PM Modi speaks at the 46th Indian Labour Conference
The country cannot be happy, if the worker is unhappy. As a society, we need to respect the Dignity of Labour: PM
If we want to move ahead, we need to give opportunities to our youth. Giving opportunities to apprentices is the need for the hour: PM Modi

केंद्र और राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न सरकारों के प्रतिनिधि बंधु गण,

ये भारत की श्रम-संसद है और एक लंबे अरसे से हमारे देश में त्रिपक्षीय वार्ता का सिलसिला चला है। एक प्रकार से ये त्रिपक्षीय वार्ता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ये अपने आप में एक उज्‍ज्‍वल इतिहास है कि 75 साल का हमारे पास एक गहरा अनुभव है। उद्योग जगत सरकार एवं श्रम संगठन गत 75 वर्ष से लगातार बैठ करके विचार-विमर्श करके मत भिन्‍नताओं के बीच भी मंथन करके अमृत निकालने का प्रयास करते रहे हैं। और उसी संजीवनी से देश को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और उसी कड़ी में आज यह श्रम संसद हो रहा है। हम सबके लिए प्रेरणा की बात है कि यह वो समारोह है जहां कभी बाबा साहेब अंबेडकर का मार्ग दर्शन मिला था। यह वो समारोह है जिसे कभी भारत के भूत-पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमान वीवी गिरि जी का मार्ग दर्शन मिला था। अनेक महानुभावों के पद चिन्‍हों पर चलते-चलते आज हम यहां पहुंचे हैं। समय का अपना एक प्रभाव होता है। आज से 70-75 साल पहले जिन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होती थी वो आज जरूरत नहीं होगी और आज जिन बिंदुओं पर विचार करने की आवश्‍यकता है हो सकता है 25 साल बाद वह भी काल बाह्य हो जाए, क्‍योंकि एक जीवंत व्‍यवस्‍था का यह लक्षण होता है, नित्‍य नूतन, नित्‍य परिवर्तनशील और अच्‍छे लक्षण की पूर्ति के लिए एकत्र होकर आगे बढ़ना है। इस बात में कोई दुविधा नहीं है। इस बात में कोई मत-मतांतर नहीं है कि राष्‍ट्र के निर्माण में श्रमिक का कितना बड़ा योगदान होता है, चाहे वो किसान हो मजदूर हो, वो unorganized लेबर का हिस्‍सा हो, और हमारे यहां तो सदियों से इन सबको एक शब्‍द से जाना जाता है- विश्‍वकर्मा। विश्‍वकर्मा के रूप में जिसको जाना जाता है, माना जाता है और इसलिए अगर श्रमिक रहेगा दुखी , तो देश कैसे होगा सुखी? और मैं नहीं मानता हूं कि इन मूलभूत बातों में हममें से किसी में कोई मतभेद है। मैं श्रम को एक महायज्ञ मानता हूं जिसमें कोटि अवधि लोग अपनी आहूति देते हैं। सिर्फ श्रम की नहीं, कभी-कभार तो सपनों की भी आहूति देते हैं और तब जा करके किसी ओर के सपने संजोए जा सकते हैं। अगर एक श्रमिक अपने सपनों को आहूत न करता तो किसी दूसरे के सपने कभी संजोए नहीं जा सकते। इतना बड़ा योगदान समाज के इस तबके का है और इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करते हुए हमने आगे किस दिशा में जाना है उस पर हमें आगे सोचना होगा। जब तक श्रमिक, मालिक- उनके बीच परिवार भाव पैदा नहीं होता है, अपनेपन का भाव पैदा नहीं होता है। मालिक अगर यह सोचता है कि वो किसी का पेट भरता है और श्रमिक यह सोचता है कि मेरे पसीने से ही तुम्‍हारी दुनिया चलती है तो मैं नहीं समझता कि कारोबार ठीक से चलेगा। लेकिन अगर परिवार भाव हो, एक श्रमिक का दुख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फैक्‍टरी का हुआ कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता | और यह जिम्‍मेवारी जब हम निभाएंगे तब जाकर के, मैं तो चाहूंगा कभी यह भी सोचा जा सकता है क्‍या। इन सारी चर्चाओं का कभी वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन होने की आवश्‍यकता है। ऐसे बड़े उद्योग और ऐसे छोटे उद्योग या मध्‍यम दर्जे के उद्योग 50 साल पुराने है, लेकिन कभी हड़ताल नहीं हुई है क्‍या कारण होगा। उसको चलाने वाले लोगों की सोच क्‍या रही होगी। उन्‍होंने उनके साथ किस प्रकार से नाता जोड़ा है, क्‍या हम आज नए उद्योगकारों को, establish उद्योगकारों को , उनको यह नमूना दिखा सकते हैं कि हमारे सामने, हमारे ही देश में, इसी धरती में ये 50 उद्योग ऐसे हैं जो 50 साल से चल रहे हैं। हजारों की तादाद में श्रमिक है। लेकिन न कभी संघर्ष हुआ है, न कभी हड़ताल हुई है, न उनकी कोई शिकायत, न इनकी कोई शिकायत। एक मंगलम माहौल जिन-जिन इकाईयों में है, कभी उनको छांटकर निकालना चाहिए और उस मंगलम का कारण क्‍या है, इस मंगल अवस्‍था को प्राप्‍त करने के उनके तौर तरीके क्‍या है। अगर इन चीजों को हम श्रमिकों के सामने ले जाएंगे, इन चीजों को हम उद्योगकारों के सामने ले जाएंगे तो उनको भली-भांति समझा सकते हैं और मंगलम का माहौल जहां होगा, वहां यह भी नजर आया होगा कि सिर्फ श्रमिक का असंतोष है, ऐसा नहीं है। वहां यह भी ध्‍यान में आया होगा कि उस उद्योग का विकास भी उतना ही हुआ होगा और उन श्रमिकों का विकास भी उतना ही हुआ होगा। जब तक हम इस भावनात्‍मक अवस्‍था को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास नहीं करते और जो सफल गाथाएं हैं और उन सफल गाथाओं को हम उजागर नहीं करते, मैं नहीं मानता हूं कि हम सिर्फ कानूनों के द्वारा बंधनों को लगाते-लगाते समस्‍याओं का समाधान कर पाएंगे। हां, कानून उनके लिए जरूरी है कि जो किसी चीज को मानने को तैयार नहीं होते, श्रमिक को इंसान भी मानने को तैयार नहीं होते। उनकी सुख-सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उसकी minimum आवश्‍यकताओं की ओर भी देखने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को कानूनों की उतनी ही जरूरत होती है और इसलिए हम इस व्‍यवस्‍था को उस रूप में समझकर चलाएं। एक सामाजिक दृष्‍टि से भी हमारे यहां सोचने की बहुत आवश्‍यकता है। किसी न किसी कारण से हमारे भीतर एक बहुत बड़ी बुराई पनप गई है। हमारी सोच का हिस्‍सा बन गई है। हर चीज को देखने के हमारे तरीके की आदत सा बन गयी है और वो है हम कभी भी श्रम करने वाले के प्रति आदर के भाव से देखते ही नहीं। कोई बढ़िया कपड़े पहन करके हमारे दरवाजे की घंटी बजाए, दोपहर दो बजे हम आराम से सोए हों, कोट-पैंट सूट पहनकर आए और घंटी बजाए तो नींद खराब होगी ही होगी, दरवाजा खोलेंगे और जैसे ही उसको देखेंगे तो कहेंगे आइए आइए कहां से आए हैं, क्‍या काम था, बैठिए-बैठिए। और कोई ऑटो रिक्‍शा वाले ने घंटी बजाई, पता नहीं चलता है दोपहर दो बजे हम सोते हैं, इस समय घंटी बजा दी। क्‍यों भई यह फर्क क्‍यों?



यह जो हमारी सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी कमी आई है सदियों के कारण आई हुई है। लेकिन कभी न कभी dignity of labour , श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक का सम्‍मान ये समाज के नाते अगर हम स्‍वभाव नहीं बनाएंगे तो हम हमारे श्रमिकों के प्रति जो कि उसके बिना हमारी जिन्‍दगी नहीं है, अगर कोई धोबी बढ़िया सा iron नहीं करता तो मैं कुर्ता पहनकर कहां से आता यहां और इसलिए जिनके भरोसे हमारी जिन्‍दगी है उनके प्रति सम्‍मान का भाव यह सामाजिक चरित्र कैसे पैदा हो, उसके लिए हम किस प्रकार से व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करे। हमारे बच्‍चों की पाठ्य पुस्‍तकों में उस प्रकार के syllabus कैसे आए ताकि सहज रूप से आनी वाली पीढ़ियां हमारे श्रमिक के प्रति सम्‍मान के भाव से देखने लगे। आप देखिए माहौल अपने आप बदलना शुरू हो जाएगा। हमारी सरकार को सेवा करने का अवसर मिला है, श्रम संगठनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है और त्रिपक्षीय बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं। कई पुरानी-पुरानी गुत्‍थियां हैं, सुलझानी है और मुझे विश्‍वास है कि देश के श्रमिकों के आशीर्वाद से इन गुत्‍थियों को सुलझाने में हम सफल होंगे और समस्‍याओं का समाधान करने में हम कोई न कोई रास्‍ते खोजते चलेंगे। और सहमति से कानूनों का भी परिवर्तन करना होगा। कानूनों में कोई कुछ जोड़ना होगा, कुछ निकालना होगा वो भी सहमति से करने का प्रयास, प्रयास करते ही रहना चाहिए और निरंतर प्रक्रिया चलती रही है, आगे भी चलती रहने वाली है। कोई भी सरकार आए, ये कोई आखिरी कार्यक्रम कभी होता नहीं है और इसलिए मैं समझता हूं कि इस प्रक्रिया का अपना महत्‍व है। मेरा विश्‍वास रहा है- ‘minimum government , maximum governance’ और इसलिए ये जो कानूनों के ढेर हैं कानूनों का ऐसा कहीं खो जाए इन्‍सान। पता नहीं इतने कानून बनाये कर रखे हुए और हरेक को अपने फायदे वाला कानून ढूंढ सकते हैं ऐसी स्थिति है। हर कोई उद्योगकार एक ही कानून में से उद्योगकार को अपने मतलब का कानून निकलाना है तो वो भी निकाल सकता है सामाजिक संगठन को निकालना है तो वो भी निकाल सकता है, सरकार को निकालना है तो वो भी निकाल सकती है। क्‍योंकि टुकड़ों में सब चीजें चलती रही हैं | जब तक हम एक एकत्रित भाव से, composite भाव से, हमें जाना कहां है उसको ले करके , और इसीलिए मैंने एक कमेटी भी बनाई है के इन सबमें जो पुराने कानूनों को जरा देखरेख में सही कैसे किया जाए। और सच्‍चे अर्थ में जिनके लिए बनाए गए हैं कानून उनको लाभ हो रहा है या नहीं हो रहा। वरना कोई और जगह पर ऐसा कानून बनके बैठा हुआ है जो इसको आगे ही नहीं जाने देता। अब श्रमिक कहां लड़ेगा, कहां जाएगा। वो क्‍या कोर्ट कचहरी में इतने महंगे वकील रखेगा क्‍या। और इसलिए मेरा यहा आग्रह है और मैं ये कोशिश कर रहा हूं कि ये कानूनों का एक बहुत बड़ा जाल हो गया है उसका सरलीकरण हो, गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी अपने हकों को भली भांति समझ पाएं, हकों को प्राप्‍त कर पाएं। ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को हमने विकसित करने की दिशा में हमारा प्रयास है और मेरा विश्‍वास है कि हम उसको कर पाएंगे। मैं कभी-कभी उद्योग जगत के मित्रों से भी कहना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कभी हमारे इस Forum में एक और पहलू पर भी हम सोच सकते हैं क्‍या, क्‍योंकि हमने अपने एजेंडे को बड़ा सीमित कर दिया है। और जब तक उसका दायरा नहीं बढ़ाऐंगे पूरे माहौल में बदलाव नहीं आएगा। कितने उद्योगार हैं जिन्‍होंने अपने उद्योग चलाते-चलाते ऐसा माहौल बनाया, ऐसी व्‍यवस्‍था बनाई कि खुद का ही काम करने वाला एक मजदूर आगे चल करके Entrepreneur बना। कभी ये ऐसे ही तो खोज के निकालना चाहिए क्‍या उद्योगकार का यही काम है क्‍या। क्‍या 18-20 साल की उम्र में उसके यहां आया वो 60 साल का होने के बाद किसी काम का न रहे तब तक उसी के यहां फंसा पड़ा रहे। क्‍या ऐसा माहौल कभी उसने बताया कि हां मेरे यहां मजदूर के यहां पे आया था लेकिन मैंने देखा भई उसमें बहुत बड़ी क्षमता है, टेलैंट है, थोड़ा मैं उसको सहारा दे दूं वो अपने-आप में एक Entrepreneur बन सकता है और मैं ही एक-आध पुर्जा बनाएगा तो मैं खुद खरीद लूंगा जो मेरी फैक्‍टरी के लिए जरूरी है तो एक अच्‍छा Entrepreneur तैयार हो जाएगा।



कभी न कभी हमें सोचना चाहिए हमारे देश में छोटे और मध्‍यम एवं बड़े उद्योगकार कितने हैं कि जो हर वर्ष अपने ही यहां काम करने वाले कितने मजदूरों को उद्योगकार बनाया हो, Entrepreneur बनाया हो, Supplier बनाया हो, कितनों को बनाया कभी ये भी तो हिसाब लगाया जाए। उसी प्रकार से हमने देखा है कि आईटी फर्म, उसके विकास का मूल कारण क्‍या है, IT Firm के विकास का मूल कारण यह है कि उन्‍होंने अपन employee को कहा कि कुछ समय तुम्‍हारा अपना समय है। तुम खुद सॉफ्टवेयर‍ विकसित करो, तुम अपने ‍दिमाग का उपयोग करो और ये motivation के कारण सॉफटेवयर की दुनिया में नई-नई चीजें वो लेकर के आए फिर वो कम्‍पनी की बनी और बाद में जा करके वो बिकी। अवसर दिया गया, हमारे इतने सारे उद्योग चल रहे हैं, मैन्‍युफैक्‍चरिंग का काम करते हैं, कैमिकल एक्टिविटी का काम करते हैं, क्‍या हमने हमारे यहां इस टैलेंट को innovation के लिए अवसर दिया है क्‍या? क्‍या उद्योगकारों को पता है कि जिसको आप अनपढ़ मानते हो, जिसको आप unskilled labour मानते हो, उसके अंदर भी वो ईश्‍वर ने ताकत दी है, वो आपकी फैक्‍टरी में एकाध चीज ऐसी बदल देता है, कि आपके प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी इतनी बढ़ जाती है, बाजार में बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हो जाता है, आप फायदा तो ले लेते हो लेकिन उसके innovation skill को recommend नहीं करते हो। मैं मानता हूं हमारे उद्योगकारों ने अपने जीवन में, सरकारों ने भी और श्रम संगठनों ने भी पूछना चाहिए कि कितने उद्योगकार हैं, कितने उद्योग हैं कि जहां पर इनोवेशन को बल दिया गया है। हर वर्ष कम से कम एक नया इनोवेटेड काम निकलता है क्‍या? हमारे यहां सेना के विशेष दिवस मनाए जाते हैं,आर्मी का, एयरफोर्स का, नेवी का। राष्‍ट्रपति जी, प्रधानमंत्री सब जाते हैं, एट-होम करते हैं वो, तो मैं पिछली बार जब हमारे सेना के लोगों के पास गया तो मैंने उनको कहा भई ठीक है ये आपका चल रहा है कि ये ही चलाते रहोगे क्‍या? हम आते हैं, 30-40 मिनट वहां रुकते हैं, चायपान होता है, फिर चले जाते हैं। मैंने कहा मेरा एक सुझाव है अगर आप कर सकते हो तो, तो बोले क्‍या है सर? मैंने कहा क्‍या फौज में ऐसे छोटे-छोटे लोग हैं क्‍या, सिपाही होंगे, छोटे-छोटे लोग हैं, लेकिन उन्‍होंने काम करते-करते कोई न कोई इनोवेशन किया है जो देश की सुरक्षा के लिए बहुत काम आता है। उसमें नया आइडिया, क्‍योंकि वो फील्‍ड में है, उसे पता रहता है कि इसके बजाय ऐसा करो तो अच्‍छा रहेगा। मैंने ये कहा तो फिर हमारे आर्मी के लोगों ने ढूंढना शुरू किया।

