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प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम की शुरूआत की
हमें बेटों और बेटियों के बीच भेदभाव को समाप्त करने की जरूरत है: प्रधानमंत्री मोदी
मेडिकल शिक्षा जीवन को बचाने के लिए है न कि बेटियों की हत्या के लिए: प्रधानमंत्री
लड़कियां आज खेल, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अच्छा काम कर रही हैं, कृषि के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है: पीएम मोदी
हमें पौधे लगाकर बालिकाओं के जन्म का जश्न मनाना चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने बालिकाओं के लाभ के लिए सुकन्या समृद्धि खाता का शुभारंभ किया 

विशाल संख्‍या में आए हुए माताओं, बहनों और भाईयों,

आज पानीपत की धरती पर हम एक बहुत बड़ी जिम्‍मेवारी की और कदम रख रहे हैं। यह अवसर किस सरकार ने क्‍या किया और क्‍या नहीं किया? इसका लेखा-जोखा करने के लिए नहीं है। गलती किसकी थी, गुनाह किसका था? यह आरोप-प्रत्यारोप का वक्‍त नहीं है। पानीपत की धरती पर यह अवसर हमारी जिम्‍मेवारियों का एहसास कराने के लिए है। सरकार हो, समाज हो, गांव हो, परिवार हो, मां-बाप हो हर किसी की एक सामूहिक जिम्‍मेवारी है और जब तक एक समाज के रूप में हम इस समस्‍या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे, तो हम अपना ही नुकसान करेंगे ऐसा नहीं है बल्कि हम आने वाली सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक भंयकर संकट को निमंत्रण दे रहे हैं और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों और मैं इस बात के लिए मेनका जी और उनके विभाग का आभारी हूं कि उन्‍होंने इस काम के लिए हरियाणा को पसंद किया। मैं मुख्‍यमंत्री जी का भी अभिनंदन करता हूं कि इस संकट को इन्‍होंने चुनौती को स्‍वीकार किया। लेकिन यह कार्यक्रम भले पानीपत की धरती पर होता हो, यह कार्यक्रम भले हरियाणा में होता हो, लेकिन यह संदेश हिंदुस्‍तान के हर परिवार के लिए है, हर गांव के लिए है, हर राज्‍य के लिए है।

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क्‍या कभी हमने कल्‍पना की है जिस प्रकार की समाज के अवस्‍था हम बना रहे हैं अगर यही चलता रहा तो आने वाले दिनों में हाल क्‍या होगा? आज भी हमारे देश में एक हजार बालक पैदा हो, तो उसके सामने एक हजार बालिकाएं भी पैदा होनी चाहिए। वरना संसार चक्र नहीं चल सकता। आज पूरे देश में यह चिंता का विषय है। यही आपके हरियाणा में झज्जर जिला देख लीजिए, महेंद्रगढ़ जिला देख लीजिए। एक हजार बालक के सामने पौने आठ सौ बच्चियां हैं। हजार में करीब-करीब सवा दौ सौ बच्‍चे कुंवारे रहने वाले हैं। मैं जरा माताओं से पूछ रहा हूं अगर बेटी पैदा नहीं होगी, तो बहू कहां से लाओगे? और इसलिए जो हम चाहते हैं वो समाज भी तो चाहता है। हम यह तो चाहते है कि बहू तो हमें पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटी को पढ़ाना है तो पास बार सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह अन्‍याय कब तक चलेगा, यह हमारी सोच में यह दोगलापन कब तक चलेगा? अगर बहू पढ़ी-लिखी चाहते हैं तो बेटी को भी पढ़ाना यह हमारी जिम्‍मेवारी बनता है। अगर हम बेटी को नहीं पढ़ाऐंगे, तो बहू भी पढ़ी-लिखी मिले। यह अपेक्षा करना अपने साथ बहुत बड़ा अन्याय है। और इसलिए भाईयों और बहनों, मैं आज आपके बीच एक बहुत बड़ी पीड़ा लेकर आया हूँ। एक दर्द लेकर आया हूँ। क्‍या कभी कल्‍पना की हमने जिस धरती पर मानवता का संदेश होता है, उसी धरती पर मां के गर्भ में बच्‍ची को मौत के घाट उतार दिया जाए।

यह पानीपत की धरती, यह उर्दू साहित्‍य के scholar अलताफ हुसैन हाली की धरती है। यह अलताफ हुसैन हाली इसी पानीपत की धरती से इस शायर ने कहा था। मैं समझता हूं जिस हरियाणा में अलताफ हुसैन जैसे शायर के शब्‍द हो, उस हरियाणा में आज बेटियों का यह हाल देखकर के मन में पीड़ा होती है। हाली ने कहा था....उन्‍होंने कहा था ए मांओ, बहनों बेटियां दुनिया की जन्नत तुमसे हैं, मुल्‍कों की बस्‍ती हो तुम, गांवों की इज्‍जत तुम से हो। आप कल्‍पना कर सकते हैं बेटियों के लिए कितनी ऊंची कल्‍पना यह पानीपत का शायर करता है और हम बेटियों को जन्‍म देने के लिए भी तैयार नही हैं।

