PM Modi speaks at the 46th Indian Labour Conference
The country cannot be happy, if the worker is unhappy. As a society, we need to respect the Dignity of Labour: PM
If we want to move ahead, we need to give opportunities to our youth. Giving opportunities to apprentices is the need for the hour: PM Modi

केंद्र और राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न सरकारों के प्रतिनिधि बंधु गण,

ये भारत की श्रम-संसद है और एक लंबे अरसे से हमारे देश में त्रिपक्षीय वार्ता का सिलसिला चला है। एक प्रकार से ये त्रिपक्षीय वार्ता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ये अपने आप में एक उज्‍ज्‍वल इतिहास है कि 75 साल का हमारे पास एक गहरा अनुभव है। उद्योग जगत सरकार एवं श्रम संगठन गत 75 वर्ष से लगातार बैठ करके विचार-विमर्श करके मत भिन्‍नताओं के बीच भी मंथन करके अमृत निकालने का प्रयास करते रहे हैं। और उसी संजीवनी से देश को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और उसी कड़ी में आज यह श्रम संसद हो रहा है। हम सबके लिए प्रेरणा की बात है कि यह वो समारोह है जहां कभी बाबा साहेब अंबेडकर का मार्ग दर्शन मिला था। यह वो समारोह है जिसे कभी भारत के भूत-पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमान वीवी गिरि जी का मार्ग दर्शन मिला था। अनेक महानुभावों के पद चिन्‍हों पर चलते-चलते आज हम यहां पहुंचे हैं। समय का अपना एक प्रभाव होता है। आज से 70-75 साल पहले जिन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होती थी वो आज जरूरत नहीं होगी और आज जिन बिंदुओं पर विचार करने की आवश्‍यकता है हो सकता है 25 साल बाद वह भी काल बाह्य हो जाए, क्‍योंकि एक जीवंत व्‍यवस्‍था का यह लक्षण होता है, नित्‍य नूतन, नित्‍य परिवर्तनशील और अच्‍छे लक्षण की पूर्ति के लिए एकत्र होकर आगे बढ़ना है। इस बात में कोई दुविधा नहीं है। इस बात में कोई मत-मतांतर नहीं है कि राष्‍ट्र के निर्माण में श्रमिक का कितना बड़ा योगदान होता है, चाहे वो किसान हो मजदूर हो, वो unorganized लेबर का हिस्‍सा हो, और हमारे यहां तो सदियों से इन सबको एक शब्‍द से जाना जाता है- विश्‍वकर्मा। विश्‍वकर्मा के रूप में जिसको जाना जाता है, माना जाता है और इसलिए अगर श्रमिक रहेगा दुखी , तो देश कैसे होगा सुखी? और मैं नहीं मानता हूं कि इन मूलभूत बातों में हममें से किसी में कोई मतभेद है। मैं श्रम को एक महायज्ञ मानता हूं जिसमें कोटि अवधि लोग अपनी आहूति देते हैं। सिर्फ श्रम की नहीं, कभी-कभार तो सपनों की भी आहूति देते हैं और तब जा करके किसी ओर के सपने संजोए जा सकते हैं। अगर एक श्रमिक अपने सपनों को आहूत न करता तो किसी दूसरे के सपने कभी संजोए नहीं जा सकते। इतना बड़ा योगदान समाज के इस तबके का है और इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करते हुए हमने आगे किस दिशा में जाना है उस पर हमें आगे सोचना होगा। जब तक श्रमिक, मालिक- उनके बीच परिवार भाव पैदा नहीं होता है, अपनेपन का भाव पैदा नहीं होता है। मालिक अगर यह सोचता है कि वो किसी का पेट भरता है और श्रमिक यह सोचता है कि मेरे पसीने से ही तुम्‍हारी दुनिया चलती है तो मैं नहीं समझता कि कारोबार ठीक से चलेगा। लेकिन अगर परिवार भाव हो, एक श्रमिक का दुख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फैक्‍टरी का हुआ कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता | और यह जिम्‍मेवारी जब हम निभाएंगे तब जाकर के, मैं तो चाहूंगा कभी यह भी सोचा जा सकता है क्‍या। इन सारी चर्चाओं का कभी वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन होने की आवश्‍यकता है। ऐसे बड़े उद्योग और ऐसे छोटे उद्योग या मध्‍यम दर्जे के उद्योग 50 साल पुराने है, लेकिन कभी हड़ताल नहीं हुई है क्‍या कारण होगा। उसको चलाने वाले लोगों की सोच क्‍या रही होगी। उन्‍होंने उनके साथ किस प्रकार से नाता जोड़ा है, क्‍या हम आज नए उद्योगकारों को, establish उद्योगकारों को , उनको यह नमूना दिखा सकते हैं कि हमारे सामने, हमारे ही देश में, इसी धरती में ये 50 उद्योग ऐसे हैं जो 50 साल से चल रहे हैं। हजारों की तादाद में श्रमिक है। लेकिन न कभी संघर्ष हुआ है, न कभी हड़ताल हुई है, न उनकी कोई शिकायत, न इनकी कोई शिकायत। एक मंगलम माहौल जिन-जिन इकाईयों में है, कभी उनको छांटकर निकालना चाहिए और उस मंगलम का कारण क्‍या है, इस मंगल अवस्‍था को प्राप्‍त करने के उनके तौर तरीके क्‍या है। अगर इन चीजों को हम श्रमिकों के सामने ले जाएंगे, इन चीजों को हम उद्योगकारों के सामने ले जाएंगे तो उनको भली-भांति समझा सकते हैं और मंगलम का माहौल जहां होगा, वहां यह भी नजर आया होगा कि सिर्फ श्रमिक का असंतोष है, ऐसा नहीं है। वहां यह भी ध्‍यान में आया होगा कि उस उद्योग का विकास भी उतना ही हुआ होगा और उन श्रमिकों का विकास भी उतना ही हुआ होगा। जब तक हम इस भावनात्‍मक अवस्‍था को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास नहीं करते और जो सफल गाथाएं हैं और उन सफल गाथाओं को हम उजागर नहीं करते, मैं नहीं मानता हूं कि हम सिर्फ कानूनों के द्वारा बंधनों को लगाते-लगाते समस्‍याओं का समाधान कर पाएंगे। हां, कानून उनके लिए जरूरी है कि जो किसी चीज को मानने को तैयार नहीं होते, श्रमिक को इंसान भी मानने को तैयार नहीं होते। उनकी सुख-सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उसकी minimum आवश्‍यकताओं की ओर भी देखने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को कानूनों की उतनी ही जरूरत होती है और इसलिए हम इस व्‍यवस्‍था को उस रूप में समझकर चलाएं। एक सामाजिक दृष्‍टि से भी हमारे यहां सोचने की बहुत आवश्‍यकता है। किसी न किसी कारण से हमारे भीतर एक बहुत बड़ी बुराई पनप गई है। हमारी सोच का हिस्‍सा बन गई है। हर चीज को देखने के हमारे तरीके की आदत सा बन गयी है और वो है हम कभी भी श्रम करने वाले के प्रति आदर के भाव से देखते ही नहीं। कोई बढ़िया कपड़े पहन करके हमारे दरवाजे की घंटी बजाए, दोपहर दो बजे हम आराम से सोए हों, कोट-पैंट सूट पहनकर आए और घंटी बजाए तो नींद खराब होगी ही होगी, दरवाजा खोलेंगे और जैसे ही उसको देखेंगे तो कहेंगे आइए आइए कहां से आए हैं, क्‍या काम था, बैठिए-बैठिए। और कोई ऑटो रिक्‍शा वाले ने घंटी बजाई, पता नहीं चलता है दोपहर दो बजे हम सोते हैं, इस समय घंटी बजा दी। क्‍यों भई यह फर्क क्‍यों?



यह जो हमारी सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी कमी आई है सदियों के कारण आई हुई है। लेकिन कभी न कभी dignity of labour , श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक का सम्‍मान ये समाज के नाते अगर हम स्‍वभाव नहीं बनाएंगे तो हम हमारे श्रमिकों के प्रति जो कि उसके बिना हमारी जिन्‍दगी नहीं है, अगर कोई धोबी बढ़िया सा iron नहीं करता तो मैं कुर्ता पहनकर कहां से आता यहां और इसलिए जिनके भरोसे हमारी जिन्‍दगी है उनके प्रति सम्‍मान का भाव यह सामाजिक चरित्र कैसे पैदा हो, उसके लिए हम किस प्रकार से व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करे। हमारे बच्‍चों की पाठ्य पुस्‍तकों में उस प्रकार के syllabus कैसे आए ताकि सहज रूप से आनी वाली पीढ़ियां हमारे श्रमिक के प्रति सम्‍मान के भाव से देखने लगे। आप देखिए माहौल अपने आप बदलना शुरू हो जाएगा। हमारी सरकार को सेवा करने का अवसर मिला है, श्रम संगठनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है और त्रिपक्षीय बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं। कई पुरानी-पुरानी गुत्‍थियां हैं, सुलझानी है और मुझे विश्‍वास है कि देश के श्रमिकों के आशीर्वाद से इन गुत्‍थियों को सुलझाने में हम सफल होंगे और समस्‍याओं का समाधान करने में हम कोई न कोई रास्‍ते खोजते चलेंगे। और सहमति से कानूनों का भी परिवर्तन करना होगा। कानूनों में कोई कुछ जोड़ना होगा, कुछ निकालना होगा वो भी सहमति से करने का प्रयास, प्रयास करते ही रहना चाहिए और निरंतर प्रक्रिया चलती रही है, आगे भी चलती रहने वाली है। कोई भी सरकार आए, ये कोई आखिरी कार्यक्रम कभी होता नहीं है और इसलिए मैं समझता हूं कि इस प्रक्रिया का अपना महत्‍व है। मेरा विश्‍वास रहा है- ‘minimum government , maximum governance’ और इसलिए ये जो कानूनों के ढेर हैं कानूनों का ऐसा कहीं खो जाए इन्‍सान। पता नहीं इतने कानून बनाये कर रखे हुए और हरेक को अपने फायदे वाला कानून ढूंढ सकते हैं ऐसी स्थिति है। हर कोई उद्योगकार एक ही कानून में से उद्योगकार को अपने मतलब का कानून निकलाना है तो वो भी निकाल सकता है सामाजिक संगठन को निकालना है तो वो भी निकाल सकता है, सरकार को निकालना है तो वो भी निकाल सकती है। क्‍योंकि टुकड़ों में सब चीजें चलती रही हैं | जब तक हम एक एकत्रित भाव से, composite भाव से, हमें जाना कहां है उसको ले करके , और इसीलिए मैंने एक कमेटी भी बनाई है के इन सबमें जो पुराने कानूनों को जरा देखरेख में सही कैसे किया जाए। और सच्‍चे अर्थ में जिनके लिए बनाए गए हैं कानून उनको लाभ हो रहा है या नहीं हो रहा। वरना कोई और जगह पर ऐसा कानून बनके बैठा हुआ है जो इसको आगे ही नहीं जाने देता। अब श्रमिक कहां लड़ेगा, कहां जाएगा। वो क्‍या कोर्ट कचहरी में इतने महंगे वकील रखेगा क्‍या। और इसलिए मेरा यहा आग्रह है और मैं ये कोशिश कर रहा हूं कि ये कानूनों का एक बहुत बड़ा जाल हो गया है उसका सरलीकरण हो, गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी अपने हकों को भली भांति समझ पाएं, हकों को प्राप्‍त कर पाएं। ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को हमने विकसित करने की दिशा में हमारा प्रयास है और मेरा विश्‍वास है कि हम उसको कर पाएंगे। मैं कभी-कभी उद्योग जगत के मित्रों से भी कहना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कभी हमारे इस Forum में एक और पहलू पर भी हम सोच सकते हैं क्‍या, क्‍योंकि हमने अपने एजेंडे को बड़ा सीमित कर दिया है। और जब तक उसका दायरा नहीं बढ़ाऐंगे पूरे माहौल में बदलाव नहीं आएगा। कितने उद्योगार हैं जिन्‍होंने अपने उद्योग चलाते-चलाते ऐसा माहौल बनाया, ऐसी व्‍यवस्‍था बनाई कि खुद का ही काम करने वाला एक मजदूर आगे चल करके Entrepreneur बना। कभी ये ऐसे ही तो खोज के निकालना चाहिए क्‍या उद्योगकार का यही काम है क्‍या। क्‍या 18-20 साल की उम्र में उसके यहां आया वो 60 साल का होने के बाद किसी काम का न रहे तब तक उसी के यहां फंसा पड़ा रहे। क्‍या ऐसा माहौल कभी उसने बताया कि हां मेरे यहां मजदूर के यहां पे आया था लेकिन मैंने देखा भई उसमें बहुत बड़ी क्षमता है, टेलैंट है, थोड़ा मैं उसको सहारा दे दूं वो अपने-आप में एक Entrepreneur बन सकता है और मैं ही एक-आध पुर्जा बनाएगा तो मैं खुद खरीद लूंगा जो मेरी फैक्‍टरी के लिए जरूरी है तो एक अच्‍छा Entrepreneur तैयार हो जाएगा।



