"भारतीय इतिहास में मेरठ सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि संस्कृति और शक्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है"
"देश में खेलों के फलने-फूलने के लिए यह आवश्यक है कि युवाओं में खेलों में विश्वास हो और खेलों को एक व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। यही मेरा संकल्प और मेरा सपना भी है"
"गांवों और छोटे शहरों में खेल के बुनियादी ढांचे के आगमन के साथ, इन जगहों पर खिलाड़ियों की संख्या बढ़ रही है"
“संसाधनों और नई धाराओं के साथ उभरता खेल इकोसिस्टम नई संभावनाएं पैदा कर रहा है, इससे समाज में विश्वास पैदा होता है कि खेलों की ओर बढ़ना सही निर्णय है”
"मेरठ लोकल के लिए वोकल ही नहीं, लोकल को ग्लोबल में भी बदल रहा है"
"हमारा लक्ष्य स्पष्ट है, युवा न केवल रोल मॉडल बनें बल्कि अपने रोल मॉडल को भी पहचानें

भारत माता की, जय।

भारत माता की, जय।

यूपी की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल जी, यहां के लोकप्रिय और ऊर्जावान मुख्यमंत्री श्रीमान योगी आदित्यनाथ जी, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जी, केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे सहयोगी श्री संजीव बाल्यान जी, वीके सिंह जी, मंत्री श्री दिनेश खटीक जी, श्री उपेंद्र तिवारी जी, श्री कपिल देव अग्रवाल जी, संसद में मेरे साथी श्रीमान सत्यपाल सिंह जी, राजेंद्र अग्रवाल जी, विजयपाल सिंह तोमर जी, श्रीमती कांता कर्दम जी, विधायक भाई सोमेंद्र तोमर जी, संगीत सोम जी, जितेंद्र सतवाल जी, सत्य प्रकाश अग्रवाल जी, मेरठ ज़िला परिषद अध्यक्ष गौरव चौधरी जी, मुज़फ्फरनगर जिला परिषद अध्यक्ष वीरपाल जी, अन्य सभी जनप्रतिनिधिगण और मेरठ-मुजफ्फरनगर, दूर-दूर से आए मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, आप सभी को वर्ष 2022 की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

साल की शुरुआत में मेरठ आना, अपने आप में मेरे लिए बहुत अहम है। भारत के इतिहास में मेरठ का स्थान सिर्फ एक शहर का नहीं है, बल्कि मेरठ हमारी संस्कृति, हमारे सामर्थ्य का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। रामायण और महाभारत काल से लेकर जैन तीर्थंकरों और पंज-प्यारों में से एक भाई, भाई धर्मसिंह तक, मेरठ ने देश की आस्था को ऊर्जावान किया है।

सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम तक इस क्षेत्र ने दुनिया को दिखाया है कि भारत का सामर्थ्य क्या होता है। 1857 में बाबा औघड़नाथ मंदिर से आज़ादी की जो ललकार उठी, दिल्ली कूच का जो आह्वान हुआ, उसने गुलामी की अंधेरी सुरंग में देश को नई रोशनी दिखा दी। क्रांति की इसी प्रेरणा से आगे बढ़ते हुए हम आज़ाद हुए और आज गर्व से अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। मेरा सौभाग्य है कि यहां आने से पहले मुझे बाबा औघड़नाथ मंदिर जाने का अवसर मिला। मैं अमर जवान ज्योति भी गया, स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में उस अनुभूति को महसूस किया, जो देश की आजादी के लिए कुछ कर गुजरने वालों के दिलों में लालायित थी।

भाइयों और बहनों,

मेरठ और आसपास के इस क्षेत्र ने स्वतंत्र भारत को भी नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। राष्ट्ररक्षा के लिए सीमा पर बलिदान हों या फिर खेल के मैदान में राष्ट्र के लिए सम्मान, राष्ट्रभक्ति की अलख को इस क्षेत्र ने सदा-सर्वदा प्रज्जवलित रखा है। नूरपुर मड़ैया ने चौधरी चरण सिंह जी के रूप में देश को एक विजनरी नेतृत्व भी दिया। मैं इस प्रेरणा स्थली का वंदन करता हूं, मेरठ और इस क्षेत्र के लोगों का अभिनंदन करता हूं।

भाइयों और बहनों,

मेरठ, देश की एक और महान संतान, मेजर ध्यान चंद जी की भी कर्मस्थली रहा है। कुछ महीने पहले केंद्र सरकार ने देश के सबसे बड़े खेल पुरस्कार का नाम दद्दा के नाम पर कर दिया। आज मेरठ की स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी मेजर ध्यान चंद जी को समर्पित की जा रही है। और जब इस यूनिवर्सिटी का नाम मेजर ध्‍यानचंद जी से जुड़ जाता है तो उनका पराक्रम तो प्रेरणा देता ही है, लेकिन उनके नाम में भी एक संदेश है। उनके नाम में जो शब्‍द है ध्‍यान, बिना ध्‍यान केंद्रित किए, बिना फोकस एक्टिविटी किए, कभी भी सफलता नहीं मिलती है। और इसलिए जिस यूनिवर्सिटी का नाम ध्‍यानचंद से जुड़ा हुआ हो वहां पूरे ध्‍यान से काम करने वाले नौजवान देश का नाम रोशन करेंगे, ये मुझे पक्‍का विश्‍वास है।

मैं उत्तर प्रदेश के नौजवानों को यूपी की पहली स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। 700 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली ये आधुनिक यूनिवर्सिटी दुनिया की श्रेष्ठ स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटीज़ में से एक होगी। यहां युवाओं को खेलों से जुड़ी अंतरराष्‍ट्रीय सुविधाएं तो मिलेंगी ही, ये एक करियर के रूप में स्पोर्ट्स को अपनाने के लिए ज़रूरी स्किल्स का निर्माण करेगी। यहां से हर साल 1000 से अधिक बेटे-बेटियां बेहतरीन खिलाड़ी बनकर निकलेंगे। यानि क्रांतिवीरों की नगरी, खेलवीरों की नगरी के रूप में भी अपनी पहचान को और सशक्त करेगी।

