उपस्थित सभी देवियों और सज्जनों,
समाज में कैसे-कैसे नर-रत्न पैदा हुए हैं, महापुरूष पैदा हुए हैं, जिसके कारण हम सबको उत्तम विरासत प्राप्त हुई है। अगर आज यह समारोह यहां नहीं हुआ होता तो शायद नार्थ में रहने वाले कई लोग होंगे, जिनको यह पता तक नहीं होता कि अयंकाली जी कौन थे और इस देश का दुर्भाग्य रहा है, इसने किसी कारणवश, समाज के लिए जीने-जूझने वाले लोगों को भुला दिया है। शायद हम सबका दायित्व बनता है कि हमारे सभी महान पूर्वजों और उनके जीवन से प्रेरणा ले के नई पीढ़ी को संस्कारित करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए।
पूरे केरल में ओणम का पर्व मनाया जा रहा है। मैं आज, सभी मेरे केरल के भाइयों-बहनों को ओणम की शुभकामनाएं देता हूं। आज 8 सितंबर है, इसका महात्मय मुझे बड़ा महत्वपूर्ण लगता है, क्योंकि 8 सितंबर को महात्मा अयंकाली का जन्म हुआ, लेकिन उसी केरल की धरती पर दूसरे महान समाज सुधारक नारायण गुरू जी का भी जन्म हुआ। आज केरल के जीवन में दो संगठनों, केपीएमस और एसएनडीपी, उनकी मर्जी के बिना न कोई समाज नीति चल सकती है, न कोई राजनीति चल सकती है। लेकिन, वो उसका एक अलग पहलू है। आज हम जब आज केरल के महान समाज सुधारक, महान संत अयंकाली जी की 152वीं जयंति पर मिले हैं। मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं पिछले बार केरल में केपीएमएस के निमंत्रण पर एक कार्यक्रम में गया था और शायद हम जिस विचारधारा में पले हुए लोग हैं, उसमें शायद मैं पहला था, जिसको आपके यहां आने का सौभाग्य मिला था।
उस समय “कायल सभा” की शताब्दी का समारोह प्रारंभ हो रहा था। एक प्रकार से अब वो कायल शताब्दी की पूर्णाहुति का ही कालखंड है। उसमें भी मुझे आने का सौभाग्य मिला है। आप कल्पना कर सकते हैं कि स्वामी विवेकानंद जी को केरल पर इतना गुस्सा क्यों आया था। क्या वो केरल को प्यार नहीं करते थे? क्या केरल की भूमि उनको अपनी नहीं लगती थी? लेकिन केरल की जो समाज व्यवस्था बन गयी थी और जिस प्रकार से वहां दलितों पर जुल्म होता था, दलितों के साथ अन्याय होता था, इसने स्वामी विवेकानंद जी को बेचैन कर दिया था। उन्हें लगा, ये क्या समाज है, ये क्या कर रहे हैं ये लोग। सर्वाधिक गुस्से में स्वामी विवेकानंद थे और उसी गुस्से में से उनके मन से ये उदगार निकले थे।
हमारे देश का, आजादी का ये आंदोलन देखें तो उस सारे आजादी के आंदोलन में 19वीं शताब्दी की घटनाओं का बहुत महत्व है। 19वीं शताब्दी में हमारे देश में, हिन्दुस्तान के हर कोने में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुआ। कोई न कोई सांस्कृतिक आंदोलन चला। एक प्रकार से 20वीं शताब्दी का आजादी के आंदोलन की पीठिका, 19वीं शताब्दी के समाज सुधारक आंदलोनों से हुई, सांस्कृतिक चेतना से हुई। 1200 साल की गुलामी के अंदर अपना सब कुछ भुला चुके समाज को फिर से एक बार प्राणवान बनाने का प्रयास उस समय महापुरूषों ने किया।
उसी कालखंड में केरल में अयंकाली जी की समाज सुधार और संघर्ष की गतिविधि नारायण गुरू का शिक्षा आंदोलन और उसी समय डा. पलप्पु, मन्नायु पद्मनाभन, पंडित करप्पन, स्वामी वागपट्टानंदन, ऐसे एक से एक दिग्गज केरल की धरती पर सामाजिक चेतना को जगाने में लगे थे।
लेकिन, 1913 में महात्मा गांधी हिन्दुस्तान लौटे, उससे पहले संत अयंकाली जी ने एक कायल सभा के द्वारा एक अद्भुत सत्याग्रह किया गया था। हम नार्थ के लोगों को मालूम नहीं है, लेकिन केरल के दलित समाज को जागृत करने के लिए उनके अधिकारों के लिए, उस समय शासकों ने वहां के, अन्य लोगों ने, वहां के समाज के अगुवा लोगों ने, ये करने से मना कर दिया। ये कहा कि तुम्हें जमीन की इंच की जगह नही मिलेगी, सम्मेलन करने के लिए। उस जमाने में एक दलित मां का बेटा, सारा समाज सामने हो तो क्या करता, चुप हो जाता, बैठ जाता?
