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दुबई की धरती पर आज मैं लघु भारत के दर्शन कर रहा हूं: प्रधानमंत्री
दुनिया भर से लोग यहां दुबई आये हैं। इस जगह ने दुनिया भर के लोगों को आकर्षित किया है: प्रधानमंत्री
भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच लगभग 700 फ्लाइट हैं, लेकिन इस देश का दौरा करने में एक प्रधानमंत्री को 34 साल लग गए: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से आग्रह किया कि वे खड़े होकर अबू धाबी के क्राउन प्रिंस का अभिनंदन करें
भारत 40 साल से आतंकवाद का शिकार रहा है। निर्दोष लोगों को अपनी जानें गवानी पड़ी हैं: प्रधानमंत्री
Good Taliban, Bad Taliban, Good Terror, Bad Terror, ये अब चलने वाला नहीं। फैसला आपको करना है- आप आतंकवाद के साथ हैं या मानवता के साथ: पीएम
हमारा प्रयास भारत को प्रगति की नई ऊंचाइयों तक ले जाना और पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना है: प्रधानमंत्री

दुबई की धरती पर मैं आज मेरे सामने लघु भारत के दर्शन कर रहा हूं। हिन्‍दुस्‍तान के कोने-कोने से आए हुए मेरे प्यारे देशवासियों को मैं नमन करता हूं। आप वे लोग हैं, जिन्होंने परिश्रम की पराकाष्ठा करके..कोई दस साल से, कोई पंद्रह साल से, कोई बीस साल से, कोई तीस साल से, रोजी रोटी कमा रहे हैं, लेकिन साथ-साथ भारत के गौरव को भी बढ़ाने में कभी पीछे नहीं रहे। आपके व्यवहार के कारण आपके आचरण के कारण हमेशा भारत गौरव अनुभव करता रहा है। भारत में अगर अधिक बारिश भी हो जाए तो दुबई में बैठा हुआ मेरा हिंदुस्तानी छाता खोल देता है। भारत में कहीं अगर कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए, दुबई में बैठा हुआ मेरा देशवासी चैन से सो नहीं सकता।

जब अटल बिहारी देश के प्रधानमंत्री थे, भारत ने न्यूक्लियर टेस्ट किया था, दुनिया चौंक गई थी, कुछ लोग गुस्से में आए थे और रातों-रात भारत पर sanction लगा दिए गए थे। भारत को आर्थिक मुसीबतों में धकेल दिया गया था.. और तब वाजपेयी जी ने विश्व भर में फैले हुए भारत वासियों को आह्वान किया था, देश की मदद करने के लिए। आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि वाजपेयी जी के उस आह्वान पर, हिन्‍दुस्‍तान की तिजोरी भरने में Gulf Countries में जो मजदूरी का काम करते थे, उन मेरे भारतवासियों का सबसे बड़ा योगदान था। इस अर्थ में यहां बसा हुआ हर भारतवासी, एक प्रकार से हिन्‍दुस्‍तान के हर कोने से जुड़ा हुआ है। पिछली बार जब देश लोकसभा के चुनाव के लिए व्यस्त था, चुनाव नतीजे आ रहे थे, हिन्‍दुस्‍तान ही नहीं, पूरा दुबई नाच रहा था। ये प्यार भारत माता के कल्याण के लिए..मां भारती फिर से एक बार सामर्थ्यवान बने, सशक्त बने, सम्‍पन्‍न बने, समृद्ध बने, ये सपना संजोकर के दिन-रात एक करने वाले आप लोग मेरे सामने बैठे हैं।

भाइयों-बहनों, आज..यहां तो हिन्‍दुस्‍तान के हर कोने से आए हुए मेरे भाई-बहन बैठे हैं और दुबई, वो सिर्फ लघु भारत ही रहा है ऐसा नहीं है, अब तो दुबई एक लघु विश्व भी बन गया है। दुनिया के सभी देशों के लोग, कम अधिक मात्रा में दुबई में रह रहे हैं। ठंडे से ठंडे प्रदेश के लोग भी इस 40-45 डिग्री तापमान में रहना पसंद करते हैं। क्या ताकत दिखाई होगी इस देश ने, क्या magnetic power पैदा किया होगा विकास के माध्यम से कि पूरा विश्व यहां आकर्षित हो जाता है।

हिन्‍दुस्‍तान के हर कोने से आए हुए सभी देशवासियों ने अभी दो दिन पूर्व 15 अगस्त, भारत की आज़ादी का पर्व मनाया है। मैं भी आप सब को आज़ादी के पावन पर्व की अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूं।

यहां केरल से आया हुआ भी समुदाय बहुत बड़ी मात्रा में है। मैं केरल का उल्लेख विशेष रूप से इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आज केरल का नववर्ष है। सहोदरकअ एंटे रूदयम निरन्या नववलसरा आशम सफलअ। नमस्कारम्।



हर हफ्ते हिन्‍दुस्‍तान से 700 से भी ज्यादा फ्लाइट यहां आती हैं। दुनिया में किसी एक देश के साथ इतनी बड़ी मात्रा में हवाई आवागमन अगर कहीं है, तो इस इलाके से है। हर हफ्ते 700 से भी अधिक फ्लाइट आती हैं, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को यहां आने में 34 साल लग गए। कभी-कभी मुझे लगता है कि बहुत सारे ऐसे अच्छे अच्छे काम हैं, जो पूर्व के लोग मेरे लिए बाकी छोड़ करके चले गए हैं और इसलिए बहुत सारे बाकी रहे अच्छे काम करने का मुझे भाग्य मिला है। उन अच्छे कामों में से महत्वपूर्ण अच्छा काम मेरा अबुधाबी आना, मेरा दुबई आना है। जिस प्रकार से..ये मेरी पहली मुलाकात है। इसके पहले कभी मैं धरती के इस भू-भाग पर नहीं आया। ..और 34 साल में प्रधानमंत्री के रूप में कोई आएं, तो किसी को भी, किसी को भी नाराज़गी व्यक्त करने का हक बनता है। हक बनता है कि नहीं बनता है? बनता है कि नहीं बनता है? लेकिन अबुधाबी में His Highness Crown Prince ने, दुबई में His Highness अल मख्तूम जी ने नाराज़गी नहीं दिखाई, इतने प्यार की वर्षा की, इतने प्यार की वर्षा की, मैं उनके इस प्यार को कभी भूल नहीं पाउंगा। जो स्वागत किया, जो सम्मान किया.. His Highness Crown Prince अपने सभी पांचों भाइयों के साथ एयरपोर्ट पर लेने के लिए आए। मेरे प्यारे देशवासियों, ये प्यार, ये सम्मान किसी व्यक्ति को नहीं है। ये सवा सौ करोड़ देशवासियों का सम्मान है। ये भारत की बदली हुई तस्वीर का सम्मान है। भारत जिस प्रकार से दुनिया में अपनी जगह बना रहा है, उस बदले हुए हालात का सम्मान है। मैं His Highness Crown Prince का, अमीरात का, दुबई के Rulers का हृदयपूर्वक बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।

एक तरफ संप्रदाय के नाम पर आतंकवाद के खेल खेले जाते हैं। निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। पूर्णतया: चिंता का माहौल हो, ऐसे समय अबुधाबी के His Highness Crown Prince भारतीय समुदाय के लिए मंदिर बनाने के लिए जगह देने का निर्णय करते हैं। जो लोग अबुधाबी से परिचित हैं, उन्हें पता है कि निर्णय कितना बड़ा है, ये सौगात कितनी बड़ी है। आप मुझे बताइए, सभी देशवासियों को उनका विशेष रूप से अभिनंदन करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए। मैं आप सभी से आग्रह करता हूं कि तालियों की गूंज से Crown Prince का अभिनंदन कीजिए। Crown Prince को Standing Ovation दीजिए। उनका अभिनंदन कीजिए। मैं हृदय से उनका अभिनंदन करता हूं।

भाइयों-बहनों, दो दिन की मेरी यात्रा में जिस प्रकार का विश्वास का माहौल बना, आखिरकार अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का आधार..आपकी भाषा क्या है, आप कितने articulate हैं, आप diplomatic relation में कितने बढि़या ढंग से मेलजोल करते हैं..उससे भी ज्यादा महत्व होता है, एक दूसरे पर भरोसे का। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में ये भरोसा, ये विश्वास, एक बहुत बड़ी पूंजी होता है ..और आज मैं चंद घंटों की मेरी मुलाकात के बाद कह सकता हूं कि भारत, अबुधाबी, दुबई, अमीरात.. जो विश्वास का सेतू बना है, वो अभूतपूर्व है और आने वाली पीढि़यों तक काम आए, ऐसा foundation तैयार हुआ है।

