उपस्थित सभी देवियों और सज्जनों,
समाज में कैसे-कैसे नर-रत्न पैदा हुए हैं, महापुरूष पैदा हुए हैं, जिसके कारण हम सबको उत्तम विरासत प्राप्त हुई है। अगर आज यह समारोह यहां नहीं हुआ होता तो शायद नार्थ में रहने वाले कई लोग होंगे, जिनको यह पता तक नहीं होता कि अयंकाली जी कौन थे और इस देश का दुर्भाग्य रहा है, इसने किसी कारणवश, समाज के लिए जीने-जूझने वाले लोगों को भुला दिया है। शायद हम सबका दायित्व बनता है कि हमारे सभी महान पूर्वजों और उनके जीवन से प्रेरणा ले के नई पीढ़ी को संस्कारित करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए।
पूरे केरल में ओणम का पर्व मनाया जा रहा है। मैं आज, सभी मेरे केरल के भाइयों-बहनों को ओणम की शुभकामनाएं देता हूं। आज 8 सितंबर है, इसका महात्मय मुझे बड़ा महत्वपूर्ण लगता है, क्योंकि 8 सितंबर को महात्मा अयंकाली का जन्म हुआ, लेकिन उसी केरल की धरती पर दूसरे महान समाज सुधारक नारायण गुरू जी का भी जन्म हुआ। आज केरल के जीवन में दो संगठनों, केपीएमस और एसएनडीपी, उनकी मर्जी के बिना न कोई समाज नीति चल सकती है, न कोई राजनीति चल सकती है। लेकिन, वो उसका एक अलग पहलू है। आज हम जब आज केरल के महान समाज सुधारक, महान संत अयंकाली जी की 152वीं जयंति पर मिले हैं। मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं पिछले बार केरल में केपीएमएस के निमंत्रण पर एक कार्यक्रम में गया था और शायद हम जिस विचारधारा में पले हुए लोग हैं, उसमें शायद मैं पहला था, जिसको आपके यहां आने का सौभाग्य मिला था।
उस समय “कायल सभा” की शताब्दी का समारोह प्रारंभ हो रहा था। एक प्रकार से अब वो कायल शताब्दी की पूर्णाहुति का ही कालखंड है। उसमें भी मुझे आने का सौभाग्य मिला है। आप कल्पना कर सकते हैं कि स्वामी विवेकानंद जी को केरल पर इतना गुस्सा क्यों आया था। क्या वो केरल को प्यार नहीं करते थे? क्या केरल की भूमि उनको अपनी नहीं लगती थी? लेकिन केरल की जो समाज व्यवस्था बन गयी थी और जिस प्रकार से वहां दलितों पर जुल्म होता था, दलितों के साथ अन्याय होता था, इसने स्वामी विवेकानंद जी को बेचैन कर दिया था। उन्हें लगा, ये क्या समाज है, ये क्या कर रहे हैं ये लोग। सर्वाधिक गुस्से में स्वामी विवेकानंद थे और उसी गुस्से में से उनके मन से ये उदगार निकले थे।
हमारे देश का, आजादी का ये आंदोलन देखें तो उस सारे आजादी के आंदोलन में 19वीं शताब्दी की घटनाओं का बहुत महत्व है। 19वीं शताब्दी में हमारे देश में, हिन्दुस्तान के हर कोने में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुआ। कोई न कोई सांस्कृतिक आंदोलन चला। एक प्रकार से 20वीं शताब्दी का आजादी के आंदोलन की पीठिका, 19वीं शताब्दी के समाज सुधारक आंदलोनों से हुई, सांस्कृतिक चेतना से हुई। 1200 साल की गुलामी के अंदर अपना सब कुछ भुला चुके समाज को फिर से एक बार प्राणवान बनाने का प्रयास उस समय महापुरूषों ने किया।
उसी कालखंड में केरल में अयंकाली जी की समाज सुधार और संघर्ष की गतिविधि नारायण गुरू का शिक्षा आंदोलन और उसी समय डा. पलप्पु, मन्नायु पद्मनाभन, पंडित करप्पन, स्वामी वागपट्टानंदन, ऐसे एक से एक दिग्गज केरल की धरती पर सामाजिक चेतना को जगाने में लगे थे।
लेकिन, 1913 में महात्मा गांधी हिन्दुस्तान लौटे, उससे पहले संत अयंकाली जी ने एक कायल सभा के द्वारा एक अद्भुत सत्याग्रह किया गया था। हम नार्थ के लोगों को मालूम नहीं है, लेकिन केरल के दलित समाज को जागृत करने के लिए उनके अधिकारों के लिए, उस समय शासकों ने वहां के, अन्य लोगों ने, वहां के समाज के अगुवा लोगों ने, ये करने से मना कर दिया। ये कहा कि तुम्हें जमीन की इंच की जगह नही मिलेगी, सम्मेलन करने के लिए। उस जमाने में एक दलित मां का बेटा, सारा समाज सामने हो तो क्या करता, चुप हो जाता, बैठ जाता?
