PM Modi speaks at the 46th Indian Labour Conference
The country cannot be happy, if the worker is unhappy. As a society, we need to respect the Dignity of Labour: PM
If we want to move ahead, we need to give opportunities to our youth. Giving opportunities to apprentices is the need for the hour: PM Modi

केंद्र और राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न सरकारों के प्रतिनिधि बंधु गण,

ये भारत की श्रम-संसद है और एक लंबे अरसे से हमारे देश में त्रिपक्षीय वार्ता का सिलसिला चला है। एक प्रकार से ये त्रिपक्षीय वार्ता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ये अपने आप में एक उज्‍ज्‍वल इतिहास है कि 75 साल का हमारे पास एक गहरा अनुभव है। उद्योग जगत सरकार एवं श्रम संगठन गत 75 वर्ष से लगातार बैठ करके विचार-विमर्श करके मत भिन्‍नताओं के बीच भी मंथन करके अमृत निकालने का प्रयास करते रहे हैं। और उसी संजीवनी से देश को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और उसी कड़ी में आज यह श्रम संसद हो रहा है। हम सबके लिए प्रेरणा की बात है कि यह वो समारोह है जहां कभी बाबा साहेब अंबेडकर का मार्ग दर्शन मिला था। यह वो समारोह है जिसे कभी भारत के भूत-पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमान वीवी गिरि जी का मार्ग दर्शन मिला था। अनेक महानुभावों के पद चिन्‍हों पर चलते-चलते आज हम यहां पहुंचे हैं। समय का अपना एक प्रभाव होता है। आज से 70-75 साल पहले जिन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होती थी वो आज जरूरत नहीं होगी और आज जिन बिंदुओं पर विचार करने की आवश्‍यकता है हो सकता है 25 साल बाद वह भी काल बाह्य हो जाए, क्‍योंकि एक जीवंत व्‍यवस्‍था का यह लक्षण होता है, नित्‍य नूतन, नित्‍य परिवर्तनशील और अच्‍छे लक्षण की पूर्ति के लिए एकत्र होकर आगे बढ़ना है। इस बात में कोई दुविधा नहीं है। इस बात में कोई मत-मतांतर नहीं है कि राष्‍ट्र के निर्माण में श्रमिक का कितना बड़ा योगदान होता है, चाहे वो किसान हो मजदूर हो, वो unorganized लेबर का हिस्‍सा हो, और हमारे यहां तो सदियों से इन सबको एक शब्‍द से जाना जाता है- विश्‍वकर्मा। विश्‍वकर्मा के रूप में जिसको जाना जाता है, माना जाता है और इसलिए अगर श्रमिक रहेगा दुखी , तो देश कैसे होगा सुखी? और मैं नहीं मानता हूं कि इन मूलभूत बातों में हममें से किसी में कोई मतभेद है। मैं श्रम को एक महायज्ञ मानता हूं जिसमें कोटि अवधि लोग अपनी आहूति देते हैं। सिर्फ श्रम की नहीं, कभी-कभार तो सपनों की भी आहूति देते हैं और तब जा करके किसी ओर के सपने संजोए जा सकते हैं। अगर एक श्रमिक अपने सपनों को आहूत न करता तो किसी दूसरे के सपने कभी संजोए नहीं जा सकते। इतना बड़ा योगदान समाज के इस तबके का है और इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करते हुए हमने आगे किस दिशा में जाना है उस पर हमें आगे सोचना होगा। जब तक श्रमिक, मालिक- उनके बीच परिवार भाव पैदा नहीं होता है, अपनेपन का भाव पैदा नहीं होता है। मालिक अगर यह सोचता है कि वो किसी का पेट भरता है और श्रमिक यह सोचता है कि मेरे पसीने से ही तुम्‍हारी दुनिया चलती है तो मैं नहीं समझता कि कारोबार ठीक से चलेगा। लेकिन अगर परिवार भाव हो, एक श्रमिक का दुख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फैक्‍टरी का हुआ कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता | और यह जिम्‍मेवारी जब हम निभाएंगे तब जाकर के, मैं तो चाहूंगा कभी यह भी सोचा जा सकता है क्‍या। इन सारी चर्चाओं का कभी वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन होने की आवश्‍यकता है। ऐसे बड़े उद्योग और ऐसे छोटे उद्योग या मध्‍यम दर्जे के उद्योग 50 साल पुराने है, लेकिन कभी हड़ताल नहीं हुई है क्‍या कारण होगा। उसको चलाने वाले लोगों की सोच क्‍या रही होगी। उन्‍होंने उनके साथ किस प्रकार से नाता जोड़ा है, क्‍या हम आज नए उद्योगकारों को, establish उद्योगकारों को , उनको यह नमूना दिखा सकते हैं कि हमारे सामने, हमारे ही देश में, इसी धरती में ये 50 उद्योग ऐसे हैं जो 50 साल से चल रहे हैं। हजारों की तादाद में श्रमिक है। लेकिन न कभी संघर्ष हुआ है, न कभी हड़ताल हुई है, न उनकी कोई शिकायत, न इनकी कोई शिकायत। एक मंगलम माहौल जिन-जिन इकाईयों में है, कभी उनको छांटकर निकालना चाहिए और उस मंगलम का कारण क्‍या है, इस मंगल अवस्‍था को प्राप्‍त करने के उनके तौर तरीके क्‍या है। अगर इन चीजों को हम श्रमिकों के सामने ले जाएंगे, इन चीजों को हम उद्योगकारों के सामने ले जाएंगे तो उनको भली-भांति समझा सकते हैं और मंगलम का माहौल जहां होगा, वहां यह भी नजर आया होगा कि सिर्फ श्रमिक का असंतोष है, ऐसा नहीं है। वहां यह भी ध्‍यान में आया होगा कि उस उद्योग का विकास भी उतना ही हुआ होगा और उन श्रमिकों का विकास भी उतना ही हुआ होगा। जब तक हम इस भावनात्‍मक अवस्‍था को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास नहीं करते और जो सफल गाथाएं हैं और उन सफल गाथाओं को हम उजागर नहीं करते, मैं नहीं मानता हूं कि हम सिर्फ कानूनों के द्वारा बंधनों को लगाते-लगाते समस्‍याओं का समाधान कर पाएंगे। हां, कानून उनके लिए जरूरी है कि जो किसी चीज को मानने को तैयार नहीं होते, श्रमिक को इंसान भी मानने को तैयार नहीं होते। उनकी सुख-सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उसकी minimum आवश्‍यकताओं की ओर भी देखने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को कानूनों की उतनी ही जरूरत होती है और इसलिए हम इस व्‍यवस्‍था को उस रूप में समझकर चलाएं। एक सामाजिक दृष्‍टि से भी हमारे यहां सोचने की बहुत आवश्‍यकता है। किसी न किसी कारण से हमारे भीतर एक बहुत बड़ी बुराई पनप गई है। हमारी सोच का हिस्‍सा बन गई है। हर चीज को देखने के हमारे तरीके की आदत सा बन गयी है और वो है हम कभी भी श्रम करने वाले के प्रति आदर के भाव से देखते ही नहीं। कोई बढ़िया कपड़े पहन करके हमारे दरवाजे की घंटी बजाए, दोपहर दो बजे हम आराम से सोए हों, कोट-पैंट सूट पहनकर आए और घंटी बजाए तो नींद खराब होगी ही होगी, दरवाजा खोलेंगे और जैसे ही उसको देखेंगे तो कहेंगे आइए आइए कहां से आए हैं, क्‍या काम था, बैठिए-बैठिए। और कोई ऑटो रिक्‍शा वाले ने घंटी बजाई, पता नहीं चलता है दोपहर दो बजे हम सोते हैं, इस समय घंटी बजा दी। क्‍यों भई यह फर्क क्‍यों?



