मंत्रिपरिषद के मेरे साथी, देश के अलग-अलग भागों से आए हुए पंचायत राज व्‍यवस्‍था के सभी प्रेरक महानुभाव,

जिन राज्‍यों को आज मुझे सम्‍मानित करने का सौभाग्‍य मिला है उन सभी राज्‍यों को मैं हृदय से बधाई देता हूं। आज जिला परिषदों को भी और ग्राम पंचायतों का भी सम्‍मान होने वाला है। उन सबको भी मैं हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। पंचायत राज दिवस पर मैं देशभर में पंचायत राज व्‍यवस्‍था से जुड़े हुए सक्रिय सभी महानुभावों को आज शुभकामनाएं देता हूं।

महात्‍मा गांधी हमेशा कहते थे कि भारत गांवों में बसता है। उन गांवों के विकास की तरफ हम कैसे आगे बढ़े दूर-सुदूर छोटे-छोटे गांवों के भी अब सपने बहुत बड़े हैं। और मुझे विश्‍वास है कि आप सब के नेतृत्‍व में गांव की चहुं दिशा में प्रगति होगी। मैं नहीं मानता हूं कि अब.. जैसे अभी हमारे चौधरी साहब बता रहे थे कि पहले से तीन गुना बजट होने वाला है आपका और तुरंत तालियां बज गई। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जो पंचायत में चुन करके आए हैं, कभी सोचा है कि हम 5 साल के कार्यकाल में हम हमारे गांव को क्‍या दें करके जाना चाहते है? कभी ये सोचा है कि हमारे 5 साल के बाद हमारा गांव हमें कैसे याद करेगा? जब तक हमारे मन में गांव के लिए कुछ कर गुजरना है - ये spirit पैदा नहीं होता है तो सिर्फ बजट के कारण स्थितियां बदलती नहीं हैं।

पिछले 60 साल में जितने रुपए आए होगे उसका सारा total लगा दिया जाए, और फिर देखा जाए कि भई गांव में क्‍या हुआ तो लगेगा कि इतने सारे रुपए गए तो परिणाम क्‍यों नहीं आया? और इसलिए कभी न कभी पंचायत level पर सोचना चाहिए। कुछ राज्‍य ऐसे हैं हमारे देश में जहां पर पंचायतें अपना five year plan बनाती हैं, पंचवर्षीय योजना बनाती हैं। 5 साल में इतने काम हम करेंगे और वो गांव के पंचायत के उसमें वो board पर लिख करके रखते हैं और उसके कारण एक निश्चित दिशा में काम होता है और गांव कुछ समस्‍याओं से बाहर आ जाता है। हम भी आदत डालें कि भई हम 5 साल में हमारे गांव में ये करके जाएंगे। अगर ये हम करते है तो आप देखिए कि बदलाव आना शुरू होगा।

बजट और leadership दोनों का combination कैसे परिणाम लाता है? हम जानते है कि गांव में CC road बनाना ये जैसे एक बहुत बड़ा काम है और बहुत महत्‍वपूर्ण काम है इस प्रकार की मानसिकता बनी हुई है। इसके पीछे कारण क्‍या है वो आप भी जानते है, मैं भी जानता हूं। लेकिन कुछ सरपंच ऐसे होते हैं जो CC road तो बना देते है, CC road तो बना देते है, लेकिन पहले से प्‍लान करके दोनों किनारों पर बढि़यां पेड़ लगा देते है। वृक्षारोपण करते है और जैसे ही गांव में entry करता तो ऐसा हरा-भरा गांव लगता है। तो बजट से तो CC road बनता है लेकिन उनकी leadership quality है कि गांव को जोड़ करके रोड़ बनते ही पौधे लगा देते हैं और वो वृक्ष बन जाते हैं और एकदम से गांव में कोई आता है तो बिल्‍कुल नजरिया ही बदल जाता है। कुछ दूसरे प्रकार के होते हैं सरपंच जो क्‍या करते हैं और गांव में से कोई धनी व्‍यक्ति कहीं कमाने गया तो उसको कहते है कि ऐसा करो भाई तुम गांव को gate लगा दो। तो बड़ा पत्‍थर का 2, 5, 10 लाख का gate लगवा देते हैं। उसको लगता है कि मैंने gate बनवा दिया तो बस गांव का काम हो गया। लेकिन दूसरे को लगता है कि मैं पेड़ लगाऊंगा। आप भी सोचिएं बैठे-बैठे कि सचमुच में जन-भागीदारी से जिसने पेड़ लगाएं हैं, CC road, enter होते ही आधे कि.मी., एक कि.मी. हरे-भरे वृक्षों की घटा के बीच से गांव जाता है तो वो दृश्‍य कैसा होता होगा? ये है leadership की quality कि हम किन चीजों को प्रधानता देते है। इस पर इस काम का प्रभाव होता है.. जिसमें आपको बजट का खर्च नहीं करना है, आपको बजट की चिंता नहीं करनी है। जो मिलने वाला है.. जैसे बताया गया कम से कम 15 लाख और ज्‍यादा से ज्‍यादा 1 करोड़ से भी ज्‍यादा।

लेकिन इसके अतिरिक्‍त बहुत पैसा गांव में आता है। आंगनवाड़ी चलती है, प्राथमिक स्‍कूल चलता है, PHC centre चलता है, बहुत सी चीजें चलती है, जिसका खर्चा तो सरकारी राह से अपनी व्‍यवस्‍था से आता है। इसमें आपको कोई लेना-देना नहीं होता है। क्‍या कभी एक सरपंच के नाते, गांव की पंचायत के नाते हमने इन चीजों पर ध्‍यान केन्द्रित किया है क्‍या? कि भई, मेरे गांव में एक भी बच्‍चा ऐसा नहीं होगा कि जो टीकाकरण में वंचित रह जाए। हम पंचायत के लोग जी-जान से जुटेंगे, गांव को जगाएंगे कि भई टीकाकरण है, सभी बच्‍चों का हुआ है कि नहीं हुआ, चलो देखो! अब इसमें कोई पैसे लगते है है क्‍या? बजट नहीं लगता है, leadership लगती है। एक समाज के प्रति कुछ कार्य करने के दायित्व का भाव लगता है।

हमारे गांव में स्‍कूल तो है, teacher है, सरकार बजट खर्च कर रही है, हमने कभी देखा क्‍या - कि भई हमारे teacher आते है कि नहीं? बच्‍चे स्‍कूल जाते है कि नहीं? समय पर स्‍कूल चलता है कि नहीं चलता? बच्‍चे खेलकूद में हिस्‍सा लेते है कि नहीं लेते? बच्‍चे library का उपयोग करते है कि नहीं करते? Computer दिया है तो चलता है कि नहीं चलता? ये हम एक पंचायत के नाते.. हमारे गांव के बच्‍चे पढ़-लिख करके आगे बढ़ें, आपको बजट खर्च नहीं करना है, न ही बजट की चिंता करनी है सिर्फ आपको गांव की चिंता करनी है, आने वाली पीढ़ी की चिंता करनी है।