अयंकाली जी चुप नहीं हुए। उन्होंने ठान ली कि मैं इस जुल्म के खिलाफ संघर्ष करूंगा। उन्होंने रास्ता खोजा। उन्होंने सब नावें इकट्ठी की, नौकाएं इकट्ठी की और समुद्र के अंदर एक नौकाओं के द्वारा एक विशाल जगह बना दी और नाव में सभा की उन्होंने। वह कायल सभा जो कही जाती है, 1913 के हर प्रतिबंध के बीच, समुंदर के अंदर। जमीन नहीं देते हो तो आप जानें, दुनिया जाने। परमात्मा ने मुझे जगह दी है समुन्दर को चीर कर के मैं वहां जायूँगा, लेकिन मैं हक़ों की लड़ाई लडूंगा, ये मिजाज अयंकाली जी ने बताया। समुन्दर में नाव इक्कठी कर कर के, नौकायें इक्कठी करके, वहीं उन्ही नौकायों में मंच बनाया, नाव में ही श्रोता आये और उन्होने सत्याग्रह किया था।
महात्मा गाँधी 1915 में हिंदुस्तान आये थे और बाद में महात्मा गाँधी ने जब अयंकाली जी की इस शक्ति को देखा तो, महात्मा गाँधी जी ने स्वयं संत अयंकाली जी को मिलने गये थे। लेकिन, हम जब इतिहास के पन्नों को देखतें हैं तो ये चीजें हमे मिलती नहीं। पता नहीं, क्या कारण है? इसे क्यों ओझल कर दिया गया है! समाज सुधार के आंदोलन के रूप में, जो बातें हमने बाबा साहेब आम्बेडकर से सुनी हैं, जो हमे पढ़ने को मिलती है, अयंकाली जी की बातो में वो सारी बाते उस समय मिलती थी, 19वीं शताब्दी में। इतना ही नहीं, आज ह्यूमन राइट्स से सम्बंधित दुनिया में जितने भी डॉक्युमेंट्स हैं, यूएन से लेकर, कहीं पे भी, अगर उन डॉक्युमेंट्स को आप अयंकाली जी ने 19वीं शताबदी में जिन बातों को कहा था, उसको अगर हम जोड़ेंगे, तो बहुत सी बाते वो मिलेंगी, जो 19वीं शताबदी में अयंकाली जी ने कही थी जिन बातों को आज विश्व में ह्यूमन राइट्स की बातों के साथ जोड़ा गया।
इतना ही नहीं, केरल में तो हम जानते हैं, दक्षिण में तो स्थिति ये थी की अगर किसी दलित को जाना है तो पीछे झाडू लगाना पड़ता था, उसके पद-चिन्ह ना रह पायें, ये पागलपन उस जमाने में था। कोई दलित बैलगाड़ी नहीं रख सकता था। बैलगाड़ी मे बैठ नहीं सकता था, वो दिन थे। तब अयंकाली जी ने सत्याग्रह किया था। उन्होने तय किया, जिस रास्ते पर प्रतिबंध है उस रास्ते पर मैं जाउंगा, बैलगाड़ी ले कर के जाउंगा और अयंकाली जी गये, बहुत बड़ा संघर्ष हुआ, मारपीट हुई, कुछ लोगों को चोटे पहुंची, लेकिन वो झुके नहीं। समाज को जगाने के लिये वो निरंतर प्रयास करते रहे।
आज जितने भी मजदूर आंदोलन चल रहे हैं, उन सभी मजदूर आंदोलनो को भी अगर कोई सच्चाई सीखनी है तो, अयंकाली जी से सीखने को मिलेगी।
उन्होंने कृषि मजदूरों को आज़ादी दिलाने का आंदोलन चलाया था। जो कृषि मजदूर थे, उनके लिये काम का समय तय हो, उनके लिये वेतन तय हो, उनके बच्चों को सरकारी स्कूल मे एडमिशन का अधिकार मिले, महिलायों के लिये मजदूरी का प्रकार अलग हो, इन सारे विषयों की लड़ाई लड़ कर के विजय प्राप्त की थी, अयंकाली जी ने। वे एक प्रकार से समाज सुधारक भी थे, लेकिन साथ-साथ समाज के हकों के लिये संघर्ष करना और उन्हें हक दिलाना, ये उस समय अयंकाली जी ने किया था और कृषि जीवन के अंदर अनेक अधिकार पाने में सुविधा मिली थी। आज केरल में जो शिक्षा की जो स्थिति है, अगर इसका गर्व हम करतें हैं, तो हमे इस बात का भी गर्व करना होगा की दो महापुरुष विशेष रूप से, जिन्होंने केरल में शिक्षा की जोत जलाई थी, एक संत अयंकाली जी और दूसरे नारायण गुरु जी। उस समय दलित, शोषित, पीड़ित, वंचित, पिछड़े, इनके लिये शिक्षा, ये उनका प्राथमिक विषय रहा था और उसके कारण केरल के समाज जीवन में इतना बड़ा बदलाव आया, इतना परिवर्तन आया।
