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PM Modi speaks at the 46th Indian Labour Conference
The country cannot be happy, if the worker is unhappy. As a society, we need to respect the Dignity of Labour: PM
If we want to move ahead, we need to give opportunities to our youth. Giving opportunities to apprentices is the need for the hour: PM Modi

केंद्र और राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न सरकारों के प्रतिनिधि बंधु गण,

ये भारत की श्रम-संसद है और एक लंबे अरसे से हमारे देश में त्रिपक्षीय वार्ता का सिलसिला चला है। एक प्रकार से ये त्रिपक्षीय वार्ता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ये अपने आप में एक उज्‍ज्‍वल इतिहास है कि 75 साल का हमारे पास एक गहरा अनुभव है। उद्योग जगत सरकार एवं श्रम संगठन गत 75 वर्ष से लगातार बैठ करके विचार-विमर्श करके मत भिन्‍नताओं के बीच भी मंथन करके अमृत निकालने का प्रयास करते रहे हैं। और उसी संजीवनी से देश को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और उसी कड़ी में आज यह श्रम संसद हो रहा है। हम सबके लिए प्रेरणा की बात है कि यह वो समारोह है जहां कभी बाबा साहेब अंबेडकर का मार्ग दर्शन मिला था। यह वो समारोह है जिसे कभी भारत के भूत-पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमान वीवी गिरि जी का मार्ग दर्शन मिला था। अनेक महानुभावों के पद चिन्‍हों पर चलते-चलते आज हम यहां पहुंचे हैं। समय का अपना एक प्रभाव होता है। आज से 70-75 साल पहले जिन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होती थी वो आज जरूरत नहीं होगी और आज जिन बिंदुओं पर विचार करने की आवश्‍यकता है हो सकता है 25 साल बाद वह भी काल बाह्य हो जाए, क्‍योंकि एक जीवंत व्‍यवस्‍था का यह लक्षण होता है, नित्‍य नूतन, नित्‍य परिवर्तनशील और अच्‍छे लक्षण की पूर्ति के लिए एकत्र होकर आगे बढ़ना है। इस बात में कोई दुविधा नहीं है। इस बात में कोई मत-मतांतर नहीं है कि राष्‍ट्र के निर्माण में श्रमिक का कितना बड़ा योगदान होता है, चाहे वो किसान हो मजदूर हो, वो unorganized लेबर का हिस्‍सा हो, और हमारे यहां तो सदियों से इन सबको एक शब्‍द से जाना जाता है- विश्‍वकर्मा। विश्‍वकर्मा के रूप में जिसको जाना जाता है, माना जाता है और इसलिए अगर श्रमिक रहेगा दुखी , तो देश कैसे होगा सुखी? और मैं नहीं मानता हूं कि इन मूलभूत बातों में हममें से किसी में कोई मतभेद है। मैं श्रम को एक महायज्ञ मानता हूं जिसमें कोटि अवधि लोग अपनी आहूति देते हैं। सिर्फ श्रम की नहीं, कभी-कभार तो सपनों की भी आहूति देते हैं और तब जा करके किसी ओर के सपने संजोए जा सकते हैं। अगर एक श्रमिक अपने सपनों को आहूत न करता तो किसी दूसरे के सपने कभी संजोए नहीं जा सकते। इतना बड़ा योगदान समाज के इस तबके का है और इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करते हुए हमने आगे किस दिशा में जाना है उस पर हमें आगे सोचना होगा। जब तक श्रमिक, मालिक- उनके बीच परिवार भाव पैदा नहीं होता है, अपनेपन का भाव पैदा नहीं होता है। मालिक अगर यह सोचता है कि वो किसी का पेट भरता है और श्रमिक यह सोचता है कि मेरे पसीने से ही तुम्‍हारी दुनिया चलती है तो मैं नहीं समझता कि कारोबार ठीक से चलेगा। लेकिन अगर परिवार भाव हो, एक श्रमिक का दुख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फैक्‍टरी का हुआ कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता | और यह जिम्‍मेवारी जब हम निभाएंगे तब जाकर के, मैं तो चाहूंगा कभी यह भी सोचा जा सकता है क्‍या। इन सारी चर्चाओं का कभी वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन होने की आवश्‍यकता है। ऐसे बड़े उद्योग और ऐसे छोटे उद्योग या मध्‍यम दर्जे के उद्योग 50 साल पुराने है, लेकिन कभी हड़ताल नहीं हुई है क्‍या कारण होगा। उसको चलाने वाले लोगों की सोच क्‍या रही होगी। उन्‍होंने उनके साथ किस प्रकार से नाता जोड़ा है, क्‍या हम आज नए उद्योगकारों को, establish उद्योगकारों को , उनको यह नमूना दिखा सकते हैं कि हमारे सामने, हमारे ही देश में, इसी धरती में ये 50 उद्योग ऐसे हैं जो 50 साल से चल रहे हैं। हजारों की तादाद में श्रमिक है। लेकिन न कभी संघर्ष हुआ है, न कभी हड़ताल हुई है, न उनकी कोई शिकायत, न इनकी कोई शिकायत। एक मंगलम माहौल जिन-जिन इकाईयों में है, कभी उनको छांटकर निकालना चाहिए और उस मंगलम का कारण क्‍या है, इस मंगल अवस्‍था को प्राप्‍त करने के उनके तौर तरीके क्‍या है। अगर इन चीजों को हम श्रमिकों के सामने ले जाएंगे, इन चीजों को हम उद्योगकारों के सामने ले जाएंगे तो उनको भली-भांति समझा सकते हैं और मंगलम का माहौल जहां होगा, वहां यह भी नजर आया होगा कि सिर्फ श्रमिक का असंतोष है, ऐसा नहीं है। वहां यह भी ध्‍यान में आया होगा कि उस उद्योग का विकास भी उतना ही हुआ होगा और उन श्रमिकों का विकास भी उतना ही हुआ होगा। जब तक हम इस भावनात्‍मक अवस्‍था को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास नहीं करते और जो सफल गाथाएं हैं और उन सफल गाथाओं को हम उजागर नहीं करते, मैं नहीं मानता हूं कि हम सिर्फ कानूनों के द्वारा बंधनों को लगाते-लगाते समस्‍याओं का समाधान कर पाएंगे। हां, कानून उनके लिए जरूरी है कि जो किसी चीज को मानने को तैयार नहीं होते, श्रमिक को इंसान भी मानने को तैयार नहीं होते। उनकी सुख-सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उसकी minimum आवश्‍यकताओं की ओर भी देखने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को कानूनों की उतनी ही जरूरत होती है और इसलिए हम इस व्‍यवस्‍था को उस रूप में समझकर चलाएं। एक सामाजिक दृष्‍टि से भी हमारे यहां सोचने की बहुत आवश्‍यकता है। किसी न किसी कारण से हमारे भीतर एक बहुत बड़ी बुराई पनप गई है। हमारी सोच का हिस्‍सा बन गई है। हर चीज को देखने के हमारे तरीके की आदत सा बन गयी है और वो है हम कभी भी श्रम करने वाले के प्रति आदर के भाव से देखते ही नहीं। कोई बढ़िया कपड़े पहन करके हमारे दरवाजे की घंटी बजाए, दोपहर दो बजे हम आराम से सोए हों, कोट-पैंट सूट पहनकर आए और घंटी बजाए तो नींद खराब होगी ही होगी, दरवाजा खोलेंगे और जैसे ही उसको देखेंगे तो कहेंगे आइए आइए कहां से आए हैं, क्‍या काम था, बैठिए-बैठिए। और कोई ऑटो रिक्‍शा वाले ने घंटी बजाई, पता नहीं चलता है दोपहर दो बजे हम सोते हैं, इस समय घंटी बजा दी। क्‍यों भई यह फर्क क्‍यों?