साथियों,

पहले की सरकारों में यूपी में अपराधी अपना खेल खेलते थे, माफिया अपना खेल खेलते थे। पहले यहां अवैध कब्जे के टूर्नामेंट होते थे, बेटियों पर फब्तियां कसने वाले खुलेआम घूमते थे। हमारे मेरठ और आसपास के क्षेत्रों के लोग कभी भूल नहीं सकते कि लोगों के घर जला दिए जाते थे और पहले की सरकार अपने खेल में लगी रहती थी। पहले की सरकारों के खेल का ही नतीजा था कि लोग अपना पुश्तैनी घर छोड़कर पलायन के लिए मजबूर हो गए थे।

पहले क्‍या–क्‍या खेल खेले जाते थे, अब योगी जी की सरकार ऐसे अपराधियों के साथ जेल-जेल खेल रही है। पांच साल पहले इसी मेरठ की बेटियां शाम होने के बाद अपने घर से निकलने से डरती थीं। आज मेरठ की बेटियां पूरे देश का नाम रौशन कर रही हैं। यहां मेरठ के सोतीगंज बाजार में गाड़ियों के साथ होने वाले खेल का भी अब द एंड हो रहा है। अब यूपी में असली खेल को बढ़ावा मिल रहा है, यूपी के युवाओं को खेल की दुनिया में छा जाने का मौका मिल रहा है।

साथियों,

हमारे यहां कहा जाता है - महाजनो येन गताः स पंथाः

अर्थात्, जिस पथ पर महान जन, महान विभूतियां चलें वही हमारा पथ है। लेकिन अब हिंदुस्‍तान बदल चुका है, अब हम 21वीं सदी में हैं। और इस 21वीं सदी के नए भारत में सबसे बड़ा दायित्व हमारे युवाओं के पास ही है। और इसलिए, अब मंत्र बदल गया है- 21वीं सदी का तो मंत्र है - युवा जनो येन गताः स पंथाः।

जिस मार्ग पर युवा चल दें, वही मार्ग देश का मार्ग है। जिधर युवाओं के कदम बढ़ जाएं, मंजिल अपने-आप चरण चूमने लग जाती है। युवा नए भारत का कर्णधार भी है, युवा नए भारत का विस्तार भी है। युवा नए भारत का नियंता भी है, और युवा नए भारत का नेतृत्वकर्ता भी है। हमारे आज के युवाओं के पास प्राचीनता की विरासत भी है, आधुनिकता का बोध भी है। और इसीलिए, जिधर युवा चलेगा उधर भारत चलेगा। और जिधर भारत चलेगा उधर ही अब दुनिया चलने वाली है। आज हम देखें तो साइंस से लेकर साहित्य तक, स्टार्ट-अप्स से लेकर स्पोर्ट्स तक, हर तरफ भारत के युवा ही छाए हुए हैं।

भाइयों और बहनों,

खेल की दुनिया में आने वाले हमारे युवा पहले भी सामर्थ्यवान थे, उनकी मेहनत में पहले भी कमी नहीं थी। हमारे देश में खेल संस्कृति भी बहुत समृद्ध रही है। हमारे गांवों में हर उत्सव, हर त्यौहार में खेल एक अहम हिस्सा रहता है। मेरठ में होने वाले दंगल और उसमें जो घी के पीपे और लड्डुओं की जीत का पुरस्कार मिलता है, उस स्वाद के लिए किसका मन मैदान में उतरने के लिए ना हो। लेकिन ये भी सही है कि पहले की सरकारों की नीतियों की वजह से, खेल और खिलाड़ियों को उनकी तरफ देखने का नजरिया बहुत अलग रहा। पहले शहरों में जब कोई युवा अपनी पहचान एक खिलाड़ी के रूप में बताता था, अगर वो कहता था मैं खिलाड़ी हूं, मैं फलाना खेल खेलता हूं, मैं उस खेल में आगे बढ़ा हूं, तो सामने वाले क्‍या पूछते थे, मालूम है? सामने वाला पूछता था- अरे बेटे खेलते हो ये तो ठीक है, लेकिन काम क्या करते हो? यानी खेल की कोई इज्‍जत ही नहीं मानी जाती थी।

गांव में यदि कोई खुद को खिलाड़ी बताता- तो लोग कहते थे चलो फौज या पुलिस में नौकरी के लिए खेल रहा होगा। यानि खेलों के प्रति सोच और समझ का दायरा बहुत सीमित हो गया था। पहले की सरकारों ने युवाओं के इस सामर्थ्य को महत्व ही नहीं दिया। ये सरकारों का दायित्व था कि समाज में खेल के प्रति जो सोच है, उस सोच को बदल करके खेल को बाहर निकालना बहुत जरूरी है। लेकिन हुआ उल्टा, ज्यादातर खेलों के प्रति देश में बेरुखी बढ़ती गई। परिणाम ये हुआ कि जिस हॉकी में गुलामी के कालखंड में भी मेजर ध्यानचंद जी जैसी प्रतिभाओं ने देश को गौरव दिलाया, उसमें भी मेडल के लिए हमें दशकों का इंतज़ार करना पड़ा।

दुनिया की हॉकी प्राकृतिक मैदान से एस्ट्रो टर्फ की तरफ बढ़ गई, लेकिन हम वहीं रह गए। जब तक हम जागे, तब-तक बहुत देर हो चुकी थी। ऊपर से ट्रेनिंग से लेकर टीम सेलेक्शन तक हर स्तर पर भाई-भतीजावाद, बिरादरी का खेल, भ्रष्टाचार का खेल, लगातार हर कदम पर भेदभाव और पारदर्शिता का तो नामोनिशान नहीं। साथियो, हॉकी तो एक उदाहरण है, ये हर खेल की कहानी थी। बदलती टेक्नॉलॉजी, बदलती डिमांड, बदलती स्किल्स के लिए देश में पहले की सरकारें, बेहतरीन इकोसिस्टम तैयार ही नहीं कर पाईं।

