उपस्थित सभी देवियों और सज्जनों,
समाज में कैसे-कैसे नर-रत्न पैदा हुए हैं, महापुरूष पैदा हुए हैं, जिसके कारण हम सबको उत्तम विरासत प्राप्त हुई है। अगर आज यह समारोह यहां नहीं हुआ होता तो शायद नार्थ में रहने वाले कई लोग होंगे, जिनको यह पता तक नहीं होता कि अयंकाली जी कौन थे और इस देश का दुर्भाग्य रहा है, इसने किसी कारणवश, समाज के लिए जीने-जूझने वाले लोगों को भुला दिया है। शायद हम सबका दायित्व बनता है कि हमारे सभी महान पूर्वजों और उनके जीवन से प्रेरणा ले के नई पीढ़ी को संस्कारित करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए।
पूरे केरल में ओणम का पर्व मनाया जा रहा है। मैं आज, सभी मेरे केरल के भाइयों-बहनों को ओणम की शुभकामनाएं देता हूं। आज 8 सितंबर है, इसका महात्मय मुझे बड़ा महत्वपूर्ण लगता है, क्योंकि 8 सितंबर को महात्मा अयंकाली का जन्म हुआ, लेकिन उसी केरल की धरती पर दूसरे महान समाज सुधारक नारायण गुरू जी का भी जन्म हुआ। आज केरल के जीवन में दो संगठनों, केपीएमस और एसएनडीपी, उनकी मर्जी के बिना न कोई समाज नीति चल सकती है, न कोई राजनीति चल सकती है। लेकिन, वो उसका एक अलग पहलू है। आज हम जब आज केरल के महान समाज सुधारक, महान संत अयंकाली जी की 152वीं जयंति पर मिले हैं। मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं पिछले बार केरल में केपीएमएस के निमंत्रण पर एक कार्यक्रम में गया था और शायद हम जिस विचारधारा में पले हुए लोग हैं, उसमें शायद मैं पहला था, जिसको आपके यहां आने का सौभाग्य मिला था।
उस समय “कायल सभा” की शताब्दी का समारोह प्रारंभ हो रहा था। एक प्रकार से अब वो कायल शताब्दी की पूर्णाहुति का ही कालखंड है। उसमें भी मुझे आने का सौभाग्य मिला है। आप कल्पना कर सकते हैं कि स्वामी विवेकानंद जी को केरल पर इतना गुस्सा क्यों आया था। क्या वो केरल को प्यार नहीं करते थे? क्या केरल की भूमि उनको अपनी नहीं लगती थी? लेकिन केरल की जो समाज व्यवस्था बन गयी थी और जिस प्रकार से वहां दलितों पर जुल्म होता था, दलितों के साथ अन्याय होता था, इसने स्वामी विवेकानंद जी को बेचैन कर दिया था। उन्हें लगा, ये क्या समाज है, ये क्या कर रहे हैं ये लोग। सर्वाधिक गुस्से में स्वामी विवेकानंद थे और उसी गुस्से में से उनके मन से ये उदगार निकले थे।
हमारे देश का, आजादी का ये आंदोलन देखें तो उस सारे आजादी के आंदोलन में 19वीं शताब्दी की घटनाओं का बहुत महत्व है। 19वीं शताब्दी में हमारे देश में, हिन्दुस्तान के हर कोने में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुआ। कोई न कोई सांस्कृतिक आंदोलन चला। एक प्रकार से 20वीं शताब्दी का आजादी के आंदोलन की पीठिका, 19वीं शताब्दी के समाज सुधारक आंदलोनों से हुई, सांस्कृतिक चेतना से हुई। 1200 साल की गुलामी के अंदर अपना सब कुछ भुला चुके समाज को फिर से एक बार प्राणवान बनाने का प्रयास उस समय महापुरूषों ने किया।
उसी कालखंड में केरल में अयंकाली जी की समाज सुधार और संघर्ष की गतिविधि नारायण गुरू का शिक्षा आंदोलन और उसी समय डा. पलप्पु, मन्नायु पद्मनाभन, पंडित करप्पन, स्वामी वागपट्टानंदन, ऐसे एक से एक दिग्गज केरल की धरती पर सामाजिक चेतना को जगाने में लगे थे।
लेकिन, 1913 में महात्मा गांधी हिन्दुस्तान लौटे, उससे पहले संत अयंकाली जी ने एक कायल सभा के द्वारा एक अद्भुत सत्याग्रह किया गया था। हम नार्थ के लोगों को मालूम नहीं है, लेकिन केरल के दलित समाज को जागृत करने के लिए उनके अधिकारों के लिए, उस समय शासकों ने वहां के, अन्य लोगों ने, वहां के समाज के अगुवा लोगों ने, ये करने से मना कर दिया। ये कहा कि तुम्हें जमीन की इंच की जगह नही मिलेगी, सम्मेलन करने के लिए। उस जमाने में एक दलित मां का बेटा, सारा समाज सामने हो तो क्या करता, चुप हो जाता, बैठ जाता?