यह जो हमारी सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी कमी आई है सदियों के कारण आई हुई है। लेकिन कभी न कभी dignity of labour , श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक का सम्‍मान ये समाज के नाते अगर हम स्‍वभाव नहीं बनाएंगे तो हम हमारे श्रमिकों के प्रति जो कि उसके बिना हमारी जिन्‍दगी नहीं है, अगर कोई धोबी बढ़िया सा iron नहीं करता तो मैं कुर्ता पहनकर कहां से आता यहां और इसलिए जिनके भरोसे हमारी जिन्‍दगी है उनके प्रति सम्‍मान का भाव यह सामाजिक चरित्र कैसे पैदा हो, उसके लिए हम किस प्रकार से व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करे। हमारे बच्‍चों की पाठ्य पुस्‍तकों में उस प्रकार के syllabus कैसे आए ताकि सहज रूप से आनी वाली पीढ़ियां हमारे श्रमिक के प्रति सम्‍मान के भाव से देखने लगे। आप देखिए माहौल अपने आप बदलना शुरू हो जाएगा। हमारी सरकार को सेवा करने का अवसर मिला है, श्रम संगठनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है और त्रिपक्षीय बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं। कई पुरानी-पुरानी गुत्‍थियां हैं, सुलझानी है और मुझे विश्‍वास है कि देश के श्रमिकों के आशीर्वाद से इन गुत्‍थियों को सुलझाने में हम सफल होंगे और समस्‍याओं का समाधान करने में हम कोई न कोई रास्‍ते खोजते चलेंगे। और सहमति से कानूनों का भी परिवर्तन करना होगा। कानूनों में कोई कुछ जोड़ना होगा, कुछ निकालना होगा वो भी सहमति से करने का प्रयास, प्रयास करते ही रहना चाहिए और निरंतर प्रक्रिया चलती रही है, आगे भी चलती रहने वाली है। कोई भी सरकार आए, ये कोई आखिरी कार्यक्रम कभी होता नहीं है और इसलिए मैं समझता हूं कि इस प्रक्रिया का अपना महत्‍व है। मेरा विश्‍वास रहा है- ‘minimum government , maximum governance’ और इसलिए ये जो कानूनों के ढेर हैं कानूनों का ऐसा कहीं खो जाए इन्‍सान। पता नहीं इतने कानून बनाये कर रखे हुए और हरेक को अपने फायदे वाला कानून ढूंढ सकते हैं ऐसी स्थिति है। हर कोई उद्योगकार एक ही कानून में से उद्योगकार को अपने मतलब का कानून निकलाना है तो वो भी निकाल सकता है सामाजिक संगठन को निकालना है तो वो भी निकाल सकता है, सरकार को निकालना है तो वो भी निकाल सकती है। क्‍योंकि टुकड़ों में सब चीजें चलती रही हैं | जब तक हम एक एकत्रित भाव से, composite भाव से, हमें जाना कहां है उसको ले करके , और इसीलिए मैंने एक कमेटी भी बनाई है के इन सबमें जो पुराने कानूनों को जरा देखरेख में सही कैसे किया जाए। और सच्‍चे अर्थ में जिनके लिए बनाए गए हैं कानून उनको लाभ हो रहा है या नहीं हो रहा। वरना कोई और जगह पर ऐसा कानून बनके बैठा हुआ है जो इसको आगे ही नहीं जाने देता। अब श्रमिक कहां लड़ेगा, कहां जाएगा। वो क्‍या कोर्ट कचहरी में इतने महंगे वकील रखेगा क्‍या। और इसलिए मेरा यहा आग्रह है और मैं ये कोशिश कर रहा हूं कि ये कानूनों का एक बहुत बड़ा जाल हो गया है उसका सरलीकरण हो, गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी अपने हकों को भली भांति समझ पाएं, हकों को प्राप्‍त कर पाएं। ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को हमने विकसित करने की दिशा में हमारा प्रयास है और मेरा विश्‍वास है कि हम उसको कर पाएंगे। मैं कभी-कभी उद्योग जगत के मित्रों से भी कहना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कभी हमारे इस Forum में एक और पहलू पर भी हम सोच सकते हैं क्‍या, क्‍योंकि हमने अपने एजेंडे को बड़ा सीमित कर दिया है। और जब तक उसका दायरा नहीं बढ़ाऐंगे पूरे माहौल में बदलाव नहीं आएगा। कितने उद्योगार हैं जिन्‍होंने अपने उद्योग चलाते-चलाते ऐसा माहौल बनाया, ऐसी व्‍यवस्‍था बनाई कि खुद का ही काम करने वाला एक मजदूर आगे चल करके Entrepreneur बना। कभी ये ऐसे ही तो खोज के निकालना चाहिए क्‍या उद्योगकार का यही काम है क्‍या। क्‍या 18-20 साल की उम्र में उसके यहां आया वो 60 साल का होने के बाद किसी काम का न रहे तब तक उसी के यहां फंसा पड़ा रहे। क्‍या ऐसा माहौल कभी उसने बताया कि हां मेरे यहां मजदूर के यहां पे आया था लेकिन मैंने देखा भई उसमें बहुत बड़ी क्षमता है, टेलैंट है, थोड़ा मैं उसको सहारा दे दूं वो अपने-आप में एक Entrepreneur बन सकता है और मैं ही एक-आध पुर्जा बनाएगा तो मैं खुद खरीद लूंगा जो मेरी फैक्‍टरी के लिए जरूरी है तो एक अच्‍छा Entrepreneur तैयार हो जाएगा।



कभी न कभी हमें सोचना चाहिए हमारे देश में छोटे और मध्‍यम एवं बड़े उद्योगकार कितने हैं कि जो हर वर्ष अपने ही यहां काम करने वाले कितने मजदूरों को उद्योगकार बनाया हो, Entrepreneur बनाया हो, Supplier बनाया हो, कितनों को बनाया कभी ये भी तो हिसाब लगाया जाए। उसी प्रकार से हमने देखा है कि आईटी फर्म, उसके विकास का मूल कारण क्‍या है, IT Firm के विकास का मूल कारण यह है कि उन्‍होंने अपन employee को कहा कि कुछ समय तुम्‍हारा अपना समय है। तुम खुद सॉफ्टवेयर‍ विकसित करो, तुम अपने ‍दिमाग का उपयोग करो और ये motivation के कारण सॉफटेवयर की दुनिया में नई-नई चीजें वो लेकर के आए फिर वो कम्‍पनी की बनी और बाद में जा करके वो बिकी। अवसर दिया गया, हमारे इतने सारे उद्योग चल रहे हैं, मैन्‍युफैक्‍चरिंग का काम करते हैं, कैमिकल एक्टिविटी का काम करते हैं, क्‍या हमने हमारे यहां इस टैलेंट को innovation के लिए अवसर दिया है क्‍या? क्‍या उद्योगकारों को पता है कि जिसको आप अनपढ़ मानते हो, जिसको आप unskilled labour मानते हो, उसके अंदर भी वो ईश्‍वर ने ताकत दी है, वो आपकी फैक्‍टरी में एकाध चीज ऐसी बदल देता है, कि आपके प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी इतनी बढ़ जाती है, बाजार में बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हो जाता है, आप फायदा तो ले लेते हो लेकिन उसके innovation skill को recommend नहीं करते हो। मैं मानता हूं हमारे उद्योगकारों ने अपने जीवन में, सरकारों ने भी और श्रम संगठनों ने भी पूछना चाहिए कि कितने उद्योगकार हैं, कितने उद्योग हैं कि जहां पर इनोवेशन को बल दिया गया है। हर वर्ष कम से कम एक नया इनोवेटेड काम निकलता है क्‍या? हमारे यहां सेना के विशेष दिवस मनाए जाते हैं,आर्मी का, एयरफोर्स का, नेवी का। राष्‍ट्रपति जी, प्रधानमंत्री सब जाते हैं, एट-होम करते हैं वो, तो मैं पिछली बार जब हमारे सेना के लोगों के पास गया तो मैंने उनको कहा भई ठीक है ये आपका चल रहा है कि ये ही चलाते रहोगे क्‍या? हम आते हैं, 30-40 मिनट वहां रुकते हैं, चायपान होता है, फिर चले जाते हैं। मैंने कहा मेरा एक सुझाव है अगर आप कर सकते हो तो, तो बोले क्‍या है सर? मैंने कहा क्‍या फौज में ऐसे छोटे-छोटे लोग हैं क्‍या, सिपाही होंगे, छोटे-छोटे लोग हैं, लेकिन उन्‍होंने काम करते-करते कोई न कोई इनोवेशन किया है जो देश की सुरक्षा के लिए बहुत काम आता है। उसमें नया आइडिया, क्‍योंकि वो फील्‍ड में है, उसे पता रहता है कि इसके बजाय ऐसा करो तो अच्‍छा रहेगा। मैंने ये कहा तो फिर हमारे आर्मी के लोगों ने ढूंढना शुरू किया।

