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मंत्रिपरिषद के मेरे साथी, देश के अलग-अलग भागों से आए हुए पंचायत राज व्‍यवस्‍था के सभी प्रेरक महानुभाव,

जिन राज्‍यों को आज मुझे सम्‍मानित करने का सौभाग्‍य मिला है उन सभी राज्‍यों को मैं हृदय से बधाई देता हूं। आज जिला परिषदों को भी और ग्राम पंचायतों का भी सम्‍मान होने वाला है। उन सबको भी मैं हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। पंचायत राज दिवस पर मैं देशभर में पंचायत राज व्‍यवस्‍था से जुड़े हुए सक्रिय सभी महानुभावों को आज शुभकामनाएं देता हूं।

महात्‍मा गांधी हमेशा कहते थे कि भारत गांवों में बसता है। उन गांवों के विकास की तरफ हम कैसे आगे बढ़े दूर-सुदूर छोटे-छोटे गांवों के भी अब सपने बहुत बड़े हैं। और मुझे विश्‍वास है कि आप सब के नेतृत्‍व में गांव की चहुं दिशा में प्रगति होगी। मैं नहीं मानता हूं कि अब.. जैसे अभी हमारे चौधरी साहब बता रहे थे कि पहले से तीन गुना बजट होने वाला है आपका और तुरंत तालियां बज गई। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जो पंचायत में चुन करके आए हैं, कभी सोचा है कि हम 5 साल के कार्यकाल में हम हमारे गांव को क्‍या दें करके जाना चाहते है? कभी ये सोचा है कि हमारे 5 साल के बाद हमारा गांव हमें कैसे याद करेगा? जब तक हमारे मन में गांव के लिए कुछ कर गुजरना है - ये spirit पैदा नहीं होता है तो सिर्फ बजट के कारण स्थितियां बदलती नहीं हैं।

पिछले 60 साल में जितने रुपए आए होगे उसका सारा total लगा दिया जाए, और फिर देखा जाए कि भई गांव में क्‍या हुआ तो लगेगा कि इतने सारे रुपए गए तो परिणाम क्‍यों नहीं आया? और इसलिए कभी न कभी पंचायत level पर सोचना चाहिए। कुछ राज्‍य ऐसे हैं हमारे देश में जहां पर पंचायतें अपना five year plan बनाती हैं, पंचवर्षीय योजना बनाती हैं। 5 साल में इतने काम हम करेंगे और वो गांव के पंचायत के उसमें वो board पर लिख करके रखते हैं और उसके कारण एक निश्चित दिशा में काम होता है और गांव कुछ समस्‍याओं से बाहर आ जाता है। हम भी आदत डालें कि भई हम 5 साल में हमारे गांव में ये करके जाएंगे। अगर ये हम करते है तो आप देखिए कि बदलाव आना शुरू होगा।

बजट और leadership दोनों का combination कैसे परिणाम लाता है? हम जानते है कि गांव में CC road बनाना ये जैसे एक बहुत बड़ा काम है और बहुत महत्‍वपूर्ण काम है इस प्रकार की मानसिकता बनी हुई है। इसके पीछे कारण क्‍या है वो आप भी जानते है, मैं भी जानता हूं। लेकिन कुछ सरपंच ऐसे होते हैं जो CC road तो बना देते है, CC road तो बना देते है, लेकिन पहले से प्‍लान करके दोनों किनारों पर बढि़यां पेड़ लगा देते है। वृक्षारोपण करते है और जैसे ही गांव में entry करता तो ऐसा हरा-भरा गांव लगता है। तो बजट से तो CC road बनता है लेकिन उनकी leadership quality है कि गांव को जोड़ करके रोड़ बनते ही पौधे लगा देते हैं और वो वृक्ष बन जाते हैं और एकदम से गांव में कोई आता है तो बिल्‍कुल नजरिया ही बदल जाता है। कुछ दूसरे प्रकार के होते हैं सरपंच जो क्‍या करते हैं और गांव में से कोई धनी व्‍यक्ति कहीं कमाने गया तो उसको कहते है कि ऐसा करो भाई तुम गांव को gate लगा दो। तो बड़ा पत्‍थर का 2, 5, 10 लाख का gate लगवा देते हैं। उसको लगता है कि मैंने gate बनवा दिया तो बस गांव का काम हो गया। लेकिन दूसरे को लगता है कि मैं पेड़ लगाऊंगा। आप भी सोचिएं बैठे-बैठे कि सचमुच में जन-भागीदारी से जिसने पेड़ लगाएं हैं, CC road, enter होते ही आधे कि.मी., एक कि.मी. हरे-भरे वृक्षों की घटा के बीच से गांव जाता है तो वो दृश्‍य कैसा होता होगा? ये है leadership की quality कि हम किन चीजों को प्रधानता देते है। इस पर इस काम का प्रभाव होता है.. जिसमें आपको बजट का खर्च नहीं करना है, आपको बजट की चिंता नहीं करनी है। जो मिलने वाला है.. जैसे बताया गया कम से कम 15 लाख और ज्‍यादा से ज्‍यादा 1 करोड़ से भी ज्‍यादा।

लेकिन इसके अतिरिक्‍त बहुत पैसा गांव में आता है। आंगनवाड़ी चलती है, प्राथमिक स्‍कूल चलता है, PHC centre चलता है, बहुत सी चीजें चलती है, जिसका खर्चा तो सरकारी राह से अपनी व्‍यवस्‍था से आता है। इसमें आपको कोई लेना-देना नहीं होता है। क्‍या कभी एक सरपंच के नाते, गांव की पंचायत के नाते हमने इन चीजों पर ध्‍यान केन्द्रित किया है क्‍या? कि भई, मेरे गांव में एक भी बच्‍चा ऐसा नहीं होगा कि जो टीकाकरण में वंचित रह जाए। हम पंचायत के लोग जी-जान से जुटेंगे, गांव को जगाएंगे कि भई टीकाकरण है, सभी बच्‍चों का हुआ है कि नहीं हुआ, चलो देखो! अब इसमें कोई पैसे लगते है है क्‍या? बजट नहीं लगता है, leadership लगती है। एक समाज के प्रति कुछ कार्य करने के दायित्व का भाव लगता है।

