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उपस्थित सभी महानुभाव और मेरे परिवार के सभी सदस्य, बंधु गण, मैंने ये कहा कि मेरे परिवार के! दो कारण से - एक तो मैं बनारस का हो गया हूं और दूसरा बचपन से एक ही याद रही है, वो है, रेल। इसलिए रेल से जुड़ा हर व्यक्ति मेरे परिवार का सदस्य है और इस अर्थ में मैं परिवार जनों के बीच आज आया हूं। मुझे खुशी है कि आज यहां दो महत्वपूर्ण प्रकल्प, एक तो 4,500 horse power capacity का डीज़ल इजिंन राष्ट्र को समर्पित हो रहा है और ये हमारी capability है। भारत को आगे बढ़ना है, तो इस बात पर बल देना होगा कि हम, हमारे आत्मबल पर, हमारी शक्ति के आधार पर हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का काम करें।

एक समय था, ये देश पेट भरने के लिए अन्न बाहर से लाता था। जब विदेशों से अन्न आता था, तब हमारा पेट भरता था। लेकिन इस देश में एक ऐसे महापुरूष हुए जिसने बेड़ा उठाया, देश के किसानों को ललकारा, आवाह्न किया, उनको प्रेरणा दी, जय जवान जय किसान का मंत्र दिया और देश के किसानों ने अन्न के भंडार भर दिए। आज हिंदुस्तान अन्न विदेशों में दे सके, ये ताकत आ गई है। वो काम किया था, इसी धरती के लाल, लाल बहादुर शास्त्री ने। अगर हमारे किसान देश को आत्मनिर्भर बना सकते हैं, अन्न के भंडार भर सकते हैं, तो देश की उस ताकत को पहचान करके हमने देश की उस युवा शक्ति का आवाह्न किया है - Make in India! हमारी जितनी आवश्यकताएं हैं, उसका निर्माण देश में क्यों नहीं होना चाहिए? क्या कमी है! जिस देश के पास होनहार नौजवान हों, 65 प्रतिशत 35 साल से कम उम्र के नौजवान हों, वो देश क्या नहीं कर सकता है?

इसलिए भाइयों, बहनों, लाल बहादुर शास्त्री का मंत्र था- जय जवान जय किसान और उन्होंने देश के अन्न के भंडार भर दिए। हम Make in India का मंत्र ले करके आए हैं इंडिजिनस! भारत की विधा से, भारत के संसाधनों से भारत अपनी चीज़ों को बनाए। आज, डिफेंस के क्षेत्र में हर चीज़ हम बाहर से लाते हैं। अश्रु गैस भी बाहर से आता है, बताईए! रोने के लिए भी बाहर से हमको साधन लाने पड़ते हैं। ये बदलना है मुझे और उसमें एक महत्वपूर्ण पहल आज आपके यहां से.. indigenous .. मुझे बताया गया, ये जो इंजिंन बना है, इसमें 96% कंपोनेंट यहीं पर बने हैं, आप ही लोगों ने बनाए हैं। मैंने कहा है कि वो 4% भी नहीं आना चाहिए। बताइए कैसे करोगे? उन्होंने कहा- हम बीड़ा उठाते हैं, हम करेंगे। डिफेंस..सब चीज़ें हम बाहर से ला रहे हैं, मोबाइल फोन बाहर से ला रहे हैं, बताईए! हमारे देश में हमें एक वायुमंडल बनाना है और इस पर हम कोशिश कर रहे हैं।

रेलवे! आप ने मुझे, जब से प्रधानमंत्री बना हूं, बार बार मेरे मुंह से रेलवे के बारे में सुना होगा। घूम फिर करके कहीं भी भाषण करता हूं तो रेलवे तो आ ही जाता है। एक तो बचपन से आदत है और दूसरा, मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत में रेलवे देश को आगे ले जाने की इतनी बड़ी ताकत रखती है, लेकिन हमने उसकी उपेक्षा की है। मेरे लिए रेलवे एक बहुत बड़ी प्राथमिकता है। आप कल्पना कर सकते हो, इतना बड़ा infrastucture! इतनी बड़ी संख्या में manpower! इतना पुराना experience! और विश्व में सर्वाधिक लोगों को ले जाने लाने वाला ये इतना बड़ा organization हमारे पास हो। इसको अगर आधुनिक बनाया जाए, इसको अगर technology upgradation किया जाए, management perfection किया जाए। service oriented बनाया जाए तो क्या हिंदुस्तान की शक्ल सूरत बदलने में रेलवे काम नहीं आ सकती? भाइयों, बहनों मैं ये सपना देख करके काम कर रहा हूं। इसलिए रेलवे तो आगे बढ़ना ही है, लेकिन रेलवे के माध्यम से मुझे देश को आगे बढ़ाना है। और, अब तक क्या हुआ है, रेल मतलब- दो-पांच किलोमीटर नई पटरी डाल दो, एक आद दो नई ट्रेन चालू कर दो, इसी के आस-पास चला है। हम उसमें आमूल-चूल परिवर्तन चाहते हैं।

