We must not discriminate between sons and daughters: PM Modi

Published By : Admin | January 22, 2015 | 16:04 IST
PM Modi launches Beti Bachao, Beti Padhao programme in Haryana
We need to end discrimination between sons and daughters, urges PM Modi
Medical education is for the purpose of saving lives, and not killing daughters: PM
Girls today doing well in sports, in education and health sectors, they have a significant contribution even in agriculture: PM
Celebrate the birth of a girl child by planting trees: PM Modi
PM Modi launches Sukanya Samriddhi Account for the benefit of girl child

विशाल संख्‍या में आए हुए माताओं, बहनों और भाईयों,

आज पानीपत की धरती पर हम एक बहुत बड़ी जिम्‍मेवारी की और कदम रख रहे हैं। यह अवसर किस सरकार ने क्‍या किया और क्‍या नहीं किया? इसका लेखा-जोखा करने के लिए नहीं है। गलती किसकी थी, गुनाह किसका था? यह आरोप-प्रत्यारोप का वक्‍त नहीं है। पानीपत की धरती पर यह अवसर हमारी जिम्‍मेवारियों का एहसास कराने के लिए है। सरकार हो, समाज हो, गांव हो, परिवार हो, मां-बाप हो हर किसी की एक सामूहिक जिम्‍मेवारी है और जब तक एक समाज के रूप में हम इस समस्‍या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे, तो हम अपना ही नुकसान करेंगे ऐसा नहीं है बल्कि हम आने वाली सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक भंयकर संकट को निमंत्रण दे रहे हैं और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों और मैं इस बात के लिए मेनका जी और उनके विभाग का आभारी हूं कि उन्‍होंने इस काम के लिए हरियाणा को पसंद किया। मैं मुख्‍यमंत्री जी का भी अभिनंदन करता हूं कि इस संकट को इन्‍होंने चुनौती को स्‍वीकार किया। लेकिन यह कार्यक्रम भले पानीपत की धरती पर होता हो, यह कार्यक्रम भले हरियाणा में होता हो, लेकिन यह संदेश हिंदुस्‍तान के हर परिवार के लिए है, हर गांव के लिए है, हर राज्‍य के लिए है।

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क्‍या कभी हमने कल्‍पना की है जिस प्रकार की समाज के अवस्‍था हम बना रहे हैं अगर यही चलता रहा तो आने वाले दिनों में हाल क्‍या होगा? आज भी हमारे देश में एक हजार बालक पैदा हो, तो उसके सामने एक हजार बालिकाएं भी पैदा होनी चाहिए। वरना संसार चक्र नहीं चल सकता। आज पूरे देश में यह चिंता का विषय है। यही आपके हरियाणा में झज्जर जिला देख लीजिए, महेंद्रगढ़ जिला देख लीजिए। एक हजार बालक के सामने पौने आठ सौ बच्चियां हैं। हजार में करीब-करीब सवा दौ सौ बच्‍चे कुंवारे रहने वाले हैं। मैं जरा माताओं से पूछ रहा हूं अगर बेटी पैदा नहीं होगी, तो बहू कहां से लाओगे? और इसलिए जो हम चाहते हैं वो समाज भी तो चाहता है। हम यह तो चाहते है कि बहू तो हमें पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटी को पढ़ाना है तो पास बार सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह अन्‍याय कब तक चलेगा, यह हमारी सोच में यह दोगलापन कब तक चलेगा? अगर बहू पढ़ी-लिखी चाहते हैं तो बेटी को भी पढ़ाना यह हमारी जिम्‍मेवारी बनता है। अगर हम बेटी को नहीं पढ़ाऐंगे, तो बहू भी पढ़ी-लिखी मिले। यह अपेक्षा करना अपने साथ बहुत बड़ा अन्याय है। और इसलिए भाईयों और बहनों, मैं आज आपके बीच एक बहुत बड़ी पीड़ा लेकर आया हूँ। एक दर्द लेकर आया हूँ। क्‍या कभी कल्‍पना की हमने जिस धरती पर मानवता का संदेश होता है, उसी धरती पर मां के गर्भ में बच्‍ची को मौत के घाट उतार दिया जाए।

यह पानीपत की धरती, यह उर्दू साहित्‍य के scholar अलताफ हुसैन हाली की धरती है। यह अलताफ हुसैन हाली इसी पानीपत की धरती से इस शायर ने कहा था। मैं समझता हूं जिस हरियाणा में अलताफ हुसैन जैसे शायर के शब्‍द हो, उस हरियाणा में आज बेटियों का यह हाल देखकर के मन में पीड़ा होती है। हाली ने कहा था....उन्‍होंने कहा था ए मांओ, बहनों बेटियां दुनिया की जन्नत तुमसे हैं, मुल्‍कों की बस्‍ती हो तुम, गांवों की इज्‍जत तुम से हो। आप कल्‍पना कर सकते हैं बेटियों के लिए कितनी ऊंची कल्‍पना यह पानीपत का शायर करता है और हम बेटियों को जन्‍म देने के लिए भी तैयार नही हैं।

भाईयों और बहनों हमारे यहां सदियों से जब बेटी का जन्‍म होता था तो शास्‍त्रों में आर्शीवाद देने की परंपरा थी और हमारे शास्‍त्रों में बेटी को जो आर्शीवाद दिये जाते थे वो आर्शीवाद आज भी हमें, बेटियों की तरफ किस तरह देखना, उसके लिए हमें संस्‍कार देते हैं, दिशा देते हैं। हमारे शास्‍त्रों ने कहा था जब हमारे पूर्वज आर्शीवाद देते थे तो कहते थे – यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद सीताकथा लोके, तावद जीवेतु बालिका। हमारे शास्‍त्र कहते थे जब तक गंगा का नाम है, जब तक कुरूक्षेत्र की याद है, जब तक हिमालय है, जब तक कथाओं में सीता का नाम है, तब तक हे बालिका तुम्‍हारा जीवन अमर रहे। यह आर्शीवाद इस धरती पर दिये जाते थे। और उसी धरती पर बेटी को बेमौत मार दिया जाए और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों उसके मूल में हमारा मानसिक दारिद्रय जिम्‍मेवार है, हमारे मन की बीमारी जिम्‍मेवार है और यह मन की बीमार क्‍या है? हम बेटे को अधिक महत्‍वपूर्ण मानते हैं और यह मानते हैं बेटी तो पराये घर जाने वाली है। यहां जितनी माताएं-बहनें बैठी हैं। सबने यह अनुभव किया होगा यह मानसिक दारिद्रय की अनुभूति परिवार में होती है। मां खुद जब बच्‍चों को खाना परोसती है। खिचड़ी परोसी गई हो और घी डाल रही हो। तो बेटे को तो दो चम्‍मच घी डालती है और बेटी को एक चम्‍मच घी डालती है और जब, मुझे माफ करना भाईयों और बहनों यह बीमारी सिर्फ हरियाणा की नहीं है यह हमारी देश की मानसिक बीमारी का परिणाम है और बेटी को, अगर बेटी कहे न न मम्‍मी मुझे भी दो चम्‍मच दे दो, तो मां कहते से डरती नहीं है बोल देती है, अरे तुझे तो पराये घर जाना है, तुझे घी खाकर के क्‍या करना है। यह कब तक हम यह अपने-पराये की बात करते रहेंगे और इसलिए हम सबका दायित्‍व है, हम समाज को जगाए।

कभी-कभी जिस बहन के पेट में बच्‍ची होती है वो कतई नहीं चाहती है कि उसकी बेटी को मार दिया जाए। लेकिन परिवार का दबाव, माहौल, घर का वातावरण उसे यह पाप करने के लिए भागीदार बना देता है, और वो मजबूर होती है। उस पर दबाव डाला जाता है और उसी का नतीजा होता है कि बेटियों को मां के गर्भ में ही मार दिया जाता है। हम किसी भी तरह से अपने आप को 21वीं सदी के नागरिक कहने के अधिकारी नही हैं। हम मानसिकता से 18वीं शताब्दी के नागरिक हैं। जिस 18वीं शताब्‍दी में बेटी को “दूध-पीती” करने की परंपरा थी। बेटी का जन्‍म होते ही दूध के भरे बर्तन के अंदर उसे डूबो दिया जाता था, उसे मार दिया जाता था। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं, वो तो पाप करते थे गुनाह करते थे। बेटी जन्‍मती थी आंखे खोलकर के पल-दो-पल के लिए अपनी मां का चेहरा देख सकती थी। बेटी जन्‍मती थी, दो चार सांस ले पाती थी। बेटी जन्मती थी, दुनिया का एहसास कर सकती थी। बाद में उस मानसिक बीमारी के लोग उसको दूध के बर्तन में डालकर के मार डालते थे। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं। हम तो बेटी को मां का चेहरा भी नहीं देखने देते, दो पल सांस भी नहीं लेने देते। इस दुनिया का एहसास भी नहीं होने देते। मां के गर्भ में ही उसे मार देते हैं। इससे बड़ा पाप क्‍या हो सकता है और हम संवेदनशील नहीं है ऐसा नहीं है।