हम हिन्दुस्तान की आज़ादी के आंदोलन की जब चर्चा करतें हैं, तो 1930 की दांडी यात्रा को एक टर्निंग प्वाइंट के रूप में देखते हैं। मैं समझाता हूं, आज़ादी के आंदोलन में 1930 की दांडी यात्रा एक महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट है, तो दलित उद्धार के आंदोलन में 1913 का कायल सम्मेलन, ये टर्निंग प्वाइंट है। बाबा साहब कहते थे- संगठित बनो, संघर्ष करो, शिक्षित बनो। संत अयंकाली जी ने भी इन्हीं तीन मंत्रों को ले कर के समाज को सशक्त बनाने का काम किया था। उस अर्थ में ऐसे महापुरूष, जिन्होंने समाज के हकों के लिए लड़ाई लड़ी, समाज के अंदर चेतना जगाई, लेकिन कभी समग्रतया समाज जीवन में दरार पैदा होने का प्रयास होने नहीं दिया। सामाजिक एकता को कभी आंच न आए, इसके लिए वह प्रयारत रहे। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। बाबा साहब अंबेदकर का जीवन देखिए, दलित उद्धार के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन दलितों के अंदर नफरत की आग जलाने का प्रयास कभी बाबा साहब अंबेदकर ने नहीं किया। यही तो दिव्य दृष्टि होती है और वही अयंकाली जी का था कि उन्होंने अन्याय के खिलाफ लड़ना तय माना लेकिन, समाज के प्रति प्रेम, उसमें कभी कटुता को जन्म न आए, इसके लिए एक जागरूक प्रयास किया और उसका परिणाम है कि समाज के ताने-बाने बचे रहते हैं।
समाज जीवन में, यह विविधताओं भरा देश है। विविधता में एकता, यह हमारे भारत की विशेषता है। ये भारत के सौंदर्य को बढ़ाने वाले, हमारी विरासत हैं। उन विविधता में एकता को बनाये रखते हुए, सामाजिक एकता के मूल मंत्र को कोई आंच न आए। लेकिन उसके साथ कोई वंचित न रह जाए। किसी से अन्याय न हो, ये व्यवस्थाओं के ऊपर बल देना, यह हर समय की मांग होती है।
कभी-कभी मुझे लगता है, लोग चर्चा करते हैं, ये 5000 साल हो गए, इस संस्कृति को, परंपरा को। ये कैसे इतना चल रहा है। दुनिया में कई संस्कृतियां नष्ट हो गईं, क्या कारण है? अगर हम देखें तो इस समाज की एक विशेषता है। हर युग में हमारे देश में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुए हैं। उन समाज सुधारकों ने अपने ही समाज की बुराइयों या कमियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।