कभी न कभी हमें सोचना चाहिए हमारे देश में छोटे और मध्‍यम एवं बड़े उद्योगकार कितने हैं कि जो हर वर्ष अपने ही यहां काम करने वाले कितने मजदूरों को उद्योगकार बनाया हो, Entrepreneur बनाया हो, Supplier बनाया हो, कितनों को बनाया कभी ये भी तो हिसाब लगाया जाए। उसी प्रकार से हमने देखा है कि आईटी फर्म, उसके विकास का मूल कारण क्‍या है, IT Firm के विकास का मूल कारण यह है कि उन्‍होंने अपन employee को कहा कि कुछ समय तुम्‍हारा अपना समय है। तुम खुद सॉफ्टवेयर‍ विकसित करो, तुम अपने ‍दिमाग का उपयोग करो और ये motivation के कारण सॉफटेवयर की दुनिया में नई-नई चीजें वो लेकर के आए फिर वो कम्‍पनी की बनी और बाद में जा करके वो बिकी। अवसर दिया गया, हमारे इतने सारे उद्योग चल रहे हैं, मैन्‍युफैक्‍चरिंग का काम करते हैं, कैमिकल एक्टिविटी का काम करते हैं, क्‍या हमने हमारे यहां इस टैलेंट को innovation के लिए अवसर दिया है क्‍या? क्‍या उद्योगकारों को पता है कि जिसको आप अनपढ़ मानते हो, जिसको आप unskilled labour मानते हो, उसके अंदर भी वो ईश्‍वर ने ताकत दी है, वो आपकी फैक्‍टरी में एकाध चीज ऐसी बदल देता है, कि आपके प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी इतनी बढ़ जाती है, बाजार में बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हो जाता है, आप फायदा तो ले लेते हो लेकिन उसके innovation skill को recommend नहीं करते हो। मैं मानता हूं हमारे उद्योगकारों ने अपने जीवन में, सरकारों ने भी और श्रम संगठनों ने भी पूछना चाहिए कि कितने उद्योगकार हैं, कितने उद्योग हैं कि जहां पर इनोवेशन को बल दिया गया है। हर वर्ष कम से कम एक नया इनोवेटेड काम निकलता है क्‍या? हमारे यहां सेना के विशेष दिवस मनाए जाते हैं,आर्मी का, एयरफोर्स का, नेवी का। राष्‍ट्रपति जी, प्रधानमंत्री सब जाते हैं, एट-होम करते हैं वो, तो मैं पिछली बार जब हमारे सेना के लोगों के पास गया तो मैंने उनको कहा भई ठीक है ये आपका चल रहा है कि ये ही चलाते रहोगे क्‍या? हम आते हैं, 30-40 मिनट वहां रुकते हैं, चायपान होता है, फिर चले जाते हैं। मैंने कहा मेरा एक सुझाव है अगर आप कर सकते हो तो, तो बोले क्‍या है सर? मैंने कहा क्‍या फौज में ऐसे छोटे-छोटे लोग हैं क्‍या, सिपाही होंगे, छोटे-छोटे लोग हैं, लेकिन उन्‍होंने काम करते-करते कोई न कोई इनोवेशन किया है जो देश की सुरक्षा के लिए बहुत काम आता है। उसमें नया आइडिया, क्‍योंकि वो फील्‍ड में है, उसे पता रहता है कि इसके बजाय ऐसा करो तो अच्‍छा रहेगा। मैंने ये कहा तो फिर हमारे आर्मी के लोगों ने ढूंढना शुरू किया।

बहुत ही कम समय मिला था लेकिन कोई 12-15 लोगों को ले आए वो और जब उनकी innovations मैंने देखा, मैं हैरान था सेना के काम आनेवाली टेक्‍नोलॉजी के संदर्भ में, कपड़ों के संदर्भ में, इतने बारीक छोटी-छोटी चीजों में उन्‍होंने बदलाव लाकर के बताया था अगर इसको हम मल्‍टीप्‍लाई करें तो सेना के कितना बड़ा काम आएगा और भारत की रक्षा के लिए कितना बड़ा काम आएगा। लेकिन उस आखिरी इन्‍सान की तरफ देखता कौन है जी? उसकी क्षमता को कौन स्‍वीकार करता है? मुझे ये माहौल बदलना है कि मेरे उद्योगकार मित्र बहुत बड़ी डिग्री लेकर आया हुआ व्‍यक्ति ही दुनिया को कुछ देता है ऐसा नहीं है। छोटे से छोटा व्‍यक्ति भी दुनिया को बहुत कुछ दे करके जाता है, सिर्फ हमारी नजरों की तरफ नहीं होता है और इसलिए हम एक कल्‍चर विकसित कर सकते हैं, व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं कि जिसमें उन, और मैं तो चाहता हूं श्रमिक संगठन भी ऐसे लोगों को सम्‍मानित करें, उद्योग भी सम्‍मानित करें और सरकार भी श्रम संसद के समय सामान्‍य मजदूर ने की हुई इनोवेशन जिसने देश का भला किया हो, उसमा सम्‍मान करने का कार्यक्रम करके हम श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़ाएं उस दिशा में हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमें एक नए तरीके से चीजों को कैसे सोचना चाहिए, नई चीजों में कैसे बदलाव लाना चाहिए, उस पर सोचने की आवश्‍यकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर हमेशा मजदूर क्‍यों रहे? उसी प्रकार से कुछ लोग ऐसे होते हैं कि पिताजी एक कारखाने में काम करते हैं, बेटा भी साथ जाना शुरू कर दिया, और वहीं काम करते, करते, करते एकाध चीज सीख लेता है और अपनी गाड़ी चला लेता है। उसके पास ऑफिशियल कोई डिग्री नहीं होती है, कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है और उसके लिए वो हमेशा उस उद्योगकार की कृपा पर जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे बड़ा शोषणा क्‍या हो सकता है कि उसको जो जिसके यहां उसके पिताजी काम करते थे, अब उसको वहीं पर काम करना पड़ रहा है, क्‍यों, क्‍योंकि उसके पास स्किल है लेकिन स्किल को दुनिया के अंदर ले जाने के लिए एक जो सर्टिफिकेट चाहिए वो नहीं है तो कोई घुसने नहीं देता है और वो भी कहीं जाने की हिम्‍मत नहीं करता है, उसको लगता है चलिए ये ही मेरे मां-बाप हैं उन्‍होंने ही मेरे बाप को संभाला था, मुझे भी संभाल लिया, चलिए भई जो दें मैं काम कर लूंगा। इससे बड़ी कोई अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती हमारी। और इसको बदलने का मेरे भीतर एक दर्द बढ़ा था और उसी में से हमने एक योजना बनाई है और मैं मानता हूं ये योजना श्रमिक के जीवन को और मैं नहीं मानता किसी श्रमिक संगठनों ने इस पर ध्‍यान गया होगा। कभी उसने सोचा नहीं होगा कि कोई सरकार श्रमिकों के लिए सोचती है तो कैसे सोचती है? हमने कहा कि जो परम्‍परागत इस प्रकार के शिक्षा पाए बिना ही चीजों को करता है भले ही उसकी उम्र 30 हो, 40 हो गई, 50 हो गई होगी, सरकार ने उसको सर्टिफाई करना चाहिए,official recognition देना चाहिए, official government का सर्टिफिकेट देना चाहिए ताकि उनका confidence लेवल बढ़ेगा, उसका मार्केट वैल्‍यू बढ़ेगा और वो एक उद्योगकार के यहां कभी अपाहिज बन करके जिन्‍दगी नहीं गुजारेगा। हमने officially ये decision लिया है।



