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PM Modi launches Beti Bachao, Beti Padhao programme in Haryana
We need to end discrimination between sons and daughters, urges PM Modi
Medical education is for the purpose of saving lives, and not killing daughters: PM
Girls today doing well in sports, in education and health sectors, they have a significant contribution even in agriculture: PM
Celebrate the birth of a girl child by planting trees: PM Modi
PM Modi launches Sukanya Samriddhi Account for the benefit of girl child

विशाल संख्‍या में आए हुए माताओं, बहनों और भाईयों,

आज पानीपत की धरती पर हम एक बहुत बड़ी जिम्‍मेवारी की और कदम रख रहे हैं। यह अवसर किस सरकार ने क्‍या किया और क्‍या नहीं किया? इसका लेखा-जोखा करने के लिए नहीं है। गलती किसकी थी, गुनाह किसका था? यह आरोप-प्रत्यारोप का वक्‍त नहीं है। पानीपत की धरती पर यह अवसर हमारी जिम्‍मेवारियों का एहसास कराने के लिए है। सरकार हो, समाज हो, गांव हो, परिवार हो, मां-बाप हो हर किसी की एक सामूहिक जिम्‍मेवारी है और जब तक एक समाज के रूप में हम इस समस्‍या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे, तो हम अपना ही नुकसान करेंगे ऐसा नहीं है बल्कि हम आने वाली सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक भंयकर संकट को निमंत्रण दे रहे हैं और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों और मैं इस बात के लिए मेनका जी और उनके विभाग का आभारी हूं कि उन्‍होंने इस काम के लिए हरियाणा को पसंद किया। मैं मुख्‍यमंत्री जी का भी अभिनंदन करता हूं कि इस संकट को इन्‍होंने चुनौती को स्‍वीकार किया। लेकिन यह कार्यक्रम भले पानीपत की धरती पर होता हो, यह कार्यक्रम भले हरियाणा में होता हो, लेकिन यह संदेश हिंदुस्‍तान के हर परिवार के लिए है, हर गांव के लिए है, हर राज्‍य के लिए है।

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क्‍या कभी हमने कल्‍पना की है जिस प्रकार की समाज के अवस्‍था हम बना रहे हैं अगर यही चलता रहा तो आने वाले दिनों में हाल क्‍या होगा? आज भी हमारे देश में एक हजार बालक पैदा हो, तो उसके सामने एक हजार बालिकाएं भी पैदा होनी चाहिए। वरना संसार चक्र नहीं चल सकता। आज पूरे देश में यह चिंता का विषय है। यही आपके हरियाणा में झज्जर जिला देख लीजिए, महेंद्रगढ़ जिला देख लीजिए। एक हजार बालक के सामने पौने आठ सौ बच्चियां हैं। हजार में करीब-करीब सवा दौ सौ बच्‍चे कुंवारे रहने वाले हैं। मैं जरा माताओं से पूछ रहा हूं अगर बेटी पैदा नहीं होगी, तो बहू कहां से लाओगे? और इसलिए जो हम चाहते हैं वो समाज भी तो चाहता है। हम यह तो चाहते है कि बहू तो हमें पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटी को पढ़ाना है तो पास बार सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह अन्‍याय कब तक चलेगा, यह हमारी सोच में यह दोगलापन कब तक चलेगा? अगर बहू पढ़ी-लिखी चाहते हैं तो बेटी को भी पढ़ाना यह हमारी जिम्‍मेवारी बनता है। अगर हम बेटी को नहीं पढ़ाऐंगे, तो बहू भी पढ़ी-लिखी मिले। यह अपेक्षा करना अपने साथ बहुत बड़ा अन्याय है। और इसलिए भाईयों और बहनों, मैं आज आपके बीच एक बहुत बड़ी पीड़ा लेकर आया हूँ। एक दर्द लेकर आया हूँ। क्‍या कभी कल्‍पना की हमने जिस धरती पर मानवता का संदेश होता है, उसी धरती पर मां के गर्भ में बच्‍ची को मौत के घाट उतार दिया जाए।

यह पानीपत की धरती, यह उर्दू साहित्‍य के scholar अलताफ हुसैन हाली की धरती है। यह अलताफ हुसैन हाली इसी पानीपत की धरती से इस शायर ने कहा था। मैं समझता हूं जिस हरियाणा में अलताफ हुसैन जैसे शायर के शब्‍द हो, उस हरियाणा में आज बेटियों का यह हाल देखकर के मन में पीड़ा होती है। हाली ने कहा था....उन्‍होंने कहा था ए मांओ, बहनों बेटियां दुनिया की जन्नत तुमसे हैं, मुल्‍कों की बस्‍ती हो तुम, गांवों की इज्‍जत तुम से हो। आप कल्‍पना कर सकते हैं बेटियों के लिए कितनी ऊंची कल्‍पना यह पानीपत का शायर करता है और हम बेटियों को जन्‍म देने के लिए भी तैयार नही हैं।

