Text of PM's remarks on National Panchayati Raj Day

Published By : Admin | April 24, 2015 | 13:46 IST

मंत्रिपरिषद के मेरे साथी, देश के अलग-अलग भागों से आए हुए पंचायत राज व्‍यवस्‍था के सभी प्रेरक महानुभाव,

जिन राज्‍यों को आज मुझे सम्‍मानित करने का सौभाग्‍य मिला है उन सभी राज्‍यों को मैं हृदय से बधाई देता हूं। आज जिला परिषदों को भी और ग्राम पंचायतों का भी सम्‍मान होने वाला है। उन सबको भी मैं हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। पंचायत राज दिवस पर मैं देशभर में पंचायत राज व्‍यवस्‍था से जुड़े हुए सक्रिय सभी महानुभावों को आज शुभकामनाएं देता हूं।

महात्‍मा गांधी हमेशा कहते थे कि भारत गांवों में बसता है। उन गांवों के विकास की तरफ हम कैसे आगे बढ़े दूर-सुदूर छोटे-छोटे गांवों के भी अब सपने बहुत बड़े हैं। और मुझे विश्‍वास है कि आप सब के नेतृत्‍व में गांव की चहुं दिशा में प्रगति होगी। मैं नहीं मानता हूं कि अब.. जैसे अभी हमारे चौधरी साहब बता रहे थे कि पहले से तीन गुना बजट होने वाला है आपका और तुरंत तालियां बज गई। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जो पंचायत में चुन करके आए हैं, कभी सोचा है कि हम 5 साल के कार्यकाल में हम हमारे गांव को क्‍या दें करके जाना चाहते है? कभी ये सोचा है कि हमारे 5 साल के बाद हमारा गांव हमें कैसे याद करेगा? जब तक हमारे मन में गांव के लिए कुछ कर गुजरना है - ये spirit पैदा नहीं होता है तो सिर्फ बजट के कारण स्थितियां बदलती नहीं हैं।

पिछले 60 साल में जितने रुपए आए होगे उसका सारा total लगा दिया जाए, और फिर देखा जाए कि भई गांव में क्‍या हुआ तो लगेगा कि इतने सारे रुपए गए तो परिणाम क्‍यों नहीं आया? और इसलिए कभी न कभी पंचायत level पर सोचना चाहिए। कुछ राज्‍य ऐसे हैं हमारे देश में जहां पर पंचायतें अपना five year plan बनाती हैं, पंचवर्षीय योजना बनाती हैं। 5 साल में इतने काम हम करेंगे और वो गांव के पंचायत के उसमें वो board पर लिख करके रखते हैं और उसके कारण एक निश्चित दिशा में काम होता है और गांव कुछ समस्‍याओं से बाहर आ जाता है। हम भी आदत डालें कि भई हम 5 साल में हमारे गांव में ये करके जाएंगे। अगर ये हम करते है तो आप देखिए कि बदलाव आना शुरू होगा।

बजट और leadership दोनों का combination कैसे परिणाम लाता है? हम जानते है कि गांव में CC road बनाना ये जैसे एक बहुत बड़ा काम है और बहुत महत्‍वपूर्ण काम है इस प्रकार की मानसिकता बनी हुई है। इसके पीछे कारण क्‍या है वो आप भी जानते है, मैं भी जानता हूं। लेकिन कुछ सरपंच ऐसे होते हैं जो CC road तो बना देते है, CC road तो बना देते है, लेकिन पहले से प्‍लान करके दोनों किनारों पर बढि़यां पेड़ लगा देते है। वृक्षारोपण करते है और जैसे ही गांव में entry करता तो ऐसा हरा-भरा गांव लगता है। तो बजट से तो CC road बनता है लेकिन उनकी leadership quality है कि गांव को जोड़ करके रोड़ बनते ही पौधे लगा देते हैं और वो वृक्ष बन जाते हैं और एकदम से गांव में कोई आता है तो बिल्‍कुल नजरिया ही बदल जाता है। कुछ दूसरे प्रकार के होते हैं सरपंच जो क्‍या करते हैं और गांव में से कोई धनी व्‍यक्ति कहीं कमाने गया तो उसको कहते है कि ऐसा करो भाई तुम गांव को gate लगा दो। तो बड़ा पत्‍थर का 2, 5, 10 लाख का gate लगवा देते हैं। उसको लगता है कि मैंने gate बनवा दिया तो बस गांव का काम हो गया। लेकिन दूसरे को लगता है कि मैं पेड़ लगाऊंगा। आप भी सोचिएं बैठे-बैठे कि सचमुच में जन-भागीदारी से जिसने पेड़ लगाएं हैं, CC road, enter होते ही आधे कि.मी., एक कि.मी. हरे-भरे वृक्षों की घटा के बीच से गांव जाता है तो वो दृश्‍य कैसा होता होगा? ये है leadership की quality कि हम किन चीजों को प्रधानता देते है। इस पर इस काम का प्रभाव होता है.. जिसमें आपको बजट का खर्च नहीं करना है, आपको बजट की चिंता नहीं करनी है। जो मिलने वाला है.. जैसे बताया गया कम से कम 15 लाख और ज्‍यादा से ज्‍यादा 1 करोड़ से भी ज्‍यादा।

लेकिन इसके अतिरिक्‍त बहुत पैसा गांव में आता है। आंगनवाड़ी चलती है, प्राथमिक स्‍कूल चलता है, PHC centre चलता है, बहुत सी चीजें चलती है, जिसका खर्चा तो सरकारी राह से अपनी व्‍यवस्‍था से आता है। इसमें आपको कोई लेना-देना नहीं होता है। क्‍या कभी एक सरपंच के नाते, गांव की पंचायत के नाते हमने इन चीजों पर ध्‍यान केन्द्रित किया है क्‍या? कि भई, मेरे गांव में एक भी बच्‍चा ऐसा नहीं होगा कि जो टीकाकरण में वंचित रह जाए। हम पंचायत के लोग जी-जान से जुटेंगे, गांव को जगाएंगे कि भई टीकाकरण है, सभी बच्‍चों का हुआ है कि नहीं हुआ, चलो देखो! अब इसमें कोई पैसे लगते है है क्‍या? बजट नहीं लगता है, leadership लगती है। एक समाज के प्रति कुछ कार्य करने के दायित्व का भाव लगता है।

हमारे गांव में स्‍कूल तो है, teacher है, सरकार बजट खर्च कर रही है, हमने कभी देखा क्‍या - कि भई हमारे teacher आते है कि नहीं? बच्‍चे स्‍कूल जाते है कि नहीं? समय पर स्‍कूल चलता है कि नहीं चलता? बच्‍चे खेलकूद में हिस्‍सा लेते है कि नहीं लेते? बच्‍चे library का उपयोग करते है कि नहीं करते? Computer दिया है तो चलता है कि नहीं चलता? ये हम एक पंचायत के नाते.. हमारे गांव के बच्‍चे पढ़-लिख करके आगे बढ़ें, आपको बजट खर्च नहीं करना है, न ही बजट की चिंता करनी है सिर्फ आपको गांव की चिंता करनी है, आने वाली पीढ़ी की चिंता करनी है।

हमारे यहां आशा worker हैं, आशा worker को कभी पूछा है कि आपका काम कैसा चल रहा है, कोई कठिनाई है क्या? हर गांव में भी सरकार है लेकिन वो बिखरा पड़ा हुआ है। क्‍या हम एक प्रयास कर सकते है क्‍या कि सप्‍ताह में एक दिन, एक घंटे के लिए, जितने भी सरकारी व्‍यक्ति हैं गांव में, उनको बिठाएंगे एक साथ और बैठ करके अपना गांव, अपना विकास.. उसके लिए क्‍या कर सकते हैं। बैठ करके चर्चा करेंगे तो शिक्षक कहेंगा कि मुझे ये करना है लेकिन हो नहीं रहा है, तो आंगनवाड़ी worker कहेगी कि हां-हां चलो मैं मदद कर देती हूं, आशा worker कहेंगी कि अच्‍छा कोई बात नहीं, मैं कल आपके लिए 2 घंटे लगा दूंगी.. अगर गांव में हम leadership ले करके team बना लें, सरकार के इतने लोग हमारे यहां होते है लेकिन हमें भी पता नहीं होता। सरकार के इतने लोग हमारे यहां रहते हैं लेकिन हमें भी पता नहीं होता है। Even बस का driver, conductor भी रहता होगा और बस चलाता होगा, वो भी तो एक सरकार का मुलाजिम है। Constable होता होगा, वो भी एक मुलाजिम है। पटवारी है, वो भी एक मुलाजिम है।

