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At Simhasth Kumbh convention, we are seeing birth of a new effort: PM
We belong to a tradition where even a Bhikshuk says, may good happen to every person: PM
We should tell the entire world about the organising capacity of an event like the Kumbh: PM
Lets hold Vichar Kumbh every year with devotees...discuss why we need to plant trees, educate girl child: PM

हम लोगों का एक स्वभाव दोष रहा है, एक समाज के नाते कि हम अपने आपको हमेशा परिस्थितियों के परे समझते हैं। हम उस सिद्धांतों में पले-बढ़े हैं कि जहां शरीर तो आता और जाता है। आत्मा के अमरत्व के साथ जुड़े हुए हम लोग हैं और उसके कारण हमारी आत्मा की सोच न हमें काल से बंधने देती है, न हमें काल का गुलाम बनने देती है लेकिन उसके कारण एक ऐसी स्थिति पैदा हुई कि हमारी इस महान परंपरा, ये हजारों साल पुरानी संस्कृति, इसके कई पहलू, वो परंपराए किस सामाजिक संदर्भ में शुरू हुई, किस काल के गर्भ में पैदा हुई, किस विचार मंथन में से बीजारोपण हुआ, वो करीब-करीब अलब्य है और उसके कारण ये कुंभ मेले की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई होगी उसके विषय में अनेक प्रकार के विभिन्न मत प्रचलित हैं, कालखंड भी बड़ा, बहुत बड़ा अंतराल वाला है।

कोई कहेगा हजार साल पहले, कोई कहेगा 2 हजार साल पहले लेकिन इतना निश्चित है कि ये परंपरा मानव जीवन की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्थाओं में से एक है। मैं अपने तरीक से जब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि कुंभ का मेला, वैसे 12 साल में एक बार होता है और नासिक हो, उज्जैन हो, हरिद्वार हो वहां 3 साल में एक बार होता है प्रयागराज में 12 साल में एक बार होता है। उस कालखंड को हम देखें तो मुझे लगता है कि एक प्रकार से ये विशाल भारत को अपने में समेटने का ये प्रयास ये कुंभ मेले के द्वारा होता था। मैं तर्क से और अनुमान से कह सकता हूं कि समाज वेदता, संत-महंत, ऋषि, मुनि जो हर पल समाज के सुख-दुख की चर्चा और चिंता करते थे। समाज के भाग्य और भविष्य के लिए नई-नई विधाओं का अन्वेषण करते थे, Innovation करते थे। इन्हें वे हमारे ऋषि जहां भी थे वे बाह्य जगत का भी रिसर्च करते थे और अंतर यात्रा को भी खोजने का प्रयास करते थे तो ये प्रक्रिया निरंतर चलती रही, सदियों तक चलती रही, हर पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही लेकिन संस्कार संक्रमण का काम विचारों के संकलन का काम कालानुरूप विचारों को तराजू पर तौलने की परंपरा ये सारी बातें इस युग की परंपरा में समहित थी, समाहित थी।

एक बार प्रयागराज के कुंभ मेले में बैठते थे, एक Final decision लिया जाता था सबके द्वारा मिलकर के कि पिछले 12 साल में समाज यहां-यहां गया, यहां पहुंचा। अब अगले 12 साल के लिए समाज के लिए दिशा क्या होगी, समाज की कार्यशैली क्या होगी किन चीजों की प्राथमिकता होगी और जब कुंभ से जाते थे तो लोग उस एजेंडा को लेकर के अपने-अपने स्थान पर पहुंचते थे और हर तीन साल के बाद जबकि कभी नासिक में, कभी उज्जैन में, कभी हरिद्वार में कुंभ का मेला लगता था तो उसका mid-term appraisal होता था कि भई प्रयागराज में जो निर्णय हम करके गए थे तीन साल में क्या अनुभव आया और हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोग आते थे।

30 दिन तक एक ही स्थान पर रहकर के समाज की गतिविधियों, समाज की आवश्यकताएं, बदलता हुआ युग, उसका चिंतन-मनन करके उसमें फिर एक बार 3 साल का करणीय एजेंडा तय होता था। In the light of main Mahakumbh प्रयागराज में होता था और फिर 3 साल के बाद दूसरा जब कुंभ लगता था तो फिर से Review होता था। एक अद्भुत सामाजिक रचना थी ये लेकिन धीरे-धीरे अनुभव ये आता है कि परंपरा तो रह जाती है, प्राण खो जाता है। हमारे यहां भी अनुभव ये आया कि परंपरा तो रह गई लेकिन समय का अभाव है, 30 दिन कौन रहेगा, 45 दिन कौन रहेगा। आओ भाई 15 मिनट जरा डुबकी लगा दें, पाप धुल जाए, पुण्य कमा ले और चले जाए।