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कुछ साल पहले इसी हरियाणा में कुरूक्षेत्र जिले में हल्दा हेड़ी गांव में एक टयूबवेल में एक बच्‍चा गिर गया, प्रिंस.. प्रिंस कश्‍यप । और सारे देश के टीवी वहां मौजूद थे। सेना आई थी एक बच्‍चे को बचाने के लिए और पूरा हिंदुस्‍तान टीवी के सामने बैठ गया था। परिवारों में माताएं खाना नहीं पका रही थी। हर पल एक-दूसरे को पूछते थे क्‍या प्रिंस बच गया, क्‍या प्रिंस सलामत निकला टयूबवेल में से? करीब 24 घंटे से भी ज्‍यादा समय हिंदुस्‍तान की सांसे रूक गई थी। एक प्रिंस.. केरल, तमिलनाडु का कोई रिश्‍तेदार नहीं था। लेकिन देश की संवेदना जग रही है। उस बच्‍चे को जिंदा निकले, इसके लिए देशभर की माताएं-बहने दुआएं कर रही थी। मैं जरा पूछना चाहता हूं कि एक प्रिंस जिसकी जिंदगी पर संकट आए, हम बेचैन बन जाते हैं। लेकिन हमारे अड़ोस-पड़ोस में आएं दिन बच्चियों को मां के पेट में मार दिया जाए, लेकिन हमें पीड़ा तक नहीं होती है, तब सवाल उठता है। हमारी संवेदनाओं को क्‍या हुआ है? और इसलिए आज मैं आपके पास आया हूं। हमें बेटियों को मारने का हक नहीं है।

यह सोच है बुढ़ापे में बेटा काम आता है। इससे बड़ी गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए। अगर बुढ़ापे में बेटे काम आए होते तो पिछले 50 साल में जितने वृद्धाश्राम खुले हैं, शायद उतने नहीं खुले होते। बेटो के घर में गाड़ियां हो, बंगले हो, लेकिन बांप को वृद्धाश्राम में रहना पड़ता है ऐसी सैकड़ों घटनाएं है और ऐसी बेटियों की भी घटनाएं है। अगर मां-बाप की इकलौती बेटी है तो मेहनत करे, मजदूरी करे, नौकरी करे, बच्‍चों को tuition करे लेकिन बूढ़े मां-बाप को कभी भूखा नहीं रहने देती। ऐसी सैकड़ों बेटियां बाप से भी सेवा करने के लिए, मां-बाप की सेवा करने के लिए अपने खुद के सपनों को चूर-चूर कर देने वाली बेटियों की संख्‍या अनगिनत है और सुखी बेटों के रहते हुए दुःखी मां-बाप की संख्‍या भी अनगिनत है। और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों यह सोच कि बेटा आपका बुढ़ापा संभालेगा, भूल जाइये। अगर आप अपनी संतानों को सामान रूप से संस्‍कारित करके बड़े करोगे, तो आपकी समस्‍याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।

कभी-कभी लगता है कि बेटी तो पराये घर की है। मैं जरा पूछना चाहता हूं सचमुच में यह सही सोच है क्‍या? अरे बेटी के लिए तो आपका घर पराया होता है जिस घर आप भेजते हो वो पल-दो-पल में उसको अपना बना लेती है। कभी पूछती नहीं है कि मुझे उस गांव में क्‍यों डाला मुझे उस कुटुम्‍ब में क्‍यों डाल दिया? जो भी मिले उसको सर-आंखों पर चढ़ाकर के अपना जीवन वहां खपा देती है और अपने मां-बाप के संस्‍कारों को उजागर करती है। अच्‍छा होता है तो कहती है कि मेरी मां ने सिखाया है, अच्‍छा होता है तो कहती है कि मां-बाप के कारण, मेरे मायके के संस्‍कार के कारण मैं अच्‍छा कर रही हूं। बेटी कहीं पर भी जाएं वहां हमेशा आपको गौरव बढ़े, उसी प्रकार का काम करती है।

मैंने कल्‍पना की, आपने कभी सोचा है यहीं तो हरियाणा की धरती, जहां की बेटी कल्‍पना चावला पूरा विश्‍व जिसके नाम पर गर्व करता है। जिस धरती पर कल्‍पना चावला का जन्‍म हुआ हो, जिसको को लेकर के पूरा विश्‍व गर्व करता हो, उसी हरियाणा में मां के पेट में पल रही कल्‍पना चावलाओं को मार करके हम दुनिया को क्‍या मुंह दिखाएंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों मैं आप आपसे आग्रह करने आया हूं और यह बात देख लीजिए अगर अवसर मिलता है तो बेटे से बेटियां ज्‍यादा कमाल करके दिखाती हैं।

आज भी आपके हरियाणा के और हिंदुस्‍तान के किसी भी राज्‍य के 10th या 12th के result देख लीजिए। first stand में से छह या सात तो बच्चियां होती है जीतने वाली, बेटों से ज्‍यादा नंबर लाती है। आप हिंदुस्‍तान का पूरा education sector देख लीजिए। teachers में 70-75 प्रतिशत महिलाएं शिक्षक के रूप में काम कर रही है। आप health sector देख लीजिए health sector में 60 प्रतिशत से ज्‍यादा, सूश्रूषा के क्षेत्र में बहनें दिखाई देती है। अरे हमारा agriculture sector, पुरूष सीना तान कर न घूमें कि पुरूषों से ही agriculture sector चलता है। अरे आज भी भारत में agriculture और पशुपालन में महिलाओं की बराबरी की हिस्‍सेदारी है। वो खेतों में जाकर के मेहनत करती है,वो भी खेती में पूरा contribution करती हैं और खेत में काम करने वाले मर्दों को संभालने का काम भी वही करती है।

पश्चिम के लोग भले ही कहते हों, लेकिन हमारे देश में महिलाओं का सक्रिय contribution आर्थिक वृद्धि में रहता है। खेलकूद में देखिए पिछले दिनों जितने game हुए, उसमें ईनाम पाने वाले अगर लड़के हैं तो 50 प्रतिशत ईनाम पाने वाली लड़कियां है। gold medal लाने वाली लड़कियां है। खेलकूद हो, विज्ञान हो, व्‍यवसाय हो, सेवा का क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, आज महिलाएं रत्‍तीभर भी पीछे नहीं है और यह सामर्थ्‍य हमारी शक्ति में है। और इसलिए मैं आपसे आग्रह करने आया हूं कि हमें बेटे और बेटी में भेद करने वाली बीमारी से निकल जाना चाहिए। “बेटा-बेटी एक समान” यही हमारा मंत्र होना चाहिए और एक बार हमारे मन में बेटा और बेटी के प्रति एक समानता का भाव होगा तो यह पाप करने की जो प्रवृति है वह अपने आप ही रूक जाएगी। और यह बात, इसके लिए commitment चाहिए, संवेदना चाहिए, जिम्‍मेवारी चाहिए।

