We must not discriminate between sons and daughters: PM Modi

Published By : Admin | January 22, 2015 | 16:04 IST
PM Modi launches Beti Bachao, Beti Padhao programme in Haryana
We need to end discrimination between sons and daughters, urges PM Modi
Medical education is for the purpose of saving lives, and not killing daughters: PM
Girls today doing well in sports, in education and health sectors, they have a significant contribution even in agriculture: PM
Celebrate the birth of a girl child by planting trees: PM Modi
PM Modi launches Sukanya Samriddhi Account for the benefit of girl child

विशाल संख्‍या में आए हुए माताओं, बहनों और भाईयों,

आज पानीपत की धरती पर हम एक बहुत बड़ी जिम्‍मेवारी की और कदम रख रहे हैं। यह अवसर किस सरकार ने क्‍या किया और क्‍या नहीं किया? इसका लेखा-जोखा करने के लिए नहीं है। गलती किसकी थी, गुनाह किसका था? यह आरोप-प्रत्यारोप का वक्‍त नहीं है। पानीपत की धरती पर यह अवसर हमारी जिम्‍मेवारियों का एहसास कराने के लिए है। सरकार हो, समाज हो, गांव हो, परिवार हो, मां-बाप हो हर किसी की एक सामूहिक जिम्‍मेवारी है और जब तक एक समाज के रूप में हम इस समस्‍या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे, तो हम अपना ही नुकसान करेंगे ऐसा नहीं है बल्कि हम आने वाली सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक भंयकर संकट को निमंत्रण दे रहे हैं और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों और मैं इस बात के लिए मेनका जी और उनके विभाग का आभारी हूं कि उन्‍होंने इस काम के लिए हरियाणा को पसंद किया। मैं मुख्‍यमंत्री जी का भी अभिनंदन करता हूं कि इस संकट को इन्‍होंने चुनौती को स्‍वीकार किया। लेकिन यह कार्यक्रम भले पानीपत की धरती पर होता हो, यह कार्यक्रम भले हरियाणा में होता हो, लेकिन यह संदेश हिंदुस्‍तान के हर परिवार के लिए है, हर गांव के लिए है, हर राज्‍य के लिए है।

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क्‍या कभी हमने कल्‍पना की है जिस प्रकार की समाज के अवस्‍था हम बना रहे हैं अगर यही चलता रहा तो आने वाले दिनों में हाल क्‍या होगा? आज भी हमारे देश में एक हजार बालक पैदा हो, तो उसके सामने एक हजार बालिकाएं भी पैदा होनी चाहिए। वरना संसार चक्र नहीं चल सकता। आज पूरे देश में यह चिंता का विषय है। यही आपके हरियाणा में झज्जर जिला देख लीजिए, महेंद्रगढ़ जिला देख लीजिए। एक हजार बालक के सामने पौने आठ सौ बच्चियां हैं। हजार में करीब-करीब सवा दौ सौ बच्‍चे कुंवारे रहने वाले हैं। मैं जरा माताओं से पूछ रहा हूं अगर बेटी पैदा नहीं होगी, तो बहू कहां से लाओगे? और इसलिए जो हम चाहते हैं वो समाज भी तो चाहता है। हम यह तो चाहते है कि बहू तो हमें पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटी को पढ़ाना है तो पास बार सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह अन्‍याय कब तक चलेगा, यह हमारी सोच में यह दोगलापन कब तक चलेगा? अगर बहू पढ़ी-लिखी चाहते हैं तो बेटी को भी पढ़ाना यह हमारी जिम्‍मेवारी बनता है। अगर हम बेटी को नहीं पढ़ाऐंगे, तो बहू भी पढ़ी-लिखी मिले। यह अपेक्षा करना अपने साथ बहुत बड़ा अन्याय है। और इसलिए भाईयों और बहनों, मैं आज आपके बीच एक बहुत बड़ी पीड़ा लेकर आया हूँ। एक दर्द लेकर आया हूँ। क्‍या कभी कल्‍पना की हमने जिस धरती पर मानवता का संदेश होता है, उसी धरती पर मां के गर्भ में बच्‍ची को मौत के घाट उतार दिया जाए।

यह पानीपत की धरती, यह उर्दू साहित्‍य के scholar अलताफ हुसैन हाली की धरती है। यह अलताफ हुसैन हाली इसी पानीपत की धरती से इस शायर ने कहा था। मैं समझता हूं जिस हरियाणा में अलताफ हुसैन जैसे शायर के शब्‍द हो, उस हरियाणा में आज बेटियों का यह हाल देखकर के मन में पीड़ा होती है। हाली ने कहा था....उन्‍होंने कहा था ए मांओ, बहनों बेटियां दुनिया की जन्नत तुमसे हैं, मुल्‍कों की बस्‍ती हो तुम, गांवों की इज्‍जत तुम से हो। आप कल्‍पना कर सकते हैं बेटियों के लिए कितनी ऊंची कल्‍पना यह पानीपत का शायर करता है और हम बेटियों को जन्‍म देने के लिए भी तैयार नही हैं।

भाईयों और बहनों हमारे यहां सदियों से जब बेटी का जन्‍म होता था तो शास्‍त्रों में आर्शीवाद देने की परंपरा थी और हमारे शास्‍त्रों में बेटी को जो आर्शीवाद दिये जाते थे वो आर्शीवाद आज भी हमें, बेटियों की तरफ किस तरह देखना, उसके लिए हमें संस्‍कार देते हैं, दिशा देते हैं। हमारे शास्‍त्रों ने कहा था जब हमारे पूर्वज आर्शीवाद देते थे तो कहते थे – यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद सीताकथा लोके, तावद जीवेतु बालिका। हमारे शास्‍त्र कहते थे जब तक गंगा का नाम है, जब तक कुरूक्षेत्र की याद है, जब तक हिमालय है, जब तक कथाओं में सीता का नाम है, तब तक हे बालिका तुम्‍हारा जीवन अमर रहे। यह आर्शीवाद इस धरती पर दिये जाते थे। और उसी धरती पर बेटी को बेमौत मार दिया जाए और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों उसके मूल में हमारा मानसिक दारिद्रय जिम्‍मेवार है, हमारे मन की बीमारी जिम्‍मेवार है और यह मन की बीमार क्‍या है? हम बेटे को अधिक महत्‍वपूर्ण मानते हैं और यह मानते हैं बेटी तो पराये घर जाने वाली है। यहां जितनी माताएं-बहनें बैठी हैं। सबने यह अनुभव किया होगा यह मानसिक दारिद्रय की अनुभूति परिवार में होती है। मां खुद जब बच्‍चों को खाना परोसती है। खिचड़ी परोसी गई हो और घी डाल रही हो। तो बेटे को तो दो चम्‍मच घी डालती है और बेटी को एक चम्‍मच घी डालती है और जब, मुझे माफ करना भाईयों और बहनों यह बीमारी सिर्फ हरियाणा की नहीं है यह हमारी देश की मानसिक बीमारी का परिणाम है और बेटी को, अगर बेटी कहे न न मम्‍मी मुझे भी दो चम्‍मच दे दो, तो मां कहते से डरती नहीं है बोल देती है, अरे तुझे तो पराये घर जाना है, तुझे घी खाकर के क्‍या करना है। यह कब तक हम यह अपने-पराये की बात करते रहेंगे और इसलिए हम सबका दायित्‍व है, हम समाज को जगाए।

कभी-कभी जिस बहन के पेट में बच्‍ची होती है वो कतई नहीं चाहती है कि उसकी बेटी को मार दिया जाए। लेकिन परिवार का दबाव, माहौल, घर का वातावरण उसे यह पाप करने के लिए भागीदार बना देता है, और वो मजबूर होती है। उस पर दबाव डाला जाता है और उसी का नतीजा होता है कि बेटियों को मां के गर्भ में ही मार दिया जाता है। हम किसी भी तरह से अपने आप को 21वीं सदी के नागरिक कहने के अधिकारी नही हैं। हम मानसिकता से 18वीं शताब्दी के नागरिक हैं। जिस 18वीं शताब्‍दी में बेटी को “दूध-पीती” करने की परंपरा थी। बेटी का जन्‍म होते ही दूध के भरे बर्तन के अंदर उसे डूबो दिया जाता था, उसे मार दिया जाता था। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं, वो तो पाप करते थे गुनाह करते थे। बेटी जन्‍मती थी आंखे खोलकर के पल-दो-पल के लिए अपनी मां का चेहरा देख सकती थी। बेटी जन्‍मती थी, दो चार सांस ले पाती थी। बेटी जन्मती थी, दुनिया का एहसास कर सकती थी। बाद में उस मानसिक बीमारी के लोग उसको दूध के बर्तन में डालकर के मार डालते थे। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं। हम तो बेटी को मां का चेहरा भी नहीं देखने देते, दो पल सांस भी नहीं लेने देते। इस दुनिया का एहसास भी नहीं होने देते। मां के गर्भ में ही उसे मार देते हैं। इससे बड़ा पाप क्‍या हो सकता है और हम संवेदनशील नहीं है ऐसा नहीं है।

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कुछ साल पहले इसी हरियाणा में कुरूक्षेत्र जिले में हल्दा हेड़ी गांव में एक टयूबवेल में एक बच्‍चा गिर गया, प्रिंस.. प्रिंस कश्‍यप । और सारे देश के टीवी वहां मौजूद थे। सेना आई थी एक बच्‍चे को बचाने के लिए और पूरा हिंदुस्‍तान टीवी के सामने बैठ गया था। परिवारों में माताएं खाना नहीं पका रही थी। हर पल एक-दूसरे को पूछते थे क्‍या प्रिंस बच गया, क्‍या प्रिंस सलामत निकला टयूबवेल में से? करीब 24 घंटे से भी ज्‍यादा समय हिंदुस्‍तान की सांसे रूक गई थी। एक प्रिंस.. केरल, तमिलनाडु का कोई रिश्‍तेदार नहीं था। लेकिन देश की संवेदना जग रही है। उस बच्‍चे को जिंदा निकले, इसके लिए देशभर की माताएं-बहने दुआएं कर रही थी। मैं जरा पूछना चाहता हूं कि एक प्रिंस जिसकी जिंदगी पर संकट आए, हम बेचैन बन जाते हैं। लेकिन हमारे अड़ोस-पड़ोस में आएं दिन बच्चियों को मां के पेट में मार दिया जाए, लेकिन हमें पीड़ा तक नहीं होती है, तब सवाल उठता है। हमारी संवेदनाओं को क्‍या हुआ है? और इसलिए आज मैं आपके पास आया हूं। हमें बेटियों को मारने का हक नहीं है।

यह सोच है बुढ़ापे में बेटा काम आता है। इससे बड़ी गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए। अगर बुढ़ापे में बेटे काम आए होते तो पिछले 50 साल में जितने वृद्धाश्राम खुले हैं, शायद उतने नहीं खुले होते। बेटो के घर में गाड़ियां हो, बंगले हो, लेकिन बांप को वृद्धाश्राम में रहना पड़ता है ऐसी सैकड़ों घटनाएं है और ऐसी बेटियों की भी घटनाएं है। अगर मां-बाप की इकलौती बेटी है तो मेहनत करे, मजदूरी करे, नौकरी करे, बच्‍चों को tuition करे लेकिन बूढ़े मां-बाप को कभी भूखा नहीं रहने देती। ऐसी सैकड़ों बेटियां बाप से भी सेवा करने के लिए, मां-बाप की सेवा करने के लिए अपने खुद के सपनों को चूर-चूर कर देने वाली बेटियों की संख्‍या अनगिनत है और सुखी बेटों के रहते हुए दुःखी मां-बाप की संख्‍या भी अनगिनत है। और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों यह सोच कि बेटा आपका बुढ़ापा संभालेगा, भूल जाइये। अगर आप अपनी संतानों को सामान रूप से संस्‍कारित करके बड़े करोगे, तो आपकी समस्‍याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।

कभी-कभी लगता है कि बेटी तो पराये घर की है। मैं जरा पूछना चाहता हूं सचमुच में यह सही सोच है क्‍या? अरे बेटी के लिए तो आपका घर पराया होता है जिस घर आप भेजते हो वो पल-दो-पल में उसको अपना बना लेती है। कभी पूछती नहीं है कि मुझे उस गांव में क्‍यों डाला मुझे उस कुटुम्‍ब में क्‍यों डाल दिया? जो भी मिले उसको सर-आंखों पर चढ़ाकर के अपना जीवन वहां खपा देती है और अपने मां-बाप के संस्‍कारों को उजागर करती है। अच्‍छा होता है तो कहती है कि मेरी मां ने सिखाया है, अच्‍छा होता है तो कहती है कि मां-बाप के कारण, मेरे मायके के संस्‍कार के कारण मैं अच्‍छा कर रही हूं। बेटी कहीं पर भी जाएं वहां हमेशा आपको गौरव बढ़े, उसी प्रकार का काम करती है।