ऐसे जैसे बदलाव आय उसमें से उज्जैन के इस कुंभ में संतों के आशीर्वाद से एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है और ये नया प्रयास एक प्रकार से उस सदियों पुरानी व्यवस्था का ही एक Modern edition है और जिसमें वर्तमान समझ में, वैश्विक संदर्भ में मानव जाति के लिए क्या चुनौतियां हैं, मानव कल्याण के मार्ग क्या हो सकते हैं। बदलते हुए युग में काल बाह्य चीजों को छोड़ने की हिम्मत कैसे आए, पुरानी चीजों को बोझ लेकर के चलकर के आदमी थक जाता है। उन पुरानी काल बाह्य चीजों को छोड़कर के एक नए विश्वास, नई ताजगी के साथ कैसे आगे बढ़ जाए, उसका एक छोटा सा प्रयास इस विचार महाकुंभ के अंदर हुआ है।

जो 51 बिंदु, अमृत बिंदु इसमें से फलित हुए हैं क्योंकि ये एक दिन का समारोह नहीं है। जैसे शिवराज जी ने बताया। देश औऱ दुनिया के इस विषय के जानकार लोगों ने 2 साल मंथन किया है, सालभर विचार-विमर्श किया है और पिछले 3 दिन से इसी पवित्र अवसर पर ऋषियों, मुनियों, संतों की परंपरा को निभाने वाले महान संतों के सानिध्य में इसका चिंतन-मनन हुआ है और उसमें से ये 51 अमृत बिंदु समाज के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। मैं नहीं मानता हूं कि हम राजनेताओं के लिए इस बात को लोगों के गले उतारना हमारे बस की बात है। हम नहीं मानते हैं लेकिन हम इतना जरूर मानते हैं कि समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग चाहे वो गेरुए वस्त्र में हो या न हो लेकिन त्याग और तपस्था के अधिष्ठान पर जीवन जीते हैं। चाहे एक वैज्ञानिक अपनी laboratory में खपा हुआ हो, चाहे एक किसान अपने खेत में खपा हुआ हो, चाहे एक मजदूर अपना पसीना बहा रहा हे, चाहे एक संत समाज का मार्गदर्शन करता हो ये सारी शक्तियां, एक दिशा में चल पड़ सकती हैं तो कितना बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं और उस दिशा में ये 51 अमृत बिंदु जो है आने वाले दिनों में भारत के जनमानस को और वैश्विक जनसमूह को भारत किस प्रकार से सोच सकता है और राजनीतिक मंच पर से किस प्रकार के विचार प्रभाग समयानुकूल हो सकते हैं इसकी चर्चा अगर आने वाले दिनों में चलेगी, तो मैं समझता हूं कि ये प्रयास सार्थक होगा।


हम वो लोग हैं, जहां हमारी छोटी-छोटी चीज बड़ी समझने जैसी है। हम उस संस्कार सरिता से निकले हुए लोग हैं। जहां एक भिक्षुक भी भिक्षा मांगने के लिए जाता है, तो भी उसके मिहिल मुंह से निकलता है ‘जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला’। ये छोटी बात नहीं है। ये एक वो संस्कार परम्परा का परिणाम है कि एक भिक्षुक मुंह से भी शब्द निकलता है ‘देगा उसका भी भला जो नहीं देगा उसका भी भला’। यानी मूल चिंतन तत्वभाव यह है कि सबका भला हो सबका कल्याण हो। ये हर प्रकार से हमारी रगों में भरा पड़ा है। हमी तो लोग हैं जिनको सिखाया गया है। तेन तत्तेन भूंजीथा। क्या तर के ही भोगेगा ये अप्रतीम आनन्द होता है। ये हमारी रगों में भरा पड़ा है। जो हमारी रगों में है, वो क्या हमारे जीवन आचरण से अछूता तो नहीं हो रहा है। इतनी महान परम्परा को कहीं हम खो तो नहीं दे रहे हैं। लेकिन कभी उसको जगजोड़ा किया जाए कि अनुभव आता है कि नहीं आज भी ये सामर्थ हमारे देश में पड़ा है।