अयंकाली जी चुप नहीं हुए। उन्होंने ठान ली कि मैं इस जुल्म के खिलाफ संघर्ष करूंगा। उन्होंने रास्ता खोजा। उन्होंने सब नावें इकट्ठी की, नौकाएं इकट्ठी की और समुद्र के अंदर एक नौकाओं के द्वारा एक विशाल जगह बना दी और नाव में सभा की उन्होंने। वह कायल सभा जो कही जाती है, 1913 के हर प्रतिबंध के बीच, समुंदर के अंदर। जमीन नहीं देते हो तो आप जानें, दुनिया जाने। परमात्मा ने मुझे जगह दी है समुन्दर को चीर कर के मैं वहां जायूँगा, लेकिन मैं हक़ों की लड़ाई लडूंगा, ये मिजाज अयंकाली जी ने बताया। समुन्दर में नाव इक्कठी कर कर के, नौकायें इक्कठी करके, वहीं उन्ही नौकायों में मंच बनाया, नाव में ही श्रोता आये और उन्होने सत्याग्रह किया था।
महात्मा गाँधी 1915 में हिंदुस्तान आये थे और बाद में महात्मा गाँधी ने जब अयंकाली जी की इस शक्ति को देखा तो, महात्मा गाँधी जी ने स्वयं संत अयंकाली जी को मिलने गये थे। लेकिन, हम जब इतिहास के पन्नों को देखतें हैं तो ये चीजें हमे मिलती नहीं। पता नहीं, क्या कारण है? इसे क्यों ओझल कर दिया गया है! समाज सुधार के आंदोलन के रूप में, जो बातें हमने बाबा साहेब आम्बेडकर से सुनी हैं, जो हमे पढ़ने को मिलती है, अयंकाली जी की बातो में वो सारी बाते उस समय मिलती थी, 19वीं शताब्दी में। इतना ही नहीं, आज ह्यूमन राइट्स से सम्बंधित दुनिया में जितने भी डॉक्युमेंट्स हैं, यूएन से लेकर, कहीं पे भी, अगर उन डॉक्युमेंट्स को आप अयंकाली जी ने 19वीं शताबदी में जिन बातों को कहा था, उसको अगर हम जोड़ेंगे, तो बहुत सी बाते वो मिलेंगी, जो 19वीं शताबदी में अयंकाली जी ने कही थी जिन बातों को आज विश्व में ह्यूमन राइट्स की बातों के साथ जोड़ा गया।
इतना ही नहीं, केरल में तो हम जानते हैं, दक्षिण में तो स्थिति ये थी की अगर किसी दलित को जाना है तो पीछे झाडू लगाना पड़ता था, उसके पद-चिन्ह ना रह पायें, ये पागलपन उस जमाने में था। कोई दलित बैलगाड़ी नहीं रख सकता था। बैलगाड़ी मे बैठ नहीं सकता था, वो दिन थे। तब अयंकाली जी ने सत्याग्रह किया था। उन्होने तय किया, जिस रास्ते पर प्रतिबंध है उस रास्ते पर मैं जाउंगा, बैलगाड़ी ले कर के जाउंगा और अयंकाली जी गये, बहुत बड़ा संघर्ष हुआ, मारपीट हुई, कुछ लोगों को चोटे पहुंची, लेकिन वो झुके नहीं। समाज को जगाने के लिये वो निरंतर प्रयास करते रहे।
आज जितने भी मजदूर आंदोलन चल रहे हैं, उन सभी मजदूर आंदोलनो को भी अगर कोई सच्चाई सीखनी है तो, अयंकाली जी से सीखने को मिलेगी।
उन्होंने कृषि मजदूरों को आज़ादी दिलाने का आंदोलन चलाया था। जो कृषि मजदूर थे, उनके लिये काम का समय तय हो, उनके लिये वेतन तय हो, उनके बच्चों को सरकारी स्कूल मे एडमिशन का अधिकार मिले, महिलायों के लिये मजदूरी का प्रकार अलग हो, इन सारे विषयों की लड़ाई लड़ कर के विजय प्राप्त की थी, अयंकाली जी ने। वे एक प्रकार से समाज सुधारक भी थे, लेकिन साथ-साथ समाज के हकों के लिये संघर्ष करना और उन्हें हक दिलाना, ये