साथियों,

देश के युवाओं का जो असीम टैलेंट था, वो सरकारी बेरुखी के कारण बंदिशों में जकड़ा हुआ था। 2014 के बाद उसे जकड़न से बाहर निकालने के लिए हमने हर स्तर पर रिफॉर्म किए। खिलाड़ियों के सामर्थ्य को बढ़ाने के लिए हमारी सरकार ने अपने खिलाड़ियों को चार शस्त्र दिए हैं। खिलाड़ियों को चाहिए- संसाधन, खिलाड़ियों को चाहिए-ट्रेनिंग की आधुनिक सुविधाएं, खिलाड़ियों को चाहिए- अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर, खिलाड़ियों को चाहिए- चयन में पारदर्शिता। हमारी सरकार ने बीते वर्षों में भारत के खिलाड़ियों को ये चार शस्त्र जरूर मिलें, इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। हमने स्पोर्ट्स को युवाओं की फिटनेस और युवाओं के रोज़गार, स्वरोज़गार, उनके करियर से जोड़ा है। टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानि Tops ऐसा ही एक प्रयास रहा है।

आज सरकार देश के शीर्ष खिलाड़ियों को उनके खाने-पीने, फिटनेस से लेकर ट्रेनिंग तक, लाखों-करोड़ों रुपए की मदद दे रही है। खेलो इंडिया अभियान के माध्यम से आज बहुत कम उम्र में ही देश के कोने-कोने में टैलेंट की पहचान की जा रही है। ऐसे खिलाड़ियों को इंटरनेशनल लेवल का एथलीट बनाने के लिए उनकी हर संभव मदद की जा रही है। इन्हीं प्रयासों की वजह से आज जब भारत का खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मैदान पर उतरता है, तो फिर उसका प्रदर्शन दुनिया भी सराहती है, देखती है। पिछले साल हमने ओलंपिक में देखा, हमने पैरालंपिक में देखा। जो इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ, वो पिछले ओलंपिक में मेरे देश के वीर बेटे-बेटियों ने करके दिखाया। मेडल की ऐसी झड़ी लगा दी कि पूरा देश कह उठा, एक स्‍वर से वो बोल उठा- खेल के मैदान में भारत का उदय हो गया है।

भाइयों और बहनों,

आज हम देख रहे हैं कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के अनेक छोटे-छोटे गांवों-कस्बों से, सामान्य परिवारों से बेटे-बेटियां भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे खेलों में भी हमारे बेटे-बेटियां आगे आ रहे हैं, जिनमें पहले संसाधन संपन्न परिवारों के युवा ही हिस्सा ले पाते थे। इसी क्षेत्र के अनेक खिलाड़ियों ने ओलंपिक्स और पैरालंपिक्स में देश का प्रतिनिधित्व किया है। सरकार गांव-गांव में जो आधुनिक स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रही है, उसका ही ये परिणाम है। पहले बेहतर स्टेडियम, सिर्फ बड़े शहरों में ही उपलब्ध थे, आज गांव के पास ही खिलाड़ियों को ये सुविधाएं दी जा रही हैं।

साथियों,

हम जब भी एक नई कार्य संस्कृति को बढ़ाने का प्रयास करते हैं, तो इसके लिए तीन चीजें जरूरी होती हैं- सानिध्य, सोच और संसाधन! खेलों से हमारा सानिध्य सदियों पुराना रहा है। लेकिन खेल की संस्कृति पैदा करने के लिए खेलों से हमारे पुराने संबंध से ही काम नहीं चलेगा। हमें इसके लिए एक नई सोच भी चाहिए। देश में खेलों के लिए जरूरी है कि हमारे युवाओं में खेलों को लेकर विश्वास पैदा हो, खेल को अपना प्रॉफ़ेशन बनाने का हौसला बढ़े। और यही मेरा संकल्प भी है, और ये मेरा सपना भी है! मैं चाहता हूँ कि जिस तरह दूसरे प्रॉफ़ेशन्स हैं, वैसे ही हमारे युवा स्पोर्ट्स को भी देखें। हमें ये भी समझना होगा कि जो कोई स्पोर्ट्स में जाएगा, वो वर्ल्ड नंबर 1 बनेगा, ये जरूरी नहीं है। अरे, देश में जब स्पोर्ट eco-system तैयार होता है तो स्पोर्ट्स मैनेजमेंट से लेकर स्पोर्ट्स राइटिंग और स्पोर्ट्स साइक्‍लॉजी तक, स्पोर्ट्स से जुड़ी कितनी ही संभावनाएं खड़ी होती हैं। धीरे-धीरे समाज में ये विश्वास पैदा होता है कि युवाओं का स्पोर्ट्स की तरफ जाना एक सही निर्णय है। इस तरह का eco-system तैयार करने के लिए जरूरत होती है- संसाधनों की। जब हम जरूरी संसाधन, जरूरी इनफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर लेते हैं तो खेल की संस्कृति मजबूत होने लगती है। अगर खेलों के लिए जरूरी संसाधन होंगे तो देश में खेलों की संस्कृति भी आकार लेगी, विस्तार लेगी।

इसीलिए, आज इस तरह की स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटीज़ इतनी ही जरूरी हैं। ये स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटीज़ खेल की संस्कृति के पुष्पित-पल्लवित होने के लिए नर्सरी की तरह काम करती हैं। इसलिए ही आज़ादी के 7 दशक बाद 2018 में पहली नेशनल स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी हमारी सरकार ने मणिपुर में स्थापित की। बीते 7 सालों में देशभर में स्पोर्ट्स एजुकेशन और स्किल्स से जुड़े अनेकों संस्थानों को आधुनिक बनाया गया है। और अब आज मेजर ध्यान चंद स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी, स्पोर्ट्स में हायर एजुकेशन का एक और श्रेष्ठ संस्थान देश को मिला है।

साथियों,

खेल की दुनिया से जुड़ी एक और बात हमें याद रखनी है। और मेरठ के लोग तो इसे अच्छी तरह जानते हैं। खेल से जुड़ी सर्विस और सामान का वैश्विक बाज़ार लाखों करोड़ रुपए का है। यहां मेरठ से ही अभी 100 से अधिक देशों को स्पोर्ट्स का सामान निर्यात होता है। मेरठ, लोकल के लिए वोकल तो है ही, लोकल को ग्लोबल भी बना रहा है। देशभर में ऐसे अनेक स्पोर्ट्स क्लस्टर्स को भी आज विकसित किया जा रहा है। मकसद यही है कि देश स्पोर्ट्स के सामान और उपकरणों की मैन्यूफैक्चरिंग में भी आत्मनिर्भर बन सके।