उसी प्रकार से human resource development. हम जानते हैं कि रेलवे में अभी भी बहुत लोगों को रोज़गार मिलने की संभावनाएं हैं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वे हिम्मत नहीं करते। अगर आर्थिक रूप से उनको मजबूत बनाया जाए तो हज़ारो नौजवान रेलवे अभी भी absorb कर सकता है, इतनी बड़ी ताकत है। इसलिए योग्य manpower के लिए हम चार युनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं, हिंदुस्तान के चार कोनों में। उस युनिवर्सिटी में जो आएंगे उन नौजवानों की शिक्षा दीक्षा होगी और उनको रेलवे के अंदर नौकरी मिलेगी। हमारे कई रेलवे के कर्मचारी हैं। उनकी संतानों को अगर वहां पर पढ़ने का अवसर मिलेगा तो अपने आप रेलवे में नौकरी करने के लिए उसकी सुविधा बढ़ जाएगी। उसको भटकना नहीं पड़ेगा। कुछ लोग अफवाहें फैलाते हैं। आप में से कई लोग होंगे जो 20 साल की उम्र के बाद, 22 साल की उम्र के बाद, पढ़ाई करने के बाद रेलवे से जुड़े होंगे। मैं जन्म से जुड़ा हुआ हूं। इसलिए आप लोगों से ज्यादा रेलवे के प्रति मेरा प्यार है, क्योंकि मेरा तो जीवन ही उसके कारण बना है। जो लोग अफवाहें फैला रहे हैं कि रेलवे का privatization हो रहा है, वो सरासर गलत है। मुझ से ज्यादा इस रेलवे को कोई प्यार नहीं कर सकता और इसलिए ये जो गप्प चलाए जा रहे हैं, भाईयों, बहनों न ये हमारी इच्छा है, न इरादा है, न सोच है। हम इस दिशा में कभी जा नहीं सकते, आप चिंता मत कीजिए। हम क्या चाहते हैं - आज देश के गरीबों के लिए जो पैसा काम आना चाहिए, स्कूल बनाने के लिए, अस्पताल बनाने के लिए, रोड बनाने के लिए, गांव के अंदर गरीब आदमी की सुविधा के लिए, उन सरकारी खजाने के पैसे हर साल रेलवे में डालने पड़ते हैं। क्यों? रेलवे को जि़ंदा रखने के लिए। हम कितने साल तक हिंदुस्तान के गरीबों की तिजोरी से पैसे रेल में डालते रहेंगे? और अगर कहीं और से पैसा मिलता है, तो समझदारी इसमें है कि गरीबों के पैसे रेल में डालने के बजाए, जो धन्ना सेठ हैं, उनके पैसे रेल में डालने चाहिए। इसलिए कम ब्याज से आज दुनिया में पैसे मिलते हैं। हम उन पैसों को रेलवे के विकास के लिए लगाना चाहते हैं, जिसके कारण, आप जो रेलवे में काम कर रहे हैं, उनका भी भला होगा और हिंदुस्तान का भी भला होगा। रेलवे का privatization नहीं होने वाला है।

अब मुझे बताईए, ये युनियन वालों को मैं पूछना चाहता हूं कि रूपया रेलवे में आए, डालर आए, पाउंड आए, अरे आपको क्या फर्क पड़ता है भई! आपका तो पैसा आ रहा है। दूसरी बात, रेलवे के स्टेशन जितने हैं, हमारे.. अब मुझे बताइए, मुझे रेलवे युनिवर्सिटी बनानी है..अगर रेलवे युनिवर्सिटी में मुझे जापान से मदद मिलती है, चाइना से मदद मिलती है, टेक्नॉलोजी की मदद मिलती है, expertise की मदद मिलती है, तो लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए? ज़रा बताईए, सच्चा बोलिए, दिल से बोलिए- लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए? यही काम ये सरकार करना चाहती है भाईयों! और इतना ही नहीं इतना ही नहीं. आज हम देखें हमारे रेलवे स्टेशन कैसे हैं? रेलवे स्टेशन पर रेलवे में 12-12 घंटे प्लेटफार्म पर काम करने वाले रेलवे के कर्मचारी को बैठने के लिए जगह नहीं होती है। ये सच्चाई है कि नहीं है? उसको बेचारे को बैठ करके खाना खाना हो, उसके लिए जगह नहीं है। क्या हमारे रेलवे स्टेशन सुविधा वाले होने चाहिए कि नहीं होने चाहिए? रेलवे पर आने वाले लोगों को सुविधा मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए? मैंने सर्वे किया कि बनारस स्टेशन पे जितने पैसेंजर आते हैं, उनको बैठने के लिए सीट है क्या? और मैं हैरान हो गया कि बहुत कम सीट हैं। ज्यादातर बेचारे बूढ़े पैसेंजर भी घंटों तक रेलवे के इंतज़ार में खड़े रहते हैं। क्या उनको बैठने की सुविधा मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए? मैंने क्या किया, मेरे MPLAD का जो फंड था, मैंने रेलवे वालों को कहा, सबसे ज्यादा, जितनी बैंच लगा सकते हो, प्लेटफार्म पर लगाओ ताकि यहां गरीब से गरीब व्यक्ति को रेलवे के इंतज़ार में बैठा है तो उसको बैठने की जगह मिले। और मैंने सभी एमपी को कहा है, हिंदुस्तान भर में सभी रेलवे स्टेशन पर वो अपने MPLAD फंड में से पैसे लगा करके वहां पर वहां पर बैंचें डलवाएं ताकि रेलवे स्टेशन पर आने वाले पैसेंजर की सुविधा बढ़े। मुझे बताईए, ये सुविधा बढ़ेगी तो आशीर्वाद आपको मिलेगा कि नहीं मिलेगा? सीधी सीधी बात है, सब आपके फायदे के लिए हो रहा है भई। आप मुझे बताईए आज रेलवे स्टेशन जो हैं बड़े बड़े, heart of the city हैं! दो दो चार किलोमीटर लंबे स्टेशन हैं। नीचे तो आपकी मालिकी मुझे मंज़ूर है लेकिन रेलवे में आसमान में कोई इमारत बना देता है और रेलवे के खजाने में हजार करोड़, दो हजार करोड़ आज जाते हैं तो रेलवे मजबूत बनेगी कि नहीं बनेगी? वो प्लेटफार्म के ऊपर, हवा में, आकाश में अपनी इमारत बनाता है, रेलवे के फायदे में जाएगी कि नहीं जाएगी? मालिकी रेलवे की रहेगी कि नहीं रहेगी? रेलवे के कर्मचारियों का भला होगा कि नहीं होगा? हम जो विकास की दिशा ले करके चल रहे हैं, ये चल रहे हैं, privatization की हमारी दिशा नहीं है। हमें दुनिया भर का धन लाना है, रेलवे में लगाना है। रेलवे को बढ़ाना है, रेलवे को आगे ले जाना है और रेल के माध्यम से देश को आगे ले जाना है। हमारे देश में रेलवे को केवल यातायात का साधन माना गया था, हम रेलवे को देश के आर्थिक विकास की रीढ़ की हड्डी के रूप में देखना चाहते हैं।