उस समय अयंकाली जी ने किया था और कृषि जीवन के अंदर अनेक अधिकार पाने में सुविधा मिली थी। आज केरल में जो शिक्षा की जो स्थिति है, अगर इसका गर्व हम करतें हैं, तो हमे इस बात का भी गर्व करना होगा की दो महापुरुष विशेष रूप से, जिन्होंने केरल में शिक्षा की जोत जलाई थी, एक संत अयंकाली जी और दूसरे नारायण गुरु जी। उस समय दलित, शोषित, पीड़ित, वंचित, पिछड़े, इनके लिये शिक्षा, ये उनका प्राथमिक विषय रहा था और उसके कारण केरल के समाज जीवन में इतना बड़ा बदलाव आया, इतना परिवर्तन आया।
हम हिन्दुस्तान की आज़ादी के आंदोलन की जब चर्चा करतें हैं, तो 1930 की दांडी यात्रा को एक टर्निंग प्वाइंट के रूप में देखते हैं। मैं समझाता हूं, आज़ादी के आंदोलन में 1930 की दांडी यात्रा एक महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट है, तो दलित उद्धार के आंदोलन में 1913 का कायल सम्मेलन, ये टर्निंग प्वाइंट है। बाबा साहब कहते थे- संगठित बनो, संघर्ष करो, शिक्षित बनो। संत अयंकाली जी ने भी इन्हीं तीन मंत्रों को ले कर के समाज को सशक्त बनाने का काम किया था। उस अर्थ में ऐसे महापुरूष, जिन्होंने समाज के हकों के लिए लड़ाई लड़ी, समाज के अंदर चेतना जगाई, लेकिन कभी समग्रतया समाज जीवन में दरार पैदा होने का प्रयास होने नहीं दिया। सामाजिक एकता को कभी आंच न आए, इसके लिए वह प्रयारत रहे। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। बाबा साहब अंबेदकर का जीवन देखिए, दलित उद्धार के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन दलितों के अंदर नफरत की आग जलाने का प्रयास कभी बाबा साहब अंबेदकर ने नहीं किया। यही तो दिव्य दृष्टि होती है और वही अयंकाली जी का था कि उन्होंने अन्याय के खिलाफ लड़ना तय माना लेकिन, समाज के प्रति प्रेम, उसमें कभी कटुता को जन्म न आए, इसके लिए एक जागरूक प्रयास किया और उसका परिणाम है कि समाज के ताने-बाने बचे रहते हैं।
समाज जीवन में, यह विविधताओं भरा देश है। विविधता में एकता, यह हमारे भारत की विशेषता है। ये भारत के सौंदर्य को बढ़ाने वाले, हमारी विरासत हैं। उन विविधता में एकता को बनाये रखते हुए, सामाजिक एकता के मूल मंत्र को कोई आंच न आए। लेकिन उसके साथ कोई वंचित न रह जाए। किसी से अन्याय न हो, ये व्यवस्थाओं के ऊपर बल देना, यह हर समय की मांग होती है।
कभी-कभी मुझे लगता है, लोग चर्चा करते हैं, ये 5000 साल हो गए, इस संस्कृति को, परंपरा को। ये कैसे इतना चल रहा है। दुनिया में कई संस्कृतियां नष्ट हो गईं, क्या कारण है? अगर हम देखें तो इस समाज की एक विशेषता है। हर युग में हमारे देश में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुए हैं। उन समाज सुधारकों ने अपने ही समाज की बुराइयों या कमियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।
