प्रधानमंत्री मोदी ने कुआलालंपुर में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण किया
स्वामी विवेकानंद ही थे जिन्होंने पहली बार ‘एक एशिया’ की अपनी सोच को सबके सामने रखा था: प्रधानमंत्री
दक्षिण पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन ‘एक एशिया’ का पक्षधर: प्रधानमंत्री
वेदों से लेकर विवेकानंद तक भारत की संस्कृति समृद्ध है: प्रधानमंत्री
स्वामी विवेकानंद न तो एक व्यक्ति हैं और न ही एक प्रणाली, वे प्राचीन भारत की आत्मा की पहचान हैं: प्रधानमंत्री
विवेकानंद सिर्फ एक नाम नहीं है। वे हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति और सभ्यता के द्योतक: प्रधानमंत्री
मलेशियाई धरती पर स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा समर्पित करना मेरे लिए सौभाग्य की बात: प्रधानमंत्री
सत्य की खोज ने रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद को आपस में मिलाया। वो कोई शिक्षक या शिष्य नहीं ढूंढ रहे थे: प्रधानमंत्री
स्वामी विवेकानंद सत्य की खोज में लगे थे: प्रधानमंत्री

भाइयो और बहनों।

अभी सुप्रियान जी कह रहे थे कि हमने इस परिसर में तो विवेकानंद जी की प्रतिमा की स्था्पना की, पर हम हमारे मन-मंदिर में, हमारे हृदय में विवेकानंद जी को प्रतिस्था पित करें और मैं ये बात आपको कहूं और आप कर लेंगे।

मैं नहीं मानता हूं कि मेरे कहने से हमारे भीतर विवेकानंद प्रवेश कर सकते है और न ही किसी के प्रवचन से विवेकानंद जी हमारे भीतर प्रवेश कर सकते है। विवेकानंद, ये न किसी व्यक्ति का नाम है, विवेकानंद न किसी व्यवस्था की पहचान है, एक प्रकार से विवेकानंद सहस्त्र साल पुरानी भारत की आत्मा की पहचान है।

वेद से विवेकानंद तक हमारी एक सांस्कृतिक लंबी विरासत है और उपनिषद से ले कर के उपग्रह तक हमने हमारी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक विकास यात्रा को भी सामर्थ्य दिया है। 

उपनिषद से शुरू किया होगा, उपग्रह तक हम पहुंचे होंगे लेकिन हमारा जो मूल Pin है जो हमारी आत्मा है और सच्चे अर्थ में जो हमारी पहचान है, उसको अगर हम बरकरार रखते है तो उसका अर्थ ये हुआ कि मैं मेरे भीतर स्वामी विवेकानंद जी को जीवित रखने की कोशिश कर रहा हूं।

रामकृष्ण परमहंस और नरेन्द्र । ये दोनों के बीच की दुनिया को अगर हम समझ लें तो शायद विवेकानंद जी को समझने में सुविधा बन जाती है।

नरेन्द्र कभी गुरू की खोज में नहीं निकले थे, न ही उसे गुरू की तलाश थी, नरेन्द्र सत्य् की तलाश कर रहा था। ईश्वर है कि नहीं! उसके मन में एक आशंका थी कि परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं हो सकती है। ईश्ववर नाम का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता है और वो उस सत्य को जानने के लिए जूझ रहे थे।

और न ही रामकृष्ण परमहंस किसी शिष्य की तलाश में थे। मैं गुरू परम्परा की भावना , मेरे बाल कुछ शिष्यों की परंपरा अगर है। और मैं जो आश्रम प्रतिस्थापित करूं और उसको कोई चलाता रहे, रामकृष्ण देव के मन में भी ऐसे किसी शिष्या की तलाश नहीं थी ऐसी कोई मनीषा नहीं थी।

एक गुरू जिसको शिष्यो की खोज नहीं थी, एक शिष्य जिसको गुरू की खोज नहीं थी, लेकिन कमाल देखिए, एक सत्य को समर्पित था और दूसरा सत्य को खोजना चाहता था और उसी सत्य की तलाश में दोनों को जोड़ के रख दिया।

और ये अगर हम समझ लें तो फिर सत्य की तलाश क्या हो सकती है, सत्य के रास्ते पे चलना कितना कठिन हो सकता है और उसमें भी कैसे सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वो विवेकानंद जी के जीवन से हम जान सकते है।

