PM Modi speaks at the 46th Indian Labour Conference
The country cannot be happy, if the worker is unhappy. As a society, we need to respect the Dignity of Labour: PM
If we want to move ahead, we need to give opportunities to our youth. Giving opportunities to apprentices is the need for the hour: PM Modi

केंद्र और राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न सरकारों के प्रतिनिधि बंधु गण,

ये भारत की श्रम-संसद है और एक लंबे अरसे से हमारे देश में त्रिपक्षीय वार्ता का सिलसिला चला है। एक प्रकार से ये त्रिपक्षीय वार्ता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ये अपने आप में एक उज्‍ज्‍वल इतिहास है कि 75 साल का हमारे पास एक गहरा अनुभव है। उद्योग जगत सरकार एवं श्रम संगठन गत 75 वर्ष से लगातार बैठ करके विचार-विमर्श करके मत भिन्‍नताओं के बीच भी मंथन करके अमृत निकालने का प्रयास करते रहे हैं। और उसी संजीवनी से देश को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और उसी कड़ी में आज यह श्रम संसद हो रहा है। हम सबके लिए प्रेरणा की बात है कि यह वो समारोह है जहां कभी बाबा साहेब अंबेडकर का मार्ग दर्शन मिला था। यह वो समारोह है जिसे कभी भारत के भूत-पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमान वीवी गिरि जी का मार्ग दर्शन मिला था। अनेक महानुभावों के पद चिन्‍हों पर चलते-चलते आज हम यहां पहुंचे हैं। समय का अपना एक प्रभाव होता है। आज से 70-75 साल पहले जिन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होती थी वो आज जरूरत नहीं होगी और आज जिन बिंदुओं पर विचार करने की आवश्‍यकता है हो सकता है 25 साल बाद वह भी काल बाह्य हो जाए, क्‍योंकि एक जीवंत व्‍यवस्‍था का यह लक्षण होता है, नित्‍य नूतन, नित्‍य परिवर्तनशील और अच्‍छे लक्षण की पूर्ति के लिए एकत्र होकर आगे बढ़ना है। इस बात में कोई दुविधा नहीं है। इस बात में कोई मत-मतांतर नहीं है कि राष्‍ट्र के निर्माण में श्रमिक का कितना बड़ा योगदान होता है, चाहे वो किसान हो मजदूर हो, वो unorganized लेबर का हिस्‍सा हो, और हमारे यहां तो सदियों से इन सबको एक शब्‍द से जाना जाता है- विश्‍वकर्मा। विश्‍वकर्मा के रूप में जिसको जाना जाता है, माना जाता है और इसलिए अगर श्रमिक रहेगा दुखी , तो देश कैसे होगा सुखी? और मैं नहीं मानता हूं कि इन मूलभूत बातों में हममें से किसी में कोई मतभेद है। मैं श्रम को एक महायज्ञ मानता हूं जिसमें कोटि अवधि लोग अपनी आहूति देते हैं। सिर्फ श्रम की नहीं, कभी-कभार तो सपनों की भी आहूति देते हैं और तब जा करके किसी ओर के सपने संजोए जा सकते हैं। अगर एक श्रमिक अपने सपनों को आहूत न करता तो किसी दूसरे के सपने कभी संजोए नहीं जा सकते। इतना बड़ा योगदान समाज के इस तबके का है और इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करते हुए हमने आगे किस दिशा में जाना है उस पर हमें आगे सोचना होगा। जब तक श्रमिक, मालिक- उनके बीच परिवार भाव पैदा नहीं होता है, अपनेपन का भाव पैदा नहीं होता है। मालिक अगर यह सोचता है कि वो किसी का पेट भरता है और श्रमिक यह सोचता है कि मेरे पसीने से ही तुम्‍हारी दुनिया चलती है तो मैं नहीं समझता कि कारोबार ठीक से चलेगा। लेकिन अगर परिवार भाव हो, एक श्रमिक का दुख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फैक्‍टरी का हुआ कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता | और यह जिम्‍मेवारी जब हम निभाएंगे तब जाकर के, मैं तो चाहूंगा कभी यह भी सोचा जा सकता है क्‍या। इन सारी चर्चाओं का कभी वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन होने की आवश्‍यकता है। ऐसे बड़े उद्योग और ऐसे छोटे उद्योग या मध्‍यम दर्जे के उद्योग 50 साल पुराने है, लेकिन कभी हड़ताल नहीं हुई है क्‍या कारण होगा। उसको चलाने वाले लोगों की सोच क्‍या रही होगी। उन्‍होंने उनके साथ किस प्रकार से नाता जोड़ा है, क्‍या हम आज नए उद्योगकारों को, establish उद्योगकारों को , उनको यह नमूना दिखा सकते हैं कि हमारे सामने, हमारे ही देश में, इसी धरती में ये 50 उद्योग ऐसे हैं जो 50 साल से चल रहे हैं। हजारों की तादाद में श्रमिक है। लेकिन न कभी संघर्ष हुआ है, न कभी हड़ताल हुई है, न उनकी कोई शिकायत, न इनकी कोई शिकायत। एक मंगलम माहौल जिन-जिन इकाईयों में है, कभी उनको छांटकर निकालना चाहिए और उस मंगलम का कारण क्‍या है, इस मंगल अवस्‍था को प्राप्‍त करने के उनके तौर तरीके क्‍या है। अगर इन चीजों को हम श्रमिकों के सामने ले जाएंगे, इन चीजों को हम उद्योगकारों के सामने ले जाएंगे तो उनको भली-भांति समझा सकते हैं और मंगलम का माहौल जहां होगा, वहां यह भी नजर आया होगा कि सिर्फ श्रमिक का असंतोष है, ऐसा नहीं है। वहां यह भी ध्‍यान में आया होगा कि उस उद्योग का विकास भी उतना ही हुआ होगा और उन श्रमिकों का विकास भी उतना ही हुआ होगा। जब तक हम इस भावनात्‍मक अवस्‍था को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास नहीं करते और जो सफल गाथाएं हैं और उन सफल गाथाओं को हम उजागर नहीं करते, मैं नहीं मानता हूं कि हम सिर्फ कानूनों के द्वारा बंधनों को लगाते-लगाते समस्‍याओं का समाधान कर पाएंगे। हां, कानून उनके लिए जरूरी है कि जो किसी चीज को मानने को तैयार नहीं होते, श्रमिक को इंसान भी मानने को तैयार नहीं होते। उनकी सुख-सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उसकी minimum आवश्‍यकताओं की ओर भी देखने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को कानूनों की उतनी ही जरूरत होती है और इसलिए हम इस व्‍यवस्‍था को उस रूप में समझकर चलाएं। एक सामाजिक दृष्‍टि से भी हमारे यहां सोचने की बहुत आवश्‍यकता है। किसी न किसी कारण से हमारे भीतर एक बहुत बड़ी बुराई पनप गई है। हमारी सोच का हिस्‍सा बन गई है। हर चीज को देखने के हमारे तरीके की आदत सा बन गयी है और वो है हम कभी भी श्रम करने वाले के प्रति आदर के भाव से देखते ही नहीं। कोई बढ़िया कपड़े पहन करके हमारे दरवाजे की घंटी बजाए, दोपहर दो बजे हम आराम से सोए हों, कोट-पैंट सूट पहनकर आए और घंटी बजाए तो नींद खराब होगी ही होगी, दरवाजा खोलेंगे और जैसे ही उसको देखेंगे तो कहेंगे आइए आइए कहां से आए हैं, क्‍या काम था, बैठिए-बैठिए। और कोई ऑटो रिक्‍शा वाले ने घंटी बजाई, पता नहीं चलता है दोपहर दो बजे हम सोते हैं, इस समय घंटी बजा दी। क्‍यों भई यह फर्क क्‍यों?



यह जो हमारी सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी कमी आई है सदियों के कारण आई हुई है। लेकिन कभी न कभी dignity of labour , श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक का सम्‍मान ये समाज के नाते अगर हम स्‍वभाव नहीं बनाएंगे तो हम हमारे श्रमिकों के प्रति जो कि उसके बिना हमारी जिन्‍दगी नहीं है, अगर कोई धोबी बढ़िया सा iron नहीं करता तो मैं कुर्ता पहनकर कहां से आता यहां और इसलिए जिनके भरोसे हमारी जिन्‍दगी है उनके प्रति सम्‍मान का भाव यह सामाजिक चरित्र कैसे पैदा हो, उसके लिए हम किस प्रकार से व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करे। हमारे बच्‍चों की पाठ्य पुस्‍तकों में उस प्रकार के syllabus कैसे आए ताकि सहज रूप से आनी वाली पीढ़ियां हमारे श्रमिक के प्रति सम्‍मान के भाव से देखने लगे। आप देखिए माहौल अपने आप बदलना शुरू हो जाएगा। हमारी सरकार को सेवा करने का अवसर मिला है, श्रम संगठनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है और त्रिपक्षीय बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं। कई पुरानी-पुरानी गुत्‍थियां हैं, सुलझानी है और मुझे विश्‍वास है कि देश के श्रमिकों के आशीर्वाद से इन गुत्‍थियों को सुलझाने में हम सफल होंगे और समस्‍याओं का समाधान करने में हम कोई न कोई रास्‍ते खोजते चलेंगे। और सहमति से कानूनों का भी परिवर्तन करना होगा। कानूनों में कोई कुछ जोड़ना होगा, कुछ निकालना होगा वो भी सहमति से करने का प्रयास, प्रयास करते ही रहना चाहिए और निरंतर प्रक्रिया चलती रही है, आगे भी चलती रहने वाली है। कोई भी सरकार आए, ये कोई आखिरी कार्यक्रम कभी होता नहीं है और इसलिए मैं समझता हूं कि इस प्रक्रिया का अपना महत्‍व है। मेरा विश्‍वास रहा है- ‘minimum government , maximum governance’ और इसलिए ये जो कानूनों के ढेर हैं कानूनों का ऐसा कहीं खो जाए इन्‍सान। पता नहीं इतने कानून बनाये कर रखे हुए और हरेक को अपने फायदे वाला कानून ढूंढ सकते हैं ऐसी स्थिति है। हर कोई उद्योगकार एक ही कानून में से उद्योगकार को अपने मतलब का कानून निकलाना है तो वो भी निकाल सकता है सामाजिक संगठन को निकालना है तो वो भी निकाल सकता है, सरकार को निकालना है तो वो भी निकाल सकती है। क्‍योंकि टुकड़ों में सब चीजें चलती रही हैं | जब तक हम एक एकत्रित भाव से, composite भाव से, हमें जाना कहां है उसको ले करके , और इसीलिए मैंने एक कमेटी भी बनाई है के इन सबमें जो पुराने कानूनों को जरा देखरेख में सही कैसे किया जाए। और सच्‍चे अर्थ में जिनके लिए बनाए गए हैं कानून उनको लाभ हो रहा है या नहीं हो रहा। वरना कोई और जगह पर ऐसा कानून बनके बैठा हुआ है जो इसको आगे ही नहीं जाने देता। अब श्रमिक कहां लड़ेगा, कहां जाएगा। वो क्‍या कोर्ट कचहरी में इतने महंगे वकील रखेगा क्‍या। और इसलिए मेरा यहा आग्रह है और मैं ये कोशिश कर रहा हूं कि ये कानूनों का एक बहुत बड़ा जाल हो गया है उसका सरलीकरण हो, गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी अपने हकों को भली भांति समझ पाएं, हकों को प्राप्‍त कर पाएं। ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को हमने विकसित करने की दिशा में हमारा प्रयास है और मेरा विश्‍वास है कि हम उसको कर पाएंगे। मैं कभी-कभी उद्योग जगत के मित्रों से भी कहना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कभी हमारे इस Forum में एक और पहलू पर भी हम सोच सकते हैं क्‍या, क्‍योंकि हमने अपने एजेंडे को बड़ा सीमित कर दिया है। और जब तक उसका दायरा नहीं बढ़ाऐंगे पूरे माहौल में बदलाव नहीं आएगा। कितने उद्योगार हैं जिन्‍होंने अपने उद्योग चलाते-चलाते ऐसा माहौल बनाया, ऐसी व्‍यवस्‍था बनाई कि खुद का ही काम करने वाला एक मजदूर आगे चल करके Entrepreneur बना। कभी ये ऐसे ही तो खोज के निकालना चाहिए क्‍या उद्योगकार का यही काम है क्‍या। क्‍या 18-20 साल की उम्र में उसके यहां आया वो 60 साल का होने के बाद किसी काम का न रहे तब तक उसी के यहां फंसा पड़ा रहे। क्‍या ऐसा माहौल कभी उसने बताया कि हां मेरे यहां मजदूर के यहां पे आया था लेकिन मैंने देखा भई उसमें बहुत बड़ी क्षमता है, टेलैंट है, थोड़ा मैं उसको सहारा दे दूं वो अपने-आप में एक Entrepreneur बन सकता है और मैं ही एक-आध पुर्जा बनाएगा तो मैं खुद खरीद लूंगा जो मेरी फैक्‍टरी के लिए जरूरी है तो एक अच्‍छा Entrepreneur तैयार हो जाएगा।



कभी न कभी हमें सोचना चाहिए हमारे देश में छोटे और मध्‍यम एवं बड़े उद्योगकार कितने हैं कि जो हर वर्ष अपने ही यहां काम करने वाले कितने मजदूरों को उद्योगकार बनाया हो, Entrepreneur बनाया हो, Supplier बनाया हो, कितनों को बनाया कभी ये भी तो हिसाब लगाया जाए। उसी प्रकार से हमने देखा है कि आईटी फर्म, उसके विकास का मूल कारण क्‍या है, IT Firm के विकास का मूल कारण यह है कि उन्‍होंने अपन employee को कहा कि कुछ समय तुम्‍हारा अपना समय है। तुम खुद सॉफ्टवेयर‍ विकसित करो, तुम अपने ‍दिमाग का उपयोग करो और ये motivation के कारण सॉफटेवयर की दुनिया में नई-नई चीजें वो लेकर के आए फिर वो कम्‍पनी की बनी और बाद में जा करके वो बिकी। अवसर दिया गया, हमारे इतने सारे उद्योग चल रहे हैं, मैन्‍युफैक्‍चरिंग का काम करते हैं, कैमिकल एक्टिविटी का काम करते हैं, क्‍या हमने हमारे यहां इस टैलेंट को innovation के लिए अवसर दिया है क्‍या? क्‍या उद्योगकारों को पता है कि जिसको आप अनपढ़ मानते हो, जिसको आप unskilled labour मानते हो, उसके अंदर भी वो ईश्‍वर ने ताकत दी है, वो आपकी फैक्‍टरी में एकाध चीज ऐसी बदल देता है, कि आपके प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी इतनी बढ़ जाती है, बाजार में बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हो जाता है, आप फायदा तो ले लेते हो लेकिन उसके innovation skill को recommend नहीं करते हो। मैं मानता हूं हमारे उद्योगकारों ने अपने जीवन में, सरकारों ने भी और श्रम संगठनों ने भी पूछना चाहिए कि कितने उद्योगकार हैं, कितने उद्योग हैं कि जहां पर इनोवेशन को बल दिया गया है। हर वर्ष कम से कम एक नया इनोवेटेड काम निकलता है क्‍या? हमारे यहां सेना के विशेष दिवस मनाए जाते हैं,आर्मी का, एयरफोर्स का, नेवी का। राष्‍ट्रपति जी, प्रधानमंत्री सब जाते हैं, एट-होम करते हैं वो, तो मैं पिछली बार जब हमारे सेना के लोगों के पास गया तो मैंने उनको कहा भई ठीक है ये आपका चल रहा है कि ये ही चलाते रहोगे क्‍या? हम आते हैं, 30-40 मिनट वहां रुकते हैं, चायपान होता है, फिर चले जाते हैं। मैंने कहा मेरा एक सुझाव है अगर आप कर सकते हो तो, तो बोले क्‍या है सर? मैंने कहा क्‍या फौज में ऐसे छोटे-छोटे लोग हैं क्‍या, सिपाही होंगे, छोटे-छोटे लोग हैं, लेकिन उन्‍होंने काम करते-करते कोई न कोई इनोवेशन किया है जो देश की सुरक्षा के लिए बहुत काम आता है। उसमें नया आइडिया, क्‍योंकि वो फील्‍ड में है, उसे पता रहता है कि इसके बजाय ऐसा करो तो अच्‍छा रहेगा। मैंने ये कहा तो फिर हमारे आर्मी के लोगों ने ढूंढना शुरू किया।