महात्मा गांधी ने आजादी का आंदोलन लड़ा, लेकिन साथ-साथ ही हिंदू समाज में जो अस्पृष्यता थी, उसके खिलाफ भी उन्होंने जंग छेड़ा, लड़ाई लड़ी। राजाराम मोहन राय समाज जीवन के लिए अनेक काम किए, लेकिन समाज में महिलाओं के खिलाफ जो अन्याय हो रहा था, उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी। हम भाग्यशाली हैं एक प्रकार से, सदियों से हम देखें, कोई युग ऐसा नहीं गया है, कि हमारे भीतर कोई बुराइयां आई है तो हमारे भीतर ही कोई महापुरूष पैदा हुआ है। उसने हमें उन बुराइयों से मुक्ति के लिए कभी डांटा है तो कभी झकझोरा है, कभी शिक्षित किया है और हमें सुधार करने के लिए रास्ता दिखाया है और हम टिके हैं, उसका कारण यह है कि हमारे यहां एक ऑटो पायलट व्यवस्था है। हमारे भीतर से ही ऐसे महापुरूष पैदा होते हैं, जो हमारी कमियों को दूर करके, हमें सशक्त करने का निरंतर प्रयास करते हैं। हम इसलिए भाग्यवान हैं, कि जो काल बाह्य चीजें हैं, जो किसी समय उपयोगी रही होगी लेकिन, समय रहते निकम्मी रह गई होगी। अगर हमें ऐसे संत नहीं मिले होते, ऐसे समाज सुधारक नहीं मिले होते, तो वहीं चीजें हमारे लिए बोझ बन जाती। हमारे यहां ऐसे महापुरूष पैदा हुए, जिन्होंने हमें उस काल बाह्य चीजों से मुक्ति दिलाई। आधुनिक बनने की दिशा दी। नवचेतना जगाने का प्रयास किया।
एक समाज के रूप में हम स्थगितता को लेकर हम जीने वाले, पनपे हुए लोग नहीं हैं। हम नित्य नूतन प्रयास करने वाले लोग हैं और हर सदी में हुआ है। उस प्रयास करने वाले महापुरूषों में अनेक महापुरूषों का जैसे स्मरण होता है, संत अयंकाली जी का भी होता है। आजादी के आंदोलन में सारे हिन्दुस्तान की तरफ नजर करना, समाज सुधारक, भक्ति आंदोलन चेतना आंदोलन, हर कोने में महापुरूषों की भरमार थी। आजादी के लिए पहले समाज को साशक्त करने के लिए उन्होंने मेहनत की थी। उसी पीठिका का परिणाम था कि 20वीं शताब्दी में हम पूरी ताकत के साथ आजादी के लिए सफलता की ओर आगे बढे और उसकी पीठिका तैयार करने में अयंकाली जैसे अनेक महापुरूषों ने, नारायण गुरू स्वामी जैसे अनेक महापुरूषों ने प्रयास किया था जिस पर परिणाम लाभदायक रहा।
समाज में आजादी के बाद दलित, पीडि़त, शोषितों से मुक्ति के लिए हम बाबा साहब अंबेडकर के जितने आभारी हों, उतने कम हैं। भारत के संविधान में एक ऐसी व्यवस्था दी है, जिसके कारण हमें अपना हक पाने का अवसर मिला है। ये भारत के संविधान निर्माता सब मिल कर के दलितों का, पीडि़तों का, शोषितों का कल्याण हो, उसकी चिंता की है। लेकिन हमें कभी एक समाज के नाते, इतने में ही संतुष्ट हो कर के चलेगा क्या? एक समाज के अग्र वर्ग का बेटा, उसको बैंक में नौकरी मिल जाए, एक दलित मां का बेटा, उसको नौकरी मिल जाए। दोनों को समानता मिलेगी। लेकिन इससे समाज की एकता हो जाती है क्या। नहीं होती है। इसलिए सिर्फ समानता के स्टेशन पर हमारी गाड़ी अटक गई तो हमें जहां जाना है, वहां हम कभी पहुंच नहीं पाएंगे। इसलिए सिर्फ समता से काम नहीं चलता है।सब समाजों के लिये समता हो, इन से काम नहीं चलता है, समता के आगे भी एक यात्रा है, और उस यात्रा के अंतिम मंजिल है समरसता।
