Text of PM's remarks on National Panchayati Raj Day

Published By : Admin | April 24, 2015 | 13:46 IST

मंत्रिपरिषद के मेरे साथी, देश के अलग-अलग भागों से आए हुए पंचायत राज व्‍यवस्‍था के सभी प्रेरक महानुभाव,

जिन राज्‍यों को आज मुझे सम्‍मानित करने का सौभाग्‍य मिला है उन सभी राज्‍यों को मैं हृदय से बधाई देता हूं। आज जिला परिषदों को भी और ग्राम पंचायतों का भी सम्‍मान होने वाला है। उन सबको भी मैं हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। पंचायत राज दिवस पर मैं देशभर में पंचायत राज व्‍यवस्‍था से जुड़े हुए सक्रिय सभी महानुभावों को आज शुभकामनाएं देता हूं।

महात्‍मा गांधी हमेशा कहते थे कि भारत गांवों में बसता है। उन गांवों के विकास की तरफ हम कैसे आगे बढ़े दूर-सुदूर छोटे-छोटे गांवों के भी अब सपने बहुत बड़े हैं। और मुझे विश्‍वास है कि आप सब के नेतृत्‍व में गांव की चहुं दिशा में प्रगति होगी। मैं नहीं मानता हूं कि अब.. जैसे अभी हमारे चौधरी साहब बता रहे थे कि पहले से तीन गुना बजट होने वाला है आपका और तुरंत तालियां बज गई। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जो पंचायत में चुन करके आए हैं, कभी सोचा है कि हम 5 साल के कार्यकाल में हम हमारे गांव को क्‍या दें करके जाना चाहते है? कभी ये सोचा है कि हमारे 5 साल के बाद हमारा गांव हमें कैसे याद करेगा? जब तक हमारे मन में गांव के लिए कुछ कर गुजरना है - ये spirit पैदा नहीं होता है तो सिर्फ बजट के कारण स्थितियां बदलती नहीं हैं।

पिछले 60 साल में जितने रुपए आए होगे उसका सारा total लगा दिया जाए, और फिर देखा जाए कि भई गांव में क्‍या हुआ तो लगेगा कि इतने सारे रुपए गए तो परिणाम क्‍यों नहीं आया? और इसलिए कभी न कभी पंचायत level पर सोचना चाहिए। कुछ राज्‍य ऐसे हैं हमारे देश में जहां पर पंचायतें अपना five year plan बनाती हैं, पंचवर्षीय योजना बनाती हैं। 5 साल में इतने काम हम करेंगे और वो गांव के पंचायत के उसमें वो board पर लिख करके रखते हैं और उसके कारण एक निश्चित दिशा में काम होता है और गांव कुछ समस्‍याओं से बाहर आ जाता है। हम भी आदत डालें कि भई हम 5 साल में हमारे गांव में ये करके जाएंगे। अगर ये हम करते है तो आप देखिए कि बदलाव आना शुरू होगा।

बजट और leadership दोनों का combination कैसे परिणाम लाता है? हम जानते है कि गांव में CC road बनाना ये जैसे एक बहुत बड़ा काम है और बहुत महत्‍वपूर्ण काम है इस प्रकार की मानसिकता बनी हुई है। इसके पीछे कारण क्‍या है वो आप भी जानते है, मैं भी जानता हूं। लेकिन कुछ सरपंच ऐसे होते हैं जो CC road तो बना देते है, CC road तो बना देते है, लेकिन पहले से प्‍लान करके दोनों किनारों पर बढि़यां पेड़ लगा देते है। वृक्षारोपण करते है और जैसे ही गांव में entry करता तो ऐसा हरा-भरा गांव लगता है। तो बजट से तो CC road बनता है लेकिन उनकी leadership quality है कि गांव को जोड़ करके रोड़ बनते ही पौधे लगा देते हैं और वो वृक्ष बन जाते हैं और एकदम से गांव में कोई आता है तो बिल्‍कुल नजरिया ही बदल जाता है। कुछ दूसरे प्रकार के होते हैं सरपंच जो क्‍या करते हैं और गांव में से कोई धनी व्‍यक्ति कहीं कमाने गया तो उसको कहते है कि ऐसा करो भाई तुम गांव को gate लगा दो। तो बड़ा पत्‍थर का 2, 5, 10 लाख का gate लगवा देते हैं। उसको लगता है कि मैंने gate बनवा दिया तो बस गांव का काम हो गया। लेकिन दूसरे को लगता है कि मैं पेड़ लगाऊंगा। आप भी सोचिएं बैठे-बैठे कि सचमुच में जन-भागीदारी से जिसने पेड़ लगाएं हैं, CC road, enter होते ही आधे कि.मी., एक कि.मी. हरे-भरे वृक्षों की घटा के बीच से गांव जाता है तो वो दृश्‍य कैसा होता होगा? ये है leadership की quality कि हम किन चीजों को प्रधानता देते है। इस पर इस काम का प्रभाव होता है.. जिसमें आपको बजट का खर्च नहीं करना है, आपको बजट की चिंता नहीं करनी है। जो मिलने वाला है.. जैसे बताया गया कम से कम 15 लाख और ज्‍यादा से ज्‍यादा 1 करोड़ से भी ज्‍यादा।

लेकिन इसके अतिरिक्‍त बहुत पैसा गांव में आता है। आंगनवाड़ी चलती है, प्राथमिक स्‍कूल चलता है, PHC centre चलता है, बहुत सी चीजें चलती है, जिसका खर्चा तो सरकारी राह से अपनी व्‍यवस्‍था से आता है। इसमें आपको कोई लेना-देना नहीं होता है। क्‍या कभी एक सरपंच के नाते, गांव की पंचायत के नाते हमने इन चीजों पर ध्‍यान केन्द्रित किया है क्‍या? कि भई, मेरे गांव में एक भी बच्‍चा ऐसा नहीं होगा कि जो टीकाकरण में वंचित रह जाए। हम पंचायत के लोग जी-जान से जुटेंगे, गांव को जगाएंगे कि भई टीकाकरण है, सभी बच्‍चों का हुआ है कि नहीं हुआ, चलो देखो! अब इसमें कोई पैसे लगते है है क्‍या? बजट नहीं लगता है, leadership लगती है। एक समाज के प्रति कुछ कार्य करने के दायित्व का भाव लगता है।

हमारे गांव में स्‍कूल तो है, teacher है, सरकार बजट खर्च कर रही है, हमने कभी देखा क्‍या - कि भई हमारे teacher आते है कि नहीं? बच्‍चे स्‍कूल जाते है कि नहीं? समय पर स्‍कूल चलता है कि नहीं चलता? बच्‍चे खेलकूद में हिस्‍सा लेते है कि नहीं लेते? बच्‍चे library का उपयोग करते है कि नहीं करते? Computer दिया है तो चलता है कि नहीं चलता? ये हम एक पंचायत के नाते.. हमारे गांव के बच्‍चे पढ़-लिख करके आगे बढ़ें, आपको बजट खर्च नहीं करना है, न ही बजट की चिंता करनी है सिर्फ आपको गांव की चिंता करनी है, आने वाली पीढ़ी की चिंता करनी है।

हमारे यहां आशा worker हैं, आशा worker को कभी पूछा है कि आपका काम कैसा चल रहा है, कोई कठिनाई है क्या? हर गांव में भी सरकार है लेकिन वो बिखरा पड़ा हुआ है। क्‍या हम एक प्रयास कर सकते है क्‍या कि सप्‍ताह में एक दिन, एक घंटे के लिए, जितने भी सरकारी व्‍यक्ति हैं गांव में, उनको बिठाएंगे एक साथ और बैठ करके अपना गांव, अपना विकास.. उसके लिए क्‍या कर सकते हैं। बैठ करके चर्चा करेंगे तो शिक्षक कहेंगा कि मुझे ये करना है लेकिन हो नहीं रहा है, तो आंगनवाड़ी worker कहेगी कि हां-हां चलो मैं मदद कर देती हूं, आशा worker कहेंगी कि अच्‍छा कोई बात नहीं, मैं कल आपके लिए 2 घंटे लगा दूंगी.. अगर गांव में हम leadership ले करके team बना लें, सरकार के इतने लोग हमारे यहां होते है लेकिन हमें भी पता नहीं होता। सरकार के इतने लोग हमारे यहां रहते हैं लेकिन हमें भी पता नहीं होता है। Even बस का driver, conductor भी रहता होगा और बस चलाता होगा, वो भी तो एक सरकार का मुलाजिम है। Constable होता होगा, वो भी एक मुलाजिम है। पटवारी है, वो भी एक मुलाजिम है।