क्या कभी हमने ये सोचा है, सप्ताह में एक घंटा कम से कम हम सरकार के रूप में एक साथ बैठेंगे? सामूहिक रूप से अपने पंचायत के विकास की चर्चा करेंगे। आप देखिए, देखते ही देखते बदलाव शुरू हो जाएगा, Team बनना शुरू हो जाएगा। और मैं वो बातें नहीं बता रहूं जिसमें बजट एक समस्या है। लेकिन वरना हमारे देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि क्यों नहीं होता है, बजट नहीं है.. हकीकत वो नहीं है। बजट है लेकिन जो काम परिणाम नहीं देते हैं उसकी चिंता हमें ज्यादा करने की आवश्यकता है। हमारे गांव में कोई drop out होता है बच्चा, क्या हमें पीड़ा होती है क्या, हमारा खुद का बच्चा अगर स्कूल छोड़ दे तो हमें दुख होता है। अगर हम पंचायत के प्रधान हैं तो गांव का भी कोई बच्चा स्कूल छोड़ दे, हमें उतनी ही पीड़ा होनी चाहिए, पूरी पंचायत को दर्द होना चाहिए। अगर ये हम करते हैं, अगर ये हम करते हैं, मैं नहीं मानता हूं कि हमारे गांव में कोई अशिक्षित रहेगा। और कोई सरंपच ये तय करके कि मेरे कार्यकाल में पांच साल में एक भी बच्चा drop out नहीं होगा। अगर इतना भी कर ले तो मैं कहता हूं, उस सरपंच ने एक पीढ़ी की सेवा कर-करके जा रहा है। ऐसा मैं मानता हूं।

नरेगा का काम हर गांव में चलता है। क्या हम उसमें पानी के लिए प्राथमिकता दें? जितनी ताकत लगानी है, लगाएं लेकिन पानी का प्रबंधन करने के लिए ही नरेगा का उपयोग करें, तो क्या कभी पानी का संकट आएगा क्या? हम व्यवस्थाओं को विकसित कर सकते हैं। आवश्यकता ये है कि मिलकर के नेतृत्व दें। हमारे गांव में कुछ लोग तो होंगे जो सरकार में कभी न कभी मुलाजिम रहे हों। Teacher रहे हों, पटवारी रहे हों और retired हो गए हों। यानी सरकार का पेंशन लेते हों। सरकारी मुलाजिम होने के नाते, निवृत्त होने के बाद पेंशन लेते हों। किसी गांव में तीन होंगे, पांच होंगे, दस होंगे, पंद्रह होंगे। क्या महीने में एक बार इन retired लोगों की मिटिंग कर सकते हैं? उनका अनुभव क्योंकि वो खाली हैं, समय हैं उनके पास, अगर मान लीजिए गांव में 5 retired teacher हैं। उनको कहें कि देखिए भई अपने गांव में चार बच्चे ऐसे हैं, बहुत बेचारे पीछे रह गए, थोड़ा सा समय दीजिए, थोड़ा सा इन बेचारों को पढाइए ना। अगर वो retired हुआ होगा न तो भी उसके DNA में teaching पड़ा हुआ होगा। उसको कहोगे हां-हां चलिए मैं समझ लेता हूं। इन चार गरीब बच्चों को मैं पढ़ा दूंगा, मैं उनकी चिंता करूंगा। हम थोड़ा motivate करें लोगों को, हम नेतृत्व करें आप देखिए गांव हमारा ऐसा नहीं हो सकता क्‍या? अपना गांव.. और मैंने देखा जी, देश में मैंने कई गांव ऐसे देखे हैं कि जहां उस सरपंच की सक्रियता के कारण गांव में परिवर्तन आया है।

मैं जब मुख्यमंत्री था, एक घटना ने मुझे बहुत.. यानी मेरे मन को बहुत आंदोलित किया था। खेड़ा district में, जहां सरदार पटेल साहब का जन्म हुआ था। एक गांव के अंदर पंचायत प्रधान के नीचे women reservation था। Women reservation था तो गांव वालों ने तय किया कि प्रधान अगर women है तो सभी member women क्यों न बनाई जाए? और गांव ने तय किया कि कोई पुरुष चुनाव नहीं लड़ेगा। सब के सब पंचायत के member भी महिलाएं बनेंगी। Reservation तो one-third था लेकिन सबने तय किया गांव वालों ने। एक दिन उन्होंने मेरे से समय मांगा पंचायत की सभी महिला सदस्यों ने और पंचायत के प्रधान ने। मेरे लिए बड़ा surprise था कि ये गांव बड़ा कमाल है भाई, सारे पुरुषों ने अपने आप withdraw को कर लिया और महिलाओं के हाथ में कारोबार दे दिया। तो मेरा भी मन कर लिया कि चलो मिलूं तो वो सब मुझे कोई 17 member का वो पंचायत थी। तो वो मिलने आईं। और ये बात कोई 2005 या 2006 की है। तो उसमें सबसे ज्यादा जो पढ़ी-लिखी महिला थी प्रधान थी, वो पांचवी कक्षा तक पढ़ी हुई थी। यानी इतना पिछड़ा हुआ गांव था कोई ज्यादा पढ़े-लिखे हुए लोग नहीं थे। तो ऐसे ही मेरा मन कर गया, मैंने पूछा उनको, मैंने कहा अब पंचायत सभी महिलाओं के हाथ में है, आपको गांव का कारोबार चलाना है तो क्या करना है, आपकी योजना क्या है करनी की? उन्होंने जो जवाब दिया, मैं नहीं मानता हूं हिंदुस्तान की सरकार में कभी इस रूप में सोचा गया होगा। कम से कम मैं मुख्यमंत्री था, मैंने इस रूप में नहीं सोचा था। उस जवाब ने मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। ठेठ गांव की सामान्य महिलाएं थी।

मैंने उनसे पूछा कि अब पांच साल आपको कारोबार चलाना है तो क्या आपके मन में है? उस प्रधान ने जो कि पढ़ी-लिखी नहीं थी, उसने मुझे जवाब दिया। उसने मुझे कहा, “हम चाहते हैं कि हमारे गांव में कोई गरीब न रहे।“ अब देखिए क्या कल्पना है ये, क्या कभी हमारे देश में पंचायत ने, नगरपालिका ने, महानगरपालिका ने, मिल-बैठकर के तय किया कि हम हमारे गांव में उस प्रकार की योजनाएं चलाएंगे कि गरीब गांव में कोई न रहे। एक बार इतने बड़े level पर काम शुरू हो जाए, कितना बड़ा फर्क पड़ता है! क्या हम कभी पंचायत के प्रधान के नाते विचार कर सकते हैं कि भई कम से कम 5 परिवार, ज्यादा मैं नहीं कह रहा हूं, 5 परिवार पंचायत की रचना में कुछ काम ऐसा निकालेंगे, उनको फलों का पेड़ बोने के लिए दे देंगे, कुछ करेंगे लेकिन 5 को तो गरीबी से बाहर लाएंगे।

अगर हिंदुस्तान में एक गांव साल में 5 लोगों को गरीबी से बाहर लाता है, पूरे हिंदुस्तान में कितना बड़ा फर्क पड़ता है जी? क्या कुछ नहीं कर सकते, आप कभी अंदाज लगाइए। और ये सारी बातें मैं बताता हूं कि बजट के constraint वाले काम नहीं हैं - हमारी संकल्प शक्ति, हमारी कल्पकता, इसके ऊपर जुड़े हुए हैं। अगर इस पर हम बल दें तो हम सच्‍चे अर्थ में इस व्यवस्था को अपने गांव के विकास के लिए परिवर्तित कर सकते हैं।

हम तब तक गांव का विकास नहीं कर पाएंगे जब तक हम गांव के प्रति गौरव और सम्मान का भाव पैदा नहीं करते हैं। उस गांव में पैदा हुए, मतलब सम्मान होना चाहिए। आप देखिए जिस गांव में महात्मा गांधी का जन्म हुआ होगा, उस गांव का व्यक्ति कभी कहीं मिलेगा तो कहेगा, मैं उस गांव से हूं जहां महात्मा गांधी पैदा हुए थे। कहेगा कि नहीं कहेगा? हर किसी को रहता है, कि कोई ऐसी बात होती है, गांव का गर्व होता है उसको। क्या हमने कभी हमारे गांव में,के प्रति एक लगाव पैदा हो, गांव के प्रति गर्व पैदा हो, ऐसी कोई चीज करते हैं क्या? नहीं करते हैं। क्या गांव का जन्मदिन मनाया जा सकता है क्या? हो सकता है कि record पर नहीं होगा तो गांव तय करे कि किस दिन को जन्मदिन मनाया जाएगा। उस दिन गांव इकट्ठा हो और गांव के बाहर जो लोग रहने गए हो, शहरों में रोजी-रोटी कमाने के लिए, किसी ने बड़ी प्रगति की हो, कोई पढ़-लिख करके डॉक्टर बना हो, उस दिन सबको बुलाया जाए। एक दिन सब लोग, नए-पुराने सब साथ रहें। कुछ बालकों के कार्यक्रम हो जाएं, कुछ बड़ों के कार्यक्रम हो जाएं, senior citizen के कुछ कार्यक्रम हो जाएं, गांव में सबसे बड़ी उम्र वाले व्यक्ति का सम्मान हो जाए। और एक अपनेपन का भाव! जो गांव से बाहर गए होंगे, उनको भी लगेगा उस दिन कि चलो भई अब तो हम रोजी-रोटी कमा रहे हैं, बड़े शहर में रहे रहे हैं चलिए अगले साल इतना हमारी तरफ से गांव के लिए दान दे देंगे, हमारे गांव में ये विकास कर दो। आप देखिए जन-भागीदारी का ऐसा माहौल बनेगा, गांव का रूप-रंग बदल जाएगा।