हमारे गांव में स्‍कूल तो है, teacher है, सरकार बजट खर्च कर रही है, हमने कभी देखा क्‍या - कि भई हमारे teacher आते है कि नहीं? बच्‍चे स्‍कूल जाते है कि नहीं? समय पर स्‍कूल चलता है कि नहीं चलता? बच्‍चे खेलकूद में हिस्‍सा लेते है कि नहीं लेते? बच्‍चे library का उपयोग करते है कि नहीं करते? Computer दिया है तो चलता है कि नहीं चलता? ये हम एक पंचायत के नाते.. हमारे गांव के बच्‍चे पढ़-लिख करके आगे बढ़ें, आपको बजट खर्च नहीं करना है, न ही बजट की चिंता करनी है सिर्फ आपको गांव की चिंता करनी है, आने वाली पीढ़ी की चिंता करनी है।

हमारे यहां आशा worker हैं, आशा worker को कभी पूछा है कि आपका काम कैसा चल रहा है, कोई कठिनाई है क्या? हर गांव में भी सरकार है लेकिन वो बिखरा पड़ा हुआ है। क्‍या हम एक प्रयास कर सकते है क्‍या कि सप्‍ताह में एक दिन, एक घंटे के लिए, जितने भी सरकारी व्‍यक्ति हैं गांव में, उनको बिठाएंगे एक साथ और बैठ करके अपना गांव, अपना विकास.. उसके लिए क्‍या कर सकते हैं। बैठ करके चर्चा करेंगे तो शिक्षक कहेंगा कि मुझे ये करना है लेकिन हो नहीं रहा है, तो आंगनवाड़ी worker कहेगी कि हां-हां चलो मैं मदद कर देती हूं, आशा worker कहेंगी कि अच्‍छा कोई बात नहीं, मैं कल आपके लिए 2 घंटे लगा दूंगी.. अगर गांव में हम leadership ले करके team बना लें, सरकार के इतने लोग हमारे यहां होते है लेकिन हमें भी पता नहीं होता। सरकार के इतने लोग हमारे यहां रहते हैं लेकिन हमें भी पता नहीं होता है। Even बस का driver, conductor भी रहता होगा और बस चलाता होगा, वो भी तो एक सरकार का मुलाजिम है। Constable होता होगा, वो भी एक मुलाजिम है। पटवारी है, वो भी एक मुलाजिम है।

क्या कभी हमने ये सोचा है, सप्ताह में एक घंटा कम से कम हम सरकार के रूप में एक साथ बैठेंगे? सामूहिक रूप से अपने पंचायत के विकास की चर्चा करेंगे। आप देखिए, देखते ही देखते बदलाव शुरू हो जाएगा, Team बनना शुरू हो जाएगा। और मैं वो बातें नहीं बता रहूं जिसमें बजट एक समस्या है। लेकिन वरना हमारे देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि क्यों नहीं होता है, बजट नहीं है.. हकीकत वो नहीं है। बजट है लेकिन जो काम परिणाम नहीं देते हैं उसकी चिंता हमें ज्यादा करने की आवश्यकता है। हमारे गांव में कोई drop out होता है बच्चा, क्या हमें पीड़ा होती है क्या, हमारा खुद का बच्चा अगर स्कूल छोड़ दे तो हमें दुख होता है। अगर हम पंचायत के प्रधान हैं तो गांव का भी कोई बच्चा स्कूल छोड़ दे, हमें उतनी ही पीड़ा होनी चाहिए, पूरी पंचायत को दर्द होना चाहिए। अगर ये हम करते हैं, अगर ये हम करते हैं, मैं नहीं मानता हूं कि हमारे गांव में कोई अशिक्षित रहेगा। और कोई सरंपच ये तय करके कि मेरे कार्यकाल में पांच साल में एक भी बच्चा drop out नहीं होगा। अगर इतना भी कर ले तो मैं कहता हूं, उस सरपंच ने एक पीढ़ी की सेवा कर-करके जा रहा है। ऐसा मैं मानता हूं।

नरेगा का काम हर गांव में चलता है। क्या हम उसमें पानी के लिए प्राथमिकता दें? जितनी ताकत लगानी है, लगाएं लेकिन पानी का प्रबंधन करने के लिए ही नरेगा का उपयोग करें, तो क्या कभी पानी का संकट आएगा क्या? हम व्यवस्थाओं को विकसित कर सकते हैं। आवश्यकता ये है कि मिलकर के नेतृत्व दें। हमारे गांव में कुछ लोग तो होंगे जो सरकार में कभी न कभी मुलाजिम रहे हों। Teacher रहे हों, पटवारी रहे हों और retired हो गए हों। यानी सरकार का पेंशन लेते हों। सरकारी मुलाजिम होने के नाते, निवृत्त होने के बाद पेंशन लेते हों। किसी गांव में तीन होंगे, पांच होंगे, दस होंगे, पंद्रह होंगे। क्या महीने में एक बार इन retired लोगों की मिटिंग कर सकते हैं? उनका अनुभव क्योंकि वो खाली हैं, समय हैं उनके पास, अगर मान लीजिए गांव में 5 retired teacher हैं। उनको कहें कि देखिए भई अपने गांव में चार बच्चे ऐसे हैं, बहुत बेचारे पीछे रह गए, थोड़ा सा समय दीजिए, थोड़ा सा इन बेचारों को पढाइए ना। अगर वो retired हुआ होगा न तो भी उसके DNA में teaching पड़ा हुआ होगा। उसको कहोगे हां-हां चलिए मैं समझ लेता हूं। इन चार गरीब बच्चों को मैं पढ़ा दूंगा, मैं उनकी चिंता करूंगा। हम थोड़ा motivate करें लोगों को, हम नेतृत्व करें आप देखिए गांव हमारा ऐसा नहीं हो सकता क्‍या? अपना गांव.. और मैंने देखा जी, देश में मैंने कई गांव ऐसे देखे हैं कि जहां उस सरपंच की सक्रियता के कारण गांव में परिवर्तन आया है।