कहने का तात्‍पर्य ये है कि हमें इन दिशाओं में सोचने की आवश्‍यकता है। हमें बदलाव करने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं। इसी प्रकार से एक बात की ओर ध्‍यान देने की मैं आवश्‍यकता समझता हूं, इसको कोई गलत अर्थ न निकाले, कोई बुरा न माने। कभी-कभार, जब चर्चा होती है कि उद्योग की भलाई, ये बात ठीक है कि देश की भलाई के लिए उद्योगों का विकास आवश्‍यक है, उद्योग की भलाई और उद्योगपति की भलाई, इसमें बहुत ही बारीक रेखा होती है। देश की भलाई और सरकार की भलाई इसमें बहुत बारीक रेखा होती है। श्रम संगठन की भलाई और श्रमिक की भलाई, बहुत बारीक रेखा होती है। और इसलिए इस बारीक रेखा की नजाकत को कभी-कभार उद्योग बचाना चाहते हैं लेकिन उनमें कभी-कभार हम उद्योगपति को बचा लेते हैं। कभी-कभार हम बात तो कर लेते हैं देश को बचाने की लेकिन कोशिश सरकार को बचाने की करते हैं। और उसी प्रकार से कभी-कभार हम बात श्रमिक की करते हैं लेकिन हम कोशिश हमारे श्रम संगठन की सुरक्षा की करते हैं। हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं, हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं और तीनों ने इस बारीक रेखा की मर्यादाओं को स्‍वीकार करना होगा, letter and spirit को स्‍वीकार करना होगा तब मैं मानता हूं श्रमिक का भी भला होगा, देश के उद्योग के विकास की यात्रा भी चलेगी और देश का भी भला होगा, सरकारों की भलाई के लिए नहीं चलता होगी। और इसलिए इन मूलभूत बातों की ओर हम कैसे मिल-बैठ करके एक सकारात्‍मक माहौल बनाने के भी दस कदम हो सकते हैं, श्रमिक की भलाई के दस कदम हो सकते हैं आवश्‍यक है तो राष्‍ट्र को आगे बढ़ाने की भी दस कदम हो सकते हैं वो भी इसके साथ-साथ आना चाहिए। जब तक हम इन बातों को संतुलित रूप से आगे नहीं ले जाएंगे, तब तक हम माहौल बदलने में सफल नहीं होंगे। और मुझे विश्‍वास है कि आज की श्रम संसद में बैठ करके हम लोग उस माहौल को निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़गे। भारत में 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 साल से कम आयु की है। हमारा देश एक प्रकार से विश्‍व का सबसे नौजवान देश है। आज दुनिया को skilled workforce की आवश्‍यकता है। Skill Development और Skill India ये मिशन हमारे नौजवानों को रोजगार कैसे मिले, अगर हम जो आज रोजगारी में है जो हमारे संगठन के सदस्‍य हैं, उनकी चिन्‍ता कर-करके बैठेंगे तो हो सकता है कि उनके हितों का भी भला हो जाएगा, उनकी रक्षा भी हो जाएगी, दो-चार चीजें हम उनको दिलवा भी देंगे लेकिन यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्ति ऐसी सीमित सोच वाला नहीं है ये मेरा विश्‍वास है। यहां बैठा हुआ हर व्‍यक्ति जो आज श्रमिक है उनकी तो चिन्‍ता करता ही करता है, लेकिन जो नौजवान बेरोजगार हैं जिनको कहीं न कहीं काम मिल जाए, इसकी उसको तलाश है, हमें उनके दरवाजे बंद करने का कोई हम नहीं है। जब तक हम हमारे देश के और नौजवानों कोरोजगार देने के लिए अवसर उपलब्‍ध नहीं कराएंगे तो हम जाने-अनजाने में गरीब का कहीं नुकसान तो नहीं कर देंगे। हो सकता है वो आज गरीब है श्रमिक नहीं बन पाया है, वो दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है और इसीलिए सरकार ने एक initiative लिया है apprenticeship को प्रोत्‍साहन देना। हमें जान करके हैरानी होगी, हम सबको लगता है हमारा देश आगे बढ़ना चाहिए और कभी पीछे रहता है तो हमीं लोग कहते हैं देखो बातें बड़ी करते थे,वो तो वहां पहुंच गया ये यहां रह गया, ये हम करते ही हैं। लेकिन जो पहुंचे हैं, आज चीन के अंदर जो भी साम्‍यवादी विचार से चलने वाले मूलभूत तो लोग हैं। चीन के अंदर दो करोड़ apprenticeship पर लोग काम कर रहे हैं,चीन के अंदर। जापान में एक करोड़ apprenticeship में काम कर रहे हैं। जर्मनी बहुत छोटा देश है, हमारे देश के किसी राज्‍य से भी छोटा देश है वहां पर तीस लाख लोग apprenticeship के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे आज दुख के साथ कहना चाहिए, सवा सौ करोड़ का हिन्‍दुस्‍तान,सिर्फ तीन लाख लोग apprenticeship पर काम कर रहे हैं। मेरे नौजवानों का क्‍या होगा मैं पूछना चाहता हूं।मैं सभी श्रमिक संगठनों से पूछना चाहता हूं कि इन नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए। इन नौजवानों के लिए अवसर खुलने चाहिए कि नहीं खुलने चाहिए। और भारत को आगे बढ़ाना है तो हमारे skill को काम में लाने के लिए ये हमें अवसर देना पड़ेगा। सरकारों ने, उद्योगकारों ने भी सोचना होगा इसलिए कि कानून के दायरे में फंस जाएंगे इसलिए कोई apprenticeship किसी को देनी नहीं, किसी नौजवान को अवसर नहीं देना, ये उद्योगकार जो दरवाजे बंद करके बैठे हैं, मैं नहीं मानता हूं ये लम्‍बे अरसे तक दरवाजे बंद करके बैठ पाएंगे। देश का नौजवान लम्‍बे अरसे तक इन्‍तजार नहीं करेगा। और इसलिए मैं उद्योगकारों को विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि आपका दायित्‍व बनता है, मुनाफा कम होगा, होगा लेकिन अगर इतनी मात्रा में आपके यहां श्रमिक हैं तो इतनी मात्रा में apprenticeship, ये आपकी social responsibility का हिस्‍सा बनना चाहिए। और इस प्रकार से क्‍या हम सपना नहीं दे सकते। दो करोड़ कर न पायें ठीक है, जब कर पाएंगे, कर पाएंगे अभी कम से कम तीन लाख में से 20 लाख apprenticeship पर जा सकते हैं हम क्‍या। कम से कम इतना तो करें। करोड़ों नौजवानों को रोजगार चाहिए, कहीं से तो शुरू करें। और इसलिए मैं चाहूंगा कि जो श्रमिक आज हैं उनकी चिन्‍ता करने वाले लोगों का ये भी दायित्‍व है कि जिनकी श्रमिक बनने की संभावना है उनकी जिन्‍दगी की भीचिन्‍ता उस नौजवान की भी करने की आवश्‍यकता है जो गरीब है। पिछले 16 अक्‍टूबर को हमने श्रमेव जयते के अभियान की शुरुआत की थी। ये सर्वांगीण प्रयास है हमारा। जिन सुविधाओं की शुरुआत हमने की उनकी प्रगति आप सबकी नजर में है। यूनिवर्सल एकाउंट नम्‍बर (यूएएन) इसके माध्‍यम से प्रोविडेंट फंड के एकाउंट पोर्टेबल हो गए हैं बल्कि लगभग 4 करोड़ 67 लाख मजदूरों को digital network platform का already लाभ मिलना शुरू हो गया है। पीएफपी ऑनलाईन लाभ ले रहा है ये चीजें नहीं थीं, इन चीजों का वो लाभ ले रहा है ये ही तो श्रमिक को empower करने के लिए टेक्‍नोलॉजी का सदुपयोग करने का प्रयास किया है। जब हम सरकार में आए हमारे देश में कई लोग ऐसे थे कि जिनको पचास रुपये पेंशन मिलता था, अस्‍सी रुपये पेंशन मिलता था, सौ रुपये पेंशन मिलता था,कुछ लोग तो पेंशन लेने के लिए जाते नहीं थे क्‍योंकि पेंशन से ऑटोरिक्‍शा का खर्चा ज्‍यादा होता था। इस देश में करीब-करीब बीस लाख से अधिक ऐसे श्रमिक थे जिनको पचास रुपया, सौ रुपया, दौ सौ रुपया पेंशन मिलता था। हमने आ करके, बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लगा है, सबके लिए minimum पेंशन एक हजार रुपया कर दिया है। मैं आशा करता हूं कि हमारे श्रमिक संगठन, ये हमारा जो pro-active initiative है उसके प्रति भी उस भाव से देखें ताकि हम सबको मिल करके दौड़ने का आनंद आ जाए,चार नई चीजें करने का उमंग आ जाए क्‍योंकि हमें चलना नहीं है और मुझे मैं मानता हूं, अगर इस देश में इतने सारे प्रधानमंत्री हो गए होंगे लेकिन श्रमिकों पर किसी एक प्रधानमंत्री पर सबसे ज्‍यादा हक है तो मुझ पर। क्‍योंकि मैं उसी बिरादरी से निकल कर आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और इसलिए गरीब के हाल को समझने के लिए मुझे कैमरामैन को लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।मैं उसको भली-भांति समझता हूँ और इसलिए जो बातें मैं बता रहा हूं। भीतर एक आग है, कुछ करना है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, वंचित, दलित, पीड़ित शोषित उनके लिए कुछ करना है। लेकिन हरेक के करने की सोच अलग होगी, रास्‍ते अलग होंगे। हमारी एक अलग सोच है, अलग रास्‍ते है लेकिन लक्ष्‍य यही है कि मेरे देश के मजदूर का भला हो, मेरे देश के गरीब का भला हो, मेरे देश के किसानों का भला हो, ये सपने लेकर के हम चल पड़े हैं। और इसलिए जैसा मैंने कहा हमने apprentice sector में सुधार किया। हमने on the job training के मौके बढ़ गए हैं, उस दिशा में हमने काम किया है। आज हमने हेल्‍थ को सेक्‍टर को ESIC 2.0 स्‍कीम को लांच किया है। हम कभी-कभार ये तो देखते हैं कि भई काम मिलना चाहिए, लेकिन कैसे मिले, मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है। उसके लिए न सरकारों को फुरसत है, न श्रमिक संगठनों को फुरसत है। उनको तो लगता है देखो यार, कागज पर दिखा दे, ये तुमको दिलवा दिया या नहीं दिलवा दिया। वो श्रमिक भी बड़ा खुश है, यार मैं इसका मेम्‍बर बन गया हूं मेरा काम हो गया। मैं इस स्‍थिति को बदलना चाहता हूं। मैं श्रमिक संगठन और सरकार की पाटर्नरशिप से आगे बढ़ना चाहता हूं। कंधे से कंधा मिलाकर के आगे चलना चाहता हूं और अगर हमने ये अस्‍पतालों की व्‍यवस्‍था को बदलने की दिशा में काम किया, अब छोटा निर्णय है कि भई हर दिन चद्दर बदलो। अब मुझे बताइए health की दृष्‍टि से, hygiene की दृष्‍टि से, ये सब जानते हैं कि बदलनी चाहिए और लोग मानते होंगे कि बदलें, लेकिन हमको मालूम है कि लोग नहीं बदलते। ठीक है, आया है patient पड़ा है। आखिरकार मुझे रास्‍ता खोजना पड़ा, मैंने कहा हर दिन की चद्दर का कलर ही अलग होगा, patient को पता चलेगा कि चद्दर बदली कि नहीं बदली। हमारे देश के बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है वो मुझे सवाल करते रहते हैं कि मोदी कुछ बड़ा ले आओ, कुछ बड़ा। बहुत सरकारें बड़ा-बड़ा ले आईं। मुझे तो मेरे गरीब के लिए जीना है, मेरे गरीब के लिए कुछ काम करना है इसलिए मेरा दिमाग इसी में चलता रहता है। यही, यही मैं सोच, और मैं दिल से बातें कर रहा हूं कि ये अन्‍य जो कई चीजें लाए हैं। हम चाहते हैं कि श्रमिक की हेल्‍थ को लेकर के चिन्‍ता होनी चाहिए, होनी चाहिए। और हमने उस दिशा में हमने एक तो उसके सारे हेल्‍थ रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए ताकि अब उसको अपना ब्‍लड टेस्‍ट का क्‍या हुआ, यूरिन टेस्‍ट का क्‍या हुआ, दुनिया भर में चक्‍कर नहीं काटना पड़ेगा। अपने मोबाइल फोन पर सारी चीजें उपलब्‍ध हो जाएं ये व्‍यवस्‍था की है ताकि श्रमिक को सुविधा कैसे हो, हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। और मैं मानता हूं कि उस काम के कारण उसको लाभ होगा।



