শেয়ার
 
Comments 3 Comments
PM Modi speaks at the 46th Indian Labour Conference
The country cannot be happy, if the worker is unhappy. As a society, we need to respect the Dignity of Labour: PM
If we want to move ahead, we need to give opportunities to our youth. Giving opportunities to apprentices is the need for the hour: PM Modi

केंद्र और राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न सरकारों के प्रतिनिधि बंधु गण,

ये भारत की श्रम-संसद है और एक लंबे अरसे से हमारे देश में त्रिपक्षीय वार्ता का सिलसिला चला है। एक प्रकार से ये त्रिपक्षीय वार्ता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ये अपने आप में एक उज्‍ज्‍वल इतिहास है कि 75 साल का हमारे पास एक गहरा अनुभव है। उद्योग जगत सरकार एवं श्रम संगठन गत 75 वर्ष से लगातार बैठ करके विचार-विमर्श करके मत भिन्‍नताओं के बीच भी मंथन करके अमृत निकालने का प्रयास करते रहे हैं। और उसी संजीवनी से देश को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और उसी कड़ी में आज यह श्रम संसद हो रहा है। हम सबके लिए प्रेरणा की बात है कि यह वो समारोह है जहां कभी बाबा साहेब अंबेडकर का मार्ग दर्शन मिला था। यह वो समारोह है जिसे कभी भारत के भूत-पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमान वीवी गिरि जी का मार्ग दर्शन मिला था। अनेक महानुभावों के पद चिन्‍हों पर चलते-चलते आज हम यहां पहुंचे हैं। समय का अपना एक प्रभाव होता है। आज से 70-75 साल पहले जिन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होती थी वो आज जरूरत नहीं होगी और आज जिन बिंदुओं पर विचार करने की आवश्‍यकता है हो सकता है 25 साल बाद वह भी काल बाह्य हो जाए, क्‍योंकि एक जीवंत व्‍यवस्‍था का यह लक्षण होता है, नित्‍य नूतन, नित्‍य परिवर्तनशील और अच्‍छे लक्षण की पूर्ति के लिए एकत्र होकर आगे बढ़ना है। इस बात में कोई दुविधा नहीं है। इस बात में कोई मत-मतांतर नहीं है कि राष्‍ट्र के निर्माण में श्रमिक का कितना बड़ा योगदान होता है, चाहे वो किसान हो मजदूर हो, वो unorganized लेबर का हिस्‍सा हो, और हमारे यहां तो सदियों से इन सबको एक शब्‍द से जाना जाता है- विश्‍वकर्मा। विश्‍वकर्मा के रूप में जिसको जाना जाता है, माना जाता है और इसलिए अगर श्रमिक रहेगा दुखी , तो देश कैसे होगा सुखी? और मैं नहीं मानता हूं कि इन मूलभूत बातों में हममें से किसी में कोई मतभेद है। मैं श्रम को एक महायज्ञ मानता हूं जिसमें कोटि अवधि लोग अपनी आहूति देते हैं। सिर्फ श्रम की नहीं, कभी-कभार तो सपनों की भी आहूति देते हैं और तब जा करके किसी ओर के सपने संजोए जा सकते हैं। अगर एक श्रमिक अपने सपनों को आहूत न करता तो किसी दूसरे के सपने कभी संजोए नहीं जा सकते। इतना बड़ा योगदान समाज के इस तबके का है और इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करते हुए हमने आगे किस दिशा में जाना है उस पर हमें आगे सोचना होगा। जब तक श्रमिक, मालिक- उनके बीच परिवार भाव पैदा नहीं होता है, अपनेपन का भाव पैदा नहीं होता है। मालिक अगर यह सोचता है कि वो किसी का पेट भरता है और श्रमिक यह सोचता है कि मेरे पसीने से ही तुम्‍हारी दुनिया चलती है तो मैं नहीं समझता कि कारोबार ठीक से चलेगा। लेकिन अगर परिवार भाव हो, एक श्रमिक का दुख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फैक्‍टरी का हुआ कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता | और यह जिम्‍मेवारी जब हम निभाएंगे तब जाकर के, मैं तो चाहूंगा कभी यह भी सोचा जा सकता है क्‍या। इन सारी चर्चाओं का कभी वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन होने की आवश्‍यकता है। ऐसे बड़े उद्योग और ऐसे छोटे उद्योग या मध्‍यम दर्जे के उद्योग 50 साल पुराने है, लेकिन कभी हड़ताल नहीं हुई है क्‍या कारण होगा। उसको चलाने वाले लोगों की सोच क्‍या रही होगी। उन्‍होंने उनके साथ किस प्रकार से नाता जोड़ा है, क्‍या हम आज नए उद्योगकारों को, establish उद्योगकारों को , उनको यह नमूना दिखा सकते हैं कि हमारे सामने, हमारे ही देश में, इसी धरती में ये 50 उद्योग ऐसे हैं जो 50 साल से चल रहे हैं। हजारों की तादाद में श्रमिक है। लेकिन न कभी संघर्ष हुआ है, न कभी हड़ताल हुई है, न उनकी कोई शिकायत, न इनकी कोई शिकायत। एक मंगलम माहौल जिन-जिन इकाईयों में है, कभी उनको छांटकर निकालना चाहिए और उस मंगलम का कारण क्‍या है, इस मंगल अवस्‍था को प्राप्‍त करने के उनके तौर तरीके क्‍या है। अगर इन चीजों को हम श्रमिकों के सामने ले जाएंगे, इन चीजों को हम उद्योगकारों के सामने ले जाएंगे तो उनको भली-भांति समझा सकते हैं और मंगलम का माहौल जहां होगा, वहां यह भी नजर आया होगा कि सिर्फ श्रमिक का असंतोष है, ऐसा नहीं है। वहां यह भी ध्‍यान में आया होगा कि उस उद्योग का विकास भी उतना ही हुआ होगा और उन श्रमिकों का विकास भी उतना ही हुआ होगा। जब तक हम इस भावनात्‍मक अवस्‍था को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास नहीं करते और जो सफल गाथाएं हैं और उन सफल गाथाओं को हम उजागर नहीं करते, मैं नहीं मानता हूं कि हम सिर्फ कानूनों के द्वारा बंधनों को लगाते-लगाते समस्‍याओं का समाधान कर पाएंगे। हां, कानून उनके लिए जरूरी है कि जो किसी चीज को मानने को तैयार नहीं होते, श्रमिक को इंसान भी मानने को तैयार नहीं होते। उनकी सुख-सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उसकी minimum आवश्‍यकताओं की ओर भी देखने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को कानूनों की उतनी ही जरूरत होती है और इसलिए हम इस व्‍यवस्‍था को उस रूप में समझकर चलाएं। एक सामाजिक दृष्‍टि से भी हमारे यहां सोचने की बहुत आवश्‍यकता है। किसी न किसी कारण से हमारे भीतर एक बहुत बड़ी बुराई पनप गई है। हमारी सोच का हिस्‍सा बन गई है। हर चीज को देखने के हमारे तरीके की आदत सा बन गयी है और वो है हम कभी भी श्रम करने वाले के प्रति आदर के भाव से देखते ही नहीं। कोई बढ़िया कपड़े पहन करके हमारे दरवाजे की घंटी बजाए, दोपहर दो बजे हम आराम से सोए हों, कोट-पैंट सूट पहनकर आए और घंटी बजाए तो नींद खराब होगी ही होगी, दरवाजा खोलेंगे और जैसे ही उसको देखेंगे तो कहेंगे आइए आइए कहां से आए हैं, क्‍या काम था, बैठिए-बैठिए। और कोई ऑटो रिक्‍शा वाले ने घंटी बजाई, पता नहीं चलता है दोपहर दो बजे हम सोते हैं, इस समय घंटी बजा दी। क्‍यों भई यह फर्क क्‍यों?