मैं आज आपके सामने एक बात बताना चाहता हूं। यह बात मेरे मन को छू गई। किसी काम के लिए जब commitment होता है, एक दर्द होता है तो इंसान कैसे कदम उठाता है। हमारे बीच माधुरी दीक्षित जी बैठी है। माधुरी नैने। उनकी माताजी ICU में हैं, वो जिंदगी की जंग लड़ रही है और बेटी पानीपत पहुंची है। और मां कहती है कि बेटी यह काम अच्‍छा है तुम जरूर जाओ। Weather इतना खराब होने के बावजूद भी माधुरी जी अपनी बीमार मां को छोड़कर के आपकी बेटी बचाने के लिए आपके बीच आकर के बैठी है और इसलिए मैं कहता हूं एक commitment चाहिए, एक जिम्‍मेवारी का एहसास चाहिए और यह एक सामूहिक जिम्‍मेवारी में साथ है। गांव, पंचायत, परिवार, समाज के लोग इन सबको दायित्‍व निभाना पड़ेगा और तभी जाकर के हम इस असंतुलन को मिटा सकेंगे। यह रातों-रात मिटने वाला नहीं है। करीब-करीब 50 साल से यह पाप चला है। आने वाले 100 साल तक हमें जागरूक रूप से प्रयास करना पड़ेगा, तब जाकर के शायद स्थिति को हम सुधार पाएंगे। और इसलिए मैंने कहा आज का जो यह पानीपत की धरती पर हम संकल्‍प कर रहे हैं, यह संकल्‍प आने वाली सदियों तक पीढि़यों की भलाई करने के लिए है।

भाईयों बहनों आज यहां भारत सरकार की और योजना का भी प्रांरभ हुआ है – सुकुन्‍या समृद्धि योजना। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं। इसको निरंतर बल देना है और इसलिए उसके लिए सामाजिक सुरक्षा भी चाहिए। यह सुकुन्‍या समृद्धि योजना के तहत 10 साल से कम उम्र की बेटी एक हजार रुपये से लेकर के डेढ़ रुपये लाख तक उसके मां-बाप पैसे बैंक में जमा कर सकते है और सरकार की तरफ से हिंदुस्‍तान में किसी भी प्रकार की परंपरा में ब्‍याज दिया जाता है उससे ज्‍यादा ब्‍याज इस बेटी को दिया जाएगा। उसका कभी Income Tax नहीं लगाया जाएगा और बेटी जब 21 साल की होगी, पढ़ाई पूरी होगी या शादी करने जाती होगी तो यह पैसा पूरा का पूरा उसके हाथ में आएगा और वो कभी मां-बाप के लिए बोझ महसूस नहीं होगी।

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काशी के लोगों ने मुझे अपना MP बनाया है। वहां एक जयापुर पर गांव है। जयापुर गांव ने मुझे गोद लिया है और वो जयापुर गांव मेरी रखवाली करता है, मेरी चिंता करता है। जयपुर में गया था मैंने उनको कहा था कि हमारे गावं में जब बेटी पैदा हो तो पूरे गांव का एक बड़ा महोत्‍सव होना चाहिए। आनंद उत्‍सव होना चाहिए और मैंने प्रार्थना की थी कि बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ बोने चाहिए। मुझे बाद में चिट्ठी आई। मेरे आने के एक-आध महीने बाद कोई एक बेटी जन्‍म का समाचार आया तो पूरे गांव ने उत्‍सव मनाया और उतना ही नहीं सब लोगों ने जाकर के पाँच पेड़ लगाए। मैं आपको भी कहता हूं। आपकी बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ लगाएंगे बेटी भी बड़ी होगी, पेड़ भी बड़ा होगा और जब शादी का समय आएगा वो पाँच पेड़ बेच दोगे न तो भी उसकी शादी का खर्चा यूं ही निकल जाएगा।

भाईयों बहनों बड़ी सरलता से समझदारी के साथ इस काम को हमने आगे बढ़ाना है और इसलिए आज मैं हरियाणा की धरती, जहां यह सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन हिंदुस्‍तान का कोई राज्‍य बाकी नहीं है कि जहां चुनौती नहीं है। और मैं जानता हूं यह दयानंद सरस्‍वती के संस्‍कारों से पली धरती है। एक बार हरियाणा के लोग ठान लें तो वे दुनिया को खड़ी करने की ताकत रखते हैं। मुझको बड़ा बनाने में हरियाणा का भी बहुत बड़ा role है। मैं सालों तक आपके बीच रहा हूं। आपके प्‍यार को भली-भांति में अनुभव करता हूं। आपने मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। मैं आज आपसे कुछ मांगने के लिए आया हूं। देश का प्रधानमंत्री एक भिक्षुक बनकर आपसे बेटियों की जिंदगी की भीख मांग रहा है। बेटियों को अपने परिवार का गर्व मानें, राष्‍ट्र का सम्‍मान मानें। आप देखिए यह असंतुलन में से हम बहुत तेजी से बाहर आ सकते हैं। बेटा और बेटी दोनों वो पंख है जीवन की ऊंचाईयों को पाने का उसके बिना कोई संभावना नहीं और इसलिए ऊंची उड़ान भी भरनी है तो सपनों को बेटे और बेटी दोनों पंख चाहिए तभी तो सपने पूरे होंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों हम एक जिम्‍मेवारी के साथ इस काम को निभाएं।

मुझे बताया गया है कि हम सबको शपथ लेना है। आप जहां बैठे है वहीं बैठे रहिये, दोनों हाथ ऊपर कर दीजिए और मैं एक शपथ बोलता हूं मेरे साथ आप शपथ बोलेंगे – “मैं शपथ लेता हूं कि मैं लिंग चयन एवं कन्‍या भ्रूण हत्‍या का ‍विरोध करूगा; मैं बेटी के जन्‍म पर खुश होकर सुरक्षित वातारवण प्रदान करते हुए बेटी को सुशिक्षित करूंगा। मैं समाज में बेटी के प्रति भेदभाव खत्‍म करूंगा, मैं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं” का संदेश पूरे समाज में प्रसारित करूंगा।“

भाई बहनों मैं डॉक्‍टरों से भी एक बात करना चाहता हूं। मैं डॉक्‍टरों से पूछना चाहता हूं कि पैसे कमाने के लिए यही जगह बची है क्‍या? और यह पाप के पैसे आपको सुखी करेंगे क्‍या? अगर डॉक्‍टर का बेटा कुंवारा रह गया तो आगे चलकर के शैतान बन गया तो वो डॉक्‍टर के पैसे किस काम आएंगे? मैं डॉक्‍टरों को पूछना चाहता हूं कि यह आपको दायित्‍व नहीं है कि आप इस पाप में भागीदार नहीं बनेंगे। डॉक्‍टरों को अच्‍छा लगे, बुरा लगे, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आपकी यह जिम्‍मेवारी है। आपको डॉक्‍टर बनाया है समाज ने, आपको पढ़-लिखकर के तैयार किया है। गरीब के पैसों से पलकर के बड़े हुए हो। आपको पढ़ाया गया है किसी की जिंदगी बचाने के लिए, आपको पढ़ाया गया है किसी की पीड़ा को मुक्‍त करने के लिए। आपको बच्चियों को मारने के लिए शिक्षा नहीं दी गई है। अपने आप को झकझोरिये, 50 बार सोचिए, आपके हाथ निर्दोष बेटियों के खून से रंगने नहीं चाहिए। जब शाम को खाना खाते हो तो उस थाली के सामने देखो। जिस मां ने, जिस पत्‍नी ने, जिस बहन ने वो खाना बनाया है वो भी तो किसी की बेटी है। अगर वो भी किसी डॉक्‍टर के हाथ चढ़ गई होती, तो आज आपकी थाली में खाना नहीं होता। आप भी सोचिए कहीं उस मां, बेटी, बहन ने आपके लिए जो खाना बनाया है, कहीं आपके के खून से रंगे हुए हाथ उस खाने की चपाती पर तो हाथ नहीं लगा रहे। जरा अपने आप को पूछिये मेरे डॉक्‍टर भाईयों और बहनों। यह पाप समाज द्रोह है। यह पाप सदियों की गुनाहगारी है और इसलिए एक सामाजिक दायित्‍व के तहत है, एक कर्तव्‍य के तहत और सरकारें किसकी-किसकी नहीं, यह दोषारोपण करने का वक्‍त नहीं है। हमारा काम है जहां से जग गए हैं, जाग करके सही दिशा में चलना।

मुझे विश्‍वास है पूरा देश इस संदेश को समझेगा। हम सब मिलकर के देश को भविष्‍य के संकट से बचाएंगे और फिर एक बार मैं हरियाणा को इतने बड़े विशाल कार्यक्रम के लिए और हरियाणा इस संदेश को उठा लेगा तो हिंदुस्‍तान तो हरियाणा के पीछे चल पड़ेगा। मैं फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद करता हूं।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ इस संकल्‍प को लेकर हम जाएंगे। इसी अपेक्षा के साथ मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए – भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