मैंने कल्‍पना की, आपने कभी सोचा है यहीं तो हरियाणा की धरती, जहां की बेटी कल्‍पना चावला पूरा विश्‍व जिसके नाम पर गर्व करता है। जिस धरती पर कल्‍पना चावला का जन्‍म हुआ हो, जिसको को लेकर के पूरा विश्‍व गर्व करता हो, उसी हरियाणा में मां के पेट में पल रही कल्‍पना चावलाओं को मार करके हम दुनिया को क्‍या मुंह दिखाएंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों मैं आप आपसे आग्रह करने आया हूं और यह बात देख लीजिए अगर अवसर मिलता है तो बेटे से बेटियां ज्‍यादा कमाल करके दिखाती हैं।

आज भी आपके हरियाणा के और हिंदुस्‍तान के किसी भी राज्‍य के 10th या 12th के result देख लीजिए। first stand में से छह या सात तो बच्चियां होती है जीतने वाली, बेटों से ज्‍यादा नंबर लाती है। आप हिंदुस्‍तान का पूरा education sector देख लीजिए। teachers में 70-75 प्रतिशत महिलाएं शिक्षक के रूप में काम कर रही है। आप health sector देख लीजिए health sector में 60 प्रतिशत से ज्‍यादा, सूश्रूषा के क्षेत्र में बहनें दिखाई देती है। अरे हमारा agriculture sector, पुरूष सीना तान कर न घूमें कि पुरूषों से ही agriculture sector चलता है। अरे आज भी भारत में agriculture और पशुपालन में महिलाओं की बराबरी की हिस्‍सेदारी है। वो खेतों में जाकर के मेहनत करती है,वो भी खेती में पूरा contribution करती हैं और खेत में काम करने वाले मर्दों को संभालने का काम भी वही करती है।

पश्चिम के लोग भले ही कहते हों, लेकिन हमारे देश में महिलाओं का सक्रिय contribution आर्थिक वृद्धि में रहता है। खेलकूद में देखिए पिछले दिनों जितने game हुए, उसमें ईनाम पाने वाले अगर लड़के हैं तो 50 प्रतिशत ईनाम पाने वाली लड़कियां है। gold medal लाने वाली लड़कियां है। खेलकूद हो, विज्ञान हो, व्‍यवसाय हो, सेवा का क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, आज महिलाएं रत्‍तीभर भी पीछे नहीं है और यह सामर्थ्‍य हमारी शक्ति में है। और इसलिए मैं आपसे आग्रह करने आया हूं कि हमें बेटे और बेटी में भेद करने वाली बीमारी से निकल जाना चाहिए। “बेटा-बेटी एक समान” यही हमारा मंत्र होना चाहिए और एक बार हमारे मन में बेटा और बेटी के प्रति एक समानता का भाव होगा तो यह पाप करने की जो प्रवृति है वह अपने आप ही रूक जाएगी। और यह बात, इसके लिए commitment चाहिए, संवेदना चाहिए, जिम्‍मेवारी चाहिए।

मैं आज आपके सामने एक बात बताना चाहता हूं। यह बात मेरे मन को छू गई। किसी काम के लिए जब commitment होता है, एक दर्द होता है तो इंसान कैसे कदम उठाता है। हमारे बीच माधुरी दीक्षित जी बैठी है। माधुरी नैने। उनकी माताजी ICU में हैं, वो जिंदगी की जंग लड़ रही है और बेटी पानीपत पहुंची है। और मां कहती है कि बेटी यह काम अच्‍छा है तुम जरूर जाओ। Weather इतना खराब होने के बावजूद भी माधुरी जी अपनी बीमार मां को छोड़कर के आपकी बेटी बचाने के लिए आपके बीच आकर के बैठी है और इसलिए मैं कहता हूं एक commitment चाहिए, एक जिम्‍मेवारी का एहसास चाहिए और यह एक सामूहिक जिम्‍मेवारी में साथ है। गांव, पंचायत, परिवार, समाज के लोग इन सबको दायित्‍व निभाना पड़ेगा और तभी जाकर के हम इस असंतुलन को मिटा सकेंगे। यह रातों-रात मिटने वाला नहीं है। करीब-करीब 50 साल से यह पाप चला है। आने वाले 100 साल तक हमें जागरूक रूप से प्रयास करना पड़ेगा, तब जाकर के शायद स्थिति को हम सुधार पाएंगे। और इसलिए मैंने कहा आज का जो यह पानीपत की धरती पर हम संकल्‍प कर रहे हैं, यह संकल्‍प आने वाली सदियों तक पीढि़यों की भलाई करने के लिए है।

भाईयों बहनों आज यहां भारत सरकार की और योजना का भी प्रांरभ हुआ है – सुकुन्‍या समृद्धि योजना। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं। इसको निरंतर बल देना है और इसलिए उसके लिए सामाजिक सुरक्षा भी चाहिए। यह सुकुन्‍या समृद्धि योजना के तहत 10 साल से कम उम्र की बेटी एक हजार रुपये से लेकर के डेढ़ रुपये लाख तक उसके मां-बाप पैसे बैंक में जमा कर सकते है और सरकार की तरफ से हिंदुस्‍तान में किसी भी प्रकार की परंपरा में ब्‍याज दिया जाता है उससे ज्‍यादा ब्‍याज इस बेटी को दिया जाएगा। उसका कभी Income Tax नहीं लगाया जाएगा और बेटी जब 21 साल की होगी, पढ़ाई पूरी होगी या शादी करने जाती होगी तो यह पैसा पूरा का पूरा उसके हाथ में आएगा और वो कभी मां-बाप के लिए बोझ महसूस नहीं होगी।

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काशी के लोगों ने मुझे अपना MP बनाया है। वहां एक जयापुर पर गांव है। जयापुर गांव ने मुझे गोद लिया है और वो जयापुर गांव मेरी रखवाली करता है, मेरी चिंता करता है। जयपुर में गया था मैंने उनको कहा था कि हमारे गावं में जब बेटी पैदा हो तो पूरे गांव का एक बड़ा महोत्‍सव होना चाहिए। आनंद उत्‍सव होना चाहिए और मैंने प्रार्थना की थी कि बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ बोने चाहिए। मुझे बाद में चिट्ठी आई। मेरे आने के एक-आध महीने बाद कोई एक बेटी जन्‍म का समाचार आया तो पूरे गांव ने उत्‍सव मनाया और उतना ही नहीं सब लोगों ने जाकर के पाँच पेड़ लगाए। मैं आपको भी कहता हूं। आपकी बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ लगाएंगे बेटी भी बड़ी होगी, पेड़ भी बड़ा होगा और जब शादी का समय आएगा वो पाँच पेड़ बेच दोगे न तो भी उसकी शादी का खर्चा यूं ही निकल जाएगा।

भाईयों बहनों बड़ी सरलता से समझदारी के साथ इस काम को हमने आगे बढ़ाना है और इसलिए आज मैं हरियाणा की धरती, जहां यह सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन हिंदुस्‍तान का कोई राज्‍य बाकी नहीं है कि जहां चुनौती नहीं है। और मैं जानता हूं यह दयानंद सरस्‍वती के संस्‍कारों से पली धरती है। एक बार हरियाणा के लोग ठान लें तो वे दुनिया को खड़ी करने की ताकत रखते हैं। मुझको बड़ा बनाने में हरियाणा का भी बहुत बड़ा role है। मैं सालों तक आपके बीच रहा हूं। आपके प्‍यार को भली-भांति में अनुभव करता हूं। आपने मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। मैं आज आपसे कुछ मांगने के लिए आया हूं। देश का प्रधानमंत्री एक भिक्षुक बनकर आपसे बेटियों की जिंदगी की भीख मांग रहा है। बेटियों को अपने परिवार का गर्व मानें, राष्‍ट्र का सम्‍मान मानें। आप देखिए यह असंतुलन में से हम बहुत तेजी से बाहर आ सकते हैं। बेटा और बेटी दोनों वो पंख है जीवन की ऊंचाईयों को पाने का उसके बिना कोई संभावना नहीं और इसलिए ऊंची उड़ान भी भरनी है तो सपनों को बेटे और बेटी दोनों पंख चाहिए तभी तो सपने पूरे होंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों हम एक जिम्‍मेवारी के साथ इस काम को निभाएं।

मुझे बताया गया है कि हम सबको शपथ लेना है। आप जहां बैठे है वहीं बैठे रहिये, दोनों हाथ ऊपर कर दीजिए और मैं एक शपथ बोलता हूं मेरे साथ आप शपथ बोलेंगे – “मैं शपथ लेता हूं कि मैं लिंग चयन एवं कन्‍या भ्रूण हत्‍या का ‍विरोध करूगा; मैं बेटी के जन्‍म पर खुश होकर सुरक्षित वातारवण प्रदान करते हुए बेटी को सुशिक्षित करूंगा। मैं समाज में बेटी के प्रति भेदभाव खत्‍म करूंगा, मैं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं” का संदेश पूरे समाज में प्रसारित करूंगा।“

भाई बहनों मैं डॉक्‍टरों से भी एक बात करना चाहता हूं। मैं डॉक्‍टरों से पूछना चाहता हूं कि पैसे कमाने के लिए यही जगह बची है क्‍या? और यह पाप के पैसे आपको सुखी करेंगे क्‍या? अगर डॉक्‍टर का बेटा कुंवारा रह गया तो आगे चलकर के शैतान बन गया तो वो डॉक्‍टर के पैसे किस काम आएंगे? मैं डॉक्‍टरों को पूछना चाहता हूं कि यह आपको दायित्‍व नहीं है कि आप इस पाप में भागीदार नहीं बनेंगे। डॉक्‍टरों को अच्‍छा लगे, बुरा लगे, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आपकी यह जिम्‍मेवारी है। आपको डॉक्‍टर बनाया है समाज ने, आपको पढ़-लिखकर के तैयार किया है। गरीब के पैसों से पलकर के बड़े हुए हो। आपको पढ़ाया गया है किसी की जिंदगी बचाने के लिए, आपको पढ़ाया गया है किसी की पीड़ा को मुक्‍त करने के लिए। आपको बच्चियों को मारने के लिए शिक्षा नहीं दी गई है। अपने आप को झकझोरिये, 50 बार सोचिए, आपके हाथ निर्दोष बेटियों के खून से रंगने नहीं चाहिए। जब शाम को खाना खाते हो तो उस थाली के सामने देखो। जिस मां ने, जिस पत्‍नी ने, जिस बहन ने वो खाना बनाया है वो भी तो किसी की बेटी है। अगर वो भी किसी डॉक्‍टर के हाथ चढ़ गई होती, तो आज आपकी थाली में खाना नहीं होता। आप भी सोचिए कहीं उस मां, बेटी, बहन ने आपके लिए जो खाना बनाया है, कहीं आपके के खून से रंगे हुए हाथ उस खाने की चपाती पर तो हाथ नहीं लगा रहे। जरा अपने आप को पूछिये मेरे डॉक्‍टर भाईयों और बहनों। यह पाप समाज द्रोह है। यह पाप सदियों की गुनाहगारी है और इसलिए एक सामाजिक दायित्‍व के तहत है, एक कर्तव्‍य के तहत और सरकारें किसकी-किसकी नहीं, यह दोषारोपण करने का वक्‍त नहीं है। हमारा काम है जहां से जग गए हैं, जाग करके सही दिशा में चलना।

मुझे विश्‍वास है पूरा देश इस संदेश को समझेगा। हम सब मिलकर के देश को भविष्‍य के संकट से बचाएंगे और फिर एक बार मैं हरियाणा को इतने बड़े विशाल कार्यक्रम के लिए और हरियाणा इस संदेश को उठा लेगा तो हिंदुस्‍तान तो हरियाणा के पीछे चल पड़ेगा। मैं फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद करता हूं।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ इस संकल्‍प को लेकर हम जाएंगे। इसी अपेक्षा के साथ मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए – भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

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ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਦੇਸ਼-ਵਾਸੀਓ, ਨਮਸਕਾਰ।

‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਤੁਹਾਡੇ ਨਾਲ ਜੁੜ ਕੇ ਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਹੋ ਰਹੀ ਹੈ। ਦੇਸ਼ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਹਿੱਸਿਆਂ ਵਿੱਚ ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਲੋਕ ਦੇਸ਼ ਹਿੱਤ ਵਿੱਚ, ਸਮਾਜ ਦੇ ਹਿੱਤ ਵਿੱਚ, ਅਜਿਹੇ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ ਕਿ ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਬਾਰੇ ਸੁਣਦੇ ਹਾਂ ਤਾਂ ਸਾਨੂੰ ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਅੱਜ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ, ਮੈਂ ਅਥਲੈਟਿਕਸ ਵਿੱਚ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਅਜਿਹੀ ਹੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਤੋਂ ਕਰਾਂਗਾ। ਕੁਝ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਝਾਰਖੰਡ ਦੇ ਰਾਂਚੀ ਵਿੱਚ ਨੈਸ਼ਨਲ ਸੀਨੀਅਰ ਅਥਲੈਟਿਕਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਕੰਪੀਟੀਸ਼ਨ ਹੋਇਆ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਦੇਸ਼ ਭਰ ਤੋਂ ਆਏ ਕਰੀਬ 800 ਅਥਲੀਟਾਂ ਨੇ ਹਿੱਸਾ ਲਿਆ। ਇਸ ਦੌਰਾਨ ਚਾਰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਈਵੈਂਟ ਵਿੱਚ ਚਾਰ ਨੈਸ਼ਨਲ ਰਿਕਾਰਡ ਟੁੱਟੇ। ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਸਿੰਘ, ਵਿਸ਼ਾਲ ਟੀਕੇ, ਤੇਜਸਵਿਨ ਸ਼ੰਕਰ, ਦੇਵ ਮੀਣਾ ਅਤੇ ਕੁਲਦੀਪ ਕੁਮਾਰ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਾਥੀਆਂ ਨੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਕੈਟੇਗਰੀ ਵਿੱਚ ਨਵੇਂ ਰਿਕਾਰਡ ਬਣਾਏ। ਮੈਂ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਤਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਵਧਾਈ ਦਿੰਦਾ ਹਾਂ।