बहुत ही कम समय मिला था लेकिन कोई 12-15 लोगों को ले आए वो और जब उनकी innovations मैंने देखा, मैं हैरान था सेना के काम आनेवाली टेक्‍नोलॉजी के संदर्भ में, कपड़ों के संदर्भ में, इतने बारीक छोटी-छोटी चीजों में उन्‍होंने बदलाव लाकर के बताया था अगर इसको हम मल्‍टीप्‍लाई करें तो सेना के कितना बड़ा काम आएगा और भारत की रक्षा के लिए कितना बड़ा काम आएगा। लेकिन उस आखिरी इन्‍सान की तरफ देखता कौन है जी? उसकी क्षमता को कौन स्‍वीकार करता है? मुझे ये माहौल बदलना है कि मेरे उद्योगकार मित्र बहुत बड़ी डिग्री लेकर आया हुआ व्‍यक्ति ही दुनिया को कुछ देता है ऐसा नहीं है। छोटे से छोटा व्‍यक्ति भी दुनिया को बहुत कुछ दे करके जाता है, सिर्फ हमारी नजरों की तरफ नहीं होता है और इसलिए हम एक कल्‍चर विकसित कर सकते हैं, व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं कि जिसमें उन, और मैं तो चाहता हूं श्रमिक संगठन भी ऐसे लोगों को सम्‍मानित करें, उद्योग भी सम्‍मानित करें और सरकार भी श्रम संसद के समय सामान्‍य मजदूर ने की हुई इनोवेशन जिसने देश का भला किया हो, उसमा सम्‍मान करने का कार्यक्रम करके हम श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़ाएं उस दिशा में हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमें एक नए तरीके से चीजों को कैसे सोचना चाहिए, नई चीजों में कैसे बदलाव लाना चाहिए, उस पर सोचने की आवश्‍यकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर हमेशा मजदूर क्‍यों रहे? उसी प्रकार से कुछ लोग ऐसे होते हैं कि पिताजी एक कारखाने में काम करते हैं, बेटा भी साथ जाना शुरू कर दिया, और वहीं काम करते, करते, करते एकाध चीज सीख लेता है और अपनी गाड़ी चला लेता है। उसके पास ऑफिशियल कोई डिग्री नहीं होती है, कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है और उसके लिए वो हमेशा उस उद्योगकार की कृपा पर जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे बड़ा शोषणा क्‍या हो सकता है कि उसको जो जिसके यहां उसके पिताजी काम करते थे, अब उसको वहीं पर काम करना पड़ रहा है, क्‍यों, क्‍योंकि उसके पास स्किल है लेकिन स्किल को दुनिया के अंदर ले जाने के लिए एक जो सर्टिफिकेट चाहिए वो नहीं है तो कोई घुसने नहीं देता है और वो भी कहीं जाने की हिम्‍मत नहीं करता है, उसको लगता है चलिए ये ही मेरे मां-बाप हैं उन्‍होंने ही मेरे बाप को संभाला था, मुझे भी संभाल लिया, चलिए भई जो दें मैं काम कर लूंगा। इससे बड़ी कोई अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती हमारी। और इसको बदलने का मेरे भीतर एक दर्द बढ़ा था और उसी में से हमने एक योजना बनाई है और मैं मानता हूं ये योजना श्रमिक के जीवन को और मैं नहीं मानता किसी श्रमिक संगठनों ने इस पर ध्‍यान गया होगा। कभी उसने सोचा नहीं होगा कि कोई सरकार श्रमिकों के लिए सोचती है तो कैसे सोचती है? हमने कहा कि जो परम्‍परागत इस प्रकार के शिक्षा पाए बिना ही चीजों को करता है भले ही उसकी उम्र 30 हो, 40 हो गई, 50 हो गई होगी, सरकार ने उसको सर्टिफाई करना चाहिए,official recognition देना चाहिए, official government का सर्टिफिकेट देना चाहिए ताकि उनका confidence लेवल बढ़ेगा, उसका मार्केट वैल्‍यू बढ़ेगा और वो एक उद्योगकार के यहां कभी अपाहिज बन करके जिन्‍दगी नहीं गुजारेगा। हमने officially ये decision लिया है।



कहने का तात्‍पर्य ये है कि हमें इन दिशाओं में सोचने की आवश्‍यकता है। हमें बदलाव करने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं। इसी प्रकार से एक बात की ओर ध्‍यान देने की मैं आवश्‍यकता समझता हूं, इसको कोई गलत अर्थ न निकाले, कोई बुरा न माने। कभी-कभार, जब चर्चा होती है कि उद्योग की भलाई, ये बात ठीक है कि देश की भलाई के लिए उद्योगों का विकास आवश्‍यक है, उद्योग की भलाई और उद्योगपति की भलाई, इसमें बहुत ही बारीक रेखा होती है। देश की भलाई और सरकार की भलाई इसमें बहुत बारीक रेखा होती है। श्रम संगठन की भलाई और श्रमिक की भलाई, बहुत बारीक रेखा होती है। और इसलिए इस बारीक रेखा की नजाकत को कभी-कभार उद्योग बचाना चाहते हैं लेकिन उनमें कभी-कभार हम उद्योगपति को बचा लेते हैं। कभी-कभार हम बात तो कर लेते हैं देश को बचाने की लेकिन कोशिश सरकार को बचाने की करते हैं। और उसी प्रकार से कभी-कभार हम बात श्रमिक की करते हैं लेकिन हम कोशिश हमारे श्रम संगठन की सुरक्षा की करते हैं। हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं, हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं और तीनों ने इस बारीक रेखा की मर्यादाओं को स्‍वीकार करना होगा, letter and spirit को स्‍वीकार करना होगा तब मैं मानता हूं श्रमिक का भी भला होगा, देश के उद्योग के विकास की यात्रा भी चलेगी और देश का भी भला होगा, सरकारों की भलाई के लिए नहीं चलता होगी। और इसलिए इन मूलभूत बातों की ओर हम कैसे मिल-बैठ करके एक सकारात्‍मक माहौल बनाने के भी दस कदम हो सकते हैं, श्रमिक की भलाई के दस कदम हो सकते हैं आवश्‍यक है तो राष्‍ट्र को आगे बढ़ाने की भी दस कदम हो सकते हैं वो भी इसके साथ-साथ आना चाहिए। जब तक हम इन बातों को संतुलित रूप से आगे नहीं ले जाएंगे, तब तक हम माहौल बदलने में सफल नहीं होंगे। और मुझे विश्‍वास है कि आज की श्रम संसद में बैठ करके हम लोग उस माहौल को निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़गे। भारत में 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 साल से कम आयु की है। हमारा देश एक प्रकार से विश्‍व का सबसे नौजवान देश है। आज दुनिया को skilled workforce की आवश्‍यकता है। Skill Development और Skill India ये मिशन हमारे नौजवानों को रोजगार कैसे मिले, अगर हम जो आज रोजगारी में है जो हमारे संगठन के सदस्‍य हैं, उनकी चिन्‍ता कर-करके बैठेंगे तो हो सकता है कि उनके हितों का भी भला हो जाएगा, उनकी रक्षा भी हो जाएगी, दो-चार चीजें हम उनको दिलवा भी देंगे लेकिन यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्ति ऐसी सीमित सोच वाला नहीं है ये मेरा विश्‍वास है। यहां बैठा हुआ हर व्‍यक्ति जो आज श्रमिक है उनकी तो चिन्‍ता करता ही करता है, लेकिन जो नौजवान बेरोजगार हैं जिनको कहीं न कहीं काम मिल जाए, इसकी उसको तलाश है, हमें उनके दरवाजे बंद करने का कोई हम नहीं है। जब तक हम हमारे देश के और नौजवानों कोरोजगार देने के लिए अवसर उपलब्‍ध नहीं कराएंगे तो हम जाने-अनजाने में गरीब का कहीं नुकसान तो नहीं कर देंगे। हो सकता है वो आज गरीब है श्रमिक नहीं बन पाया है, वो दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है और इसीलिए सरकार ने एक initiative लिया है apprenticeship को प्रोत्‍साहन देना। हमें जान करके हैरानी होगी, हम सबको लगता है हमारा देश आगे बढ़ना चाहिए और कभी पीछे रहता है तो हमीं लोग कहते हैं देखो बातें बड़ी करते थे,वो तो वहां पहुंच गया ये यहां रह गया, ये हम करते ही हैं। लेकिन जो पहुंचे हैं, आज चीन के अंदर जो भी साम्‍यवादी विचार से चलने वाले मूलभूत तो लोग हैं। चीन के अंदर दो करोड़ apprenticeship पर लोग काम कर रहे हैं,चीन के अंदर। जापान में एक करोड़ apprenticeship में काम कर रहे हैं। जर्मनी बहुत छोटा देश है, हमारे देश के किसी राज्‍य से भी छोटा देश है वहां पर तीस लाख लोग apprenticeship के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे आज दुख के साथ कहना चाहिए, सवा सौ करोड़ का हिन्‍दुस्‍तान,सिर्फ तीन लाख लोग apprenticeship पर काम कर रहे हैं। मेरे नौजवानों का क्‍या होगा मैं पूछना चाहता हूं।मैं सभी श्रमिक संगठनों से पूछना चाहता हूं कि इन नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए। इन नौजवानों के लिए अवसर खुलने चाहिए कि नहीं खुलने चाहिए। और भारत को आगे बढ़ाना है तो हमारे skill को काम में लाने के लिए ये हमें अवसर देना पड़ेगा। सरकारों ने, उद्योगकारों ने भी सोचना होगा इसलिए कि कानून के दायरे में फंस जाएंगे इसलिए कोई apprenticeship किसी को देनी नहीं, किसी नौजवान को अवसर नहीं देना, ये उद्योगकार जो दरवाजे बंद करके बैठे हैं, मैं नहीं मानता हूं ये लम्‍बे अरसे तक दरवाजे बंद करके बैठ पाएंगे। देश का नौजवान लम्‍बे अरसे तक इन्‍तजार नहीं करेगा। और इसलिए मैं उद्योगकारों को विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि आपका दायित्‍व बनता है, मुनाफा कम होगा, होगा लेकिन अगर इतनी मात्रा में आपके यहां श्रमिक हैं तो इतनी मात्रा में apprenticeship, ये आपकी social responsibility का हिस्‍सा बनना चाहिए। और इस प्रकार से क्‍या हम सपना नहीं दे सकते। दो करोड़ कर न पायें ठीक है, जब कर पाएंगे, कर पाएंगे अभी कम से कम तीन लाख में से 20 लाख apprenticeship पर जा सकते हैं हम क्‍या। कम से कम इतना तो करें। करोड़ों नौजवानों को रोजगार चाहिए, कहीं से तो शुरू करें। और इसलिए मैं चाहूंगा कि जो श्रमिक आज हैं उनकी चिन्‍ता करने वाले लोगों का ये भी दायित्‍व है कि जिनकी श्रमिक बनने की संभावना है उनकी जिन्‍दगी की भीचिन्‍ता उस नौजवान की भी करने की आवश्‍यकता है जो गरीब है। पिछले 16 अक्‍टूबर को हमने श्रमेव जयते के अभियान की शुरुआत की थी। ये सर्वांगीण प्रयास है हमारा। जिन सुविधाओं की शुरुआत हमने की उनकी प्रगति आप सबकी नजर में है। यूनिवर्सल एकाउंट नम्‍बर (यूएएन) इसके माध्‍यम से प्रोविडेंट फंड के एकाउंट पोर्टेबल हो गए हैं बल्कि लगभग 4 करोड़ 67 लाख मजदूरों को digital network platform का already लाभ मिलना शुरू हो गया है। पीएफपी ऑनलाईन लाभ ले रहा है ये चीजें नहीं थीं, इन चीजों का वो लाभ ले रहा है ये ही तो श्रमिक को empower करने के लिए टेक्‍नोलॉजी का सदुपयोग करने का प्रयास किया है। जब हम सरकार में आए हमारे देश में कई लोग ऐसे थे कि जिनको पचास रुपये पेंशन मिलता था, अस्‍सी रुपये पेंशन मिलता था, सौ रुपये पेंशन मिलता था,कुछ लोग तो पेंशन लेने के लिए जाते नहीं थे क्‍योंकि पेंशन से ऑटोरिक्‍शा का खर्चा ज्‍यादा होता था। इस देश में करीब-करीब बीस लाख से अधिक ऐसे श्रमिक थे जिनको पचास रुपया, सौ रुपया, दौ सौ रुपया पेंशन मिलता था। हमने आ करके, बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लगा है, सबके लिए minimum पेंशन एक हजार रुपया कर दिया है। मैं आशा करता हूं कि हमारे श्रमिक संगठन, ये हमारा जो pro-active initiative है उसके प्रति भी उस भाव से देखें ताकि हम सबको मिल करके दौड़ने का आनंद आ जाए,चार नई चीजें करने का उमंग आ जाए क्‍योंकि हमें चलना नहीं है और मुझे मैं मानता हूं, अगर इस देश में इतने सारे प्रधानमंत्री हो गए होंगे लेकिन श्रमिकों पर किसी एक प्रधानमंत्री पर सबसे ज्‍यादा हक है तो मुझ पर। क्‍योंकि मैं उसी बिरादरी से निकल कर आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और इसलिए गरीब के हाल को समझने के लिए मुझे कैमरामैन को लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।मैं उसको भली-भांति समझता हूँ और इसलिए जो बातें मैं बता रहा हूं। भीतर एक आग है, कुछ करना है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, वंचित, दलित, पीड़ित शोषित उनके लिए कुछ करना है। लेकिन हरेक के करने की सोच अलग होगी, रास्‍ते अलग होंगे। हमारी एक अलग सोच है, अलग रास्‍ते है लेकिन लक्ष्‍य यही है कि मेरे देश के मजदूर का भला हो, मेरे देश के गरीब का भला हो, मेरे देश के किसानों का भला हो, ये सपने लेकर के हम चल पड़े हैं। और इसलिए जैसा मैंने कहा हमने apprentice sector में सुधार किया। हमने on the job training के मौके बढ़ गए हैं, उस दिशा में हमने काम किया है। आज हमने हेल्‍थ को सेक्‍टर को ESIC 2.0 स्‍कीम को लांच किया है। हम कभी-कभार ये तो देखते हैं कि भई काम मिलना चाहिए, लेकिन कैसे मिले, मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है। उसके लिए न सरकारों को फुरसत है, न श्रमिक संगठनों को फुरसत है। उनको तो लगता है देखो यार, कागज पर दिखा दे, ये तुमको दिलवा दिया या नहीं दिलवा दिया। वो श्रमिक भी बड़ा खुश है, यार मैं इसका मेम्‍बर बन गया हूं मेरा काम हो गया। मैं इस स्‍थिति को बदलना चाहता हूं। मैं श्रमिक संगठन और सरकार की पाटर्नरशिप से आगे बढ़ना चाहता हूं। कंधे से कंधा मिलाकर के आगे चलना चाहता हूं और अगर हमने ये अस्‍पतालों की व्‍यवस्‍था को बदलने की दिशा में काम किया, अब छोटा निर्णय है कि भई हर दिन चद्दर बदलो। अब मुझे बताइए health की दृष्‍टि से, hygiene की दृष्‍टि से, ये सब जानते हैं कि बदलनी चाहिए और लोग मानते होंगे कि बदलें, लेकिन हमको मालूम है कि लोग नहीं बदलते। ठीक है, आया है patient पड़ा है। आखिरकार मुझे रास्‍ता खोजना पड़ा, मैंने कहा हर दिन की चद्दर का कलर ही अलग होगा, patient को पता चलेगा कि चद्दर बदली कि नहीं बदली। हमारे देश के बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है वो मुझे सवाल करते रहते हैं कि मोदी कुछ बड़ा ले आओ, कुछ बड़ा। बहुत सरकारें बड़ा-बड़ा ले आईं। मुझे तो मेरे गरीब के लिए जीना है, मेरे गरीब के लिए कुछ काम करना है इसलिए मेरा दिमाग इसी में चलता रहता है। यही, यही मैं सोच, और मैं दिल से बातें कर रहा हूं कि ये अन्‍य जो कई चीजें लाए हैं। हम चाहते हैं कि श्रमिक की हेल्‍थ को लेकर के चिन्‍ता होनी चाहिए, होनी चाहिए। और हमने उस दिशा में हमने एक तो उसके सारे हेल्‍थ रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए ताकि अब उसको अपना ब्‍लड टेस्‍ट का क्‍या हुआ, यूरिन टेस्‍ट का क्‍या हुआ, दुनिया भर में चक्‍कर नहीं काटना पड़ेगा। अपने मोबाइल फोन पर सारी चीजें उपलब्‍ध हो जाएं ये व्‍यवस्‍था की है ताकि श्रमिक को सुविधा कैसे हो, हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। और मैं मानता हूं कि उस काम के कारण उसको लाभ होगा।