यह जो हमारी सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी कमी आई है सदियों के कारण आई हुई है। लेकिन कभी न कभी dignity of labour , श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक का सम्‍मान ये समाज के नाते अगर हम स्‍वभाव नहीं बनाएंगे तो हम हमारे श्रमिकों के प्रति जो कि उसके बिना हमारी जिन्‍दगी नहीं है, अगर कोई धोबी बढ़िया सा iron नहीं करता तो मैं कुर्ता पहनकर कहां से आता यहां और इसलिए जिनके भरोसे हमारी जिन्‍दगी है उनके प्रति सम्‍मान का भाव यह सामाजिक चरित्र कैसे पैदा हो, उसके लिए हम किस प्रकार से व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करे। हमारे बच्‍चों की पाठ्य पुस्‍तकों में उस प्रकार के syllabus कैसे आए ताकि सहज रूप से आनी वाली पीढ़ियां हमारे श्रमिक के प्रति सम्‍मान के भाव से देखने लगे। आप देखिए माहौल अपने आप बदलना शुरू हो जाएगा। हमारी सरकार को सेवा करने का अवसर मिला है, श्रम संगठनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है और त्रिपक्षीय बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं। कई पुरानी-पुरानी गुत्‍थियां हैं, सुलझानी है और मुझे विश्‍वास है कि देश के श्रमिकों के आशीर्वाद से इन गुत्‍थियों को सुलझाने में हम सफल होंगे और समस्‍याओं का समाधान करने में हम कोई न कोई रास्‍ते खोजते चलेंगे। और सहमति से कानूनों का भी परिवर्तन करना होगा। कानूनों में कोई कुछ जोड़ना होगा, कुछ निकालना होगा वो भी सहमति से करने का प्रयास, प्रयास करते ही रहना चाहिए और निरंतर प्रक्रिया चलती रही है, आगे भी चलती रहने वाली है। कोई भी सरकार आए, ये कोई आखिरी कार्यक्रम कभी होता नहीं है और इसलिए मैं समझता हूं कि इस प्रक्रिया का अपना महत्‍व है। मेरा विश्‍वास रहा है- ‘minimum government , maximum governance’ और इसलिए ये जो कानूनों के ढेर हैं कानूनों का ऐसा कहीं खो जाए इन्‍सान। पता नहीं इतने कानून बनाये कर रखे हुए और हरेक को अपने फायदे वाला कानून ढूंढ सकते हैं ऐसी स्थिति है। हर कोई उद्योगकार एक ही कानून में से उद्योगकार को अपने मतलब का कानून निकलाना है तो वो भी निकाल सकता है सामाजिक संगठन को निकालना है तो वो भी निकाल सकता है, सरकार को निकालना है तो वो भी निकाल सकती है। क्‍योंकि टुकड़ों में सब चीजें चलती रही हैं | जब तक हम एक एकत्रित भाव से, composite भाव से, हमें जाना कहां है उसको ले करके , और इसीलिए मैंने एक कमेटी भी बनाई है के इन सबमें जो पुराने कानूनों को जरा देखरेख में सही कैसे किया जाए। और सच्‍चे अर्थ में जिनके लिए बनाए गए हैं कानून उनको लाभ हो रहा है या नहीं हो रहा। वरना कोई और जगह पर ऐसा कानून बनके बैठा हुआ है जो इसको आगे ही नहीं जाने देता। अब श्रमिक कहां लड़ेगा, कहां जाएगा। वो क्‍या कोर्ट कचहरी में इतने महंगे वकील रखेगा क्‍या। और इसलिए मेरा यहा आग्रह है और मैं ये कोशिश कर रहा हूं कि ये कानूनों का एक बहुत बड़ा जाल हो गया है उसका सरलीकरण हो, गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी अपने हकों को भली भांति समझ पाएं, हकों को प्राप्‍त कर पाएं। ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को हमने विकसित करने की दिशा में हमारा प्रयास है और मेरा विश्‍वास है कि हम उसको कर पाएंगे। मैं कभी-कभी उद्योग जगत के मित्रों से भी कहना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कभी हमारे इस Forum में एक और पहलू पर भी हम सोच सकते हैं क्‍या, क्‍योंकि हमने अपने एजेंडे को बड़ा सीमित कर दिया है। और जब तक उसका दायरा नहीं बढ़ाऐंगे पूरे माहौल में बदलाव नहीं आएगा। कितने उद्योगार हैं जिन्‍होंने अपने उद्योग चलाते-चलाते ऐसा माहौल बनाया, ऐसी व्‍यवस्‍था बनाई कि खुद का ही काम करने वाला एक मजदूर आगे चल करके Entrepreneur बना। कभी ये ऐसे ही तो खोज के निकालना चाहिए क्‍या उद्योगकार का यही काम है क्‍या। क्‍या 18-20 साल की उम्र में उसके यहां आया वो 60 साल का होने के बाद किसी काम का न रहे तब तक उसी के यहां फंसा पड़ा रहे। क्‍या ऐसा माहौल कभी उसने बताया कि हां मेरे यहां मजदूर के यहां पे आया था लेकिन मैंने देखा भई उसमें बहुत बड़ी क्षमता है, टेलैंट है, थोड़ा मैं उसको सहारा दे दूं वो अपने-आप में एक Entrepreneur बन सकता है और मैं ही एक-आध पुर्जा बनाएगा तो मैं खुद खरीद लूंगा जो मेरी फैक्‍टरी के लिए जरूरी है तो एक अच्‍छा Entrepreneur तैयार हो जाएगा।



कभी न कभी हमें सोचना चाहिए हमारे देश में छोटे और मध्‍यम एवं बड़े उद्योगकार कितने हैं कि जो हर वर्ष अपने ही यहां काम करने वाले कितने मजदूरों को उद्योगकार बनाया हो, Entrepreneur बनाया हो, Supplier बनाया हो, कितनों को बनाया कभी ये भी तो हिसाब लगाया जाए। उसी प्रकार से हमने देखा है कि आईटी फर्म, उसके विकास का मूल कारण क्‍या है, IT Firm के विकास का मूल कारण यह है कि उन्‍होंने अपन employee को कहा कि कुछ समय तुम्‍हारा अपना समय है। तुम खुद सॉफ्टवेयर‍ विकसित करो, तुम अपने ‍दिमाग का उपयोग करो और ये motivation के कारण सॉफटेवयर की दुनिया में नई-नई चीजें वो लेकर के आए फिर वो कम्‍पनी की बनी और बाद में जा करके वो बिकी। अवसर दिया गया, हमारे इतने सारे उद्योग चल रहे हैं, मैन्‍युफैक्‍चरिंग का काम करते हैं, कैमिकल एक्टिविटी का काम करते हैं, क्‍या हमने हमारे यहां इस टैलेंट को innovation के लिए अवसर दिया है क्‍या? क्‍या उद्योगकारों को पता है कि जिसको आप अनपढ़ मानते हो, जिसको आप unskilled labour मानते हो, उसके अंदर भी वो ईश्‍वर ने ताकत दी है, वो आपकी फैक्‍टरी में एकाध चीज ऐसी बदल देता है, कि आपके प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी इतनी बढ़ जाती है, बाजार में बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हो जाता है, आप फायदा तो ले लेते हो लेकिन उसके innovation skill को recommend नहीं करते हो। मैं मानता हूं हमारे उद्योगकारों ने अपने जीवन में, सरकारों ने भी और श्रम संगठनों ने भी पूछना चाहिए कि कितने उद्योगकार हैं, कितने उद्योग हैं कि जहां पर इनोवेशन को बल दिया गया है। हर वर्ष कम से कम एक नया इनोवेटेड काम निकलता है क्‍या? हमारे यहां सेना के विशेष दिवस मनाए जाते हैं,आर्मी का, एयरफोर्स का, नेवी का। राष्‍ट्रपति जी, प्रधानमंत्री सब जाते हैं, एट-होम करते हैं वो, तो मैं पिछली बार जब हमारे सेना के लोगों के पास गया तो मैंने उनको कहा भई ठीक है ये आपका चल रहा है कि ये ही चलाते रहोगे क्‍या? हम आते हैं, 30-40 मिनट वहां रुकते हैं, चायपान होता है, फिर चले जाते हैं। मैंने कहा मेरा एक सुझाव है अगर आप कर सकते हो तो, तो बोले क्‍या है सर? मैंने कहा क्‍या फौज में ऐसे छोटे-छोटे लोग हैं क्‍या, सिपाही होंगे, छोटे-छोटे लोग हैं, लेकिन उन्‍होंने काम करते-करते कोई न कोई इनोवेशन किया है जो देश की सुरक्षा के लिए बहुत काम आता है। उसमें नया आइडिया, क्‍योंकि वो फील्‍ड में है, उसे पता रहता है कि इसके बजाय ऐसा करो तो अच्‍छा रहेगा। मैंने ये कहा तो फिर हमारे आर्मी के लोगों ने ढूंढना शुरू किया।

बहुत ही कम समय मिला था लेकिन कोई 12-15 लोगों को ले आए वो और जब उनकी innovations मैंने देखा, मैं हैरान था सेना के काम आनेवाली टेक्‍नोलॉजी के संदर्भ में, कपड़ों के संदर्भ में, इतने बारीक छोटी-छोटी चीजों में उन्‍होंने बदलाव लाकर के बताया था अगर इसको हम मल्‍टीप्‍लाई करें तो सेना के कितना बड़ा काम आएगा और भारत की रक्षा के लिए कितना बड़ा काम आएगा। लेकिन उस आखिरी इन्‍सान की तरफ देखता कौन है जी? उसकी क्षमता को कौन स्‍वीकार करता है? मुझे ये माहौल बदलना है कि मेरे उद्योगकार मित्र बहुत बड़ी डिग्री लेकर आया हुआ व्‍यक्ति ही दुनिया को कुछ देता है ऐसा नहीं है। छोटे से छोटा व्‍यक्ति भी दुनिया को बहुत कुछ दे करके जाता है, सिर्फ हमारी नजरों की तरफ नहीं होता है और इसलिए हम एक कल्‍चर विकसित कर सकते हैं, व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं कि जिसमें उन, और मैं तो चाहता हूं श्रमिक संगठन भी ऐसे लोगों को सम्‍मानित करें, उद्योग भी सम्‍मानित करें और सरकार भी श्रम संसद के समय सामान्‍य मजदूर ने की हुई इनोवेशन जिसने देश का भला किया हो, उसमा सम्‍मान करने का कार्यक्रम करके हम श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़ाएं उस दिशा में हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमें एक नए तरीके से चीजों को कैसे सोचना चाहिए, नई चीजों में कैसे बदलाव लाना चाहिए, उस पर सोचने की आवश्‍यकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर हमेशा मजदूर क्‍यों रहे? उसी प्रकार से कुछ लोग ऐसे होते हैं कि पिताजी एक कारखाने में काम करते हैं, बेटा भी साथ जाना शुरू कर दिया, और वहीं काम करते, करते, करते एकाध चीज सीख लेता है और अपनी गाड़ी चला लेता है। उसके पास ऑफिशियल कोई डिग्री नहीं होती है, कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है और उसके लिए वो हमेशा उस उद्योगकार की कृपा पर जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे बड़ा शोषणा क्‍या हो सकता है कि उसको जो जिसके यहां उसके पिताजी काम करते थे, अब उसको वहीं पर काम करना पड़ रहा है, क्‍यों, क्‍योंकि उसके पास स्किल है लेकिन स्किल को दुनिया के अंदर ले जाने के लिए एक जो सर्टिफिकेट चाहिए वो नहीं है तो कोई घुसने नहीं देता है और वो भी कहीं जाने की हिम्‍मत नहीं करता है, उसको लगता है चलिए ये ही मेरे मां-बाप हैं उन्‍होंने ही मेरे बाप को संभाला था, मुझे भी संभाल लिया, चलिए भई जो दें मैं काम कर लूंगा। इससे बड़ी कोई अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती हमारी। और इसको बदलने का मेरे भीतर एक दर्द बढ़ा था और उसी में से हमने एक योजना बनाई है और मैं मानता हूं ये योजना श्रमिक के जीवन को और मैं नहीं मानता किसी श्रमिक संगठनों ने इस पर ध्‍यान गया होगा। कभी उसने सोचा नहीं होगा कि कोई सरकार श्रमिकों के लिए सोचती है तो कैसे सोचती है? हमने कहा कि जो परम्‍परागत इस प्रकार के शिक्षा पाए बिना ही चीजों को करता है भले ही उसकी उम्र 30 हो, 40 हो गई, 50 हो गई होगी, सरकार ने उसको सर्टिफाई करना चाहिए,official recognition देना चाहिए, official government का सर्टिफिकेट देना चाहिए ताकि उनका confidence लेवल बढ़ेगा, उसका मार्केट वैल्‍यू बढ़ेगा और वो एक उद्योगकार के यहां कभी अपाहिज बन करके जिन्‍दगी नहीं गुजारेगा। हमने officially ये decision लिया है।