अब जो नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी लागू हो रही है, उसमें भी खेल को प्राथमिकता दी गई है। स्पोर्ट्स को अब उसी श्रेणी में रखा गया है, जैसे साईंस, कॉमर्स, मैथेमेटिक्‍स, ज्‍योग्रॉफी या दूसरी पढ़ाई हो। पहले खेल को एक्स्ट्रा एक्टिविटी माना जाता था, लेकिन अब स्पोर्ट्स स्कूल में बाकायदा एक विषय होगा। उसका उतना ही महत्व होगा जितना बाकी विषयों का।

साथियों,

यूपी के युवाओं में तो इतनी प्रतिभा है, हमारे यूपी के युवा इतने प्रतिभावान हैं कि आसमान छोटा पड़ जाए। इसलिए यूपी में डबल इंजन सरकार कई विश्वविद्यालयों की स्थापना कर रही है। गोरखपुर में महायोगी गुरू गोरखनाथ आयुष यूनिवर्सिटी, प्रयागराज में डॉ राजेन्द्र प्रसाद विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ में स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फारेंसिक साइंसेज़, अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय, सहारनपुर में मां शाकुँबरी विश्वविद्यालय और यहां मेरठ में मेजर ध्यानचंद स्पोर्टस यूनिवर्सिटी, हमारा ध्येय साफ है। हमारा युवा ना सिर्फ रोल मॉडल बने वो अपने रोल मॉडल पहचाने भी।

साथियों,

सरकारों की भूमिका अभिभावक की तरह होती है। योग्यता होने पर बढ़ावा भी दें और गलती होने पर ये कहकर ना टाल दें कि लड़कों से गलती हो जाती है। आज योगी जी की सरकार, युवाओं की रिकॉर्ड सरकारी नियुक्तियां कर रही है। ITI से ट्रेनिंग पाने वाले हजारों युवाओं को बड़ी कंपनियों में रोज़गार दिलवाया गया है। नेशनल अप्रेंटिसशिप योजना हो या फिर प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, लाखों युवाओं को इसका लाभ दिया गया है। अटल जी की जयंती पर यूपी सरकार ने विद्यार्थियों को टेबलेट और स्मार्टफोन देने का भी अभियान शुरू किया है।

साथियों,

केंद्र सरकार की एक और योजना के बारे में भी यूपी के नौजवानों को जानना जरूरी है। ये योजना है- स्वामित्व योजना। इस योजना के तहत केंद्र सरकार, गांवों में रहने वाले लोगों को, उनकी प्रॉपर्टी के मालिकाना हक से जुड़े कागज- घरौनी दे रही है। घरौनी मिलने पर, गांव के युवाओं को, अपना काम-धंधा शुरू करने लिए बैंकों से आसानी से मदद मिल पाएगी। ये घरौनी, गरीब, दलित, वंचित, पीड़ित, पिछड़े, समाज के हर वर्ग को अपने घर पर अवैध कब्ज़े की चिंता से भी मुक्ति दिलाएगी। मुझे खुशी है कि स्वामित्व योजना को योगी जी की सरकार बहुत तेजी से आगे बढ़ा रही है। यूपी के 75 जिलों में 23 लाख से अधिक घरौनी दी जा चुकी है। चुनाव के बाद, योगी जी की सरकार, इसी अभियान को और तेज करेगी।

भाइयों और बहनों,

इस क्षेत्र के ज्यादातर युवा ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए भी हमारी सरकार निरंतर काम कर रही है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से कल ही, यूपी के लाखों किसानों के बैंक खातों में करोड़ों रुपए ट्रांसफर किए गए हैं। इसका बहुत बड़ा लाभ, इस क्षेत्र के छोटे किसानों को भी हो रहा है।

साथियों,

जो पहले सत्ता में थे, उन्होंने आपको गन्ने का मूल्य, किस्तों में तरसा-तरसा कर दिया। योगी जी सरकार में जितना गन्ना किसानों को भुगतान किया गया है, उतना पिछली दोनों सरकार के दौरान किसानों को नहीं मिला था। पहले की सरकारों में चीनी मिलें कौड़ियों के भाव बेची जाती थीं, मुझसे ज्‍यादा आप जानते हैं, जानते हैं कि नहीं जानते हैं? चीनी मिलें बेची गईं कि नहीं बेची गईं? भ्रष्‍टाचार हुआ कि नहीं हुआ? योगी जी की सरकार में मिलें बंद नहीं होतीं, यहां तो उनका विस्तार होता है, नई मिलें खोली जाती हैं। अब यूपी, गन्ने से बनने वाले इथेनॉल के उत्पादन में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। बीते साढ़े 4 साल में लगभग 12 हज़ार करोड़ रुपए का इथेनॉल यूपी से खरीदा गया है। सरकार कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर और फूड प्रोसेसिंग, ऐसे उद्योगों को भी तेज़ी से विस्तार दे रही है। आज ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर पर, भंडारण की व्यवस्था बनाने पर, कोल्ड स्टोरेज पर एक लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

भाइयों और बहनों,

डबल इंजन की सरकार युवाओं के सामर्थ्य के साथ ही इस क्षेत्र के सामर्थ्य को भी बढ़ाने के लिए काम कर रही है। मेरठ का रेवड़ी-गजक, हैंडलूम, ब्रास बैंड, आभूषण, ऐसे कारोबार यहां की शान हैं। मेरठ-मुज्जफरनगर में छोटे और लघु उद्योगों का और विस्तार हो, यहां बड़े उद्योगों का मज़बूत आधार बने, यहां के कृषि उत्पादों, यहां की उपज को नए बाज़ार मिले, इसके लिए भी आज अनेकविध प्रयास किए जा रहे हैं। इसलिए, इस क्षेत्र को देश का सबसे आधुनिक और सबसे कनेक्टेड रीजन बनाने के लिए काम हो रहा है। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे की वजह से दिल्ली अब एक घंटे की दूरी पर रह गई है। अभी कुछ दिन पहले ही जो गंगा एक्सप्रेसवे का काम शुरू हुआ है, वो भी मेरठ से ही शुरू होगा। ये मेरठ की कनेक्टिविटी यूपी के दूसरे शहरों से और संबंधों को, व्‍यवहार को आसान बनाने में काम करेगी। देश का पहला रीजनल रेपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम भी मेरठ को राजधानी से जोड़ रहा है। मेरठ देश का पहला ऐसा शहर होगा जहां मेट्रो और हाई स्पीड रैपिड रेल एक साथ दौड़ेंगी। मेरठ का आईटी पार्क जो पहले की सरकार की सिर्फ घोषणा बनकर रह गया था, उसका भी लोकार्पण हो चुका है।

