उपस्थित सभी महानुभाव और मेरे परिवार के सभी सदस्य, बंधु गण, मैंने ये कहा कि मेरे परिवार के! दो कारण से - एक तो मैं बनारस का हो गया हूं और दूसरा बचपन से एक ही याद रही है, वो है, रेल। इसलिए रेल से जुड़ा हर व्यक्ति मेरे परिवार का सदस्य है और इस अर्थ में मैं परिवार जनों के बीच आज आया हूं। मुझे खुशी है कि आज यहां दो महत्वपूर्ण प्रकल्प, एक तो 4,500 horse power capacity का डीज़ल इजिंन राष्ट्र को समर्पित हो रहा है और ये हमारी capability है। भारत को आगे बढ़ना है, तो इस बात पर बल देना होगा कि हम, हमारे आत्मबल पर, हमारी शक्ति के आधार पर हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का काम करें।

एक समय था, ये देश पेट भरने के लिए अन्न बाहर से लाता था। जब विदेशों से अन्न आता था, तब हमारा पेट भरता था। लेकिन इस देश में एक ऐसे महापुरूष हुए जिसने बेड़ा उठाया, देश के किसानों को ललकारा, आवाह्न किया, उनको प्रेरणा दी, जय जवान जय किसान का मंत्र दिया और देश के किसानों ने अन्न के भंडार भर दिए। आज हिंदुस्तान अन्न विदेशों में दे सके, ये ताकत आ गई है। वो काम किया था, इसी धरती के लाल, लाल बहादुर शास्त्री ने। अगर हमारे किसान देश को आत्मनिर्भर बना सकते हैं, अन्न के भंडार भर सकते हैं, तो देश की उस ताकत को पहचान करके हमने देश की उस युवा शक्ति का आवाह्न किया है - Make in India! हमारी जितनी आवश्यकताएं हैं, उसका निर्माण देश में क्यों नहीं होना चाहिए? क्या कमी है! जिस देश के पास होनहार नौजवान हों, 65 प्रतिशत 35 साल से कम उम्र के नौजवान हों, वो देश क्या नहीं कर सकता है?

इसलिए भाइयों, बहनों, लाल बहादुर शास्त्री का मंत्र था- जय जवान जय किसान और उन्होंने देश के अन्न के भंडार भर दिए। हम Make in India का मंत्र ले करके आए हैं इंडिजिनस! भारत की विधा से, भारत के संसाधनों से भारत अपनी चीज़ों को बनाए। आज, डिफेंस के क्षेत्र में हर चीज़ हम बाहर से लाते हैं। अश्रु गैस भी बाहर से आता है, बताईए! रोने के लिए भी बाहर से हमको साधन लाने पड़ते हैं। ये बदलना है मुझे और उसमें एक महत्वपूर्ण पहल आज आपके यहां से.. indigenous .. मुझे बताया गया, ये जो इंजिंन बना है, इसमें 96% कंपोनेंट यहीं पर बने हैं, आप ही लोगों ने बनाए हैं। मैंने कहा है कि वो 4% भी नहीं आना चाहिए। बताइए कैसे करोगे? उन्होंने कहा- हम बीड़ा उठाते हैं, हम करेंगे। डिफेंस..सब चीज़ें हम बाहर से ला रहे हैं, मोबाइल फोन बाहर से ला रहे हैं, बताईए! हमारे देश में हमें एक वायुमंडल बनाना है और इस पर हम कोशिश कर रहे हैं।

रेलवे! आप ने मुझे, जब से प्रधानमंत्री बना हूं, बार बार मेरे मुंह से रेलवे के बारे में सुना होगा। घूम फिर करके कहीं भी भाषण करता हूं तो रेलवे तो आ ही जाता है। एक तो बचपन से आदत है और दूसरा, मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत में रेलवे देश को आगे ले जाने की इतनी बड़ी ताकत रखती है, लेकिन हमने उसकी उपेक्षा की है। मेरे लिए रेलवे एक बहुत बड़ी प्राथमिकता है। आप कल्पना कर सकते हो, इतना बड़ा infrastucture! इतनी बड़ी संख्या में manpower! इतना पुराना experience! और विश्व में सर्वाधिक लोगों को ले जाने लाने वाला ये इतना बड़ा organization हमारे पास हो। इसको अगर आधुनिक बनाया जाए, इसको अगर technology upgradation किया जाए, management perfection किया जाए। service oriented बनाया जाए तो क्या हिंदुस्तान की शक्ल सूरत बदलने में रेलवे काम नहीं आ सकती? भाइयों, बहनों मैं ये सपना देख करके काम कर रहा हूं। इसलिए रेलवे तो आगे बढ़ना ही है, लेकिन रेलवे के माध्यम से मुझे देश को आगे बढ़ाना है। और, अब तक क्या हुआ है, रेल मतलब- दो-पांच किलोमीटर नई पटरी डाल दो, एक आद दो नई ट्रेन चालू कर दो, इसी के आस-पास चला है। हम उसमें आमूल-चूल परिवर्तन चाहते हैं।