हम विवेकानंद जी के उस कालखंड का विचार करें जहां पर धर्म का प्रभाव, पूजा पद्धति की विधि का प्रभाव, rituals का माहात्मय । धर्म गुरुओं का माहात्मय, धर्मग्रथों का माहात्मय। ये चरम सीमा पर था। उस समय एक नौजवान उन सारी परम्पराओं से भाग जाने की बात करे, इसकी आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता है।

एक बहुत बड़ा वर्ग ये मानता था कि भगवान के पास घंटो तक बैठे रहे, पूजा-पाठ करते रहे, आरती-धूप करते रहे, फूल चढ़ाते रहे, नए-नए प्रसाद चढ़ाते रहे तो जीवन के पाप धूल जाते है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। एक चरम सीमा का आनंद प्राप्त, करने का अवसर मिल जाता है। ये सोच बनी पड़ी हुई थी और उस समय विवेकानंद डंके की चोट पर कहते थे कि जन सेवा ये प्रभु सेवा। सामान्य मानवी जो आपके सामने जिंदा है, जो दुख और दर्द से पीड़ित है, उसकी सेवा करो, ईश्वर अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

उन्होंने जब कलकत्ते की धरती पर नौजवानों से पूछा कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता क्या होता है, हमें क्या करना चाहिए तब उन्होंने कहा ये सब छोड़ो, जाओ फुटबॉल खेलो, मस्ती से फुटबॉल खेलो पूरी तरह से अपने आप को झोंक दो, हो सकता है तुम्हें रास्ता मिल जाएगा। उस समय हम गुलामी के कालखंड में जी रहे थे, कोई सोच भी नहीं सकता था भारत कभी आजाद हो सकता है लेकिन स्वामी विवेकानंद एक दीर्घ दृष्टा थे और वो कहते थे, अपने जीवन के काल में कहा था कि मैं, मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं, मैं मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं कि मेरी भारत मां उठ खड़ी हुई है, वो जगत गुरू के स्थान पर विराजमान मैं देख रहा हूं, मैं एक दिनमान भारत माता मैं देख रहा हूं और वो दिन बहुत निकट होगा । ये भाव जगत स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन काल में अपनी आंखों से देखा था और वो हिंदुस्तान को प्रेरित करने का प्रयास करते थे।

वो एक कालखंड था जब आध्यात्म प्रधान जीवन था और वो सिर्फ भारत में नहीं एशिया के सभी देशों में समाहित था और दूसरी तरफ वो पश्चिम का विचार था, जहां अर्थ प्रधान था। आध्यात्म प्रधान जीवन और अर्थ प्रधान जीवन के बीच एक शताब्दियों का टकराव चल रहा था। अर्थ प्रधान जीवन ने आध्यात्म प्रधान जीवन को किनारे कर दिया था। अर्थ प्रधान जीवन जन सामान्य की आशा, आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु बन गया था और ऐसे कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने हिम्मत के साथ और 30-32 साल की आयु में पश्चिम की दुनिया में जाकर के, उस धरती पर जाकर के विश्व को आध्यत्मिकता का संदेश देने का एक सामर्थ्यवान काम किया था। जिस महापुरुष ने एशिया की आध्यात्मिक ताकत को दुनिया को पहचान कराया था और पहली बार विश्व को एशिया की अपनी धरती की एक अलग चिंतनधारा है, यहां के संस्कार अलग हैं और विश्व को देने के लिए उसके पास बहुत कुछ है। ये बात डंके की चोट पर कहने का साहस स्वामी विवेकानंद ने किया था। कल मैं यहां आसियान समिट में था आज यहां मैं South East Asia Summit में था और एक बात वहां उभरकर के सामने आती थी और वो एक आती थी कि One Asia .

One Asia का विचार लेकिन आज जो आवाज गूंज रही है उसमें आर्थिक व्यवस्था है, राजनीतिक व्यवस्था है, सरकारों के मेलजोल की व्यवस्था का चिंतन है लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि One Asia का concept आध्यात्मिक धरातल पर सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने प्रचारित किया था। मैं एक पुरानी घटना आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। ..