यह जो हमारी सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी कमी आई है सदियों के कारण आई हुई है। लेकिन कभी न कभी dignity of labour , श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक का सम्‍मान ये समाज के नाते अगर हम स्‍वभाव नहीं बनाएंगे तो हम हमारे श्रमिकों के प्रति जो कि उसके बिना हमारी जिन्‍दगी नहीं है, अगर कोई धोबी बढ़िया सा iron नहीं करता तो मैं कुर्ता पहनकर कहां से आता यहां और इसलिए जिनके भरोसे हमारी जिन्‍दगी है उनके प्रति सम्‍मान का भाव यह सामाजिक चरित्र कैसे पैदा हो, उसके लिए हम किस प्रकार से व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करे। हमारे बच्‍चों की पाठ्य पुस्‍तकों में उस प्रकार के syllabus कैसे आए ताकि सहज रूप से आनी वाली पीढ़ियां हमारे श्रमिक के प्रति सम्‍मान के भाव से देखने लगे। आप देखिए माहौल अपने आप बदलना शुरू हो जाएगा। हमारी सरकार को सेवा करने का अवसर मिला है, श्रम संगठनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है और त्रिपक्षीय बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं। कई पुरानी-पुरानी गुत्‍थियां हैं, सुलझानी है और मुझे विश्‍वास है कि देश के श्रमिकों के आशीर्वाद से इन गुत्‍थियों को सुलझाने में हम सफल होंगे और समस्‍याओं का समाधान करने में हम कोई न कोई रास्‍ते खोजते चलेंगे। और सहमति से कानूनों का भी परिवर्तन करना होगा। कानूनों में कोई कुछ जोड़ना होगा, कुछ निकालना होगा वो भी सहमति से करने का प्रयास, प्रयास करते ही रहना चाहिए और निरंतर प्रक्रिया चलती रही है, आगे भी चलती रहने वाली है। कोई भी सरकार आए, ये कोई आखिरी कार्यक्रम कभी होता नहीं है और इसलिए मैं समझता हूं कि इस प्रक्रिया का अपना महत्‍व है। मेरा विश्‍वास रहा है- ‘minimum government , maximum governance’ और इसलिए ये जो कानूनों के ढेर हैं कानूनों का ऐसा कहीं खो जाए इन्‍सान। पता नहीं इतने कानून बनाये कर रखे हुए और हरेक को अपने फायदे वाला कानून ढूंढ सकते हैं ऐसी स्थिति है। हर कोई उद्योगकार एक ही कानून में से उद्योगकार को अपने मतलब का कानून निकलाना है तो वो भी निकाल सकता है सामाजिक संगठन को निकालना है तो वो भी निकाल सकता है, सरकार को निकालना है तो वो भी निकाल सकती है। क्‍योंकि टुकड़ों में सब चीजें चलती रही हैं | जब तक हम एक एकत्रित भाव से, composite भाव से, हमें जाना कहां है उसको ले करके , और इसीलिए मैंने एक कमेटी भी बनाई है के इन सबमें जो पुराने कानूनों को जरा देखरेख में सही कैसे किया जाए। और सच्‍चे अर्थ में जिनके लिए बनाए गए हैं कानून उनको लाभ हो रहा है या नहीं हो रहा। वरना कोई और जगह पर ऐसा कानून बनके बैठा हुआ है जो इसको आगे ही नहीं जाने देता। अब श्रमिक कहां लड़ेगा, कहां जाएगा। वो क्‍या कोर्ट कचहरी में इतने महंगे वकील रखेगा क्‍या। और इसलिए मेरा यहा आग्रह है और मैं ये कोशिश कर रहा हूं कि ये कानूनों का एक बहुत बड़ा जाल हो गया है उसका सरलीकरण हो, गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी अपने हकों को भली भांति समझ पाएं, हकों को प्राप्‍त कर पाएं। ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को हमने विकसित करने की दिशा में हमारा प्रयास है और मेरा विश्‍वास है कि हम उसको कर पाएंगे। मैं कभी-कभी उद्योग जगत के मित्रों से भी कहना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कभी हमारे इस Forum में एक और पहलू पर भी हम सोच सकते हैं क्‍या, क्‍योंकि हमने अपने एजेंडे को बड़ा सीमित कर दिया है। और जब तक उसका दायरा नहीं बढ़ाऐंगे पूरे माहौल में बदलाव नहीं आएगा। कितने उद्योगार हैं जिन्‍होंने अपने उद्योग चलाते-चलाते ऐसा माहौल बनाया, ऐसी व्‍यवस्‍था बनाई कि खुद का ही काम करने वाला एक मजदूर आगे चल करके Entrepreneur बना। कभी ये ऐसे ही तो खोज के निकालना चाहिए क्‍या उद्योगकार का यही काम है क्‍या। क्‍या 18-20 साल की उम्र में उसके यहां आया वो 60 साल का होने के बाद किसी काम का न रहे तब तक उसी के यहां फंसा पड़ा रहे। क्‍या ऐसा माहौल कभी उसने बताया कि हां मेरे यहां मजदूर के यहां पे आया था लेकिन मैंने देखा भई उसमें बहुत बड़ी क्षमता है, टेलैंट है, थोड़ा मैं उसको सहारा दे दूं वो अपने-आप में एक Entrepreneur बन सकता है और मैं ही एक-आध पुर्जा बनाएगा तो मैं खुद खरीद लूंगा जो मेरी फैक्‍टरी के लिए जरूरी है तो एक अच्‍छा Entrepreneur तैयार हो जाएगा।



कभी न कभी हमें सोचना चाहिए हमारे देश में छोटे और मध्‍यम एवं बड़े उद्योगकार कितने हैं कि जो हर वर्ष अपने ही यहां काम करने वाले कितने मजदूरों को उद्योगकार बनाया हो, Entrepreneur बनाया हो, Supplier बनाया हो, कितनों को बनाया कभी ये भी तो हिसाब लगाया जाए। उसी प्रकार से हमने देखा है कि आईटी फर्म, उसके विकास का मूल कारण क्‍या है, IT Firm के विकास का मूल कारण यह है कि उन्‍होंने अपन employee को कहा कि कुछ समय तुम्‍हारा अपना समय है। तुम खुद सॉफ्टवेयर‍ विकसित करो, तुम अपने ‍दिमाग का उपयोग करो और ये motivation के कारण सॉफटेवयर की दुनिया में नई-नई चीजें वो लेकर के आए फिर वो कम्‍पनी की बनी और बाद में जा करके वो बिकी। अवसर दिया गया, हमारे इतने सारे उद्योग चल रहे हैं, मैन्‍युफैक्‍चरिंग का काम करते हैं, कैमिकल एक्टिविटी का काम करते हैं, क्‍या हमने हमारे यहां इस टैलेंट को innovation के लिए अवसर दिया है क्‍या? क्‍या उद्योगकारों को पता है कि जिसको आप अनपढ़ मानते हो, जिसको आप unskilled labour मानते हो, उसके अंदर भी वो ईश्‍वर ने ताकत दी है, वो आपकी फैक्‍टरी में एकाध चीज ऐसी बदल देता है, कि आपके प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी इतनी बढ़ जाती है, बाजार में बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हो जाता है, आप फायदा तो ले लेते हो लेकिन उसके innovation skill को recommend नहीं करते हो। मैं मानता हूं हमारे उद्योगकारों ने अपने जीवन में, सरकारों ने भी और श्रम संगठनों ने भी पूछना चाहिए कि कितने उद्योगकार हैं, कितने उद्योग हैं कि जहां पर इनोवेशन को बल दिया गया है। हर वर्ष कम से कम एक नया इनोवेटेड काम निकलता है क्‍या? हमारे यहां सेना के विशेष दिवस मनाए जाते हैं,आर्मी का, एयरफोर्स का, नेवी का। राष्‍ट्रपति जी, प्रधानमंत्री सब जाते हैं, एट-होम करते हैं वो, तो मैं पिछली बार जब हमारे सेना के लोगों के पास गया तो मैंने उनको कहा भई ठीक है ये आपका चल रहा है कि ये ही चलाते रहोगे क्‍या? हम आते हैं, 30-40 मिनट वहां रुकते हैं, चायपान होता है, फिर चले जाते हैं। मैंने कहा मेरा एक सुझाव है अगर आप कर सकते हो तो, तो बोले क्‍या है सर? मैंने कहा क्‍या फौज में ऐसे छोटे-छोटे लोग हैं क्‍या, सिपाही होंगे, छोटे-छोटे लोग हैं, लेकिन उन्‍होंने काम करते-करते कोई न कोई इनोवेशन किया है जो देश की सुरक्षा के लिए बहुत काम आता है। उसमें नया आइडिया, क्‍योंकि वो फील्‍ड में है, उसे पता रहता है कि इसके बजाय ऐसा करो तो अच्‍छा रहेगा। मैंने ये कहा तो फिर हमारे आर्मी के लोगों ने ढूंढना शुरू किया।