उसी प्रकार से human resource development. हम जानते हैं कि रेलवे में अभी भी बहुत लोगों को रोज़गार मिलने की संभावनाएं हैं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वे हिम्मत नहीं करते। अगर आर्थिक रूप से उनको मजबूत बनाया जाए तो हज़ारो नौजवान रेलवे अभी भी absorb कर सकता है, इतनी बड़ी ताकत है। इसलिए योग्य manpower के लिए हम चार युनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं, हिंदुस्तान के चार कोनों में। उस युनिवर्सिटी में जो आएंगे उन नौजवानों की शिक्षा दीक्षा होगी और उनको रेलवे के अंदर नौकरी मिलेगी। हमारे कई रेलवे के कर्मचारी हैं। उनकी संतानों को अगर वहां पर पढ़ने का अवसर मिलेगा तो अपने आप रेलवे में नौकरी करने के लिए उसकी सुविधा बढ़ जाएगी। उसको भटकना नहीं पड़ेगा। कुछ लोग अफवाहें फैलाते हैं। आप में से कई लोग होंगे जो 20 साल की उम्र के बाद, 22 साल की उम्र के बाद, पढ़ाई करने के बाद रेलवे से जुड़े होंगे। मैं जन्म से जुड़ा हुआ हूं। इसलिए आप लोगों से ज्यादा रेलवे के प्रति मेरा प्यार है, क्योंकि मेरा तो जीवन ही उसके कारण बना है। जो लोग अफवाहें फैला रहे हैं कि रेलवे का privatization हो रहा है, वो सरासर गलत है। मुझ से ज्यादा इस रेलवे को कोई प्यार नहीं कर सकता और इसलिए ये जो गप्प चलाए जा रहे हैं, भाईयों, बहनों न ये हमारी इच्छा है, न इरादा है, न सोच है। हम इस दिशा में कभी जा नहीं सकते, आप चिंता मत कीजिए। हम क्या चाहते हैं - आज देश के गरीबों के लिए जो पैसा काम आना चाहिए, स्कूल बनाने के लिए, अस्पताल बनाने के लिए, रोड बनाने के लिए, गांव के अंदर गरीब आदमी की सुविधा के लिए, उन सरकारी खजाने के पैसे हर साल रेलवे में डालने पड़ते हैं। क्यों? रेलवे को जि़ंदा रखने के लिए। हम कितने साल तक हिंदुस्तान के गरीबों की तिजोरी से पैसे रेल में डालते रहेंगे? और अगर कहीं और से पैसा मिलता है, तो समझदारी इसमें है कि गरीबों के पैसे रेल में डालने के बजाए, जो धन्ना सेठ हैं, उनके पैसे रेल में डालने चाहिए। इसलिए कम ब्याज से आज दुनिया में पैसे मिलते हैं। हम उन पैसों को रेलवे के विकास के लिए लगाना चाहते हैं, जिसके कारण, आप जो रेलवे में काम कर रहे हैं, उनका भी भला होगा और हिंदुस्तान का भी भला होगा। रेलवे का privatization नहीं होने वाला है।