कभी आपने सोचा है, हमारी आने वाली पीढ़ी को तैयार करना है तो.. मैं कई बार गांव को पूछता हूं, भई आपके गांव में सबसे वृद्ध-oldest, oldest tree कौन सा है, कौन सा वृक्ष है जो सबसे बूढ़ा होगा? गांव को पता नहीं है, क्यों? ध्यान ही नहीं है! क्या हम पंचायत के लोग तय कर सकते हैं कि चलो भई ये सबसे बड़ी आयु का वृक्ष कौन सा दिखता है, ये सबसे बड़ा है, स्कूल के बच्चों को ले जाइए कि देखो भई अपने गांव की सबसे बड़ी आयु का वृक्ष ये है, ये है सबसे बड़ा वो, 200 साल उम्र होगी उसकी, 100 साल होगी उसकी, 80 साल होगी उसकी, जो भी होगा। चलो भई उसका भी सम्मान करे, उसका भी गौरव करें। यही तो है जो गांव के विकास का सबसे बड़ा साक्ष्य है। He is a witness! हम किस प्रकार से अपने गांव के गौरव को जोड़ें, गांव के साथ अपने आप कैसे लगाव लोगों का पैदा करें? आप देखिए अपने आप बदलाव आना शुरू हो जाएगा। और इसलिए मैं आग्रह करता हूं कि आप नेतृत्व दीजिए, अनेक नई कल्पकताओं के साथ नेतृत्व दीजिए।

हमारे देश ने बहुत बड़ा निर्णय किया है। कभी-कभी पश्चिम के देशों से बातें होती हैं और जब कहते हैं कि भारत में महिलाओं के लिए पंचायती व्यवस्था में reservation है तो कईयों आश्चर्य होता है। हिंदुस्तान में political process में decision making process में महिलाओं को इतना बड़ा अधिकार दिया गया है कि विश्व के बहुत बड़े-बड़े देशों के लिए surprise होता है। लेकिन कभी-कभी हमारे यहां क्या होता है।.. एक पहले तो मैं सरकार से जुड़ा हुआ नहीं था, संगठन के काम में लगा रहता था तो देशभर में मेरा भ्रमण होता था। तो लोगों से मिलता था। मिलता था तो थोड़ा परिचय भी करता था, एक बार परिचय देकर मैंने कहा, आप कौन हैं? तो उसने कहा मैं so and so SP हूं। तो मैंने कहा SP हैं! और political meeting में कैसे आ गए? क्योंकि मैं... SP यानी Superintendent of Police.. ये ही मेरे दिमाग में था। क्योंकि SP यानी पुलिस – पुलिसवाला हो के ये meeting में कैसे आ गए? तो मैंने कहा SP... तो बोले नहीं-नहीं मैं सरकारी नहीं हूं तो मैंने बोला क्या हैं? तो बोले “मैं सरपंच पति हूं।“

अब कानून ने तो empower कर दिया लेकिन जो SP कारोबार चला रहे हैं भई... है ना? हकीकत है ना? अब कानून ने महिलाओं को अधिकार दिया है तो उनको मौका भी देना चाहिए। और मैं कहता हूं जी, वो बहुत अच्‍छा काम करेंगी आप विश्‍वास कीजिए, बहुत अच्‍छा काम करेंगी। सच्‍चे अर्थों में गांव में परिवर्तन होंगे। अभी आपने छत्‍तीसगढ़ का भाषण सुना। बिना हाथ में कागज़ लिए गांव में क्या काम किया है, उन्‍होंने बताया कि नहीं बताया? और पता है उनको कि सरपंच के नाते अपने गांव में कितने काम हैं, किन-किन कामों पर ध्‍यान देना चाहिए, सब चीज का पता है। ये सामर्थ्‍य है हमारी माताओं-बहनों में। इसलिए ये SP वाला जो culture है वो बंद होना चाहिए। उनको अवसर देना चाहिए, उनको काम करने के लिए प्रोत्‍साहित करना चाहिए। और हम अवसर देंगे तो वे परिणाम भी दिखाएंगे।

तो मैं आज पंचायती राज दिवस पर आप सबको हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। जो award winner हैं, उनसे आप बात करेंगे तो पता चलेगा कि उन्‍होंने अपने-अपने यहां बहुत नए-नए प्रयोग किए होंगे, जो आपको भी काम आ सकते हैं। लेकिन अगर गांव तय करे तो दुनिया देखने के लिए आए, ऐसा गांव बन सकता है जी। ये ताकत होती है गांव की, एक परिवार होता है, अपनापन होता है, सुख-दु:ख के साथी होते हैं।

उस भाव को फिर से हम जगाएं और गांवों को बहुत आगे बढ़ाएं, इसी एक अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्‍यवाद।

Explore More
শ্রী রাম জন্মভূমি মন্দিরের ধ্বজারোহণ উৎসবে প্রধানমন্ত্রীর বক্তব্যের বাংলা অনুবাদ

জনপ্রিয় ভাষণ

শ্রী রাম জন্মভূমি মন্দিরের ধ্বজারোহণ উৎসবে প্রধানমন্ত্রীর বক্তব্যের বাংলা অনুবাদ
Cabinet approves Rs 4,415 crore upgrade of 233 km NH-347B in Madhya Pradesh

Media Coverage

Cabinet approves Rs 4,415 crore upgrade of 233 km NH-347B in Madhya Pradesh
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
ঝাড়খণ্ডের রাঁচিতে ন্যাশনাল সিনিয়র অ্যাথলেটিক্স ফেডারেশন প্রতিযোগিতা চলাকালীন চারটি ভিন্ন ভিন্ন ইভেন্টে চারটি জাতীয় রেকর্ড ভাঙা হয়েছে: প্রধানমন্ত্রী মোদী
আমার প্রিয় দেশবাসী, এই সময়, দেশের বেশিরভাগ জায়গায় খুব গরম পড়েছে। প্রচণ্ড রোদ, গরম হাওয়া, এই রকম আবহাওয়ায় নিজের প্রতি খেয়াল রাখা অত্যন্ত জরুরি: প্রধানমন্ত্রী মোদী
বিহার ঝাড়খণ্ড, পূর্ব উত্তরপ্রদেশে ছাতুর সরবৎ, ওর কথা তো একদম আলাদা -পেটও ভরে, শক্তিও দেয়: প্রধানমন্ত্রী মোদী
সেবা করার জন্য অনেক বড় প্রচেষ্টার দরকার নেই -জরুরী হল এক সৎ ইচ্ছে এবং নিরন্তর প্রচেষ্টা: প্রধানমন্ত্রী মোদী
নেদারল্যান্ডসে আয়োজিত এক বিশেষ অনুষঠানেও চোল রাজত্বকালীন প্রাচীন তাম্র ফলক ভারতকে প্রত্যর্পণ করা হয়: প্রধানমন্ত্রী মোদী
আমাদের এখানে সব প্রজন্মেই জ্যোতির্বিজ্ঞান কৌতুহল জাগিয়েছে। এর অনুসন্ধানের জন্য উদ্বুদ্ধ করেছে , আর আজকের যুব প্রজন্মও এব্যাপারে যথেষ্ট উৎসাহ দেখাচ্ছেন: প্রধানমন্ত্রী মোদী
ডলফিন উদ্ধারকারী অ্যাম্বুলেন্সটিকে একটি ভ্রাম্যমান হাসপাতালের মতো করে তৈরি করা হয়েছে। এতে ডলফিনকে সুরক্ষিত রাখার ব্যবস্থা আছে: প্রধানমন্ত্রী মোদী
বন্ধুরা, যখন আমরা গাঙ্গেয় ডলফিনকে বাঁচাই, তখন শুধু যে একটি প্রজাতিকে বাঁচাই তা-ই নয়, আমরা গঙ্গার জীব বৈচিত্রকে বাঁচাই: প্রধানমন্ত্রী মোদী
গিরিজা আম্মাজীর দেশভক্তির ভাবনা প্রত্যেক ভারতবাসীকে প্রেরণা জোগাতে পারে। 'মন কি বাত' থেকে অনুপ্রেরণা নিয়ে তিনি দেশের সৈনিকদের কাজে লাগার সংকল্প নিয়েছিলেন: প্রধানমন্ত্রী মোদী