कहने का तात्‍पर्य ये है कि हमें इन दिशाओं में सोचने की आवश्‍यकता है। हमें बदलाव करने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं। इसी प्रकार से एक बात की ओर ध्‍यान देने की मैं आवश्‍यकता समझता हूं, इसको कोई गलत अर्थ न निकाले, कोई बुरा न माने। कभी-कभार, जब चर्चा होती है कि उद्योग की भलाई, ये बात ठीक है कि देश की भलाई के लिए उद्योगों का विकास आवश्‍यक है, उद्योग की भलाई और उद्योगपति की भलाई, इसमें बहुत ही बारीक रेखा होती है। देश की भलाई और सरकार की भलाई इसमें बहुत बारीक रेखा होती है। श्रम संगठन की भलाई और श्रमिक की भलाई, बहुत बारीक रेखा होती है। और इसलिए इस बारीक रेखा की नजाकत को कभी-कभार उद्योग बचाना चाहते हैं लेकिन उनमें कभी-कभार हम उद्योगपति को बचा लेते हैं। कभी-कभार हम बात तो कर लेते हैं देश को बचाने की लेकिन कोशिश सरकार को बचाने की करते हैं। और उसी प्रकार से कभी-कभार हम बात श्रमिक की करते हैं लेकिन हम कोशिश हमारे श्रम संगठन की सुरक्षा की करते हैं। हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं, हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं और तीनों ने इस बारीक रेखा की मर्यादाओं को स्‍वीकार करना होगा, letter and spirit को स्‍वीकार करना होगा तब मैं मानता हूं श्रमिक का भी भला होगा, देश के उद्योग के विकास की यात्रा भी चलेगी और देश का भी भला होगा, सरकारों की भलाई के लिए नहीं चलता होगी। और इसलिए इन मूलभूत बातों की ओर हम कैसे मिल-बैठ करके एक सकारात्‍मक माहौल बनाने के भी दस कदम हो सकते हैं, श्रमिक की भलाई के दस कदम हो सकते हैं आवश्‍यक है तो राष्‍ट्र को आगे बढ़ाने की भी दस कदम हो सकते हैं वो भी इसके साथ-साथ आना चाहिए। जब तक हम इन बातों को संतुलित रूप से आगे नहीं ले जाएंगे, तब तक हम माहौल बदलने में सफल नहीं होंगे। और मुझे विश्‍वास है कि आज की श्रम संसद में बैठ करके हम लोग उस माहौल को निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़गे। भारत में 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 साल से कम आयु की है। हमारा देश एक प्रकार से विश्‍व का सबसे नौजवान देश है। आज दुनिया को skilled workforce की आवश्‍यकता है। Skill Development और Skill India ये मिशन हमारे नौजवानों को रोजगार कैसे मिले, अगर हम जो आज रोजगारी में है जो हमारे संगठन के सदस्‍य हैं, उनकी चिन्‍ता कर-करके बैठेंगे तो हो सकता है कि उनके हितों का भी भला हो जाएगा, उनकी रक्षा भी हो जाएगी, दो-चार चीजें हम उनको दिलवा भी देंगे लेकिन यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्ति ऐसी सीमित सोच वाला नहीं है ये मेरा विश्‍वास है। यहां बैठा हुआ हर व्‍यक्ति जो आज श्रमिक है उनकी तो चिन्‍ता करता ही करता है, लेकिन जो नौजवान बेरोजगार हैं जिनको कहीं न कहीं काम मिल जाए, इसकी उसको तलाश है, हमें उनके दरवाजे बंद करने का कोई हम नहीं है। जब तक हम हमारे देश के और नौजवानों कोरोजगार देने के लिए अवसर उपलब्‍ध नहीं कराएंगे तो हम जाने-अनजाने में गरीब का कहीं नुकसान तो नहीं कर देंगे। हो सकता है वो आज गरीब है श्रमिक नहीं बन पाया है, वो दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है और इसीलिए सरकार ने एक initiative लिया है apprenticeship को प्रोत्‍साहन देना। हमें जान करके हैरानी होगी, हम सबको लगता है हमारा देश आगे बढ़ना चाहिए और कभी पीछे रहता है तो हमीं लोग कहते हैं देखो बातें बड़ी करते थे,वो तो वहां पहुंच गया ये यहां रह गया, ये हम करते ही हैं। लेकिन जो पहुंचे हैं, आज चीन के अंदर जो भी साम्‍यवादी विचार से चलने वाले मूलभूत तो लोग हैं। चीन के अंदर दो करोड़ apprenticeship पर लोग काम कर रहे हैं,चीन के अंदर। जापान में एक करोड़ apprenticeship में काम कर रहे हैं। जर्मनी बहुत छोटा देश है, हमारे देश के किसी राज्‍य से भी छोटा देश है वहां पर तीस लाख लोग apprenticeship के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे आज दुख के साथ कहना चाहिए, सवा सौ करोड़ का हिन्‍दुस्‍तान,सिर्फ तीन लाख लोग apprenticeship पर काम कर रहे हैं। मेरे नौजवानों का क्‍या होगा मैं पूछना चाहता हूं।मैं सभी श्रमिक संगठनों से पूछना चाहता हूं कि इन नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए। इन नौजवानों के लिए अवसर खुलने चाहिए कि नहीं खुलने चाहिए। और भारत को आगे बढ़ाना है तो हमारे skill को काम में लाने के लिए ये हमें अवसर देना पड़ेगा। सरकारों ने, उद्योगकारों ने भी सोचना होगा इसलिए कि कानून के दायरे में फंस जाएंगे इसलिए कोई apprenticeship किसी को देनी नहीं, किसी नौजवान को अवसर नहीं देना, ये उद्योगकार जो दरवाजे बंद करके बैठे हैं, मैं नहीं मानता हूं ये लम्‍बे अरसे तक दरवाजे बंद करके बैठ पाएंगे। देश का नौजवान लम्‍बे अरसे तक इन्‍तजार नहीं करेगा। और इसलिए मैं उद्योगकारों को विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि आपका दायित्‍व बनता है, मुनाफा कम होगा, होगा लेकिन अगर इतनी मात्रा में आपके यहां श्रमिक हैं तो इतनी मात्रा में apprenticeship, ये आपकी social responsibility का हिस्‍सा बनना चाहिए। और इस प्रकार से क्‍या हम सपना नहीं दे सकते। दो करोड़ कर न पायें ठीक है, जब कर पाएंगे, कर पाएंगे अभी कम से कम तीन लाख में से 20 लाख apprenticeship पर जा सकते हैं हम क्‍या। कम से कम इतना तो करें। करोड़ों नौजवानों को रोजगार चाहिए, कहीं से तो शुरू करें। और इसलिए मैं चाहूंगा कि जो श्रमिक आज हैं उनकी चिन्‍ता करने वाले लोगों का ये भी दायित्‍व है कि जिनकी श्रमिक बनने की संभावना है उनकी जिन्‍दगी की भीचिन्‍ता उस नौजवान की भी करने की आवश्‍यकता है जो गरीब है। पिछले 16 अक्‍टूबर को हमने श्रमेव जयते के अभियान की शुरुआत की थी। ये सर्वांगीण प्रयास है हमारा। जिन सुविधाओं की शुरुआत हमने की उनकी प्रगति आप सबकी नजर में है। यूनिवर्सल एकाउंट नम्‍बर (यूएएन) इसके माध्‍यम से प्रोविडेंट फंड के एकाउंट पोर्टेबल हो गए हैं बल्कि लगभग 4 करोड़ 67 लाख मजदूरों को digital network platform का already लाभ मिलना शुरू हो गया है। पीएफपी ऑनलाईन लाभ ले रहा है ये चीजें नहीं थीं, इन चीजों का वो लाभ ले रहा है ये ही तो श्रमिक को empower करने के लिए टेक्‍नोलॉजी का सदुपयोग करने का प्रयास किया है। जब हम सरकार में आए हमारे देश में कई लोग ऐसे थे कि जिनको पचास रुपये पेंशन मिलता था, अस्‍सी रुपये पेंशन मिलता था, सौ रुपये पेंशन मिलता था,कुछ लोग तो पेंशन लेने के लिए जाते नहीं थे क्‍योंकि पेंशन से ऑटोरिक्‍शा का खर्चा ज्‍यादा होता था। इस देश में करीब-करीब बीस लाख से अधिक ऐसे श्रमिक थे जिनको पचास रुपया, सौ रुपया, दौ सौ रुपया पेंशन मिलता था। हमने आ करके, बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लगा है, सबके लिए minimum पेंशन एक हजार रुपया कर दिया है। मैं आशा करता हूं कि हमारे श्रमिक संगठन, ये हमारा जो pro-active initiative है उसके प्रति भी उस भाव से देखें ताकि हम सबको मिल करके दौड़ने का आनंद आ जाए,चार नई चीजें करने का उमंग आ जाए क्‍योंकि हमें चलना नहीं है और मुझे मैं मानता हूं, अगर इस देश में इतने सारे प्रधानमंत्री हो गए होंगे लेकिन श्रमिकों पर किसी एक प्रधानमंत्री पर सबसे ज्‍यादा हक है तो मुझ पर। क्‍योंकि मैं उसी बिरादरी से निकल कर आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और इसलिए गरीब के हाल को समझने के लिए मुझे कैमरामैन को लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।मैं उसको भली-भांति समझता हूँ और इसलिए जो बातें मैं बता रहा हूं। भीतर एक आग है, कुछ करना है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, वंचित, दलित, पीड़ित शोषित उनके लिए कुछ करना है। लेकिन हरेक के करने की सोच अलग होगी, रास्‍ते अलग होंगे। हमारी एक अलग सोच है, अलग रास्‍ते है लेकिन लक्ष्‍य यही है कि मेरे देश के मजदूर का भला हो, मेरे देश के गरीब का भला हो, मेरे देश के किसानों का भला हो, ये सपने लेकर के हम चल पड़े हैं। और इसलिए जैसा मैंने कहा हमने apprentice sector में सुधार किया। हमने on the job training के मौके बढ़ गए हैं, उस दिशा में हमने काम किया है। आज हमने हेल्‍थ को सेक्‍टर को ESIC 2.0 स्‍कीम को लांच किया है। हम कभी-कभार ये तो देखते हैं कि भई काम मिलना चाहिए, लेकिन कैसे मिले, मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है। उसके लिए न सरकारों को फुरसत है, न श्रमिक संगठनों को फुरसत है। उनको तो लगता है देखो यार, कागज पर दिखा दे, ये तुमको दिलवा दिया या नहीं दिलवा दिया। वो श्रमिक भी बड़ा खुश है, यार मैं इसका मेम्‍बर बन गया हूं मेरा काम हो गया। मैं इस स्‍थिति को बदलना चाहता हूं। मैं श्रमिक संगठन और सरकार की पाटर्नरशिप से आगे बढ़ना चाहता हूं। कंधे से कंधा मिलाकर के आगे चलना चाहता हूं और अगर हमने ये अस्‍पतालों की व्‍यवस्‍था को बदलने की दिशा में काम किया, अब छोटा निर्णय है कि भई हर दिन चद्दर बदलो। अब मुझे बताइए health की दृष्‍टि से, hygiene की दृष्‍टि से, ये सब जानते हैं कि बदलनी चाहिए और लोग मानते होंगे कि बदलें, लेकिन हमको मालूम है कि लोग नहीं बदलते। ठीक है, आया है patient पड़ा है। आखिरकार मुझे रास्‍ता खोजना पड़ा, मैंने कहा हर दिन की चद्दर का कलर ही अलग होगा, patient को पता चलेगा कि चद्दर बदली कि नहीं बदली। हमारे देश के बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है वो मुझे सवाल करते रहते हैं कि मोदी कुछ बड़ा ले आओ, कुछ बड़ा। बहुत सरकारें बड़ा-बड़ा ले आईं। मुझे तो मेरे गरीब के लिए जीना है, मेरे गरीब के लिए कुछ काम करना है इसलिए मेरा दिमाग इसी में चलता रहता है। यही, यही मैं सोच, और मैं दिल से बातें कर रहा हूं कि ये अन्‍य जो कई चीजें लाए हैं। हम चाहते हैं कि श्रमिक की हेल्‍थ को लेकर के चिन्‍ता होनी चाहिए, होनी चाहिए। और हमने उस दिशा में हमने एक तो उसके सारे हेल्‍थ रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए ताकि अब उसको अपना ब्‍लड टेस्‍ट का क्‍या हुआ, यूरिन टेस्‍ट का क्‍या हुआ, दुनिया भर में चक्‍कर नहीं काटना पड़ेगा। अपने मोबाइल फोन पर सारी चीजें उपलब्‍ध हो जाएं ये व्‍यवस्‍था की है ताकि श्रमिक को सुविधा कैसे हो, हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। और मैं मानता हूं कि उस काम के कारण उसको लाभ होगा।