बहुत ही कम समय मिला था लेकिन कोई 12-15 लोगों को ले आए वो और जब उनकी innovations मैंने देखा, मैं हैरान था सेना के काम आनेवाली टेक्‍नोलॉजी के संदर्भ में, कपड़ों के संदर्भ में, इतने बारीक छोटी-छोटी चीजों में उन्‍होंने बदलाव लाकर के बताया था अगर इसको हम मल्‍टीप्‍लाई करें तो सेना के कितना बड़ा काम आएगा और भारत की रक्षा के लिए कितना बड़ा काम आएगा। लेकिन उस आखिरी इन्‍सान की तरफ देखता कौन है जी? उसकी क्षमता को कौन स्‍वीकार करता है? मुझे ये माहौल बदलना है कि मेरे उद्योगकार मित्र बहुत बड़ी डिग्री लेकर आया हुआ व्‍यक्ति ही दुनिया को कुछ देता है ऐसा नहीं है। छोटे से छोटा व्‍यक्ति भी दुनिया को बहुत कुछ दे करके जाता है, सिर्फ हमारी नजरों की तरफ नहीं होता है और इसलिए हम एक कल्‍चर विकसित कर सकते हैं, व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं कि जिसमें उन, और मैं तो चाहता हूं श्रमिक संगठन भी ऐसे लोगों को सम्‍मानित करें, उद्योग भी सम्‍मानित करें और सरकार भी श्रम संसद के समय सामान्‍य मजदूर ने की हुई इनोवेशन जिसने देश का भला किया हो, उसमा सम्‍मान करने का कार्यक्रम करके हम श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़ाएं उस दिशा में हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमें एक नए तरीके से चीजों को कैसे सोचना चाहिए, नई चीजों में कैसे बदलाव लाना चाहिए, उस पर सोचने की आवश्‍यकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर हमेशा मजदूर क्‍यों रहे? उसी प्रकार से कुछ लोग ऐसे होते हैं कि पिताजी एक कारखाने में काम करते हैं, बेटा भी साथ जाना शुरू कर दिया, और वहीं काम करते, करते, करते एकाध चीज सीख लेता है और अपनी गाड़ी चला लेता है। उसके पास ऑफिशियल कोई डिग्री नहीं होती है, कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है और उसके लिए वो हमेशा उस उद्योगकार की कृपा पर जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे बड़ा शोषणा क्‍या हो सकता है कि उसको जो जिसके यहां उसके पिताजी काम करते थे, अब उसको वहीं पर काम करना पड़ रहा है, क्‍यों, क्‍योंकि उसके पास स्किल है लेकिन स्किल को दुनिया के अंदर ले जाने के लिए एक जो सर्टिफिकेट चाहिए वो नहीं है तो कोई घुसने नहीं देता है और वो भी कहीं जाने की हिम्‍मत नहीं करता है, उसको लगता है चलिए ये ही मेरे मां-बाप हैं उन्‍होंने ही मेरे बाप को संभाला था, मुझे भी संभाल लिया, चलिए भई जो दें मैं काम कर लूंगा। इससे बड़ी कोई अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती हमारी। और इसको बदलने का मेरे भीतर एक दर्द बढ़ा था और उसी में से हमने एक योजना बनाई है और मैं मानता हूं ये योजना श्रमिक के जीवन को और मैं नहीं मानता किसी श्रमिक संगठनों ने इस पर ध्‍यान गया होगा। कभी उसने सोचा नहीं होगा कि कोई सरकार श्रमिकों के लिए सोचती है तो कैसे सोचती है? हमने कहा कि जो परम्‍परागत इस प्रकार के शिक्षा पाए बिना ही चीजों को करता है भले ही उसकी उम्र 30 हो, 40 हो गई, 50 हो गई होगी, सरकार ने उसको सर्टिफाई करना चाहिए,official recognition देना चाहिए, official government का सर्टिफिकेट देना चाहिए ताकि उनका confidence लेवल बढ़ेगा, उसका मार्केट वैल्‍यू बढ़ेगा और वो एक उद्योगकार के यहां कभी अपाहिज बन करके जिन्‍दगी नहीं गुजारेगा। हमने officially ये decision लिया है।



कहने का तात्‍पर्य ये है कि हमें इन दिशाओं में सोचने की आवश्‍यकता है। हमें बदलाव करने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं। इसी प्रकार से एक बात की ओर ध्‍यान देने की मैं आवश्‍यकता समझता हूं, इसको कोई गलत अर्थ न निकाले, कोई बुरा न माने। कभी-कभार, जब चर्चा होती है कि उद्योग की भलाई, ये बात ठीक है कि देश की भलाई के लिए उद्योगों का विकास आवश्‍यक है, उद्योग की भलाई और उद्योगपति की भलाई, इसमें बहुत ही बारीक रेखा होती है। देश की भलाई और सरकार की भलाई इसमें बहुत बारीक रेखा होती है। श्रम संगठन की भलाई और श्रमिक की भलाई, बहुत बारीक रेखा होती है। और इसलिए इस बारीक रेखा की नजाकत को कभी-कभार उद्योग बचाना चाहते हैं लेकिन उनमें कभी-कभार हम उद्योगपति को बचा लेते हैं। कभी-कभार हम बात तो कर लेते हैं देश को बचाने की लेकिन कोशिश सरकार को बचाने की करते हैं। और उसी प्रकार से कभी-कभार हम बात श्रमिक की करते हैं लेकिन हम कोशिश हमारे श्रम संगठन की सुरक्षा की करते हैं। हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं, हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं और तीनों ने इस बारीक रेखा की मर्यादाओं को स्‍वीकार करना होगा, letter and spirit को स्‍वीकार करना होगा तब मैं मानता हूं श्रमिक का भी भला होगा, देश के उद्योग के विकास की यात्रा भी चलेगी और देश का भी भला होगा, सरकारों की भलाई के लिए नहीं चलता होगी। और इसलिए इन मूलभूत बातों की ओर हम कैसे मिल-बैठ करके एक सकारात्‍मक माहौल बनाने के भी दस कदम हो सकते हैं, श्रमिक की भलाई के दस कदम हो सकते हैं आवश्‍यक है तो राष्‍ट्र को आगे बढ़ाने की भी दस कदम हो सकते हैं वो भी इसके साथ-साथ आना चाहिए। जब तक हम इन बातों को संतुलित रूप से आगे नहीं ले जाएंगे, तब तक हम माहौल बदलने में सफल नहीं होंगे। और मुझे विश्‍वास है कि आज की श्रम संसद में बैठ करके हम लोग उस माहौल को निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़गे। भारत में 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 साल से कम आयु की है। हमारा देश एक प्रकार से विश्‍व का सबसे नौजवान देश है। आज दुनिया को skilled workforce की आवश्‍यकता है। Skill Development और Skill India ये मिशन हमारे नौजवानों को रोजगार कैसे मिले, अगर हम जो आज रोजगारी में है जो हमारे संगठन के सदस्‍य हैं, उनकी चिन्‍ता कर-करके बैठेंगे तो हो सकता है कि उनके हितों का भी भला हो जाएगा, उनकी रक्षा भी हो जाएगी, दो-चार चीजें हम उनको दिलवा भी देंगे लेकिन यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्ति ऐसी सीमित सोच वाला नहीं है ये मेरा विश्‍वास है। यहां बैठा हुआ हर व्‍यक्ति जो आज श्रमिक है उनकी तो चिन्‍ता करता ही करता है, लेकिन जो नौजवान बेरोजगार हैं जिनको कहीं न कहीं काम मिल जाए, इसकी उसको तलाश है, हमें उनके दरवाजे बंद करने का कोई हम नहीं है। जब तक हम हमारे देश के और नौजवानों कोरोजगार देने के लिए अवसर उपलब्‍ध नहीं कराएंगे तो हम जाने-अनजाने में गरीब का कहीं नुकसान तो नहीं कर देंगे। हो सकता है वो आज गरीब है श्रमिक नहीं बन पाया है, वो दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है और इसीलिए सरकार ने एक initiative लिया है apprenticeship को प्रोत्‍साहन देना। हमें जान करके हैरानी होगी, हम सबको लगता है हमारा देश आगे बढ़ना चाहिए और कभी पीछे रहता है तो हमीं लोग कहते हैं देखो बातें बड़ी करते थे,वो तो वहां पहुंच गया ये यहां रह गया, ये हम करते ही हैं। लेकिन जो पहुंचे हैं, आज चीन के अंदर जो भी साम्‍यवादी विचार से चलने वाले मूलभूत तो लोग हैं। चीन के अंदर दो करोड़ apprenticeship पर लोग काम कर रहे हैं,चीन के अंदर। जापान में एक करोड़ apprenticeship में काम कर रहे हैं। जर्मनी बहुत छोटा देश है, हमारे देश के किसी राज्‍य से भी छोटा देश है वहां पर तीस लाख लोग apprenticeship के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे आज दुख के साथ कहना चाहिए, सवा सौ करोड़ का हिन्‍दुस्‍तान,सिर्फ तीन लाख लोग apprenticeship पर काम कर रहे हैं। मेरे नौजवानों का क्‍या होगा मैं पूछना चाहता हूं।मैं सभी श्रमिक संगठनों से पूछना चाहता हूं कि इन नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए। इन नौजवानों के लिए अवसर खुलने चाहिए कि नहीं खुलने चाहिए। और भारत को आगे बढ़ाना है तो हमारे skill को काम में लाने के लिए ये हमें अवसर देना पड़ेगा। सरकारों ने, उद्योगकारों ने भी सोचना होगा इसलिए कि कानून के दायरे में फंस जाएंगे इसलिए कोई apprenticeship किसी को देनी नहीं, किसी नौजवान को अवसर नहीं देना, ये उद्योगकार जो दरवाजे बंद करके बैठे हैं, मैं नहीं मानता हूं ये लम्‍बे अरसे तक दरवाजे बंद करके बैठ पाएंगे। देश का नौजवान लम्‍बे अरसे तक इन्‍तजार नहीं करेगा। और इसलिए मैं उद्योगकारों को विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि आपका दायित्‍व बनता है, मुनाफा कम होगा, होगा लेकिन अगर इतनी मात्रा में आपके यहां श्रमिक हैं तो इतनी मात्रा में apprenticeship, ये आपकी social responsibility का हिस्‍सा बनना चाहिए। और इस प्रकार से क्‍या हम सपना नहीं दे सकते। दो करोड़ कर न पायें ठीक है, जब कर पाएंगे, कर पाएंगे अभी कम से कम तीन लाख में से 20 लाख apprenticeship पर जा सकते हैं हम क्‍या। कम से कम इतना तो करें। करोड़ों नौजवानों को रोजगार चाहिए, कहीं से तो शुरू करें। और इसलिए मैं चाहूंगा कि जो श्रमिक आज हैं उनकी चिन्‍ता करने वाले लोगों का ये भी दायित्‍व है कि जिनकी श्रमिक बनने की संभावना है उनकी जिन्‍दगी की भीचिन्‍ता उस नौजवान की भी करने की आवश्‍यकता है जो गरीब है। पिछले 16 अक्‍टूबर को हमने श्रमेव जयते के अभियान की शुरुआत की थी। ये सर्वांगीण प्रयास है हमारा। जिन सुविधाओं की शुरुआत हमने की उनकी प्रगति आप सबकी नजर में है। यूनिवर्सल एकाउंट नम्‍बर (यूएएन) इसके माध्‍यम से प्रोविडेंट फंड के एकाउंट पोर्टेबल हो गए हैं बल्कि लगभग 4 करोड़ 67 लाख मजदूरों को digital network platform का already लाभ मिलना शुरू हो गया है। पीएफपी ऑनलाईन लाभ ले रहा है ये चीजें नहीं थीं, इन चीजों का वो लाभ ले रहा है ये ही तो श्रमिक को empower करने के लिए टेक्‍नोलॉजी का सदुपयोग करने का प्रयास किया है। जब हम सरकार में आए हमारे देश में कई लोग ऐसे थे कि जिनको पचास रुपये पेंशन मिलता था, अस्‍सी रुपये पेंशन मिलता था, सौ रुपये पेंशन मिलता था,कुछ लोग तो पेंशन लेने के लिए जाते नहीं थे क्‍योंकि पेंशन से ऑटोरिक्‍शा का खर्चा ज्‍यादा होता था। इस देश में करीब-करीब बीस लाख से अधिक ऐसे श्रमिक थे जिनको पचास रुपया, सौ रुपया, दौ सौ रुपया पेंशन मिलता था। हमने आ करके, बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लगा है, सबके लिए minimum पेंशन एक हजार रुपया कर दिया है। मैं आशा करता हूं कि हमारे श्रमिक संगठन, ये हमारा जो pro-active initiative है उसके प्रति भी उस भाव से देखें ताकि हम सबको मिल करके दौड़ने का आनंद आ जाए,चार नई चीजें करने का उमंग आ जाए क्‍योंकि हमें चलना नहीं है और मुझे मैं मानता हूं, अगर इस देश में इतने सारे प्रधानमंत्री हो गए होंगे लेकिन श्रमिकों पर किसी एक प्रधानमंत्री पर सबसे ज्‍यादा हक है तो मुझ पर। क्‍योंकि मैं उसी बिरादरी से निकल कर आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और इसलिए गरीब के हाल को समझने के लिए मुझे कैमरामैन को लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।मैं उसको भली-भांति समझता हूँ और इसलिए जो बातें मैं बता रहा हूं। भीतर एक आग है, कुछ करना है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, वंचित, दलित, पीड़ित शोषित उनके लिए कुछ करना है। लेकिन हरेक के करने की सोच अलग होगी, रास्‍ते अलग होंगे। हमारी एक अलग सोच है, अलग रास्‍ते है लेकिन लक्ष्‍य यही है कि मेरे देश के मजदूर का भला हो, मेरे देश के गरीब का भला हो, मेरे देश के किसानों का भला हो, ये सपने लेकर के हम चल पड़े हैं। और इसलिए जैसा मैंने कहा हमने apprentice sector में सुधार किया। हमने on the job training के मौके बढ़ गए हैं, उस दिशा में हमने काम किया है। आज हमने हेल्‍थ को सेक्‍टर को ESIC 2.0 स्‍कीम को लांच किया है। हम कभी-कभार ये तो देखते हैं कि भई काम मिलना चाहिए, लेकिन कैसे मिले, मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है। उसके लिए न सरकारों को फुरसत है, न श्रमिक संगठनों को फुरसत है। उनको तो लगता है देखो यार, कागज पर दिखा दे, ये तुमको दिलवा दिया या नहीं दिलवा दिया। वो श्रमिक भी बड़ा खुश है, यार मैं इसका मेम्‍बर बन गया हूं मेरा काम हो गया। मैं इस स्‍थिति को बदलना चाहता हूं। मैं श्रमिक संगठन और सरकार की पाटर्नरशिप से आगे बढ़ना चाहता हूं। कंधे से कंधा मिलाकर के आगे चलना चाहता हूं और अगर हमने ये अस्‍पतालों की व्‍यवस्‍था को बदलने की दिशा में काम किया, अब छोटा निर्णय है कि भई हर दिन चद्दर बदलो। अब मुझे बताइए health की दृष्‍टि से, hygiene की दृष्‍टि से, ये सब जानते हैं कि बदलनी चाहिए और लोग मानते होंगे कि बदलें, लेकिन हमको मालूम है कि लोग नहीं बदलते। ठीक है, आया है patient पड़ा है। आखिरकार मुझे रास्‍ता खोजना पड़ा, मैंने कहा हर दिन की चद्दर का कलर ही अलग होगा, patient को पता चलेगा कि चद्दर बदली कि नहीं बदली। हमारे देश के बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है वो मुझे सवाल करते रहते हैं कि मोदी कुछ बड़ा ले आओ, कुछ बड़ा। बहुत सरकारें बड़ा-बड़ा ले आईं। मुझे तो मेरे गरीब के लिए जीना है, मेरे गरीब के लिए कुछ काम करना है इसलिए मेरा दिमाग इसी में चलता रहता है। यही, यही मैं सोच, और मैं दिल से बातें कर रहा हूं कि ये अन्‍य जो कई चीजें लाए हैं। हम चाहते हैं कि श्रमिक की हेल्‍थ को लेकर के चिन्‍ता होनी चाहिए, होनी चाहिए। और हमने उस दिशा में हमने एक तो उसके सारे हेल्‍थ रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए ताकि अब उसको अपना ब्‍लड टेस्‍ट का क्‍या हुआ, यूरिन टेस्‍ट का क्‍या हुआ, दुनिया भर में चक्‍कर नहीं काटना पड़ेगा। अपने मोबाइल फोन पर सारी चीजें उपलब्‍ध हो जाएं ये व्‍यवस्‍था की है ताकि श्रमिक को सुविधा कैसे हो, हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। और मैं मानता हूं कि उस काम के कारण उसको लाभ होगा।



