प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम की शुरूआत की
हमें बेटों और बेटियों के बीच भेदभाव को समाप्त करने की जरूरत है: प्रधानमंत्री मोदी
मेडिकल शिक्षा जीवन को बचाने के लिए है न कि बेटियों की हत्या के लिए: प्रधानमंत्री
लड़कियां आज खेल, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अच्छा काम कर रही हैं, कृषि के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है: पीएम मोदी
हमें पौधे लगाकर बालिकाओं के जन्म का जश्न मनाना चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने बालिकाओं के लाभ के लिए सुकन्या समृद्धि खाता का शुभारंभ किया 

विशाल संख्‍या में आए हुए माताओं, बहनों और भाईयों,

आज पानीपत की धरती पर हम एक बहुत बड़ी जिम्‍मेवारी की और कदम रख रहे हैं। यह अवसर किस सरकार ने क्‍या किया और क्‍या नहीं किया? इसका लेखा-जोखा करने के लिए नहीं है। गलती किसकी थी, गुनाह किसका था? यह आरोप-प्रत्यारोप का वक्‍त नहीं है। पानीपत की धरती पर यह अवसर हमारी जिम्‍मेवारियों का एहसास कराने के लिए है। सरकार हो, समाज हो, गांव हो, परिवार हो, मां-बाप हो हर किसी की एक सामूहिक जिम्‍मेवारी है और जब तक एक समाज के रूप में हम इस समस्‍या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे, तो हम अपना ही नुकसान करेंगे ऐसा नहीं है बल्कि हम आने वाली सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक भंयकर संकट को निमंत्रण दे रहे हैं और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों और मैं इस बात के लिए मेनका जी और उनके विभाग का आभारी हूं कि उन्‍होंने इस काम के लिए हरियाणा को पसंद किया। मैं मुख्‍यमंत्री जी का भी अभिनंदन करता हूं कि इस संकट को इन्‍होंने चुनौती को स्‍वीकार किया। लेकिन यह कार्यक्रम भले पानीपत की धरती पर होता हो, यह कार्यक्रम भले हरियाणा में होता हो, लेकिन यह संदेश हिंदुस्‍तान के हर परिवार के लिए है, हर गांव के लिए है, हर राज्‍य के लिए है।

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क्‍या कभी हमने कल्‍पना की है जिस प्रकार की समाज के अवस्‍था हम बना रहे हैं अगर यही चलता रहा तो आने वाले दिनों में हाल क्‍या होगा? आज भी हमारे देश में एक हजार बालक पैदा हो, तो उसके सामने एक हजार बालिकाएं भी पैदा होनी चाहिए। वरना संसार चक्र नहीं चल सकता। आज पूरे देश में यह चिंता का विषय है। यही आपके हरियाणा में झज्जर जिला देख लीजिए, महेंद्रगढ़ जिला देख लीजिए। एक हजार बालक के सामने पौने आठ सौ बच्चियां हैं। हजार में करीब-करीब सवा दौ सौ बच्‍चे कुंवारे रहने वाले हैं। मैं जरा माताओं से पूछ रहा हूं अगर बेटी पैदा नहीं होगी, तो बहू कहां से लाओगे? और इसलिए जो हम चाहते हैं वो समाज भी तो चाहता है। हम यह तो चाहते है कि बहू तो हमें पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटी को पढ़ाना है तो पास बार सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह अन्‍याय कब तक चलेगा, यह हमारी सोच में यह दोगलापन कब तक चलेगा? अगर बहू पढ़ी-लिखी चाहते हैं तो बेटी को भी पढ़ाना यह हमारी जिम्‍मेवारी बनता है। अगर हम बेटी को नहीं पढ़ाऐंगे, तो बहू भी पढ़ी-लिखी मिले। यह अपेक्षा करना अपने साथ बहुत बड़ा अन्याय है। और इसलिए भाईयों और बहनों, मैं आज आपके बीच एक बहुत बड़ी पीड़ा लेकर आया हूँ। एक दर्द लेकर आया हूँ। क्‍या कभी कल्‍पना की हमने जिस धरती पर मानवता का संदेश होता है, उसी धरती पर मां के गर्भ में बच्‍ची को मौत के घाट उतार दिया जाए।

यह पानीपत की धरती, यह उर्दू साहित्‍य के scholar अलताफ हुसैन हाली की धरती है। यह अलताफ हुसैन हाली इसी पानीपत की धरती से इस शायर ने कहा था। मैं समझता हूं जिस हरियाणा में अलताफ हुसैन जैसे शायर के शब्‍द हो, उस हरियाणा में आज बेटियों का यह हाल देखकर के मन में पीड़ा होती है। हाली ने कहा था....उन्‍होंने कहा था ए मांओ, बहनों बेटियां दुनिया की जन्नत तुमसे हैं, मुल्‍कों की बस्‍ती हो तुम, गांवों की इज्‍जत तुम से हो। आप कल्‍पना कर सकते हैं बेटियों के लिए कितनी ऊंची कल्‍पना यह पानीपत का शायर करता है और हम बेटियों को जन्‍म देने के लिए भी तैयार नही हैं।

भाईयों और बहनों हमारे यहां सदियों से जब बेटी का जन्‍म होता था तो शास्‍त्रों में आर्शीवाद देने की परंपरा थी और हमारे शास्‍त्रों में बेटी को जो आर्शीवाद दिये जाते थे वो आर्शीवाद आज भी हमें, बेटियों की तरफ किस तरह देखना, उसके लिए हमें संस्‍कार देते हैं, दिशा देते हैं। हमारे शास्‍त्रों ने कहा था जब हमारे पूर्वज आर्शीवाद देते थे तो कहते थे – यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद सीताकथा लोके, तावद जीवेतु बालिका। हमारे शास्‍त्र कहते थे जब तक गंगा का नाम है, जब तक कुरूक्षेत्र की याद है, जब तक हिमालय है, जब तक कथाओं में सीता का नाम है, तब तक हे बालिका तुम्‍हारा जीवन अमर रहे। यह आर्शीवाद इस धरती पर दिये जाते थे। और उसी धरती पर बेटी को बेमौत मार दिया जाए और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों उसके मूल में हमारा मानसिक दारिद्रय जिम्‍मेवार है, हमारे मन की बीमारी जिम्‍मेवार है और यह मन की बीमार क्‍या है? हम बेटे को अधिक महत्‍वपूर्ण मानते हैं और यह मानते हैं बेटी तो पराये घर जाने वाली है। यहां जितनी माताएं-बहनें बैठी हैं। सबने यह अनुभव किया होगा यह मानसिक दारिद्रय की अनुभूति परिवार में होती है। मां खुद जब बच्‍चों को खाना परोसती है। खिचड़ी परोसी गई हो और घी डाल रही हो। तो बेटे को तो दो चम्‍मच घी डालती है और बेटी को एक चम्‍मच घी डालती है और जब, मुझे माफ करना भाईयों और बहनों यह बीमारी सिर्फ हरियाणा की नहीं है यह हमारी देश की मानसिक बीमारी का परिणाम है और बेटी को, अगर बेटी कहे न न मम्‍मी मुझे भी दो चम्‍मच दे दो, तो मां कहते से डरती नहीं है बोल देती है, अरे तुझे तो पराये घर जाना है, तुझे घी खाकर के क्‍या करना है। यह कब तक हम यह अपने-पराये की बात करते रहेंगे और इसलिए हम सबका दायित्‍व है, हम समाज को जगाए।