भाईयों और बहनों हमारे यहां सदियों से जब बेटी का जन्‍म होता था तो शास्‍त्रों में आर्शीवाद देने की परंपरा थी और हमारे शास्‍त्रों में बेटी को जो आर्शीवाद दिये जाते थे वो आर्शीवाद आज भी हमें, बेटियों की तरफ किस तरह देखना, उसके लिए हमें संस्‍कार देते हैं, दिशा देते हैं। हमारे शास्‍त्रों ने कहा था जब हमारे पूर्वज आर्शीवाद देते थे तो कहते थे – यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद सीताकथा लोके, तावद जीवेतु बालिका। हमारे शास्‍त्र कहते थे जब तक गंगा का नाम है, जब तक कुरूक्षेत्र की याद है, जब तक हिमालय है, जब तक कथाओं में सीता का नाम है, तब तक हे बालिका तुम्‍हारा जीवन अमर रहे। यह आर्शीवाद इस धरती पर दिये जाते थे। और उसी धरती पर बेटी को बेमौत मार दिया जाए और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों उसके मूल में हमारा मानसिक दारिद्रय जिम्‍मेवार है, हमारे मन की बीमारी जिम्‍मेवार है और यह मन की बीमार क्‍या है? हम बेटे को अधिक महत्‍वपूर्ण मानते हैं और यह मानते हैं बेटी तो पराये घर जाने वाली है। यहां जितनी माताएं-बहनें बैठी हैं। सबने यह अनुभव किया होगा यह मानसिक दारिद्रय की अनुभूति परिवार में होती है। मां खुद जब बच्‍चों को खाना परोसती है। खिचड़ी परोसी गई हो और घी डाल रही हो। तो बेटे को तो दो चम्‍मच घी डालती है और बेटी को एक चम्‍मच घी डालती है और जब, मुझे माफ करना भाईयों और बहनों यह बीमारी सिर्फ हरियाणा की नहीं है यह हमारी देश की मानसिक बीमारी का परिणाम है और बेटी को, अगर बेटी कहे न न मम्‍मी मुझे भी दो चम्‍मच दे दो, तो मां कहते से डरती नहीं है बोल देती है, अरे तुझे तो पराये घर जाना है, तुझे घी खाकर के क्‍या करना है। यह कब तक हम यह अपने-पराये की बात करते रहेंगे और इसलिए हम सबका दायित्‍व है, हम समाज को जगाए।

कभी-कभी जिस बहन के पेट में बच्‍ची होती है वो कतई नहीं चाहती है कि उसकी बेटी को मार दिया जाए। लेकिन परिवार का दबाव, माहौल, घर का वातावरण उसे यह पाप करने के लिए भागीदार बना देता है, और वो मजबूर होती है। उस पर दबाव डाला जाता है और उसी का नतीजा होता है कि बेटियों को मां के गर्भ में ही मार दिया जाता है। हम किसी भी तरह से अपने आप को 21वीं सदी के नागरिक कहने के अधिकारी नही हैं। हम मानसिकता से 18वीं शताब्दी के नागरिक हैं। जिस 18वीं शताब्‍दी में बेटी को “दूध-पीती” करने की परंपरा थी। बेटी का जन्‍म होते ही दूध के भरे बर्तन के अंदर उसे डूबो दिया जाता था, उसे मार दिया जाता था। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं, वो तो पाप करते थे गुनाह करते थे। बेटी जन्‍मती थी आंखे खोलकर के पल-दो-पल के लिए अपनी मां का चेहरा देख सकती थी। बेटी जन्‍मती थी, दो चार सांस ले पाती थी। बेटी जन्मती थी, दुनिया का एहसास कर सकती थी। बाद में उस मानसिक बीमारी के लोग उसको दूध के बर्तन में डालकर के मार डालते थे। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं। हम तो बेटी को मां का चेहरा भी नहीं देखने देते, दो पल सांस भी नहीं लेने देते। इस दुनिया का एहसास भी नहीं होने देते। मां के गर्भ में ही उसे मार देते हैं। इससे बड़ा पाप क्‍या हो सकता है और हम संवेदनशील नहीं है ऐसा नहीं है।

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कुछ साल पहले इसी हरियाणा में कुरूक्षेत्र जिले में हल्दा हेड़ी गांव में एक टयूबवेल में एक बच्‍चा गिर गया, प्रिंस.. प्रिंस कश्‍यप । और सारे देश के टीवी वहां मौजूद थे। सेना आई थी एक बच्‍चे को बचाने के लिए और पूरा हिंदुस्‍तान टीवी के सामने बैठ गया था। परिवारों में माताएं खाना नहीं पका रही थी। हर पल एक-दूसरे को पूछते थे क्‍या प्रिंस बच गया, क्‍या प्रिंस सलामत निकला टयूबवेल में से? करीब 24 घंटे से भी ज्‍यादा समय हिंदुस्‍तान की सांसे रूक गई थी। एक प्रिंस.. केरल, तमिलनाडु का कोई रिश्‍तेदार नहीं था। लेकिन देश की संवेदना जग रही है। उस बच्‍चे को जिंदा निकले, इसके लिए देशभर की माताएं-बहने दुआएं कर रही थी। मैं जरा पूछना चाहता हूं कि एक प्रिंस जिसकी जिंदगी पर संकट आए, हम बेचैन बन जाते हैं। लेकिन हमारे अड़ोस-पड़ोस में आएं दिन बच्चियों को मां के पेट में मार दिया जाए, लेकिन हमें पीड़ा तक नहीं होती है, तब सवाल उठता है। हमारी संवेदनाओं को क्‍या हुआ है? और इसलिए आज मैं आपके पास आया हूं। हमें बेटियों को मारने का हक नहीं है।

यह सोच है बुढ़ापे में बेटा काम आता है। इससे बड़ी गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए। अगर बुढ़ापे में बेटे काम आए होते तो पिछले 50 साल में जितने वृद्धाश्राम खुले हैं, शायद उतने नहीं खुले होते। बेटो के घर में गाड़ियां हो, बंगले हो, लेकिन बांप को वृद्धाश्राम में रहना पड़ता है ऐसी सैकड़ों घटनाएं है और ऐसी बेटियों की भी घटनाएं है। अगर मां-बाप की इकलौती बेटी है तो मेहनत करे, मजदूरी करे, नौकरी करे, बच्‍चों को tuition करे लेकिन बूढ़े मां-बाप को कभी भूखा नहीं रहने देती। ऐसी सैकड़ों बेटियां बाप से भी सेवा करने के लिए, मां-बाप की सेवा करने के लिए अपने खुद के सपनों को चूर-चूर कर देने वाली बेटियों की संख्‍या अनगिनत है और सुखी बेटों के रहते हुए दुःखी मां-बाप की संख्‍या भी अनगिनत है। और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों यह सोच कि बेटा आपका बुढ़ापा संभालेगा, भूल जाइये। अगर आप अपनी संतानों को सामान रूप से संस्‍कारित करके बड़े करोगे, तो आपकी समस्‍याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।