हमारे यहां आशा worker हैं, आशा worker को कभी पूछा है कि आपका काम कैसा चल रहा है, कोई कठिनाई है क्या? हर गांव में भी सरकार है लेकिन वो बिखरा पड़ा हुआ है। क्‍या हम एक प्रयास कर सकते है क्‍या कि सप्‍ताह में एक दिन, एक घंटे के लिए, जितने भी सरकारी व्‍यक्ति हैं गांव में, उनको बिठाएंगे एक साथ और बैठ करके अपना गांव, अपना विकास.. उसके लिए क्‍या कर सकते हैं। बैठ करके चर्चा करेंगे तो शिक्षक कहेंगा कि मुझे ये करना है लेकिन हो नहीं रहा है, तो आंगनवाड़ी worker कहेगी कि हां-हां चलो मैं मदद कर देती हूं, आशा worker कहेंगी कि अच्‍छा कोई बात नहीं, मैं कल आपके लिए 2 घंटे लगा दूंगी.. अगर गांव में हम leadership ले करके team बना लें, सरकार के इतने लोग हमारे यहां होते है लेकिन हमें भी पता नहीं होता। सरकार के इतने लोग हमारे यहां रहते हैं लेकिन हमें भी पता नहीं होता है। Even बस का driver, conductor भी रहता होगा और बस चलाता होगा, वो भी तो एक सरकार का मुलाजिम है। Constable होता होगा, वो भी एक मुलाजिम है। पटवारी है, वो भी एक मुलाजिम है।

क्या कभी हमने ये सोचा है, सप्ताह में एक घंटा कम से कम हम सरकार के रूप में एक साथ बैठेंगे? सामूहिक रूप से अपने पंचायत के विकास की चर्चा करेंगे। आप देखिए, देखते ही देखते बदलाव शुरू हो जाएगा, Team बनना शुरू हो जाएगा। और मैं वो बातें नहीं बता रहूं जिसमें बजट एक समस्या है। लेकिन वरना हमारे देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि क्यों नहीं होता है, बजट नहीं है.. हकीकत वो नहीं है। बजट है लेकिन जो काम परिणाम नहीं देते हैं उसकी चिंता हमें ज्यादा करने की आवश्यकता है। हमारे गांव में कोई drop out होता है बच्चा, क्या हमें पीड़ा होती है क्या, हमारा खुद का बच्चा अगर स्कूल छोड़ दे तो हमें दुख होता है। अगर हम पंचायत के प्रधान हैं तो गांव का भी कोई बच्चा स्कूल छोड़ दे, हमें उतनी ही पीड़ा होनी चाहिए, पूरी पंचायत को दर्द होना चाहिए। अगर ये हम करते हैं, अगर ये हम करते हैं, मैं नहीं मानता हूं कि हमारे गांव में कोई अशिक्षित रहेगा। और कोई सरंपच ये तय करके कि मेरे कार्यकाल में पांच साल में एक भी बच्चा drop out नहीं होगा। अगर इतना भी कर ले तो मैं कहता हूं, उस सरपंच ने एक पीढ़ी की सेवा कर-करके जा रहा है। ऐसा मैं मानता हूं।

नरेगा का काम हर गांव में चलता है। क्या हम उसमें पानी के लिए प्राथमिकता दें? जितनी ताकत लगानी है, लगाएं लेकिन पानी का प्रबंधन करने के लिए ही नरेगा का उपयोग करें, तो क्या कभी पानी का संकट आएगा क्या? हम व्यवस्थाओं को विकसित कर सकते हैं। आवश्यकता ये है कि मिलकर के नेतृत्व दें। हमारे गांव में कुछ लोग तो होंगे जो सरकार में कभी न कभी मुलाजिम रहे हों। Teacher रहे हों, पटवारी रहे हों और retired हो गए हों। यानी सरकार का पेंशन लेते हों। सरकारी मुलाजिम होने के नाते, निवृत्त होने के बाद पेंशन लेते हों। किसी गांव में तीन होंगे, पांच होंगे, दस होंगे, पंद्रह होंगे। क्या महीने में एक बार इन retired लोगों की मिटिंग कर सकते हैं? उनका अनुभव क्योंकि वो खाली हैं, समय हैं उनके पास, अगर मान लीजिए गांव में 5 retired teacher हैं। उनको कहें कि देखिए भई अपने गांव में चार बच्चे ऐसे हैं, बहुत बेचारे पीछे रह गए, थोड़ा सा समय दीजिए, थोड़ा सा इन बेचारों को पढाइए ना। अगर वो retired हुआ होगा न तो भी उसके DNA में teaching पड़ा हुआ होगा। उसको कहोगे हां-हां चलिए मैं समझ लेता हूं। इन चार गरीब बच्चों को मैं पढ़ा दूंगा, मैं उनकी चिंता करूंगा। हम थोड़ा motivate करें लोगों को, हम नेतृत्व करें आप देखिए गांव हमारा ऐसा नहीं हो सकता क्‍या? अपना गांव.. और मैंने देखा जी, देश में मैंने कई गांव ऐसे देखे हैं कि जहां उस सरपंच की सक्रियता के कारण गांव में परिवर्तन आया है।

मैं जब मुख्यमंत्री था, एक घटना ने मुझे बहुत.. यानी मेरे मन को बहुत आंदोलित किया था। खेड़ा district में, जहां सरदार पटेल साहब का जन्म हुआ था। एक गांव के अंदर पंचायत प्रधान के नीचे women reservation था। Women reservation था तो गांव वालों ने तय किया कि प्रधान अगर women है तो सभी member women क्यों न बनाई जाए? और गांव ने तय किया कि कोई पुरुष चुनाव नहीं लड़ेगा। सब के सब पंचायत के member भी महिलाएं बनेंगी। Reservation तो one-third था लेकिन सबने तय किया गांव वालों ने। एक दिन उन्होंने मेरे से समय मांगा पंचायत की सभी महिला सदस्यों ने और पंचायत के प्रधान ने। मेरे लिए बड़ा surprise था कि ये गांव बड़ा कमाल है भाई, सारे पुरुषों ने अपने आप withdraw को कर लिया और महिलाओं के हाथ में कारोबार दे दिया। तो मेरा भी मन कर लिया कि चलो मिलूं तो वो सब मुझे कोई 17 member का वो पंचायत थी। तो वो मिलने आईं। और ये बात कोई 2005 या 2006 की है। तो उसमें सबसे ज्यादा जो पढ़ी-लिखी महिला थी प्रधान थी, वो पांचवी कक्षा तक पढ़ी हुई थी। यानी इतना पिछड़ा हुआ गांव था कोई ज्यादा पढ़े-लिखे हुए लोग नहीं थे। तो ऐसे ही मेरा मन कर गया, मैंने पूछा उनको, मैंने कहा अब पंचायत सभी महिलाओं के हाथ में है, आपको गांव का कारोबार चलाना है तो क्या करना है, आपकी योजना क्या है करनी की? उन्होंने जो जवाब दिया, मैं नहीं मानता हूं हिंदुस्तान की सरकार में कभी इस रूप में सोचा गया होगा। कम से कम मैं मुख्यमंत्री था, मैंने इस रूप में नहीं सोचा था। उस जवाब ने मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। ठेठ गांव की सामान्य महिलाएं थी।