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माझ्या प्रिय देशवासीयांनो, नमस्कार

‘मन की बात’ मध्ये पुन्हा एकदा तुमच्याशी संवाद साधताना मला अतिशय आनंद होत आहे. देशाच्या वेगवेगळ्या भागांत आपल्या देशातले लोक देशहितासाठी, समाजहितासाठी अशा काही अद्भूत गोष्टी करत आहेत की, जेव्हा त्यांच्याबद्दल आपण ऐकतो तेव्हा आपल्याला एक नवीन प्रेरणा मिळते. आज कार्यक्रमाची सुरुवात मी ऍथलेटिक्समधील  देशाच्या अशाच एका कामगिरीने करणार आहे. काही दिवसांपूर्वीच झारखंडच्या रांची येथे नॅशनल सिनियर ऍथलेटिक्स फेडरेशन स्पर्धा झाली. यामध्ये देशभरातून आलेल्या जवळजवळ 800 खेळाडूंनी भाग घेतला होता. यादरम्यान चार वेगवेगळ्या क्रीडाप्रकारांमध्ये चार राष्ट्रीय विक्रम मोडीत निघाले. गुरिंदरवीर सिंह, विशाल टीके, तेजस्विन शंकर, देव मीणा आणि कुलदीप कुमार. या खेळाडूंनी वेगवेगळ्या श्रेणींमध्ये नवीन विक्रम प्रस्थापित केले. मी सर्वात आधी या सर्वांचे खूप खूप अभिनंदन करतो.

मित्रांनो,

देशभरात ज्या एका स्पर्धेची खूपच चर्चा होत आहे, ती म्हणजे – 100 meter Race, शंभर मीटरची धावण्याची शर्यत. अवघ्या दोन दिवसांत पुरुषांच्या 100 मीटर धावण्याच्या शर्यतीचा राष्ट्रीय विक्रम तीन वेळा मोडीत निघाला. ज्या दोन खेळाडूंनी ही किमया करून दाखवली आहे ते आहेत - गुरिंदरवीर सिंह आणि अनिमेष कुजूर. मी असा विचार केला की या वेळी ‘मन की बात’ मध्ये या दोन्ही खेळाडूंशी संवाद साधावा.

(दूरध्वनी)

पंतप्रधान: अनिमेष जी नमस्कार. गुरिंदरवीर तुम्हालाही नमस्कार, सत श्री अकाल.

अनिमेष, गुरिंदरवीर: नमस्कार सर, नमस्कार सर.

पंतप्रधान: वा भाऊ, तुम्ही तर खूप मोठे यश संपादन केले आहे. तुमच्या जोडीनेही मोठी कमाल केली आहे. आपण संगीतात तर जुगलबंदी पाहिली होती, पण आव्हानांमध्ये अशी जुगलबंदी आता पाहायला मिळत आहे की, एकानं आव्हान द्यावं आणि दुसऱ्यानं ते आव्हान स्वीकारावं. मग तिसऱ्यांदा पुन्हा तसंच करावं. तुमचा हा विषय खूपच रंजक राहिला आहे. ‘मन की बात’ च्या श्रोत्यांना तुमच्याबद्दल माहिती मिळावी, तुम्ही जे पराक्रम गाजवले आहेत ते त्यांना समजावेत, अशी माझी इच्छा आहे.

अनिमेष जी: नमस्ते सर, माझे नाव अनिमेष कुजूर. मी 200 मीटर आणि 400 मीटरचा नॅशनल रेकॉर्ड होल्डर( राष्ट्रीय विक्रमवीर) आहे आणि मी छत्तीसगडचा रहिवासी आहे सर. आणि सध्या मी ओदिशाकडून खेळतो. मी गेल्या वर्षी आशियायी पदक आणि जागतिक विद्यापीठ स्पर्धांमध्ये पदक मिळवलं आहे आणि  2021 मध्ये माझं शालेय शिक्षण पूर्ण झाल्यावर मी ऍथलेटिक्सला सुरुवात केली. मी सैनिक स्कूल अंबिकापूरमधून उत्तीर्ण झालो आहे, आणि मी आधी फूटबॉल खेळायचो. कोविडच्या काळात माझे आई-वडील मला थोडीफार मोकळीक द्यायचे की तू बाहेर जाऊन धाव किंवा खेळ. मग जेव्हा कोविड संपू लागला, तेव्हा माझ्या फूटबॉल संघातल्या मित्रांनी मला सांगितलं की राज्यस्तरीय स्पर्धा होणार आहे, तू जाऊन त्यात भाग घे. मी त्यात भाग घेतला आणि मला हे माहीत नव्हतं की तिथे राष्ट्रीय स्तराच्या खेळाडूंची निवड होणार आहे. मी तिथून नॅशनलसाठी निवडला गेलो आणि आज मी आंतरराष्ट्रीय स्तरावर भारताचं प्रतिनिधित्व करत आहे.

पंतप्रधान: आणि गुरिंदरवीर जी, तुम्ही काय सांगाल?

गुरिंदरवीर: नमस्ते सर, माझे नाव गुरिंदरवीर आहे आणि मी भारतीय नौदलात  पेटी ऑफिसर(Petty Officer) आहे. मी भारताचा सर्वात वेगवान धावपटू आहे आणि नुकताच मी 100 मीटरमध्ये 10.09 सेकंदांचा राष्ट्रीय विक्रम केला आहे. 10.1 सेकंदांच्या टप्प्याच्या खाली येत या वेळेपेक्षा कमी वेळेत धावणारा मी पहिला भारतीय आहे. ट्रॅकवर आणि गणवेशातही आपल्या देशाची सेवा करण्याचा मी प्रयत्न करत आहे. माझे वडील आणि आजोबा दोघेही खेळाडू होते, त्यामुळे आपल्या भारताची एक संस्कृती आहे की ज्यावेळी दिवाळी किंवा नवीन वर्षासारखा कोणताही सण असतो, तेव्हा आपण आपलं घर स्वच्छ करतो. त्या वेळी मी माझ्या वडिलांच्या ट्रॉफी  आणि पदकं स्वच्छ करायचो, हे काम मला खूप आवडायचं आणि मला खूप आनंद व्हायचा. मग जेव्हा मी एखादी ट्रॉफी स्वच्छ करायचो, तेव्हा मी विचारायचो की ही ट्रॉफी कुठे जिंकली, हे पदक कुठे जिंकलं, हा फोटो कधीचा आहे; मग ते मला त्यांची गोष्ट सांगायचे की मी या ठिकाणी खेळायला गेलो होतो, मी हे राष्ट्रीय पदक जिंकलं, मी माझ्या संघाला यामध्ये जिंकवून दिले. मग मीसुद्धा त्यांना म्हणायचो की मलाही कोणता तरी खेळ खेळायचा आहे. ते सकाळी धावायला जायचे, तेव्हा मी त्यांना सांगू लागलो की मलाही तुमच्यासोबत घेऊन जात जा. मग ते मला सोबत घेऊन जाऊ लागले आणि त्यांनी आपल्या क्रीडा कारकीर्दीत जे काही शिक्षण घेतले होते, ते मला शिकवू लागले. त्यामुळे मला त्याची आवड निर्माण होऊ लागली. मी उसेन बोल्टचा जागतिक विक्रम मोडीत निघताना पाहिला. मग अशीच एक मजेशीर गोष्ट आहे. मी एकदा टीव्ही पाहत होतो, तर माझ्या मम्मीने(आईने) टीव्ही बंद केला की, "बेटा, आता अभ्यासाची वेळ झाली आहे, तू अभ्यास कर." तेव्हा मी म्हणालो की ठीक आहे, तुम्ही मला टीव्ही पाहू देत नाही ना, एक दिवस असा येईल की तुम्ही मला टीव्हीवर शोधाल की "बघा, तो गुरिंदर धावत आहे." त्यामुळे जेव्हा माझी आई मला टीव्हीवर धावताना पाहते, तेव्हा मलाही खूप आनंद होतो.

पंतप्रधान: वाह वाह वाह! खूपच छान गोष्ट आहे तुमची.