बहुत ही कम समय मिला था लेकिन कोई 12-15 लोगों को ले आए वो और जब उनकी innovations मैंने देखा, मैं हैरान था सेना के काम आनेवाली टेक्‍नोलॉजी के संदर्भ में, कपड़ों के संदर्भ में, इतने बारीक छोटी-छोटी चीजों में उन्‍होंने बदलाव लाकर के बताया था अगर इसको हम मल्‍टीप्‍लाई करें तो सेना के कितना बड़ा काम आएगा और भारत की रक्षा के लिए कितना बड़ा काम आएगा। लेकिन उस आखिरी इन्‍सान की तरफ देखता कौन है जी? उसकी क्षमता को कौन स्‍वीकार करता है? मुझे ये माहौल बदलना है कि मेरे उद्योगकार मित्र बहुत बड़ी डिग्री लेकर आया हुआ व्‍यक्ति ही दुनिया को कुछ देता है ऐसा नहीं है। छोटे से छोटा व्‍यक्ति भी दुनिया को बहुत कुछ दे करके जाता है, सिर्फ हमारी नजरों की तरफ नहीं होता है और इसलिए हम एक कल्‍चर विकसित कर सकते हैं, व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं कि जिसमें उन, और मैं तो चाहता हूं श्रमिक संगठन भी ऐसे लोगों को सम्‍मानित करें, उद्योग भी सम्‍मानित करें और सरकार भी श्रम संसद के समय सामान्‍य मजदूर ने की हुई इनोवेशन जिसने देश का भला किया हो, उसमा सम्‍मान करने का कार्यक्रम करके हम श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़ाएं उस दिशा में हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमें एक नए तरीके से चीजों को कैसे सोचना चाहिए, नई चीजों में कैसे बदलाव लाना चाहिए, उस पर सोचने की आवश्‍यकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर हमेशा मजदूर क्‍यों रहे? उसी प्रकार से कुछ लोग ऐसे होते हैं कि पिताजी एक कारखाने में काम करते हैं, बेटा भी साथ जाना शुरू कर दिया, और वहीं काम करते, करते, करते एकाध चीज सीख लेता है और अपनी गाड़ी चला लेता है। उसके पास ऑफिशियल कोई डिग्री नहीं होती है, कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है और उसके लिए वो हमेशा उस उद्योगकार की कृपा पर जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे बड़ा शोषणा क्‍या हो सकता है कि उसको जो जिसके यहां उसके पिताजी काम करते थे, अब उसको वहीं पर काम करना पड़ रहा है, क्‍यों, क्‍योंकि उसके पास स्किल है लेकिन स्किल को दुनिया के अंदर ले जाने के लिए एक जो सर्टिफिकेट चाहिए वो नहीं है तो कोई घुसने नहीं देता है और वो भी कहीं जाने की हिम्‍मत नहीं करता है, उसको लगता है चलिए ये ही मेरे मां-बाप हैं उन्‍होंने ही मेरे बाप को संभाला था, मुझे भी संभाल लिया, चलिए भई जो दें मैं काम कर लूंगा। इससे बड़ी कोई अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती हमारी। और इसको बदलने का मेरे भीतर एक दर्द बढ़ा था और उसी में से हमने एक योजना बनाई है और मैं मानता हूं ये योजना श्रमिक के जीवन को और मैं नहीं मानता किसी श्रमिक संगठनों ने इस पर ध्‍यान गया होगा। कभी उसने सोचा नहीं होगा कि कोई सरकार श्रमिकों के लिए सोचती है तो कैसे सोचती है? हमने कहा कि जो परम्‍परागत इस प्रकार के शिक्षा पाए बिना ही चीजों को करता है भले ही उसकी उम्र 30 हो, 40 हो गई, 50 हो गई होगी, सरकार ने उसको सर्टिफाई करना चाहिए,official recognition देना चाहिए, official government का सर्टिफिकेट देना चाहिए ताकि उनका confidence लेवल बढ़ेगा, उसका मार्केट वैल्‍यू बढ़ेगा और वो एक उद्योगकार के यहां कभी अपाहिज बन करके जिन्‍दगी नहीं गुजारेगा। हमने officially ये decision लिया है।