मैंने उनसे पूछा कि अब पांच साल आपको कारोबार चलाना है तो क्या आपके मन में है? उस प्रधान ने जो कि पढ़ी-लिखी नहीं थी, उसने मुझे जवाब दिया। उसने मुझे कहा, “हम चाहते हैं कि हमारे गांव में कोई गरीब न रहे।“ अब देखिए क्या कल्पना है ये, क्या कभी हमारे देश में पंचायत ने, नगरपालिका ने, महानगरपालिका ने, मिल-बैठकर के तय किया कि हम हमारे गांव में उस प्रकार की योजनाएं चलाएंगे कि गरीब गांव में कोई न रहे। एक बार इतने बड़े level पर काम शुरू हो जाए, कितना बड़ा फर्क पड़ता है! क्या हम कभी पंचायत के प्रधान के नाते विचार कर सकते हैं कि भई कम से कम 5 परिवार, ज्यादा मैं नहीं कह रहा हूं, 5 परिवार पंचायत की रचना में कुछ काम ऐसा निकालेंगे, उनको फलों का पेड़ बोने के लिए दे देंगे, कुछ करेंगे लेकिन 5 को तो गरीबी से बाहर लाएंगे।

अगर हिंदुस्तान में एक गांव साल में 5 लोगों को गरीबी से बाहर लाता है, पूरे हिंदुस्तान में कितना बड़ा फर्क पड़ता है जी? क्या कुछ नहीं कर सकते, आप कभी अंदाज लगाइए। और ये सारी बातें मैं बताता हूं कि बजट के constraint वाले काम नहीं हैं - हमारी संकल्प शक्ति, हमारी कल्पकता, इसके ऊपर जुड़े हुए हैं। अगर इस पर हम बल दें तो हम सच्‍चे अर्थ में इस व्यवस्था को अपने गांव के विकास के लिए परिवर्तित कर सकते हैं।

हम तब तक गांव का विकास नहीं कर पाएंगे जब तक हम गांव के प्रति गौरव और सम्मान का भाव पैदा नहीं करते हैं। उस गांव में पैदा हुए, मतलब सम्मान होना चाहिए। आप देखिए जिस गांव में महात्मा गांधी का जन्म हुआ होगा, उस गांव का व्यक्ति कभी कहीं मिलेगा तो कहेगा, मैं उस गांव से हूं जहां महात्मा गांधी पैदा हुए थे। कहेगा कि नहीं कहेगा? हर किसी को रहता है, कि कोई ऐसी बात होती है, गांव का गर्व होता है उसको। क्या हमने कभी हमारे गांव में,के प्रति एक लगाव पैदा हो, गांव के प्रति गर्व पैदा हो, ऐसी कोई चीज करते हैं क्या? नहीं करते हैं। क्या गांव का जन्मदिन मनाया जा सकता है क्या? हो सकता है कि record पर नहीं होगा तो गांव तय करे कि किस दिन को जन्मदिन मनाया जाएगा। उस दिन गांव इकट्ठा हो और गांव के बाहर जो लोग रहने गए हो, शहरों में रोजी-रोटी कमाने के लिए, किसी ने बड़ी प्रगति की हो, कोई पढ़-लिख करके डॉक्टर बना हो, उस दिन सबको बुलाया जाए। एक दिन सब लोग, नए-पुराने सब साथ रहें। कुछ बालकों के कार्यक्रम हो जाएं, कुछ बड़ों के कार्यक्रम हो जाएं, senior citizen के कुछ कार्यक्रम हो जाएं, गांव में सबसे बड़ी उम्र वाले व्यक्ति का सम्मान हो जाए। और एक अपनेपन का भाव! जो गांव से बाहर गए होंगे, उनको भी लगेगा उस दिन कि चलो भई अब तो हम रोजी-रोटी कमा रहे हैं, बड़े शहर में रहे रहे हैं चलिए अगले साल इतना हमारी तरफ से गांव के लिए दान दे देंगे, हमारे गांव में ये विकास कर दो। आप देखिए जन-भागीदारी का ऐसा माहौल बनेगा, गांव का रूप-रंग बदल जाएगा।

कभी आपने सोचा है, हमारी आने वाली पीढ़ी को तैयार करना है तो.. मैं कई बार गांव को पूछता हूं, भई आपके गांव में सबसे वृद्ध-oldest, oldest tree कौन सा है, कौन सा वृक्ष है जो सबसे बूढ़ा होगा? गांव को पता नहीं है, क्यों? ध्यान ही नहीं है! क्या हम पंचायत के लोग तय कर सकते हैं कि चलो भई ये सबसे बड़ी आयु का वृक्ष कौन सा दिखता है, ये सबसे बड़ा है, स्कूल के बच्चों को ले जाइए कि देखो भई अपने गांव की सबसे बड़ी आयु का वृक्ष ये है, ये है सबसे बड़ा वो, 200 साल उम्र होगी उसकी, 100 साल होगी उसकी, 80 साल होगी उसकी, जो भी होगा। चलो भई उसका भी सम्मान करे, उसका भी गौरव करें। यही तो है जो गांव के विकास का सबसे बड़ा साक्ष्य है। He is a witness! हम किस प्रकार से अपने गांव के गौरव को जोड़ें, गांव के साथ अपने आप कैसे लगाव लोगों का पैदा करें? आप देखिए अपने आप बदलाव आना शुरू हो जाएगा। और इसलिए मैं आग्रह करता हूं कि आप नेतृत्व दीजिए, अनेक नई कल्पकताओं के साथ नेतृत्व दीजिए।

हमारे देश ने बहुत बड़ा निर्णय किया है। कभी-कभी पश्चिम के देशों से बातें होती हैं और जब कहते हैं कि भारत में महिलाओं के लिए पंचायती व्यवस्था में reservation है तो कईयों आश्चर्य होता है। हिंदुस्तान में political process में decision making process में महिलाओं को इतना बड़ा अधिकार दिया गया है कि विश्व के बहुत बड़े-बड़े देशों के लिए surprise होता है। लेकिन कभी-कभी हमारे यहां क्या होता है।.. एक पहले तो मैं सरकार से जुड़ा हुआ नहीं था, संगठन के काम में लगा रहता था तो देशभर में मेरा भ्रमण होता था। तो लोगों से मिलता था। मिलता था तो थोड़ा परिचय भी करता था, एक बार परिचय देकर मैंने कहा, आप कौन हैं? तो उसने कहा मैं so and so SP हूं। तो मैंने कहा SP हैं! और political meeting में कैसे आ गए? क्योंकि मैं... SP यानी Superintendent of Police.. ये ही मेरे दिमाग में था। क्योंकि SP यानी पुलिस – पुलिसवाला हो के ये meeting में कैसे आ गए? तो मैंने कहा SP... तो बोले नहीं-नहीं मैं सरकारी नहीं हूं तो मैंने बोला क्या हैं? तो बोले “मैं सरपंच पति हूं।“