अब मुझे बताईए, ये युनियन वालों को मैं पूछना चाहता हूं कि रूपया रेलवे में आए, डालर आए, पाउंड आए, अरे आपको क्या फर्क पड़ता है भई! आपका तो पैसा आ रहा है। दूसरी बात, रेलवे के स्टेशन जितने हैं, हमारे.. अब मुझे बताइए, मुझे रेलवे युनिवर्सिटी बनानी है..अगर रेलवे युनिवर्सिटी में मुझे जापान से मदद मिलती है, चाइना से मदद मिलती है, टेक्नॉलोजी की मदद मिलती है, expertise की मदद मिलती है, तो लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए? ज़रा बताईए, सच्चा बोलिए, दिल से बोलिए- लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए? यही काम ये सरकार करना चाहती है भाईयों! और इतना ही नहीं इतना ही नहीं. आज हम देखें हमारे रेलवे स्टेशन कैसे हैं? रेलवे स्टेशन पर रेलवे में 12-12 घंटे प्लेटफार्म पर काम करने वाले रेलवे के कर्मचारी को बैठने के लिए जगह नहीं होती है। ये सच्चाई है कि नहीं है? उसको बेचारे को बैठ करके खाना खाना हो, उसके लिए जगह नहीं है। क्या हमारे रेलवे स्टेशन सुविधा वाले होने चाहिए कि नहीं होने चाहिए? रेलवे पर आने वाले लोगों को सुविधा मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए? मैंने सर्वे किया कि बनारस स्टेशन पे जितने पैसेंजर आते हैं, उनको बैठने के लिए सीट है क्या? और मैं हैरान हो गया कि बहुत कम सीट हैं। ज्यादातर बेचारे बूढ़े पैसेंजर भी घंटों तक रेलवे के इंतज़ार में खड़े रहते हैं। क्या उनको बैठने की सुविधा मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए? मैंने क्या किया, मेरे MPLAD का जो फंड था, मैंने रेलवे वालों को कहा, सबसे ज्यादा, जितनी बैंच लगा सकते हो, प्लेटफार्म पर लगाओ ताकि यहां गरीब से गरीब व्यक्ति को रेलवे के इंतज़ार में बैठा है तो उसको बैठने की जगह मिले। और मैंने सभी एमपी को कहा है, हिंदुस्तान भर में सभी रेलवे स्टेशन पर वो अपने MPLAD फंड में से पैसे लगा करके वहां पर वहां पर बैंचें डलवाएं ताकि रेलवे स्टेशन पर आने वाले पैसेंजर की सुविधा बढ़े। मुझे बताईए, ये सुविधा बढ़ेगी तो आशीर्वाद आपको मिलेगा कि नहीं मिलेगा? सीधी सीधी बात है, सब आपके फायदे के लिए हो रहा है भई। आप मुझे बताईए आज रेलवे स्टेशन जो हैं बड़े बड़े, heart of the city हैं! दो दो चार किलोमीटर लंबे स्टेशन हैं। नीचे तो आपकी मालिकी मुझे मंज़ूर है लेकिन रेलवे में आसमान में कोई इमारत बना देता है और रेलवे के खजाने में हजार करोड़, दो हजार करोड़ आज जाते हैं तो रेलवे मजबूत बनेगी कि नहीं बनेगी? वो प्लेटफार्म के ऊपर, हवा में, आकाश में अपनी इमारत बनाता है, रेलवे के फायदे में जाएगी कि नहीं जाएगी? मालिकी रेलवे की रहेगी कि नहीं रहेगी? रेलवे के कर्मचारियों का भला होगा कि नहीं होगा? हम जो विकास की दिशा ले करके चल रहे हैं, ये चल रहे हैं, privatization की हमारी दिशा नहीं है। हमें दुनिया भर का धन लाना है, रेलवे में लगाना है। रेलवे को बढ़ाना है, रेलवे को आगे ले जाना है और रेल के माध्यम से देश को आगे ले जाना है। हमारे देश में रेलवे को केवल यातायात का साधन माना गया था, हम रेलवे को देश के आर्थिक विकास की रीढ़ की हड्डी के रूप में देखना चाहते हैं।

इसलिए मेरे भाईयों, बहनों मैं देश भर के रेल कर्मचारियों को आज आग्रह करता हूं- आइए! हिंदुस्तान में सबसे उत्तम सेवा कहां की तो रेलवे की ये सपने को हम साकार करें। इन दिनों जो स्वच्छता का अभियान हमने चलाया है, कभी-कभार ट्विटर पर खबरें सुनने को मिलती हैं कि साहब मै पहले भी रेलवे में जाता था अब भी जाता हूं लेकिन अब जरा डिब्बे साफ-सुथरे नजर आते हैं, सफाई दिखती है देखिए लोगों को कितना संतोष मिलता है, आशीर्वाद मिलता है और ये कोई उपकार नहीं है, हमारी जिम्मेवारी का हिस्सा है। It is a part of our duty. धीरे-धीरे उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। हमारा पूरा रेलवे व्यवस्था तंत्र साफ-सुथरा क्यों न हो उसका सबसे ज्यादा लाभ गरीब लोगों को कैसे मिले, मैं तो देख रहा हूं. रेलवे Infrastructure का उपयोग देश के विकास में इतना हो सकता है जिसकी किसे ने कल्पना नहीं की थी। हमारे देश में पोस्ट ऑफिस का नेटवर्क और रेलवे का नेटवर्क इन दोनों का अगर बुद्धिपूर्वक उपयोग किया जाए तो हमारे देश के ग्रामीण विकास की वह धरोहर बन सकते हैं।