अयंकाली जी चुप नहीं हुए। उन्होंने ठान ली कि मैं इस जुल्म के खिलाफ संघर्ष करूंगा। उन्होंने रास्ता खोजा। उन्होंने सब नावें इकट्ठी की, नौकाएं इकट्ठी की और समुद्र के अंदर एक नौकाओं के द्वारा एक विशाल जगह बना दी और नाव में सभा की उन्होंने। वह कायल सभा जो कही जाती है, 1913 के हर प्रतिबंध के बीच, समुंदर के अंदर। जमीन नहीं देते हो तो आप जानें, दुनिया जाने। परमात्मा ने मुझे जगह दी है समुन्दर को चीर कर के मैं वहां जायूँगा, लेकिन मैं हक़ों की लड़ाई लडूंगा, ये मिजाज अयंकाली जी ने बताया। समुन्दर में नाव इक्कठी कर कर के, नौकायें इक्कठी करके, वहीं उन्ही नौकायों में मंच बनाया, नाव में ही श्रोता आये और उन्होने सत्याग्रह किया था।
महात्मा गाँधी 1915 में हिंदुस्तान आये थे और बाद में महात्मा गाँधी ने जब अयंकाली जी की इस शक्ति को देखा तो, महात्मा गाँधी जी ने स्वयं संत अयंकाली जी को मिलने गये थे। लेकिन, हम जब इतिहास के पन्नों को देखतें हैं तो ये चीजें हमे मिलती नहीं। पता नहीं, क्या कारण है? इसे क्यों ओझल कर दिया गया है! समाज सुधार के आंदोलन के रूप में, जो बातें हमने बाबा साहेब आम्बेडकर से सुनी हैं, जो हमे पढ़ने को मिलती है, अयंकाली जी की बातो में वो सारी बाते उस समय मिलती थी, 19वीं शताब्दी में। इतना ही नहीं, आज ह्यूमन राइट्स से सम्बंधित दुनिया में जितने भी डॉक्युमेंट्स हैं, यूएन से लेकर, कहीं पे भी, अगर उन डॉक्युमेंट्स को आप अयंकाली जी ने 19वीं शताबदी में जिन बातों को कहा था, उसको अगर हम जोड़ेंगे, तो बहुत सी बाते वो मिलेंगी, जो 19वीं शताबदी में अयंकाली जी ने कही थी जिन बातों को आज विश्व में ह्यूमन राइट्स की बातों के साथ जोड़ा गया।
इतना ही नहीं, केरल में तो हम जानते हैं, दक्षिण में तो स्थिति ये थी की अगर किसी दलित को जाना है तो पीछे झाडू लगाना पड़ता था, उसके पद-चिन्ह ना रह पायें, ये पागलपन उस जमाने में था। कोई दलित बैलगाड़ी नहीं रख सकता था। बैलगाड़ी मे बैठ नहीं सकता था, वो दिन थे। तब अयंकाली जी ने सत्याग्रह किया था। उन्होने तय किया, जिस रास्ते पर प्रतिबंध है उस रास्ते पर मैं जाउंगा, बैलगाड़ी ले कर के जाउंगा और अयंकाली जी गये, बहुत बड़ा संघर्ष हुआ, मारपीट हुई, कुछ लोगों को चोटे पहुंची, लेकिन वो झुके नहीं। समाज को जगाने के लिये वो निरंतर प्रयास करते रहे।
आज जितने भी मजदूर आंदोलन चल रहे हैं, उन सभी मजदूर आंदोलनो को भी अगर कोई सच्चाई सीखनी है तो, अयंकाली जी से सीखने को मिलेगी।
उन्होंने कृषि मजदूरों को आज़ादी दिलाने का आंदोलन चलाया था। जो कृषि मजदूर थे, उनके लिये काम का समय तय हो, उनके लिये वेतन तय हो, उनके बच्चों को सरकारी स्कूल मे एडमिशन का अधिकार मिले, महिलायों के लिये मजदूरी का प्रकार अलग हो, इन सारे विषयों की लड़ाई लड़ कर के विजय प्राप्त की थी, अयंकाली जी ने। वे एक प्रकार से समाज सुधारक भी थे, लेकिन साथ-साथ समाज के हकों के लिये संघर्ष करना और उन्हें हक दिलाना, ये उस समय अयंकाली जी ने किया था और कृषि जीवन के अंदर अनेक अधिकार पाने में सुविधा मिली थी। आज केरल में जो शिक्षा की जो स्थिति है, अगर इसका गर्व हम करतें हैं, तो हमे इस बात का भी गर्व करना होगा की दो महापुरुष विशेष रूप से, जिन्होंने केरल में शिक्षा की जोत जलाई थी, एक संत अयंकाली जी और दूसरे नारायण गुरु जी। उस समय दलित, शोषित, पीड़ित, वंचित, पिछड़े, इनके लिये शिक्षा, ये उनका प्राथमिक विषय रहा था और उसके कारण केरल के समाज जीवन में इतना बड़ा बदलाव आया, इतना परिवर्तन आया।
हम हिन्दुस्तान की आज़ादी के आंदोलन की जब चर्चा करतें हैं, तो 1930 की दांडी यात्रा को एक टर्निंग प्वाइंट के रूप में देखते हैं। मैं समझाता हूं, आज़ादी के आंदोलन में 1930 की दांडी यात्रा एक महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट है, तो दलित उद्धार के आंदोलन में 1913 का कायल सम्मेलन, ये टर्निंग प्वाइंट है। बाबा साहब कहते थे- संगठित बनो, संघर्ष करो, शिक्षित बनो। संत अयंकाली जी ने भी इन्हीं तीन मंत्रों को ले कर के समाज को सशक्त बनाने का काम किया था। उस अर्थ में ऐसे महापुरूष, जिन्होंने समाज के हकों के लिए लड़ाई लड़ी, समाज के अंदर चेतना जगाई, लेकिन कभी समग्रतया समाज जीवन में दरार पैदा होने का प्रयास होने नहीं दिया। सामाजिक एकता को कभी आंच न आए, इसके लिए वह प्रयारत रहे। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। बाबा साहब अंबेदकर का जीवन देखिए, दलित उद्धार के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन दलितों के अंदर नफरत की आग जलाने का प्रयास कभी बाबा साहब अंबेदकर ने नहीं किया। यही तो दिव्य दृष्टि होती है और वही अयंकाली जी का था कि उन्होंने अन्याय के खिलाफ लड़ना तय माना लेकिन, समाज के प्रति प्रेम, उसमें कभी कटुता को जन्म न आए, इसके लिए एक जागरूक प्रयास किया और उसका परिणाम है कि समाज के ताने-बाने बचे रहते हैं।
समाज जीवन में, यह विविधताओं भरा देश है। विविधता में एकता, यह हमारे भारत की विशेषता है। ये भारत के सौंदर्य को बढ़ाने वाले, हमारी विरासत हैं। उन विविधता में एकता को बनाये रखते हुए, सामाजिक एकता के मूल मंत्र को कोई आंच न आए। लेकिन उसके साथ कोई वंचित न रह जाए। किसी से अन्याय न हो, ये व्यवस्थाओं के ऊपर बल देना, यह हर समय की मांग होती है।
कभी-कभी मुझे लगता है, लोग चर्चा करते हैं, ये 5000 साल हो गए, इस संस्कृति को, परंपरा को। ये कैसे इतना चल रहा है। दुनिया में कई संस्कृतियां नष्ट हो गईं, क्या कारण है? अगर हम देखें तो इस समाज की एक विशेषता है। हर युग में हमारे देश में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुए हैं। उन समाज सुधारकों ने अपने ही समाज की बुराइयों या कमियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।