আমার প্রিয় দেশবাসী, নমস্কার। ‘মন কী বাত’-এ আবারও আপনাদের সঙ্গে যুক্ত হয়ে আমি অত্যন্ত আনন্দিত। দেশের বিভিন্ন প্রান্তে আমাদের দেশের মানুষ দেশের স্বার্থে, সমাজের স্বার্থে এমন অসাধারণ সব কাজ করছেন এবং যখন তাঁদের সম্পর্কে শুনি, তখন আমরা নতুন প্রেরণা পাই। আজকের অনুষ্ঠানের সূচনা আমি অ্যাথলেটিক্সে দেশের তেমনই এক কৃতিত্বের কথা দিয়ে করব। কয়েকদিন আগেই ঝাড়খণ্ডের রাঁচিতে ন্যাশনাল সিনিয়র অ্যাথলেটিক্স ফেডারেশন প্রতিযোগিতা অনুষ্ঠিত হয়েছে। এতে সারা দেশ থেকে প্রায় ৮০০ অ্যাথলিট অংশ নিয়েছেন। এই প্রতিযোগিতা চলাকালীন চারটি ভিন্ন ভিন্ন ইভেন্টে চারটি জাতীয় রেকর্ড ভাঙা হয়েছে। ভেঙেছেন গুরিন্দরবীর সিং, বিশাল টিকে, তেজস্বীন শঙ্কর, দেব মীণা এবং কুলদীপ কুমার। এই সাথীরা আলাদা-আলাদা ক্যাটেগরিতে নতুন রেকর্ড গড়েছেন। আমি সর্বপ্রথম এদের সকলকে অনেক-অনেক অভিনন্দন জানাই।

সাথী, একটি ইভেন্ট যা নিয়ে সারা দেশে খুব আলোচনা হচ্ছে, সেটি হলো – ১০০ মিটার রেস, একশ মিটারের দৌড়। মাত্র দু’ দিনের মধ্যে পুরুষদের একশো মিটার রেসে জাতীয় রেকর্ড তিনবার ভেঙে গিয়েছে। যে দু’জন অ্যাথলিট এই কৃতিত্ব দেখিয়েছেন তাঁরা হলেন - গুরিন্দরবীর সিং এবং অনিমেষ কুজুর। আমি ভাবলাম এইবার ‘মন কী বাত’-এ এই দু’জন খেলোয়াড়ের সঙ্গে কথা বলা যাক।

(ফোন কল)

প্রধানমন্ত্রী: অনিমেষ জী নমস্কার | গুরিন্দর বীর তোমাকেও নমস্কার, সৎশ্রী অকাল।

অনিমেষ, গুরিন্দরবীর: নমস্কার স্যার, নমস্কার স্যার।

প্রধানমন্ত্রী: আচ্ছা ভাই, তোমরা তো খুব বড় কৃতিত্ব দেখিয়েছ। তোমাদের জুটিও তাক লাগিয়ে দিয়েছে। আমরা সঙ্গীতে তো যুগলবন্দী দেখেছি, কিন্তু চ্যালেঞ্জে এখন যুগলবন্দী হল যেখানে একবার একজন চ্যালেঞ্জ দেয়, তারপর অন্যজন সেই চ্যালেঞ্জটি গ্রহণ করে। ফের তৃতীয়বার সাফল্য পায়। তোমাদের ব্যাপারটা খুব আকর্ষণীয় ছিল। আমি চাই ‘মন কী বাত’-এর শ্রোতারা জানুন এ ব্যাপারে, তোমাদের সম্পর্কে জানুন তাঁরা। তোমরা যে চমৎকার প্রদর্শন করেছেন সেটা জানা যাক।

অনিমেষ জী: নমস্কার স্যার, আমার নাম অনিমেষ কুজুর। আমি ২০০ মিটার এবং ৪০০ মিটারে জাতীয় রেকর্ডের অধিকারী স্যার আমি ছত্তিশগড়ের মানুষ।এখন আমি ওড়িশার হয়ে খেলি। আমি গত বছর এশিয়ান মেডেল এবং ওয়ার্ল্ড ইউনিভার্সিটি গেমস মেডেল নিয়ে এসেছি আমি অ্যাথলেটিক্স ২০২১ থেকে শুরু করি যখন আমি স্কুল থেকে উত্তীর্ণ হই। আমি অম্বিকাপুরের সৈনিক স্কুল থেকে পাশ করেছি, আমি প্রথমে ফুটবল খেলতাম, আমার বাবা-মা কোভিডের সময় আমাকে কিছুটা ছাড় দিতেন যে তুই গিয়ে বাইরে দৌড়ে আয় বা খেলে আয়, আর যখন কোভিড শেষ হতে লাগল তখন আমার ফুটবলের যেসব বন্ধু ছিল তারা আমাকে বলল যে স্টেট মিট হতে চলেছে, তুই গিয়ে অংশগ্রহণ কর আমি অংশ নিলাম আমি জানতাম না যে সেখান থেকে জাতীয় স্তরের বাছাই হয়। আমি সেখান থেকে জাতীয় পর্যায়ে নির্বাচিত হলাম এবং আজ আমি আন্তর্জাতিক পর্যায়ে ভারতের প্রতিনিধিত্ব করছি।

প্রধানমন্ত্রী: এবার গুরিন্দরবীর জী তুমি বলো?

গুরিন্দরবীর: নমস্কার স্যার, আমার নাম গুরিন্দরবীর এবং আমি ভারতীয় নৌবাহিনীতে প্যাটি অফিসার এবং আমি ভারতের সবচেয়ে দ্রুত স্প্রিন্টার। এখন ১০০ মিটারে ১০.০৯ (দশ দশমিক শূন্য নয়) সেকেন্ডের জাতীয় রেকর্ড গড়েছি। এবং আমি প্রথম ভারতীয় যে ১০.১ (দশ দশমিক এক) সেকেন্ডের কমে দৌড়েছি, এবং আমি চেষ্টা করছি যেন ট্র্যাক ও ইউনিফর্মেও আমার দেশের সেবা করতে পারি। আমার বাবা এবং ঠাকুরদা দু’জনেই খেলাধুলো করতেন – আমাদের ভারতের সংস্কৃতি হলো, যখনই কোনো উৎসব হয় যেমন দীপাবলী, যেমন নববর্ষ, তখন আমরা আমাদের ঘর পরিষ্কার করি। সেই সময় আমি আমার বাবার ট্রফি এবং মেডেলগুলো পরিষ্কার করতাম, সেটা আমার খুব ভালো লাগত, আমি খুব আনন্দ পেতাম। যখনই কোনো ট্রফি পরিষ্কার করতাম, তখন জিজ্ঞাসা করতাম – আচ্ছা, এই ট্রফি কোথায় জিতেছ? এই মেডেল কোথায় জিতেছ? এই ছবিটি কবেকার? তখন তাঁরা আমাকে তাঁদের গল্প শোনাতেন যে, দ্যাখো, আমি এখানে খেলতে গিয়েছিলাম, আমি এই জাতীয়-পদক জিতেছি, আমি এতে আমার দলকে জিতিয়েছি। তখন আমিও তাঁদের বলতাম – বেশ, আমিও কোনো খেলা খেলতে চাই। তাঁরা সকালে দৌড়তে যেতেন, তাই আমি তাঁদের বলতে লাগলাম – শোনো না, আমাকেও নিয়ে চল তোমাদের সঙ্গে। তখন তাঁরা আমাকে নিয়ে যেতে লাগলেন এবং তাঁদের খেলায় যা শিখেছিলেন, সেটা আমাকে শেখাতে লাগলেন। তখন আমার আগ্রহ তৈরি হতে লাগল। উসেইন বোল্টের বিশ্বরেকর্ড ভাঙ্গা হচ্ছে সেটা আমি দেখেছি। মজার একটা ঘটনা আছে এ ব্যাপারে – আমি টিভি দেখছিলাম, তখন আমার মা আমার টিভি বন্ধ করে দিলেন –বেটা এখন পড়ার সময় হয়েছে, তুমি পড়ো। তখন আমি বললাম – ঠিক আছে, তুমি আমাকে টিভি দেখতে দিচ্ছ না, কিন্তু একদিন এমন আসবে যে তুমি আমাকে টিভিতে খুঁজবে – দেখো, সেই গুরিন্দর দৌড়চ্ছে। তাই এখন আমার খুব আনন্দ হয় যে আমার মা আমাকে টিভিতে দৌড়তে দেখছে।

প্রধানমন্ত্রী : বাঃ বাঃ বাঃ! খুব চমৎকার কথা বললে ভাই!