आज हमारे देश में असंगठित मजदूर कुल मजदूरों का 93 पर्सेंट है। इस सरकार ने असंगठित मजदूरों के संबंध में बहुत ही constructive way में और well planned way में योजनाएं बनाई हैं और हम आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा कैसे मिले। न उसे स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा है, न जीवन बीमा है और न हीं पेंशन है और बड़ी संख्‍या में असंगठित ग्रामीण मजदूर अनपढ़ हैं, जिन्‍हें अपनी बात कहां कहना है, कैसे पहुंचे, इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। ऐसे मजदूर के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में सरकार का उत्‍तरदायित्‍व मानता हूं। देश के गरीब, असंगठित वर्गों को ध्‍यान में रख करके हमने तीन महत्‍वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं । और ये योजनाएं गरीब के लिए हैं। अमीर का उससे कोई लेना-देना नहीं है। और मैं मानता हूं, सभी श्रमिक संगठनों से मैं आग्रह करूंगा कि आप भी इस बात में मदद कीजिए। अगर किसी के घर में, हम कई यहां संगठन है जो असंगठित मजदूरों का काम करते हैं। कुछ लोग हैं जो घरों में बर्तन साफ करने वाले लोग होते हैं, उनका संगठन चलाते हैं। क्‍या हम कोशिश नहीं करे तो उसके मालिकों को मिल करके कहे कि भई आपके यहां ये लड़का कपड़े धोता है, बर्तन साफ करता है या खाना पकाता है या गाड़ी चलाता है। या आपका धोबी है। इसके लिए ये-ये सरकार की स्‍कीम है। आप एक मालिक हो, इसके लिए इतना पैसा बैंक में डालो, उसका जीवन भरा हो जाएगा। मैं मानता हूं हर कोई इसको करेगा। हम मध्‍यम वर्ग के लोगों को भी अगर समझाएंगे कि भई तुम्‍हारे साथ काम करने वाले जो गरीब लोग है उनको इन स्‍कीम का फायदा तुम दो। तुमको कोई महंगा नहीं पड़ने वाला है, तुम्हारे लिए तो एक फाइव स्‍टार होटल का एक खाने से ज्‍यादा का खर्च नहीं है। लेकिन उस गरीब की तो जिन्‍दगी बदल जाएगी और इसलिए हमने अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन जयोति बीमा योजना और मैं बताऊं यानी एक महीने का एक रुपया,12 महीने का 12 रुपया। एक स्‍कीम ऐसी है एक दिन का सिर्फ 80-90 पैसा। साल भर का 330 रुपया। लेकिन उसको जीवन भर उसकी व्‍यवस्‍था मिल सकती है। ये काम उसके मालिक, जिसके वहां वह काम करता है, वो कर सकते हैं और श्रमिक संगठन एक सामाजिक काम के तौर पर इस बात को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार से कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। मुझे लगता है कि इसका उसको फायदा होगा और हमने यह फायदा दिलवाना चाहिए। व्‍यवस्‍थाएं हैं, योजनाएं हैं। अटल पेंशन योजना। अगर आज से उसको जोड़ दिया जाए, समझा दिया जाए उसका तो जीवन धन्‍य हो जाएगा कि भई चलो 60 साल के बाद मुझे ये लाभ मिलेगा। मैं समझता हूं कि हम एक सामाजिक चेतना जगाने का भी काम करें, सामाजिक बदलाव का भी काम करें और उस काम को आगे बढ़ाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत सारी बातें हम कर पाएंगे। कई विषय है जिसको मैं आपके सामने रखता ही चला जाता हूं। लेकिन मुझे विश्‍वास है कि इस श्रम संसद के अंदर जो कुछ भी महत्‍वपूर्ण चर्चाएं हो रही है। हमारे वित्‍त मंत्री और उनकी एक कमेटी बनी है जो उनको सुन रही है। और बातचीत से ही अच्‍छे नतीजे निकलते हैं, सुखद परिणाम निकलेंगे। कल भी मेरी श्रम संगठन के प्रमुख लोगों के साथ मुझे मिलने का अवसर मिला था, उनको सुनने का अवसर मिला था और मैं भली-भांति उनकी बात को, उनकी भावनाओं को समझता हूं। मिल-बांट करके हमें आगे बढ़ना है और हम देश को आगे बढ़ाने में कैसे काम आएं, देश को आर्थिक नई ऊंचाइयों पर कैसे ले जाएं, देश में नौजवानों को अधिकतम रोजगार के अवसर कैसे उपलब्‍ध कराएं।

आज भारत के सामने मौका है विश्‍व के परिदृश्‍य में भारत के सामने मौका है। यह मौका अगर हमने खो दिया तो फिर पता नहीं हमारे हाथ में कब मौका आएगा और उस काम को लेकर आगे बढ़ें इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस श्रम सांसद को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, उत्‍तर परिणाम निकलेंगे इस भरोसे के साथ और साथ मिल करके आगे चलेंगे इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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నా ప్రియమైన దేశవాసులారా! నమస్కారం. 'మన్ కీ బాత్' కార్యక్రమంలో మరోసారి మీతో కలవడం నాకు చాలా సంతోషంగా ఉంది. దేశంలోని వివిధ ప్రాంతాలకు చెందిన ప్రజలు దేశం కోసం, సమాజ ప్రయోజనం కోసం అద్భుతమైన పనులు చేస్తున్నారు. వాటి గురించి విన్నప్పుడు మనకు కొత్త స్ఫూర్తి కలుగుతుంది. అథ్లెటిక్స్‌లో దేశం సాధించిన ప్రేరణాత్మకమైన ఘనతతో నేను ఈరోజు ఈ కార్యక్రమాన్ని ప్రారంభిస్తాను. కొన్ని రోజుల కిందట జార్ఖండ్‌లోని రాంచీలో జాతీయ సీనియర్ అథ్లెటిక్స్ ఫెడరేషన్ పోటీలు జరిగాయి. ఇందులో దేశంలోని వివిధ ప్రాంతాల నుండి దాదాపు 800 మంది అథ్లెట్లు పాల్గొన్నారు. ఈ సందర్భంగా నాలుగు వేర్వేరు ఈవెంట్లలో నాలుగు జాతీయ రికార్డులను నెలకొల్పారు. గురిందర్‌వీర్ సింగ్, విశాల్ టీకే, తేజస్విన్ శంకర్, దేవ్ మీనా, కుల్దీప్ కుమార్ ఈ ఘనత సాధించారు. ఈ మిత్రులు వివిధ విభాగాలలో కొత్త రికార్డులను నెలకొల్పారు. ముందుగా వారందరికీ నా అభినందనలు.

మిత్రులారా! దేశవ్యాప్తంగా ఎక్కువగా చర్చల్లో ఉన్న ఈవెంట్ 100 మీటర్ల పరుగు పందెం. కేవలం రెండు రోజుల్లోనే పురుషుల 100 మీటర్ల పరుగు పందెంలో జాతీయస్థాయిలో పాతరికార్డులను మూడుసార్లు అధిగమించారు. ఈ రికార్డు సాధించిన ఇద్దరు అథ్లెట్లు గురిందర్‌వీర్ సింగ్, అనిమేష్ కుజూర్. ఈసారి 'మన్ కీ బాత్'లో ఈ ఇద్దరు అథ్లెట్లతో మాట్లాడాలని అనుకున్నాను.

(ఫోన్ కాల్)

ప్రధానమంత్రి: నమస్కారం అనిమేష్ గారూ... గురిందర్‌వీర్ గారూ.. మీకు కూడా నమస్కారం. సత్ శ్రీ అకాల్.

 

అనిమేష్, గురిందర్‌వీర్: నమస్కారం సార్, నమస్కారం సార్.

 

ప్రధానమంత్రి: సోదరులారా! మీరు ఒక గొప్ప ఘనత సాధించారు. మీ జంట కూడా అద్భుతంగా పనిచేసింది. మనం సంగీతంలో జుగల్బందీని చూశాం. కానీ ఇప్పుడు పోటీలలో కూడా జుగల్బందీ ఉంది. ఇందులో ఒకరు సవాలు విసురుతారు.  మరొకరు దాన్ని స్వీకరిస్తారు. ఆ తర్వాత మరోసారి కూడా ఇలాగే చేస్తారు. మీ విషయం చాలా ఆసక్తికరంగా ఉంది. 'మన్ కీ బాత్' శ్రోతలకు మీ గురించి, మీరు సాధించిన ఘనత గురించి తెలియాలని నేను కోరుకుంటున్నాను. మీరు సాధించిన రికార్డు గురించి చెప్పండి.

 

అనిమేష్: నమస్కారం సార్, నా పేరు అనిమేష్ కుజూర్. నేను 200 మీటర్లు, 400 మీటర్ల పరుగు పందాలలో జాతీయ రికార్డు సాధించాను. మాది ఛత్తీస్‌గఢ్‌. ప్రస్తుతం నేను ఒడిశా తరపున ఆడుతున్నాను. గత ఏడాది నేను ఒక ఆసియా పతకాన్ని, ఒక ప్రపంచ విశ్వవిద్యాలయ క్రీడల పతకాన్ని గెలుచుకున్నాను. నేను 2021లో పాఠశాల విద్య పూర్తి చేశాక అథ్లెటిక్స్ ప్రారంభించాను. నేను అంబికాపూర్‌లోని సైనిక్ స్కూల్ పూర్వ విద్యార్థిని. నేను ఇంతకుముందు ఫుట్‌బాల్ ఆడేవాడిని. కోవిడ్ సమయంలో బయటకు వెళ్ళి పరుగెత్తమని లేదా ఆడుకొమ్మని చెప్తూ మా అమ్మానాన్న నాకు కొంత స్వేచ్ఛ ఇచ్చేవారు. కోవిడ్ తగ్గుముఖం పట్టడం ప్రారంభమైనప్పుడు నా ఫుట్‌బాల్ స్నేహితులు రాష్ట్ర స్థాయి పోటీలు వస్తున్నాయని చెప్పారు. నేను పాల్గొనాలని చెప్పారు. నేను పాల్గొన్నాను. కానీ అక్కడి నుండి జాతీయ స్థాయి ఎంపిక ఉంటుందని నాకు తెలియదు. నేను అక్కడి నుండి జాతీయ స్థాయికి ఎంపికయ్యాను. ఈ రోజు నేను అంతర్జాతీయంగా భారతదేశానికి ప్రాతినిధ్యం వహిస్తున్నాను.

 

ప్రధానమంత్రి: మరి గురిందర్‌వీర్ గారూ... మీ గురించి చెప్పండి.