महात्मा गांधी ने आजादी का आंदोलन लड़ा, लेकिन साथ-साथ ही हिंदू समाज में जो अस्पृष्यता थी, उसके खिलाफ भी उन्होंने जंग छेड़ा, लड़ाई लड़ी। राजाराम मोहन राय समाज जीवन के लिए अनेक काम किए, लेकिन समाज में महिलाओं के खिलाफ जो अन्याय हो रहा था, उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी। हम भाग्यशाली हैं एक प्रकार से, सदियों से हम देखें, कोई युग ऐसा नहीं गया है, कि हमारे भीतर कोई बुराइयां आई है तो हमारे भीतर ही कोई महापुरूष पैदा हुआ है। उसने हमें उन बुराइयों से मुक्ति के लिए कभी डांटा है तो कभी झकझोरा है, कभी शिक्षित किया है और हमें सुधार करने के लिए रास्ता दिखाया है और हम टिके हैं, उसका कारण यह है कि हमारे यहां एक ऑटो पायलट व्यवस्था है। हमारे भीतर से ही ऐसे महापुरूष पैदा होते हैं, जो हमारी कमियों को दूर करके, हमें सशक्त करने का निरंतर प्रयास करते हैं। हम इसलिए भाग्यवान हैं, कि जो काल बाह्य चीजें हैं, जो किसी समय उपयोगी रही होगी लेकिन, समय रहते निकम्मी रह गई होगी। अगर हमें ऐसे संत नहीं मिले होते, ऐसे समाज सुधारक नहीं मिले होते, तो वहीं चीजें हमारे लिए बोझ बन जाती। हमारे यहां ऐसे महापुरूष पैदा हुए, जिन्होंने हमें उस काल बाह्य चीजों से मुक्ति दिलाई। आधुनिक बनने की दिशा दी। नवचेतना जगाने का प्रयास किया।
एक समाज के रूप में हम स्थगितता को लेकर हम जीने वाले, पनपे हुए लोग नहीं हैं। हम नित्य नूतन प्रयास करने वाले लोग हैं और हर सदी में हुआ है। उस प्रयास करने वाले महापुरूषों में अनेक महापुरूषों का जैसे स्मरण होता है, संत अयंकाली जी का भी होता है। आजादी के आंदोलन में सारे हिन्दुस्तान की तरफ नजर करना, समाज सुधारक, भक्ति आंदोलन चेतना आंदोलन, हर कोने में महापुरूषों की भरमार थी। आजादी के लिए पहले समाज को साशक्त करने के लिए उन्होंने मेहनत की थी। उसी पीठिका का परिणाम था कि 20वीं शताब्दी में हम पूरी ताकत के साथ आजादी के लिए सफलता की ओर आगे बढे और उसकी पीठिका तैयार करने में अयंकाली जैसे अनेक महापुरूषों ने, नारायण गुरू स्वामी जैसे अनेक महापुरूषों ने प्रयास किया था जिस पर परिणाम लाभदायक रहा।
समाज में आजादी के बाद दलित, पीडि़त, शोषितों से मुक्ति के लिए हम बाबा साहब अंबेडकर के जितने आभारी हों, उतने कम हैं। भारत के संविधान में एक ऐसी व्यवस्था दी है, जिसके कारण हमें अपना हक पाने का अवसर मिला है। ये भारत के संविधान निर्माता सब मिल कर के दलितों का, पीडि़तों का, शोषितों का कल्याण हो, उसकी चिंता की है। लेकिन हमें कभी एक समाज के नाते, इतने में ही संतुष्ट हो कर के चलेगा क्या? एक समाज के अग्र वर्ग का बेटा, उसको बैंक में नौकरी मिल जाए, एक दलित मां का बेटा, उसको नौकरी मिल जाए। दोनों को समानता मिलेगी। लेकिन इससे समाज की एकता हो जाती है क्या। नहीं होती है। इसलिए सिर्फ समानता के स्टेशन पर हमारी गाड़ी अटक गई तो हमें जहां जाना है, वहां हम कभी पहुंच नहीं पाएंगे। इसलिए सिर्फ समता से काम नहीं चलता है।सब समाजों के लिये समता हो, इन से काम नहीं चलता है, समता के आगे भी एक यात्रा है, और उस यात्रा के अंतिम मंजिल है समरसता।
समता पर सब कुछ बन गए, दलित का बेटा भी डॉक्टर बन गया, ब्राह्मण का भी बेटा भी डॉक्टर बन गया, दोनों डॉक्टरी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी अगर समरसता नहीं है तो कुछ न कुछ कमी महसूस होती है । ये समरसता कब आती है, संविधान की व्यवस्था से, कानून की व्यवस्था से, हकों की लड़ाई लड़ते-लड़ते समता तो मिल सकती, लेकिन समरसता पाने के लिये समाज मे एक सतत निरन्तर, जागरूक समाज का प्रयासकरना पड़ता है । और इसलिये दो मूल बातों को ले करके चलना पड़ता है, सम-भाव+मम-भाव=समरसता। समता प्लस ममता इज इक्वल टू समरसता। समता है, लेकिन अगर ममता नहीं है तो समाज एक रस नहीं बन सकता। सम-भाव है, लेकिन मम-भाव नहीं है, ये भी मेरा है, मेरा ही भाई है, उसकी और मेरी रगों में एक ही खून है, ये भाव जब तक पैदा नहीं होता, तब तक समरसता नहीं आती है ।
इसलिये, हमे सम-भाव की यात्रा को मम-भाव से जोडना है, हमें समता की यात्रा को ममता की यात्रा के साथ जोड़ना है। समता और ममता के भाव को जोड़ कर के ही हम समरसता की यात्रा को आगे बड़ा सकते हैं । तभी जा करके समाज में किसी के प्रति कटुता पैदा नहीं होगी, किसी के साथ अन्याय नहीं होगा, किसी को अपने हकों के लिये लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी, सहज रूप से उसे प्राप्त होगा । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आने वाला युग समरसता की यात्रा का युग है ।
इसे परिपूर्ण करना, समाज का शासकों का, सुधारकों का, शिक्षकों का, संस्कृतिक नेतृत्व करने वालों का, सबका सामूहिक दायित्व है ।
भारत "बहुरत्न वसुंधरा" है । हर युग में ऐसे लोग मिले हैं जिन्होने साहित्यों को पैदा किया है, इन साहित्यों का लाभ हमें अवश्य मिलेगा।
मैं फिर एक बार परम पूज्य अयंकाली जी, उनके उन महान कामों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता हूँ, उनके चरणों में नमन करता हूँ, और केपीएमएस के द्वारा ये जो निरन्तर प्रयास चले हैं, मैं उन सब को बहुत हृदय से अभिनन्दन देता हूँ । राजनीतिक दृष्टि से कभी हमारा और उनका मेल नहीं रहा, लेकिन जो प्यार् मुझे केपीएमएस से मिला है, हमेशा मिला है और बाबू तो हमारे लिये, मैंने देखा है, हमेशा, प्यार लिये रहते हैं। ये प्यार बना रहेगा।
मुझे आज आप के बीच आने का अवसर मिला, दिल्ली के इस महत्वपूर्ण ओडिटोरियम में , कभी किसी ने सोचा होगा, 152 साल पहले पैदा हुये एक संत को, इस महत्वपूर्ण भवन में हम लोगों को श्रद्धांजलि देने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यही तो बताता है कि ये समरसता की यात्रा का युग है, और इस समरसता की यात्रा को हम सब मिल कर आगे बढायेंगे।
फिर एक बार आप सब को मेरी शुभकामनाएं। फिर एक बार ओणम की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, धन्यवाद ।
ভারত মাতা কি জয়!