ਸਾਥੀਓ,

ਇੱਕ ਈਵੈਂਟ ਜਿਸ ਦੀ ਦੇਸ਼ ਭਰ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਚਰਚਾ ਹੋ ਰਹੀ ਹੈ, ਉਹ ਹੈ – 100 ਮੀਟਰ ਰੇਸ, ਸੌ ਮੀਟਰ ਦੀ ਦੌੜ। ਮਹਿਜ਼ ਦੋ ਦਿਨਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਮੈਨਜ਼ 100 ਮੀਟਰ ਰੇਸ ਵਿੱਚ ਨੈਸ਼ਨਲ ਰਿਕਾਰਡ ਤਿੰਨ ਵਾਰ ਟੁੱਟਿਆ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੋ ਅਥਲੀਟਾਂ ਨੇ ਇਹ ਕਮਾਲ ਕੀਤਾ ਹੈ ਉਹ ਹਨ - ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਅਨੀਮੇਸ਼ ਕੁਜੂਰ। ਮੈਂ ਸੋਚਿਆ ਇਸ ਵਾਰ ‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਵਿੱਚ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋਵਾਂ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਨਾਲ ਗੱਲਬਾਤ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ।

(ਫੋਨ ਕਾਲ)

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਅਨੀਮੇਸ਼ ਜੀ ਨਮਸਕਾਰ। ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਤੁਹਾਨੂੰ ਵੀ ਨਮਸਕਾਰ, ਸਤਿ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ।

ਅਨੀਮੇਸ਼, ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ: ਨਮਸਕਾਰ ਸਰ, ਨਮਸਕਾਰ ਸਰ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਅੱਛਾ ਭਈਆ, ਤੁਸੀਂ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਤੁਹਾਡੀ ਜੋੜੀ ਨੇ ਵੀ ਵੱਡਾ ਕਮਾਲ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਅਸੀਂ ਸੰਗੀਤ ਵਿੱਚ ਤਾਂ ਜੁਗਲਬੰਦੀ ਦੇਖੀ ਸੀ, ਪਰ ਚੁਣੌਤੀ ਵਿੱਚ ਹੁਣ ਜੁਗਲਬੰਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਇੱਕ ਵਾਰ ਇੱਕ ਚੁਣੌਤੀ ਦੇਵੇ ਫਿਰ ਦੂਜਾ ਉਸ ਚੁਣੌਤੀ ਨੂੰ ਕਬੂਲ ਕਰ ਲਵੇ। ਫਿਰ ਤੀਜੀ ਵਾਰ ਕਰ ਲਵੇ। ਬੜਾ ਦਿਲਚਸਪ ਵਿਸ਼ਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਤੁਹਾਡਾ। ਮੈਂ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਦੇ ਸਰੋਤਿਆਂ ਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗੇ, ਕਿ ਤੁਹਾਡੇ ਬਾਰੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਾਣਕਾਰੀ ਹੋਵੇ। ਤੁਸੀਂ ਜੋ ਕਮਾਲ ਕੀਤਾ ਹੈ ਉਸ ਦਾ ਪਤਾ ਲੱਗੇ।

ਅਨੀਮੇਸ਼ ਜੀ: ਨਮਸਤੇ ਸਰ, ਮੇਰਾ ਨਾਮ ਅਨੀਮੇਸ਼ ਕੁਜੂਰ ਹੈ। ਮੈਂ 200 ਮੀਟਰ ਅਤੇ 400 ਮੀਟਰ ਦਾ ਨੈਸ਼ਨਲ ਰਿਕਾਰਡ ਹੋਲਡਰ ਹਾਂ ਅਤੇ ਮੈਂ ਛੱਤੀਸਗੜ੍ਹ ਤੋਂ ਬਿਲੌਂਗ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਸਰ। ਅਤੇ ਹੁਣ ਮੈਂ ਉੜੀਸਾ ਵੱਲੋਂ ਖੇਡਦਾ ਹਾਂ। ਮੈਂ ਪਿਛਲੇ ਸਾਲ ਏਸ਼ੀਅਨ ਮੈਡਲ ਅਤੇ ਵਰਲਡ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਗੇਮਜ਼ ਮੈਡਲ ਜਿੱਤ ਕੇ ਲਿਆਇਆ ਅਤੇ ਮੈਂ ਅਥਲੈਟਿਕਸ  2021 ਤੋਂ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਸਕੂਲ ਤੋਂ ਪਾਸ-ਆਊਟ ਹੋਇਆ। ਮੈਂ ਸੈਨਿਕ ਸਕੂਲ ਅੰਬਿਕਾਪੁਰ ਤੋਂ ਪਾਸ-ਆਊਟ ਹਾਂ, ਅਤੇ ਮੈਂ ਪਹਿਲਾਂ ਫੁਟਬਾਲ ਖੇਡਿਆ ਕਰਦਾ ਸੀ, ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਮਾਪੇ ਕੋਵਿਡ ਵੇਲੇ ਮੈਨੂੰ ਥੋੜ੍ਹੀ ਬਹੁਤ ਛੋਟ ਦਿੰਦੇ ਸਨ ਕਿ ਤੂੰ ਜਾ ਕੇ ਬਾਹਰ ਦੌੜ ਲੈ ਜਾਂ ਖੇਡ ਲੈ। ਤਾਂ ਜਦੋਂ ਕੋਵਿਡ ਖ਼ਤਮ ਹੋਣ ਲੱਗਾ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਫੁਟਬਾਲ ਦੇ ਜੋ ਦੋਸਤ ਸਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸਟੇਟ ਮੀਟ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਹੈ ਜਾ ਕੇ ਤੂੰ ਹਿੱਸਾ ਲੈ ਅਤੇ ਮੈਂ ਹਿੱਸਾ ਲਿਆ ਤੇ ਮੈਨੂੰ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਉੱਥੋਂ ਨੈਸ਼ਨਲ ਲੈਵਲ ਦੀ ਸਿਲੈਕਸ਼ਨ ਹੈ। ਮੈਂ ਉੱਥੋਂ ਨੈਸ਼ਨਲ ਵਿੱਚ ਸਿਲੈਕਟ ਹੋਇਆ ਅਤੇ ਅੱਜ ਮੈਂ ਇੰਡੀਆ ਨੂੰ ਅੰਤਰਰਾਸ਼ਟਰੀ ਪੱਧਰ ਉੱਤੇ ਰਿਪ੍ਰੈਜ਼ੈਂਟ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਅਤੇ ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਜੀ ਕੀ ਹੈ?

ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ: ਨਮਸਤੇ ਸਰ, ਮੇਰਾ ਨਾਮ ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਹੈ ਅਤੇ ਮੈਂ ਇੰਡੀਅਨ ਨੇਵੀ ਵਿੱਚ ਪੈਟੀ ਆਫਿਸਰ ਹਾਂ ਅਤੇ ਮੈਂ ਇੰਡੀਆ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਤੇਜ਼ ਸਪ੍ਰਿੰਟਰ ਹਾਂ, ਹਾਲ ਹੀ ਵਿੱਚ ਮੈਂ 100 ਮੀਟਰ ਵਿੱਚ 10.09 ਦਾ ਨੈਸ਼ਨਲ ਰਿਕਾਰਡ ਬਣਾਇਆ ਹੈ। ਅਤੇ ਮੈਂ ਪਹਿਲਾ ਭਾਰਤੀ ਹਾਂ ਜੋ 10.1 ਦੀ ਰੁਕਾਵਟ ਤੋਂ ਹੇਠਾਂ ਭੱਜਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਮੈਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ ਕਿ ਮੈਂ ਟਰੈਕ ਅਤੇ ਵਰਦੀ ਵਿੱਚ ਵੀ ਆਪਣੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੇਵਾ ਕਰਾਂ। ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਅਤੇ ਦਾਦਾ ਜੀ ਦੋਵੇਂ ਖੇਡਦੇ ਸਨ ਤਾਂ ਸਾਡੇ ਇੰਡੀਆ ਦਾ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਹੈ ਕਿ ਜਦੋਂ ਵੀ ਕੋਈ ਤਿਉਹਾਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਜਿਵੇਂ ਦੀਵਾਲੀ, ਜਿਵੇਂ ਨਵਾਂ ਸਾਲ, ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਘਰ ਦੀ ਸਫ਼ਾਈ ਕਰਦੇ ਹਾਂ। ਤਾਂ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਦੀਆਂ ਟਰਾਫੀਆਂ ਅਤੇ ਮੈਡਲਾਂ ਦੀ ਸਫ਼ਾਈ ਕਰਦਾ ਸੀ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਉਹ ਬਹੁਤ ਚੰਗਾ ਲੱਗਦਾ ਸੀ, ਮੈਂ ਬਹੁਤ ਖ਼ੁਸ਼ ਹੁੰਦਾ ਸੀ। ਉਦੋਂ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਕੋਈ ਟਰਾਫੀ ਸਾਫ਼ ਕਰਦਾ ਸੀ ਤਾਂ ਮੈਂ ਪੁੱਛਦਾ ਸੀ ਕਿ ਬਈ ਇਹ ਟਰਾਫੀ ਕਿੱਥੇ ਜਿੱਤੀ, ਇਹ ਮੈਡਲ ਕਿੱਥੇ ਜਿੱਤਿਆ, ਇਹ ਫੋਟੋ ਕਦੋਂ ਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਫਿਰ ਮੈਨੂੰ ਉਹ ਆਪਣੀ ਕਹਾਣੀ ਸੁਣਾਉਂਦੇ ਸਨ, ਕਿ ਬਈ ਮੈਂ ਇੱਥੇ ਖੇਡਣ ਗਿਆ, ਮੈਂ ਇਹ ਨੈਸ਼ਨਲ ਮੈਡਲ ਜਿੱਤਿਆ, ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਇਸ ਵਿੱਚ ਜਿਤਾਇਆ। ਤਾਂ ਫਿਰ ਮੈਂ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦਾ ਸੀ ਕਿ ਬਈ ਮੈਂ ਵੀ ਕੋਈ ਖੇਡ ਖੇਡਣੀ ਹੈ। ਉਹ ਰਨਿੰਗ ਕਰਨ ਜਾਂਦੇ ਸਨ ਸਵੇਰੇ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਹਿਣ ਲੱਗਾ ਕਿ ਬਈ ਮੈਨੂੰ ਵੀ ਲੈ ਕੇ ਜਾਇਆ ਕਰੋ ਆਪਣੇ ਨਾਲ। ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਜਾਣ ਲੱਗੇ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਜੋ ਆਪਣੀ ਗੇਮ ਸਪੋਰਟਸ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਿਆ ਸੀ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਸਿਖਾਉਣ ਲੱਗੇ। ਤਾਂ ਮੇਰੀ ਦਿਲਚਸਪੀ ਬਣਨ ਲੱਗੀ। ਮੈਂ ਉਸੈਨ ਬੋਲਟ ਦਾ ਵਰਲਡ ਰਿਕਾਰਡ ਟੁੱਟਦਾ ਹੋਇਆ ਦੇਖਿਆ। ਤਾਂ ਇੱਕ ਕਹਾਣੀ ਹੈ ਇੱਦਾਂ ਮਜ਼ਾਕੀਆ। ਮੈਂ ਅਜੇ ਟੀਵੀ ਦੇਖ ਰਿਹਾ ਸੀ ਤਾਂ ਮੰਮੀ ਨੇ ਮੇਰਾ ਟੀਵੀ ਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਹੁਣ ਬੇਟਾ ਪੜ੍ਹਨ ਦਾ ਸਮਾਂ ਹੋ ਗਿਆ, ਤੁਸੀਂ ਪੜ੍ਹੋ। ਤਾਂ ਮੈਂ ਕਿਹਾ ਬਈ ਠੀਕ ਹੈ ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਟੀਵੀ ਨਹੀਂ ਦੇਖਣ ਦਿੰਦੇ, ਇੱਕ ਦਿਨ ਅਜਿਹਾ ਆਵੇਗਾ ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਟੀਵੀ ਵਿੱਚ ਲੱਭੋਗੇ ਕਿ ਦੇਖੋ ਉਹ ਗੁਰਿੰਦਰ ਦੌੜ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਵੀ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜਦੋਂ ਮੇਰੀ ਮਾਂ ਮੈਨੂੰ ਟੀਵੀ ਉੱਤੇ ਦੌੜਦਾ ਹੋਇਆ ਦੇਖਦੀ ਹੈ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਵਾਹ ਵਾਹ ਵਾਹ। ਬੜੀ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਗੱਲ ਹੈ ਬਈ ਤੁਹਾਡੀ ਤਾਂ।

ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ: ਹਾਂ ਜੀ। ਮਿਡਲ ਕਲਾਸ ਫੈਮਿਲੀ ਹੈ ਸਰ, ਫਿਰ ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਉਹ ਵੀ ਵਾਲੀਬਾਲ ਖੇਡਦੇ ਸਨ। ਘਰ ਦੀਆਂ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਖੇਡ ਛੱਡ ਦਿੱਤੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜੋ ਸੁਪਨਾ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਰਹਿ ਗਿਆ। ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਉਹ ਸੁਪਨਾ ਦੇਖਿਆ ਕਿ ਬਈ ਮੇਰਾ ਬੇਟਾ ਉਹ ਸੁਪਨਾ ਪੂਰਾ ਕਰੇਗਾ ਤਾਂ ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਗੱਲਾਂ ਕਰਦਾ ਸੀ, ਫਿਰ ਸੁਣਦਾ ਸੀ ਮਿਲਖਾ ਸਿੰਘ ਇੰਨੀ ਮਿਹਨਤ ਕਰਦੇ ਸਨ, ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦਾ ਸੀ ਮੈਂ ਵੀ ਇੱਕ ਦਿਨ ਤੁਹਾਡਾ ਸੁਪਨਾ ਪੂਰਾ ਕਰਾਂਗਾ। ਤਾਂ ਬੋਲਦੇ ਸੁਪਨਾ ਪੂਰਾ ਇੱਦਾਂ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਉਸ ਲਈ ਬਹੁਤ ਸਖ਼ਤ ਮਿਹਨਤ ਕਰਨੀ ਪੈਂਦੀ ਹੈ। ਮਿਹਨਤ ਕਰਨੀ ਪੈਂਦੀ ਹੈ। ਮਿਲਖਾ ਸਿੰਘ ਜੀ ਖ਼ੂਨ ਦੀਆਂ ਉਲਟੀਆਂ ਕਰਦੇ ਸਨ, ਧੁੱਪ ਵਿੱਚ ਭੱਜਦੇ ਸਨ। ਸਾਰਾ-ਸਾਰਾ ਦਿਨ ਟਰੇਨਿੰਗ ਕਰਦੇ ਸਨ ਤਾਂ ਉਹ ਚੀਜ਼ਾਂ ਮੈਨੂੰ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰਦੀਆਂ ਸਨ। ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਮੈਨੂੰ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰਦੇ ਸਨ, ਕਿ ਮੈਂ ਭੱਜਾਂਗਾ ਤਾਂ ਆਪਣੇ ਦੇਸ਼ ਲਈ, ਦੇਸ਼ ਲਈ ਮੈਡਲ ਲਿਆਵਾਂ, ਜਿੱਤਾਂ। ਅਤੇ ਇਹ ਵੀ ਸੀ ਕਿ ਬਈ ਜਦੋਂ ਮੈਂ 100 ਮੀਟਰ ਦਾ ਈਵੈਂਟ ਚੁਣਿਆ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਮੈਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਸਨ ਕਿ ਬਈ 100 ਨਾ ਕਰੋ, 100 ਭਾਰਤੀਆਂ ਦਾ ਈਵੈਂਟ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਭਾਰਤੀਆਂ ਦੀ ਬੌਡੀ 100 ਮੀਟਰ ਲਈ ਬਣੀ ਹੀ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਤਾਂ ਮੈਂ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਬੋਲਦੇ ਸਨ ਕਿ ਹੁਣ ਗੁਰਿੰਦਰ ਅਸੀਂ ਇਹ ਚੁਣਿਆ ਹੈ, ਅਸੀਂ ਇਸ ਤੋਂ ਪਿੱਛੇ ਨਹੀਂ ਹਟਾਂਗੇ। ਜੋ ਸਾਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਬਈ ਅਸੀਂ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੇ ਅਸੀਂ ਉਸ ਨੂੰ ਕਰ ਕੇ ਦਿਖਾਵਾਂਗੇ। ਅਤੇ ਤੂੰ ਕਰ ਕੇ ਦਿਖਾਵੇਂਗਾ, ਮੈਨੂੰ ਤੇਰੇ ਉੱਤੇ ਭਰੋਸਾ ਹੈ। ਤਾਂ ਉਹ ਭਰੋਸਾ ਜਦੋਂ ਮੈਨੂੰ ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਨੇ ਮੇਰੇ ਉੱਤੇ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਮੈਂ ਉਸ ਭਰੋਸੇ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਹਿੰਮਤ ਬਣਾ ਕੇ ਮੈਂ ਤੁਰਿਆ ਅਤੇ ਮੈਂ ਅੱਜ ਹਰ ਭਾਰਤੀ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਬਈ ਇੰਡੀਅਨ ਸਪ੍ਰਿੰਟ ਕਰ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਦੇਖੋ ਤੁਸੀਂ ਦੋਵਾਂ ਨੇ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਕਮਾਲ ਕੀਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸਿਰਫ਼ ਦੋ ਦਿਨਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਤੁਸੀਂ ਦੋਵਾਂ ਨੇ ਤਿੰਨ ਵਾਰ ਨੈਸ਼ਨਲ ਰਿਕਾਰਡ ਤੋੜਿਆ ਹੈ। 100 ਮੀਟਰ ਰੇਸ ਵਿੱਚ ਦੌੜਨਾ, ਜਿਵੇਂ ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਭਾਰਤ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਤਾਂ ਸਰੀਰ ਇਸ ਕੰਮ ਲਈ ਹੈ ਹੀ ਨਹੀਂ। ਇੰਨਾ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਹੁੰਦਿਆਂ ਵੀ ਤੁਸੀਂ ਕੰਮ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਇਹ ਦੋਵਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਜਾਣਨਾ ਚਾਹਾਂਗਾ, ਅਤੇ ‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਦੇ ਸਰੋਤੇ ਵੀ ਸੁਣਨਾ ਚਾਹੁਣਗੇ ਕਿ ਕਿਹੜਾ ਜਜ਼ਬਾ ਸੀ, ਕੀ ਜ਼ਿੱਦ ਸੀ, ਕੀ ਸੋਚਿਆ ਸੀ, ਅਤੇ ਕਿਵੇਂ ਕਰ ਰਹੇ ਸੀ? ਇਹ ਕਿੰਨਾ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਹੁੰਦਾ ਹੈ?

ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ: ਜੀ ਸਰ, ਮੈਂ ਗੁਰਿੰਦਰ, ਮੈਂ ਜਦੋਂ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਵਿੱਚ ਸਰ ਬਹੁਤ ਸੰਘਰਸ਼ ਸੀ, ਬਹੁਤ ਵਾਰ ਸ਼ੱਕ ਵੀ ਹੋਇਆ ਕਿ ਮੈਂ ਸਹੀ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ, ਮੈਂ ਸਹੀ ਚੁਣਿਆ ਕਿਉਂਕਿ ਹਰ ਵਾਰ ਤੁਸੀਂ ਨਹੀਂ ਜਿੱਤਦੇ, ਕਦੇ-ਕਦੇ ਤੁਸੀਂ ਸਿੱਖਦੇ ਹੋ। ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਹਾਰਦਾ ਸੀ, ਜਦੋਂ ਮੇਰੀ ਸਹੀ ਪਰਫਾਰਮੈਂਸ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੀ ਸੀ, ਕੋਈ ਸੱਟ ਲੱਗ ਜਾਂਦੀ ਸੀ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਘਰਵਾਲੇ ਮੈਨੂੰ ਸਹਿਯੋਗ ਕਰਦੇ ਸਨ ਕਿ ਬਈ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਇੱਕ ਦਿਨ ਮਾੜਾ ਚਲਾ ਗਿਆ, ਇੱਕ ਸਾਲ ਮਾੜਾ ਚਲਾ ਗਿਆ ਤਾਂ ਇਸ ਨਾਲ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਖਰਾਬ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ। ਸੁਪਨੇ ਦੇਖਣੇ ਨਹੀਂ ਛੱਡੀਦੇ। ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਕੋਚ ਨੇ ਵੀ ਮੈਨੂੰ ਇਹ ਸਿਖਾਇਆ ਕਿ ਜੇ ਤੂੰ ਨਹੀਂ ਕਰੇਂਗਾ ਤਾਂ ਕੋਈ ਹੋਰ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕੇਗਾ। ਤਾਂ ਇੱਦਾਂ ਜਦੋਂ ਸਾਡਾ ਭਾਈਚਾਰਾ ਸਾਡੇ ਆਲ਼ੇ-ਦੁਆਲ਼ੇ ਲੋਕ ਸਾਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਕਰਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਸਾਡਾ ਕਦੇ ਉਹ ਹੌਸਲਾ ਨਹੀਂ ਟੁੱਟਦਾ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਅਨੀਮੇਸ਼ ਜੀ...

ਅਨੀਮੇਸ਼: ਸਰ, ਮੈਨੂੰ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਸਨ ਕਿ ਜਦੋਂ ਮੈਂ 2021 ਵਿੱਚ ਅਥਲੈਟਿਕਸ  ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਸਨ ਕਿ ਦੇਖ ਇਹ ਨਵਾਂ ਫੀਲਡ ਹੈ, ਤੂੰ ਕਰ ਸਕੇਂਗਾ ਕਿ ਨਹੀਂ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਹੁਣ ਮੈਂ ਇਸ ਫੀਲਡ ਵਿੱਚ ਵੜਿਆ ਹਾਂ ਤਾਂ ਕਰਾਂਗਾ ਹੀ। ਮੇਰੇ ਪਾਪਾ ਵੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਮੈਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਸਨ ਕਿ ਤੂੰ ਇਸ ਫੀਲਡ ਵਿੱਚ ਵੜਿਆ ਹੈ ਤਾਂ ਕਦੇ ਪਿੱਛੇ ਮੁੜ ਕੇ ਨਹੀਂ ਦੇਖਣਾ ਕਿਉਂਕਿ ਸੋਚਦੇ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਹਨ ਕਿ ਇਹ ਕਰਨਾ ਹੈ, ਉਹ ਕਰਨਾ ਹੈ ਪਰ ਕਰਕੇ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਹੀ ਦਿਖਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਤੂੰ ਬਸ ਇਸ ਫੀਲਡ ਵਿੱਚ ਵੜਿਆ ਹੈ ਤਾਂ ਇਸ ਉੱਤੇ ਡਟੇ ਰਹਿਣਾ, ਇਸ ਉੱਤੇ ਅੱਗੇ ਵਧਣਾ ਹੈ। ਤੈਨੂੰ ਸਾਰੀਆਂ ਸਹੂਲਤਾਂ, ਸਭ ਚੀਜ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਅਸੀਂ ਸਹਿਯੋਗ ਕਰਾਂਗੇ, ਪਰਿਵਾਰਕ ਸਹਿਯੋਗ, ਵਿੱਤੀ ਸਹਿਯੋਗ, ਸਭ ਚੀਜ਼ਾਂ ਅਸੀਂ ਲੋਕ ਕਰਾਂਗੇ ਬਸ ਤੂੰ ਮਿਹਨਤ ਕਰ ਅਤੇ ਇੰਡੀਆ ਨੂੰ ਦਿਖਾ ਕਿ ਭਾਰਤੀ ਵੀ ਭੱਜ ਸਕਦੇ ਹਨ ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਮੈਨੂੰ ਵੀ ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਸਨ ਕਿ ਭਾਰਤੀਆਂ ਦੇ ਜੀਨਸ ਅਜਿਹੇ ਨਹੀਂ ਹਨ ਕਿ ਉਹ ਸਬ 10 ਜਾਂ ਸਬ 10.1 ਦੇ ਅੰਦਰ ਭੱਜ ਸਕਦੇ ਹਨ ਜਾਂ ਕੋਈ ਉਹ ਸਪ੍ਰਿੰਟ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ਪਰ ਹੁਣ ਅਸੀਂ ਦੋਵਾਂ ਨੇ ਅਜਿਹਾ ਸਾਬਤ ਕੀਤਾ ਕਿ ਭਾਰਤੀ ਵੀ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ। ਅਜਿਹਾ ਕੋਈ ਔਖਾ ਨਹੀਂ ਹੈ ਸਾਡੇ ਲਈ, ਅਸੀਂ ਵੀ ਸਭ ਕੁਝ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਾਂ। ਤਾਂ ਸਰ ਇਹ ਸਾਰੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ ਅਤੇ ਜਿਵੇਂ-ਜਿਵੇਂ ਅਸੀਂ ਟਰੇਨਿੰਗ ਕਰ ਰਹੇ ਹਾਂ ਅਸੀਂ ਹੋਰ ਟਾਈਮਿੰਗ ਤੋੜ ਰਹੇ ਹਾਂ ਆਪਣਾ ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਭਾਰਤੀਆਂ ਨੂੰ ਵੀ ਇਹ ਚੀਜ਼ ਦਿਖ ਰਹੀ ਹੈ ਕਿ ਭਾਰਤੀ ਵੀ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਅਸੀਂ ਹੋਰ ਕਰਾਂਗੇ ਸਰ ਅਜੇ ਅਤੇ ਅਜੇ ਅਸੀਂ ਦੋਵਾਂ ਦੀ ਸਿਲੈਕਸ਼ਨ ਕਾਮਨਵੈਲਥ ਗੇਮਜ਼ ਲਈ ਵੀ ਹੋਈ ਹੈ ਤਾਂ ਉੱਥੇ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਮੁਕਾਬਲੇ ਵਿੱਚ ਅਸੀਂ ਹੋਰ ਵਧੀਆ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕਰਾਂਗੇ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਅੱਛਾ ਦੇਖੋ ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਵੀ ਇੱਕ ਉਤਸੁਕਤਾ ਹੈ। ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਹੋਵੇਗੀ ਮੈਂ ਸੁਣਿਆ ਹੈ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਚੰਗੇ ਦੋਸਤ ਵੀ ਹੋ ਤੁਸੀਂ ਦੋਵਾਂ ਨੇ ਕੁਝ ਠਾਣ ਰੱਖਿਆ ਸੀ ਕੀ ਕਿ ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਰਿਕਾਰਡ ਤੋੜਿਆ ਤਾਂ ਮੈਂ ਤੇਰਾ ਰਿਕਾਰਡ ਤੋੜ ਦੇਵਾਂ ਕੀ ਪਹਿਲਾਂ ਅਨੀਮੇਸ਼ ਦੱਸ ਦੇਵੇ।