क्या कभी हमने ये सोचा है, सप्ताह में एक घंटा कम से कम हम सरकार के रूप में एक साथ बैठेंगे? सामूहिक रूप से अपने पंचायत के विकास की चर्चा करेंगे। आप देखिए, देखते ही देखते बदलाव शुरू हो जाएगा, Team बनना शुरू हो जाएगा। और मैं वो बातें नहीं बता रहूं जिसमें बजट एक समस्या है। लेकिन वरना हमारे देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि क्यों नहीं होता है, बजट नहीं है.. हकीकत वो नहीं है। बजट है लेकिन जो काम परिणाम नहीं देते हैं उसकी चिंता हमें ज्यादा करने की आवश्यकता है। हमारे गांव में कोई drop out होता है बच्चा, क्या हमें पीड़ा होती है क्या, हमारा खुद का बच्चा अगर स्कूल छोड़ दे तो हमें दुख होता है। अगर हम पंचायत के प्रधान हैं तो गांव का भी कोई बच्चा स्कूल छोड़ दे, हमें उतनी ही पीड़ा होनी चाहिए, पूरी पंचायत को दर्द होना चाहिए। अगर ये हम करते हैं, अगर ये हम करते हैं, मैं नहीं मानता हूं कि हमारे गांव में कोई अशिक्षित रहेगा। और कोई सरंपच ये तय करके कि मेरे कार्यकाल में पांच साल में एक भी बच्चा drop out नहीं होगा। अगर इतना भी कर ले तो मैं कहता हूं, उस सरपंच ने एक पीढ़ी की सेवा कर-करके जा रहा है। ऐसा मैं मानता हूं।

नरेगा का काम हर गांव में चलता है। क्या हम उसमें पानी के लिए प्राथमिकता दें? जितनी ताकत लगानी है, लगाएं लेकिन पानी का प्रबंधन करने के लिए ही नरेगा का उपयोग करें, तो क्या कभी पानी का संकट आएगा क्या? हम व्यवस्थाओं को विकसित कर सकते हैं। आवश्यकता ये है कि मिलकर के नेतृत्व दें। हमारे गांव में कुछ लोग तो होंगे जो सरकार में कभी न कभी मुलाजिम रहे हों। Teacher रहे हों, पटवारी रहे हों और retired हो गए हों। यानी सरकार का पेंशन लेते हों। सरकारी मुलाजिम होने के नाते, निवृत्त होने के बाद पेंशन लेते हों। किसी गांव में तीन होंगे, पांच होंगे, दस होंगे, पंद्रह होंगे। क्या महीने में एक बार इन retired लोगों की मिटिंग कर सकते हैं? उनका अनुभव क्योंकि वो खाली हैं, समय हैं उनके पास, अगर मान लीजिए गांव में 5 retired teacher हैं। उनको कहें कि देखिए भई अपने गांव में चार बच्चे ऐसे हैं, बहुत बेचारे पीछे रह गए, थोड़ा सा समय दीजिए, थोड़ा सा इन बेचारों को पढाइए ना। अगर वो retired हुआ होगा न तो भी उसके DNA में teaching पड़ा हुआ होगा। उसको कहोगे हां-हां चलिए मैं समझ लेता हूं। इन चार गरीब बच्चों को मैं पढ़ा दूंगा, मैं उनकी चिंता करूंगा। हम थोड़ा motivate करें लोगों को, हम नेतृत्व करें आप देखिए गांव हमारा ऐसा नहीं हो सकता क्‍या? अपना गांव.. और मैंने देखा जी, देश में मैंने कई गांव ऐसे देखे हैं कि जहां उस सरपंच की सक्रियता के कारण गांव में परिवर्तन आया है।

मैं जब मुख्यमंत्री था, एक घटना ने मुझे बहुत.. यानी मेरे मन को बहुत आंदोलित किया था। खेड़ा district में, जहां सरदार पटेल साहब का जन्म हुआ था। एक गांव के अंदर पंचायत प्रधान के नीचे women reservation था। Women reservation था तो गांव वालों ने तय किया कि प्रधान अगर women है तो सभी member women क्यों न बनाई जाए? और गांव ने तय किया कि कोई पुरुष चुनाव नहीं लड़ेगा। सब के सब पंचायत के member भी महिलाएं बनेंगी। Reservation तो one-third था लेकिन सबने तय किया गांव वालों ने। एक दिन उन्होंने मेरे से समय मांगा पंचायत की सभी महिला सदस्यों ने और पंचायत के प्रधान ने। मेरे लिए बड़ा surprise था कि ये गांव बड़ा कमाल है भाई, सारे पुरुषों ने अपने आप withdraw को कर लिया और महिलाओं के हाथ में कारोबार दे दिया। तो मेरा भी मन कर लिया कि चलो मिलूं तो वो सब मुझे कोई 17 member का वो पंचायत थी। तो वो मिलने आईं। और ये बात कोई 2005 या 2006 की है। तो उसमें सबसे ज्यादा जो पढ़ी-लिखी महिला थी प्रधान थी, वो पांचवी कक्षा तक पढ़ी हुई थी। यानी इतना पिछड़ा हुआ गांव था कोई ज्यादा पढ़े-लिखे हुए लोग नहीं थे। तो ऐसे ही मेरा मन कर गया, मैंने पूछा उनको, मैंने कहा अब पंचायत सभी महिलाओं के हाथ में है, आपको गांव का कारोबार चलाना है तो क्या करना है, आपकी योजना क्या है करनी की? उन्होंने जो जवाब दिया, मैं नहीं मानता हूं हिंदुस्तान की सरकार में कभी इस रूप में सोचा गया होगा। कम से कम मैं मुख्यमंत्री था, मैंने इस रूप में नहीं सोचा था। उस जवाब ने मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। ठेठ गांव की सामान्य महिलाएं थी।

मैंने उनसे पूछा कि अब पांच साल आपको कारोबार चलाना है तो क्या आपके मन में है? उस प्रधान ने जो कि पढ़ी-लिखी नहीं थी, उसने मुझे जवाब दिया। उसने मुझे कहा, “हम चाहते हैं कि हमारे गांव में कोई गरीब न रहे।“ अब देखिए क्या कल्पना है ये, क्या कभी हमारे देश में पंचायत ने, नगरपालिका ने, महानगरपालिका ने, मिल-बैठकर के तय किया कि हम हमारे गांव में उस प्रकार की योजनाएं चलाएंगे कि गरीब गांव में कोई न रहे। एक बार इतने बड़े level पर काम शुरू हो जाए, कितना बड़ा फर्क पड़ता है! क्या हम कभी पंचायत के प्रधान के नाते विचार कर सकते हैं कि भई कम से कम 5 परिवार, ज्यादा मैं नहीं कह रहा हूं, 5 परिवार पंचायत की रचना में कुछ काम ऐसा निकालेंगे, उनको फलों का पेड़ बोने के लिए दे देंगे, कुछ करेंगे लेकिन 5 को तो गरीबी से बाहर लाएंगे।

अगर हिंदुस्तान में एक गांव साल में 5 लोगों को गरीबी से बाहर लाता है, पूरे हिंदुस्तान में कितना बड़ा फर्क पड़ता है जी? क्या कुछ नहीं कर सकते, आप कभी अंदाज लगाइए। और ये सारी बातें मैं बताता हूं कि बजट के constraint वाले काम नहीं हैं - हमारी संकल्प शक्ति, हमारी कल्पकता, इसके ऊपर जुड़े हुए हैं। अगर इस पर हम बल दें तो हम सच्‍चे अर्थ में इस व्यवस्था को अपने गांव के विकास के लिए परिवर्तित कर सकते हैं।