ভারত মাতা কি জয়!
দাদরা ও নগর হাভেলি, দমন ও দিউ-এর প্রশাসক প্রফুল ভাই প্যাটেল, সংসদে আমার সহকর্মী কালাবেন দেলকর, দমন পৌর পরিষদের সভাপতি দীপিকা তান্ডেল জি, দমন জেলা পঞ্চায়েতের চেয়ারম্যান ধর্ম বাবু প্যাটেল, সিলভাসা পৌর পরিষদের চেয়ারম্যান সোমনাথ দেবরে জি, দাদরা নগর হাভেলি জেলা পঞ্চায়েতের চেয়ারপার্সন নিশা ভাবসার জি, দিউ পৌর পরিষদের চেয়ারম্যান হরিশ কাপাদিয়া জি, দিউ জেলা পঞ্চায়েতের চেয়ারপার্সন কোটিয়া রঞ্জিতাবেন, এবং এখানে এত বিপুল সংখ্যায় সমবেত আমার প্রিয় ভাই ও বোনেরা,
আপনারা যেমন এখানে সমবেত হয়েছেন, তেমনি লাক্ষাদ্বীপেরও বহু মানুষ ভিডিওর মাধ্যমে আমাদের সঙ্গে যুক্ত আছেন। আজ লাক্ষাদ্বীপে উন্নয়নের এক নতুন সূচনা হয়েছে। লাক্ষাদ্বীপের মানুষের জীবনে বৈপ্লবিক পরিবর্তন আনবে এমন একটি নতুন প্রকল্পেরও উদ্বোধন করা হয়েছে এবং কয়েকটি প্রকল্পের ভিত্তিপ্রস্তর স্থাপন করা হয়েছে।
বন্ধুগণ,
কয়েক বছর আগে, যখন আমি আপনাদের মধ্যে এসেছিলাম, তখন বলেছিলাম যে আমাদের দমন দ্রুত মিনি ইন্ডিয়া হয়ে উঠছে, আর আজ আমি দেখছি, বা-দিকে সমগ্র বাংলা এবং ডান দিকে সমগ্র আসাম। দমন মিনি ইন্ডিয়ার এক জীবন্ত উদাহরণ হয়ে উঠেছে। এখানকার বৈচিত্র্য, বিভিন্ন অঞ্চলের মানুষের বসবাস, আপনাদের মধ্যে সমগ্র ভারতের এক সুন্দর ঝলক তুলে ধরে। আপনারা সকলে এত বিপুল সংখ্যায় আমাদের আশীর্বাদ করতে এসেছেন, এর জন্য আমি আপনাদের সকলকে অনেক ধন্যবাদ জানাই।
ভাই ও বোনেরা,
আমার দমন ও দিউতে বহুবার আসার সুযোগ হয়েছে। আমি দাদরা ও নগর হাভেলিতেও নিয়মিত যাই। আমি যখন মুখ্যমন্ত্রী বা প্রধানমন্ত্রী ছিলাম না, তখনও এখানে বহুবার এসেছি। কিন্তু এখন যখন আমি এখানে এসে সুশাসনের মডেল দেখি, তখন খুব ভালো লাগে। প্রতিবারই আমার মনে হয় যে আগের বারের তুলনায় এই অঞ্চলটি উন্নয়নের পথে বহু মাইল এগিয়ে গেছে।

বন্ধুগণ,
দাদরা ও নগর হাভেলি, দমন ও দিউ কয়েক দশক ধরে উন্নয়নের স্বপ্ন দেখেছিল। আগের প্রজন্ম যারা স্বপ্ন দেখেছিলেন, তারা চলে গেছেন। কিন্তু বর্তমান প্রজন্ম নিজেদের চোখে দেখছে যে, তাদের বাবা-মা ও দাদু-ঠাকুমারা যে স্বপ্নগুলো দেখতেন, তা এখন তাদের চোখের সামনেই পূরণ হচ্ছে। আজও এখানে যোগাযোগ, স্বাস্থ্য, শিক্ষা, পর্যটন এবং নগর পরিকাঠামো সম্পর্কিত অনেক প্রকল্পের উদ্বোধন ও ভিত্তিপ্রস্তর স্থাপন করা হয়েছে। এই উন্নয়নমূলক কাজগুলো দমন এবং সমগ্র কেন্দ্রশাসিত অঞ্চলের মানুষের জীবনকে আরও সহজ করে তুলবে। এগুলো যুবকদের জন্য নতুন সুযোগ তৈরি করবে। এই কাজগুলোর পেছনে প্রফুল ভাই প্যাটেলের দূরদৃষ্টি এবং তাঁর ও তাঁর দলের কঠোর পরিশ্রম স্পষ্টভাবে দৃশ্যমান। এর জন্য আমিও প্রফুল ভাই এবং তাঁর পুরো দলকে সাধুবাদ জানাই। আমি লাক্ষাদ্বীপ এবং দাদরা-নগর হাভেলির জনগণকে অনেক অভিনন্দন ও শুভেচ্ছা জানাই।
বন্ধুগণ,