भाईयों और बहनों हमारे यहां सदियों से जब बेटी का जन्‍म होता था तो शास्‍त्रों में आर्शीवाद देने की परंपरा थी और हमारे शास्‍त्रों में बेटी को जो आर्शीवाद दिये जाते थे वो आर्शीवाद आज भी हमें, बेटियों की तरफ किस तरह देखना, उसके लिए हमें संस्‍कार देते हैं, दिशा देते हैं। हमारे शास्‍त्रों ने कहा था जब हमारे पूर्वज आर्शीवाद देते थे तो कहते थे – यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद गंगा कुरूक्षेत्रे, यावद तिस्‍तदी मेदनी, यावद सीताकथा लोके, तावद जीवेतु बालिका। हमारे शास्‍त्र कहते थे जब तक गंगा का नाम है, जब तक कुरूक्षेत्र की याद है, जब तक हिमालय है, जब तक कथाओं में सीता का नाम है, तब तक हे बालिका तुम्‍हारा जीवन अमर रहे। यह आर्शीवाद इस धरती पर दिये जाते थे। और उसी धरती पर बेटी को बेमौत मार दिया जाए और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों उसके मूल में हमारा मानसिक दारिद्रय जिम्‍मेवार है, हमारे मन की बीमारी जिम्‍मेवार है और यह मन की बीमार क्‍या है? हम बेटे को अधिक महत्‍वपूर्ण मानते हैं और यह मानते हैं बेटी तो पराये घर जाने वाली है। यहां जितनी माताएं-बहनें बैठी हैं। सबने यह अनुभव किया होगा यह मानसिक दारिद्रय की अनुभूति परिवार में होती है। मां खुद जब बच्‍चों को खाना परोसती है। खिचड़ी परोसी गई हो और घी डाल रही हो। तो बेटे को तो दो चम्‍मच घी डालती है और बेटी को एक चम्‍मच घी डालती है और जब, मुझे माफ करना भाईयों और बहनों यह बीमारी सिर्फ हरियाणा की नहीं है यह हमारी देश की मानसिक बीमारी का परिणाम है और बेटी को, अगर बेटी कहे न न मम्‍मी मुझे भी दो चम्‍मच दे दो, तो मां कहते से डरती नहीं है बोल देती है, अरे तुझे तो पराये घर जाना है, तुझे घी खाकर के क्‍या करना है। यह कब तक हम यह अपने-पराये की बात करते रहेंगे और इसलिए हम सबका दायित्‍व है, हम समाज को जगाए।

कभी-कभी जिस बहन के पेट में बच्‍ची होती है वो कतई नहीं चाहती है कि उसकी बेटी को मार दिया जाए। लेकिन परिवार का दबाव, माहौल, घर का वातावरण उसे यह पाप करने के लिए भागीदार बना देता है, और वो मजबूर होती है। उस पर दबाव डाला जाता है और उसी का नतीजा होता है कि बेटियों को मां के गर्भ में ही मार दिया जाता है। हम किसी भी तरह से अपने आप को 21वीं सदी के नागरिक कहने के अधिकारी नही हैं। हम मानसिकता से 18वीं शताब्दी के नागरिक हैं। जिस 18वीं शताब्‍दी में बेटी को “दूध-पीती” करने की परंपरा थी। बेटी का जन्‍म होते ही दूध के भरे बर्तन के अंदर उसे डूबो दिया जाता था, उसे मार दिया जाता था। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं, वो तो पाप करते थे गुनाह करते थे। बेटी जन्‍मती थी आंखे खोलकर के पल-दो-पल के लिए अपनी मां का चेहरा देख सकती थी। बेटी जन्‍मती थी, दो चार सांस ले पाती थी। बेटी जन्मती थी, दुनिया का एहसास कर सकती थी। बाद में उस मानसिक बीमारी के लोग उसको दूध के बर्तन में डालकर के मार डालते थे। हम तो उनसे भी गए-बीते हैं। हम तो बेटी को मां का चेहरा भी नहीं देखने देते, दो पल सांस भी नहीं लेने देते। इस दुनिया का एहसास भी नहीं होने देते। मां के गर्भ में ही उसे मार देते हैं। इससे बड़ा पाप क्‍या हो सकता है और हम संवेदनशील नहीं है ऐसा नहीं है।

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कुछ साल पहले इसी हरियाणा में कुरूक्षेत्र जिले में हल्दा हेड़ी गांव में एक टयूबवेल में एक बच्‍चा गिर गया, प्रिंस.. प्रिंस कश्‍यप । और सारे देश के टीवी वहां मौजूद थे। सेना आई थी एक बच्‍चे को बचाने के लिए और पूरा हिंदुस्‍तान टीवी के सामने बैठ गया था। परिवारों में माताएं खाना नहीं पका रही थी। हर पल एक-दूसरे को पूछते थे क्‍या प्रिंस बच गया, क्‍या प्रिंस सलामत निकला टयूबवेल में से? करीब 24 घंटे से भी ज्‍यादा समय हिंदुस्‍तान की सांसे रूक गई थी। एक प्रिंस.. केरल, तमिलनाडु का कोई रिश्‍तेदार नहीं था। लेकिन देश की संवेदना जग रही है। उस बच्‍चे को जिंदा निकले, इसके लिए देशभर की माताएं-बहने दुआएं कर रही थी। मैं जरा पूछना चाहता हूं कि एक प्रिंस जिसकी जिंदगी पर संकट आए, हम बेचैन बन जाते हैं। लेकिन हमारे अड़ोस-पड़ोस में आएं दिन बच्चियों को मां के पेट में मार दिया जाए, लेकिन हमें पीड़ा तक नहीं होती है, तब सवाल उठता है। हमारी संवेदनाओं को क्‍या हुआ है? और इसलिए आज मैं आपके पास आया हूं। हमें बेटियों को मारने का हक नहीं है।