कभी-कभी लगता है कि बेटी तो पराये घर की है। मैं जरा पूछना चाहता हूं सचमुच में यह सही सोच है क्‍या? अरे बेटी के लिए तो आपका घर पराया होता है जिस घर आप भेजते हो वो पल-दो-पल में उसको अपना बना लेती है। कभी पूछती नहीं है कि मुझे उस गांव में क्‍यों डाला मुझे उस कुटुम्‍ब में क्‍यों डाल दिया? जो भी मिले उसको सर-आंखों पर चढ़ाकर के अपना जीवन वहां खपा देती है और अपने मां-बाप के संस्‍कारों को उजागर करती है। अच्‍छा होता है तो कहती है कि मेरी मां ने सिखाया है, अच्‍छा होता है तो कहती है कि मां-बाप के कारण, मेरे मायके के संस्‍कार के कारण मैं अच्‍छा कर रही हूं। बेटी कहीं पर भी जाएं वहां हमेशा आपको गौरव बढ़े, उसी प्रकार का काम करती है।

मैंने कल्‍पना की, आपने कभी सोचा है यहीं तो हरियाणा की धरती, जहां की बेटी कल्‍पना चावला पूरा विश्‍व जिसके नाम पर गर्व करता है। जिस धरती पर कल्‍पना चावला का जन्‍म हुआ हो, जिसको को लेकर के पूरा विश्‍व गर्व करता हो, उसी हरियाणा में मां के पेट में पल रही कल्‍पना चावलाओं को मार करके हम दुनिया को क्‍या मुंह दिखाएंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों मैं आप आपसे आग्रह करने आया हूं और यह बात देख लीजिए अगर अवसर मिलता है तो बेटे से बेटियां ज्‍यादा कमाल करके दिखाती हैं।

आज भी आपके हरियाणा के और हिंदुस्‍तान के किसी भी राज्‍य के 10th या 12th के result देख लीजिए। first stand में से छह या सात तो बच्चियां होती है जीतने वाली, बेटों से ज्‍यादा नंबर लाती है। आप हिंदुस्‍तान का पूरा education sector देख लीजिए। teachers में 70-75 प्रतिशत महिलाएं शिक्षक के रूप में काम कर रही है। आप health sector देख लीजिए health sector में 60 प्रतिशत से ज्‍यादा, सूश्रूषा के क्षेत्र में बहनें दिखाई देती है। अरे हमारा agriculture sector, पुरूष सीना तान कर न घूमें कि पुरूषों से ही agriculture sector चलता है। अरे आज भी भारत में agriculture और पशुपालन में महिलाओं की बराबरी की हिस्‍सेदारी है। वो खेतों में जाकर के मेहनत करती है,वो भी खेती में पूरा contribution करती हैं और खेत में काम करने वाले मर्दों को संभालने का काम भी वही करती है।

पश्चिम के लोग भले ही कहते हों, लेकिन हमारे देश में महिलाओं का सक्रिय contribution आर्थिक वृद्धि में रहता है। खेलकूद में देखिए पिछले दिनों जितने game हुए, उसमें ईनाम पाने वाले अगर लड़के हैं तो 50 प्रतिशत ईनाम पाने वाली लड़कियां है। gold medal लाने वाली लड़कियां है। खेलकूद हो, विज्ञान हो, व्‍यवसाय हो, सेवा का क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, आज महिलाएं रत्‍तीभर भी पीछे नहीं है और यह सामर्थ्‍य हमारी शक्ति में है। और इसलिए मैं आपसे आग्रह करने आया हूं कि हमें बेटे और बेटी में भेद करने वाली बीमारी से निकल जाना चाहिए। “बेटा-बेटी एक समान” यही हमारा मंत्र होना चाहिए और एक बार हमारे मन में बेटा और बेटी के प्रति एक समानता का भाव होगा तो यह पाप करने की जो प्रवृति है वह अपने आप ही रूक जाएगी। और यह बात, इसके लिए commitment चाहिए, संवेदना चाहिए, जिम्‍मेवारी चाहिए।

मैं आज आपके सामने एक बात बताना चाहता हूं। यह बात मेरे मन को छू गई। किसी काम के लिए जब commitment होता है, एक दर्द होता है तो इंसान कैसे कदम उठाता है। हमारे बीच माधुरी दीक्षित जी बैठी है। माधुरी नैने। उनकी माताजी ICU में हैं, वो जिंदगी की जंग लड़ रही है और बेटी पानीपत पहुंची है। और मां कहती है कि बेटी यह काम अच्‍छा है तुम जरूर जाओ। Weather इतना खराब होने के बावजूद भी माधुरी जी अपनी बीमार मां को छोड़कर के आपकी बेटी बचाने के लिए आपके बीच आकर के बैठी है और इसलिए मैं कहता हूं एक commitment चाहिए, एक जिम्‍मेवारी का एहसास चाहिए और यह एक सामूहिक जिम्‍मेवारी में साथ है। गांव, पंचायत, परिवार, समाज के लोग इन सबको दायित्‍व निभाना पड़ेगा और तभी जाकर के हम इस असंतुलन को मिटा सकेंगे। यह रातों-रात मिटने वाला नहीं है। करीब-करीब 50 साल से यह पाप चला है। आने वाले 100 साल तक हमें जागरूक रूप से प्रयास करना पड़ेगा, तब जाकर के शायद स्थिति को हम सुधार पाएंगे। और इसलिए मैंने कहा आज का जो यह पानीपत की धरती पर हम संकल्‍प कर रहे हैं, यह संकल्‍प आने वाली सदियों तक पीढि़यों की भलाई करने के लिए है।