किसी समय इस देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश को आहवान किया था कि सप्ताह में एक दिन शाम का खाना छोड़ दीजिए। देश को अन्न की जरूरत है। और इस देश के कोटी-कोटी लोगों ने तेन त्यक्तेन भुंजीथा इसको अपने जीवन में चरितार्थ करके, करके दिखाया था। और कुछ पीढ़ी तो लोग अभी भी जिन्दा हैं। जो लालबहादुर शास्त्री ने कहा था। सप्ताह में एक दिन खाना नहीं खाते हैं। ऐसे लोग आज भी हैं। तेन त्यक्तेन भुंजीथा का मंत्र हमारी रगों में पला है। पिछले दिनों में ऐसे ही बातों-बातों में मैंने पिछले मार्च महीने में देश के लोगों के सामने एक विषय रखा था। ऐसे ही रखा था। रखते समय मैंने भी नहीं सोचा था कि मेरे देश के जनसामान्य का मन इतनी ऊंचाइयों से भरा पड़ा है। कभी-कभी लगता है कि हम उन ऊंचाईयों को पहुंचने में कम पड़ जाते हैं। मैंने इतना ही कहा था। अगर आप सम्पन्न हैं, आप समर्थ हैं, तो आप रसोई गैस की सब्सिडी क्या जरूरत है छोड़ दीजिये न। हजार-पंद्रह सौ रुपये में क्या रखा है। इतना ही मैंने कहा था। और आज मैं मेरे देश के एक करोड़ से ज्यादा परिवारों के सामने सर झुका कर कहना चाहता हूं और दुनिया के सामने कहना चाहता हूं। एक करोड़ से ज्यादा परिवारों ने अपनी गैस सब्सिडी छोड़ दी। तेन त्यक्तेन भुंजीथा । और उसका परिणाम क्या है। परिणाम शासन व्यवस्था पर भी सीधा होता है। हमारे मन में विचार आया कि एक करोड़ परिवार गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ रहे हैं तो इसका हक़ सरकार की तिजोरी में भरने के लिये नहीं बनता है।

ये फिर से गरीब के घर में जाना चाहिए। जो मां लकड़ी का चूल्हा जला कर के एक दिन में चार सौ सिगरेट जितना धुआं अपने शरीर में ले जाती है। उस मां को लकड़ी के चूल्हे से मुक्त करा के रसोई गैस देना चाहिए और उसी में से संकल्प निकला कि तीन साल में पांच करोड़ परिवारों को गैस सिलेंडर दे कर के उनको इस धुएं वाले चूल्हे से मुक्ति दिला देंगे।

यहाँ एक चर्चा में पर्यावरण का मुद्दा है। मैं समझता हूं पांच करोड़ परिवारों में लकड़ी का चूल्हा न जलना ये जंगलों को भी बचाएगा, ये कार्बन को भी कम करेगा और हमारी माताओं को गरीब माताओं के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन लाएगा। यहां पर नारी की एम्पावरमेंट की बात हुई नारी की dignity की बात हुई है। ये गैस का चूल्हा उसकी dignity को कायम करता है। उसकी स्वास्थ्य की चिंता करता है और इस लिए मैं कहता हूं - तेन त्यक्तेन भुंजीथा । इस मंत्र में अगर हम भरोसा करें। सामान्य मानव को हम इसका विश्वास दिला दें तो हम किस प्रकार का परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं। ये अनुभव कर रहे हैं।

हमारा देश, मैं नहीं मानता हूं हमारे शास्त्रों में ऐसी कोई चीज है, जिसके कारण हम भटक जाएं। ये हमलोग हैं कि हमारी मतलब की चीजें उठाते रहते हैं और पूर्ण रूप से चीजों को देखने का स्वभाव छोड़ दिया है। हमारे यहां कहा गया है – नर करनी करे तो नारायण हो जाए - और ये हमारे ऋषियों ने मुनियों ने कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर भक्ति करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर कथा करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा। संतों ने भी कहा हैः नर करनी करे तो नारायण हो जाए और इसीलिए ये 51 अमृत बिन्दु हमारे सामने है। उसका एक संदेश यही है कि नर करनी करे तो नारायण हो जाए। और इसलिए हम करनी से बाध्य होने चाहिए और तभी तो अर्जुन को भी यही तो कहा था योगः कर्मसु कौशलम्। यही हमारा योग है, जिसमें कर्म की महानता को स्वीकार किया गया है और इसलिए इस पवित्र कार्य के अवसर पर हम उस विचार प्रवाह को फिर से एक बार पुनर्जीवित कर सकते हैं क्या तमसो मा ज्योतिरगमय। ये विचार छोटा नहीं है। और प्रकाश कौनसा वो कौनसी ज्योति ये ज्योति ज्ञान की है, ज्योति प्रकाश की है। और हमी तो लोग हैं जो कहते हैं कि ज्ञान को न पूरब होता है न पश्चिम होता है। ज्ञान को न बीती हुई कल होती है, ज्ञान को न आने वाली कल होती है। ज्ञान अजरा अमर होता है और हर काल में उपकारक होता है। ये हमारी परम्परा रही है और इसलिए विश्व में जो भी श्रेष्ठ है इसको लेना, पाना, पचाना internalize करना ये हमलोगों को सदियों से आदत रही है।