गुरिंदर वीर: हो सर. मध्यमवर्गीय कुटुंब  आहे सर, नंतर माझे वडील, ते पण व्हॉलीबॉल खेळायचे. कौटुंबिक अडचणींमुळे त्यांनी आपले खेळ सोडून दिले. त्यांचे जे स्वप्न पूर्ण करायचे राहिले होते, ते स्वप्न त्यांनी माझ्यामध्ये पाहिले की माझा मुलगा ते स्वप्न पूर्ण करेल. मग मी त्यांच्याशी बोलायचो, तेव्हा ऐकायचो की मिल्खा सिंग इतकी मेहनत करायचे. मी त्यांना सांगायचो की मी पण एक दिवस तुमचे स्वप्न पूर्ण करेन. तेव्हा ते म्हणायचे की स्वप्न इतक्या सहज पूर्ण होत नाही, त्यासाठी खूप कठोर परिश्रम करावे लागतात. मेहनत करावी लागते. मिल्खा सिंगजी रक्ताच्या उलट्या करायचे, उन्हात धावायचे. दिवस-दिवसभर प्रशिक्षण घ्यायचे, तर त्या गोष्टी मला प्रेरित करायच्या. माझे वडील मला प्रेरित करायचे की मी धावेन तर आपल्या देशासाठी, देशासाठी मेडल आणेन, जिंकेन. आणि हे पण होते की जेव्हा मी 100 मीटर हा क्रीडाप्रकार निवडला, त्यावेळी सगळे मला सांगायचे की बाबा रे 100 मीटर नको घेऊ, 100 मीटर हा भारतीयांचा क्रीडाप्रकार नाही आहे. भारतीयांचे शरीर 100 मीटरसाठी बनलेलेच नाही आहे. तेव्हा मी आणि माझे वडील नेहमी सांगायचो की गुरिंदर, आता आपण हे निवडलेच आहे, तर आपण यातून मागे हटायचे नाही. जे आपल्याला म्हणतात की आपण हे करू शकत नाही, आपण त्यांना ते करून दाखवू. आणि तू करून दाखवशील, माझा तुझ्यावर विश्वास आहे. तर तो विश्वास, जेव्हा माझ्या वडिलांनी माझ्यावर दाखवला, तेव्हा मी त्या विश्वासाला आपली हिंमत बनवून पुढे गेलो आणि आज प्रत्येक भारतीय म्हणतो की भारतीयांनी स्प्रिंट करावी. 

पंतप्रधान: बघा, तुम्ही दोघांनी खूप मोठी कमाल केली आहे, आणि अवघ्या 2 दिवसांच्या आत तुम्ही दोघांनी 3 राष्ट्रीय विक्रम मोडले आहेत. 100 मीटर शर्यतीत धावणे, जसे गुरिंदरवीरने सांगितले की लोक म्हणतात की भारताच्या लोकांचे शरीर तर या प्रकारासाठी बनलेलेच नाही. इतके कठीण असूनही तुम्ही हे काम केले, तर मला या दोन्ही गोष्टी तुमच्याकडून जाणून घ्यायला आवडतील, आणि 'मन की बात' च्या श्रोत्यांनाही ऐकायची इच्छा असेल की ती कोणती भावना होती, कोणती जिद्द होती, काय विचार केला होता आणि तुम्ही हे कसे करत होता? हे किती कठीण असते? 

गुरिंदरवीर: जी सर, मी गुरिंदर, सर सुरुवातीला खूप संघर्ष होता, मनात बऱ्याचदा संभ्रम देखील निर्माण झाला की मी जे करत आहे ते योग्य आहे का, मी योग्य निवड केली आहे का, कारण प्रत्येक वेळी तुम्ही जिंकत नाही, कधी कधी तुम्ही शिकता. जेव्हा मी हरायचो, जेव्हा माझी कामगिरी चांगली व्हायची नाही, किंवा एखादी दुखापत व्हायची, तेव्हा माझ्या घरचे मला पाठिंबा द्यायचे की काही हरकत नाही, एक दिवस वाईट गेला किंवा एक वर्ष वाईट गेले तर त्याने आयुष्य वाया जात नाही. स्वप्ने पाहणे सोडू नये. तसच माझ्या प्रशिक्षकांनी देखील मला हे शिकवलं की जर तू हे नाही केलंस, तर दुसरं कोणीही करू शकणार नाही. अशा प्रकारे जेव्हा आपला समुदाय आणि आपल्या आसपासचे लोक आपल्याला प्रोत्साहित करतात, तेव्हा आपल्याला मिळालेली ती प्रेरणा कधीच कमी होत नाही.

पंतप्रधान : अनिमेष जी… 

अनिमेष : सर, मला तर सगळे लोक बोलायचे की जेव्हा मी 2021 मध्ये ऍथलेटिक्स सुरू केले, तेव्हा मला बोलायचे की बघ हे नवीन क्षेत्र  आहे, तू करू शकशील की नाही. तेव्हा मी म्हणालो की आता मी या क्षेत्रात उतरलो आहे तर करणारच. माझे पप्पा पण नेहमी मला बोलायचे की तू या क्षेत्रात उतरला आहेस तर कधीही मागे वळून बघू नकोस, कारण विचार तर सगळेच करतात की हे करायचे आहे, ते करायचे आहे, पण प्रत्यक्षात काही तरी करून खूप कमी लोक दाखवतात. तू फक्त या क्षेत्रात उतरला आहेस तर यावर ठाम राहा, यात पुढे वाढायचे आहे. तुला सर्व सुविधा, प्रत्येक गोष्टीत आम्ही पाठबळ देऊ; कुटुंबाचे पाठबळ, आर्थिक पाठबळ, सर्व गोष्टी आम्ही करू, बस तू मेहनत कर आणि भारताला दाखवून दे की भारतीय देखील धावू शकतात. कारण मलाही लोक बोलायचे की भारतीयांची जनुके अशी नाहीत की ते सब 10 (Sub 10) किंवा सब 10 पॉइंट1 (Sub 10.1) च्या आत धावू शकतील किंवा कोणी स्प्रिंट करू शकेल. पण आता आम्हा दोघांनी हे सिद्ध  केले आहे की भारतीय देखील हे करू शकतात. आमच्यासाठी असे काही फार अवघड नाहीये, आम्ही देखील सर्व काही करू शकतो. तर सर, या सर्व गोष्टी मला खूप प्रेरित  करतात आणि जसजसे आम्ही प्रशिक्षण घेत आहोत, आम्ही आमचे टायमिंग अजून मोडीत काढत आहोत आणि बाकी भारतीयांनाही ही गोष्ट दिसत आहे की भारतीय देखील करू शकतात आणि आम्ही आणखी चांगली कामगिरी करू सर आता. आणि आता आम्हा दोघांची निवड राष्ट्रकुल क्रीडा स्पर्धांसाठी (कॉमनवेल्थ गेम्ससाठी)  देखील झाली आहे, तर तिथे आगामी स्पर्धेत  आम्ही अजून चांगली कामगिरी करू.

पंतप्रधान: बरं, हे बघा, माझ्या मनातही एक कुतूहल आहे आणि लोकांनाही असेल. मी ऐकलं आहे की तुम्ही दोघे खूप चांगले मित्रही आहात. तुम्ही दोघांनी काही ठरवून ठेवलं होतं का की तू माझा विक्रम मोडलास तर मी तुझा विक्रम मोडेन? आधी अनिमेष, तुम्ही सांगा.

अनिमेष: सर, आधीचा 10 पूर्णांक 18 शतांशाचा जो विक्रम होता तो माझाच होता, आणि नंतर तो गुरिंदरवीर भैय्यांनी सेमीफायनलमध्ये 10 पूर्णांक 17 शंताश करून तो मोडला. मी पुन्हा दुसऱ्या सेमीफायनमध्ये 10 पूर्णांक 15 करून तो विक्रम मोडीत काढला. मग त्या वेळी जेव्हा माझी सेमीफायनल झाली, तेव्हा आम्ही दोघेही खूप खूष होतो की, हा बुवा ठीक आहे, आज विक्रम मोडीत निघाला आणि चला आपण दोघांनी मिळून तोडला असं. कारण त्या वेळी स्पर्धेत एकमेकांसोबत एक प्रतिस्पर्धा तर असतेच, पण आम्ही आधीपासूनच हे ठरवून ठेवलं होतं. यापूर्वी आम्ही सौदी अरेबियालाही स्पर्धेसाठी गेलो होतो, तिथेही आम्ही दोघे रूममेट्स  होतो. तिथेही आम्ही दोघे बोलायचो की भारताच्या स्प्रिंटिंगला पुढे घेऊन जायचं आहे आणि ती गोष्ट आमच्याच हातात आहे, आम्ही जे करू तेच इतरांना प्रेरित  करेल.