 

గురిందర్‌వీర్: నమస్కారం సార్. నా పేరు గురిందర్‌వీర్. నేను భారత నావికాదళంలో పెట్టీ ఆఫీసర్‌గా పని చేస్తున్నాను. భారతదేశ అత్యంత వేగవంతమైన స్ప్రింటర్‌ను. నేను ఇప్పుడు 100 మీటర్ల పరుగులో 10.09 సెకన్లతో జాతీయ రికార్డు నెలకొల్పాను. 10.1 సెకన్ల లోపు పరుగు పూర్తి చేసిన మొదటి భారతీయుడిని నేనే. నేను ట్రాక్‌పై, యూనిఫాంలో కూడా నా దేశానికి సేవ చేయాలని ప్రయత్నిస్తున్నాను. మా నాన్నగారు, తాతగారు ఇద్దరూ క్రీడలు ఆడేవారు. కాబట్టి దీపావళి, నూతన సంవత్సరం వంటి పండుగలు వచ్చినప్పుడు మేం మా ఇంటిని శుభ్రం చేసుకోవడం మా భారతీయ సంస్కృతిలో భాగం. అందుకే నేను మా నాన్నగారి ట్రోఫీలను, పతకాలను శుభ్రం చేసేవాడిని. నాకు అది చాలా నచ్చేది. నేను ఆ పని చేయడాన్ని చాలా సంతోషంగా భావించేవాడిని. నేను ఏదైనా ట్రోఫీని శుభ్రం చేస్తున్నప్పుడు "మీరు ఈ ట్రోఫీని ఎక్కడ గెలిచారు? ఈ పతకాన్ని ఎక్కడ గెలిచారు? ఈ ఫోటో ఎప్పటిది?" అని ఆయన్ని అడిగేవాడిని. అప్పుడు ఆయన "నేను పోటీల్లో ఆడటానికి వెళ్ళాను. ఈ జాతీయ పతకాన్ని గెలిచాను. మా జట్టును గెలిపించాను" అని తన కథ చెప్పేవారు. అప్పుడు నేను కూడా క్రీడలు ఆడాలనుకుంటున్నానని ఆయనతో చెప్పేవాడిని. ఆయన ఉదయాన్నే పరుగుకు వెళ్ళేవారు. నన్ను కూడా తనతో పాటు తీసుకెళ్ళమని చెప్పడం మొదలుపెట్టాను. దాంతో ఆయన నన్ను తీసుకెళ్ళడం ప్రారంభించారు. ఆటలలో ఆయన నేర్చుకున్నదంతా నాకు నేర్పించడం ప్రారంభించారు. ఆ తర్వాత నాకు ఆసక్తి కలగడం మొదలైంది. ఉసేన్ బోల్ట్ ప్రపంచ రికార్డు నెలకొల్పడం నేను చూశాను. ఇదొక సరదా కథ. నేను టీవీ చూస్తుండగా, మా అమ్మ "బాబూ... చదువుకునే సమయం అయింది. నువ్వు చదువుకోవాలి" అని చెప్పి టీవీ ఆపేసింది. అప్పుడు "ఫర్వాలేదు...నన్ను టీవీ చూడనివ్వకు. కానీ ఏదో ఒకరోజు గురిందర్ పరుగెత్తడం చూడడం కోసం నువ్వు టీవీలో వెతుకుతావు" అని అన్నాను. అందుకే మా అమ్మ నన్ను టీవీలో పరుగెత్తడం చూసినప్పుడు నాకు కూడా సంతోషంగా అనిపిస్తుంది.

 

ప్రధానమంత్రి: వావ్… వావ్… వావ్ … సోదరా! ఈ విషయం చాలా గొప్పది.

 

గురిందర్ వీర్: అవును సార్. మేం మధ్యతరగతి కుటుంబానికి చెందినవాళ్ళం. మా నాన్నగారు కూడా వాలీబాల్ ఆడేవారు. ఇంట్లో సమస్యల వల్ల ఆయన ఆటలు మానేశారు. ఆయన కల నెరవేరలేదు. కాబట్టి తన కొడుకు ఆ కలను నెరవేర్చాలని ఆయన కోరుకున్నారు. అందుకే నేను ఆయనతో మాట్లాడేవాడిని. అప్పుడు మిల్ఖా సింగ్ చాలా కష్టపడ్డారని వినేవాడిని. నేను కూడా ఆయన కలను నెరవేరుస్తానని ఆయనతో చెప్పేవాడిని. అప్పుడు ఆయన “కలలు అలా నెరవేరవు.  దాని కోసం చాలా కష్టపడాలి. చాలా కష్టపడాలి”  అని చెప్పేవారు. మిల్ఖా సింగ్ గారు రక్తం కక్కేవారు. ఎండలో పరిగెత్తేవారు. ఆయన రోజంతా శిక్షణ తీసుకునేవారు.  ఆ విషయాలు నాకు స్ఫూర్తినిచ్చేవి. నేను పరుగెత్తితే మన దేశం కోసం పతకం గెలవాలని మా నాన్నగారు నాకు స్ఫూర్తినిచ్చేవారు. ఇంకో విషయం కూడా జరిగింది. నేను 100 మీటర్ల ఈవెంట్‌ను ఎంచుకున్నప్పుడు అందరూ నాతో  "సోదరా! 100 మీటర్లు చేయకు. 100 మీటర్లు భారతీయులకు సరిపోయే ఈవెంట్ కాదు. భారతీయుల శరీరం 100 మీటర్ల పరుగు పోటీలకు తగ్గట్టు తయారు కాలేదు" అని చెప్పేవారు. అందుకే మా నాన్నగారు, నేను ఎప్పుడూ "గురిందర్..  మనం దీన్ని ఎంచుకున్నాం. దాని నుండి ఇక వెనకడుగు వేయం" అని చెప్పుకునేవాళ్ళం. ఇది చేయలేమని చెప్పేవారితో సవాలు చేసి, గెలిచి చూపించాలని మా నాన్న గారు చెప్పేవారు. “నువ్వు చేస్తావు. నీపై నాకు నమ్మకం ఉంది” అనేవారు. అందుకే మా నాన్నగారు నాపై ఆ నమ్మకం ఉంచినప్పుడు నేను ఆ నమ్మకాన్నే నా ధైర్యంగా మార్చుకుని ముందుకు సాగాను. ఈ రోజు నేను ప్రతి భారతీయుడిని ఇండియన్ స్ప్రింట్ చేయమని చెప్తున్నాను.

 

ప్రధానమంత్రి: చూడండి, మీరిద్దరూ గొప్ప పని చేశారు. కేవలం రెండు రోజుల్లోనే మూడుసార్లు పాత జాతీయ రికార్డును అధిగమించారు. గురిందర్‌వీర్ చెప్పినట్లుగా, 100 మీటర్ల పరుగు పందెంలో భారతీయులకు ఈ పనికి తగిన శరీరం లేదని ప్రజలు అంటారు. ఇన్ని కష్టాలు ఉన్నప్పటికీ మీరు చాలా కష్టపడ్డారు. మీ ఇద్దరి నుండి నేను కొన్ని విషయాలు తెలుసుకోవాలనుకుంటున్నాను. 'మన్ కీ బాత్' శ్రోతలు కూడా మీ అభిరుచి ఏమిటి, మీ పట్టుదల ఏమిటి, మీ ఆలోచనలు ఏమిటి,  మీరంతా దీన్ని ఎలా సాధించారు? ఇది ఎంత కష్టమైనది? అనే విషయాలను మీ నుండి తెలుసుకోవాలనుకుంటున్నారు.

 

గురిందర్‌వీర్: సార్. నేను గురిందర్ ని. నేను మొదట్లో చాలా పోరాటం చేశాను.  నేను సరైన పని చేస్తున్నానా, సరైన ఎంపిక చేసుకున్నానా అని చాలాసార్లు సందేహించాను. ఎందుకంటే ప్రతిసారీ గెలవలేం. కొన్నిసార్లు నేర్చుకుంటాం. నేను ఓడిపోయినప్పుడు, నేను సరిగ్గా రాణించనప్పుడు, నాకు గాయమైనప్పుడు, నా కుటుంబసభ్యులు నన్ను ప్రోత్సహిస్తూ “ఫర్వాలేదు... ఒక రోజు చెడుగా గడిచినా, ఒక సంవత్సరం చెడుగా గడిచినా, అది నీ జీవితాన్ని పాడుచేయదు. కలలు కనడం ఆపవద్దు” అని చెప్పేవారు. “నువ్వు చేయకపోతే ఇంకెవరూ చేయలేర”ని నా కోచ్ కూడా నాకు నేర్పించారు. మన సమాజం, మన చుట్టూ ఉన్నవాళ్లు మనల్ని ప్రోత్సహించినప్పుడు మన ప్రేరణ ఎప్పటికీ సడలదు.

 

ప్రధానమంత్రి: అనిమేష్ గారూ... మీరు చెప్పండి.

 

అనిమేష్: సార్... నేను 2021లో అథ్లెటిక్స్ ప్రారంభించినప్పుడు అందరూ నాతో “చూడు... ఇది కొత్త రంగం... నువ్వు దీన్ని చేయగలవా లేదా?' అని అడిగేవారు. అప్పుడు నేను “ఇప్పుడు నేను ఈ రంగంలోకి అడుగుపెట్టాను. కాబట్టి నేను తప్పకుండా చేస్తాను” అని చెప్పాను. మా నాన్నగారు కూడా నాతో ఎప్పుడూ “నువ్వు ఈ రంగంలోకి అడుగుపెట్టాక ఎప్పుడూ వెనక్కి తిరిగి చూడకు. ఎందుకంటే నువ్వు ఇది చేయాలి, అది చేయాలి అని అందరూ అనుకుంటారు. కానీ చేసి చూపించేవారు చాలా తక్కువ మంది ఉంటారు. నువ్వు ఇప్పుడే ఈ రంగంలోకి అడుగుపెట్టావు. కాబట్టి దీనికే కట్టుబడి ఉండు. దీంట్లోనే ముందుకు సాగిపో' అని చెప్పేవారు. “నీకు మేం అన్ని సౌకర్యాలు కల్పిస్తాం. ప్రతి విషయంలోనూ నీకు అండగా ఉంటాం. కుటుంబ మద్దతు, ఆర్థిక సహాయం... అన్నీ చేస్తాం. కేవలం కష్టపడి పనిచేసి, భారతీయులు కూడా పరుగెత్తగలరని భారతదేశానికి చూపించు.” అనేవారు. ఎందుకంటే భారతీయుల జన్యువులు 10 సెకన్ల లోపు లేదా 10.1 సెకన్ల లోపు పరుగెత్తేంత గొప్పవి కావని, లేదా వారు స్ప్రింట్ చేయలేరని జనం  నాతో అనేవారు. కానీ ఇప్పుడు భారతీయులు కూడా అది చేయగలరని మేమిద్దరం నిరూపించాం. ఇది మాకు అంత కష్టం కాదు. మేం కూడా ఏదైనా చేయగలం. కాబట్టి సార్, ఈ విషయాలన్నీ నన్ను చాలా ప్రోత్సహిస్తున్నాయి. మేం శిక్షణ పొందుతున్న కొద్దీ మా టైమింగ్‌లను మరింత ఎక్కువగా మెరుగుపరుస్తున్నాం. భారతీయులు కూడా ఇది చేయగలరని ఇతర భారతీయులు కూడా చూస్తున్నారు. మేం ఇంకా ఎక్కువ సాధిస్తాం సార్. ఇప్పుడు మేమిద్దరం కామన్వెల్త్ గేమ్స్‌కు కూడా ఎంపికయ్యాం. అక్కడ జరగబోయే పోటీలో మరింత మెరుగ్గా రాణిస్తాం.