हम एक ऐसे समाज के लोग हैं। जहां विविधताएं भी हैं और कभी-कभी बाहर वाले व्यक्ति को conflict भी नजर आता है। लेकिन दुनिया जो conflict management को लेकर के इतनी सैमिनार कर रही है, लेकिन रास्ते नहीं मिल रहे। हमलोग हैं inherent conflict management का हमें सिखाया गया है। वरना दो extreme हम कभी भी नहीं सोच सकते थे। हम भगवान राम की पूजा करते हैं, जिन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया था। और हम वो लोग हैं, जो प्रहलाद की भी पूजा करते हैं, जिसने पिता की आज्ञा की अवमानना की थी। इतना बड़ा conflict, एक वो महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा को माना वो भी हमारे पूजनीय और एक दूसरा महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा क का अनादर किया वो भी हमारा महापुरुष।

हम वो लोग हैं जिन्होंने माता सीता को प्रणाम करते हैं। जिसने पति और ससुर के इच्छा के अनुसार अपना जीवन दे दिया। और उसी प्रकार से हम उस मीरा की भी भक्ति करते हैं जिसने पति की आज्ञा की अवज्ञा कर दी थी। यानी हम किस प्रकार के conflict management को जानने वाले लोग हैं। ये हमारी स्थिति का कारण क्या है और कारण ये है कि हम हठबाधिता से बंधे हुए लोग नहीं हैं। हम दर्शन के जुड़े हुए लोग हैं। और दर्शन, दर्शन तपी तपाई विचारों की प्रक्रिया और जीवन शैली में से निचोड़ के रूप में निकलता रहता है। जो समयानुकूल उसका विस्तार होता जाता है। उसका एक व्यापक रूप समय में आता है। और इसलिए हम उस दर्शन की परम्पराओं से निकले हुए लोग हैं जो दर्शन आज भी हमें इस जीवन को जीने के लिए प्रेरणा देता है।

यहां पर विचार मंथन में एक विषय यह भी रहा – Values, Values कैसे बदलते हैं। आज दुनिया में अगर आप में से किसी को अध्ययन करने का स्वभाव हो तो अध्ययन करके देखिये। दुनिया के समृद्ध-समृद्ध देश जब वो चुनाव के मैदान में जाते हैं, तो वहां के राजनीतिक दल, वहां के राजनेता उनके चुनाव में एक बात बार-बार उल्लेख करते हैं। और वो कहते हैं – हम हमारे देश में families values को पुनःप्रस्थापित करेंगे। पूरा विश्व, परिवार संस्था, पारिवारिक जीवन के मूल्य उसका महत्व बहुत अच्छी तरह समझने लगा है। हम उसमें पले बड़े हैं। इसलिये कभी उसमें छोटी सी भी इधर-उधर हो जाता है तो पता नहीं चलता है कि कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। लेकिन हमारे सामने चुनौती है कि values और values यानी वो विषय नहीं है कि आपकी मान्यता और मेरी मान्यता। जो समय की कसौटी पर कस कर के खरे उतरे हैं, वही तो वैल्यूज़ होते हैं। और इसलिए हर समाज के अपने वैल्यूज़ होते हैं। उन values के प्रति हम जागरूक कैसे हों। इन दिनों मैं देखता हूं। अज्ञान के कारण कहो, या तो inferiority complex के कारण कहो, जब कोई बड़ा संकट आ जाता है, बड़ा विवाद आ जाता है तो हम ज्यादा से ज्यादा ये कह कर भाग जाते हैं कि ये तो हमारी परम्परा है। आज दुनिया इस प्रकार की बातों को मानने के लिए नहीं है।