After Swami Vivekananda introduced the East and Asia to the West, Scholars and philosophers like Okakura, Karinzo from Japan, Rabindranath Tagore, Mahrishi Aurbindo, Anand Kumar Swami and Vinoy Sarkar were inspired by Swami Vivekananda. OkaKura invited Swami Vivekananda to Japan and also sent him a cheque of Rs 300. He came to Calcutta and met Swami Vivekananda on 1st February 1902 and both went to Bodh Gaya together. OkaKura is the symbol of Asianism. In his book, ‘Ideals of the East’ by Okakura, the manuscripts were edited by Sister Nivedita, the foremost western disciple of Swami Vivekananda. The very first sentence, this is one important thing I want to tell you. The very first sentence is “Asia is one.” The idea of Asian unity is clearly Swami Vivekananda’s concept. In his next book, Okakura began by saying “Brothers and sisters of Asia”, echoing Swami Vivekananda’s speech at Parliament of Religions.

मैं ये इसलिए कह रहा था कि जो उस समय इस प्रकार के Philosopher विवेकानंद जी के प्रभाव में थे, उन्होंने जो विवेकानंद जी से मंत्र पाया था वो Asia is One ये मंत्र पाया था। आज 100 साल के बाद आर्थिक, राजनीतिक कारणों से One Asia की चर्चा हो रही है लेकिन उस समय आध्यात्मिक एकात्मता के आधार पर विवेकानंद जी ये देख पाते थे कि ये भूमि है जो विश्व को संकटों से बाहर निकाल सकती है और आज दुनिया जिन दो संकटों से जूझ रही है अगर उन दो संकटों के समाधान का रास्ता कोई दे सकता है तो एशिया की धरती से ही निकल सकता है।

और इसलिए आज विश्व कह रहा है Climate change और Global warming की बात, आज विश्व कह रहा है Terrorism की चर्चा, यही तो धरती है जहां भगवान बुद्ध का संदेश मिला, यही तो धरती है जहां हिंदुत्व का संदेश मिला और इसी धरती से ये बातें उभर करके आ गई हैं जहां पर ये कहा गया एकम सत, विपरा बहुधा विधंति, Truth is One, Wise call it in different ways ये जो मूल मंत्र हैं वो सबको एक रखना, जोड़ने की ताकत देता है और इसलिए जब Terrorism की बात आती है तो उसका समाधान इसमें holier than thou की कल्पना ही नहीं है, हर सत्य को स्वीकार किया जाता है और जब हर सत्य को स्वीकार किया जाता है तब conflict के लिए अवकाश नहीं होता है और जब conflict के लिए अवकाश नहीं है तो संघर्ष की संभावना नहीं है और जहां संघर्ष नहीं है वहां Terrorism के रास्ते पर जाना का कोई कारण नहीं बनता है। 


आज विश्व Global Warming की चर्चा करता है। हम वो लोग हैं जिसने पौधे में परमात्मा देखा था, हम जितने भी ईश्वर की कल्पना की है हर ईश्वर के साथ कोई न कोई प्राकृतिक जीवन जुड़ा हुआ है। किसी न किसी वृक्ष के साथ उन्होंने साधना की है, किसी न किसी पशु-पक्षी को उन्होंने पालन किया है। ये सहज संदेश हमारी परंपरा में रहा हुआ है। हम प्रकृति के शोषण का पक्षकार नहीं रहे हैं, हम nature के साथ मित्रतापूर्ण गुजारा करने की सबक ले करके चले हुए लोग है। वही संस्कृति है जो ग्लोबल वार्मिंग से मानवजाति को बचा सकती है।

मुझे लगता है कि स्वा्मी विवेकानंद जी ने हमें ये जो रास्तेे दिखाएं है। उन रास्तों को अगर हम परिपूर्ण करते है तो हमें हमारे भीतर कोई नए विवेकानंद को प्रतिस्थापित करने की जरूरत नहीं है। उनकी कही हुई एक बात को ले करके भी हम चल पाते है मैं समझता हूं हम आने वाली शताब्दियों तक मानवजात की सेवा करने के लिए कुछ न कुछ योगदान करके जा सकते है।

आज मुझे यहां एक योग की पुस्तक का भी लोकापर्ण करने का अवसर मिला है और वो भी हमारे सरकार के साथ ही श्रीमान शाहू ने यहां की भाषा में योग की पुस्तक की रचना की है। वे स्वयं सरकारी अधिकारी है लेकिन योग के प्रति उनका समर्पण है। मुझे खुशी हुई उनकी उस किताब का लोकापर्ण करते हुए। आज विश्व योग के प्रति आकर्षित हुआ है। हर कोई तनाव मुक्त जीवन का रास्ता खोज रहा है और उसको लगता है उसकी खिड़की योग से खुलती है और इसलिए हर कोई उस खिड़की में झांकने की कोशिश करता है।