গুরিন্দর বীর: হ্যাঁ স্যার, আমরা মধ্যবিত্ত পরিবার স্যার, আমার বাবাও ভলিবল খেলতেন। পারিবারিক সমস্যার কারনে উনি খেলা ছেড়ে দেন। তার স্বপ্ন অসম্পূর্ণ থেকে যায়। উনি আমার ভেতরে সেই স্বপ্ন দেখেছিলেন, যে আমার ছেলে সেই স্বপ্ন পূরণ করবে। আমি বাবার সঙ্গে কথা বলতাম, শুনতাম মিলখা সিং কত পরিশ্রম করতেন। আমি বাবাকে বলতাম যে আমিও একদিন তোমার স্বপ্ন পূরণ করব। তিনি বলতেন স্বপ্ন পূরণ এমনি এমনি হয় না। তার জন্য প্রচুর হার্ডওয়ার্ক করতে হয়। পরিশ্রম করতে হয়। মিলখা সিংজী মুখে রক্ত তুলে পরিশ্রম করতেন, রোদের মধ্যে দৌড়তেন। সারাদিন ট্রেনিং করতেন। সেই বিষয়গুলো আমাকে ইন্সপায়ার করত। আমার বাবা আমাকে ইন্সপায়ার করতেন। বলতেন, আমি দৌড়ব আমার দেশের জন্য, দেশের জন্য মেডেল আনবো, জিতবো। আর এই বিষয়টাও ছিল, আমি যখন ১০০ মিটারের ইভেন্ট বাছাই করলাম, তখন সবাই আমাকে বলল, ভাই ১০০ কোরো না। ১০০ ভারতীয়দের ইভেন্ট নয়। ভারতীয়দের শরীর ১০০ মিটারের জন্য প্রস্তুতই নয়। তখন আমি আর আমার বাবা সব সময় বলতাম, যে দেখ গুরিন্দর, আমরা এটা বেছে নিয়েছি। এখন এটার থেকে পিছু হটবো না। যারা আমাকে বলতো যে ভাই, এটা তুমি করতে পারবে না, আমি সেটা করে দেখাব। বাবা বলত, তুই করে দেখাবি, তোর ওপর আমার ভরসা আছে। যে ভরসা আমার বাবা আমার ওপর করেছেন, সেই ভরসাকে নিজের শক্তিতে পরিণত করে আমি এগিয়ে চলেছি, আর এখন তো আমি প্রত্যেক ভারতীয় কে বলছি, ভাই ভারতীয়রা স্প্রিন্ট করো।

প্রধানমন্ত্রী : দেখুন, তোমরা দু'জন এক অভূতপূর্ব কীর্তি স্থাপন করেছ, এবং মাত্র দুদিনের মধ্যে তোমরা তিনবার ন্যাশনাল রেকর্ড ভেঙেছো।

যেমনটা গুরিন্দারবীর বললেন, যে লোকে বলে ভারতীয়দের শরীর ১০০ মিটার রেসে দৌড়নোর জন্য একেবারেই উপযুক্ত নয়। এত সমস্যা থাকা সত্ত্বেও তোমরা তোমাদের কাজ করেছো। তাই তোমাদের দু'জনের থেকে আমি জানতে চাইবো এবং মন কি বাত-এর শ্রোতারাও শুনতে চাইবেন যে কি এমন আবেগ ছিল? কি এমন জেদ ছিল? কী ভেবেছিলে তোমরা এবং কীভাবে এটা করলে? কতটা কঠিন এই বিষয়টা?

গুরিন্দরবীর: হ্যাঁ স্যার, আমি গুরিন্দর। শুরুতে তো খুব স্ট্রাগল ছিল। অনেকবার সংশয়ও হয়েছে যে, আমি কি ঠিক করছি? আমি কি সঠিক বিষয় বাছাই করেছি? কারণ প্রত্যেকবার তো আপনি জিতবেন না, কখনো কখনো আপনি শিখবেনও। যখন আমি হেরে যেতাম, যখন আমি ঠিকমতো পারফরম করতে পারতাম না, কোন চোট-আঘাত আসত, তখন আমার পরিবারের সদস্যরা আমাকে সাপোর্ট করতেন। বলতেন, কোন ব্যাপার না। একদিন খারাপ গেছে, এক বছর খারাপ গেছে, এতে সারা জীবন খারাপ হয়ে যায় না। স্বপ্ন দেখা ছেড়ো না। আমার কোচও আমাকে এটা শিখিয়েছেন, যে যদি তুই না করতে পারিস, তবে অন্য কেউও করতে পারবে না। এভাবেই যখন আমার কমিউনিটি, আমাদের আশেপাশের মানুষ আমাকে উৎসাহিত করেন, তখন আমার মোটিভেশন কখনো নষ্ট হয় না।

প্রধানমন্ত্রী: অনিমেষজী...

অনিমেষ: স্যার, যখন আমি ২০২১ এ অ্যাথলেটিক্স শুরু করি তখন

লোকজন আমাকে বলতো যে, এটা নতুন ফিল্ড, দেখ তুই করতে পারবি কিনা। তা আমি বললাম যে আমি এই ফিল্ডে ঢুকেছি যখন, তখন করবোই। আমার বাবাও সব সময় আমাকে বলতেন, যে তুই এই ফিল্ডে ঢুকেছিস যখন তখন কখনো পিছন ফিরে দেখবি না, কারণ ভাবে তো সবাই যে এই করব, ওই করব, কিন্তু খুব কম লোকই করে দেখায়। তুই এই ফিল্ডে ঢুকেছিস তো এটাতেই লেগে থাকতে হবে, এটাতেই এগিয়ে যেতে হবে।

তোমাকে সবরকম facilities (সুযোগ সুবিধে) সমস্ত কিছু দিয়ে আমরা support করব। পারিবারিক support, আর্থিক support, সব কিছু করব আমরা। ব্যাস, তুমি পরিশ্রম কর আর India কে দেখিয়ে দাও যে ভারতীয়রাও দৌড়তে পারে। কারণ আমাকেও লোকে বলত যে ভারতীয়দের genes সেরকম নয় যাতে তারা দশ অথবা দশ দশমিক এক এর মধ্যে দৌড়তে পারে অথবা sprint করতে পারে। কিন্তু এখন আমরা দুজনেই এটা prove করেছি যে ভারতীয়রাও এটা করতে পারে। আমাদের জন্য এটা এমন কিছু কঠিন নয়, আমরা ও এসব করতে পারি। আসলে স্যার, এ সমস্ত কিছু আমাকে খুব প্রেরণা দেয়, আর আমরা যত প্রশিক্ষণ নিচ্ছি প্রয়োজনীয় সময় আরো কমছে এবং অন্য ভারতীরাও দেখতে পারছে যে ভারতীয়রাও পারে। আমরা আরো করব স্যার, এখন আমাদের দুজনের নির্বাচন Commonwealth games এর জন্য ও হয়েছে। সামনের প্রতিযোগিতায় আমরা আরো ভালো প্রদর্শন (perform) করব ।

প্রধানমন্ত্রী : দ্যাখো, আমার মনে একটা কৌতুহল আছে, আর লোকেদের ও আছে। আমি শুনেছি তোমরা দুজনে খুব ভালো বন্ধুও। তোমরা দুজনে কিছু ঠিক করে রেখেছ নাকি যে তুমি আমার record ভাঙলে আমি তোমার record ভাঙব। প্রথমে অনিমেষ বলো।

অনিমেষ: স্যার জী, আগে রেকর্ড ছিল দশ দশমিক এক আট এর , যা আমার ছিল। সেটাকে গুরিন্দরবীর ভাই সেমিফাইনালে ভেঙে দশ দশমিক এক সাত করে। তারপর আমি আবার ওটাকে সেকেন্ড সেমিফাইনাল- দশ দশমিক এক পাঁচ করে ভাঙি। যখন সেমিফাইনাল হয়, আমরা দুজনেই খুশি ছিলাম যে, চলো ঠিক আছে , আজ রেকর্ড ভেঙেছে আর আমরা দুজনেই ভেঙেছি। কারণ ঐ সময়ে প্রতিযোগিতায় এ প্রতিদ্বন্দ্বিতা থাকে কিন্তু এটা আমরা দুজনেই আগে থেকে ঠিক করে রেখেছিলাম । তার আগে আমরা সৌদি আরব ও গিয়েছিলাম প্রতিযোগিতায় অংশ নিতে, সেখানেও আমরা দুজন roommates ছিলাম। আমরা ওখানেও আলোচনা করতাম ভারতের sprinting কে আরো এগিয়ে নিয়ে যেতে হবে আর এটা আমাদেরই হাতে , আমরা যা করব সেটাই অন্যদের উৎসাহিত করবে।

প্রধানমন্ত্রী : গুরিন্দরবীর তুমি কী বলবে?