इसलिए मेरे भाईयों, बहनों मैं देश भर के रेल कर्मचारियों को आज आग्रह करता हूं- आइए! हिंदुस्तान में सबसे उत्तम सेवा कहां की तो रेलवे की ये सपने को हम साकार करें। इन दिनों जो स्वच्छता का अभियान हमने चलाया है, कभी-कभार ट्विटर पर खबरें सुनने को मिलती हैं कि साहब मै पहले भी रेलवे में जाता था अब भी जाता हूं लेकिन अब जरा डिब्बे साफ-सुथरे नजर आते हैं, सफाई दिखती है देखिए लोगों को कितना संतोष मिलता है, आशीर्वाद मिलता है और ये कोई उपकार नहीं है, हमारी जिम्मेवारी का हिस्सा है। It is a part of our duty. धीरे-धीरे उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। हमारा पूरा रेलवे व्यवस्था तंत्र साफ-सुथरा क्यों न हो उसका सबसे ज्यादा लाभ गरीब लोगों को कैसे मिले, मैं तो देख रहा हूं. रेलवे Infrastructure का उपयोग देश के विकास में इतना हो सकता है जिसकी किसे ने कल्पना नहीं की थी। हमारे देश में पोस्ट ऑफिस का नेटवर्क और रेलवे का नेटवर्क इन दोनों का अगर बुद्धिपूर्वक उपयोग किया जाए तो हमारे देश के ग्रामीण विकास की वह धरोहर बन सकते हैं।

मैं उदाहरण देता हूं- रेलवे के पास बिजली होती है, कहीं पर भी जाइए रेलवे के पास बिजली का कनेक्शन है। हिंदुस्तान की हर जगह पर। रेलवे के पास Infrastructure है। छोटे-छोटे गांव पर भी, छोटे-छोटे स्टेशन बने हुए हैं, भले ही वहां पर एक ट्रेन आती हो तो भी कोई न कोई वहां बैठा है, कोई न कोई व्यवस्था है। बाकी 24 घंटे वो खाली पड़ा रहता है उसी प्रकार से पोस्ट ऑफिस गांव-गांव तक उसका नेटवर्क है लेकिन वो पुराने जमाने की चल रही है उसमें बदलाव लाना है ये मैंने तय किया है और बदलाव लाने वाला हूं। अब मुझे बताइए गांव के अंदर जो रेलवे के स्टेशन हैं वहां पर दिन में मुश्किल से एक ट्रेन आती है मेरे हिसाब से हजारों की तादाद में ऐसी जगहें हैं, जहां बिजली हो, जहां Infrastructure हो वहीं पर अगर एक-दो कमरे और बना दिए जाएं और उन कमरों में Skill Development की Classes शुरू की जाएं क्योंकि Skill Development करना है तो Machine tools चाहिए और Machine tools के लिए बिजली चाहिए लेकिन बिजली गांव में नहीं है लेकिन रेलवे स्टेशन पर है, गांव के बच्चे Daily रेलवे स्टेशन पर आएंगे और रेलवे स्टेशन पर जो दो कमरें बने हुए होंगे उनमें जो Tools लगे हुए होंगे। Turner, Fitter के Course चलेंगे। एक साथ हिंदुस्तान में Extra पैसे खर्च किए बिना रेलवे की मदद से देश में हजारों की तादाद में Skill Development Centres खड़े हो सकते हैं कि नहीं।

मेरे भाईयों-बहनों थोड़ा दिमाग का उपयोग करने की जरुरत है, आप देखिए चीजें बदलने वाली हैं। मैं रेलवे के मित्रों से कहना चाहता हूं ऐसे स्टेशनों को Identify कीजिए जहां पर बिजली की सुविधा है वहां पर सरकार अपने खर्चे सेदो-तीन कमरे और बना दे और वहां पर उस इलाके के जो 500-1000 बच्चे हो उनके लिए Skill Development के Institutions चलें। ट्रेन ट्रेन का और Institutions, Institutions का काम करें रेलवे को Income हो जाए और गांव के बच्चों का Skill Development हो जाए। एक साथ हम अनेक व्यवस्थाएं विकसित कर सकते हैं और उस दिशा में हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

आज एक तो सोलर प्लांट भी इसके साथ जुड़ रहा है। आधुनिक Loco shed का Expansion हो रहा है, करीब 300 करोड़ रुपए जब पूरा होगा। 300 करोड़ रुपए की लागत से यहां Expansion होने के कारण इस क्षेत्र के अनेक नौजवानों को रोजगार की नई संभावनाएं बढ़ने वाली हैं।

मैं फिर एक बार रेल विभाग को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। श्रीमान सुरेश प्रभु जी के नेतृत्व में बहुत तेज गति से रेल का विकास होगा। आजादी के बाद जितना विकास हुआ है उससे ज्यादा विकास मुझे आने वाले दिनों में करना है। रेलवे के बैठे सभी मेरे साथियों आप सभी मेरे परिवारजन हैं और इसलिए मेरा आप पर हक बनता है, रेलवे वालों पर मेरा सबसे ज्यादा हक बनता है कि हम सब मिलकर के रेल को सेवा का एक बहुत बड़ा माध्यम बनाएं, सुविधा का माध्यम बनाएं और राष्ट्र की आर्थिक गति को तेज करने का एक माध्यम बना दें। उस विश्वास के साथ आगे बढ़ें, इसी एक अपेक्षा के साथ आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद.