আজ আপনাদের মধ্যে আসার সময় একটি সুখবর পেলাম। আজ সকালেই আমি দিল্লি থেকে রওনা হয়েছিলা। এইমাত্র যে পরিসংখ্যান ও খবরটি এসেছে তা সত্যিই আনন্দদায়ক; আর আমি আপনাদের সঙ্গে এই আনন্দ ভাগ করে নিতে চাই। আজকের এই পরিসংখ্যান স্পষ্টভাবে প্রমাণ করে যে ভারতের অর্থনীতির ভিত্তি কতটা মজবুত। ২০২৫-২৬ সালে - অর্থাৎ যে অর্থবছরটি সদ্য শেষ হলো তাতে—ভারত ৭.৭ শতাংশ প্রবৃদ্ধির হার অর্জন করেছে। এমনকি ৩১শে মার্চ শেষ হওয়া সর্বশেষ ত্রৈমাসিকেও ভারতের প্রবৃদ্ধির হার ছিল ৭.৮ শতাংশ। এর ফলে ভারত বিশ্বের দ্রুততম উন্নয়নশীল বৃহৎ অর্থনীতিতে পরিণত হয়েছে। প্রত্যেক ভারতীয়রই এতে গর্ববোধ করা উচিত। এটাই আমাদের অগ্রগতির গতি। দেশ আজ 'রিফর্ম এক্সপ্রেস'-এর গতিতে এগিয়ে চলেছে। দেশ আজ বিশাল পরিকাঠামোগত উন্নয়ন এবং দরিদ্রদের কল্যাণে ব্যাপক কর্মযজ্ঞ প্রত্যক্ষ করছে। আর এসব প্রচেষ্টারই ফলস্বরূপ, দেশ আজ দ্রুততম উন্নয়নশীল বৃহৎ অর্থনীতি হিসেবে এগিয়ে যাচ্ছে। আমরা সবাই জানি যে বিশ্ব আজ নানা সংকটে জর্জরিত এবং বিশ্বের বিভিন্ন দেশের অর্থনীতি অনিশ্চয়তার মুখে পড়েছে। কিন্তু বিশ্বব্যাপী এই চরম সংকটের সময়েও ১৪০ কোটি দেশবাসীর সম্মিলিত প্রচেষ্টায় ভারত কেবল নিজের অবস্থানই ধরে রাখেনি, বরং অন্যদের চেয়ে এগিয়েও রয়েছে। অর্থনৈতিক ক্ষেত্রে এই নতুন উচ্চতা অর্জনের জন্য আমি দেশবাসীকে অনেক অনেক অভিনন্দন জানাই। আমি আবারও দেশবাসীকে আশ্বস্ত করছি যে, বিশ্বজুড়ে বিদ্যমান নানা সংকট সত্ত্বেও দেশ দৃঢ় সংকল্প নিয়ে 'রিফর্ম, পারফর্ম এবং ট্রান্সফর্ম'-এর পথে দ্রুত গতিতে এগিয়ে যাবে। দেশবাসীর কাছে এটাই আমার নিশ্চয়তা।
বন্ধুগণ,
আমাদের কাছে এখন উন্নয়নের পাশাপাশি আমাদের উন্নয়ন মডেলটি যাতে টেকসই হয়, তা নিশ্চিত করাও সমান গুরুত্বপূর্ণ। বিশ্ব পরিবেশ দিবসে আজ আমাদের এই কেন্দ্রশাসিত অঞ্চলটি সেই সংকল্পই বাস্তবায়িত করছে। একদিকে যেমন এখানে হাজার হাজার কোটি টাকার উন্নয়ন প্রকল্পের উদ্বোধন ও ভিত্তিপ্রস্তর স্থাপন করা হয়েছে, তেমনই একই সঙ্গে 'মায়ের নামে একটি গাছ' কর্মসূচির আওতায় প্রায় এক লক্ষ চারাগাছও রোপণ করা হচ্ছে। আমি গর্বিত যে, এটি এমন একটি কেন্দ্রশাসিত অঞ্চল যা সরকারি ভবনগুলোতে সৌরশক্তির শতভাগ ব্যবহারের কৃতিত্ব অর্জন করেছে। আজ দিউ-তে দিনের বেলার বিদ্যুতের সম্পূর্ণ চাহিদা কেবল সৌরশক্তি দিয়েই মেটানো হচ্ছে এবং আমাদের এই উদ্যোগকে আরও এগিয়ে নিয়ে যেতে হবে। সৌরশক্তির মাধ্যমে বাড়িঘরেও বিদ্যুৎ পৌঁছানো উচিত। শুধু তাই নয়, উদ্বৃত্ত বিদ্যুৎ থেকে পরিবারগুলোর আয় করার ব্যবস্থাও থাকা প্রয়োজন। এ লক্ষ্যে বাড়ির ছাদে সৌরবিদ্যুৎ কেন্দ্র স্থাপনের উদ্যোগ শুরু হয়েছে। এসব সাফল্য অর্জনের জন্য আমি আপনাদের সবাইকে সাধুবাদ জানাই।

বন্ধুগণ,
আমি এটাও জেনেছি যে, আজকাল দমন-এর মানুষজন একটি পরিচ্ছন্নতা অভিযান চালাচ্ছেন। এটি প্রমাণ করে যে পরিচ্ছন্নতা কীভাবে দমন-এর জনজীবনের সংস্কৃতির একটি অবিচ্ছেদ্য অংশ হয়ে উঠেছে এবং সেই সংস্কৃতির প্রতিফলন তাদের পরিচ্ছন্নতা বিষয়ক প্রচেষ্টায় স্পষ্ট। এই ধরনের গণ-অংশীদারিত্বমূলক প্রচেষ্টার জন্য আমি দমন-এর জনগণকে অভিনন্দন জানাই।
বন্ধুগণ,