हम तब तक गांव का विकास नहीं कर पाएंगे जब तक हम गांव के प्रति गौरव और सम्मान का भाव पैदा नहीं करते हैं। उस गांव में पैदा हुए, मतलब सम्मान होना चाहिए। आप देखिए जिस गांव में महात्मा गांधी का जन्म हुआ होगा, उस गांव का व्यक्ति कभी कहीं मिलेगा तो कहेगा, मैं उस गांव से हूं जहां महात्मा गांधी पैदा हुए थे। कहेगा कि नहीं कहेगा? हर किसी को रहता है, कि कोई ऐसी बात होती है, गांव का गर्व होता है उसको। क्या हमने कभी हमारे गांव में,के प्रति एक लगाव पैदा हो, गांव के प्रति गर्व पैदा हो, ऐसी कोई चीज करते हैं क्या? नहीं करते हैं। क्या गांव का जन्मदिन मनाया जा सकता है क्या? हो सकता है कि record पर नहीं होगा तो गांव तय करे कि किस दिन को जन्मदिन मनाया जाएगा। उस दिन गांव इकट्ठा हो और गांव के बाहर जो लोग रहने गए हो, शहरों में रोजी-रोटी कमाने के लिए, किसी ने बड़ी प्रगति की हो, कोई पढ़-लिख करके डॉक्टर बना हो, उस दिन सबको बुलाया जाए। एक दिन सब लोग, नए-पुराने सब साथ रहें। कुछ बालकों के कार्यक्रम हो जाएं, कुछ बड़ों के कार्यक्रम हो जाएं, senior citizen के कुछ कार्यक्रम हो जाएं, गांव में सबसे बड़ी उम्र वाले व्यक्ति का सम्मान हो जाए। और एक अपनेपन का भाव! जो गांव से बाहर गए होंगे, उनको भी लगेगा उस दिन कि चलो भई अब तो हम रोजी-रोटी कमा रहे हैं, बड़े शहर में रहे रहे हैं चलिए अगले साल इतना हमारी तरफ से गांव के लिए दान दे देंगे, हमारे गांव में ये विकास कर दो। आप देखिए जन-भागीदारी का ऐसा माहौल बनेगा, गांव का रूप-रंग बदल जाएगा।

कभी आपने सोचा है, हमारी आने वाली पीढ़ी को तैयार करना है तो.. मैं कई बार गांव को पूछता हूं, भई आपके गांव में सबसे वृद्ध-oldest, oldest tree कौन सा है, कौन सा वृक्ष है जो सबसे बूढ़ा होगा? गांव को पता नहीं है, क्यों? ध्यान ही नहीं है! क्या हम पंचायत के लोग तय कर सकते हैं कि चलो भई ये सबसे बड़ी आयु का वृक्ष कौन सा दिखता है, ये सबसे बड़ा है, स्कूल के बच्चों को ले जाइए कि देखो भई अपने गांव की सबसे बड़ी आयु का वृक्ष ये है, ये है सबसे बड़ा वो, 200 साल उम्र होगी उसकी, 100 साल होगी उसकी, 80 साल होगी उसकी, जो भी होगा। चलो भई उसका भी सम्मान करे, उसका भी गौरव करें। यही तो है जो गांव के विकास का सबसे बड़ा साक्ष्य है। He is a witness! हम किस प्रकार से अपने गांव के गौरव को जोड़ें, गांव के साथ अपने आप कैसे लगाव लोगों का पैदा करें? आप देखिए अपने आप बदलाव आना शुरू हो जाएगा। और इसलिए मैं आग्रह करता हूं कि आप नेतृत्व दीजिए, अनेक नई कल्पकताओं के साथ नेतृत्व दीजिए।

हमारे देश ने बहुत बड़ा निर्णय किया है। कभी-कभी पश्चिम के देशों से बातें होती हैं और जब कहते हैं कि भारत में महिलाओं के लिए पंचायती व्यवस्था में reservation है तो कईयों आश्चर्य होता है। हिंदुस्तान में political process में decision making process में महिलाओं को इतना बड़ा अधिकार दिया गया है कि विश्व के बहुत बड़े-बड़े देशों के लिए surprise होता है। लेकिन कभी-कभी हमारे यहां क्या होता है।.. एक पहले तो मैं सरकार से जुड़ा हुआ नहीं था, संगठन के काम में लगा रहता था तो देशभर में मेरा भ्रमण होता था। तो लोगों से मिलता था। मिलता था तो थोड़ा परिचय भी करता था, एक बार परिचय देकर मैंने कहा, आप कौन हैं? तो उसने कहा मैं so and so SP हूं। तो मैंने कहा SP हैं! और political meeting में कैसे आ गए? क्योंकि मैं... SP यानी Superintendent of Police.. ये ही मेरे दिमाग में था। क्योंकि SP यानी पुलिस – पुलिसवाला हो के ये meeting में कैसे आ गए? तो मैंने कहा SP... तो बोले नहीं-नहीं मैं सरकारी नहीं हूं तो मैंने बोला क्या हैं? तो बोले “मैं सरपंच पति हूं।“

अब कानून ने तो empower कर दिया लेकिन जो SP कारोबार चला रहे हैं भई... है ना? हकीकत है ना? अब कानून ने महिलाओं को अधिकार दिया है तो उनको मौका भी देना चाहिए। और मैं कहता हूं जी, वो बहुत अच्‍छा काम करेंगी आप विश्‍वास कीजिए, बहुत अच्‍छा काम करेंगी। सच्‍चे अर्थों में गांव में परिवर्तन होंगे। अभी आपने छत्‍तीसगढ़ का भाषण सुना। बिना हाथ में कागज़ लिए गांव में क्या काम किया है, उन्‍होंने बताया कि नहीं बताया? और पता है उनको कि सरपंच के नाते अपने गांव में कितने काम हैं, किन-किन कामों पर ध्‍यान देना चाहिए, सब चीज का पता है। ये सामर्थ्‍य है हमारी माताओं-बहनों में। इसलिए ये SP वाला जो culture है वो बंद होना चाहिए। उनको अवसर देना चाहिए, उनको काम करने के लिए प्रोत्‍साहित करना चाहिए। और हम अवसर देंगे तो वे परिणाम भी दिखाएंगे।

तो मैं आज पंचायती राज दिवस पर आप सबको हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। जो award winner हैं, उनसे आप बात करेंगे तो पता चलेगा कि उन्‍होंने अपने-अपने यहां बहुत नए-नए प्रयोग किए होंगे, जो आपको भी काम आ सकते हैं। लेकिन अगर गांव तय करे तो दुनिया देखने के लिए आए, ऐसा गांव बन सकता है जी। ये ताकत होती है गांव की, एक परिवार होता है, अपनापन होता है, सुख-दु:ख के साथी होते हैं।

उस भाव को फिर से हम जगाएं और गांवों को बहुत आगे बढ़ाएं, इसी एक अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्‍यवाद।

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मित्रांनो, जेव्हा आपण गंगा नदीतील डॉल्फिन वाचवतो, तेव्हा आपण केवळ एका प्रजातीचे रक्षण करत नाही, तर आपण गंगेच्या जैवविविधतेचे रक्षण करतो: पंतप्रधान मोदी
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माझ्या प्रिय देशवासीयांनो, नमस्कार

‘मन की बात’ मध्ये पुन्हा एकदा तुमच्याशी संवाद साधताना मला अतिशय आनंद होत आहे. देशाच्या वेगवेगळ्या भागांत आपल्या देशातले लोक देशहितासाठी, समाजहितासाठी अशा काही अद्भूत गोष्टी करत आहेत की, जेव्हा त्यांच्याबद्दल आपण ऐकतो तेव्हा आपल्याला एक नवीन प्रेरणा मिळते. आज कार्यक्रमाची सुरुवात मी ऍथलेटिक्समधील  देशाच्या अशाच एका कामगिरीने करणार आहे. काही दिवसांपूर्वीच झारखंडच्या रांची येथे नॅशनल सिनियर ऍथलेटिक्स फेडरेशन स्पर्धा झाली. यामध्ये देशभरातून आलेल्या जवळजवळ 800 खेळाडूंनी भाग घेतला होता. यादरम्यान चार वेगवेगळ्या क्रीडाप्रकारांमध्ये चार राष्ट्रीय विक्रम मोडीत निघाले. गुरिंदरवीर सिंह, विशाल टीके, तेजस्विन शंकर, देव मीणा आणि कुलदीप कुमार. या खेळाडूंनी वेगवेगळ्या श्रेणींमध्ये नवीन विक्रम प्रस्थापित केले. मी सर्वात आधी या सर्वांचे खूप खूप अभिनंदन करतो.