भाईयों बहनों आज यहां भारत सरकार की और योजना का भी प्रांरभ हुआ है – सुकुन्‍या समृद्धि योजना। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं। इसको निरंतर बल देना है और इसलिए उसके लिए सामाजिक सुरक्षा भी चाहिए। यह सुकुन्‍या समृद्धि योजना के तहत 10 साल से कम उम्र की बेटी एक हजार रुपये से लेकर के डेढ़ रुपये लाख तक उसके मां-बाप पैसे बैंक में जमा कर सकते है और सरकार की तरफ से हिंदुस्‍तान में किसी भी प्रकार की परंपरा में ब्‍याज दिया जाता है उससे ज्‍यादा ब्‍याज इस बेटी को दिया जाएगा। उसका कभी Income Tax नहीं लगाया जाएगा और बेटी जब 21 साल की होगी, पढ़ाई पूरी होगी या शादी करने जाती होगी तो यह पैसा पूरा का पूरा उसके हाथ में आएगा और वो कभी मां-बाप के लिए बोझ महसूस नहीं होगी।

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काशी के लोगों ने मुझे अपना MP बनाया है। वहां एक जयापुर पर गांव है। जयापुर गांव ने मुझे गोद लिया है और वो जयापुर गांव मेरी रखवाली करता है, मेरी चिंता करता है। जयपुर में गया था मैंने उनको कहा था कि हमारे गावं में जब बेटी पैदा हो तो पूरे गांव का एक बड़ा महोत्‍सव होना चाहिए। आनंद उत्‍सव होना चाहिए और मैंने प्रार्थना की थी कि बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ बोने चाहिए। मुझे बाद में चिट्ठी आई। मेरे आने के एक-आध महीने बाद कोई एक बेटी जन्‍म का समाचार आया तो पूरे गांव ने उत्‍सव मनाया और उतना ही नहीं सब लोगों ने जाकर के पाँच पेड़ लगाए। मैं आपको भी कहता हूं। आपकी बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ लगाएंगे बेटी भी बड़ी होगी, पेड़ भी बड़ा होगा और जब शादी का समय आएगा वो पाँच पेड़ बेच दोगे न तो भी उसकी शादी का खर्चा यूं ही निकल जाएगा।

भाईयों बहनों बड़ी सरलता से समझदारी के साथ इस काम को हमने आगे बढ़ाना है और इसलिए आज मैं हरियाणा की धरती, जहां यह सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन हिंदुस्‍तान का कोई राज्‍य बाकी नहीं है कि जहां चुनौती नहीं है। और मैं जानता हूं यह दयानंद सरस्‍वती के संस्‍कारों से पली धरती है। एक बार हरियाणा के लोग ठान लें तो वे दुनिया को खड़ी करने की ताकत रखते हैं। मुझको बड़ा बनाने में हरियाणा का भी बहुत बड़ा role है। मैं सालों तक आपके बीच रहा हूं। आपके प्‍यार को भली-भांति में अनुभव करता हूं। आपने मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। मैं आज आपसे कुछ मांगने के लिए आया हूं। देश का प्रधानमंत्री एक भिक्षुक बनकर आपसे बेटियों की जिंदगी की भीख मांग रहा है। बेटियों को अपने परिवार का गर्व मानें, राष्‍ट्र का सम्‍मान मानें। आप देखिए यह असंतुलन में से हम बहुत तेजी से बाहर आ सकते हैं। बेटा और बेटी दोनों वो पंख है जीवन की ऊंचाईयों को पाने का उसके बिना कोई संभावना नहीं और इसलिए ऊंची उड़ान भी भरनी है तो सपनों को बेटे और बेटी दोनों पंख चाहिए तभी तो सपने पूरे होंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों हम एक जिम्‍मेवारी के साथ इस काम को निभाएं।

मुझे बताया गया है कि हम सबको शपथ लेना है। आप जहां बैठे है वहीं बैठे रहिये, दोनों हाथ ऊपर कर दीजिए और मैं एक शपथ बोलता हूं मेरे साथ आप शपथ बोलेंगे – “मैं शपथ लेता हूं कि मैं लिंग चयन एवं कन्‍या भ्रूण हत्‍या का ‍विरोध करूगा; मैं बेटी के जन्‍म पर खुश होकर सुरक्षित वातारवण प्रदान करते हुए बेटी को सुशिक्षित करूंगा। मैं समाज में बेटी के प्रति भेदभाव खत्‍म करूंगा, मैं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं” का संदेश पूरे समाज में प्रसारित करूंगा।“

भाई बहनों मैं डॉक्‍टरों से भी एक बात करना चाहता हूं। मैं डॉक्‍टरों से पूछना चाहता हूं कि पैसे कमाने के लिए यही जगह बची है क्‍या? और यह पाप के पैसे आपको सुखी करेंगे क्‍या? अगर डॉक्‍टर का बेटा कुंवारा रह गया तो आगे चलकर के शैतान बन गया तो वो डॉक्‍टर के पैसे किस काम आएंगे? मैं डॉक्‍टरों को पूछना चाहता हूं कि यह आपको दायित्‍व नहीं है कि आप इस पाप में भागीदार नहीं बनेंगे। डॉक्‍टरों को अच्‍छा लगे, बुरा लगे, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आपकी यह जिम्‍मेवारी है। आपको डॉक्‍टर बनाया है समाज ने, आपको पढ़-लिखकर के तैयार किया है। गरीब के पैसों से पलकर के बड़े हुए हो। आपको पढ़ाया गया है किसी की जिंदगी बचाने के लिए, आपको पढ़ाया गया है किसी की पीड़ा को मुक्‍त करने के लिए। आपको बच्चियों को मारने के लिए शिक्षा नहीं दी गई है। अपने आप को झकझोरिये, 50 बार सोचिए, आपके हाथ निर्दोष बेटियों के खून से रंगने नहीं चाहिए। जब शाम को खाना खाते हो तो उस थाली के सामने देखो। जिस मां ने, जिस पत्‍नी ने, जिस बहन ने वो खाना बनाया है वो भी तो किसी की बेटी है। अगर वो भी किसी डॉक्‍टर के हाथ चढ़ गई होती, तो आज आपकी थाली में खाना नहीं होता। आप भी सोचिए कहीं उस मां, बेटी, बहन ने आपके लिए जो खाना बनाया है, कहीं आपके के खून से रंगे हुए हाथ उस खाने की चपाती पर तो हाथ नहीं लगा रहे। जरा अपने आप को पूछिये मेरे डॉक्‍टर भाईयों और बहनों। यह पाप समाज द्रोह है। यह पाप सदियों की गुनाहगारी है और इसलिए एक सामाजिक दायित्‍व के तहत है, एक कर्तव्‍य के तहत और सरकारें किसकी-किसकी नहीं, यह दोषारोपण करने का वक्‍त नहीं है। हमारा काम है जहां से जग गए हैं, जाग करके सही दिशा में चलना।