यूनाइटेड नेशन ने अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस के रूप में 21 जून को स्वीकार किया। दुनिया के 177 देशों ने उसको को-स्पोंसर किया और दुनिया के सभी देशों ने 21 जून को योग का दिवस मनाया। मानवजात जो कि अपने मानसिक समाधान का रास्ता तलाश रही है। Holistic health care की तरफ आगे बढ़ रही है। तब उसको लगता है कि योग एक ऐसी सरल विद्या है जिसको अगर हम दिन के आधा-पौना घंटा भी लगा ले तो हम अपने मन, बुद्धि, शरीर को एक दिशा में चला सकते है। आज हमारे लिए ये चुनौती नहीं है कि हम दुनिया को समझाएं कि योग क्या है, हमारे सामने चुनौती ये है कि सारा विश्व अच्छे योग टीचरों की मांग कर रहा है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि हम Perfect योग teacher को कैसे दें ताकि इस विद्या का सही स्वरूप आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे और जो भी इसका लाभ उठाएं, उसको सचमुच में, उसका जो मकसद हो, मकसद पूरा करने में काम हो और इसलिए जितना अधिक आधुनिक भाषा में हम योग को प्रचारित करें, जितनी अधिक योग को आधुनिक भाषा में प्रतिपादित करें और खुद योग के जीवन को जीकर के दुनिया के सामने प्रस्तुत करें और अधिकतम योग के teacher तैयार करें, hobby के रूप में तैयार करें भले profession के रूप में न तैयार कर सकें। दिन में हम 50 काम करते हैं, एक घंटे योगा के लिए जो भी सीखने आएगा, हम सिखाएंगे।

ये पूरा हम एशिया के वायुमंडल में लाते हैं तो विश्व की जो अपेक्षा है, उस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए उत्तम योग teacher हम दुनिया को दे सकते हैं। मैं स्वामी सूपरयानंद जी का बहुत आभारी हूं कि आज मुझे इस पवित्र स्थान पर आने का अवसर मिला, विवेकानंद जी की प्रतिमा का लोकापर्ण करने का अवसर मिला और मुझे विश्वास है कि इस धरती पर आने वाले विश्व के सभी लोगों को यहां से कोई प्रेरणा मिलती रहेगी। इसी एक शुभकामना के साथ आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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जीवन में अपनी जिज्ञासा को हमेशा जीवित रखें: IIT दिल्ली के दीक्षांत समारोह में पीएम मोदी
August 08, 2026
जिन लोगों में चुनौतियों के नए समाधान खोजने का साहस होता है, उनके लिए चुनौतियाँ अवसर बन जाती हैं: प्रधानमंत्री
जीवन में अपनी जिज्ञासा को जीवित रखें, सीखने की प्रवृत्ति को बनाए रखें: प्रधानमंत्री
बिना सोचे-समझे स्वीकार की गई बातों पर सवाल उठाएँ, लेकिन केवल सवाल उठाने तक ही सीमित न रहें; उनके समाधान खोजने का भी साहस रखें: प्रधानमंत्री
आज भारत इकोनॉमिक, टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, यह प्रयास विकसित भारत की मजबूत नींव का सबूत है: पीएम मोदी
आज देश में हमारे युवाओं के लिए नए क्षेत्र उभर रहे हैं: प्रधानमंत्री

शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी जी, मेरे मित्र हरीश साल्वे जी, प्रोफेसर अभय करंदिकर, IIT दिल्ली के डायरेक्टर प्रोफेसर रंगन बैनर्जी, सभी प्रोफेसर्स, अन्य महानुभाव और सभी स्टूडेंट्स साथियों।

आज देश के आप सभी प्रतिभाशाली युवाओं के जीवन की नई यात्रा शुरू हो रही है। आप इस समय जीवन के एक यादगार moment को जी रहे हैं। उत्साह, उमंग, सपनों और भावनाओं से सराबोर, इस moment का हिस्सा बनना, IIT दिल्ली के इस कैंपस में आना, आपके साथ ये अनुभव शेयर करना मेरे लिए भी बहुत खास है। पिछली बार जब मैं Convocation में शामिल हुआ था, तब पूरा देश कोविड के दौर से गुजर रहा था। तब मैं वर्चुअल माध्यम से जुड़ा था, लेकिन मैं आज आप सब युवाओं के बीच उपस्थित हूँ। और इसलिए, मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा है।