अब कानून ने तो empower कर दिया लेकिन जो SP कारोबार चला रहे हैं भई... है ना? हकीकत है ना? अब कानून ने महिलाओं को अधिकार दिया है तो उनको मौका भी देना चाहिए। और मैं कहता हूं जी, वो बहुत अच्‍छा काम करेंगी आप विश्‍वास कीजिए, बहुत अच्‍छा काम करेंगी। सच्‍चे अर्थों में गांव में परिवर्तन होंगे। अभी आपने छत्‍तीसगढ़ का भाषण सुना। बिना हाथ में कागज़ लिए गांव में क्या काम किया है, उन्‍होंने बताया कि नहीं बताया? और पता है उनको कि सरपंच के नाते अपने गांव में कितने काम हैं, किन-किन कामों पर ध्‍यान देना चाहिए, सब चीज का पता है। ये सामर्थ्‍य है हमारी माताओं-बहनों में। इसलिए ये SP वाला जो culture है वो बंद होना चाहिए। उनको अवसर देना चाहिए, उनको काम करने के लिए प्रोत्‍साहित करना चाहिए। और हम अवसर देंगे तो वे परिणाम भी दिखाएंगे।

तो मैं आज पंचायती राज दिवस पर आप सबको हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। जो award winner हैं, उनसे आप बात करेंगे तो पता चलेगा कि उन्‍होंने अपने-अपने यहां बहुत नए-नए प्रयोग किए होंगे, जो आपको भी काम आ सकते हैं। लेकिन अगर गांव तय करे तो दुनिया देखने के लिए आए, ऐसा गांव बन सकता है जी। ये ताकत होती है गांव की, एक परिवार होता है, अपनापन होता है, सुख-दु:ख के साथी होते हैं।

उस भाव को फिर से हम जगाएं और गांवों को बहुत आगे बढ़ाएं, इसी एक अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्‍यवाद।

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मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार | ‘मन की बात’ में एक बार फिर आपसे जुड़कर मुझे बेहद खुशी हो रही है | देश के अलग-अलग हिस्सों में हमारे देश के लोग देशहित में, समाजहित में, ऐसी अद्भुत चीजें कर रहे हैं और जब उनके विषय में सुनते हैं तो हमें एक नई प्रेरणा मिलती है | आज कार्यक्रम की शुरुआत, मैं athletics में देश की ऐसी ही उपलब्धि से करूंगा | कुछ दिन पहले ही झारखंड के रांची में National Senior Athletics Federation Competition हुआ | इसमें करीब 800 athletes ने हिस्सा लिया - देशभर से आए थे | इस दौरान चार अलग-अलग event में चार national record टूटे | गुरिंदरवीर सिंह, विशाल टीके, तेजस्विन शंकर, देव मीणा और कुलदीप कुमार | इन साथियों ने अलग-अलग category में नए record बनाए | मैं सबसे पहले तो इन सभी को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ |

साथियो, एक event जिसकी देशभर में बहुत चर्चा हो रही है, वह है – 100 meter Race, सौ meter की दौड़ | महज दो दिनों के भीतर Men’s 100 meter Race में national record तीन बार टूटा | जिन दो athletes ने ये कमाल दिखाया है वे हैं - गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर | मैंने सोचा इस बार ‘मन की बात’ में इन दोनों खिलाड़ियों से बात की जाए |

प्रधानमंत्री: अनिमेष जी नमस्कार | गुरिन्दर वीर आपको भी नमस्कार, सतश्री अकाल |

अनिमेष, गुरिन्दरवीर : नमस्कार सर, नमस्कार सर |

प्रधानमंत्री : अच्छा भैया आपने तो बहुत बड़ा achievement किया है | आपकी जोड़ी ने भी बड़ा कमाल किया है | हमने संगीत में तो जुगलबंदी देखी थी, लेकिन चुनौती में अब जुगलबंदी होती है कि एक बार एक चुनौती दे फिर दूसरा उस चुनौती को उठा ले | फिर तीसरी बार कर ले | बड़ा interesting विषय रहा है आपका | मैं चाहता हूँ कि ‘मन की बात’ के श्रोताओं को पता चले कि आप लोग के विषय में उनको जानकारी हो | आपने जो पराक्रम किया है उसका पता चले |

अनिमेष जी : नमस्ते सर, मेरा नाम अनिमेष कुजूर |मैं 200 मीटर और 400 मीटर का National record holder हूँ and मैं छत्तीसगढ़ से belong करता हूँ सर | And अभी मैं उड़ीसा से खेलता हूँ | मैं last year Asian Medal और World University Games Medal लेकर आया and मैं athletics 2021 से चालू किया जब मैं school से pass out हुआ | मैं सैनिक school अम्बिकापुर से pass out हूँ, and मैं पहले football खेला करता था, and मेरे parents covid के समय मुझे थोड़ी बहुत छूट देते थे कि तू जाके बाहर दौड़ ले या खेल ले तो जब covid खत्म होने लगा तो मेरे football के जो friends थे उन्होंने मुझे बोला कि state meet होने वाला है जाके तू participate कर and मैं participate किया and मुझे पता नहीं था कि वहाँ से National level का Selection है | मैं वहाँ से National में select हुआ and आज मैं India को represent कर रहा हूँ Internationally |

प्रधानमंत्री : और गुरिन्दरवीर जी क्या है ?

गुरिन्दरवीर: नमस्ते सर, मेरा नाम गुरिन्दरवीर है और मैं Indian Navy में Patty Officer हूँ और मैं India का सबसे तेज sprinter हूँ अभी मैंने 100 मीटर में 10.09 का national record बनाया है | और मैं पहला Indian हूँ जो 10.1 के barrier के नीचे भागा है, और मैं कोशिश कर रहा हूँ कि मैं track और वर्दी में भी अपने देश की सेवा करूँ | मेरे father और grandfather दोनों sports करते थे तो हमारे India का culture है जब भी कोई त्योहार होता है जैसे दिवाली, जैसे नया साल तो हम अपने घर की सफाई करते हैं | तो मैं अपने father की Trophies और Medals की सफाई करता था तो मेरे को वो बहुत अच्छा लगता था, मैं बहुत खुश होता था | तब जब मैं कोई trophy साफ करता था तो मैं पूछता था कि भई ये trophy कहाँ जीती, ये Medal कहाँ जीता, ये photo कब की है, तो फिर मेरे को वो अपनी कहानी सुनाते थे ,कि भई मैं यहां खेलने गया, मैंने ये National Medal जीता, मैंने अपनी team को इसमें जिताया | तो फिर मैं भी उनको बोलता था कि भई मैं भी कोई sports करनी है | वो running करने जाते थे morning में, तो मैं उनको बोलने लगा भई मेरे को भी लेकर जाया करो अपने साथ | तो मेरे को लेकर जाने लगे तो उन्होंने जो अपनी game sports में सीखा था तो मेरे को सिखाने लगे | तो मेरा interest बनने लगा | मैंने Usain Bolt का world record टूटता हुआ देखा | तो एक story है ऐसे funny | मैं अभी TV देख रहा था तो मम्मी ने मेरी TV बंद कर दिया कि अभी बेटा पढ़ने का time हो गया, आप पढ़ो | तो मैं कहा भई ठीक है आप मेरे को TV नहीं देखने देते, एक दिन ऐसा आएगा आप मेरे को TV में ढूँढोगे कि देखो वो गुरिन्दर दौड़ रहा है | तो मेरे को भी खुशी होती जब मेरी माँ मेरे को TV पे दौड़ता हुआ देखती है |