দাদরা ও নগর হাভেলি এবং দমন ও দিউ - কেন্দ্রশাসিত অঞ্চল হিসেবে ভারতীয় ঐতিহ্যের অংশ। তাই এদের উন্নয়নের জন্য আমাদের লক্ষ্য কোনো সাধারণ বিষয় নয়। আমার মনে আছে, গত বছর যখন আমি সিলভাসায় এসেছিলাম, তখন আপনাদের সিঙ্গাপুরের উদাহরণ দিয়েছিলাম। আমি বলেছিলাম যে, একসময় সিঙ্গাপুর ছিল একটি ছোট মৎস্যজীবী গ্রাম। কিন্তু সিঙ্গাপুরের মানুষ স্বপ্ন দেখেছিলেন, বড় লক্ষ্য স্থির করেছিলেন এবং আজ সেই সিঙ্গাপুরই বিশ্বের বৃহত্তম বাণিজ্যিক কেন্দ্রে পরিণত হয়েছে। আজ দাদরা ও নগর হাভেলি এবং দমন ও দিউ-ও ঠিক তেমনই স্বপ্ন দেখছে। ‘নমো বিমানবন্দর’, দমনগঙ্গা নদীর ওপর আইকনিক সেতু এবং ‘বিচ ফ্রন্ট’-এ কনভেনশন সেন্টারের মতো প্রকল্পের মাধ্যমে আমরা ভবিষ্যতের বড় বড় সংকল্প বাস্তবায়নের ভিত্তি স্থাপন করছি। এই প্রকল্পগুলোর ফলে আপনাদের যাতায়াত সহজ হবে। এখানে ব্যবসার নতুন নতুন সুযোগ সৃষ্টি হবে। দমন-এর উভয় প্রান্তেই উন্নয়নের গতি ত্বরান্বিত হবে।
বন্ধুগণ,
এখানে হসপিটালিটি বা আতিথেয়তা-কেন্দ্রিক অর্থনীতির সুযোগ বাড়বে এবং সেই সঙ্গে ‘ট্রান্সপোর্ট নগর’-এর মতো সুবিধাগুলো বাণিজ্য ও লজিস্টিকস ব্যবস্থায় নতুন গতি সঞ্চার করবে।

বন্ধুগণ,
এই অঞ্চলে ‘ব্লু ইকোনমি’বা সমুদ্র-অর্থনীতি নিয়ে আমরা যে রূপরেখা তৈরি করেছি, তা-ও অত্যাধুনিক পরিকাঠামোর শক্তির মাধ্যমেই বাস্তবায়িত হবে। আর তাই, আজই লাক্ষাদ্বীপের কালপেনি ও কাদমাত দ্বীপে আধুনিক বন্দরের ভিত্তিপ্রস্তর স্থাপন করা হচ্ছে। এই সমস্ত প্রচেষ্টা ‘ব্লু ইকোনমি’-র ক্ষেত্রে দেশের শক্তি বৃদ্ধি করবে এবং আমি আগেই বলেছি, এই উদ্যোগগুলি লাক্ষাদ্বীপের ভাগ্য বদলে দেবে।
বন্ধুগণ,
বিজেপি সরকার তথা আমাদের এনডিএ সরকারের কাছে উন্নয়নের প্রধান মাপকাঠি হলো - দরিদ্র, বঞ্চিত, আদিবাসী এবং মধ্যবিত্ত মানুষের জীবনে পরিবর্তন আনা! আর এ কারণেই স্বাস্থ্য ক্ষেত্র আমাদের কাছে অত্যন্ত অগ্রাধিকারের বিষয়। বিগত বছরগুলোতে স্বাস্থ্যসেবার ক্ষেত্রে দেশ একটি সামগ্রিক দৃষ্টিভঙ্গি নিয়ে এগিয়ে চলেছে। চিকিৎসা সংক্রান্ত প্রতিটি সমস্যার সমাধান আমরা করেছি। আজ দরিদ্রতম মানুষেরাও 'আয়ুষ্মান কার্ড'-এর সুবিধা পাচ্ছেন। ৫ লক্ষ টাকা পর্যন্ত বিনামূল্যে চিকিৎসার নিশ্চয়তা তাঁদের রয়েছে। সময়মতো রোগনির্ণয় নিশ্চিত করতে 'প্রধানমন্ত্রী আয়ুষ্মান আরোগ্য মন্দির'-এর ব্যবস্থা করা হয়েছে। 'জন ঔষধি কেন্দ্র'-এর মাধ্যমে সাশ্রয়ী মূল্যে ওষুধও পাওয়া যাচ্ছে। এই পরিষেবাগুলিকে আরও উন্নত ও আধুনিক করে তুলতে, আজ 'আয়ুষ্মান ভারত ডিজিটাল মিশন'-এর মাধ্যমে স্বাস্থ্যসেবাকে প্রযুক্তির সঙ্গে যুক্ত করা হচ্ছে।
বন্ধুগণ,
শুধুমাত্র আয়ুষ্মান কার্ড এবং জন-ঔষধি কেন্দ্রের সুবাদেই দরিদ্র ও মধ্যবিত্ত শ্রেণীর প্রায় ২.২৫ লক্ষ কোটি টাকা সাশ্রয় হয়েছে।
ভাই ও বোনেরা,
কেন্দ্রীয় সরকারের নীতির ফলে এই অঞ্চলের মানুষও ব্যাপকভাবে উপকৃত হয়েছেন। এক সময় এখানে উন্নত চিকিৎসার সুযোগ-সুবিধার অভাব ছিল। এমনকি এখানে কোনো মেডিকেল কলেজও ছিল না। কিন্তু এখন এখানে একটি মেডিকেল কলেজ রয়েছে এবং সেখানে স্নাতকোত্তর পড়াশোনাও শুরু হয়েছে। সিলভাসার ‘নমো হাসপাতাল’গত এক বছর ধরে হাজার হাজার মানুষের সেবা করে আসছে। আজ দমন-এও ‘নমো হাসপাতাল-এর উদ্বোধন করা হলো। এই অঞ্চলের মানুষ এখন আরও উন্নত স্বাস্থ্যসেবার সুবিধা পাবেন।

বন্ধুগণ,