साथियों,

यही डबल बेनिफिट, डबल स्पीड, डबल इंजन की सरकार की पहचान है। इस पहचान को और सशक्त करना है। मेरे पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के लोग जानते हैं कि आप उधर हाथ लंबा करोगे तो लखनऊ में योगीजी, और इधर हाथ लंबा करोगे तो दिल्‍ली में मैं हूं ही आपके लिए। विकास की गति को और बढ़ाना है। नए साल में हम नए जोश के साथ आगे बढ़ेंगे। मेरे नौजवान सा‍थियो, आज पूरा हिंदुस्‍तान मेरठ की ताकत देख रहा है, पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश की ताकत देख रहा है, नौजवानों की ताकत देख रहा है। ये ताकत देश की ताकत है और इस ताकत को और बढ़ावा देने के लिए एक नए विश्‍वस के साथ एक बार फिर आपको मेजर ध्यानचंद स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के लिए बहुत-बहुत बधाई!

भारत माता की जय! भारत माता की जय!

वंदे मातरम! वंदे मातरम!

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दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल देगा: उत्तराखंड में पीएम मोदी
April 14, 2026
आज उद्घाटित दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारा एक विश्व स्तरीय अवसंरचना परियोजना है जो कनेक्टिविटी को मजबूत करेगी, अर्थव्यवस्था और पर्यटन को बढ़ावा देगी: प्रधानमंत्री
उत्तराखंड ने अपने गठन के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं और अब यह अपने 26वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है; आज दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के साथ एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि अर्जित की गई: प्रधानमंत्री
देहरादून-दिल्ली आर्थिक गलियारा समस्‍त क्षेत्र को रूपांतरित कर देगा: प्रधानमंत्री
यह गलियारा समय बचाएगा, यात्रा सस्ती और तेज होगी, लोग पेट्रोल और डीजल पर कम व्‍यय करेंगे और किराए एवं माल ढुलाई लागत में कमी आएगी; इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे: प्रधानमंत्री
हमारे पहाड़, ये वन क्षेत्र, देवभूमि की यह विरासत, ये बहुत ही पवित्र स्थान हैं; ऐसे स्थानों को स्‍वच्‍छ रखना हमारा कर्तव्य है: प्रधानमंत्री
इन क्षेत्रों में प्लास्टिक की बोतलें, कूड़े के ढेर देवभूमि की पवित्रता को ठेस पहुंचाते हैं; यह बहुत आवश्‍यक है कि हम देवभूमि के इन स्थलों, हमारे तीर्थ स्थलों को स्‍वच्‍छ और सुंदर रखें: प्रधानमंत्री

 

भारत माता की जय।

भारत माता की जय।

भारत माता की जय।

उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह जी, यहां के लोकप्रिय और कर्मठ युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी, केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी नितिन गड़करी जी, अजय टमटा जी, टेक्नॉलोजी के माध्यम से जुड़े उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, गर्वनर आनंदी बेन, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी, मंच पर उपस्थित प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट जी, पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जी, पूर्व मुख्यमंत्री भाई रमेश पोखरियाल, विजय बहुगुना जी, तीरथ सिंह रावत जी, त्रिवेंद्र सिंह रावत जी, उत्तराखंड सरकार के सभी मंत्रीगण, सांसद और विधायकगण और विशाल संख्या में पधारे मेरे प्यारे भाईयों बहनों।

देवभूमि उत्तराखंड़ की इस पावन धरती पर आप सभी को मेरा प्रणाम। बहुत बडी संख्या में आए हुए पूज्य संतगण को भी प्रणाम। उत्तराखंड का प्यारा भुलों-भैबंदों, बौड़ी-भूलियों, स्याणा-बुजुर्गों, आप सबु तैं नमस्कार! मेरो प्यारो दाजी भाई, दीदी-बैनी, आमा-बाबा सबई लाई मेरो तरफ़ देखी ढोग दिनछू।

इस कार्यक्रम से टेक्नोलॉजी के जरिये भी दिल्ली, यूपी से अनेक लोग जुड़े हैं, मैं सभी का अभिनन्दन करता हूं। सबसे पहले तो मैं आप सबकी क्षमा चाहता हूं, उत्तरप्रदेश और दिल्ली के कार्यक्रम में जुड़े हुए लोगों की भी क्षमा मांगता हूं, कि मुझे यहां पहुंचने में एक घंटे से भी ज्यादा देर हो गई, सब स्थान पर लंबे समय तक आप सबको इंतजार करना पड़ा, और कारण यही था, मैं निकला तो समय पर था, लेकिन करीब-करीब 12 किलोमीटर का रोड शो, काली मंदिर से लेकर के यहां तक, इतना उत्साह इतना उमंग, कि मेरे लिए तेज गति से गाड़ी चलाना बड़ा मुश्किल हो गया। तो धीरे-धीरे लोगों को प्रणाम करते-करते, जनता जनार्दन के आशीर्वाद लेते लेते यहां पहुंचने में मुझे एक घंटे से भी ज्यादा देरी हो गई, और इसके लिए मैं आपकी क्षमा मांगता हूं, और ऐसी धूप में 12 किलोमीटर ये जन सैलाब, ये उत्तराखंड़ का प्यार, माताओं-बहनों का आशीर्वाद, मैं आज उत्तराखंड़ से एक नई ऊर्जा लेकर के जाऊंगा, नई प्रेरणा लेकर के जाऊंगा और मैं इसके लिए हर किसी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।

साथियों,

आज देश में पर्व त्योहार की उमंग है। विभिन्न हिस्सों में नववर्ष का आगमन हुआ है। मैं देशवासियों को बैसाखी, बोहाग बीहू और पुथांडु की शुभकामनाएं देता हूं!