महात्मा गांधी ने आजादी का आंदोलन लड़ा, लेकिन साथ-साथ ही हिंदू समाज में जो अस्पृष्यता थी, उसके खिलाफ भी उन्होंने जंग छेड़ा, लड़ाई लड़ी। राजाराम मोहन राय समाज जीवन के लिए अनेक काम किए, लेकिन समाज में महिलाओं के खिलाफ जो अन्याय हो रहा था, उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी। हम भाग्यशाली हैं एक प्रकार से, सदियों से हम देखें, कोई युग ऐसा नहीं गया है, कि हमारे भीतर कोई बुराइयां आई है तो हमारे भीतर ही कोई महापुरूष पैदा हुआ है। उसने हमें उन बुराइयों से मुक्ति के लिए कभी डांटा है तो कभी झकझोरा है, कभी शिक्षित किया है और हमें सुधार करने के लिए रास्ता दिखाया है और हम टिके हैं, उसका कारण यह है कि हमारे यहां एक ऑटो पायलट व्यवस्था है। हमारे भीतर से ही ऐसे महापुरूष पैदा होते हैं, जो हमारी कमियों को दूर करके, हमें सशक्त करने का निरंतर प्रयास करते हैं। हम इसलिए भाग्यवान हैं, कि जो काल बाह्य चीजें हैं, जो किसी समय उपयोगी रही होगी लेकिन, समय रहते निकम्मी रह गई होगी। अगर हमें ऐसे संत नहीं मिले होते, ऐसे समाज सुधारक नहीं मिले होते, तो वहीं चीजें हमारे लिए बोझ बन जाती। हमारे यहां ऐसे महापुरूष पैदा हुए, जिन्होंने हमें उस काल बाह्य चीजों से मुक्ति दिलाई। आधुनिक बनने की दिशा दी। नवचेतना जगाने का प्रयास किया।
एक समाज के रूप में हम स्थगितता को लेकर हम जीने वाले, पनपे हुए लोग नहीं हैं। हम नित्य नूतन प्रयास करने वाले लोग हैं और हर सदी में हुआ है। उस प्रयास करने वाले महापुरूषों में अनेक महापुरूषों का जैसे स्मरण होता है, संत अयंकाली जी का भी होता है। आजादी के आंदोलन में सारे हिन्दुस्तान की तरफ नजर करना, समाज सुधारक, भक्ति आंदोलन चेतना आंदोलन, हर कोने में महापुरूषों की भरमार थी। आजादी के लिए पहले समाज को साशक्त करने के लिए उन्होंने मेहनत की थी। उसी पीठिका का परिणाम था कि 20वीं शताब्दी में हम पूरी ताकत के साथ आजादी के लिए सफलता की ओर आगे बढे और उसकी पीठिका तैयार करने में अयंकाली जैसे अनेक महापुरूषों ने, नारायण गुरू स्वामी जैसे अनेक महापुरूषों ने प्रयास किया था जिस पर परिणाम लाभदायक रहा।
समाज में आजादी के बाद दलित, पीडि़त, शोषितों से मुक्ति के लिए हम बाबा साहब अंबेडकर के जितने आभारी हों, उतने कम हैं। भारत के संविधान में एक ऐसी व्यवस्था दी है, जिसके कारण हमें अपना हक पाने का अवसर मिला है। ये भारत के संविधान निर्माता सब मिल कर के दलितों का, पीडि़तों का, शोषितों का कल्याण हो, उसकी चिंता की है। लेकिन हमें कभी एक समाज के नाते, इतने में ही संतुष्ट हो कर के चलेगा क्या? एक समाज के अग्र वर्ग का बेटा, उसको बैंक में नौकरी मिल जाए, एक दलित मां का बेटा, उसको नौकरी मिल जाए। दोनों को समानता मिलेगी। लेकिन इससे समाज की एकता हो जाती है क्या। नहीं होती है। इसलिए सिर्फ समानता के स्टेशन पर हमारी गाड़ी अटक गई तो हमें जहां जाना है, वहां हम कभी पहुंच नहीं पाएंगे। इसलिए सिर्फ समता से काम नहीं चलता है।सब समाजों के लिये समता हो, इन से काम नहीं चलता है, समता के आगे भी एक यात्रा है, और उस यात्रा के अंतिम मंजिल है समरसता।