कहने का तात्‍पर्य ये है कि हमें इन दिशाओं में सोचने की आवश्‍यकता है। हमें बदलाव करने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं। इसी प्रकार से एक बात की ओर ध्‍यान देने की मैं आवश्‍यकता समझता हूं, इसको कोई गलत अर्थ न निकाले, कोई बुरा न माने। कभी-कभार, जब चर्चा होती है कि उद्योग की भलाई, ये बात ठीक है कि देश की भलाई के लिए उद्योगों का विकास आवश्‍यक है, उद्योग की भलाई और उद्योगपति की भलाई, इसमें बहुत ही बारीक रेखा होती है। देश की भलाई और सरकार की भलाई इसमें बहुत बारीक रेखा होती है। श्रम संगठन की भलाई और श्रमिक की भलाई, बहुत बारीक रेखा होती है। और इसलिए इस बारीक रेखा की नजाकत को कभी-कभार उद्योग बचाना चाहते हैं लेकिन उनमें कभी-कभार हम उद्योगपति को बचा लेते हैं। कभी-कभार हम बात तो कर लेते हैं देश को बचाने की लेकिन कोशिश सरकार को बचाने की करते हैं। और उसी प्रकार से कभी-कभार हम बात श्रमिक की करते हैं लेकिन हम कोशिश हमारे श्रम संगठन की सुरक्षा की करते हैं। हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं, हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं और तीनों ने इस बारीक रेखा की मर्यादाओं को स्‍वीकार करना होगा, letter and spirit को स्‍वीकार करना होगा तब मैं मानता हूं श्रमिक का भी भला होगा, देश के उद्योग के विकास की यात्रा भी चलेगी और देश का भी भला होगा, सरकारों की भलाई के लिए नहीं चलता होगी। और इसलिए इन मूलभूत बातों की ओर हम कैसे मिल-बैठ करके एक सकारात्‍मक माहौल बनाने के भी दस कदम हो सकते हैं, श्रमिक की भलाई के दस कदम हो सकते हैं आवश्‍यक है तो राष्‍ट्र को आगे बढ़ाने की भी दस कदम हो सकते हैं वो भी इसके साथ-साथ आना चाहिए। जब तक हम इन बातों को संतुलित रूप से आगे नहीं ले जाएंगे, तब तक हम माहौल बदलने में सफल नहीं होंगे। और मुझे विश्‍वास है कि आज की श्रम संसद में बैठ करके हम लोग उस माहौल को निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़गे। भारत में 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 साल से कम आयु की है। हमारा देश एक प्रकार से विश्‍व का सबसे नौजवान देश है। आज दुनिया को skilled workforce की आवश्‍यकता है। Skill Development और Skill India ये मिशन हमारे नौजवानों को रोजगार कैसे मिले, अगर हम जो आज रोजगारी में है जो हमारे संगठन के सदस्‍य हैं, उनकी चिन्‍ता कर-करके बैठेंगे तो हो सकता है कि उनके हितों का भी भला हो जाएगा, उनकी रक्षा भी हो जाएगी, दो-चार चीजें हम उनको दिलवा भी देंगे लेकिन यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्ति ऐसी सीमित सोच वाला नहीं है ये मेरा विश्‍वास है। यहां बैठा हुआ हर व्‍यक्ति जो आज श्रमिक है उनकी तो चिन्‍ता करता ही करता है, लेकिन जो नौजवान बेरोजगार हैं जिनको कहीं न कहीं काम मिल जाए, इसकी उसको तलाश है, हमें उनके दरवाजे बंद करने का कोई हम नहीं है। जब तक हम हमारे देश के और नौजवानों कोरोजगार देने के लिए अवसर उपलब्‍ध नहीं कराएंगे तो हम जाने-अनजाने में गरीब का कहीं नुकसान तो नहीं कर देंगे। हो सकता है वो आज गरीब है श्रमिक नहीं बन पाया है, वो दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है और इसीलिए सरकार ने एक initiative लिया है apprenticeship को प्रोत्‍साहन देना। हमें जान करके हैरानी होगी, हम सबको लगता है हमारा देश आगे बढ़ना चाहिए और कभी पीछे रहता है तो हमीं लोग कहते हैं देखो बातें बड़ी करते थे,वो तो वहां पहुंच गया ये यहां रह गया, ये हम करते ही हैं। लेकिन जो पहुंचे हैं, आज चीन के अंदर जो भी साम्‍यवादी विचार से चलने वाले मूलभूत तो लोग हैं। चीन के अंदर दो करोड़ apprenticeship पर लोग काम कर रहे हैं,चीन के अंदर। जापान में एक करोड़ apprenticeship में काम कर रहे हैं। जर्मनी बहुत छोटा देश है, हमारे देश के किसी राज्‍य से भी छोटा देश है वहां पर तीस लाख लोग apprenticeship के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे आज दुख के साथ कहना चाहिए, सवा सौ करोड़ का हिन्‍दुस्‍तान,सिर्फ तीन लाख लोग apprenticeship पर काम कर रहे हैं। मेरे नौजवानों का क्‍या होगा मैं पूछना चाहता हूं।मैं सभी श्रमिक संगठनों से पूछना चाहता हूं कि इन नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए। इन नौजवानों के लिए अवसर खुलने चाहिए कि नहीं खुलने चाहिए। और भारत को आगे बढ़ाना है तो हमारे skill को काम में लाने के लिए ये हमें अवसर देना पड़ेगा। सरकारों ने, उद्योगकारों ने भी सोचना होगा इसलिए कि कानून के दायरे में फंस जाएंगे इसलिए कोई apprenticeship किसी को देनी नहीं, किसी नौजवान को अवसर नहीं देना, ये उद्योगकार जो दरवाजे बंद करके बैठे हैं, मैं नहीं मानता हूं ये लम्‍बे अरसे तक दरवाजे बंद करके बैठ पाएंगे। देश का नौजवान लम्‍बे अरसे तक इन्‍तजार नहीं करेगा। और इसलिए मैं उद्योगकारों को विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि आपका दायित्‍व बनता है, मुनाफा कम होगा, होगा लेकिन अगर इतनी मात्रा में आपके यहां श्रमिक हैं तो इतनी मात्रा में apprenticeship, ये आपकी social responsibility का हिस्‍सा बनना चाहिए। और इस प्रकार से क्‍या हम सपना नहीं दे सकते। दो करोड़ कर न पायें ठीक है, जब कर पाएंगे, कर पाएंगे अभी कम से कम तीन लाख में से 20 लाख apprenticeship पर जा सकते हैं हम क्‍या। कम से कम इतना तो करें। करोड़ों नौजवानों को रोजगार चाहिए, कहीं से तो शुरू करें। और इसलिए मैं चाहूंगा कि जो श्रमिक आज हैं उनकी चिन्‍ता करने वाले लोगों का ये भी दायित्‍व है कि जिनकी श्रमिक बनने की संभावना है उनकी जिन्‍दगी की भीचिन्‍ता उस नौजवान की भी करने की आवश्‍यकता है जो गरीब है। पिछले 16 अक्‍टूबर को हमने श्रमेव जयते के अभियान की शुरुआत की थी। ये सर्वांगीण प्रयास है हमारा। जिन सुविधाओं की शुरुआत हमने की उनकी प्रगति आप सबकी नजर में है। यूनिवर्सल एकाउंट नम्‍बर (यूएएन) इसके माध्‍यम से प्रोविडेंट फंड के एकाउंट पोर्टेबल हो गए हैं बल्कि लगभग 4 करोड़ 67 लाख मजदूरों को digital network platform का already लाभ मिलना शुरू हो गया है। पीएफपी ऑनलाईन लाभ ले रहा है ये चीजें नहीं थीं, इन चीजों का वो लाभ ले रहा है ये ही तो श्रमिक को empower करने के लिए टेक्‍नोलॉजी का सदुपयोग करने का प्रयास किया है। जब हम सरकार में आए हमारे देश में कई लोग ऐसे थे कि जिनको पचास रुपये पेंशन मिलता था, अस्‍सी रुपये पेंशन मिलता था, सौ रुपये पेंशन मिलता था,कुछ लोग तो पेंशन लेने के लिए जाते नहीं थे क्‍योंकि पेंशन से ऑटोरिक्‍शा का खर्चा ज्‍यादा होता था। इस देश में करीब-करीब बीस लाख से अधिक ऐसे श्रमिक थे जिनको पचास रुपया, सौ रुपया, दौ सौ रुपया पेंशन मिलता था। हमने आ करके, बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लगा है, सबके लिए minimum पेंशन एक हजार रुपया कर दिया है। मैं आशा करता हूं कि हमारे श्रमिक संगठन, ये हमारा जो pro-active initiative है उसके प्रति भी उस भाव से देखें ताकि हम सबको मिल करके दौड़ने का आनंद आ जाए,चार नई चीजें करने का उमंग आ जाए क्‍योंकि हमें चलना नहीं है और मुझे मैं मानता हूं, अगर इस देश में इतने सारे प्रधानमंत्री हो गए होंगे लेकिन श्रमिकों पर किसी एक प्रधानमंत्री पर सबसे ज्‍यादा हक है तो मुझ पर। क्‍योंकि मैं उसी बिरादरी से निकल कर आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और इसलिए गरीब के हाल को समझने के लिए मुझे कैमरामैन को लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।मैं उसको भली-भांति समझता हूँ और इसलिए जो बातें मैं बता रहा हूं। भीतर एक आग है, कुछ करना है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, वंचित, दलित, पीड़ित शोषित उनके लिए कुछ करना है। लेकिन हरेक के करने की सोच अलग होगी, रास्‍ते अलग होंगे। हमारी एक अलग सोच है, अलग रास्‍ते है लेकिन लक्ष्‍य यही है कि मेरे देश के मजदूर का भला हो, मेरे देश के गरीब का भला हो, मेरे देश के किसानों का भला हो, ये सपने लेकर के हम चल पड़े हैं। और इसलिए जैसा मैंने कहा हमने apprentice sector में सुधार किया। हमने on the job training के मौके बढ़ गए हैं, उस दिशा में हमने काम किया है। आज हमने हेल्‍थ को सेक्‍टर को ESIC 2.0 स्‍कीम को लांच किया है। हम कभी-कभार ये तो देखते हैं कि भई काम मिलना चाहिए, लेकिन कैसे मिले, मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है। उसके लिए न सरकारों को फुरसत है, न श्रमिक संगठनों को फुरसत है। उनको तो लगता है देखो यार, कागज पर दिखा दे, ये तुमको दिलवा दिया या नहीं दिलवा दिया। वो श्रमिक भी बड़ा खुश है, यार मैं इसका मेम्‍बर बन गया हूं मेरा काम हो गया। मैं इस स्‍थिति को बदलना चाहता हूं। मैं श्रमिक संगठन और सरकार की पाटर्नरशिप से आगे बढ़ना चाहता हूं। कंधे से कंधा मिलाकर के आगे चलना चाहता हूं और अगर हमने ये अस्‍पतालों की व्‍यवस्‍था को बदलने की दिशा में काम किया, अब छोटा निर्णय है कि भई हर दिन चद्दर बदलो। अब मुझे बताइए health की दृष्‍टि से, hygiene की दृष्‍टि से, ये सब जानते हैं कि बदलनी चाहिए और लोग मानते होंगे कि बदलें, लेकिन हमको मालूम है कि लोग नहीं बदलते। ठीक है, आया है patient पड़ा है। आखिरकार मुझे रास्‍ता खोजना पड़ा, मैंने कहा हर दिन की चद्दर का कलर ही अलग होगा, patient को पता चलेगा कि चद्दर बदली कि नहीं बदली। हमारे देश के बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है वो मुझे सवाल करते रहते हैं कि मोदी कुछ बड़ा ले आओ, कुछ बड़ा। बहुत सरकारें बड़ा-बड़ा ले आईं। मुझे तो मेरे गरीब के लिए जीना है, मेरे गरीब के लिए कुछ काम करना है इसलिए मेरा दिमाग इसी में चलता रहता है। यही, यही मैं सोच, और मैं दिल से बातें कर रहा हूं कि ये अन्‍य जो कई चीजें लाए हैं। हम चाहते हैं कि श्रमिक की हेल्‍थ को लेकर के चिन्‍ता होनी चाहिए, होनी चाहिए। और हमने उस दिशा में हमने एक तो उसके सारे हेल्‍थ रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए ताकि अब उसको अपना ब्‍लड टेस्‍ट का क्‍या हुआ, यूरिन टेस्‍ट का क्‍या हुआ, दुनिया भर में चक्‍कर नहीं काटना पड़ेगा। अपने मोबाइल फोन पर सारी चीजें उपलब्‍ध हो जाएं ये व्‍यवस्‍था की है ताकि श्रमिक को सुविधा कैसे हो, हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। और मैं मानता हूं कि उस काम के कारण उसको लाभ होगा।