मित्रांनो,

देशभरात ज्या एका स्पर्धेची खूपच चर्चा होत आहे, ती म्हणजे – 100 meter Race, शंभर मीटरची धावण्याची शर्यत. अवघ्या दोन दिवसांत पुरुषांच्या 100 मीटर धावण्याच्या शर्यतीचा राष्ट्रीय विक्रम तीन वेळा मोडीत निघाला. ज्या दोन खेळाडूंनी ही किमया करून दाखवली आहे ते आहेत - गुरिंदरवीर सिंह आणि अनिमेष कुजूर. मी असा विचार केला की या वेळी ‘मन की बात’ मध्ये या दोन्ही खेळाडूंशी संवाद साधावा.

(दूरध्वनी)

पंतप्रधान: अनिमेष जी नमस्कार. गुरिंदरवीर तुम्हालाही नमस्कार, सत श्री अकाल.

अनिमेष, गुरिंदरवीर: नमस्कार सर, नमस्कार सर.

पंतप्रधान: वा भाऊ, तुम्ही तर खूप मोठे यश संपादन केले आहे. तुमच्या जोडीनेही मोठी कमाल केली आहे. आपण संगीतात तर जुगलबंदी पाहिली होती, पण आव्हानांमध्ये अशी जुगलबंदी आता पाहायला मिळत आहे की, एकानं आव्हान द्यावं आणि दुसऱ्यानं ते आव्हान स्वीकारावं. मग तिसऱ्यांदा पुन्हा तसंच करावं. तुमचा हा विषय खूपच रंजक राहिला आहे. ‘मन की बात’ च्या श्रोत्यांना तुमच्याबद्दल माहिती मिळावी, तुम्ही जे पराक्रम गाजवले आहेत ते त्यांना समजावेत, अशी माझी इच्छा आहे.

अनिमेष जी: नमस्ते सर, माझे नाव अनिमेष कुजूर. मी 200 मीटर आणि 400 मीटरचा नॅशनल रेकॉर्ड होल्डर( राष्ट्रीय विक्रमवीर) आहे आणि मी छत्तीसगडचा रहिवासी आहे सर. आणि सध्या मी ओदिशाकडून खेळतो. मी गेल्या वर्षी आशियायी पदक आणि जागतिक विद्यापीठ स्पर्धांमध्ये पदक मिळवलं आहे आणि  2021 मध्ये माझं शालेय शिक्षण पूर्ण झाल्यावर मी ऍथलेटिक्सला सुरुवात केली. मी सैनिक स्कूल अंबिकापूरमधून उत्तीर्ण झालो आहे, आणि मी आधी फूटबॉल खेळायचो. कोविडच्या काळात माझे आई-वडील मला थोडीफार मोकळीक द्यायचे की तू बाहेर जाऊन धाव किंवा खेळ. मग जेव्हा कोविड संपू लागला, तेव्हा माझ्या फूटबॉल संघातल्या मित्रांनी मला सांगितलं की राज्यस्तरीय स्पर्धा होणार आहे, तू जाऊन त्यात भाग घे. मी त्यात भाग घेतला आणि मला हे माहीत नव्हतं की तिथे राष्ट्रीय स्तराच्या खेळाडूंची निवड होणार आहे. मी तिथून नॅशनलसाठी निवडला गेलो आणि आज मी आंतरराष्ट्रीय स्तरावर भारताचं प्रतिनिधित्व करत आहे.

पंतप्रधान: आणि गुरिंदरवीर जी, तुम्ही काय सांगाल?

गुरिंदरवीर: नमस्ते सर, माझे नाव गुरिंदरवीर आहे आणि मी भारतीय नौदलात  पेटी ऑफिसर(Petty Officer) आहे. मी भारताचा सर्वात वेगवान धावपटू आहे आणि नुकताच मी 100 मीटरमध्ये 10.09 सेकंदांचा राष्ट्रीय विक्रम केला आहे. 10.1 सेकंदांच्या टप्प्याच्या खाली येत या वेळेपेक्षा कमी वेळेत धावणारा मी पहिला भारतीय आहे. ट्रॅकवर आणि गणवेशातही आपल्या देशाची सेवा करण्याचा मी प्रयत्न करत आहे. माझे वडील आणि आजोबा दोघेही खेळाडू होते, त्यामुळे आपल्या भारताची एक संस्कृती आहे की ज्यावेळी दिवाळी किंवा नवीन वर्षासारखा कोणताही सण असतो, तेव्हा आपण आपलं घर स्वच्छ करतो. त्या वेळी मी माझ्या वडिलांच्या ट्रॉफी  आणि पदकं स्वच्छ करायचो, हे काम मला खूप आवडायचं आणि मला खूप आनंद व्हायचा. मग जेव्हा मी एखादी ट्रॉफी स्वच्छ करायचो, तेव्हा मी विचारायचो की ही ट्रॉफी कुठे जिंकली, हे पदक कुठे जिंकलं, हा फोटो कधीचा आहे; मग ते मला त्यांची गोष्ट सांगायचे की मी या ठिकाणी खेळायला गेलो होतो, मी हे राष्ट्रीय पदक जिंकलं, मी माझ्या संघाला यामध्ये जिंकवून दिले. मग मीसुद्धा त्यांना म्हणायचो की मलाही कोणता तरी खेळ खेळायचा आहे. ते सकाळी धावायला जायचे, तेव्हा मी त्यांना सांगू लागलो की मलाही तुमच्यासोबत घेऊन जात जा. मग ते मला सोबत घेऊन जाऊ लागले आणि त्यांनी आपल्या क्रीडा कारकीर्दीत जे काही शिक्षण घेतले होते, ते मला शिकवू लागले. त्यामुळे मला त्याची आवड निर्माण होऊ लागली. मी उसेन बोल्टचा जागतिक विक्रम मोडीत निघताना पाहिला. मग अशीच एक मजेशीर गोष्ट आहे. मी एकदा टीव्ही पाहत होतो, तर माझ्या मम्मीने(आईने) टीव्ही बंद केला की, "बेटा, आता अभ्यासाची वेळ झाली आहे, तू अभ्यास कर." तेव्हा मी म्हणालो की ठीक आहे, तुम्ही मला टीव्ही पाहू देत नाही ना, एक दिवस असा येईल की तुम्ही मला टीव्हीवर शोधाल की "बघा, तो गुरिंदर धावत आहे." त्यामुळे जेव्हा माझी आई मला टीव्हीवर धावताना पाहते, तेव्हा मलाही खूप आनंद होतो.

पंतप्रधान: वाह वाह वाह! खूपच छान गोष्ट आहे तुमची.