आज मुझे खुशी हुई कि जब आज भारत और अमीरात के बीच जो Joint Statement आया है, आपको भी खुशी होगी जान करके.. Crown Prince ने हिन्‍दुस्‍तान में साढ़े चार लाख करोड़ रूपए का निवेश करने का संकल्प दोहराया है। साढ़े चार लाख करोड़ रूपया! कितना? कितना? कितना? भाइयों-बहनों, अगर आप पर किसी का भरोसा न हो, तो कोई 10 रूपया भी आप पर लगाने के लिए तैयार होगा क्या? ये भारत की साख बनी है। आज भारत का बदला हुआ रूप विश्‍व के सामने अपनी स्वीकृति बनाता आगे चल रहा है।

आज अमीरात और भारत की तरफ से आतंकवाद के खिलाफ, दो टूक शब्दों में, बिना लाग लपेट और किसी की परवाह किए बिना साफ-साफ शब्‍दों में संकेत दे दिए गए हैं। आतंकवाद के खिलाफ एकता का स्वर आज इस धरती से उठा है। मैं इसे बहुत अहम मानता हूं और इतना ही नहीं..समझने वाले समझ जाएंगे, अक्लमंद को इशारा काफी। आतंकवाद में लिप्त लोगों को सजा होनी चाहिए, ये स्पष्ट शब्दों में संकेत यहां से निकला है। मैं आज यहां के शासकों का इसलिए भी आभारी हूं कि उन्होंने..United Nations जब अपने 70 साल मनाने जा रहा है, तो यहां से कहा गया है और भारत की इस बात का खुला समर्थन किया गया है कि भारत को United Nations की Security Council की Permanent Membership मिलनी चाहिए। मैं आभारी हूं उनका।

इससे भी आगे एक बहुत-बहुत महत्वपूर्ण बात पर..आज भारत की लंबे अर्से से एक position है। उसका आज His Highness Crown Prince ने खुले आम समर्थन घोषित किया। भाइयों-बहनों, कई वर्षों से United Nations में एक Resolution लटका पड़ा है। आपको भी बड़ी हैरानी होगी..और दो-पांच साल से नहीं, कई वर्षों से लटका पड़ा है। क्या.. ? United Nations, जो कि प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध से पीडि़त मानव समुदाय को मरहम लगाने के लिए..आगे मानव जाति को ऐसे संकट झेलने की नौबत न आए, इसके लिए precaution लेने के लिए, व्यवस्थाएं विकसित करने के लिए 70 साल पहले United Nations का जन्म हुआ। लेकिन वह United Nations आतंकवाद की अभी तक परिभाषा नहीं कर पाया। आतंकवादी किसको कहें, आतंकवाद किसको कहें, आतंकवाद को समर्थन करने वाले कौन माना जाए, किस देश को आतंकवाद का समर्थक माना जाएं, किस देश को समर्थक न माना जाए। इसलिए Comprehensive Convention on International Terrorism..इसका निर्णय करने का प्रस्ताव लंबे अर्से से United Nations में लंबित पड़ा हुआ है। भारत ने position ली हैं सालों से किए एक प्रस्ताव पर चर्चा हो जाए, निर्णय होना चाहिए और ये टाला जा रहा है। आज मुझे खुशी इस बात की है कि His Highness Crown Prince ने भारत की स्थिति का समर्थन का किया है, भारत की position का समर्थन किया है और आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के संबंध में आपने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। न सिर्फ.. साढ़े चार लाख करोड़ का पूंजी निवेश की बात नहीं है ये। ये एक निश्चित दिशा में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का एक प्रकार का संकेत, इस Joint Statement में है। मैं इसे बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं।

भाइयों-बहनों आप तो सालों से बाहर हैं। आज भारत का नाम सुनते ही आपके सामने खड़े हुए व्यक्ति की आंखों में चमक आती है कि नहीं आती है? आपका माथा गर्व से ऊंचा होता है कि नहीं होता है, आपका सीना गर्व से तन जाता है कि नहीं तन जाता है? एक गर्व महसूस करते हैं कि नहीं करते हैं? भाइयों बहनों आज दुनिया का हिन्‍दुस्‍तान की तरफ देखने का नज़रिया पूरी तरह बदल गया है और उसका एक कारण..क्या कारण है?.. क्या कारण है, ये बदलाव आया है? मोदी के कारण नहीं, ये जो बदलाव आया है, सवा सौ करोड़ देशवासियों की संकल्प शक्ति के कारण आया है। सवा सौ करोड़ देशवासियों ने 2014 मई महीने में 30 साल के बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार चुनी। आज दुनिया का कोई भी महापुरूष, दुनिया का कोई भी राजनेता मोदी से जब हाथ मिलाता है न, तब उसे मोदी नहीं दिखता है। उसे सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी दिखाई देते हैं। दुनिया की तेज़ गति से बढ़ रही economy दिखाई दे रही है।

भाइयों-बहनों, पिछले दिनों, IMF हो, World Bank हो, Moody हो, विश्व की जितनी भी आर्थिक पैमाने पर Rating Institutions हैं, सब किसी ने एक स्वर से कहा है कि आज दुनिया में बड़े देशों में सबसे तेज गति से अगर आर्थिक सुधार हो रहा है, तेज गति से growth हो रहा है तो उस देश का नाम है.. (दर्शक दीर्घा से भारत-भारत के नारे). मुझे बताइए सीना तन जाएगा कि नहीं तन जाएगा? माथा ऊंचा हो जाएगा कि नहीं होगा कि नहीं होगा। एक साल के भीतर-भीतर ये बदलाव आया है। भाइयों बहनों, हमने मेक इन इंडिया.. कुछ महीने पहले इस अभियान का प्रारंभ किया। दुनिया को मैं कह रहा हूं- मेक इन इंडिया। आइए, हिन्‍दुस्‍तान एक ऐसा देश है जो संभावनाओं से भरा हुआ है, Opportunities ही Opportunities हैं। ये एक ऐसा भाग्‍यशाली देश है, जिसके पास 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 साल से कम उम्र की है। भारत एक नौजवान देश है। आज यहां जवानी लबालब भरी पड़ी है और विश्व वहां आए, हमारे युवकों की शक्ति जुटाए, उत्पादन करे, दुनिया के बाज़ार में जाकर बेचे। और आज..ये कुछ ही महीनों का मामला है.. Foreign Direct Investment..FDI में 48 प्रतिशत वृद्धि हुई है, 48%। भाइयों-बहनों विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए Ease of doing Business का माध्‍यम हो। देश की युवा शक्‍ति में Skill Development का अभियान हो। आधुनिक भारत के निर्माण के लिए डिजिटल इंडिया का सपना साकार करने के लिए दिन-रात पुरुषार्थ चलता हो। तो विश्‍व का आना बहुत स्‍वाभाविक है मेरे भाइयों और बहनों, बहुत स्‍वाभाविक है।

भाइयों-बहनों, आज दुनिया जिस आतंकवाद के नाम सुनते ही कांप उठती हैं, एक नफरत पैदा होती है। मैं दुनिया को कहता हूं हम हिन्‍दुस्‍तान के लोग 40-40 साल से ये आतंकवाद के शिकार हुए हैं। हमारे निर्दोष लोग आतंकवादियों की गोलियों से भून दिए गए हैं, मौत के घाट उतार दिए गए हैं और जब कभी मैं विश्‍व के लोगों के साथ आज से 25-30 साल पहले कभी मुझे बात करने का अवसर मिलता था, तो वे आतंकवाद समझने की उनकी क्षमता ही नहीं थी। कभी मैं आतंकवाद की बात करता था तो वे मुझे कहते थे ये तो आपका Policing का problem है Law and Order का problem है। अब उनको समझ आ गया है कि आतंकवाद का कितना भयंकर रूप होता है। आतंकवाद की कोई सीमाएं नहीं होती है, वो पता नहीं कब किस सीमा पर जाकर आ धमकेगा। आज अभी मैं यहां पहुंच रहा था, मैंने सुना बैंकॉक के अंदर आज एक बम धमाका हुआ, निर्दोष लोगों को मार दिया गया। भारत तो लगातार इन हरकतों को झेलता रहा है और विश्‍व समुदाय जब तक आतंकवाद की मानसिकता वाले देशों को, आतंकवाद को, उसको समर्थन करने वालों को एक ओर, और मानवता में विश्‍वास करने वाले दूसरी ओर, और मानवतावाद में विश्‍वास करने वाले दुनिया के देश एक होकर के आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का वक्‍त आ चुका है।