आज हमारे देश में असंगठित मजदूर कुल मजदूरों का 93 पर्सेंट है। इस सरकार ने असंगठित मजदूरों के संबंध में बहुत ही constructive way में और well planned way में योजनाएं बनाई हैं और हम आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा कैसे मिले। न उसे स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा है, न जीवन बीमा है और न हीं पेंशन है और बड़ी संख्‍या में असंगठित ग्रामीण मजदूर अनपढ़ हैं, जिन्‍हें अपनी बात कहां कहना है, कैसे पहुंचे, इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। ऐसे मजदूर के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में सरकार का उत्‍तरदायित्‍व मानता हूं। देश के गरीब, असंगठित वर्गों को ध्‍यान में रख करके हमने तीन महत्‍वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं । और ये योजनाएं गरीब के लिए हैं। अमीर का उससे कोई लेना-देना नहीं है। और मैं मानता हूं, सभी श्रमिक संगठनों से मैं आग्रह करूंगा कि आप भी इस बात में मदद कीजिए। अगर किसी के घर में, हम कई यहां संगठन है जो असंगठित मजदूरों का काम करते हैं। कुछ लोग हैं जो घरों में बर्तन साफ करने वाले लोग होते हैं, उनका संगठन चलाते हैं। क्‍या हम कोशिश नहीं करे तो उसके मालिकों को मिल करके कहे कि भई आपके यहां ये लड़का कपड़े धोता है, बर्तन साफ करता है या खाना पकाता है या गाड़ी चलाता है। या आपका धोबी है। इसके लिए ये-ये सरकार की स्‍कीम है। आप एक मालिक हो, इसके लिए इतना पैसा बैंक में डालो, उसका जीवन भरा हो जाएगा। मैं मानता हूं हर कोई इसको करेगा। हम मध्‍यम वर्ग के लोगों को भी अगर समझाएंगे कि भई तुम्‍हारे साथ काम करने वाले जो गरीब लोग है उनको इन स्‍कीम का फायदा तुम दो। तुमको कोई महंगा नहीं पड़ने वाला है, तुम्हारे लिए तो एक फाइव स्‍टार होटल का एक खाने से ज्‍यादा का खर्च नहीं है। लेकिन उस गरीब की तो जिन्‍दगी बदल जाएगी और इसलिए हमने अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन जयोति बीमा योजना और मैं बताऊं यानी एक महीने का एक रुपया,12 महीने का 12 रुपया। एक स्‍कीम ऐसी है एक दिन का सिर्फ 80-90 पैसा। साल भर का 330 रुपया। लेकिन उसको जीवन भर उसकी व्‍यवस्‍था मिल सकती है। ये काम उसके मालिक, जिसके वहां वह काम करता है, वो कर सकते हैं और श्रमिक संगठन एक सामाजिक काम के तौर पर इस बात को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार से कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। मुझे लगता है कि इसका उसको फायदा होगा और हमने यह फायदा दिलवाना चाहिए। व्‍यवस्‍थाएं हैं, योजनाएं हैं। अटल पेंशन योजना। अगर आज से उसको जोड़ दिया जाए, समझा दिया जाए उसका तो जीवन धन्‍य हो जाएगा कि भई चलो 60 साल के बाद मुझे ये लाभ मिलेगा। मैं समझता हूं कि हम एक सामाजिक चेतना जगाने का भी काम करें, सामाजिक बदलाव का भी काम करें और उस काम को आगे बढ़ाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत सारी बातें हम कर पाएंगे। कई विषय है जिसको मैं आपके सामने रखता ही चला जाता हूं। लेकिन मुझे विश्‍वास है कि इस श्रम संसद के अंदर जो कुछ भी महत्‍वपूर्ण चर्चाएं हो रही है। हमारे वित्‍त मंत्री और उनकी एक कमेटी बनी है जो उनको सुन रही है। और बातचीत से ही अच्‍छे नतीजे निकलते हैं, सुखद परिणाम निकलेंगे। कल भी मेरी श्रम संगठन के प्रमुख लोगों के साथ मुझे मिलने का अवसर मिला था, उनको सुनने का अवसर मिला था और मैं भली-भांति उनकी बात को, उनकी भावनाओं को समझता हूं। मिल-बांट करके हमें आगे बढ़ना है और हम देश को आगे बढ़ाने में कैसे काम आएं, देश को आर्थिक नई ऊंचाइयों पर कैसे ले जाएं, देश में नौजवानों को अधिकतम रोजगार के अवसर कैसे उपलब्‍ध कराएं।

आज भारत के सामने मौका है विश्‍व के परिदृश्‍य में भारत के सामने मौका है। यह मौका अगर हमने खो दिया तो फिर पता नहीं हमारे हाथ में कब मौका आएगा और उस काम को लेकर आगे बढ़ें इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस श्रम सांसद को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, उत्‍तर परिणाम निकलेंगे इस भरोसे के साथ और साथ मिल करके आगे चलेंगे इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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আমার প্রিয় দেশবাসী, নমস্কার। ‘মন কী বাত’-এ আবারও আপনাদের সঙ্গে যুক্ত হয়ে আমি অত্যন্ত আনন্দিত। দেশের বিভিন্ন প্রান্তে আমাদের দেশের মানুষ দেশের স্বার্থে, সমাজের স্বার্থে এমন অসাধারণ সব কাজ করছেন এবং যখন তাঁদের সম্পর্কে শুনি, তখন আমরা নতুন প্রেরণা পাই। আজকের অনুষ্ঠানের সূচনা আমি অ্যাথলেটিক্সে দেশের তেমনই এক কৃতিত্বের কথা দিয়ে করব। কয়েকদিন আগেই ঝাড়খণ্ডের রাঁচিতে ন্যাশনাল সিনিয়র অ্যাথলেটিক্স ফেডারেশন প্রতিযোগিতা অনুষ্ঠিত হয়েছে। এতে সারা দেশ থেকে প্রায় ৮০০ অ্যাথলিট অংশ নিয়েছেন। এই প্রতিযোগিতা চলাকালীন চারটি ভিন্ন ভিন্ন ইভেন্টে চারটি জাতীয় রেকর্ড ভাঙা হয়েছে। ভেঙেছেন গুরিন্দরবীর সিং, বিশাল টিকে, তেজস্বীন শঙ্কর, দেব মীণা এবং কুলদীপ কুমার। এই সাথীরা আলাদা-আলাদা ক্যাটেগরিতে নতুন রেকর্ড গড়েছেন। আমি সর্বপ্রথম এদের সকলকে অনেক-অনেক অভিনন্দন জানাই।

সাথী, একটি ইভেন্ট যা নিয়ে সারা দেশে খুব আলোচনা হচ্ছে, সেটি হলো – ১০০ মিটার রেস, একশ মিটারের দৌড়। মাত্র দু’ দিনের মধ্যে পুরুষদের একশো মিটার রেসে জাতীয় রেকর্ড তিনবার ভেঙে গিয়েছে। যে দু’জন অ্যাথলিট এই কৃতিত্ব দেখিয়েছেন তাঁরা হলেন - গুরিন্দরবীর সিং এবং অনিমেষ কুজুর। আমি ভাবলাম এইবার ‘মন কী বাত’-এ এই দু’জন খেলোয়াড়ের সঙ্গে কথা বলা যাক।

(ফোন কল)