साथियों,

आज जैसे आपके परिवार के लोग proud फील कर रहे हैं, वैसे ही मुझे भी आप सब पर गर्व है। क्योंकि, आप सब केवल एक डिग्री नहीं ले रहे, आप देश के लिए बहुत कुछ करने का सपने लेकर के यहाँ से निकल रहे हैं। आज कई स्टूडेंट्स, उनको उनकी उपलब्धियों के लिए मेडल्स भी मिले हैं। मैं आप सभी को इसके लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। लेकिन एक-दो बेटियां होती तो जरा ज्यादा अच्छा होता। सॉरी, एक-दो क्यों, ज्यादा होनी चाहिए थी। आज IIT दिल्ली में AI से जुड़े कुछ नए initiatives भी शुरू हुये हैं, मैं इसके लिए आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ।

साथियों,

आज आप सभी, और सारे students इस कार्यक्रम में उपस्थित हैं, लेकिन मन के किसी कोने में कुछ और चल रहा होगा, मैं तो बाबा बागेश्वर नहीं हूं, लेकिन कुछ तो चलता होगा। हर स्टूडेंट के मन में आने वाले कल की अपनी-अपनी तस्वीर होगी। कई छात्र अपनी पहली सैलरी का इंतजार कर रहे होंगे। कोई नए शहर में नई शुरुआत की तैयारी में होगा। कई साथी अपने पहले स्टार्टअप का सपना देख रहे होंगे। किसी ने अगले Competitive Exams का लक्ष्य बनाया होगा। हर किसी का रास्ता अलग है, हर किसी का सपना अलग है, लेकिन इन सबके बाद भी एक एहसास ऐसा है जो आप सभी के मन में एक सा होगा, वो दिन याद करिए, जब आपका IIT दिल्ली में पहला दिन था और एक ये आज का दिन है। आप सोच रहे होंगे कि अभी कल की ही तो बात है, जब ओरिएंटेशन हुआ था और अब ये कॉन्वोकेशन का समय भी आ गया, तो ओरिएंटेशन से कॉन्वोकेशन की इस यात्रा का आपको भरपूर satisfaction भी होगा। और साथ ही आप सभी में जीवन के एक नए चैप्टर की शुरुआत का उत्साह भी होगा। और इसलिए मैं तो यही कहूंगा, आज के इस पल को पूरी तरह जी लीजिए। आने वाले समय में जब आप पर बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियाँ होंगी, तब यहाँ की पुरानी यादें आपको पुराने दिनों में जरूर ले जाएंगी। ये आपको energise भी करेंगी। हर हॉस्टल के साथ आपकी memories, कुमाऊं, आरा, कारा, विंडी, नील, कैलाश, हिमाद्री, इंटर-हॉस्टल कॉम्पिटिशंस के किस्से, पुरानी नोंक-झोंक, ऐसा कितना कुछ होगा, जो विदा होने से पहले एक बार फिर आप जरूर याद करिए।

और दोस्तों,

बात सिर्फ पढ़ाई की नहीं है, ये भी हो सकता है, जिया सराय का पोहा भी आज कुछ लोगों को बुला रहा हो। अभी समय तो हो गया है, सतपुरा मेस के पराठे याद आ रहे हों। आपमें से कई साथी विंड टी पर भी कुछ और पल भी बिताना चाहते होंगे, और विंड टी पर जाए तो मुझे भी याद करना। कोई अपने डिपार्टमेंट में एक बार फिर जाना चाहेगा। कोई अपने पसंदीदा अड्डे पर कुछ देर और बैठना चाहेगा।

और साथियों,

इन भावुक पलों में, मैं एक बात आपसे जरूर कहूंगा, जब-जब जीवन आपको पीछे मुड़कर देखने का अवसर देगा, तो ये कैंपस लाइफ, आपके दोस्त, टीचर्स, मेंटोर्स और सपोर्ट स्टाफ, जो आपका परिवार बन गए हैं, आपके प्रोफेसर्स, जिन्होंने आप जैसी प्रतिभाओं को गढ़ने की ज़िम्मेदारी उठाई और आपका ये 'इंस्टी', जो धीरे-धीरे आपका अपना घर बन गया। आप अपनी हर सक्सेस में इन सबको याद करेंगे। इन सबके लिए thankful होंगे। और इसलिए, इन्हें एक asset के तौर पर यहाँ से लेकर के निकलना, भूल मत जाना, छोड़ मत जाना, साथ ले जाना। मेरा सुझाव होगा कि जाते-जाते यहाँ के हर सदस्य से मिल करके जाइए, और आप कहीं भी रहें, कोशिश करिएगा, ये रिश्ता हमेशा-हमेशा ताजा बना रहे।