समता पर सब कुछ बन गए, दलित का बेटा भी डॉक्टर बन गया, ब्राह्मण का भी बेटा भी डॉक्टर बन गया, दोनों डॉक्टरी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी अगर समरसता नहीं है तो कुछ न कुछ कमी महसूस होती है । ये समरसता कब आती है, संविधान की व्यवस्था से, कानून की व्यवस्था से, हकों की लड़ाई लड़ते-लड़ते समता तो मिल सकती, लेकिन समरसता पाने के लिये समाज मे एक सतत निरन्तर, जागरूक समाज का प्रयासकरना पड़ता है । और इसलिये दो मूल बातों को ले करके चलना पड़ता है, सम-भाव+मम-भाव=समरसता। समता प्लस ममता इज इक्वल टू समरसता। समता है, लेकिन अगर ममता नहीं है तो समाज एक रस नहीं बन सकता। सम-भाव है, लेकिन मम-भाव नहीं है, ये भी मेरा है, मेरा ही भाई है, उसकी और मेरी रगों में एक ही खून है, ये भाव जब तक पैदा नहीं होता, तब तक समरसता नहीं आती है ।
इसलिये, हमे सम-भाव की यात्रा को मम-भाव से जोडना है, हमें समता की यात्रा को ममता की यात्रा के साथ जोड़ना है। समता और ममता के भाव को जोड़ कर के ही हम समरसता की यात्रा को आगे बड़ा सकते हैं । तभी जा करके समाज में किसी के प्रति कटुता पैदा नहीं होगी, किसी के साथ अन्याय नहीं होगा, किसी को अपने हकों के लिये लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी, सहज रूप से उसे प्राप्त होगा । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आने वाला युग समरसता की यात्रा का युग है ।
इसे परिपूर्ण करना, समाज का शासकों का, सुधारकों का, शिक्षकों का, संस्कृतिक नेतृत्व करने वालों का, सबका सामूहिक दायित्व है ।
भारत "बहुरत्न वसुंधरा" है । हर युग में ऐसे लोग मिले हैं जिन्होने साहित्यों को पैदा किया है, इन साहित्यों का लाभ हमें अवश्य मिलेगा।
मैं फिर एक बार परम पूज्य अयंकाली जी, उनके उन महान कामों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता हूँ, उनके चरणों में नमन करता हूँ, और केपीएमएस के द्वारा ये जो निरन्तर प्रयास चले हैं, मैं उन सब को बहुत हृदय से अभिनन्दन देता हूँ । राजनीतिक दृष्टि से कभी हमारा और उनका मेल नहीं रहा, लेकिन जो प्यार् मुझे केपीएमएस से मिला है, हमेशा मिला है और बाबू तो हमारे लिये, मैंने देखा है, हमेशा, प्यार लिये रहते हैं। ये प्यार बना रहेगा।
मुझे आज आप के बीच आने का अवसर मिला, दिल्ली के इस महत्वपूर्ण ओडिटोरियम में , कभी किसी ने सोचा होगा, 152 साल पहले पैदा हुये एक संत को, इस महत्वपूर्ण भवन में हम लोगों को श्रद्धांजलि देने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यही तो बताता है कि ये समरसता की यात्रा का युग है, और इस समरसता की यात्रा को हम सब मिल कर आगे बढायेंगे।
फिर एक बार आप सब को मेरी शुभकामनाएं। फिर एक बार ओणम की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, धन्यवाद ।
ভাই, আপনাদের সবাইকে স্বাগত জানাই।
বর্ষা সুফল বয়ে আনছে এবং সেই সঙ্গে বাদল অধিবেশনও শুরু হচ্ছে। বর্ষা হোক কিংবা বাদল অধিবেশন—দুই-ই যদি সক্রিয় ও প্রাণবন্ত হয়, তবে তা অত্যন্ত ফলপ্রসূ হয়ে ওঠে। উভয়ের এই ইতিবাচক ভূমিকা দেশ ও জীবজগতের জন্য কল্যাণকর। তাই আমরা প্রার্থনা করি বর্ষা যাতে সক্রিয় থাকে আর বাদল অধিবেশনও ফলপ্রসূ হয়।
বন্ধুরা,