समता पर सब कुछ बन गए, दलित का बेटा भी डॉक्टर बन गया, ब्राह्मण का भी बेटा भी डॉक्टर बन गया, दोनों डॉक्टरी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी अगर समरसता नहीं है तो कुछ न कुछ कमी महसूस होती है । ये समरसता कब आती है, संविधान की व्यवस्था से, कानून की व्यवस्था से, हकों की लड़ाई लड़ते-लड़ते समता तो मिल सकती, लेकिन समरसता पाने के लिये समाज मे एक सतत निरन्तर, जागरूक समाज का प्रयासकरना पड़ता है । और इसलिये दो मूल बातों को ले करके चलना पड़ता है, सम-भाव+मम-भाव=समरसता। समता प्लस ममता इज इक्वल टू समरसता। समता है, लेकिन अगर ममता नहीं है तो समाज एक रस नहीं बन सकता। सम-भाव है, लेकिन मम-भाव नहीं है, ये भी मेरा है, मेरा ही भाई है, उसकी और मेरी रगों में एक ही खून है, ये भाव जब तक पैदा नहीं होता, तब तक समरसता नहीं आती है ।
इसलिये, हमे सम-भाव की यात्रा को मम-भाव से जोडना है, हमें समता की यात्रा को ममता की यात्रा के साथ जोड़ना है। समता और ममता के भाव को जोड़ कर के ही हम समरसता की यात्रा को आगे बड़ा सकते हैं । तभी जा करके समाज में किसी के प्रति कटुता पैदा नहीं होगी, किसी के साथ अन्याय नहीं होगा, किसी को अपने हकों के लिये लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी, सहज रूप से उसे प्राप्त होगा । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आने वाला युग समरसता की यात्रा का युग है ।
इसे परिपूर्ण करना, समाज का शासकों का, सुधारकों का, शिक्षकों का, संस्कृतिक नेतृत्व करने वालों का, सबका सामूहिक दायित्व है ।
भारत "बहुरत्न वसुंधरा" है । हर युग में ऐसे लोग मिले हैं जिन्होने साहित्यों को पैदा किया है, इन साहित्यों का लाभ हमें अवश्य मिलेगा।
मैं फिर एक बार परम पूज्य अयंकाली जी, उनके उन महान कामों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता हूँ, उनके चरणों में नमन करता हूँ, और केपीएमएस के द्वारा ये जो निरन्तर प्रयास चले हैं, मैं उन सब को बहुत हृदय से अभिनन्दन देता हूँ । राजनीतिक दृष्टि से कभी हमारा और उनका मेल नहीं रहा, लेकिन जो प्यार् मुझे केपीएमएस से मिला है, हमेशा मिला है और बाबू तो हमारे लिये, मैंने देखा है, हमेशा, प्यार लिये रहते हैं। ये प्यार बना रहेगा।
मुझे आज आप के बीच आने का अवसर मिला, दिल्ली के इस महत्वपूर्ण ओडिटोरियम में , कभी किसी ने सोचा होगा, 152 साल पहले पैदा हुये एक संत को, इस महत्वपूर्ण भवन में हम लोगों को श्रद्धांजलि देने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यही तो बताता है कि ये समरसता की यात्रा का युग है, और इस समरसता की यात्रा को हम सब मिल कर आगे बढायेंगे।
फिर एक बार आप सब को मेरी शुभकामनाएं। फिर एक बार ओणम की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, धन्यवाद ।
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നിങ്ങൾക്കെല്ലാവർക്കും സ്വാഗതം.