कभी-कभी जिस बहन के पेट में बच्‍ची होती है वो कतई नहीं चाहती है कि उसकी बेटी को मार दिया जाए। लेकिन परिवार का दबाव, माहौल, घर का वातावरण उसे यह पाप करने के लिए भागीदार बना देता है, और वो मजबूर होती है। उस पर दबाव डाला जाता है और उसी का नतीजा होता है कि बेटियों को मां के गर्भ में ही मार दिया जाता है। हम किसी भी तरह से अपने आप को 21वीं सदी के नागरिक कहने के अधिकारी नही हैं। हम मानसिकता से 18वीं शताब्दी के नागरिक हैं। जिस 18वीं शताब्‍दी में बेटी को “दूध-पीती” करने की परंपरा थी। बेटी का जन्‍म होते ही दूध के भरे बर्तन के अंदर उसे डूबो दिया जाता था, उसे मार दिया जाता था। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं, वो तो पाप करते थे गुनाह करते थे। बेटी जन्‍मती थी आंखे खोलकर के पल-दो-पल के लिए अपनी मां का चेहरा देख सकती थी। बेटी जन्‍मती थी, दो चार सांस ले पाती थी। बेटी जन्मती थी, दुनिया का एहसास कर सकती थी। बाद में उस मानसिक बीमारी के लोग उसको दूध के बर्तन में डालकर के मार डालते थे। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं। हम तो बेटी को मां का चेहरा भी नहीं देखने देते, दो पल सांस भी नहीं लेने देते। इस दुनिया का एहसास भी नहीं होने देते। मां के गर्भ में ही उसे मार देते हैं। इससे बड़ा पाप क्‍या हो सकता है और हम संवेदनशील नहीं है ऐसा नहीं है।

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कुछ साल पहले इसी हरियाणा में कुरूक्षेत्र जिले में हल्दा हेड़ी गांव में एक टयूबवेल में एक बच्‍चा गिर गया, प्रिंस.. प्रिंस कश्‍यप । और सारे देश के टीवी वहां मौजूद थे। सेना आई थी एक बच्‍चे को बचाने के लिए और पूरा हिंदुस्‍तान टीवी के सामने बैठ गया था। परिवारों में माताएं खाना नहीं पका रही थी। हर पल एक-दूसरे को पूछते थे क्‍या प्रिंस बच गया, क्‍या प्रिंस सलामत निकला टयूबवेल में से? करीब 24 घंटे से भी ज्‍यादा समय हिंदुस्‍तान की सांसे रूक गई थी। एक प्रिंस.. केरल, तमिलनाडु का कोई रिश्‍तेदार नहीं था। लेकिन देश की संवेदना जग रही है। उस बच्‍चे को जिंदा निकले, इसके लिए देशभर की माताएं-बहने दुआएं कर रही थी। मैं जरा पूछना चाहता हूं कि एक प्रिंस जिसकी जिंदगी पर संकट आए, हम बेचैन बन जाते हैं। लेकिन हमारे अड़ोस-पड़ोस में आएं दिन बच्चियों को मां के पेट में मार दिया जाए, लेकिन हमें पीड़ा तक नहीं होती है, तब सवाल उठता है। हमारी संवेदनाओं को क्‍या हुआ है? और इसलिए आज मैं आपके पास आया हूं। हमें बेटियों को मारने का हक नहीं है।

यह सोच है बुढ़ापे में बेटा काम आता है। इससे बड़ी गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए। अगर बुढ़ापे में बेटे काम आए होते तो पिछले 50 साल में जितने वृद्धाश्राम खुले हैं, शायद उतने नहीं खुले होते। बेटो के घर में गाड़ियां हो, बंगले हो, लेकिन बांप को वृद्धाश्राम में रहना पड़ता है ऐसी सैकड़ों घटनाएं है और ऐसी बेटियों की भी घटनाएं है। अगर मां-बाप की इकलौती बेटी है तो मेहनत करे, मजदूरी करे, नौकरी करे, बच्‍चों को tuition करे लेकिन बूढ़े मां-बाप को कभी भूखा नहीं रहने देती। ऐसी सैकड़ों बेटियां बाप से भी सेवा करने के लिए, मां-बाप की सेवा करने के लिए अपने खुद के सपनों को चूर-चूर कर देने वाली बेटियों की संख्‍या अनगिनत है और सुखी बेटों के रहते हुए दुःखी मां-बाप की संख्‍या भी अनगिनत है। और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों यह सोच कि बेटा आपका बुढ़ापा संभालेगा, भूल जाइये। अगर आप अपनी संतानों को सामान रूप से संस्‍कारित करके बड़े करोगे, तो आपकी समस्‍याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।

कभी-कभी लगता है कि बेटी तो पराये घर की है। मैं जरा पूछना चाहता हूं सचमुच में यह सही सोच है क्‍या? अरे बेटी के लिए तो आपका घर पराया होता है जिस घर आप भेजते हो वो पल-दो-पल में उसको अपना बना लेती है। कभी पूछती नहीं है कि मुझे उस गांव में क्‍यों डाला मुझे उस कुटुम्‍ब में क्‍यों डाल दिया? जो भी मिले उसको सर-आंखों पर चढ़ाकर के अपना जीवन वहां खपा देती है और अपने मां-बाप के संस्‍कारों को उजागर करती है। अच्‍छा होता है तो कहती है कि मेरी मां ने सिखाया है, अच्‍छा होता है तो कहती है कि मां-बाप के कारण, मेरे मायके के संस्‍कार के कारण मैं अच्‍छा कर रही हूं। बेटी कहीं पर भी जाएं वहां हमेशा आपको गौरव बढ़े, उसी प्रकार का काम करती है।

मैंने कल्‍पना की, आपने कभी सोचा है यहीं तो हरियाणा की धरती, जहां की बेटी कल्‍पना चावला पूरा विश्‍व जिसके नाम पर गर्व करता है। जिस धरती पर कल्‍पना चावला का जन्‍म हुआ हो, जिसको को लेकर के पूरा विश्‍व गर्व करता हो, उसी हरियाणा में मां के पेट में पल रही कल्‍पना चावलाओं को मार करके हम दुनिया को क्‍या मुंह दिखाएंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों मैं आप आपसे आग्रह करने आया हूं और यह बात देख लीजिए अगर अवसर मिलता है तो बेटे से बेटियां ज्‍यादा कमाल करके दिखाती हैं।

आज भी आपके हरियाणा के और हिंदुस्‍तान के किसी भी राज्‍य के 10th या 12th के result देख लीजिए। first stand में से छह या सात तो बच्चियां होती है जीतने वाली, बेटों से ज्‍यादा नंबर लाती है। आप हिंदुस्‍तान का पूरा education sector देख लीजिए। teachers में 70-75 प्रतिशत महिलाएं शिक्षक के रूप में काम कर रही है। आप health sector देख लीजिए health sector में 60 प्रतिशत से ज्‍यादा, सूश्रूषा के क्षेत्र में बहनें दिखाई देती है। अरे हमारा agriculture sector, पुरूष सीना तान कर न घूमें कि पुरूषों से ही agriculture sector चलता है। अरे आज भी भारत में agriculture और पशुपालन में महिलाओं की बराबरी की हिस्‍सेदारी है। वो खेतों में जाकर के मेहनत करती है,वो भी खेती में पूरा contribution करती हैं और खेत में काम करने वाले मर्दों को संभालने का काम भी वही करती है।