आज हमारे देश में असंगठित मजदूर कुल मजदूरों का 93 पर्सेंट है। इस सरकार ने असंगठित मजदूरों के संबंध में बहुत ही constructive way में और well planned way में योजनाएं बनाई हैं और हम आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा कैसे मिले। न उसे स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा है, न जीवन बीमा है और न हीं पेंशन है और बड़ी संख्‍या में असंगठित ग्रामीण मजदूर अनपढ़ हैं, जिन्‍हें अपनी बात कहां कहना है, कैसे पहुंचे, इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। ऐसे मजदूर के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में सरकार का उत्‍तरदायित्‍व मानता हूं। देश के गरीब, असंगठित वर्गों को ध्‍यान में रख करके हमने तीन महत्‍वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं । और ये योजनाएं गरीब के लिए हैं। अमीर का उससे कोई लेना-देना नहीं है। और मैं मानता हूं, सभी श्रमिक संगठनों से मैं आग्रह करूंगा कि आप भी इस बात में मदद कीजिए। अगर किसी के घर में, हम कई यहां संगठन है जो असंगठित मजदूरों का काम करते हैं। कुछ लोग हैं जो घरों में बर्तन साफ करने वाले लोग होते हैं, उनका संगठन चलाते हैं। क्‍या हम कोशिश नहीं करे तो उसके मालिकों को मिल करके कहे कि भई आपके यहां ये लड़का कपड़े धोता है, बर्तन साफ करता है या खाना पकाता है या गाड़ी चलाता है। या आपका धोबी है। इसके लिए ये-ये सरकार की स्‍कीम है। आप एक मालिक हो, इसके लिए इतना पैसा बैंक में डालो, उसका जीवन भरा हो जाएगा। मैं मानता हूं हर कोई इसको करेगा। हम मध्‍यम वर्ग के लोगों को भी अगर समझाएंगे कि भई तुम्‍हारे साथ काम करने वाले जो गरीब लोग है उनको इन स्‍कीम का फायदा तुम दो। तुमको कोई महंगा नहीं पड़ने वाला है, तुम्हारे लिए तो एक फाइव स्‍टार होटल का एक खाने से ज्‍यादा का खर्च नहीं है। लेकिन उस गरीब की तो जिन्‍दगी बदल जाएगी और इसलिए हमने अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन जयोति बीमा योजना और मैं बताऊं यानी एक महीने का एक रुपया,12 महीने का 12 रुपया। एक स्‍कीम ऐसी है एक दिन का सिर्फ 80-90 पैसा। साल भर का 330 रुपया। लेकिन उसको जीवन भर उसकी व्‍यवस्‍था मिल सकती है। ये काम उसके मालिक, जिसके वहां वह काम करता है, वो कर सकते हैं और श्रमिक संगठन एक सामाजिक काम के तौर पर इस बात को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार से कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। मुझे लगता है कि इसका उसको फायदा होगा और हमने यह फायदा दिलवाना चाहिए। व्‍यवस्‍थाएं हैं, योजनाएं हैं। अटल पेंशन योजना। अगर आज से उसको जोड़ दिया जाए, समझा दिया जाए उसका तो जीवन धन्‍य हो जाएगा कि भई चलो 60 साल के बाद मुझे ये लाभ मिलेगा। मैं समझता हूं कि हम एक सामाजिक चेतना जगाने का भी काम करें, सामाजिक बदलाव का भी काम करें और उस काम को आगे बढ़ाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत सारी बातें हम कर पाएंगे। कई विषय है जिसको मैं आपके सामने रखता ही चला जाता हूं। लेकिन मुझे विश्‍वास है कि इस श्रम संसद के अंदर जो कुछ भी महत्‍वपूर्ण चर्चाएं हो रही है। हमारे वित्‍त मंत्री और उनकी एक कमेटी बनी है जो उनको सुन रही है। और बातचीत से ही अच्‍छे नतीजे निकलते हैं, सुखद परिणाम निकलेंगे। कल भी मेरी श्रम संगठन के प्रमुख लोगों के साथ मुझे मिलने का अवसर मिला था, उनको सुनने का अवसर मिला था और मैं भली-भांति उनकी बात को, उनकी भावनाओं को समझता हूं। मिल-बांट करके हमें आगे बढ़ना है और हम देश को आगे बढ़ाने में कैसे काम आएं, देश को आर्थिक नई ऊंचाइयों पर कैसे ले जाएं, देश में नौजवानों को अधिकतम रोजगार के अवसर कैसे उपलब्‍ध कराएं।

आज भारत के सामने मौका है विश्‍व के परिदृश्‍य में भारत के सामने मौका है। यह मौका अगर हमने खो दिया तो फिर पता नहीं हमारे हाथ में कब मौका आएगा और उस काम को लेकर आगे बढ़ें इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस श्रम सांसद को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, उत्‍तर परिणाम निकलेंगे इस भरोसे के साथ और साथ मिल करके आगे चलेंगे इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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80 व्या स्वातंत्र्यदिनानिमित्त लाल किल्ल्याच्या तटबंदीवरून पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी केलेल्या संबोधनाचा मजकूर
August 15, 2026
“आजचा दिवस आपल्या स्वप्नांना, संकल्पांना आणि सामर्थ्याला घेऊन पुढे जाण्याचा आहे” : पंतप्रधान
“आज दृढ संकल्पाने भारताने एक मोठे स्वप्न पाहिले आहे. 2047 मध्ये स्वातंत्र्याची 100 वर्षे पूर्ण होत असताना आपण विकसित भारताची निर्मिती केलेली असेल, हेच ते स्वप्न” : पंतप्रधान
“आपण स्वतःवर विश्वास ठेवला पाहिजे आणि आत्मनिर्भर भारत उभारण्याचा अभिमान बाळगला पाहिजे” : पंतप्रधान
“ज्या क्षेत्रांकडे पूर्वी ‘प्रवेश निषिद्ध क्षेत्रे’ म्हणून पाहिले जात होते, ती आता ‘पुढे जाण्याची क्षेत्रे’ बनली आहेत” : पंतप्रधान
“प्रत्येक भारतीय ‘मेक इन इंडिया’ आणि ‘स्थानिकांसाठी आग्रह’ या भावनेचा स्वीकार करत आहे” : पंतप्रधान
“भारताकडे स्थिर राजकीय जनादेश, स्थिर सरकार, सशक्त लोकशाही, मजबूत न्यायव्यवस्था आणि आपल्या सर्वांना मार्गदर्शन करणारी राज्यघटना आहे” : पंतप्रधान
“आपल्याला 3 गोष्टींवर लक्ष केंद्रित करण्याची गरज आहे: खर्च, गुणवत्ता आणि उत्पादनाचे प्रमाण” : पंतप्रधान
“आपले कारखाने स्पर्धात्मक, आपली उत्पादने वापरण्यास सुलभ आणि आपले पॅकेजिंग सर्वोत्तम असले पाहिजे” : पंतप्रधान
“ज्या ठिकाणी पूर्वी नक्षलवादी हिंसाचाराचा प्रभाव होता, तेथे आता शांतता, विकास आणि नव्या आशेचे वातावरण आहे” : पंतप्रधान
“येत्या काळात या सप्तधारा भारताला पुढे घेऊन जातील आणि देशाला नव्या उंचीवर पोहोचवतील” : पंतप्रधान

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

आज आपण सर्व 80 वा स्वातंत्र्यदिन साजरा करत आहोत. आज प्रत्येक हृदयाची धडधड वंदे मातरमच्या सुरात निनादत आहे. आज प्रत्येक घरात तिरंगा आहे. प्रत्येक मनात तिरंगा आहे. आणि देश उत्साह आणि आकांक्षांसह नव्या संकल्पांना घेऊन आज पुढे जात आहे. तुम्हा सर्वांना स्वातंत्र्यदिनाच्या खूप खूप शुभेच्छा. देश आज त्या महान सुपुत्रांचे पुण्यस्मरण करतो, ज्यांनी देशाच्या स्वातंत्र्यासाठी त्याग, बलिदानाची पराकाष्ठा केली. आपले तप, त्याग आणि बलिदानाने स्वातंत्र्याचे एकमेव लक्ष्य निर्धारित करून आपले संपूर्ण आयुष्य खर्ची घातले. पूज्य बापूंसह सर्व स्वातंत्र्य सेनानींना, बलिदानाची महान परंपरा जागवणाऱ्या महान क्रांतिकारकांना आज मी श्रद्धेने नमन करत आहे.

आज या समारंभात जे उपस्थित आहेत, त्या सर्वांसाठी आज एक ऐतिहासिक क्षण देखील आहे. स्वातंत्र्यानंतर 15 ऑगस्टला लाल किल्ल्यावर पहिल्यांदा वंदे मातरमचा सूर घुमत आहे. आज ज्यावेळी आपण सर्व या देशाचे लोक वंदे मातरमची 150 वर्षे साजरी करत आहोत, त्यावेळी यापेक्षा जास्त उत्तम क्षण कोणता असू शकेल.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

गेल्या काही दिवसात देशाच्या काही भागात पुराचे थैमान होते, भूस्खलनाचा प्रकोप राहिला, अनेक कुटुंबांना याची झळ पोहोचली, त्यांचे दुःख, वेदना यांची आम्हाला पूर्णपणे जाणीव आहे. पीडित कुटुंबांना मी याची हमी देत आहे की आम्ही आणि संपूर्ण देश त्यांच्या पाठिशी उभे आहोत.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

कोणताही देश त्यावेळी महान बनतो, त्यावेळी आपली उद्दिष्टे साध्य करतो, ज्यावेळी आपली स्वप्ने, आपले संकल्प आणि आपल्या सामर्थ्याच्या बळावर पुढे जातो.

माझ्या देशवासियांनो,

आता लहान स्वप्नांनी काही चालणार नाही, आपल्याला मोठी स्वप्ने,कारण मोठी स्वप्ने आपल्या विचारांचा देखील विस्तार करतात.आपल्या विचारांच्या क्षितिजाचा विस्तार करतात. आपले संकल्प दृढ असले पाहिजेत, ज्यावेळी संकल्प दृढ असतात, तेव्हा अडचणींमध्ये, आपत्तींमध्ये, मार्ग निघण्याचे सामर्थ्य आपोआपच प्राप्त होते.

आणि माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

आपले संकल्प देखील मोठे असले पाहिजेत,कारण, ज्यावेळी स्वप्ने मोठी असतात, संकल्प मोठे असतात, त्यावेळी आपल्या सामर्थ्याची उंची देखील वाढते. आपल्या प्रयत्नांची उंची देखील वाढते, तेव्हा कुठे आपण आपली स्वप्ने साकार करू शकतो

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

आज भारताने देखील एक खूप मोठे स्वप्न पाहिले आहे,दृढ संकल्पासह पाहिले आहे. नवी उंची गाठण्यासाठी पाहिले आहे. आणि ते स्वप्न आहे...