मुझे विश्‍वास है पूरा देश इस संदेश को समझेगा। हम सब मिलकर के देश को भविष्‍य के संकट से बचाएंगे और फिर एक बार मैं हरियाणा को इतने बड़े विशाल कार्यक्रम के लिए और हरियाणा इस संदेश को उठा लेगा तो हिंदुस्‍तान तो हरियाणा के पीछे चल पड़ेगा। मैं फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद करता हूं।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ इस संकल्‍प को लेकर हम जाएंगे। इसी अपेक्षा के साथ मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए – भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

सेवा आणि समर्पणाची व्याख्या सांगणारी 20 छायाचित्रे
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‘आत्मनिर्भर भारत, स्वयंपूर्ण गोवा’ कार्यक्रमामध्ये लाभार्थी आणि इतर हितसंबंधीयांशी संवाद साधल्यानंतर पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी केलेले भाषण
October 23, 2021
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"પ્રકૃતિ અને આનંદ સિવાય, ગોવા વિકાસનું નવું મોડલ દર્શાવે છે તથા પંચાયતથી પ્રશાસન સુધી વિકાસના સામૂહિક પ્રયાસો અને દ્રઢતાનું પ્રતિબિંબ રજૂ કરે છે"
"ગોવાએ ODF, વીજળી, નળથી જળ, ગરીબોને રાશન જેવી તમામ મહત્ત્વની યોજનાઓમાં 100% સફળતા મેળવી છે"
"સ્વયંપૂર્ણ ગોવા ટીમ ગોવાની નવી ટીમ સ્પિરિટનું પરિણામ છે"
"ગોવામાં વિકાસ પામી રહેલું ઇન્ફ્રાસ્ટ્રક્ચર ખેડૂતોની આવક, પશુપાલકો અને આપણાં માછીમારોની આવક વધારવામાં પણ મદદ કરશે"
"પ્રવાસન કેન્દ્રિત રાજ્યોએ રસીકરણ ઝૂંબેશમાં વિશેષ ઝૂંબેશમાં વિશેષ ધ્યાન પ્રાપ્ત કર્યુ છે અને ગોવાએ તેનાથી મહત્ત્વપૂર્ણ લાભ પ્રાપ્ત કર્યો છે"

आत्मनिर्भर भारताचे सपन, स्वयंपूर्ण गोवा येव-जणे-तल्येन, साकार करपी गोयकारांक येवकार। तुमच्या.सारख्याए धड.पड.करपी, लोकांक लागून, गोंय राज्याचो गरजो, गोयांतच भागपाक सुरू जाल्यात, ही खोशयेची गजाल आसा।

ज्यावेळी सरकारची मदत आणि  जनतेचे परिश्रम एकत्रितपणे काम करतात, त्यावेळी कशा पद्धतीने परिवर्तन घडून येते, आत्मविश्वास कसा दुणावतो, याचा आपण सर्वांनी स्वयंपूर्ण गोव्याच्या लाभार्थींबरोबर चर्चा करताना अनुभव घेतला. गोव्यामध्ये आलेल्या या सार्थक परिवर्तनाचा मार्ग दाखविणारे लोकप्रिय आणि ऊर्जावान मुख्यमंत्री डॉक्टर प्रमोद सावंत, केंद्रीय मंत्रिमंडळातले माझे वरिष्ठ सहयोगी श्रीपाद नाईक, गोव्याचे उपमुख्यमंत्री मनोहर आजगावकर, उपमुख्यमंत्री चंद्रकांत केवलेकर, राज्य सरकारमधले इतर मंत्री, खासदार, आमदार, स्थानिक संस्थांचे सर्व प्रतिनिधी, जिल्हा परिषद सदस्य, पंचायत सदस्य, इतर लोकप्रतिनिधी आणि माझ्या प्रिय गोव्याच्या  बंधू आणि भगिनींनो!!

असे म्हणतात की, गोवा म्हणजे आनंद, गोवा म्हणचे निसर्ग, गोवा म्हणजे पर्यटन, मात्र आज मी असेही म्हणेन - गोवा म्हणजे विकासाचे नवीन मॉडेल! गोवा म्हणजे सामूहिक प्रयत्नांचे प्रतिबिंब. गोवा म्हणजे पंचायतीपासून ते प्रशासनापर्यंत विकासासाठी असलेली एकजूटता!