बहुत ही कम समय मिला था लेकिन कोई 12-15 लोगों को ले आए वो और जब उनकी innovations मैंने देखा, मैं हैरान था सेना के काम आनेवाली टेक्‍नोलॉजी के संदर्भ में, कपड़ों के संदर्भ में, इतने बारीक छोटी-छोटी चीजों में उन्‍होंने बदलाव लाकर के बताया था अगर इसको हम मल्‍टीप्‍लाई करें तो सेना के कितना बड़ा काम आएगा और भारत की रक्षा के लिए कितना बड़ा काम आएगा। लेकिन उस आखिरी इन्‍सान की तरफ देखता कौन है जी? उसकी क्षमता को कौन स्‍वीकार करता है? मुझे ये माहौल बदलना है कि मेरे उद्योगकार मित्र बहुत बड़ी डिग्री लेकर आया हुआ व्‍यक्ति ही दुनिया को कुछ देता है ऐसा नहीं है। छोटे से छोटा व्‍यक्ति भी दुनिया को बहुत कुछ दे करके जाता है, सिर्फ हमारी नजरों की तरफ नहीं होता है और इसलिए हम एक कल्‍चर विकसित कर सकते हैं, व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं कि जिसमें उन, और मैं तो चाहता हूं श्रमिक संगठन भी ऐसे लोगों को सम्‍मानित करें, उद्योग भी सम्‍मानित करें और सरकार भी श्रम संसद के समय सामान्‍य मजदूर ने की हुई इनोवेशन जिसने देश का भला किया हो, उसमा सम्‍मान करने का कार्यक्रम करके हम श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़ाएं उस दिशा में हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमें एक नए तरीके से चीजों को कैसे सोचना चाहिए, नई चीजों में कैसे बदलाव लाना चाहिए, उस पर सोचने की आवश्‍यकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर हमेशा मजदूर क्‍यों रहे? उसी प्रकार से कुछ लोग ऐसे होते हैं कि पिताजी एक कारखाने में काम करते हैं, बेटा भी साथ जाना शुरू कर दिया, और वहीं काम करते, करते, करते एकाध चीज सीख लेता है और अपनी गाड़ी चला लेता है। उसके पास ऑफिशियल कोई डिग्री नहीं होती है, कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है और उसके लिए वो हमेशा उस उद्योगकार की कृपा पर जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे बड़ा शोषणा क्‍या हो सकता है कि उसको जो जिसके यहां उसके पिताजी काम करते थे, अब उसको वहीं पर काम करना पड़ रहा है, क्‍यों, क्‍योंकि उसके पास स्किल है लेकिन स्किल को दुनिया के अंदर ले जाने के लिए एक जो सर्टिफिकेट चाहिए वो नहीं है तो कोई घुसने नहीं देता है और वो भी कहीं जाने की हिम्‍मत नहीं करता है, उसको लगता है चलिए ये ही मेरे मां-बाप हैं उन्‍होंने ही मेरे बाप को संभाला था, मुझे भी संभाल लिया, चलिए भई जो दें मैं काम कर लूंगा। इससे बड़ी कोई अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती हमारी। और इसको बदलने का मेरे भीतर एक दर्द बढ़ा था और उसी में से हमने एक योजना बनाई है और मैं मानता हूं ये योजना श्रमिक के जीवन को और मैं नहीं मानता किसी श्रमिक संगठनों ने इस पर ध्‍यान गया होगा। कभी उसने सोचा नहीं होगा कि कोई सरकार श्रमिकों के लिए सोचती है तो कैसे सोचती है? हमने कहा कि जो परम्‍परागत इस प्रकार के शिक्षा पाए बिना ही चीजों को करता है भले ही उसकी उम्र 30 हो, 40 हो गई, 50 हो गई होगी, सरकार ने उसको सर्टिफाई करना चाहिए,official recognition देना चाहिए, official government का सर्टिफिकेट देना चाहिए ताकि उनका confidence लेवल बढ़ेगा, उसका मार्केट वैल्‍यू बढ़ेगा और वो एक उद्योगकार के यहां कभी अपाहिज बन करके जिन्‍दगी नहीं गुजारेगा। हमने officially ये decision लिया है।