ਅਨੀਮੇਸ਼: ਸਰ ਜੀ ਪਹਿਲਾਂ ਰਿਕਾਰਡ 10.18 ਦਾ ਸੀ ਜੋ ਕਿ ਮੇਰਾ ਹੀ ਸੀ ਅਤੇ ਫਿਰ ਉਸ ਨੂੰ ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਨੇ ਸੈਮੀ-ਫਾਈਨਲ ਵਿੱਚ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ 10.17 ਕਰਕੇ ਅਤੇ ਮੈਂ ਫਿਰ ਤੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਸੈਮੀ-ਫਾਈਨਲ 2 ਵਿੱਚ 10.15 ਕਰਕੇ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਤਾਂ ਉਸ ਸਮੇਂ ਜਦੋਂ ਮੇਰਾ ਸੈਮੀ-ਫਾਈਨਲ ਹੋਇਆ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਹੀ ਖ਼ੁਸ਼ ਸੀ ਕਿ ਹਾਂ ਚਲੋ ਠੀਕ ਹੈ, ਅੱਜ ਰਿਕਾਰਡ ਟੁੱਟਿਆ ਅਤੇ ਚਲੋ ਅਸੀਂ ਦੋਵਾਂ ਨੇ ਤੋੜਿਆ ਇੱਦਾਂ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਸ ਸਮੇਂ ਕੰਪੀਟੀਸ਼ਨ ਵਿੱਚ ਮੁਕਾਬਲੇਬਾਜ਼ੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ ਪਰ ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਠਾਣ ਕੇ ਰੱਖੇ ਸੀ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਉਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਅਸੀਂ ਸਾਊਦੀ ਅਰਬ ਵੀ ਗਏ ਸੀ ਕੰਪੀਟੀਸ਼ਨ ਕਰਨ ਲਈ ਤਾਂ ਉੱਥੇ ਵੀ ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਰੂਮਮੇਟਸ ਸੀ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਉੱਥੇ ਵੀ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਸੀ ਕਿ ਇੰਡੀਆ ਦੇ ਸਪ੍ਰਿੰਟਿੰਗ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਲੈ ਕੇ ਜਾਣਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸਾਡੇ ਹੀ ਹੱਥਾਂ ਵਿੱਚ ਹੈ ਉਹ ਚੀਜ਼ ਅਸੀਂ ਜੋ ਕਰਾਂਗੇ ਉਹੀ ਬਾਕੀਆਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰੇਗਾ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ ਕੀ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੋਗੇ?

ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ: ਅਸੀਂ ਦੋਵਾਂ ਨੇ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਸੀ ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਚੰਗਾ ਭੱਜਾਂਗੇ। ਤਾਂ ਕਦੇ ਵੀ ਸਰ ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਲੋੜ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਦੇ ਨਾਲ ਖੜ੍ਹੇ ਹੁੰਦੇ ਹਾਂ ਜਿਵੇਂ ਹੁਣ ਰਿਕਾਰਡ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਰਿਕਾਰਡ ਕੀਤਾ ਫਿਰ ਅਨੀਮੇਸ਼ ਨੇ ਕੀਤਾ। ਤਾਂ ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਵਾਰਮ-ਅੱਪ ਕਰ ਰਹੇ ਸੀ ਤਾਂ ਮੈਂ ਅਨੀਮੇਸ਼ ਨੂੰ ਦੱਸ ਰਿਹਾ ਸੀ, ਅਨੀਮੇਸ਼ ਉਹ ਬਲਾਕ ਸਹੀ ਹੈ ਉਸ ਉੱਤੇ ਜਾ ਕੇ ਬੈਠ ਉੱਥੇ ਸਟ੍ਰਾਈਡ ਕਰ ਲੈ ਅਸੀਂ ਵਾਰਮ-ਅੱਪ ਇੱਥੇ ਕਰਾਂਗੇ, ਇੱਥੇ ਵਾਰਮ-ਅੱਪ ਸਹੀ ਹੋਵੇਗਾ ਤਾਂ ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਦੀ ਮਦਦ ਕਰਦੇ ਹਾਂ, ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਦੀ ਮਦਦ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਤਾਂ ਦੂਜਾ ਵੀ ਇੰਪਰੂਵ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਅਸੀਂ ਵੀ ਇੰਪਰੂਵ ਕਰਦੇ ਹਾਂ। ਤਾਂ ਦੋਸਤੀ ਵੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਪਰ ਸਰ ਅਸੀਂ ਗਰਾਊਂਡ ਦੇ ਬਾਹਰ ਹਾਂ, ਕੰਪੀਟੀਸ਼ਨ ਦੇ ਬਾਹਰ ਹਾਂ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਦੋਸਤ ਹਾਂ, ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਗਰਾਊਂਡ ਵਿੱਚ ਚਲੇ ਜਾਂਦੇ ਹਾਂ ਤਾਂ ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਦੇ ਮੁਕਾਬਲੇਬਾਜ਼ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਾਂ। ਤਾਂ ਇਹ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਮੈਂ ਇਸ ਤੋਂ ਤੇਜ਼ ਭੱਜਾਂਗਾ, ਮੈਂ ਇਸ ਤੋਂ ਤੇਜ਼ ਭੱਜਾਂਗਾ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਦੇਖੋ ਤੁਸੀਂ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਜੋ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕੀਤਾ ਹੈ ਨਾ ਉਹ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਮਾਣ ਵਧਾਉਣ ਲਈ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਭਵਿੱਖ ਵਿੱਚ ਇਸ ਜਗ੍ਹਾ ਉੱਤੇ ਪਹੁੰਚਾਉਣ ਲਈ ਕੀਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸਕਾਰਾਤਮਕ ਭਾਵਨਾ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਮੈਂ ਮੰਨਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਤੁਹਾਡਾ ਇਹ ਜੋ ਸਪੋਰਟਸਮੈਨ ਸਪਿਰਿਟ ਹੈ, ਖੇਡਣਾ ਵੀ ਹੈ, ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਚੁਣੌਤੀ ਵੀ ਦੇਣਾ ਹੈ ਅਤੇ ਫਿਰ ਅੱਗੇ ਨਿਕਲਣ ਲਈ ਯਤਨ ਕਰਨਾ ਹੈ ਅਤੇ ਫਿਰ ਅੱਗੇ ਜਾਣ ਲਈ ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਦੀ ਮਦਦ ਕਰਨਾ ਹੈ ਇਹ ਅਦਭੁਤ ਕੰਮ ਕੀਤਾ ਹੈ ਤੁਸੀਂ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਮੇਰੇ ਵੱਲੋਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਵਧਾਈ, ਮੇਰੀਆਂ ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਸ਼ੁਭਕਾਮਨਾਵਾਂ ਅਤੇ ਤੁਸੀਂ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਨਾਮ ਵੀ ਰੋਸ਼ਨ ਕਰੋਗੇ ਮੈਨੂੰ ਪੂਰਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਹੈ ਤੁਸੀਂ ਇੱਦਾਂ ਹੀ ਮਿਹਨਤ ਕਰਦੇ ਰਹੋ ਬਹੁਤ ਤਰੱਕੀ ਹੋਵੇਗੀ, ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਸ਼ੁਭਕਾਮਨਾਵਾਂ ਮੇਰੀਆਂ।

ਗੁਰਿੰਦਰਵੀਰ/ਅਨੀਮੇਸ਼: ਸ਼ੁਕਰੀਆ ਸਰ, ਸ਼ੁਕਰੀਆ ਤੁਹਾਡਾ।

ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ: ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਧੰਨਵਾਦ।

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ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਦੇਸ਼-ਵਾਸੀਓ,

ਇਸ ਵੇਲੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਹਿੱਸਿਆਂ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਗਰਮੀ ਪੈ ਰਹੀ ਹੈ। ਤੇਜ਼ ਧੁੱਪ, ਗਰਮ ਹਵਾਵਾਂ, ਅਜਿਹੇ ਮੌਸਮ ਵਿੱਚ ਆਪਣਾ ਧਿਆਨ ਰੱਖਣਾ ਬਹੁਤ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਪਾਣੀ ਪੀਂਦੇ ਰਹੋ। ਧੁੱਪ ਵਿੱਚ ਜੇ ਨਿਕਲਣਾ ਹੀ ਪਵੇ ਤਾਂ ਥੋੜ੍ਹਾ ਸੰਭਲ ਕੇ ਨਿਕਲੋ। ਇਸ ਦਿਸ਼ਾ ਵਿੱਚ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਵਿਭਾਗਾਂ ਨੇ ਜੋ ਗਾਈਡਲਾਈਨਜ਼ ਜਾਰੀ ਕੀਤੀਆਂ ਹਨ ਉਹ ਵੀ ਨਾ ਭੁੱਲਿਓ।

ਸਾਥੀਓ,

ਸਾਡੇ ਇੱਥੇ ਗਰਮੀ ਨਾਲ ਲੜਨ ਦਾ ਤਰੀਕਾ ਕਈ ਵਾਰ ਰਸੋਈ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਦੇਖਿਆ ਹੋਵੇਗਾ ਜਿਵੇਂ-ਜਿਵੇਂ ਗਰਮੀ ਵਧਦੀ ਹੈ, ਉਵੇਂ-ਉਵੇਂ ਘਰ ਦੀ ਰਸੋਈ ਦਾ ਸਵਾਦ ਬਦਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਰਸੋਈ ਦੀ ਕਿਸਮ ਬਦਲ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਕਿਤੇ ਘੜੇ ਦਾ ਪਾਣੀ ਨਿਕਲ ਆਉਂਦਾ ਹੈ, ਕਿਤੇ ਦਹੀਂ ਜੰਮਣ ਲੱਗਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਕਿਤੇ ਕੱਚੇ ਅੰਬ ਉੱਬਲਣ ਲੱਗਦੇ ਹਨ - ਅਤੇ ਫਿਰ ਸ਼ੁਰੂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਦੇਸੀ ਪੀਣ ਵਾਲੇ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦਾ ਦੌਰ। ਦੇਸੀ ਸ਼ਰਬਤਾਂ ਤੋਂ ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਜਾਣੂ ਹੋ, ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਉੱਤਰ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਜਾਓਗੇ ਤਾਂ ਕਾਫੀ ਜਗ੍ਹਾ ਤੁਹਾਨੂੰ ਮਿਲੇਗਾ ਆਮ ਪੰਨਾ, ਕੱਚੇ ਅੰਬ ਦਾ ਸਵਾਦ ਅਤੇ ਗਰਮੀ ਤੋਂ ਰਾਹਤ ਵੀ। ਪੰਜਾਬ-ਹਰਿਆਣਾ ਜਾਓ ਤਾਂ ਲੱਸੀ ਮਿਲ ਜਾਵੇਗੀ, ਵੱਡੇ ਗਲਾਸ ਵਾਲੀ ਲੱਸੀ। ਰਾਜਸਥਾਨ ਅਤੇ ਗੁਜਰਾਤ ਵਿੱਚ ਛਾਛ, ਜਿਵੇਂ ਹਰ ਖਾਣੇ ਦੀ ਸਾਥੀ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਅਤੇ ਬਿਹਾਰ, ਝਾਰਖੰਡ, ਪੂਰਬੀ ਉੱਤਰ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਸੱਤੂ ਦਾ ਸ਼ਰਬਤ, ਉਸ ਦੀ ਤਾਂ ਗੱਲ ਹੀ ਕੀ ਹੈ - ਪੇਟ ਵੀ ਭਰੇ, ਤਾਕਤ ਵੀ ਦੇਵੇ। ਕੋਂਕਣ ਅਤੇ ਗੋਆ ਵਿੱਚ ਕੋਕਮ ਸ਼ਰਬਤ, ਸੋਲ ਕੜ੍ਹੀ। ਦੱਖਣ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਪਾਨਕਮ, ਨੀਰ ਮੋਰ, ਸੰਬਾਰਮ ਅਤੇ ਉੜੀਸਾ ਵਿੱਚ ਬੇਲ ਪਨਾ, ਉਹ ਸਿਰਫ਼ ਸ਼ਰਬਤ ਨਹੀਂ, ਭਾਰਤ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਖੇਤਰਾਂ ਦੀ ਪਰੰਪਰਾ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਹੈ। ਅਤੇ ਇਸ ਵਿੱਚ ‘ਏਕ ਭਾਰਤ-ਸ੍ਰੇਸ਼ਠ ਭਾਰਤ’ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਦੀ ਝਲਕ ਵੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਅਤੇ ਇੱਕ ਗੱਲ ਜ਼ਰੂਰ ਧਿਆਨ ਰੱਖਿਓ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਚੀਜ਼ਾਂ ਸਾਡੀ ਆਪਣੀ ਰਸੋਈ ਵਿੱਚੋਂ ਨਿਕਲੀਆਂ ਹਨ, ਸਾਡੇ ਖੇਤ-ਖਲਿਆਣ ਵਿੱਚੋਂ ਨਿਕਲੀਆਂ ਹਨ। ਕੋਈ ਵੱਡੀ ਬ੍ਰਾਂਡਿੰਗ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਪਰ ਪੀੜ੍ਹੀਆਂ ਦਾ ਤਜਰਬਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਸਮਾਇਆ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਗਰਮੀ ਦੌਰਾਨ ਦੇਸੀ ਸ਼ਰਬਤਾਂ ਦਾ ਖੂਬ ਆਨੰਦ ਲਓ।