हमने वैज्ञानिक आधार पर अपनी बातों को दुनिया के सामने रखना पड़ेगा। और इसलिये यही तो कुम्भ के काल में ये विचार-विमर्श आवश्यकता है, जो हमारे मूल्यों की, हमारे विचारों की धार निकाल सके।

हम जानते हैं कभी-कभी जिनके मुंह से परम्परा की बात सुनते हैं। यही देश ये मान्यता से ग्रस्त था कि हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने संतों ने समुद्र पार नहीं करना चाहिए। विदेश नहीं जाना चाहिए। ये हमलोग मानते थे। और एक समय था, जब समुद्र पार करना बुरा माना जाता था। वो भी एक परम्परा थी लेकिन काल बदल गया। वही संत अगर आज विश्व भ्रमण करते हैं, सातों समुद्र पार करके जाते हैं। परम्पराएं उनके लिए कोई रुकावट नहीं बनती हैं, तो और चीजों में परम्पराएं क्यों रुकावट बननी चाहिए। ये पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और इसलिए परम्पराओं के नाम पर अवैज्ञानिक तरीके से बदले हुए युग को, बदले हुए समाज को मूल्य के स्थान पर जीवित रखते हुए उसको मोड़ना, बदलना दिशा देना ये हम सबका कर्तव्य बनता है, हम सबका दायित्व बनता है। और उस दायित्व को अगर हम निभाते हैं तो मुझे विश्वास है कि हम समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं।

आज विश्व दो संकटों से गुजर रहा है। एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग दूसरी तरफ आतंकवाद। क्या उपाय है इसका। आखिर इसके मूल पर कौन सी चीजें पड़ी हैं। holier than thou तेरे रास्ते से मेरा रास्ता ज्यादा सही है। यही तो भाव है जो conflict की ओर हमें घसीटता ले चला जा रहा है। विस्तारवाद यही तो है जो हमें conflict की ओर ले जा रहा है। युग बदल चुका है। विस्तारवाद समस्याओं का समाधान नहीं है। हम हॉरीजॉन्टल की तरह ही जाएं समस्याओं का समाधान नहीं है। हमें वर्टिकल जाने की आवश्यकता है अपने भीतर को ऊपर उठाने की आवश्यकता है, व्यवस्थाओं को आधुनिक करने की आवश्यकता है। नई ऊंचाइयों को पार करने के लिए उन मूल्यों को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है और इसलिये समय रहते हुए मूलभूत चिंतन के प्रकाश में, समय के संदर्भ में आवश्यकताओं की उपज के रूप में नई विधाओं को जन्म देना होगा। वेद सब कुछ है लेकिन उसके बाद भी हमी लोग हैं जिन्होंने वेद के प्रकाश में उपनिषदों का निर्माण किया। उपनिषद में बहुत कुछ है। लेकिन समय रहते हमने भी वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में समृति और स्रुति को जन्म दिया और समृति और स्रुतियां, जो उस कालखंड को दिशा देती है, उसके आधार पर हम चलें। आज हम में किसी को वेद के नाम भी मालूम नहीं होंगे। लेकिन वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में श्रुति और समृति वो आज भी हमें दिशा देती हैं। समय की मांग है कि अगर 21वीं सदी में मानव जाति का कल्याण करना है तो चाहे वेद के प्रकाश में उपनिषद रही हो, उपनिषद के प्रकाश में समृति और श्रुति रही हो, तो समृति और श्रुति के प्रकाश में 21वीं सदी के मानव के कल्याण के लिए किन चीजों की जरूरत है ये 51 अमृत बिन्दु शायद पूर्णतयः न हो कुछ कमियां उसमें भी हो सकती हैं। क्या हम कुम्भ के मेले में ऐसे अमृत बिन्दु निकाल कर के आ सकते हैं।

मुझे विश्वास है कि हमारा इतना बड़ा समागम। कभी – कभी मुझे लगता है, दुनिया हमे कहती है कि हम बहुत ही unorganised लोग हैं। बड़े ही विचित्र प्रकार का जीवन जीने वाले बाहर वालों के नजर में हमें देखते हैं। लेकिन हमें अपनी बात दुनिया के सामने सही तरीके से रखनी आती नहीं है। और जिनको रखने की जिम्मेवारी है और जिन्होंने इस प्रकार के काम को अपना प्रोफेशन स्वीकार किया है। वे भी समाज का जैसा स्वभाव बना है शॉर्टकट पर चले जाते हैं। हमने देखा है कुम्भ मेला यानी एक ही पहचान बना दी गई है नागा साधु। उनकी फोटो निकालना, उनका प्रचार करना, उनका प्रदर्शन के लिए जाना इसीके आसपास उसको सीमित कर दिया गया है। क्या दुनिया को हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारे देश के लोगों की कितनी बड़ी organizing capacity है। क्या ये कुम्भ मेले का कोई सर्कुलर निकला था क्या। निमंत्रण कार्ड गया था क्या।