मैं जब मुख्यमंत्री था, एक घटना ने मुझे बहुत.. यानी मेरे मन को बहुत आंदोलित किया था। खेड़ा district में, जहां सरदार पटेल साहब का जन्म हुआ था। एक गांव के अंदर पंचायत प्रधान के नीचे women reservation था। Women reservation था तो गांव वालों ने तय किया कि प्रधान अगर women है तो सभी member women क्यों न बनाई जाए? और गांव ने तय किया कि कोई पुरुष चुनाव नहीं लड़ेगा। सब के सब पंचायत के member भी महिलाएं बनेंगी। Reservation तो one-third था लेकिन सबने तय किया गांव वालों ने। एक दिन उन्होंने मेरे से समय मांगा पंचायत की सभी महिला सदस्यों ने और पंचायत के प्रधान ने। मेरे लिए बड़ा surprise था कि ये गांव बड़ा कमाल है भाई, सारे पुरुषों ने अपने आप withdraw को कर लिया और महिलाओं के हाथ में कारोबार दे दिया। तो मेरा भी मन कर लिया कि चलो मिलूं तो वो सब मुझे कोई 17 member का वो पंचायत थी। तो वो मिलने आईं। और ये बात कोई 2005 या 2006 की है। तो उसमें सबसे ज्यादा जो पढ़ी-लिखी महिला थी प्रधान थी, वो पांचवी कक्षा तक पढ़ी हुई थी। यानी इतना पिछड़ा हुआ गांव था कोई ज्यादा पढ़े-लिखे हुए लोग नहीं थे। तो ऐसे ही मेरा मन कर गया, मैंने पूछा उनको, मैंने कहा अब पंचायत सभी महिलाओं के हाथ में है, आपको गांव का कारोबार चलाना है तो क्या करना है, आपकी योजना क्या है करनी की? उन्होंने जो जवाब दिया, मैं नहीं मानता हूं हिंदुस्तान की सरकार में कभी इस रूप में सोचा गया होगा। कम से कम मैं मुख्यमंत्री था, मैंने इस रूप में नहीं सोचा था। उस जवाब ने मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। ठेठ गांव की सामान्य महिलाएं थी।

मैंने उनसे पूछा कि अब पांच साल आपको कारोबार चलाना है तो क्या आपके मन में है? उस प्रधान ने जो कि पढ़ी-लिखी नहीं थी, उसने मुझे जवाब दिया। उसने मुझे कहा, “हम चाहते हैं कि हमारे गांव में कोई गरीब न रहे।“ अब देखिए क्या कल्पना है ये, क्या कभी हमारे देश में पंचायत ने, नगरपालिका ने, महानगरपालिका ने, मिल-बैठकर के तय किया कि हम हमारे गांव में उस प्रकार की योजनाएं चलाएंगे कि गरीब गांव में कोई न रहे। एक बार इतने बड़े level पर काम शुरू हो जाए, कितना बड़ा फर्क पड़ता है! क्या हम कभी पंचायत के प्रधान के नाते विचार कर सकते हैं कि भई कम से कम 5 परिवार, ज्यादा मैं नहीं कह रहा हूं, 5 परिवार पंचायत की रचना में कुछ काम ऐसा निकालेंगे, उनको फलों का पेड़ बोने के लिए दे देंगे, कुछ करेंगे लेकिन 5 को तो गरीबी से बाहर लाएंगे।

अगर हिंदुस्तान में एक गांव साल में 5 लोगों को गरीबी से बाहर लाता है, पूरे हिंदुस्तान में कितना बड़ा फर्क पड़ता है जी? क्या कुछ नहीं कर सकते, आप कभी अंदाज लगाइए। और ये सारी बातें मैं बताता हूं कि बजट के constraint वाले काम नहीं हैं - हमारी संकल्प शक्ति, हमारी कल्पकता, इसके ऊपर जुड़े हुए हैं। अगर इस पर हम बल दें तो हम सच्‍चे अर्थ में इस व्यवस्था को अपने गांव के विकास के लिए परिवर्तित कर सकते हैं।

हम तब तक गांव का विकास नहीं कर पाएंगे जब तक हम गांव के प्रति गौरव और सम्मान का भाव पैदा नहीं करते हैं। उस गांव में पैदा हुए, मतलब सम्मान होना चाहिए। आप देखिए जिस गांव में महात्मा गांधी का जन्म हुआ होगा, उस गांव का व्यक्ति कभी कहीं मिलेगा तो कहेगा, मैं उस गांव से हूं जहां महात्मा गांधी पैदा हुए थे। कहेगा कि नहीं कहेगा? हर किसी को रहता है, कि कोई ऐसी बात होती है, गांव का गर्व होता है उसको। क्या हमने कभी हमारे गांव में,के प्रति एक लगाव पैदा हो, गांव के प्रति गर्व पैदा हो, ऐसी कोई चीज करते हैं क्या? नहीं करते हैं। क्या गांव का जन्मदिन मनाया जा सकता है क्या? हो सकता है कि record पर नहीं होगा तो गांव तय करे कि किस दिन को जन्मदिन मनाया जाएगा। उस दिन गांव इकट्ठा हो और गांव के बाहर जो लोग रहने गए हो, शहरों में रोजी-रोटी कमाने के लिए, किसी ने बड़ी प्रगति की हो, कोई पढ़-लिख करके डॉक्टर बना हो, उस दिन सबको बुलाया जाए। एक दिन सब लोग, नए-पुराने सब साथ रहें। कुछ बालकों के कार्यक्रम हो जाएं, कुछ बड़ों के कार्यक्रम हो जाएं, senior citizen के कुछ कार्यक्रम हो जाएं, गांव में सबसे बड़ी उम्र वाले व्यक्ति का सम्मान हो जाए। और एक अपनेपन का भाव! जो गांव से बाहर गए होंगे, उनको भी लगेगा उस दिन कि चलो भई अब तो हम रोजी-रोटी कमा रहे हैं, बड़े शहर में रहे रहे हैं चलिए अगले साल इतना हमारी तरफ से गांव के लिए दान दे देंगे, हमारे गांव में ये विकास कर दो। आप देखिए जन-भागीदारी का ऐसा माहौल बनेगा, गांव का रूप-रंग बदल जाएगा।

कभी आपने सोचा है, हमारी आने वाली पीढ़ी को तैयार करना है तो.. मैं कई बार गांव को पूछता हूं, भई आपके गांव में सबसे वृद्ध-oldest, oldest tree कौन सा है, कौन सा वृक्ष है जो सबसे बूढ़ा होगा? गांव को पता नहीं है, क्यों? ध्यान ही नहीं है! क्या हम पंचायत के लोग तय कर सकते हैं कि चलो भई ये सबसे बड़ी आयु का वृक्ष कौन सा दिखता है, ये सबसे बड़ा है, स्कूल के बच्चों को ले जाइए कि देखो भई अपने गांव की सबसे बड़ी आयु का वृक्ष ये है, ये है सबसे बड़ा वो, 200 साल उम्र होगी उसकी, 100 साल होगी उसकी, 80 साल होगी उसकी, जो भी होगा। चलो भई उसका भी सम्मान करे, उसका भी गौरव करें। यही तो है जो गांव के विकास का सबसे बड़ा साक्ष्य है। He is a witness! हम किस प्रकार से अपने गांव के गौरव को जोड़ें, गांव के साथ अपने आप कैसे लगाव लोगों का पैदा करें? आप देखिए अपने आप बदलाव आना शुरू हो जाएगा। और इसलिए मैं आग्रह करता हूं कि आप नेतृत्व दीजिए, अनेक नई कल्पकताओं के साथ नेतृत्व दीजिए।