ज्यावेळी देशाच्या स्वातंत्र्याला 100 वर्षे पूर्ण होतील, 2047 मध्ये, आपण विकसित भारत बनवणारच.140 कोटी देशवासियांच्या पुरुषार्थाने, आपल्याला हे लक्ष्य साध्य करायचे आहे. आणि ज्यावेळी जगातील सर्वात जास्त लोकसंख्या असलेला देश विकसित होण्याचा संकल्प करतो, त्यावेळी जगाच्या नजरेत देखील तो आपल्या साहसाची ओळख बनतो.

आपल्याकडे पाहण्याच्या दृष्टीकोनात बदल करण्यासाठी तो जगाला भाग पाडतो.

प्रिय देशवासियांनो,

आणि हे मी उगीचच सांगत नाही, गेल्या 12 वर्षात देशाच्या कोट्यवधी नागरिकांनी, मग ते गरीब असोत, पीडित असोत, वंचित असोत, आदिवासी असोत, गावात राहणारे असोत, शहरात राहणारे असोत, गरीब असोत, मध्यम वर्गातील असोत, युवा असोत, ज्येष्ठ असोत, महिला असोत, पुरुष असोत, उत्तर असो, दक्षिण असो, पूर्व असो वा पश्चिम असो.प्रत्येकाने गेल्या 12 वर्षात या संकल्पासह, समर्पणासह,देशाला नव्या उंचीवर नेण्यासाठी हर तऱ्हेने प्रयत्न केले आहेत. त्यांच्या या प्रयत्नांचा मी आदरपूर्वक स्वीकार करतो आणि त्याचाच हा परिणाम आहे की इतक्या कमी कालावधीत 25 कोटी देशवासी, दारिद्र्य रेषा ओलांडून गरिबीतून बाहेर पडले आहेत. याच देशवासियांच्या प्रयत्नांचा हा परिणाम आहे, एकेकाळी आपली गणना “फ्रॅजाईल फाईव्ह”( अतिशय नाजूक अर्थव्यवस्था) म्हणून होत होती.मात्र, 12 वर्षांच्या आत आपण एक महत्त्वाची अर्थव्यवस्था, एक झपाट्याने विकसित होत असलेली अर्थव्यवस्था बनलो आहोत.

मित्रांनो,

देश स्वतंत्र झाला.अनेक स्वप्ने बाळगून स्वतंत्र झाला.मात्र, आपल्याला गती प्राप्त करता आली नाही,आपल्याला वेग प्राप्त करता आला नाही,होत आहे, चालतंय, अरे होईल, बघू नंतर, यामध्येच अडकून राहिलो. 2014 येईपर्यंत तर संपूर्ण जगाने आपल्याला “फ्रॅजाईल फाईव्ह” मध्ये टाकून ठेवले होते. अशा काळात,गेल्या 12 वर्षात भारताने एक नवी गती प्राप्त केली, अतिशय वेगाने आपण पुढे जात आहोत आणि देशवासियांचा हा संकल्प आहे. की आता 140 कोटी देशवासियांच्या संकल्पाला, सामर्थ्याला थांबवणे आता अशक्य आहे

प्रिय देशवासियांनो,

गेल्या 12 वर्षात संरक्षण उत्पादन सुमारे चार पट झाले आहे, खादी आणि ग्रामोद्योगाचे उत्पादन सुमारे पाच पट झाले आहे, इलेक्ट्रॉनिक उत्पादनात सुमारे सात पट वाढ झाली आहे, आधुनिक रेल्वे डब्यांच्या निर्मितीत 21 पट वाढ झाली, मोबाईल फोन उत्पादनात 33 पट वाढ झाली, केवळ इतकेच नाही तर आधुनिक युगामध्ये डिजिटल आणि नवोन्मेषाच्या या जगातही आपण आपली पताका फडकवली.इंटरनेट वापरकर्ते, इंटरनेट उपभोक्ते, जवळ जवळ चार पट झाले.

पेटंट मिळण्याच्या संख्येत चार पट वाढ झाली. डिजिटल व्यवहारात 100 पट वाढ झाली.सर्वसामान्य माणसाच्या सुविधांबाबतही आम्ही तितक्याच गांभिर्याने काम केले. दरवर्षी सरासरी 15 पट जास्त वेगाने आम्ही नळाद्वारे पाण्याच्या जोडण्या दिल्या. दरवर्षी सरासरी सहा पट जास्त वेगाने आम्ही लोकांना गॅस कनेक्शन दिले. दरवर्षी सरासरी चार पट वेगाने गरिबांना शौचालये बांधून देण्याचे काम केले. दरवर्षी सरासरी तिप्पट वेगाने गरिबांना घरे देण्याचे काम केले. देशाने शासनात देखील मोठ्या प्रमाणावर बदल केला. हजारोंच्या संख्येने अनुपालने संपुष्टात आणली.शेकडोंच्या संख्येने जुनाट कायदे रद्दबातल केले.गेल्या शतकातील कायदे 21 व्या शतकासाठी लागू होऊ शकत नाहीत.आम्ही आधुनिक पायाभूत सुविधांसाठी मेट्रोचा विस्तार केला. आम्ही सार्वजनिक परिवहन बळ दिले. ज्या वेगाने काम,ज्या प्रमाणात काम केले, हे सर्व,हा वेग, हा विस्तार,ही कामगिरी स्वातंत्र्यानंतर पहिल्यांदाच गेल्या एका दशकात देशाने पाहिली आहे. आणि ज्यावेळी इतक्या जास्त सिद्धी आपल्या समोर आहेत, इतका जास्त वेग दिसत आहे, देशवासियांचे सामर्थ्य प्रत्येक क्षणाला प्रकट होत आहे, त्यावेळी तर 2047 मध्ये विकसित भारत होण्याचा संकल्प कधीच अपूर्ण राहू शकत नाही. ही सर्व आकडेवारी या गोष्टीची साक्ष देत आहे, की आपण प्रगती करणार आहोत.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

मात्र, यासाठी आत्मविश्वासाची गरज असते, आत्मगौरवाची गरज असते आणि त्याबरोबर आत्मनिर्भर भारत असण्याची देखील अतिशय गरज असते. आणि म्हणूनच गेल्या काही वर्षांमध्ये, आमची ही धारणा राहिली आहे आता भारताला दुसऱ्या देशांवर अवलंबून राहून चालणार नाही, आपल्याला आत्मनिर्भर बनावे लागेल.जगात बरेच काही मिळते, स्वस्त मिळते, लवकर मिळू शकते, पण त्यामुळे आपले सामर्थ्य तयार होऊ शकत नाही. ही आपल्या सामर्थ्याची परीक्षा असते. आणि म्हणूनच आपल्याला आपल्या क्षमतेत वाढ करायची आहे. आपल्या हितांचे संरक्षण आपल्याला स्वतः करायचे आहे. आणि यासाठी आत्मनिर्भर भारताचा संकल्प अतिशय दृढतेने सोबत घेऊन आपण पुढे जात आहोत. मेक इन इंडिया, स्वदेशी, व्होकल फॉर लोकल, या सर्व क्षेत्रात आज प्रत्येक भारतीयाचे मन जोडले जात आहे.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

मी तुम्हाला एक उदाहरण देतो. सेमीकंडक्टरचे,देश स्वतंत्र झाल्यानंतर जगात तर सेमीकंडक्टरची चर्चा होतच होती, आपल्याकडे देखील चर्चा होत होती, मात्र, सेमीकंडक्टरचा एखादा मोठा प्रकल्प आपण सुरू करू शकलो नाहीत, आणि आज काय स्थिती आहे. आजच्या डिजिटल जगात, आजच्या तंत्रज्ञानात चिपचे महत्त्व आम्ही जाणून आहोत. कोणतेही इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन असेल, आपली वैद्यकीय उपकरणे असतील, आपल्या परिवहनाची साधने असतील, प्रत्येकात चिप अनिवार्य आहे. आणि या चिपविना जग थांबून जाईल, अशी स्थिती आहे. आणि म्हणूनच भारताने आत्मनिर्भर होण्याच्या दिशेने आपला सेमीकंडक्टर प्लांट, मोठा सेमीकंडक्टर प्लांट, तीन सेमीकंडक्टर प्लांट सुरू झाले आहेत. आणि मला हे सांगण्यात आले की तिथे जे उत्पादन सुरू झाले आहे त्याची निर्यातही सुरू झाली आहे. आणि मला देशवासियांना सांगायचे आहे की आगामी 7-8 वर्षात आणखी पाच, सात किंवा आठ सेमीकंडक्टर प्लांट लवकरच सुरू होणार आहेत. हा आत्मनिर्भर भारत आपल्याला विकसित भारताच्या दिशेने जाण्याचा महामार्ग देईल.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो.

तशीच एक चर्चा डिजिटल मिनरल्सची(खनिजांची) होत आहे, संपूर्ण तंत्रज्ञान डिजिटल मिनरल्सवर अवलंबून आहे. यामध्ये देखील भारत आपली स्थिती सुरक्षित करण्यामध्ये गुंतलेला आहे. या डिजिटल मिनरल्सचे लक्ष्य साध्य करण्यासाठी, आम्ही नॅशनल क्रिटिकल मिनरल सुरू केले. डिजिटल मिनरल कॉरिडॉरची आम्ही घोषणा केली. अनेक देशांसोबत करार होत आहेत. जगातील कित्येक देश आता या क्रिटिकल मिनरल्स संदर्भात भारतावर विश्वास दाखवू लागले आहेत.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

ज्या प्रकारे सेमीकंडक्टरचा विषय आहे, डिजिटल मिनरल्सचा विषय आहे, त्याच प्रकारे ज्या तंत्रज्ञानाच्या दिशेने आपण जात आहोत, जग चालले आहे, त्यामध्ये ऊर्जेचे महत्त्व वाढत चालले आहे, आता ऊर्जेशिवाय नवे जग चालवणे अवघड आहे, आणि म्हणूनच आपल्याला, चिप असो, एआय असो, डेटा सेंटर असो, आपल्याला खूप मोठ्या प्रमाणावर ऊर्जेची गरज भासणार आहे. ऊर्जा सुरक्षा ही आपल्या काळाची गरज आहे.आणि म्हणूनच आम्ही आधीपासूनच त्या दिशेने एकामागोमाग एक भक्कम पावले टाकली आहेत. ऊर्जा सुरक्षेचे एक खूप मोठे माध्यम आहे अणुऊर्जा अर्थात न्यूक्लिअर एनर्जी. आम्ही संसदेत शांती कायदा संमत करून एका नव्या लक्ष्याच्या दिशेने जाण्याचा मार्ग निश्चित केला आहे. 2047 पर्यंत आम्ही 100 गिगावॉट अणुऊर्जा निर्मितीचे लक्ष्य घेऊन वाटचाल करत आहोत, या एकाच दशकात पाच नवीन अणुभट्ट्या उभारण्याचे लक्ष्य निर्धारित करून आम्ही वाटचाल करत आहोत. यावर्षी भारताने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर टेक्नॉलॉजीमध्ये प्रभुत्व प्राप्त करून एक महत्त्वाचा टप्पा गाठला आहे. यामुळे अणुऊर्जा क्षेत्रात आत्मनिर्भर बनण्याच्या दिशेने एक मोठे यश मिळवण्याच्या दिशेने आपण पाऊल टाकले आहे.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

अनेकदा संसाधनांच्या अभावामुळे देशाची वाटचाल थांबत नाही,तर ती थांबण्याचे कारण आहे विचारांच्या मर्यादा.... ज्यावेळी विचारशक्ती कुंठित होते, मर्यादांमध्ये अडकून राहते, तेव्हा आपल्याला आपले सामर्थ्य ओळखता येत नाही. देशाला आज खनिज तेलासाठी अवलंबून रहावे लागत आहे. आणि आपल्या चुकीच्या विचारशक्तीमुळे हे होत आहे. तुम्हाला हे जाणून आश्चर्य वाटेल की आपण आपल्या किनारपट्टीवर,आपण अशा विचारसरणीमुळे,आपल्या किनारपट्टीचा 99 टक्के भाग नो गो एरिया घोषित केला आहे. आपणच समुद्रात जाऊन कोणतेही उत्खनन न करण्याचा निर्णय घेतला आहे. हे विचारांचे दारिद्र्य होते. आपण हा निर्णय घेतला की हे चालणार नाही. आम्ही त्या 99 टक्के भागाला जो एकेकाळी नो गो एरिया होता, त्याला गो अहेड एरिया म्हणून खुला केला. आता आम्ही समुद्राच्या आत जाऊन संशोधन करण्याच्या आणि नवनवीन साठे शोधण्याच्या दिशेने प्रवृत्त झालो आहोत. आम्ही प्रयत्न करत आहोत. आम्ही गेल्या वर्षी याच दिशेने महत्त्वपूर्ण पाऊल ठेवत समुद्रमंथनाची घोषणा केली होती. गेल्या काही दिवसात 85 हजार कोटी रुपयांची तरतूद करून या योजनेला गती देण्याचा निर्णय घेतला आहे.

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

ऊर्जा सुरक्षेच्या पर्यायी स्रोतांसाठी पूर्ण शक्ती लावणं फार गरजेचे आहे आणि म्हणूनच ऊर्जेचा योग्य वापर व्हावा यासाठी भारत गतिमान काम करत आहे. 2014 च्या आधी म्हणजे आजपासून बारा वर्षांपूर्वी आपल्या देशात फक्त 70 शहरांमध्ये पाईप गॅस ची सुविधा होती, पाईपनं गॅस पुरवला जात असे. बारा वर्षात या 70 शहरांना आम्ही 700 शहरांपर्यंत पोहोचवले. याला म्हणतात गती. याला म्हणतात विस्तार. 2014 पूर्वी जेमतेम वीस-बावीस लाख घरांमध्ये पाईपनं गॅस पोहोचत होता, आज पावणेदोन कोटी घरांमध्ये पाईपनं गॅस पुरवला जात आहे. बारा वर्षांपूर्वी देशाची सौर ऊर्जा क्षमता केवळ 2GW होती 2GW.आज 160 GWचं लक्ष्य आपण साध्य केले आहे.

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

मी आणखी एक माहिती देतो. देशाच्या मध्यमवर्गाला सामान्य वर्गाला फायदे मिळावेत यासाठी आम्ही लक्ष दिले आहे. आम्ही पीएम सूर्यघर मोफत वीज योजना सुरू केली आणि आज मला समाधान वाटतं की इतक्या कमी वेळात 50 लाख घरांच्या सौरऊर्जेचे काम आपण पूर्ण केले आहे. वेगाने काम होत आहे. हजारो घरांचे वीज बिल शून्यावर आले आहे. हजारो घरं स्वतःची वीज वापरल्यानंतर अतिरिक्त विजेची विक्री करून उत्पन्न मिळवत आहेत. प्रत्येक कुटुंबाला यासाठी 80 हजार रुपये मदत म्हणून सरकारतर्फे दिले जात आहेत. तेव्हा कुठे हे काम पूर्ण होत आहे.