गुरिंदर वीर: हो सर. मध्यमवर्गीय कुटुंब  आहे सर, नंतर माझे वडील, ते पण व्हॉलीबॉल खेळायचे. कौटुंबिक अडचणींमुळे त्यांनी आपले खेळ सोडून दिले. त्यांचे जे स्वप्न पूर्ण करायचे राहिले होते, ते स्वप्न त्यांनी माझ्यामध्ये पाहिले की माझा मुलगा ते स्वप्न पूर्ण करेल. मग मी त्यांच्याशी बोलायचो, तेव्हा ऐकायचो की मिल्खा सिंग इतकी मेहनत करायचे. मी त्यांना सांगायचो की मी पण एक दिवस तुमचे स्वप्न पूर्ण करेन. तेव्हा ते म्हणायचे की स्वप्न इतक्या सहज पूर्ण होत नाही, त्यासाठी खूप कठोर परिश्रम करावे लागतात. मेहनत करावी लागते. मिल्खा सिंगजी रक्ताच्या उलट्या करायचे, उन्हात धावायचे. दिवस-दिवसभर प्रशिक्षण घ्यायचे, तर त्या गोष्टी मला प्रेरित करायच्या. माझे वडील मला प्रेरित करायचे की मी धावेन तर आपल्या देशासाठी, देशासाठी मेडल आणेन, जिंकेन. आणि हे पण होते की जेव्हा मी 100 मीटर हा क्रीडाप्रकार निवडला, त्यावेळी सगळे मला सांगायचे की बाबा रे 100 मीटर नको घेऊ, 100 मीटर हा भारतीयांचा क्रीडाप्रकार नाही आहे. भारतीयांचे शरीर 100 मीटरसाठी बनलेलेच नाही आहे. तेव्हा मी आणि माझे वडील नेहमी सांगायचो की गुरिंदर, आता आपण हे निवडलेच आहे, तर आपण यातून मागे हटायचे नाही. जे आपल्याला म्हणतात की आपण हे करू शकत नाही, आपण त्यांना ते करून दाखवू. आणि तू करून दाखवशील, माझा तुझ्यावर विश्वास आहे. तर तो विश्वास, जेव्हा माझ्या वडिलांनी माझ्यावर दाखवला, तेव्हा मी त्या विश्वासाला आपली हिंमत बनवून पुढे गेलो आणि आज प्रत्येक भारतीय म्हणतो की भारतीयांनी स्प्रिंट करावी. 

पंतप्रधान: बघा, तुम्ही दोघांनी खूप मोठी कमाल केली आहे, आणि अवघ्या 2 दिवसांच्या आत तुम्ही दोघांनी 3 राष्ट्रीय विक्रम मोडले आहेत. 100 मीटर शर्यतीत धावणे, जसे गुरिंदरवीरने सांगितले की लोक म्हणतात की भारताच्या लोकांचे शरीर तर या प्रकारासाठी बनलेलेच नाही. इतके कठीण असूनही तुम्ही हे काम केले, तर मला या दोन्ही गोष्टी तुमच्याकडून जाणून घ्यायला आवडतील, आणि 'मन की बात' च्या श्रोत्यांनाही ऐकायची इच्छा असेल की ती कोणती भावना होती, कोणती जिद्द होती, काय विचार केला होता आणि तुम्ही हे कसे करत होता? हे किती कठीण असते? 

गुरिंदरवीर: जी सर, मी गुरिंदर, सर सुरुवातीला खूप संघर्ष होता, मनात बऱ्याचदा संभ्रम देखील निर्माण झाला की मी जे करत आहे ते योग्य आहे का, मी योग्य निवड केली आहे का, कारण प्रत्येक वेळी तुम्ही जिंकत नाही, कधी कधी तुम्ही शिकता. जेव्हा मी हरायचो, जेव्हा माझी कामगिरी चांगली व्हायची नाही, किंवा एखादी दुखापत व्हायची, तेव्हा माझ्या घरचे मला पाठिंबा द्यायचे की काही हरकत नाही, एक दिवस वाईट गेला किंवा एक वर्ष वाईट गेले तर त्याने आयुष्य वाया जात नाही. स्वप्ने पाहणे सोडू नये. तसच माझ्या प्रशिक्षकांनी देखील मला हे शिकवलं की जर तू हे नाही केलंस, तर दुसरं कोणीही करू शकणार नाही. अशा प्रकारे जेव्हा आपला समुदाय आणि आपल्या आसपासचे लोक आपल्याला प्रोत्साहित करतात, तेव्हा आपल्याला मिळालेली ती प्रेरणा कधीच कमी होत नाही.

पंतप्रधान : अनिमेष जी… 

अनिमेष : सर, मला तर सगळे लोक बोलायचे की जेव्हा मी 2021 मध्ये ऍथलेटिक्स सुरू केले, तेव्हा मला बोलायचे की बघ हे नवीन क्षेत्र  आहे, तू करू शकशील की नाही. तेव्हा मी म्हणालो की आता मी या क्षेत्रात उतरलो आहे तर करणारच. माझे पप्पा पण नेहमी मला बोलायचे की तू या क्षेत्रात उतरला आहेस तर कधीही मागे वळून बघू नकोस, कारण विचार तर सगळेच करतात की हे करायचे आहे, ते करायचे आहे, पण प्रत्यक्षात काही तरी करून खूप कमी लोक दाखवतात. तू फक्त या क्षेत्रात उतरला आहेस तर यावर ठाम राहा, यात पुढे वाढायचे आहे. तुला सर्व सुविधा, प्रत्येक गोष्टीत आम्ही पाठबळ देऊ; कुटुंबाचे पाठबळ, आर्थिक पाठबळ, सर्व गोष्टी आम्ही करू, बस तू मेहनत कर आणि भारताला दाखवून दे की भारतीय देखील धावू शकतात. कारण मलाही लोक बोलायचे की भारतीयांची जनुके अशी नाहीत की ते सब 10 (Sub 10) किंवा सब 10 पॉइंट1 (Sub 10.1) च्या आत धावू शकतील किंवा कोणी स्प्रिंट करू शकेल. पण आता आम्हा दोघांनी हे सिद्ध  केले आहे की भारतीय देखील हे करू शकतात. आमच्यासाठी असे काही फार अवघड नाहीये, आम्ही देखील सर्व काही करू शकतो. तर सर, या सर्व गोष्टी मला खूप प्रेरित  करतात आणि जसजसे आम्ही प्रशिक्षण घेत आहोत, आम्ही आमचे टायमिंग अजून मोडीत काढत आहोत आणि बाकी भारतीयांनाही ही गोष्ट दिसत आहे की भारतीय देखील करू शकतात आणि आम्ही आणखी चांगली कामगिरी करू सर आता. आणि आता आम्हा दोघांची निवड राष्ट्रकुल क्रीडा स्पर्धांसाठी (कॉमनवेल्थ गेम्ससाठी)  देखील झाली आहे, तर तिथे आगामी स्पर्धेत  आम्ही अजून चांगली कामगिरी करू.

पंतप्रधान: बरं, हे बघा, माझ्या मनातही एक कुतूहल आहे आणि लोकांनाही असेल. मी ऐकलं आहे की तुम्ही दोघे खूप चांगले मित्रही आहात. तुम्ही दोघांनी काही ठरवून ठेवलं होतं का की तू माझा विक्रम मोडलास तर मी तुझा विक्रम मोडेन? आधी अनिमेष, तुम्ही सांगा.

अनिमेष: सर, आधीचा 10 पूर्णांक 18 शतांशाचा जो विक्रम होता तो माझाच होता, आणि नंतर तो गुरिंदरवीर भैय्यांनी सेमीफायनलमध्ये 10 पूर्णांक 17 शंताश करून तो मोडला. मी पुन्हा दुसऱ्या सेमीफायनमध्ये 10 पूर्णांक 15 करून तो विक्रम मोडीत काढला. मग त्या वेळी जेव्हा माझी सेमीफायनल झाली, तेव्हा आम्ही दोघेही खूप खूष होतो की, हा बुवा ठीक आहे, आज विक्रम मोडीत निघाला आणि चला आपण दोघांनी मिळून तोडला असं. कारण त्या वेळी स्पर्धेत एकमेकांसोबत एक प्रतिस्पर्धा तर असतेच, पण आम्ही आधीपासूनच हे ठरवून ठेवलं होतं. यापूर्वी आम्ही सौदी अरेबियालाही स्पर्धेसाठी गेलो होतो, तिथेही आम्ही दोघे रूममेट्स  होतो. तिथेही आम्ही दोघे बोलायचो की भारताच्या स्प्रिंटिंगला पुढे घेऊन जायचं आहे आणि ती गोष्ट आमच्याच हातात आहे, आम्ही जे करू तेच इतरांना प्रेरित  करेल.


पंतप्रधान: गुरिंदरवीर तुम्ही काय सांगाल ?