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀଙ୍କ 'ମନ କି ବାତ' ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ବିଚାର ଏବଂ ଅନ୍ତର୍ଦୃଷ୍ଟି ପଠାନ୍ତୁ !
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September 18, 2021
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ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ୧୦୦% ପ୍ରଥମ ଡୋଜ୍ ପ୍ରଦାନ ପୂରଣ ଲାଗି ଗୋଆକୁ ପ୍ରଶଂସା କଲେ
ଏହି ଉପଲକ୍ଷେ ଶ୍ରୀ ମନୋହର ପାରିକରଙ୍କ ସେବାଗୁଡ଼ିକୁ ସ୍ମରଣ କଲେ
‘ସବକା ସାଥ, ସବକା ବିକାଶ, ସବକା ବିଶ୍ୱାସ ଓ ସବକା ପ୍ରୟାସ’ର ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଫଳାଫଳ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି ଗୋଆ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ମୁଁ ଅନେକ ଜନ୍ମଦିନ ଦେଖିସାରିଲିଣି ଏବଂ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ସର୍ବଦା ସାଧାରଣ ବିବେଚନା କରିଥାଏ କିନ୍ତୁ, ମୋର ସମସ୍ତ ବର୍ଷଗୁଡ଼ିକରେ, ଗତକାଲି ଏଭଳି ଏକ ଦିନ ଥିଲା ଯାହା ମୋତେ ଆବେଗିକ ଭାବେ ପ୍ରଭାବିତ କରିଥିଲା, କାରଣ ୨.୫ କୋଟି ଲୋକଙ୍କ ଟିକାକରଣ ହୋଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ ୧୫ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ପରିଚାଳନା କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ ୨୬ ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଏବଂ ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ୪୨୫ରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ଦିଆଯାଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି ଯାହା କି ‘ଏକ ଭାରତ- ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’କୁ ପ୍ରତିପାଦିତ କରୁଛି, ମୋ ମନରେ ଅନେକ ଆନନ୍ଦ ଭରିଦେଇଛି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆ କେବଳ ଦେଶର ଏକ ରାଜ୍ୟ ନୁହେଁ, ବରଂ ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ଏକ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଚିହ୍ନ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ଗୋଆର ଉର୍ଜାବାନ ତଥା ଲୋକପ୍ରିୟ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ମନ୍ତ୍ରିମଣ୍ଡଳରେ ମୋର ସାଥୀ, ଗୋଆର ସୁପୁତ୍ର ଶ୍ରୀପଦ ନାୟକ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାରଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀ ପରିଷଦରେ ମୋର ସହକର୍ମୀ ଡକ୍ଟର ଭାରତୀ ପାୱାର ମହାଶୟା, ଗୋଆର ସମସ୍ତ ମନ୍ତ୍ରୀଗଣ, ସାଂସଦ ଏବଂ ବିଧାୟକ, ଅନ୍ୟ ଜନ ପ୍ରତିନିଧି, ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ !

ଗୌୟଚ୍ୟା ମ୍ହଜା ମୋଗାଲ ଭାବା ବହିଣିନୋ, ତୁମଚେ ଅଭିନନ୍ଦନ।

ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଶ୍ରୀ ଗଣେଶ ପର୍ବର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାବନା । ଆସନ୍ତାକାଲି ଅନନ୍ତ ଚତର୍ଦ୍ଦଶୀର ପବିତ୍ର  ଅବସରରେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ବାପ୍ପାଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେବା, ଆମେ ମଧ୍ୟ ଆମ ହାତରେ ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ବାନ୍ଧିବା। ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ଅର୍ଥାତ ଜୀବନରେ ସୁଖ-ସମୃଦ୍ଧି, ଦୀର୍ଘ ଜୀବନର ଆଶୀର୍ବାଦ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ ଏହି ପବିତ୍ର ଦିନ ପୂର୍ବରୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ନିଜ ହାତରେ, ବାହୁରେ ଜୀବନ ରକ୍ଷା ସୂତ୍ର,  ଅର୍ଥାତ୍ ଟିକା ନେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଶେଷ କରିଛନ୍ତି । ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଗ୍ୟ ବ୍ୟକ୍ତି ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଟିକା ନେଇ ସାରିଛନ୍ତି । କରୋନା ବିରୋଧରେ ଲଢେଇରେ ଏହା ହେଉଛି ଏକ ବଡ କାର୍ଯ୍ୟ। ଏଥିପାଇଁ ଗୋଆର ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ଏପରି ଏକ ରାଜ୍ୟ, ଯେଉଁଠାରେ ଭାରତର ବିବିଧତାର ଶକ୍ତି ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ। ପୂର୍ବ ଏବଂ ପଶ୍ଚିମର ସଂସ୍କୃତି, ଚାଲିଚଳନୀ, ଖାଦ୍ୟପେୟ ଏଠାରେ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରେ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ । ଏଠାରେ ଗଣେଶୋତ୍ସବ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରାଯାଏ, ଦୀପାବଳୀ ମଧ୍ୟ ଧୂମଧାମରେ  ପାଳନ କରାଯାଏ ଏବଂ ଖ୍ରୀଷ୍ଟମାସ ସମୟରେ ଗୋଆର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଆହୁରି ବୃଦ୍ଧି ପାଇଥାଏ । ଏହାସବୁ କରିବା ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆ ନିଜର ପରମ୍ପରା ନିର୍ବାହ କରିଥାଏ। ଏକ ଭାରତ-ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତର ଭାବନାକୁ ନିରନ୍ତର ସୁଦୃଢ କରୁଥିବା ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି, କେବଳ ମୋତେ ନୁହେଁ, ବରଂ ସମଗ୍ର ଦେଶକୁ ଖୁସି ଦେଇଥାଏ ଏବଂ ଗର୍ବରେ ଭରି ଦେଇଥାଏ।

ଏହି ଗୁରୁତ୍ବପୂର୍ଣ୍ଣ ଅବସରରେ, ମୋର ବନ୍ଧୁ, ସଚ୍ଚୋଟ କର୍ମାଯାଗୀ, ସ୍ବର୍ଗତ ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ମନେ ପଡିବା ସ୍ୱାଭାବିକ କଥା । 100 ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ ସଙ୍କଟ ସହିତ ଗୋଆ ଯେଉଁଭଳି ଭାବରେ ମୁକାବିଲା କରିଛି, ପାରିକର ମହାଶୟ ଆଜି ଆମ ଗହଣରେ ଥାଆନ୍ତେ, ତେବେ ସେମ ମଧ୍ୟ ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ, ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ଉପଲବ୍ଧି ପାଇଁ ବହୁତ ଗର୍ବି କରିଥାନ୍ତେ।

ଗୋଆ ବିଶ୍ୱର ସର୍ବବୃହତ ଏବଂ ଦ୍ରୁତ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ- ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଟିକା, ମାଗଣା ଟିକାର ସଫଳତାରେ ପ୍ରମୁଖ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କରିଛି । ଗତ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆରେ ପ୍ରବଳ ବର୍ଷା, ଘୂର୍ଣ୍ଣିଝଡ, ବନ୍ୟା ପରି ପ୍ରାକୃତିକ ବିପର୍ଯ୍ୟୟ ସହିତ ଖୁବ ସାହସର ସହିତ ଲଢେଇ କରିଛି। ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ବଡ଼ ସାହସର ସହିତ ଲଢିଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ କରୋନା ଟିକାକରଣର ଗତି ବଜାୟ ରଖିଥିବାରୁ ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ, ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ଦଳ, ଗୋଆର ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି।