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

आपण जाणून हैराण व्हाल की ही जी आपली रेल्वे आहे तिच्या विद्युतीकरणाचं काम आपल्या देशात 1925 मध्ये सुरू झालं होतं 1925 साली विद्युतीकरण सुरू झालं पण 90 वर्षांमध्ये फक्त तीस टक्के रेल्वेचे विद्युतीकरण झालं. 90 वर्षात 30 टक्के. आमचा वेग पहा. उद्दिष्ट साध्य करण्यासाठी आमची धाव पहा. आम्ही या एकाच दशकात शतप्रतिशत काम पूर्ण केलं. 90 वर्षात 30 टक्के आणि दहा वर्षात 70% याला म्हणतात काम आणि यामुळेच डिझेल आपल्याला बाहेरून आणावे लागतं त्यात बचत झाली,

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

आम्ही इथेच नाही थांबलो. जगात मागे राहण्याची आमची इच्छा नाही. आपण ही बातमी ऐकली असेलच.‌ भारताने इंधनाच्या एका नव्या क्षेत्रालाही स्पर्श केला आहे. देशात हायड्रोजनवर चालणारी पहिली रेल्वेगाडी सुरू झाली आहे. मला आनंद वाटतो की ही सर्वात लांब रेल्वेगाडी आहे आणि सर्वात ताकदवान रेल्वेगाडी आहे. जगात हायड्रोजन क्षेत्रात भारताने आपला झेंडा रोवला आहे.

प्रिय देश बांधवांनो,

गेली दहा-बारा वर्ष आम्ही 2047 उद्दिष्ट गाठण्यासाठी स्वतःला सिद्ध करत आहोत. आम्ही विचारही केला नव्हता की आम्हाला यातही काही संकट झेलावी लागतील. गेल्या दहा-बारा वर्षात कित्येक संकटांचा सामना करावा लागला.कोरोनासारख्या महामारीनं संपूर्ण जगाला चिंतेच्या खाईत लोटला होतं. सर्व व्यवस्था कोलमडून पडल्या होत्या. कोरोना मधून बाहेर पडलो तर युद्धाच्या विध्वंसाच्या बातम्या येऊ लागल्या. कधी युक्रेन तर कधी पश्चिम आशिया . बघावं तिकडे तणावाची परिस्थिती. माहीत नाही, भविष्यवेत्यांनी काय काय घोषणा केल्या होत्या! जनतेला चिंतेत ठेवणं यातच काही लोकांना आनंद मिळतो. लस मिळणार नाही, कोविडमध्ये लोक वाचणार नाहीत, काहीही होणार नाही , पेट्रोल पंपावर पेट्रोल मिळणार नाही, गॅस मिळणार नाही, डिझेल मिळणार नाही , खत मिळणार नाही, अशा सगळ्या दुनियाभरच्या अफवा पसरवून भारताच्या जनतेला घाबरवून सोडण्याचा, चिंतेमध्ये बुडवून टाकण्याचा आनंद काहीजण घेत होते. पण देशाने बघितलं, गेल्या दहा-बारा वर्षात सुनियोजित योजनांना रंग भरले आहेत आणि अशा संकटं झेलूनही आमच्या नागरिक सेवो भव या मंत्राने विजयी होऊन भारताने जी तयारी केली होती, एकाहून एक उपाय केले होते, कोणी विचार केला नव्हता असं संकट येईल पण संकटाच्या त्या तेवढ्या वेळातही हे सर्व उपाय कामी आले आणि आज देशात गॅस आहे, पेट्रोल आहे, युरिया आहे. आम्ही आपल्या ताकदीने उभे आहोत, चालत आहोत.

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

जगातल्या या संकटाचा परिणाम प्रत्येकावरच झाला, आम्हीही यातून सुटलो नाही‌ युरियाचे भाव 3000 रुपयांवर पोहोचले -एका गोणीला. आजही आम्ही देशातल्या कृषी बांधवांना तो भार सहन करायला मजबूर केलेलं नाही. सरकार आपल्या खांद्यांवर तो भार उचलत आहे. भारताला युरियाची गोण ३ हजार रुपयांना मिळते ते सरकार शेतकऱ्यांना 300 रुपयांना उपलब्ध करून देते. एवढेच नाही तर डीएपी चा बाजारभाव आज जगात पाच हजारांवर जाऊन पोहोचला आहे पण आपल्या शेतकऱ्यांना कष्ट होऊ नयेत म्हणून तेराशे पन्नास रुपयांना देण्याचे काम आम्ही आजही करत आहोत. एक वेळ अशी होती.

प्रिय देश बंधूंनो,

एक वेळ अशी होती, जेव्हा मी स्वावलंबनाचा उल्लेख करत असे तेव्हा काहीजण वातानुकूलित दालनात बसणारे लोक आम्हाला विचारत होते जागतिकीकरणाचं काय होणार? पण जगानं पाहिलं आहे -एका दशकात जगानं जणू जागतिकीकरणाबद्दल बोलणं सोडूनच दिलं आहे. जिथून जागतिकीकरणाचा आवाज येत होता तो आता ऐकू येत नाही. जगातला प्रत्येक देश आपापल्या समस्यानुसार निर्णय घेत आहे आणि दुर्दैवानं संकटाच्या या काळात काही लोकांनी आपली प्रतिष्ठा दाखवण्यासाठी संसाधनांचं हत्यारीकरण करण्याचा खेळ खेळला जात आहे. जग स्वतःजवळ जे काही आहे ते शस्त्र म्हणून वापरत आहे. संसाधनांचं शस्त्रीकरण, स्रोतांचं शस्त्रीकरण, पेट्रोल, डिझेल, खतं,औषधं, तंत्रज्ञानाची चिप एवढंच नव्हे तर भूभागालाही शस्त्र बनवलं जात आहे आणि अशावेळी आपण आत्मनिर्भरतेचा मंत्र घेऊन दहा वर्ष योग्य दिशेने चाललो नसतो तर कल्पना करू शकता, अशा संकटांचा सामना कसा केला असता?

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

दुसरीकडे, आज भारताचे प्रोफाइल अधिकाधिक विकसित होत आहे. आज भारत जगासाठी एक स्वीकृत आणि सन्माननीय देश म्हणून मान्यता पावत आहे. भारताकडे स्थिर राजकीय जनादेश आहे, स्थिर सरकार आहे, भारताची गतिमान, चैतन्यमय लोकशाही आहे, भारताची मजबूत न्यायव्यवस्था आहे, आणि आम्हा सर्वांना दिशा देणारे, भारताचे संविधान आहे. आणि आज जग, भारताच्या या सामर्थ्याला ओळखते आहे. आणि म्हणूनच, 2014 नंतर, जगातील जवळपास 40 देशांसोबत, आमचे मुक्त व्यापार करार होत आहेत. आणि बघा, त्यातून किती मोठ्या संधी निर्माण होत आहेत. हे जे व्यापार करार होत आहेत, ते भारतासाठी मोठी संधी आहेत. आणि म्हणून, मी माझ्या एमएसएमई कंपन्यांना सांगू इच्छितो, की आपल्याला ही संधी सोडायची नाही. संपूर्ण जगात आपल्याला पोचायचे आहे, भारताच्या बाजारातील प्रत्येक उत्पादन आपल्याला जागतिक बाजारात पोहचवायचे आहे. मग ते आपली वस्त्रे- प्रावरणे असोत, किंवा आपली मशीनरी असोत, आपली औषधे असतो, आपल्याला ही संधी सोडायची नाही. मात्र, जी जागतिक गुणवत्तेची परिमाणे आहेत, ती आपल्याला साध्य करावी लागतील. जगभरात जी उत्पादने मिळतात, त्यापेक्षा चांगल्या दर्जाची उत्पादने द्यावी लागतील, जगभरात जी उत्पादने मिळतात, त्यापेक्षा स्वस्त द्यावी लागतील. पंजाबच्या लुधीयानापासून ते तमिळनाडूच्या तिरुपुर पर्यंत आमचे वस्त्रोद्योग क्षेत्र जगात पोहचू शकते. इतकेच नाही, तर केरळम पासून ते गुजरात आणि तामिळनाडू पासून ते बंगाल पर्यंतचा आपला सागरी किनारा आहे. आपल्या मच्छीमार बंधू भगिनींना, या मुक्त व्यापार कराराचा, कोळंबी माशाच्या निर्यातीत फायदा होणार आहे. आपले सी-फूड जगभरात पोहोचवण्याची संधी वाढली आहे. आणि आपण या संधीचा लाभ घेत, पुढे जाण्यासाठी, प्रगतीसाठी प्रयत्न करावेत अशी माझी इच्छा आहे.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

मी जी भूमिका आपल्यासमोर मांडली आहे, त्यामागे, 2047 च्या विकसित भारताच्या उद्दिष्टाचा पाया त्यावर रचला आहे. 2047 च्या विकसित भारताचे उद्दिष्ट, गेल्या दहा -बारा वर्षात, देशवासीयांनी जे सामर्थ्य दाखवले आहे, त्या सामर्थ्याचाच भाग आहे.

आणि म्हणूनच, माझ्या बंधू- भगिनींनो,

या शतकाचा एक चतुर्थांश भाग संपला आहे, आणि पुढचा एक चतुर्थांश भाग, आपल्यासाठी अत्यंत महत्वाचा आहे. आता आपण थांबू शकत नाही, आपला वेग कमी होऊ शकत नाही, आपली दिशा निश्चित झाली आहे. आपल्याला आपले साध्य प्राप्त करायचेच आहे. आणि म्हणूनच, आपल्याला आपली कार्यशैली बदलावी लागेल. आपली कार्यशैली बदलत आपल्याला आपली मानसिकता ही बदलावी लागेल. आपल्याला आपल्या कामाची गतीही बदलावी लागेल. जी कामे गेल्या पांच- सात दशकांत झाली नाहीत, ती आपल्याला आगामी पाच सात वर्षात करायची आहेत. आणि मला विश्वास आहे, माझ्या देशातील युवाशक्तीवर, माझ्या देशातील तरुणाईवर, माझ्या देशातील माता- भगिनींवर, माझ्या देशातील शेतकऱ्यांवर, कामगारांवर, की आपण सगळे मिळून हे स्वप्न साकार करू शकतो. आणि म्हणूनच, आपल्याला सुधारणांची गतीही वाढवावी लागणार आहे. आणि मी जेव्हा सुधारणांविषयी बोलतो, त्यावेळी हे लक्षात घ्या, की सुधारणा आपल्यासाठी काही बंधन नाहीत, आपल्यासाठी ती बळजबरी नाही, तर आपला तो दृढनिश्चय आहे. आपल्या दृढनिश्चयानेच आपण सुधारणांच्या एक्सप्रेसला गती दिली आहे आणि आगामी काळातही आपण पुढच्या दर्जाच्या सुधारणांकडे वळणार आहोत. आणि म्हणूनच सरकार, समाज, उद्योजक, उत्पादक, शेतकरी, प्रत्येकाने आपल्या पारंपरिक व्यवस्थेत सुधारणा करायच्या आहेत, आपल्या मानसिकतेत सुधारणा करायच्या आहेत. आपल्या उद्दिष्टांमध्ये सुधारणा करायच्या आहेत.

आणि म्हणूनच, माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

आपल्याला निश्चित दिशा घेऊन वाटचाल करावी लागेल. मी आज त्या युगाचेही स्मरण करू इच्छितो, जेव्हा भारताचे सामर्थ्य सप्त सिंधूच्या रूपात ओळखले जात असे. आपण ते ऐकले आहे, समजून घेतले आहे. आता विकसित भारत घडवण्यासाठी, आपल्याला नवी धारा हवी आहे. आज लाल किल्ल्याच्या या तटबंदी वरुन मी शक्तीच्या सात धारांचे आवाहन करतो. जी कामे गेल्या पाच -सात दशकांत झाली नाहीत, ती कामे, येणाऱ्या पाच- सात वर्षात आपल्याला सप्त धारांच्या सामर्थ्यतून, शक्तीतून, आपण देशाला नवी ऊंची देऊ, गती देऊ. आणि नवी उद्दिष्टे पार करणारे सामर्थ्य देऊ. आणि त्यासोबतच, देशाच्या युवा शक्तिच्या सांमर्थ्यांचाही पूर्ण उपयोग केला जाईल, त्यांची शक्ती या शक्तीशी जोडली जाईल. आणि म्हणूनच, येत्या काळात, जेव्हा मी सप्त धारांविषयी बोलतो, तेव्हा या सप्तधारेतली पहिली शक्ती आहे, आपली उत्पादन शक्ती !

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

आपल्याला उत्पादन क्षेत्राला खूप पुढे न्यायचे आहे. आणि उत्पादन वाढवण्यासोबतच आपल्याला, छोटे छोटे सुटे भागही बनवायचे आहेत आणि मोठ-मोठी यंत्रेही बनवायची आहेत, संपूर्ण मूल्य साखळी आपली असली पाहिजे. आपल्याला छोटे घटकही हवे आहेत, आणि संपूर्ण उत्पादनही करायचे आहे. डिझाईन पासून, उत्पादनापर्यंत, भारताला जागतिक मूल्य साखळीचे एक विश्वासार्ह केंद्र बनवायचे आहे. आणि त्यासाठी मी तीन गोष्टींवर विशेष भर देऊ इच्छितो.