मित्रांनो,

गेल्या काही वर्षांमध्ये देशाने अभावाच्या स्थितीतून बाहेर पडून आवश्यकता-आकांक्षांची पूर्तता करण्याचे आपले ध्येय बनवले आहे. ज्या मूलभूत सुविधांपासून देशातले नागरिक दशकांपासून वंचित होते, त्या सर्व सुविधा देशवासियांना मिळाव्यात यासाठी सर्वोच्च प्राधान्य दिले आहे. यंदाच्या वर्षी 15 ऑगस्ट रोजी मी लाल किल्ल्यावरून भाषण देताना सांगितले होते की, आपल्याला आता या योजना ‘सॅच्युरेशन’ म्हणजेच अगदी शंभर टक्के लक्ष्यपूर्तीपर्यंत न्यायच्या आहेत. या ध्येयाच्या पूर्तीमध्ये प्रमोद सावंत आणि त्यांच्या टीमच्या नेतृत्वाखाली गोवा अग्रणी भूमिका बजावत आहे.  खुल्या जागेत शौच करण्याच्या पद्धतीमधून भारताला मुक्त करण्याचे लक्ष्य निश्चित केले गेले. गोव्याने हे लक्ष्य अगदी शंभर टक्के गाठले. देशाने प्रत्येक घरामध्ये विजेची जोडणी देण्याचे लक्ष्य निश्चित केले. हे लक्ष्यही गोवा राज्याने पूर्ण केले. प्रत्येक घरामध्ये नळाव्दारे पाणी अभियान सुरू केल्यानंतर गोव्याने सर्वात प्रथम हे काम पूर्ण केले. गरीबांना मोफत अन्नधान्य देण्याच्या कामातही गोव्यामध्ये शंभर टक्के काम करण्यात आले आहे.

 

मित्रांनो,

दोनच दिवसांपूर्वी भारताने लसीच्या 100 कोटी मात्रा देण्याचा एक विराट- विक्रमी, महत्वपूर्ण टप्पा पार केला आहे. यामध्येही गोवा आघाडीवर असून गोव्यातल्या सर्व पात्र म्हणजे अगदी 100 टक्के  लोकांना लसीची पहिली मात्रा देऊन झाली आहे. आता लसीची दुसरी मात्रा  सर्वांनी घ्यावी, हे लक्ष्य शंभर टक्के साध्य करण्यासाठी गोवा आपली शक्ती वापरत आहे.

 

बंधू आणि भगिनींनो,

महिलांच्या सुविधेसाठी आणि त्यांच्या सन्मानासाठी केंद्र सरकारने ज्या योजना बनविल्या आहेत, त्या सर्व योजनांचे कार्य गोव्याच्या भूमीमध्ये यशस्वीपणे पार पाडण्यात आले आहे, इतकेच नाही तर या कामांचा विस्तारही करण्यात येत आहे. या गोष्टीचा मला आनंद होत आहे. मग यामध्ये शौचालयांचे बांधकाम असो, उज्ज्वला गॅस जोडणी असो किंवा मग बँकेमध्ये जन-धन खाती उघडणे असो, गोव्यामध्ये महिलांसाठी आवश्यक सुविधा देण्याचे काम खूप चांगले झाले आहे. या कारणामुळेच कोरोनाच्या लॉकडाऊनमध्ये हजारो भगिनींना मोफत गॅस सिलेंडर मिळू शकले होते. तसेच त्यांच्या बँक खात्यामध्ये पैसेही जमा होवू शकले. घराघरामध्ये आता नळाव्दारे पाणी पोहोचवून गोवा सरकारने भगिनीवर्गाला मोठीच सुविधा करून दिली आहे. आता गोवा सरकार, गृह आधार आणि दीनदयाल विशेष सामाजिक सुरक्षा यासारख्या योजनांच्या माध्यमातून गोव्यातल्या भगिनींचे जीवन आणखी चांगले बनविण्याचे काम करीत आहे.  

बंधू आणि भगिनींनो,

ज्यावेळी कठीण-अवघड काळ असतो, ज्यावेळी आव्हाने समोर असतात,  त्याचवेळी आपल्याकडे खरे किती सामर्थ्य आहे, ही गोष्ट समजते. गेल्या दीड-दोन वर्षांमध्ये गोव्यासमोर शंभर वर्षातून आलेले सर्वात मोठे महामारीचे संकट आले. गोव्याने भीषण चक्रीवादळाचा सामना केला, महापूराचा प्रकोपही झेलला. या आपत्तींमुळे गोव्याच्या पर्यटन क्षेत्रापुढे किती संकटे आली असतील, याची जाणीव मला आहे. मात्र अशी आव्हाने सामोरी आली असतानाही, गोव्याचे सरकार केंद्र सरकारच्या सहकार्यामुळे दुप्पट ताकदीने गोव्यातल्या लोकांना मदत करण्यासाठी कार्यरत आहे. आम्ही गोव्यामध्ये विकास कार्य थांबवू दिली नाहीत. प्रमोद सावंत  आणि त्यांच्या संपूर्ण टीमचे मी अभिनंदन करू इच्छितो. या सर्वांनी मिळून स्वयंपूर्ण गोवा अभियानाला गोव्याच्या विकासाचा आधार बनविले आहे. आता या अभियानाला अधिक वेगवान करण्यासाठी ‘सरकार तुमच्या दारी’ या योजनेचे मोठे पाऊल उचलण्यात आले आहे.

मित्रांनो,

ही गोष्‍ट म्हणजे ‘प्रो पीपल, प्रोअॅक्टिव्ह गव्हर्नन्स’च्या भावनेचा विस्तार आहे. गेल्या सात वर्षांपासून देश या संकल्पनेनुसार पुढे जात आहे. अशाप्रकारे जिथे प्रशासन कार्य केले जाते, तिथे सरकार स्वतःहून नागरिकांकडे जाते आणि त्यांच्या समस्यांवर तोडगा काढते. गोव्याने तर गावपातळीवर, पंचायत स्तरावर, जिल्हा स्तरावर एक चांगले मॉडेल विकसित केले आहे. मला पूर्ण विश्वास आहे की, ज्या प्रकारे केंद्राच्या अनेक अभियानांमध्ये आत्तापर्यंत गोव्याने आपले शंभर टक्के योगदान दिले आहे, आणि त्या योजना यशस्वी केल्या आहेत, तसेच इतर लक्ष्यही सर्वांच्या प्रयत्नांमधून तुम्ही लवकरच पूर्ण करणार आहात, असा मला ठाम विश्वास आहे.