ଏଠାରେ ଅନେକ ସାଥୀ ଯେଉଁମାନେ ସେମାନଙ୍କର ଅନୁଭୂତି ସଂପର୍କରେ ଆମ ସହିତ ମତ ବିନିମୟ କରିଛନ୍ତି, ତାହା ସ୍ପଷ୍ଟ ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଏହି ଅଭିଯାନ କେତେ କଷ୍ଟକର ଥିଲା। ଭରା  ନଦୀ ପାର ହୋଇ, ଟିକାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖି ଦୂର ଦୂରାନ୍ତରେ ପହଞ୍ଚିବା କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଭାବନା ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ, ସମାଜ ପ୍ରତି ଭକ୍ତି ଦରକାର ଏବଂ ଅପ୍ରତିମ ସାହସର ଆବଶ୍ୟକ ପଡିଥାଏ। ଆପଣ ସମସ୍ତେ ଅଟକି ନ ଯାଇ, ଥକି ନ ପଡି ମାନବିକତାର ସେବା କରୁଛନ୍ତି। ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସେବା ସଦା- ସର୍ବଦା ସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ରହିବ।

ସାଥୀଗଣ,

ସାବକା ସାଥ, ସାବକା ବିକାଶ, ସାବକା ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ ସାବକା ପ୍ରୟାସ (ସମସ୍ତଙ୍କର ସହିତ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିକାଶ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ  ସମସ୍ତଙ୍କର ପ୍ରୟାସ)- ଏହି ସମସ୍ତ କଥା କିଭଳି ଚମତ୍କାର ଫଳାଫଳ ଆଣିଥାଏ, ଏହା ଗୋଆ, ଗୋଆର ସରକାର, ଗୋଆର ନାଗରିକ, ଗୋଆର କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଆଗଧାଡିର କର୍ମଚାରୀ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି । ସାମାଜିକ ଏବଂ ଭୌଗୋଳିକ ଆହ୍ବାନର ମୁକାବିଲା ପାଇଁ ଗୋଆ ଯେଉଁ ପ୍ରକାରର ସମନ୍ୱୟ ଦେଖାଇଛି, ତାହା ବାସ୍ତବରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ପ୍ରମୋଦ ମହାଶୟ ଆପଣଙ୍କୁ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ଟିମକୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା । ରାଜ୍ୟର ଦୂର- ଦୂରାନ୍ତରେ ବସବାସ କରୁଥିବା, କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ସମସ୍ତ ସବ୍-ଡିଭିଜନରେ ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟ ଭଳି ଦ୍ରୁତଗତିରେ ଟିକାକରଣ କରାଯିବା ହେଉଛି ଏହାର ଏକ ବଡ଼ ପ୍ରମାଣ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ, ଗୋଆ ଏହାର ଗତିକୁ ହ୍ରାସ କରିବାକୁ ଦେଇ ନାହିଁ । ଏହି ସମୟରେ ଏପରିକି ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଆଲୋଚନା କରୁଛୁ, ସେତେବେଳେ ରାଜ୍ୟରେ ଦ୍ୱିତୀୟ ଡୋଜ ପାଇଁ ଟିକା ଉତ୍ସବ ଚାଲିଛି। ଏହିଭଳି ଆନ୍ତରିକ, ଏକନିଷ୍ଠ ଉଦ୍ୟମ ସହିତ ଗୋଆ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟିକାକରଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଦେଶର ଏକ ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟ ହେବା ପାଇଁ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି। ଆଉ ଏହା ମଧ୍ୟ ଏକ ଉତ୍ତମ କଥା ଯେ ଗୋଆ ନା କେବଳ ଏହାର ଜନସଂଖ୍ୟା ନୁହେଁ ଏଠାକୁ ଆସୁଥିବା ପର୍ଯ୍ୟଟକ, ବାହାରୁ ଆସୁଥିବା ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଟିକାଦାନ କରୁଛି ।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜିର ଏହି ଅବସରରେ ମୁଁ ଦେଶର ସମସ୍ତ ଡାକ୍ତର, ସ୍ବାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀ, ପ୍ରଶାସନ ସହ ଜଡିତ ଲୋକଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ ଯୋଗୁଁ ଗତକାଲି ଭାରତ ଗୋଟିଏ ଦିନରେ ଅଢେଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦେବାର ରେକର୍ଡ କରିଛି। ବିଶ୍ବର ବଡ଼ ବଡ଼ ସମୃଦ୍ଧ ଏବଂ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଥିବା ଦେଶ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରି ନାହାଁନ୍ତି । ଗତକାଲି ଆମେ ଦେଖୁଥିଲୁ କିଭଳି ଦେଶ ଆଲାରାମ ଲଗାଇ କୋୱିନ ଡ୍ୟାସବୋର୍ଡକୁ ଦେଖୁଥିଲା। ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିବା ସଂଖ୍ୟାକୁ କେଇ ଉତ୍ସାହିତ ହୋଇ ପଡୁଥିଲେ।

ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ 15 ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ 26 ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଟୀକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ଚାରି ଶହ ପଚିଶରୁ ଅଧିକ ଲୋକ ଏହି ଟିକା ନେଇଥିଲେ। ଦେଶର ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରାଯାଇଥିବା ଏକ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କେନ୍ଦ୍ରରେ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆଯାଇଛି । ଭାରତର ନିଜସ୍ୱ ଟିକା, ଟିକାକରଣ ପାଇଁ ଏତେ ବଡ଼ ନେଟୱାର୍କ, କୁଶଳୀ ମାନବ ସମ୍ବଳ, ଏହା ଭାରତର ସାମର୍ଥ୍ୟକୁ ଦର୍ଶାଉଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଗତକାଲି ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଯେଉଁ ଉପଲବ୍ଧି ମିଳିଛି ନା, ତାହା କେବଳ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱରେ ଟୀକାକରଣର ପରିସଂଖ୍ୟାନ ଆଧାରରେ ନୁହେଁ, ଭାରତ ପାଖରେ କେତେ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଅଛି ତାହାର ପରିଚୟ ବିଶ୍ବକୁ ମିଳିବାକୁ ଯାଉଛି। ଆଉ ସେଥିପାଇଁ ଏହାର ଗୌରବଗାନ କରିବା ହେଉଛି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଏବଂ ଏହା ମଧ୍ୟ ସ୍ବଭାବ ହେବା ଉଚିତ୍।