आज हमारे देश में असंगठित मजदूर कुल मजदूरों का 93 पर्सेंट है। इस सरकार ने असंगठित मजदूरों के संबंध में बहुत ही constructive way में और well planned way में योजनाएं बनाई हैं और हम आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा कैसे मिले। न उसे स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा है, न जीवन बीमा है और न हीं पेंशन है और बड़ी संख्‍या में असंगठित ग्रामीण मजदूर अनपढ़ हैं, जिन्‍हें अपनी बात कहां कहना है, कैसे पहुंचे, इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। ऐसे मजदूर के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में सरकार का उत्‍तरदायित्‍व मानता हूं। देश के गरीब, असंगठित वर्गों को ध्‍यान में रख करके हमने तीन महत्‍वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं । और ये योजनाएं गरीब के लिए हैं। अमीर का उससे कोई लेना-देना नहीं है। और मैं मानता हूं, सभी श्रमिक संगठनों से मैं आग्रह करूंगा कि आप भी इस बात में मदद कीजिए। अगर किसी के घर में, हम कई यहां संगठन है जो असंगठित मजदूरों का काम करते हैं। कुछ लोग हैं जो घरों में बर्तन साफ करने वाले लोग होते हैं, उनका संगठन चलाते हैं। क्‍या हम कोशिश नहीं करे तो उसके मालिकों को मिल करके कहे कि भई आपके यहां ये लड़का कपड़े धोता है, बर्तन साफ करता है या खाना पकाता है या गाड़ी चलाता है। या आपका धोबी है। इसके लिए ये-ये सरकार की स्‍कीम है। आप एक मालिक हो, इसके लिए इतना पैसा बैंक में डालो, उसका जीवन भरा हो जाएगा। मैं मानता हूं हर कोई इसको करेगा। हम मध्‍यम वर्ग के लोगों को भी अगर समझाएंगे कि भई तुम्‍हारे साथ काम करने वाले जो गरीब लोग है उनको इन स्‍कीम का फायदा तुम दो। तुमको कोई महंगा नहीं पड़ने वाला है, तुम्हारे लिए तो एक फाइव स्‍टार होटल का एक खाने से ज्‍यादा का खर्च नहीं है। लेकिन उस गरीब की तो जिन्‍दगी बदल जाएगी और इसलिए हमने अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन जयोति बीमा योजना और मैं बताऊं यानी एक महीने का एक रुपया,12 महीने का 12 रुपया। एक स्‍कीम ऐसी है एक दिन का सिर्फ 80-90 पैसा। साल भर का 330 रुपया। लेकिन उसको जीवन भर उसकी व्‍यवस्‍था मिल सकती है। ये काम उसके मालिक, जिसके वहां वह काम करता है, वो कर सकते हैं और श्रमिक संगठन एक सामाजिक काम के तौर पर इस बात को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार से कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। मुझे लगता है कि इसका उसको फायदा होगा और हमने यह फायदा दिलवाना चाहिए। व्‍यवस्‍थाएं हैं, योजनाएं हैं। अटल पेंशन योजना। अगर आज से उसको जोड़ दिया जाए, समझा दिया जाए उसका तो जीवन धन्‍य हो जाएगा कि भई चलो 60 साल के बाद मुझे ये लाभ मिलेगा। मैं समझता हूं कि हम एक सामाजिक चेतना जगाने का भी काम करें, सामाजिक बदलाव का भी काम करें और उस काम को आगे बढ़ाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत सारी बातें हम कर पाएंगे। कई विषय है जिसको मैं आपके सामने रखता ही चला जाता हूं। लेकिन मुझे विश्‍वास है कि इस श्रम संसद के अंदर जो कुछ भी महत्‍वपूर्ण चर्चाएं हो रही है। हमारे वित्‍त मंत्री और उनकी एक कमेटी बनी है जो उनको सुन रही है। और बातचीत से ही अच्‍छे नतीजे निकलते हैं, सुखद परिणाम निकलेंगे। कल भी मेरी श्रम संगठन के प्रमुख लोगों के साथ मुझे मिलने का अवसर मिला था, उनको सुनने का अवसर मिला था और मैं भली-भांति उनकी बात को, उनकी भावनाओं को समझता हूं। मिल-बांट करके हमें आगे बढ़ना है और हम देश को आगे बढ़ाने में कैसे काम आएं, देश को आर्थिक नई ऊंचाइयों पर कैसे ले जाएं, देश में नौजवानों को अधिकतम रोजगार के अवसर कैसे उपलब्‍ध कराएं।

आज भारत के सामने मौका है विश्‍व के परिदृश्‍य में भारत के सामने मौका है। यह मौका अगर हमने खो दिया तो फिर पता नहीं हमारे हाथ में कब मौका आएगा और उस काम को लेकर आगे बढ़ें इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस श्रम सांसद को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, उत्‍तर परिणाम निकलेंगे इस भरोसे के साथ और साथ मिल करके आगे चलेंगे इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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ನನ್ನ ಪ್ರಿಯ ದೇಶ ಬಾಂಧವರೆ, ನಮಸ್ಕಾರ. ‘ಮನದ ಮಾತಿನ’ ಮೂಲಕ ಮತ್ತೊಮ್ಮೆ ನಿಮ್ಮನ್ನು ಸಂಪರ್ಕಿಸುತ್ತಿರುವುದು ನನಗೆ ಬಹಳ ಸಂತೋಷವೆನಿಸಿದೆ. ದೇಶದ ವಿವಿಧ ಭಾಗಗಳಲ್ಲಿ, ನಮ್ಮ ಜನರು ರಾಷ್ಟ್ರ ಮತ್ತು ಸಮಾಜದ ಹಿತದೃಷ್ಟಿಯಿಂದ ಸಾಕಷ್ಟು ಗಮನಾರ್ಹ ಕೆಲಸಗಳನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಿದ್ದಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರ ಪ್ರಯತ್ನಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಕೇಳಿದಾಗ, ನಮ್ಮಲ್ಲಿ ಹೊಸ ಸ್ಫೂರ್ತಿಯ ಸೆಲೆ ಹುಟ್ಟುತ್ತದೆ. ಇಂದು, ಅಥ್ಲೆಟಿಕ್ಸ್ ಕ್ಷೇತ್ರದಲ್ಲಿ ಅಂತಹ ಒಂದು ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಸಾಧನೆಯ ಕುರಿತು ಪ್ರಸ್ತಾಪಿಸುವ ಮೂಲಕ ನಾನು ಈ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮವನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಲು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ. ಕೆಲವೇ ದಿನಗಳ ಹಿಂದೆ, ಜಾರ್ಖಂಡ್‌ನ ರಾಂಚಿಯಲ್ಲಿ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಹಿರಿಯ ಅಥ್ಲೆಟಿಕ್ಸ್ ಫೆಡರೇಶನ್ ಸ್ಪರ್ಧೆ ನಡೆಯಿತು. ಈ ಸ್ಪರ್ಧೆಯಲ್ಲಿ ಸುಮಾರು 800 ಕ್ರೀಡಾಪಟುಗಳು ಭಾಗವಹಿಸಿದ್ದರು. ದೇಶದ ಮೂಲೆ ಮೂಲೆಗಳಿಂದ ಅವರನ್ನು ಅಭಿನಂದಿಸಲಾಯಿತು. ಈ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ, ನಾಲ್ಕು ವಿಭಿನ್ನ ಸ್ಪರ್ಧೆಗಳಲ್ಲಿ ನಾಲ್ಕು ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ದಾಖಲೆಗಳನ್ನು ಮುರಿಯಲಾಯಿತು. ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್ ಸಿಂಗ್, ವಿಶಾಲ್ ಟಿ.ಕೆ., ತೇಜಸ್ವಿನ್ ಶಂಕರ್, ದೇವ್ ಮೀನಾ ಮತ್ತು ಕುಲದೀಪ್ ಕುಮಾರ್ - ಈ ಕ್ರೀಡಾಪಟುಗಳು ತಮ್ಮ ತಮ್ಮ ವಿಭಾಗಗಳಲ್ಲಿ ಹೊಸ ದಾಖಲೆಗಳನ್ನು ಸ್ಥಾಪಿಸಿದರು. ಮೊದಲನೆಯದಾಗಿ, ಅವರೆಲ್ಲರಿಗೂ ನನ್ನ ಹೃತ್ಪೂರ್ವಕ ಅಭಿನಂದನೆಗಳನ್ನು ಸಲ್ಲಿಸುತ್ತೇನೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ, ದೇಶಾದ್ಯಂತ 100 ಮೀಟರ್ ಓಟದ ಸ್ಪರ್ಧೆ ಬಹಳಷ್ಟು ಚರ್ಚೆಗೆ ಗ್ರಾಸವಾಗಿದೆ. ಕೇವಲ ಎರಡು ದಿನಗಳ ಅವಧಿಯಲ್ಲಿ, ಪುರುಷರ 100 ಮೀಟರ್ ಓಟದ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ದಾಖಲೆಯನ್ನು ಮೂರು ಬಾರಿ ಮುರಿಯಲಾಯಿತು. ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್ ಸಿಂಗ್ ಮತ್ತು ಅನಿಮೇಶ್ ಕುಜುರ್ ಈ ಅಸಾಧಾರಣ ಸಾಧನೆ ಮಾಡಿದ ಇಬ್ಬರು ಕ್ರೀಡಾಪಟುಗಳಾಗಿದ್ದಾರೆ. ಈ ಬಾರಿಯ 'ಮನದ ಮಾತು' ನಲ್ಲಿ ಈ ಇಬ್ಬರು ಕ್ರೀಡಾಪಟುಗಳೊಂದಿಗೆ ಮಾತನಾಡಬೇಕೆಂದು ನಾನು ಬಯಸಿದೆ.

(PHONE CALL)

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ಅನಿಮೇಶ್-ಜಿ, ನಮಸ್ಕಾರ. ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್, ನಿಮಗೂ ನಮಸ್ಕಾರ—ಸತ್ ಶ್ರೀ ಅಕಾಲ್.

ಅನಿಮೇಶ್, ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್: ನಮಸ್ಕಾರ, ಸರ್. ನಮಸ್ಕಾರ, ಸರ್.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ಸರಿ, ಸೋದರನೆ, ನೀವಂತೂ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಅದ್ಭುತವಾದ ಸಾಧನೆಗೈಯ್ದಿದ್ದೀರಿ. ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರ ಜೋಡಿ ಅಪಾರ ಸಾಧನೆ ಮೆರೆದಿದೆ. ಸಂಗೀತ ಕ್ಷೇತ್ರದಲ್ಲಿ ನಾವು ಅನೇಕ ಬಾರಿ *ಜುಗಲ್ಬಂದಿ* ಗಳನ್ನು ನೋಡಿದ್ದೇವೆ, ಆದರೆ ಈಗ ನಾವು ಕ್ರೀಡಾ ಕ್ಷೇತ್ರದಲ್ಲಿಯೂ *ಜುಗಲ್ಬಂದಿ* ಯನ್ನು ನೋಡುತ್ತಿದ್ದೇವೆ - ಅಲ್ಲಿ ಒಬ್ಬ ವ್ಯಕ್ತಿ ಸವಾಲನ್ನು ಒಡ್ಡಿದರೆ, ಇನ್ನೊಬ್ಬರು ತಕ್ಷಣವೇ ಅದನ್ನು ಎದುರಿಸಲು ಸನ್ನದ್ಧರಾಗಿ ನಿಲ್ಲುತ್ತಾರೆ, ಆದರೆ ಮೊದಲಿಗರು ಮತ್ತೊಮ್ಮೆ ಉಚ್ಚ ಮಟ್ಟವನ್ನು ಏರುತ್ತಾರೆ. ಇದು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಆಸಕ್ತಿಕರ ಸಾಹಸಗಾಥೆಯಾಗಿದೆ. 'ಮನದ ಮಾತು' ಕೇಳುಗರು ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರ ಬಗ್ಗೆ ಚೆನ್ನಾಗಿ ಅರಿತುಕೊಳ್ಳಬೇಕು ಮತ್ತು ನಿಮ್ಮ ಅಸಾಧಾರಣ ಸಾಧನೆಗಳ ಬಗ್ಗೆ ತಿಳಿದುಕೊಳ್ಳಬೇಕು ಎಂದು ನಾನು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ.

ಅನಿಮೇಶ್: ನಮಸ್ತೆ, ಸರ್. ನನ್ನ ಹೆಸರು ಅನಿಮೇಶ್ ಕುಜುರ್. ನಾನು 200 ಮೀಟರ್ ಮತ್ತು 400 ಮೀಟರ್ ಓಟಗಳಲ್ಲಿ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ದಾಖಲೆ ಮಾಡಿದ್ದೇನೆ, ಮತ್ತು ನಾನು ಛತ್ತೀಸ್‌ಗಢ ಮೂಲದವನು ಸರ್. ಪ್ರಸ್ತುತ, ನಾನು ಒಡಿಶಾವನ್ನು ಪ್ರತಿನಿಧಿಸುತ್ತಾ ಸ್ಪರ್ಧಿಸುತ್ತಿದ್ದೇನೆ.

2021 ರಲ್ಲಿ ನಾನು ಶಾಲೆಯಿಂದ ಪಾಸಾದ ತಕ್ಷಣ ಅಥ್ಲೆಟಿಕ್ಸ್‌ನಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಪಯಣ ಆರಂಭವಾಯಿತು. ನಾನು ಅಂಬಿಕಾಪುರದ ಸೈನಿಕ್ ಶಾಲೆಯ ಹಳೆಯ ವಿದ್ಯಾರ್ಥಿ. ಹಿಂದೆ, ನಾನು ಫುಟ್ಬಾಲ್ ಆಡುತ್ತಿದ್ದೆ. ಆದಾಗ್ಯೂ, COVID-19 ಸಾಂಕ್ರಾಮಿಕ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ನನ್ನ ಪೋಷಕರು ನನಗೆ, ಓಡಲು ಅಥವಾ ಆಟವಾಡಲು ಹೊರಗೆ ಹೋಗಲು ಸ್ವಲ್ಪ ಅವಕಾಶ ನೀಡುತ್ತಿದ್ದರು. ಸಾಂಕ್ರಾಮಿಕ ರೋಗ ಕಡಿಮೆಯಾಗಲಾರಂಭಿಸಿದಾಗ, ಫುಟ್ಬಾಲ್ ತಂಡದ ನನ್ನ ಸ್ನೇಹಿತರು ರಾಜ್ಯ ಕ್ರೀಡಾಕೂಟ ನಡೆಯಲಿದೆ ಎಂದು ನನಗೆ ಮಾಹಿತಿ ನೀಡಿದರು ಮತ್ತು ಭಾಗವಹಿಸಲು ನನ್ನನ್ನು ಪ್ರೋತ್ಸಾಹಿಸಿದರು. ನಾನು ಭಾಗವಹಿಸಿದ್ದೆ - ಆ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಈ ಸ್ಪರ್ಧೆಯು ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಮಟ್ಟಕ್ಕೆ ಆಯ್ಕೆಗೆ ವೇದಿಕೆ ಎಂಬುದು ನನಗೆ ತಿಳಿದಿರಲಿಲ್ಲ. ಅಲ್ಲಿಂದ, ನಾನು ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ತಂಡಕ್ಕೆ ಆಯ್ಕೆಯಾದೆ, ಮತ್ತು ಇಂದು, ಅಂತರರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ವೇದಿಕೆಯಲ್ಲಿ ಭಾರತವನ್ನು ಪ್ರತಿನಿಧಿಸುವ ಸೌಭಾಗ್ಯ ನನಗೆ ಲಭಿಸಿದೆ.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ಮತ್ತು ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್ ಅವರೇ ನಿಮ್ಮ ಬಗ್ಗೆ ಹೇಳುವಿರಾ?

ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್: ನಮಸ್ತೆ, ಸರ್. ನನ್ನ ಹೆಸರು ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್. ನಾನು ಭಾರತೀಯ ನೌಕಾಪಡೆಯಲ್ಲಿ Patty Officer ಆಗಿ ಸೇವೆ ಸಲ್ಲಿಸುತ್ತಿದ್ದೇನೆ. ಪ್ರಸ್ತುತ ನಾನು ಭಾರತದ ಅತ್ಯಂತ ವೇಗದ ಓಟಗಾರನಾಗಿದ್ದೇನೆ. ನಾನು ಇತ್ತೀಚೆಗೆ 100 ಮೀಟರ್ ಓಟದ ಸ್ಪರ್ಧೆಯಲ್ಲಿ 10.09 ಸೆಕೆಂಡುಗಳ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ದಾಖಲೆಯನ್ನು ಸ್ಥಾಪಿಸಿದ್ದೇನೆ. 10.1-ಸೆಕೆಂಡ್ ನ ಸವಾಲನ್ನು ಮುರಿದ ಮೊದಲ ಭಾರತೀಯ ಕ್ರೀಡಾಪಟು ನಾನು. ಟ್ರ್ಯಾಕ್‌ನಲ್ಲಿ ಜೊತೆಗೆ ಸಮವಸ್ತ್ರದ ಧರಿಸಿ ಕೂಡಾ ನನ್ನ ದೇಶಕ್ಕೆ ಸೇವೆ ಸಲ್ಲಿಸಲು ಶ್ರಮಿಸುತ್ತಿದ್ದೇನೆ. ನನ್ನ ತಂದೆ ಮತ್ತು ಅಜ್ಜ ಇಬ್ಬರೂ ಕ್ರೀಡಾಪಟುಗಳಾಗಿದ್ದರು. ದೀಪಾವಳಿ ಅಥವಾ ಹೊಸ ವರ್ಷದಂತಹ ಹಬ್ಬ ಬಂದಾಗಲೆಲ್ಲಾ ನಾವು ನಮ್ಮ ಮನೆಗಳನ್ನು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಸ್ವಚ್ಛಗೊಳಿಸುವುದು ಭಾರತದ ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕ ಸಂಪ್ರದಾಯ. ಹಾಗಾಗಿ, ನಾನು ನನ್ನ ತಂದೆಯ ಟ್ರೋಫಿಗಳು ಮತ್ತು ಪದಕಗಳನ್ನು ಆಗ ಸ್ವಚ್ಛಗೊಳಿಸುತ್ತಿದ್ದೆ. ಆ ಕೆಲಸವು ನನಗೆ ತುಂಬಾ ಆನಂದದಾಯಕವಾಗಿತ್ತು ಮತ್ತು ಅದು ನನಗೆ ತುಂಬಾ ಸಂತೋಷವನ್ನುಂಟುಮಾಡಿತು. ನಾನು ಯಾವುದೇ ಒಂದು ನಿರ್ದಿಷ್ಟ ಟ್ರೋಫಿಯನ್ನು ಸ್ವಚ್ಛಗೊಳಿಸಿದಾಗಲೆಲ್ಲಾ, ನಾನು ಅವರನ್ನು ಕೇಳುತ್ತಿದ್ದೆ: "ಅಪ್ಪಾ, ನೀವು ಈ ಟ್ರೋಫಿಯನ್ನು ಎಲ್ಲಿ ಗೆದ್ದಿದ್ದೀರಿ? ನೀವು ಈ ಪದಕವನ್ನು ಎಲ್ಲಿ ಗೆದ್ದಿದ್ದೀರಿ? ಈ ಛಾಯಾಚಿತ್ರವನ್ನು ಯಾವಾಗ ತೆಗೆಯಲಾಗಿದೆ?" ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯೆಯಾಗಿ, ಅವರು ತಮ್ಮ ಕಥೆಗಳನ್ನು ನನ್ನೊಂದಿಗೆ ಹಂಚಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಿದ್ದರು - ಸ್ಪರ್ಧಿಸಲು ನಾನು ಇಲ್ಲಿಗೆ ಆಡಲು ಹೋಗಿದ್ದೆ, ನಾನು ಈ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಪದಕ ಗೆದ್ದೆ, ನನ್ನ ತಂಡವನ್ನು ಈ ರೀತಿ ಗೆಲ್ಲಿಸಿದೆ, ಎಂದೆಲ್ಲ ವಿವರಿಸುತ್ತಿದ್ದರು. ಅವರ ಕಥೆಗಳಿಂದ ಪ್ರೇರಿತನಾಗಿ, "ಅಪ್ಪಾ, ನಾನು ಕೂಡ ಯಾವುದಾದರೂ ಕ್ರೀಡೆಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳಬಯಸುತ್ತೇನೆ" ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಿದ್ದೆ. ಅವರು ಪ್ರತಿದಿನ ಬೆಳಿಗ್ಗೆ ಓಟಕ್ಕೆ ಹೋಗುತ್ತಿದ್ದರಿಂದ, ನಾನು ಅವರನ್ನು "ಅಪ್ಪಾ, ದಯವಿಟ್ಟು ನಿಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ನನ್ನನ್ನು ಕರೆದುಕೊಂಡು ಹೋಗು" ಎಂದು ಕೇಳಲು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದೆ. ಆದ್ದರಿಂದ, ಅವರು ನನ್ನನ್ನು ಕರೆದುಕೊಂಡು ಹೋಗಲು ಪ್ರಾರಂಭಿಸುತ್ತಿದ್ದಂತೆ, ತಾವು ಕ್ರೀಡೆಯಲ್ಲಿ ಕಲಿತ ಕೌಶಲ್ಯಗಳನ್ನು ನನಗೆ ಹೇಳಿಕೊಡಲಾರಂಭಿಸಿದರು. ಹಾಗಾಗಿ, ಅದರಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಆಸಕ್ತಿ ಬೆಳೆಯಲಾರಂಭಿಸಿತು. ಉಸೇನ್ ಬೋಲ್ಟ್ ಅವರ ವಿಶ್ವ ದಾಖಲೆ ಮುರಿಯುವುದನ್ನು ನಾನು ಕಣ್ಣಾರೆ ಕಂಡೆ. ಇದಕ್ಕೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ಒಂದು ಮೋಜಿನ ಸಂಗತಿಯಿದೆ. ಒಂದು ದಿನ ನಾನು ಟಿವಿ ನೋಡುತ್ತಿದ್ದಾಗ ನನ್ನ ತಾಯಿ ಅದನ್ನು ಆಫ್ ಮಾಡಿ, "ಮಗನೇ, ಈಗ ಓದುವ ಸಮಯ; ಓದಿಕೊಳ್ಳಲು ಹೋಗು" ಎಂದು ಹೇಳಿದರು. ಆಗ, ನಾನು "ಸರಿ, ನೀನು ಈಗ ನನಗೆ ಟಿವಿ ನೋಡಲು ಬಿಡುವುದಿಲ್ಲ, ಆದರೆ ಒಂದು ದಿನ ನೀನು ಟಿವಿ ಪರದೆಯ ಮೇಲೆ ನನ್ನನ್ನು ಹುಡುಕುವೆ - ನನ್ನನ್ನು ತೋರಿಸಿ 'ನೋಡಿ, ಗುರಿಂದರ್ ಓಡುತ್ತಿದ್ದಾನೆ!' ಎಂದು ಹೇಳುವ ದಿನ ಬರುತ್ತದೆ" ಎಂದು ಸವಾಲು ಹಾಕಿದೆ. ಮತ್ತು ನಿಜಕ್ಕೂ, ನನ್ನ ತಾಯಿ ನಾನು ದೂರದರ್ಶನದಲ್ಲಿ ಓಡುವುದನ್ನು ನೋಡಿದಾಗಲೆಲ್ಲಾ ಅದು ನನಗೆ ಅಪಾರ ಸಂತೋಷವಾಗುತ್ತದೆ.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ವಾಹ್, ವಾವ್, ವಾವ್! ನಿಮ್ಮದಂತೂ ಬಹಳ ಅದ್ಭುತವಾದ ಭಾವನೆ!

ಗುರಿಂದರ್ ವೀರ್: ಹೌದು, ಸರ್. ನನ್ನದು ಮಧ್ಯಮ ವರ್ಗದ ಕುಟುಂಬ. ಇದಲ್ಲದೆ, ನನ್ನ ತಂದೆ ಸ್ವತಃ ವಾಲಿಬಾಲ್ ಆಡುತ್ತಿದ್ದರು; ಆದರೆ, ಮನೆಯ ಸಮಸ್ಯೆಗಳಿಂದಾಗಿ, ಅವರು ತಮ್ಮ ಕ್ರೀಡಾ ವೃತ್ತಿಜೀವನವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಬೇಕಾಯಿತು. ಅವರ ಸ್ವಂತ ಕನಸು ನನಸಾಗಲಿಲ್ಲ. ನನ್ನ ಮೂಲಕ ಆ ಕನಸನ್ನು ನನಸಾಗಿಸುವ ಸಾಮರ್ಥ್ಯವನ್ನು ಅವರು ಕಂಡರು - ಅವರ ಮಗ ಅದನ್ನು ನನಸಾಗಿಸುವವನು ಎಂದು ನಂಬಿದ್ದರು. ನಾನು ಆಗಾಗ್ಗೆ ಅವರೊಂದಿಗೆ ಚರ್ಚಿಸುತ್ತಿದ್ದೆ, ಮತ್ತು ಮಿಲ್ಖಾ ಸಿಂಗ್‌ ಎಷ್ಟು ಶ್ರಮಿಸುತ್ತಿದ್ದರು ಎಂಬುದರ ಕುರಿತು ಕಥೆಗಳನ್ನು ನಾನು ಗಮನವಿಟ್ಟು ಕೇಳುತ್ತಿದ್ದೆ. ನಾನು ನನ್ನ ತಂದೆಗೆ, "ಒಂದು ದಿನ, ನಾನು ನಿಮ್ಮ ಕನಸನ್ನು ನನಸು ಮಾಡುವೆ” ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಿದ್ದೆ.

ಆಗ ತಂದೆಯವರು, ಕನಸುಗಳು ಹಾಗೆ ನನಸಾಗುವುದಿಲ್ಲ, ಅವುಗಳಿಗೆ ಅಪಾರ ಪ್ರಮಾಣದ ಕಠಿಣ ಪರಿಶ್ರಮ - ಸಂಪೂರ್ಣ ಏಕಾಗ್ರತೆ ಮತ್ತು ಪ್ರಯತ್ನ ಬೇಕಾಗುತ್ತದೆ ಎಂದು ಹೇಳಿದರು. ಮಿಲ್ಖಾ ಸಿಂಗ್ ಅವರು ಕಠಿಣ ಪರಿಶ್ರಮದಿಂದಾಗಿ ರಕ್ತವನ್ನು ವಾಂತಿ ಮಾಡಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಿದ್ದರು. ಬಿರು ಬಿಸಿಲಿನಲ್ಲಿ ಓಡುತ್ತಿದ್ದರು. ಅವರು ದಿನವಿಡೀ ತರಬೇತಿ ಪಡೆಯುತ್ತಿದ್ದರು; ಅವೆಲ್ಲ ನನಗೆ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಸ್ಫೂರ್ತಿದಾಯಕವಾಗಿದ್ದವು. ನಾನು ಓಡಿದರೆ, ನನ್ನ ದೇಶಕ್ಕಾಗಿ ಓಡುತ್ತೇನೆ - ಪದಕ ಗೆದ್ದು ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ಕೀರ್ತಿ ತರುತ್ತೇನೆ ಎಂಬ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ನನ್ನಲ್ಲಿ ತುಂಬಿದ ನನ್ನ ತಂದೆ ನಿರಂತರ ಸ್ಫೂರ್ತಿಯ ಸೆಲೆಯಾಗಿದ್ದರು, ಇದಲ್ಲದೆ, ನಾನು 100 ಮೀಟರ್ ಓಟವನ್ನು ನನ್ನ ಸ್ಪರ್ಧೆಯಾಗಿ ಆರಿಸಿಕೊಂಡಾಗ, ಎಲ್ಲರೂ ನನ್ನನ್ನು ತಡೆಯಲು ಯತ್ನಿಸಿದರು, "100 ಮೀಟರ್ ಓಟವನ್ನು ಆಯ್ಕೆ ಮಾಡಬೇಡಿ; ಇದು ಭಾರತೀಯರಿಗಾಗಿ ಅಲ್ಲ. ಭಾರತೀಯರ ದೇಹ ರಚನೆ 100 ಮೀಟರ್ ಓಟಕ್ಕಾಗಿ ಸೂಕ್ತವಲ್ಲ" ಎಂದು ಹೇಳಿದರು. ಆದರೆ ನನ್ನ ತಂದೆ ಮತ್ತು ನಾನು ಯಾವಾಗಲೂ ದೃಢವಾಗಿದ್ದೆವು, "ಗುರಿಂದರ್, ನಾವು ನಮ್ಮ ಆಯ್ಕೆಯನ್ನು ಮಾಡಿದ್ದೇವೆ ಮತ್ತು ಹಿಂದೆ ಸರಿಯುವ ಮಾತೇ ಇಲ್ಲ. ನಾವದನ್ನು ಮಾಡಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳಿಕೊಳ್ಳುವವರಿಗೆ, ಖಂಡಿತ ಮಾಡಿ ತೋರಿಸುವ ಮೂಲಕ ಅವರು ತಪ್ಪು ಎಂದು ಸಾಬೀತುಪಡಿಸೋಣ. ನೀನು ಸಾದಿಸಿ ತೋರಿಸುವೆ. ನನಗೆ ನಿನ್ನ ಮೇಲೆ ಸಂಪೂರ್ಣ ನಂಬಿಕೆ ಇದೆ." ಎಂದು ತಂದೆ ಹೇಳುತ್ತಿದ್ದರು. ನನ್ನ ತಂದೆ ನನ್ನ ಮೇಲೆ ಅಷ್ಟೊಂದು ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ಇಟ್ಟಾಗ, ನಾನು ಆ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ನನ್ನ ಆಂತರಿಕ ಶಕ್ತಿಯಾಗಿಸಿಕೊಂಡು ಮುನ್ನಡೆದಿದ್ದೇನೆ. ಇಂದು, ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬ ಭಾರತೀಯನೂ Sprint ರನ್ನಿಂಗ್ ನಲ್ಲಿ ಮುಂದುವರಿಯುವಂತೆ ಹುರಿದುಂಬಿಸುತ್ತಿದ್ದಾನೆ.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ನೋಡಿ, ನೀವಿಬ್ಬರೂ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಅಸಾಧಾರಣವಾದದ್ದನ್ನು ಸಾಧಿಸಿದ್ದೀರಿ. ಕೇವಲ ಎರಡು ದಿನಗಳ ಅವಧಿಯಲ್ಲಿ, ನೀವು ಜೊತೆಯಾಗಿ ಮೂರು ಬಾರಿ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ದಾಖಲೆಯನ್ನು ಮುರಿದಿದ್ದೀರಿ. 100 ಮೀಟರ್ ಓಟದ ಬಗ್ಗೆ - ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್ ಹೇಳಿದಂತೆ - ಜನರು ಸಾಮಾನ್ಯವಾಗಿ ಭಾರತೀಯ ದೇಹವು ಈ ಸ್ಪರ್ಧೆಗೆ ಸೂಕ್ತವಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ. ಇಷ್ಟೆಲ್ಲ ಸಂಕಷ್ಟಗಳ ಮಧ್ಯೆಯೂ, ನೀವು ಪರಿಶ್ರಮಪಟ್ಟು ಈ ಸಾಧನೆಗೈದಿದ್ದೀರಿ. “ನಿಮ್ಮ ಯಶಸ್ಸಿನ ಹಿಂದಿನ ಉತ್ಸಾಹ, ದೃಢನಿಶ್ಚಯ, ಮನಸ್ಥಿತಿ ಎಂಥದ್ದು, ಏನು ಯೋಚಿಸಿದ್ದೀರಿ? ಹೇಗೆ ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡುತ್ತಿದ್ದಿರಿ ಎಷ್ಟು ಕಷ್ಟಕರ ಈ ಪ್ರಕ್ರಿಯೆ?” ಎಂದು ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರನ್ನೂ ನಾನು - ಮತ್ತು 'ಮನದ ಮಾತು' ಕೇಳುಗರೂ ಸಹ ಆಲಿಸಬಯಸುತ್ತಾರೆ.

ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್: ಹೌದು ಸರ್. ನಾನು ಗುರಿಂದರ್. ಆರಂಭದಲ್ಲಿ, ಸರ್, ಬಹಳಷ್ಟು ಸಂಕಷ್ಟಗಳನ್ನು ಎದುರಿಸಿದೆ. ನಾನು ಸರಿಯಾದ ಮಾರ್ಗದಲ್ಲಿದ್ದೇನೆಯೇ ಅಥವಾ ನಾನು ಸರಿಯಾದ ಆಯ್ಕೆ ಮಾಡಿದ್ದೇನೆಯೇ ಎಂಬ ಸಂದೇಹಗಳು ಹಲವು ಬಾರಿ ಮೂಡಿದವು - ಏಕೆಂದರೆ ಪ್ರತಿ ಬಾರಿಯೂ ನೀವು ಗೆಲ್ಲುವುದಿಲ್ಲ; ಕೆಲವೊಮ್ಮೆ, ನೀವು ಸರಳವಾಗಿ ಕಲಿಯುತ್ತೀರಿ. ನಾನು ಸೋಲನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿದಾಗಲೆಲ್ಲಾ, ನನ್ನ ಪ್ರದರ್ಶನವು ನಿರೀಕ್ಷೆಗಳನ್ನು ತಲುಪಲು ಸಾಧ್ಯವಾಗದಿದ್ದಾಗಲೆಲ್ಲಾ, ಅಥವಾ ನಾನು ಗಾಯಗೊಂಡಾಗಲೆಲ್ಲಾ, ನನ್ನ ಕುಟುಂಬವು ನನ್ನೊಂದಿಗೆ ನಿಂತು ಬೆಂಬಲವನ್ನು ನೀಡುತ್ತಿತ್ತು. ಅವರು ನನಗೆ ಧೈರ್ಯ ತುಂಬುತ್ತಾ, "ಪರವಾಗಿಲ್ಲ, ಒಂದು ದಿನ ಉತ್ತಮವಾಗಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ಒಂದು ವರ್ಷ ಅಷ್ಟೊಂದು ಉತ್ತಮವಾಗಿಲ್ಲ ಎಂದರೆ ನಿಮ್ಮ ಇಡೀ ಜೀವನ ಹಾಳಾಯ್ತು ಎಂದಲ್ಲ."ಎಂದಿಗೂ ಕನಸು ಕಾಣುವುದನ್ನು ನಿಲ್ಲಿಸಬಾರದು. ಎಂದು ಹುರಿದುಂಬಿಸುತ್ತಿದ್ದರು. ನನ್ನ ತರಬೇತುದಾರ ಕೂಡ ನನಗೆ ಈ ಪಾಠವನ್ನು ಕಲಿಸಿದರು: "ನೀನು ಇದನ್ನು ಸಾಧಿಸಲಾಗದಿದ್ದರೆ, ಬೇರೆ ಯಾರಿಗೂ ಇದು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ." ಹೀಗಾಗಿ, ನಮ್ಮ ಸಮುದಾಯ - ನಮ್ಮ ಸುತ್ತಮುತ್ತಲಿನ ಜನರು - ಈ ರೀತಿ ನಮ್ಮನ್ನು ಪ್ರೋತ್ಸಾಹಿಸಿದಾಗ ಮತ್ತು ಹುರಿದುಂಬಿಸಿದಾಗ, ನಮ್ಮ ಪ್ರೇರಣೆಗೆ ಎಂದಿಗೂ ಧಕ್ಕೆಯಾಗುವುದಿಲ್ಲ.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ಅನಿಮೇಶ್-ಅವರೆ…