 

ప్రధానమంత్రి: అయితే చూడండి... నాకు కూడా ఒక ఆసక్తి ఉంది. ప్రజలకు కూడా ఉంటుంది. మీరిద్దరూ మంచి స్నేహితులని నేను విన్నాను. మీరు నా రికార్డును బ్రేక్ చేస్తే, నేను మీ రికార్డును బ్రేక్ చేస్తానని మీరిద్దరూ నిర్ణయించుకున్నారా? అనిమేష్… ముందు మీరు చెప్పండి.

 

అనిమేష్: సర్, మొదటి రికార్డు 10.18 సెకన్లు. అది నాదే. ఆ తర్వాత సెమీ-ఫైనల్‌లో గురిందర్‌వీర్ భయ్యా 10.17 సెకన్లతో దాన్ని బద్దలు కొట్టారు. రెండో సెమీ-ఫైనల్‌లో నేను 10.15తో దాన్ని మళ్ళీ బద్దలు కొట్టాను. ఆ సమయంలో నా సెమీ-ఫైనల్ జరిగినప్పుడు “అవును... ఫర్వాలేదు.  ఈరోజు రికార్డు బద్దలైంది.  మేమిద్దరం కలిసి చేశాం” అని మేమిద్దరం సంతోషించాం. ఎందుకంటే ఆ సమయంలో గేమ్స్ లో  ఒకరిపై ఒకరికి తీవ్రమైన పోటీ ఉండేది. కానీ మేమిద్దరం అప్పటికే దృఢ నిశ్చయంతో ఉన్నాం. అంతకు ముందు మేమిద్దరం పోటీల కోసం సౌదీ అరేబియాకు కూడా వెళ్ళాం. అక్కడ మేమిద్దరం రూమ్‌మేట్స్‌గా కూడా ఉండేవాళ్ళం. అందుకే అక్కడ మేమిద్దరం “మనం భారతదేశ స్ప్రింటింగ్‌ను ముందుకు తీసుకెళ్లాలి. ఆ విషయం మన చేతుల్లోనే ఉంది. మనం ఏది చేసినా అది ఇతరులకు స్ఫూర్తినిస్తుంది” అని మాట్లాడుకునేవాళ్ళం.

 

ప్రధానమంత్రి: గురిందర్‌వీర్... మీరేం చెప్పాలనుకుంటున్నారు?

 

గురిందర్‌వీర్: మేమిద్దరం బాగా పరుగెత్తాలని నిర్ణయించుకున్నాం. అందుకే సార్.. మేం ఒకరికొకరం అవసరమైనప్పుడు ఒకరికొకరం అండగా నిలబడతాం. ఇప్పుడే రికార్డింగ్‌కు ముందు చేసినట్టు. ఇపుడు ముందుగా నేను రికార్డ్ చేశాను. ఆ తర్వాత అనిమేష్ చేశాడు. మేం వార్మప్ చేస్తున్నప్పుడు అనిమేష్‌తో "అనిమేష్, ఆ బ్లాక్ సరిగ్గా ఉంది. వెళ్లి దానిపై కూర్చొని అక్కడ అడుగులు వేయి. మనం ఇక్కడ వార్మప్ చేద్దాం. వార్మప్ ఇక్కడ సరిగ్గా చేస్తే మనం ఒకరికొకరు సహాయం చేసుకుంటాం. ఒకరికొకరు సహాయం చేసుకుంటే అవతలి వారు కూడా మెరుగుపడతారు. మనం కూడా మెరుగుపడతాం" అని చెప్పాను. కాబట్టి స్నేహం కూడా అవసరం. కానీ సార్, మేం మైదానం బయట.. పోటీకి బయట ఉన్నపుడు స్నేహితులం. మైదానంలోకి వెళ్ళినప్పుడు ఒకరికొకరం పోటీదారులం అవుతాం. అప్పుడు “నేను ఇతని కంటే వేగంగా పరుగెడతాను. నేను ఇతని కంటే వేగంగా పరుగెడతాను” అని అనుకుంటూ ఉంటాం.

 

ప్రధానమంత్రి: చూడండి.. మీరందరూ ఈ పోటీ దేశ గౌరవాన్ని పెంచారు. దేశాన్ని భవిష్యత్తులో ఉన్నత స్థాయికి తీసుకెళ్లడానికి కృషి చేశారు. మీరు దానిని సానుకూల స్ఫూర్తితో చేశారు. మీలోని ఈ క్రీడాస్ఫూర్తితో ఒకరినొకరు సవాలు చేసుకుంటూ, ముందుకు సాగడానికి కృషి చేస్తూ, ఒకరికొకరు సహాయం చేసుకుంటూ, మీరు అద్భుతమైన పని చేశారని నేను నమ్ముతున్నాను. మీకు నా హృదయపూర్వక అభినందనలు, నా శుభాకాంక్షలు. మీరు దేశానికి కీర్తిని కూడా తెస్తారు. మీరు ఇలాగే కష్టపడి పనిచేస్తూ ఉంటే చాలా పురోగతి సాధిస్తారని నాకు నమ్మకం ఉంది.  మీకు చాలా చాలా శుభాకాంక్షలు.

 

గురిందర్‌వీర్/అనిమేష్: ధన్యవాదాలు సార్… ధన్యవాదాలు.

 

ప్రధాన మంత్రి: చాలా చాలా ధన్యవాదాలు.

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       నా ప్రియమైన దేశప్రజలారా! ప్రస్తుతం దేశంలోని చాలా ప్రాంతాల్లో చాలా వేడిగా ఉంది. తీవ్రమైన ఎండతో పాటు వేడి గాలులు వీస్తున్నాయి. ఇలాంటి వాతావరణంలో మిమ్మల్ని మీరు జాగ్రత్తగా చూసుకోవడం చాలా ముఖ్యం. నీళ్లు తాగుతూ ఉండండి. ఒకవేళ తప్పనిసరిగా ఎండలోకి వెళ్లాల్సి వస్తే జాగ్రత్తగా ఉండండి. ఈ విషయంలో వివిధ ప్రభుత్వ శాఖలు జారీ చేసిన మార్గదర్శకాలను మర్చిపోవద్దు.

మిత్రులారా! వేడిని తట్టుకునే మార్గం తరచుగా వంటగదిలోనే దొరుకుతుంది. వేడి పెరిగే కొద్దీ వంటగది రుచి మారుతుందని మీరు గమనించే ఉంటారు. కొన్ని చోట్ల మట్టి కుండలోని నీరు పొంగిపొర్లుతుంది. మరికొన్ని చోట్ల పెరుగు గడ్డకడుతుంది. పచ్చి మామిడికాయలు ఉడకడం మొదలవుతుంది. ఆ తర్వాత భారతీయ పానీయాల సమయం ప్రారంభమవుతుంది. మీకు భారతీయ పానీయాల గురించి కూడా తెలిసే ఉంటుంది. మీరు ఉత్తర భారతదేశానికి వెళితే అనేక చోట్ల ఆమ్ పన్నా కనిపిస్తుంది. ఇది పచ్చి మామిడికాయల రుచిని అందించడంతో పాటు వేడి నుండి ఉపశమనాన్ని కూడా ఇస్తుంది. పంజాబ్, హర్యానాలకు వెళితే పెద్ద గ్లాసులో ఉండే లస్సీ మీకు కనిపిస్తుంది. రాజస్థాన్, గుజరాత్‌లలో మజ్జిగ ప్రతి భోజనానికి తోడుగా ఉంటుంది. అంతేకాకుండా బీహార్, ఝార్ఖండ్, తూర్పు ఉత్తర ప్రదేశ్‌ల సత్తు షర్బత్ చాలా అద్భుతంగా ఉంటుంది. అది కడుపు నింపి, శక్తినిస్తుంది. కొంకణ్, గోవాలలో  కోకుమ్ షర్బత్, సోల్ కఢి దొరుకుతాయి.  దక్షిణ భారతదేశపు పానకం, నీర్ మోర్, సాంబారు; ఒడిశాలో లభించే బేల్ పానా కేవలం పానీయాలు మాత్రమే కాదు. అవి భారతదేశంలోని వివిధ ప్రాంతాల సంప్రదాయాలలో ఒక భాగం. అవి 'ఏక్ భారత్ శ్రేష్ఠ భారత్' స్ఫూర్తిని కూడా ప్రతిబింబిస్తాయి. ఒక విషయం గుర్తుంచుకోవాలి. వీటిలో చాలా వరకు మన వంటగదుల నుండి, మన పొలాల నుండి, పశువుల కొట్టాల నుండి వచ్చాయి. వీటికి పెద్ద బ్రాండింగ్ ఏమీ లేదు. కానీ అవి తరతరాల అనుబంధాన్ని  ప్రతిబింబిస్తాయి. మీరు కూడా వేసవిలో ఈ దేశీయ పానీయాలను ఆస్వాదించాలి.

మిత్రులారా! వేసవి రాకతో ప్రతి ఇంట్లో మరో చర్చ మొదలవుతుంది. అది మామిడి పండ్లపై ఉంటుంది. మామిడిపండ్లు ఒక సాధారణ చర్చనీయాంశం. భారతదేశంలో వేసవి కాలంలో మామిడిపండ్ల ప్రస్తావన రాని ఇల్లు దాదాపుగా ఉండదు. ఒక్కో ప్రాంతానికి ఒక్కో మామిడి రకం, ఒక్కో రుచి, ఒక్కో సువాసన ఉంటాయి. మహారాష్ట్ర, కొంకణ్ ప్రాంతాల నుండి హాపుస్, అల్ఫోన్సో రకాలుంటాయి. గుజరాత్ నుండి కేసర్- ఇవైతే మామిడి రసానికి ప్రాణం. ఉత్తర ప్రదేశ్ నుండి దశహరి; ఇక కాశీ నుండి లంగ్రా. యాదృచ్ఛికంగా లంగ్రా మామిడి పండ్లకు ఒక ప్రత్యేక గుణం ఉంది. పండిన తర్వాత కూడా వాటి రంగు తరచుగా ఆకుపచ్చగానే ఉంటుంది. బీహార్ నుండి జర్దాలూ సువాసనను దూరం నుంచే గుర్తించవచ్చు. చౌసా, మాల్దా — ఇలా ప్రతి పేరుతో ముడివడిన జ్ఞాపకాలు ఉన్నాయి. దక్షిణ భారతదేశానికి వెళితే బంగనపల్లె, తోతాపురి, నీలం, మాల్గోవా రకాలుంటాయి.  బెంగాల్ నుండి హిమసాగర్; ఒడిశా, ఆంధ్రప్రదేశ్ ల నుండి సువర్ణరేఖ ఉన్నాయి. ప్రదేశం మారేకొద్దీ మామిడి పండు రూపం, రంగు, రుచి కూడా మారతాయి. మిత్రులారా! మామిడిపండ్ల  ఈ ప్రయాణం ఇప్పుడు పల్లెటూరి నుండి ప్రపంచ మార్కెట్‌కు చేరుకుంటోంది. ఈ రోజు జరుగుతోన్న 'మన్ కీ బాత్' ద్వారా మామిడి ఉత్పత్తిలో నిమగ్నమైన నా రైతు సోదర సోదరీమణులను నేను ప్రశంసిస్తాను. మీరు కేవలం సాధారణ రైతులు కాదు- దేశ వ్యవసాయ ఆర్థిక వ్యవస్థకు మీరు చాలా ప్రత్యేకమైనవారు. మీరు ఇలాగే ప్రజాదరణ పొందాలని కోరుకుంటున్నాను.