ସାଥୀଗଣ,

ମୁଁ ଆଜି ମୋର ମନର କଥା ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ବହୁତ ଜନ୍ମଦିନ ତ ଆସିଛି ଆଉ ଯାଇଛି କିନ୍ତୁ ମୁଁ ମନର ସହିତ ସବୁବେଳେ ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ଅଲିପ୍ତ ହୋଇ ରହିଛି, ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ମୁଁ ଦୂରେଇ ରହିଛି । କିନ୍ତୁ ମୋର ଏତିକି ଆୟୂଷରେ କାଲିର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ମୋତେ ବହୁତ ଭାବୁକ କରିବା ଭଳି ଥିଲା। ଜନ୍ମଦିନ ପାଳନ କରିବାର ବହୁତ ଗୁଡ଼ିଏ ଉପାୟ ରହିଛି। ଲୋକମାନେ ଭିନ୍ନ- ଭିନ୍ନ ଉପାୟରେ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରିଥାଆନ୍ତି। ଆଉ ଯଦି ପାଳନ କରନ୍ତି ତେବେ କିଛି ଯେ ଭୁଲ କରନ୍ତି ଏଭଳି ଭାବୁଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ମୁଁ ନୁହେଁ। କିନ୍ତୁ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ କାରଣରୁ, କାଲିକାର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥିଲା।

ମେଡିକାଲ କ୍ଷେତ୍ରର ଲୋକମାନେ, ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ବିଗତ ଦେଢ଼- ଦୁଇ ବର୍ଷ ଧରି ଦିନ-ରାତି ଲାଗି ପଡ଼ିଛନ୍ତି, ନିଜ ଜୀବନର ଚିନ୍ତା ନ କରି କରୋନା ସହିତ ଲଢ଼ିବାରେ ଦେଶବାସୀମାନଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି, ସେମାନେ କାଲି ଟିକାକରଣର ଯେଉଁ ରେକର୍ଡ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି, ତାହା ହେଉଛି ବହୁତ ବଡ଼ କଥା। ସମସ୍ତେ ଏଥିରେ ବହୁତ ସହଯୋଗ କରିଛନ୍ତି। ଲୋକମାନେ ଏହାକୁ ସେବା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଲେ। ଏହା ହେଉଛି ତାଙ୍କର କରୁଣା ଭାବ, କର୍ତବ୍ୟ ଭାବ, ଯେଉଁଥିପାଇଁ ଅଢ଼େଇ କୋଟି ଟିକାର ଡୋଜ ଦିଆ ଯାଇ ପାରିଲା । ଆଉ ମୁଁ ମାନୁଛି ଯେ, ଟିକାର ପ୍ରତ୍ୟେକଟି ଡୋଜ, ଗୋଟିଏ ଜୀବନକୁ ବଂଚାଇବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିଥାଏ। ଅଢ଼େଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଏତେ କମ୍ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ, ଏତେ ବଡ଼ ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳିବା, ବହୁତ ସନ୍ତୋଷ ପ୍ରଦାନ କରିଥାଏ। ଜନ୍ମଦିନମାନ ଆସିବ, ଯିବ, କିନ୍ତୁ କାଲିର ଏହି ଦିନ ମୋ ମନକୁ ଛୁଇଁ ଯାଇଛି, ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ଯାଇଛି। ମୁଁ ଯେତିକି ଧନ୍ୟବାଦ ଦେବି ତାହା କମ୍ ହେବ। ମୁଁ ହୃଦୟର ସହିତ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରୁଛି, ସମସ୍ତଙ୍କୁ କୃତଜ୍ଞତା ଜ୍ଞାପନ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଭାରତର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ, କେବଳ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ହିଁ ନୁହେଁ, ବରଂ ଗୋଟିଏ ପ୍ରକାରରେ ଅଜୀବିକାରର ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ସୁରକ୍ଷା କବଚ। ଏବେ ଆମେ ଦେଖିବା ତ ହିମାଚଳ, ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ମାମଲାରେ 100ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଗୋଆ 100 ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ ଏବଂ ଲାକ୍ଷାଦ୍ୱୀପରେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଦିଆଯାଇ ସାରିଛି। ସିକ୍କିମ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଶୀଘ୍ର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି । ଆଣ୍ଡାମାନ ନିକୋବାର, କେରଳ, ଲଦ୍ଦାଖ, ଉତରାଖଣ୍ଡ, ଦାଦରା ଏବଂ ନଗର ହାବେଳୀ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଦୂରରେ ନାହିଁ।

ସାଥୀଗଣ,

ଏହା ବହୁତ ଚର୍ଚ୍ଚାକୁ ଆସିନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ଭାରତ ନିଜର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ର ସହିତ ଜଡ଼ିତ ରାଜ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ବହୁତ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଇଛି। ପ୍ରାରମ୍ଭରେ ଆମେ କହିଲୁ ନାହିଁ କାରଣ ଏହା ଉପରେ ମଧ୍ୟ ରାଜନୀତି ହେବାକୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ଯାଇଥାଏ। କିନ୍ତୁ ଏହା ବହୁତ ଜରୁରୀ ଥିଲା ଯେ ଆମର ପର୍ଯ୍ୟଟନସ୍ଥଳ ଶୀଘ୍ରରୁ ଅତି ଶୀଘ୍ର ଖୋଲୁ । ଏବେ ଉତରାଖଣ୍ଡରେ ମଧ୍ୟ ଚାର-ଧାମ ଯାତ୍ରା ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ। ଆଉ ଏହି ସବୁ ପ୍ରୟାସ ଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବା, ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥାଏ।

ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରର ପୁନଃରୁଦ୍ଧାର କରିବାରେ ଗାଁର ଭୂମିକା ହେଉଛି ବହୁତ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ । ଆପଣ ଚିନ୍ତା କରନ୍ତୁ, ହୋଟେଲ ଶିଳ୍ପର ଲୋକ ହୁଅନ୍ତୁ, ଟ୍ୟାକ୍ସି ଡ୍ରାଇଭର ହୁଅନ୍ତୁ, ଫେରିବାଲା ହୁଅନ୍ତୁ, ଦୋକାନୀ ହୁଅନ୍ତୁ, ଯେତେବେଳେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆ ଯାଇଥିବ ତେବେ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁରକ୍ଷାର ଏକ ଭାବନା ନେଇ ଏଠାକୁ ଆସିବେ। ଏବେ ଗୋଆ ଦୁନିଆର ସେହି ହାତଗଣତି ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସ୍ଥଳୀରେ ସାମିଲ ହୋଇ ଚାଲିଛି, ଯେଉଁଠାରେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଟିକାର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳି ସାରିଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଗାମୀ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ଋତୁରେ ଏଠାରେ ପୂର୍ବଭଳି ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କାର୍ଯ୍ୟକଳାପ ହେଉ, ଦେଶ –ବିଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଏଠାରେ ଆନନ୍ଦ ନେଇ ପାରିବେ, ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର କାମନା । ଏହା ସେତେବେଳେ ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ ଯେତେବେଳେ ଆମେ କରୋନା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସାବଧାନତା ଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ସେତିକି ଧ୍ୟାନ ଦେବା, ଯେତିକି ଟିକାକରଣ ଉପରେ ଦେଉଛେ । ସଂକ୍ରମଣ କମ୍ ହୋଇଛି କିନ୍ତୁ ଏବେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଭୂତାଣୁକୁ ଆମକୁ ହାଲୁକା ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିବା ନାହିଁ। ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ଉପରେ ଯେତିକି ଗୁରୁତ୍ୱ ରହିବ, ପର୍ଯ୍ୟଟକ ସେତେ ଅଧିକ ସଂଖ୍ୟାରେ ଏଠାକୁ ଆସିବେ।

ସାଥୀଗଣ,

କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ମଧ୍ୟ ଏବେ ନିକଟରେ ବିଦେଶୀ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରିବା ପାଇଁ ଅନେକ ପଦକ୍ଷେପ ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି। ଭାରତ ଆସିବାକୁ 5 ଲକ୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟଟକଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ଭିସା ପ୍ରଦାନ କରିବାକୁ ନିଷ୍ପତି ନିଆଯାଇଛି। ଯାତ୍ରାଏବଂ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ହିତଧାରକ ମାନଙ୍କୁ 10 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ଶତ- ପ୍ରତିଶତ ସରକାରୀ ଗ୍ୟାରେଂଟି ସହିତ ଦିଆ ଯାଉଛି। ପଞ୍ଜୀକୃତ ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଗାଇଡ଼୍ ମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ 1 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଯାଇଛି। କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଆଗକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସେହି ପଦକ୍ଷେପ ଉଠାଇବା ପାଇଁ ପ୍ରତିବଦ୍ଧ, ଯାହା ଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇବାରେ ସହାୟକ ହେବ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଆକର୍ଷକ କରିବା ପାଇଁ, ସେଠାକାର କୃଷକ, ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଲୋକମାନଙ୍କର ସୁବିଧା ପାଇଁ, ଭିତିଭୂମିକୁ ଡବଲ ଇଂଜିନ ସରକାରଙ୍କର ଦୁଇଗୁଣ ଶକ୍ତି ମିଳୁଛି। ବିଶେଷ କରି ଯୋଗାଯୋଗ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଭିତିଭୂମି ଉପରେ ଗୋଆରେ ଅଦ୍ଭୂତପୂର୍ବ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ‘ମୋପା’ରେ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଥିବା ଗ୍ରୀନଫିଲ୍ଡ ଏୟାରପୋର୍ଟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ନିର୍ମାଣ ହୋଇ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଏହି ବିମାନବନ୍ଦରକୁ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ସହ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ପ୍ରାୟ 12 ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କା ବ୍ୟୟରେ 6 ଲେନର ଆଧୁନିକ ସଂଯୋଗକାରୀ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି। କେବଳ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣରେ ହିଁ ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ହଜାର ହଜାର କୋଟି କୋଟି ଟଙ୍କାର ନିବେଶ ମଧ୍ୟ ଗାଁ ମାନଙ୍କରେ ହୋଇଛି।