ಅನಿಮೇಶ್: ಸರ್, 2021 ರಲ್ಲಿ, ನಾನು ಮೊದಲು ಅಥ್ಲೆಟಿಕ್ಸ್‌ ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದಾಗ, ಎಲ್ಲರೂ ನನಗೆ, "ನೋಡಿ, ಇದು ಹೊಸ ಕ್ಷೇತ್ರ; ನಿಮ್ಮಿಂದ ಇದು ಸಾಧ್ಯವೋ ಇಲ್ಲವೋ ಎಂದು ಸಂಶಯ ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸುತ್ತಿದ್ದರು. ಆಗ ನಾನು, "ಈ ಕ್ಷೇತ್ರಕ್ಕೆ ನಾನು ಕಾಲಿಟ್ಟಿದ್ದೇನೆ, ನಾನು ಅದನ್ನು ನಿಭಾಯಿಸಿಯೇ ತೀರುತ್ತೇನೆ." ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಿದ್ದೆ. ನನ್ನ ತಂದೆ ಕೂಡ ನನಗೆ ನಿರಂತರವಾಗಿ ನೆನಪಿಸುತ್ತಿದ್ದರು: "ನೀನು ಈ ಕ್ಷೇತ್ರಕ್ಕೆ ಪ್ರವೇಶಿಸಿ ಆಗಿದೆ ಎಂದಾದ ಮೇಲೆ, ಎಂದಿಗೂ ಹಿಂತಿರುಗಿ ನೋಡಬೇಡಿ. ಎಲ್ಲರೂ ಇದನ್ನು ಮಾಡುವ ಅಥವಾ ಅದನ್ನು ಮಾಡುವ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸುತ್ತಾರೆ, ಆದರೆ ಬಹಳ ಕಡಿಮೆ ಜನರು ಮಾತ್ರ ಅದನ್ನು ಅನುಸರಿಸುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಅದನ್ನು ಸಾಧಿಸುತ್ತಾರೆ. ನೀನು ಈ ಕ್ಷೇತ್ರ ಪ್ರವೇಶಿಸಿದ್ದೀಯಾದ್ದರಿಂದ, ಅದಕ್ಕೆ ಬದ್ಧವಾಗಿರು; ಇದರಲ್ಲೇ ಮುಂದುವರಿ ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಿದ್ದರು. ನಿನಗೆ ಬೇಕಾದ ಎಲ್ಲವನ್ನೂ ನಾವು ಒದಗಿಸುತ್ತೇವೆ. ಕುಟುಂಬ ಬೆಂಬಲ, ಆರ್ಥಿಕ ಬೆಂಬಲ - ನಾವು ಎಲ್ಲವನ್ನೂ ನೋಡಿಕೊಳ್ಳುತ್ತೇವೆ. ನೀನು ಕಷ್ಟಪಟ್ಟು ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡುವುದರ ಮೇಲೆ ಗಮನ ಕೇಂದ್ರೀಕರಿಸು ಮತ್ತು ಭಾರತೀಯರು ಸಹ ಓಡಬಹುದು ಎಂದು ಭಾರತಕ್ಕೆ ತೋರಿಸು ಎನ್ನುತ್ತಿದ್ದರು. ಜನರು ನನಗೆ ಮತ್ತು ಇತರರಿಗೆ ಹೇಳುತ್ತಿದ್ದರು - 'ಸಬ್-10' ಅಥವಾ 'ಸಬ್-10.1' ಸ್ಪ್ರಿಂಟ್ ರನ್ನಿಂಗ್ ಗೆ ಭಾರತೀಯರ ಆನುವಂಶಿಕ ರಚನೆ ಸೂಕ್ತವಾಗಿಲ್ಲ ಎಂದು. ಆದರೆ ಈಗ, ಭಾರತೀಯರು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಅದನ್ನು ಮಾಡಬಹುದು ಎಂದು ನಾವಿಬ್ಬರೂ ಸಾಬೀತುಪಡಿಸಿದ್ದೇವೆ. ಇದು ನಮಗೆ ತುಂಬಾ ಕಷ್ಟಕರವೇನಲ್ಲ. ನಾವು ಏನನ್ನಾದರೂ ಸಾಧಿಸಲು ಸಮರ್ಥರಾಗಿದ್ದೇವೆ." ಆದ್ದರಿಂದ, ಸರ್, ಈ ಎಲ್ಲಾ ವಿಷಯಗಳು ನನ್ನನ್ನು ಬಹಳ ಪ್ರೇರೇಪಿಸುತ್ತವೆ. ನಾವು ನಮ್ಮ ತರಬೇತಿಯನ್ನು ಮುಂದುವರಿಸುತ್ತಿದ್ದಂತೆ, ನಿರಂತರವಾಗಿ ನಮ್ಮ ವೈಯಕ್ತಿಕ ದಾಖಲೆಗಳನ್ನು ಮುರಿಯುತ್ತಿದ್ದೇವೆ. ಇದು ಇತರ ಭಾರತೀಯರಿಗೂ - ಅವರು ಸಹ ಅಂತಹ ಸಾಧನೆಗಳನ್ನು ಸಾಧಿಸಬಹುದು ಎಂಬುದನ್ನು ಸ್ಪಷ್ಪಡಿಸುತ್ತಿದೆ. ನಾವು ಇನ್ನೂ ಹೆಚ್ಚಿನದನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಉದ್ದೇಶ ಹೊಂದಿದ್ದೇವೆ, ಸರ್. ಇದಲ್ಲದೆ, ಮುಂಬರುವ ಕಾಮನ್‌ವೆಲ್ತ್ ಕ್ರೀಡಾಕೂಟಕ್ಕೆ ನಾವಿಬ್ಬರೂ ಆಯ್ಕೆಯಾಗಿರುವುದರಿಂದ, ಆ ಸ್ಪರ್ಧೆಯಲ್ಲಿ ಇನ್ನೂ ಉತ್ತಮ ಪ್ರದರ್ಶನ ನೀಡಲು ದೃಢನಿಶ್ಚಯ ಕೈಗೊಂಡಿದ್ದೇವೆ.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ಸರಿ, ನೋಡಿ— ನನ್ನ ಮನದಲ್ಲೂ ಒಂದು ಕುತೂಹಲವಿದೆ, ಮತ್ತು ಇತರರಿಗೂ ಹಾಗೆಯೇ ಇರಬಹುದು ಎಂದುಕೊಳ್ಳುತ್ತೇನೆ. ನೀವಿಬ್ಬರೂ ಒಳ್ಳೆಯ ಸ್ನೇಹಿತರು ಎಂದು ನಾನು ಕೇಳಿದ್ದೇನೆ. ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರ ನಡುವೆ ಏನಾದರೂ ಒಪ್ಪಂದ ಅಥವಾ ಸ್ನೇಹಪರ ಪೈಪೋಟಿ ನಡೆಯುತ್ತಿದೆಯೇ - "ನೀನು ನನ್ನ ದಾಖಲೆಯನ್ನು ಮುರಿದರೆ, ನಾನು ನಿನ್ನ ದಾಖಲೆಯನ್ನು ಮುರಿಯುತ್ತೇನೆ"? ಎಂದು. ಅನಿಮೇಶ್, ನೀವೇಕೆ ಈ ಕುರಿತು ಮೊದಲು ಹೇಳಬಾರದು?

ಅನಿಮೇಶ್: ಸರ್, ಹಿಂದಿನ ದಾಖಲೆ 10.18 ಸೆಕೆಂಡುಗಳದ್ದಾಗಿತ್ತು - ಅದು ನಾನೇ ಮಾಡಿದ ದಾಖಲೆ. ನಂತರ, ಸೆಮಿಫೈನಲ್‌ನಲ್ಲಿ, ಸೋದರ ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್ 10.17 ಸೆಕೆಂಡುಗಳ ಸಮಯದೊಂದಿಗೆ ಅದನ್ನು ಮುರಿದರು. ತರುವಾಯ, ಎರಡನೇ ಸೆಮಿಫೈನಲ್‌ನಲ್ಲಿ, ನಾನು 10.15 ಸೆಕೆಂಡುಗಳ ಸಮಯದೊಂದಿಗೆ ಮತ್ತೊಮ್ಮೆ ದಾಖಲೆ ಮಾಡಿದೆ. ಆದ್ದರಿಂದ, ಆ ಕ್ಷಣದಲ್ಲಿ - ನನ್ನ ಸೆಮಿಫೈನಲ್ ನಡೆದಾಗ - ನಾವಿಬ್ಬರೂ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಸಂತೋಷಪಟ್ಟೆವು. "ಹೌದು, ಇದು ಅದ್ಭುತ! ಇಂದು ದಾಖಲೆ ಮುರಿಯಿತು. ಮತ್ತು ನಾವಿಬ್ಬರೂ - ಒಟ್ಟಿಗೆ ಅದನ್ನು ಮುರಿದಿದ್ದೇವೆ” ಎಂದು. ಏಕೆಂದರೆ, ಸ್ಪರ್ಧೆಯ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಸ್ವಾಭಾವಿಕವಾಗಿ ಪೈಪೋಟಿಯ ಭಾವನೆ ಇದ್ದರೂ, ನಾವಿಬ್ಬರೂ ಮೊದಲೇ ದೃಢ ನಿರ್ಧಾರವನ್ನು ಮಾಡಿದ್ದೆವು. ವಾಸ್ತವವಾಗಿ, ಇದಕ್ಕೂ ಮೊದಲು, ನಾವು ಸೌದಿ ಅರೇಬಿಯಾಕ್ಕೆ ಸ್ಪರ್ಧಿಸಲು ಪ್ರಯಾಣಿಸಿದ್ದೆವು ಮತ್ತು ನಾವು ಅಲ್ಲಿಯೂ ರೂಮ್‌ಮೇಟ್‌ಗಳಾಗಿದ್ದೆವು. ಆಗಲೂ, ಭಾರತೀಯ spint running ಮುಂದಕ್ಕೆ ಕೊಂಡೊಯ್ಯುವುದು ನಮ್ಮ ಕರ್ತವ್ಯ, ಆ ಜವಾಬ್ದಾರಿ ನಮ್ಮ ಮೇಲಿದೆ ಮತ್ತು ನಮ್ಮ ಸಾಧನೆ ಎಲ್ಲರನ್ನೂ ಪ್ರೇರೇಪಿಸಲು ಸಹಾಯ ಮಾಡುತ್ತದೆ ಎಂದು ನಾವು ಚರ್ಚಿಸುತ್ತಿದ್ದೆವು.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್, ನೀವು ಏನು ಹೇಳ ಬಯಸುತ್ತೀರಿ?

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ನಾವಿಬ್ಬರೂ ಅಸಾಧಾರಣ ಪ್ರದರ್ಶನ ನೀಡುವುದೆಂದು ನಿರ್ಧರಿಸಿದ್ದೆವು. ಆದ್ದರಿಂದ, ನಮ್ಮಲ್ಲಿ ಯಾರಿಗಾದರೂ ಏನಾದರೂ ಅಗತ್ಯವಿದ್ದಾಗ - ಸರ್ - ನಾವು ಪರಸ್ಪರ ಬೆಂಬಲಕ್ಕೆ ನಿಲ್ಲುತ್ತೇವೆ. ಉದಾಹರಣೆಗೆ, ದಾಖಲೆ ಸ್ಥಾಪಿಸುವ ಮುನ್ನ- ಮೊದಲು ನಾನು ದಾಖಲೆಯನ್ನು ಮುರಿದೆ, ನಂತರ ಅನಿಮೇಶ್ ದಾಖಲೆ ಮಾಡಿದರು. ನಾವು ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡುತ್ತಿದ್ದಾಗ, ನಾನು ಅನಿಮೇಶ್‌ಗೆ ಪಾಯಿಂಟರ್‌ಗಳನ್ನು ನೀಡುತ್ತಿದ್ದೆ: "ಅನಿಮೇಶ್, ಆ ಆರಂಭಿಕ ಬ್ಲಾಕ್ ಸರಿಯಾಗಿ ಕಾಣುತ್ತದೆ; ಅಲ್ಲಿ ಕುಳಿತು stride ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡು. ಇಲ್ಲಿ ನಮ್ಮ ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡೋಣ - ಈ ಸ್ಥಳ ಅದಕ್ಕೆ ಸೂಕ್ತವಾಗಿದೆ." ಎಂದು. ಆದ್ದರಿಂದ, ನಾವು ಒಬ್ಬರಿಗೊಬ್ಬರು ಸಹಾಯ ಮಾಡುತ್ತೇವೆ; ನಾವು ಪರಸ್ಪರ ಸಹಾಯ ಮಾಡಿದಾಗ, ಇನ್ನೊಬ್ಬ ವ್ಯಕ್ತಿ ಸುಧಾರಿಸುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ನಾವು ಸಹ ಸುಧಾರಿಸುತ್ತೇವೆ. ಆ ಸ್ನೇಹಭಾವ ಅತ್ಯಗತ್ಯ. ಆದರೆ ಸರ್, ನಾವು ಟ್ರ್ಯಾಕ್‌ನಿಂದ ಹೊರಗಿದ್ದಾಗ - ಸ್ಪರ್ಧೆಯ ಕ್ಷೇತ್ರದ ಹೊರಗೆ ನಾವು ಸ್ನೇಹಿತರು. ಆದರೆ ನಾವು ಟ್ರ್ಯಾಕ್‌ಗೆ ಕಾಲಿಟ್ಟ ಕ್ಷಣ, ನಾವು ಸ್ಪರ್ಧಿಗಳಾಗುತ್ತೇವೆ. ಆ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ಮನಸ್ಥಿತಿಯು "ನಾನು ಅವನಿಗಿಂತ ವೇಗವಾಗಿ ಓಡಲಿದ್ದೇನೆ" ಮತ್ತು "ನಾನು ಇವನಿಗಿಂತ ವೇಗವಾಗಿ ಓಡಲಿದ್ದೇನೆ!" ಎಂಬುದಕ್ಕೆ ಬದಲಾಗುತ್ತದೆ.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ನೋಡಿ, ನಿಮ್ಮಲ್ಲಿ ಸ್ಪರ್ಧೆ ಎಂಬುದು ರಾಷ್ಟ್ರದ ಪ್ರತಿಷ್ಠೆಯನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸಲು - ಭವಿಷ್ಯದಲ್ಲಿ ದೇಶವನ್ನು ಹೊಸ ಎತ್ತರಕ್ಕೆ ಕೊಂಡೊಯ್ಯಲು ಕೈಗೊಳ್ಳಲಾಗಿದೆ ಮತ್ತು ನೀವು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಸಕಾರಾತ್ಮಕ ಮನೋಭಾವದಿಂದ ಅದರಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿದ್ದೀರಿ. ನಿಮ್ಮ ಈ "ಕ್ರೀಡಾ ಮನೋಭಾವ" - ಸ್ಪರ್ಧಿಸುವುದು, ಪರಸ್ಪರ ಸವಾಲು ಹಾಕುವುದು, ಮುಂದೆ ಸಾಗಲು ಶ್ರಮಿಸುವುದು ಮತ್ತು ಪರಸ್ಪರ ಮುಂದುವರಿಯಲು ಸಹಾಯ ಮಾಡುವುದರ ನಡುವಿನ ಸಮತೋಲನ - ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಗಮನಾರ್ಹವಾಗಿದೆ ಎಂದು ನಾನು ದೃಢವಾಗಿ ನಂಬುತ್ತೇನೆ. ನೀವು ಅದ್ಭುತವಾದ ಕೆಲಸ ಮಾಡಿದ್ದೀರಿ. ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರಿಗೂ ನನ್ನ ಹೃತ್ಪೂರ್ವಕ ಅಭಿನಂದನೆಗಳು ಮತ್ತು ಶುಭಾಶಯಗಳನ್ನು ಸಲ್ಲಿಸುತ್ತೇನೆ. ನೀವು ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ಕೀರ್ತಿ ತರುತ್ತೀರಿ ಎಂದು ನನಗೆ ಸಂಪೂರ್ಣ ನಂಬಿಕೆ ಇದೆ. ಇದೇ ರೀತಿ ಶ್ರಮಿಸುತ್ತಿರಿ; ನೀವು ಹೆಚ್ಚಿನ ಪ್ರಗತಿಯನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಗುರಿ ಹೊಂದಿದ್ದೀರಿ. ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರಿಗೂ ನನ್ನ ಹೃತ್ಪೂರ್ವಕ ಶುಭಾಶಯಗಳು.

ಗುರಿಂದರ್‌ವೀರ್ / ಅನಿಮೇಶ್: ಧನ್ಯವಾದಗಳು ಸರ್. ತುಂಬಾ ಧನ್ಯವಾದಗಳು.

ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ: ತುಂಬಾ ಧನ್ಯವಾದಗಳು.