संरचनेपासून उत्पादनापर्यंत प्रत्येक टप्प्यावर भारताला जागतिक पुरवठा साखळीचे विश्वसनीय केंद्र व्हावे लागेल. यासाठी मी तीन बाबींवर विशेष भर देऊ इच्छितो. उत्पादनाच्या क्षेत्रात माझे ज्या बंधू-भगिनी कार्यरत आहेत, त्यांना मी सांगेन की हा या काळाने दिलेली ही संधी आहे, ही संधी हातातून जाऊ देऊ नका. यासाठी आपल्याला किंमत, गुणवत्ता आणि प्रमाण यांच्या बाबतीत जागतिक मानकांची पूर्तता करावी लागेल. आपले कारखाने स्पर्धेला तोंड देणारे असावेत, आपली उत्पादने वापरकर्ता स्नेही असावीत, आपले पॅकेजिंग जगातील लोकांना, आवडणारे, आकर्षित करणारे असावे. आपल्या उत्पादनांमध्ये शून्य दोष आणि अचूकतेने केलेले उत्पादन ही आपली ओळख बनली पाहिजे. प्रत्येक उत्पादक, प्रत्येक उद्योजक आणि प्रत्येक एमएसएमई उद्योगाला मी असे सांगू इच्छितो की, विश्वसनीयता आणि गुणवत्तेच्या आधारावरच जागतिक बाजारात आपली ओळख निर्माण व्हायला हवी. गुणवत्तेच्या बाबतीत कोणतीही तडजोड नको. आणि म्हणूनच आपला मंत्र आहे गुणवत्ता, गुणवत्ता आणि केवळ गुणवत्ता. हेच आपला जागतिक आधारमूल्य असेल.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

या सप्तधारेतील दुसरी शक्ती आहे कृषी आणि अन्न उत्पादन तसेच अन्न प्रकिया. आपल्याला या संदर्भात आगेकूच करावी लागेल. आपल्या शेतकऱ्यांनी सांगेन की आता जगातील बाजारपेठा आपल्यासाठी खुल्या झाल्या आहेत, थेट परदेशी गुंतवणुकीमुळे जगभरातील बाजारपेठा आपल्यासाठी उपलब्ध आहेत.आपल्याला तिथपर्यंत पोहोचायचे आहे, आपल्याला त्या क्षेत्रात प्रवेश करायचा आहे. शेतापासून निर्यात बाजारापर्यंत आपल्याला वाटचाल करायची आहे. आपल्या खाण्यापिण्याच्या पारंपरिक पद्धती असोत, आपले मसाले असोत, आपली भरड धान्ये असोत, खाद्यान्न असो, आपल्याकडे कितीतरी गोष्टी आहेत, त्यांचे जागतिक ब्रँड्स बनले पाहिजेत. शेतकऱ्यांनी रसायनमुक्त शेती करण्यावर भर दिला पाहिजे, जगभरात त्यांना असलेली मागणी वाढत जाणार आहे. आपली उत्पादने जागतिक मानकांची पूर्तता करणारी असतील तर आपण सहजपणे ती जगभरात पोहोचवू शकू. माझ्या सप्तधारेतील तिसरी शक्ती आहे तंत्रज्ञान आणि नवोन्मेष.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

आजचा काळ कृत्रिम बुद्धिमत्तेचा आहे, क्वांटम तंत्रज्ञानाचा आहे, अवकाश तंत्रज्ञानाचा आहे, रोबोटिक्सचा आहे, डेटा सेंटर्सचा आहे, संपूर्णपणे नवी क्षेत्रे खुली झाली आहेत, आणि उदयोन्मुख तंत्रज्ञान हे क्षेत्र देखील आपल्यासाठी आव्हानात्मक ठरते आहे. आणि म्हणूनच आपल्या देशाला जगासाठी उपलब्ध बाजारपेठ बनायचे नाही तर आपल्याला नवोन्मेषाचे प्रमुख केंद्र व्हायचे आहे. आपण युपीआय आणि डिजिटल सार्वजनिक पायाभूत सुविधांच्या रुपात स्वतःची क्षमता दाखवून दिली आहे, आपल्या सामर्थ्याची जाणीव करून दिली आहे. आता भारताला डिजिटल सार्वजनिक तंत्रज्ञान जगाच्या कानाकोपऱ्यापर्यंत पोहोचवायचे आहे. भारताला पुढच्या पिढीतील संपर्क तंत्रज्ञानात आघाडी घ्यायची आहे. भारतात निर्मित 6 जी तंत्रज्ञान जगभरात सर्वत्र पोहोचवणे हे आपले लक्ष्य असले पाहिजे. आणि त्यासाठी आपण जलदगतीने काम केले पाहिजे, आपले प्रयत्न कमी पडता कामा नयेत.

सप्तधारेतील चौथी शक्ती आहे, गतिशक्ती. या गतिशक्तीसाठी, देशभरात सुरळीत संपर्क यंत्रणा निर्माण करण्यावर आपण भर द्यायला हवा. जलदगती रेल्वे सुविधेद्वारे शहरांना एकमेकांशी जोडले पाहिजे. आणि यासाठी आपल्याला आधुनिक महामार्ग हवेत, अंतर्गत जलमार्ग हवेत, विमानतळे हवीत, बहुपद्धतीय लॉजिस्टिक्सची यंत्रणा हवी. आपल्याला बंदरे म्हणजे केवळ माल चढवण्याच्या-उतरवण्याच्या जागा म्हणून नव्हे, जगभरातील जहाजांना नांगर टाकून थांबण्याची जागा म्हणून नव्हे तर आपल्याला बंदरांचा वापर करून विकास घडवून आणण्याच्या दिशेने काम केले पाहिजे.

आपली सप्तधारेतील पाचवी शक्ती आहे, संरक्षण सामर्थ्य. आणि या सामर्थ्याचे अनेक प्रकारे महत्त्व आहे. माझ्या प्रिय देशवासियांनो, संरक्षणाच्या क्षेत्रात आत्मनिर्भर होणे किती आवश्यक आहे याचा अनुभव आता भारताने घेतला आहे, आणि जगाने देखील घेतला आहे. हे साध्य करण्याशिवाय कोणताही पर्याय नाही, आणि यासाठी जगभरात सगळे स्वतःपुरता विचार करत असताना भारत जगभरासाठी बाजारपेठ म्हणून उपलब्ध राहू शकत नाही. आपल्याला संरक्षणाच्या क्षेत्रात आत्मनिर्भर व्हावे लागेल. अत्याधुनिक तंत्रज्ञान विकसित करून आपल्याला तंत्रज्ञानाचा जागतिक पुरवठादार होण्याचे उद्दिष्ट निश्चित करून त्या दिशेने काम करावे लागेल. आपल्याला ड्रोन आणि ड्रोन-विरोधी तंत्रज्ञान विकसित केले पाहिजे. तसेच हायपरसॉनिक संरक्षण तंत्रज्ञानाच्या क्षेत्रात आपल्याला आघाडी घ्यावी लागेल. मित्रांनो, सायबर सुरक्षितता देखील आज प्रत्येक घराची समस्या झाली आहे. आपल्या तरुणांसाठी ते देखील संरक्षणाचे एक असे क्षेत्र आहे ज्यामध्ये आपल्या सामर्थ्याचा वापर आपण देशासाठी आणि जगासाठी करून घेऊ शकतो.

आपल्या सप्तधारेतील सहावी शक्ती आहे, हरित अर्थव्यवस्था, नील अर्थव्यवस्था, जी हरित रोजगार निर्माण करते. आपल्याला हरित हायड्रोजन, नवीकरणीय उर्जा, उर्जा साठवण, हरित वाहतूक व्यवस्था, हरित उत्पादन यांच्या संदर्भात जागतिक व्यापक प्रमाण प्राप्त करायचे आहे. जग जेव्हा जागतिक तापमानवाढीची चर्चा करत असते तेव्हा आपण त्यावर उपाययोजना शोधत असतो, समस्यांचे निराकरण करण्याचे मार्ग शोधत असतो. आणि भारत या हरित अर्थव्यवस्थेच्या चळवळीसह वाटचाल करत आहे. भारताकडे नील अर्थव्यवस्थेसाठी देखील फार मोठ्या संधी आहेत. भारताकडे प्रचंड सागरकिनारी भाग आहे, नील अर्थव्यवस्थेसाठी मोठा वाव आहे, मत्स्योद्योग आहे, तटवर्ती पर्यटन आहे, महासागर तंत्रज्ञाने आहेत, अशी अनेक क्षेत्रे आहेत ज्यामध्ये आपण प्रगती करू शकतो.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

भारत जेव्हा सप्तधारेच्या संदर्भात व्यक्त होतो आहे तेव्हा याची सातवी धारा आहे, तिचे जगासाठी स्वतःचे एक वेगळे महत्त्व आहे, आणि ते म्हणजे भारताचे सूप्त सामर्थ्य. भारताच्या सूप्त सामर्थ्याचे महत्त्व वेगळे आहे. आज योगाने संपूर्ण जगाला भारताशी जोडले आहे. जगासाठी योग एक उर्जास्त्रोत होऊ लागला आहे, भारतावरील विश्वासाचे एक सबळ कारण होऊ लागला आहे. ज्या भारताकडे श्रद्धास्थाने आहेत, आयुर्वेदाचे ज्ञान आहे, ज्या पद्धतीने भारताकडे समग्र आरोग्यसुविधेची यंत्रणा आहे, ‘हील इन इंडिया’ ची चळवळ आहे, त्यांच्या बळावर आपण जगात आपल्या सामर्थ्यासह सादर होऊ शकतो. आपली हस्तकला असो, संस्कृती असो, आपले चित्रपट असोत, आपले सर्जन विश्व असो, व्हिएफएक्स असो, आपले अॅनिमेशन असो, गेमिंग असो, डिजिटल कार्यक्रम असो, सर्जनशील विश्वात भारत आपला दबदबा निर्माण करू शकतो. आपल्याला याला वैश्विक सामर्थ्याच्या रुपात विकसित करावे लागेल. आज भारताने वेव्हज समिटला फार मोठी ताकद मिळवून दिली आहे. संपूर्ण जग हळूहळू या जागतिक दृक्श्राव्य आणि मनोरंजन संमेलनाची प्रतीक्षा करू लागले आहे. आणि हे संमेलन भारताच्या सूप्त सामर्थ्याची, सर्जक विश्वाची जगाला ओळख करून देईल.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

भारताकडे एक प्रचंड वनसंपदा आहे. आपल्याकडे शंभराहून अधिक राष्ट्रीय उद्याने आहेत, क्षमता प्रचंड आहे, मात्र परदेशी पर्यटकांना आकर्षित करण्यात आपण कमी पडलो आहोत. आपल्याकडे सुप्त सामर्थ्याच्या माध्यमातून जगभरातील पर्यटकांना भारताकडे आकर्षित करण्याची संधी आहे. आपल्याला आपली ताकद जगाला दाखवून द्यायची आहे आणि आपण हे काम सहजपणे करू शकतो.

आज जगात क्रीडाक्षेत्राप्रती जो ओढा वाढला आहे तो देखील भारताप्रती आकर्षणाचे केंद्र झाला आहे. जगातील खेळ भारतात का नसावेत. कॉन्सर्ट अर्थव्यवस्था देखील वाढत आहे, जगातील प्रत्येक कलाकाराला आता असे वाटते की एकदातरी भारताच्या भूमीवर सादरीकरण करावे. ही एक फार मोठी संधी आहे. आपल्याला याचा लाभ घेण्यासाठी यंत्रणा उभाराव्या लागतील.

मित्रांनो, सप्तधारेतील या सात शक्तींचा. सप्तशक्तींचा उद्देश केवळ एकाच क्षेत्रात प्रगती करण्याचा नाही तर समग्र दृष्टीकोनासह आपल्याला आपल्या राष्ट्रासाठी जी लक्ष्य निश्चित करून चाललो आहोत, जी आकांक्षा बाळगून निघालो आहोत ती साध्य करण्याच्या दिशेने आपल्याला काम करायचे आहे.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

काही गोष्टी मी तुम्हाला सांगितल्या आहेत. पण मी याच्याही पुढे जाऊन विचार करतो आहे. मी जरा देशाला खडबडून जागे करू इच्छितो, देशाच्या सामर्थ्यांना देखील जागृत करू इच्छितो. देश म्हणजे केवळ सरकार नसते, देश म्हणजे प्रत्येक नागरिक असतो. की फॉर्च्युन 500 ची चर्चा तर आपण खूप करतो पण या फॉर्च्युन 500 मध्ये भारताच्या 50 कंपन्या असायला काय हरकत आहे असा विचार आपण करू शकत नाही का? ते आपले लक्ष्य असले पाहिजे.

मित्रांनो,

जगात बँकिंग क्षेत्र भरभराटीला येत आहे, अशा वेळी जगातील प्रमुख बँकांमध्ये भारतातील बँकांचा समावेश का होऊ नये?. जगातील प्रमुख पाच बँकांमध्ये भारतातील बँकेने स्थान मिळवले पाहिजे. भारतातील औषधनिर्मिती क्षेत्रात आपण खूप कार्य केले आहे.मात्र जगातील प्रमुख औषधनिर्मिती कंपन्यांच्या यादीत भारताच्या देखील एक दोन कंपन्यांचा समावेश असला पाहिजे, भारताने ते स्थान मिळवले पाहिजे. लॉ-फर्म्स आहेत, रेटिंग एजन्सी असतात. तर आता भारताने या क्षेत्रात जागतिक नेतृत्व केले पाहिजे ही आजच्या काळाची मागणी नव्हे काय..आपल्याकडे प्रतिभा आहे, सामर्थ्य आहे, आपला इतका प्रदीर्घ इतिहास आहे, भाषांवर आपले प्रभुत्व आहे. आपली एखादी कन्सल्टिंग कंपनी, अकाऊंटिंग कंपनी जगातील प्रमुख कंपन्यांमध्ये का नसावी? भारतातील तंत्रज्ञानविषयक कंपन्या जगात आघाडीवर असाव्यात हे आपले उद्दिष्ट असले पाहिजे. आपले निर्धार असे असले पाहिजेत ज्याकडे विश्व आकर्षित होईल, आपले निर्धार ही आपल्या देशाची ओळख असली पाहिजे, आणि जगासाठी ते एक विश्वसनीय स्थान असेल, त्या दिशेने आपल्याला काम करावे लागेल. आणि यासाठी मी राज्य सरकारांना सांगू इच्छितो की, स्थानिक स्वराज्य संस्थांना सांगू इच्छितो, आणि भारत सरकारची देखील ही जबाबदारी आहे की आपल्याला आपल्या सुधारणांचा वेग वाढवला पाहिजे. आपल्याला 2047 च्या आपल्या उद्दिष्टानुसार आपल्या यंत्रणा विकसित कराव्या लागतील. भूतकाळातील नीतीनियम येथे लागू होणार नाहीत तर आपल्याला आगामी काळातील स्वप्नांना लक्षात घेऊन चालावे लागेल. अशा प्रकारे जर आपण काम करू शकलो तर मला पूर्ण विश्वास आहे आणि मी देशवासियांना हा भरवसा देऊ इच्छितो की याच मार्गाने, मेहनतीमध्ये कोणतीही कसर न ठेवता आपण विकसित भारताचे स्वप्न पूर्ण करू शकतो.

आपल्याला सर्वांना सोबत घेऊन पुढे जायचे आहे, केंद्र सरकार, राज्य सरकारे, उद्योगक्षेत्र, असे आपण सर्वांनी मिळून काम करायचे आहे, सुधारणा घडवायच्या आहेत, सुधारणांसह प्रगती करायची आहे. आणि मी याआधी देखील सांगितले आहे की आम्ही सुधारणा जबरदस्ती करून नव्हे तर सर्वांना पटवून देऊन करतो आहोत.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो,

जेव्हा मी विकसित भारताबद्दल बोलतो, देशाला जलदगतीने पुढे नेण्याविषयी बोलतो, तेव्हा याचा सर्वात मोठा लाभार्थी कोण आहे, सुधारणांचा लाभार्थी कोण आहे तर तो माझ्या देशातील युवावर्ग आहे, युवा शक्ती आहे. विकसित भारताच्या प्रवासात तरुणांची फार मोठी भूमिका आहे.इतकेच नव्हे तर विकसित भारताचा सर्वात मोठा लाभार्थी माझ्या देशातील तरुण आहे आणि म्हणूनच आपल्याला विकसित भारताचे उद्दिष्ट तरुणांशी जोडून घेऊन पुढे जायचे आहे. तरुणांना सर्वोच्च प्राधान्य मानून आपल्याला पुढे जायचे आहे.