यह सोच है बुढ़ापे में बेटा काम आता है। इससे बड़ी गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए। अगर बुढ़ापे में बेटे काम आए होते तो पिछले 50 साल में जितने वृद्धाश्राम खुले हैं, शायद उतने नहीं खुले होते। बेटो के घर में गाड़ियां हो, बंगले हो, लेकिन बांप को वृद्धाश्राम में रहना पड़ता है ऐसी सैकड़ों घटनाएं है और ऐसी बेटियों की भी घटनाएं है। अगर मां-बाप की इकलौती बेटी है तो मेहनत करे, मजदूरी करे, नौकरी करे, बच्‍चों को tuition करे लेकिन बूढ़े मां-बाप को कभी भूखा नहीं रहने देती। ऐसी सैकड़ों बेटियां बाप से भी सेवा करने के लिए, मां-बाप की सेवा करने के लिए अपने खुद के सपनों को चूर-चूर कर देने वाली बेटियों की संख्‍या अनगिनत है और सुखी बेटों के रहते हुए दुःखी मां-बाप की संख्‍या भी अनगिनत है। और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों यह सोच कि बेटा आपका बुढ़ापा संभालेगा, भूल जाइये। अगर आप अपनी संतानों को सामान रूप से संस्‍कारित करके बड़े करोगे, तो आपकी समस्‍याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।

कभी-कभी लगता है कि बेटी तो पराये घर की है। मैं जरा पूछना चाहता हूं सचमुच में यह सही सोच है क्‍या? अरे बेटी के लिए तो आपका घर पराया होता है जिस घर आप भेजते हो वो पल-दो-पल में उसको अपना बना लेती है। कभी पूछती नहीं है कि मुझे उस गांव में क्‍यों डाला मुझे उस कुटुम्‍ब में क्‍यों डाल दिया? जो भी मिले उसको सर-आंखों पर चढ़ाकर के अपना जीवन वहां खपा देती है और अपने मां-बाप के संस्‍कारों को उजागर करती है। अच्‍छा होता है तो कहती है कि मेरी मां ने सिखाया है, अच्‍छा होता है तो कहती है कि मां-बाप के कारण, मेरे मायके के संस्‍कार के कारण मैं अच्‍छा कर रही हूं। बेटी कहीं पर भी जाएं वहां हमेशा आपको गौरव बढ़े, उसी प्रकार का काम करती है।

मैंने कल्‍पना की, आपने कभी सोचा है यहीं तो हरियाणा की धरती, जहां की बेटी कल्‍पना चावला पूरा विश्‍व जिसके नाम पर गर्व करता है। जिस धरती पर कल्‍पना चावला का जन्‍म हुआ हो, जिसको को लेकर के पूरा विश्‍व गर्व करता हो, उसी हरियाणा में मां के पेट में पल रही कल्‍पना चावलाओं को मार करके हम दुनिया को क्‍या मुंह दिखाएंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों मैं आप आपसे आग्रह करने आया हूं और यह बात देख लीजिए अगर अवसर मिलता है तो बेटे से बेटियां ज्‍यादा कमाल करके दिखाती हैं।

आज भी आपके हरियाणा के और हिंदुस्‍तान के किसी भी राज्‍य के 10th या 12th के result देख लीजिए। first stand में से छह या सात तो बच्चियां होती है जीतने वाली, बेटों से ज्‍यादा नंबर लाती है। आप हिंदुस्‍तान का पूरा education sector देख लीजिए। teachers में 70-75 प्रतिशत महिलाएं शिक्षक के रूप में काम कर रही है। आप health sector देख लीजिए health sector में 60 प्रतिशत से ज्‍यादा, सूश्रूषा के क्षेत्र में बहनें दिखाई देती है। अरे हमारा agriculture sector, पुरूष सीना तान कर न घूमें कि पुरूषों से ही agriculture sector चलता है। अरे आज भी भारत में agriculture और पशुपालन में महिलाओं की बराबरी की हिस्‍सेदारी है। वो खेतों में जाकर के मेहनत करती है,वो भी खेती में पूरा contribution करती हैं और खेत में काम करने वाले मर्दों को संभालने का काम भी वही करती है।

पश्चिम के लोग भले ही कहते हों, लेकिन हमारे देश में महिलाओं का सक्रिय contribution आर्थिक वृद्धि में रहता है। खेलकूद में देखिए पिछले दिनों जितने game हुए, उसमें ईनाम पाने वाले अगर लड़के हैं तो 50 प्रतिशत ईनाम पाने वाली लड़कियां है। gold medal लाने वाली लड़कियां है। खेलकूद हो, विज्ञान हो, व्‍यवसाय हो, सेवा का क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, आज महिलाएं रत्‍तीभर भी पीछे नहीं है और यह सामर्थ्‍य हमारी शक्ति में है। और इसलिए मैं आपसे आग्रह करने आया हूं कि हमें बेटे और बेटी में भेद करने वाली बीमारी से निकल जाना चाहिए। “बेटा-बेटी एक समान” यही हमारा मंत्र होना चाहिए और एक बार हमारे मन में बेटा और बेटी के प्रति एक समानता का भाव होगा तो यह पाप करने की जो प्रवृति है वह अपने आप ही रूक जाएगी। और यह बात, इसके लिए commitment चाहिए, संवेदना चाहिए, जिम्‍मेवारी चाहिए।