Good Taliban-Bad Taliban, Good Terrorism- Bad Terrorism ये अब चलने वाला नहीं है। हर किसी को तय करना पड़ेगा कि फैसला करो कि आप आतंकवाद के साथ हो या मानवता के साथ हो, निर्णय करो। भारत को तो आज भी आए दिन इन नापाक हरकतों का शिकार होना पड़ता है। हम समस्‍याओं का समाधान खोजने की दिशा में लगातार कोशिश कर रहे हैं। यहां बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत की आजादी के पहले से नागालैंड में अतिवाद, insurgency इस समस्‍या से नागालैंड जूझता रहा और उसके कारण भारत का पूरा ये पूर्वी हिस्‍सा, नॉर्थ-ईस्‍ट, आए दिन हिंसा का शिकार होता था और धीरे-धीरे वो बीमारी इतनी फैलती गई कि अन्‍य राज्‍यों में भी अलग-अलग नाम से, अलग-अलग अतिवादी, आतंकवादी गुट बनते चले गए। आजादी के भी पहले से चल रहा था।

आज मैं बहुत संतोष के साथ मेरे देशवासियों, आपको कहना चाहता हूं कि अभी एक महीने पहले नागालैंड के इन गुटों के साथ, जो कभी हिंसा में विश्‍वास करते थे, जो शस्‍त्रों को लेकर के गतिविधि चलाते थे। उनसे जो बातचीत चल रही थी, वो सफलतापूर्वक आगे बढ़ी, निर्णय हुआ, मुख्‍य धारा में आने का निर्णय हुआ। 60-70 साल के बाद ये संभव हुआ। मैं नागालैंड की ये घटना का जिक्र इसलिए करना चाहता हूं कि हिंसा के राह पर चले हुए भारत के नौजवानों को और विश्‍व के नौजवानों को मैं एक उदाहरण के रूप में कहना चाहता हूं, समस्‍या कितनी भी गंभीर क्‍यों न हो, आखिर तो बातचीत से ही रास्‍ता निकलता है। कोई 10 साल लड़ाई लड़ने के बाद बात करें, कोई 20 साल लड़ाई लड़ने के बाद करें, कोई 40 साल लड़ाई लड़ने के बाद बात करें, लेकिन आखिर में तो बात ही होती है और टेबल पर ही फैसले होते हैं और इसलिए विश्‍व भर से इस गलत रास्‍ते पर चल पड़ लोग बम-बंदूक के भरोसे, अपने सपनों को साकार करने के रास्‍ते पर चले हुए लोग। ये रास्‍ता कभी आपका भला नहीं करेगा। ये रास्‍ता कभी किसी और का भला नहीं करेगा। ये रास्‍ता कभी मानवता का भला नहीं करेगा। ये रास्‍ता इतिहास को बेदाग नहीं रहने देगा। ये पूरे इतिहास को कलंकित कर देगा, ये पूरे इतिहास को दागदार बना देगा और इसलिए हिंसा का मार्ग छोड़कर के मुख्‍यधारा में जाना, ये आज समय की मांग है।

मेरे प्‍यारे भाइयों-बहनों, बांग्‍लादेश 1947 में भारत का विभाजन हुआ, 1947 में। तब से पूर्व पाकिस्‍तान, पश्‍चिम पाकिस्‍तान थे उस समय। पूर्वी पाकिस्‍तान जो आज बांग्‍लादेश बना, भारत और उनके बीच सीमा का विवाद चल रहा था। तनाव का कारण बना हुआ था। आशंकाओं का कारण बना हुआ था। घुसपैठ के लिए एक सुविधाजनक स्‍थिति बनी हुई थी। आप सब के आशीर्वाद से हिन्‍दुस्‍तान ने बीड़ा उठाया, सबने मिलकर के बीड़ा उठाया। इस समस्‍या का समाधान करना है, बातचीत से करना है। मैं पिछले सितंबर में बांग्‍लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना जी से मिला था और मैंने उनको वादा किया था कि मुझ पर भरोसा कीजिए और मुझे थोड़ा समय दीजिए। उन्‍होंने कहा कि मेरे पास भरोसा रखने के सिवाए है भी क्‍या! लेकिन आज, आज मैं मेरे प्‍यारे देशवासियों आपके सामने सर झुकाकर के कहना चाहता हूं कि आजादी से लटका हुआ ये सवाल 1 अगस्‍त को समाप्‍त कर दिया गया है। सीमा निर्धारित हो गई। जिनको बांग्‍लादेश जाना था, बांग्‍लादेश चले गए, जिनको भारत आना था भारत आ गए। हम लोग तो 15 अगस्‍त, 1947 को आजाद हो गए थे। भारत के नागरिक के नाते गौरवगान करने लगे थे। लेकिन ये हमारे भाई-बहन अभी 1 अगस्‍त, 2015 को भारत की भूमि पर आजादी का स्‍वाद लेने का उन्‍हें सौभाग्‍यमान मिला है। भारत की संसद में सर्वसम्‍मति से सभी राजनैतिक दलों ने साथ दिया और सर्वसम्‍मति से फैसला हुआ, बातचीत के माध्‍यम से फैसला हुआ।

ये छोटी-मोटी उपलब्‍धि नहीं है मेरे भाइयों-बहनों। और मैं, औरों को भी हमेशा कहता हूं, अड़ोस-पड़ोस के देशों को भी कहता रहता हूं। जैसे हिंसा के रास्‍ते पर गए हुए लोगों को भी कभी न कभार बातचीत के रास्‍ते पर आना पड़ता है। वैसे अड़ोस-पड़ोस में भी समस्‍याओं का समाधान बातचीत से ही निकलता है।

अंतर्राष्‍ट्रीय संबंधों में आज भारत एक महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। मानवता के अधिष्‍ठान पर कर रहा है। जब नेपाल में भूकंप आया चंद घंटों में, ऐसा नहीं है कि भई ज़रा पूछो तो क्‍या हुआ है? जरा जानकारी लो क्‍या हुआ है? ऐसा करो अफसरों का delegation भेजो, देखो ज़रा क्‍या मुसीबत आई है? ऐसा करो भई कोई अपने रिश्‍तेदार वहां हो तो पूछो भई हुआ क्‍या है? ऐसा इंतजार नहीं किया? आज दिल्‍ली में ऐसी सरकार है, जो हर पल नज़र आती है, हर जगह पर नज़र आती है और चंद घंटों में, चंद घंटों में, भारत से जो भी हो सकता था, ये मानवता का काम था। नेपाल के चरणों में जाकर के हमारे लोग बैठ गए और उनकी सेवा में लग गए और आज भी सेवा चालू है। नेपाल हमारा पड़ोसी है। वो दुखी हो और हम सुखी हों, ये कभी संभव नहीं होता है। उसके सुख में भी हमारा सुख समा हुआ है।

श्रीलंका, आपको हैरानी होगी। जब मैं नेपाल गया, प्रधानमंत्री बनने के बाद। नेपाल जाना है, तो 70 मिनट नहीं लगते। दिल्‍ली से नेपाल जाना हो, तो 70 मिनट नहीं लगते। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को नेपाल पहुंचने में 17 साल लग गए। फिर से हम गए, संबंधों को फिर से जोड़ा। अपनापन। आज नेपाल भारत पर भरोसा कर रहा है। भारत नेपाल का सुख-दु:ख का साथी बन रहा है। श्रीलंका, राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, उसके बाद कोई प्रधानमंत्री की stand alone visit नहीं हुई थी। कितने साल बीत गए। हमारा पड़ोसी है, आए दिन हमारे तमिलनाडु, केरल के मछुआरे और उनके मछुआरे आपस में भिड़ जाते हैं। लेकिन उधर कोई जाता नहीं था। हम गए, इतना ही नहीं। जाफना जहां 20-20 साल तक बम और बंदूक का ही कारोबार चलता था, उस जाफना में जाकर के उन दुखियारों के आंसू पोंछने का काम करने का सौभाग्‍य मुझे मिला। एक प्रधानमंत्री के रूप में जाफना जाने का सौभाग्‍य मुझे मिला।