कहने का तात्‍पर्य ये है कि हमें इन दिशाओं में सोचने की आवश्‍यकता है। हमें बदलाव करने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं। इसी प्रकार से एक बात की ओर ध्‍यान देने की मैं आवश्‍यकता समझता हूं, इसको कोई गलत अर्थ न निकाले, कोई बुरा न माने। कभी-कभार, जब चर्चा होती है कि उद्योग की भलाई, ये बात ठीक है कि देश की भलाई के लिए उद्योगों का विकास आवश्‍यक है, उद्योग की भलाई और उद्योगपति की भलाई, इसमें बहुत ही बारीक रेखा होती है। देश की भलाई और सरकार की भलाई इसमें बहुत बारीक रेखा होती है। श्रम संगठन की भलाई और श्रमिक की भलाई, बहुत बारीक रेखा होती है। और इसलिए इस बारीक रेखा की नजाकत को कभी-कभार उद्योग बचाना चाहते हैं लेकिन उनमें कभी-कभार हम उद्योगपति को बचा लेते हैं। कभी-कभार हम बात तो कर लेते हैं देश को बचाने की लेकिन कोशिश सरकार को बचाने की करते हैं। और उसी प्रकार से कभी-कभार हम बात श्रमिक की करते हैं लेकिन हम कोशिश हमारे श्रम संगठन की सुरक्षा की करते हैं। हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं, हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं और तीनों ने इस बारीक रेखा की मर्यादाओं को स्‍वीकार करना होगा, letter and spirit को स्‍वीकार करना होगा तब मैं मानता हूं श्रमिक का भी भला होगा, देश के उद्योग के विकास की यात्रा भी चलेगी और देश का भी भला होगा, सरकारों की भलाई के लिए नहीं चलता होगी। और इसलिए इन मूलभूत बातों की ओर हम कैसे मिल-बैठ करके एक सकारात्‍मक माहौल बनाने के भी दस कदम हो सकते हैं, श्रमिक की भलाई के दस कदम हो सकते हैं आवश्‍यक है तो राष्‍ट्र को आगे बढ़ाने की भी दस कदम हो सकते हैं वो भी इसके साथ-साथ आना चाहिए। जब तक हम इन बातों को संतुलित रूप से आगे नहीं ले जाएंगे, तब तक हम माहौल बदलने में सफल नहीं होंगे। और मुझे विश्‍वास है कि आज की श्रम संसद में बैठ करके हम लोग उस माहौल को निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़गे। भारत में 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 साल से कम आयु की है। हमारा देश एक प्रकार से विश्‍व का सबसे नौजवान देश है। आज दुनिया को skilled workforce की आवश्‍यकता है। Skill Development और Skill India ये मिशन हमारे नौजवानों को रोजगार कैसे मिले, अगर हम जो आज रोजगारी में है जो हमारे संगठन के सदस्‍य हैं, उनकी चिन्‍ता कर-करके बैठेंगे तो हो सकता है कि उनके हितों का भी भला हो जाएगा, उनकी रक्षा भी हो जाएगी, दो-चार चीजें हम उनको दिलवा भी देंगे लेकिन यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्ति ऐसी सीमित सोच वाला नहीं है ये मेरा विश्‍वास है। यहां बैठा हुआ हर व्‍यक्ति जो आज श्रमिक है उनकी तो चिन्‍ता करता ही करता है, लेकिन जो नौजवान बेरोजगार हैं जिनको कहीं न कहीं काम मिल जाए, इसकी उसको तलाश है, हमें उनके दरवाजे बंद करने का कोई हम नहीं है। जब तक हम हमारे देश के और नौजवानों कोरोजगार देने के लिए अवसर उपलब्‍ध नहीं कराएंगे तो हम जाने-अनजाने में गरीब का कहीं नुकसान तो नहीं कर देंगे। हो सकता है वो आज गरीब है श्रमिक नहीं बन पाया है, वो दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है और इसीलिए सरकार ने एक initiative लिया है apprenticeship को प्रोत्‍साहन देना। हमें जान करके हैरानी होगी, हम सबको लगता है हमारा देश आगे बढ़ना चाहिए और कभी पीछे रहता है तो हमीं लोग कहते हैं देखो बातें बड़ी करते थे,वो तो वहां पहुंच गया ये यहां रह गया, ये हम करते ही हैं। लेकिन जो पहुंचे हैं, आज चीन के अंदर जो भी साम्‍यवादी विचार से चलने वाले मूलभूत तो लोग हैं। चीन के अंदर दो करोड़ apprenticeship पर लोग काम कर रहे हैं,चीन के अंदर। जापान में एक करोड़ apprenticeship में काम कर रहे हैं। जर्मनी बहुत छोटा देश है, हमारे देश के किसी राज्‍य से भी छोटा देश है वहां पर तीस लाख लोग apprenticeship के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे आज दुख के साथ कहना चाहिए, सवा सौ करोड़ का हिन्‍दुस्‍तान,सिर्फ तीन लाख लोग apprenticeship पर काम कर रहे हैं। मेरे नौजवानों का क्‍या होगा मैं पूछना चाहता हूं।मैं सभी श्रमिक संगठनों से पूछना चाहता हूं कि इन नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए। इन नौजवानों के लिए अवसर खुलने चाहिए कि नहीं खुलने चाहिए। और भारत को आगे बढ़ाना है तो हमारे skill को काम में लाने के लिए ये हमें अवसर देना पड़ेगा। सरकारों ने, उद्योगकारों ने भी सोचना होगा इसलिए कि कानून के दायरे में फंस जाएंगे इसलिए कोई apprenticeship किसी को देनी नहीं, किसी नौजवान को अवसर नहीं देना, ये उद्योगकार जो दरवाजे बंद करके बैठे हैं, मैं नहीं मानता हूं ये लम्‍बे अरसे तक दरवाजे बंद करके बैठ पाएंगे। देश का नौजवान लम्‍बे अरसे तक इन्‍तजार नहीं करेगा। और इसलिए मैं उद्योगकारों को विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि आपका दायित्‍व बनता है, मुनाफा कम होगा, होगा लेकिन अगर इतनी मात्रा में आपके यहां श्रमिक हैं तो इतनी मात्रा में apprenticeship, ये आपकी social responsibility का हिस्‍सा बनना चाहिए। और इस प्रकार से क्‍या हम सपना नहीं दे सकते। दो करोड़ कर न पायें ठीक है, जब कर पाएंगे, कर पाएंगे अभी कम से कम तीन लाख में से 20 लाख apprenticeship पर जा सकते हैं हम क्‍या। कम से कम इतना तो करें। करोड़ों नौजवानों को रोजगार चाहिए, कहीं से तो शुरू करें। और इसलिए मैं चाहूंगा कि जो श्रमिक आज हैं उनकी चिन्‍ता करने वाले लोगों का ये भी दायित्‍व है कि जिनकी श्रमिक बनने की संभावना है उनकी जिन्‍दगी की भीचिन्‍ता उस नौजवान की भी करने की आवश्‍यकता है जो गरीब है। पिछले 16 अक्‍टूबर को हमने श्रमेव जयते के अभियान की शुरुआत की थी। ये सर्वांगीण प्रयास है हमारा। जिन सुविधाओं की शुरुआत हमने की उनकी प्रगति आप सबकी नजर में है। यूनिवर्सल एकाउंट नम्‍बर (यूएएन) इसके माध्‍यम से प्रोविडेंट फंड के एकाउंट पोर्टेबल हो गए हैं बल्कि लगभग 4 करोड़ 67 लाख मजदूरों को digital network platform का already लाभ मिलना शुरू हो गया है। पीएफपी ऑनलाईन लाभ ले रहा है ये चीजें नहीं थीं, इन चीजों का वो लाभ ले रहा है ये ही तो श्रमिक को empower करने के लिए टेक्‍नोलॉजी का सदुपयोग करने का प्रयास किया है। जब हम सरकार में आए हमारे देश में कई लोग ऐसे थे कि जिनको पचास रुपये पेंशन मिलता था, अस्‍सी रुपये पेंशन मिलता था, सौ रुपये पेंशन मिलता था,कुछ लोग तो पेंशन लेने के लिए जाते नहीं थे क्‍योंकि पेंशन से ऑटोरिक्‍शा का खर्चा ज्‍यादा होता था। इस देश में करीब-करीब बीस लाख से अधिक ऐसे श्रमिक थे जिनको पचास रुपया, सौ रुपया, दौ सौ रुपया पेंशन मिलता था। हमने आ करके, बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लगा है, सबके लिए minimum पेंशन एक हजार रुपया कर दिया है। मैं आशा करता हूं कि हमारे श्रमिक संगठन, ये हमारा जो pro-active initiative है उसके प्रति भी उस भाव से देखें ताकि हम सबको मिल करके दौड़ने का आनंद आ जाए,चार नई चीजें करने का उमंग आ जाए क्‍योंकि हमें चलना नहीं है और मुझे मैं मानता हूं, अगर इस देश में इतने सारे प्रधानमंत्री हो गए होंगे लेकिन श्रमिकों पर किसी एक प्रधानमंत्री पर सबसे ज्‍यादा हक है तो मुझ पर। क्‍योंकि मैं उसी बिरादरी से निकल कर आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और इसलिए गरीब के हाल को समझने के लिए मुझे कैमरामैन को लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।मैं उसको भली-भांति समझता हूँ और इसलिए जो बातें मैं बता रहा हूं। भीतर एक आग है, कुछ करना है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, वंचित, दलित, पीड़ित शोषित उनके लिए कुछ करना है। लेकिन हरेक के करने की सोच अलग होगी, रास्‍ते अलग होंगे। हमारी एक अलग सोच है, अलग रास्‍ते है लेकिन लक्ष्‍य यही है कि मेरे देश के मजदूर का भला हो, मेरे देश के गरीब का भला हो, मेरे देश के किसानों का भला हो, ये सपने लेकर के हम चल पड़े हैं। और इसलिए जैसा मैंने कहा हमने apprentice sector में सुधार किया। हमने on the job training के मौके बढ़ गए हैं, उस दिशा में हमने काम किया है। आज हमने हेल्‍थ को सेक्‍टर को ESIC 2.0 स्‍कीम को लांच किया है। हम कभी-कभार ये तो देखते हैं कि भई काम मिलना चाहिए, लेकिन कैसे मिले, मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है। उसके लिए न सरकारों को फुरसत है, न श्रमिक संगठनों को फुरसत है। उनको तो लगता है देखो यार, कागज पर दिखा दे, ये तुमको दिलवा दिया या नहीं दिलवा दिया। वो श्रमिक भी बड़ा खुश है, यार मैं इसका मेम्‍बर बन गया हूं मेरा काम हो गया। मैं इस स्‍थिति को बदलना चाहता हूं। मैं श्रमिक संगठन और सरकार की पाटर्नरशिप से आगे बढ़ना चाहता हूं। कंधे से कंधा मिलाकर के आगे चलना चाहता हूं और अगर हमने ये अस्‍पतालों की व्‍यवस्‍था को बदलने की दिशा में काम किया, अब छोटा निर्णय है कि भई हर दिन चद्दर बदलो। अब मुझे बताइए health की दृष्‍टि से, hygiene की दृष्‍टि से, ये सब जानते हैं कि बदलनी चाहिए और लोग मानते होंगे कि बदलें, लेकिन हमको मालूम है कि लोग नहीं बदलते। ठीक है, आया है patient पड़ा है। आखिरकार मुझे रास्‍ता खोजना पड़ा, मैंने कहा हर दिन की चद्दर का कलर ही अलग होगा, patient को पता चलेगा कि चद्दर बदली कि नहीं बदली। हमारे देश के बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है वो मुझे सवाल करते रहते हैं कि मोदी कुछ बड़ा ले आओ, कुछ बड़ा। बहुत सरकारें बड़ा-बड़ा ले आईं। मुझे तो मेरे गरीब के लिए जीना है, मेरे गरीब के लिए कुछ काम करना है इसलिए मेरा दिमाग इसी में चलता रहता है। यही, यही मैं सोच, और मैं दिल से बातें कर रहा हूं कि ये अन्‍य जो कई चीजें लाए हैं। हम चाहते हैं कि श्रमिक की हेल्‍थ को लेकर के चिन्‍ता होनी चाहिए, होनी चाहिए। और हमने उस दिशा में हमने एक तो उसके सारे हेल्‍थ रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए ताकि अब उसको अपना ब्‍लड टेस्‍ट का क्‍या हुआ, यूरिन टेस्‍ट का क्‍या हुआ, दुनिया भर में चक्‍कर नहीं काटना पड़ेगा। अपने मोबाइल फोन पर सारी चीजें उपलब्‍ध हो जाएं ये व्‍यवस्‍था की है ताकि श्रमिक को सुविधा कैसे हो, हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। और मैं मानता हूं कि उस काम के कारण उसको लाभ होगा।