हिन्दुस्तान के हर कोने में दुनिया में रहते हुए भारतीय मूल के लोगों को कोई इनविटेशन कार्ड गया था क्या। कोई फाइवस्टार होटलों का बुकिंग था क्या। एक सिपरा मां नदी के किनारे पर उसकी गोद में हर दिन यूरोप के किसी छोटे देश की जनसंख्या जितने लोग आते हों, 30 दिन तक आते हों। जब प्रयागराज में कुंभ का मेला हो तब गंगा मैया के किनारे पर यूरोप का एकाध देश daily इकट्ठा होता हो, रोज नए लोग आते हों और कोई भी संकट न आता हो, ये management की दुनिया की सबसे बड़ी घटना है लेकिन हम भारत का branding करने के लिए इस ताकत का परिचय नहीं करवा रहे हैं।

मैं कभी-कभी कहता हूं हमारे हिंदुस्तान का चुनाव दुनिया के लिए अजूबा है कि इतना बड़ा देश दुनिया के कई देशों से ज्यादा वोटर और हमारा Election Commission आधुनिक Technology का उपयोग करते हुए सुचारु रूप से पूरा चुनाव प्रबंधन करता है। विश्व के लिए, प्रबंधन के लिए ये सबसे बड़ा case study है, सबसे बड़ा case study है। मैं तो दुनिया की बड़ी-बड़ी Universities को कहता हूं कि हमारे इस कुंभ मेले की management को भी एक case study के रूप में दुनिया की Universities को study करना चाहिए।

हमने अपने वैश्विक रूप में अपने आप को प्रस्तुत करने के लिए दुनिया को जो भाषा समझती है, उस भाषा में रखने की आदत भी समय की मांग है, हम अपनी ही बात को अपने ही तरीके से कहते रहेंगे तो दुनिया के गले नहीं उतरेगी। विश्व जिस बात को जिस भाषा में समझता है, जिस तर्क से समझता है, जिस आधारों के आधार पर समझ पाता है, वो समझाने का प्रयास इस चिंतन-मनन के द्वारा तय करना पड़ेगा। ये जब हम करते हैं तो मुझे विश्वास है, इस महान देश की ये सदियों पुरानी विरासत वो सामाजिक चेतना का कारण बन सकती है, युवा पीढ़ी के आकर्षण का कारण बन सकती है और मैं जो 51 बिंदु हैं उसके बाहर एक बात मैं सभी अखाड़े के अधिष्ठाओं को, सभी परंपराओं से संत-महात्माओं को मैं आज एक निवेदन करना चाहता हूं, प्रार्थना करना चाहता हूं। क्या यहां से जाने के बाद हम सभी अपनी परंपराओं के अंदर एक सप्ताह का विचार कुंभ हर वर्ष अपने भक्तों के बीच कर सकते हैं क्या।

मोक्ष की बातें करें, जरूर करें लेकिन एक सप्ताह ऐसा हो कि जहां धरती की सच्चाइयों के साथ पेड़ क्यों उगाना चाहिए, नदी को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए, बेटी को क्यों पढ़ाना चाहिए, नारी का गौरव क्यों करना चाहिए वैज्ञानिक तरीके से और देश भर के विधिवत जनों बुलाकर के, जिनकी धर्म में आस्था न हो, जो परमात्मा में विश्वास न करता हो, उसको भी बुलाकर के जरा बताओ तो भाई और हमारा जो भक्त समुदाय है। उनके सामने विचार-विमर्श हर परंपरा में साल में एक बार 7 दिन अपने-अपने तरीके से अपने-अपने स्थान पर ज्ञानी-विज्ञानी को बुलाकर के विचार-विमर्श हो तो आप देखिए 3 साल के बाद अगला जब हमारा कुंभ का अवसर आएगा और 12 साल के बाद जो महाकुंभ आता है वो जब आएगा आप देखिए ये हमारी विचार-मंथन की प्रक्रिया इतनी sharpen हुई होगी, दुनिया हमारे विचारों को उठाने के लिए तैयार होगी।