पंतप्रधान: गुरिंदरवीर तुम्ही काय सांगाल ?

गुरिंदरवीर : आम्ही दोघांनी ठरवलं होतं की आम्ही दोघे चांगलं धावू. सर, कधीही एकमेकांना गरज भासली तर आम्ही एकमेकांच्या पाठीशी उभे राहतो. जसं की आता विक्रम करण्यापूर्वी, जेव्हा मी विक्रम केला आणि नंतर अनिमेषने केला, तेव्हा आम्ही जेव्हा वॉर्म-अप करत होतो, तेव्हा मी अनिमेषला सांगत होतो की, 'अनिमेष, तो ब्लॉक  योग्य आहे, तिथे जाऊन बस, तिथे स्ट्राईड करून घे, आपण वॉर्म-अप इथे करू, इथे वॉर्म-अप चांगलं होईल.' आम्ही एकमेकांना मदत करतो. एकमेकांना मदत केली की समोरचाही कामगिरीत सुधारणा करतो आणि आपणही प्रगती करतो. मैत्रीही हवी, पण सर, जोपर्यंत आम्ही मैदानाच्या बाहेर आहोत, स्पर्धेच्या बाहेर आहोत, तोपर्यंत आम्ही मित्र आहोत. जेव्हा आम्ही मैदानात जातो, तेव्हा आम्ही एकमेकांचे प्रतिस्पर्धी बनतो. मग मनात हे असतं की मी याच्यापेक्षा वेगात धावेन, मी याच्यापेक्षा वेगाने धावेन. 

पंतप्रधान: हे बघा, तुम्ही लोकांनी जी स्पर्धा केली आहे ना, ती देशाचा मान वाढवण्यासाठी केली आहे. देशाला भविष्यात या स्थानावर पोहोचवण्यासाठी केली आहे आणि एका सकारात्मक भावनेने  केली आहे. मला असं वाटतं की तुमची ही जी खिलाडूवृत्ती आहे—खेळायचंही आहे, एकमेकांना आव्हानही द्यायचं आहे, मग पुढे जाण्यासाठी प्रयत्न करायचा आहे आणि पुन्हा पुढे जाण्यासाठी एकमेकांना मदत करायची आहे—हे अद्भुत काम तुम्ही लोकांनी केलं आहे. माझ्याकडून तुम्हा दोघांचं खूप खूप अभिनंदन आणि खूप खूप शुभेच्छा! तुम्ही देशाचं नाव नक्कीच उज्ज्वल कराल, याचा मला पूर्ण विश्वास आहे. तुम्ही अशीच मेहनत करत राहा, खूप प्रगती होईल. माझ्या खूप खूप शुभेच्छा.

गुरिंदरवीर / अनिमेष: आभारी आहे सर, तुमचे खूप खूप धन्यवाद.

पंतप्रधान: खूप खूप धन्यवाद.

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प्रिय देशवासियांनो, 
सध्या देशातल्या बहुतांश भागात उष्णता वाढली आहे. कडक ऊन, गरम हवा, अशा वातावरणात स्वत:ची काळजी घेणं महत्त्वाचं आहे. सतत पाणी पीत रहा. ऊन्हात बाहेर पडणं गरजेचंच असेल, तर काळजी घेऊन बाहेर पडा. या संदर्भात सरकारच्या विवध विभागांनी जारी केलेल्या मार्गदर्शक सुचनांचं  पालन करा. ते विसरू नका. 

मित्रांनो,

आपल्या देशात उष्णतेशी लढण्याचा उपाय बहुतेकवेळा आपल्या स्वयंपाकघरातही सापडतो. जसजशी उष्णता वाढत जाते,तसतशी स्वयंपाकघरातली चव आणि जेवणाचे प्रकारही बदलत जातात. काही ठिकाणी माठातलं पाणी पिण्याचं प्रमाण वाढते, तर काही ठिकाणी दह्याच्या सेवनाकडे कल वाढतो. काही ठिकाणी कच्च्या कैऱ्या उकळल्या जातात आणि देशी पेय तयार केली जातात. देशी पेय सर्वांनाच परिचित आहेत. जर तुम्ही उत्तर भारतात गेलात तर कच्च्या कैऱ्यांपासून तयार केलेल्या पन्ह्यांचा स्वाद चाखता येईल. उष्णतेपासून आराम आणि कच्च्या कैऱ्यांचा स्वादही.पंजाब मध्ये गेलात तर, मोठ्या ग्लासातून दिली जाणारी मधूर लस्सी, आणि गुजरात, राजस्थान मध्ये गेलात, तर थंडगार ताक प्रत्येक जेवणाचे सोबती ठरतो. आणि इतकेच नाही तर, बिहार, झारखंड आणि पूर्व उत्तर प्रदेशातील सातुच्या पिठापासून तयार केलेलं सरबत, तर पोटभरण्याचे आणि ऊर्जा देणारे मुख्य स्रोत आहे. कोकण आणि गोव्यात मिळणारे स्वादीष्ट कोकम सरबत आणि सोलकढी. दक्षिण भारतातले प्रसिद्ध पानकम, नीर मोर, संबारम आणि ओडिशामधले बेलपना ही केवळ पेये नाहीत, तर ती भारताच्या विविध प्रदेशांच्या परंपरांचा एक एक अविभाज्य भाग आहेत. आणि त्यातून 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' ही भावनाही प्रतिबिंबित होते. आणि यामध्येच एक भारत श्रेष्ठ भारताच्या भावना प्रतिबिंबित होतात. आणि एक गोष्ट लक्षात ठेवा, यातल्या बहुतांश वस्तू आपल्या घरात आणि शेतातूनच येतात. कसलाच गाजावाजा नाही, पण पिढ्यांपिढ्याचा अनुभव त्यात एकवटलेला आहे. आपणही उन्हाळ्यात घरगुती पेयांचा मोठ्या प्रमाणात आनंद लुटा. 

मित्रांनो, 
उन्हाळा सुरू झाला की प्रत्येक घरात चर्चेचा एक नवीन विषय सुरू होतो आणि तो म्हणजे आंबा. आंबा हा एक सर्वसामान्य चर्चेचा विषय आहे, भारतात असे क्वचितच एखादे घर असेल, जिथे उन्हाळ्यात आंब्यावर चर्चा होत नाही. प्रत्येक प्रदेशाचा स्वतःचा आंबा, त्याची स्वतःची चव, त्याचा स्वतःचा सुगंध असतो. महाराष्ट्र आणि कोकणचा हापूस, अल्फान्सो, गुजरातचा केसर, हा तर आमरसचा जीव आहे, उत्तर प्रदेशचा दशहरी आणि माझ्या काशीचा लंगडा. तसे, लंगडा आंब्यामध्ये एक विशेष गोष्ट आहे - पिकल्यानंतरही त्याचा रंग अनेकदा हिरवाच राहतो. बिहारचा जर्दाळू, अगदी लांबूनच त्याच्या सुगंधामुळे तो ओळखता येतो. चौसा, मालदा प्रत्येक नावानेच लोकांच्या आठवणी जोडलेल्या आहेत. दक्षिण भारतात गेलात तर बंगनपल्ली, तोतापुरी, नीलम, मलगोवा, बंगालचा हिमसागर, ओदिशा आणि आंध्र प्रदेशचा सुवर्णरेखा, म्हणजेचा प्रदेशानुरुप त्याचं नाव, स्वरुप, रंग आणि चव बदलते. आणि मित्रांनो आंब्याचा हा प्रवास आता गावाखेड्यातून जागतिक बाजारात पोहोचला आहे. आज मन की बातच्या माध्यमातून आंब्याचे उत्पादन करणाऱ्या माझ्या शेतकरी बंधू – भगिनिंची प्रशंसा करणार. देशाच्या कृषी अर्थव्यवस्थेसाठी तुम्ही सर्वसाधारण नाही, तर विशेष आहात.