हमारे देश ने बहुत बड़ा निर्णय किया है। कभी-कभी पश्चिम के देशों से बातें होती हैं और जब कहते हैं कि भारत में महिलाओं के लिए पंचायती व्यवस्था में reservation है तो कईयों आश्चर्य होता है। हिंदुस्तान में political process में decision making process में महिलाओं को इतना बड़ा अधिकार दिया गया है कि विश्व के बहुत बड़े-बड़े देशों के लिए surprise होता है। लेकिन कभी-कभी हमारे यहां क्या होता है।.. एक पहले तो मैं सरकार से जुड़ा हुआ नहीं था, संगठन के काम में लगा रहता था तो देशभर में मेरा भ्रमण होता था। तो लोगों से मिलता था। मिलता था तो थोड़ा परिचय भी करता था, एक बार परिचय देकर मैंने कहा, आप कौन हैं? तो उसने कहा मैं so and so SP हूं। तो मैंने कहा SP हैं! और political meeting में कैसे आ गए? क्योंकि मैं... SP यानी Superintendent of Police.. ये ही मेरे दिमाग में था। क्योंकि SP यानी पुलिस – पुलिसवाला हो के ये meeting में कैसे आ गए? तो मैंने कहा SP... तो बोले नहीं-नहीं मैं सरकारी नहीं हूं तो मैंने बोला क्या हैं? तो बोले “मैं सरपंच पति हूं।“

अब कानून ने तो empower कर दिया लेकिन जो SP कारोबार चला रहे हैं भई... है ना? हकीकत है ना? अब कानून ने महिलाओं को अधिकार दिया है तो उनको मौका भी देना चाहिए। और मैं कहता हूं जी, वो बहुत अच्‍छा काम करेंगी आप विश्‍वास कीजिए, बहुत अच्‍छा काम करेंगी। सच्‍चे अर्थों में गांव में परिवर्तन होंगे। अभी आपने छत्‍तीसगढ़ का भाषण सुना। बिना हाथ में कागज़ लिए गांव में क्या काम किया है, उन्‍होंने बताया कि नहीं बताया? और पता है उनको कि सरपंच के नाते अपने गांव में कितने काम हैं, किन-किन कामों पर ध्‍यान देना चाहिए, सब चीज का पता है। ये सामर्थ्‍य है हमारी माताओं-बहनों में। इसलिए ये SP वाला जो culture है वो बंद होना चाहिए। उनको अवसर देना चाहिए, उनको काम करने के लिए प्रोत्‍साहित करना चाहिए। और हम अवसर देंगे तो वे परिणाम भी दिखाएंगे।

तो मैं आज पंचायती राज दिवस पर आप सबको हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। जो award winner हैं, उनसे आप बात करेंगे तो पता चलेगा कि उन्‍होंने अपने-अपने यहां बहुत नए-नए प्रयोग किए होंगे, जो आपको भी काम आ सकते हैं। लेकिन अगर गांव तय करे तो दुनिया देखने के लिए आए, ऐसा गांव बन सकता है जी। ये ताकत होती है गांव की, एक परिवार होता है, अपनापन होता है, सुख-दु:ख के साथी होते हैं।

उस भाव को फिर से हम जगाएं और गांवों को बहुत आगे बढ़ाएं, इसी एक अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्‍यवाद।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀଙ୍କ 'ମନ କି ବାତ' ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ବିଚାର ଏବଂ ଅନ୍ତର୍ଦୃଷ୍ଟି ପଠାନ୍ତୁ !
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ଲୋକପ୍ରିୟ ଅଭିଭାଷଣ

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ରାଷ୍ଟ୍ର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ବାର୍ତ୍ତା
October 22, 2021
ସେୟାର
 
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“୧୦୦କୋଟି ଟିକାକରଣ କେବଳ ମାତ୍ର ସଂଖ୍ୟା ନୁହେଁ ବରଂ ଦେଶର ଶକ୍ତିର ପ୍ରତିଫଳନ”
“ଏହା ଭାରତ ଓ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କ ସଫଳତା”
“ଯେତେବେଳେ ରୋଗ କୌଣସି ବାଛବିଚାର ଦେଖେ ନାହିଁ ଟିକାକରଣ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ତାରତମ୍ୟ ରହିବ ନାହିଁ । ସେ ଦୃଷ୍ଟିରୁ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ କୌଣସି ଭିଆଇପି ସଂସ୍କୃତି ଯେପରି ନ ରହେ ତାହା ସୁନିଶ୍ଚିତ କରାଯାଇଛି”
“ବିଶ୍ୱରେ ଭାରତର ଭେଷଜ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଯେଉଁ ପ୍ରସିଦ୍ଧି ରହିଛି ତାହା ଆହୁରି ମଜବୁତ ହୋଇଛି”
“ଦେଶରେ ବୈଶ୍ୱିକ ମହାମାରୀ ବିରୁଦ୍ଧ ସଂଗ୍ରାମରେ ଜନସାଧାରଣଙ୍କ ଅଂଶୀଦାରୀତାକୁ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଇଛନ୍ତି ସରକାର” “ଭାରତର ସମଗ୍ର ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ବିଜ୍ଞାନ ସମ୍ଭୁତ, ବିଜ୍ଞାନଭିତ୍ତିକ ଓ ବିଜ୍ଞାନ ପରିଚାଳିତ”
“ଆଜି ଭାରତୀୟ କମ୍ପାନୀଗୁଡିକରେ ରେକର୍ଡ ପୁଞ୍ଜି ବିନିଯୋଗ ସହିତ ଯୁବସମାଜ ପାଇଁ ନୂତନ ନିଯୁକ୍ତି ସୁଯୋଗ ମଧ୍ୟ ସୃଷ୍ଟି ହେଉଛି ।
ଷ୍ଟାର୍ଟଅପ୍‌ରେ ରେକର୍ଡ ପୁଞ୍ଜିନିବେଶ ଯୋଗୁଁ ନୂତନ କାହାଣୀମାନ ସୃଷ୍ଟି ହେଉଛି”
“ଯେପରି ସ୍ୱଚ୍ଛ ଭାରତ ଅଭିଯାନ ଏକ ଜନ ଆନ୍ଦୋଳନରେ ପରିଣତ ହୋଇଛି, ସେହିଭଳି ଭାରତରେ ତିଆରି ଜିନିଷ କ୍ରୟ, ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତିଆରି ଜିନିଷ କିଣିବା, ଭୋକାଲ ଫର ଲୋକାଲକୁ କାମରେ ଲଗାଯାଇଛି”
“ପ୍ରଚ୍ଛଦ ଯେତେ ଭଲ ସେଥିରେ କିଛି ଯାଏ ଆସେନା, ଅସ୍ତ୍ରୋପକରଣଭାବେ ଯେତେ ଆଧୁନିକ ହେଉ ପଛେ ଓ ଅସ୍ତ୍ରଶସ୍ତ୍ର ନିରାପତ୍ତାର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଗ୍ୟାରେଣ୍ଟି ଦେଲେ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧବେଳେ ଅସ୍ତ୍ରଶସ୍ତ୍ରକୁ ଫୋପାଡି ଦିଆଯାଏ ନାହିଁ, ଲଗାମଛଡା ହେବାର କୌଣସି କାରଣ ନାହିଁ, ଆମର ପର୍ବପର୍ବାଣୀ ଖୁବ୍ ସତର୍କତାର ସହ ପାଳନ କରନ୍ତୁ”

ନମସ୍କାର, ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ!