पश्चिम के लोग भले ही कहते हों, लेकिन हमारे देश में महिलाओं का सक्रिय contribution आर्थिक वृद्धि में रहता है। खेलकूद में देखिए पिछले दिनों जितने game हुए, उसमें ईनाम पाने वाले अगर लड़के हैं तो 50 प्रतिशत ईनाम पाने वाली लड़कियां है। gold medal लाने वाली लड़कियां है। खेलकूद हो, विज्ञान हो, व्‍यवसाय हो, सेवा का क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, आज महिलाएं रत्‍तीभर भी पीछे नहीं है और यह सामर्थ्‍य हमारी शक्ति में है। और इसलिए मैं आपसे आग्रह करने आया हूं कि हमें बेटे और बेटी में भेद करने वाली बीमारी से निकल जाना चाहिए। “बेटा-बेटी एक समान” यही हमारा मंत्र होना चाहिए और एक बार हमारे मन में बेटा और बेटी के प्रति एक समानता का भाव होगा तो यह पाप करने की जो प्रवृति है वह अपने आप ही रूक जाएगी। और यह बात, इसके लिए commitment चाहिए, संवेदना चाहिए, जिम्‍मेवारी चाहिए।

मैं आज आपके सामने एक बात बताना चाहता हूं। यह बात मेरे मन को छू गई। किसी काम के लिए जब commitment होता है, एक दर्द होता है तो इंसान कैसे कदम उठाता है। हमारे बीच माधुरी दीक्षित जी बैठी है। माधुरी नैने। उनकी माताजी ICU में हैं, वो जिंदगी की जंग लड़ रही है और बेटी पानीपत पहुंची है। और मां कहती है कि बेटी यह काम अच्‍छा है तुम जरूर जाओ। Weather इतना खराब होने के बावजूद भी माधुरी जी अपनी बीमार मां को छोड़कर के आपकी बेटी बचाने के लिए आपके बीच आकर के बैठी है और इसलिए मैं कहता हूं एक commitment चाहिए, एक जिम्‍मेवारी का एहसास चाहिए और यह एक सामूहिक जिम्‍मेवारी में साथ है। गांव, पंचायत, परिवार, समाज के लोग इन सबको दायित्‍व निभाना पड़ेगा और तभी जाकर के हम इस असंतुलन को मिटा सकेंगे। यह रातों-रात मिटने वाला नहीं है। करीब-करीब 50 साल से यह पाप चला है। आने वाले 100 साल तक हमें जागरूक रूप से प्रयास करना पड़ेगा, तब जाकर के शायद स्थिति को हम सुधार पाएंगे। और इसलिए मैंने कहा आज का जो यह पानीपत की धरती पर हम संकल्‍प कर रहे हैं, यह संकल्‍प आने वाली सदियों तक पीढि़यों की भलाई करने के लिए है।

भाईयों बहनों आज यहां भारत सरकार की और योजना का भी प्रांरभ हुआ है – सुकुन्‍या समृद्धि योजना। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं। इसको निरंतर बल देना है और इसलिए उसके लिए सामाजिक सुरक्षा भी चाहिए। यह सुकुन्‍या समृद्धि योजना के तहत 10 साल से कम उम्र की बेटी एक हजार रुपये से लेकर के डेढ़ रुपये लाख तक उसके मां-बाप पैसे बैंक में जमा कर सकते है और सरकार की तरफ से हिंदुस्‍तान में किसी भी प्रकार की परंपरा में ब्‍याज दिया जाता है उससे ज्‍यादा ब्‍याज इस बेटी को दिया जाएगा। उसका कभी Income Tax नहीं लगाया जाएगा और बेटी जब 21 साल की होगी, पढ़ाई पूरी होगी या शादी करने जाती होगी तो यह पैसा पूरा का पूरा उसके हाथ में आएगा और वो कभी मां-बाप के लिए बोझ महसूस नहीं होगी।

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काशी के लोगों ने मुझे अपना MP बनाया है। वहां एक जयापुर पर गांव है। जयापुर गांव ने मुझे गोद लिया है और वो जयापुर गांव मेरी रखवाली करता है, मेरी चिंता करता है। जयपुर में गया था मैंने उनको कहा था कि हमारे गावं में जब बेटी पैदा हो तो पूरे गांव का एक बड़ा महोत्‍सव होना चाहिए। आनंद उत्‍सव होना चाहिए और मैंने प्रार्थना की थी कि बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ बोने चाहिए। मुझे बाद में चिट्ठी आई। मेरे आने के एक-आध महीने बाद कोई एक बेटी जन्‍म का समाचार आया तो पूरे गांव ने उत्‍सव मनाया और उतना ही नहीं सब लोगों ने जाकर के पाँच पेड़ लगाए। मैं आपको भी कहता हूं। आपकी बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ लगाएंगे बेटी भी बड़ी होगी, पेड़ भी बड़ा होगा और जब शादी का समय आएगा वो पाँच पेड़ बेच दोगे न तो भी उसकी शादी का खर्चा यूं ही निकल जाएगा।

भाईयों बहनों बड़ी सरलता से समझदारी के साथ इस काम को हमने आगे बढ़ाना है और इसलिए आज मैं हरियाणा की धरती, जहां यह सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन हिंदुस्‍तान का कोई राज्‍य बाकी नहीं है कि जहां चुनौती नहीं है। और मैं जानता हूं यह दयानंद सरस्‍वती के संस्‍कारों से पली धरती है। एक बार हरियाणा के लोग ठान लें तो वे दुनिया को खड़ी करने की ताकत रखते हैं। मुझको बड़ा बनाने में हरियाणा का भी बहुत बड़ा role है। मैं सालों तक आपके बीच रहा हूं। आपके प्‍यार को भली-भांति में अनुभव करता हूं। आपने मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। मैं आज आपसे कुछ मांगने के लिए आया हूं। देश का प्रधानमंत्री एक भिक्षुक बनकर आपसे बेटियों की जिंदगी की भीख मांग रहा है। बेटियों को अपने परिवार का गर्व मानें, राष्‍ट्र का सम्‍मान मानें। आप देखिए यह असंतुलन में से हम बहुत तेजी से बाहर आ सकते हैं। बेटा और बेटी दोनों वो पंख है जीवन की ऊंचाईयों को पाने का उसके बिना कोई संभावना नहीं और इसलिए ऊंची उड़ान भी भरनी है तो सपनों को बेटे और बेटी दोनों पंख चाहिए तभी तो सपने पूरे होंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों हम एक जिम्‍मेवारी के साथ इस काम को निभाएं।