 

मित्रांनो,

मी गोव्याविषयी बोलावे आणि फुटबॉलविषयी बोलायचं नाही, असे होऊच  शकत नाही. फुटबॉलविषयीचे गोवेकरांचे प्रेम खूप काही वेगळेच आहे. फुटबॉलची गोव्यात असलेली ‘क्रेझ’ अगदी वेगळीच आहे. फुटबॉलमध्ये मग ‘डिफेन्स’ असो अथवा ‘फॉरवर्ड’ सर्व काही गोलशी निगडित असते.  कुणाला गोल करण्यापासून वाचवायचं आहे तर कुणाला गोल करायचा आहे. आपआपला गोल ‘साधून घेण्याची’ ही भावना गोव्यामध्ये कधीच कमी नाही. मात्र आधी जी सरकारे होती, त्यांच्यामध्ये संघभावनेचा, एक सकारात्मक वातावरण निर्माण करण्याचा अभाव होता. दीर्घकाळापर्यंत गोव्यामध्ये राजकीय स्वार्थ हा सुशासनावर भारी पडत होता. गोव्यातल्या संमजस लोकांनी इथली राजकीय अस्थिरता संपुष्टात आणून स्थिरता आणली आहे. माझे मित्र स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर जी यांनी गोव्यामध्ये जो वेगवान विकास घडवून आणला, गोव्याला ज्या विश्वासाने विकासाच्या आघाडीवर वेगाने नेले, तेच कार्य प्रमोद जी आणि त्यांची टीम संपूर्ण इमानदारीने करीत असल्याने नवीन विक्रम प्रस्थापित होत आहे. आज गोवा नव्या आत्मविश्वासाने पुढे जात आहे. टीम गोव्याच्या या नवीन ‘टीम स्पिरीट’चा परिणाम म्हणजे स्वयंपूर्ण गोव्याचा संकल्प आहे.

 

बंधू आणि भगिनींनो,

गोव्याकडे एक अतिशय समृद्ध ग्रामीण संपदाही आहे. आणि एक आकर्षक नागरी जीवनही आहे. गोव्याकडे शेत-शिवारही आहे आणि नील अर्थव्यवस्थेच्या विकासाच्या असंख्य संधीही आहेत. आत्मनिर्भर भारताच्या निर्माणासाठी जे काही आवश्यक-गरजेचे आहे, ते सर्व काही गोव्याकडे आहे. म्हणूनच गोव्याचा संपूर्ण विकास करण्‍यासाठी  हे डबल इंजिनचे सरकार त्याला प्राधान्य देत आहे.

मित्रहो,

डबल इंजिन सरकार गोव्याच्या ग्रामीण शहरी आणि समुद्र किनाऱ्याशी  निगडीत पायाभूत सुविधांवर विशेष लक्ष पुरवत आहे.

गोव्याचा दुसरा विमानतळ असो, वाहतूक केंद्र म्हणजे लॉजिस्टिक हब असो, भारतातील दुसऱ्या क्रमांकाचा सर्वात मोठा केबल ब्रिज असो किंवा हजारो कोटी रुपये खर्चून तयार केलेला नॅशनल हायवे असो या सगळ्यांमुळे गोव्याच्या राष्ट्रीय आणि आंतरराष्ट्रीय कनेक्टिव्हिटीला नवीन दिशा मिळणार आहेत‌.

 

बंधू-भगिनींनो,

गोव्यात विकसित होत असलेल्या पायाभूत सुविधा या शेतकरी, पशुपालक आणि आमच्या मच्छिमार बांधवांची कमाई वाढण्यासाठी उपयुक्त ठरतील. ग्रामीण पायाभूत सुविधांच्या आधुनिकीकरणासाठी यावर्षी गोव्याला देण्यात येणाऱ्या निधीत पाचपट वाढ करण्यात आली आहे.

ग्रामीण पायाभूत सुविधांच्या विकासासाठी केंद्र सरकारने 500 कोटी रुपये गोव्यासाठी मंजूर केले आहेत. त्यामुळे कृषी आणि पशुपालन क्षेत्रात गोव्यामध्ये जे काम होत आहे त्याला वेग येईल.

 

बंधू-भगिनींनो,

शेतकरी आणि मच्छीमारांना बँकेशी तसंच बाजारपेठेशी जोडण्यासाठी ज्या ज्या योजना केंद्र सरकारने आखल्या आहेत त्या लोकांपर्यंत पोचण्यावर गोवा सरकार काम करत आहे. गोव्यामध्ये छोट्या शेतकऱ्यांची संख्या जास्त आहे. मग ते फळे ,भाज्या विकणारे असोत वा मासेमारीच्या व्यवसायातील असोत. या छोट्या शेतकऱ्यांना, पशुपालन करणाऱ्यांना किंवा मच्छिमारांना बँकेकडून कर्ज मिळवणे म्हणजे एक मोठेच आव्हान होते. त्यांना होणारा त्रास लक्षात घेऊन किसान क्रेडिट कार्ड या योजनेचा विस्तार केला गेला आहे.