ଆଜି ମୁଁ ଏକ ବେଦ ବାକ୍ୟ ସହିତ ମୋ କଥାର ଆରମ୍ଭ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି।

କୃତମ ମେ ଦକ୍ଷିଣ ହସ୍ତେ,

ଜୟୋ ମେ ସବ୍ୟ ଅହିତଃ।

ଏ କଥାକୁ ଭାରତ ସନ୍ଦର୍ଭରେ ଦେଖିଲେ ଏହାର ଅର୍ଥ ହେବ- ଆମ ଦେଶ ଗୋଟିଏ ପଟେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପାଳନ କଲା ଏବଂ ଅନ୍ୟପଟେ ଏହାକୁ ବଡ଼ ସଫଳତା ମିଳିଲା। ଆସନ୍ତାକାଲି ୨୧ ଅକ୍ଟୋବରରେ ଭାରତ ୧ ବିଲିୟନ, ୧୦୦ କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ୍ ଦେବାର କଠିନ କିନ୍ତୁ ଅସାଧାରଣ ଲକ୍ଷ୍ୟ ହାସଲ କରିଛି। ଏହି ଉପଲବ୍ଧି ପଛରେ 130 କୋଟି ଦେଶବାସୀଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟଶକ୍ତି ରହିଛି, ସେଥିପାଇଁ ଏ ସଫଳତା ଭାରତର ସଫଳତା। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କର ସଫଳତା। ମୁଁ ଏଥିପାଇଁ ସମସ୍ତ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ହୃଦୟରୁ ହାର୍ଦ୍ଦିକ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି।

ସାଥୀଗଣ,

୧୦୦ କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ, ଏହା କେବଳ ଏକ ତଥ୍ୟ ନୁହେଁ। ଏହା ଦେଶର ସାମର୍ଥ୍ୟର ପ୍ରତିବିମ୍ବ ଅଟେ, ଇତିହାସରେ ଏକ ନୂତନ ଅଧ୍ୟାୟ ରଚନା ହୋଇଛି। ଏହା ସେହି ନୂତନ ଭାରତର ଛବି ଯାହାକି କଠିନ ଲକ୍ଷ୍ୟ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରି, ତାହାକୁ ହାସଲ କରିବା ଜାଣିଥାଏ। ଏହା ସେହି ନୂତନ ଭାରତର ଛବି ଯାହାକି ନିଜ ସଂକଳ୍ପର ସିଦ୍ଧି ନିମନ୍ତେ ପରିଶ୍ରମର ପରାକାଷ୍ଠା ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି।

ସାଥୀମାନେ,

ଆଜି ଅନେକ ଲୋକ ଭାରତର ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ତୁଳନା ଦୁନିଆର ଅନ୍ୟ ଦେଶଗୁଡ଼ିକ ସହିତ କରୁଛନ୍ତି।  ଭାରତ ଯେଉଁ ଗତିରେ ୧୦୦ କୋଟି, ଏକ ବିଲିୟନ ସଂଖ୍ୟା ଅତିକ୍ରମ କଲା, ତାହାର ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରାଯାଉଛି। କିନ୍ତୁ, ଏହି ବିଶ୍ଳେଷଣରେ ଗୋଟିଏ କଥା ସବୁବେଳେ ଆମେ ଛାଡ଼ି ଦେଇଥାଉ ଯେ ଆମେ ଏହି ଆରମ୍ଭ କେଉଁଠୁ କରିଥିଲୁ! ବିଶ୍ୱର ଅନ୍ୟ ବଡ଼ ଦେଶମାନେ, ଟିକା ଉପରେ ଗବେଷଣା କରିବା, ଟିକା ଖୋଜିବା, ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ବହୁ ଦଶନ୍ଧି ଧରି ବିଶେଷଜ୍ଞତା ହାସଲ କରିଥିଲେ। ଭାରତ ଅଧିକାଂଶ ସମୟରେ ଏସବୁ ଦେଶଗୁଡ଼ିକ ପକ୍ଷରୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଇଥିବା ଟିକା ଉପରେ ନିର୍ଭର କରୁଥିଲା। ଏହି କାରଣରୁ  ୧୦୦ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ସବୁଠୁ ବଡ଼ ମହାମାରୀ ଯେତେବେଳେ ଆସିଲା, ଭାରତ ଉପରେ ନାନା ପ୍ରଶ୍ନ ଉଠିଲା। ଭାରତ କ’ଣ ଏହି ବିଶ୍ୱ ମହାମାରୀର ମୁକାବିଲା କରିପାରିବ? ଭାରତ ଅନ୍ୟ ଦେଶମାନଙ୍କ ଠାରୁ ଟିକା କିଣିବା ଲାଗି ଏତେ ଟଙ୍କା ଆଣିବ କେଉଁଠୁ? ଭାରତକୁ ଟିକା କେବେ ମିଳିବ? ଭାରତର ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଟିକା ମିଳିବ ନା ନାହିଁ? ଭାରତର ଏତେ ସଂଖ୍ୟକ ଲୋକମାନଙ୍କୁ କ’ଣ ଟିକା ଦେଇପାରିବ କି ଯାହାଫଳରେ ମହାମାରୀ ବ୍ୟାପିବା ଉପରେ ଅଙ୍କୁଶ ଲାଗିପାରିବ? ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ପ୍ରଶ୍ନ ଥିଲା, କିନ୍ତୁ ଆଜି ଏହି ୧୦୦ କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ଦେଉଛି। ଭାରତ ନିଜ ନାଗରିକମାନଙ୍କୁ ୧୦୦ କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ୍ ଦେଇସାରିଛି, ତାହା ପୁଣି ମାଗଣାରେ। ବିନା ଖର୍ଚ୍ଚରେ।