স্বাস্থ্যক্ষেত্রকে আমাদের সরকার কতটা অগ্রাধিকার দিচ্ছে, তা ‘জাতীয় পরিবার স্বাস্থ্য সমীক্ষা’-র ফলাফলেও স্পষ্ট। এক সময় ভারতে অধিকাংশ সন্তান প্রসব হাসপাতালে হতো না। আজ দেশে ৯০ শতাংশেরও বেশি প্রসব হাসপাতালে হচ্ছে। এর ফলে মাতৃমৃত্যু ও শিশুমৃত্যুর হার উল্লেখযোগ্যভাবে কমেছে। ‘মিশন ইন্দ্রধনুষ’-এর কারণে শিশু টিকাকরণের ক্ষেত্রেও ভারত ভালো সাফল্য অর্জন করেছে। ২০১৪ সালের আগে মাত্র ৬০ শতাংশ শিশু সম্পূর্ণ টিকা পেয়েছিল। আজ এই সংখ্যা বেড়ে প্রায় ৯০ শতাংশে পৌঁছেছে। স্বাস্থ্য সুরক্ষার ক্ষেত্রেও বড় পরিবর্তন এসেছে। ২০১৪ সালের আগে ৩০ শতাংশেরও কম পরিবার স্বাস্থ্য বিমা প্রকল্পের আওতাভুক্ত ছিল। আজ ‘আয়ুষ্মান ভারত’সেই পরিসংখ্যানও বদলে দিয়েছে। এখন ৬০ শতাংশেরও বেশি পরিবার এই সুরক্ষার সুবিধা পাচ্ছে।
বন্ধুগণ,
স্বাস্থ্যক্ষেত্রে সরকারের এসব প্রচেষ্টার ফলে যদি কেউ সবচেয়ে বেশি উপকৃত হয়েছেন আমার দেশের মহিলারা।
বন্ধুগণ,
আগে এই অঞ্চলের তরুণ-তরুণীদের উচ্চশিক্ষার জন্য বাইরে যেতে হতো। কিন্তু আজ এখানে একটি নয়, বরং জাতীয় পর্যায়ের অনেক প্রতিষ্ঠান গড়ে উঠেছে। সাম্প্রতিক বছরগুলোতে এখানে নতুন স্কুল ভবন নির্মিত হয়েছে এবং স্কুলগুলোতে ‘স্মার্ট ক্লাসরুম’ও তৈরি করা হয়েছে। ৪০ হাজারেরও বেশি শিক্ষার্থী এর সুফল পাচ্ছে। আমি আনন্দিত যে, এই কেন্দ্রশাসিত অঞ্চলটি শিক্ষার ক্ষেত্রে ক্রমশ এগিয়ে চলেছে। এখানে ‘স্বামী বিবেকানন্দ এডুকেশন হাব’-এর মতো অনেক নির্মাণকাজ হচ্ছে।

ভাই ও বোনেরা,
শিক্ষার এই বিপ্লবে যেন আমাদের মেয়েরা পিছিয়ে না থাকে আমরা সেজন্য দৃঢ় সংকল্প । এ লক্ষ্যে বড় ধরনের অনেক প্রচেষ্টা চালানো হচ্ছে। ‘সরস্বতী সাইকেল যোজনা’ এবং ‘সরস্বতী বিদ্যা যোজনা’-র মতো কর্মসূচিগুলো এখানকার মেয়েদের ব্যাপকভাবে সহায়তা করছে।
বন্ধুগণ,
ভারত আজ এমন এক প্রচেষ্টা চালাচ্ছে যাতে দেশের যুবসমাজ কেবল ডিগ্রির পাশাপাশি সঠিক দিকনির্দেশনাও পায়। তাদের এমন অভিজ্ঞতা ও সুযোগের সঙ্গে পরিচিত করা প্রয়োজন, যা স্থানীয় প্রতিভাকে বিশ্বমানের সুযোগ-সুবিধার সঙ্গে যুক্ত করতে পারে। ডিজাইন, আইন, প্রকৌশল, চিকিৎসা শিক্ষা, তথ্যপ্রযুক্তি ,ড্রোন এবং নবীকরনযোগ্য শক্তির মতো ক্ষেত্রগুলোতে আমাদের বর্তমান প্রস্তুতি ভারতের কর্মীবাহিনীকে আরও শক্তিশালী করে তুলবে। তাই পেশাগত শিক্ষা প্রতিষ্ঠানের সম্প্রসারণ অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ।
বন্ধুগণ,
আজ এনআইএফটি-এর অষ্টাদশ ক্যাম্পাসের ভিত্তিপ্রস্তর স্থাপন করা হলো। এই প্রতিষ্ঠানটি এখানকার যুবসমাজকে বিশ্বমানের অভিজ্ঞতার সাথে যুক্ত করবে। আইটিআই দমন-এ ড্রোন টেকনিশিয়ানের মতো নতুন কোর্সও চালু হয়েছে। ‘পিএম বিশ্বকর্মা এবং ‘পিএম সূর্য ঘর বিনামূল্যে বিদ্যুৎ যোজনা’-র মতো প্রশিক্ষণ কর্মসূচিগুলোও যুবসমাজকে উপকৃত করছে।
বন্ধুগণ,
নতুন চিন্তাধারার মাধ্যমে দেশের ক্রীড়াক্ষেত্রকেও এগিয়ে নেওয়া হয়েছে। আমাদের খেলাধুলা এখন আর কেবল বড় শহর বা বড় স্টেডিয়ামের মধ্যে সীমাবদ্ধ নেই। ‘খেলো ইন্ডিয়া’-র মতো উদ্যোগ যুবসমাজকে তাদের প্রতিভা প্রদর্শনের এক নতুন মঞ্চ দিয়েছে। এর ফলে ছোট অঞ্চলের ছেলেমেয়েরাও খেলাধুলার ক্ষেত্রে জাতীয় পর্যায়ে উঠে আসছে এবং এই অঞ্চলটিও এর সুফল পেয়েছে। দিউ আজ বিচ স্পোর্টস বা সমুদ্রতট-কেন্দ্রিক খেলাধুলার একটি বড় কেন্দ্র হিসেবে গড়ে উঠেছে। ঘোগলা বিচে আয়োজিত ‘বিচ গেমস’ও দেশের দৃষ্টি এই অঞ্চলের দিকে আকর্ষণ করেছে। আজ এখানে ক্রমাগত আধুনিক ক্রীড়া পরিকাঠামো গড়ে তোলা হচ্ছে। খানভেল-এর ফুটবল সেন্টার এবং দমন-এর ভলিবল প্রশিক্ষণ কেন্দ্র এখানকার ক্রীড়া সংস্কৃতিকে আরও শক্তিশালী করে তুলছে।