मुझे बताया गया है कि हम सबको शपथ लेना है। आप जहां बैठे है वहीं बैठे रहिये, दोनों हाथ ऊपर कर दीजिए और मैं एक शपथ बोलता हूं मेरे साथ आप शपथ बोलेंगे – “मैं शपथ लेता हूं कि मैं लिंग चयन एवं कन्‍या भ्रूण हत्‍या का ‍विरोध करूगा; मैं बेटी के जन्‍म पर खुश होकर सुरक्षित वातारवण प्रदान करते हुए बेटी को सुशिक्षित करूंगा। मैं समाज में बेटी के प्रति भेदभाव खत्‍म करूंगा, मैं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं” का संदेश पूरे समाज में प्रसारित करूंगा।“

भाई बहनों मैं डॉक्‍टरों से भी एक बात करना चाहता हूं। मैं डॉक्‍टरों से पूछना चाहता हूं कि पैसे कमाने के लिए यही जगह बची है क्‍या? और यह पाप के पैसे आपको सुखी करेंगे क्‍या? अगर डॉक्‍टर का बेटा कुंवारा रह गया तो आगे चलकर के शैतान बन गया तो वो डॉक्‍टर के पैसे किस काम आएंगे? मैं डॉक्‍टरों को पूछना चाहता हूं कि यह आपको दायित्‍व नहीं है कि आप इस पाप में भागीदार नहीं बनेंगे। डॉक्‍टरों को अच्‍छा लगे, बुरा लगे, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आपकी यह जिम्‍मेवारी है। आपको डॉक्‍टर बनाया है समाज ने, आपको पढ़-लिखकर के तैयार किया है। गरीब के पैसों से पलकर के बड़े हुए हो। आपको पढ़ाया गया है किसी की जिंदगी बचाने के लिए, आपको पढ़ाया गया है किसी की पीड़ा को मुक्‍त करने के लिए। आपको बच्चियों को मारने के लिए शिक्षा नहीं दी गई है। अपने आप को झकझोरिये, 50 बार सोचिए, आपके हाथ निर्दोष बेटियों के खून से रंगने नहीं चाहिए। जब शाम को खाना खाते हो तो उस थाली के सामने देखो। जिस मां ने, जिस पत्‍नी ने, जिस बहन ने वो खाना बनाया है वो भी तो किसी की बेटी है। अगर वो भी किसी डॉक्‍टर के हाथ चढ़ गई होती, तो आज आपकी थाली में खाना नहीं होता। आप भी सोचिए कहीं उस मां, बेटी, बहन ने आपके लिए जो खाना बनाया है, कहीं आपके के खून से रंगे हुए हाथ उस खाने की चपाती पर तो हाथ नहीं लगा रहे। जरा अपने आप को पूछिये मेरे डॉक्‍टर भाईयों और बहनों। यह पाप समाज द्रोह है। यह पाप सदियों की गुनाहगारी है और इसलिए एक सामाजिक दायित्‍व के तहत है, एक कर्तव्‍य के तहत और सरकारें किसकी-किसकी नहीं, यह दोषारोपण करने का वक्‍त नहीं है। हमारा काम है जहां से जग गए हैं, जाग करके सही दिशा में चलना।

मुझे विश्‍वास है पूरा देश इस संदेश को समझेगा। हम सब मिलकर के देश को भविष्‍य के संकट से बचाएंगे और फिर एक बार मैं हरियाणा को इतने बड़े विशाल कार्यक्रम के लिए और हरियाणा इस संदेश को उठा लेगा तो हिंदुस्‍तान तो हरियाणा के पीछे चल पड़ेगा। मैं फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद करता हूं।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ इस संकल्‍प को लेकर हम जाएंगे। इसी अपेक्षा के साथ मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए – भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

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मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार | ‘मन की बात’ में एक बार फिर आपसे जुड़कर मुझे बेहद खुशी हो रही है | देश के अलग-अलग हिस्सों में हमारे देश के लोग देशहित में, समाजहित में, ऐसी अद्भुत चीजें कर रहे हैं और जब उनके विषय में सुनते हैं तो हमें एक नई प्रेरणा मिलती है | आज कार्यक्रम की शुरुआत, मैं athletics में देश की ऐसी ही उपलब्धि से करूंगा | कुछ दिन पहले ही झारखंड के रांची में National Senior Athletics Federation Competition हुआ | इसमें करीब 800 athletes ने हिस्सा लिया - देशभर से आए थे | इस दौरान चार अलग-अलग event में चार national record टूटे | गुरिंदरवीर सिंह, विशाल टीके, तेजस्विन शंकर, देव मीणा और कुलदीप कुमार | इन साथियों ने अलग-अलग category में नए record बनाए | मैं सबसे पहले तो इन सभी को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ |

साथियो, एक event जिसकी देशभर में बहुत चर्चा हो रही है, वह है – 100 meter Race, सौ meter की दौड़ | महज दो दिनों के भीतर Men’s 100 meter Race में national record तीन बार टूटा | जिन दो athletes ने ये कमाल दिखाया है वे हैं - गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर | मैंने सोचा इस बार ‘मन की बात’ में इन दोनों खिलाड़ियों से बात की जाए |

प्रधानमंत्री: अनिमेष जी नमस्कार | गुरिन्दर वीर आपको भी नमस्कार, सतश्री अकाल |

अनिमेष, गुरिन्दरवीर : नमस्कार सर, नमस्कार सर |

प्रधानमंत्री : अच्छा भैया आपने तो बहुत बड़ा achievement किया है | आपकी जोड़ी ने भी बड़ा कमाल किया है | हमने संगीत में तो जुगलबंदी देखी थी, लेकिन चुनौती में अब जुगलबंदी होती है कि एक बार एक चुनौती दे फिर दूसरा उस चुनौती को उठा ले | फिर तीसरी बार कर ले | बड़ा interesting विषय रहा है आपका | मैं चाहता हूँ कि ‘मन की बात’ के श्रोताओं को पता चले कि आप लोग के विषय में उनको जानकारी हो | आपने जो पराक्रम किया है उसका पता चले |

अनिमेष जी : नमस्ते सर, मेरा नाम अनिमेष कुजूर |मैं 200 मीटर और 400 मीटर का National record holder हूँ and मैं छत्तीसगढ़ से belong करता हूँ सर | And अभी मैं उड़ीसा से खेलता हूँ | मैं last year Asian Medal और World University Games Medal लेकर आया and मैं athletics 2021 से चालू किया जब मैं school से pass out हुआ | मैं सैनिक school अम्बिकापुर से pass out हूँ, and मैं पहले football खेला करता था, and मेरे parents covid के समय मुझे थोड़ी बहुत छूट देते थे कि तू जाके बाहर दौड़ ले या खेल ले तो जब covid खत्म होने लगा तो मेरे football के जो friends थे उन्होंने मुझे बोला कि state meet होने वाला है जाके तू participate कर and मैं participate किया and मुझे पता नहीं था कि वहाँ से National level का Selection है | मैं वहाँ से National में select हुआ and आज मैं India को represent कर रहा हूँ Internationally |

प्रधानमंत्री : और गुरिन्दरवीर जी क्या है ?