मैं आज आपके सामने एक बात बताना चाहता हूं। यह बात मेरे मन को छू गई। किसी काम के लिए जब commitment होता है, एक दर्द होता है तो इंसान कैसे कदम उठाता है। हमारे बीच माधुरी दीक्षित जी बैठी है। माधुरी नैने। उनकी माताजी ICU में हैं, वो जिंदगी की जंग लड़ रही है और बेटी पानीपत पहुंची है। और मां कहती है कि बेटी यह काम अच्‍छा है तुम जरूर जाओ। Weather इतना खराब होने के बावजूद भी माधुरी जी अपनी बीमार मां को छोड़कर के आपकी बेटी बचाने के लिए आपके बीच आकर के बैठी है और इसलिए मैं कहता हूं एक commitment चाहिए, एक जिम्‍मेवारी का एहसास चाहिए और यह एक सामूहिक जिम्‍मेवारी में साथ है। गांव, पंचायत, परिवार, समाज के लोग इन सबको दायित्‍व निभाना पड़ेगा और तभी जाकर के हम इस असंतुलन को मिटा सकेंगे। यह रातों-रात मिटने वाला नहीं है। करीब-करीब 50 साल से यह पाप चला है। आने वाले 100 साल तक हमें जागरूक रूप से प्रयास करना पड़ेगा, तब जाकर के शायद स्थिति को हम सुधार पाएंगे। और इसलिए मैंने कहा आज का जो यह पानीपत की धरती पर हम संकल्‍प कर रहे हैं, यह संकल्‍प आने वाली सदियों तक पीढि़यों की भलाई करने के लिए है।

भाईयों बहनों आज यहां भारत सरकार की और योजना का भी प्रांरभ हुआ है – सुकुन्‍या समृद्धि योजना। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं। इसको निरंतर बल देना है और इसलिए उसके लिए सामाजिक सुरक्षा भी चाहिए। यह सुकुन्‍या समृद्धि योजना के तहत 10 साल से कम उम्र की बेटी एक हजार रुपये से लेकर के डेढ़ रुपये लाख तक उसके मां-बाप पैसे बैंक में जमा कर सकते है और सरकार की तरफ से हिंदुस्‍तान में किसी भी प्रकार की परंपरा में ब्‍याज दिया जाता है उससे ज्‍यादा ब्‍याज इस बेटी को दिया जाएगा। उसका कभी Income Tax नहीं लगाया जाएगा और बेटी जब 21 साल की होगी, पढ़ाई पूरी होगी या शादी करने जाती होगी तो यह पैसा पूरा का पूरा उसके हाथ में आएगा और वो कभी मां-बाप के लिए बोझ महसूस नहीं होगी।

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काशी के लोगों ने मुझे अपना MP बनाया है। वहां एक जयापुर पर गांव है। जयापुर गांव ने मुझे गोद लिया है और वो जयापुर गांव मेरी रखवाली करता है, मेरी चिंता करता है। जयपुर में गया था मैंने उनको कहा था कि हमारे गावं में जब बेटी पैदा हो तो पूरे गांव का एक बड़ा महोत्‍सव होना चाहिए। आनंद उत्‍सव होना चाहिए और मैंने प्रार्थना की थी कि बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ बोने चाहिए। मुझे बाद में चिट्ठी आई। मेरे आने के एक-आध महीने बाद कोई एक बेटी जन्‍म का समाचार आया तो पूरे गांव ने उत्‍सव मनाया और उतना ही नहीं सब लोगों ने जाकर के पाँच पेड़ लगाए। मैं आपको भी कहता हूं। आपकी बेटी पैदा हो तो पाँच पेड़ लगाएंगे बेटी भी बड़ी होगी, पेड़ भी बड़ा होगा और जब शादी का समय आएगा वो पाँच पेड़ बेच दोगे न तो भी उसकी शादी का खर्चा यूं ही निकल जाएगा।

भाईयों बहनों बड़ी सरलता से समझदारी के साथ इस काम को हमने आगे बढ़ाना है और इसलिए आज मैं हरियाणा की धरती, जहां यह सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन हिंदुस्‍तान का कोई राज्‍य बाकी नहीं है कि जहां चुनौती नहीं है। और मैं जानता हूं यह दयानंद सरस्‍वती के संस्‍कारों से पली धरती है। एक बार हरियाणा के लोग ठान लें तो वे दुनिया को खड़ी करने की ताकत रखते हैं। मुझको बड़ा बनाने में हरियाणा का भी बहुत बड़ा role है। मैं सालों तक आपके बीच रहा हूं। आपके प्‍यार को भली-भांति में अनुभव करता हूं। आपने मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। मैं आज आपसे कुछ मांगने के लिए आया हूं। देश का प्रधानमंत्री एक भिक्षुक बनकर आपसे बेटियों की जिंदगी की भीख मांग रहा है। बेटियों को अपने परिवार का गर्व मानें, राष्‍ट्र का सम्‍मान मानें। आप देखिए यह असंतुलन में से हम बहुत तेजी से बाहर आ सकते हैं। बेटा और बेटी दोनों वो पंख है जीवन की ऊंचाईयों को पाने का उसके बिना कोई संभावना नहीं और इसलिए ऊंची उड़ान भी भरनी है तो सपनों को बेटे और बेटी दोनों पंख चाहिए तभी तो सपने पूरे होंगे और इसलिए मेरे भाईयों और बहनों हम एक जिम्‍मेवारी के साथ इस काम को निभाएं।