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ನನ್ನ ಪ್ರೀತಿಯ ದೇಶಬಾಂಧವರೆ,

ಈ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ದೇಶದ ಬಹು ಭಾಗಗಳಲ್ಲಿ ಬಿಸಿಲಿನ ತಾಪ ಹೆಚ್ಚಾಗಿದೆ. ಸುಡುವ ಸೂರ್ಯ ಮತ್ತು ಬಿಸಿ ಗಾಳಿಯಂತಹ ಹವಾಮಾನದ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ನಿಮ್ಮನ್ನು ನೀವು ಕಾಪಾಡಿಕೊಳ್ಳುವುದು ಅತ್ಯಗತ್ಯ. ನೀರು ಕುಡಿಯುತ್ತಿರಿ. ನೀವು ಬಿಸಿಲಿನಲ್ಲಿ ಹೊರಗೆ ಹೋಗಬೇಕಾದರೆ, ಎಚ್ಚರಿಕೆಯಿಂದ ಹೋಗಿ. ಅಲ್ಲದೆ, ಈ ನಿಟ್ಟಿನಲ್ಲಿ ವಿವಿಧ ಸರ್ಕಾರಿ ಇಲಾಖೆಗಳು ಹೊರಡಿಸಿದ ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಅನುಸರಿಸುವುದನ್ನು ಮರೆಯಬೇಡಿ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ನಮ್ಮ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಬೇಸಿಗೆಯನ್ನು ಎದುರಿಸಲು ಪರಿಹಾರಗಳು ಹೆಚ್ಚಾಗಿ ನಮ್ಮ ಅಡುಗೆಮನೆಗಳಲ್ಲಿ ಕಂಡುಬರುತ್ತವೆ. ತಾಪಮಾನ ತೀವ್ರಗೊಳ್ಳುತ್ತಿದ್ದಂತೆ, ನಮ್ಮ ಮನೆಗಳಲ್ಲಿನ ಸ್ವಾದ ಬದಲಾಗುವುದನ್ನು, ಪಾಕ ಪದ್ಧತಿ ರೂಪಾಂತರಗೊಳ್ಳುವುದನ್ನು ನೀವು ಸಹ ಗಮನಿಸಿರಬಹುದು. ಕೆಲವು ಸ್ಥಳಗಳಲ್ಲಿ, ನೀರಿಗಾಗಿ ಮಣ್ಣಿನ ಮಡಕೆಗಳನ್ನು ಬಳಸಲಾರಂಭಿಸಿದರೆ, ಇನ್ನು ಕೆಲವೆಡೆ, ಮೊಸರನ್ನು ಹೆಪ್ಪು ಹಾಕಿ ಸಿದ್ಧಪಡಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ. ಇನ್ನು ಕೆಲವೆಡೆ, ಮಾವಿನ ಕಾಯಿಗಳನ್ನು ಕುದಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ - ಇದು ಸ್ಥಳೀಯ ಪಾನೀಯಗಳ ಋತುವಿನ ಆರಂಭವನ್ನು ಸೂಚಿಸುತ್ತದೆ. ನೀವು ಖಂಡಿತವಾಗಿಯೂ ಈ ಸ್ಥಳೀಯ ಪಾನೀಯಗಳ ಬಗ್ಗೆ ನಿಮಗೂ ಗೊತ್ತಿರಬಹುದು. ನೀವು ಉತ್ತರ ಭಾರತಕ್ಕೆ ಪ್ರಯಾಣಿಸಿದರೆ, ಅನೇಕ ಸ್ಥಳಗಳಲ್ಲಿ ನೀವು 'ಆಮ್ ಪನ್ನಾ'ವನ್ನು ಕಾಣಬಹುದು - ಇದು ಮಾವಿನ ಕಾಯಿಯ ರುಚಿ ಜೊತೆಗೆ ಬಿಸಿಲಿನ ತಾಪದಿಂದ ಉಪಶಮನ ಒದಗಿಸುತ್ತದೆ. ಪಂಜಾಬ್ ಅಥವಾ ಹರಿಯಾಣಕ್ಕೆ ಹೋದರೆ ನೀವು ದೊಡ್ಡ ಲೋಟಗಳಲ್ಲಿ ನೀಡುವ 'ಲಸ್ಸಿ'ಯ ಸ್ವಾದವನ್ನು ಕಾಣುತ್ತೀರಿ - ರಾಜಸ್ಥಾನ ಮತ್ತು ಗುಜರಾತ್‌ನಲ್ಲಿ ಮಜ್ಜಿಗೆ ಬಹುತೇಕ ಎಲ್ಲಾ ಊಟಗಳಿಗೆ ಅತ್ಯಗತ್ಯ ಸಂಗಾತಿಯಾಗಿರುತ್ತದೆ. ಮತ್ತು ಬಿಹಾರ, ಜಾರ್ಖಂಡ್ ಮತ್ತು ಪೂರ್ವ ಉತ್ತರ ಪ್ರದೇಶದಲ್ಲಿ, 'ಸತ್ತು ಶರ್ಬತ್' ಲಭಿಸುತ್ತದೆ- ಅದರ ಸ್ವಾದ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಹೋಲಿಸಲಾಗದಂತಹದ್ದು, ಏಕೆಂದರೆ ಅದು ನಿಮ್ಮ ಹಸಿವನ್ನು ನೀಗಿಸುವುದಲ್ಲದೆ ನಿಮಗೆ ಶಕ್ತಿಯನ್ನು ಕೊಡುತ್ತದೆ. ಕೊಂಕಣ ಪ್ರದೇಶ ಮತ್ತು ಗೋವಾದಲ್ಲಿ, ನಿಮಗೆ 'ಕೋಕಮ್ ಶರ್ಬತ್' ಮತ್ತು 'ಸೋಲ್ ಕಡಿ' ಸಿಗುತ್ತದೆ. ದಕ್ಷಿಣ ಭಾರತದಲ್ಲಿ, 'ಪಾನಕಂ', 'ನೀರ್ ಮೋರ್' ಮತ್ತು 'ಸಾಂಬಾರ್' ಇವೆ; ಮತ್ತು ಒಡಿಶಾದಲ್ಲಿ, 'ಬೇಲ್ ಪನಾ' ಅಂದರೆ ಬಳುವಲಕಾಯಿಯ ಪಾನಕ. ಇವು ಕೇವಲ ಪಾನೀಯಗಳಲ್ಲ; ಅವು ಭಾರತದ ವೈವಿಧ್ಯಮಯ ಪ್ರದೇಶಗಳ ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕ ಸಂಪ್ರದಾಯಗಳ ಅವಿಭಾಜ್ಯ ಅಂಗವಾಗಿದೆ. ಇದಲ್ಲದೆ, ಅವು 'ಏಕ್ ಭಾರತ್, ಶ್ರೇಷ್ಠ ಭಾರತ' ದ ಚೈತನ್ಯದ ಕುರುಹೂ ಆಗಿದೆ. ಒಂದು ವಿಷಯವನ್ನು ಖಂಡಿತ ನೆನಪಿನಲ್ಲಿಡಿ: ಇವುಗಳಲ್ಲಿ ಬಹಳಷ್ಟು ಸಿದ್ಧತೆಗಳು ನಮ್ಮ ಅಡುಗೆಮನೆಗಳು ಮತ್ತು ನಮ್ಮ ಹೊಲಗದ್ದೆಗಳಿಂದಲೇ ಹುಟ್ಟಿಕೊಂಡಿರುವಂಥವಾಗಿವೆ. ಅವುಗಳಿಗೆ ಪ್ರಮುಖ ವಾಣಿಜ್ಯ ಬ್ರ್ಯಾಂಡಿಂಗ್‌ನ ಬೆಂಬಲವಿಲ್ಲದಿರಬಹುದು, ಆದರೆ ಅವು ತಲೆಮಾರುಗಳ ಅನುಭವ ಇದರಲ್ಲಿ ಮಿಳಿತವಾಗಿದೆ. ಈ ಬೇಸಿಗೆ ಋತುವಿನಲ್ಲಿ ಈ ಸ್ಥಳೀಯ ಪಾನೀಯಗಳನ್ನು ಎಲ್ಲರೂ ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಆನಂದಿಸಿ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಬೇಸಿಗೆ ಬರುತ್ತಿದ್ದಂತೆಯೇ ಪ್ರತಿಯೊಂದು ಮನೆಯಲ್ಲಿಯೂ ಮಾತಿನ ಮಧ್ಯೆ ಬರುವ ಮತ್ತೊಂದು ವಿಷಯವೆಂದರೆ ಅದು ಮಾವು. ಮನೆಗಳಲ್ಲಿ,  ಮಾವು ಮಾತುಕತೆಯ ವಿಷಯವಾಗುತ್ತದೆ. ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಬೇಸಿಗೆ ಋತುವಿನಲ್ಲಿ ಮಾವಿನ ಬಗ್ಗೆ ಮಾತುಕತೆಯಾಡದ ಮನೆಯೇ ಇಲ್ಲ ಎಂದರೆ ತಪ್ಪಾಗಲಾರದು. ಪ್ರತಿಯೊಂದು ಪ್ರದೇಶಕ್ಕೂ ತನ್ನದೇ ಆದ ಮಾವು, ತನ್ನದೇ ಆದ ರುಚಿ, ತನ್ನದೇ ಆದ ಪರಿಮಳ ಇರುತ್ತದೆ. ಮಹಾರಾಷ್ಟ್ರ ಮತ್ತು ಕೊಂಕಣದ ಹಾಪಸ್, ಅಲ್ಫಾನ್ಸೊ, ಗುಜರಾತ್‌ ನ ಕೇಸರ್,  ಇದಂತೂ ಮಾವಿನ ರಸದ ಜೀವಾಳ, ಉತ್ತರ ಪ್ರದೇಶದ ದಶಹರೀ, ಮತ್ತು ನನ್ನ ಕಾಶಿಯ ಲಂಗ್ಡಾ. ಅಂದಹಾಗೆ, ಲಂಗ್ಡಾ ಮಾವಿಗೆ ಒಂದು ವಿಶೇಷತೆಯಿದೆ. ಹಣ್ಣಾದ ನಂತರವೂ, ಅದರ ಬಣ್ಣ ಕೆಲವೊಮ್ಮೆ ಹಸಿರಾಗಿಯೇ ಇರುತ್ತದೆ. ಬಿಹಾರದ ಜರ್ದಾಲು ಹಣ್ಣಿನ ಸುವಾಸನೆಯನ್ನು ದೂರದಿಂದಲೇ ಗುರುತಿಸಬಹುದು. ಚೌಸಾ, ಮಾಲ್ಡಾ - ಪ್ರತಿಯೊಂದು ಹೆಸರಿಗೂ ಅದರೊಂದಿಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ನೆನಪುಗಳಿವೆ. ದಕ್ಷಿಣ ಭಾರತಕ್ಕೆ ಹೋಗಿ ನೋಡಿ, ಅಲ್ಲಿ ಬಂಗನಪಲ್ಲಿ, ತೋತಾಪುರಿ, ನೀಲಂ, ಮಲ್ಗೋವಾ, ಬಂಗಾಳದಲ್ಲಿ ಹಿಮಸಾಗರ್, ಒಡಿಶಾ ಮತ್ತು ಆಂಧ್ರಪ್ರದೇಶದಲ್ಲಿ ಸುವರ್ಣರೇಖಾ ಇವೆ. ಮತ್ತೊಂದು ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಹೇಳುವುದಾದರೆ, ಸ್ಥಳ ಬದಲಾದಂತೆ, ಮಾವಿನ ರೂಪ, ಬಣ್ಣ ಮತ್ತು ರುಚಿಯೂ ಬದಲಾಗುತ್ತದೆ. ಸ್ನೇಹಿತರೇ ಮಾವಿನ ಈ ಪಯಣ ಈಗ ಗ್ರಾಮದಿಂದ, ಜಾಗತಿಕ ಮಾರುಕಟ್ಟೆಯವರೆಗೂ ತಲುಪುತ್ತಿದೆ. ಇಂದು ‘ಮನದ ಮಾತಿನ’ ಮೂಲಕ ನಾನು ಮಾವು ಕೃಷಿಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿರುವ ರೈತ ಸೋದರ-ಸೋದರಿಯರನ್ನು ಪ್ರಶಂಸಿಸುತ್ತೇನೆ. ನೀವು ದೇಶದ ಕೃಷಿ ಅರ್ಥ ವ್ಯವಸ್ಥೆಗೆ ಕೇವಲ ಸಾಮಾನ್ಯ ರೈತರಲ್ಲ, ನೀವು ವಿಶೇಷ ರೈತರು. ಇದನ್ನು ಹೀಗೆಯೇ ಮುಂದವರಿಸಿ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಬೇಸಿಗೆಯ ಈ ದಿನಗಳಲ್ಲಿ, ಶಾಲೆಗಳಿಗೆ ರಜೆಯಂತೂ ಇದ್ದೇ ಇರುತ್ತದೆ, ಆದರೆ, ನಿಮಗೂ ಪ್ರವೇಶ ಪಡೆದುಕೊಳ್ಳಬೇಕೆಂದು ಮನಸ್ಸಾಗುವ ಒಂದು ತರಗತಿಯ ಬಗ್ಗೆ ನಾನು ಈಗ ಹೇಳುತ್ತೇವೆ. ಸ್ನೇಹಿತರೇ, ಮಕ್ಕಳು, ಯುವಜನರು ಮತ್ತು ವೃದ್ಧರು ಬರುವ, ಯಾವುದೇ ಶುಲ್ಕವಿಲ್ಲದ, ದೊಡ್ಡ ಕಟ್ಟಡವಿಲ್ಲದ, ತರಗತಿ ಕೊಠಡಿಗಳಿಲ್ಲದ, ಆದರೆ ನದಿಯಲ್ಲಿ ನಡೆಯುವಂತಹ ಒಂದು ಆಸಕ್ತಿದಾಯಕ ಶಾಲೆಯ ಬಗ್ಗೆ ಕಲ್ಪನೆ ಮಾಡಿಕೊಳ್ಳಿ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಇದೊಂದು ಕತೆಯಲ್ಲ. ಇದೊಂದು ಪ್ರಾಮಾಣಿಕ ಪ್ರಯತ್ನ. ಕೇರಳದ ಆಲುವಾದಲ್ಲಿ, ಸಾಜಿ ವಲಾಶೇರಿಲ್ ಅವರು ಇಂತಹದ್ದೇ ಒಂದು swimming club ನಡೆಸುತ್ತಿದ್ದಾರೆ. ಇಲ್ಲಿಯವರೆಗೂ 15 ಸಾವಿರಕ್ಕೂ ಅಧಿಕ ಮಂದಿ ಇಲ್ಲಿ ಈಜುವುದನ್ನು ಕಲಿತಿದ್ದಾರೆ. ಸಾಜೀ ಅವರು ದಿವ್ಯಾಂಗ ಮಕ್ಕಳಿಗೆ ಕೂಡಾ ಈಜು ಕಲಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಈ ಪ್ರಯತ್ನದ ಹಿಂದೆ, ಒಂದು ನೋವು ಕೂಡಾ ಅಡಗಿದೆ. ಕೆಲವು ವರ್ಷಗಳ ಹಿಂದೆ, ಒಂದು ದೋಣಿ ಅಪಘಾತದಲ್ಲಿ ಹಲವಾರು ವಿದ್ಯಾರ್ಥಿಗಳ ಸಾವು ಸಂಭವಿಸಿತ್ತು. ಈ ದುರ್ಘಟನೆಯು ಸಾಜೀ ಅವರನ್ನು ತೀವ್ರವಾಗಿ ಬೆಚ್ಚಿಬೀಳಿಸಿತು. ಆ ಮಕ್ಕಳಿಗೆ ಈಜುವುದು ಹೇಗೆಂದು ತಿಳಿದಿದ್ದರೆ, ಬಹುಶಃ ಬದುಕುಳಿಯುತ್ತಿದ್ದರೇನೋ ಎಂಬ  ಯೋಚನೆಯಿಂದಲೇ ಆರಂಭವಾದದ್ದು -  ಅವರ ಈ ಅಭಿಯಾನ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಸಾಜಿ ವಲಾಶೇರಿಲ್ ಅವರ ಜೀವನವು ನಮಗೆ ಒಂದು ದೊಡ್ಡ ಪಾಠವನ್ನು ಕಲಿಸುತ್ತದೆ. ಜನರಿಗೆ ಸೇವೆ ಸಲ್ಲಿಸಲು ಅಪಾರ ಸಂಪನ್ಮೂಲಗಳು ಬೇಕಾಗಿಲ್ಲ - ಬೇಕಾಗಿರುವುದು ಒಳ್ಳೆಯ ಉದ್ದೇಶ ಮತ್ತು ಸ್ಥಿರವಾದ ಪ್ರಯತ್ನ. ಇವುಗಳಿಂದ ಸಾವಿರಾರು ಜನರ ಜೀವನದಲ್ಲಿ ಪರಿವರ್ತನೆ ತರಬಹುದು.