साथियों,

आज आप ऐसे समय में इस Institute से निकल रहे हैं, जब दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है। आज दुनिया की Strategic Equations बहुत तेजी से बदल रही हैं। Global Power Balance भी प्रति पल बदल रहा है। और इसके पीछे सबसे बड़ी फोर्स है -टेक्नोलॉजी की स्पीड। आज कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि अगले 20-30 वर्षों की दुनिया कैसी होगी।

लेकिन साथियों,

जब-जब बदलाव का दौर आता है, तब-तब चुनौतियां भी आती हैं और नए अवसर भी पैदा होते हैं। दुनिया बदलेगी, टेक्नोलॉजी भी बदलेगी, इंडस्ट्रीज़ बदलेगी, प्रोफेशन्स भी बदलेंगे। लेकिन, इन सबके बीच मेरी बात याद रखिएगा, जो सीखेगा, वो जीतेगा। जो नए challenges के नए solutions खोजने का साहस रखेगा, Challenges उसके लिए chances बन जाएंगे। और आपने, यही तो IIT दिल्ली से सीखा है। आख़िर आपकी ये डिग्री क्या कहती है? क्या ये सिर्फ़ इस बात का प्रमाण है कि आपने एग्जाम पास किया? अच्छा CGPA हासिल किया? या एक अच्छा Placement हासिल किया? निश्चित रूप से इन सबका अपना महत्व है, लेकिन मुझे लगता है, आपकी डिग्री दुनिया को ये बताती है कि आप कठिन समस्याओं का समाधान करना जानते हैं। आप अपने IIT दिल्ली के सफर को याद कीजिए, यहां तक पहुंचना आसान नहीं था, यहां की पढ़ाई भी आसान नहीं थी। लेकिन आपने हार नहीं मानी। ये डिग्री आपको एक दिन में नहीं मिली, एक-एक विषय, एक-एक प्रोजेक्ट, मिड सेम, एंड सेम, इन्हीं छोटे-छोटे कदमों ने आपको यहां तक पहुंचाया है। जीवन भी इसी सिद्धांत पर चलता है। जब कभी कोई चुनौती बहुत बड़ी लगे, तो उससे घबराइए मत, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दीजिए। आपने खुद देखा है, कैसे लैब में कोई problem dead end तक, यानी लगने लगती थी। Simulation में solution खोजने में घंटे या दिन निकल जाते थे। लेकिन फिर आपने problem solve भी की और कुछ नया लेकर भी आए। इसी तरह, लाइफ में भी मुश्किलें आएंगी, लेकिन मुश्किलों का स्वभाव होता है, वो अकेली नहीं आती है, मुश्किल जब आती है ना, तो साथ-साथ मौके भी लेकर आती है। सबको बस अलर्ट रहना है, सतर्क रहना है। इस संस्थान ने जो सिखाया है, उसे बार-बार याद रखना है।

साथियों,

मैं लाइफ की कुछ प्रैक्टिकल बातें भी आपसे शेयर करना चाहता हूं। कैंपस का जीवन और कैंपस के बाहर का जीवन, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर होता है। IIT की परीक्षा में सिलेबस होता है, लेकिन जिंदगी की परीक्षा में सबकुछ Out of Syllabus होता है। आप याद करिए, कैंपस लाइफ में सारे फंडे Clear होते थे। क्या पढ़ना है, कौन-सा असाइनमेंट पूरा करना है, कौन-सी परीक्षा देनी है, सब पहले से तय होता था। लेकिन जिंदगी कुछ अलग तरह से चलती है, वहां न कोई तय Course होता है, न कोई Question Paper होता है। कई बार तो, ये भी कोई नहीं बताता कि असली सवाल क्या था, वो सवाल भी आपको खुद पहचानना पड़ता है। मैंने IIT के अनेक Alumni की यात्रा को देखा है। उनकी सक्सेस का कारण सिर्फ ये नहीं था कि उन्होंने सही जवाब दिए, उनकी सक्सेस का कारण ये था कि उन्होंने वो सवाल पहचाने, जिन्हें दुनिया ने सवाल मानना ही छोड़ दिया था। उन्होंने उन समस्याओं का समाधान खोजा, जिनके साथ बाकी लोग समझौते कर चुके थे। और इसलिए, लाइफ में curiosity बनाए रखिए, अपनी learning instinct को जगाए रखिए, चेतना बनाए रखिए। जो बातें बिना सोचे-समझे स्वीकार कर ली जाती हैं, जरा उन्हें परखिए, उन पर सवाल उठाइए। लेकिन सिर्फ सवाल पूछकर मत रुकिए, उनका समाधान खोजने का साहस भी रखिए। यही सोच, आपकी अलग पहचान बनाएगी।