मुझे बताया गया है कि हम सबको शपथ लेना है। आप जहां बैठे है वहीं बैठे रहिये, दोनों हाथ ऊपर कर दीजिए और मैं एक शपथ बोलता हूं मेरे साथ आप शपथ बोलेंगे – “मैं शपथ लेता हूं कि मैं लिंग चयन एवं कन्‍या भ्रूण हत्‍या का ‍विरोध करूगा; मैं बेटी के जन्‍म पर खुश होकर सुरक्षित वातारवण प्रदान करते हुए बेटी को सुशिक्षित करूंगा। मैं समाज में बेटी के प्रति भेदभाव खत्‍म करूंगा, मैं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं” का संदेश पूरे समाज में प्रसारित करूंगा।“

भाई बहनों मैं डॉक्‍टरों से भी एक बात करना चाहता हूं। मैं डॉक्‍टरों से पूछना चाहता हूं कि पैसे कमाने के लिए यही जगह बची है क्‍या? और यह पाप के पैसे आपको सुखी करेंगे क्‍या? अगर डॉक्‍टर का बेटा कुंवारा रह गया तो आगे चलकर के शैतान बन गया तो वो डॉक्‍टर के पैसे किस काम आएंगे? मैं डॉक्‍टरों को पूछना चाहता हूं कि यह आपको दायित्‍व नहीं है कि आप इस पाप में भागीदार नहीं बनेंगे। डॉक्‍टरों को अच्‍छा लगे, बुरा लगे, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आपकी यह जिम्‍मेवारी है। आपको डॉक्‍टर बनाया है समाज ने, आपको पढ़-लिखकर के तैयार किया है। गरीब के पैसों से पलकर के बड़े हुए हो। आपको पढ़ाया गया है किसी की जिंदगी बचाने के लिए, आपको पढ़ाया गया है किसी की पीड़ा को मुक्‍त करने के लिए। आपको बच्चियों को मारने के लिए शिक्षा नहीं दी गई है। अपने आप को झकझोरिये, 50 बार सोचिए, आपके हाथ निर्दोष बेटियों के खून से रंगने नहीं चाहिए। जब शाम को खाना खाते हो तो उस थाली के सामने देखो। जिस मां ने, जिस पत्‍नी ने, जिस बहन ने वो खाना बनाया है वो भी तो किसी की बेटी है। अगर वो भी किसी डॉक्‍टर के हाथ चढ़ गई होती, तो आज आपकी थाली में खाना नहीं होता। आप भी सोचिए कहीं उस मां, बेटी, बहन ने आपके लिए जो खाना बनाया है, कहीं आपके के खून से रंगे हुए हाथ उस खाने की चपाती पर तो हाथ नहीं लगा रहे। जरा अपने आप को पूछिये मेरे डॉक्‍टर भाईयों और बहनों। यह पाप समाज द्रोह है। यह पाप सदियों की गुनाहगारी है और इसलिए एक सामाजिक दायित्‍व के तहत है, एक कर्तव्‍य के तहत और सरकारें किसकी-किसकी नहीं, यह दोषारोपण करने का वक्‍त नहीं है। हमारा काम है जहां से जग गए हैं, जाग करके सही दिशा में चलना।

मुझे विश्‍वास है पूरा देश इस संदेश को समझेगा। हम सब मिलकर के देश को भविष्‍य के संकट से बचाएंगे और फिर एक बार मैं हरियाणा को इतने बड़े विशाल कार्यक्रम के लिए और हरियाणा इस संदेश को उठा लेगा तो हिंदुस्‍तान तो हरियाणा के पीछे चल पड़ेगा। मैं फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद करता हूं।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ इस संकल्‍प को लेकर हम जाएंगे। इसी अपेक्षा के साथ मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए – भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

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ट्रांसपोर्टेशन किसी भी शहर, किसी भी देश के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी होता है: प्रधानमंत्री मोदी
December 18, 2018
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ट्रांसपोर्टेशन किसी भी शहर, किसी भी देश के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी होता है, भारत तो दुनिया के उन देशों में है जहां तेज़ गति से शहरीकरण हो रहा है: प्रधानमंत्री मोदी
केंद्र सरकार ने तय किया है कि साल 2022 में, जब देश आजादी का 75 वां पर्व मना रहा हो, तब देश के हर परिवार के पास अपनी पक्की छत हो, अपना पक्का घर हो: पीएम मोदी
2014 के बाद हमने तय किया कि मेट्रो लाइन बिछाने की स्पीड भी बढ़ेगी और स्केल भी बढ़ेगी: प्रधानमंत्री
निम्न और मध्यम वर्ग का बिजली का बिल कैसे कम हो, सरकार इसके लिए भी निरंतर प्रयास कर रही है: प्रधानमंत्री मोदी
केंद्र सरकार सबका साथ, सबका विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रही है, देश का कोई कोना, कोई गांव और शहर, कोई वर्ग विकास से अछूता ना रहे, इसके लिए काम किया जा रहा है: पीएम मोदी
गरीब का जीवन स्तर ऊपर उठाया जाए इसके लिए योजनाएं बनाई और चलाई जा रही हैं: प्रधानमंत्री
पिछले 4 साल में मुंबई में मेट्रो का जाल बिछाने के लिए अनेक नई परियोजनाओं की शुरुआत की गई है: प्रधानमंत्री मोदी