ನನ್ನ ಪ್ರೀತಿಯ ದೇಶವಾಸಿಗೇಳ,

ಕಳೆದ ಕೆಲವು ದಿನಗಳಲ್ಲಿ ನನಗೆ ಯುರೋಪ್ ಮತ್ತು ನೆದರ್ ಲ್ಯಾಂಡ್ಸ್ ಗೆ ಹೋಗುವ ಅವಕಾಶ ದೊರೆತಿತ್ತು. ನಾನು ಅಲ್ಲಿ ಹಲವಾರು ಸಭೆಗಳಲ್ಲಿ ಪಾಲ್ಗೊಂಡಿದ್ದೆ. ಆ ವೇಳೆ ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬ ಭಾರತೀಯನ ಮನಸ್ಸನ್ನೂ ಹೆಮ್ಮೆಯಿಂದ ತುಂಬುವಂತೆ ಮಾಡುವ ಘಳಿಗೆಯೊಂದು ಬಂದಿತ್ತು. ನೆದರ್ ಲ್ಯಾಂಡ್ಸ್ ನಲ್ಲಿ ಆಯೋಜನೆಯಾಗಿದ್ದ ಒಂದು ವಿಶೇಷ ಸಮಾರಂಭದಲ್ಲಿ ಚೋಳರ ಕಾಲದ ಪ್ರಾಚೀನ ತಾಮ್ರದ ಫಲಕಗಳನ್ನು ಭಾರತಕ್ಕೆ ಹಿಂದಿರುಗಿಸಲಾಯಿತು. ಈ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮದಲ್ಲಿ ನೆದರ್ ಲ್ಯಾಂಡ್ಸ್ ನ ಪ್ರಧಾನಿಯವರೂ ಉಪಸ್ಥಿತರಿದ್ದರು. ಈ ತಾಮ್ರ ಫಲಕಗಳ ಕುರಿತಂತೆ ನನಗೆ ದೇಶ ವಿದೇಶಗಳಿಂದ ಸತತವಾಗಿ ಸಂದೇಶಗಳು ಬರುತ್ತಲೇ ಇವೆ. ಜನರು ಸಂತಸ, ಹೆಮ್ಮೆ ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸುತ್ತಿದ್ದಾರೆ. ಪ್ರಪಂಚದಾದ್ಯಂತದ ತಮಿಳು ಸಮುದಾಯದಲ್ಲಿ ಇದರ ಬಗ್ಗೆ ವಿಶೇಷ ಉತ್ಸಾಹವಿದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಈ ತಾಮ್ರ ಫಲಕಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಜನರಲ್ಲಿ ಸಾಕಷ್ಟು ಕುತೂಹಲ ಮೂಡಿದೆ. ಆದ್ದರಿಂದ ಇಂದು ಅವುಗಳಿಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ಕೆಲವು ವಿಷಯಗಳನ್ನು ನಿಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ನಾನು ಹಂಚಿಕೊಳ್ಳಲು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ. ಇದರಲ್ಲಿ 21 ದೊಡ್ಡ ಮತ್ತು ಮೂರು ಸಣ್ಣ ತಾಮ್ರದ ಫಲಕಗಳಿವೆ. ಅವು ಮುಖ್ಯವಾಗಿ ಮೊದಲನೇ ರಾಜ ರಾಜೇಂದ್ರ ಚೋಳ ಅವರ ತಂದೆ ರಾಜ ರಾಜರಾಜ ಚೋಳ ನೀಡಿದ ವಾಗ್ದಾನವನ್ನು ಈಡೇರಿಸುವುದಕ್ಕೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿವೆ. ಅವು ಆನೈಮಂಗಲಂ ಗ್ರಾಮವನ್ನು ಬೌದ್ಧ ಮಠಕ್ಕೆ ದಾನ ಮಾಡಿದ್ದನ್ನು ಉಲ್ಲೇಖಿಸುತ್ತವೆ. ಈ ತಾಮ್ರ ಫಲಕಗಳು ಚೋಳ ರಾಜವಂಶದ ಸಾಧನೆಗಳನ್ನೂ ವಿವರಿಸುತ್ತವೆ. ಅವು ಚೋಳ ಸಾಮ್ರಾಜ್ಯದ ಬಲವಾದ ಸಮುದ್ರ ಶಕ್ತಿಯನ್ನು ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸುತ್ತವೆ. ಅವು ಆಗ್ನೇಯ ಏಷ್ಯಾದ ದೇಶಗಳೊಂದಿಗಿನ ಅವರ ಸಂಬಂಧಗಳ ಬಗ್ಗೆಯೂ ಮಾಹಿತಿಯನ್ನು ಒದಗಿಸುತ್ತವೆ.

ಚೋಳ ಸಾಮ್ರಾಜ್ಯದ ಶ್ರೀಮಂತ ಇತಿಹಾಸ ಮತ್ತು ಸಂಸ್ಕೃತಿಯ ಬಗ್ಗೆ ನಮ್ಮೆಲ್ಲರಿಗೂ ಬಹಳ ಹೆಮ್ಮೆಯಿದೆ. ಸ್ನೇಹಿತರೆ, ನಮ್ಮ ಸರ್ಕಾರವು ಭಾರತದ ಈ ಅಮೂಲ್ಯ ಪರಂಪರೆಯನ್ನು ಸಂರಕ್ಷಿಸಲು ಸತತವಾಗಿ ಪ್ರಯತ್ನ ಮಾಡುತ್ತಲೇ ಇದೆ. ಈ ಅನುಕ್ರಮದಲ್ಲಿ ‘ಜ್ಞಾನ ಭಾರತಂ ಅಭಿಯಾನ’ ದ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಛತ್ತೀಸ್ ಗಢ್ ನ ಮಲ್ಹಾರ್ ನಲ್ಲಿ ಕೂಡಾ ಒಂದು ಮಹತ್ವಪೂರ್ಣ ಅನ್ವೇಷಣೆ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ. ಇಲ್ಲಿ ಮೂರು ಅಪರೂಪದ ತಾಮ್ರದ ಫಲಕಗಳು ಪತ್ತೆಯಾಗಿವೆ. ಇವು ಪಾಂಡುವಂಶೀ ರಾಜವಂಶದ ಮಹರ್ಷಿ ಬಾಲಾರ್ಜುನನ ಆಳ್ವಿಕೆಯ ಕಾಲದ್ದೆಂದು ನಂಬಲಾಗಿದೆ. ಈ ಶಾಸನಗಳು ಆರು-ಏಳನೇ ಶತಮಾನದ್ದು ಅಂದರೆ ಹದಿನಾಲ್ಕು ನೂರರಿಂದ ಹದಿನೈದು ನೂರರಷ್ಟು ಹಳೆಯದೆಂದೂ, ಈ ತಾಮ್ರದ ಫಲಕಗಳನ್ನು ಪ್ರಾಚೀನ ಬ್ರಾಹ್ಮಿ ಲಿಪಿ ಮತ್ತು ಪಾಲಿ ಭಾಷೆಯಲ್ಲಿ ಬರೆಯಲಾಗಿದೆಯೆಂದೂ ತಜ್ಞರು ನಂಬುತ್ತಾರೆ. ಇವುಗಳಿಂದ ಆ ಕಾಲದ ಆಡಳಿತ, ಧರ್ಮ ಮತ್ತು ಸಂಸ್ಕೃತಿಯ ಬಗ್ಗೆ ಪ್ರಮುಖ ಮಾಹಿತಿ ದೊರೆಯುತ್ತವೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ನಾವು ಭಾರತೀಯರಲ್ಲಿ ಖಗೋಳವಿಜ್ಞಾನ ಅಂದರೆ astronomy ಬಗ್ಗೆ ಯಾವಾಗಲೂ ವಿಶೇಷ ಆಕರ್ಷಣೆಯಿದೆ. ನಮ್ಮ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಇಂದಿಗೂ ಶತಮಾನಗಳಷ್ಟು ಹಳೆಯದಾದ ವೀಕ್ಷಣಾಲಯಗಳಿವೆ. ಇಲ್ಲಿ ಗಣಿತ ಶಾಸ್ತ್ರದ ಅದ್ಭುತ ಆವಿಷ್ಕಾರಗಳಾಗಿವೆ. Navigation ಆಗಿರಲಿ, ಪಂಚಾಂಗವಿರಲಿ, ಅಥವಾ ನಮ್ಮ ಹಬ್ಬ-ಹರಿದಿನಗಳಿರಲಿ, ಇವುಗಳೆಲ್ಲದರ ಸಂಬಂಧ ಆಕಾಶ ಮತ್ತು ನಕ್ಷತ್ರಗಳೊಂದಿಗಿದೆ. ನಮ್ಮ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಈ ಖಗೋಳ ಶಾಸ್ತ್ರವು ಪ್ರತಿ ಪೀಳಿಗೆಯಲ್ಲೂ ಕುತೂಹಲ ಹುಟ್ಟು ಹಾಕಿದೆ. ಅವರನ್ನು ಅನ್ವೇಷಣೆಗೆ ಪ್ರೇರೇಪಿಸಿದೆ ಮತ್ತು ಇಂದಿನ ಯುವಜನರಲ್ಲಿ ಕೂಡಾ ಇದರ ಬಗ್ಗೆ ಸಾಕಷ್ಟು ಉತ್ಸಾಹ, ಕುತೂಹಲ ಕಂಡು ಬರುತ್ತದೆ. ಇತ್ತೀಚಿನ ದಿನಗಳಲ್ಲಿ, ದೇಶಾದ್ಯಂತ astronomy Clubs ಬಹಳ ಜನಪ್ರಿಯವಾಗುತ್ತಿರುವುದನ್ನು ನೀವು ನೋಡಿಯೇ ಇರುತ್ತೀರಿ. ದೊಡ್ಡ ನಗರಗಳಿಂದ ಹಿಡಿದು ಸಣ್ಣ ಪಟ್ಟಣಗಳವರೆಗೂ, ಶಾಲೆಗಳಿಂದ ಹಿಡಿದು ಉದ್ಯಾನವನಗಳವರೆಗೂ ಈ ಸಂಬಂಧ ಚಟುವಟಿಕೆಗಳು ಕಂಡುಬರುತ್ತವೆ. ನನಗೆ ಬೆಂಗಳೂರು Astronomical Society ಬಗ್ಗೆ ತಿಳಿದುಬಂದಿತು. ಇಲ್ಲಿ ವೀಕ್ಷಣಾ ಸೆಷನ್ ಗಳನ್ನು ಆಯೋಜಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ. ಈ ಸಂಸ್ಥೆಯು ಗ್ರಾಮೀಣ ಪ್ರದೇಶಗಳಲ್ಲಿ ಖಗೋಳಶಾಸ್ತ್ರವನ್ನು ಜನಪ್ರಿಯಗೊಳಿಸುವ ಅಭಿಯಾನವನ್ನು ಕೂಡಾ ಆರಂಭಿಸಿದೆ. ‘ಖಗೋಳ್ ಮಂಡಲ್ (खगोल मण्डल’) ಹೆಸರಿನ ಒಂದು ತಂಡವು 30 ಗಂಟೆಗಳ ಅವಧಿಯ ಒಂದು ದೊಡ್ಡ innovative course ಆರಂಭಿಸಿದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ರಾತ್ರಿಯ ವೇಳೆ ನಕ್ಷತ್ರಗಳನ್ನು ವೀಕ್ಷಿಸುವುದು ಬಹಳ ಅದ್ಭುತ ಅನುಭವ ಎನಿಸುತ್ತದೆ. Astro Kerala ಹೆಸರಿನ ಒಂದು ಸಂಸ್ಥೆಯು Night Observation Camps ಮತ್ತು ಕಾರ್ಯಾಗಾರಗಳನ್ನು ಆಯೋಜಿಸುತ್ತದೆ. ಇಲ್ಲಿ ಯುವ ಸ್ನೇಹಿತರು Telescope ತಯಾರಿಕೆ ಮತ್ತು star maps ನ ಉಪಯೋಗವನ್ನು ಕಲಿಯುತ್ತಾರೆ. ರಾಜಕೋಟ್ ನ Big Bang Astronomy Club  ಗಿರ್ ನ ಅರಣ್ಯಗಳಿಂದ ಹಿಡಿದು ಕಚ್ ನ ರಣ್ ವರೆಗೂ ಅನೇಕ astronomy ಕಾರ್ಯಕ್ರಮಗಳನ್ನು ಆಯೋಜಿಸಿದೆ. ‘ಜ್ಯೋತಿರ್ವಿದ್ಯಾ ಪರಿಸಂಸ್ಥಾ (ज्योतिर्विद्या परिसंस्था’) ಕೂಡಾ ಅತ್ಯಂತ ಪುರಾತನ ಖಗೋಳಶಾಸ್ತ್ರ ಸಂಸ್ಥೆಗಳಲ್ಲಿ ಒಂದಾಗಿದೆ. ಇಲ್ಲಿ ವೀಕ್ಷಣಾ ಸೌಲಭ್ಯಗಳೊಂದಿಗೆ ಪುಸ್ತಕಗಳು, ಗ್ರಂಥಾಲಯ ಮತ್ತು ಟೆಲಿಸ್ಕೋಪ್ ಲೈಬ್ರರಿ ಸೌಲಭ್ಯವೂ ಇದೆ. ನಾನು ISAAC (आईसैक) ಅನ್ನು ಕೂಡಾ ಉಲ್ಲೇಖಿಸಲು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ. ಇದೊಂದು ರಾಷ್ಟ್ರವ್ಯಾಪಿ ವಿದ್ಯಾರ್ಥಿ-ನೇತೃತ್ವದ ನೆಟ್ವರ್ಕ್ ಆಗಿದ್ದು, ಖಗೋಳಶಾಸ್ತ್ರ ಮತ್ತು ಆಸ್ಟ್ರೋಫಿಸಿಕ್ಸ್ ಕ್ಲಬ್ ಗಳನ್ನು ಪರಸ್ಪರ ಸಂಪರ್ಕಿಸುತ್ತದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ನಿಮ್ಮ ಹವ್ಯಾಸಕ್ಕಾಗಿ ಸಮಯ ಮೀಸಲಿಡುವುದು ಮತ್ತು ಯಾವಾಗಲೂ ಏನನ್ನೂದರೂ ಹೊಸದನ್ನು ಕಲಿಯುತ್ತಲೇ ಇರುವುದು ಬಹಳ ಅಗತ್ಯ. ಈ ರಜಾದಿನಗಳಲ್ಲಿ ಯುವಜನರು ಖಗೋಳಶಾಸ್ತ್ರ ಕ್ಲಬ್‌ ಗೆ ಸೇರಿಕೊಳ್ಳಬೇಕೆಂದೂ ಮತ್ತು ತಾರಾಲಯಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ ನೀಡಬೇಕೆಂದು ನಾನು ಮನವಿ ಮಾಡುತ್ತೇನೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

‘ಮನದ ಮಾತು’ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮವನ್ನು ಟಿವಿಯಲ್ಲಿ ವೀಕ್ಷಿಸುತ್ತಿರುವವರಿಗೆ ಒಂದು ವಿಡಿಯೋ ಖಂಡಿತವಾಗಿಯೂ ವೀಕ್ಷಿಸಬೇಕೆಂದು ಹೇಳುತ್ತೇನೆ. ಈ ವಿಡಿಯೋ ಕಳೆದ ಕೆಲವು ದಿನಗಳಲ್ಲಿ ಬಹಳ ಚರ್ಚೆಗೆ ಕಾರಣವಾಗಿತ್ತು. ಇದರಲ್ಲಿ ಕೆಲವರು ಬಹಳ ಧೈರ್ಯದಿಂದ, ಬಹಳ ಜಾಗರೂಕತೆಯಿಂದ ಒಂದು ಗಂಗಾ ಡಾಲ್ಫಿನ್ ಅನ್ನು ರಕ್ಷಿಸಲು ಪ್ರಯತ್ನಿಸುತ್ತಿದ್ದಾರೆ. ಈ ಸಂಪೂರ್ಣ ಪ್ರಯತ್ನಕ್ಕೆ ಸುಮಾರು 13 ಗಂಟೆಗಳ ಕಾಲ ಹಿಡಿಯಿತೆಂದು ತಿಳಿದು ನಿಮಗೆ ಆಶ್ಚರ್ಯವೆನಿಸಬಹುದು. ಕೊನೆಯಲ್ಲಿ ಆ ಡಾಲ್ಫಿನ್ ರಕ್ಷಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿತು.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಭಾರತದ ಮೊದಲ ಗಂಗಾ ಡಾಲ್ಫಿನ್ ರಕ್ಷಣಾ ಆಂಬ್ಯುಲೆನ್ಸ್ (dolphin rescue ambulance) ಇದರಲ್ಲಿ ಪ್ರಮುಖ ಪಾತ್ರ ವಹಿಸಿದೆ. ಈ ಘಟನೆ ಉತ್ತರ ಪ್ರದೇಶದಲ್ಲಿ ಸಂಭವಿಸಿದೆ. ಅಲ್ಲಿನ ಕಾಲುವೆಯಲ್ಲಿ ಗಂಗಾ ಡಾಲ್ಫಿನ್ ಸಿಲುಕಿ ಕೊಂಡಿತ್ತು. ಆ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, 'ನಮಾಮಿ ಗಂಗಾ ಅಭಿಯಾನ'ದ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ನಿರ್ಮಿಸಲಾದ ಈ ಆಂಬ್ಯುಲೆನ್ಸ್, ಅದಕ್ಕೆ ಒಂದು  ಭರವಸೆಯ ಕಿರಣದಂತೆ ಅದರ ಬಳಿ ತಲುಪಿತು. ನಂತರ ಅದನ್ನು ಎಚ್ಚರಿಕೆಯಿಂದ ರಕ್ಷಿಸಲಾಯಿತು. ಅದನ್ನು ಪರೀಕ್ಷಿಸಿ, ಚಿಕಿತ್ಸೆ ನೀಡಲಾಯಿತು ಮತ್ತು ನಂತರ ಸುರಕ್ಷಿತವಾಗಿ ರಾಪ್ತಿ ನದಿಯಲ್ಲಿ ಬಿಡಲಾಯಿತು. ಒಂದು ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಹೇಳಬೇಕೆಂದರೆ,  ಒಂದು ಜೀವ ಪುನಃ ತನ್ನ ಮನೆಗೆ ಮರಳಿತು.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಈ dolphin rescue ambulance ಬಹಳ ವಿಶೇಷವಾದುದು. ಇದನ್ನು ಒಂದು ನಡೆದಾಡುವ ಆಸ್ಪತ್ರೆಯ ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಸಿದ್ಧಪಡಿಸಲಾಗಿದೆ. ಇದರಲ್ಲಿ Dolphin ಅನ್ನು ಸುರಕ್ಷಿತವಾಗಿ ಇರಿಸುವಂತಹ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯಿದೆ. ಆಮ್ಲಜನಕ ಪೂರೈಕೆಯ ಸೌಲಭ್ಯವಿದೆ, ವಿಶೇಷ stretcher ಇದೆ, ರಕ್ಷಿಸುವ ಉಪಕರಣವಿದೆ ಅಂದರೆ, ಯಾವುದಾದರೂ ಡಾಲ್ಫಿನ್ ಗಾಯಗೊಂಡರೆ, ಕಾಲುವೆಯಲ್ಲಿ ಸಿಲುಕಿಕೊಂಡರೆ ಅಥವಾ ನದಿಯಿಂದ ಹೊರಬಂದರೆ, ತಕ್ಷಣವೇ ಅದಕ್ಕೆ ಸಹಾಯ ಮಾಡಬಹುದಾಗಿದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ನಾವು ಗಂಗಾ ಡಾಲ್ಫಿನ್ ಅನ್ನು ರಕ್ಷಿಸಿದಾಗ, ನಾವು ಕೇವಲ ಒಂದು ಜಾತಿಯನ್ನಷ್ಟೇ ಅಲ್ಲದೇ,  ಗಂಗೆಯ ಜೀವವೈವಿಧ್ಯವನ್ನು ಉಳಿಸಿದಂತಾಗುತ್ತದೆ. ನಾವು ನದಿಯ ಸಂಪೂರ್ಣ ಜೀವನ ವ್ಯವಸ್ಥೆಯನ್ನು ಉಳಿಸುತ್ತೇವೆ ಮತ್ತು ನಮ್ಮ ಭವಿಷ್ಯದ ಪೀಳಿಗೆಗಾಗಿ ಪ್ರಕೃತಿಯ ಅಮೂಲ್ಯ ಪರಂಪರೆಯನ್ನು ಕಾಪಾಡುತ್ತೇವೆ.