हमारे पड़ोस में मालदीव, आइलैंड पर बसा हुआ देश, tourism की दृष्‍टि से काफी आगे बढ़ा है। अचानक एक दिन उनके यहां पानी के सारे संयंत्र खराब हो गए। पूरे देश के पास पीने का पानी नहीं था। आप कल्‍पना कर सकते हो, कोई देश के पास पीने का पानी न हो। कितना बड़ा गहरा संकट आया। मालदीव से हमें message आया कि ऐसी मुसीबत आई है। एक पल का इंतज़ार नहीं किया, भाइयों और बहनों। हवाई जहाज से पीने का पानी पहुंचाया मालदीव में। दूसरे दिन स्‍टीमर से पानी पहुंचाना शुरू कर दिया और जब तक उनकी वो मशीन चालू नहीं हुई, पानी की व्‍यवस्‍था दुबारा पुनर्जीवित नहीं हुई, हमने मालदीव को प्‍यासा नहीं रहने दिया।

अफगानिस्‍तान हमारा पड़ोसी है। अफगानिस्‍तान संकटों से गुजर रहा है। लंबे अरसे से आए दिन वो घाव झेलता चला जा रहा है। हर पल अफगानिस्‍तान को मरहम लगाने का काम हिन्‍दुस्‍तान करता आया है। अफगानिस्‍तान फिर से एक बार खड़ा हो जाए, क्‍योंकि हम सब बचपन से काबुलीवाला से तो बहुत परिचित हैं। जब काबुली वाले की बात करते हैं, तो हमें कितना अपनापन महसूस होता है। भाइयों-बहनों हमारी कोशिश रही है भारत को विकास की नई ऊचाइयों पर ले जाना। भारत में निरंतर विकास को आगे बढ़ाना और अपने अड़ोस-पड़ोस के देशों से दोस्‍ती बनाकर करके साथ और सहयोग लेकर करके आगे चल पड़ना।

SAARC देशों का समूह उसमें एक नया प्राण पूरने का प्रयास किया है, सफलतापूर्वक प्रयास किया है। वरना पहले SAARC देशों के मंच का उपयोग तू-तू मैं मैं के लिए होता था, कभी भारत को घेरने के लिए होता था। आज SAARC देशों के लोग, जितने साथ चल सकते हैं, उनको ले करके इन SAARC की इकाई का विकास की ऊंचाइयों पर ले जाने का सपना हमने देखा था। हमने घोषित किया है कि 2016 में हम आकाश में एक SAARC Satellite छोड़ेंगे जिसकी सेवाएं SAARC देशों में मुफ्त में देंगे, जो शिक्षा के काम आए , जो आरोग्‍य के लिए काम आये, जो किसानों को काम आये, जो मछुआरों के काम आये, सामान्‍य जन को काम आये। अभी हम बीच में सोच रहे थे कि SAARC देश Connectivity के लिए गंभीरता से सोचे और हम जानते हैं, आज विकास में Connectivity का महत्‍व बहुत है। आप समुद्री मार्ग से जुडि़ए या रेल मार्ग से जुडि़ए, या रोड मार्ग से जुडि़ए, जुड़ना जरूरी है। यूरोप के देशों को ये लाभ मिला हुआ है। एक देश से दूसरे देश चले जाओ पता तक नहीं चलता कि देश कब बदल गया। क्‍या ये SAARC देशों के बीच नहीं हो सकता है? हमने मिल करके सामूहिक निर्णय करने का प्रयास किया नेपाल में। लेकिन आप जानते हैं, कुछ लोगों को जरा तकलीफ होती है, लेकिन कुछ लोगों की तकलीफ के लिए क्‍या रुकना चाहिए? हमारे काम को क्‍या हमें रोक देना चाहिए? हमें अटक जाना चाहिए क्‍या? ठीक है आपकी मर्जी, आप वहां रह जाइये, हम तो चल पड़े भाई और हमने क्‍या किया। एक बहुत बड़ा अहम फैसला लिया है भाइयों और बहनों, इसका प्रभाव आने वाले दिनों में क्‍या होने वाला है, वो तो वक्‍त बताएगा। नेपाल, भूटान, भारत, बांग्‍लादेश, इन चार देशों ने एक नया इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर बना करके Connectivity का एक पूरा काम तय कर लिया, Agreement हो गया, ये आगे चल करके नॉर्थ-ईस्‍ट से जुड़ेगा। वहां से ये म्‍यांमार मार्ग से जुड़ेगा। वो इंडोनेशिया, थाइलैंड, पूरब, हिन्‍दुस्‍तान, पूरब की बीच की तरफ भारत को Connectivity की ताकत देगा एक नया भारत का बदला हुआ, संबंधों का नया विश्‍व खड़ा हो जाएगा।

भाइयों-बहनों, एक निश्चत समय के साथ भारत अपनी भूमिका भी अदा करें, भारत बड़े होने के अहंकार से नहीं, हर किसी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहता । विकास की नई ऊंचाईयों को पार करना चाहता। भारत में नौजवानों को रोजगार मिले, हमारे कृषि में Second Green Revolution हो, हमारा पूर्वी हिन्‍दुस्‍तान, चाहे पूर्वी उत्‍तर प्रदेश हो, चाहे बिहार हो, चाहे पश्चिम बंगाल हो, चाहे असम हो, चाहे नॉर्थ-ईस्‍ट हो, चाहे ओडि़शा हो, ये हमारा जो इलाका है, ये मानना पड़ेगा कि वहां विकास की ज्‍यादा जरूरत है। अगर वहां पर विकास हो गया और हिन्‍दुस्‍तान का पश्चिमी छोर और पूरब का छोर बराबर हो गये, तो भारत बहुत तेज गति से दौड़ने लग जाएगा और इसलिए भारत के इस पूर्वी छोर पर आर्थिक विकास का एक नया अभियान हमने चलाया है। Infrastructure खड़ा करने का एक नया अभियान चलाया है। Fertiliser के नये कारखाने शुरू कर रहे हैं। गैस की पाइप लाइन लगानी है। बिजली पहुंचानी है। आप मुझे बताइए आजादी के इतने सालों के बाद बिजली होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए? बिजली मिलनी चाहिए या नहीं मिलनी चाहिए? क्‍या आज के युग में बिजली के बिना गुजारा संभव है? भाइयों-बहनों हमने सपना संजोया है। पांच साल के भीतर-भीतर हम देश के कोने-कोने में 24 घंटे बिजली मैंने देने के लिए फैसला किया। ये हम करके रहेंगे।

दुबई में रहने वाले मेरे प्‍यारे भाइयो-बहनों, हमने एक महत्‍वपूर्ण योजना घोषित की है । हमारे देश में लोगों को पहले Bank Accounts नहीं थे, हमने हर हिन्‍दुस्‍तानी का Bank Account खोल दिया, एक काम किया। भारत में हमारे देश के नागरिकों को इंश्‍योरंस नहीं है, बीमा नहीं है। उसके परिवार में कोई आपत्ति आ जाए, पीछे वालों को देखने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं। हमने तीन योजनाएं लगाई हैं, एक प्रधानमंत्री बीमा सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्‍योति योजना और इंश्‍योरेंस के लिए कितना पैसा देना है? एक स्‍कीम ऐसी है कि जिसमें एक महीने में सिर्फ एक रुपया देना है, 12 महीने में 12 रुपया। हमारे देश का गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी दे सकता है या नहीं दे सकता है? मुझे बताइए दे सकता है या नहीं दे सकता है? गरीब से गरीब व्‍यक्ति एक रुपया महीने में दे सकता है या नहीं दे सकता है? महीने का 12 रुपया,.. साल भर का 12 रुपया, साल भर का 12 रुपया देगा, दो लाख रुपयों का सुरक्षा का बीमा मिलेगा। दूसरी योजना है जिसमें उसे और भी मददें मिलेंगी, वो है एक दिन का नब्‍बे पैसा, एक रुपया भी नहीं, एक दिन का एक रुपया भी नहीं, आज तो चाय भी एक रुपये में मिलती नहीं है। मैं जब चाय बेचता था तो एक रुपया भी नहीं मिलता था। लेकिन आज एक रुपये में चाय नहीं मिलती है। एक दिन का नब्‍बे पैसा, साल भर के 330 रुपये, और उसे भी ये सुरक्षा कवच मिलेगा। Natural मृत्‍यु होगा Natural अकस्‍मात नहीं हुआ है, सहज, तो भी उसके परिवार को दो लाख रुपया मिलेगा। हमने लोगों से आग्रह किया है कि रक्षाबन्‍धन के पर्व पर हमारे देश की परम्‍परा है, हम अपनी बहनों को Best सौगात देते हैं। कोई न कोई Gift देते हैं। मैं मेरे, Gulf Countries में रहने वाले मेरे प्‍यारे भाइयों बहनों का आग्रह करता हूं, इस बार रखी के त्‍यौहार पर आप अपनी बहन को ये जीवन सुरक्षा योजना दे दीजिए। अगर आप 600 रुपया बैंक में Fixed Deposit करा दोगे, तो हर साल उसको 12 रुपये से ज्‍यादा Interest मिलेगा, कटता जाएगा और आपकी बहन को दो लाख रुपये का सुरक्षा का कवच मिल जाएगा, और दोनों योजना लें लेगे, उतने पैसे जमा करा दिये, तो चार लाख रुपया उसके चरणों में आपकी तरफ से पहुंच जाएगा। भाइयो-बहनों, हमनें समाज-जीवन को एक सुरक्षित बनाना है, हमारी नई पीढ़ी को शिक्षित बनाना है, देश को आधुनिक बनाना है, और आज जब विश्‍व का भारत की तरफ आकर्षण बढ़ा है, उस परि‍स्थिति का हमने लाभ उठाना है और देश को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाना है।