গত এক মাসে দেশ বহুক্ষেত্রে মাইলফলক অর্জন করেছে—ধারাবাহিকভাবে নানা বিষয়ে যেসব সাফল্য অর্জিত হয়েছে, সেগুলির জন্য নাগরিকরা গর্বিত। এই সব সাফল্য জাতীয় ও আন্তর্জাতিক পরিসর অতিক্রম করে এখন মহাকাশ পর্যন্ত বিস্তৃত। এক অর্থে, এগুলি ভারতের জন্য অত্যন্ত গর্বের। গত বছর বাদল অধিবেশনের ঠিক আগেই একজন ভারতীয় আন্তর্জাতিক মহাকাশ স্টেশনে পৌঁছেছিলেন আর পরশু দিনই ভারতের একটি নতুন স্টার্টআপ সংস্থা এক অসাধারণ কৃতিত্ব অর্জন করেছে। বিশ্বের খুব কম দেশেই এই ক্ষেত্রে এ ধরনের বেসরকারি উদ্যোগ দেখা গেছে; ভারতের তরুণরা মহাকাশে এক নতুন যাত্রার সূচনা করেছে—যা এক বিশাল সাফল্য। আর স্কাইরুট স্টার্টআপটি সম্পর্কে আমাকে জানানো হয়েছে, সেখানে কর্মরত তরুণদের পুরো দলটির গড় বয়স মাত্র ২৮ বছর। তরুণরাই এই অসাধ্য সাধন করেছে। আমি ৫৬ বছর বয়সী কোনো তথাকথিত 'তরুণ'-এর কথা বলছি না; আমি দেশের সেই স্টার্টআপগুলির কথা বলছি—যে গুলির নেতৃত্বে রয়েছেন গড়ে ২৮ বছর বয়সী তরুণ তরুণীরা—তারাই মহাকাশে ভারতের পতাকা নিয়ে গেছেন। এরা নিঃসন্দেহে অভিনন্দন পাওয়ার যোগ্য, আর এই অর্জন ভারতকে আত্মবিশ্বাসেও বলীয়ান করে তোলে। বিশ্বমঞ্চে ভারতের পরিচিতি ও অবস্থান এখন সর্বজনস্বীকৃত ও সমাদৃত।

বন্ধুরা,
এটি কোনো কাকতালীয় ঘটনা নয়; এটি এক অত্যন্ত শক্তিশালী বার্তা—তা হল আমাদের দেশের তরুণদের সম্ভাবনা ও উচ্চাকাঙ্ক্ষা মহাকাশের মতোই অসীম। জাতিকে এর থেকে বড় কোনো অনুপ্রেরণাদায়ক বার্তা দেওয়া সম্ভব নয়।
বন্ধুগণ,
দেশ আজ বিভিন্ন ক্ষেত্রে সংস্কার কার্যকর করছে। এরই ফলশ্রুতিতে ভারতের যুবসমাজ এ ধরণের সাহসী পদক্ষেপ নিতে পারছে এবং সফলও হচ্ছে।
বন্ধুগণ,
সম্প্রতি রাজস্থানে একটি বৃহৎ তেল শোধনাগার জাতির উদ্দেশে উৎসর্গ করা হয়েছে। কয়েক সপ্তাহ আগে, একটি সেমিকন্ডাক্টর প্ল্যান্ট দেশকে উৎসর্গ করা হয়, এটি তৃতীয় সেমিকন্ডাক্টরপ্ল্যান্ট। অতি সম্প্রতি পরিবেশবান্ধব হাইড্রোজেনচালিত একটি ট্রেন চলাচল শুরু হয়েছে; বিশ্বের খুব কম দেশেই এই প্রযুক্তি ব্যবহারের সুবিধা রয়েছে। তবে, ভারত তার নাগরিকদের জন্য হাইড্রোজেন চালিত যে ট্রেনটি উৎসর্গ করেছে, তাতে রয়েছে সবচেয়ে শক্তিশালী ইঞ্জিন এবং এ ধরনের পরিবেশবান্ধব ট্রেনগুলির মধ্যে দীর্ঘতম। এই অর্জন ভারতের বিজ্ঞানী, প্রকৌশলী, উদ্ভাবক, উদ্যোক্তা ও কর্মীদের সম্মিলিত প্রচেষ্টার ফসল। এঁরা সকলে একটি অভিন্ন লক্ষ্য নিয়ে দেশের জন্য কাজ করে চলেছেন।
বন্ধুগণ,
আমরা ভালোভাবেই জানি বিশ্বে কোথাও না কোথাও যুদ্ধের পরিস্থিতি সৃষ্টি হয়েই চলে। সমগ্র বিশ্ব এই বিষয়ে উদ্বিগ্ন। পশ্চিম এশিয়ার সংঘাত ভারতের মতো দেশগুলি ─ যারা জ্বালানির জন্য অন্যদের ওপর নির্ভরশীল, তাদের জন্য এক বড় সংকট তৈরি করেছে । পেট্রোল, ডিজেল, রান্নার গ্যাস, সার ও রাসায়নিক পদার্থের মতো বিভিন্ন ক্ষেত্রে নানা ধরণের বাধা ও সংকটের মুখোমুখি হওয়া সত্ত্বেও, ভারত ৭.৭ শতাংশ প্রবৃদ্ধির হার অর্জন করে পৃথিবীর দ্রুত বর্ধনশীল প্রধান অর্থনীতির দেশ হিসেবে আত্মপ্রকাশ করেছে। এর মাধ্যমে ভারতের সম্ভাবনা প্রতিফলিত হয় এবং উৎসাহ, উদ্দীপনা ও উদ্যমে বলীয়ান হয়ে নতুন উচ্চতায় পৌঁছানোর লক্ষ্যে দেশের উচ্চাকাঙ্ক্ষা প্রকাশ পায়। বাদল অধিবেশনের প্রাক্কালে দেশ নতুন যে গতিবেগ অর্জন করেছে, সংসদের প্রাণশক্তি সেই গতিতে নতুন প্রাণের সঞ্চার করতে পারবে। দেশের লক্ষ্য অর্জনের জন্য ইতিবাচক মনোভাব অপরিহার্য। আমাদের সংসদে অত্যন্ত অভিজ্ঞ সব সাংসদ রয়েছেন; তাঁদের দলীয় পরিচয় যা-ই হোক না