आज हमारे देश में असंगठित मजदूर कुल मजदूरों का 93 पर्सेंट है। इस सरकार ने असंगठित मजदूरों के संबंध में बहुत ही constructive way में और well planned way में योजनाएं बनाई हैं और हम आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा कैसे मिले। न उसे स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा है, न जीवन बीमा है और न हीं पेंशन है और बड़ी संख्‍या में असंगठित ग्रामीण मजदूर अनपढ़ हैं, जिन्‍हें अपनी बात कहां कहना है, कैसे पहुंचे, इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। ऐसे मजदूर के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में सरकार का उत्‍तरदायित्‍व मानता हूं। देश के गरीब, असंगठित वर्गों को ध्‍यान में रख करके हमने तीन महत्‍वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं । और ये योजनाएं गरीब के लिए हैं। अमीर का उससे कोई लेना-देना नहीं है। और मैं मानता हूं, सभी श्रमिक संगठनों से मैं आग्रह करूंगा कि आप भी इस बात में मदद कीजिए। अगर किसी के घर में, हम कई यहां संगठन है जो असंगठित मजदूरों का काम करते हैं। कुछ लोग हैं जो घरों में बर्तन साफ करने वाले लोग होते हैं, उनका संगठन चलाते हैं। क्‍या हम कोशिश नहीं करे तो उसके मालिकों को मिल करके कहे कि भई आपके यहां ये लड़का कपड़े धोता है, बर्तन साफ करता है या खाना पकाता है या गाड़ी चलाता है। या आपका धोबी है। इसके लिए ये-ये सरकार की स्‍कीम है। आप एक मालिक हो, इसके लिए इतना पैसा बैंक में डालो, उसका जीवन भरा हो जाएगा। मैं मानता हूं हर कोई इसको करेगा। हम मध्‍यम वर्ग के लोगों को भी अगर समझाएंगे कि भई तुम्‍हारे साथ काम करने वाले जो गरीब लोग है उनको इन स्‍कीम का फायदा तुम दो। तुमको कोई महंगा नहीं पड़ने वाला है, तुम्हारे लिए तो एक फाइव स्‍टार होटल का एक खाने से ज्‍यादा का खर्च नहीं है। लेकिन उस गरीब की तो जिन्‍दगी बदल जाएगी और इसलिए हमने अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन जयोति बीमा योजना और मैं बताऊं यानी एक महीने का एक रुपया,12 महीने का 12 रुपया। एक स्‍कीम ऐसी है एक दिन का सिर्फ 80-90 पैसा। साल भर का 330 रुपया। लेकिन उसको जीवन भर उसकी व्‍यवस्‍था मिल सकती है। ये काम उसके मालिक, जिसके वहां वह काम करता है, वो कर सकते हैं और श्रमिक संगठन एक सामाजिक काम के तौर पर इस बात को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार से कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। मुझे लगता है कि इसका उसको फायदा होगा और हमने यह फायदा दिलवाना चाहिए। व्‍यवस्‍थाएं हैं, योजनाएं हैं। अटल पेंशन योजना। अगर आज से उसको जोड़ दिया जाए, समझा दिया जाए उसका तो जीवन धन्‍य हो जाएगा कि भई चलो 60 साल के बाद मुझे ये लाभ मिलेगा। मैं समझता हूं कि हम एक सामाजिक चेतना जगाने का भी काम करें, सामाजिक बदलाव का भी काम करें और उस काम को आगे बढ़ाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत सारी बातें हम कर पाएंगे। कई विषय है जिसको मैं आपके सामने रखता ही चला जाता हूं। लेकिन मुझे विश्‍वास है कि इस श्रम संसद के अंदर जो कुछ भी महत्‍वपूर्ण चर्चाएं हो रही है। हमारे वित्‍त मंत्री और उनकी एक कमेटी बनी है जो उनको सुन रही है। और बातचीत से ही अच्‍छे नतीजे निकलते हैं, सुखद परिणाम निकलेंगे। कल भी मेरी श्रम संगठन के प्रमुख लोगों के साथ मुझे मिलने का अवसर मिला था, उनको सुनने का अवसर मिला था और मैं भली-भांति उनकी बात को, उनकी भावनाओं को समझता हूं। मिल-बांट करके हमें आगे बढ़ना है और हम देश को आगे बढ़ाने में कैसे काम आएं, देश को आर्थिक नई ऊंचाइयों पर कैसे ले जाएं, देश में नौजवानों को अधिकतम रोजगार के अवसर कैसे उपलब्‍ध कराएं।

आज भारत के सामने मौका है विश्‍व के परिदृश्‍य में भारत के सामने मौका है। यह मौका अगर हमने खो दिया तो फिर पता नहीं हमारे हाथ में कब मौका आएगा और उस काम को लेकर आगे बढ़ें इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस श्रम सांसद को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, उत्‍तर परिणाम निकलेंगे इस भरोसे के साथ और साथ मिल करके आगे चलेंगे इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀଙ୍କ 'ମନ କି ବାତ' ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ବିଚାର ଏବଂ ଅନ୍ତର୍ଦୃଷ୍ଟି ପଠାନ୍ତୁ !
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ଲୋକପ୍ରିୟ ଅଭିଭାଷଣ

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ଗୋଆରେ କୋଭିଡ ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ହିତାଧିକାରୀ ଓ ସ୍ବସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ସହ ମତ ବିନିମୟ ଅବସରରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଉଦବୋଧନ
September 18, 2021
ସେୟାର
 
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ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ୧୦୦% ପ୍ରଥମ ଡୋଜ୍ ପ୍ରଦାନ ପୂରଣ ଲାଗି ଗୋଆକୁ ପ୍ରଶଂସା କଲେ
ଏହି ଉପଲକ୍ଷେ ଶ୍ରୀ ମନୋହର ପାରିକରଙ୍କ ସେବାଗୁଡ଼ିକୁ ସ୍ମରଣ କଲେ
‘ସବକା ସାଥ, ସବକା ବିକାଶ, ସବକା ବିଶ୍ୱାସ ଓ ସବକା ପ୍ରୟାସ’ର ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଫଳାଫଳ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି ଗୋଆ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ମୁଁ ଅନେକ ଜନ୍ମଦିନ ଦେଖିସାରିଲିଣି ଏବଂ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ସର୍ବଦା ସାଧାରଣ ବିବେଚନା କରିଥାଏ କିନ୍ତୁ, ମୋର ସମସ୍ତ ବର୍ଷଗୁଡ଼ିକରେ, ଗତକାଲି ଏଭଳି ଏକ ଦିନ ଥିଲା ଯାହା ମୋତେ ଆବେଗିକ ଭାବେ ପ୍ରଭାବିତ କରିଥିଲା, କାରଣ ୨.୫ କୋଟି ଲୋକଙ୍କ ଟିକାକରଣ ହୋଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ ୧୫ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ପରିଚାଳନା କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ ୨୬ ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଏବଂ ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ୪୨୫ରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ଦିଆଯାଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି ଯାହା କି ‘ଏକ ଭାରତ- ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’କୁ ପ୍ରତିପାଦିତ କରୁଛି, ମୋ ମନରେ ଅନେକ ଆନନ୍ଦ ଭରିଦେଇଛି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆ କେବଳ ଦେଶର ଏକ ରାଜ୍ୟ ନୁହେଁ, ବରଂ ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ଏକ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଚିହ୍ନ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ଗୋଆର ଉର୍ଜାବାନ ତଥା ଲୋକପ୍ରିୟ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ମନ୍ତ୍ରିମଣ୍ଡଳରେ ମୋର ସାଥୀ, ଗୋଆର ସୁପୁତ୍ର ଶ୍ରୀପଦ ନାୟକ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାରଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀ ପରିଷଦରେ ମୋର ସହକର୍ମୀ ଡକ୍ଟର ଭାରତୀ ପାୱାର ମହାଶୟା, ଗୋଆର ସମସ୍ତ ମନ୍ତ୍ରୀଗଣ, ସାଂସଦ ଏବଂ ବିଧାୟକ, ଅନ୍ୟ ଜନ ପ୍ରତିନିଧି, ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ !

ଗୌୟଚ୍ୟା ମ୍ହଜା ମୋଗାଲ ଭାବା ବହିଣିନୋ, ତୁମଚେ ଅଭିନନ୍ଦନ।

ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଶ୍ରୀ ଗଣେଶ ପର୍ବର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାବନା । ଆସନ୍ତାକାଲି ଅନନ୍ତ ଚତର୍ଦ୍ଦଶୀର ପବିତ୍ର  ଅବସରରେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ବାପ୍ପାଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେବା, ଆମେ ମଧ୍ୟ ଆମ ହାତରେ ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ବାନ୍ଧିବା। ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ଅର୍ଥାତ ଜୀବନରେ ସୁଖ-ସମୃଦ୍ଧି, ଦୀର୍ଘ ଜୀବନର ଆଶୀର୍ବାଦ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ ଏହି ପବିତ୍ର ଦିନ ପୂର୍ବରୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ନିଜ ହାତରେ, ବାହୁରେ ଜୀବନ ରକ୍ଷା ସୂତ୍ର,  ଅର୍ଥାତ୍ ଟିକା ନେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଶେଷ କରିଛନ୍ତି । ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଗ୍ୟ ବ୍ୟକ୍ତି ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଟିକା ନେଇ ସାରିଛନ୍ତି । କରୋନା ବିରୋଧରେ ଲଢେଇରେ ଏହା ହେଉଛି ଏକ ବଡ କାର୍ଯ୍ୟ। ଏଥିପାଇଁ ଗୋଆର ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ଏପରି ଏକ ରାଜ୍ୟ, ଯେଉଁଠାରେ ଭାରତର ବିବିଧତାର ଶକ୍ତି ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ। ପୂର୍ବ ଏବଂ ପଶ୍ଚିମର ସଂସ୍କୃତି, ଚାଲିଚଳନୀ, ଖାଦ୍ୟପେୟ ଏଠାରେ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରେ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ । ଏଠାରେ ଗଣେଶୋତ୍ସବ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରାଯାଏ, ଦୀପାବଳୀ ମଧ୍ୟ ଧୂମଧାମରେ  ପାଳନ କରାଯାଏ ଏବଂ ଖ୍ରୀଷ୍ଟମାସ ସମୟରେ ଗୋଆର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଆହୁରି ବୃଦ୍ଧି ପାଇଥାଏ । ଏହାସବୁ କରିବା ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆ ନିଜର ପରମ୍ପରା ନିର୍ବାହ କରିଥାଏ। ଏକ ଭାରତ-ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତର ଭାବନାକୁ ନିରନ୍ତର ସୁଦୃଢ କରୁଥିବା ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି, କେବଳ ମୋତେ ନୁହେଁ, ବରଂ ସମଗ୍ର ଦେଶକୁ ଖୁସି ଦେଇଥାଏ ଏବଂ ଗର୍ବରେ ଭରି ଦେଇଥାଏ।

