने है। हमें इसे नई ऊंचाई पर लेकर जाना है। हमारे संकल्पों को पूरा करने में दादा सोमनाथ का आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहे, यही प्रार्थना है। एक बार फिर सभी देशवासियों को, विरासत में विश्वास करने वाले हर नागरिक को, आप सभी को इस अवसर की बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मेरे साथ बोलिए-
जय सोमनाथ।
जय सोमनाथ।
हर-हर महादेव।