मैं उदाहरण देता हूं- रेलवे के पास बिजली होती है, कहीं पर भी जाइए रेलवे के पास बिजली का कनेक्शन है। हिंदुस्तान की हर जगह पर। रेलवे के पास Infrastructure है। छोटे-छोटे गांव पर भी, छोटे-छोटे स्टेशन बने हुए हैं, भले ही वहां पर एक ट्रेन आती हो तो भी कोई न कोई वहां बैठा है, कोई न कोई व्यवस्था है। बाकी 24 घंटे वो खाली पड़ा रहता है उसी प्रकार से पोस्ट ऑफिस गांव-गांव तक उसका नेटवर्क है लेकिन वो पुराने जमाने की चल रही है उसमें बदलाव लाना है ये मैंने तय किया है और बदलाव लाने वाला हूं। अब मुझे बताइए गांव के अंदर जो रेलवे के स्टेशन हैं वहां पर दिन में मुश्किल से एक ट्रेन आती है मेरे हिसाब से हजारों की तादाद में ऐसी जगहें हैं, जहां बिजली हो, जहां Infrastructure हो वहीं पर अगर एक-दो कमरे और बना दिए जाएं और उन कमरों में Skill Development की Classes शुरू की जाएं क्योंकि Skill Development करना है तो Machine tools चाहिए और Machine tools के लिए बिजली चाहिए लेकिन बिजली गांव में नहीं है लेकिन रेलवे स्टेशन पर है, गांव के बच्चे Daily रेलवे स्टेशन पर आएंगे और रेलवे स्टेशन पर जो दो कमरें बने हुए होंगे उनमें जो Tools लगे हुए होंगे। Turner, Fitter के Course चलेंगे। एक साथ हिंदुस्तान में Extra पैसे खर्च किए बिना रेलवे की मदद से देश में हजारों की तादाद में Skill Development Centres खड़े हो सकते हैं कि नहीं।

मेरे भाईयों-बहनों थोड़ा दिमाग का उपयोग करने की जरुरत है, आप देखिए चीजें बदलने वाली हैं। मैं रेलवे के मित्रों से कहना चाहता हूं ऐसे स्टेशनों को Identify कीजिए जहां पर बिजली की सुविधा है वहां पर सरकार अपने खर्चे सेदो-तीन कमरे और बना दे और वहां पर उस इलाके के जो 500-1000 बच्चे हो उनके लिए Skill Development के Institutions चलें। ट्रेन ट्रेन का और Institutions, Institutions का काम करें रेलवे को Income हो जाए और गांव के बच्चों का Skill Development हो जाए। एक साथ हम अनेक व्यवस्थाएं विकसित कर सकते हैं और उस दिशा में हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

आज एक तो सोलर प्लांट भी इसके साथ जुड़ रहा है। आधुनिक Loco shed का Expansion हो रहा है, करीब 300 करोड़ रुपए जब पूरा होगा। 300 करोड़ रुपए की लागत से यहां Expansion होने के कारण इस क्षेत्र के अनेक नौजवानों को रोजगार की नई संभावनाएं बढ़ने वाली हैं।

मैं फिर एक बार रेल विभाग को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। श्रीमान सुरेश प्रभु जी के नेतृत्व में बहुत तेज गति से रेल का विकास होगा। आजादी के बाद जितना विकास हुआ है उससे ज्यादा विकास मुझे आने वाले दिनों में करना है। रेलवे के बैठे सभी मेरे साथियों आप सभी मेरे परिवारजन हैं और इसलिए मेरा आप पर हक बनता है, रेलवे वालों पर मेरा सबसे ज्यादा हक बनता है कि हम सब मिलकर के रेल को सेवा का एक बहुत बड़ा माध्यम बनाएं, सुविधा का माध्यम बनाएं और राष्ट्र की आर्थिक गति को तेज करने का एक माध्यम बना दें। उस विश्वास के साथ आगे बढ़ें, इसी एक अपेक्षा के साथ आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद.