आज हमारे देश में असंगठित मजदूर कुल मजदूरों का 93 पर्सेंट है। इस सरकार ने असंगठित मजदूरों के संबंध में बहुत ही constructive way में और well planned way में योजनाएं बनाई हैं और हम आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा कैसे मिले। न उसे स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा है, न जीवन बीमा है और न हीं पेंशन है और बड़ी संख्‍या में असंगठित ग्रामीण मजदूर अनपढ़ हैं, जिन्‍हें अपनी बात कहां कहना है, कैसे पहुंचे, इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। ऐसे मजदूर के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में सरकार का उत्‍तरदायित्‍व मानता हूं। देश के गरीब, असंगठित वर्गों को ध्‍यान में रख करके हमने तीन महत्‍वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं । और ये योजनाएं गरीब के लिए हैं। अमीर का उससे कोई लेना-देना नहीं है। और मैं मानता हूं, सभी श्रमिक संगठनों से मैं आग्रह करूंगा कि आप भी इस बात में मदद कीजिए। अगर किसी के घर में, हम कई यहां संगठन है जो असंगठित मजदूरों का काम करते हैं। कुछ लोग हैं जो घरों में बर्तन साफ करने वाले लोग होते हैं, उनका संगठन चलाते हैं। क्‍या हम कोशिश नहीं करे तो उसके मालिकों को मिल करके कहे कि भई आपके यहां ये लड़का कपड़े धोता है, बर्तन साफ करता है या खाना पकाता है या गाड़ी चलाता है। या आपका धोबी है। इसके लिए ये-ये सरकार की स्‍कीम है। आप एक मालिक हो, इसके लिए इतना पैसा बैंक में डालो, उसका जीवन भरा हो जाएगा। मैं मानता हूं हर कोई इसको करेगा। हम मध्‍यम वर्ग के लोगों को भी अगर समझाएंगे कि भई तुम्‍हारे साथ काम करने वाले जो गरीब लोग है उनको इन स्‍कीम का फायदा तुम दो। तुमको कोई महंगा नहीं पड़ने वाला है, तुम्हारे लिए तो एक फाइव स्‍टार होटल का एक खाने से ज्‍यादा का खर्च नहीं है। लेकिन उस गरीब की तो जिन्‍दगी बदल जाएगी और इसलिए हमने अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन जयोति बीमा योजना और मैं बताऊं यानी एक महीने का एक रुपया,12 महीने का 12 रुपया। एक स्‍कीम ऐसी है एक दिन का सिर्फ 80-90 पैसा। साल भर का 330 रुपया। लेकिन उसको जीवन भर उसकी व्‍यवस्‍था मिल सकती है। ये काम उसके मालिक, जिसके वहां वह काम करता है, वो कर सकते हैं और श्रमिक संगठन एक सामाजिक काम के तौर पर इस बात को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार से कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। मुझे लगता है कि इसका उसको फायदा होगा और हमने यह फायदा दिलवाना चाहिए। व्‍यवस्‍थाएं हैं, योजनाएं हैं। अटल पेंशन योजना। अगर आज से उसको जोड़ दिया जाए, समझा दिया जाए उसका तो जीवन धन्‍य हो जाएगा कि भई चलो 60 साल के बाद मुझे ये लाभ मिलेगा। मैं समझता हूं कि हम एक सामाजिक चेतना जगाने का भी काम करें, सामाजिक बदलाव का भी काम करें और उस काम को आगे बढ़ाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत सारी बातें हम कर पाएंगे। कई विषय है जिसको मैं आपके सामने रखता ही चला जाता हूं। लेकिन मुझे विश्‍वास है कि इस श्रम संसद के अंदर जो कुछ भी महत्‍वपूर्ण चर्चाएं हो रही है। हमारे वित्‍त मंत्री और उनकी एक कमेटी बनी है जो उनको सुन रही है। और बातचीत से ही अच्‍छे नतीजे निकलते हैं, सुखद परिणाम निकलेंगे। कल भी मेरी श्रम संगठन के प्रमुख लोगों के साथ मुझे मिलने का अवसर मिला था, उनको सुनने का अवसर मिला था और मैं भली-भांति उनकी बात को, उनकी भावनाओं को समझता हूं। मिल-बांट करके हमें आगे बढ़ना है और हम देश को आगे बढ़ाने में कैसे काम आएं, देश को आर्थिक नई ऊंचाइयों पर कैसे ले जाएं, देश में नौजवानों को अधिकतम रोजगार के अवसर कैसे उपलब्‍ध कराएं।

आज भारत के सामने मौका है विश्‍व के परिदृश्‍य में भारत के सामने मौका है। यह मौका अगर हमने खो दिया तो फिर पता नहीं हमारे हाथ में कब मौका आएगा और उस काम को लेकर आगे बढ़ें इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस श्रम सांसद को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, उत्‍तर परिणाम निकलेंगे इस भरोसे के साथ और साथ मिल करके आगे चलेंगे इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

'মন কি বাত' অনুষ্ঠানের জন্য আপনার আইডিয়া ও পরামর্শ শেয়ার করুন এখনই!
Modi Govt's #7YearsOfSeva
Explore More
আমাদের ‘চলতা হ্যায়’ মানসিকতা ছেড়ে ‘বদল সাকতা হ্যায়’ চিন্তায় উদ্বুদ্ধ হতে হবে: প্রধানমন্ত্রী

জনপ্রিয় ভাষণ

আমাদের ‘চলতা হ্যায়’ মানসিকতা ছেড়ে ‘বদল সাকতা হ্যায়’ চিন্তায় উদ্বুদ্ধ হতে হবে: প্রধানমন্ত্রী
PLI scheme for auto sector to re-energise incumbents, charge up new players

Media Coverage

PLI scheme for auto sector to re-energise incumbents, charge up new players
...

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
গোয়াতে কোভিড টিকার সুবিধাভোগী এবং এইচসিডব্লিউএস-দের সঙ্গে কথোপকথন অনুষ্ঠানে প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ
September 18, 2021
শেয়ার
 
Comments
গোয়ার প্রাপ্তবয়স্ক নাগরিকদের টিকার প্রথম ডোজ ১০০ শতাংশ সম্পূর্ণ হওয়ায় প্রধানমন্ত্রীর প্রশংসা
অনুষ্ঠানে শ্রী মনোহর পারিক্করের কর্মধারাকে স্মরণ করা হয়েছে
‘সবকা সাথ সবকা বিকাশ, সবকা বিশ্বাস ও সবকা প্রয়াস’ – এর যথাযথ ফলফল গোয়া উপস্থাপিত করেছে : প্রধানমন্ত্রী
আমি জীবনে অনেক জন্মদিন পালন করেছি এবং সব জন্মদিনই একই রকম ছিল কিন্তু গতকাল আড়াই কোটি মানুষের টিকা পাওয়ার খবরে আমি আবেগাপ্লুত হয়ে পড়েছি : প্রধানমন্ত্রী
গতকাল প্রতি ঘণ্টায় ১৫ লক্ষেরও বেশি, প্রতি মিনিটে ২৬ হাজারেরও বেশি ও প্রতি সেকেন্ডে ৪২৫টিরও বেশি ডোজ দেওয়া হয়েছে : প্রধানমন্ত্রী
গোয়ার প্রতিটি সাফল্য ‘এক ভারত, শ্রেষ্ঠ ভারত’ – এর ধারণার উদাহরণ হয়ে ওঠায় আমি অত্যন্ত আনন্দিত : প্রধানমন্ত্রী
গোয়া শুধুমাত্র একটি রাজ্যই নয়, গোয়া হল ব্র্যান্ড ইন্ডিয়ার একটি শক্তিশালী অংশীদার : প্রধানমন্ত্রী

গোয়ার প্রাণশক্তিতে ভরপুর জনপ্রিয় মুখ্যমন্ত্রী শ্রী প্রমোদ সাওয়ান্তজি, আমার কেন্দ্রীয় মন্ত্রিসভার সঙ্গী ও গোয়ার সুপুত্র শ্রীপাদ নায়েকজি, ডঃ ভারতীজি, পাওয়ারজি, গোয়া রাজ্যের মন্ত্রীগণ, উপস্থিত সাংসদ ও বিধায়কগণ, অন্যান্য জনপ্রতিনিধি, সমস্ত করোনা যোদ্ধা এবং ভাই ও বোনেরা!