गुरिन्दरवीर: नमस्ते सर, मेरा नाम गुरिन्दरवीर है और मैं Indian Navy में Patty Officer हूँ और मैं India का सबसे तेज sprinter हूँ अभी मैंने 100 मीटर में 10.09 का national record बनाया है | और मैं पहला Indian हूँ जो 10.1 के barrier के नीचे भागा है, और मैं कोशिश कर रहा हूँ कि मैं track और वर्दी में भी अपने देश की सेवा करूँ | मेरे father और grandfather दोनों sports करते थे तो हमारे India का culture है जब भी कोई त्योहार होता है जैसे दिवाली, जैसे नया साल तो हम अपने घर की सफाई करते हैं | तो मैं अपने father की Trophies और Medals की सफाई करता था तो मेरे को वो बहुत अच्छा लगता था, मैं बहुत खुश होता था | तब जब मैं कोई trophy साफ करता था तो मैं पूछता था कि भई ये trophy कहाँ जीती, ये Medal कहाँ जीता, ये photo कब की है, तो फिर मेरे को वो अपनी कहानी सुनाते थे ,कि भई मैं यहां खेलने गया, मैंने ये National Medal जीता, मैंने अपनी team को इसमें जिताया | तो फिर मैं भी उनको बोलता था कि भई मैं भी कोई sports करनी है | वो running करने जाते थे morning में, तो मैं उनको बोलने लगा भई मेरे को भी लेकर जाया करो अपने साथ | तो मेरे को लेकर जाने लगे तो उन्होंने जो अपनी game sports में सीखा था तो मेरे को सिखाने लगे | तो मेरा interest बनने लगा | मैंने Usain Bolt का world record टूटता हुआ देखा | तो एक story है ऐसे funny | मैं अभी TV देख रहा था तो मम्मी ने मेरी TV बंद कर दिया कि अभी बेटा पढ़ने का time हो गया, आप पढ़ो | तो मैं कहा भई ठीक है आप मेरे को TV नहीं देखने देते, एक दिन ऐसा आएगा आप मेरे को TV में ढूँढोगे कि देखो वो गुरिन्दर दौड़ रहा है | तो मेरे को भी खुशी होती जब मेरी माँ मेरे को TV पे दौड़ता हुआ देखती है |

प्रधानमंत्री : वाह वाह वाह | बड़ी शानदार बात है भई आपकी तो |

गुरिन्दर वीर: हाँ जी | Middle Class Family है सर, फिर मेरे father वो भी volleyball खेलते थे | घर की problems की वजह से उन्होंने अपनी sports छोड़ दी | उनका जो सपना पूरा करने वाला रह गया | तो उन्होंने मेरे अंदर वो सपना देखा भई मेरा बेटा वो सपना पूरा करेगा तो मैं उनसे बातें करता था, फिर सुनता था मिल्खा सिंह इतनी मेहनत करते थे, मैं उनको बोलता था मैं भी एक दिन आपका सपना पूरा करूंगा | तो बोलते सपना पूरा ऐसे नहीं होता, उसके लिए बहुत hard work करना पड़ता है | मेहनत करनी पड़ती है | मिल्खा सिंह जी खून की उल्टियाँ करते थे, धूप में भागते थे | सारा-सारा दिन training करते थे तो वो चीजें मेरे को inspire करती थीं | मेरे father मेरे को inspire करते थे, कि मैं भागूँगा तो अपने देश के लिए, देश के लिए Medal लाऊँ, जीतूँ | और ये भी था कि भई जब मैंने event choose किया 100 मीटर तो सभी मेरे को बोलते थे कि भई 100 मत करो, 100 Indians का event नहीं है | Indians की body 100 मीटर के लिए बनी ही नहीं है | तो मैं और मेरे father हमेशा बोलते थे कि अभी गुरिन्दर हमने ये choose किया है, हम इससे पीछे नहीं हटेंगे | जो हमें बोलते हैं कि भई हम नहीं कर सकते हम उसको कर के दिखाएंगे | और तू करके दिखाएगा, मुझे तेरे पे भरोसा है | तो वो भरोसा जब मेरे को मेरे father ने मेरे पर किया तो मैं उस भरोसे को अपनी हिम्मत बनाके मैं चला और मैं आज हर Indian बोलता कि भई Indian Sprint कर |

प्रधानमंत्री : देखिए आप दोनों ने बहुत बड़ा कमाल किया है, और सिर्फ दो दिनों के भीतर आप दोनों ने तीन बार National Record तोड़ा है | 100 मीटर race में दौड़ना, जैसा गुरिन्दरवीर ने कहा कि लोग कहते हैं कि भारत के लोगों का तो बदन इस काम के लिए है ही नहीं | इतना मुश्किल होते हुए भी आपने काम किया तो ये दोनों से मैं जानना चाहूँगा, और ‘मन की बात’ के श्रोता भी सुनना चाहेंगे कि कौन सा जज्बा था, क्या जिद थी, क्या सोचा था, और कैसे कर रहे थे ? ये कितना मुश्किल होता है ?

गुरिन्दरवीर: जी सर, मैं गुरिन्दर, मैं जब starting में सर बहुत struggle था, बहुत बार doubt भी आया कि मैं सही कर रहा हूँ, मैं सही choose किया क्योंकि हर बार आप नहीं जीतते, कभी- कभी आप सीखते हो | जब मैं हारता था, जब मैं सही performance नहीं आती थी, कोई injury आ जाती थी तो मेरे घरवाले मेरे को support करते थे कि भई कोई नहीं एक दिन बुरा चला गया, एक साल बुरा चला गया तो इससे जिंदगी खराब नहीं होती | सपने देखना नहीं छोड़ते | तो मेरे coach ने भी मेरे को ये सिखाया कि अगर तू नहीं करेगा तो कोई और नहीं कर पाएगा | तो ऐसे जब हमारी community हमारे आसपास लोग हमें उत्साहित करते हैं तो हमारा कभी वो motivation नहीं टूटता |

प्रधानमंत्री : अनिमेष जी…

अनिमेष : सर, मुझे तो सारे लोग बोलते थे कि जब मैं 2021 में चालू किया athletics तो मुझे बोलते थे कि देख ये नया field है, तू कर पाएगा की नहीं, तो मैं बोला कि अब मैं इस field में घुसा हूँ तो करूंगा ही | मेरे पापा भी हमेशा मुझे बोलते थे कि तू इस field में घुसा है तो कभी पीछे मुड़के देखना मत क्योंकि सोचते तो सभी है की ये करना है, वो करना है but करके बहुत कम ही दिखाते है | तू बस इस field में घुसा है तो इस पे अमल रहना, इस पे आगे बढ़ना है | तेरे को सारी facilities, सब चीज हम support करेंगे, family support, financial support, सब चीज हम लोग करेंगे बस तू मेहनत कर और India को दिखा कि Indians भी भाग सकते हैं क्योंकि ये मुझे भी लोग बोलते थे कि Indians के genes ऐसे नहीं है कि वो Sub 10 या Sub 10.1 के अंदर भाग सकते है या कोई वो sprint कर सकता है but अभी हम दोनों ने ऐसा prove कि Indians भी कर सकते हैं | ऐसा कोई hard नहीं है हमारे लिए, हम भी सब कुछ कर सकते हैं | तो सर ये सारी चीजें मुझे बहुत motivate करती हैं and जैसे-जैसे हम training कर रहे हैं हम और timing तोड़ रहे हैं अपना and बाकी Indians को भी ये चीज दिख रहा है कि Indians भी कर सकते हैं and हम और करेंगे सर अभी, and अभी हम दोनों का selection commonwealth games के लिए भी हुआ है तो वहाँ upcoming competition में हम और अच्छा परफॉर्म करेंगे।