ਸਾਥੀਓ,

ਗਰਮੀ ਆਉਂਦਿਆਂ ਹੀ ਇੱਕ ਹੋਰ ਚਰਚਾ ਹਰ ਘਰ ਵਿੱਚ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉਹ ਹੈ ਅੰਬ। ਅੰਬ, ਆਮ ਚਰਚਾ ਦਾ ਵਿਸ਼ਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਇਦ ਹੀ ਕੋਈ ਘਰ ਹੋਵੇਗਾ ਜਿੱਥੇ ਗਰਮੀਆਂ ਵਿੱਚ ਅੰਬ ਦੀ ਗੱਲ ਨਾ ਹੁੰਦੀ ਹੋਵੇ। ਹਰ ਇਲਾਕੇ ਦਾ ਆਪਣਾ ਅੰਬ, ਆਪਣਾ ਸਵਾਦ, ਆਪਣੀ ਖ਼ੁਸ਼ਬੂ। ਮਹਾਰਾਸ਼ਟਰ ਅਤੇ ਕੋਂਕਣ ਦਾ ਹਾਪੁਸ, ਅਲਫੌਂਸੋ, ਗੁਜਰਾਤ ਦਾ ਕੇਸਰ, ਇਹ ਤਾਂ ਆਮਰਸ ਦੀ ਜਾਨ ਹੈ, ਉੱਤਰ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਦਾ ਦਸ਼ਹਿਰੀ ਅਤੇ ਮੇਰੀ ਕਾਸ਼ੀ ਦਾ ਲੰਗੜਾ। ਵੈਸੇ, ਲੰਗੜੇ ਅੰਬ ਦੀ ਇੱਕ ਖ਼ਾਸ ਗੱਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ - ਪੱਕਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਉਸਦਾ ਰੰਗ ਕਈ ਵਾਰ ਹਰਾ ਹੀ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਬਿਹਾਰ ਦਾ ਜਰਦਾਲੂ ਜਿਸਦੀ ਖ਼ੁਸ਼ਬੂ ਦੂਰੋਂ ਪਛਾਣ ਵਿੱਚ ਆ ਜਾਵੇ। ਚੌਸਾ, ਮਾਲਦਾ - ਹਰ ਨਾਮ ਦੇ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਜੁੜੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ। ਦੱਖਣ ਭਾਰਤ ਜਾਓ, ਤਾਂ ਬੰਗਨਪੱਲੀ, ਤੋਤਾਪੁਰੀ, ਨੀਲਮ, ਮਲਗੋਵਾ, ਬੰਗਾਲ ਦਾ ਹਿਮਸਾਗਰ, ਉੜੀਸਾ ਅਤੇ ਆਂਧਰਾ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਦਾ ਸੁਵਰਨਰੇਖਾ। ਭਾਵ, ਜਗ੍ਹਾ ਬਦਲਦੀ ਹੈ, ਅੰਬ ਦਾ ਰੂਪ-ਰੰਗ ਅਤੇ ਉਸਦਾ ਸਵਾਦ ਵੀ ਬਦਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਅਤੇ ਸਾਥੀਓ ਅੰਬ ਦੀ ਇਹ ਯਾਤਰਾ, ਹੁਣ ਪਿੰਡ ਤੋਂ, ਆਲਮੀ ਬਾਜ਼ਾਰ ਤੱਕ ਵੀ ਪਹੁੰਚ ਰਹੀ ਹੈ। ਅੱਜ ‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਰਾਹੀਂ ਮੈਂ ਅੰਬ ਦੀ ਪੈਦਾਵਾਰ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਆਪਣੇ ਕਿਸਾਨ ਭੈਣ-ਭਰਾਵਾਂ ਦੀ ਸ਼ਲਾਘਾ ਕਰਾਂਗਾ। ਤੁਸੀਂ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਖੇਤੀ ਅਰਥ-ਵਿਵਸਥਾ ਲਈ ਆਮ ਕਿਸਾਨ ਨਹੀਂ ਬਹੁਤ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਹੋ। ਇੱਦਾਂ ਹੀ ਛਾਏ ਰਹੋ।

ਸਾਥੀਓ,

ਗਰਮੀ ਦੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਿਨਾਂ ਵਿੱਚ, ਇੱਦਾਂ ਤਾਂ ਸਕੂਲਾਂ ਦੀਆਂ ਛੁੱਟੀਆਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ, ਪਰ, ਮੈਂ ਇੱਕ ਅਜਿਹੀ ਕਲਾਸ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗਾ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਤੁਹਾਡਾ ਦਾਖ਼ਲਾ ਕਰਵਾਉਣ ਦਾ ਮਨ ਕਰ ਜਾਵੇਗਾ। ਸਾਥੀਓ, ਇੱਕ ਸਥਿਤੀ ਦੀ ਕਲਪਨਾ ਕਰੋ, ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਸਕੂਲ ਜਿੱਥੇ ਬੱਚੇ ਵੀ ਆਉਂਦੇ ਹੋਣ, ਨੌਜਵਾਨ ਵੀ ਅਤੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਵੀ, ਜਿੱਥੇ ਕੋਈ ਫੀਸ ਨਾ ਹੋਵੇ, ਕੋਈ ਵੱਡੀ ਇਮਾਰਤ ਨਾ ਹੋਵੇ, ਕੋਈ ਕਲਾਸਰੂਮ ਵੀ ਨਾ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਰੋਚਕ ਗੱਲ, ਉੱਥੇ ਕਲਾਸ ਨਦੀ ਵਿੱਚ ਲੱਗਦੀ ਹੋਵੇ।

ਸਾਥੀਓ,

ਇਹ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਇੱਕ ਸੱਚਾ ਯਤਨ ਹੈ। ਕੇਰਲਮ ਦੇ ਆਲੁਵਾ ਵਿੱਚ, ਸਾਜੀ ਵਲਾਸ਼ੇਰਿਲ ਜੀ ਅਜਿਹਾ ਹੀ ਇੱਕ ਸਵਿਮਿੰਗ ਕਲੱਬ ਚਲਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਹੁਣ ਤੱਕ 15 ਹਜ਼ਾਰ ਤੋਂ ਵੱਧ ਲੋਕ ਇੱਥੇ ਤੈਰਨਾ ਸਿੱਖ ਚੁੱਕੇ ਹਨ। ਸਾਜੀ ਜੀ ਨੇ ਦਿਵਯਾਂਗ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਵੀ ਤੈਰਾਕੀ ਸਿਖਾਈ ਹੈ। ਇਸ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਦੇ ਪਿੱਛੇ, ਇੱਕ ਪੀੜ ਵੀ ਲੁਕੀ ਹੈ। ਕੁਝ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ, ਇੱਕ ਕਿਸ਼ਤੀ ਹਾਦਸੇ ਵਿੱਚ ਕਈ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ। ਉਸ ਘਟਨਾ ਨੇ ਸਾਜੀ ਜੀ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਤੱਕ ਝੰਜੋੜ ਦਿੱਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੋਚਿਆ, ਜੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਤੈਰਨਾ ਆਉਂਦਾ ਹੁੰਦਾ, ਤਾਂ ਸ਼ਾਇਦ ਕਈ ਜਾਨਾਂ ਬਚ ਜਾਂਦੀਆਂ - ਬਸ ਇੱਥੋਂ ਹੀ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਇਹ ਮੁਹਿੰਮ।

ਸਾਥੀਓ,

ਸਾਜੀ ਵਲਾਸ਼ੇਰਿਲ ਜੀ ਦਾ ਜੀਵਨ, ਸਾਨੂੰ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਸਿੱਖਿਆ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਸੇਵਾ ਕਰਨ ਲਈ ਬਹੁਤ ਵੱਡੇ ਸਾਧਨ ਜ਼ਰੂਰੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ - ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਇੱਕ ਚੰਗਾ ਇਰਾਦਾ ਅਤੇ ਲਗਾਤਾਰ ਕੀਤੀ ਗਈ ਕੋਸ਼ਿਸ਼। ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਦਮ ਉੱਤੇ, ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਬਦਲਾਅ ਲਿਆਂਦਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।

ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਦੇਸ਼-ਵਾਸੀਓ,

ਪਿਛਲੇ ਦਿਨੀਂ ਮੈਨੂੰ ਯੂਰਪ ਦੇ ਨੀਦਰਲੈਂਡਜ਼ ਜਾਣ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲਿਆ। ਉੱਥੇ ਮੈਂ ਕਈ ਮੀਟਿੰਗਾਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਇਆ। ਇਸੇ ਦੌਰਾਨ ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਪਲ ਆਇਆ ਜਿਸ ਨੇ ਹਰ ਭਾਰਤੀ ਨੂੰ ਮਾਣ ਨਾਲ ਭਰ ਦਿੱਤਾ। ਨੀਦਰਲੈਂਡਜ਼ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸਮਾਗਮ ਵਿੱਚ ਚੋਲ ਕਾਲ ਦੀਆਂ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਤਾਂਬੇ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ (ਤਾਮਰ ਪੱਤਰੀਆਂ) ਭਾਰਤ ਨੂੰ ਵਾਪਸ ਸੌਂਪੀਆਂ ਗਈਆਂ। ਉਸ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਵਿੱਚ ਨੀਦਰਲੈਂਡਜ਼ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਵੀ ਮੌਜੂਦ ਸਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਤਾਂਬੇ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਮੈਨੂੰ ਦੇਸ਼-ਵਿਦੇਸ਼ ਤੋਂ ਲਗਾਤਾਰ ਸੰਦੇਸ਼ ਮਿਲ ਰਹੇ ਹਨ। ਲੋਕ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਜਤਾ ਰਹੇ ਹਨ, ਮਾਣ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਦੁਨੀਆ ਭਰ ਦੇ ਤਾਮਿਲ ਭਾਈਚਾਰੇ ਵਿੱਚ ਵੀ ਇਸ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਉਤਸ਼ਾਹ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਇਨ੍ਹਾਂ ਤਾਂਬੇ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਕਾਫੀ ਉਤਸੁਕਤਾ ਵੀ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਅੱਜ ਮੈਂ ਇਸ ਨਾਲ ਜੁੜੀਆਂ ਕੁਝ ਗੱਲਾਂ ਤੁਹਾਡੇ ਨਾਲ ਸਾਂਝੀਆਂ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ 21 ਵੱਡੀਆਂ ਅਤੇ ਤਿੰਨ ਛੋਟੀਆਂ ਤਾਂਬੇ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ ਹਨ। ਇਹ ਮੁੱਖ ਤੌਰ ਉੱਤੇ ਰਾਜਾ ਰਾਜੇਂਦਰ ਚੋਲ-ਪਹਿਲੇ ਵੱਲੋਂ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਰਾਜਾ ਰਾਜਰਾਜਾ ਚੋਲ ਦੇ ਇੱਕ ਵਚਨ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਨਾਲ ਜੁੜੀਆਂ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਆਨਇਮੰਗਲਮ ਪਿੰਡ ਨੂੰ ਇੱਕ ਬੋਧੀ ਵਿਹਾਰ ਨੂੰ ਦਾਨ ਦੇਣ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਹੈ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਤਾਂਬੇ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ ਵਿੱਚ ਚੋਲ ਵੰਸ਼ ਦੀਆਂ ਪ੍ਰਾਪਤੀਆਂ ਦਾ ਵੀ ਵਰਣਨ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਪਤਾ ਚੱਲਦਾ ਹੈ ਕਿ ਚੋਲ ਸਾਮਰਾਜ ਦੀ ਸਮੁੰਦਰੀ ਤਾਕਤ ਕਿੰਨੀ ਮਜ਼ਬੂਤ ਸੀ। ਦੱਖਣ-ਪੂਰਬੀ ਏਸ਼ੀਆ ਦੇ ਦੇਸ਼ਾਂ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਬੰਧਾਂ ਦੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਵੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਮਿਲਦੀ ਹੈ।