Explore More
શ્રી રામ જન્મભૂમિ મંદિર ધ્વજારોહણ ઉત્સવ દરમિયાન પ્રધાનમંત્રીના સંબોધનનો મૂળપાઠ

લોકપ્રિય ભાષણો

શ્રી રામ જન્મભૂમિ મંદિર ધ્વજારોહણ ઉત્સવ દરમિયાન પ્રધાનમંત્રીના સંબોધનનો મૂળપાઠ
FPOs’ sales rise via commodity exchanges in FY26

Media Coverage

FPOs’ sales rise via commodity exchanges in FY26
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
Somnath Amrut Mahotsav is a grand festival of inspiration for India for the next thousand years: PM Modi in Prabhas Patan, Gujarat
May 11, 2026
The Somnath Temple stands as a beacon of unwavering faith, divinity and a sacred symbol of India’s eternal soul: PM
The restoration of the Somnath Temple on this exact day 75 years ago was no ordinary occasion; If India attained independence in 1947, then the consecration of Somnath in 1951 proclaimed the independent spirit of India: PM
The Somnath Amrit Mahotsav will serve as India's guiding inspiration for the next thousand years: PM
Looters tried to destroy the magnificence of the Somnath temple;Thinking of Somnath as nothing but a physical edifice, they kept striking against it; The temple was broken repeatedly, yet it was rebuilt time and again, standing tall after every fall: PM
Not only was the Somnath temple reconstructed, but the country also washed away the blemish of centuries: PM
Somnath serves as a reminder that a nation can sustain its strength over time only if it remains connected to its roots: PM

जय सोमनाथ !

जय सोमनाथ !

हर-हर महादेव !

गुजरात के मुख्यमंत्री श्रीमान भूपेंद्र भाई पटेल, उपमुख्यमंत्री भाई हर्ष संघवी जी, गुजरात सरकार के मंत्रीगण, सांसद एवं विधायकगण, अन्य सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों।

आज प्रभास पाटन का पवित्र क्षेत्र एक अद्भुत प्रभा से भरा हुआ है। महादेव का ये साक्षात्कार, ये सौन्दर्य, धरती और आसमान से हुई पुष्पवर्षा, भगवा ध्वजों की ये आभा, कला, संगीत और नृत्य की अद्भुत प्रस्तुतियां, वेदमंत्रों का उच्चार, गर्भगृह में हो रहा शिव पंचाक्षरी का अखंड पाठ और इस सबके साथ-साथ सागर की लहरों का जयघोष, ऐसा लग रहा है, जैसे ये सृष्टि एक साथ बोल रही है- जय सोमनाथ ! जय-जय सोमनाथ !

साथियों,

समय खुद जिनकी इच्छा से प्रकट होता है, जो स्वयं कालातीत हैं, जो स्वयं कालस्वरूप हैं, आज उन देवाधिदेव महादेव की विग्रह प्रतिष्ठा के हम 75 वर्ष मना रहे हैं। ये सृष्टि जिनसे सृजित होती है, जिनमें लय हो जाती है, यतो जायते पाल्यते येन विश्वं, तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ! आज हम उनके धाम के पुनर्निर्माण का उत्सव मना रहे हैं। जो हलाहल को पीकर नीलकंठ हो गए, आज उन्हीं की शरण में यहां सोमनाथ अमृत महोत्सव हो रहा है। ये सब भगवान सदाशिव की ही लीला है।

साथियों,

दादा सोमनाथ के अनन्य भक्त के रूप में, मैं कितनी ही बार यहां आया हूं, कितनी ही बार उनके सामने नतमस्तक हुआ हूं। लेकिन, आज जब मैं यहां आ रहा था, तो समय की ये यात्रा एक सुखद अनुभूति दे रही थी। अभी कुछ ही महीने पहले मैं यहां आया था। तब हम सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मना रहे थे। प्रथम विध्वंस के 1000 वर्ष बाद भी सोमनाथ के अविनाशी होने का गर्व और आज इस आधुनिक स्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष, हम केवल दो आयोजनों का हिस्सा भर नहीं, सिर्फ हिस्सा भर नहीं बने हैं, हमें हजार वर्षों की अमृत यात्रा को अनुभव करने का शिव जी ने मौका दिया है।

साथियों,

75 साल पहले, आज के ही दिन सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना, ये कोई साधारण अवसर नहीं था। अगर 1947 में भारत आजाद हुआ था, तो 1951 में सोमनाथ की प्राण प्रतिष्ठा ने भारत की स्वतंत्र चेतना का उद्घोष किया था। आज़ादी के समय, सरदार साहब ने 500 से ज्यादा रियासतों को जोड़कर एक भारत का आधुनिक स्वरूप गढ़ा था। तो साथ ही, सोमनाथ के पुनर्निर्माण से उन्होंने दुनिया को बताया था, भारत केवल आज़ाद नहीं हुआ है, भारत अपने प्राचीन गौरव को पुनः हासिल करने के मार्ग पर भी अब आगे बढ़ चुका है।