কেন, তাঁদের রয়েছে বিপুল অভিজ্ঞতা। এমন এক সময়ে সংসদ ও দেশ—উভয়ের জন্যই তাঁদের সেই অভিজ্ঞতা ও জ্ঞানের প্রয়োজন। আর তাই আমি মনে করি সংসদের সুষ্ঠু কার্যক্রম, অর্থবহ আলোচনা এবং দেশকে এগিয়ে নিয়ে যাওয়ার সম্মিলিত সংকল্পই এখন সময়ের দাবি। উচ্চাকাঙ্ক্ষায় ভরপূর এ দেশের যুব সম্প্রদায় চায় আমরা যেন সামনের দিকে এগিয়ে যাই। আজ সময়ের দাবি হলো—দেশপ্রেমে উদ্বুদ্ধ ও দেশসেবায় নিবেদিতপ্রাণ ব্যক্তিরা যাতে সংসদে নিজেদের বক্তব্য তুলে ধরার এবং দেশকে সঠিক দিকনির্দেশনা দেওয়ার জন্য উপযুক্ত একটি মঞ্চ পান। আমি দৃঢ়ভাবে বিশ্বাস করি— তথ্য ও যুক্তির যেখানে প্রাধান্য থাকে, সেখানে কোনো হৈ চৈ করা বা বিশৃঙ্খলার অবকাশ থাকে না। যুক্তি ও তথ্য যদি জোরালো হয়, তবে শান্ত ও সংযত আচরণ করেও নিজের বক্তব্য অত্যন্ত কার্যকরভাবে তুলে ধরা সম্ভব। আমি আশা করি, যুক্তি ও তথ্যের মাধ্যমে এই সংসদের আলোচনা সমৃদ্ধ হয়ে উঠবে। প্রত্যেকে নিজের বক্তব্য জানানোর যেন সুযোগ পান এবং প্রতিটি মতামতের প্রতি যেন সম্মান দেখানো হয়—সংসদে সেটা নিশ্চিত করাই আমাদের দায়িত্ব। আমি সকল সংসদ সদস্যকে এই সদনের কার্যক্রমে স্বতঃস্ফূর্তভাবে অংশগ্রহণের আহ্বান জানাই। আজ সকালে অধ্যক্ষও সামাজিক মাধ্যমে দেশের সাংসদদের স্বাগত জানিয়ে তাঁর বক্তব্য জানিয়েছেন; আমিও তাঁর সেই বক্তব্যে সহমত পোষণ করছি। আপনাদের সবাইকে অনেক অনেক ধন্যবাদ।

বন্ধুরা,
গত এক মাসে দেশ বহুক্ষেত্রে মাইলফলক অর্জন করেছে—ধারাবাহিকভাবে নানা বিষয়ে যেসব সাফল্য অর্জিত হয়েছে, সেগুলির জন্য নাগরিকরা গর্বিত। এই সব সাফল্য জাতীয় ও আন্তর্জাতিক পরিসর অতিক্রম করে এখন মহাকাশ পর্যন্ত বিস্তৃত। এক অর্থে, এগুলি ভারতের জন্য অত্যন্ত গর্বের। গত বছর বাদল অধিবেশনের ঠিক আগেই একজন ভারতীয় আন্তর্জাতিক মহাকাশ স্টেশনে পৌঁছেছিলেন আর পরশু দিনই ভারতের একটি নতুন স্টার্টআপ সংস্থা এক অসাধারণ কৃতিত্ব অর্জন করেছে। বিশ্বের খুব কম দেশেই এই ক্ষেত্রে এ ধরনের বেসরকারি উদ্যোগ দেখা গেছে; ভারতের তরুণরা মহাকাশে এক নতুন যাত্রার সূচনা করেছে—যা এক বিশাল সাফল্য। আর স্কাইরুট স্টার্টআপটি সম্পর্কে আমাকে জানানো হয়েছে, সেখানে কর্মরত তরুণদের পুরো দলটির গড় বয়স মাত্র ২৮ বছর। তরুণরাই এই অসাধ্য সাধন করেছে। আমি ৫৬ বছর বয়সী কোনো তথাকথিত 'তরুণ'-এর কথা বলছি না; আমি দেশের সেই স্টার্টআপগুলির কথা বলছি—যে গুলির নেতৃত্বে রয়েছেন গড়ে ২৮ বছর বয়সী তরুণ তরুণীরা—তারাই মহাকাশে ভারতের পতাকা নিয়ে গেছেন। এরা নিঃসন্দেহে অভিনন্দন পাওয়ার যোগ্য, আর এই অর্জন ভারতকে আত্মবিশ্বাসেও বলীয়ান করে তোলে। বিশ্বমঞ্চে ভারতের পরিচিতি ও অবস্থান এখন সর্বজনস্বীকৃত ও সমাদৃত।

বন্ধুরা,
এটি কোনো কাকতালীয় ঘটনা নয়; এটি এক অত্যন্ত শক্তিশালী বার্তা—তা হল আমাদের দেশের তরুণদের সম্ভাবনা ও উচ্চাকাঙ্ক্ষা মহাকাশের মতোই অসীম। জাতিকে এর থেকে বড় কোনো অনুপ্রেরণাদায়ক বার্তা দেওয়া সম্ভব নয়।
বন্ধুগণ,
দেশ আজ বিভিন্ন ক্ষেত্রে সংস্কার কার্যকর করছে। এরই ফলশ্রুতিতে ভারতের যুবসমাজ এ ধরণের সাহসী পদক্ষেপ নিতে পারছে এবং সফলও হচ্ছে।
বন্ধুগণ,