प्रधानमंत्री : वाह वाह वाह | बड़ी शानदार बात है भई आपकी तो |

गुरिन्दर वीर: हाँ जी | Middle Class Family है सर, फिर मेरे father वो भी volleyball खेलते थे | घर की problems की वजह से उन्होंने अपनी sports छोड़ दी | उनका जो सपना पूरा करने वाला रह गया | तो उन्होंने मेरे अंदर वो सपना देखा भई मेरा बेटा वो सपना पूरा करेगा तो मैं उनसे बातें करता था, फिर सुनता था मिल्खा सिंह इतनी मेहनत करते थे, मैं उनको बोलता था मैं भी एक दिन आपका सपना पूरा करूंगा | तो बोलते सपना पूरा ऐसे नहीं होता, उसके लिए बहुत hard work करना पड़ता है | मेहनत करनी पड़ती है | मिल्खा सिंह जी खून की उल्टियाँ करते थे, धूप में भागते थे | सारा-सारा दिन training करते थे तो वो चीजें मेरे को inspire करती थीं | मेरे father मेरे को inspire करते थे, कि मैं भागूँगा तो अपने देश के लिए, देश के लिए Medal लाऊँ, जीतूँ | और ये भी था कि भई जब मैंने event choose किया 100 मीटर तो सभी मेरे को बोलते थे कि भई 100 मत करो, 100 Indians का event नहीं है | Indians की body 100 मीटर के लिए बनी ही नहीं है | तो मैं और मेरे father हमेशा बोलते थे कि अभी गुरिन्दर हमने ये choose किया है, हम इससे पीछे नहीं हटेंगे | जो हमें बोलते हैं कि भई हम नहीं कर सकते हम उसको कर के दिखाएंगे | और तू करके दिखाएगा, मुझे तेरे पे भरोसा है | तो वो भरोसा जब मेरे को मेरे father ने मेरे पर किया तो मैं उस भरोसे को अपनी हिम्मत बनाके मैं चला और मैं आज हर Indian बोलता कि भई Indian Sprint कर |

प्रधानमंत्री : देखिए आप दोनों ने बहुत बड़ा कमाल किया है, और सिर्फ दो दिनों के भीतर आप दोनों ने तीन बार National Record तोड़ा है | 100 मीटर race में दौड़ना, जैसा गुरिन्दरवीर ने कहा कि लोग कहते हैं कि भारत के लोगों का तो बदन इस काम के लिए है ही नहीं | इतना मुश्किल होते हुए भी आपने काम किया तो ये दोनों से मैं जानना चाहूँगा, और ‘मन की बात’ के श्रोता भी सुनना चाहेंगे कि कौन सा जज्बा था, क्या जिद थी, क्या सोचा था, और कैसे कर रहे थे ? ये कितना मुश्किल होता है ?

गुरिन्दरवीर: जी सर, मैं गुरिन्दर, मैं जब starting में सर बहुत struggle था, बहुत बार doubt भी आया कि मैं सही कर रहा हूँ, मैं सही choose किया क्योंकि हर बार आप नहीं जीतते, कभी- कभी आप सीखते हो | जब मैं हारता था, जब मैं सही performance नहीं आती थी, कोई injury आ जाती थी तो मेरे घरवाले मेरे को support करते थे कि भई कोई नहीं एक दिन बुरा चला गया, एक साल बुरा चला गया तो इससे जिंदगी खराब नहीं होती | सपने देखना नहीं छोड़ते | तो मेरे coach ने भी मेरे को ये सिखाया कि अगर तू नहीं करेगा तो कोई और नहीं कर पाएगा | तो ऐसे जब हमारी community हमारे आसपास लोग हमें उत्साहित करते हैं तो हमारा कभी वो motivation नहीं टूटता |

प्रधानमंत्री : अनिमेष जी…

अनिमेष : सर, मुझे तो सारे लोग बोलते थे कि जब मैं 2021 में चालू किया athletics तो मुझे बोलते थे कि देख ये नया field है, तू कर पाएगा की नहीं, तो मैं बोला कि अब मैं इस field में घुसा हूँ तो करूंगा ही | मेरे पापा भी हमेशा मुझे बोलते थे कि तू इस field में घुसा है तो कभी पीछे मुड़के देखना मत क्योंकि सोचते तो सभी है की ये करना है, वो करना है but करके बहुत कम ही दिखाते है | तू बस इस field में घुसा है तो इस पे अमल रहना, इस पे आगे बढ़ना है | तेरे को सारी facilities, सब चीज हम support करेंगे, family support, financial support, सब चीज हम लोग करेंगे बस तू मेहनत कर और India को दिखा कि Indians भी भाग सकते हैं क्योंकि ये मुझे भी लोग बोलते थे कि Indians के genes ऐसे नहीं है कि वो Sub 10 या Sub 10.1 के अंदर भाग सकते है या कोई वो sprint कर सकता है but अभी हम दोनों ने ऐसा prove कि Indians भी कर सकते हैं | ऐसा कोई hard नहीं है हमारे लिए, हम भी सब कुछ कर सकते हैं | तो सर ये सारी चीजें मुझे बहुत motivate करती हैं and जैसे-जैसे हम training कर रहे हैं हम और timing तोड़ रहे हैं अपना and बाकी Indians को भी ये चीज दिख रहा है कि Indians भी कर सकते हैं and हम और करेंगे सर अभी, and अभी हम दोनों का selection commonwealth games के लिए भी हुआ है तो वहाँ upcoming competition में हम और अच्छा परफॉर्म करेंगे।

प्रधानमंत्री: अच्छा देखिये मेरे मन में भी एक कोतूहल है | और लोगो को भी होगा मैंने सुना है कि आप दोनों अच्छे दोस्त भी है आप दोनों ने कुछ ठान रखा था क्या कि तुमने मेरा record तोड़ा तो मैं तेरा record तोड़ दूँ क्या पहले अनिमेष बता दे |

अनिमेष : सर जी पहले record 10.18 का था जो की मेरा ही था and then उसको गुरिंदरवीर भईया ने semi-final में तोड़ दिया 10.17 करके and मैंने फिर से उसको semi-final 2 में 10.15 करके तोड़ दिया तो उस समय जब मेरा semi-final हुआ तो हम दोनों ही खुश थे कि हां चलो ठीक है, आज record टूटा and चलो हम दोनों ने तोड़ा ऐसा, क्योंकि उस समय competition में rivalry रहती है but हम दोनों ठान के रखे थे पहले से ही उससे पहले हमलोग Saudi Arabia भी गए थे competition करने के लिए तो वहाँ भी हम दोनों roommates थे तो हम दोनों वहाँ भी बात करते थे कि India के sprinting को आगे लेकर जाना है and हमारे ही हाथों में है वो चीज हम जो करेंगे वही बाकियों को motivate करेगा ।

प्रधानमंत्री : गुरिंदरवीर क्या कहना चाहेंगे ?