मित्रांनो,

गेल्या दहा बारा वर्षांत या दिशेने खूप मोठे काम झाले आहे. स्टार्ट अप इंडिया अभियान, आज संपूर्ण देशात अडीच लाखांहून अधिक नोंदणीकृत स्टार्ट अप उद्योग उभारले आहेत. देशातील तरुण स्वतः तर काम करत आहेतच, इतरांना देखील रोजगार देत आहेत. भारत सरकारने 1 लाख कोटी रुपयांचा नवोन्मेष निधी जाहीर केला आहे. मी देशातील तरुणांना सांगू इच्छितो की तुम्ही तुमची स्वप्ने घेऊन या, साधनसंपत्तीची टंचाई भासू देणार नाही, 1 लाख कोटी रुपये वापरून तुमच्या स्वप्नांना ताकद देण्याची यंत्रणा आम्ही उभारली आहे. संशोधनाच्या क्षेत्रात नव्या संधी निर्माण होत आहेत, डिजिटल इंडियामुळे किफायतशीर दरात डेटा उपलब्ध झाला आहे, ज्याने तरुणांना सक्षम केले आहे. जगभरात सर्वात स्वस्त दरातील डेटा आज भारतात उपलब्ध आहे.देशातील तरुणांना यामुळे नवी ताकद मिळाली आहे.

स्किल इंडिया हा राष्ट्रीय कार्यक्रम आम्ही तयार केला आहे. अवकाश क्षेत्र आम्ही खुले केले आहे.आम्ही राष्ट्रीय ड्रोन नीती तयार केली आहे.खेलो इंडिया धोरण तयार केले आहे, गेल्या 35 वर्षात नवे शैक्षणिक धोरण आणले नव्हते ते आम्ही घेऊन आलो आहोत. याचा लाभ मध्यमवर्गीय कुटुंबांना झाला आहे. मित्रांनो, 2004 ते 2014 या काळातील आकडेवारी मी तुमच्यासमोर मांडू इच्छितो. या काळात देशात 350पेक्षा देखील कमी विद्यापीठे होती. आणि आज दहा बारा वर्षानंतर 650 नवी विद्यापीठे स्थापन झाली आहेत, ही संख्या आता 2000पर्यंत पोहोचते आहे. 2014 पूर्वी वैद्यकीय अभ्यासक्रमासाठी केवळ चारशे जागा उपलब्ध होत्या ती संख्या आता 800 वर पोहोचली आहे. इतकेच नव्हे तर, आता परदेशी विद्यापीठे देखील भारताच्या भूमीवर आली आहेत, आज देशातच परदेशी विद्यापीठाची पदवी आपल्या तरुणांना मिळेल याची व्यवस्था करण्यात आली आहे.

आपल्या देशातील मुले तंत्रज्ञानाकडे लहान वयातच आकर्षित व्हावी या दिशेने आम्ही काम करत आहोत. आणि यासाठी आम्ही 10 हजारांहून अधिक अटल टिंकरिंग प्रयोगशाळा लहान लहान मुलांसाठी उपलब्ध करून दिल्या आहेत, जेणेकरून नवोन्मेष आणि तंत्रज्ञानामध्ये या लहान मुलांची रुची वाढेल.आम्ही अनेक मार्ग शोधले, आम्ही खासगी स्टार्ट अप क्षेत्र खुले केले तुम्ही पाहिले असेल. 28 वर्षांच्या तरुणांनी पहिल्या प्रयत्नातच जगातील पहिला खासगी उपग्रह प्रक्षेपित केला. हे फार मोठे कार्य झाले. आज सुमारे अडीच लाखांहून अधिक नोंदणीकृत स्टार्ट अप उद्योग आहेत. आम्ही गेल्या काही दिवसांत एआय संमेलन भरवले. एआय क्षेत्राचा विस्तार वेगाने होतो आहे. लाल किल्ल्यावरून बोलताना मी तरुणांसाठी एक घोषणा करू इच्छितो, येत्या एका वर्षात एक कोटी युवकांना एआय प्रशिक्षण देणार आहोत, ज्यामुळे आपल्या देशाचा तरुण एआयच्या क्षेत्रात जगाचे नेतृत्व करण्याचे सामर्थ्य मिळवू शकेल.

माझ्या मित्रांनो,

जैवअर्थव्यवस्था एक नवे क्षेत्र आहे. 2014 पूर्वी एक काळ असा होता जेव्हा केवळ साठ हजार कोटी रुपये मूल्याचे जैवअर्थव्यवस्थेचे काम होत असे. माझ्या तरुणांनी काय कमाल केली आहे, बघा जेव्हा नीती स्वच्छ असतात, लक्ष्य स्पष्ट असते, तेव्हा माझ्या तरुणांनी जैवअर्थव्यवस्थेचे मूल्य 20 लाख कोटी रुपयांवर नेऊन ठेवले. 2009-10 च्या काळात केवळ दीड लाख इलेक्ट्रिक वाहने आपल्या देशात विकली गेली होती. 2025-26 मध्ये 25 लाख इलेक्ट्रिक वाहने विकली गेली आहेत.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

माझ्या तरुणांसाठी विमान वाहतूक क्षेत्रही अतिशय वेगाने पुढे जात आहे. नवीन विमानतळ, नवीन मार्ग, नवनवीन रोजगाराच्या संधी निर्माण होत आहेत. देखभाल, दुरुस्ती आणि ओव्हरहॉलिंगमुळेही देशात मोठ्या प्रमाणावर कुशल मनुष्यबळाला काम मिळत आहे. मेड इन इंडिया विमाने बनवण्याच्या दिशेने आपण यश मिळवले आहे. मेड इन इंडिया डिफेन्स ट्रान्सपोर्ट एअरक्राफ्ट C-295 ने आधीच आपले उड्डाण केले आहे, यशस्वी उड्डाण केले आहे.

माझ्या सहकाऱ्यांनो,

देशातील तरुणांसाठी ड्रोननेही खूप मोठे काम केले आहे. स्वामित्व योजना, गावांमध्ये ड्रोनच्या माध्यमातून स्वामित्व योजना यशस्वी होत आहे. सुमारे सव्वा तीन कोटी कुटुंबांना स्वामित्व योजनेचा लाभ मिळाला आहे आणि त्यामुळे 140 लाख कोटी रुपयांएवढी संपत्ती अनलॉक झाली आहे. ज्यामुळे त्यांना बँकेकडून कर्ज मिळू शकते. लोक आपला व्यवसाय करू शकतात.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

आपल्या मध्यमवर्गीय कुटुंबांच्या डोक्यावर एक मोठे ओझे ठरले आहे, ते म्हणजे, कोचिंग क्लासेसची स्पर्धा. ही स्पर्धा अशी आहे की प्रत्येक आई-वडिलांना वाटते की मुलाला कोचिंग क्लासमध्ये पाठवले नाही, तर आपण प्रतिष्ठित कुटुंब नाही. या गरीब आणि मध्यमवर्गीय कुटुंबांची चिंता करताना त्यांचा हजारो कोटी रुपयांचा खर्च होतो, तो खर्चही वाचावा, मुलेही आपल्या आसपास राहू शकावीत, त्यांची काळजी घेता येऊ शकेल, कुटुंबावर आर्थिक भार पडू नये यासाठी, आम्ही तरुणांसाठी विविध स्पर्धा परीक्षांचे मोफत ऑनलाइन कोचिंग सुरू करण्याचा निर्णय घेतला आहे. आपल्याकडे सार्वजनिक डिजिटल पायाभूत सुविधा आहेत. आपल्याकडे उत्तम गुणवत्ता आहे, शिक्षक आहेत. या सर्व संसाधनांना एकत्र जोडून देशातील तरुणांना मोफत कोचिंग व्यवस्था देण्यासाठी एक संपूर्ण नेटवर्क उभारणार आहोत.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

मी नेहमी म्हणत आलो आहे, जो खेळेल तो विकसित होईल, फुलेल. जेव्हा मी खेळाबद्दल बोलत आहे, तेव्हा माझ्या प्रिय देशबांधवांनो, आज भारत क्रीडा जगतात आपले स्थान निर्माण करत आहे. आता क्रीडा स्पर्धांच्या पोडियमवर भारताचे राष्ट्रगीत ऐकू येते. भारताचे राष्ट्रगान ऐकू येते. भारताचा तिरंगा फडकताना दिसतो. टॉप्स योजनेने मोठे यश मिळवले आहे. खेलो इंडिया क्रीडा स्पर्धा, विद्यापीठ स्पर्धा, हिवाळी क्रीडा स्पर्धा, सागर किनारी क्रीडा स्पर्धा, क्रीडा पायाभूत सुविधा, खेळांसाठी प्रशिक्षण, स्पोर्ट्स मेडिसिन, खेळांसाठी पोषण—या सर्व विषयांमध्ये भारत आता प्रावीण्य मिळवण्याच्या दिशेने पुढे जात आहे. तरुणांसाठी एक संपूर्ण नवे क्षेत्र खुले होत आहे. खेळाडू बनता आले नाही, तरी त्याला पाठबळ देण्यासाठी मोठे क्षेत्र खुले होत आहे. क्रीडा जगतात भारताची कामगिरी सातत्याने सुधारत आहे आणि आपण 2036 मध्ये ऑलिम्पिक स्पर्धांचे मजबूत दावेदार म्हणून पुढे जात आहोत आणि 2030 मध्ये भारतात राष्ट्रकुल क्रीडा स्पर्धेचे आयोजन आपण करणार आहोत.

आणि माझ्या सहकाऱ्यांनो,

जगात ऑलिम्पिकमध्ये सुमारे 40 प्रकारचे खेळ असतात आणि ऑलिम्पिकमध्ये सुमारे सव्वा तीनशे ते साडेतीनशे असतात. आणि तुम्हाला हे जाणून वाईट वाटेल, माझ्या देशबांधवांनो, माझ्या तरुणांनो, मी तुम्हाला आव्हान देतो, मी आवाहन करतो, मला तुमची मदत हवी आहे. सव्वा तीनशे स्पर्धांपैकी भारत दोन तृतीयांश खेळांमध्ये कुठेच नसतो. आपली उपस्थिती पण नसते. आपण पात्र ठरत नाही. आता मात्र आम्ही ठरवले आहे की 2036 मध्ये जी ऑलिंपिक स्पर्धा होणार, ती भारतात व्हावी, अशी आमची इच्छा आहे. पण 2036 मध्ये ज्या क्रीडा प्रकारांमध्ये आज भारत खेळत नाही, ज्या प्रकारांमध्ये भारत पात्र ठरत नाही, ज्या स्पर्धा भारताने सोडून दिल्या आहेत, त्यातील तीन चतुर्थांश भाग आपली वाट पाहत आहे. भारत त्यावर भर देईल आणि यासाठी आम्ही गुणवत्ता शोधाचे एक अभियानही चालवू इच्छितो.

आम्हाला जर 2036 साठी खेळाडू हवे असतील, तर आज पाच वर्षे, 10 वर्षे, 15 वर्षे वयाची जी मुले आहेत, त्यांच्याकडे लक्ष द्यावे लागेल. त्या मुलींकडेही लक्ष द्यावे लागेल. आणि म्हणूनच 5 ते 15 वर्षे वयोगटातील मुलांमध्ये क्रीडा नैपुण्य शोधण्यासाठी गावोगावी, शहरोशहरी, शाळाशाळांमध्ये टॅलेंट हंटचे अभियान राबवले जाईल. मुलांची प्रतिभा पाहिली जाईल आणि त्यानंतर त्यांना विशेष प्रशिक्षण देऊन त्यातून देशासाठी खेळणारे चांगले खेळाडू तयार केले जातील.

माझ्या प्रिय युवा मित्रांनो,

देशासमोर, देशातील तरुणांसमोर अमली पदार्थांचे व्यसन हे एक मोठे संकट बनत चालले आहे. नशामुक्त भारत ही आपल्या सर्वांची सामूहिक जबाबदारी असली पाहिजे. आपल्या उज्ज्वल भविष्यासाठी आपली युवा पिढी सक्षम झाली पाहिजे. आपल्या युवा सामर्थ्याचा उपयोग आपल्या देशासाठी झाला पाहिजे. म्हणून नशामुक्त भारतासाठी, गेल्या काही दिवसांत, माय भारतचे स्वयंसेवक, देशातील स्वयंसेवी संस्था, सामाजिक-सांस्कृतिक संघटना आणि देशातील आध्यात्मिक गुरूंनी एकत्र येऊन नशामुक्त भारताचा, 100 सप्ताहांचा एक कार्यक्रम निश्चित केला आहे. 100 आठवडे चालणारे हे अभियान असणार आहे. मी प्रत्येक कुटुंबाला सांगू इच्छितो की तुम्हीही या अभियानाचा भाग बना.त्यात सहभागी व्हा आणि नशामुक्त भारताचे स्वप्न पूर्ण करण्यासाठी पुढे या.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो

दशकांपासून असलेल्या ज्या आव्हानांचा सामना आपण करत आहोत, ती आव्हाने आता एकविसाव्या शतकात संपवणे अत्यंत आवश्यक आहे. नक्षलवाद, माओवादाने लाखो तरुणांचे भविष्य उद्ध्वस्त केले. अनेक मातांच्या कुशीतले त्यांचे तरुण पुत्र हिरावून घेतले, त्यांना उद्ध्वस्त केले. प्रत्येक आई-वडिलांची स्वप्ने चिरडून टाकली. या नक्षलवादाने चार-चार दशकांपर्यंत हिंदुस्थानच्या मोठ्या भागाला, मोठ्या लोकसंख्येला आपल्या ताब्यात ठेवले होते. बंदुकीच्या जोरावर त्यांच्यावर दडपशाही केली . संविधानाची संपूर्ण पायमल्ली केली होती. देशातील सामान्य नागरिकांच्या रक्षणासाठी 3,000 हून अधिक आमचे पोलीस आणि सुरक्षा दलाचे जवान शहीद झाले. युद्धात जितके सैनिक मृत्युमुखी पडतात, त्यापेक्षा अधिक आमच्या पोलीस जवानांना देशातील सामान्य माणसाला सुरक्षा मिळावी यासाठी आपल्या प्राणांची बाजी लावावी लागली. या नक्षलवादाने सगळी भूमी रक्तबंबाळ केली होती.