साथियों,

आप सब जानते हैं, हर पीढ़ी के सामने उस Time Period की अपनी चुनौतियां होती हैं और हर पीढ़ी का अपना एक राष्ट्रीय दायित्व भी होता है। हमारे देश ने गुलामी का वो समय भी देखा है, जब उस पीढ़ी के सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य था- भारत की आजादी। उसके लिए उन्होंने sacrifice किया, लंबा struggle किया। आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, इसके पीछे उस पीढ़ी का तप, त्याग और बलिदान है।

और साथियों,

आज के इस दौर में हमारे सामने चुनौतियाँ भी अलग हैं, और इसलिए हमारे दायित्व भी अलग हैं। अपने जीवन के अगले 30-35 साल में आप जो कुछ भी करेंगे, वो विकसित भारत की हमारी यात्रा को प्रभावित करेगा। इसलिए, आपके हर निर्णय का आधार ये भी होना चाहिए कि इससे देश को क्या फायदा होगा? इससे देश की कौन सी जरूरत पूरी होगी। आज भारत Economic Self-Reliance, Technological Self-Reliance, Industrial Self-Reliance ऐसे हर सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए काम कर रहा है। यही विकसित भारत की मजबूत नींव का सबूत है। इस मजबूत नींव पर आपको एक भव्य-सुंदर विकसित भारत का निर्माण करना है।

साथियों,

विकसित भारत की इस यात्रा में आपकी भूमिका बहुत बड़ी है। देश का युवा जितना सशक्त होगा, उतना ही देश सशक्त होगा। इसी सोच के साथ हमने कई ऐसे सेक्टर्स Open किए हैं, जहां युवाओं के लिए Entry ही एक तरह से बंद हुआ करती थी। सरकार की आधुनिक नीतियों की वजह से आज देश में युवाओं के लिए नए-नए सेक्टर्स भी बन रहे हैं।

साथियों,

पिछली बार जब मैं आपके सीनियर्स के Convocation से virtually जुड़ने का मुझे अवसर मिला था, तब मैंने युवाओं के लिए Space Sector में हो रहे रिफॉर्म्स की चर्चा की थी। तब तक इस सेक्टर में लगभग पूरा काम सरकार ही करती थी। लेकिन आज, वही Space Sector हजारों युवाओं के लिए नए अवसरों का आकाश बन चुका है। आज हमारे युवा अपने Launch Vehicles बना रहे हैं, रॉकेट लॉन्च कर रहे हैं और ऐसी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं, जो दुनिया के गिने-चुने देश ही हासिल कर पाए हैं। मुझे विश्वास है, आज कहीं न कहीं, देश का कोई युवा इंजीनियर गर्व से कह रहा है- "First in my bloodline to build a rocket". Semiconductor Sector का उदाहरण भी हमारे सामने है। जब हमने इस दिशा में कदम बढ़ाया, तो कुछ लोगों ने सवाल उठाए। कहा गया, भारत ये नहीं कर पाएगा। लेकिन आज, पहली सेमीकंडक्टर यूनिट्स में प्रोडक्शन शुरू हो चुका है। मैं साफ मानता हूं, चिप से लेकर के शिप तक सब कुछ यहीं पर, आप ही के हाथों से बनेगा। और कहीं कोई युवा पूरे आत्मविश्वास से कह रहा है- "First in my bloodline to make a chip in India".