ਚੋਲ ਸਾਮਰਾਜ ਦੇ ਅਮੀਰ ਇਤਿਹਾਸ ਅਤੇ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਉੱਤੇ ਸਾਡੇ ਸਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਮਾਣ ਹੈ। ਸਾਥੀਓ, ਸਾਡੀ ਸਰਕਾਰ ਭਾਰਤ ਦੀਆਂ ਅਜਿਹੀਆਂ ਅਨਮੋਲ ਵਿਰਾਸਤਾਂ ਦੀ ਸੰਭਾਲ ਲਈ ਲਗਾਤਾਰ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਰਹੀ ਹੈ। ਇਸੇ ਲੜੀ ਵਿੱਚ ‘ਗਿਆਨ ਭਾਰਤਮ ਅਭਿਆਨ’ ਤਹਿਤ ਛੱਤੀਸਗੜ੍ਹ ਦੇ ਮਲਹਾਰ ਵਿੱਚ ਵੀ ਇੱਕ ਅਹਿਮ ਖੋਜ ਹੋਈ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਤਿੰਨ ਦੁਰਲੱਭ ਤਾਂਬੇ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ ਮਿਲੀਆਂ ਹਨ। ਇਹ ਪਾਂਡੂਵੰਸ਼ੀ ਰਾਜਵੰਸ਼ ਦੇ ਮਹਾਰਿਸ਼ੀ ਬਾਲਾਰਜੁਨ ਦੇ ਸ਼ਾਸਨਕਾਲ ਨਾਲ ਜੁੜੀਆਂ ਮੰਨੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਮਾਹਿਰ ਮੰਨਦੇ ਹਨ ਕਿ ਇਹ ਸ਼ਿਲਾਲੇਖ ਛੇਵੀਂ-ਸੱਤਵੀਂ ਸਦੀ ਦੇ ਹਨ ਭਾਵ 1400, 1500 ਸਾਲ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਇਹ ਤਾਂਬੇ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਬ੍ਰਾਹਮੀ ਲਿਪੀ ਅਤੇ ਪਾਲੀ ਭਾਸ਼ਾ ਵਿੱਚ ਲਿਖੀਆਂ ਗਈਆਂ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੀ ਸ਼ਾਸਨ-ਵਿਵਸਥਾ, ਧਰਮ ਅਤੇ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਬਾਰੇ ਅਹਿਮ ਜਾਣਕਾਰੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਸਾਡੇ ਭਾਰਤੀਆਂ ਵਿੱਚ ਖਗੋਲ ਵਿਗਿਆਨ ਯਾਨੀ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਹਮੇਸ਼ਾ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਖਿੱਚ ਰਹੀ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਅੱਜ ਵੀ ਸਦੀਆਂ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਆਬਜ਼ਰਵੇਟਰੀਆਂ ਮੌਜੂਦ ਹਨ। ਇੱਥੇ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਗਣਿਤਿਕ ਖੋਜਾਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ। ਦਿਸ਼ਾ-ਨਿਰਦੇਸ਼ਨ ਹੋਵੇ, ਪੰਚਾਂਗ ਹੋਵੇ, ਜਾਂ ਸਾਡੇ ਪੁਰਬ-ਤਿਉਹਾਰ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਭ ਦਾ ਸਬੰਧ ਅਕਾਸ਼ ਅਤੇ ਤਾਰਿਆਂ ਨਾਲ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਇੱਥੇ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਨੇ ਹਰ ਪੀੜ੍ਹੀ ਵਿੱਚ ਉਤਸੁਕਤਾ ਜਗਾਈ ਹੈ। ਉਸ ਨੂੰ ਖੋਜ ਲਈ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕੀਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਅੱਜ ਦੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਇਸ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਕਾਫੀ ਉਤਸ਼ਾਹ ਦਿਖਾਈ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਅੱਜ-ਕੱਲ੍ਹ ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਦੇਖਦੇ ਹੋਵੋਗੇ, ਦੇਸ਼ ਭਰ ਵਿੱਚ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਕਲੱਬਸ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਮਸ਼ਹੂਰ ਹੋ ਰਹੇ ਹਨ। ਵੱਡੇ ਸ਼ਹਿਰਾਂ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਛੋਟੇ ਕਸਬਿਆਂ ਤੱਕ, ਸਕੂਲਾਂ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਪਾਰਕਾਂ ਤੱਕ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਗਤੀਵਿਧੀਆਂ ਦਿਖਾਈ ਦਿੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਮੈਨੂੰ ਬੈਂਗਲੁਰੂ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀਕਲ ਸੁਸਾਇਟੀ ਬਾਰੇ ਜਾਣਕਾਰੀ ਮਿਲੀ। ਇੱਥੇ ਨਿਰੀਖਣ ਸੈਸ਼ਨ ਕਰਵਾਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਸੰਸਥਾ ਨੇ ਪੇਂਡੂ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿੱਚ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਨੂੰ ਮਸ਼ਹੂਰ ਕਰਨ ਦਾ ਮਿਸ਼ਨ ਵੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਹੈ। ‘ਖਗੋਲ ਮੰਡਲ’ ਨਾਮ ਦੀ ਇੱਕ ਟੀਮ ਨੇ 30 ਘੰਟੇ ਦਾ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਹੀ ਨਵੀਨਤਾਕਾਰੀ ਕੋਰਸ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਰਾਤ ਨੂੰ ਤਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਨਿਹਾਰਨਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਅਨੁਭਵ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਐਸਟ੍ਰੋ ਕੇਰਲਾ ਨਾਮ ਦੀ ਇੱਕ ਸੰਸਥਾ ਨਾਈਟ ਆਬਜ਼ਰਵੇਸ਼ਨ ਕੈਂਪਸ ਅਤੇ ਵਰਕਸ਼ਾਪਸ ਲਾਉਂਦੀ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਨੌਜਵਾਨ ਸਾਥੀ ਟੈਲੀਸਕੋਪ ਬਣਾਉਣਾ ਅਤੇ ਸਟਾਰ ਮੈਪਸ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਨਾ ਸਿੱਖਦੇ ਹਨ। ਰਾਜਕੋਟ ਦੇ ਬਿੱਗ ਬੈਂਗ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਕਲੱਬ ਨੇ ਗਿਰ ਦੇ ਜੰਗਲਾਂ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਕੱਛ ਦੇ ਰਣ ਤੱਕ ਕਈ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਈਵੈਂਟਸ ਕਰਵਾਏ ਹਨ। ‘ਜੋਤਿਰਵਿਦਿਆ ਪਰਿਸੰਸਥਾ’ ਵੀ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਪੁਰਾਣੇ ਸੰਸਥਾਨਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਆਬਜ਼ਰਵੇਸ਼ਨਲ ਫੈਸਿਲਿਟੀਜ਼ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਕਿਤਾਬਾਂ, ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ ਅਤੇ ਟੈਲੀਸਕੋਪ ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ ਦੀ ਸਹੂਲਤ ਵੀ ਹੈ। ਮੈਂ ਆਈਸੈਕ ਦਾ ਵੀ ਜ਼ਿਕਰ ਕਰਨਾ ਚਾਹਾਂਗਾ। ਇਹ ਇੱਕ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਾਲਾ ਰਾਸ਼ਟਰ-ਵਿਆਪੀ ਨੈੱਟਵਰਕ ਹੈ, ਜੋ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਅਤੇ ਐਸਟ੍ਰੋਫਿਜ਼ਿਕਸ ਕਲੱਬਸ ਨੂੰ ਆਪਸ ਵਿੱਚ ਜੋੜਦਾ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਆਪਣੇ ਸ਼ੌਕ ਲਈ ਸਮਾਂ ਕੱਢਣਾ ਅਤੇ ਲਗਾਤਾਰ ਕੁਝ ਨਵਾਂ ਸਿੱਖਦੇ ਰਹਿਣਾ ਬਹੁਤ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਮੈਂ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਅਪੀਲ ਕਰਾਂਗਾ ਕਿ ਉਹ ਕਿਸੇ ਐਸਟ੍ਰੋਨੌਮੀ ਕਲੱਬ ਨਾਲ ਜ਼ਰੂਰ ਜੁੜਨ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਛੁੱਟੀਆਂ ਵਿੱਚ ਕਿਸੇ ਪਲੈਨੇਟੇਰੀਅਮ ਨੂੰ ਵੀ ਜ਼ਰੂਰ ਦੇਖਣ ਜਾਣ।

ਸਾਥੀਓ,

‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਨੂੰ ਜੋ ਲੋਕ ਟੀਵੀ ਉੱਤੇ ਦੇਖ ਰਹੇ ਹਨ, ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਹਾਂਗਾ – ਇੱਕ ਵੀਡੀਓ ਜ਼ਰੂਰ ਦੇਖਿਓ। ਇਹ ਵੀਡੀਓ ਪਿਛਲੇ ਦਿਨੀਂ ਬਹੁਤ ਚਰਚਾ ਵਿੱਚ ਰਿਹਾ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਲੋਕ ਬਹੁਤ ਧੀਰਜ ਨਾਲ, ਬਹੁਤ ਸਾਵਧਾਨੀ ਨਾਲ ਇੱਕ ਗੰਗਾ ਡੌਲਫਿਨ ਨੂੰ ਬਚਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਹ ਜਾਣ ਕੇ ਹੈਰਾਨੀ ਹੋਵੇਗੀ, ਇਸ ਪੂਰੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਵਿੱਚ ਕਰੀਬ 13 ਘੰਟੇ ਲੱਗੇ ਅਤੇ ਆਖਿਰਕਾਰ ਉਹ ਡੌਲਫਿਨ ਬਚ ਗਈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਇਸ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਭੂਮਿਕਾ ਰਹੀ – ਭਾਰਤ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਗੰਗਾ ਡੌਲਫਿਨ ਰੈਸਕਿਊ ਐਂਬੂਲੈਂਸ ਦੀ। ਇਹ ਘਟਨਾ ਉੱਤਰ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਦੀ ਹੈ। ਉੱਥੇ ਇੱਕ ਗੰਗਾ ਡੌਲਫਿਨ ਨਹਿਰ ਵਿੱਚ ਫਸ ਗਈ ਸੀ। ਅਜਿਹੇ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ‘ਨਮਾਮਿ ਗੰਗੇ ਅਭਿਆਨ’ ਤਹਿਤ ਬਣੀ ਇਹ ਐਂਬੂਲੈਂਸ ਉਸ ਲਈ ਉਮੀਦ ਬਣ ਕੇ ਪਹੁੰਚੀ। ਫਿਰ ਬਹੁਤ ਸਾਵਧਾਨੀ ਨਾਲ ਉਸ ਨੂੰ ਬਾਹਰ ਕੱਢਿਆ ਗਿਆ। ਉਸ ਦੀ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਗਈ, ਉਸ ਦਾ ਇਲਾਜ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਸ ਨੂੰ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਰਾਪਤੀ ਨਦੀ ਵਿੱਚ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਇੱਕ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਹੀਏ, ਤਾਂ ਇੱਕ ਜੀਵਨ, ਫਿਰ ਆਪਣੇ ਘਰ ਪਰਤ ਗਿਆ।