गुरिंदरवीर : हम दोनों ने decide किया था हम दोनों अच्छा भागेंगे | तो कभी भी सर एक-दूसरे को जरूरत होती है तो एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं जैसे अभी record करने से पहले जब मैंने record किया फिर अनिमेश ने किया | तो जब हम warm-up कर रहे थे तो मैं अनिमेष को बता रहा था, अभी अनिमेष वो block सही है उस पे जाके बैठ वहाँ पे stride कर ले हम warm-up यहाँ पे करेंगे, यहाँ पर warm-up सही होगा तो एक दूसरे की help करते है, एक-दूसरे की help करते है तो दूसरा भी improve करता है, हम भी improve करते है | तो दोस्ती भी चाहिए but सर हम ground के बाहर है, competition के बाहर है तो हम दोस्त हैं, जब हम ground में चले जाते है तो एक-दूसरे के competitor हो जाते है | तो यह होता है कि मैं इससे fast भागूंगा, मैं इससे fast भागूंगा |

प्रधानमंत्री : देखिये आप लोगों ने जो स्पर्धा की है न वो देश का मान बढ़ाने के लिए की है, देश को भविष्य में इस जगह पर पहुँचाने के लिए की है और एक positive spirit से की है और मैं मानता हूँ कि आपका ये जो sportsman spirit है, खेलना भी है, एक-दूसरे को चुनौती भी देना है और फिर आगे निकलने के लिए प्रयास करना है और फिर आगे जाने के लिए एक-दूसरे की मदद करना है ये अद्भुत काम किया है आप लोगों ने मेरी तरफ से आपको बहुत-बहुत बधाई, मेरी बहुत-बहुत शुभकामनायें और आप देश का नाम भी रोशन करेंगे मुझे पूरा विश्वास है आप ऐसे ही मेहनत करते रहिये बहुत प्रगति होगी, बहुत-बहुत शुभकामनाएँ मेरी |

गुरिंदरवीर /अनिमेष : शुक्रिया सर, शुक्रिया आपका |

प्रधानमंत्री : बहुत बहुत धन्यवाद।

मेरे प्यारे देशवासियो, इस समय देश के ज्यादातर हिस्सों में बहुत गर्मी पड़ रही है | तेज धूप, गर्म हवाएँ, ऐसे मौसम में अपना ध्यान रखना बहुत जरूरी है | पानी पीते रहिए | धूप में अगर निकलना ही पड़े तो थोड़ा संभल कर निकलें | इस दिशा में सरकार की भिन्न-भिन्न departments ने जो guidelines जारी की है वो भी भूलियेगा नहीं |

साथियो, हमारे यहां गर्मी से लड़ने का तरीका कई बार रसोई में भी मिलता है | आपने भी देखा होगा जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे घर की रसोई का स्वाद बदल जाता है, रसोई का प्रकार बदल जाता है | कहीं मटके का पानी निकल आता है, कहीं दही जमने लगता है, तो कहीं कच्चे आम उबलने लगते हैं - और फिर शुरू होता है देसी पेय का दौर | देसी पेय से आप भी परिचित हैं, अगर आप उत्तर भारत में जाएँगे तो काफी जगह आपको मिलेगा आम पन्ना, कच्चे आम का स्वाद, और गर्मी से राहत भी | पंजाब-हरियाणा जाइए तो लस्सी मिल जाएगी, बड़े गिलास वाली लस्सी | राजस्थान और गुजरात में छाछ, जैसे हर खाने की साथी बन जाती है | और बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश में सत्तू का शरबत, उसकी तो बात ही क्या है - पेट भी भरे, ताकत भी दे | कोंकण और गोवा में कोकम शरबत, सोल कढ़ी | दक्षिण भारत में पानकम, नीर मोर, सम्बारम और ओडिशा में बेल पना, वो सिर्फ पेय नहीं, भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की परंपरा का हिस्सा है | और इसमें ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की भावना की झलक भी मिलती है | और एक बात जरूर ध्यान रखियेगा, इनमें से ज्यादातर चीजें हमारी अपनी रसोई से निकली हैं, हमारे खेत खलिहान से निकली हैं | कोई बड़ी branding नहीं है| लेकिन पीढ़ियों का अनुभव उनमें समाया हुआ है | आप भी गर्मी के दौरान देसी पेजयलों का खूब आनंद लीजिए |

साथियो, गर्मी आते ही एक और चर्चा हर घर में शुरू हो जाती है और वो है आम | आम, आम चर्चा का विषय होता है, भारत में शायद ही कोई घर होगा जहाँ गर्मियों में आम की बात न होती हो | हर इलाके का अपना आम, अपना स्वाद, अपनी खुशबू | महाराष्ट्र और कोंकण का हापुस, alphonso, गुजरात का केसर, यह तो आमरस की जान है , उत्तर प्रदेश का दशहरी और मेरी काशी का लंगड़ा | वैसे, लंगड़ा आम की एक खास बात होती है - पकने के बाद भी उसका रंग कई बार हरा ही रहता है | बिहार का जर्दालू जिसकी खुशबू दूर से पहचान में आ जाए | चौसा, मालदा - हर नाम के साथ लोगों की यादें जुड़ी हुई हैं | दक्षिण भारत जाइए, तो बंगनपल्ली, तोतापुरी, नीलम, मलगोवा, बंगाल का हिमसागर, ओडिशा और आंध्र प्रदेश का सुवर्णरेखा | यानी, जगह बदलती है, आम का रूप-रंग और उसका स्वाद भी बदल जाता है | और साथियो आम की ये यात्रा, अब गाँव से, global market तक भी पहुँच रही है | आज ‘मन की बात’ के माध्यम से मैं आम की पैदावार से जुड़े अपने किसान भाई-बहनों की प्रशंसा करूंगा | आप देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए आम किसान नहीं बहुत विशेष हैं | ऐसे ही छाए रहिए |