मेरे प्‍यारे भाइयो, बहनों, आपने जो मुझे सम्‍मान दिया, प्‍यार दिया, पूरा हिन्‍दुस्‍तान आपको देख रहा होगा। ये बदले हुए माहौल का असर हर भारतवासी के दिल पर भी होता है। और मुझे लगता है कि विश्‍व भर में जो हमारा भारतीय समुदाय पहुंचा है, उस भारतीय समुदाय को भी आज एक नई ऊर्जा, नई शक्ति मिली है। आज जब मैं अबुधाबी आया, दुबई आया, तो कुछ बातें मेरे ध्‍यान में आई हैं, उसके विषय में भी आज आपको मैं कह करके जाना चाहता हूं, Embassy के संबंध में, Counsel के संबंध में, आपकी शिकायतें रहती हैं, नहीं रहती हैं? नहीं रहती हैं तो अच्‍छी बात है। लेकिन अगर रहती हैं तो भारत सरकार ने ‘MADAD’ नाम का एक Online Platform बनाया है, इस ‘MADAD’ नाम के Online Platform का उपयोग दुनिया भर में फैले हुए हमारे भारतीय भाई, बहन उसका उपयोग कर सकते हैं, ताकि आपकी बात आगे पहुंच सकती है। मोबाइल फोन के द्वारा भी आप उनका सम्‍पर्क कर सकते हैं। एक, दूसरा काम किया है, E-migrate portal शुरू किया गया है। जिसके द्वारा इस प्रकार सके हमारे प्रवासी भारतीयों को कोई शिकायत हो, कोई कठिनाई हो, तो उनको Emigration Office के चक्‍कर काटने नहीं पड़ेंगे ये E-migrate portal पर अपनी बात रख करके वो मदद ले सकता है, इसकी एक व्‍यवस्‍था की गई है, क्‍यों यहां दूर-दूर से आपका वहां जाना, बहुत तकलीफ होती है। मुझे ये भी बताया गया कि कही- कहीं पर E-migrate Portal का उपयेाग करने में नागरिकों को दिक्‍कत होती है इसके लिए मैंने हमारे Embassy को आदेश किया है कि वे ये जो Technical Problem है इसका 30 दिन के भीतर-भीतर Solution दें। आज 17 अगस्‍त है, 17 सितम्‍बर तक Solution दें, ऐसा मैंने उनसे कहा है और मुझे विश्‍वास है कि हमारे Embassy के भाई, ये जो Technical Problem कहीं-कहीं आता है, उसका रास्‍ता निकालेंगे।

एक और काम मैंने कहा है, यहां भारतीय समुदाय ज्‍यादातर workers हैं। उनके पास इतने पैसे नहीं कि एक जगह से दूसरी जगह पर वो भागते रहें और इसलिए हमने कहा है, कि हम समय-समय पर जहां हमारे भारतीय भाई समुदाय रहते हैं, वहां जा करके, Counselor Camp लगाएं। महीने में एक बार, दो महीने में एक बार, और वहीं जा करके उनसे बैठें, बातचीत करें, और उनकी समस्‍या के समाधान के लिए योग्‍य व्‍यवस्‍था करें। मैं यहां ये बातें इसलिए कह रहा हूं कि ये भू-भाग ऐसा है, के जहां मेरे गरीब तबके के भाई-बहन रहते हैं, मजदूरी करने के लिए यहां आए हुए हैं। अमेरिका के लिए कुछ कर पाऊं, या न कर पाऊं लेकिन अगर आपके लिए नहीं कुछ करता तो मैं बेचैन हो जाता हूं। और इसलिए हमने एक और काम किया है, इन दिनों विदेशों में कभी-कभी जाते हैं तो हमारे भारतीय भाई कभी-कभी संकट में जैसे अचानक बीमारी आ गई, कुछ हो गया, कभी कोई कानूनी पचड़े में फंस गए, बेचारे जेल चले गए। तो दुनिया के बाहर कौन उनको देखने वाला है? परिवार तो है नहीं, और इन हमारे कभी-कभी मुसीबत में कोई परिवार आ जाए तो उनकी मदद करने के लिए Indian Community Welfare Fund (ICWF) स्‍थापित किया गया है। सब दूतावासों को ये Welfare Fund दिया गया है, और इसलिए ऐसी मुसीबत में कोई फंस गया हो तो उनको कानून की मर्यादा में रह करके जो मदद हो सकती है, कोई अगर जेल में बंद हुआ है, तो कम से कम उसको खाना-पीना मिल जाए मानवता की दृष्‍टि से कोई व्‍यवस्‍था हो जाए, इन सारे कामों के लिए एक Fund की हमने व्‍यवस्‍था की है। हमने ये भी निर्णय किया है, इस Fund के द्वारा दूतावास, Counsel में Counselor सुविधाएं और अच्‍छी कैसे बनें, जो नागरिकों की भलाई के लिए हों, उनके लिए भी इसका उपयोग किया जाएगा। जिनको कानूनी सलाह की जरूरत पड़ेगी और अगर वो खुद इसको करने के लिए स्थिति नहीं है, कभी-कभार तो एक हजार-दो हजार का दंड बेचारा नहीं भर पाता, उसके कारण जेलों में सड़ता रहता है। ऐसे लोगों को मदद करके, भारतीय नागरिक होने के नाते उनको मदद करना इसके लिए Welfare Fund का उपयोग हो, ताकि वो संकटों से बाहर आ सकें, ये भी हमने व्‍यवस्‍था करने के लिए कहा है। मैं जानता हूं यहां पर स्‍कूलों में Admission में कितनी दिक्‍कत होती है, आपके बच्‍चों को स्‍कूलों में पढ़ाई की कितनी दिक्‍कत होती है? मैंने यहां के संबंधित लोगों से ये बात कही है और मैंने कहा है कि अधिक स्‍कूल कैसे बनें, उसकी चिन्‍ता मैंने की है, देखते हैं, मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में उसका भी लाभ आप लोगों को मिलेगा।

मुझे विश्‍वास है मेरे भाइयो, बहनों, कि जो आपकी छोटी-मोटी बातें मेरे ध्‍यान में आई थीं, इसको पूरा करने का मैंने प्रयास किया है। मैं फिर एक बार आप सबको दृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और दुनिया में कहीं पर भी मेरा भारतवासी है, तो हम पासपोर्ट का रंग नहीं देखते हैं। हमारा खून का रंग काफी है, वो धरती का नाता काफी है, और इसलिए आइए मेरे साथियो हम सब मिल करके जहां भी हों, मां भारती का माथा ऊंचा करने के लिए, गौरव से जीवन जीने के लिए एक माहौल बनाने में सक्रिय शरीक हों और आपका योगदान आपकी शक्ति सामर्थ्‍यवान आपके परिवार को भी भला करने में काम आए, देश का भी भला करने के लिए काम आए।