भारी संख्‍या में पधारे मेरे प्‍यारे भाइयो और बहनों।

मुम्‍बई और ठाणे, देश का वो हिस्‍सा है जिसने देश के सपनों को साकार करने में मदद की है। छोटे-छोटे गांवों-कस्‍बों से आए सामान्‍य लोगों ने यहां बड़ा नाम कमाया है; गौरवान्वित किया है। यहां जन्‍म लेने वालों, यहां रहने वालों का हृदय इतना विशाल है कि सबको को अपने दिल में जगह दी है। तभी तो यहां पूरे भारत की तस्‍वीर एक ही जगह दिखती है। जो भी यहां आता है वो मुम्‍बईया रंग में रंग जाता है; मराठी परम्‍परा का हिस्‍सा हो जाता है।

भाइयो और बहनों, आज मुम्‍बई का विस्‍तार हो रहा है, चारों ओर विकास हो रहा है; लेकिन इसके साथ-साथ यहां संसाधनों पर भी दबाव बढ़ रहा है। विशेषतौर पर यहां के transport system, सड़क और रेल व्‍यवस्‍था पर इसका प्रभाव देखने को मिलता है। इसी को ध्‍यान में रखते हुए बीते चार-साढ़े चार वर्षों में मुम्‍बई और ठाणे समेत इससे सटे तमाम इलाकों में transport system को बेहतर करने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं।

आज भी यहां जो 33 हजार करोड़ रुपये ये अधिक के प्रोजेक्‍ट्स का शिलान्‍यास किया गया है, उसमें दो मेट्रो लाइन भी शामिल हैं। इसके अलावा ठाणे में 90 हजार गरीब और मध्‍यम वर्ग के परिवारों के लिए अपने घरों के निर्माण से जुड़े प्रोजेक्‍ट्स की भी शुरूआत आज की गई है।

साथियो, transportation किसी भी शहर, किसी भी देश के विकास की महत्‍वपूर्ण कड़ी होता है। भारत तो दुनिया के उन देशों में है जहां तेज गति से शहरीकरण हो रहा है।

हाल में एक रिसर्च सामने आई है कि आने वाले दशक में दुनिया के Top Ten, सबसे तेजी से विकसित होते शहरों में सारे दसों-दस शहर भारत के शहर हैं। यानी देश जितनी तेजी से विकास की गति को पकड़ रहा है, उसका एक मजबूत हिस्‍सा हमारे शहर में रहने वाले लोग हैं।

मुम्‍बई तो वैसे भी देश की आर्थिक गतिविधियों का सेंटर रहा है और आने वाले समय में इसका और विस्‍तार होने वाला है। इसलिए केन्‍द्र में भारतीय जनता पार्टी और एनडीए की सरकार बनी, तब हमने यहां के infrastructure पर ध्‍यान दिया।

मुम्‍बई लोकल के लिए सैंकड़ों करोड़ का आवंटन किया। यहां पुराने रेलवे ब्रिजों का नवीनीकरण किया गया। मुम्बई लोकल के अलावा भी ट्रांसपोर्ट के दूसरे माध्‍यमों का विस्‍तार किया गया, जिसमें से मेट्रो सिस्‍टम सबसे प्रभावी माध्‍यम बनता जा रहा है।

आज जो मेट्रो का विस्‍तार यहां ठाणे में हुआ है, ये मुम्‍बई, ठाणे और आसपास के दूसरे क्षेत्रों को बेहतर connectivity देने के vision का ही हिस्‍सा है।

साथियो, मुम्‍बई में पहली बार साल 2006 में मेट्रो की पहली परियोजना की शुरूआत की गई थी। लेकिन आठ साल तक क्‍या हुआ, कहां मामला अटक गया, बताना मुश्किल है।

पहली लाईन 2014 में शुरू हो पाई और वो भी सिर्फ 11 किलोमीटर की लाइन। आठ साल में सिर्फ और सिर्फ 11 किलोमीटर।

2014 के बाद हमने तय किया कि मेट्रो लाइन बिछाने की स्‍पीड भी बढ़ेगी और स्‍केल भी बढ़ेगी। पिछले चार साल में मुम्‍बई में मेटो का जाल बिछाने के लिए अनेक नई परियोजनाओं की शुरूआत की गई।

इसी सोच पर चलते हुए आज दो और मेट्रो लाइनों का शिलान्‍यास किया गया है। यानी आने वाले तीन साल में यहां 35 किलोमीटर की मेट्रो क्षमता और जुड़ जाएगी।