साथियों,

अगले कुछ ही दिनों में, यमुनोत्री, गंगोत्री, बाबा केदारनाथ, बद्रीनाथ धाम की यात्रा भी शुरू होने जा रही है। इस पवित्र समय का, देश के कोटि-कोटि आस्थावान, श्रद्धाभाव से इंतज़ार करते हैं। मैं पंच बद्री, पंच केदार, पंच प्रयाग और यहां के आराध्य देवों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता हूं। मैं संतला माता को भी नमन करता हूं। यहां आने से पहले मुझे, मां डाट काली के दर्शन करने का सौभाग्य मिला है। देहरादून शहर पर, मां डाट काली की बड़ी कृपा है। दिल्ली-देहरादून इकनॉमिक कॉरिडोर के इतने बड़े प्रोजेक्ट को पूरा करने में, माता डाट काली का आशीर्वाद बहुत बड़ी शक्ति रहा है।

साथियों,

उत्तराखंड राज्य अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरा करने के साथ ही छब्बीसवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। आज दिल्ली देहरादून एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन के साथ इस प्रगति में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ी है। आपको याद होगा, बाबा केदार के दर्शन के बाद मेरे मुंह से अनायास निकला था, कि इस शताब्दी का तीसरा दशक उत्तराखंड का दशक होगा। मुझे बहुत खुशी है कि डबल इंजन सरकार की नीतियों, और उत्तराखंड के लोगों के परिश्रम से, ये युवा राज्य, विकास के नए आयाम जोड़ रहा है। ये प्रोजेक्ट भी, उत्तराखंड के विकास को नई गति देगा। इस एक्सप्रेसवे का बहुत बड़ा हिस्सा यूपी से होकर गुजरता है। इससे गाजियाबाद, बागपत, बड़ौत, शामली और सहारनपुर जैसे अनेक शहरों को भी बहुत फायदा होगा। टूरिज्म के लिहाज से ये प्रोजेक्ट बहुत अहम है। मैं पूरे देश को इस प्रोजेक्ट की बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

आज डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती भी है। मैं बाबा साहेब को कोटि-कोटि देशवासियों की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। बीते दशक में हमारी सरकार ने जो नीतियां बनाईं, जो निर्णय लिए, वो संविधान की गरिमा को पुनर्स्थापित करने वाले रहे हैं। आर्टिकल 370 हटने के बाद आज पूरे देश में भारत का संविधान लागू है। जिन दर्जनों जिलों में माओवाद-नक्सलवाद खत्म हुआ है, वहां भी अब संविधान की भावना के अनुरूप काम हो रहा है। देश में समान नागरिक संहिता लागू हो, ये हमारे संविधान की अपेक्षा है। उत्तराखंड ने संविधान की इस भावना को आगे बढ़कर और उस भावना को आगे बढ़ाकर पूरे देश को राह दिखाई है।

साथियों,

बाबा साहेब का जीवन, गरीबों को, वंचितों को, शोषितों को न्यायपूर्ण व्यवस्था देने के लिए समर्पित था। हमारी सरकार आज उसी भावना के साथ, हर गरीब, हर वंचित को सच्चा सामाजिक न्याय देने में जुटी है। और सामाजिक न्याय का एक बहुत बड़ा माध्यम, देश का संतुलित विकास है, सबको सुविधा है, सबकी समृद्धि है। इसलिए ही बाबा साहेब आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की, औद्योगीकरण की भरपूर वकालत करते थे।

साथियों,

भविष्य की दशा और दिशा क्या होगी, अक्सर लोग, इसके लिए हाथ की रेखाओं को देखते हैं, दिखाते हैं। जो भविष्य वक्ता होते हैं ना, वो हस्त रेखाएं देखते हैं, और हर व्यक्ति के भविष्य के विषय में बताते हैं। मैं इस विज्ञान को तो नहीं जानता हूं, लेकिन कहते हैं कि ये भी एक शास्त्र है। अब ये तो हो गई व्यक्ति के भाग्य की जो उसके हाथ में रेखाएं हैं उसकी बात, लेकिन मैं अगर इसी संदर्भ मे बात को, इसी संदर्भ को राष्ट्र-जीवन से जोड़कर के देखूं, तो राष्ट्र की भाग्य रेखाएं कौन सी होती हैं? राष्ट्र की भाग्य रेखाएं ये हमारी ये सड़कें होती हैं, हमारे हाईवे होते हैं, हमारे एक्सप्रेसवे होते हैं, एयरवे, रेलवे, वॉटरवे, ये हमारे राष्ट्र की भाग्य रेखाएं होती हैं। और बीते एक दशक से हमारा देश, विकसित भारत बनाने के लिए विकास की ऐसी ही भाग्य रेखाओं के निर्माण में जुटा हुआ है। ये विकास रेखाएं सिर्फ आज की सुविधाएं नहीं हैं, ये आने वाली पीढ़ियों की समृद्धि की गारंटी हैं और ये मोदी की भी गारंटी है। बीते दशक से हमारी सरकार राष्ट्र की इन विकास-रेखाओं पर अभूतपूर्व निवेश कर रही है। मैं आपको एक आंकड़ा देता हूं। अभी नितिन जी ने बहुत सारे आंकड़ें सिर्फ उत्तराखंड़ से संबंधित बताए हैं आपको। देखिए साल 2014 तक ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए साल में, पूरे देश में, 2 लाख करोड़ रुपए भी खर्च नहीं होते थे। ये मैं पूरे हिन्दुस्तान की बात बताता हूं, 2 लाख करोड़ भी नहीं होते थे, आज ये छह गुना अधिक, 12 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा हो चुका है। यहां उत्तराखंड में ही, सवा दो लाख करोड़ रुपए से अधिक के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम जारी है। 2014 के पहले पूरे देश के लिए 2 लाख करोड़, आज अकेले उत्तराखंड़ के लिए सवा दो लाख करोड़ रूपया। कभी उत्तराखंड के गांवों में सड़क के इंतज़ार में पीढ़ियां बदल जाती थीं। आज डबल इंजन सरकार के प्रयासों से, अब सड़क गांव तक पहुंच रही है, जो गांव पहले वीरान पड़ गए थे, वो फिर से जीवंत हो रहे हैं। चारधाम महामार्ग परियोजना हो, रेल परियोजनाओं का विस्तार हो, केदारनाथ और हेमकुंड साहिब रोपवे हो, विकास की ये रेखाएं, इस क्षेत्र के कोने-कोने में जीवन की भी भाग्य रेखाएं बन रही हैं।