കാലവർഷം അതിന്റെ ഗുണാത്മക സ്വാധീനം കാണിക്കാൻ തുടങ്ങിയിരിക്കുന്നു. അതോടൊപ്പം പാർലമെന്റിന്റെ വർഷകാല സമ്മേളനവും ആരംഭിക്കുകയാണ്. കാലവർഷമായാലും വർഷകാല സമ്മേളനമായാലും രണ്ടും സജീവമായിരിക്കുമ്പോൾ അവ വളരെയധികം ഫലപ്രദമായി മാറുന്നു. രണ്ടും ഫലപ്രദമാകുമ്പോൾ രാജ്യത്തിന്റെയും സർവ്വചരാചരങ്ങളുടെയും ക്ഷേമത്തിന് അവ സംഭാവന നൽകുന്നു. ഈ പ്രതീക്ഷയോടെ കാലവർഷം സജീവമായി തുടരാനും അതുപോലെ തന്നെ വർഷകാല സമ്മേളനം ഫലപ്രദമായിരിക്കാനും നമുക്ക് പ്രാർത്ഥിക്കാം.

സുഹൃത്തുക്കളേ,
കഴിഞ്ഞ മാസത്തിൽ രാജ്യം നിരവധി നാഴികക്കല്ലുകൾ കൈവരിക്കുകയും അത് പൗരന്മാരിൽ അഭിമാനം നിറയ്ക്കുകയും ചെയ്തു. ഈ നേട്ടങ്ങൾ ദേശീയ, അന്തർദേശീയ, ബഹിരാകാശ മേഖലകളിൽ ഉൾപ്പെടെ വ്യാപിപിച്ചുകിടക്കുന്നു. ഇന്ത്യയെ സംബന്ധിച്ചിടത്തോളം ഇവ മഹത്വത്തിന്റെ നിമിഷങ്ങളായിരുന്നു. കഴിഞ്ഞ വർഷത്തെ വർഷകാല സമ്മേളനത്തിന് തൊട്ടുമുമ്പ് ഒരു ഇന്ത്യൻ പൗരൻ അന്താരാഷ്ട്ര ബഹിരാകാശ നിലയത്തിൽ എത്തിച്ചേർന്നു. കഴിഞ്ഞ ദിവസം ഇന്ത്യയിലെ ഒരു യുവ സ്റ്റാർട്ടപ്പ് അസാധാരണമായ ഒരു നേട്ടം കൈവരിച്ചു. സ്വകാര്യ സംരംഭങ്ങൾ ഇത്തരം ശേഷി തെളിയിച്ചിട്ടുള്ള ചുരുക്കം ചില രാജ്യങ്ങൾ മാത്രമേ ലോകത്തുള്ളൂ. നമ്മുടെ യുവ നവീന സംരംഭകർ ബഹിരാകാശത്ത് ഇന്ത്യയുടെ അഭിലാഷങ്ങളെ പുതിയ ഉയരങ്ങളിലേക്ക് എത്തിച്ചിരിക്കുന്നു. ഇത് യഥാർത്ഥത്തിൽ ശ്രദ്ധേയമായ ഒരു നേട്ടമാണ്. സ്കൈറൂട്ട് സ്റ്റാർട്ടപ്പിൽ പ്രവർത്തിക്കുന്ന ടീമിന്റെ ശരാശരി പ്രായം വെറും 28 വയസ്സ് മാത്രമാണെന്ന് ഞാനറിയുകയുണ്ടായി. ഈ യുവമനസ്സുകളാണ് ഇത് സാധ്യമാക്കിയത്. 56 വയസ്സുള്ള ഒരു യുവാവിനെക്കുറിച്ചല്ല ഞാൻ പറയുന്നത്; ശരാശരി 28 വയസ്സ് മാത്രം പ്രായമുള്ള ടീമിൻ്റെ ഒരു സ്റ്റാർട്ടപ്പിനെക്കുറിച്ചാണ്. അവർ ബഹിരാകാശ മേഖലയിൽ ഇന്ത്യയുടെ പതാക നാട്ടിയിരിക്കുന്നു. അവർ തീർച്ചയായും നമ്മുടെ ഹൃദയം നിറഞ്ഞ അഭിനന്ദനങ്ങൾ അർഹിക്കുന്നു. അതിലും പ്രധാനമായി ഇത്തരം നേട്ടങ്ങൾ നമ്മുടെ രാജ്യത്തിൽ അളവറ്റ ആത്മവിശ്വാസം വളർത്തുകയും ലോകത്തിലെ ബഹുമാനിക്കപ്പെടുന്നതും വിശ്വസനീയവുമായ പങ്കാളി എന്ന നിലയിൽ ഇന്ത്യയുടെ സ്ഥാനം കൂടുതൽ ശക്തിപ്പെടുത്തുകയും ചെയ്യുന്നു.