ସାଥୀଗଣ,

୧୦୦ କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ ଦେବାର ଆଉ ଏକ ପ୍ରଭାବ ପଡ଼ିବ, ବିଶ୍ୱ ଏବେ ଭାରତକୁ  କରୋନାଠାରୁ ଅଧିକ ସୁରକ୍ଷିତ ବୋଲି ବିବେଚନା କରିବ। ଏକ ଫାର୍ମା ହବ୍ ରୂପରେ ଭାରତକୁ ବିଶ୍ୱରେ ଯେଉଁ ସ୍ୱୀକୃତି ମିଳିଛି, ତାହା ଆହୁରି ସୁଦୃଢ଼ ହେବ। ସାରା ବିଶ୍ୱ ଆଜି ଭାରତର ଏହି ଶକ୍ତିକୁ ଦେଖୁଛି, ଅନୁଭବ କରୁଛି।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ ‘ସବକା ସାଥ,  ସବକା ବିକାଶ ସବକା ବିଶ୍ୱାସ, ଏବଂ ସବକା ପ୍ରୟାସ’ର ସବୁଠୁ ବଡ଼ ଜୀବନ୍ତ ଉଦାହରଣ। କରୋନା ମହାମାରୀ ଆରମ୍ଭରେ ଏହା ମଧ୍ୟ ଆଶଙ୍କା ବ୍ୟକ୍ତ କରାଯାଉଥିଲା ଯେ ଭାରତ ଭଳି ଗଣତନ୍ତ୍ରରେ ଏହି ମହାମାରୀର ମୁକାବିଲା କରିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟକର ହେବ। ଭାରତ ପାଇଁ, ଭାରତର ଲୋକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହା ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଉଥିଲା ଯେ ଏତେ ସଂଯମ, ଏତେ ଅନୁଶାସନ ଏଠି କେମିତି ଚାଲିବ? କିନ୍ତୁ ଆମ ପାଇଁ ଗଣତନ୍ତ୍ରର ଅର୍ଥ ହେଉଛି- ‘ସବକା ସାଥ’। ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସାଥୀରେ ନେଇ ଦେଶ, ‘ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଟିକା’, ‘ମାଗଣାରେ ଟିକା’ ଦେବାର ଅଭିଯାନ ଆରମ୍ଭ କଲା। ଗରିବ-ଧନୀ, ଗାଁ-ସହର, ଦୂର-ସୁଦୂର, ଦେଶର ଗୋଟିଏ ମନ୍ତ୍ର

ରହିଲା ଯେ- ଯଦି ରୋଗ ଭେଦଭାବ କରେ ନାହିଁ, ତା’ହେଲେ ଟିକାରେ ମଧ୍ୟ ଭେଦଭାବ ହେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ! ସେଥିପାଇଁ, ଏହା ସୁନିଶ୍ଚିତ କରାଗଲା ଯେ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ ଉପରେ ଯେମିତି ଭିଆଇପି ସଂସ୍କୃତି ପ୍ରଭାବୀ ନହେଉ। ଯିଏ ଯେତେ ବଡ଼ ପଦବୀରେ ଥାଉ ନା କାହିଁକି, ଯେତେ ଧନୀ ହୋଇଥାଉ ପଛେ, ତାଙ୍କୁ ସାଧାରଣ ନାଗରିକମାନଙ୍କ ଭଳି ଟିକା ନେବାକୁ ହେବ।

ସାଥୀମାନେ,

ଆମ ଦେଶ ପାଇଁ ଏହା ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଉଥିଲା ଯେ ଏଠାକାର ଅଧିକାଂଶ ଲୋକ ଟିକା ନେବାକୁ ଆସିବେ ନାହିଁ। ବିଶ୍ୱର ଅନେକ ବଡ଼ ବଡ଼ ବିକଶିତ ଦେଶରେ ଆଜି ମଧ୍ୟ ଟିକାକୁ ନେଇ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ ଏକ ବଡ଼ ସମସ୍ୟା ଭାବେ ରହିଛି। କିନ୍ତୁ ଭାରତର ଲୋକମାନେ 100 କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ ନେଇ ଏପରି ଲୋକମାନଙ୍କୁ ନିରୁତ୍ତର କରି ଦେଇଛନ୍ତି।

ସାଥୀମାନେ,

ଯେକୌଣସି ଅଭିଯାନରେ ଯେତେବେଳେ ‘ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ’ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଯାଇଥାଏ  ସେତେବେଳେ ଅଦ୍ଭୂତ ପରିଣାମ ମିଳିଥାଏ। ଆମେ ମହାମାରୀ ବିରୋଧରେ ଦେଶର ଲଢ଼େଇରେ ଜନଭାଗିଦାରୀକୁ ନିଜର ପ୍ରଥମ ଶକ୍ତି ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କଲେ, ଫର୍ଷ୍ଟ ଲାଇନ ଅଫ ଡିଫେନ୍ସରେ ପରିଣତ କଲେ। ଦେଶ ନିଜର ଏକତାକୁ ଶକ୍ତି ଦେବା ଲାଗି ତାଳି, ଥାଳି ବଜାଇଲା, ଦୀପ ଜଳାଇଲା। ସେତେବେଳେ କିଛି ଲୋକ ପ୍ରଶ୍ନ କରିଥିଲେ, ଏଥିରେ କ’ଣ ରୋଗ ଚାଲିଯିବ? କିନ୍ତୁ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଏଥିରେ ଦେଶର ଏକତା ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଲା, ସାମୂହିକ ଶକ୍ତିର ଜାଗରଣ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଲା। ଏହି ଶକ୍ତି କୋଭିଡ ଟିକାକରଣରେ ଆଜି ଦେଶକୁ ଏତେ କମ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ ୧୦୦ କୋଟି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚାଇପାରିଛି। ବହୁବାର ଆମ ଦେଶ ଗୋଟିଏ ଦିନରେ ୧ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ ସଂଖ୍ୟା ହାସଲ କରିଛି। ଏହା ବହୁତ ବଡ଼ ସାମର୍ଥ୍ୟ, ପରିଚାଳନା କୌଶଳ, ପ୍ରଯୁକ୍ତିର ଏହା ଏକ ଚମତ୍କାର ଉପଯୋଗ, ଯାହା ବଡ଼ ବଡ଼ ଦେଶ ପାଖରେ ସୁଦ୍ଧା ନାହିଁ।