गुरिंदरवीर : आम्ही दोघांनी ठरवलं होतं की आम्ही दोघे चांगलं धावू. सर, कधीही एकमेकांना गरज भासली तर आम्ही एकमेकांच्या पाठीशी उभे राहतो. जसं की आता विक्रम करण्यापूर्वी, जेव्हा मी विक्रम केला आणि नंतर अनिमेषने केला, तेव्हा आम्ही जेव्हा वॉर्म-अप करत होतो, तेव्हा मी अनिमेषला सांगत होतो की, 'अनिमेष, तो ब्लॉक  योग्य आहे, तिथे जाऊन बस, तिथे स्ट्राईड करून घे, आपण वॉर्म-अप इथे करू, इथे वॉर्म-अप चांगलं होईल.' आम्ही एकमेकांना मदत करतो. एकमेकांना मदत केली की समोरचाही कामगिरीत सुधारणा करतो आणि आपणही प्रगती करतो. मैत्रीही हवी, पण सर, जोपर्यंत आम्ही मैदानाच्या बाहेर आहोत, स्पर्धेच्या बाहेर आहोत, तोपर्यंत आम्ही मित्र आहोत. जेव्हा आम्ही मैदानात जातो, तेव्हा आम्ही एकमेकांचे प्रतिस्पर्धी बनतो. मग मनात हे असतं की मी याच्यापेक्षा वेगात धावेन, मी याच्यापेक्षा वेगाने धावेन. 

पंतप्रधान: हे बघा, तुम्ही लोकांनी जी स्पर्धा केली आहे ना, ती देशाचा मान वाढवण्यासाठी केली आहे. देशाला भविष्यात या स्थानावर पोहोचवण्यासाठी केली आहे आणि एका सकारात्मक भावनेने  केली आहे. मला असं वाटतं की तुमची ही जी खिलाडूवृत्ती आहे—खेळायचंही आहे, एकमेकांना आव्हानही द्यायचं आहे, मग पुढे जाण्यासाठी प्रयत्न करायचा आहे आणि पुन्हा पुढे जाण्यासाठी एकमेकांना मदत करायची आहे—हे अद्भुत काम तुम्ही लोकांनी केलं आहे. माझ्याकडून तुम्हा दोघांचं खूप खूप अभिनंदन आणि खूप खूप शुभेच्छा! तुम्ही देशाचं नाव नक्कीच उज्ज्वल कराल, याचा मला पूर्ण विश्वास आहे. तुम्ही अशीच मेहनत करत राहा, खूप प्रगती होईल. माझ्या खूप खूप शुभेच्छा.

गुरिंदरवीर / अनिमेष: आभारी आहे सर, तुमचे खूप खूप धन्यवाद.

पंतप्रधान: खूप खूप धन्यवाद.

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प्रिय देशवासियांनो, 
सध्या देशातल्या बहुतांश भागात उष्णता वाढली आहे. कडक ऊन, गरम हवा, अशा वातावरणात स्वत:ची काळजी घेणं महत्त्वाचं आहे. सतत पाणी पीत रहा. ऊन्हात बाहेर पडणं गरजेचंच असेल, तर काळजी घेऊन बाहेर पडा. या संदर्भात सरकारच्या विवध विभागांनी जारी केलेल्या मार्गदर्शक सुचनांचं  पालन करा. ते विसरू नका. 

मित्रांनो,

आपल्या देशात उष्णतेशी लढण्याचा उपाय बहुतेकवेळा आपल्या स्वयंपाकघरातही सापडतो. जसजशी उष्णता वाढत जाते,तसतशी स्वयंपाकघरातली चव आणि जेवणाचे प्रकारही बदलत जातात. काही ठिकाणी माठातलं पाणी पिण्याचं प्रमाण वाढते, तर काही ठिकाणी दह्याच्या सेवनाकडे कल वाढतो. काही ठिकाणी कच्च्या कैऱ्या उकळल्या जातात आणि देशी पेय तयार केली जातात. देशी पेय सर्वांनाच परिचित आहेत. जर तुम्ही उत्तर भारतात गेलात तर कच्च्या कैऱ्यांपासून तयार केलेल्या पन्ह्यांचा स्वाद चाखता येईल. उष्णतेपासून आराम आणि कच्च्या कैऱ्यांचा स्वादही.पंजाब मध्ये गेलात तर, मोठ्या ग्लासातून दिली जाणारी मधूर लस्सी, आणि गुजरात, राजस्थान मध्ये गेलात, तर थंडगार ताक प्रत्येक जेवणाचे सोबती ठरतो. आणि इतकेच नाही तर, बिहार, झारखंड आणि पूर्व उत्तर प्रदेशातील सातुच्या पिठापासून तयार केलेलं सरबत, तर पोटभरण्याचे आणि ऊर्जा देणारे मुख्य स्रोत आहे. कोकण आणि गोव्यात मिळणारे स्वादीष्ट कोकम सरबत आणि सोलकढी. दक्षिण भारतातले प्रसिद्ध पानकम, नीर मोर, संबारम आणि ओडिशामधले बेलपना ही केवळ पेये नाहीत, तर ती भारताच्या विविध प्रदेशांच्या परंपरांचा एक एक अविभाज्य भाग आहेत. आणि त्यातून 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' ही भावनाही प्रतिबिंबित होते. आणि यामध्येच एक भारत श्रेष्ठ भारताच्या भावना प्रतिबिंबित होतात. आणि एक गोष्ट लक्षात ठेवा, यातल्या बहुतांश वस्तू आपल्या घरात आणि शेतातूनच येतात. कसलाच गाजावाजा नाही, पण पिढ्यांपिढ्याचा अनुभव त्यात एकवटलेला आहे. आपणही उन्हाळ्यात घरगुती पेयांचा मोठ्या प्रमाणात आनंद लुटा. 

मित्रांनो, 
उन्हाळा सुरू झाला की प्रत्येक घरात चर्चेचा एक नवीन विषय सुरू होतो आणि तो म्हणजे आंबा. आंबा हा एक सर्वसामान्य चर्चेचा विषय आहे, भारतात असे क्वचितच एखादे घर असेल, जिथे उन्हाळ्यात आंब्यावर चर्चा होत नाही. प्रत्येक प्रदेशाचा स्वतःचा आंबा, त्याची स्वतःची चव, त्याचा स्वतःचा सुगंध असतो. महाराष्ट्र आणि कोकणचा हापूस, अल्फान्सो, गुजरातचा केसर, हा तर आमरसचा जीव आहे, उत्तर प्रदेशचा दशहरी आणि माझ्या काशीचा लंगडा. तसे, लंगडा आंब्यामध्ये एक विशेष गोष्ट आहे - पिकल्यानंतरही त्याचा रंग अनेकदा हिरवाच राहतो. बिहारचा जर्दाळू, अगदी लांबूनच त्याच्या सुगंधामुळे तो ओळखता येतो. चौसा, मालदा प्रत्येक नावानेच लोकांच्या आठवणी जोडलेल्या आहेत. दक्षिण भारतात गेलात तर बंगनपल्ली, तोतापुरी, नीलम, मलगोवा, बंगालचा हिमसागर, ओदिशा आणि आंध्र प्रदेशचा सुवर्णरेखा, म्हणजेचा प्रदेशानुरुप त्याचं नाव, स्वरुप, रंग आणि चव बदलते. आणि मित्रांनो आंब्याचा हा प्रवास आता गावाखेड्यातून जागतिक बाजारात पोहोचला आहे. आज मन की बातच्या माध्यमातून आंब्याचे उत्पादन करणाऱ्या माझ्या शेतकरी बंधू – भगिनिंची प्रशंसा करणार. देशाच्या कृषी अर्थव्यवस्थेसाठी तुम्ही सर्वसाधारण नाही, तर विशेष आहात.

मित्रांनो, उन्हाळ्याच्या दिवसांमध्ये शाळांना सहसा सुट्टी असते, पण मी तुम्हाला अशा एका वर्गाबद्दल सांगणार आहे, ज्यात तुम्हाला प्रवेश घ्यायला नक्कीच आवडेल. मित्रांनो, अशा एका शाळेची कल्पना करा जिथे लहान मुले, तरुण आणि वृद्ध एकत्र शिकतात, जिथे कोणतेही शुल्क नाही, मोठ्या इमारती नाहीत, वर्गखोल्या नाहीत आणि सर्वात मनोरंजक गोष्ट म्हणजे, वर्ग चक्क नदीत भरतात.