साथियों,

इसलिए, आज इस अवसर पर, मैं केवल 75 वर्षों की झांकी नहीं देख रहा हूं। मैं यहां देख रहा हूं, विनाश में सृजन के संकल्प को, जिसे सोमनाथ ने चरितार्थ किया है। मैं यहां देख रहा हूं, असत्य पर सत्य की विजय को, जिसे प्रभास-पाटन ने बार-बार जिया है। मैं यहां देख रहा हूं, हजारों वर्षों की आध्यात्मिक चेतना को, जिसने मानव मात्र के कल्याण की सीख समूचे विश्व को दी है। मैं यहां देख रहा हूं, भारत के उस अविनाशी स्वरूप को, जिसे सदियों के कुत्सित प्रयास भी न मिटा सके, न हरा सके। और मैं यहां देख रहा हूं, सोमनाथ अमृत-महोत्सव, ये केवल अतीत का उत्सव नहीं है, ये अगले एक हजार वर्षों के लिए भारत की प्रेरणा का महोत्सव भी है। मैं सभी देशवासियों को, दादा सोमनाथ के कोटि-कोटि भक्तों को इस महोत्सव की बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

आज का दिन एक और वजह से भी विशेष है। 11 मई 1998, 1998, यानि आज के ही दिन, देश ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था। देश ने 11 मई को पहले तीन परमाणु परीक्षण किए। हमारे वैज्ञानिकों ने भारत के सामर्थ्य को, भारत की क्षमता को, वैज्ञानिकों ने दुनिया के सामने रखा, दुनिया में तूफान आ गया। भारत, उसकी ये हैसियत, कौन होता है भारत, जो परमाणु परीक्षण करें और दुनिया की आंखें लाल हो गई, दुनिया भर की शक्तियां भारत को दबोचने के लिए मैदान में उतरी। अनेक प्रकार के बंधन लग गए। आर्थिक संकट की संभावनाओं के रास्ते सारे के सारे बंद कर दिए गए। कोई भी हिल जाता। जब दुनिया भर की बड़ी-बड़ी शक्तियां इतना बड़ा आक्रमण कर दे, तो आगे के रास्ते दिखते नहीं है। लेकिन हम कोई और मिट्टी के बने हुए हैं। 11 मई के बाद दुनिया हम पर टूट पड़ी थी। 11 मई को वैज्ञानिकों ने अपना काम कर लिया था। लेकिन 13 मई को फिर दो और परमाणु परीक्षण हुए, उससे दुनिया को पता चला था कि भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी अटल है। उस समय पूरी दुनिया का दबाव भारत पर था, लेकिन अटल जी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने ये दिखाया था कि हमारे लिए राष्ट्र प्रथम है। दुनिया की कोई ताकत भारत को झुका नहीं सकती, दबाव में नहीं ला सकती।

साथियों,

देश ने पोखरण परमाणु परीक्षण को ऑपरेशन शक्ति नाम दिया था। क्योंकि, शिव के साथ शक्ति की आराधना, ये हमारी परंपरा रही है। अर्धनारीश्वर शिव स्वयं भी शक्ति के साथ ही पूर्ण होते हैं। आपको याद होगा, जब देश का मिशन चंद्रयान सफल हुआ था, तब चंद्रमा पर जहां भारत का रोवर लैंड हुआ, उस जगह का नाम भी हमने ‘शिवशक्ति पॉइंट’ रखा है। क्योंकि, हमारी आस्था में चंद्रमा शिव से जुड़ा है और शिव शक्ति से जुड़े हैं। और ये कितना सुखद है कि चंद्रमा के नाम से ही इस ज्योतिर्लिंग को हम सोमनाथ कहते हैं।

साथियों,

शिव और शक्ति की हमारी आराधना का जो विचार है, वो देश की वैज्ञानिक प्रगति के लिए भी प्रेरणा बने, आज हम ये संकल्प साकार होते देख रहे हैं। मैं इस अवसर पर, भगवान सोमनाथ के चरणों से सभी देशवासियों को ऑपरेशन शक्ति की वर्षगांठ की भी बधाई देता हूं।