গুরিন্দরবীর: আমরা দুজনে ঠিক করেছিলাম যে আমরা খুব ভালো দৌড়বো। সেই জন্য যখনই একে অপরকে প্রয়োজন হয় একে অন্যের পাশে থাকি। যেমন, এখন রেকর্ড গড়ার আগে আমি রেকর্ড গড়লাম তারপর অনিমেষ গড়ল। যখন আমরা warm up করছিলাম তখন আমি অনিমেষ কে বলছিলাম, অনিমেষ ঐ ব্লক টা ভালো, ঐখানে গিয়ে বোস, ওখানে তাড়াতাড়ি চলে যা আমরা ওখানেই warm up করব, এখানে ভালো warm up করা গেলে একে অপরকে help করা হবে। একজন অন্য কে সাহায্য করলে সেও improve করে, আমি ও improve করি। সেই জন্য বন্ধুত্ব ও দরকার। তবে, স্যার, আমরা যখন মাঠের বাইরে, প্রতিযোগিতার বাইরে তখন আমরা বন্ধু। যেই আমরা মাঠে আসি তখন একে অপরের প্রতিদ্বন্দী হয়ে যাই। তখন এটাই হয় যে আমি দ্রুত দৌড়বো, আমি ওর থেকেও দ্রুত দৌড়বো।

প্রধানমন্ত্রী: দ্যাখো, তোমাদের যে লড়াই সেটা দেশের সম্মান বাড়ানোর জন্য। দেশ কে ভবিষ্যতে এই জায়গায় নিয়ে যাওয়ার জন্য আর এটা এক positive spirit নিয়েই করা। আর আমি মনে করি তোমাদের এই যে sportsman spirit, এটা খেলা ও, আবার একে অপর কে challenge করাও, এগিয়ে যাওয়ার চেষ্টা করা আবার এগিয়ে যাবার জন্য একে অন্যকে সাহায্য ও করা , এ এক অভিনব দৃষ্টান্ত স্থাপন করেছ তোমরা। আমার তরফ থেকে অনেক অনেক অভিনন্দন তোমাদের। অনেক অনেক শুভ কামনা এবং আমার পূর্ণ বিশ্বাস যে তোমরা দেশের নাম ঊজ্জ্বল করবে।

তোমরা এভাবেই পরিশ্রম করতে থাকো অনেক উন্নতি হবে। আমার অনেক অনেক শুভ কামনা।

গুরিন্দরবীর/ অনিমেষ: ধন্যবাদ স্যার, ধন্যবাদ আপনাকে।

প্রধানমন্ত্রী: অনেক অনেক ধন্যবাদ।

আমার প্রিয় দেশবাসী , এই সময়, দেশের বেশিরভাগ জায়গায় খুব গরম পড়েছে। প্রচণ্ড রোদ, গরম হাওয়া, এই রকম আবহাওয়ায় নিজের প্রতি খেয়াল রাখা অত্যন্ত জরুরি। জল পান করতে থাকুন। রোদে বেরোনো জরুরি হলে সাবধানে বেরোন। এব্যাপারে সরকারের বিভিন্ন দপ্তর যে যে গাইডলাইনস দিয়েছে তা ভুলবেন না।

বন্ধুরা, আমাদের এখানে গরমের সঙ্গে লড়াই করার নানা উপায় রান্নাঘরেও পাওয়া যায়। আপনিও নিশ্চয়ই দেখেছেন, যেমন যেমন গরম বাড়তে থাকে, তেমন তেমন রান্নার স্বাদও বদলাতে থাকে, রান্নার পদ্ধতিও পাল্টে যায়। কখনও কলসির জল আসে, কখনও দই পাতা হয়, তো কখনও কাঁচা আম সিদ্ধ করা হয়- আর শুরু হয় দেশী পানীয়র বাহার। দেশী পানীয়র সঙ্গে আপনিও পরিচিত। আপনি যদি উত্তর ভারতে যান তো অনেক জায়গায় আপনি পাবেন আম পান্না, কাঁচা আমের স্বাদ আর গরম থেকে রেহাই। পঞ্জাব হরিয়ানা গেলে লস্যি পাবেন, বড় গেলাসের লস্যি। রাজস্থান আর গুজরাটে ছাঁচ, যা সব খাবারের সঙ্গেই যায়। আর বিহার ঝাড়খণ্ড, পূর্ব উত্তরপ্রদেশে ছাতুর সরবৎ, ওর কথা তো একদম আলাদা -পেটও ভরে, শক্তিও দেয়। কোঙ্কন আর গোয়াতে কোকম শরবৎ , আর সোলকারি। দক্ষিণ ভারতের পানকম, নীর মোর, সম্বারন আর ওড়িশার বেলপান্না, এসব শুধু পানীয়ই নয়, ভারতের আলাদা আলাদা জায়গায় ঐতিহ্যের নিদর্শন।

আর এর মধ্যে এক ভারত শ্রেষ্ঠ ভারতের এক ছবিও পাওয়া যায়। আর একটা ব্যাপার অবশ্যই মাথায় রাখবেন, এর মধ্যে অধিকাংশ জিনিসই আমাদের রান্নাঘরেই পাওয়া যায়, আমাদের ক্ষেতখামার থেকেই আসে। কোন বড় branding নেই। কিন্তু প্রজন্মের অভিজ্ঞতা তার মধ্যে মিলেমিশে আছে। আপনিও গরমের সময় দেশীয় পানীয়র আস্বাদ অনুভব করুন।

বন্ধুরা, গরম এলেই আর একটি আলোচনা সব ঘরে শুরু হয়ে যায়, আর সেটি হলো আম। আম, সর্বসাধারনের আলোচনার বিষয় হয়ে ওঠে,, ভারতে খুব কম ঘর আছে যেখানে আম নিয়ে কথা হয় না। প্রত্যেক জায়গার নিজস্ব আম, নিজস্ব স্বাদ, নিজস্ব সুগন্ধ।মহারাষ্ট্র আর কোঙ্কনে হাপুস, আলফনসো, গুজরাটে কেসর, এটাই তো আমের প্রাণ, উত্তরপ্রদেশের দশহরী আর আমার কাশীর ল্যাংড়া। ল্যাংড়া আমের মধ্যে অন্যতম, পাকার পরেও তার রং অনেক সময়ই সবুজই থেকে যায়। বিহারের জর্দালু, যার সুগন্ধ বহুদূর থেকে পাওয়া যায়। মালদার চৌসা, এই প্রত্যেকটি নামের সঙ্গে মানুষের স্মৃতি জুড়ে আছে। দক্ষিণ ভারতে যান, বংগনপল্লী, তোতাপুরি, নীলম, মলগোবা, বাংলার হিমসাগর, ওড়িশার আর অন্ধ্রপ্রদেশের সুবর্ণরেখা। অর্থাৎ, স্হান বদলায়, আমের রূপ রঙ আর তার স্বাদও বদলে যায়। আর বন্ধুরা, আমের এই পথচলা এখন গ্রাম থেকে global market পর্যন্ত পৌঁছে গেছে।আজ মন কি বাতের মাধ্যমে আমের ফলনের সঙ্গে যুক্ত কৃষক ভাইবোনদের প্রশংসা করব। আপনারা দেশের কৃষি অর্থ ব্যবস্থার জন্য শুধু সাধারণ কৃষক নন, আরও অনেক বেশি। এরকমই থাকুন।

বন্ধুরা, গরমের এই দিনগুলিতে একতো স্কুলের ছুটি থাকে, কিন্তু আমি এক এরকম class এর কথা বলব, যেখানে ভর্তি হওয়ার জন্য আপনার ইচ্ছে হবেই।

বন্ধুরা কল্পনা করুন, এক এমন school, যেখানে বাচ্চারাও যাচ্ছে , য়ুবারাও এবং বয়স্করাও, যেখানে কোন fee নেই, কোন বড় building নেই, কোন classroom ও নেই, আর সবচেয়ে পছন্দের কথা এখানে class নদীতে হয়।

বন্ধুরা, এ কোন গল্প নয়। এ এক সত্যি প্রচেষ্টা। কেরলের আলুওয়া তে, সাজি ওয়ালাশেরিলজী এমনি এক swimming club চালান। এখনও পর্যন্ত ১৫ হাজারের ও বেশী লোক এখানে সাঁতার শিখেছেন। সাজিজী

দিব্যাঙ্গ বাচ্চাদের ও swimming শিখিয়েছেন। এই প্রচেষ্টার পেছনে এক দুঃখও রয়েছে। কয়েক বছর আগে এক নৌকা দুর্ঘটনায় কিছু ছাত্রের মৃত্যু হয়। এই ঘটনা সাজিজির ভেতরটাকে ওলটপালট করে দেয়। উনি চিন্তা করেন যে যদি বাচ্চারা সাঁতার জানতো তবে অনেক প্রাণ বেঁচে যেত- ব্যস এরপর থেকেই শুরু হয় তাঁর এই প্রচেষ্টা।