మిత్రులారా! పాఠశాలలకు సెలవులున్న ఈ వేసవి రోజుల్లో మీరు అడ్మిషన్ పొందాలకునే ఒక తరగతి గురించి నేను చెప్తాను. మిత్రులారా... ఒక పరిస్థితిని ఊహించుకోండి: అక్కడ పిల్లలతో పాటు యువకులు, వృద్ధులు కూడా హాజరవుతారు. అక్కడ ఎటువంటి ఫీజులు ఉండవు. పెద్ద భవనాలు ఉండవు. తరగతి గదులు ఉండవు. అన్నింటికన్నా ఆసక్తికరంగా తరగతులు నదిలోనే జరుగుతాయి.

మిత్రులారా! ఇది ఒక కథ కాదు. ఇది ఒక నిజమైన ప్రయత్నం. కేరళలోని ఆలువాలో సాజి వలాశేరిల్ ఒక స్విమ్మింగ్ క్లబ్బును నడుపుతున్నారు. ఇప్పటివరకు ఇక్కడ 15,000 మందికి పైగా ఈత నేర్చుకున్నారు. సాజి దివ్యాంగ పిల్లలకు కూడా ఈత నేర్పించారు. ఈ ప్రయత్నం వెనుక తీవ్రమైన వేదన ఉంది. కొన్ని సంవత్సరాల కిందట ఒక పడవ ప్రమాదంలో చాలా మంది విద్యార్థులు మరణించారు. ఆ సంఘటన సాజిని తీవ్రంగా కలచివేసింది. పిల్లలకు ఈత వచ్చి ఉంటే ఎన్నో ప్రాణాలను కాపాడి ఉండేవాళ్ళమని ఆయన భావించారు. ఆ ఆలోచనతో ఆయన ఈ కృషి ప్రారంభించారు.

మిత్రులారా! సాజి వలాశేరిల్ గారి జీవితం మనకు ఒక గొప్ప పాఠాన్ని నేర్పుతుంది. సేవకు గొప్ప వనరులు అవసరం లేదు. కావాల్సింది మంచి సంకల్పం, నిరంతర కృషి. వీటితో వేలాది మంది జీవితాలను మార్చవచ్చు.

నా ప్రియమైన దేశవాసులారా! ఇటీవల నాకు యూరప్‌లోని నెదర్లాండ్స్‌ను సందర్శించే అవకాశం లభించింది. నేను అక్కడ అనేక సమావేశాలకు హాజరయ్యాను. ఈ సమయంలో ప్రతి భారతీయుడిని గర్వంతో నింపే ఒక సంఘటన జరిగింది. నెదర్లాండ్స్‌లో జరిగిన ఒక ప్రత్యేక కార్యక్రమంలో చోళుల కాలం నాటి పురాతన రాగి ఫలకాలను భారతదేశానికి తిరిగి అప్పగించారు. ఆ కార్యక్రమానికి నెదర్లాండ్స్ ప్రధానమంత్రి కూడా హాజరయ్యారు. ఈ రాగి ఫలకాల గురించి నాకు భారతదేశంతో పాటు విదేశాల నుండి కూడా నిరంతరం సందేశాలు వస్తున్నాయి. ప్రజలు తమ ఆనందాన్ని, గర్వాన్ని వ్యక్తం చేస్తున్నారు. ప్రపంచవ్యాప్తంగా ఉన్న తమిళ సమాజంలో కూడా వాటి పట్ల ప్రత్యేక ఉత్సాహం ఉంది.

మిత్రులారా! ఈ రాగి ఫలకాల గురించి ప్రజల్లో చాలా ఆసక్తి ఉంది. అందువల్ల ఈ రోజు నేను వాటికి సంబంధించిన కొన్ని విషయాలను మీతో పంచుకోవాలనుకుంటున్నాను. అక్కడ 21 పెద్ద, మూడు చిన్న రాగి ఫలకాలు ఉన్నాయి. ఇవి ప్రధానంగా మొదటి రాజేంద్ర చోళ మహారాజు తన తండ్రి అయిన రాజరాజ చోళ మహారాజు ఇచ్చిన వాగ్దానాన్ని నెరవేర్చడానికి సంబంధించినవి. ఆనైమంగళం గ్రామాన్ని ఒక బౌద్ధ మఠానికి దానం చేసినట్టు అవి పేర్కొంటున్నాయి. ఈ రాగి ఫలకాలు చోళ రాజవంశం  విజయాలను కూడా వివరిస్తాయి. అవి చోళ సామ్రాజ్యం  బలమైన సముద్ర శక్తిని వెల్లడిస్తాయి. ఆగ్నేయాసియా దేశాలతో వారి సంబంధాల గురించి కూడా అవి సమాచారాన్ని అందిస్తాయి.

చోళ సామ్రాజ్య  గొప్ప చరిత్ర, సంస్కృతి పట్ల మనమందరం చాలా గర్వపడతాం. మిత్రులారా! భారతదేశానికి చెందిన ఇటువంటి అమూల్యమైన వారసత్వాన్ని పరిరక్షించడానికి మన ప్రభుత్వం నిరంతరం కృషి చేస్తోంది. ఈ విషయంలో 'జ్ఞాన భారతం అభియాన్' కింద ఛత్తీస్‌గఢ్‌లోని మల్హార్‌లో ఒక ముఖ్యమైన ఆవిష్కరణ జరిగింది. ఇక్కడ మూడు అరుదైన రాగి ఫలకాలు లభించాయి. ఇవి పాండువంశానికి చెందిన మహర్షి బాలార్జునుని పాలనా కాలానికి సంబంధించినవని భావిస్తున్నారు. నిపుణుల అభిప్రాయం ప్రకారం ఈ శాసనాలు ఆరవ-ఏడవ శతాబ్దానికి చెందినవి. అంటే పద్నాలుగు వందల, పదిహేను వందల సంవత్సరాల పూర్వం నాటివన్నమాట. ఈ రాగి ఫలకాలు ప్రాచీన బ్రాహ్మీ లిపి, పాలి భాషలో లిఖితమై ఉన్నాయి. అవి ఆనాటి పరిపాలన, మతం, సంస్కృతి గురించి ముఖ్యమైన సమాచారాన్ని అందిస్తాయి.

మిత్రులారా! మన భారతీయులకు ఖగోళశాస్త్రంపై ఎల్లప్పుడూ ఒక ప్రత్యేకమైన ఆకర్షణ ఉంది. మన దేశంలో శతాబ్దాల నాటి అబ్జర్వేటరీలు  ఇప్పటికీ ఉన్నాయి. ఇక్కడ అద్భుతమైన గణిత ఆవిష్కరణలు జరిగాయి. నావిగేషన్ కానివ్వండి. పంచాంగం కానివ్వండి. లేదా మన పండుగలు ఏవైనా సరే...  వాటన్నింటికీ ఆకాశం, నక్షత్రాలతో సంబంధం ఉంది. ఇక్కడ ప్రతి తరంలోనూ ఖగోళశాస్త్రం కుతూహలాన్ని రేకెత్తించింది. ఇది అన్వేషణకు స్ఫూర్తినిచ్చింది. నేటి యువత కూడా దాని పట్ల గొప్ప ఉత్సాహాన్ని కనబరుస్తున్నారు. ఈ రోజుల్లో దేశవ్యాప్తంగా ఖగోళశాస్త్ర క్లబ్‌లు బాగా ప్రాచుర్యం పొందుతున్నాయని మీరు గమనించే ఉంటారు. వాటి కార్యకలాపాలు పెద్ద నగరాల నుండి చిన్న పట్టణాల వరకు, పాఠశాలల నుండి పార్కుల వరకు కనిపిస్తాయి. నాకు బెంగళూరు ఆస్ట్రోనామికల్ సొసైటీ గురించి తెలిసింది. ఇక్కడ పరిశీలనా సమావేశాలు నిర్వహిస్తారు. ఈ సంస్థ గ్రామీణ ప్రాంతాల్లో ఖగోళశాస్త్రాన్ని ప్రాచుర్యంలోకి తీసుకురావడానికి ఒక కార్యక్రమాన్ని కూడా ప్రారంభించింది. 'ఖగోళ్  మండల్' అనే బృందం చాలా వినూత్నమైన 30 గంటల కోర్సును ప్రారంభించింది.

మిత్రులారా! రాత్రిపూట నక్షత్రాలను చూడటం ఒక అద్భుతమైన అనుభవం. ఆస్ట్రో కేరళ అనే సంస్థ రాత్రి పరిశీలన శిబిరాలు, వర్క్‌షాప్‌లను నిర్వహిస్తుంది. ఇక్కడ యువత టెలిస్కోపులను తయారు చేయడం, నక్షత్ర పటాలను ఉపయోగించడం నేర్చుకుంటారు. రాజ్‌కోట్‌లోని బిగ్ బ్యాంగ్ ఆస్ట్రానమీ క్లబ్, గిర్ అడవుల నుండి రాన్ ఆఫ్ కచ్ వరకు అనేక ఖగోళ శాస్త్ర కార్యక్రమాలను నిర్వహించింది. ‘జ్యోతిర్విద్యా పరిసంస్థ’ అత్యంత పురాతన ఖగోళ శాస్త్ర సంస్థలలో ఒకటి. ఇది పరిశీలన సౌకర్యాలతో పాటు పుస్తకాలు, గ్రంథాలయం, టెలిస్కోప్ గ్రంథాలయాన్ని కూడా అందిస్తుంది. నేను ఐఎస్ ఏఏసి (ఐజాక్-ISAAC)  గురించి కూడా ప్రస్తావించాలనుకుంటున్నాను. ఇది విద్యార్థులు నిర్వహించే ఒక దేశవ్యాప్త నెట్‌వర్క్. ఇది ఖగోళశాస్త్రం, ఖగోళ భౌతిక శాస్త్ర క్లబ్‌లను అనుసంధానిస్తుంది.

మిత్రులారా! మీ అభిరుచి కోసం సమయం కేటాయించడం, నిరంతరం కొత్త విషయాలు నేర్చుకోవడం చాలా ముఖ్యం. ఈ సెలవుల్లో యువత ఒక ఖగోళ శాస్త్ర క్లబ్‌లో చేరాలని, ఏదైనా ప్లానెటేరియంను సందర్శించాలని నేను కోరుతున్నాను.