প্রধানমন্ত্রী: অনিমেষ জী নমস্কার | গুরিন্দর বীর তোমাকেও নমস্কার, সৎশ্রী অকাল।

অনিমেষ, গুরিন্দরবীর: নমস্কার স্যার, নমস্কার স্যার।

প্রধানমন্ত্রী: আচ্ছা ভাই, তোমরা তো খুব বড় কৃতিত্ব দেখিয়েছ। তোমাদের জুটিও তাক লাগিয়ে দিয়েছে। আমরা সঙ্গীতে তো যুগলবন্দী দেখেছি, কিন্তু চ্যালেঞ্জে এখন যুগলবন্দী হল যেখানে একবার একজন চ্যালেঞ্জ দেয়, তারপর অন্যজন সেই চ্যালেঞ্জটি গ্রহণ করে। ফের তৃতীয়বার সাফল্য পায়। তোমাদের ব্যাপারটা খুব আকর্ষণীয় ছিল। আমি চাই ‘মন কী বাত’-এর শ্রোতারা জানুন এ ব্যাপারে, তোমাদের সম্পর্কে জানুন তাঁরা। তোমরা যে চমৎকার প্রদর্শন করেছেন সেটা জানা যাক।

অনিমেষ জী: নমস্কার স্যার, আমার নাম অনিমেষ কুজুর। আমি ২০০ মিটার এবং ৪০০ মিটারে জাতীয় রেকর্ডের অধিকারী স্যার আমি ছত্তিশগড়ের মানুষ।এখন আমি ওড়িশার হয়ে খেলি। আমি গত বছর এশিয়ান মেডেল এবং ওয়ার্ল্ড ইউনিভার্সিটি গেমস মেডেল নিয়ে এসেছি আমি অ্যাথলেটিক্স ২০২১ থেকে শুরু করি যখন আমি স্কুল থেকে উত্তীর্ণ হই। আমি অম্বিকাপুরের সৈনিক স্কুল থেকে পাশ করেছি, আমি প্রথমে ফুটবল খেলতাম, আমার বাবা-মা কোভিডের সময় আমাকে কিছুটা ছাড় দিতেন যে তুই গিয়ে বাইরে দৌড়ে আয় বা খেলে আয়, আর যখন কোভিড শেষ হতে লাগল তখন আমার ফুটবলের যেসব বন্ধু ছিল তারা আমাকে বলল যে স্টেট মিট হতে চলেছে, তুই গিয়ে অংশগ্রহণ কর আমি অংশ নিলাম আমি জানতাম না যে সেখান থেকে জাতীয় স্তরের বাছাই হয়। আমি সেখান থেকে জাতীয় পর্যায়ে নির্বাচিত হলাম এবং আজ আমি আন্তর্জাতিক পর্যায়ে ভারতের প্রতিনিধিত্ব করছি।

প্রধানমন্ত্রী: এবার গুরিন্দরবীর জী তুমি বলো?

গুরিন্দরবীর: নমস্কার স্যার, আমার নাম গুরিন্দরবীর এবং আমি ভারতীয় নৌবাহিনীতে প্যাটি অফিসার এবং আমি ভারতের সবচেয়ে দ্রুত স্প্রিন্টার। এখন ১০০ মিটারে ১০.০৯ (দশ দশমিক শূন্য নয়) সেকেন্ডের জাতীয় রেকর্ড গড়েছি। এবং আমি প্রথম ভারতীয় যে ১০.১ (দশ দশমিক এক) সেকেন্ডের কমে দৌড়েছি, এবং আমি চেষ্টা করছি যেন ট্র্যাক ও ইউনিফর্মেও আমার দেশের সেবা করতে পারি। আমার বাবা এবং ঠাকুরদা দু’জনেই খেলাধুলো করতেন – আমাদের ভারতের সংস্কৃতি হলো, যখনই কোনো উৎসব হয় যেমন দীপাবলী, যেমন নববর্ষ, তখন আমরা আমাদের ঘর পরিষ্কার করি। সেই সময় আমি আমার বাবার ট্রফি এবং মেডেলগুলো পরিষ্কার করতাম, সেটা আমার খুব ভালো লাগত, আমি খুব আনন্দ পেতাম। যখনই কোনো ট্রফি পরিষ্কার করতাম, তখন জিজ্ঞাসা করতাম – আচ্ছা, এই ট্রফি কোথায় জিতেছ? এই মেডেল কোথায় জিতেছ? এই ছবিটি কবেকার? তখন তাঁরা আমাকে তাঁদের গল্প শোনাতেন যে, দ্যাখো, আমি এখানে খেলতে গিয়েছিলাম, আমি এই জাতীয়-পদক জিতেছি, আমি এতে আমার দলকে জিতিয়েছি। তখন আমিও তাঁদের বলতাম – বেশ, আমিও কোনো খেলা খেলতে চাই। তাঁরা সকালে দৌড়তে যেতেন, তাই আমি তাঁদের বলতে লাগলাম – শোনো না, আমাকেও নিয়ে চল তোমাদের সঙ্গে। তখন তাঁরা আমাকে নিয়ে যেতে লাগলেন এবং তাঁদের খেলায় যা শিখেছিলেন, সেটা আমাকে শেখাতে লাগলেন। তখন আমার আগ্রহ তৈরি হতে লাগল। উসেইন বোল্টের বিশ্বরেকর্ড ভাঙ্গা হচ্ছে সেটা আমি দেখেছি। মজার একটা ঘটনা আছে এ ব্যাপারে – আমি টিভি দেখছিলাম, তখন আমার মা আমার টিভি বন্ধ করে দিলেন –বেটা এখন পড়ার সময় হয়েছে, তুমি পড়ো। তখন আমি বললাম – ঠিক আছে, তুমি আমাকে টিভি দেখতে দিচ্ছ না, কিন্তু একদিন এমন আসবে যে তুমি আমাকে টিভিতে খুঁজবে – দেখো, সেই গুরিন্দর দৌড়চ্ছে। তাই এখন আমার খুব আনন্দ হয় যে আমার মা আমাকে টিভিতে দৌড়তে দেখছে।

প্রধানমন্ত্রী : বাঃ বাঃ বাঃ! খুব চমৎকার কথা বললে ভাই!

গুরিন্দর বীর: হ্যাঁ স্যার, আমরা মধ্যবিত্ত পরিবার স্যার, আমার বাবাও ভলিবল খেলতেন। পারিবারিক সমস্যার কারনে উনি খেলা ছেড়ে দেন। তার স্বপ্ন অসম্পূর্ণ থেকে যায়। উনি আমার ভেতরে সেই স্বপ্ন দেখেছিলেন, যে আমার ছেলে সেই স্বপ্ন পূরণ করবে। আমি বাবার সঙ্গে কথা বলতাম, শুনতাম মিলখা সিং কত পরিশ্রম করতেন। আমি বাবাকে বলতাম যে আমিও একদিন তোমার স্বপ্ন পূরণ করব। তিনি বলতেন স্বপ্ন পূরণ এমনি এমনি হয় না। তার জন্য প্রচুর হার্ডওয়ার্ক করতে হয়। পরিশ্রম করতে হয়। মিলখা সিংজী মুখে রক্ত তুলে পরিশ্রম করতেন, রোদের মধ্যে দৌড়তেন। সারাদিন ট্রেনিং করতেন। সেই বিষয়গুলো আমাকে ইন্সপায়ার করত। আমার বাবা আমাকে ইন্সপায়ার করতেন। বলতেন, আমি দৌড়ব আমার দেশের জন্য, দেশের জন্য মেডেল আনবো, জিতবো। আর এই বিষয়টাও ছিল, আমি যখন ১০০ মিটারের ইভেন্ট বাছাই করলাম, তখন সবাই আমাকে বলল, ভাই ১০০ কোরো না। ১০০ ভারতীয়দের ইভেন্ট নয়। ভারতীয়দের শরীর ১০০ মিটারের জন্য প্রস্তুতই নয়। তখন আমি আর আমার বাবা সব সময় বলতাম, যে দেখ গুরিন্দর, আমরা এটা বেছে নিয়েছি। এখন এটার থেকে পিছু হটবো না। যারা আমাকে বলতো যে ভাই, এটা তুমি করতে পারবে না, আমি সেটা করে দেখাব। বাবা বলত, তুই করে দেখাবি, তোর ওপর আমার ভরসা আছে। যে ভরসা আমার বাবা আমার ওপর করেছেন, সেই ভরসাকে নিজের শক্তিতে পরিণত করে আমি এগিয়ে চলেছি, আর এখন তো আমি প্রত্যেক ভারতীয় কে বলছি, ভাই ভারতীয়রা স্প্রিন্ট করো।

প্রধানমন্ত্রী : দেখুন, তোমরা দু'জন এক অভূতপূর্ব কীর্তি স্থাপন করেছ, এবং মাত্র দুদিনের মধ্যে তোমরা তিনবার ন্যাশনাল রেকর্ড ভেঙেছো।

যেমনটা গুরিন্দারবীর বললেন, যে লোকে বলে ভারতীয়দের শরীর ১০০ মিটার রেসে দৌড়নোর জন্য একেবারেই উপযুক্ত নয়। এত সমস্যা থাকা সত্ত্বেও তোমরা তোমাদের কাজ করেছো। তাই তোমাদের দু'জনের থেকে আমি জানতে চাইবো এবং মন কি বাত-এর শ্রোতারাও শুনতে চাইবেন যে কি এমন আবেগ ছিল? কি এমন জেদ ছিল? কী ভেবেছিলে তোমরা এবং কীভাবে এটা করলে? কতটা কঠিন এই বিষয়টা?

গুরিন্দরবীর: হ্যাঁ স্যার, আমি গুরিন্দর। শুরুতে তো খুব স্ট্রাগল ছিল। অনেকবার সংশয়ও হয়েছে যে, আমি কি ঠিক করছি? আমি কি সঠিক বিষয় বাছাই করেছি? কারণ প্রত্যেকবার তো আপনি জিতবেন না, কখনো কখনো আপনি শিখবেনও। যখন আমি হেরে যেতাম, যখন আমি ঠিকমতো পারফরম করতে পারতাম না, কোন চোট-আঘাত আসত, তখন আমার পরিবারের সদস্যরা আমাকে সাপোর্ট করতেন। বলতেন, কোন ব্যাপার না। একদিন খারাপ গেছে, এক বছর খারাপ গেছে, এতে সারা জীবন খারাপ হয়ে যায় না। স্বপ্ন দেখা ছেড়ো না। আমার কোচও আমাকে এটা শিখিয়েছেন, যে যদি তুই না করতে পারিস, তবে অন্য কেউও করতে পারবে না। এভাবেই যখন আমার কমিউনিটি, আমাদের আশেপাশের মানুষ আমাকে উৎসাহিত করেন, তখন আমার মোটিভেশন কখনো নষ্ট হয় না।

প্রধানমন্ত্রী: অনিমেষজী...