আমার গোয়ার সমস্ত ভাই ও বোনেরা, আপনাদের অভিনন্দন।

আপনাদের সবাইকে শ্রীগণেশ পরবের অনেক অনেক শুভকামনা। আগামীকাল অনন্ত চতুর্দশীর পবিত্র উৎসবে আমরা সবাই গণপতি বাপ্পাকে বিদায় জানাব, হাতে অনন্ত সূত্র বাঁধব। অনন্ত সূত্রের তাৎপর্য হল, এটি জীবনে সুখ-সমৃদ্ধি আনে, দীর্ঘায়ুর আশীর্বাদ বহন করে।

আমি অত্যন্ত আনন্দিত যে এই পবিত্র দিবসের আগে গোয়ার জনগণ নিজেদের হাতে জীবনের রক্ষাসূত্র অর্থাৎ, টিকা নেওয়ার কাজ সম্পূর্ণ করেছেন, গোয়া রাজ্যের প্রত্যেক নাগরিক টিকার একটি ডোজ নিয়ে নিয়েছেন। করোনার বিরুদ্ধে লড়াইয়ে এটা অনেক বড় কথা। সেজন্য সমস্ত গোয়াবাসীকে আমি অনেক অনেক শুভেচ্ছা জানাই।

বন্ধুগণ,

গোয়া একটি এমন রাজ্য যেখানে ভারতের বিবিধতার শক্তি দেখা যায়। পূর্ব এবং পশ্চিমের সংস্কৃতি, আচার-ব্যবহার, খাদ্যাভ্যাস – সব এই রাজ্যে একত্রে দেখা যায়। এই রাজ্যে মহাসমারোহে গণেশ উৎসব যেমন পালিত হয়, দীপাবলিও তেমনই পালিত হয় আর ক্রিস্টমাসের সময় গোয়ার জাঁকজমক আরও বেড়ে যায়। এভাবেই গোয়া তার পরম্পরাকে পালন করে। ‘এক ভারত শ্রেষ্ঠ ভারত’-এর ভাবনাকে ক্রমাগত শক্তিশালী করে তোলা গোয়ার প্রতিটি সাফল্য শুধু আমাকে নয়, গোটা দেশকে আনন্দ দেয়, গর্বে ভরে তোলে।

ভাই ও বোনেরা,

এই গুরুত্বপূর্ণ অনুষ্ঠানে আমার নিজের বন্ধু, প্রকৃত কর্মযোগী স্বর্গীয় মনোহর পররিকরজির কথা মনে পড়া অত্যন্ত স্বাভাবিক। গত ১০০ বছরে মানবতার সবচাইতে বড় বিপর্যয়ের প্রতিরোধে গোয়া যেভাবে লড়াই করেছে, পররিকরজি যদি আজ আমাদের মধ্যে থাকতেন, তাহলে আপনাদের এই সাফল্যের জন্য নিশ্চিতভাবেই তিনি অনেক গর্বিত হতেন।

গোয়া আজ দেশে বিশ্বের সর্ববৃহৎ ও দ্রুততম টিকাকরণ অভিযান ‘সবাইকে টিকা, বিনামূল্যে টিকা’-র সাফল্যে গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করছে। বিগত কয়েক মাসে গোয়া ভারী বৃষ্টিপাত, ঘূর্ণিঝড় ও বন্যার মতো প্রাকৃতিক বিপর্যয়ের বিরুদ্ধেও অত্যন্ত বীরত্বের সঙ্গে লড়াই করেছে। এই প্রাকৃতিক বিপর্যয়ের মধ্যেও প্রমোদ সাওয়ন্তজির নেতৃত্বে আপনারা অত্যন্ত বীরত্বের সঙ্গে লড়াই করেছেন। এই প্রাকৃতিক সমস্যাগুলির মধ্যে করোনা টিকাকরণের গতি বজায় রাখার জন্য সমস্ত করোনা যোদ্ধাদের, স্বাস্থ্যকর্মীদের, টিম গোয়ার প্রত্যেক সদস্যকে অনেক অনেক অভিনন্দন জানাই। এখানে অনেক বন্ধু তাঁদের অভিজ্ঞতার কথা বলেছেন। তা থেকে এটা স্পষ্ট হয়েছে যে এই অভিযান কত কঠিন ছিল। প্রবল খরস্রোতা নদী পেরিয়ে টিকার বাক্স সুরক্ষিত রেখে দূরাদুরান্তে পৌঁছনোর জন্য কর্তব্য-ভাবনা যেমন চাই, সমাজের প্রতি ভক্তিও চাই, আর চাই অপ্রতীম সাহস। আপনাদের সবাই কখনও না থেমে অক্লান্ত পরিশ্রমের সঙ্গে মানবতার সেবা করছেন। আপনাদের এই সেবার কথা সব সময় মনে রাখা হবে।

বন্ধুগণ,

‘সবকা সাথ, সবকা বিকাশ, সবকা বিশ্বাস অউর সবকা প্রয়াস’ – এই মন্ত্রগুলি কত অসাধারণ পরিণাম আনতে পারে তা গোয়া, গোয়ার সরকার, গোয়ার জনগণ, গোয়ার করোনা যোদ্ধারা এবং সামনে থেকে যাঁরা লড়াই করে যাচ্ছেন সেই অগ্রণী কর্মীরা বাস্তবায়িত করে দেখিয়েছেন। সামাজিক এবং ভৌগোলিক সমস্যাগুলি সমাধানের জন্য যে ধরনের সমন্বয় গোয়া দেখিয়েছে, এটা সত্যিই প্রশংসনীয়। সেজন্য প্রমোদজি আপনাকে এবং আপনার টিমকে অনেক অনেক শুভেচ্ছা। রাজধানী থেকে অনেক দূরে থাকা কেনাকোনা মহকুমাতেও রাজ্যের অন্যান্য মহকুমার মতোই দ্রুতগতিতে টিকাকরণ সম্পন্ন হওয়া এই সমন্বয়ের অনেক বড় উদাহরণ।

আমি অত্যন্ত আনন্দিত যে গোয়া তার গতিকে শ্লথ হতে দেয়নি। এই সময় যখন আমরা কথা বলছি, তখন রাজ্যের অনেক জায়গায় দ্বিতীয় ডোজ প্রদানের জন্য টিকা উৎসব চলছে। এরকম সৎ, একনিষ্ঠ প্রচেষ্টার ফলেই সম্পূর্ণ টিকাকরণ অভিযানে গোয়া দেশের অগ্রণী রাজ্যগুলির মধ্যে এগিয়ে রয়েছে। আর এটাও খুব ভালো কথা যে গোয়া শুধু রাজ্যবাসী নয়, গোয়ায় বেড়াতে আসা পর্যটক এবং পরিযায়ী শ্রমিকদেরও টিকা দিচ্ছে।

বন্ধুগণ,

আজ এই সুযোগে আমি দেশের সমস্ত চিকিৎসক, স্বাস্থ্যকর্মী, স্বাস্থ্য প্রশাসনের সঙ্গে যুক্ত মানুষদের প্রশংসা করতে চাই। আপনাদের সকলের প্রচেষ্টাতেই গতকাল ভারতে একদিনে ২.৫ কোটিরও বেশি মানুষের টিকাকরণের রেকর্ড তৈরি হয়েছে। বিশ্বের বড় বড় এবং সমৃদ্ধ ও সামর্থ্যবান দেশগুলিও এরকম করতে পারেনি। গতকাল আমরা দেখছিলাম কিভাবে দেশবাসী কোভিড ড্যাশবোর্ড দেখছিল আর ক্রমবর্ধমান পরিসংখ্যান দেখে উৎসাহে টগবগ করছিল।