प्रधानमंत्री: अच्छा देखिये मेरे मन में भी एक कोतूहल है | और लोगो को भी होगा मैंने सुना है कि आप दोनों अच्छे दोस्त भी है आप दोनों ने कुछ ठान रखा था क्या कि तुमने मेरा record तोड़ा तो मैं तेरा record तोड़ दूँ क्या पहले अनिमेष बता दे |

अनिमेष : सर जी पहले record 10.18 का था जो की मेरा ही था and then उसको गुरिंदरवीर भईया ने semi-final में तोड़ दिया 10.17 करके and मैंने फिर से उसको semi-final 2 में 10.15 करके तोड़ दिया तो उस समय जब मेरा semi-final हुआ तो हम दोनों ही खुश थे कि हां चलो ठीक है, आज record टूटा and चलो हम दोनों ने तोड़ा ऐसा, क्योंकि उस समय competition में rivalry रहती है but हम दोनों ठान के रखे थे पहले से ही उससे पहले हमलोग Saudi Arabia भी गए थे competition करने के लिए तो वहाँ भी हम दोनों roommates थे तो हम दोनों वहाँ भी बात करते थे कि India के sprinting को आगे लेकर जाना है and हमारे ही हाथों में है वो चीज हम जो करेंगे वही बाकियों को motivate करेगा ।

प्रधानमंत्री : गुरिंदरवीर क्या कहना चाहेंगे ?

गुरिंदरवीर : हम दोनों ने decide किया था हम दोनों अच्छा भागेंगे | तो कभी भी सर एक-दूसरे को जरूरत होती है तो एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं जैसे अभी record करने से पहले जब मैंने record किया फिर अनिमेश ने किया | तो जब हम warm-up कर रहे थे तो मैं अनिमेष को बता रहा था, अभी अनिमेष वो block सही है उस पे जाके बैठ वहाँ पे stride कर ले हम warm-up यहाँ पे करेंगे, यहाँ पर warm-up सही होगा तो एक दूसरे की help करते है, एक-दूसरे की help करते है तो दूसरा भी improve करता है, हम भी improve करते है | तो दोस्ती भी चाहिए but सर हम ground के बाहर है, competition के बाहर है तो हम दोस्त हैं, जब हम ground में चले जाते है तो एक-दूसरे के competitor हो जाते है | तो यह होता है कि मैं इससे fast भागूंगा, मैं इससे fast भागूंगा |

प्रधानमंत्री : देखिये आप लोगों ने जो स्पर्धा की है न वो देश का मान बढ़ाने के लिए की है, देश को भविष्य में इस जगह पर पहुँचाने के लिए की है और एक positive spirit से की है और मैं मानता हूँ कि आपका ये जो sportsman spirit है, खेलना भी है, एक-दूसरे को चुनौती भी देना है और फिर आगे निकलने के लिए प्रयास करना है और फिर आगे जाने के लिए एक-दूसरे की मदद करना है ये अद्भुत काम किया है आप लोगों ने मेरी तरफ से आपको बहुत-बहुत बधाई, मेरी बहुत-बहुत शुभकामनायें और आप देश का नाम भी रोशन करेंगे मुझे पूरा विश्वास है आप ऐसे ही मेहनत करते रहिये बहुत प्रगति होगी, बहुत-बहुत शुभकामनाएँ मेरी |

गुरिंदरवीर /अनिमेष : शुक्रिया सर, शुक्रिया आपका |

प्रधानमंत्री : बहुत बहुत धन्यवाद।

मेरे प्यारे देशवासियो, इस समय देश के ज्यादातर हिस्सों में बहुत गर्मी पड़ रही है | तेज धूप, गर्म हवाएँ, ऐसे मौसम में अपना ध्यान रखना बहुत जरूरी है | पानी पीते रहिए | धूप में अगर निकलना ही पड़े तो थोड़ा संभल कर निकलें | इस दिशा में सरकार की भिन्न-भिन्न departments ने जो guidelines जारी की है वो भी भूलियेगा नहीं |

साथियो, हमारे यहां गर्मी से लड़ने का तरीका कई बार रसोई में भी मिलता है | आपने भी देखा होगा जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे घर की रसोई का स्वाद बदल जाता है, रसोई का प्रकार बदल जाता है | कहीं मटके का पानी निकल आता है, कहीं दही जमने लगता है, तो कहीं कच्चे आम उबलने लगते हैं - और फिर शुरू होता है देसी पेय का दौर | देसी पेय से आप भी परिचित हैं, अगर आप उत्तर भारत में जाएँगे तो काफी जगह आपको मिलेगा आम पन्ना, कच्चे आम का स्वाद, और गर्मी से राहत भी | पंजाब-हरियाणा जाइए तो लस्सी मिल जाएगी, बड़े गिलास वाली लस्सी | राजस्थान और गुजरात में छाछ, जैसे हर खाने की साथी बन जाती है | और बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश में सत्तू का शरबत, उसकी तो बात ही क्या है - पेट भी भरे, ताकत भी दे | कोंकण और गोवा में कोकम शरबत, सोल कढ़ी | दक्षिण भारत में पानकम, नीर मोर, सम्बारम और ओडिशा में बेल पना, वो सिर्फ पेय नहीं, भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की परंपरा का हिस्सा है | और इसमें ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की भावना की झलक भी मिलती है | और एक बात जरूर ध्यान रखियेगा, इनमें से ज्यादातर चीजें हमारी अपनी रसोई से निकली हैं, हमारे खेत खलिहान से निकली हैं | कोई बड़ी branding नहीं है| लेकिन पीढ़ियों का अनुभव उनमें समाया हुआ है | आप भी गर्मी के दौरान देसी पेजयलों का खूब आनंद लीजिए |

साथियो, गर्मी आते ही एक और चर्चा हर घर में शुरू हो जाती है और वो है आम | आम, आम चर्चा का विषय होता है, भारत में शायद ही कोई घर होगा जहाँ गर्मियों में आम की बात न होती हो | हर इलाके का अपना आम, अपना स्वाद, अपनी खुशबू | महाराष्ट्र और कोंकण का हापुस, alphonso, गुजरात का केसर, यह तो आमरस की जान है , उत्तर प्रदेश का दशहरी और मेरी काशी का लंगड़ा | वैसे, लंगड़ा आम की एक खास बात होती है - पकने के बाद भी उसका रंग कई बार हरा ही रहता है | बिहार का जर्दालू जिसकी खुशबू दूर से पहचान में आ जाए | चौसा, मालदा - हर नाम के साथ लोगों की यादें जुड़ी हुई हैं | दक्षिण भारत जाइए, तो बंगनपल्ली, तोतापुरी, नीलम, मलगोवा, बंगाल का हिमसागर, ओडिशा और आंध्र प्रदेश का सुवर्णरेखा | यानी, जगह बदलती है, आम का रूप-रंग और उसका स्वाद भी बदल जाता है | और साथियो आम की ये यात्रा, अब गाँव से, global market तक भी पहुँच रही है | आज ‘मन की बात’ के माध्यम से मैं आम की पैदावार से जुड़े अपने किसान भाई-बहनों की प्रशंसा करूंगा | आप देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए आम किसान नहीं बहुत विशेष हैं | ऐसे ही छाए रहिए |