इसी शुभ कामनाओं के साथ आप सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

मेरे साथ दोनों मुट्ठी बंद करके बोलिए, भारत माता की जय। दोनों मुट्ठी पूरी बंद करके पूरी ताकत से बोलिए, भारत के कोने-कोने में, आपके अपने गांव में आवाज पहुंचनी चाहिए भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

दान
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हमें सदन में रुकावटों की बजाय संवाद का रास्ता चुनना चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी
November 18, 2019
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राज्यसभा उन लोगों को चुनावी राजनीति से दूर राष्ट्र के विकास में योगदान करने का अवसर देती है: प्रधानमंत्री मोदी
हमें सदन में रुकावटों की बजाय संवाद का रास्ता चुनना चाहिए, एनसीपी-बीजेडी की विशेषता है कि दोनों ने तय किया है कि वो लोग सदन के वेल में नहीं जाएंगे: पीएम मोदी
राज्यसभा की विशेषता है कि उसका स्थायित्व और उसकी विविधता: प्रधानमंत्री

आदरणीय सभापति जी और सम्‍मानीय गृह, आपके माध्‍यम से इस 250वें सत्र के निमित्‍त मैं यहां मौजूद सभी सासंदों को बहुत-बहुत बधाई देता हूं, लेकिन इस 250 सत्रों के दरम्‍यान ये जो यात्रा चली है, अब तक जिन-जिन ने योगदान दिया है, वे सभी अभिनंदन के अधिकारी हैं, मैं उनका भी आदरपूर्वक स्‍मरण करता हूं।

सभापति जी, आप जब बहुत ही articulate way में दो अलग-अलग घटनाओं को जोड़ करके अभी प्रस्‍तुत कर रहे थे, मुझे जरूर लगता है कि देश में जो लोग लेखन के शौकीन हैं, वे जरूर इस पर अब गौर करेंगे, लिखेंगे कि 250 सत्र, यह अपने-आप में समय व्‍यतीत हुआ ऐसा नहीं है; एक विचार यात्रा भी रही है। जैसा आपने कहा कि कभी एक बिल ऐसा आया था तो जाते-जाते उसी के बिल्कुलअलग सा नया बिलइस प्रकार से आया। समय बदलता गया, परिस्थितियां बदलती गईं और इस सदन ने बदली हुई परिस्थितियों को आत्‍मसात करते हुए अपने को ढालने का प्रयास किया। मैं समझता हूं यह बहुत बड़ी चीज है और इसके लिए सदन के सभी सदस्‍य जिन्‍होंने तब तक काम किया, बधाई के पात्र हैं, वरना किसी को लग सकता है भई 20 साल पहले मैंने तो ये stand लिया था अब मैं stand कैसे बदल सकता हूं। लेकिन आपने जिस प्रकार से articulate करके इस बात को प्रस्‍तुत किया, वह हमारी विचार यात्रा का प्रतिबिम्‍ब है, भारत की विकास यात्रा का प्रतिबिम्‍ब है और वैश्विक परिवेश में भारत किस प्रकार से नई-नई बातों को लीड करने का सामर्थ्‍य रखता है, उसका उसमें प्रतिबिम्‍ब है। और ये काम इस सदन से हुआ है, इसलिए सदन अपने-आप में गौरव अनुभव करता है।

मेरे लिए सौभाग्‍य का विषय है कि आज इस महत्‍वपूर्ण अवसर का साक्षी बनने का और इसमें शरीक होने का मुझे अवसर मिला है। ये साफ कह सकते हम कि कभी चर्चा चल रही थी संविधान निर्माताओं के बीच में कि सदन एक हो या दो हों, लेकिन अनुभव कहता है कि संविधान निर्माताओं ने जो व्‍यवस्‍था दी, वो कितनी उपयुक्‍त रही है और कितना बढ़िया contribution किया है। अगर निचला सदन जमीन से जुड़ा हुआ है तो ऊपरी सदन दूर तक देख सकता है। और इस प्रकार से भारत की विकास यात्रा में निचले सदन से जमीन से जुड़ी हुई तत्‍कालीन चीजों का अगर प्रतिबिम्‍ब व्‍यक्‍त होता है तो यहां बैठे हुए महानुभावों से क्‍योंकि ऊपर है, ऊपर वाला जरा दूर का देख सकता है, तो दूर की दृष्टि का भी अनुभव, इन दोनों का combination इन हमारे दोनों सदनों से हमको देखने को मिलता है।

इस सदन ने कई ऐतिहासिक पल देखे हैं। इतिहास बनाया भी है और बनते हुए इतिहास को देखा भी है और जरूरत पड़ने पर उस इतिहास को मोड़ने में भी इस सदन ने बहुत बड़ी सफलता पाई है। उसी प्रकार से इस देश के गणमान्‍य दिग्‍गज महापुरुषों ने इस सदन का नेतृत्‍व किया है, इस सदन में सहभागिता की है और इसके कारण हमारे देश की इस विकास यात्रा को और आजादी के बाद की बहुत सी चीजें गढ़नी थीं। अब तो 50-60 साल के बाद बहुत सी चीजों ने शेप ले ली है, लेकिन वो शुरूआत काल में fear of unknown से हमें गुजरना पड़ता था। उस समय जिस maturity के साथ सबने नेतृत्‍व किया है, दिया है; ये अपने-आप में बहुत बड़ी बात है।

आदरणीय सभापति जी ये सदन की बड़ी विशेषता है और दो पहलू खास हैं- एक तो उसका स्‍थायित्‍व permanent कहें या eternal कहें, और दूसरा है विविधता diversity. स्‍थायित्‍व इसलिए है, eternal इसलिएहै कि लोकसभा तो भंग होती है, इसका जन्‍म हुआ न अब तक कभी भंग हुई है न भंग होना है, यानी ये eternal है। लोग आएंगे, जाएंगे लेकिन ये व्‍यवस्‍था eternal रहती है। ये अपनी उसकी एक विशेषता है। और दूसरा है विविधता- क्‍योंकि यहां राज्‍यों का प्रतिनिधित्‍व प्राथमिकता है। एक प्रकार से भारत के फेडरल स्ट्रक्चर की आत्‍मा यहां पर हर पल हमें प्रेरित करती है। भारत की विविधता, भारत के अनेकता में एकता के जो सूत्र है, उसकी सबसे बड़ी ताकत इस सदन में नजर आती है और वो समय-समय पर ये reflect भी होती रहती है। उसी प्रकार से उन विविधताओं के साथ हम जब आगे बढ़ते हैं तब, इस सदन का एक और लाभ भी है कि हर किसी के लिए चुनावी अखाड़ा पार करना बहुत सरल नहीं होता है, लेकिन देश हित में उनकी उपयोगिता कम नहीं होती है। उनका अनुभव, उनका सामर्थ्‍य उतना ही मूल्‍यवान होता है। तो ये एक ऐसी जगह है कि जहां इस प्रकार के सामर्थ्‍यवान महानुभाव, भिन्‍न-भिन्‍न क्षेत्रों के अनुभवी लोग, उनका लाभ देश के राजनीतिक जीवन को, देश के नीति-निर्धारण के अंदर उनका बहुत बड़ा लाभ मिलता है और समय-समय पर मिला है। वैज्ञानिक हों, खेल जगत के लोग हों, कला जगत के लोग हों, कलम के धनी हों, ऐसे अनेक महानुभावों का लाभ जिनके लिए चुनावी अखाड़े से निकल करके आना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन इस व्‍यवस्‍था के कारण हमारी इस बौद्धिक संपदा की भी एक richness हमें इससे प्राप्‍त हुई है।