साथियों,

जब मैं पिछली बार यहाँ आया था, तब मैंने कहा था- जिसके नाम में ही सोम अर्थात्, अमृत जुड़ा हो, उसे नष्ट कौन कर सकता है? इतिहास के लंबे कालखंड में इस मंदिर ने कितने ही आक्रमण झेले। महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी जैसे अनेक आक्रांता आए, लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर का वैभव मिटाने का प्रयास किया। वो सोमनाथ को एक भौतिक ढांचा मानकर उससे टकराते रहे। बार-बार इस मंदिर को, इस ढांचे को तोड़ा गया। और ये बार-बार बनता रहा, हर बार उठ खड़ा होता रहा, क्योंकि तोड़ने वालों को मालूम नहीं था, हमारे राष्ट्र का वैचारिक सामर्थ्य क्या है। हम भौतिक शरीर को नश्वर मानने वाले लोग हैं। लेकिन, हम जानते हैं, उसके भीतर बैठी आत्मा अविनाशी है। और फिर तो, शिव तो सर्वात्मा हैं। इसलिए, अलग-अलग काल में, अलग-अलग जीवों की संकल्पशक्ति में शिव प्रकट होते रहे। राजा भोज, कभी राजा भीमदेव प्रथम, कभी राजा कुमारपाल, कभी राजा महीपाल प्रथम, तो कभी राव खंगार, ऐसे अनेक शिवभक्त समय-समय पर सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाते रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे कितने मनीषी, उन्होंने प्रभास पाटन क्षेत्र की विरासत को संरक्षित किया, इसे शैव साधना और दर्शन का महान केंद्र बनाया। भाव बृहस्पति, पाशुपताचार्यों और अनेक विद्वानों ने इस तीर्थ की आध्यात्मिक परंपराओं को जीवित रखा। विशालदेव और त्रिपुरांतक जैसे व्यक्तित्वों ने यहां की बौद्धिक चेतना को सुरक्षित रखने का पुनीत कार्य किया।

साथियों,

वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील, पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर जी, बड़ौदा के गायकवाड़, जाम साहब महाराजा दिग्विजय सिंह जी, ऐसी कितनी ही महान विभूतियाँ हैं, जो सोमनाथ की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित करती थीं। मैं आज इस अवसर पर सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, श्रीमान के. एम. मुंशी जी, ऐसी सभी ज्ञात-अज्ञात दिव्यात्माओं को भी श्रद्धा पूर्वक, आदर पूर्वक नमन करता हूँ। उनका स्मरण हमें ये प्रेरणा देता है कि हमें न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाना है, बल्कि इस ज़िम्मेदारी को आने वाली पीढ़ियों के हाथों में सौंपकर भी जाना है।

साथियों,

हमारे सांस्कृतिक स्थल हजारों वर्षों से भारत की पहचान रहे हैं। इतनी समृद्ध विरासत हमें मिली है। लेकिन, आप विडम्बना देखिए, हमने दशकों तक उसके महत्व को नहीं समझा। दुनिया में ऐसे कितने ही उदाहरण हैं, जहां विदेशी हमलावरों ने राष्ट्रीय पहचान से जुड़े स्थलों को नष्ट किया। लेकिन, जब उस देश के लोगों को मौका मिला, सबने साथ आकर, अपनी पहचान को फिर से सहेजा, फिर से संवारा, पुन: प्रतिष्ठा की। लेकिन, हमारे यहाँ राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े विषयों पर भी राजनीति होती रही। सोमनाथ खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज़ादी के बाद पहले दायित्वों में से एक था कि सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार करते। इसलिए, सरदार वल्लभ भाई पटेल और डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी, उन्होंने इसके लिए इतने प्रयास किए। लेकिन, हम सब जानते हैं, उन्हें इसके लिए नेहरूजी द्वारा कितना विरोध झेलना पड़ा था। मैं आज इसके विस्तार में नहीं जाउंगा, लेकिन ये सरदार साहब की इच्छाशक्ति थी कि इतने विरोध के बावजूद सरदार साहब डिगे नहीं। सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी हुआ और देश ने सदियों के कलंक को भी धो दिया।

साथियों,

दुर्भाग्य से देश में ऐसी शक्तियां आज भी प्रभावी हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्वाभिमान से ज्यादा तुष्टिकरण जरूरी लगता है। राममंदिर निर्माण जैसे अवसरों पर भी हमने देखा है, किस तरह राम मंदिर निर्माण का भी विरोध किया गया। हमें ऐसी मानसिकता से सावधान रहना है। इस तरह की संकुचित राजनीति को हमें पीछे छोड़ना होगा। हमें विकास और विरासत को साथ लेकर के आगे बढ़ना होगा।

साथियों,

बीते वर्षों में मुझे सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में सोमनाथ दादा की सेवा का जो अवसर मिला, इस मंदिर और क्षेत्र के विकास के लिए जो ऐतिहासिक काम हुए, उस परिवर्तन को आज हम सब प्रत्यक्ष देख रहे हैं। लेकिन साथ ही, इस सेवा का मुझे व्यक्तिगत लाभ भी हुआ है। आज मुझे देश के सभी पवित्र तीर्थों के विकास का जो मौका मिल रहा है, ये भगवान सोमनाथ का ही कृपा प्रसाद है।