ଏହି ଗୁରୁତ୍ବପୂର୍ଣ୍ଣ ଅବସରରେ, ମୋର ବନ୍ଧୁ, ସଚ୍ଚୋଟ କର୍ମାଯାଗୀ, ସ୍ବର୍ଗତ ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ମନେ ପଡିବା ସ୍ୱାଭାବିକ କଥା । 100 ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ ସଙ୍କଟ ସହିତ ଗୋଆ ଯେଉଁଭଳି ଭାବରେ ମୁକାବିଲା କରିଛି, ପାରିକର ମହାଶୟ ଆଜି ଆମ ଗହଣରେ ଥାଆନ୍ତେ, ତେବେ ସେମ ମଧ୍ୟ ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ, ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ଉପଲବ୍ଧି ପାଇଁ ବହୁତ ଗର୍ବି କରିଥାନ୍ତେ।

ଗୋଆ ବିଶ୍ୱର ସର୍ବବୃହତ ଏବଂ ଦ୍ରୁତ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ- ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଟିକା, ମାଗଣା ଟିକାର ସଫଳତାରେ ପ୍ରମୁଖ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କରିଛି । ଗତ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆରେ ପ୍ରବଳ ବର୍ଷା, ଘୂର୍ଣ୍ଣିଝଡ, ବନ୍ୟା ପରି ପ୍ରାକୃତିକ ବିପର୍ଯ୍ୟୟ ସହିତ ଖୁବ ସାହସର ସହିତ ଲଢେଇ କରିଛି। ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ବଡ଼ ସାହସର ସହିତ ଲଢିଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ କରୋନା ଟିକାକରଣର ଗତି ବଜାୟ ରଖିଥିବାରୁ ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ, ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ଦଳ, ଗୋଆର ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି।

ଏଠାରେ ଅନେକ ସାଥୀ ଯେଉଁମାନେ ସେମାନଙ୍କର ଅନୁଭୂତି ସଂପର୍କରେ ଆମ ସହିତ ମତ ବିନିମୟ କରିଛନ୍ତି, ତାହା ସ୍ପଷ୍ଟ ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଏହି ଅଭିଯାନ କେତେ କଷ୍ଟକର ଥିଲା। ଭରା  ନଦୀ ପାର ହୋଇ, ଟିକାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖି ଦୂର ଦୂରାନ୍ତରେ ପହଞ୍ଚିବା କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଭାବନା ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ, ସମାଜ ପ୍ରତି ଭକ୍ତି ଦରକାର ଏବଂ ଅପ୍ରତିମ ସାହସର ଆବଶ୍ୟକ ପଡିଥାଏ। ଆପଣ ସମସ୍ତେ ଅଟକି ନ ଯାଇ, ଥକି ନ ପଡି ମାନବିକତାର ସେବା କରୁଛନ୍ତି। ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସେବା ସଦା- ସର୍ବଦା ସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ରହିବ।

ସାଥୀଗଣ,

ସାବକା ସାଥ, ସାବକା ବିକାଶ, ସାବକା ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ ସାବକା ପ୍ରୟାସ (ସମସ୍ତଙ୍କର ସହିତ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିକାଶ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ  ସମସ୍ତଙ୍କର ପ୍ରୟାସ)- ଏହି ସମସ୍ତ କଥା କିଭଳି ଚମତ୍କାର ଫଳାଫଳ ଆଣିଥାଏ, ଏହା ଗୋଆ, ଗୋଆର ସରକାର, ଗୋଆର ନାଗରିକ, ଗୋଆର କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଆଗଧାଡିର କର୍ମଚାରୀ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି । ସାମାଜିକ ଏବଂ ଭୌଗୋଳିକ ଆହ୍ବାନର ମୁକାବିଲା ପାଇଁ ଗୋଆ ଯେଉଁ ପ୍ରକାରର ସମନ୍ୱୟ ଦେଖାଇଛି, ତାହା ବାସ୍ତବରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ପ୍ରମୋଦ ମହାଶୟ ଆପଣଙ୍କୁ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ଟିମକୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା । ରାଜ୍ୟର ଦୂର- ଦୂରାନ୍ତରେ ବସବାସ କରୁଥିବା, କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ସମସ୍ତ ସବ୍-ଡିଭିଜନରେ ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟ ଭଳି ଦ୍ରୁତଗତିରେ ଟିକାକରଣ କରାଯିବା ହେଉଛି ଏହାର ଏକ ବଡ଼ ପ୍ରମାଣ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ, ଗୋଆ ଏହାର ଗତିକୁ ହ୍ରାସ କରିବାକୁ ଦେଇ ନାହିଁ । ଏହି ସମୟରେ ଏପରିକି ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଆଲୋଚନା କରୁଛୁ, ସେତେବେଳେ ରାଜ୍ୟରେ ଦ୍ୱିତୀୟ ଡୋଜ ପାଇଁ ଟିକା ଉତ୍ସବ ଚାଲିଛି। ଏହିଭଳି ଆନ୍ତରିକ, ଏକନିଷ୍ଠ ଉଦ୍ୟମ ସହିତ ଗୋଆ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟିକାକରଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଦେଶର ଏକ ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟ ହେବା ପାଇଁ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି। ଆଉ ଏହା ମଧ୍ୟ ଏକ ଉତ୍ତମ କଥା ଯେ ଗୋଆ ନା କେବଳ ଏହାର ଜନସଂଖ୍ୟା ନୁହେଁ ଏଠାକୁ ଆସୁଥିବା ପର୍ଯ୍ୟଟକ, ବାହାରୁ ଆସୁଥିବା ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଟିକାଦାନ କରୁଛି ।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜିର ଏହି ଅବସରରେ ମୁଁ ଦେଶର ସମସ୍ତ ଡାକ୍ତର, ସ୍ବାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀ, ପ୍ରଶାସନ ସହ ଜଡିତ ଲୋକଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ ଯୋଗୁଁ ଗତକାଲି ଭାରତ ଗୋଟିଏ ଦିନରେ ଅଢେଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦେବାର ରେକର୍ଡ କରିଛି। ବିଶ୍ବର ବଡ଼ ବଡ଼ ସମୃଦ୍ଧ ଏବଂ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଥିବା ଦେଶ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରି ନାହାଁନ୍ତି । ଗତକାଲି ଆମେ ଦେଖୁଥିଲୁ କିଭଳି ଦେଶ ଆଲାରାମ ଲଗାଇ କୋୱିନ ଡ୍ୟାସବୋର୍ଡକୁ ଦେଖୁଥିଲା। ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିବା ସଂଖ୍ୟାକୁ କେଇ ଉତ୍ସାହିତ ହୋଇ ପଡୁଥିଲେ।

ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ 15 ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ 26 ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଟୀକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ଚାରି ଶହ ପଚିଶରୁ ଅଧିକ ଲୋକ ଏହି ଟିକା ନେଇଥିଲେ। ଦେଶର ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରାଯାଇଥିବା ଏକ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କେନ୍ଦ୍ରରେ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆଯାଇଛି । ଭାରତର ନିଜସ୍ୱ ଟିକା, ଟିକାକରଣ ପାଇଁ ଏତେ ବଡ଼ ନେଟୱାର୍କ, କୁଶଳୀ ମାନବ ସମ୍ବଳ, ଏହା ଭାରତର ସାମର୍ଥ୍ୟକୁ ଦର୍ଶାଉଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଗତକାଲି ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଯେଉଁ ଉପଲବ୍ଧି ମିଳିଛି ନା, ତାହା କେବଳ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱରେ ଟୀକାକରଣର ପରିସଂଖ୍ୟାନ ଆଧାରରେ ନୁହେଁ, ଭାରତ ପାଖରେ କେତେ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଅଛି ତାହାର ପରିଚୟ ବିଶ୍ବକୁ ମିଳିବାକୁ ଯାଉଛି। ଆଉ ସେଥିପାଇଁ ଏହାର ଗୌରବଗାନ କରିବା ହେଉଛି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଏବଂ ଏହା ମଧ୍ୟ ସ୍ବଭାବ ହେବା ଉଚିତ୍।

ସାଥୀଗଣ,

ମୁଁ ଆଜି ମୋର ମନର କଥା ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ବହୁତ ଜନ୍ମଦିନ ତ ଆସିଛି ଆଉ ଯାଇଛି କିନ୍ତୁ ମୁଁ ମନର ସହିତ ସବୁବେଳେ ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ଅଲିପ୍ତ ହୋଇ ରହିଛି, ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ମୁଁ ଦୂରେଇ ରହିଛି । କିନ୍ତୁ ମୋର ଏତିକି ଆୟୂଷରେ କାଲିର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ମୋତେ ବହୁତ ଭାବୁକ କରିବା ଭଳି ଥିଲା। ଜନ୍ମଦିନ ପାଳନ କରିବାର ବହୁତ ଗୁଡ଼ିଏ ଉପାୟ ରହିଛି। ଲୋକମାନେ ଭିନ୍ନ- ଭିନ୍ନ ଉପାୟରେ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରିଥାଆନ୍ତି। ଆଉ ଯଦି ପାଳନ କରନ୍ତି ତେବେ କିଛି ଯେ ଭୁଲ କରନ୍ତି ଏଭଳି ଭାବୁଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ମୁଁ ନୁହେଁ। କିନ୍ତୁ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ କାରଣରୁ, କାଲିକାର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥିଲା।