छोट्या शेतकऱ्यांना तत्परतेने किसान क्रेडिट कार्ड दिले जात आहे तर दुसरीकडे पशुपालन करणाऱ्यांना तसेच मच्छिमारांना यात प्रथमच सामावून घेतले गेले आहे.गोव्यासुद्धा अगदी थोड्या काळात शेकडो नवीन किसान क्रेडिट कार्ड दिली गेली आहेत आणि करोडो रुपयांची मदत हे दिली गेली आहे. पंतप्रधान शेतकरी सम्मान निधीची  गोव्यातल्या शेतकऱ्यांना खूप मदत झाली आहे. अशाच प्रयत्नांमुळे अनेक नवीन साथीदार सुद्धा शेतीकडे वळले आहेत. एका वर्षातच गोव्यामध्ये फळांचे आणि  भाज्यांचे उत्पादन जवळपास 40 टक्‍क्‍यांनी वाढले. दूध उत्पादनाच्या  प्रमाणातही  चाळीस टक्‍क्‍यांहूनअधिक  वाढ झाली  आहे.

 

मित्रहो,

अन्न प्रक्रिया केंद्र ही स्वावलंबी गोव्याची मोठी ताकत बनणार आहे. विशेषतः मत्स्य प्रक्रिया या क्षेत्रात गोवा भारताची ताकद बनवू शकतो. भारत खूप वर्षांपूर्वीपासून मासे निर्यात करत आला आहे.भारतातील मासे पूर्व आशियाई देशांमध्ये प्रक्रिया झाल्यानंतर जगभरातील बाजारामध्ये पोचतात. ही परिस्थिती बदलण्यासाठी मत्स्य उत्पादन क्षेत्राला पहिल्यांदाच मोठ्या स्तरावर मदत दिली जात आहे. माशांचचा व्यापार किंवा व्यवहारांसाठी विशेष मंत्रालय ते मच्छीमारांच्या होड्यांचे आधुनिकीकरण अशा प्रत्येक स्तरावर प्रोत्साहन दिलं जात आहे. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा या योजनेअंतर्गत गोव्यातील मच्छिमारांना खूप मदत मिळत आहे.

 

मित्रहो,

गोव्याचे पर्यावरण आणि गोव्याचा पर्यटन या दोन्हीचा विकास भारताच्या विकासाशी थेट जोडलेला आहे. गोवा हे भारताच्या पर्यटन क्षेत्राचे एक महत्त्वाचे केंद्र आहे. वेगाने वाढणाऱ्या भारताच्या अर्थव्यवस्थेत पर्यटन आणि अतिथी क्षेत्राचा वाटा सातत्याने वाढत आहे. साहजिकच यात गोव्याचा वाटा खूप मोठा आहे . गेल्या काही वर्षांमध्ये पर्यटन आणि अतिथी क्षेत्रांना वेग देण्याच्या दृष्टीने प्रत्येक प्रकारे मदत दिली जात आहे. विजा ऑन अरायवल ही सुविधा व्यापक प्रमाणावर राबवली जात आहे. कनेक्टिविटीशिवाय पर्यटनाशी संलग्न पायाभूत सुविधा विकासासाठी केंद्र सरकारने गोव्याला करोडो रुपयांची मदत दिली आहे.

 

मित्रहो,

भारतातील लसीकरण मोहिमेतसुद्धा गोव्या सह पर्यटनाचे केंद्र असलेल्या राज्यांना विशेष प्रोत्साहन दिले गेले. यामध्ये गोव्यालाही मोठा फायदा मिळाला. गोव्याने दिवस-रात्र प्रयत्न करून राज्यातल्या सर्व पात्र लोकांना लसींची पहिली मात्रा दिली. इतर राज्यांनीही विशेष प्रोत्साहन दिले. आता आपल्या देशानेही लसीकरणाचा 100 कोटींचा आकडा ओलांडला आहे . यामुळे देशवासियांचा, पर्यटकांचा विश्वास वाढला आहे.

आता आपण दिवाळी ख्रिसमस आणि नववर्षाच्या तयारीत गुंतलेला आहात. अशावेळी सणांच्या आणि सुट्ट्यांच्या या या मोसमात गोव्यातील पर्यटन क्षेत्रात नवीन उर्जा दिसायला लागणार आहे. गोव्यात स्वदेशी आणि विदेशी दोन्ही पर्यटकाची हालचाल नक्कीच वाढणार आहे. गोव्याच्या पर्यटन उद्योगासाठी हे शुभकारक आहे.

 

बंधू-भगिनींनो,

जेव्हा गोवा विकासाच्या प्रत्येक शक्यतेचा शंभर टक्के उपयोग करेल तेव्हाच गोवा स्वयंपूर्ण बनेल. स्वयंपूर्ण गोवा म्हणजे सर्वसामान्य लोकांच्या आकांक्षा आणि अपेक्षांना प्रत्यक्षात आणण्याचा संकल्प आहे स्वयंपूर्ण गोवा म्हणजे माता-भगिनी आणि लेकींच्‍या आरोग्य सुविधा सुरक्षा आणि सन्मानाची खात्री आहे.

स्वयंपूर्ण गोव्यात तरुणांसाठी रोजगार आणि स्वयंरोजगाराच्या संधी आहेत, गोव्याच्या समृद्ध भविष्याची झलक आहे. हा केवळ पाच महिन्याचा किंवा पाच वर्षांचा कार्यक्रम नाही , तर येत्या पंचवीस वर्षांसाठी आखलेल्या दूरदर्शीपणाचा पहिला टप्पा आहे. या टप्प्यापर्यंत पोहोचण्यासाठी गोव्यातील प्रत्येकाने आपल्याला याच्याशी जोडून घेतले पाहिजे. म्हणून गोव्याला डबल इंजिन विकासासाठी सातत्य आवश्यक आहे

गोव्याला सध्या आहे तसे स्पष्ट धोरण हवे आहे. आतासारखे स्थिर सरकार हवे आहे. आणि आता आहे तसे ऊर्जावान नेतृत्व हवे आहे. संपूर्ण गोव्यातून मिळालेल्या प्रचंड आशीर्वादाने आम्ही स्वयंपूर्ण गोवा हा संकल्प पूर्ण करू या विश्वासासौबतच आपल्याला खूप खूप शुभेच्छा.

खूप खूप धन्यवाद!