অনিমেষ: স্যার, যখন আমি ২০২১ এ অ্যাথলেটিক্স শুরু করি তখন

লোকজন আমাকে বলতো যে, এটা নতুন ফিল্ড, দেখ তুই করতে পারবি কিনা। তা আমি বললাম যে আমি এই ফিল্ডে ঢুকেছি যখন, তখন করবোই। আমার বাবাও সব সময় আমাকে বলতেন, যে তুই এই ফিল্ডে ঢুকেছিস যখন তখন কখনো পিছন ফিরে দেখবি না, কারণ ভাবে তো সবাই যে এই করব, ওই করব, কিন্তু খুব কম লোকই করে দেখায়। তুই এই ফিল্ডে ঢুকেছিস তো এটাতেই লেগে থাকতে হবে, এটাতেই এগিয়ে যেতে হবে।

তোমাকে সবরকম facilities (সুযোগ সুবিধে) সমস্ত কিছু দিয়ে আমরা support করব। পারিবারিক support, আর্থিক support, সব কিছু করব আমরা। ব্যাস, তুমি পরিশ্রম কর আর India কে দেখিয়ে দাও যে ভারতীয়রাও দৌড়তে পারে। কারণ আমাকেও লোকে বলত যে ভারতীয়দের genes সেরকম নয় যাতে তারা দশ অথবা দশ দশমিক এক এর মধ্যে দৌড়তে পারে অথবা sprint করতে পারে। কিন্তু এখন আমরা দুজনেই এটা prove করেছি যে ভারতীয়রাও এটা করতে পারে। আমাদের জন্য এটা এমন কিছু কঠিন নয়, আমরা ও এসব করতে পারি। আসলে স্যার, এ সমস্ত কিছু আমাকে খুব প্রেরণা দেয়, আর আমরা যত প্রশিক্ষণ নিচ্ছি প্রয়োজনীয় সময় আরো কমছে এবং অন্য ভারতীরাও দেখতে পারছে যে ভারতীয়রাও পারে। আমরা আরো করব স্যার, এখন আমাদের দুজনের নির্বাচন Commonwealth games এর জন্য ও হয়েছে। সামনের প্রতিযোগিতায় আমরা আরো ভালো প্রদর্শন (perform) করব ।

প্রধানমন্ত্রী : দ্যাখো, আমার মনে একটা কৌতুহল আছে, আর লোকেদের ও আছে। আমি শুনেছি তোমরা দুজনে খুব ভালো বন্ধুও। তোমরা দুজনে কিছু ঠিক করে রেখেছ নাকি যে তুমি আমার record ভাঙলে আমি তোমার record ভাঙব। প্রথমে অনিমেষ বলো।

অনিমেষ: স্যার জী, আগে রেকর্ড ছিল দশ দশমিক এক আট এর , যা আমার ছিল। সেটাকে গুরিন্দরবীর ভাই সেমিফাইনালে ভেঙে দশ দশমিক এক সাত করে। তারপর আমি আবার ওটাকে সেকেন্ড সেমিফাইনাল- দশ দশমিক এক পাঁচ করে ভাঙি। যখন সেমিফাইনাল হয়, আমরা দুজনেই খুশি ছিলাম যে, চলো ঠিক আছে , আজ রেকর্ড ভেঙেছে আর আমরা দুজনেই ভেঙেছি। কারণ ঐ সময়ে প্রতিযোগিতায় এ প্রতিদ্বন্দ্বিতা থাকে কিন্তু এটা আমরা দুজনেই আগে থেকে ঠিক করে রেখেছিলাম । তার আগে আমরা সৌদি আরব ও গিয়েছিলাম প্রতিযোগিতায় অংশ নিতে, সেখানেও আমরা দুজন roommates ছিলাম। আমরা ওখানেও আলোচনা করতাম ভারতের sprinting কে আরো এগিয়ে নিয়ে যেতে হবে আর এটা আমাদেরই হাতে , আমরা যা করব সেটাই অন্যদের উৎসাহিত করবে।

প্রধানমন্ত্রী : গুরিন্দরবীর তুমি কী বলবে?

গুরিন্দরবীর: আমরা দুজনে ঠিক করেছিলাম যে আমরা খুব ভালো দৌড়বো। সেই জন্য যখনই একে অপরকে প্রয়োজন হয় একে অন্যের পাশে থাকি। যেমন, এখন রেকর্ড গড়ার আগে আমি রেকর্ড গড়লাম তারপর অনিমেষ গড়ল। যখন আমরা warm up করছিলাম তখন আমি অনিমেষ কে বলছিলাম, অনিমেষ ঐ ব্লক টা ভালো, ঐখানে গিয়ে বোস, ওখানে তাড়াতাড়ি চলে যা আমরা ওখানেই warm up করব, এখানে ভালো warm up করা গেলে একে অপরকে help করা হবে। একজন অন্য কে সাহায্য করলে সেও improve করে, আমি ও improve করি। সেই জন্য বন্ধুত্ব ও দরকার। তবে, স্যার, আমরা যখন মাঠের বাইরে, প্রতিযোগিতার বাইরে তখন আমরা বন্ধু। যেই আমরা মাঠে আসি তখন একে অপরের প্রতিদ্বন্দী হয়ে যাই। তখন এটাই হয় যে আমি দ্রুত দৌড়বো, আমি ওর থেকেও দ্রুত দৌড়বো।

প্রধানমন্ত্রী: দ্যাখো, তোমাদের যে লড়াই সেটা দেশের সম্মান বাড়ানোর জন্য। দেশ কে ভবিষ্যতে এই জায়গায় নিয়ে যাওয়ার জন্য আর এটা এক positive spirit নিয়েই করা। আর আমি মনে করি তোমাদের এই যে sportsman spirit, এটা খেলা ও, আবার একে অপর কে challenge করাও, এগিয়ে যাওয়ার চেষ্টা করা আবার এগিয়ে যাবার জন্য একে অন্যকে সাহায্য ও করা , এ এক অভিনব দৃষ্টান্ত স্থাপন করেছ তোমরা। আমার তরফ থেকে অনেক অনেক অভিনন্দন তোমাদের। অনেক অনেক শুভ কামনা এবং আমার পূর্ণ বিশ্বাস যে তোমরা দেশের নাম ঊজ্জ্বল করবে।

তোমরা এভাবেই পরিশ্রম করতে থাকো অনেক উন্নতি হবে। আমার অনেক অনেক শুভ কামনা।

গুরিন্দরবীর/ অনিমেষ: ধন্যবাদ স্যার, ধন্যবাদ আপনাকে।

প্রধানমন্ত্রী: অনেক অনেক ধন্যবাদ।

আমার প্রিয় দেশবাসী , এই সময়, দেশের বেশিরভাগ জায়গায় খুব গরম পড়েছে। প্রচণ্ড রোদ, গরম হাওয়া, এই রকম আবহাওয়ায় নিজের প্রতি খেয়াল রাখা অত্যন্ত জরুরি। জল পান করতে থাকুন। রোদে বেরোনো জরুরি হলে সাবধানে বেরোন। এব্যাপারে সরকারের বিভিন্ন দপ্তর যে যে গাইডলাইনস দিয়েছে তা ভুলবেন না।

বন্ধুরা, আমাদের এখানে গরমের সঙ্গে লড়াই করার নানা উপায় রান্নাঘরেও পাওয়া যায়। আপনিও নিশ্চয়ই দেখেছেন, যেমন যেমন গরম বাড়তে থাকে, তেমন তেমন রান্নার স্বাদও বদলাতে থাকে, রান্নার পদ্ধতিও পাল্টে যায়। কখনও কলসির জল আসে, কখনও দই পাতা হয়, তো কখনও কাঁচা আম সিদ্ধ করা হয়- আর শুরু হয় দেশী পানীয়র বাহার। দেশী পানীয়র সঙ্গে আপনিও পরিচিত। আপনি যদি উত্তর ভারতে যান তো অনেক জায়গায় আপনি পাবেন আম পান্না, কাঁচা আমের স্বাদ আর গরম থেকে রেহাই। পঞ্জাব হরিয়ানা গেলে লস্যি পাবেন, বড় গেলাসের লস্যি। রাজস্থান আর গুজরাটে ছাঁচ, যা সব খাবারের সঙ্গেই যায়। আর বিহার ঝাড়খণ্ড, পূর্ব উত্তরপ্রদেশে ছাতুর সরবৎ, ওর কথা তো একদম আলাদা -পেটও ভরে, শক্তিও দেয়। কোঙ্কন আর গোয়াতে কোকম শরবৎ , আর সোলকারি। দক্ষিণ ভারতের পানকম, নীর মোর, সম্বারন আর ওড়িশার বেলপান্না, এসব শুধু পানীয়ই নয়, ভারতের আলাদা আলাদা জায়গায় ঐতিহ্যের নিদর্শন।

আর এর মধ্যে এক ভারত শ্রেষ্ঠ ভারতের এক ছবিও পাওয়া যায়। আর একটা ব্যাপার অবশ্যই মাথায় রাখবেন, এর মধ্যে অধিকাংশ জিনিসই আমাদের রান্নাঘরেই পাওয়া যায়, আমাদের ক্ষেতখামার থেকেই আসে। কোন বড় branding নেই। কিন্তু প্রজন্মের অভিজ্ঞতা তার মধ্যে মিলেমিশে আছে। আপনিও গরমের সময় দেশীয় পানীয়র আস্বাদ অনুভব করুন।