मित्रांनो, उन्हाळ्याच्या दिवसांमध्ये शाळांना सहसा सुट्टी असते, पण मी तुम्हाला अशा एका वर्गाबद्दल सांगणार आहे, ज्यात तुम्हाला प्रवेश घ्यायला नक्कीच आवडेल. मित्रांनो, अशा एका शाळेची कल्पना करा जिथे लहान मुले, तरुण आणि वृद्ध एकत्र शिकतात, जिथे कोणतेही शुल्क नाही, मोठ्या इमारती नाहीत, वर्गखोल्या नाहीत आणि सर्वात मनोरंजक गोष्ट म्हणजे, वर्ग चक्क नदीत भरतात.

मित्रांनो, 

ही केवळ एक गोष्ट नाही. हा एक प्रामाणिक प्रयत्न आहे. केरळमधील अलुवा येथे साजी वलाशेरिल असाच एक जलतरण क्लब चालवतात. आतापर्यंत येथे 15 हजारांहून अधिक लोक पोहायला शिकले आहेत. साजींनी दिव्यांग मुलांनाही पोहायला शिकवले आहे. या प्रयत्नांमागे एक खोल दुःख दडलेले आहे. काही वर्षांपूर्वी, एका बोटीच्या अपघातात अनेक विद्यार्थ्यांचा मृत्यू झाला. त्या घटनेने साजींना आतून हादरवून सोडले. त्यांना वाटले की, जर मुलांना पोहायला आले असते, तर कदाचित अनेक जीव वाचवता आले असते—आणि येथूनच त्यांच्या मोहिमेची सुरुवात झाली.

मित्रांनो, 

लोकांची सेवा करण्यासाठी प्रचंड संसाधनांची गरज नसते—त्यासाठी फक्त एक चांगला हेतू आणि सातत्यपूर्ण प्रयत्न पुरेसे असतात. या गोष्टींनी हजारो लोकांचे जीवन बदलता येते. साजी वलाशेरील यांचे जीवन आपल्याला हा मोठा धडा शिकवते.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो, 

अलीकडेच मला युरोपमधल्या नेदरलँड्सला भेट देण्याची संधी मिळाली. मी तिथे अनेक बैठकींना उपस्थित राहिलो. यादरम्यान एक असा क्षण आला, ज्याने प्रत्येक भारतीयाला अभिमानाने भारून टाकले. नेदरलँड्समध्ये आयोजित एका विशेष समारंभात, चोला काळातील प्राचीन ताम्रपट भारताला परत करण्यात आले. त्या कार्यक्रमात नेदरलँड्सचे पंतप्रधानही उपस्थित होते. मला या ताम्रपटांविषयी भारत आणि परदेशातून सतत संदेश येत आहेत. लोक आनंद आणि अभिमान व्यक्त करत आहेत. जगभरातल्या तमिळ समाजातही याबद्दल विशेष उत्साह आहे.

मित्रांनो, 

या ताम्रपटांबद्दल बरीच उत्सुकता आहे. म्हणून आज मी तुम्हाला त्याबद्दल काही माहिती देऊ इच्छितो. यामध्ये २१ मोठे आणि तीन छोटे ताम्रपट समाविष्ट आहेत. ते प्रामुख्याने राजा राजेंद्र चोल प्रथम यांनी त्यांचे वडील, राजा राजाराजा चोल यांनी दिलेले वचन पूर्ण करण्याशी संबंधित आहेत. त्यांमध्ये आनाईमंगलम गाव एका बौद्ध मठाला दान केल्याचा उल्लेख आहे.

चोल साम्राज्याच्या समृद्ध इतिहासाचा आणि संस्कृतीचा आम्हा सर्वांना खूप अभिमान आहे. मित्रांनो, आमचे सरकार भारताच्या या अमूल्य वारसा स्थळांचे जतन करण्यासाठी सातत्याने प्रयत्न करत आहे. याच संदर्भात, 'ज्ञान भारतम अभियाना'अंतर्गत छत्तीसगडमधील मल्हार इथे एक महत्त्वाचा शोध लागला आहे. इथे तीन दुर्मिळ ताम्रपट सापडले आहेत. हे शिलालेख पांडुवंशी राजवंशातील महर्षी बालार्जुन यांच्या कारकिर्दीतील असल्याचे मानले जाते. तज्ञांच्या मते हे शिलालेख सहाव्या आणि सातव्या शतकातील आहेत, म्हणजेच चौदाशे ते पंधराशे वर्षे जुने असलेले हे ताम्रपट प्राचीन ब्राह्मी लिपी आणि पाली भाषेत लिहिलेले आहेत. त्यांतून त्या काळातले शासन, धर्म आणि संस्कृतीबद्दल महत्त्वाची माहिती मिळते.

मित्रांनो,
 
आम्हा भारतीयांना खगोलशास्त्राबद्दल नेहमीच एक विशेष आकर्षण राहिले आहे. आपल्या देशात अनेक शतकं जुन्या वेधशाळा आजही अस्तित्वात आहेत. इथे आश्चर्यकारक गणितीय शोध लागले आहेत. नौकानयन असो, पंचांग असो किंवा आपले सण असोत, या सर्वांचा संबंध आकाश आणि ताऱ्यांशी राहिला आहे. इथे खगोलशास्त्राने प्रत्येक पिढीमध्ये कुतूहल निर्माण केले आहे. त्याने संशोधनाला प्रेरणा दिली आहे आणि आजची तरुण पिढीसुद्धा त्याबद्दल प्रचंड उत्साह दाखवते. तुमच्या लक्षात आलंच असेल की आजकाल देशभरात खगोलशास्त्र क्लब अधिकाधिक लोकप्रिय होत आहेत. त्यांचे उपक्रम मोठ्या शहरांपासून ते लहान गावांपर्यंत, शाळांपासून ते उद्यानांपर्यंत सर्वत्र दिसतात. मला बंगळूरु खगोलशास्त्रीय संस्थेबद्दल माहिती मिळाली, जिथे निरीक्षण सत्रे आयोजित केली जातात. या संस्थेने ग्रामीण भागात खगोलशास्त्र लोकप्रिय करण्यासाठी एक मोहीमही सुरू केली आहे. ‘खगोल मंडळ' नावाच्या एका चमूने एक अतिशय नाविन्यपूर्ण 30 तासांचा अभ्यासक्रम सुरू केला आहे.

मित्रांनो, रात्री ताऱ्यांचे दर्शन घेणे हा स्वतःच एक अद्भुत अनुभव आहे. 'ॲस्ट्रो केरळ' नावाची एक संस्था रात्रीच्या निरीक्षणासाठी शिबिरे आणि कार्यशाळा आयोजित करते. तिथे तरुण मुले दुर्बिणी बनवायला आणि ताऱ्यांचे नकाशे वापरायला शिकतात. राजकोटच्या 'बिग बँग ॲस्ट्रॉनॉमी क्लब'ने गीरच्या जंगलांपासून ते कच्छच्या रणापर्यंत अनेक खगोलशास्त्रीय कार्यक्रमांचे आयोजन केले आहे. ज्योतिर्विद्या परिसंघ ही खगोलशास्त्राच्या सर्वात जुन्या संस्थांपैकी एक आहे. इथे निरीक्षणाच्या सुविधा, तसेच एक ग्रंथालय आणि एक दुर्बिण ग्रंथालय उपलब्ध आहे. मला आयझॅकचाही उल्लेख करायचा आहे. हे विद्यार्थ्यांच्या नेतृत्वाखालील एक देशव्यापी नेटवर्क आहे, जे खगोलशास्त्र आणि खगोलभौतिकशास्त्र क्लबना जोडते.

मित्रांनो, 

आपला  छंद जोपासण्यासाठी वेळ काढणे आणि सतत काहीतरी नवीन शिकणे अत्यंत महत्त्वाचे आहे. मी तरुणांना आग्रह करतो की, त्यांनी या सुट्ट्यांमध्ये खगोलशास्त्र क्लबमध्ये सामील व्हावे आणि तारांगणाला भेट द्यावी.


मित्रांनो, 

टीव्हीवर 'मन की बात' कार्यक्रम पाहणाऱ्यांना मी सांगू इच्छितो की, तुम्ही हा व्हिडिओ नक्की पाहा. हल्ली या व्हिडिओची खूप चर्चा होत आहे. यामध्ये काही लोक मोठ्या संयमाने आणि काळजीपूर्वक गंगेतल्या एका डॉल्फिनला वाचवण्याचा प्रयत्न करत आहेत. तुम्हाला हे जाणून आश्चर्य वाटेल की, या संपूर्ण प्रयत्नाला अंदाजे 13 तास लागले आणि अखेरीस त्या डॉल्फिनला वाचवण्यात आले.
          