বন্ধুরা, সাজি ওয়ালাশেরিলজীর জীবন আমাদের এক মস্ত বড় শিক্ষা দেয়। সেবা করার জন্য অনেক বড় প্রচেষ্টার দরকার নেই -জরুরী হল এক সৎ ইচ্ছে এবং নিরন্তর প্রচেষ্টা। তাঁর এই শক্তির মাধ্যমেই বহু মানুষের জীবনে পরিবর্তন আনা সম্ভব হয়।

আমার প্রিয় দেশবাসী, কয়েক দিন আগে আমার ইউরোপের নেদারল্যান্ডসে যাওয়ার সুযোগ হয়েছিল।ওখানে আমি অনেকগুলো মিটিং এ ছিলাম। এই সময়েই এক এমন মুহূর্ত আসে যা সমস্ত ভারতীয়দের গর্বে ভরিয়ে তোলে। নেদারল্যান্ডসে আয়োজিত এক বিশেষ অনুষঠানেও চোল রাজত্বকালীন প্রাচীন তাম্র ফলক ভারতকে প্রত্যর্পণ করা হয়।এই কার্যক্রমে নেদারল্যান্ডসের প্রধানমন্ত্রীও ছিলেন।এই তাম্র ফলক নিয়ে দেশবিদেশ থেকে আমার কাছে নিরন্তর সংবাদ আসতে থাকে।

মানুষ তাঁদের খুশি জানাচ্ছেন, তাঁদের গর্বের কথা জানাচ্ছেন। সারা বিশ্বে তামিল দের মধ্যে এবিষয়ে বিশেষ উৎসাহ রয়েছে।

বন্ধুরা এই তাম্র ফলক নিয়ে মানুষের মধ্যে অনেক প্রশ্নও রয়েছে। এজন্য আমি এর সঙ্গে যুক্ত কিছু কথা আজ আপনাদের সঙ্গে আলোচনা করতে চাই।এর মধ্যে একুশটি বড় এবং তিনটি ছোট তাম্র ফলক রয়েছে। এগুলি প্রধানত রাজা প্রথম রাজেন্দ্র চোলের পিতা রাজা রাজরাজা চোলকে দেওয়া প্রতিজ্ঞার সঙ্গে যুক্ত। এতে আনইমঙ্গলম গ্রামটি এক বৌদ্ধ বিহার কে দানের কথা লেখা আছে। এই তাম্র ফলকে চোল বংশের সাফল্যের কথাও লেখা আছে। এরথেকে বোঝা যায় চোল সাম্রাজ্যের সমুদ্র শক্তি কতটা শক্তিশালী ছিল। দক্ষিণ পূর্ব এশিয়ার দেশের সঙ্গে তাঁদের যোগাযোগের কথাও এতে পাওয়া যায়।

চোল সাম্রাজ্যের সমৃদ্ধ ইতিহাস আর সংস্কৃতি আমাদের সবার অনেক গর্বের। বন্ধুরা, আমাদের সরকার ভারতের এইসব অমূল্য ঐতিহ্য সংরক্ষণের জন্য নিরন্তর প্রচেষ্টা চালিয়ে যাচ্ছে। এরকম ভাবেই ছত্তিশগড়ের মল্হারেও জ্ঞান ভারতম অভিযানের সঙ্গে যুক্ত এক গুরুত্বপূর্ণ খনন হয়েছে। এখানে তিনটি দুর্লভ তাম্রফলক পাওয়া গেছে।এগুলো পাণ্ডু রাজবংশের মহর্ষি বালার্জুনের শাসনকালের সঙ্গে যুক্ত বলে মনে করা হয়। বিশেষজ্ঞদের মত এই inscription গুলি ষষ্ঠ - সপ্তম শতকের অর্থাৎ চোদ্দ পনেরোশো বছর আগের পুরোনো এই তাম্র ফলক প্রাচীন ব্রাম্হী লিপি আর পালি ভাষাতে লেখা। এ থেকে ওই সময়ের শাসন ব্যবস্থা, ধর্ম আর সংস্কৃতি সম্পর্কে গুরুত্বপূর্ণ তথ্য জানা যায়।

বন্ধুরা, আমাদের ভারতবর্ষে জ্যোতির্বিজ্ঞান অর্থাৎ astronomy সম্পর্কে বিশেষ আকর্ষণ রয়েছে। আমাদের দেশে আজও শতাব্দী প্রাচীন observatories রয়েছে। এখানে অদ্ভুত mathematical discoveries হয়েছে।

Navigation হোক, পঞ্চাঙ্গ হোক, অথবা আমাদের পরব বা উৎসব, এই সব কিছু আকাশ আর তারাদের সঙ্গে জুড়ে রয়েছে। আমাদের এখানে সব প্রজন্মেই astronomy কৌতুহল জাগিয়েছে। এর exploration এর জন্য উদ্বুদ্ধ করেছে , আর আজকের যুব প্রজন্মও এব্যাপারে যথেষ্ট উৎসাহ দেখাচ্ছেন।আজকাল আপনিও দেখতে পাবেন সারা দেশে astronomy club অত্যন্ত দ্রুত জনপ্রিয় হয়ে উঠছে। বড় শহর থেকে ছোট শহর , স্কুল থেকে পার্ক পর্যন্ত এর ক্রিয়াকলাপ দেখা যাচ্ছে। আমি Bangalore Astronomical Society থেকে খবর পেয়েছি।এখানে observational sessions আয়োজন করা হয়।এই সংস্হা গ্রাম অঞ্চলে astronomy কে জনপ্রিয় করার কাজও শুরু করে দিয়েছে। খগোল মণ্ডল নামে এক টিম ৩০ঘণ্টার এক খুব innovative course শুরু করেছেন।

বন্ধুরা, রাতে তারাদের পর্যবেক্ষণ এক অদ্ভুত অনুভূতি। Astro Kerala নামের একটি সংস্হা night observation camps আর workshop এর আয়োজন করে। এখানে যুবা বন্ধুরা টেলিস্কোপ তৈরি করা আর star maps ব্যবহার করা শেখেন।রাজকোটের বিগ ব্যাং অ্যাস্ট্রোনমি ক্লাব গিরের জংগল থেকে কচ্ছের রণ পর্যন্ত অনেক অ্যাস্ট্রোনমি ইভেন্ট এর আয়োজন করেছেন। জ্যোতির্বিদ্যা পরিসংস্হাও অ্যাস্ট্রোনমির সবথেকে পুরনো সংস্থাগুলির মধ্যে একটি। এখানে observational facility র সঙ্গে সঙ্গে বই , লাইব্রেরী আর টেলিস্কোপ লাইব্রেরীরও সুবিধে আছে। আমি আইস্যাকের কথাও উল্লেখ করতে চাই। এটা একটা student - led nationwide network , যেটা astronomy আর astrophysics club কে একসঙ্গে যুক্ত করে।

বন্ধুরা , নিজের hobbyর জন্য সময় বের করা, সবসময়ে নতুন কিছু শিখতে থাকা খুব জরুরি। আমি যুবকদের কাছে চাইব তাঁরা যেন অবশ্যই কোনো astronomy club-এর সঙ্গে যুক্ত হন এবং এই ছুটিতে অবশ্যই কোনো একটি planetarium দেখতে যান।

বন্ধুরা, 'মন কি বাত' অনুষ্ঠানটি যাঁরা টিভিতে দেখছেন, আমি তাঁদের বলব, একটি ভিডিও নিশ্চয়ই দেখবেন। এই ভিডিওটি নিয়ে কিছুদিন আগে প্রচুর আলোচনা হয়েছে। এটিতে কিছু মানুষ অপরিসীম ধৈর্য সহকারে, খুব সাবধানে গাঙ্গেয় ডলফিনকে বাঁচানোর চেষ্টা করছেন। আপনারা শুনে অবাক হবেন যে, এই পুরো প্রচেষ্টায় লেগেছিল প্রায় ১৩ ঘন্টা, আর তার ফলে শেষপর্যন্ত ডলফিনটি বেঁচে যায়।

বন্ধুরা, এই গোটা ব্যাপারটিতে খুব বড় ভূমিকা ছিল, ভারতের প্রথম গঙ্গা dolphin rescue ambulance এর। এটি উত্তর প্রদেশের ঘটনা। সেখানে একটি গাঙ্গেয় dolphin খালে আটকে গিয়েছিল। ওই সময়ে 'নমামি গঙ্গে অভিযানের' জন্য তৈরি এই ambulance তার ভরসা হয়ে পৌঁছে গেল এবং খুব সাবধানে তাকে বাইরে বার করে আনা হল। ভালো করে পরীক্ষা ও চিকিৎসার পর তাকে সুরক্ষিত রাপ্তি নদীতে ছেড়ে দেওয়া হয়। এক হিসেবে বলা যেতে পারে, একটি জীবন যেন আবার তার নিজের ঘরে ফিরে গেল।