साथियो, गर्मी के इन दिनों में, ऐसे तो स्कूलों की छुट्टियां होती हैं, लेकिन, मैं एक ऐसी class की बात करूंगा, जिसमें आपका admission करने का मन कर जाएगा । साथियो, एक स्थिति की कल्पना कीजिए, एक ऐसा school जहाँ बच्चे भी आते हों, युवा भी और बुजुर्ग भी, जहाँ कोई fees ना हो, कोई बड़ी building ना हो, कोई classroom भी ना हो और सबसे रोचक बात, वहाँ class नदी में लगती हो ।

साथियो, ये कोई कहानी नहीं है। ये एक सच्चा प्रयास है। केरलम के आलुवा में, साजी वलाशेरिल जी ऐसा ही एक swimming club चला रहे हैं । अब तक 15 हजार से ज्यादा लोग यहाँ तैरना सीख चुके हैं । साजी जी ने दिव्यांग बच्चों को भी swimming सिखाई है । इस प्रयास के पीछे, एक पीड़ा भी छिपी है । कुछ वर्ष पहले, एक नौका हादसे में कई छात्रों की मृत्यु हो गई थी । उस घटना ने साजी जी को भीतर तक झकझोर दिया । उन्होंने सोचा, अगर बच्चों को तैरना आता होता, तो शायद कई जानें बच जातीं - बस यहीं से शुरू हुआ उनका ये अभियान।

साथियो, साजी वलाशेरिल जी का जीवन, हमें एक बहुत बड़ी सीख देता है। सेवा करने के लिए बहुत बड़े साधन जरूरी नहीं होते - जरूरी होता है, एक अच्छा इरादा और लगातार किया गया प्रयास। इन्हीं के दम पर, हजारों लोगों के जीवन में बदलाव लाया जा सकता है ।

मेरे प्यारे देशवासियो, बीते दिनों मुझे Europe के Netherlands जाने का अवसर मिला | वहां मैं कई meeting में शामिल हुआ | इसी दौरान एक ऐसा क्षण आया जिसने हर भारतीय को गर्व से भर दिया | Netherlands में आयोजित एक विशेष समारोह में चोला काल की प्राचीन ताम्र पट्टिकाएं भारत को वापस सौंपी गई | उस कार्यक्रम में Netherlands के प्रधानमंत्री भी मौजूद थे | इन ताम्र पट्टिकाओं को लेकर मुझे देश-विदेश से लगातार संदेश मिल रहे हैं | लोग खुशी जता रहे हैं, गर्व व्यक्त कर रहे हैं | दुनियाभर के तमिल समुदाय में भी इसे लेकर विशेष उत्साह है |

साथियो, इन ताम्र पट्टिकाओं को लेकर लोगों में काफी जिज्ञासा भी है | इसलिए आज मैं इससे जुड़ी कुछ बातें आपसे साझा करना चाहता हूं | इनमें 21 बड़ी और तीन छोटी ताम्र पट्टिकाएं हैं | ये मुख्य रूप से राजा राजेंद्र चोला-प्रथम द्वारा अपने पिता राजा राजराजा चोला के एक वचन को पूरा करने से जुड़ी हैं | इनमें आनइमंगलम् गांव को एक बौद्ध विहार को दान देने का उल्लेख है | इन ताम्र पट्टिकाओं में चोला वंश की उपलब्धियों का भी वर्णन मिलता है | इनसे पता चलता है कि चोला साम्राज्य की समुद्री शक्ति कितनी मजबूत थी | दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ उनके संबंधों की जानकारी भी इनमें मिलती है |

चोला साम्राज्य के समृद्ध इतिहास और संस्कृति पर हम सभी को बहुत गर्व है | साथियो, हमारी सरकार भारत की ऐसी अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है | इसी क्रम में ‘ज्ञान भारतम् अभियान’ के तहत छत्तीसगढ़ के मल्हार में भी एक महत्वपूर्ण खोज हुई है | यहां तीन दुर्लभ ताम्र पट्टिकाएं मिली हैं | ये पांडुवंशी राजवंश के महर्षि बालार्जुन के शासनकाल से जुड़ी मानी जा रही हैं | विशेषज्ञ मानते हैं कि ये inscriptions छठी-सातवीं सदी के हैं यानि चौदह-सौ, पंद्रह-सौ साल पुराने ये ताम्र पट्टिकाएं प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में लिखी गई हैं | इनसे उस समय की शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है |

साथियो, हम भारतीयों में खगोल विज्ञान यानी astronomy को लेकर हमेशा विशेष आकर्षण रहा है | हमारे देश में आज भी सदियों पुरानी observatories मौजूद हैं | यहां अद्भुत mathematical discoveries हुई हैं | Navigation हो, पंचांग हो, या हमारे पर्व-त्योहार, इन सबका संबंध आकाश और तारों से रहा है | हमारे यहां astronomy ने हर पीढ़ी में कौतूहल जगाया है | उसे exploration के लिए प्रेरित किया है और आज के युवाओं में भी इसे लेकर काफी उत्साह दिखाई देता है | आजकल आप भी देखते होंगे, देशभर में astronomy Clubs तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं | बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, स्कूलों से लेकर पार्कों तक इनकी गतिविधियां दिखाई देती हैं | मुझे Bangalore Astronomical Society के बारे में जानकारी मिली | यहां observational sessions आयोजित किए जाते हैं | इस संस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में astronomy को लोकप्रिय बनाने का mission भी शुरू किया है | ‘खगोल मण्डल’ नाम की एक टीम ने 30 घंटे का एक बहुत innovative course शुरू किया है |

साथियो, रात में तारों को निहारना अपने आप में अद्भुत अनुभव होता है | Astro Kerala नाम की एक संस्था Night Observation Camps और workshops आयोजित करती है | यहां युवा साथी Telescope बनाना और star maps का इस्तेमाल करना सीखते हैं | राजकोट के Big Bang Astronomy Club ने गिर के जंगलों से लेकर कच्छ के रण तक अनेक astronomy events आयोजित किए हैं | ‘ज्योतिर्विद्या परिसंस्था’ भी astronomy के सबसे पुराने संस्थानों में से एक है | यहां observational facilities के साथ-साथ books, library और telescope library की सुविधा भी है | मैं ISAAC (आईसैक) का भी जिक्र करना चाहूंगा | यह एक student-led nationwide network है, जो, astronomy और astrophysics clubs को आपस में जोड़ता है |

साथियो, अपनी hobby के लिए समय निकालना और लगातार कुछ नया सीखते रहना बहुत जरूरी है | मैं युवाओं से आग्रह करूंगा कि वे किसी astronomy club से जरूर जुड़ें, और इन छुट्टियों में किसी planetarium को भी जरूर देखने जाएं |

साथियो, ‘मन की बात’ कार्यक्रम को जो लोग टीवी पर देख रहे हैं, मैं उनसे कहूँगा – एक video जरूर देखिएगा | ये video पिछले दिनों बहुत चर्चा में रहा | इसमें कुछ लोग बहुत धैर्य से, बहुत सावधानी से एक गंगा Dolphin को बचाने की कोशिश कर रहे हैं | आपको ये जानकर आश्चर्य होगा, इस पूरे प्रयास में करीब 13 घंटे लगे, और आखिरकार वो dolphin बच गई |