ସାଥୀମାନେ,

ଭାରତର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ବିଜ୍ଞାନର କୋଳରେ ଜନ୍ମ ନେଇଛି, ବୈଜ୍ଞାନିକ ଆଧାର ଉପରେ ବଢ଼ିଛି ଏବଂ ବୈଜ୍ଞାନିକ ପଦ୍ଧତିରେ ଚତୁର୍ଦ୍ଦିଗରେ ପହଞ୍ଚି ପାରିଛି। ଏହା ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଗର୍ବର ବିଷୟରେ ଭାରତର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ, ବିଜ୍ଞାନରୁ ଜନ୍ମିତ, ବିଜ୍ଞାନ ଦ୍ୱାରା ପରିଚାଳିତ ଏବଂ ବିଜ୍ଞାନ ଆଧାରିତ ରହି ଆସିଛି। ଟିକା ପ୍ରସ୍ତୁତ କରିବା ପୂର୍ବରୁ ଏବଂ ଟିକା ଦେବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ,ଏହି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅଭିଯାନରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସ୍ଥାନରେ ସାଇନ୍ସ ଓ ସାଇଣ୍ଟିଫିକ୍ ଆପ୍ରୋଚ୍ ସାମିଲ ରହିଛି। ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ଉତ୍ପାଦନକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ୟା ରହିଥିଲା, ଉତ୍ପାଦନକୁ ବଢ଼ାଇବାକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଥିଲା। ଏତେ ବଡ଼ ଦେଶ, ଏତେ ବଡ଼ ଜନସଂଖ୍ୟା! ଏହାପରେ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ରାଜ୍ୟରେ ଦୂର-ଉପାନ୍ତ ଅଞ୍ଚଳରେ ଠିକ୍ ସମୟରେ ଟିକା ପହଞ୍ଚାଇବା! ଏହା ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଭଗୀରଥ କାର୍ଯ୍ୟ ଠାରୁ କମ୍ ନଥିଲା। କିନ୍ତୁ, ବୈଜ୍ଞାନିକ ପଦ୍ଧତି ଏବଂ ନୂଆ ନୂଆ ନବୋନ୍ମେଷ ବଳରେ ଦେଶ ଏହି ସମସ୍ୟାର ସମାଧାନ ବାହାର କଲା। ଅସାଧାରଣ ଗତିରେ ସମ୍ବଳ ବୃଦ୍ଧି କରାଗଲା। କେଉଁ ରାଜ୍ୟକୁ କେତେ ଟିକା କେବେ ମିଳିବା ଉଚିତ୍, କେଉଁ ଅଞ୍ଚଳରେ କେତେ ଟିକା ପହଞ୍ଚିବା ଆବଶ୍ୟକ, ସେଥିପାଇଁ ମଧ୍ୟ ବୈଜ୍ଞାନିକ ଫର୍ମୁଲା ଆଧାରରେ‍ କାମ ଆରମ୍ଭ ହେଲା। ଆମ ଦେଶରେ କୋୱିନ ପ୍ଲାଟଫର୍ମର ଯେଉଁ ବ୍ୟବସ୍ଥା ତିଆରି କରାଗଲା, ତାହା ମଧ୍ୟ ବିଶ୍ୱରେ ଆକର୍ଷଣର କେନ୍ଦ୍ର ପାଲଟିଛି। ଭାରତରେ ତିଆରି ହୋଇଥିବା କୋୱିନ ପ୍ଲାଟଫର୍ମ, କେବଳ ସାଧାରଣ ଲୋକଙ୍କୁ ସୁବିଧା ଦେଲା ନାହିଁ, ବରଂ ଆମ ମେଡ଼ିକାଲ କର୍ମଚାରୀମାନଙ୍କର କାମକୁ ମଧ୍ୟ ସହଜ କଲା।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଚତୁର୍ଦ୍ଦିଗରେ ଏକ ବିଶ୍ୱାସ ରହିଛି, ଉତ୍ସାହ ରହିଛି। ସମାଜ ଠାରୁ ନେଇ ଅର୍ଥବ୍ୟବସ୍ଥାରେ, ଏକ ଆଶ୍ୱାସନା ରହିଛି, ଏକ ଆଶାବାଦ ରହିଛି। ବିଶେଷଜ୍ଞ ଏବଂ ଦେଶ-ବିଦେଶର ବିଭିନ୍ନ ଏଜେନ୍ସି  ଭାରତର ଅର୍ଥବ୍ୟବସ୍ଥାକୁ ନେଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସକାରାତ୍ମକ ମତପୋଷଣ କରୁଛନ୍ତି। ଆଜି ଭାରତୀୟ କମ୍ପାନୀରେ କେବଳ ରେକର୍ଡ ପରିମାଣର ନିବେଶ ହେଉ ନାହିଁ ବରଂ ଯୁବକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ରୋଜଗାରର ନୂଆ ସୁଯୋଗ ମଧ୍ୟ ସୃଷ୍ଟି ହେଉଛି। ଷ୍ଟାର୍ଟ-ଅପ୍ସରେ ରେକର୍ଡ ନିବେଶ ସହିତ ରେକର୍ଡ ସଂଖ୍ୟକ ଷ୍ଟାର୍ଟ-ଅପ୍ସ, ୟୁନିକର୍ଣ୍ଣ ହେଉଛନ୍ତି। ହାଉସିଂ କ୍ଷେତ୍ରରେ ମଧ୍ୟ ନୂତନ ଉତ୍ସାହ ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି। ବିଗତ ମାସଗୁଡ଼ିକରେ ଗ୍ରହଣ କରାଯାଇଥିବା ଅନେକ ସଂସ୍କାର ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାରର ଯୋଜନା, ଗତି ଶକ୍ତି ଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ନୂତନ ଡ୍ରୋନ ନୀତି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଭାରତର ଅର୍ଥବ୍ୟବସ୍ଥାକୁ ଆହୁରି ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବା ଲାଗି ବଡ଼ ଭୂମିକା ନିର୍ବାହ କରିବ। କରୋନା କାଳରେ କୃଷି କ୍ଷେତ୍ର ଆମ ଅର୍ଥବ୍ୟବସ୍ଥାକୁ ଦୃଢ଼ତା ପୂର୍ବକ ସମର୍ଥନ ଯୋଗାଇ ଦେଇଥିଲା। ଆଜି ରେକର୍ଡ ପରିମାଣର ଶସ୍ୟ ସରକାରୀ ସ୍ତରରେ କ୍ରୟ କରାଯାଉଛି, କୃଷକମାନଙ୍କ ବ୍ୟାଙ୍କ ଖାତାକୁ ସିଧାସଳଖ ଟଙ୍କା ପଠାଯାଉଛି। ଟିକାର ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିବା କଭରେଜ୍ ସହିତ ଆର୍ଥିକ-ସାମାଜିକ ଗତିବିଧି ହେଉ, ଖେଳ ଜଗତ ହେଉ, ପର୍ଯ୍ୟଟନ ହେଉ, ସବୁଆଡ଼େ ସକାରାତ୍ମକ ଗତିବିଧି ଦ୍ରୁତ ହେଉଛି। ଆଗାମୀ ପାର୍ବଣର ଋତୁ ଏହାକୁ ଆହୁରି ଗତିଶୀଳ କରିବ, ଶକ୍ତି ପ୍ରଦାନ କରିବ।