സുഹൃത്തുക്കളേ,
ഇതൊരു യാദൃശ്ചികതയല്ല; ഇതൊരു ശക്തമായ സന്ദേശമാണ് - ഇന്ത്യൻ യുവത്വത്തിന്റെ ശേഷിയും അഭിലാഷങ്ങളും ബഹിരാകാശം പോലെ അതിരുകളില്ലാത്തതാണെന്ന സന്ദേശം. രാജ്യത്തിന് ഇതിനേക്കാൾ വലിയൊരു പ്രചോദനം വേറെയുണ്ടാകില്ല.
സുഹൃത്തുക്കളേ,
രാജ്യം തുടക്കമിട്ട നവീകരണ മുന്നേറ്റത്തിന്റെ ഫലമാണിത്. ഇത് നമ്മുടെ ചെറുപ്പക്കാർക്ക് ഇത്തരം ധൈര്യപൂർവ്വമായ ചുവടുകൾ വെക്കാനും വിജയിക്കാനും പ്രാപ്തി നൽകുന്നു.

സുഹൃത്തുക്കളേ,
അടുത്തിടെ, രാജസ്ഥാനിൽ ഒരു വലിയ എണ്ണശുദ്ധീകരണ ശാല രാജ്യത്തിന് സമർപ്പിക്കുകയുണ്ടായി. ഏതാനും ആഴ്ചകൾക്ക് മുമ്പ്, രാജ്യത്തെ മൂന്നാമത്തെ സെമികണ്ടക്ടർ പ്ലാന്റ് ഉദ്ഘാടനം ചെയ്തു. ദിവസങ്ങൾക്ക് മുമ്പ്, വളരെ ചില രാജ്യങ്ങളിൽ മാത്രം ലഭ്യമായ സൗകര്യമായ, ഗ്രീൻ ഹൈഡ്രജൻ ഇന്ധനമാക്കിയ ട്രെയിൻ ആരംഭിച്ചു. എന്നാൽ ഇന്ത്യ പൗരന്മാർക്കായി സമർപ്പിച്ച ഹൈഡ്രജൻ ട്രെയിൻ ലോകത്തിലെ ഏറ്റവും കരുത്തുറ്റ എഞ്ചിനിൽ പ്രവർത്തിക്കുന്നതും ഏറ്റവും നീളമേറിയതുമാണ്. ഇന്ത്യയുടെ ശാസ്ത്രജ്ഞർ, എഞ്ചിനീയർമാർ, ഉപജ്ഞാതാക്കൾ, സംരംഭകർ, തൊഴിലാളികൾ എന്നിവർ രാജ്യത്തിനായുള്ള ഒരു ദൗത്യത്തോടെ പ്രവർത്തിച്ചതിന്റെ ഫലമാണിത്.