साथियो, इसमें बहुत बड़ी भूमिका रही – भारत की पहली गंगा dolphin rescue ambulance की | ये घटना उत्तर प्रदेश की है | वहाँ एक गंगा dolphin नहर में फंस गई थी | ऐसे समय में ‘नमामि गंगे अभियान’ के तहत बनी ये ambulance उसके लिए उम्मीद बनकर पहुंची | फिर बहुत सावधानी से उसे बाहर निकाला गया | उसकी जांच की गई, उसका इलाज किया गया और उसके बाद उसे सुरक्षित राप्ती नदी में छोड़ दिया गया | एक तरह से कहें, तो एक जीवन, फिर अपने घर लौट गया |

साथियो, ये dolphin rescue ambulance बहुत खास है | इसे एक चलते–फिरते अस्पताल की तरह तैयार किया गया है | इसमें Dolphin को सुरक्षित रखने की व्यवस्था है | Oxygen की सुविधा है, विशेष stretcher हैं, बचाव के उपकरण हैं, यानि अगर कोई Dolphin, घायल हो जाए, नहर में फंस जाए या नदी से कट जाए, तो तुरंत उसकी मदद की जा सकती है |

साथियो, जब हम गंगा dolphin को बचाते हैं, तो हम सिर्फ एक प्रजाति को नहीं बचाते, हम गंगा की जैव विविधता को बचाते हैं | नदी के पूरे जीवन तंत्र को बचाते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की एक अमूल्य धरोहर भी बचाते हैं |

मेरे प्यारे देशवासियो, आप में से बहुत लोगों की नदी, तालाब या कुएं के पानी से जुड़ी यादें जरूर होंगी | किसी को तालाब में तैरना याद होगा, किसी को दोस्तों के साथ तालाब किनारे खेलना, किसी को उस मिट्टी की खुशबू याद होगी | बचपन की ऐसी यादें जीवन-भर मन में बसी रहती हैं |

साथियो, ऐसी ही यादों को बचाने की एक प्रेरक गाथा उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से सामने आई है | बस्ती के आकाश गुप्ता अपने गाँव की मनोरमा नदी को देखकर बहुत दुखी होते थे | क्योंकि जिस नदी को उन्होंने बचपन में साफ और जीवंत देखा था | समय के साथ उस नदी में प्लास्टिक जमा होने लगा था | गंदगी बढ़ती चली जा रही थी | श्रीमान आकाश ने तय किया कि शिकायत नहीं करेंगे, एक नई शुरुआत करेंगे | शिकायत नहीं, शुरुआत मंत्र बन गया | उन्होंने अपने दोस्तों को साथ लिया | सिर्फ जाल था, फावड़ा था, टोकरी थी और सबसे बड़ी ताकत थी, कुछ बदलने का संकल्प | ये युवा नदी में उतरते थे, जलकुंभी निकालते थे | प्लास्टिक और कचरा बाहर लाते थे | कई बार एक दिन में 50-60 किलो तक कचरा नदी से निकाला गया | धीरे- धीरे मनोरमा नदी का वह हिस्सा फिर से साफ दिखने लगा | आसपास के लोगों का ध्यान भी इस काम की तरफ गया | लोगों में स्वच्छता को लेकर जागरूकता बढ़ी |

साथियो, ऐसी ही एक प्रेरक कहानी गोवा से भी सामने आई है | गोवा के बालकृष्ण अइया जी retired teacher हैं | लेकिन समाज के लिए काम करने का उनका उत्साह आज भी वैसा ही है | उन्हें मड्डी-तोलाप इलाके में पानी की समस्या बहुत परेशान करती थी | उन्होंने भी समाधान के लिए काम शुरू किया | बालकृष्ण जी ने pipeline बिछाने के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इससे कई घरों तक पानी पहुंचा | जिन परिवारों को पानी के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता था, उनके लिए यह बहुत बड़ी राहत बनी |

साथियो, पिछले महीने मुझे एक बहुत अच्छा अनुभव हुआ | इसका संबंध ‘मन की बात’ से भी जुड़ा है | इसलिए आज मैं इसकी चर्चा आपसे करना चाहता हूँ | तमिलनाडु के नागरकोइल में मेरी मुलाकात एक टीचर से हुई | करीब तीन दशक पहले भी मैं उनसे मिला था | मैं बात कर रहा हूँ, गिरिजा अम्मा जी की | इस मुलाकात के दौरान कुछ युवा students भी उनके साथ थे |

साथियो, गिरिजा अम्मा जी करीब 15 स्कूल चलाती हैं | इनमें चेन्नई का जयगोपाल गरोडिया हिन्दू विद्यालय बहुत प्रमुख है | उनकी देशभक्ति की भावना हर भारतवासी को प्रेरित करने वाली है | उन्होंने ‘मन की बात’ से प्रेरणा लेकर देश के अनेक सैनिकों के लिए योगदान का संकल्प लिया | इसके लिए उन्होंने अपने सभी स्कूलों के students को प्रेरित किया | उन्होंने बच्चों से कहा कि वे वीर जवानों के लिए हर दिन एक रुपया योगदान दें | यानी एक साल में हर student की ओर से 365 रुपये जमा हुए | इस छोटे-छोटे योगदान से करीब 40 लाख रुपये इकट्ठा हुए | गिरिजा अम्मा जी ने इस पूरी राशि का चेक मुझे सौंपा | उनसे बातचीत के दौरान मैंने महसूस किया कि माँ भारती के प्रति उनका समर्पण कितना गहरा है | पिछले वर्ष ही चेन्नई के पहले हिन्दू विद्यालय ने अपने 50 वर्ष पूरे किए हैं | देश की शिक्षा और सांस्कृतिक गौरव को आगे बढ़ाने में इस School network की भूमिका बहुत प्रशंसनीय है | मैं इससे जुड़े सभी लोगों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ और उन students की भी विशेष सराहना करता हूँ, जिन्होंने, अपने वीर सैनिकों के लिए योगदान दिया |

साथियो, भारत के हर गाँव में, हर शहर में, कुछ-न-कुछ ऐसा हो रहा है जो हमें प्रेरणा देता है | कई बार, इन प्रयासों की ज्यादा चर्चा नहीं होती, लेकिन जब हम इन्हें जानते हैं, तो ये विश्वास और मजबूत होता है, कि देश, अपने लोगों की शक्ति से आगे बढ़ रहा है | मेरा आपसे आग्रह है, अपने आसपास ऐसे प्रयासों को जरूर देखिए | जो लोग समाज के लिए अच्छा काम कर रहें हैं, उन्हें पहचानिए, उनकी सराहना कीजिए, उनसे सीखिए, और हो सके तो खुद भी किसी अच्छे काम से जुड़िए | अगले महीने ‘मन की बात’ में कुछ और प्रेरक गाथाओं के साथ मैं फिर आपसे जुड़ूँगा | बहुत-बहुत धन्यवाद | नमस्कार |