साथियों,

आज आप हमारे Drone Sector को भी देखिए, आज इस सेक्टर में युवा नई-नई संभावनाएं तैयार कर रहे हैं। कहीं ड्रोन से खेतों में काम लिया जा रहा है, ड्रोन दवाइयां पहुंचा रहा है, ड्रोन देश की रक्षा-सुरक्षा में मदद कर रहा है। और आज कहीं कोई युवा कह रहा है -"First in my bloodline to make a drone”.

साथियों,

भारत की Startup Revolution को इसी पीढ़ी के आप जैसे युवाओं ने ही तराशा भी है, ताकत भी दी है। इसी Institute से कितने ही Founders निकले हैं। अगर एक Institute से इतना कुछ हो सकता है, तो सोचिए, पूरे देश में कितनी बड़ी ताकत तैयार हो रही है। Unicorns, Digital Payments, FinTech Revolution इन सभी ने देश के लाखों युवाओं को पहली बार कुछ नया करने का अवसर दिया है।

साथियों,

अभी ऐसे भी अनेक सेक्टर्स हैं, जहां भारत अपनी नई यात्रा शुरू कर रहा है और बड़ी जिम्मेदारी के साथ और बड़ी उम्मीदों के साथ देश आप जैसे युवाओं की ओर देख रहा है। Artificial Intelligence, डेटा सेंटर्स, क्रिटिकल मिनरल्स, Deep Sea Exploration, Batteries, Power Storage, एनर्जी सिक्योरिटी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, Quantum Computing ऐसे अनेक क्षेत्र आपके talent, आपके इनोवेशन और आपकी लीडरशिप का इंतजार कर रहे हैं, और मैं भी इंतजार कर रहा हूं।

साथियों,

अब एक और बड़ी संभावना आप सबके सामने है, और वो नया अवसर है- रिसर्च। आज देश को नई-नई research की बहुत जरूरत है और research पर हमारा उतना ही फोकस भी है। Prime Minister's Research Fellowship हमारे प्रतिभाशाली युवाओं को Research करने का अवसर दे रही है। आइडियाज को आगे बढ़ने का मौका मिले, इसके लिए Research Development and Innovation Scheme शुरू की गई है। अनुसंधान National Research Foundation की स्थापना भी हुई है, ताकि देश में Science और Research को नई ताकत मिल सके। रिसर्च सेक्टर में एक लाख करोड़ रुपए तक की फंडिंग की व्यवस्था की जा रही है। अंग्रेजी में बोलूं, One Lakh Crore. ये आपके लिए बता रहा हूं।

इसी तरह साथियों,

Academic resources की access को भी आसान बनाया गया है। One Nation One Subscription के माध्यम से आज दुनिया की प्रतिष्ठित Research Journals देश के छोटे से छोटे शहर में बिना किसी अतिरिक्त लागत के पहुंच रही हैं।

साथियों,

मुझे पता है, अभी इस दिशा में हमें लंबी दूरी तय करनी है और ये काम रिसर्च को लेकर आप सबके कमिटमेंट से ही हो सकता है। इसके लिए देश को आपसे अपेक्षा भी है और सबसे बड़ी बात, आप पर भरोसा भी है।

साथियों,

अब मैं आपसे थोड़ा distraction की बात करूंगा। जब हम बड़े गोल्स को achieve करने के लिए प्रारंभ करते हैं, निकलते हैं, तो एक बड़ा distraction भी हमारे सामने आता है। ये distraction होता है - एक दूसरे से comparison का, किसी को क्या Package मिला, कौन किस कंपनी में गया, किस शहर में गया, किस देश में गया, किसने Startup शुरू किया। आज के Social Media के दौर में, ये तुलना कभी खत्म नहीं होती। लेकिन याद रखिए, जिंदगी कोई लीडर-बोर्ड नहीं है, आपकी असली दौड़ किसी और से नहीं, खुद अपने आप से है। हर दिन कल से बेहतर बनने की कोशिश करते रहिएगा। साथ ही, अपनी Physical Health, अपनी Mental Health का भी ध्यान रखिएगा।

साथियों,

मैं सभी स्टूडेंट्स को एक बार फिर बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आपके माता-पिता को, परिवारजनों को विशेष बधाई देता हूं, आपके शिक्षकों को और उन सभी लोगों को भी मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, जो इस पूरी यात्रा में हर कदम पर आपके साथ खड़े रहे। आप सभी का भविष्य उज्ज्वल हो, आप निरंतर नई ऊंचाइयों को छुएं, इसी मंगलकामना के साथ बहुत-बहुत धन्यवाद।

नमस्कार!