साथियों,

21वीं सदी का भारत आज जिस स्पीड और जिस स्केल पर काम कर रहा है, उसकी पूरी दुनिया चर्चा कर रही है। मैं आपको उत्तराखंड, पश्चिमी यूपी और दिल्ली का ही उदाहरण देता हूं। कुछ सप्ताह पहले ही, दिल्ली मेट्रो का विस्तार हुआ, मेरठ में मेट्रो-सेवा की शुरुआत हुई, दिल्ली-मेरठ नमो-भारत रेल देश को समर्पित की गई, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की शुरुआत हुई, हवाई जहाजों के लिए MRO फेसिलिटी पर काम शुरू हुआ, और आज, देहरादून-दिल्ली एक्सप्रेसवे शुरु हो रहा है।

साथियों,

इतने छोटे से रीजन में ये सब इतने कम समय में हो रहा है। कल्पना कीजिए, देश में कितने बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है। और इसलिए ही मैं कहता हूं - 21वीं सदी का भारत, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के जिस नए युग में प्रवेश कर रहा है, वो अभूतपूर्व है, अकल्पनीय है।

साथियों,

आज भारत के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाले, अनेक इकोनॉमिक कॉरिडोर्स, उस पर काम चल रहा है। जैसे दिल्ली-मुबंई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, बेंगलुरू-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर, अमृतसर-कोलकाता इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, ऐसे बहुत से इकोनॉमिक कॉरिडोर देश में बनाए जा रहे हैं। ये इकोनॉमिक कॉरिडोर, प्रगति के नए द्वार हैं, गेटवे हैं, डोर हैं। और इनसे उम्मीदों की डोर भी जुड़ी हुई है। ये इकोनॉमिक कॉरिडोर, सड़क के अलावा नए-नए व्यापार-कारोबार का मार्ग बनाते हैं। फैक्ट्रियों के लिए, गोदामों के लिए पूरा नेटवर्क, उसका आधार तैयार करते हैं।

साथियों,

देहरादून-दिल्ली इकोनॉमिक कॉरिडोर से भी इस पूरे क्षेत्र का कायाकल्प होने जा रहा है। पहला फायदा तो ये है कि इससे समय बचेगा, आना-जाना सस्ता और तेज होगा, लोगों का पेट्रोल-डीजल कम खर्च होगा, किराया-भाड़ा कम होगा, और दूसरा बड़ा फायदा रोजगार का होगा। अभी इसके निर्माण में 12 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए, तो हज़ारों श्रमिकों को काम मिला है। साथ ही, जो इंजीनियर हैं, अन्य स्किल्ड वर्कफोर्स हैं, ट्रांसपोर्ट से, उससे जुड़े साथी हैं, उनको भी बहुत बड़ी मात्रा में काम मिला है। किसानों और पशुपालकों की उपज भी, अब तेज़ गति से, बड़ी मंडियों और बड़े बाज़ारों तक पहुंचेगी।

साथियों,

इस शानदार एक्सप्रेस-वे से उत्तराखंड के टूरिज्म को बहुत ही बड़ा फायदा होगा। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, मसूरी और चारधाम यात्रा के लिए ये सबसे प्रमुख मार्ग बनेगा। और हम सभी जानते हैं, जब टूरिज्म का विकास होता है, तो हर कोई कुछ न कुछ कमाता है। होटल हो, ढाबे वाले हो, टैक्सी हो, ऑटो हो, होम स्टे हो, सबको इसका फायदा होता है।

साथियों,

मुझे खुशी है कि आज उत्तराखंड, विंटर टूरिज्म, विंटर स्पोर्टस और wed in india, शादी के लिए, बहुत बेहतरीन डेस्टिनेशन बनता जा रहा है।

साथियों,

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए बारहमासी पर्यटन बहुत जरूरी है। इसलिए मेरा सर्दियों में होने वाली धार्मिक यात्राओं को लेकर बहुत आग्रह रहा है। और मुझे खुशी है कि हर साल इन यात्राओं में लोगों की संख्या बढ़ रही है। आपको याद होगा, मैं 2023 में आदि कैलाश और ओम पर्वत की यात्रा पर गया था। पहले बहुत जाता था, बीच में बिल्कुल जा नहीं पाया, कई वर्षों के बाद मैं गया, और मुझे मुख्यमंत्री जी बता रहे थे, गर्वनर साहब बीच मे आए, वो भी बता रहे थे कि 2023 में वहां गया और उसके बाद, बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु वहां जा रहे हैं। पहले वहां कुछ सौ लोग ही सर्दियों में यात्रा के लिए जाते थे। साल 2025 में, करीब-करीब 40 हजार से अधिक लोगों ने इन पवित्र स्थानों की यात्रा की है। कभी एक हजार नहीं होते थे, अगर चालीस हजार पहुंचते हैं तो यहां के लोगों की रोजी-रोटी की कितनी बड़ी ताकत आ जाती है। इसी तरह साल 2024 में शीतकालीन चारधाम यात्रा में, करीब अस्सी हज़ार श्रद्धालु आए थे। 2025 में ये संख्या डेढ़ लाख पार कर चुकी है।

साथियों,

हम ऐसा विकसित भारत बनाने में जुटे हैं, जहां प्रगति भी हो, प्रकृति भी हो और संस्कृति भी हो। और इसलिए, आज होने वाले हर निर्माण को, इन्हीं त्रिवेणी, प्रगति, प्रकृति और सांस्कृति की त्रिवेणी, इन्हीं मूल्यों के आधार पर विकसित किया जा रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर से इंसानों को भी सुविधा हो, और वहां रहने वाले वन्यजीवों को भी असुविधा न हो, ये हमारा प्रयास है। और इसलिए ही इस एक्सप्रेसवे पर, करीब 12 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर भी बनाया गया है। हाथियों को भी असुविधा न हो, इसका भी ध्यान रखा गया है।