ସାଥୀମାନେ,

ଏପରି ଏକ ସମୟ ଥିଲା ଯେତେବେଳେ ମେଡ୍ ଇନ୍ ଅମୁକ କଣ୍ଟ୍ରି, ମେଡ଼ ଇନ୍ ସମୁକ କଣ୍ଟ୍ରିର ବହୁ ଚାହିଦା ଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଭାବେ ଅନୁଭବ କରିପାରୁଛନ୍ତି ଯେ ମେଡ୍ ଇନ ଇଣ୍ଡିଆର ଶକ୍ତି ଖୁବ୍ ଅଧିକ ବୃଦ୍ଧି ପାଇଛି। ସେଥିପାଇଁ  ଆଜି ମୁଁ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ପୁଣିଥରେ କହିବି ଯେ ଆମକୁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଛୋଟରୁ ଛୋଟ ଜିନିଷ, ଯାହା ମେଡ୍ ଇନ୍ ଇଣ୍ଡିଆ ହୋଇଥିବ, ଯାହାକୁ ତିଆରି କରିବା ଲାଗି କୌଣସି ଭାରତବାସୀଙ୍କ ଝାଳ ବୋହିଥିବ, ତାହାକୁ କିଣିବା ଉପରେ ଜୋର ଦେବା ଆବଶ୍ୟକ। ଏହା ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ କାରଣରୁ ସମ୍ଭବ ହୋଇପାରିବ। ଯେମିତି ସ୍ୱଚ୍ଛ ଭାରତ ଅଭିଯାନ, ଏକ ଜନ-ଆନ୍ଦୋଳନ ପାଲଟିଛି, ସେମିତି ଭାରତରେ ନିର୍ମିତ ସାମଗ୍ରୀ କିଣିବା, ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତିଆରି ଜିନିଷ କିଣିବା, ଭୋକାଲ ଫର ଲୋକାଲ ହେବା, ଏହା ଆମକୁ ଉପଯୋଗ କରିବାକୁ ହେବ। ତେଣୁ ମୋର ବିଶ୍ୱାସ ରହିଛି,  ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ ବଳରେ ଆମେ ଏହା ମଧ୍ୟ କରିପାରିବା। ଆପଣମାନେ ମନେ ପକାନ୍ତୁ। ଗତ ଦୀପାବଳିରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କ ମନ-ମସ୍ତିଷ୍କରେ ଏକ ଚାପ ରହିଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଏହି ଦୀପାବଳିରେ, ୧୦୦ କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ କାରଣରୁ, ଏକ ବିଶ୍ୱାସର ଭାବ ରହିଛି। ଯଦି ମୋ ଦେଶର ଟିକା ମୋତେ ସୁରକ୍ଷା ଦେଇପାରୁଛି ତା’ହେଲେ ମୋ ଦେଶର ଉତ୍ପାଦନ, ମୋ ଦେଶରେ ତିଆରି ସାମଗ୍ରୀ, ମୋ ଦୀପାବଳିକୁ ଆହୁରି ଭବ୍ୟ କରିପାରିବ। ଦୀପାବଳି ସମୟରେ ବିକ୍ରି ଗୋଟିଏ ପଟେ ଏବଂ ଅବଶିଷ୍ଟ ସମୟରେ ବିକ୍ରି ଅନ୍ୟପଟେ ରହିଥାଏ। 100 କୋଟି ଟିକା ଡୋଜ, ଆମର ଛୋଟ ଛୋଟ ଦୋକାନୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଆମର ଛୋଟ ଉଦ୍ୟୋଗୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଆମର ଉଠାଦୋକାନୀ ଭାଇ-ଭଉଣୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଆଶାର ଏକ କିରଣ ହୋଇ ଆସିଛି।

ସାଥୀମାନେ,

ଆଜି ଆମ ସାମ୍ନାରେ, ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବର ସଂକଳ୍ପ ଅଛି, ଏଭଳି ସ୍ଥିତିରେ ଆମର ଏ ସଫଳତା ଆମକୁ ଏକ ନୂତନ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ପ୍ରଦାନ କରିଥାଏ। ଆମେ ଆଜି କହିପାରିବା ଯେ ଦେଶ ବଡ଼ ଲକ୍ଷ୍ୟ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିବା ଏବଂ ତାହାକୁ ହାସଲ କରିବା ଶିଖିଛି। କିନ୍ତୁ ଏଥିପାଇଁ ଆମକୁ ନିରନ୍ତର ସାବଧାନ ରହିବାର ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି। ଆମେ ବେପରୁଆ ହେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। କବଚ ଯେତେ ଉତ୍ତମ ହେଉ, କବଚ ଯେତେ ଆଧୁନିକ ହେଉ, କବଚରୁ ସୁରକ୍ଷାର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଗ୍ୟାରେଣ୍ଟି ମିଳୁ, ତଥାପି, ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଯୁଦ୍ଧ ଚାଲିଛି, ଅସ୍ତ୍ର ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ମୋର ଅନୁରୋଧ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଆମ ପର୍ବପର୍ବାଣୀକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସତର୍କତାର ସହିତ ପାଳନ କରିବା। ଯେଉଁମାନେ ବର୍ତ୍ତମାନସୁଦ୍ଧା ଟିକା ନେଇନାହାନ୍ତି। ସେମାନେ ଏହାକୁ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ପ୍ରାଥମିକତା ଦିଅନ୍ତୁ। ଯେଉଁମାନେ ଟିକା ନେଇସାରିଛନ୍ତି, ସେମାନେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଅନୁପ୍ରାଣିତ କରନ୍ତୁ। ମୋର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭରସା ରହିଛି ଯେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ମିଶି ପ୍ରୟାସ କଲେ, କରୋନାକୁ ଖୁବଶୀଘ୍ର ପରାଜିତ କରିପାରିବା। ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଆଗାମୀ ପର୍ବପର୍ବାଣୀ ପାଇଁ ପୁଣିଥରେ ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାମନା। ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ।

ଧନ୍ୟବାଦ !