మిత్రులారా! టీవీలో ‘మన్ కీ బాత్’ కార్యక్రమం చూస్తున్న వారు తప్పకుండా ఒక వీడియోను చూడాలని నేను చెప్పాలనుకుంటున్నాను. ఈ వీడియో ఇటీవల చాలా చర్చనీయమైంది. అందులో కొందరు వ్యక్తులు ఒక గంగా డాల్ఫిన్‌ను కాపాడటానికి ఓపికగా, జాగ్రత్తగా ప్రయత్నిస్తున్నారు. ఈ మొత్తం ప్రయత్నానికి సుమారు 13 గంటల సమయం పట్టిందని, చివరికి ఆ డాల్ఫిన్‌ను కాపాడారని తెలిస్తే మీరు ఆశ్చర్యపోతారు.

మిత్రులారా! ఇందులో భారతదేశపు మొట్టమొదటి గంగా డాల్ఫిన్ రెస్క్యూ అంబులెన్స్ కీలక పాత్ర పోషించింది. ఈ సంఘటన ఉత్తరప్రదేశ్‌లో జరిగింది. అక్కడ ఒక గంగా డాల్ఫిన్ కాలువలో చిక్కుకుపోయింది. 'నమామి గంగే అభియాన్' కింద ప్రవేశపెట్టిన ఈ అంబులెన్స్ ఆ సమయంలో ఆ డాల్ఫిన్‌కు ఆశ కల్పించింది. అప్పుడు దాన్ని జాగ్రత్తగా రక్షించారు. దానికి పరీక్షలు చేసి, చికిత్స అందించి, ఆ తర్వాత సురక్షితంగా రాప్తి నదిలోకి విడిచిపెట్టారు. ఒక విధంగా ఒక ప్రాణం తన గూటికి తిరిగి వచ్చింది.

మిత్రులారా! ఈ డాల్ఫిన్ రెస్క్యూ అంబులెన్స్ చాలా ప్రత్యేకమైనది. దీన్ని ఒక మొబైల్ ఆసుపత్రిలా రూపొందించారు. ఇందులో డాల్ఫిన్‌ను సురక్షితంగా ఉంచడానికి ఏర్పాట్లు ఉన్నాయి. ఆక్సిజన్, ప్రత్యేక స్ట్రెచర్లు, రెస్క్యూ పరికరాలు ఉన్నాయి. అంటే ఒకవేళ డాల్ఫిన్‌కు గాయమైనా, కాలువలో చిక్కుకుపోయినా, లేదా నది నుండి వేరుపడినా దానికి తక్షణమే సహాయం అందించవచ్చు.

మిత్రులారా! మనం గంగా డాల్ఫిన్‌ను కాపాడినప్పుడు కేవలం ఒక జాతిని మాత్రమే కాపాడటం లేదు. మనం గంగానది జీవవైవిధ్యాన్ని కాపాడుతున్నాం.  మనం నది  సంపూర్ణ జీవ వ్యవస్థను కాపాడి, మన భవిష్యత్ తరాల కోసం ఒక అమూల్యమైన సహజ వారసత్వాన్ని పరిరక్షిస్తున్నాం.

నా ప్రియమైన దేశప్రజలారా! మీలో చాలా మందికి నది, చెరువు లేదా బావి నీటితో ముడిపడిన జ్ఞాపకాలు ఉండే ఉంటాయి. కొందరికి చెరువులో ఈత కొట్టడం గుర్తుండవచ్చు. కొందరికి చెరువు గట్లపై స్నేహితులతో ఆడుకోవడం గుర్తుండవచ్చు.  మరికొందరికి మట్టి వాసన గుర్తుండవచ్చు. ఇలాంటి బాల్య జ్ఞాపకాలు జీవితాంతం మనసులో నిలిచిపోతాయి.

మిత్రులారా! ఇలాంటి జ్ఞాపకాలను పరిరక్షించడానికి సంబంధించిన ఒక స్ఫూర్తిదాయకమైన కథ ఉత్తరప్రదేశ్‌లోని బస్తీ జిల్లా నుండి వెలుగులోకి వచ్చింది. బస్తీకి చెందిన ఆకాష్ గుప్తా తన గ్రామంలోని మనోరమ నదిని చూసి తీవ్రంగా బాధపడేవారు. ఎందుకంటే తన బాల్యంలో పరిశుభ్రంగా, జీవకళతో నిండిన ఆ నదిలో కాలక్రమేణా ప్లాస్టిక్‌ పేరుకుపోవడం మొదలైంది. ఆ మురికి పెరుగుతూనే ఉంది. దీనిపై ఫిర్యాదు చేయకూడదని, ఒక కొత్త ప్రారంభం చేయాలని ఆకాష్ నిర్ణయించుకున్నారు. "ఫిర్యాదులు వద్దు, ఇదొక ఆరంభం మాత్రమే" అనేది ఆయన మంత్రంగా మారింది. ఆయన తన స్నేహితులను సమీకరించారు. వారి దగ్గర కేవలం ఒక వల, ఒక పార, ఒక బుట్ట మాత్రమే ఉండేవి. అన్నిటికంటే మిన్నగా  ఏదైనా మార్పు తీసుకురావాలనే దృఢ సంకల్పమనే గొప్ప బలం ఉండేది. ఈ యువకులు నదిలోకి దిగి, నీటి నుండి ఎండిపోయిన గడ్డిని, ప్లాస్టిక్‌ను, చెత్తను బయటకు తీసేవారు. కొన్నిసార్లు వారు ఒక్క రోజులోనే నది నుండి 50-60 కిలోగ్రాముల చెత్తను తొలగించేవారు. క్రమంగా మనోరమ నదిలోని ఆ భాగం మళ్ళీ శుభ్రంగా కనిపించడం ప్రారంభించింది. చుట్టుపక్కల ప్రజలు కూడా ఈ పనిని గమనించారు. ప్రజలలో పరిశుభ్రతపై అవగాహన పెరిగింది.

మిత్రులారా! గోవా నుండి కూడా ఇలాంటి స్ఫూర్తిదాయకమైన గాథ ఒకటి వెలుగులోకి వచ్చింది. బాలకృష్ణ అయ్యగారు గోవాకు చెందిన ఒక రిటైర్డ్ ఉపాధ్యాయుడు. రిటైర్ అయినా సమాజం కోసం పనిచేయాలనే ఆయన ఉత్సాహం మాత్రం అలాగే ఉంది. మడ్డి-తోలాప్ ప్రాంతంలోని నీటి సమస్య ఆయనను తీవ్రంగా కలవరపరిచింది. ఆయన కూడా ఒక పరిష్కారం కోసం కృషి చేయడం ప్రారంభించారు. పైప్‌లైన్లు వేయడంలో బాలకృష్ణగారు కీలక పాత్ర పోషించారు. దీనివల్ల అనేక ఇళ్లకు నీరు చేరింది. ప్రతిరోజూ నీటి కోసం పోరాడవలసి వస్తున్న కుటుంబాలకు ఇది గొప్ప ఉపశమనాన్ని కలిగించింది.

మిత్రులారా! గత నెలలో నాకు ఒక అద్భుతమైన అనుభవం ఎదురైంది. ఇది కూడా ‘మన్ కీ బాత్’కు సంబంధించినదే. అందుకే ఈ రోజు నేను ఈ విషయం మీతో చర్చించాలనుకుంటున్నాను. నేను తమిళనాడులోని నాగర్‌కోయిల్‌లో ఒక ఉపాధ్యాయురాలిని కలిశాను. నేను దాదాపు మూడు దశాబ్దాల కిందట కూడా ఆమెను కలిశాను. నేను మాట్లాడుతున్నది గిరిజా అమ్మగారి గురించి. ఈ సమావేశంలో ఆమెతో పాటు కొంతమంది యువ విద్యార్థులు కూడా ఉన్నారు. మిత్రులారా! గిరిజా అమ్మగారు సుమారు 15 పాఠశాలలను నడుపుతున్నారు. వీటిలో చెన్నైలోని జైగోపాల్ గరోడియా హిందూ విద్యాలయం చాలా ప్రముఖమైనది. ఆమె దేశభక్తి భావన ప్రతి భారతీయుడికి ప్రేరణనిస్తుంది. 'మన్ కీ బాత్' స్ఫూర్తితో ఆమె దేశంలోని ఎందరో సైనికులకు విరాళం ఇవ్వడానికి ప్రతిజ్ఞ చేశారు. ఇది చేయడానికి, ఆమె తన పాఠశాలలన్నింటిలోని విద్యార్థులను ప్రేరేపించారు. ధైర్యవంతులైన సైనికుల కోసం ప్రతిరోజూ ఒక రూపాయి విరాళంగా ఇవ్వమని ఆమె పిల్లలను కోరారు. అంటే విద్యార్థుల్లో ప్రతి ఒక్కరి నుండి ఒక సంవత్సరంలో 365 రూపాయలు సేకరించారు. ఈ చిన్న విరాళాలు సుమారు 40 లక్షల రూపాయలకు చేరాయి. గిరిజా అమ్మగారు ఈ మొత్తం సొమ్ముతో నాకు ఒక చెక్కును అందజేశారు. మాతృభూమి పట్ల ఆమెకున్న ప్రగాఢమైన భక్తిని ఆమెతో నా సంభాషణ సమయంలో  నేను గ్రహించాను. చెన్నైలోని మొట్టమొదటి హిందూ పాఠశాల గత సంవత్సరమే 50వ వార్షికోత్సవాన్ని జరుపుకుంది. దేశానికి చెందిన విద్య, సాంస్కృతిక గౌరవాన్ని పెంపొందించడంలో ఈ పాఠశాలల సముదాయం పోషిస్తున్న పాత్ర ప్రశంసనీయం. ఇందులో పాలుపంచుకున్న ప్రతి ఒక్కరినీ నేను అభినందిస్తున్నాను. మన ధైర్యవంతులైన సైనికుల సేవకు తమ వంతు సహకారం అందించిన విద్యార్థులకు ప్రత్యేక ప్రశంసలు తెలియజేస్తున్నాను.

మిత్రులారా! భారతదేశంలోని ప్రతి గ్రామంలో, నగరంలో మనకు స్ఫూర్తినిచ్చే ఏదో ఒక సంఘటన జరుగుతూనే ఉంటుంది. తరచుగా ఈ ప్రయత్నాల గురించి పెద్దగా చర్చ జరగదు. కానీ వాటి గురించి మనకు తెలిసినప్పుడు దేశం ప్రజల శక్తితోనే ముందుకు సాగుతోందనే మన నమ్మకం మరింత బలపడుతుంది. మీ చుట్టూ జరుగుతున్న ఇటువంటి ప్రయత్నాలను మీరు తప్పకుండా గమనించాలని నేను కోరుతున్నాను. సమాజానికి మంచి చేస్తున్న వారిని గుర్తించండి. వారిని అభినందించండి. వారి నుండి నేర్చుకోండి. వీలైతే మీరే స్వయంగా ఏదైనా మంచి పనిలో పాలుపంచుకోండి. వచ్చే నెల 'మన్ కీ బాత్'లో మరికొన్ని స్ఫూర్తిదాయకమైన గాథలతో నేను మళ్ళీ మిమ్మల్ని కలుస్తాను. చాలా చాలా ధన్యవాదాలు. నమస్కారం.