मित्रांनो, 

ही केवळ एक गोष्ट नाही. हा एक प्रामाणिक प्रयत्न आहे. केरळमधील अलुवा येथे साजी वलाशेरिल असाच एक जलतरण क्लब चालवतात. आतापर्यंत येथे 15 हजारांहून अधिक लोक पोहायला शिकले आहेत. साजींनी दिव्यांग मुलांनाही पोहायला शिकवले आहे. या प्रयत्नांमागे एक खोल दुःख दडलेले आहे. काही वर्षांपूर्वी, एका बोटीच्या अपघातात अनेक विद्यार्थ्यांचा मृत्यू झाला. त्या घटनेने साजींना आतून हादरवून सोडले. त्यांना वाटले की, जर मुलांना पोहायला आले असते, तर कदाचित अनेक जीव वाचवता आले असते—आणि येथूनच त्यांच्या मोहिमेची सुरुवात झाली.

मित्रांनो, 

लोकांची सेवा करण्यासाठी प्रचंड संसाधनांची गरज नसते—त्यासाठी फक्त एक चांगला हेतू आणि सातत्यपूर्ण प्रयत्न पुरेसे असतात. या गोष्टींनी हजारो लोकांचे जीवन बदलता येते. साजी वलाशेरील यांचे जीवन आपल्याला हा मोठा धडा शिकवते.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो, 

अलीकडेच मला युरोपमधल्या नेदरलँड्सला भेट देण्याची संधी मिळाली. मी तिथे अनेक बैठकींना उपस्थित राहिलो. यादरम्यान एक असा क्षण आला, ज्याने प्रत्येक भारतीयाला अभिमानाने भारून टाकले. नेदरलँड्समध्ये आयोजित एका विशेष समारंभात, चोला काळातील प्राचीन ताम्रपट भारताला परत करण्यात आले. त्या कार्यक्रमात नेदरलँड्सचे पंतप्रधानही उपस्थित होते. मला या ताम्रपटांविषयी भारत आणि परदेशातून सतत संदेश येत आहेत. लोक आनंद आणि अभिमान व्यक्त करत आहेत. जगभरातल्या तमिळ समाजातही याबद्दल विशेष उत्साह आहे.

मित्रांनो, 

या ताम्रपटांबद्दल बरीच उत्सुकता आहे. म्हणून आज मी तुम्हाला त्याबद्दल काही माहिती देऊ इच्छितो. यामध्ये २१ मोठे आणि तीन छोटे ताम्रपट समाविष्ट आहेत. ते प्रामुख्याने राजा राजेंद्र चोल प्रथम यांनी त्यांचे वडील, राजा राजाराजा चोल यांनी दिलेले वचन पूर्ण करण्याशी संबंधित आहेत. त्यांमध्ये आनाईमंगलम गाव एका बौद्ध मठाला दान केल्याचा उल्लेख आहे.

चोल साम्राज्याच्या समृद्ध इतिहासाचा आणि संस्कृतीचा आम्हा सर्वांना खूप अभिमान आहे. मित्रांनो, आमचे सरकार भारताच्या या अमूल्य वारसा स्थळांचे जतन करण्यासाठी सातत्याने प्रयत्न करत आहे. याच संदर्भात, 'ज्ञान भारतम अभियाना'अंतर्गत छत्तीसगडमधील मल्हार इथे एक महत्त्वाचा शोध लागला आहे. इथे तीन दुर्मिळ ताम्रपट सापडले आहेत. हे शिलालेख पांडुवंशी राजवंशातील महर्षी बालार्जुन यांच्या कारकिर्दीतील असल्याचे मानले जाते. तज्ञांच्या मते हे शिलालेख सहाव्या आणि सातव्या शतकातील आहेत, म्हणजेच चौदाशे ते पंधराशे वर्षे जुने असलेले हे ताम्रपट प्राचीन ब्राह्मी लिपी आणि पाली भाषेत लिहिलेले आहेत. त्यांतून त्या काळातले शासन, धर्म आणि संस्कृतीबद्दल महत्त्वाची माहिती मिळते.

मित्रांनो,
 
आम्हा भारतीयांना खगोलशास्त्राबद्दल नेहमीच एक विशेष आकर्षण राहिले आहे. आपल्या देशात अनेक शतकं जुन्या वेधशाळा आजही अस्तित्वात आहेत. इथे आश्चर्यकारक गणितीय शोध लागले आहेत. नौकानयन असो, पंचांग असो किंवा आपले सण असोत, या सर्वांचा संबंध आकाश आणि ताऱ्यांशी राहिला आहे. इथे खगोलशास्त्राने प्रत्येक पिढीमध्ये कुतूहल निर्माण केले आहे. त्याने संशोधनाला प्रेरणा दिली आहे आणि आजची तरुण पिढीसुद्धा त्याबद्दल प्रचंड उत्साह दाखवते. तुमच्या लक्षात आलंच असेल की आजकाल देशभरात खगोलशास्त्र क्लब अधिकाधिक लोकप्रिय होत आहेत. त्यांचे उपक्रम मोठ्या शहरांपासून ते लहान गावांपर्यंत, शाळांपासून ते उद्यानांपर्यंत सर्वत्र दिसतात. मला बंगळूरु खगोलशास्त्रीय संस्थेबद्दल माहिती मिळाली, जिथे निरीक्षण सत्रे आयोजित केली जातात. या संस्थेने ग्रामीण भागात खगोलशास्त्र लोकप्रिय करण्यासाठी एक मोहीमही सुरू केली आहे. ‘खगोल मंडळ' नावाच्या एका चमूने एक अतिशय नाविन्यपूर्ण 30 तासांचा अभ्यासक्रम सुरू केला आहे.

मित्रांनो, रात्री ताऱ्यांचे दर्शन घेणे हा स्वतःच एक अद्भुत अनुभव आहे. 'ॲस्ट्रो केरळ' नावाची एक संस्था रात्रीच्या निरीक्षणासाठी शिबिरे आणि कार्यशाळा आयोजित करते. तिथे तरुण मुले दुर्बिणी बनवायला आणि ताऱ्यांचे नकाशे वापरायला शिकतात. राजकोटच्या 'बिग बँग ॲस्ट्रॉनॉमी क्लब'ने गीरच्या जंगलांपासून ते कच्छच्या रणापर्यंत अनेक खगोलशास्त्रीय कार्यक्रमांचे आयोजन केले आहे. ज्योतिर्विद्या परिसंघ ही खगोलशास्त्राच्या सर्वात जुन्या संस्थांपैकी एक आहे. इथे निरीक्षणाच्या सुविधा, तसेच एक ग्रंथालय आणि एक दुर्बिण ग्रंथालय उपलब्ध आहे. मला आयझॅकचाही उल्लेख करायचा आहे. हे विद्यार्थ्यांच्या नेतृत्वाखालील एक देशव्यापी नेटवर्क आहे, जे खगोलशास्त्र आणि खगोलभौतिकशास्त्र क्लबना जोडते.

मित्रांनो, 

आपला  छंद जोपासण्यासाठी वेळ काढणे आणि सतत काहीतरी नवीन शिकणे अत्यंत महत्त्वाचे आहे. मी तरुणांना आग्रह करतो की, त्यांनी या सुट्ट्यांमध्ये खगोलशास्त्र क्लबमध्ये सामील व्हावे आणि तारांगणाला भेट द्यावी.


मित्रांनो, 

टीव्हीवर 'मन की बात' कार्यक्रम पाहणाऱ्यांना मी सांगू इच्छितो की, तुम्ही हा व्हिडिओ नक्की पाहा. हल्ली या व्हिडिओची खूप चर्चा होत आहे. यामध्ये काही लोक मोठ्या संयमाने आणि काळजीपूर्वक गंगेतल्या एका डॉल्फिनला वाचवण्याचा प्रयत्न करत आहेत. तुम्हाला हे जाणून आश्चर्य वाटेल की, या संपूर्ण प्रयत्नाला अंदाजे 13 तास लागले आणि अखेरीस त्या डॉल्फिनला वाचवण्यात आले.
          