और इन 250 सत्रों में और मैं मानता हूं इसका सबसे बड़ा उदाहरण बाबा साहेब अम्‍बेडकर स्‍वयं हैं। क्‍योंकि किसी न किसी कारण से उनको लोकसभा में पहुंचने नहीं दिया गया। लेकिन यही तो राज्‍यसभा थी जहां बाबा साहेब अम्‍बेडकर के कारण देश को बहुत लाभ मिला और इसलिए हम इस बात पर गर्व करते हैं कि ये सदन है जहां से देश को बाबा साहेब अम्‍बेडकर जैसे अनेक महापुरुषों का हमें बहुत ही लाभ मिला। ये भी देखा गया है कि एक लंबा कालखंड ऐसा था कि जहां विपक्ष जैसा कुछ खास नहीं था, विरोध भाव भी बहुत कम था- ऐसा एक बहुत बड़ा कालखंड रहा है। और उस समय जो शासन व्‍यवस्‍था में जो लोग बैठे थे उनका वो एक सौभाग्‍य रहा कि उनको इसका बहुत बड़ा सौभाग्‍य भी मिला जो आज नहीं है। आज डगर-डगर पर संघर्ष रहते हैं, डगर-डगर पर विरोध भाव व्‍यक्‍त रहता है। लेकिन उस समय जबकि विरोध पक्ष न के बराबर था, इस सदन में ऐसे बहुत ही अनुभवी और विद्वान लोग बैठे थे कि उन्‍होंने शासन व्‍यवस्‍था में कभी भी निरंकुशता नहीं आने दी। शासन में बैठे हुए लोगों को सही दिशा में जाने के लिए प्रेरित करने के कठोर काम इसी सदन में हुए हैं। ये एक यानी कितनी बड़ी सेवा हुई है, इसका हम गर्व कर सकते हैं और ये हम सबके लिए‍ स्‍मरणीय है।

आदरणीय सभापति जी, हमारे प्रथम उप-राष्‍ट्रपति जी डॉक्‍टर सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन जी ने इस सदन के संबंध में जो बात कही थी, मैं उसको आपके सामने प्रस्‍तुत करना चाहूंगा। डॉक्‍टर राधाकृष्‍णन जी ने कहा था, इसी चेयर पर बैठकर उन्‍होंने कहा था और वो आज भी उतना ही उपयुक्‍त है। और आप आदरणीय प्रणब मुखर्जी की बात का उल्‍लेख करते हों या स्‍वयं अपना दर्द व्‍यक्‍त करते हों, ये सारी बातें उसमें हैं और उस समय राधा कृष्‍णन जी ने कहा था- हमारे विचार, हमारा व्‍यवहार, और हमारी सोच ही दो सदनों वाली हमारी संसदीय प्रणाली के औचित्‍यको साबित करेगी। संविधान का हिस्‍सा बनी इस द्विसदनीय व्‍यवस्‍था की परीक्षा हमारे कामों से होगी। हम पहली बार अपनी संसदीय प्रणाली में दो सदनों की शुरूआत कर रहे हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम अपनी सोच, सामर्थ्‍य और समझ से देश को इस व्‍यवस्‍था का औचित्‍य साबित करें।

250 सत्र की यात्रा के बाद, अनुभव का इतना संपूर्ण होने के बाद वर्तमान की ओर आने वाली पीढ़ियों का दायित्‍व और बढ़ जाता है कि डॉक्‍टर राधाकृष्‍णन जी ने जो अपेक्षा की थी, कहीं हम उससे नीचे तो नहीं जा रहे हैं, क्‍या हम उन अपेक्षाओं को पूरा कर रहे हैं, या बदलते हुए युग में हम उन अपेक्षाओं को भी और अच्‍छा value addition कर रहे हैं, ये सोचने का समय है। और मुझे विश्‍वास है कि सदन की वर्तमान पीढ़ी भी और आने वाली पीढ़ी भी डॉक्‍टर राधाकृष्‍णन जी की अपेक्षाओं को पूर्ण करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहेगी और उसे आने वाले दिनों में देश को...।

अगर अब, जैसा अभी आदरणीय सभापति जी ने कहा, अगर हम पिछले 250 सत्रों की विवेचना करें तो कई महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक बिल यहां पास हुए हैं जो एक प्रकार से देश के कानून बने, देश के जीवन को चलाने का आधार बने हैं। और मैं भी पिछले अगर पांच साल का हिसाब-किताब देखूं तो मेरे लिए बड़े सौभाग्‍य की बात है कि ऐसी अनेक महत्‍वपूर्ण घटनाओं का साक्षी बनने का अवसर मुझे भी मिला है। विद्ववतापूर्ण हर किसी के विचार सुनने कामुझे सौभाग्‍य मिला है और कई बातों को नए सिरे से देखने का अवसर इसी सदन से मिला है। और इसके लिए मैं खुद लाभान्वित हुआ हूं, और मैं सबका आभारी भी हूं और ये अगर हम चीजों को अगर सीखें, समझें तो बहुत कुछ मिलता है और वो मैंने यहां अनुभव किया है। तो मेरे लिए आप सबके बीच कभी-कभी आ करके सुनने का मौका मिलता है, वो अपने-आप में एक सौभाग्‍य है।

अगर हम पिछले पांच साल की ओर देखें, यही सदन है जिसने तीन तलाक का कानून होगा कि नहीं होगा, हरेक को लगता था यहीं पर अटक जाएगा, लेकिन इसी सदन की maturity है कि उसने एक बहुत बड़ा महत्‍वपूर्ण women empowerment का काम इसी सदन में किया गया। हमारे देश में आरक्षण का विरोध करके हर पल संघर्ष के बीज बोए गए हैं। उसमें से तनाव पैदा करने के भरसक प्रयास भी किए गए हैं। लेकिन ये गर्व की बात है कि इसी सदन ने सामान्‍य वर्ग के गरीब परिवार का दस प्रतिशत आरक्षण का निर्णय किया, लेकिन देश में कहीं तनाव नहीं हुआ, विरोध भाव पैदा नहीं हुआ, सहमति का भाव बना, ये भी इसी सदन के कारण संभव हुआ है।

इस प्रकार से हम जानते हैं जीएसटी- लंबे अर्से से जो भी कोई, शासन में जिसकी जिम्‍मेदारी है, हरेक ने मेहनत की। कमियां हैं, नहीं है, सुधरनी चाहिए-नहीं सुधरनी चाहिए- ये सारी debate चलती रही लेकिन One Nation One Tax System की ओर इसी सदन ने सर्व-सम्‍मति बना करके देश को दिशा देने का काम किया है और उसी के कारण एक नए विश्‍वास के साथ विश्‍व में हम अपनी बात रख पा रहे हैं।

देश की एकता और अखंडता- इसी सदन में 1964 में जो वादे किए गए थे कि एक साल के भीतर-भीतर इस काम को कर दिया जाएगा, जो नहीं हो पाया था; वो धारा 370 और 35(ए) इसी सदन में और देश को दिशा देने का काम इस सदन में पहले किया बाद में लोकसभा ने किया है और इसलिए ये सदन अपने-आप में देश की एकता-अखंडता के लिए इतने महत्‍वपूर्ण निर्णय के अंदर इतनी जो भूमिका अदा की है, वो अपने आप में। और ये भी एक विशेषता है कि इस सदन इस बात के लिए जिस बात को याद करेगा कि संविधान के अंदर धारा 370 आई, उसको introduce करने वाले मिस्‍टर एन गोपालास्‍वामी, वो इस सदन के प‍हले नेता थे, फर्स्‍ट लीडर थे वो, तो उन्‍होंने इसको रखा था और इसी सदन ने उसको निकालने का काम भी बड़े गौरव के साथ करके- वो एक घटना अब एक इतिहास बन चुकी है, लेकिन यहीं पर हुआ है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने हमको जो दायित्‍व दिया है, हमारी प्राथमिकता है कल्‍याणकारी राज्‍य, लेकिन उसके साथ एक जिम्‍मेदारी है- राज्‍यों का कल्‍याण। यानी भारत as such हम कल्‍याणकारी राज्‍य के रूप में काम करें लेकिन at the same time हम लोगों का दायित्‍व है- राज्‍यों का भी कल्‍याण। और ये दोनों मिल करके, राज्‍य और केन्‍द्र मिल करके ही देश को आगे बढ़ा सकते हैं और उस काम को करने में इस सदन ने क्‍योंकि ये राज्‍य का representation पूरी ताकत के साथ करते हैं, बहुत बड़ी भूमिका निभाई है और हमारी संवैधानिक संस्‍थाओं को ताकत देने का भी हमने काम किया है। हमारा संघीय ढांचा, हमारा देश के विकास के लिए अहम शर्त है और राज्‍य और केंद्र सरकारें मिल करके काम करें, तभी प्रगति संभव होती है।