സുഹൃത്തുക്കളേ,
യുദ്ധസമാനമായ സാഹചര്യങ്ങൾ വീണ്ടും വീണ്ടും ഉയർന്നുവരുന്നത് നമുക്കറിയാം. ലോകവും ആശങ്കാകുലരാണ്. ഊർജ്ജത്തിനായി മറ്റുള്ളവരെ ആശ്രയിക്കുന്ന ഇന്ത്യയെപ്പോലുള്ള രാജ്യങ്ങൾക്ക് പശ്ചിമേഷ്യയിലെ യുദ്ധം വലിയ പ്രതിസന്ധിയാണ് സൃഷ്ടിച്ചത്. പെട്രോൾ, ഡീസൽ, എൽ.പി.ജി, രാസവളങ്ങൾ, രാസവസ്തുക്കൾ എന്നിവയിലെല്ലാം തടസ്സങ്ങൾ നേരിട്ടു. എന്നിരുന്നാലും ലോകത്ത് ഏറ്റവും വേഗത്തിൽ വളരുന്ന വലിയ സമ്പദ്വ്യവസ്ഥയായി മാറിക്കൊണ്ട് ഇന്ത്യ 7.7 ശതമാനം നിരക്കിൽ വളർച്ച തുടർന്നു. ഇത് ഇന്ത്യയുടെ കരുത്തിനെയും ആവേശത്തോടും ഊർജ്ജത്തോടും കൂടി പുതിയ ഉയരങ്ങൾ കീഴടക്കാനുള്ള അതിന്റെ നിശ്ചയദാർഢ്യത്തെയുമാണ് പ്രതിഫലിപ്പിക്കുന്നത്. വർഷകാല സമ്മേളനം ആരംഭിക്കുമ്പോൾ രാജ്യം വേഗത കൈവരിച്ചിരിക്കുന്നു. പാർലമെന്റിന്റെ മനോഭാവത്തിന് ഈ ഗതിവേഗത്തിലേക്ക് പുതിയ ഊർജ്ജം പകരാൻ സാധിക്കും. ദേശീയ ലക്ഷ്യങ്ങൾ കൈവരിക്കുന്നതിന് പോസിറ്റീവായ ഒരു മനോഭാവം അത്യാവശ്യമാണ്. പാർട്ടി ഭേദമന്യേ, നമ്മുടെ സഭയിൽ പരിചയസമ്പന്നരായ നിരവധി പാർലമെന്റ് അംഗങ്ങളുണ്ട്, അവരുടെ അറിവും ബുദ്ധിയും പാർലമെന്റിനും രാജ്യത്തിനും ആവശ്യമാണ്. അതിനാൽ, പാർലമെന്റ് പ്രവർത്തിക്കണം, അർത്ഥവത്തായ ചർച്ചകൾ നടക്കണം, രാജ്യത്തെ മുന്നോട്ട് കൊണ്ടുപോകുന്നതിനുള്ള കൂട്ടായ തീരുമാനങ്ങൾ കൈക്കൊള്ളണം. ഇതാണ് കാലഘട്ടത്തിന്റെ ആവശ്യവും യുവത്വത്തിന്റെ അഭിലാഷവും. രാജ്യസ്നേഹവും രാജ്യഭക്തിയും നിറഞ്ഞ ശബ്ദങ്ങൾക്ക് പാർലമെന്റിൽ അർഹമായ വേദി ലഭിക്കണമെന്നും ശബ്ദമുയർത്തി രാജ്യത്തെ വഴിനടത്തണമെന്നുമാണ് ഇന്നത്തെ ആവശ്യം. വസ്തുതകളും യുക്തിയും നിലനിൽക്കുന്നിടത്ത് തടസ്സങ്ങൾക്ക് സ്ഥാനമില്ലെന്ന് എനിക്ക് ഉറപ്പുണ്ട്. ശക്തമായ വാദങ്ങളും ശക്തമായ വസ്തുതകളും ശാന്തവും എന്നാൽ കരുത്തുറ്റതുമായ രീതിയിൽ ശബ്ദമുയർത്താൻ അനുവദിക്കുന്നു. പാർലമെന്റിലെ ചർച്ചകൾ വസ്തുതകളും യുക്തിയും കൊണ്ട് സമ്പന്നമാകുമെന്നും എല്ലാ ശബ്ദങ്ങൾക്കും അവസരം ലഭിക്കുമെന്നും ഓരോ ആശയത്തിനും ആദരവ് ലഭിക്കുമെന്നും ഞാൻ പ്രതീക്ഷിക്കുന്നു. പാർലമെന്റിൽ നമ്മുടെ പങ്ക് ഇതാണ്. ഈ സമ്മേളനത്തിൽ സജീവമായി പങ്കടുക്കാൻ എല്ലാ പാർലമെന്റ് അംഗങ്ങളെയും ഞാൻ ക്ഷണിക്കുന്നു. ഇന്ന് രാവിലെ ബഹുമാനപ്പെട്ട സ്പീക്കറും സമൂഹമാധ്യമത്തിലൂടെ പാർലമെന്റ് അംഗങ്ങളെ സ്വാഗതം ചെയ്യുകയുണ്ടായി. അദ്ദേഹത്തിന്റെ ശബ്ദത്തോടൊപ്പം ഞാനും ചേരുന്നു.
എല്ലാവർക്കും വളരെയധികം നന്ദി.
നമസ്കാരം.