मित्रांनो, यात भारताच्या पहिल्या गंगा डॉल्फिन बचाव रुग्णवाहिकेने महत्त्वाची भूमिका बजावली. ही घटना उत्तर प्रदेशात घडली. तिथल्या एका कालव्यात एक गंगा डॉल्फिन अडकला होता. त्यावेळी, 'नमामि गंगे अभियान' अंतर्गत तयार करण्यात आलेल्या या रुग्णवाहिकेने त्याला आशेचा किरण म्हणून घरी आणले. त्यानंतर त्याची काळजीपूर्वक सुटका करण्यात आली. त्याची तपासणी करून, त्याच्यावर उपचार करण्यात आले आणि मग त्याला सुरक्षितपणे राप्ती नदीत सोडण्यात आले. एक प्रकारे, एक जीव घरी परतला.
       
मित्रांनो, 

ही डॉल्फिन बचाव रुग्णवाहिका खूप खास आहे. तिची रचना एका फिरत्या रुग्णालयाप्रमाणे करण्यात आली आहे. यामध्ये डॉल्फिनना सुरक्षित ठेवण्याची व्यवस्था आहे. यामध्ये ऑक्सिजनची सोय, विशेष स्ट्रेचर्स आणि बचाव साहित्य आहे. याचा अर्थ असा की, जर एखादा डॉल्फिन जखमी झाला, कालव्यात अडकला किंवा नदीपासून दुरावला, तर त्याला तात्काळ मदत केली जाऊ शकते.

मित्रांनो, 
जेव्हा आपण गंगा डॉल्फिनला वाचवतो, तेव्हा आपण केवळ एक प्रजातीच वाचवत नाही, तर आपण गंगेची जैवविविधता वाचवतो. आपण नदीची संपूर्ण जीवनप्रणाली वाचवतो आणि त्याचबरोबर आपल्या भावी पिढ्यांसाठी निसर्गाचा एक अमूल्य वारसाही वाचवतो.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो, 

तुमच्यापैकी अनेकांच्या आठवणी नदी, तलाव किंवा विहिरीच्या पाण्याशी निगडित असतील. काहींना तलावात पोहल्याचं आठवत असेल, काहींना तलावाच्या काठावर मित्रांसोबत खेळल्याचं आठवत असेल, तर काहींना त्या चिखलाचा वास आठवत असेल. अशा बालपणीच्या आठवणी आयुष्यभर मनात राहतात.

मित्रांनो, 

उत्तर प्रदेशातील बस्ती जिल्ह्यातून अशा आठवणी जपण्याची एक प्रेरणादायी कहाणी समोर आली आहे. बस्ती इथल्या आकाश गुप्ता यांना आपल्या गावातील मनोरमा नदी पाहून खूप वाईट वाटायचे. कारण जी नदी त्यांनी लहानपणी स्वच्छ आणि जिवंत पाहिली होती, त्याच नदीत काळाच्या ओघात प्लास्टिक जमा होऊ लागले होते. घाण वाढत होती. श्री. आकाश यांनी ठरवले की ते तक्रार करणार नाहीत, तर एक नवी सुरुवात करतील. तक्रार नाही, सुरुवात हाच त्याच मूलमंत्र बनला. त्याने आपल्या मित्रांना एकत्र केले. त्यांच्याकडे फक्त एक जाळी, एक फावडे, एक टोपली आणि सर्वात मोठी शक्ती होती - काहीतरी बदल घडवण्याचा दृढनिश्चय. हे तरुण नदीत उतरून जलपर्णी, प्लास्टिक आणि कचरा बाहेर काढत असत. कधीकधी, एका दिवसात नदीतून 50-60 किलो कचरा काढला जात असे. हळूहळू, मनोरमा नदीचा तो भाग पुन्हा स्वच्छ दिसू लागला. या कामाने आजूबाजूच्या लोकांचेही लक्ष वेधून घेतले. लोकांमध्ये स्वच्छतेबद्दलची जागरूकता वाढली.

मित्रांनो, 
अशीच एक प्रेरणादायी कहाणी गोव्यातून समोर आली आहे. गोव्याचे बाळकृष्ण अय्याजी हे एक सेवानिवृत्त शिक्षक आहेत. पण समाजसेवेबद्दलचा त्यांचा उत्साह आजही तसाच आहे. मड्डी-तोलाप भागातील पाण्याच्या समस्येमुळे ते खूप व्यथित झाले होते. त्यांनीही यावर तोडगा काढण्यासाठी काम सुरू केले. पाईपलाईन टाकण्यात बाळकृष्णजींनी महत्त्वाची भूमिका बजावली. यामुळे अनेक घरांना पाणी मिळाले. पाण्यासाठी रोज संघर्ष करणाऱ्या कुटुंबांसाठी हा एक मोठा दिलासा होता.

मित्रांनो, 

गेल्या महिन्यात मला एक अद्भुत अनुभव आला. त्याचा संबंध 'मन की बात' बरोबर सुद्धा आहे. म्हणूनच आज मी तुमच्याशी त्याबद्दल बोलणार आहे. मी तामिळनाडूतल्या नागरकोविलमध्ये एका शिक्षिकेला भेटलो. मी त्यांना जवळपास तीन दशकांपूर्वी भेटलो होतो. मी गिरिजा अम्मा यांच्याबद्दल बोलत आहे. या भेटीदरम्यान त्यांच्यासोबत काही तरुण विद्यार्थीसुद्धा होते.

मित्रांनो, 

गिरिजा अम्मा सुमारे 15 शाळा चालवतात. यापैकी चेन्नईमधले जयगोपाल गारोडिया हिंदू विद्यालय विशेष उल्लेखनीय आहे. त्यांची देशभक्तीची भावना प्रत्येक भारतीयाला प्रेरणा देते. 'मन की बात' पासून प्रेरित होऊन, त्यांनी देशाच्या अनेक सैनिकांसाठी योगदान देण्याची प्रतिज्ञा केली. यासाठी त्यांनी आपल्या सर्व शाळांमधील विद्यार्थ्यांना प्रेरित केलं. त्यांनी मुलांना शूर सैनिकांसाठी दररोज एक रुपया योगदान देण्यास सांगितलं. याचा अर्थ असा की, एका वर्षात प्रत्येक विद्यार्थ्याकडून 365 रुपये जमा झाले. या छोट्या योगदानांमधून अंदाजे 40 लाख रुपये जमा झाले. गिरिजा अम्मा यांनी मला संपूर्ण रकमेचा चेक सुपूर्द केला. त्यांच्याशी बोलताना मला भारतमातेप्रती असलेल्या त्यांच्या समर्पणाची खोली जाणवली. गेल्याच वर्षी, चेन्नईच्या पहिल्या हिंदू शाळेने 50 वर्षे पूर्ण केली. देशाचा शिक्षण आणि सांस्कृतिक अभिमान वाढवण्यात या शाळांच्या शाखांची भूमिका प्रशंसनीय आहे. मी यात सहभागी असलेल्या सर्वांचे अभिनंदन करतो आणि विशेषतः आपल्या शूर सैनिकांसाठी योगदान देणाऱ्या विद्यार्थ्यांचे कौतुक करतो.

मित्रांनो, 
भारतातील प्रत्येक गावात आणि शहरात असे काही घडत आहे जे आपल्याला प्रेरणा देते. अनेकदा या प्रयत्नांची फारशी चर्चा होत नाही, पण जेव्हा आपल्याला त्यांची जाणीव होते, तेव्हा आपला हा विश्वास अधिक दृढ होतो, की देश आपल्या लोकांच्या सामर्थ्याने पुढे जात आहे. मी तुम्हाला आवाहन करतो की, तुम्ही तुमच्या आजूबाजूला असे प्रयत्न नक्की शोधा. जे समाजासाठी चांगलं काम करत आहेत, त्यांना ओळखा, त्यांचं कौतुक करा, त्यांच्याकडून शिका आणि शक्य असल्यास, तुम्हीही काही चांगल्या कामात सहभागी व्हा. पुढच्या महिन्यात 'मन की बात' मध्ये मी आणखी काही प्रेरणादायी कथा घेऊन पुन्हा तुमच्या भेटीला येईन. खूप खूप धन्यवाद. नमस्कार.