राज्‍यसभा इस बात को सुनिश्चित करती है कि देश में केंद्र और राज्‍य सरकारें प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। लेकिन हम प्रतिभागी बन करके, सहभागी बन करके देश को आगे ले जाने का काम करते हैं। यहां जिन विचारों का आदान-प्रदान होता है, उसका जो अर्क है, जो यहां के प्रतिनिधि अपने राज्‍य में ले जाते हैं, अपने राज्‍य की सरकारों को बताते हैं। राज्‍य की सरकारों को उसके साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करने का काम जाने-अनजाने भी सतर्क रूप में हमें करने की आवश्‍यकता होती है।

देश का विकास और राज्‍यों का विकास- ये दो अलग चीजें नहीं हैं। राज्‍य के विकास के बिना देश का विकास संभव नहीं है और देश के विकास का नक्‍शा राज्‍यों के विकास के विपरीत होगा, तो भी राज्‍य विकास नहीं कर पाएंगे। और इन बातों को ये सदन सबसे ज्‍यादा प्रतिबिम्बित करता है, जीवंतता के साथ प्रतिबिम्बित करता है। बहुत सी नीतियां केंद्र सरकार बनाती है। उस नीतियों में राज्‍यों की अपेक्षाएं, राज्‍यों की स्थिति, राज्‍यों का अनुभव, राज्‍यों की रोजमर्रा की दिक्‍कतें- उन बातों को सरकार के नीति-निर्धारण में बहुत ही सटीक तरीके से कोई ला सकता है तो ये सदन ला सकता है, इस सदन के सदस्‍य लाते हैं। और उसी का लाभ federal structure को भी मिलता है। सब काम एक साथ होने वाले नहीं हैं, कुछ काम इस पांच साल होंगे तो कुछ अगले पांच साल होंगे, लेकिन दिशा तय होती है और वो काम यहां से हो रहा है, यह अपने-आप में...।

आदरणीय सभापति जी, 2003 में जब इस सदन के 200 साल हुए थे, तब भी एक समारंभ हुआ था और तब भी सरकार एनडीए की थी और अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। तो उस 200वें सत्र के समय आदरणीय अटलजी का जो भाषण था, बड़ा interesting था। उनका बात करने का अपना एक लहजा था। उन्‍होंने कहा था कि हमारे संसदीय लोकतंत्र की शक्ति बढ़ाने के लिए second chamber मौजूद है और उन्‍होंने ये भी चेतावनी दी थी कि second house को कोई secondary house बनाने की गलती न करें। ये चेतावनी अटलजी ने दी थी कि second house को कभी भी secondary house बनाने की गलती न करें।

अटलजी की उन बातों को जब मैं पढ़ रहा था तो मुझे भी लगा कि इसको आज के संबंध में कुछ नए तरीके से अगर प्रस्‍तुत करना है तो मैं कहूंगा कि राज्‍यसभा second house है, secondary house कभी भी नहीं है और भारत के विकास के लिए इसे supportive house बने रहना चाहिए।

जब हमारी संसदीय प्रणाली के 50 साल हुए तब अटलजी का एक भाषण हुआ था, संसदीय प्रणाली के 50 साल पर और उस भाषण में बड़े कवि भाव से उन्‍होंने एक बात बताई थी। उन्‍होंने कहा था- एक नदी का प्रवाह तभी तक अच्‍छा रहता है जब तक कि उसके किनारे मजबूत होते हैं। और उन्‍होंने कहा था कि भारत का संसदीय जो प्रवाह है वो हमारा जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया है- एक किनारा लोकसभा है, दूसरा किनारा राज्‍यसभा है। ये दो मजबूत रहेंगे, तभी जा करके लोकतांत्रिक परम्‍पराओं का प्रवाह बहुत ही सटीक तरीके से आगे बढ़ेगा। ये बात आदरणीय अटलजी ने उस समय कही थी।

ये एक बात निश्चित है कि भारत federal structure है, विविधताओं से भरा हुआ है, तब ये भी अनिवार्य शर्त है कि हमें राष्‍ट्रीय दृष्टिकोण से ओझल नहीं होना है। राष्‍ट्रीय दृष्टिकोण को हमें हमेशा केंद्रवर्ती रखना ही होगा। लेकिन हमें राष्‍ट्रीय दृष्टिकोण के साथ क्षेत्रीय जो हित है इसका संतुलन भी बहुत सटीक तरीके से बनाना पड़ेगा, तभी जा करके हम उस भाव को, उस संतुलन के द्वारा आगे बढ़ा पाएंगे। और ये काम सबसे अच्‍छे ढंग से कहीं हो सकता है तो इस सदन में हो सकता है, यहां के माननीय सदस्‍यों के द्वारा हो सकता है और मुझे विश्‍वास है कि वो काम करने में हम निरंतर प्रयासरत हैं।

राज्‍यसभा एक प्रकार से checks and balance का विचार उसके मूल सिद्धांतों के लिए बहुत ही महत्‍वपूर्ण है। लेकिन checking और clogging, इसके बीच अंतर बनाए रखना बहुत आवश्‍यक होता है। Balance and blocking, इसके बीच भी हमें बैलेंस बनाए रखना बहुत आवश्‍यक होता है। एक प्रकार से हमारे अनेक महानुभाव ये बात बार-बार कहते हैं कि भई सदन चर्चा के लिए होना चाहिए, संवाद के लिए होना चाहिए, विचार-विमर्श के लिए होना चाहिए। तीखे से तीखे स्‍वर में विवाद हो, कोई उससे नुकसान होने वाला नहीं है, लेकिन आवश्‍यक है कि रुकावटों के बजाय हम संवाद का रास्‍ता चुनें।

मैं आज, हो सकता है मैं जिनका उल्‍लेख कर रहा हूं, इसके सिवाय भी लोग होंगे, लेकिन मैं दो दलों का आज मैं उल्‍लेख करना चाहूंगा- एक एनसीपी और दूसरा बीजेडी। और किसी का नाम छूट जाए तो मुझे क्षमा करना, लेकिन मैं दो का उल्‍लेख कर रहा हूं। इन दोनों दलों की विशेषता देखिए- उन्‍होंने खुद ने discipline तय किया है कि हम well में नहीं जाएंगे और मैं देख रहा हूं कि एक बार भी उनके एक भी सदस्‍य ने नि‍यम को तोड़ा नहीं है। हम सभी राजनीतिक दलों को सीखना होगा कि including my party. हम सबको सीखना होगा कि ये नियम का पालन करने के बावजूद भी न एनसीपी की राजनीतिक विकास यात्रा में कोई रुकावट आई है और बीजेडी की राजनीतिक विकास यात्रा में रुकावट आई है। मतलब well में न जा करके भी लोगों के दिल जीत सकते हैं, लोगों का विश्‍वास जीत सकते हैं। ये और इसलिए मैं समझता हूं including treasury bench हम लोगों ने ऐसी जो उच्‍च परम्‍पराएं जिन्‍होंने निर्माण की हैं, उनका कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ है, क्‍यों न हम उनसे कुछ सीखें। हमारे सामने वो मौजूद हैं और मैं चाहूंगा कि हम भी वहां बैठे तो हमने भी वो काम किया है। और इसलिए मैं इस सारे सदन के लिए कह रहा हूं कि हम एनसीपी, बीजेडी- दोनों ने जो ये बहुत उत्‍तम तरीके से इस चीज को discipline follow किया, ये जो कभी न कभी इसकी चर्चा भी होनी चा‍हिए, उनका धन्‍यवाद करना चाहिए। और मैं मानता हूं आज जब 250 सत्र कर रहे हैं तो ऐसी उत्‍तम जो घटना है, उसका जिक्र होना चाहिए और लोगों के ध्‍यान में लानी चाहिए।

मुझे विश्‍वास है कि सदन की गरिमा की दिशा में जो भी आवश्‍यक है उसको करने में सभी सदस्‍य अपनी भूमिका अदा करते रहते हैं। आपकी वेदना, व्‍यथा प्रकट होती रहती है। हम सब कोशिश करेंगे, इस 250वें सत्र पर हम सब संकल्‍प लेंगे, विशेष करके हम लोग भी लेंगे ताकि आपको कम से कम कष्‍ट हो, आपकी भावनाओं का आदर हो और आप जैसा चाहते हैं वैसा ही ये सदन चलाने में हम आपके साथी बन करके सारे discipline को follow करते हुए करने का प्रयास करें।

इस संकल्‍प के साथ मैं फिर एक बार इस महत्‍वपूर्ण पड़ाव पर सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। और जिन्‍होंने यहां तक पहुंचाया है, उन सबका धन्‍यवाद करते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।