जब अभी पेरिस में पुरा विश्व climate को लेकर के चिंतित था, भारत ने एक अहम भूमिका निभाई और भारत ने उन मूल्यों को प्रस्तावित करने का प्रयास किया। एक पुस्तक भी प्रसिद्ध हुई कि प्रकृति के प्रति प्रेम का धार्मिक जीवन में क्या-क्या महत्व रहा है और पेरिस के, दुनिया के सामने life style को बदलने पर बल दिया, ये पहली बार हुआ है।

हम वो लोग हैं जो पौधे में भी परमात्मा देखते हैं, हम वो लोग हैं जो जल में भी जीवन देखते हैं, हम वो लोग हैं जो चांद और सूरज में भी अपने परिवार का भाव देखते हैं, हम वो लोग हैं जिनको... आज शायद अंतरराष्ट्रीय Earth दिवस मनाया जाता होगा, पृथ्वी दिवास मनाया जाता होगा लेकिन देखिए हम तो वो लोग हैं जहां बालक सुबह उठकर के जमीन पर पैर रखता था तो मां कहती थी कि बेटा बिस्तर पर से जमीन पर जब पैर रखते हो तो पहले ये धरती मां को प्रणाम करो, माफी मांगों, कहीं तेरे से इस धरती मां को पीढ़ा न हो हो जाए। आज हम धरती दिवस मनाते हैं, हम तो सदियों से इस परंपरा को निभाते आए हैं।

हम ही तो लोग हैं जहां मां, बालक को बचपन में कहती है कि देखो ये पूरा ब्रहमांड तुम्हारा परिवार है, ये चाँद जो है न ये चाँद तेरा मामा है। ये सूरज तेरा दादा है। ये प्रकृति को अपना बनाना, ये हमारी विशेषता रही है।

सहज रूप से हमारे जीवन में प्रकृति का प्रेम, प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन के संस्कार हमें मिले हैं और इसलिए जिन बिंदुओं को लेकर के आज हम चलना चाहते हैं। उन बिंदुओं पर विश्वास रखते हुए और जो काल बाह्य है उसको छोड़ना पड़ेगा। हम काल बाह्य चीजों के बोझ के बीच जी नहीं सकते हैं और बदलाव कोई बड़ा संकट है, ये डर भी मैं नहीं मानता हूं कि हमारी ताकत का परिचय देता है। अरे बदलाव आने दो, बदलाव ही तो जीवन होता है। मरी पड़ी जिंदगी में बदलाव नहीं होता है, जिंदा दिल जीवन में ही तो बदलाव होता है, बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। हम सर्वसमावेशक लोग हैं, हम सबको जोड़ने वाले लोग हैं। ये सबको जोड़ने का हमारा सामर्थ्य है, ये कहीं कमजोर तो नहीं हो रहा अगर हम कमजोर हो गए तो हम जोड़ने का दायित्व नहीं निभा पाएंगे और शायद हमारे सिवा कोई जोड़ पाएगा कि नहीं पाएगा ये कहना कठिन है इसलिए हमारा वैश्विक दायित्व बनता है कि जोड़ने के लिए भी हमारे भीतर जो विशिष्ट गुणों की आवश्यकता है उन गुणों को हमें विकसित करना होगा क्योंकि संकट से भरे जन-जीवन को सुलभ बनाना हम लोगों ने दायित्व लिया हुआ है और हमारी इस ऋषियों-मुनियों की परंपरा ज्ञान के भंडार हैं, अनुभव की एक महान परंपरा रही है, उसके आधार पर हम इसको लेकर के चलेंगे तो मुझे पूरा विश्वास है कि जो अपेक्षाएं हैं, वो पूरी होंगी। आज ये समारोह संपन्न हो रहा है।