বন্ধুগণ,
আজ দেশের বিশেষ মনোযোগ রয়েছে পর্যটন ক্ষেত্রের ওপরও। আমাদের লক্ষ্য হলো পর্যটনের মাধ্যমে স্থানীয় শিল্প ও সংস্কৃতির প্রসার ঘটানো। ছোট ছোট জায়গাকেও বড় বড় সুযোগ-সুবিধার সঙ্গে যুক্ত করা। ‘দেখো আপনা দেশ’-এর মতো উদ্যোগ মানুষকে দেশের বৈচিত্র্য সম্পর্কে জানতে অনুপ্রাণিত করেছে। আজ ভারতে হেরিটেজ ট্যুরিজম, বিচ ট্যুরিজম, ইকো-ট্যুরিজম এবং অ্যাডভেঞ্চার ট্যুরিজম নতুন প্রাণশক্তি পাচ্ছে।
বন্ধুগণ,
দাদরা ও নগর হাভেলি এবং দমন ও দিউ-তেও পর্যটন এক বিপুল সম্ভাবনাময় ক্ষেত্র। এই অঞ্চলটি প্রাকৃতিক সৌন্দর্যে সমৃদ্ধ। তাই পর্যটন নিয়ে দেশ যে নীতিগুলো গ্রহণ করেছে, তার ফলে দাদরা ও নগর হাভেলি এবং দমন ও দিউ ব্যাপকভাবে উপকৃত হয়েছে। ২০২১ সালে এখানে প্রায় ৬ লক্ষ পর্যটক এসেছিলেন। ২০২৫ সালে এই সংখ্যা বেড়ে প্রায় ৫০ লক্ষে পৌঁছেছে। অর্থাৎ, মাত্র কয়েক বছরের মধ্যেই পর্যটকদের সংখ্যা প্রায় দশগুণ বেড়েছে। উন্নত পরিকাঠামো, ভালো সুযোগ-সুবিধা এবং পরিচ্ছন্ন সমুদ্রতটের কারণেই এটি সম্ভব হয়েছে। দমন নাইট মার্কেট, রামসেতু সি-ফ্রন্ট, নামোপথ সি-ফ্রন্ট, নানি দমন দুর্গ, গঙ্গেশ্বর মন্দির চত্বর - এমন অসংখ্য স্থান আজ এই পুরো অঞ্চলের নতুন পরিচয় হয়ে উঠছে।
বন্ধুগণ,
দাদরা ও নগর হাভেলি এবং দমন ও দিউ-এর স্বপ্ন পূরণের জন্য আমাদের এখানকার শিল্প-সামর্থ্যও বৃদ্ধি করতে হবে। এটি অত্যন্ত গর্বের বিষয় যে, এই কেন্দ্রশাসিত অঞ্চলটি কৃত্রিম তন্তু বা 'ম্যান-মেড ফাইবার'-এর ক্ষেত্রে নিজের এক স্বতন্ত্র পরিচিতি গড়ে তুলেছে। দাদরা ও নগর হাভেলি আজ 'জাতীয় ম্যান-মেড ফাইবার রাজধানী' হিসেবে স্বীকৃতি পেয়েছে। প্লাস্টিক পণ্য রপ্তানির ক্ষেত্রেও এই অঞ্চলটি ক্রমাগত এগিয়ে চলেছে। এখানকার শিল্প ও এমএসএমই-গুলোকে সহায়তা করার জন্য সরকার নিরন্তর প্রচেষ্টা চালিয়ে যাচ্ছে। এখানকার এমএসএমই এবং অন্যান্য শিল্পকে কোটি কোটি টাকার আর্থিক সহায়তা প্রদান করা হয়েছে। এই কেন্দ্রশাসিত অঞ্চলের ক্ষুদ্র ও কুটির শিল্পের জন্য নতুন নতুন সুযোগ সৃষ্টি হচ্ছে। আমি নিশ্চিত যে, আগামী দিনে এই অঞ্চলটি উৎপাদন শিল্পের এক বিশাল কেন্দ্রে পরিণত হবে।
বন্ধুগণ,
যখন সংবেদনশীল শাসনব্যবস্থার সঙ্গে উন্নয়নের দূরদর্শী চিন্তাধারার মেলবন্ধন ঘটে, তখন বাস্তবে দ্রুত রূপান্তর হয়। দাদরা ও নগর হাভেলি এবং দমন ও দিউ-তে আমাদের প্রচেষ্টার সুফল দেখে আমি অত্যন্ত সন্তোষ বোধ করছি। এ অঞ্চলের মানুষের ওপর আমার পূর্ণ আস্থা রয়েছে। এখানকার যুবসমাজ, মা ও বোনেরা, কৃষক, কারিগর, শ্রমিক এবং উদ্যোক্তারা আগামী বছরগুলোতে উন্নয়নের এই যাত্রাকে আরও এগিয়ে নিয়ে যাবেন। আমি আপনাদের নিশ্চিত করছি যে, আপনাদের স্বপ্ন পূরণে কেন্দ্রীয় সরকার সর্বদা আপনাদের পাশে থাকবে। এই বিশ্বাস নিয়ে, উন্নয়নমূলক প্রকল্পগুলোর জন্য আমি আপনাদের আবারও অনেক অনেক অভিনন্দন জানাচ্ছি। আমার সঙ্গে বলুন - ভারত মাতা কি জয়! ভারত মাতা কি জয়! ভারত মাতা কি জয়!
আপনাদের অনেক ধন্যবাদ।