इतना ही नहीं, साल 2022 से 2024 के बीच मुम्‍बई वासियों को पौने 300 किलोमीटर की मेट्रो लाइन उपलब्‍ध हो जाएगी।

आज जो शिलान्‍यास किए गए हैं, उससे ठाणे से भिवंडी, कल्‍याण,दहिसरसे लेकर मीरा-भायंदर तक के लोगों को तो फायदा पहुंचेगा ही, इनसे पूरी मुम्‍बई में जाम की परेशानी कम होगी।

साथियो, ये सुविधाएं सिर्फ आज की आवश्‍यकताओं के हिसाब से नहीं, बल्कि साल 2035 की जरूरतों को और उसके हिसाब से विकसित की जा रही हैं।

भाइयो और बहनों, आपका सफर आसान हो, आपका जीवन सुगम हो, लेकिन देश के गरीब और मध्‍यम वर्ग के लोगों को बिना घर के न रहना पड़े, इसे लिए भी व्‍यापक प्रयास किए जा रहे हैं।

केन्‍द्र सरकार ने तय किया है कि साल 2022 में जब देश आजादी का 75वां पर्व मना रहा हो, तब देश के हर परिवार के पास अपनी पक्‍कीछत हो, अपना पक्‍का घर हो; इसी लक्ष्‍य को आगे बढ़ाते हुए आज यहां 90 हजार नए घर बनाने की शुरूआत हुई है। मुझे बताया गया है कि तीन साल के भीतर ये घर बनकर तैयार हो जाएंगे।

साथियो, पहले की सरकार से हमारे संस्‍कार भी अलग हैं, सरोकार भी और रफ्तार भी अलग है। पिछली सरकार ने अपने आखिरी चार वर्षों में सिर्फ साढ़े 25 लाख घर बनाए थे; उनकी सरकार के last four years में 25 लाख 50 हजार मकान बनाए थे। जबकि बीते चार वर्षों में हमारी सरकार ने करीब 1 करोड़ 25 लाख से ज्‍यादा यानी पांच गुना से अधिक लोगों के लिए घर बनाए गए हैं। इसका मतलब इतना काम उनको करना होता तो शायद दो पीढ़ी चली जातीं।

प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के तहत पूरे महाराष्‍ट्र में आठ लाख घर बनाए जा रहे हैं। साथियो, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बेघर लोगों के लिए अच्‍छी सोसायटी का निर्माण किया जा रहा है और ये वो आदर्श सोसायटी नहीं है, जो कि पुरानी सरकार के दौरान चर्चा में रही थी। बल्कि सही मायने में आदर्श सोसायटी बनाई जा रही है जहां एक सामान्‍य परिवार के सपने पलते हैं, बेहतर भविष्‍य का आत्‍मविश्‍वास जगता है।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हमारी सरकार ढाई लाख रुपये तक की मदद सीधे बैंक में जमा कर रही है।यानी लोन का एमाउंट सीधे ढाई लाख रुपये घट जाता है। यानी निम्‍न और मध्‍यम वर्ग की मदद होम लोन में भी की जा रही है।

इसके अलावा पहले के मुकाबले होम लोन पर ब्‍याज दर भी काफी कम हुई है। सरकार द्वारा इस योजना के तहत कमजोर तबके के लोगों को, निम्‍न आय वर्ग वालों को साढ़े 6 प्रतिशत की interest subsidy भी दी जा रही है।

Medium Income ग्रुप वालों को 3 से 4 प्रतिशत की interest subsidy दी गई है। इन प्रयासों का मतलब ये हुआ कि अगर किसी ने 20 लाख रुपये का होम लोन 20 वर्ष के लिए लिया है, तो उसे इस अवधि में करीब-करीब 6 लाख रुपये तक की सहायता सरकार द्वारा दी जा रही है।

साथियो, सरकार की इन्‍हीं ईमानदार कोशिशों का नतीजा है कि बीते एक-डेढ़ वर्ष में लाखों लोगों ने अपना पहला घर इस योजना का लाभ उठाते हुए बुक किया है, खरीदा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते 7-8 महीने में नए घर खरीदने की रफ्तार पिछले वर्ष के मुकाबले दोगुनी से भी ज्‍यादा अधिक हुई है।

मुझे बताया गया है कि आज जो योजना शुरू हो रही है, उसमें भी इस तरह के लोगों की मदद की जा रही है। महाराष्‍ट्र में 85 हजार से ज्‍यादा लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत दो हजार करोड़ रुपये की मदद मिल चुकी है।

साथियों, हम सिर्फ मध्‍यम वर्ग के अपने घर के सपनों को ही साकार करने में मदद नहीं कर रहे हैं, बल्कि इससे जुड़ी दूसरी दिक्‍कतों को भी दूर कर रहे हैं।

चार वर्ष पहले तक किस-किस प्रकार की समस्‍याएं अपनी जीवन भर की कमाई से बुक किए घर को पाने में होती थीं, इससे आप भलीभांति परिचित हैं।

कुछ लोगों की मनमानी और गलत नीयत के चलते कैसे बरसों तक आपका घर फंस जाता था। ऐसा भी होता था कि वादा वो कुछ और करते थे और डिलीवरी कुछ और होती थी। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने का एक बड़ा प्रयास हमारी सरकार ने किया है।