वैसे साथियों,

मैं आज देशभर के सभी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों से भी एक आग्रह करना चाहता हूं। हमारे पहाड़, ये वन क्षेत्र, ये देवभूमि की धरोहर, ये बहुत ही बहुत पवित्र स्थान हैं। ऐसे स्थानों को साफ-सुथरा रखना, ये हम सभी का कर्तव्य है। यहां रहने वालों का भी और यात्री के रूप में आने वालों का भी। इन इलाकों में प्लास्टिक की बोतलें, कूड़े-कचरे का ढेर, ये देवभूमि की पवित्रता को ठेस पहुंचाता है। इसलिए बहुत आवश्यक है कि हम देवभूमि के इन स्थलों को, हमारे इन तीर्थ स्थलों को स्वच्छ रखें, सुंदर रखें।

साथियों,

अगले वर्ष हरिद्वार में कुंभ का भी आयोजन होना है। हमें आस्था के इस संगम को दिव्य-भव्य और स्वच्छ बनाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़नी है।

साथियों,

उत्तराखंड में नंदा देवी राजजात यात्रा भी होती है। ये आस्था का उत्सव तो है ही, ये हमारी सांस्कृतिक चेतना का भी जीवंत उदाहरण है। जहां मां नंदा को बेटी मानकर पूरे सम्मान के साथ विदा किया जाता है। इस यात्रा में बहनों-बेटियों की भागीदारी, इसे विशेष बनाती है। मैं मां नंदा को प्रणाम करते हुए, देशभर की बहनों-बेटियों को भी विशेष संदेश देना चाहता हूं। विकसित भारत के निर्माण में आपकी बहुत बड़ी भूमिका है। इस देश की बेटियों की, इस देश की माताओं की, बहनों की बहुत बड़ी भूमिका मैं देख रहा हूं। और बहनों-बेटियों की सुविधा, सुरक्षा और लोकतंत्र में भागीदारी, ये डबल इंजन सरकार की बहुत बड़ी प्राथमिकता है। आप अभी देख रही हैं, कि दुनिया में कितना बड़ा संकट आया है। इससे दुनिया के विकसित देशों में भी कितना हाहाकार मचा है। ऐसे मुश्किल हालात में भी, सरकार का निरंतर प्रयास है कि हमारी बहनों को कम से कम परेशानी हो।

साथियों,

बहनों-बेटियों की भागीदारी का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव अब देश के सामने है। 4 दशकों के इंतज़ार के बाद संसद ने, नारीशक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था। इससे विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण तय हो गया। सभी दलों ने आगे आकर इस महत्वपूर्ण कानून को समर्थन दिया। अब महिलाओं को ये जो हक मिला है ना, इस हक को लागू करने में देर नहीं होनी चाहिए। अब ये लागू होना चाहिए। अब जो 2029 में लोकसभा के चुनाव होंगे, अब तब से लेकर विधान सभा के भी चुनाव आते रहेंगे, जो भी चुनाव आते रहेंगे, 2029 से ही ये लागू हो जाना चाहिए। ये देश की भावना है, ये देश की हर बहन-बेटी की इच्छा है। मातृशक्ति की इसी इच्छा को नमन करते हुए, 16 अप्रैल से संसद में विशेष चर्चा तय की गई है। देश की बहनों-बेटियों के हक से जुड़े इस काम को, सभी राजनीतिक दल मिलकर के सर्वसम्मति से आगे बढ़ाएं, उसको पूरा करे। और मैंने आज देश की सभी बहनों के नाम एक खुला पत्र लिखा है, सोशल मीडिया में शायद ये मेरा पत्र आप तक पहुंचा होगा, हो सकता है टीवी और अखबार वाले भी इस पत्र का जिक्र करते होंगे। मैंने बड़े आग्रह के साथ देश की माताओं-बहनों को इस कार्य में भागीदार बनने के लिए निमंत्रित किया है। मुझे पक्का विश्वास है कि पत्र मेरे देश की माताएं-बहनें जरूर पढ़ेंगी। एक एक शब्द पर मनन करेंगी, और इतना बड़ा पवित्र कार्य करने के लिए 16-17-18 को संसद में आने वाले सभी सांसदों को उनके आशीर्वाद भी मिलेंगे। मैं आज देवभूमि से देश के सभी दलों से फिर अपील करूंगा कि नारीशक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन का जरूर समर्थन करें। 2029 में हमारे देश की 50 प्रतिशत जनसंख्या हमारी माताएं-बहनें, हमारी बेटियां, उनको उनका हक हम देकर रहें।

साथियों,

मैं उत्तराखंड आउं और फौज की बात ना हो, तो बात अधूरी ही रहती है। ये गढ़ी कैंट, ये सभा स्थल, ये उत्तराखंड की महान सैन्य परंपरा का प्रमाण है। यहां पास ही देश की रक्षा सुरक्षा से जुड़े कई संस्थान हैं, 1962 की लड़ाई में, शहीद जसवंत सिंह रावत जी के शौर्य को देश कभी भुला नहीं सकता।

साथियों,

सेना के सामर्थ्य को सशक्त करना हो, या हमारे सैनिक परिवारों की सुविधा और सम्मान हो, हमारी सरकार इसके लिए निरंतर प्रयासरत है। वन रैंक वन पेंशन के माध्यम से हमारी सरकार ने, अब तक करीब सवा लाख करोड़ रुपए पूर्व फौजियों को उनके खाते में जमा कर दिए हैं। उत्तराखंड के भी हजारों परिवारों को इसका लाभ मिला है। इसके अलावा, इस वर्ष पूर्व फौजियों के लिए health scheme का बजट भी छत्तीस प्रतिशत बढ़ाया गया है। 70 वर्ष और इससे अधिक के ex-servicemen के लिए, दवाईयों की door step home delivery भी शुरू की गई है। पूर्व फौजियों के बच्चों की एजुकेशन ग्रांट भी डबल की गई है। और बेटियों के विवाह के लिए जो सहायता मिलती है, उसको भी 50 हज़ार से बढ़ाकर एक लाख रुपए किया गया है।

साथियों,

देशभक्ति, देवभक्ति और प्रगति, ऐसे हर आयाम को जोड़ते हुए, हमें देश को विकसित बनाना है। एक बार फिर दिल्ली-वासियों को, उत्तर प्रदेश वासियों को, और एक प्रकार से देशवासियों को, इस शानदार एक्सप्रेसवे की मैं बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

मेरे साथ बोलिये-

भारत माता की जय!

भारत माता की जय!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

बहुत-बहुत धन्यवाद !