ଏହା ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ବହୁତ ଖୁସିର କଥା ଯେ ଉତରର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକୁ ଦକ୍ଷିଣର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକ ସହିତ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ‘ଝୁରୀ ବ୍ରିଜ’ର ଲୋକାର୍ପଣ ମଧ୍ୟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଯେମିତିକି ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି, ଏହି ବ୍ରିଜ ପଣଜୀକୁ ‘ମାର୍ଗୋ’ ସହିତ ଯୋଡ଼ୁଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଗୋଆ ମୁକ୍ତି ସଂଗ୍ରାମର ଅନନ୍ୟ ସଂଗ୍ରାମର ସାକ୍ଷୀ ‘ଅଗୌଡ଼ା’ ଦୁର୍ଗ ମଧ୍ୟ ଖୁବ ଶୀଘ୍ର ଲୋକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଖୋଲି ଦିଆଯିବ।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆର ବିକାଶର ଯେଉଁ ପରମ୍ପରା ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ଛାଡ଼ିଥିଲେ, ତାହାକୁ ମୋର ମିତ୍ର ଡ. ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ଟିମ୍ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମନୋନିବେଶର ସହିତ ଆଗକୁ ବଢାଉଛନ୍ତି। ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତକାଳରେ ଯେତେବେଳେ ଦେଶ ଆତ୍ମନିର୍ଭରତାର ନୂତନ ସଂକଳ୍ପ ସହିତ ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଛି ତେବେ ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ସଂକଳ୍ପ ନେଇଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଆତ୍ମନିର୍ଭର ଭାରତ, ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ଏହି ସଂକଳ୍ପ ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆରେ 50 ରୁ ଅଧିକ ଏହିଭଳି ଉପାଦାନ ନିର୍ମାଣ ଉପରେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ସାରିଛି। ଏହା ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଗୋଆ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଲକ୍ଷ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ, ଯୁବକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ରୋଜଗାରର ନୂତନ ଅବସର ସୃଷ୍ଟି କରିବା ପାଇଁ କେତେ ଗମ୍ଭୀରତାର ସହିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଗୋଆ କେବଳ କୋଭିଡ଼ ଟିକାକରଣରେ ଅଗ୍ରଣୀ ନୁହେଁ, ବରଂ ବିକାଶର ଅନେକ ସ୍ତରରେ ଦେଶର ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ହେଉଛି ଗୋଟିଏ। ଗୋଆର ଯେଉଁ ଗ୍ରାମୀଣ ଏବଂ ସହରୀ କ୍ଷେତ୍ର ରହିଛି, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଖୋଲା ମଳମୁକ୍ତ ହେବାରେ ଲାଗିଛି। ବିଜୁଳି ଏବଂ ପାଣି ଭଳି ମୌଳିକ ସୁବିଧାଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଗୋଆରେ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ଗୋଆ ହେଉଛି ଦେଶର ଏଭଳି ରାଜ୍ୟ ଯେଉଁଠାରେ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ବିଜୁଳିକରଣ ହୋଇ ସାରିଛି। ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ମାମଲାରେ ତ ଗୋଆ ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଛି। ଗୋଆର ଗ୍ରାମୀଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ପହଂଚାଇବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉଛି ପ୍ରଶଂସନୀୟ। ଜଳ ଜୀବନ ମିଶନ ମାଧ୍ୟମରେ ବିଗତ 2 ବର୍ଷରେ ଦେଶରେ ଏ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରାୟ 5 କୋଟି ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ସୁବିଧା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଛନ୍ତି। ଯେଉଁଭଳି ଭାବେ ଗୋଆ ଏହି ଅଭିଯାନକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇଛି ତାହା ‘ଗୁଡ଼୍ ଗଭର୍ଣ୍ଣାନ୍ସ’(ସୁ-ଶାସନ) ଏବଂ ‘ଇଜ୍ ଅଫ୍ ଲିଭିଂ’କୁ ନେଇ ଗୋଆ ସରକାରଙ୍କର ପ୍ରାଥମିକତାକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ସୁଶାସନକୁ ନେଇ ଏହି ପ୍ରତିବଦ୍ଧତା କରୋନା କାଳରେ ଗୋଆ ସରକାର ଦେଖାଇଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ପ୍ରକାରର ଆହ୍ୱାନ ଗୁଡ଼ିକ ସତ୍ୱେ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଯେଉଁ ସାହାଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଗୋଆ ପାଇଁ ପଠାଇଲେ, ତାହାକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ, ବିନା କୌଣସି ଭେଦଭାବରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ପାଖରେ ପହଂଚାଇବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଗୋଆର ଟିମ୍ କରିଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗରିବ, ପ୍ରତ୍ୟେକ କୃଷକ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ସାଥୀଙ୍କ ପାଖରେ ସାହାଯ୍ୟ ପହଂଚାଇବାରେ କୌଣସି ଅଭାବ ରଖା ଯାଇ ନାହିଁ । ମାସ- ମାସ ଧରି ଗୋଆର ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ରାସନ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଚ୍ଚୋଟତାର ସହିତ ପହଂଚାଯାଉଛି। ମାଗଣ ଗ୍ୟାସ ସିଲିଣ୍ଡର ମିଳିବା ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଅନେକ ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ଅସୁବିଧା ସମୟରେ ସାହାରା ମିଳିଛି।

ଗୋଆର କୃଷକ ପରିବାରକୁ ପିଏମ କିଷାନ ସମ୍ମାନ ନିଧି ଦ୍ୱାରା କୋଟି- କୋଟି ଟଙ୍କା ସିଧାସଳଖ ସେମାନଙ୍କର ବ୍ୟାଙ୍କ ଖାତାରେ ମିଳିଛି। କରୋନା କାଳରେ ହିଁ ଏଠାକାର ଛୋଟ- ଛୋଟ କୃଷକମାନଙ୍କୁ ମିଶନ ମୋଡରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡ ମିଳିଛି। କେବଳ ଏତିକି ନୁହେଁ, ଗୋଆର ପଶୁପାଳକଙ୍କୁ ଏବଂ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଥର ବଡ଼ ସଂଖ୍ୟାରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡର ସୁବିଧା ମିଳିଛି । ପିଏମ ସ୍ୱନିଧି ଯୋଜନା ମାଧ୍ୟମରେ ମଧ୍ୟ ଗାଁରେ ବୁଲାବିକାଳୀ ଏବଂ ଠେଲାଗାଡ଼ି ମାଧ୍ୟମରେ ବ୍ୟବସାୟ କରୁଥିବା ସାଥୀଙ୍କୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଋଣ ଦେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଚାଲୁ ରହିଛି। ଏହି ସମସ୍ତ ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକ ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଲୋକମାନଙ୍କୁ, ବନ୍ୟା ସମୟରେ ମଧ୍ୟ ବହୁତ କିଛି ସାହାଯ୍ୟ ମିଳିପାରିଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆ ହେଉଛି ଅସୀମ ସମ୍ଭାବନାଗୁଡ଼ିକର ପ୍ରଦେଶ। ଗୋଆ ଦେଶର କେବଳ ମାତ୍ର ଗୋଟିଏ ଦେଶ ନୁହେଁ, ବରଂ ହେଉଛି ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ମଧ୍ୟ ଏକ ସଶକ୍ତ ପରିଚୟ। ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର ଦାୟିତ୍ୱ ଯେ ଗୋଆର ଏହି ଭୂମିକାକୁ ଆମେ ସଂପ୍ରସାରଣ କରିବା। ଗୋଆରେ ଆଜି ଯେଉଁ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟମାନ ହେଉଛି, ସେଥିରେ ନିରନ୍ତରତା ହେଉଛି ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ। ଦୀର୍ଘ ସମୟ ପରେ ଗୋଆକୁ ରାଜନୈତିକ ସ୍ଥିରତାର, ସୁଶାସନର ଲାଭ ମିଳୁଛି।

ଏହି ନିରନ୍ତରତାକୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ଏହିଭଳି ଭାବେ ବଜାୟ ରଖିବେ, ଏହି କାମନାର ସହିତ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପୁଣିଥରେ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା। ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ସମଗ୍ର ଟିମକୁ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ସଗଲ୍ୟାଙ୍କ ଦେୱ ବରେଁ କରୁଁ

ଧନ୍ୟବାଦ!