বন্ধুরা, এই dolphin rescue ambulance টি বিশেষ ধরনের। এটিকে একটি ভ্রাম্যমান হাসপাতালের মতো করে তৈরি করা হয়েছে। এতে dolphinকে সুরক্ষিত রাখার ব্যবস্থা আছে। Oxygen আছে, বিশেষ স্ট্রেচার আছে, জীবন রক্ষার নানা উপকরণ আছে, অর্থাৎ যদি কোনো dolphin আহত হয়, খালে আটকে যায় বা নদী থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়, তাহলে সঙ্গে সঙ্গে তাকে উদ্ধার করা যাবে।

বন্ধুরা, যখন আমরা গাঙ্গেয় dolphin কে বাঁচাই, তখন শুধু যে একটি প্রজাতিকে বাঁচাই তা-ই নয়, আমরা গঙ্গার জীব বৈচিত্রকে বাঁচাই । এভাবে নদীর পুরো জীবনতন্ত্রকে বাঁচানো হয়, এবং আমাদের আগামী প্রজন্মের জন্যে প্রকৃতির এক অমূল্য উত্তরাধিকারকে বাঁচিয়ে রাখা হয়।

আমার প্রিয় দেশবাসী, আপনাদের মধ্যে অনেকেরই নিশ্চয়ই নদী, পুকুর বা কুয়ার জলের সঙ্গে জড়িত অনেক স্মৃতি রয়েছে। কারুর পুকুরে সাঁতার কাটার কথা মনে পড়বে, কারুর আবার পুকুরপাড়ে বন্ধুদের সঙ্গে খেলার কথা কিংবা সেই মাটির গন্ধটা মনে আসবে। ছোটবেলার এইসব স্মৃতি সারা জীবন মনে থেকে যায়।

বন্ধুরা, এইসব স্মৃতিকে বাঁচিয়ে রাখার এক অনুপ্রেরণামূলক কাহিনী উত্তর প্রদেশের বস্তি জেলা থেকে জানা গেছে। নিজেদের গ্রামের মনোরমা নদীটিকে দেখে বস্তির বাসিন্দা আকাশ গুপ্তার খুব দুঃখ হত। কারণ যে নদীকে তিনি বাল্যকালে পরিষ্কার আর প্রাণবন্ত দেখতেন, সময়ের সঙ্গে সঙ্গে সেই নদীতে ক্রমশ প্লাস্টিক জমা হতে থেকেছে, জলে আবর্জনা বেড়ে চলেছে। শ্রীমান আকাশ স্থির করলেন, তিনি কোনো অভিযোগ করবেন না, বরং নতুনভাবে এক প্রচেষ্টা শুরু করবেন। অভিযোগ নয়, আরম্ভ -- এটাই মন্ত্র হয়ে দাঁড়াল। তিনি নিজের বন্ধুদের সঙ্গে নিলেন। আর ছিল শুধু জাল, ছোট কোদাল, ঝুড়ি এবং সেইসঙ্গে সবচেয়ে বড় যে শক্তিটা ছিল সেটা হল কিছু বদলে দেবার সংকল্প। এই যুবকেরা জলে নেমে কচুরিপানা সরাতেন। প্লাষ্টিক আর আবর্জনা তুলে আনতেন। কয়েকবার তো এক এক দিনে ৫০-৬০ কিলো পর্যন্ত আবর্জনা নদী থেকে তোলা হয়েছে। ধীরে ধীরে মনোরমা নদীর ওই অংশটিকে আবার পরিষ্কার দেখাতে লাগল। আশপাশের মানুষদেরও নজর পড়ল এমন একটি উদ্যোগের প্রতি । অধিবাসীদের মধ্যে স্বচ্ছতার ব্যাপারে সচেতনতা বাড়ল।

 বন্ধুরা, এরকমই আর একটি প্রেরণাদায়ী কাহিনী গোয়া থেকেও আমাদের কাছে এসেছে। গোয়ার বালকৃষ্ণ অইয়া জী একজন retired teacher. অবসর নিলেও সমাজের জন্য কাজ করার উৎসাহ তাঁর আজও একই রকম আছে। মড্ডি-তোলাপ এলাকার জলের সমস্যা নিয়ে তাঁকে খুবই পীড়িত করতো। তিনিও সমাধানের জন্য কাজ শুরু করলেন। পাইপলাইন পাতার কাজে বালকৃষ্ণজী গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা নেন। এর ফলে বেশ কিছু বাড়িতে জল পৌঁছে দেওয়া গেল। যে পরিবারগুলিকে জলের জন্য রোজ অনেক কষ্ট করতে হত, এতে তাঁরাও স্বস্তি পেলেন।

বন্ধুরা, গতমাসে আমার একটি সুন্দর অভিজ্ঞতা হয়েছে। এরসঙ্গে 'মন কি বাত'-এরও সম্বন্ধ রয়েছে। সেইজন্যেই আজ আপনাদের কাছে এই বিষয়ে আলোচনা করতে চাই। তামিলনাড়ুর নাগেরকয়েলে এক শিক্ষকের সঙ্গে আমার দেখা হয়েছিল। প্রায় তিন দশক আগে আমার সঙ্গে তাঁর দেখা হয়। আমি গিরিজা আম্মাজী-র কথা বলছি। এই সাক্ষাতের সময়ে কিছু তরুণ ছাত্রও তাঁর সঙ্গে ছিল।

বন্ধুরা, গিরিজা আম্মাজী প্রায় ১৫ টি স্কুল চালান। এরমধ্যে চেন্নাইয়ের জয়গোপাল গরোডিয়া হিন্দু বিদ্যালয় খুবই উল্লেখযোগ্য। তার দেশভক্তির ভাবনা প্রত্যেক ভারতবাসীকে প্রেরণা জোগাতে পারে। 'মন কি বাত' থেকে অনুপ্রেরণা নিয়ে তিনি দেশের সৈনিকদের কাজে লাগার সংকল্প নিয়েছিলেন। সেই উদ্দেশ্যে তিনি তাঁর সব স্কুলের ছাত্রদের উৎসাহ দিলেন এবং বললেন তারা যেন প্রতিদিন সেই বীর জওয়ানদের জন্য এক টাকা করে দেয়। অর্থাৎ এক বছর পরে ছাত্রপিছু মোট ৩৬৫ টাকা জমা হল। এই ছোট ছোট উদ্যোগকে এক করে প্রায় চল্লিশ লক্ষ টাকা একত্রিত করা সম্ভব হয়েছিল। গিরিজা আম্মাজী এই পুরো টাকার অঙ্কটি আমার হাতে সমর্পণ করেন। তাঁর সঙ্গে কথা বলতে গিয়ে আমি উপলব্ধি করেছিলাম, মা ভারতীর প্রতি তাঁর সমর্পণ কতটাই গভীর !

গতবছরই চেন্নাইয়ের প্রথম হিন্দু বিদ্যালয় তাদের ৫০ বছর পূর্ণ করেছে। দেশের শিক্ষা ও সংস্কৃতিকে এগিয়ে নিয়ে যাবার ব্যাপারে এই school network এর ভূমিকা খুবই প্রশংসনীয়। আমি এরসঙ্গে যুক্ত সকলকে অনেক অনেক ধন্যবাদ জানাই, এবং সেই ছাত্রদেরও বিশেষ তারিফ করি, যারা দেশের বীর সৈনিকদের জন্য অবদান রেখেছিল ।

বন্ধুরা , ভারতের প্রতিটি গ্রামে, প্রতিটি শহরে, এরকম কিছু না কিছু ঘটে চলেছে যা আমাদের প্রেরণা দেয়। অনেকসময়েই এই প্রয়াসগুলি নিয়ে বেশি চর্চা হয়না, কিন্তু যখন আমরা এগুলির বিষয়ে জানতে পারি, তখন তখন এই বিশ্বাসটিই আরো মজবুত হয় যে দেশ তার আপনজনেদের শক্তিতেই এগিয়ে চলেছে। আমি চাই, আপনারাও নিজেদের চারপাশে এইসব প্রয়াসগুলির প্রতি নজর রাখুন। সমাজের জন্য যাঁরা ভালো কাজ করছেন, তাঁদের চিনে রাখুন, তাঁদের প্রশংসা করুন, তাঁদের থেকে শিখুন, আর সম্ভব হলে নিজেরাও কোনো ভালো কাজের সঙ্গে যুক্ত হন।

আগামী মাসে 'মন কি বাত'এ আরো কিছু অনুপ্রেরণামূলক কাহিনী নিয়ে আপনাদের কাছে আসব। অনেক অনেক ধন্যবাদ। নমস্কার।