2014 मध्ये तुम्ही आम्हाला संधी दिली, त्याच दिवशी आम्ही संकल्प केला होता की देशाला नक्षलवादापासून मुक्त करू आणि आज मला आनंद आहे की नक्षली-माओवादी हिंसा आता आपल्या शेवटच्या घटका मोजत आहे. आता तिच्यात तग धरण्याची ताकद उरलेली नाही. ती पूर्णपणे संपवण्याच्या दिशेने आपण पुढे जात आहोत. ज्या ठिकाणी कधी नक्षलवाद्यांच्या गोळ्या चालत होत्या, जी भूमी कधी रक्तरंजित राहत असे, आज त्याच नक्षलग्रस्त भागांमध्ये, त्याच परिसरांमध्ये नक्षलमुक्त झाल्यामुळे विकास, विश्वास आणि प्रयत्नांचा तिरंगा फडकत आहे.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

पण या आव्हानाला आपण आजही कमी लेखू शकत नाही. या आव्हानाबाबत आपल्याला आणखी सावध राहण्याची गरज आहे. अनेक वर्षे देशाच्या सत्तेत माओवादी विचारांचे लोक सत्तेच्या विविध स्थानांवर आपले स्थान निर्माण करून बसले होते. सरकारी समित्यांमध्ये सल्लागार म्हणूनही या माओवादी विचारसरणीने सरकारच्या धोरणांवर प्रभाव टाकला होता.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,

जंगलांमध्ये आम्हाला सशस्त्र नक्षलवाद्यांचा खात्मा करण्यात, त्या संकटापासून देशाला मुक्त करण्यात यश मिळाले आहे. मात्र शस्त्रधारी नक्षलवादी आता शिल्लक राहिले नसले तरी पण बुद्धीवर नक्षलवादाचा पगडा असलेले, नक्षलीबुद्धीचे अशा संधीच्या शोधात आहेत ज्यानं समाज हिंसा, अराजकतेचा मार्ग चोखाळेल, यासाठी ते हर तऱ्हेनं प्रयत्न करत आहेत. हे नक्षली विचारांचे लोक ओळखले पाहिजेत; अशा नक्षली विचारांच्या लोकांना बाजूला करावं लागेल आणि देशाला विकसित राष्ट्र बनविण्याच्या मुख्य ध्येयाच्या दिशेने देशातील युवा पिढीला सहभागी करून घ्यावं लागेल.

माझ्या प्रिय देशवासीयांनो,

सुरक्षित भारत बनवणं, हे आपलं सर्वांचं दायित्व आहे. आव्हान आपल्या देशामधलं असो की सीमेच्या पलीकडचं, कोणत्याही स्थितीला तोंड देण्यासाठी भारत तयार आहे. आज युद्धाचं स्वरुप बदलत आहे. आज युद्ध सीमेवरच लढलं जाईल, अशी खात्री देता येत नाही, ते कधी सीमेच्या आत, कुठे तेलशुद्धीकरण केंद्रावर, कुठे बँकिंग क्षेत्रावर, कुठे डेटा सेंटरवर जाऊन, एकप्रकारे युद्धाचं नवीन स्वरुप पायाभूत सुविधा तोडून टाकत आहे. आम्ही गेल्यावर्षी मिशन सुदर्शन चक्रची घोषणा केली होती. त्याबाबत अत्यंत वेगानं काम सुरू आहे. आज संरक्षण निर्यात जवळपास 50 टक्क्यांनी वाढली आहे. सुमारे 100 देशांमध्ये आपल्या देशात तयार झालेली शस्त्रास्त्रे पोहोचत आहेत. जागतिक पटलावर भारताची प्रतिमा हळूहळू उंचावत आहे. बदलत्या काळानुसार आपल्याला अस्त्र-शस्त्राप्रमाणे काम करायचं आहे. सैन्यदलांचं सामर्थ्य वाढवायचं आहे, पण त्याचबरोबर नागरिकांनाही सज्ज बनवायचं आहे. मागील शतकानुरुप नागरी संरक्षणाची जी व्यवस्था विकसित झाली होती, ती आता कालबाह्य झाली आहे, आणि म्हणूनच आज मी लाल किल्यावरून घोषणा करतो की येत्या काही दिवसात नागरी संरक्षणासाठी एक ‘व्हायब्रंट नेटवर्क’ तयार करू. त्याला आधुनिक संरक्षण व्यवस्थांची ओळख करून देऊ. आधुनिक संकटांपासून नागरिकांचं रक्षण करण्याची व्यवस्था होऊ शकेल असं, आधुनिक काळातील आव्हानांवर मात करू शकेल असं, खूप मोठं आधुनिक स्वयंसेवी दल आम्ही तयार करणार आहोत.

माझ्या प्रिय देशवासीयांनो,

राष्ट्र उभारणीच्या कार्यातील आपल्या भगिनींचं-मुलींचं योगदान ही मोठी प्रेरणादायी बाब बनली आहे. फायटर जेट असो वा नागरी विमान वाहतूक आपल्या मुली सर्वात पुढे दिसत आहेत. खेळाचं मैदान असो, आपल्या मुली पुढे आहेत. विज्ञान -तंत्रज्ञान-गणित (स्टेम) क्षेत्रातील शिक्षणासाठी प्रवेश घेण्यातही आपल्या मुली सर्वात पुढे असल्याचं दिसत आहे. आज सैन्यातही, ज्या मुली एनडीएतून शिक्षण घेऊन बाहेर पडल्या आहेत, त्या अत्यंत आत्मविश्वासानं सैन्यात नेतृत्व करण्याचं सामर्थ्य दाखवून देऊ लागल्या आहेत. आपल्या मुलींमध्ये केवढी शक्ती आहे. मागील काही दिवसांपूर्वी मी साहरनमध्ये एका सेमीकंडक्टर प्रकल्पात गेलो होतो. तिथे देशाच्या कानाकोपऱ्यातल्या आदिवासी भागातून आलेल्या मुली काम करत होत्या. जिथे पासपोर्ट काय असतो, याचीही कुणाला माहिती नाही, अशा गावांमधल्या होत्या, त्या मुली परदेशात गेल्या, तिथे त्यांनी प्रशिक्षण घेतलं आणि आज त्या ‘चिप’ तयार करण्याचं काम अत्यंत आत्मविश्वासानं करत आहे, मी त्यांचा आत्मविश्वास पाहून खरोखर मी खूप प्रभावित झालो.

आज तीन कोटी भगिनींना लखपती दीदी बनवण्याचं आम्ही जे उद्दीष्ट ठरवलं होतं, ते पार केलेलं आहे. आता आम्ही सहा कोटी महिलांना लखपती दीदी बनवण्याचं ध्येय गाठण्याच्या दिशेनं प्रगती करत आहोत. तीन कोटी नवीन लखपती दीदी तयार होणं म्हणजे ग्रामीण अर्थव्यवस्थेत मातृशक्तीच्या रुपानं मोठा बदल घडून येणार आहे.

माझ्या प्रिय देशवासीयांनो,

आज पंचायतींमध्ये, नगरपालिकांमध्ये, महानगरपालिकांमध्ये लोकप्रतिनिधी या नात्यानं महिला खूप मोठ्या संख्येनं देशाला मार्ग दाखवत आहेत. समस्यांवर उपाय शोधत आहेत, अत्यंत सक्षम नेतृत्व देत आहेत, हीच बाब लक्षात घेऊन आम्ही संसदेत नारी शक्ती वंदन अधिनियम विधेयक मंजूर केलं होतं; पण काही ना काही कारणांमुळे राजकारणाच्या आखाड्यात चाळीस वर्षांपासून कायम हे स्वप्न राजकीय डावपेचांचा बळी ठरत आलं आहे. आज मी देशातल्या सर्व राजकीय पक्षांना लाल किल्ल्याच्या या तटबंदीवरून, फडकणाऱ्या तिरंग्याच्या साक्षीनं आवाहन करतो, आग्रहपूर्वक सांगतो की चला, आपल्या माता भगिनींना विधानसभेत आणि लोकसभेत लवकरात लवकर 33 टक्के प्रतिनिधीत्व मिळावं, धोरण निर्मितीत त्यांना योगदान देता यावं, यासाठी त्या महिलांच्या सामर्थ्याचे पुजारी व्हा, त्या महिलांचा सन्मान करण्यासाठी पुढे या. ही काळाची गरज आहे. मी सगळ्या राजकीय पक्षांना आवाहन करतो की महिलांना आरक्षण मिळवून देऊन त्यांचा सन्मान करण्यात तुम्हीही सहभागी व्हा, तुम्हीही या यशाचं श्रेय घ्या आणि माता भगिनींना त्यांचा हक्क द्या.

माझ्या प्रिय देशवासीयांनो,

विकसित भारताचा संकल्प तेव्हाच पूर्ण होईल, जेव्हा विकास अगदी शेवटच्या व्यक्तीपर्यंत पोहोचेल. 2014 पूर्वी केवळ 25 कोटी लोकांना सामाजिक सुरक्षेचं कवच होतं. फक्त 25 कोटी लोकांना. मित्रांनो, गेल्या पाच-सात दशकांमध्ये फक्त 25 कोटी. आम्ही केवळ एका दशकाच्या आत शंभर कोटी नागरिकांना सामाजिक सुरक्षेचं कवच दिलं आहे. आयुष्मान भारत योजनेअंतर्गत 70 वर्षांहून अधिक वयाच्या ज्येष्ठ नागरिकांनाही पाच लाख रुपयांचे औषधोपचार मोफत मिळण्याची सोय उपलब्ध झाली आहे. कोट्यावधी लोकांची यामुळे खूप मोठी सोय झाली आहे, आणि या आयुष्मान कार्डामुळे जी गरीब कुटुंबं होती, मध्यमवर्गीय कुटुंबं होती त्यांच्या औषधं, शस्त्रक्रिया यावर होणाऱ्या दोन लाख कोटी रुपयांच्या खर्चात बचत झाली आहे. आज मला एका कामासाठी तुमची मदत हवी आहे. मी तुम्हा सर्वांकडून एक मदत मागतो आहे. सर्व तरुणांनो तुम्ही या गोष्टीचं नेतृत्व करावं, अशी माझी इच्छा आहे. तुमचा एक ते दोन तासांचा वेळ देशाला खूप मोठी शक्ती देणारा असेल. तुम्हाला वाटेल की एक-दोन तासांत मी काय शक्ती देणार, पण मी सांगतो की तुम्ही खूप मोठी शक्ती देणार आहात आणि त्यासाठी प्रत्येक घरात तसं वातावरण तयार झालं पाहिजे. सध्या काही दिवसांपासून जनगणनेचं काम सुरू आहे. विविध गोष्टींची मोजदाद केली जात आहे. आणि ही मोजणी केवळ आकड्यांमध्ये होऊन चालत नाही. त्यातल्या बारीक सारीक तपशीलांच्या आधारे धोरणं तयार केली जातात, योजनांची आखणी होते. देशाला पुढे नेण्यासाठीची रुपरेषा तयार केली जाते; आणि यासाठी परिपूर्ण माहिती उपलब्ध असणे आवश्यक असते. कधी कधी सरकारच्यावतीने जे प्रतिनिधी येतात, ते इतके घाईत असतात की ते कधी एक स्पेलिंग भलतंच लिहितात किंवा वेगळंच काही तरी लिहून ठेवतात आणि यामुळे अपेक्षित स्वरुपात अंतिम परिणाम दिसून येण्यात अडचणी येतात. आता जर तंत्रज्ञान उपलब्ध झालेलं आहे आणि यावेळी निर्णय झालेला आहे तर तुम्ही स्वतः देखील आपली माहिती मोबाईल फोनच्या माध्यमातून भरून देऊ शकता. त्यानंतर कुणी सरकारी कर्मचारी, प्रतिनिधी येतील, तुमच्याशी चर्चा करतील. तरी पण कुटुंबातील तुम्ही सर्वजण एकत्र बसून सर्व बारीकसारीक तपशीलात, स्पेलिंगमध्येही कोणती चूक राहू न देता आपली सगळी माहिती डिजिटली जितक्या अचूकपणे नोंदवाल तितकी देशाला पुढे जाण्यात मोठी मदत होईल. यासाठी मी देशातील तरुणांना सांगू इच्छितो की, तुम्ही आपल्या कुटुंबातील सर्व सदस्यांना एकत्र बसवून पूर्ण फॉर्म नीट समजून घ्या, अगोदर कागदावर ती माहिती लिहून काढा. कुठे चूक असेल तर ती दुरुस्त करून घ्या आणि त्यानंतर ती सगळी माहिती डिजिटली अपलोड करा. तुम्ही पहाल की देशाचं किती महत्त्वाचं काम होईल, देशाचा वेळ आणि ऊर्जा योग्य कामासाठी वापरली जाईल. यासाठी देशातील तरुणांना जनगणनेच्या या कामाशी अशाप्रकारे स्वतःला सक्रियपणे जोडून घेण्याचं मी आग्रहपूर्वक आवाहन करतो. या लाल किल्ल्यावरून मी याच दिवशी पंच प्रण (प्रतिज्ञा)ची चर्चा केली होती. या पंचप्रणांनी देशाला आपल्या आत्मगौरव बाळगून आपले लक्ष्य पार करण्याचे सामर्थ्य प्राप्त करून पुढे जाण्यास खूप मोठं बळ दिलं आहे. आपल्याला गुलामगिरीच्या खुणा यापुढेही पुसून टाकत राहायचं आहे. नेताजी सुभाषचंद्र बोस यांनी जशा भारताचं स्वप्न पाहिलं होतं, जसं बाबासाहेब आंबेडकरांनी पाहिलं होतं, पंडित नेहरुंनी पाहिलं होतं, सरदार पटेल, भगतसिंग, सुखदेव, राजगुरू यांनी पाहिलं होतं, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जींनी पाहिलं होतं, भगवान बिरसा मुंडांनी पाहिलं होतं, जोतिबा फुलेंनी पाहिलं होतं, त्या सर्वांपासून प्रेरणा घेऊन आपण पुढे वाटचाल करण्यासाठी आपण पुन्हा नव्यानं त्या संकल्पाचा पुनरुच्चार करूया. स्वतःपेक्षा राष्ट्रहिताला प्राधान्य आणि कर्तव्य ही आपली ओळख असावी, मी सर्व देशवासीयांना सांगेन की ही वेळ आपली आहे. स्वप्नांना ध्येय बनवा आणि सामर्थ्याचं यशात रुपांतर करा. चला, प्रत्येक पाऊल हे विकासाचं पाऊल बनवूया, सर्वांनी एकमेकांच्या साथीने वाटचाल करूया, सर्वांची मने जुळलेली असावीत, सगळ्यांनी आपल्या ध्येयाला धरून असावे, एका दिव्याने हजारो दीप उजळले जावेत. चला सर्वांनी मिळवून विकसित भारत घडवूया. याच भावनेसह या मंगल पर्वाच्या आपल्या सर्वांना खूप खूप शुभेच्छा

माझ्यासोबत म्हणा,

भारत माता की जय!

भारत माता की जय!

भारत माता की जय!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

खूप-खूप आभार!