साथियो, गर्मी के इन दिनों में, ऐसे तो स्कूलों की छुट्टियां होती हैं, लेकिन, मैं एक ऐसी class की बात करूंगा, जिसमें आपका admission करने का मन कर जाएगा । साथियो, एक स्थिति की कल्पना कीजिए, एक ऐसा school जहाँ बच्चे भी आते हों, युवा भी और बुजुर्ग भी, जहाँ कोई fees ना हो, कोई बड़ी building ना हो, कोई classroom भी ना हो और सबसे रोचक बात, वहाँ class नदी में लगती हो ।

साथियो, ये कोई कहानी नहीं है। ये एक सच्चा प्रयास है। केरलम के आलुवा में, साजी वलाशेरिल जी ऐसा ही एक swimming club चला रहे हैं । अब तक 15 हजार से ज्यादा लोग यहाँ तैरना सीख चुके हैं । साजी जी ने दिव्यांग बच्चों को भी swimming सिखाई है । इस प्रयास के पीछे, एक पीड़ा भी छिपी है । कुछ वर्ष पहले, एक नौका हादसे में कई छात्रों की मृत्यु हो गई थी । उस घटना ने साजी जी को भीतर तक झकझोर दिया । उन्होंने सोचा, अगर बच्चों को तैरना आता होता, तो शायद कई जानें बच जातीं - बस यहीं से शुरू हुआ उनका ये अभियान।

साथियो, साजी वलाशेरिल जी का जीवन, हमें एक बहुत बड़ी सीख देता है। सेवा करने के लिए बहुत बड़े साधन जरूरी नहीं होते - जरूरी होता है, एक अच्छा इरादा और लगातार किया गया प्रयास। इन्हीं के दम पर, हजारों लोगों के जीवन में बदलाव लाया जा सकता है ।

मेरे प्यारे देशवासियो, बीते दिनों मुझे Europe के Netherlands जाने का अवसर मिला | वहां मैं कई meeting में शामिल हुआ | इसी दौरान एक ऐसा क्षण आया जिसने हर भारतीय को गर्व से भर दिया | Netherlands में आयोजित एक विशेष समारोह में चोला काल की प्राचीन ताम्र पट्टिकाएं भारत को वापस सौंपी गई | उस कार्यक्रम में Netherlands के प्रधानमंत्री भी मौजूद थे | इन ताम्र पट्टिकाओं को लेकर मुझे देश-विदेश से लगातार संदेश मिल रहे हैं | लोग खुशी जता रहे हैं, गर्व व्यक्त कर रहे हैं | दुनियाभर के तमिल समुदाय में भी इसे लेकर विशेष उत्साह है |

साथियो, इन ताम्र पट्टिकाओं को लेकर लोगों में काफी जिज्ञासा भी है | इसलिए आज मैं इससे जुड़ी कुछ बातें आपसे साझा करना चाहता हूं | इनमें 21 बड़ी और तीन छोटी ताम्र पट्टिकाएं हैं | ये मुख्य रूप से राजा राजेंद्र चोला-प्रथम द्वारा अपने पिता राजा राजराजा चोला के एक वचन को पूरा करने से जुड़ी हैं | इनमें आनइमंगलम् गांव को एक बौद्ध विहार को दान देने का उल्लेख है | इन ताम्र पट्टिकाओं में चोला वंश की उपलब्धियों का भी वर्णन मिलता है | इनसे पता चलता है कि चोला साम्राज्य की समुद्री शक्ति कितनी मजबूत थी | दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ उनके संबंधों की जानकारी भी इनमें मिलती है |

चोला साम्राज्य के समृद्ध इतिहास और संस्कृति पर हम सभी को बहुत गर्व है | साथियो, हमारी सरकार भारत की ऐसी अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है | इसी क्रम में ‘ज्ञान भारतम् अभियान’ के तहत छत्तीसगढ़ के मल्हार में भी एक महत्वपूर्ण खोज हुई है | यहां तीन दुर्लभ ताम्र पट्टिकाएं मिली हैं | ये पांडुवंशी राजवंश के महर्षि बालार्जुन के शासनकाल से जुड़ी मानी जा रही हैं | विशेषज्ञ मानते हैं कि ये inscriptions छठी-सातवीं सदी के हैं यानि चौदह-सौ, पंद्रह-सौ साल पुराने ये ताम्र पट्टिकाएं प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में लिखी गई हैं | इनसे उस समय की शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है |

साथियो, हम भारतीयों में खगोल विज्ञान यानी astronomy को लेकर हमेशा विशेष आकर्षण रहा है | हमारे देश में आज भी सदियों पुरानी observatories मौजूद हैं | यहां अद्भुत mathematical discoveries हुई हैं | Navigation हो, पंचांग हो, या हमारे पर्व-त्योहार, इन सबका संबंध आकाश और तारों से रहा है | हमारे यहां astronomy ने हर पीढ़ी में कौतूहल जगाया है | उसे exploration के लिए प्रेरित किया है और आज के युवाओं में भी इसे लेकर काफी उत्साह दिखाई देता है | आजकल आप भी देखते होंगे, देशभर में astronomy Clubs तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं | बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, स्कूलों से लेकर पार्कों तक इनकी गतिविधियां दिखाई देती हैं | मुझे Bangalore Astronomical Society के बारे में जानकारी मिली | यहां observational sessions आयोजित किए जाते हैं | इस संस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में astronomy को लोकप्रिय बनाने का mission भी शुरू किया है | ‘खगोल मण्डल’ नाम की एक टीम ने 30 घंटे का एक बहुत innovative course शुरू किया है |

साथियो, रात में तारों को निहारना अपने आप में अद्भुत अनुभव होता है | Astro Kerala नाम की एक संस्था Night Observation Camps और workshops आयोजित करती है | यहां युवा साथी Telescope बनाना और star maps का इस्तेमाल करना सीखते हैं | राजकोट के Big Bang Astronomy Club ने गिर के जंगलों से लेकर कच्छ के रण तक अनेक astronomy events आयोजित किए हैं | ‘ज्योतिर्विद्या परिसंस्था’ भी astronomy के सबसे पुराने संस्थानों में से एक है | यहां observational facilities के साथ-साथ books, library और telescope library की सुविधा भी है | मैं ISAAC (आईसैक) का भी जिक्र करना चाहूंगा | यह एक student-led nationwide network है, जो, astronomy और astrophysics clubs को आपस में जोड़ता है |

साथियो, अपनी hobby के लिए समय निकालना और लगातार कुछ नया सीखते रहना बहुत जरूरी है | मैं युवाओं से आग्रह करूंगा कि वे किसी astronomy club से जरूर जुड़ें, और इन छुट्टियों में किसी planetarium को भी जरूर देखने जाएं |