বন্ধুরা, গরম এলেই আর একটি আলোচনা সব ঘরে শুরু হয়ে যায়, আর সেটি হলো আম। আম, সর্বসাধারনের আলোচনার বিষয় হয়ে ওঠে,, ভারতে খুব কম ঘর আছে যেখানে আম নিয়ে কথা হয় না। প্রত্যেক জায়গার নিজস্ব আম, নিজস্ব স্বাদ, নিজস্ব সুগন্ধ।মহারাষ্ট্র আর কোঙ্কনে হাপুস, আলফনসো, গুজরাটে কেসর, এটাই তো আমের প্রাণ, উত্তরপ্রদেশের দশহরী আর আমার কাশীর ল্যাংড়া। ল্যাংড়া আমের মধ্যে অন্যতম, পাকার পরেও তার রং অনেক সময়ই সবুজই থেকে যায়। বিহারের জর্দালু, যার সুগন্ধ বহুদূর থেকে পাওয়া যায়। মালদার চৌসা, এই প্রত্যেকটি নামের সঙ্গে মানুষের স্মৃতি জুড়ে আছে। দক্ষিণ ভারতে যান, বংগনপল্লী, তোতাপুরি, নীলম, মলগোবা, বাংলার হিমসাগর, ওড়িশার আর অন্ধ্রপ্রদেশের সুবর্ণরেখা। অর্থাৎ, স্হান বদলায়, আমের রূপ রঙ আর তার স্বাদও বদলে যায়। আর বন্ধুরা, আমের এই পথচলা এখন গ্রাম থেকে global market পর্যন্ত পৌঁছে গেছে।আজ মন কি বাতের মাধ্যমে আমের ফলনের সঙ্গে যুক্ত কৃষক ভাইবোনদের প্রশংসা করব। আপনারা দেশের কৃষি অর্থ ব্যবস্থার জন্য শুধু সাধারণ কৃষক নন, আরও অনেক বেশি। এরকমই থাকুন।

বন্ধুরা, গরমের এই দিনগুলিতে একতো স্কুলের ছুটি থাকে, কিন্তু আমি এক এরকম class এর কথা বলব, যেখানে ভর্তি হওয়ার জন্য আপনার ইচ্ছে হবেই।

বন্ধুরা কল্পনা করুন, এক এমন school, যেখানে বাচ্চারাও যাচ্ছে , য়ুবারাও এবং বয়স্করাও, যেখানে কোন fee নেই, কোন বড় building নেই, কোন classroom ও নেই, আর সবচেয়ে পছন্দের কথা এখানে class নদীতে হয়।

বন্ধুরা, এ কোন গল্প নয়। এ এক সত্যি প্রচেষ্টা। কেরলের আলুওয়া তে, সাজি ওয়ালাশেরিলজী এমনি এক swimming club চালান। এখনও পর্যন্ত ১৫ হাজারের ও বেশী লোক এখানে সাঁতার শিখেছেন। সাজিজী

দিব্যাঙ্গ বাচ্চাদের ও swimming শিখিয়েছেন। এই প্রচেষ্টার পেছনে এক দুঃখও রয়েছে। কয়েক বছর আগে এক নৌকা দুর্ঘটনায় কিছু ছাত্রের মৃত্যু হয়। এই ঘটনা সাজিজির ভেতরটাকে ওলটপালট করে দেয়। উনি চিন্তা করেন যে যদি বাচ্চারা সাঁতার জানতো তবে অনেক প্রাণ বেঁচে যেত- ব্যস এরপর থেকেই শুরু হয় তাঁর এই প্রচেষ্টা।

বন্ধুরা, সাজি ওয়ালাশেরিলজীর জীবন আমাদের এক মস্ত বড় শিক্ষা দেয়। সেবা করার জন্য অনেক বড় প্রচেষ্টার দরকার নেই -জরুরী হল এক সৎ ইচ্ছে এবং নিরন্তর প্রচেষ্টা। তাঁর এই শক্তির মাধ্যমেই বহু মানুষের জীবনে পরিবর্তন আনা সম্ভব হয়।

আমার প্রিয় দেশবাসী, কয়েক দিন আগে আমার ইউরোপের নেদারল্যান্ডসে যাওয়ার সুযোগ হয়েছিল।ওখানে আমি অনেকগুলো মিটিং এ ছিলাম। এই সময়েই এক এমন মুহূর্ত আসে যা সমস্ত ভারতীয়দের গর্বে ভরিয়ে তোলে। নেদারল্যান্ডসে আয়োজিত এক বিশেষ অনুষঠানেও চোল রাজত্বকালীন প্রাচীন তাম্র ফলক ভারতকে প্রত্যর্পণ করা হয়।এই কার্যক্রমে নেদারল্যান্ডসের প্রধানমন্ত্রীও ছিলেন।এই তাম্র ফলক নিয়ে দেশবিদেশ থেকে আমার কাছে নিরন্তর সংবাদ আসতে থাকে।

মানুষ তাঁদের খুশি জানাচ্ছেন, তাঁদের গর্বের কথা জানাচ্ছেন। সারা বিশ্বে তামিল দের মধ্যে এবিষয়ে বিশেষ উৎসাহ রয়েছে।

বন্ধুরা এই তাম্র ফলক নিয়ে মানুষের মধ্যে অনেক প্রশ্নও রয়েছে। এজন্য আমি এর সঙ্গে যুক্ত কিছু কথা আজ আপনাদের সঙ্গে আলোচনা করতে চাই।এর মধ্যে একুশটি বড় এবং তিনটি ছোট তাম্র ফলক রয়েছে। এগুলি প্রধানত রাজা প্রথম রাজেন্দ্র চোলের পিতা রাজা রাজরাজা চোলকে দেওয়া প্রতিজ্ঞার সঙ্গে যুক্ত। এতে আনইমঙ্গলম গ্রামটি এক বৌদ্ধ বিহার কে দানের কথা লেখা আছে। এই তাম্র ফলকে চোল বংশের সাফল্যের কথাও লেখা আছে। এরথেকে বোঝা যায় চোল সাম্রাজ্যের সমুদ্র শক্তি কতটা শক্তিশালী ছিল। দক্ষিণ পূর্ব এশিয়ার দেশের সঙ্গে তাঁদের যোগাযোগের কথাও এতে পাওয়া যায়।

চোল সাম্রাজ্যের সমৃদ্ধ ইতিহাস আর সংস্কৃতি আমাদের সবার অনেক গর্বের। বন্ধুরা, আমাদের সরকার ভারতের এইসব অমূল্য ঐতিহ্য সংরক্ষণের জন্য নিরন্তর প্রচেষ্টা চালিয়ে যাচ্ছে। এরকম ভাবেই ছত্তিশগড়ের মল্হারেও জ্ঞান ভারতম অভিযানের সঙ্গে যুক্ত এক গুরুত্বপূর্ণ খনন হয়েছে। এখানে তিনটি দুর্লভ তাম্রফলক পাওয়া গেছে।এগুলো পাণ্ডু রাজবংশের মহর্ষি বালার্জুনের শাসনকালের সঙ্গে যুক্ত বলে মনে করা হয়। বিশেষজ্ঞদের মত এই inscription গুলি ষষ্ঠ - সপ্তম শতকের অর্থাৎ চোদ্দ পনেরোশো বছর আগের পুরোনো এই তাম্র ফলক প্রাচীন ব্রাম্হী লিপি আর পালি ভাষাতে লেখা। এ থেকে ওই সময়ের শাসন ব্যবস্থা, ধর্ম আর সংস্কৃতি সম্পর্কে গুরুত্বপূর্ণ তথ্য জানা যায়।

বন্ধুরা, আমাদের ভারতবর্ষে জ্যোতির্বিজ্ঞান অর্থাৎ astronomy সম্পর্কে বিশেষ আকর্ষণ রয়েছে। আমাদের দেশে আজও শতাব্দী প্রাচীন observatories রয়েছে। এখানে অদ্ভুত mathematical discoveries হয়েছে।

Navigation হোক, পঞ্চাঙ্গ হোক, অথবা আমাদের পরব বা উৎসব, এই সব কিছু আকাশ আর তারাদের সঙ্গে জুড়ে রয়েছে। আমাদের এখানে সব প্রজন্মেই astronomy কৌতুহল জাগিয়েছে। এর exploration এর জন্য উদ্বুদ্ধ করেছে , আর আজকের যুব প্রজন্মও এব্যাপারে যথেষ্ট উৎসাহ দেখাচ্ছেন।আজকাল আপনিও দেখতে পাবেন সারা দেশে astronomy club অত্যন্ত দ্রুত জনপ্রিয় হয়ে উঠছে। বড় শহর থেকে ছোট শহর , স্কুল থেকে পার্ক পর্যন্ত এর ক্রিয়াকলাপ দেখা যাচ্ছে। আমি Bangalore Astronomical Society থেকে খবর পেয়েছি।এখানে observational sessions আয়োজন করা হয়।এই সংস্হা গ্রাম অঞ্চলে astronomy কে জনপ্রিয় করার কাজও শুরু করে দিয়েছে। খগোল মণ্ডল নামে এক টিম ৩০ঘণ্টার এক খুব innovative course শুরু করেছেন।

বন্ধুরা, রাতে তারাদের পর্যবেক্ষণ এক অদ্ভুত অনুভূতি। Astro Kerala নামের একটি সংস্হা night observation camps আর workshop এর আয়োজন করে। এখানে যুবা বন্ধুরা টেলিস্কোপ তৈরি করা আর star maps ব্যবহার করা শেখেন।রাজকোটের বিগ ব্যাং অ্যাস্ট্রোনমি ক্লাব গিরের জংগল থেকে কচ্ছের রণ পর্যন্ত অনেক অ্যাস্ট্রোনমি ইভেন্ট এর আয়োজন করেছেন। জ্যোতির্বিদ্যা পরিসংস্হাও অ্যাস্ট্রোনমির সবথেকে পুরনো সংস্থাগুলির মধ্যে একটি। এখানে observational facility র সঙ্গে সঙ্গে বই , লাইব্রেরী আর টেলিস্কোপ লাইব্রেরীরও সুবিধে আছে। আমি আইস্যাকের কথাও উল্লেখ করতে চাই। এটা একটা student - led nationwide network , যেটা astronomy আর astrophysics club কে একসঙ্গে যুক্ত করে।

বন্ধুরা , নিজের hobbyর জন্য সময় বের করা, সবসময়ে নতুন কিছু শিখতে থাকা খুব জরুরি। আমি যুবকদের কাছে চাইব তাঁরা যেন অবশ্যই কোনো astronomy club-এর সঙ্গে যুক্ত হন এবং এই ছুটিতে অবশ্যই কোনো একটি planetarium দেখতে যান।