সম্প্রতি রাজস্থানে একটি বৃহৎ তেল শোধনাগার জাতির উদ্দেশে উৎসর্গ করা হয়েছে। কয়েক সপ্তাহ আগে, একটি সেমিকন্ডাক্টর প্ল্যান্ট দেশকে উৎসর্গ করা হয়, এটি তৃতীয় সেমিকন্ডাক্টরপ্ল্যান্ট। অতি সম্প্রতি পরিবেশবান্ধব হাইড্রোজেনচালিত একটি ট্রেন চলাচল শুরু হয়েছে; বিশ্বের খুব কম দেশেই এই প্রযুক্তি ব্যবহারের সুবিধা রয়েছে। তবে, ভারত তার নাগরিকদের জন্য হাইড্রোজেন চালিত যে ট্রেনটি উৎসর্গ করেছে, তাতে রয়েছে সবচেয়ে শক্তিশালী ইঞ্জিন এবং এ ধরনের পরিবেশবান্ধব ট্রেনগুলির মধ্যে দীর্ঘতম। এই অর্জন ভারতের বিজ্ঞানী, প্রকৌশলী, উদ্ভাবক, উদ্যোক্তা ও কর্মীদের সম্মিলিত প্রচেষ্টার ফসল। এঁরা সকলে একটি অভিন্ন লক্ষ্য নিয়ে দেশের জন্য কাজ করে চলেছেন।
বন্ধুগণ,
আমরা ভালোভাবেই জানি বিশ্বে কোথাও না কোথাও যুদ্ধের পরিস্থিতি সৃষ্টি হয়েই চলে। সমগ্র বিশ্ব এই বিষয়ে উদ্বিগ্ন। পশ্চিম এশিয়ার সংঘাত ভারতের মতো দেশগুলি ─ যারা জ্বালানির জন্য অন্যদের ওপর নির্ভরশীল, তাদের জন্য এক বড় সংকট তৈরি করেছে । পেট্রোল, ডিজেল, রান্নার গ্যাস, সার ও রাসায়নিক পদার্থের মতো বিভিন্ন ক্ষেত্রে নানা ধরণের বাধা ও সংকটের মুখোমুখি হওয়া সত্ত্বেও, ভারত ৭.৭ শতাংশ প্রবৃদ্ধির হার অর্জন করে পৃথিবীর দ্রুত বর্ধনশীল প্রধান অর্থনীতির দেশ হিসেবে আত্মপ্রকাশ করেছে। এর মাধ্যমে ভারতের সম্ভাবনা প্রতিফলিত হয় এবং উৎসাহ, উদ্দীপনা ও উদ্যমে বলীয়ান হয়ে নতুন উচ্চতায় পৌঁছানোর লক্ষ্যে দেশের উচ্চাকাঙ্ক্ষা প্রকাশ পায়। বাদল অধিবেশনের প্রাক্কালে দেশ নতুন যে গতিবেগ অর্জন করেছে, সংসদের প্রাণশক্তি সেই গতিতে নতুন প্রাণের সঞ্চার করতে পারবে। দেশের লক্ষ্য অর্জনের জন্য ইতিবাচক মনোভাব অপরিহার্য। আমাদের সংসদে অত্যন্ত অভিজ্ঞ সব সাংসদ রয়েছেন; তাঁদের দলীয় পরিচয় যা-ই হোক না কেন, তাঁদের রয়েছে বিপুল অভিজ্ঞতা। এমন এক সময়ে সংসদ ও দেশ—উভয়ের জন্যই তাঁদের সেই অভিজ্ঞতা ও জ্ঞানের প্রয়োজন। আর তাই আমি মনে করি সংসদের সুষ্ঠু কার্যক্রম, অর্থবহ আলোচনা এবং দেশকে এগিয়ে নিয়ে যাওয়ার সম্মিলিত সংকল্পই এখন সময়ের দাবি। উচ্চাকাঙ্ক্ষায় ভরপূর এ দেশের যুব সম্প্রদায় চায় আমরা যেন সামনের দিকে এগিয়ে যাই। আজ সময়ের দাবি হলো—দেশপ্রেমে উদ্বুদ্ধ ও দেশসেবায় নিবেদিতপ্রাণ ব্যক্তিরা যাতে সংসদে নিজেদের বক্তব্য তুলে ধরার এবং দেশকে সঠিক দিকনির্দেশনা দেওয়ার জন্য উপযুক্ত একটি মঞ্চ পান। আমি দৃঢ়ভাবে বিশ্বাস করি— তথ্য ও যুক্তির যেখানে প্রাধান্য থাকে, সেখানে কোনো হৈ চৈ করা বা বিশৃঙ্খলার অবকাশ থাকে না। যুক্তি ও তথ্য যদি জোরালো হয়, তবে শান্ত ও সংযত আচরণ করেও নিজের বক্তব্য অত্যন্ত কার্যকরভাবে তুলে ধরা সম্ভব। আমি আশা করি, যুক্তি ও তথ্যের মাধ্যমে এই সংসদের আলোচনা সমৃদ্ধ হয়ে উঠবে। প্রত্যেকে নিজের বক্তব্য জানানোর যেন সুযোগ পান এবং প্রতিটি মতামতের প্রতি যেন সম্মান দেখানো হয়—সংসদে সেটা নিশ্চিত করাই আমাদের দায়িত্ব। আমি সকল সংসদ সদস্যকে এই সদনের কার্যক্রমে স্বতঃস্ফূর্তভাবে অংশগ্রহণের আহ্বান জানাই। আজ সকালে অধ্যক্ষও সামাজিক মাধ্যমে দেশের সাংসদদের স্বাগত জানিয়ে তাঁর বক্তব্য জানিয়েছেন; আমিও তাঁর সেই বক্তব্যে সহমত পোষণ করছি। আপনাদের সবাইকে অনেক অনেক ধন্যবাদ।