साथियो, ‘मन की बात’ कार्यक्रम को जो लोग टीवी पर देख रहे हैं, मैं उनसे कहूँगा – एक video जरूर देखिएगा | ये video पिछले दिनों बहुत चर्चा में रहा | इसमें कुछ लोग बहुत धैर्य से, बहुत सावधानी से एक गंगा Dolphin को बचाने की कोशिश कर रहे हैं | आपको ये जानकर आश्चर्य होगा, इस पूरे प्रयास में करीब 13 घंटे लगे, और आखिरकार वो dolphin बच गई |

साथियो, इसमें बहुत बड़ी भूमिका रही – भारत की पहली गंगा dolphin rescue ambulance की | ये घटना उत्तर प्रदेश की है | वहाँ एक गंगा dolphin नहर में फंस गई थी | ऐसे समय में ‘नमामि गंगे अभियान’ के तहत बनी ये ambulance उसके लिए उम्मीद बनकर पहुंची | फिर बहुत सावधानी से उसे बाहर निकाला गया | उसकी जांच की गई, उसका इलाज किया गया और उसके बाद उसे सुरक्षित राप्ती नदी में छोड़ दिया गया | एक तरह से कहें, तो एक जीवन, फिर अपने घर लौट गया |

साथियो, ये dolphin rescue ambulance बहुत खास है | इसे एक चलते–फिरते अस्पताल की तरह तैयार किया गया है | इसमें Dolphin को सुरक्षित रखने की व्यवस्था है | Oxygen की सुविधा है, विशेष stretcher हैं, बचाव के उपकरण हैं, यानि अगर कोई Dolphin, घायल हो जाए, नहर में फंस जाए या नदी से कट जाए, तो तुरंत उसकी मदद की जा सकती है |

साथियो, जब हम गंगा dolphin को बचाते हैं, तो हम सिर्फ एक प्रजाति को नहीं बचाते, हम गंगा की जैव विविधता को बचाते हैं | नदी के पूरे जीवन तंत्र को बचाते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की एक अमूल्य धरोहर भी बचाते हैं |

मेरे प्यारे देशवासियो, आप में से बहुत लोगों की नदी, तालाब या कुएं के पानी से जुड़ी यादें जरूर होंगी | किसी को तालाब में तैरना याद होगा, किसी को दोस्तों के साथ तालाब किनारे खेलना, किसी को उस मिट्टी की खुशबू याद होगी | बचपन की ऐसी यादें जीवन-भर मन में बसी रहती हैं |

साथियो, ऐसी ही यादों को बचाने की एक प्रेरक गाथा उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से सामने आई है | बस्ती के आकाश गुप्ता अपने गाँव की मनोरमा नदी को देखकर बहुत दुखी होते थे | क्योंकि जिस नदी को उन्होंने बचपन में साफ और जीवंत देखा था | समय के साथ उस नदी में प्लास्टिक जमा होने लगा था | गंदगी बढ़ती चली जा रही थी | श्रीमान आकाश ने तय किया कि शिकायत नहीं करेंगे, एक नई शुरुआत करेंगे | शिकायत नहीं, शुरुआत मंत्र बन गया | उन्होंने अपने दोस्तों को साथ लिया | सिर्फ जाल था, फावड़ा था, टोकरी थी और सबसे बड़ी ताकत थी, कुछ बदलने का संकल्प | ये युवा नदी में उतरते थे, जलकुंभी निकालते थे | प्लास्टिक और कचरा बाहर लाते थे | कई बार एक दिन में 50-60 किलो तक कचरा नदी से निकाला गया | धीरे- धीरे मनोरमा नदी का वह हिस्सा फिर से साफ दिखने लगा | आसपास के लोगों का ध्यान भी इस काम की तरफ गया | लोगों में स्वच्छता को लेकर जागरूकता बढ़ी |

साथियो, ऐसी ही एक प्रेरक कहानी गोवा से भी सामने आई है | गोवा के बालकृष्ण अइया जी retired teacher हैं | लेकिन समाज के लिए काम करने का उनका उत्साह आज भी वैसा ही है | उन्हें मड्डी-तोलाप इलाके में पानी की समस्या बहुत परेशान करती थी | उन्होंने भी समाधान के लिए काम शुरू किया | बालकृष्ण जी ने pipeline बिछाने के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इससे कई घरों तक पानी पहुंचा | जिन परिवारों को पानी के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता था, उनके लिए यह बहुत बड़ी राहत बनी |

साथियो, पिछले महीने मुझे एक बहुत अच्छा अनुभव हुआ | इसका संबंध ‘मन की बात’ से भी जुड़ा है | इसलिए आज मैं इसकी चर्चा आपसे करना चाहता हूँ | तमिलनाडु के नागरकोइल में मेरी मुलाकात एक टीचर से हुई | करीब तीन दशक पहले भी मैं उनसे मिला था | मैं बात कर रहा हूँ, गिरिजा अम्मा जी की | इस मुलाकात के दौरान कुछ युवा students भी उनके साथ थे |

साथियो, गिरिजा अम्मा जी करीब 15 स्कूल चलाती हैं | इनमें चेन्नई का जयगोपाल गरोडिया हिन्दू विद्यालय बहुत प्रमुख है | उनकी देशभक्ति की भावना हर भारतवासी को प्रेरित करने वाली है | उन्होंने ‘मन की बात’ से प्रेरणा लेकर देश के अनेक सैनिकों के लिए योगदान का संकल्प लिया | इसके लिए उन्होंने अपने सभी स्कूलों के students को प्रेरित किया | उन्होंने बच्चों से कहा कि वे वीर जवानों के लिए हर दिन एक रुपया योगदान दें | यानी एक साल में हर student की ओर से 365 रुपये जमा हुए | इस छोटे-छोटे योगदान से करीब 40 लाख रुपये इकट्ठा हुए | गिरिजा अम्मा जी ने इस पूरी राशि का चेक मुझे सौंपा | उनसे बातचीत के दौरान मैंने महसूस किया कि माँ भारती के प्रति उनका समर्पण कितना गहरा है | पिछले वर्ष ही चेन्नई के पहले हिन्दू विद्यालय ने अपने 50 वर्ष पूरे किए हैं | देश की शिक्षा और सांस्कृतिक गौरव को आगे बढ़ाने में इस School network की भूमिका बहुत प्रशंसनीय है | मैं इससे जुड़े सभी लोगों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ और उन students की भी विशेष सराहना करता हूँ, जिन्होंने, अपने वीर सैनिकों के लिए योगदान दिया |

साथियो, भारत के हर गाँव में, हर शहर में, कुछ-न-कुछ ऐसा हो रहा है जो हमें प्रेरणा देता है | कई बार, इन प्रयासों की ज्यादा चर्चा नहीं होती, लेकिन जब हम इन्हें जानते हैं, तो ये विश्वास और मजबूत होता है, कि देश, अपने लोगों की शक्ति से आगे बढ़ रहा है | मेरा आपसे आग्रह है, अपने आसपास ऐसे प्रयासों को जरूर देखिए | जो लोग समाज के लिए अच्छा काम कर रहें हैं, उन्हें पहचानिए, उनकी सराहना कीजिए, उनसे सीखिए, और हो सके तो खुद भी किसी अच्छे काम से जुड़िए | अगले महीने ‘मन की बात’ में कुछ और प्रेरक गाथाओं के साथ मैं फिर आपसे जुड़ूँगा | बहुत-बहुत धन्यवाद | नमस्कार |