বন্ধুরা, 'মন কি বাত' অনুষ্ঠানটি যাঁরা টিভিতে দেখছেন, আমি তাঁদের বলব, একটি ভিডিও নিশ্চয়ই দেখবেন। এই ভিডিওটি নিয়ে কিছুদিন আগে প্রচুর আলোচনা হয়েছে। এটিতে কিছু মানুষ অপরিসীম ধৈর্য সহকারে, খুব সাবধানে গাঙ্গেয় ডলফিনকে বাঁচানোর চেষ্টা করছেন। আপনারা শুনে অবাক হবেন যে, এই পুরো প্রচেষ্টায় লেগেছিল প্রায় ১৩ ঘন্টা, আর তার ফলে শেষপর্যন্ত ডলফিনটি বেঁচে যায়।

বন্ধুরা, এই গোটা ব্যাপারটিতে খুব বড় ভূমিকা ছিল, ভারতের প্রথম গঙ্গা dolphin rescue ambulance এর। এটি উত্তর প্রদেশের ঘটনা। সেখানে একটি গাঙ্গেয় dolphin খালে আটকে গিয়েছিল। ওই সময়ে 'নমামি গঙ্গে অভিযানের' জন্য তৈরি এই ambulance তার ভরসা হয়ে পৌঁছে গেল এবং খুব সাবধানে তাকে বাইরে বার করে আনা হল। ভালো করে পরীক্ষা ও চিকিৎসার পর তাকে সুরক্ষিত রাপ্তি নদীতে ছেড়ে দেওয়া হয়। এক হিসেবে বলা যেতে পারে, একটি জীবন যেন আবার তার নিজের ঘরে ফিরে গেল।

বন্ধুরা, এই dolphin rescue ambulance টি বিশেষ ধরনের। এটিকে একটি ভ্রাম্যমান হাসপাতালের মতো করে তৈরি করা হয়েছে। এতে dolphinকে সুরক্ষিত রাখার ব্যবস্থা আছে। Oxygen আছে, বিশেষ স্ট্রেচার আছে, জীবন রক্ষার নানা উপকরণ আছে, অর্থাৎ যদি কোনো dolphin আহত হয়, খালে আটকে যায় বা নদী থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়, তাহলে সঙ্গে সঙ্গে তাকে উদ্ধার করা যাবে।

বন্ধুরা, যখন আমরা গাঙ্গেয় dolphin কে বাঁচাই, তখন শুধু যে একটি প্রজাতিকে বাঁচাই তা-ই নয়, আমরা গঙ্গার জীব বৈচিত্রকে বাঁচাই । এভাবে নদীর পুরো জীবনতন্ত্রকে বাঁচানো হয়, এবং আমাদের আগামী প্রজন্মের জন্যে প্রকৃতির এক অমূল্য উত্তরাধিকারকে বাঁচিয়ে রাখা হয়।

আমার প্রিয় দেশবাসী, আপনাদের মধ্যে অনেকেরই নিশ্চয়ই নদী, পুকুর বা কুয়ার জলের সঙ্গে জড়িত অনেক স্মৃতি রয়েছে। কারুর পুকুরে সাঁতার কাটার কথা মনে পড়বে, কারুর আবার পুকুরপাড়ে বন্ধুদের সঙ্গে খেলার কথা কিংবা সেই মাটির গন্ধটা মনে আসবে। ছোটবেলার এইসব স্মৃতি সারা জীবন মনে থেকে যায়।

বন্ধুরা, এইসব স্মৃতিকে বাঁচিয়ে রাখার এক অনুপ্রেরণামূলক কাহিনী উত্তর প্রদেশের বস্তি জেলা থেকে জানা গেছে। নিজেদের গ্রামের মনোরমা নদীটিকে দেখে বস্তির বাসিন্দা আকাশ গুপ্তার খুব দুঃখ হত। কারণ যে নদীকে তিনি বাল্যকালে পরিষ্কার আর প্রাণবন্ত দেখতেন, সময়ের সঙ্গে সঙ্গে সেই নদীতে ক্রমশ প্লাস্টিক জমা হতে থেকেছে, জলে আবর্জনা বেড়ে চলেছে। শ্রীমান আকাশ স্থির করলেন, তিনি কোনো অভিযোগ করবেন না, বরং নতুনভাবে এক প্রচেষ্টা শুরু করবেন। অভিযোগ নয়, আরম্ভ -- এটাই মন্ত্র হয়ে দাঁড়াল। তিনি নিজের বন্ধুদের সঙ্গে নিলেন। আর ছিল শুধু জাল, ছোট কোদাল, ঝুড়ি এবং সেইসঙ্গে সবচেয়ে বড় যে শক্তিটা ছিল সেটা হল কিছু বদলে দেবার সংকল্প। এই যুবকেরা জলে নেমে কচুরিপানা সরাতেন। প্লাষ্টিক আর আবর্জনা তুলে আনতেন। কয়েকবার তো এক এক দিনে ৫০-৬০ কিলো পর্যন্ত আবর্জনা নদী থেকে তোলা হয়েছে। ধীরে ধীরে মনোরমা নদীর ওই অংশটিকে আবার পরিষ্কার দেখাতে লাগল। আশপাশের মানুষদেরও নজর পড়ল এমন একটি উদ্যোগের প্রতি । অধিবাসীদের মধ্যে স্বচ্ছতার ব্যাপারে সচেতনতা বাড়ল।

 বন্ধুরা, এরকমই আর একটি প্রেরণাদায়ী কাহিনী গোয়া থেকেও আমাদের কাছে এসেছে। গোয়ার বালকৃষ্ণ অইয়া জী একজন retired teacher. অবসর নিলেও সমাজের জন্য কাজ করার উৎসাহ তাঁর আজও একই রকম আছে। মড্ডি-তোলাপ এলাকার জলের সমস্যা নিয়ে তাঁকে খুবই পীড়িত করতো। তিনিও সমাধানের জন্য কাজ শুরু করলেন। পাইপলাইন পাতার কাজে বালকৃষ্ণজী গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা নেন। এর ফলে বেশ কিছু বাড়িতে জল পৌঁছে দেওয়া গেল। যে পরিবারগুলিকে জলের জন্য রোজ অনেক কষ্ট করতে হত, এতে তাঁরাও স্বস্তি পেলেন।

বন্ধুরা, গতমাসে আমার একটি সুন্দর অভিজ্ঞতা হয়েছে। এরসঙ্গে 'মন কি বাত'-এরও সম্বন্ধ রয়েছে। সেইজন্যেই আজ আপনাদের কাছে এই বিষয়ে আলোচনা করতে চাই। তামিলনাড়ুর নাগেরকয়েলে এক শিক্ষকের সঙ্গে আমার দেখা হয়েছিল। প্রায় তিন দশক আগে আমার সঙ্গে তাঁর দেখা হয়। আমি গিরিজা আম্মাজী-র কথা বলছি। এই সাক্ষাতের সময়ে কিছু তরুণ ছাত্রও তাঁর সঙ্গে ছিল।

বন্ধুরা, গিরিজা আম্মাজী প্রায় ১৫ টি স্কুল চালান। এরমধ্যে চেন্নাইয়ের জয়গোপাল গরোডিয়া হিন্দু বিদ্যালয় খুবই উল্লেখযোগ্য। তার দেশভক্তির ভাবনা প্রত্যেক ভারতবাসীকে প্রেরণা জোগাতে পারে। 'মন কি বাত' থেকে অনুপ্রেরণা নিয়ে তিনি দেশের সৈনিকদের কাজে লাগার সংকল্প নিয়েছিলেন। সেই উদ্দেশ্যে তিনি তাঁর সব স্কুলের ছাত্রদের উৎসাহ দিলেন এবং বললেন তারা যেন প্রতিদিন সেই বীর জওয়ানদের জন্য এক টাকা করে দেয়। অর্থাৎ এক বছর পরে ছাত্রপিছু মোট ৩৬৫ টাকা জমা হল। এই ছোট ছোট উদ্যোগকে এক করে প্রায় চল্লিশ লক্ষ টাকা একত্রিত করা সম্ভব হয়েছিল। গিরিজা আম্মাজী এই পুরো টাকার অঙ্কটি আমার হাতে সমর্পণ করেন। তাঁর সঙ্গে কথা বলতে গিয়ে আমি উপলব্ধি করেছিলাম, মা ভারতীর প্রতি তাঁর সমর্পণ কতটাই গভীর !

গতবছরই চেন্নাইয়ের প্রথম হিন্দু বিদ্যালয় তাদের ৫০ বছর পূর্ণ করেছে। দেশের শিক্ষা ও সংস্কৃতিকে এগিয়ে নিয়ে যাবার ব্যাপারে এই school network এর ভূমিকা খুবই প্রশংসনীয়। আমি এরসঙ্গে যুক্ত সকলকে অনেক অনেক ধন্যবাদ জানাই, এবং সেই ছাত্রদেরও বিশেষ তারিফ করি, যারা দেশের বীর সৈনিকদের জন্য অবদান রেখেছিল ।

বন্ধুরা , ভারতের প্রতিটি গ্রামে, প্রতিটি শহরে, এরকম কিছু না কিছু ঘটে চলেছে যা আমাদের প্রেরণা দেয়। অনেকসময়েই এই প্রয়াসগুলি নিয়ে বেশি চর্চা হয়না, কিন্তু যখন আমরা এগুলির বিষয়ে জানতে পারি, তখন তখন এই বিশ্বাসটিই আরো মজবুত হয় যে দেশ তার আপনজনেদের শক্তিতেই এগিয়ে চলেছে। আমি চাই, আপনারাও নিজেদের চারপাশে এইসব প্রয়াসগুলির প্রতি নজর রাখুন। সমাজের জন্য যাঁরা ভালো কাজ করছেন, তাঁদের চিনে রাখুন, তাঁদের প্রশংসা করুন, তাঁদের থেকে শিখুন, আর সম্ভব হলে নিজেরাও কোনো ভালো কাজের সঙ্গে যুক্ত হন।

আগামী মাসে 'মন কি বাত'এ আরো কিছু অনুপ্রেরণামূলক কাহিনী নিয়ে আপনাদের কাছে আসব। অনেক অনেক ধন্যবাদ। নমস্কার।