গতকাল প্রত্যেক ঘন্টায় গড়ে ১৫ লক্ষেরও বেশি টিকাকরণ হয়েছে। প্রত্যেক মিনিটে ২৬ হাজারেরও বেশি আর প্রত্যেক সেকেন্ডে ৪২৫-এরও বেশি মানুষ টিকা নিয়েছেন। সারা দেশের বিভিন্ন প্রান্তে ১ লক্ষেরও বেশি টিকাকরণ কেন্দ্রে এই টিকা দেওয়া হয়েছে। ভারতের নিজস্ব টিকা, টিকাকরণের জন্য এতবড় নেটওয়ার্ক, দক্ষ মানবসম্পদ – এইসব কিছুই ভারতের সামর্থ্যকে তুলে ধরে।

বন্ধুগণ,

গতকাল আপনাদের যে সাফল্য সেটা সমগ্র বিশ্বে শুধু টিকাকরণের পরিসংখ্যানের ভিত্তিতে নয়, ভারতের কতটা সামর্থ্য আছে তার পরিচয়ও তুলে ধরেছে। সেজন্য প্রত্যেক ভারতবাসীর কর্তব্য এই সাফল্যের জন্য গর্ব করা।

বন্ধুগণ,

আমি আজ একটি মনের কথা বলতে চাই। আমার জীবনে জন্মদিন তো অনেক এসেছে, কিন্তু এইসব বিষয় নিয়ে আমি সবসময়ই নিষ্পৃহ, এসব আড়ম্বর থেকে সবসময় দূরে থাকার চেষ্টা করি। কিন্তু গতকাল এত বছর বয়সে এসে দিনটি আমার জন্য অত্যন্ত আবেগপূর্ণ ছিল। জন্মদিন পালনের অনেক পদ্ধতি থাকে। মানুষ নানাভাবে জন্মদিন পালন করে আর যেভাবেই পালন করুক, জন্মদিন পালন করে কেউ কোনও অন্যায় করে বলে আমি মনে করি না। কিন্তু আপনাদের সকলের প্রচেষ্টায় গতকালকের দিনটি আমার জন্য অনেক বিশেষ হয়ে উঠেছে।

স্বাস্থ্য বিভাগের সকল মানুষ, যাঁরা বিগত ১.৫-২ বছর ধরে দিন-রাত পরিশ্রম করছেন, নিজের জীবনের পরোয়া না করে করোনার বিরুদ্ধে লড়াইয়ে দেশবাসীকে সাহায্য করছেন, তাঁরা গতকাল যেভাবে টিকাকরণের রেকর্ড তৈরি করে দেখিয়েছেন, এটা আমার জন্য অনেক বড় কথা। প্রত্যেকেই এতে অনেক সহযোগিতা করেছে। আপনারা এটাকে সেবার সঙ্গে জুড়েছেন। আপনাদের মনের এই করুণাভাব, এই কর্তব্য পরায়ণতার ফলেই একদিনে ২.৫ কোটি মানুষকে টিকা দেওয়া সম্ভব হয়েছে।

আর আমি মনে করি টিকার প্রত্যেক ডোজ এক একটি জীবন রক্ষায় সাহায্য করে। ২.৫ কোটিরও বেশি মানুষ এত কম সময়ে এত বড় সুরক্ষা কবচ পেয়েছেন যে, এটা আমাকে খুব আনন্দ দিয়েছে। আরও জন্মদিন আসবে, যাবে; কিন্তু গতকালকের এই দিনটা আমার মনকে ছুঁয়ে গেছে, অবিস্মরণীয় করে তুলেছে। আমি সেজন্য দেশের স্বাস্থ্যকর্মীদের যতই ধন্যবাদ জানাই না কেন তা কম হবে। আমি অন্তর থেকে প্রত্যেক দেশবাসীকে প্রণাম জানাই। সবার প্রতি কৃতজ্ঞতা জানাই।

ভাই ও বোনেরা,

ভারতের টিকাকরণ অভিযান নিছকই স্বাস্থ্যের সুরক্ষা কবচ নয়, একভাবে এটা পেশার সুরক্ষা কবচও। ইতিমধ্যেই হিমাচলে প্রথম ডোজের ১০০ শতাংশ হয়ে গেছে। গোয়াতেও ১০০ শতাংশ হয়ে গেছে। চণ্ডীগড় ও লাক্ষাদ্বীপেও প্রত্যেক নাগরিকের প্রথম ডোজ সম্পন্ন হয়েছে। সিকিমেও শীঘ্রই ১০০ শতাংশ হতে চলেছে। আন্দামান-নিকোবর, কেরল, লাদাখ, উত্তরাখণ্ড, দাদরা ও নগর হাভেলিতেও ১০০ শতাংশ হতে বেশিদিন লাগবে না।

বন্ধুগণ,

এটা আমরা অনেকেই শুনেছি যে দেশে পর্যটন উন্নয়ন বাস্তবায়নের জন্য বিখ্যাত রাজ্যগুলি টিকাকরণ অভিযানকে অনেক বেশি অগ্রাধিকার দিয়েছে। আগে আমরা এটা ঘোষণা করিনি, কারণ তাহলে এক্ষেত্রেও অনেকে রাজনীতির গন্ধ পেতেন। কিন্তু এটা অত্যন্ত প্রয়োজনীয় ছিল যে আমাদের পর্যটন গন্তব্যগুলি যত দ্রুত সম্ভব শঙ্কামুক্ত হবে। এখন উত্তরাখণ্ডেও চারধাম যাত্রা সম্পন্ন করা সম্ভব হবে আর এ সকল প্রচেষ্টার মধ্যে গোয়াতে ১০০ শতাংশ টিকাকরণ অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ সাফল্য।

পর্যটন ক্ষেত্রকে পুনরুজ্জীবিত করতে গোয়ার ভূমিকা অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ। আপনারা ভাবুন, হোটেল ইন্ডাস্ট্রি থেকে শুরু করে ট্যাক্সি ড্রাইভার, ফেরিওয়ালা, দোকানদার – সবাই যখন টিকা নিয়েছেন, তখন পর্যটকরা নিজেদের মনে একটা নিরাপত্তার ভাবনা নিয়ে এখানে আসবেন। এভাবে আজ গোয়া আবার বিশ্বের হাতেগোনা কয়েকটি আন্তর্জাতিক পর্যটন গন্তব্যের মধ্যে অন্যতম হয়ে উঠেছে। সেজন্য জনগণ টিকার সুরক্ষা কবচ পেয়েছে।

বন্ধুগণ,

আগামী পর্যটন ঋতুতে এখানে আগের মতোই পর্যটকদের ভিড় হবে। জাতীয় ও আন্তর্জাতিক পর্যটকরা এখানে আনন্দ নিতে আসবেন। এটাই আমাদের সকলের কামনা। এটা তখনই সম্ভব হবে, যখন আমরা করোনা সংক্রান্ত সাবধানতার দিকে ততটাই নজর দেব, যতটা টিকাকরণের দিকে দিয়েছি। সংক্রমণ কমেছে, কিন্তু এখনও আমাদের এই ভাইরাসকে সহজভাবে নেওয়া উচিৎ নয়। নিরাপত্তা এবং পরিচ্ছন্নতাকে যতটা অগ্রাধিকার দেওয়া হবে, তত বেশি সংখ্যক পর্যটক এখানে আসবেন।

বন্ধুগণ,

সম্প্রতি কেন্দ্রীয় সরকার বিদেশি পর্যটকদের উৎসাহ যোগানোর জন্য অনেক পদক্ষেপ নিয়েছে। ৫ লক্ষ পর্যটককে বিনামূল্যে ভিসা দেওয়ার সিদ্ধান্ত নেওয়া হয়েছে। ভ্রমণ ও পর্যটন-সংশ্লিষ্ট সকলকে ১০ লক্ষ টাকা পর্যন্ত ঋণ ১০০ শতাংশ সরকারি গ্যারান্টির মাধ্যমে দেওয়া হচ্ছে। রেজিস্টার্ড ট্যুরিস্ট গাইডরাও ১ লক্ষ টাকা পর্যন্ত ঋণ পাবেন। কেন্দ্রীয় সরকার ভবিষ্যতেও সমস্ত প্রয়োজনীয় পদক্ষেপ নিতে দায়বদ্ধ যা দেশের পর্যটন ক্ষেত্রকে দ্রুতগতিতে এগিয়ে নিয়ে যেতে সহায়ক হবে।