ମେଡିକାଲ କ୍ଷେତ୍ରର ଲୋକମାନେ, ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ବିଗତ ଦେଢ଼- ଦୁଇ ବର୍ଷ ଧରି ଦିନ-ରାତି ଲାଗି ପଡ଼ିଛନ୍ତି, ନିଜ ଜୀବନର ଚିନ୍ତା ନ କରି କରୋନା ସହିତ ଲଢ଼ିବାରେ ଦେଶବାସୀମାନଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି, ସେମାନେ କାଲି ଟିକାକରଣର ଯେଉଁ ରେକର୍ଡ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି, ତାହା ହେଉଛି ବହୁତ ବଡ଼ କଥା। ସମସ୍ତେ ଏଥିରେ ବହୁତ ସହଯୋଗ କରିଛନ୍ତି। ଲୋକମାନେ ଏହାକୁ ସେବା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଲେ। ଏହା ହେଉଛି ତାଙ୍କର କରୁଣା ଭାବ, କର୍ତବ୍ୟ ଭାବ, ଯେଉଁଥିପାଇଁ ଅଢ଼େଇ କୋଟି ଟିକାର ଡୋଜ ଦିଆ ଯାଇ ପାରିଲା । ଆଉ ମୁଁ ମାନୁଛି ଯେ, ଟିକାର ପ୍ରତ୍ୟେକଟି ଡୋଜ, ଗୋଟିଏ ଜୀବନକୁ ବଂଚାଇବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିଥାଏ। ଅଢ଼େଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଏତେ କମ୍ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ, ଏତେ ବଡ଼ ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳିବା, ବହୁତ ସନ୍ତୋଷ ପ୍ରଦାନ କରିଥାଏ। ଜନ୍ମଦିନମାନ ଆସିବ, ଯିବ, କିନ୍ତୁ କାଲିର ଏହି ଦିନ ମୋ ମନକୁ ଛୁଇଁ ଯାଇଛି, ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ଯାଇଛି। ମୁଁ ଯେତିକି ଧନ୍ୟବାଦ ଦେବି ତାହା କମ୍ ହେବ। ମୁଁ ହୃଦୟର ସହିତ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରୁଛି, ସମସ୍ତଙ୍କୁ କୃତଜ୍ଞତା ଜ୍ଞାପନ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଭାରତର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ, କେବଳ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ହିଁ ନୁହେଁ, ବରଂ ଗୋଟିଏ ପ୍ରକାରରେ ଅଜୀବିକାରର ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ସୁରକ୍ଷା କବଚ। ଏବେ ଆମେ ଦେଖିବା ତ ହିମାଚଳ, ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ମାମଲାରେ 100ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଗୋଆ 100 ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ ଏବଂ ଲାକ୍ଷାଦ୍ୱୀପରେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଦିଆଯାଇ ସାରିଛି। ସିକ୍କିମ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଶୀଘ୍ର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି । ଆଣ୍ଡାମାନ ନିକୋବାର, କେରଳ, ଲଦ୍ଦାଖ, ଉତରାଖଣ୍ଡ, ଦାଦରା ଏବଂ ନଗର ହାବେଳୀ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଦୂରରେ ନାହିଁ।

ସାଥୀଗଣ,

ଏହା ବହୁତ ଚର୍ଚ୍ଚାକୁ ଆସିନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ଭାରତ ନିଜର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ର ସହିତ ଜଡ଼ିତ ରାଜ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ବହୁତ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଇଛି। ପ୍ରାରମ୍ଭରେ ଆମେ କହିଲୁ ନାହିଁ କାରଣ ଏହା ଉପରେ ମଧ୍ୟ ରାଜନୀତି ହେବାକୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ଯାଇଥାଏ। କିନ୍ତୁ ଏହା ବହୁତ ଜରୁରୀ ଥିଲା ଯେ ଆମର ପର୍ଯ୍ୟଟନସ୍ଥଳ ଶୀଘ୍ରରୁ ଅତି ଶୀଘ୍ର ଖୋଲୁ । ଏବେ ଉତରାଖଣ୍ଡରେ ମଧ୍ୟ ଚାର-ଧାମ ଯାତ୍ରା ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ। ଆଉ ଏହି ସବୁ ପ୍ରୟାସ ଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବା, ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥାଏ।

ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରର ପୁନଃରୁଦ୍ଧାର କରିବାରେ ଗାଁର ଭୂମିକା ହେଉଛି ବହୁତ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ । ଆପଣ ଚିନ୍ତା କରନ୍ତୁ, ହୋଟେଲ ଶିଳ୍ପର ଲୋକ ହୁଅନ୍ତୁ, ଟ୍ୟାକ୍ସି ଡ୍ରାଇଭର ହୁଅନ୍ତୁ, ଫେରିବାଲା ହୁଅନ୍ତୁ, ଦୋକାନୀ ହୁଅନ୍ତୁ, ଯେତେବେଳେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆ ଯାଇଥିବ ତେବେ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁରକ୍ଷାର ଏକ ଭାବନା ନେଇ ଏଠାକୁ ଆସିବେ। ଏବେ ଗୋଆ ଦୁନିଆର ସେହି ହାତଗଣତି ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସ୍ଥଳୀରେ ସାମିଲ ହୋଇ ଚାଲିଛି, ଯେଉଁଠାରେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଟିକାର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳି ସାରିଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଗାମୀ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ଋତୁରେ ଏଠାରେ ପୂର୍ବଭଳି ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କାର୍ଯ୍ୟକଳାପ ହେଉ, ଦେଶ –ବିଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଏଠାରେ ଆନନ୍ଦ ନେଇ ପାରିବେ, ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର କାମନା । ଏହା ସେତେବେଳେ ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ ଯେତେବେଳେ ଆମେ କରୋନା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସାବଧାନତା ଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ସେତିକି ଧ୍ୟାନ ଦେବା, ଯେତିକି ଟିକାକରଣ ଉପରେ ଦେଉଛେ । ସଂକ୍ରମଣ କମ୍ ହୋଇଛି କିନ୍ତୁ ଏବେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଭୂତାଣୁକୁ ଆମକୁ ହାଲୁକା ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିବା ନାହିଁ। ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ଉପରେ ଯେତିକି ଗୁରୁତ୍ୱ ରହିବ, ପର୍ଯ୍ୟଟକ ସେତେ ଅଧିକ ସଂଖ୍ୟାରେ ଏଠାକୁ ଆସିବେ।

ସାଥୀଗଣ,

କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ମଧ୍ୟ ଏବେ ନିକଟରେ ବିଦେଶୀ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରିବା ପାଇଁ ଅନେକ ପଦକ୍ଷେପ ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି। ଭାରତ ଆସିବାକୁ 5 ଲକ୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟଟକଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ଭିସା ପ୍ରଦାନ କରିବାକୁ ନିଷ୍ପତି ନିଆଯାଇଛି। ଯାତ୍ରାଏବଂ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ହିତଧାରକ ମାନଙ୍କୁ 10 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ଶତ- ପ୍ରତିଶତ ସରକାରୀ ଗ୍ୟାରେଂଟି ସହିତ ଦିଆ ଯାଉଛି। ପଞ୍ଜୀକୃତ ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଗାଇଡ଼୍ ମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ 1 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଯାଇଛି। କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଆଗକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସେହି ପଦକ୍ଷେପ ଉଠାଇବା ପାଇଁ ପ୍ରତିବଦ୍ଧ, ଯାହା ଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇବାରେ ସହାୟକ ହେବ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଆକର୍ଷକ କରିବା ପାଇଁ, ସେଠାକାର କୃଷକ, ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଲୋକମାନଙ୍କର ସୁବିଧା ପାଇଁ, ଭିତିଭୂମିକୁ ଡବଲ ଇଂଜିନ ସରକାରଙ୍କର ଦୁଇଗୁଣ ଶକ୍ତି ମିଳୁଛି। ବିଶେଷ କରି ଯୋଗାଯୋଗ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଭିତିଭୂମି ଉପରେ ଗୋଆରେ ଅଦ୍ଭୂତପୂର୍ବ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ‘ମୋପା’ରେ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଥିବା ଗ୍ରୀନଫିଲ୍ଡ ଏୟାରପୋର୍ଟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ନିର୍ମାଣ ହୋଇ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଏହି ବିମାନବନ୍ଦରକୁ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ସହ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ପ୍ରାୟ 12 ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କା ବ୍ୟୟରେ 6 ଲେନର ଆଧୁନିକ ସଂଯୋଗକାରୀ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି। କେବଳ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣରେ ହିଁ ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ହଜାର ହଜାର କୋଟି କୋଟି ଟଙ୍କାର ନିବେଶ ମଧ୍ୟ ଗାଁ ମାନଙ୍କରେ ହୋଇଛି।