ನನ್ನ ಪ್ರೀತಿಯ ದೇಶಬಾಂಧವರೇ,

ನಿಮ್ಮಲ್ಲಿ ಅನೇಕರಿಗೆ ನದಿ, ಕೆರೆ ಅಥವಾ ಬಾವಿಯ ನೀರಿನೊಂದಿಗಿನ ನೆನಪು ಖಂಡಿತವಾಗಿಯೂ ಇದ್ದೇ ಇರುತ್ತದೆ. ಕೆಲವರಿಗೆ ಕೆರೆಯಲ್ಲಿ ಈಜಿದ ನೆನಪಿರಬಹುದು, ಕೆಲವರಿಗೆ ಗೆಳೆಯರೊಂದಿಗೆ ಕೆರೆಯ ಸಮೀಪ ಆಟವಾಡಿದ ನೆನಪಿರಬಹುದು, ಕೆಲವರಿಗೆ ಆ ಮಣ್ಣಿನ ಸುವಾಸನೆ ನೆನಪಿರಬಹುದು. ಬಾಲ್ಯಕಾಲದ ಇಂತಹ ನೆನಪುಗಳು ಜೀವನದುದ್ದಕ್ಕೂ ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಹಾಗೆಯೇ ಉಳಿದಿರುತ್ತವೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ನೆನಪುಗಳನ್ನು ಸಂರಕ್ಷಿಸುವ ಇಂತಹ ಪ್ರೇರಣಾದಾಯಕ ವಿಷಯವೊಂದು ಉತ್ತರ ಪ್ರದೇಶದ ಬಸ್ತಿ ಜಿಲ್ಲೆಯಿಂದ ಬೆಳಕಿಗೆ ಬಂದಿದೆ. ಬಸ್ತಿಯ ನಿವಾಸಿ ಆಕಾಶ್ ಗುಪ್ತಾ ಅವರು ತಮ್ಮ ಗ್ರಾಮದಲ್ಲಿದ್ದ ಮನೋರಮಾ ನದಿಯನ್ನು ನೋಡಿ ಬಹಳ ದುಃಖಿತರಾಗುತ್ತಿದ್ದರು. ಏಕೆಂದರೆ ಅವರು ಬಾಲ್ಯದಿಂದಲೂ ಅವರು ಈ ನದಿಯನ್ನು ಸದಾ ಸ್ವಚ್ಛ ಹಾಗೂ ಜೀವಂತವಾಗಿ ಹರಿಯುವುದನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾ ಬಂದಿದ್ದರು. ಕಾಲಕ್ರಮೇಣ ಈ ನದಿಯಲ್ಲಿ ಪ್ಲಾಸ್ಟಿಕ್ ಸಂಗ್ರಹವಾಗತೊಡಗಿತು. ಕೊಳಕು ಹೆಚ್ಚಾಗುತ್ತಲೇ ಇತ್ತು. ಇದಕ್ಕಾಗಿ ಯಾರನ್ನೂ ದೂರದೇ ಹೊಸ ಆರಂಭಕ್ಕೆ ಶ್ರೀ ಆಕಾಶ್ ನಿರ್ಧರಿಸಿದರು. ದೂರಲ್ಲ, ಹೊಸ ಆರಂಭ ಎನ್ನುವುದು ಅವರ ಮಂತ್ರವಾಯಿತು. ಅವರು ತಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ತಮ್ಮ ಸ್ನೇಹಿತರನ್ನು ಸೇರಿಸಿಕೊಂಡರು. ಅವರ ಬಳಿ ಇದ್ದದ್ದು ಬಲೆ, ಸಲಿಕೆ ಮತ್ತು ಬುಟ್ಟಿ ಮಾತ್ರ ಆದರೆ ಅವರಲ್ಲಿದ್ದ ಬಹು ದೊಡ್ಡ ಶಕ್ತಿಯೆಂದರೆ ಏನನ್ನಾದರೂ ಬದಲಾಯಿಸಬಹುದೆಂಬ ಸಂಕಲ್ಪ. ಈ ಯುವಕರು ನದಿಯಲ್ಲಿ ಇಳಿಯುತ್ತಿದ್ದರು ಮತ್ತು ನೀರಿನಲ್ಲಿದ್ದ ತ್ಯಾಜ್ಯ ಹೊರತೆಗೆಯುತ್ತಿದ್ದರು. ಪ್ಲಾಸ್ಟಿಕ್ ಮತ್ತು ಇನ್ನಿತರ ತ್ಯಾಜ್ಯ ವಸ್ತುಗಳನ್ನು ಹೊರತರುತ್ತಿದ್ದರು. ಅನೇಕ ಬಾರಿ ಒಂದು ದಿನದಲ್ಲಿ 50-60 ಕಿಲೋ ತ್ಯಾಜ್ಯ ನದಿಯಿಂದ ಹೊರಬರುತ್ತಿತ್ತು. ಕ್ರಮೇಣ ಮನೋರಮಾ ನದಿಯ ಆ ಭಾಗ ಸ್ವಚ್ಛವಾಗಿ ಕಾಣತೊಡಗಿತು. ಸುತ್ತಮುತ್ತಲಿನ ಜನರು ಕೂಡಾ ಈ ಕೆಲಸದತ್ತ ಗಮನ ಹರಿಸತೊಡಗಿದರು. ಜನರಲ್ಲಿ ಸ್ವಚ್ಛತೆಯ ಬಗ್ಗೆ ಜಾಗೃತಿ ಹೆಚ್ಚಾಯಿತು.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಗೋವಾದಿಂದ ಇಂತಹದ್ದೇ ಪ್ರೇರಣಾದಾಯಕ ಕತೆಯೊಂದು ಹೊರಬಂದಿದೆ. ಗೋವಾದ ಬಾಲಕೃಷ್ಣ ಅಯ್ಯ ಅವರು ಓರ್ವ ನಿವೃತ್ತ ಶಿಕ್ಷಕರು. ಆದರೆ ಸಮಾಜಕ್ಕಾಗಿ ಕೆಲಸ ಮಾಡುವ ಅವರ ಉತ್ಸಾಹ ಇಂದಿಗೂ ಕುಗ್ಗದೆ ಅದೇ ರೀತಿ ಉಳಿದಿದೆ. ಮಡ್ಡಿ-ತೋಲಾಪ್ ಪ್ರದೇಶದಲ್ಲಿದ್ದ ನೀರಿನ ಸಮಸ್ಯೆ ಅವರನ್ನು ಬಹಳ ಚಿಂತಿತರನ್ನಾಗಿಸಿತ್ತು. ಅವರೂ ಪರಿಹಾರಕ್ಕಾಗಿ ಕೆಲಸ ಆರಂಭಿಸಿದರು. ಕೊಳವೆ ಮಾರ್ಗ ಅಳವಡಿಸುವ ಕಾರ್ಯದಲ್ಲಿ ಬಾಲಕೃಷ್ಣ ಅವರು ಮಹತ್ವದ ಪಾತ್ರ ವಹಿಸಿದರು. ಇದರಿಂದಾಗಿ ಅನೇಕ ಮನೆಗಳಿಗೆ ನೀರು ತಲುಪುವಂತಾಯಿತು. ಪ್ರತಿದಿನ ನೀರಿಗಾಗಿ ಬವಣೆ ಅನುಭವಿಸುತ್ತಿದ್ದ ಕುಟುಂಬಗಳಿಗೆ ಇದು ಅತಿ ದೊಡ್ಡ ಪರಿಹಾರ ದೊರೆತಂತಾಯಿತು.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಕಳೆದ ವರ್ಷ ನನಗೆ ಅತ್ಯಂತ ಅದ್ಭುತ ಅನುಭವವಾಯಿತು. ಇದು ಮನ್ ಕಿ ಬಾತ್ ನೊಂದಿಗೆ ಕೂಡಾ ಸಂಬಂಧಿಸಿದೆ. ಹೀಗಾಗಿ ನಾನು ಅದರ ವಿಷಯ ಕುರಿತು ನಿಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ಮಾತನಾಡಲು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ. ತಮಿಳುನಾಡಿನ ನಾಗರಕೋಯಿಲ್ ನಲ್ಲಿ ಓರ್ವ ಶಿಕ್ಷಕಿಯೊಂದಿಗೆ ನನ್ನ ಭೇಟಿಯಾಯಿತು. ಸುಮಾರು ಮೂರು ದಶಕಗಳ ಹಿಂದೆಯೇ ನಾನು ಅವರನ್ನು ಭೇಟಿಯಾಗಿದ್ದೆ. ನಾನು ಮಾತನಾಡುತ್ತಿರುವುದು ಗಿರಿಜಾ ಅಮ್ಮನವರ ಬಗ್ಗೆ. ಈ ಭೇಟಿಯ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಕೆಲವು ಯುವ ವಿದ್ಯಾರ್ಥಿಗಳು ಕೂಡಾ ಅವರೊಂದಿಗಿದ್ದರು.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಗಿರಿಜಾ ಅಮ್ಮಾ ಅವರು ಸುಮಾರು 15 ಶಾಲೆಗಳನ್ನು ನಡೆಸುತ್ತಾರೆ. ಇವುಗಳ ಪೈಕಿ ಚೆನ್ನೈನ ಜಯಗೋಪಾಲ್ ಗರೋಡಿಯಾ ಹಿಂದೂ ವಿದ್ಯಾಲಯ ಮುಖ್ಯವಾದುದು. ಈಕೆಯ ದೇಶಭಕ್ತಿಯ ಮನೋಭಾವ ಪ್ರತಿ ಭಾರತೀಯನಿಗೂ ಸ್ಫೂರ್ತಿದಾಯಕವಾಗಿದೆ. ಮನದ ಮಾತಿನಿಂದ ಪ್ರೇರಣೆ ಪಡೆದ ಅವರು ದೇಶದ ಅನೇಕ ಸೈನಿಕರಿಗೆ ಕೊಡುಗೆ ನೀಡುವುದಾಗಿ ಸಂಕಲ್ಪ ತೊಟ್ಟರು. ಇದಕ್ಕಾಗಿ ಅವರು ತಮ್ಮೆಲ್ಲಾ ಶಾಲೆಗಳ ವಿದ್ಯಾರ್ಥಿಗಳಿಗೆ ಸ್ಫೂರ್ತಿ ನೀಡಿದರು. ಪ್ರತಿದಿನವೂ ವೀರ ಸೈನಿಕರಿಗಾಗಿ ಒಂದೊಂದು ರೂಪಾಯಿ ಕೊಡುಗೆ ನೀಡಬೇಕೆಂದು ಅವರು ಮಕ್ಕಳಲ್ಲಿ ಕೇಳಿಕೊಂಡರು. ಅಂದರೆ ಒಂದು ವರ್ಷದಲ್ಲಿ ಪ್ರತಿ ವಿದ್ಯಾರ್ಥಿಯಿಂದ 365 ರೂಪಾಯಿ ಸಂಗ್ರಹವಾಯಿತು.ಈ ಸಣ್ಣ ಸಣ್ಣ ಕೊಡುಗೆಯಿಂದ ಸರಿ ಸುಮಾರು 40 ಲಕ್ಷ ರೂಪಾಯಿ ಸಂಗ್ರಹವಾಯಿತು. ಗಿರಿಜಾ ಅಮ್ಮ ಅವರು ಈ ಸಂಪೂರ್ಣ ಮೊತ್ತದ ಚೆಕ್ ಅನ್ನು ನನಗೆ ನೀಡಿದರು. ಭಾರತ ಮಾತೆಗೆ ಅವರ ಹೃದಯದಲ್ಲಿದ್ದ ಸಮರ್ಪಣಾ ಭಾವ ಅದೆಷ್ಟು ಆಳವಾಗಿತ್ತೆಂಬುದು ಅವರೊಂದಿಗಿನ ಮಾತುಕತೆಯಿಂದ ನನಗೆ ಮನದಟ್ಟಾಯಿತು. ಕಳೆದ ವರ್ಷವಷ್ಟೇ ಚೆನ್ನೈನ ಪ್ರಥಮ ಹಿಂದೂ ವಿದ್ಯಾಲಯ ತನ್ನ 50 ವರ್ಷಗಳನ್ನು ಪೂರ್ಣಗೊಳಿಸಿತು. ದೇಶದ ಶಿಕ್ಷಣ ಮತ್ತು ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕ ಹೆಮ್ಮೆಯನ್ನು ಮುಂದಕ್ಕೆ ಕೊಂಡೊಯ್ಯುವಲ್ಲಿ, ಶಾಲೆಯ ನೆಟ್ವರ್ಕ್ ನ ಪಾತ್ರ ಅತ್ಯಂತ ಶ್ಲಾಘನೀಯವಾಗಿದೆ. ಇದರೊಂದಿಗೆ ಕೈಜೋಡಿಸಿರುವ ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬರಿಗೂ ನಾನು ಹೃತ್ಪೂರ್ವಕವಾಗಿ ಅಭಿನಂದಿಸುತ್ತೇನೆ ಮತ್ತು ವೀರ ಸೈನಿಕರಿಗಾಗಿ ಕೊಡುಗೆ ನೀಡಿದ ಆ ವಿದ್ಯಾರ್ಥಿಗಳನ್ನು ಹೃತ್ಪೂರ್ವಕವಾಗಿ ಪ್ರಶಂಸಿಸುತ್ತೇನೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಭಾರತದ ಪ್ರತಿ ಗ್ರಾಮದಲ್ಲಿ, ಪ್ರತಿ ನಗರದಲ್ಲಿ, ನಮಗೆ ಸ್ಫೂರ್ತಿ-ಪ್ರೇರಣೆ ನೀಡುವಂತಹ ಏನಾದರೊಂದು ನಡೆಯುತ್ತಲೇ ಇದೆ. ಹಲವು ಬಾರಿ ಈ ಪ್ರಯತ್ನಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಹೆಚ್ಚು ಮಾತುಕತೆ ನಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ, ಆದರೆ ನಮಗೆ ಇವುಗಳ ಬಗ್ಗೆ ತಿಳಿದುಬಂದಾಗ, ನಮ್ಮ ದೇಶದ, ನಮ್ಮ ಜನರ ಶಕ್ತಿಯಿಂದ ದೇಶ ಪ್ರಗತಿಯ ಹಾದಿಯಲ್ಲಿ ಮುಂದೆ ಸಾಗುತ್ತಿದೆ ಎಂಬ ನಂಬಿಕೆ ಮತ್ತಷ್ಟು ಬಲಗೊಳ್ಳುತ್ತದೆ. ನಿಮ್ಮ ಸುತ್ತಮುತ್ತ ನಡೆಯುತ್ತಿರುವ ಇಂತಹ ಪ್ರಯತ್ನಗಳನ್ನು ಖಂಡಿತವಾಗಿಯೂ ನೋಡಿ ಎನ್ನುವುದು ನಿಮ್ಮೆಲ್ಲರಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಮನವಿ. ಸಮಾಜಕ್ಕಾಗಿ ಉತ್ತಮ ಕೆಲಸ-ಕಾರ್ಯ ಮಾಡುತ್ತಿರುವ ವ್ಯಕ್ತಿಗಳನ್ನು ಗುರುತಿಸಿ, ಅವರನ್ನು ಪ್ರಶಂಸಿಸಿ, ಅವರಿಂದ ಕಲಿಯಿರಿ, ಹಾಗೂ ಸಾಧ್ಯವಾದಲ್ಲಿ ನೀವು ಕೂಡಾ ಯಾವುದಾದರೊಂದು ಉತ್ತಮ ಕೆಲಸದಲ್ಲಿ ಕೈಜೋಡಿಸಿ. ಮುಂದಿನ ತಿಂಗಳ ಮನದ ಮಾತಿನಲ್ಲಿ ಮತ್ತಷ್ಟು ಪ್ರೇರಣಾದಾಯಕ ವಿಷಯಗಳೊಂದಿಗೆ ಮತ್ತೆ ನಿಮ್ಮನ್ನು ಭೇಟಿಯಾಗುತ್ತೇನೆ. ಅನೇಕಾನೇಕ ಧನ್ಯವಾದ. ನಮಸ್ಕಾರ.