বন্ধুগণ,

গোয়ার পর্যটন ক্ষেত্রকে আকর্ষক করে তোলার জন্য, এখানকার কৃষক, মৎস্যজীবী এবং অন্যান্য সকলের সুবিধার জন্য এই রাজ্যের ডবল ইঞ্জিনের সরকার দ্বিগুণ শক্তি নিয়ে পরিকাঠামো উন্নয়ন করছে। বিশেষ করে, গোয়াতে যোগাযোগ ব্যবস্থার উন্নতির স্বার্থে সব ধরনের সম্ভাব্য পরিকাঠামো গড়ে তোলা হচ্ছে। ‘মোতা’য় নির্মীয়মান গ্রিনফিল্ড এয়ারপোর্ট আগামী কয়েক মাসের মধ্যেই তৈরি হয়ে যাবে। এই এয়ারপোর্টকে জাতীয় মহাসড়কের সঙ্গে যুক্ত করার জন্য প্রায় ১২ হাজার কোটি টাকা বিনিয়োগে ছয় লেনবিশিষ্ট একটি আধুনিক সংযোগ রক্ষাকারী মহাসড়ক গড়ে তোলা হচ্ছে। কেবল জাতীয় মহাসড়ক নির্মাণ খাতেই বিগত বছরগুলিতে গোয়ায় কয়েক হাজার কোটি টাকা বিনিয়োগ করা হয়েছে।

এটা অত্যন্ত আনন্দের বিষয় যে নর্থ গোয়াকে সাউথ গোয়ার সঙ্গে যুক্ত করার জন্য ‘ঝুড়ি ব্রিজ’-এর উদ্বোধনও আগামী কয়েক মাসের মধ্যেই হতে চলেছে। আর আপনারা জানেন যে এই সেতু পানাজিকে মার্গো-র সঙ্গে যুক্ত করবে। আমাকে বলা হয়েছে যে, গোয়া মুক্তি সংগ্রামের অসাধারণ কাহিনীর সাক্ষী আগৌড়া দুর্গও দ্রুত জনগণের জন্য আবার খুলে দেওয়া হবে।

ভাই ও বোনেরা,

গোয়ার উন্নয়নের যে ঐতিহ্য মনোহর পররিকরজি রেখে গেছেন তাকে আমার বন্ধু ডঃ প্রমোদজি এবং তাঁর টিম পূর্ণ নিষ্ঠার সঙ্গে এগিয়ে নিয়ে যাচ্ছে। স্বাধীনতার অমৃতকালে যখন দেশ আত্মনির্ভরতার নতুন সঙ্কল্প নিয়ে এগিয়ে চলেছে, তখন গোয়াও স্বয়ংসম্পূর্ণ গোয়া হয়ে ওঠার সঙ্কল্প নিয়েছে। আমাকে বলা হয়েছে যে, আত্মনির্ভর ভারত, স্বয়ংসম্পূর্ণ গোয়ার এই সঙ্কল্পের মাধ্যমে গোয়ায় ৫০টিরও বেশি ক্ষেত্রে নির্মাণকার্য শুরু হয়েছে। এ থেকে স্পষ্টভাবে বোঝা যায় যে গোয়া জাতীয় লক্ষ্য প্রাপ্তির জন্য, যুব সম্প্রদায়ের কর্মসংস্থানের নতুন সুযোগ গড়ে তোলার জন্য কতটা ঐকান্তিকতা নিয়ে কাজ করে চলেছে।

বন্ধুগণ,

আজ গোয়া শুধুই কোভিড টিকাকরণে অগ্রণী ভূমিকা পালন করছে না, উন্নয়নের ক্ষেত্রেও দেশের অগ্রণী রাজ্যগুলির অন্যতম হয়ে উঠেছে। গোয়ার গ্রামীণ এবং শহুরে অঞ্চল খোলা জায়গায় শৌচ থেকে সম্পূর্ণ মুক্ত হয়েছে। বিদ্যুৎ এবং জলের মতো প্রাথমিক সুবিধাগুলি সুনিশ্চিত করতে গোয়ায় খুব ভালো কাজ হচ্ছে। গোয়া দেশের মধ্যে এমন একটি রাজ্যে যেখানে ১০০ শতাংশ বৈদ্যুতিকীকরণ হয়েছে। প্রত্যেক বাড়িতে নলের মাধ্যমে জল পৌঁছে দেওয়ার ক্ষেত্রেও গোয়ায় অসাধারণ সাফল্য এসেছে। বিশেষ করে গ্রামীণ ক্ষেত্রে এই সাফল্য অত্যন্ত প্রশংসনীয়। জল জীবন মিশনের মাধ্যমে বিগত দু’বছরে দেশে প্রায় ৫ কোটি পরিবারকে নলের মাধ্যমে জলের সুবিধাসম্পন্ন করে তুলেছে। এই অভিযানকে গোয়া যেভাবে এগিয়ে নিয়ে চলেছে, ‘গুড গভর্ন্যান্স’ এবং ‘ইজ অফ লিভিং’ নিয়ে গোয়া সরকারের অগ্রাধিকারকে স্পষ্টভাবে তুলে ধরে।

ভাই ও বোনেরা,

করোনাকালের মধ্যেও গোয়া সরকার সুশাসন নিয়ে এই দায়বদ্ধতা দেখিয়েছে। সব ধরনের প্রতিকূলতা থাকা সত্ত্বেও কেন্দ্রীয় সরকার গোয়াকে যত ধরনের সহায়তা পাঠিয়েছে তা দ্রুতগতিতে কোনরকম বৈষম্য না করে প্রত্যেক সুবিধাভোগীর কাছে পৌঁছে দেওয়ার কাজ গোয়ার টিম সাফল্যের সঙ্গে করেছে। প্রত্যেক গরীব, কৃষক, মৎস্যজীবী বন্ধুর কাছে সাহায্য পৌঁছে দিতে কোনও চেষ্টার ত্রুটি রাখেনি। মাসের পর মাস ধরে গোয়ার গরীব পরিবারগুলিতে সততার সঙ্গে বিনামূল্যে রেশন পৌঁছে দেওয়া হচ্ছে। গোয়ার অনেক বোনেদের এই কঠিন সময়ে বিনামূল্যে গ্যাস সিলিন্ডার পৌঁছে দেওয়া হয়েছে।

গোয়ার কৃষক পরিবারগুলি পিএম কিষাণ সম্মান নিধির কয়েক কোটি টাকা সরাসরি ব্যাঙ্ক অ্যাকাউন্টে পেয়েছেন। করোনাকালেই এখানে ছোট ছোট কৃষকদের মিশন মোডে কিষাণ ক্রেডিট কার্ড দেওয়া হয়েছে। শুধু তাই নয়, গোয়ার পশুপালক ও মৎস্যজীবীরা প্রথমবার বিপুল সংখ্যায় কিষাণ ক্রেডিট কার্ডের সুবিধা পেয়েছেন। পিএম স্বনিধি যোজনার মাধ্যমেও গোয়াতে ঠেলাওয়ালা এবং রেললাইনের দু’ধারে পসরা সাজানো হকারদের দ্রুতগতিতে ঋণ দেওয়ার কাজ চলছে। এই সকল প্রচেষ্টার ফলে গোয়ার জনগণ বন্যার সময়েও অনেক সাহায্য পেয়েছেন।

বন্ধুগণ,

গোয়া অসীম সম্ভাবনার রাজ্য। শুধু রাজ্য নয়, ব্র্যান্ড ইন্ডিয়ার একটি উজ্জ্বল পরিচয় তুলে ধরে। এটা আমাদের সকলের দায়িত্ব যে গোয়ার এই ভূমিকাকে আমরা আরও সম্প্রসারিত করব। গোয়াতে আজ যত ভালো কাজ হচ্ছে, সেগুলি যেন নিরন্তর জারি থাকে তা সুনিশ্চিত করা অত্যন্ত প্রয়োজনীয়। দীর্ঘকাল পর গোয়া রাজনৈতিক স্থিরতা এবং সুশাসনের মাধ্যমে উপকৃত হচ্ছে।

উন্নয়নের এই ধারা গোয়ার জনগণ যাতে এভাবেই বজায় রাখেন, সেই কামনা নিয়ে আপনাদের সবাইকে আরেকবার অনেক অনেক শুভেচ্ছা, প্রমোদজি এবং তাঁর গোটা টিমকে অনেক অনেক শুভেচ্ছা।

ঈশ্বর আপনাদের সকলের মঙ্গল করুন।

ধন্যবাদ!