आज Real Estate Regulatory Authority यानी RERA, देश के अधिकांश राज्‍यों में notify किया जा चुका है। 21 राज्‍यों में तो tribunal भी काम कर रहे हैं।

मैं फडणवीस जी को बधाई देता हूं, क्‍योंकि महाराष्‍ट्र देश के उन राज्‍यों में है, जिसने सबसे पहले RERA को लागू किया है। देशभर के करीब 35 हजार रियल एस्‍टेट प्रोजेक्‍ट्स और 27 हजार रियल एस्‍टेट एजेंट्स इससे रजिस्‍टर्ड हो चुके हैं। इसमें भी महाराष्‍ट्र के सबसे अधिक प्रोजेक्‍ट्सशामिल हैं1

साथियो, सोचिए, 70 वर्षों से बिना किसी सख्‍त और स्‍पष्‍ट कानून के Real Estate Sectorचल रहा था। अगर पहले ही इस प्रकार का कानून सरकारें बनातीं तो घर खरीदारों को अदालतों के चक्‍कर न लगाने पड़ते और रियल एस्‍टेट सेक्‍टर भी ईमानदारी के साथ खूब फलता-फूलता।

भाइयो और बहनों, निम्‍न और मध्‍यम वर्ग का बिजली का बिल कैसे कम हो, सरकार इसके लिए भी निरंतर प्रयास कर रही है। देशभर में उजाला योजना के तहत 30 करोड़ से अधिक एलईडी बल्‍ब बांटे गए हैं।जिसमें करीब सवा दो करोड़ बल्‍ब, उसमें से महाराष्‍ट्र में बांटे गए हैं; जिसमें से ठाणे में भी लाखों बल्‍ब दिए जा चुके हैं। जो काम पहले 60 वाट का बल्‍ब करता था, वही आज 7 या 8 वाट का बल्‍ब कर रहा है। यानी बिजली की बचत हो हो रही है, साथ में बिल भी कम हो रहा है।

सिर्फ इसी योजना से देश के तमाम परिवारों को हर साल मिलाकर करीब 16 हजार करोड़ रुपये की बचत हो रही है। सिर्फ महाराष्‍ट्र में ही लोगों का हर साल करीब 1100 करोड़ रुपये का बिजली का बिल कम हुआ है।

ये इसलिए हो पाया है क्‍योंकि हमने LED Bulb पर mission mode पर काम किया। कंपनियों को उत्‍पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्‍साहित किया।Competition को promote किया, बिचौलियों को बीच से हटा दिया। जिसके चलते चार वर्ष पहले जो बल्‍ब 250-300 रुपये का मिलता था, वही आज 50 रुपये तक में मिल रहा है।

साथियो, केन्‍द्र सरकार ‘सबका साथ-सबका विकास’ रास्‍ते पर आगे बढ़ रही है। देश का कोई कोना, कोई गांव और शहर, कोई वर्ग विकास से अछूता न रहे, इसके लिए काम किया जा रहा है। गरीब का जीवन स्‍तर ऊपर उठाया जाए, इसके लिए योजनाएं बनाई और चलाई जा रही हैं।

उज्‍ज्‍वला योजना के तहत देशभर में गरीब बहनों का जीवन धुंआ-मुक्‍त करने औरउनके समय की बचत कराने के लिए मुफ्त गैस के कनेक्‍शन दिए जा रहे हैं।

अब तक करीब 6 करोड़ कनेक्‍शन देशभर में दिए जा चुके हैं। जिसमें से ठाणे समेत पूरे महाराष्‍ट्र की 34 लाख से अधिक बहनों को मुफ्त गैस कनेक्‍शन दिया जा चुका है।

साथियो, ऐसी बहनें जो अपना छोटा-मोटा कारोबार करना चाहती हैं- जैसे सैलून हो, टेलरिंग हो, कोई बुनाई-कढ़ाई का काम हो, हथकरघे का काम हो, ऐसा कोई भी काम करना चाहती हैं, तो उनके लिए बैंकों के दरवाजे खुले हैं।

मुद्रा योजना के तहत 50 हजार रुपये से 10 लाख रुपये तक का बिना गारंटी का लोन दिया जा रहा है। महाराष्‍ट्र में करीब सवा करोड़ ऐसे ऋण दिए जा चुके हैं, जिसमें से एक करोड़ ऋण बहनों के नाम से आवंटित हुए हैं।

भाइयो और बहनों, गरीब को गरिमापूर्ण जीवन मिले, महिलाओं को मान और सम्‍मान मिले; यही हमारा ध्‍येय भी है और हासिल भी।

बच्‍चों को पढ़ाई, युवाओं को कमाई, बुजुर्गों को दवाई, किसानों को सिंचाई, जन-जन की सुनवाई; विकास की इस पंचधारा के प्रति सरकार समर्पित है।

और अंत में फिर एक बार आप सभी को विकास की नई परियोजनाओं के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। इतनी बड़ी तादाद में आ करके आपने आशीर्वाद दिए, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

यहां से मुझे पुणे जाना है। वहां भी हजारों करोड़ के प्रोजेक्‍ट का शिलान्‍यास और लोकार्पण होना है। आपने भारी संख्‍या में ये जो ताकत दिखाई है, इसके लिए मैं आपका अभिनंदन करता हूं।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।