ଏହା ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ବହୁତ ଖୁସିର କଥା ଯେ ଉତରର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକୁ ଦକ୍ଷିଣର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକ ସହିତ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ‘ଝୁରୀ ବ୍ରିଜ’ର ଲୋକାର୍ପଣ ମଧ୍ୟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଯେମିତିକି ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି, ଏହି ବ୍ରିଜ ପଣଜୀକୁ ‘ମାର୍ଗୋ’ ସହିତ ଯୋଡ଼ୁଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଗୋଆ ମୁକ୍ତି ସଂଗ୍ରାମର ଅନନ୍ୟ ସଂଗ୍ରାମର ସାକ୍ଷୀ ‘ଅଗୌଡ଼ା’ ଦୁର୍ଗ ମଧ୍ୟ ଖୁବ ଶୀଘ୍ର ଲୋକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଖୋଲି ଦିଆଯିବ।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆର ବିକାଶର ଯେଉଁ ପରମ୍ପରା ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ଛାଡ଼ିଥିଲେ, ତାହାକୁ ମୋର ମିତ୍ର ଡ. ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ଟିମ୍ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମନୋନିବେଶର ସହିତ ଆଗକୁ ବଢାଉଛନ୍ତି। ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତକାଳରେ ଯେତେବେଳେ ଦେଶ ଆତ୍ମନିର୍ଭରତାର ନୂତନ ସଂକଳ୍ପ ସହିତ ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଛି ତେବେ ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ସଂକଳ୍ପ ନେଇଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଆତ୍ମନିର୍ଭର ଭାରତ, ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ଏହି ସଂକଳ୍ପ ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆରେ 50 ରୁ ଅଧିକ ଏହିଭଳି ଉପାଦାନ ନିର୍ମାଣ ଉପରେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ସାରିଛି। ଏହା ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଗୋଆ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଲକ୍ଷ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ, ଯୁବକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ରୋଜଗାରର ନୂତନ ଅବସର ସୃଷ୍ଟି କରିବା ପାଇଁ କେତେ ଗମ୍ଭୀରତାର ସହିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଗୋଆ କେବଳ କୋଭିଡ଼ ଟିକାକରଣରେ ଅଗ୍ରଣୀ ନୁହେଁ, ବରଂ ବିକାଶର ଅନେକ ସ୍ତରରେ ଦେଶର ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ହେଉଛି ଗୋଟିଏ। ଗୋଆର ଯେଉଁ ଗ୍ରାମୀଣ ଏବଂ ସହରୀ କ୍ଷେତ୍ର ରହିଛି, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଖୋଲା ମଳମୁକ୍ତ ହେବାରେ ଲାଗିଛି। ବିଜୁଳି ଏବଂ ପାଣି ଭଳି ମୌଳିକ ସୁବିଧାଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଗୋଆରେ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ଗୋଆ ହେଉଛି ଦେଶର ଏଭଳି ରାଜ୍ୟ ଯେଉଁଠାରେ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ବିଜୁଳିକରଣ ହୋଇ ସାରିଛି। ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ମାମଲାରେ ତ ଗୋଆ ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଛି। ଗୋଆର ଗ୍ରାମୀଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ପହଂଚାଇବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉଛି ପ୍ରଶଂସନୀୟ। ଜଳ ଜୀବନ ମିଶନ ମାଧ୍ୟମରେ ବିଗତ 2 ବର୍ଷରେ ଦେଶରେ ଏ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରାୟ 5 କୋଟି ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ସୁବିଧା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଛନ୍ତି। ଯେଉଁଭଳି ଭାବେ ଗୋଆ ଏହି ଅଭିଯାନକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇଛି ତାହା ‘ଗୁଡ଼୍ ଗଭର୍ଣ୍ଣାନ୍ସ’(ସୁ-ଶାସନ) ଏବଂ ‘ଇଜ୍ ଅଫ୍ ଲିଭିଂ’କୁ ନେଇ ଗୋଆ ସରକାରଙ୍କର ପ୍ରାଥମିକତାକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ସୁଶାସନକୁ ନେଇ ଏହି ପ୍ରତିବଦ୍ଧତା କରୋନା କାଳରେ ଗୋଆ ସରକାର ଦେଖାଇଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ପ୍ରକାରର ଆହ୍ୱାନ ଗୁଡ଼ିକ ସତ୍ୱେ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଯେଉଁ ସାହାଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଗୋଆ ପାଇଁ ପଠାଇଲେ, ତାହାକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ, ବିନା କୌଣସି ଭେଦଭାବରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ପାଖରେ ପହଂଚାଇବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଗୋଆର ଟିମ୍ କରିଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗରିବ, ପ୍ରତ୍ୟେକ କୃଷକ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ସାଥୀଙ୍କ ପାଖରେ ସାହାଯ୍ୟ ପହଂଚାଇବାରେ କୌଣସି ଅଭାବ ରଖା ଯାଇ ନାହିଁ । ମାସ- ମାସ ଧରି ଗୋଆର ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ରାସନ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଚ୍ଚୋଟତାର ସହିତ ପହଂଚାଯାଉଛି। ମାଗଣ ଗ୍ୟାସ ସିଲିଣ୍ଡର ମିଳିବା ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଅନେକ ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ଅସୁବିଧା ସମୟରେ ସାହାରା ମିଳିଛି।

ଗୋଆର କୃଷକ ପରିବାରକୁ ପିଏମ କିଷାନ ସମ୍ମାନ ନିଧି ଦ୍ୱାରା କୋଟି- କୋଟି ଟଙ୍କା ସିଧାସଳଖ ସେମାନଙ୍କର ବ୍ୟାଙ୍କ ଖାତାରେ ମିଳିଛି। କରୋନା କାଳରେ ହିଁ ଏଠାକାର ଛୋଟ- ଛୋଟ କୃଷକମାନଙ୍କୁ ମିଶନ ମୋଡରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡ ମିଳିଛି। କେବଳ ଏତିକି ନୁହେଁ, ଗୋଆର ପଶୁପାଳକଙ୍କୁ ଏବଂ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଥର ବଡ଼ ସଂଖ୍ୟାରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡର ସୁବିଧା ମିଳିଛି । ପିଏମ ସ୍ୱନିଧି ଯୋଜନା ମାଧ୍ୟମରେ ମଧ୍ୟ ଗାଁରେ ବୁଲାବିକାଳୀ ଏବଂ ଠେଲାଗାଡ଼ି ମାଧ୍ୟମରେ ବ୍ୟବସାୟ କରୁଥିବା ସାଥୀଙ୍କୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଋଣ ଦେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଚାଲୁ ରହିଛି। ଏହି ସମସ୍ତ ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକ ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଲୋକମାନଙ୍କୁ, ବନ୍ୟା ସମୟରେ ମଧ୍ୟ ବହୁତ କିଛି ସାହାଯ୍ୟ ମିଳିପାରିଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆ ହେଉଛି ଅସୀମ ସମ୍ଭାବନାଗୁଡ଼ିକର ପ୍ରଦେଶ। ଗୋଆ ଦେଶର କେବଳ ମାତ୍ର ଗୋଟିଏ ଦେଶ ନୁହେଁ, ବରଂ ହେଉଛି ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ମଧ୍ୟ ଏକ ସଶକ୍ତ ପରିଚୟ। ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର ଦାୟିତ୍ୱ ଯେ ଗୋଆର ଏହି ଭୂମିକାକୁ ଆମେ ସଂପ୍ରସାରଣ କରିବା। ଗୋଆରେ ଆଜି ଯେଉଁ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟମାନ ହେଉଛି, ସେଥିରେ ନିରନ୍ତରତା ହେଉଛି ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ। ଦୀର୍ଘ ସମୟ ପରେ ଗୋଆକୁ ରାଜନୈତିକ ସ୍ଥିରତାର, ସୁଶାସନର ଲାଭ ମିଳୁଛି।

ଏହି ନିରନ୍ତରତାକୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ଏହିଭଳି ଭାବେ ବଜାୟ ରଖିବେ, ଏହି କାମନାର ସହିତ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପୁଣିଥରେ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା। ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ସମଗ୍ର ଟିମକୁ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ସଗଲ୍ୟାଙ୍କ ଦେୱ ବରେଁ କରୁଁ

ଧନ୍ୟବାଦ!