मित्रांनो, यात भारताच्या पहिल्या गंगा डॉल्फिन बचाव रुग्णवाहिकेने महत्त्वाची भूमिका बजावली. ही घटना उत्तर प्रदेशात घडली. तिथल्या एका कालव्यात एक गंगा डॉल्फिन अडकला होता. त्यावेळी, 'नमामि गंगे अभियान' अंतर्गत तयार करण्यात आलेल्या या रुग्णवाहिकेने त्याला आशेचा किरण म्हणून घरी आणले. त्यानंतर त्याची काळजीपूर्वक सुटका करण्यात आली. त्याची तपासणी करून, त्याच्यावर उपचार करण्यात आले आणि मग त्याला सुरक्षितपणे राप्ती नदीत सोडण्यात आले. एक प्रकारे, एक जीव घरी परतला.
       
मित्रांनो, 

ही डॉल्फिन बचाव रुग्णवाहिका खूप खास आहे. तिची रचना एका फिरत्या रुग्णालयाप्रमाणे करण्यात आली आहे. यामध्ये डॉल्फिनना सुरक्षित ठेवण्याची व्यवस्था आहे. यामध्ये ऑक्सिजनची सोय, विशेष स्ट्रेचर्स आणि बचाव साहित्य आहे. याचा अर्थ असा की, जर एखादा डॉल्फिन जखमी झाला, कालव्यात अडकला किंवा नदीपासून दुरावला, तर त्याला तात्काळ मदत केली जाऊ शकते.

मित्रांनो, 
जेव्हा आपण गंगा डॉल्फिनला वाचवतो, तेव्हा आपण केवळ एक प्रजातीच वाचवत नाही, तर आपण गंगेची जैवविविधता वाचवतो. आपण नदीची संपूर्ण जीवनप्रणाली वाचवतो आणि त्याचबरोबर आपल्या भावी पिढ्यांसाठी निसर्गाचा एक अमूल्य वारसाही वाचवतो.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो, 

तुमच्यापैकी अनेकांच्या आठवणी नदी, तलाव किंवा विहिरीच्या पाण्याशी निगडित असतील. काहींना तलावात पोहल्याचं आठवत असेल, काहींना तलावाच्या काठावर मित्रांसोबत खेळल्याचं आठवत असेल, तर काहींना त्या चिखलाचा वास आठवत असेल. अशा बालपणीच्या आठवणी आयुष्यभर मनात राहतात.

मित्रांनो, 

उत्तर प्रदेशातील बस्ती जिल्ह्यातून अशा आठवणी जपण्याची एक प्रेरणादायी कहाणी समोर आली आहे. बस्ती इथल्या आकाश गुप्ता यांना आपल्या गावातील मनोरमा नदी पाहून खूप वाईट वाटायचे. कारण जी नदी त्यांनी लहानपणी स्वच्छ आणि जिवंत पाहिली होती, त्याच नदीत काळाच्या ओघात प्लास्टिक जमा होऊ लागले होते. घाण वाढत होती. श्री. आकाश यांनी ठरवले की ते तक्रार करणार नाहीत, तर एक नवी सुरुवात करतील. तक्रार नाही, सुरुवात हाच त्याच मूलमंत्र बनला. त्याने आपल्या मित्रांना एकत्र केले. त्यांच्याकडे फक्त एक जाळी, एक फावडे, एक टोपली आणि सर्वात मोठी शक्ती होती - काहीतरी बदल घडवण्याचा दृढनिश्चय. हे तरुण नदीत उतरून जलपर्णी, प्लास्टिक आणि कचरा बाहेर काढत असत. कधीकधी, एका दिवसात नदीतून 50-60 किलो कचरा काढला जात असे. हळूहळू, मनोरमा नदीचा तो भाग पुन्हा स्वच्छ दिसू लागला. या कामाने आजूबाजूच्या लोकांचेही लक्ष वेधून घेतले. लोकांमध्ये स्वच्छतेबद्दलची जागरूकता वाढली.

मित्रांनो, 
अशीच एक प्रेरणादायी कहाणी गोव्यातून समोर आली आहे. गोव्याचे बाळकृष्ण अय्याजी हे एक सेवानिवृत्त शिक्षक आहेत. पण समाजसेवेबद्दलचा त्यांचा उत्साह आजही तसाच आहे. मड्डी-तोलाप भागातील पाण्याच्या समस्येमुळे ते खूप व्यथित झाले होते. त्यांनीही यावर तोडगा काढण्यासाठी काम सुरू केले. पाईपलाईन टाकण्यात बाळकृष्णजींनी महत्त्वाची भूमिका बजावली. यामुळे अनेक घरांना पाणी मिळाले. पाण्यासाठी रोज संघर्ष करणाऱ्या कुटुंबांसाठी हा एक मोठा दिलासा होता.

मित्रांनो, 

गेल्या महिन्यात मला एक अद्भुत अनुभव आला. त्याचा संबंध 'मन की बात' बरोबर सुद्धा आहे. म्हणूनच आज मी तुमच्याशी त्याबद्दल बोलणार आहे. मी तामिळनाडूतल्या नागरकोविलमध्ये एका शिक्षिकेला भेटलो. मी त्यांना जवळपास तीन दशकांपूर्वी भेटलो होतो. मी गिरिजा अम्मा यांच्याबद्दल बोलत आहे. या भेटीदरम्यान त्यांच्यासोबत काही तरुण विद्यार्थीसुद्धा होते.

मित्रांनो, 

गिरिजा अम्मा सुमारे 15 शाळा चालवतात. यापैकी चेन्नईमधले जयगोपाल गारोडिया हिंदू विद्यालय विशेष उल्लेखनीय आहे. त्यांची देशभक्तीची भावना प्रत्येक भारतीयाला प्रेरणा देते. 'मन की बात' पासून प्रेरित होऊन, त्यांनी देशाच्या अनेक सैनिकांसाठी योगदान देण्याची प्रतिज्ञा केली. यासाठी त्यांनी आपल्या सर्व शाळांमधील विद्यार्थ्यांना प्रेरित केलं. त्यांनी मुलांना शूर सैनिकांसाठी दररोज एक रुपया योगदान देण्यास सांगितलं. याचा अर्थ असा की, एका वर्षात प्रत्येक विद्यार्थ्याकडून 365 रुपये जमा झाले. या छोट्या योगदानांमधून अंदाजे 40 लाख रुपये जमा झाले. गिरिजा अम्मा यांनी मला संपूर्ण रकमेचा चेक सुपूर्द केला. त्यांच्याशी बोलताना मला भारतमातेप्रती असलेल्या त्यांच्या समर्पणाची खोली जाणवली. गेल्याच वर्षी, चेन्नईच्या पहिल्या हिंदू शाळेने 50 वर्षे पूर्ण केली. देशाचा शिक्षण आणि सांस्कृतिक अभिमान वाढवण्यात या शाळांच्या शाखांची भूमिका प्रशंसनीय आहे. मी यात सहभागी असलेल्या सर्वांचे अभिनंदन करतो आणि विशेषतः आपल्या शूर सैनिकांसाठी योगदान देणाऱ्या विद्यार्थ्यांचे कौतुक करतो.

मित्रांनो, 
भारतातील प्रत्येक गावात आणि शहरात असे काही घडत आहे जे आपल्याला प्रेरणा देते. अनेकदा या प्रयत्नांची फारशी चर्चा होत नाही, पण जेव्हा आपल्याला त्यांची जाणीव होते, तेव्हा आपला हा विश्वास अधिक दृढ होतो, की देश आपल्या लोकांच्या सामर्थ्याने पुढे जात आहे. मी तुम्हाला आवाहन करतो की, तुम्ही तुमच्या आजूबाजूला असे प्रयत्न नक्की शोधा. जे समाजासाठी चांगलं काम करत आहेत, त्यांना ओळखा, त्यांचं कौतुक करा, त्यांच्याकडून शिका आणि शक्य असल्यास, तुम्हीही काही चांगल्या कामात सहभागी व्हा. पुढच्या महिन्यात 'मन की बात' मध्ये मी आणखी काही प्रेरणादायी कथा घेऊन पुन्हा तुमच्या भेटीला येईन. खूप खूप धन्यवाद. नमस्कार.