ਸਾਥੀਓ,

ਇਹ ਡੌਲਫਿਨ ਰੈਸਕਿਊ ਐਂਬੂਲੈਂਸ ਬਹੁਤ ਖ਼ਾਸ ਹੈ। ਇਸ ਨੂੰ ਇੱਕ ਚੱਲਦੇ-ਫਿਰਦੇ ਹਸਪਤਾਲ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਡੌਲਫਿਨ ਨੂੰ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਰੱਖਣ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਹੈ। ਆਕਸੀਜਨ ਦੀ ਸਹੂਲਤ ਹੈ, ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸਟ੍ਰੈਚਰ ਹਨ, ਬਚਾਅ ਦੇ ਉਪਕਰਨ ਹਨ, ਭਾਵ ਜੇ ਕੋਈ ਡੌਲਫਿਨ ਜ਼ਖ਼ਮੀ ਹੋ ਜਾਵੇ, ਨਹਿਰ ਵਿੱਚ ਫਸ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਨਦੀ ਤੋਂ ਵੱਖ ਹੋ ਜਾਵੇ, ਤਾਂ ਤੁਰੰਤ ਉਸ ਦੀ ਮਦਦ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਗੰਗਾ ਡੌਲਫਿਨ ਨੂੰ ਬਚਾਉਂਦੇ ਹਾਂ, ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਪ੍ਰਜਾਤੀ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਬਚਾਉਂਦੇ, ਅਸੀਂ ਗੰਗਾ ਦੀ ਜੈਵਿਕ ਵਿਭਿੰਨਤਾ ਨੂੰ ਬਚਾਉਂਦੇ ਹਾਂ। ਨਦੀ ਦੇ ਪੂਰੇ ਜੀਵਨ ਤੰਤਰ ਨੂੰ ਬਚਾਉਂਦੇ ਹਾਂ ਅਤੇ ਆਪਣੀਆਂ ਆਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਪੀੜ੍ਹੀਆਂ ਲਈ ਕੁਦਰਤ ਦੀ ਇੱਕ ਅਨਮੋਲ ਵਿਰਾਸਤ ਵੀ ਬਚਾਉਂਦੇ ਹਾਂ।

ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਦੇਸ਼-ਵਾਸੀਓ,

ਤੁਹਾਡੇ ਵਿੱਚੋਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਨਦੀ, ਤਲਾਬ ਜਾਂ ਖੂਹ ਦੇ ਪਾਣੀ ਨਾਲ ਜੁੜੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਜ਼ਰੂਰ ਹੋਣਗੀਆਂ। ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਤਲਾਬ ਵਿੱਚ ਤੈਰਨਾ ਯਾਦ ਹੋਵੇਗਾ, ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਦੋਸਤਾਂ ਨਾਲ ਤਲਾਬ ਕਿਨਾਰੇ ਖੇਡਣਾ, ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਉਸ ਮਿੱਟੀ ਦੀ ਖ਼ੁਸ਼ਬੂ ਯਾਦ ਹੋਵੇਗੀ। ਬਚਪਨ ਦੀਆਂ ਅਜਿਹੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਜੀਵਨ ਭਰ ਮਨ ਵਿੱਚ ਵਸੀਆਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਹਨ।

ਸਾਥੀਓ,

ਅਜਿਹੀਆਂ ਹੀ ਯਾਦਾਂ ਨੂੰ ਬਚਾਉਣ ਦੀ ਇੱਕ ਪ੍ਰੇਰਕ ਗਾਥਾ ਉੱਤਰ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਦੇ ਬਸਤੀ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਤੋਂ ਸਾਹਮਣੇ ਆਈ ਹੈ। ਬਸਤੀ ਦੇ ਆਕਾਸ਼ ਗੁਪਤਾ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡ ਦੀ ਮਨੋਰਮਾ ਨਦੀ ਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਬਹੁਤ ਦੁਖੀ ਹੁੰਦੇ ਸਨ। ਕਿਉਂਕਿ ਜਿਸ ਨਦੀ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਬਚਪਨ ਵਿੱਚ ਸਾਫ਼ ਅਤੇ ਜੀਵੰਤ ਦੇਖਿਆ ਸੀ। ਸਮੇਂ ਦੇ ਨਾਲ ਉਸ ਨਦੀ ਵਿੱਚ ਪਲਾਸਟਿਕ ਜਮ੍ਹਾਂ ਹੋਣ ਲੱਗਾ ਸੀ। ਗੰਦਗੀ ਵਧਦੀ ਜਾ ਰਹੀ ਸੀ। ਸ਼੍ਰੀਮਾਨ ਆਕਾਸ਼ ਨੇ ਤੈਅ ਕੀਤਾ ਕਿ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨਹੀਂ ਕਰਨਗੇ, ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਕਰਨਗੇ। "ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨਹੀਂ, ਸ਼ੁਰੂਆਤ" ਮੰਤਰ ਬਣ ਗਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਦੋਸਤਾਂ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲਿਆ। ਸਿਰਫ਼ ਜਾਲ ਸੀ, ਕਹੀ ਸੀ, ਟੋਕਰੀ ਸੀ ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਤਾਕਤ ਸੀ, ਕੁਝ ਬਦਲਣ ਦਾ ਸੰਕਲਪ। ਇਹ ਨੌਜਵਾਨ ਨਦੀ ਵਿੱਚ ਉੱਤਰਦੇ ਸਨ, ਜਲਕੁੰਭੀ ਕੱਢਦੇ ਸਨ। ਪਲਾਸਟਿਕ ਅਤੇ ਕੂੜਾ ਬਾਹਰ ਲਿਆਉਂਦੇ ਸਨ। ਕਈ ਵਾਰ ਇੱਕ ਦਿਨ ਵਿੱਚ 50-60 ਕਿੱਲੋ ਤੱਕ ਕੂੜਾ ਨਦੀ ਵਿੱਚੋਂ ਕੱਢਿਆ ਗਿਆ। ਹੌਲ਼ੀ-ਹੌਲ਼ੀ ਮਨੋਰਮਾ ਨਦੀ ਦਾ ਉਹ ਹਿੱਸਾ ਫਿਰ ਤੋਂ ਸਾਫ਼ ਦਿਖਣ ਲੱਗਾ। ਆਸਪਾਸ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਧਿਆਨ ਵੀ ਇਸ ਕੰਮ ਵੱਲ ਗਿਆ। ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਸਫ਼ਾਈ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਜਾਗਰੂਕਤਾ ਵਧੀ।

ਸਾਥੀਓ,

ਅਜਿਹੀ ਹੀ ਇੱਕ ਪ੍ਰੇਰਕ ਕਹਾਣੀ ਗੋਆ ਤੋਂ ਵੀ ਸਾਹਮਣੇ ਆਈ ਹੈ। ਗੋਆ ਦੇ ਬਾਲਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਅਈਆ ਜੀ ਰਿਟਾਇਰਡ ਟੀਚਰ ਹਨ। ਪਰ ਸਮਾਜ ਲਈ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਉਤਸ਼ਾਹ ਅੱਜ ਵੀ ਉਹੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮੱਡੀ-ਤੋਲਾਪ ਇਲਾਕੇ ਵਿੱਚ ਪਾਣੀ ਦੀ ਸਮੱਸਿਆ ਬਹੁਤ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਕਰਦੀ ਸੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਵੀ ਹੱਲ ਲਈ ਕੰਮ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ। ਬਾਲਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਜੀ ਨੇ ਪਾਈਪਲਾਈਨ ਵਿਛਾਉਣ ਦੇ ਕੰਮ ਵਿੱਚ ਅਹਿਮ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਈ। ਇਸ ਨਾਲ ਕਈ ਘਰਾਂ ਤੱਕ ਪਾਣੀ ਪਹੁੰਚਿਆ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਨੂੰ ਪਾਣੀ ਲਈ ਰੋਜ਼ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰਨਾ ਪੈਂਦਾ ਸੀ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਇਹ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਰਾਹਤ ਬਣੀ।

ਸਾਥੀਓ,

ਪਿਛਲੇ ਮਹੀਨੇ ਮੈਨੂੰ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਅਨੁਭਵ ਹੋਇਆ। ਇਸ ਦਾ ਸਬੰਧ ‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਨਾਲ ਵੀ ਜੁੜਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਅੱਜ ਮੈਂ ਇਸ ਦੀ ਚਰਚਾ ਤੁਹਾਡੇ ਨਾਲ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ। ਤਾਮਿਲਨਾਡੂ ਦੇ ਨਾਗਰਕੋਇਲ ਵਿੱਚ ਮੇਰੀ ਮੁਲਾਕਾਤ ਇੱਕ ਟੀਚਰ ਨਾਲ ਹੋਈ। ਕਰੀਬ ਤਿੰਨ ਦਹਾਕੇ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਿਆ ਸੀ। ਮੈਂ ਗੱਲ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ, ਗਿਰਿਜਾ ਅੰਮਾ ਜੀ ਦੀ। ਇਸ ਮੁਲਾਕਾਤ ਦੌਰਾਨ ਕੁਝ ਨੌਜਵਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਸਨ।

ਸਾਥੀਓ,

ਗਿਰਿਜਾ ਅੰਮਾ ਜੀ ਕਰੀਬ 15 ਸਕੂਲ ਚਲਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਚੇਨੱਈ ਦਾ ਜੈਗੋਪਾਲ ਗਰੋਡੀਆ ਹਿੰਦੂ ਵਿਦਿਆਲਿਆ ਬਹੁਤ ਪ੍ਰਮੁੱਖ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਦੇਸ਼ ਭਗਤੀ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਹਰ ਭਾਰਤਵਾਸੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਤੋਂ ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਲੈ ਕੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਕਈ ਸੈਨਿਕਾਂ ਲਈ ਯੋਗਦਾਨ ਦਾ ਸੰਕਲਪ ਲਿਆ। ਇਸ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸਾਰੇ ਸਕੂਲਾਂ ਦੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕੀਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਿ ਉਹ ਵੀਰ ਜਵਾਨਾਂ ਲਈ ਹਰ ਦਿਨ ਇੱਕ ਰੁਪਿਆ ਯੋਗਦਾਨ ਦੇਣ। ਭਾਵ ਇੱਕ ਸਾਲ ਵਿੱਚ ਹਰ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਨੇ 365 ਰੁਪਏ ਜਮ੍ਹਾਂ ਕੀਤੇ। ਇਸ ਛੋਟੇ-ਛੋਟੇ ਯੋਗਦਾਨ ਨਾਲ ਕਰੀਬ 40 ਲੱਖ ਰੁਪਏ ਇਕੱਠੇ ਹੋਏ। ਗਿਰਿਜਾ ਅੰਮਾ ਜੀ ਨੇ ਇਸ ਪੂਰੀ ਰਾਸ਼ੀ ਦਾ ਚੈੱਕ ਮੈਨੂੰ ਸੌਂਪਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਗੱਲਬਾਤ ਦੌਰਾਨ ਮੈਂ ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤਾ ਕਿ ਮਾਂ ਭਾਰਤੀ ਪ੍ਰਤੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਮਰਪਣ ਕਿੰਨਾ ਡੂੰਘਾ ਹੈ। ਪਿਛਲੇ ਸਾਲ ਹੀ ਚੇਨਈ ਦੇ ਪਹਿਲੇ ਹਿੰਦੂ ਵਿਦਿਆਲਿਆ ਨੇ ਆਪਣੇ 50 ਸਾਲ ਪੂਰੇ ਕੀਤੇ ਹਨ। ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸੱਭਿਆਚਾਰਕ ਮਾਣ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਵਧਾਉਣ ਵਿੱਚ ਇਸ ਸਕੂਲ ਨੈੱਟਵਰਕ ਦੀ ਭੂਮਿਕਾ ਬਹੁਤ ਸ਼ਲਾਘਾਯੋਗ ਹੈ। ਮੈਂ ਇਸ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਸਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਵਧਾਈ ਦਿੰਦਾ ਹਾਂ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੀ ਵੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸ਼ਲਾਘਾ ਕਰਦਾ ਹਾਂ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਵੀਰ ਸੈਨਿਕਾਂ ਲਈ ਯੋਗਦਾਨ ਦਿੱਤਾ।

ਸਾਥੀਓ,

ਭਾਰਤ ਦੇ ਹਰ ਪਿੰਡ ਵਿੱਚ, ਹਰ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ, ਕੁਝ ਨਾ ਕੁਝ ਅਜਿਹਾ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ ਜੋ ਸਾਨੂੰ ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਕਈ ਵਾਰ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਦੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਚਰਚਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਪਰ ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਾਣਦੇ ਹਾਂ, ਤਾਂ ਇਹ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਹੋਰ ਮਜ਼ਬੂਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਆਪਣੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਤਾਕਤ ਨਾਲ ਅੱਗੇ ਵਧ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਮੇਰੀ ਤੁਹਾਨੂੰ ਅਪੀਲ ਹੈ, ਆਪਣੇ ਆਲ਼ੇ-ਦੁਆਲ਼ੇ ਅਜਿਹੀਆਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਜ਼ਰੂਰ ਦੇਖੋ। ਜੋ ਲੋਕ ਸਮਾਜ ਲਈ ਚੰਗਾ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਛਾਣੋ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸ਼ਲਾਘਾ ਕਰੋ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਸਿੱਖੋ ਅਤੇ ਹੋ ਸਕੇ ਤਾਂ ਖ਼ੁਦ ਵੀ ਕਿਸੇ ਚੰਗੇ ਕੰਮ ਨਾਲ ਜੁੜੋ। ਅਗਲੇ ਮਹੀਨੇ ‘ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ’ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਹੋਰ ਪ੍ਰੇਰਕ ਗਾਥਾਵਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਮੈਂ ਫਿਰ ਤੁਹਾਡੇ ਨਾਲ ਜੁੜਾਂਗਾ। ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਧੰਨਵਾਦ। ਨਮਸਕਾਰ।