साथियों,

आज काशी में सदियों बाद बाबा विश्वनाथ धाम का इतना भव्य विस्तार हुआ है। आज उज्जैन में महाकाल, महालोक के विशाल दर्शन भी हमें हो रहे हैं। केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण भी हुआ है। जैसा मैंने पहले कहा, अयोध्या में 500 साल की प्रतीक्षा भी पूरी हुई है। आज वहाँ भव्य मंदिर में रामलला विराजमान हैं।

साथियों,

ऐसे कितने ही पवित्र तीर्थ, पवित्र मठ, मंदिर और क्षेत्र, उनकी जो महिमा हमने पुराणों में सुनी है, आज वहाँ हमें उस समृद्ध परंपरा के दर्शन होने लगे हैं। और, ये इतना कुछ 10-12 साल के भीतर-भीतर हुआ है।

साथियों,

हमारे सांस्कृतिक केन्द्रों की उपेक्षा देश के विकास में बड़ी बाधा रही है। क्योंकि, हमारे तीर्थ भारत की आध्यात्मिक-सामाजिक व्यवस्था के केंद्र तो हैं ही, वो देश की आर्थिक प्रगति के भी स्रोत रहे हैं। आज आप देखिए, चारधाम महामार्ग परियोजना, गोविंदघाट से हेमकुंड साहिब तक रोपवे परियोजना, करतारपुर कॉरिडोर, बौद्ध सर्किट का विकास, इनके जरिए देश में तीर्थ क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। सोमनाथ परिसर भी इसका एक सशक्त उदाहरण है। आज सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट से सैकड़ों परिवार जुड़े हैं। हजारों लोगों का जीवन इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। देश-दुनिया के कोने-कोने से जो लोग यहाँ आते हैं, वो गुजरात के बाकी हिस्सों में भी जाते हैं। इससे प्रदेश और देश में प्रगति के नए द्वार खुलते हैं।

साथियों,

हमारी आस्था हमें जीवन जीने का तरीका भी सिखाती है। क्योंकि, हम मानते हैं- सर्वं खल्विदं ब्रह्म ! अर्थात्, सृष्टि का हर एक घटक, ये सम्पूर्ण प्रकृति भी ईश्वर का ही स्वरूप है। इसलिए, हमारी आस्था नदियों में भी है, वृक्षों में भी है। हम जंगलों को भी श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। हम पर्वतों में भी पवित्रता का भाव रखते हैं। और, आज जब दुनिया प्राकृतिक जीवनशैली की ओर लौट रही है, हमें हमारी इस शक्ति को भी पहचानना होगा। हमें हमारे तीर्थों और मंदिरों के विकास के साथ-साथ उनकी गरिमा के लिए जागरूक होना होगा। हम ऐसा जीवन अपनाएं, जिससे प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा हो। साथ ही, हम हमारे पुण्य स्थलों को पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण के रूप में विकसित करें। हमें इन संकल्पों को अपनी आस्था से जोड़कर जीना होगा।

साथियों,

जब नई पीढ़ियां अपने इतिहास, अपनी आस्था और अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ती हैं, तब राष्ट्र का आत्मबल और मजबूत होता है। आज भारत जिस आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, उसमें हमारी इस सांस्कृतिक निरंतरता की भी बहुत बड़ी भूमिका है। आधुनिक और विरासत, आधुनिकता हो या विरासत हो, भारत में इसे कोई अलग नहीं कर सकता, भारत में एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, ये साथ-साथ आगे बढ़ने वाली शक्तियां हैं, एक दूसरे में प्राण पूरने वाली शक्तियां है। सोमनाथ हमें याद दिलाता है कि कोई भी राष्ट्र तभी लंबे समय तक मजबूत रह सकता है, जब वो अपनी जड़ों से जुड़ा रहे। जब हम अपनी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनके हाथों में सुपुर्द करें। 75 वर्ष पहले, जब ये पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर में, 75 वर्ष पहले प्राण प्रतिष्ठा हुई थी, तब भारत ने एक नई चेतना यात्रा शुरू की थी। आज, 75 वर्ष बाद, वही यात्रा और अधिक व्यापक रूप में हमारे सामने है। हमें इसे नई ऊंचाई पर लेकर जाना है। हमारे संकल्पों को पूरा करने में दादा सोमनाथ का आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहे, यही प्रार्थना है। एक बार फिर सभी देशवासियों को, विरासत में विश्वास करने वाले हर नागरिक को, आप सभी को इस अवसर की बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मेरे साथ बोलिए-

जय सोमनाथ।

जय सोमनाथ।

हर-हर महादेव।