मैं शिवराज जी को और उनकी पूरी टीम को हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं इतने उत्तम योजना के लिए, बीच में प्रकृति ने कसौटी कर दी। अचानक आंधी आई, तूफान सा बारिश आई, कई भक्त जनों को जीवन अपना खोना पड़ा लेकिन कुछ ही घंटों में व्यवस्थाओं को फिर से ठीक कर दी। मैं उन सभी 40 हजार के करीब मध्य प्रदेश सरकार के छोटे-मोटे साथी सेवारत हैं, मैं विशेष रूप से उनको बधाई देना चाहता हूं कि आपके इस प्रयासों के कारण सिर्फ मेला संपन्न हुआ है, ऐसा नहीं है। आपके इन उत्तम प्रयासों के कारण विश्व में भारत की एक छवि भी बनी है। भारत के सामान्य मानव के मन में हमारा अपने ऊपर एक विश्वास बढ़ता है इस प्रकार के चीजों से और इसलिए जिन 40 हजार के करीब लोगों ने 30 दिन, दिन-रात मेहनत की है उनको भी मैं बधाई देना चाहता हूं, मैं उज्जैनवासियों का भी हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं, उन्होंने पूरे विश्व का यहां स्वागत किया, सम्मान किया, अपने मेहमान की तरह सम्मान किया और इसलिए उज्जैन के मध्य प्रदेश के नागरिक बंधु भी अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं, उनको भी हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और अगले कुंभ के मेले तक हम फिर एक बार अपनी विचार यात्रा को आगे बढ़ाएं इसी शुभकामनाओं के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, फिर एक बार सभी संतों को प्रणाम और उनका आशीर्वाद, उनका सामर्थ्य, उनकी व्यवस्थाएं इस चीज को आगे चलाएगी, इसी अपेक्षा के साथ सबको प्रणाम।

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December 04, 2021
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“Today, India is moving ahead with the intention of investing more than Rs 100 lakh crore on modern infrastructure. India's policy is of ‘Gatishakti’, to work twice or thrice as fast.”
“Our mountains are not only strongholds of faith and our culture, they are also the fortresses of our country's security. One of the top priorities of the country is to make life easier for the people living in the mountains”
“The government today cannot come under pressure from any country in the world. We are people who follow the mantra of nation first, always first”
“Whatever schemes we bring, we will bring it for everyone, without discrimination. We did not make vote bank politics the basis but gave priority to the service of the people. Our approach has been to strengthen the country”

उत्तराखंड का, सभी दाणा सयाणौ, दीदी-भूलियौं, चच्ची-बोडियों और भै-बैणो। आप सबु थैं, म्यारू प्रणाम ! मिथै भरोसा छ, कि आप लोग कुशल मंगल होला ! मी आप लोगों थे सेवा लगौण छू, आप स्वीकार करा !

उत्तराखंड के गवर्नर श्रीमान गुरमीत सिंह जी, यहां के लोकप्रिय, ऊर्जावान मुख्यमंत्री श्रीमान पुष्कर सिंह धामी जी, केंद्रीय मंत्रिपरिषद के मेरे सहयोगी प्रह्लाद जोशी जी, अजय भट्ट जी, उत्तराखंड में मंत्री सतपाल महाराज जी, हरक सिंह रावत जी, राज्य मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यगण, संसद में मेरे सहयोगी निशंक जी, तीरथ सिंह रावत जी, अन्य सांसदगण, भाई त्रिवेंद्र सिंह रावत जी, विजय बहुगुणा जी, राज्य विधानसभा के अन्य सदस्य, मेयर श्री, जिला पंचायत के सदस्यगण, भाई मदन कौशिक जी और मेरे प्‍यारे भाइयों और बहनों,

आप सभी इतनी बड़ी संख्या में हमें आशीर्वाद देने आए हैं। आपके स्नेह, आपके आशीर्वाद का प्रसाद पाकर हम सभी अभीभूत हैं। उत्तराखंड, पूरे देश की आस्था ही नहीं बल्कि, कर्म और कर्मठता की भूमि है। इसीलिए, इस क्षेत्र का विकास, यहां को भव्य स्वरूप देना डबल इंजन की सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी भावना से सिर्फ बीते 5 वर्षों में उत्तराखंड के विकास के लिए केंद्र सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की हैं। यहां की सरकार इनको तेज़ी से ज़मीन पर उतार रही है। इसी को आगे बढ़ाते हुए, आज 18 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं का लोकापर्ण और शिलान्यास किया गया है। इनमें कनेक्टिविटी हो, स्वास्थ्य हो, संस्कृति हो, तीर्थाटन हो, बिजली हो, बच्चों के लिए विशेष तौर पर बना चाइल्ड फ्रेंडली सिटी प्रोजेक्ट हो, करीब-करीब हर सेक्टर से जुड़े प्रोजेक्ट इसमें शामिल हैं। बीते वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, अनेक जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद, आखिरकार आज ये दिन आया है। ये परियोजनाएं, मैंने केदारपुरी की पवित्र धरती से कहा था, आज मैं देहरादून से दोहरा रहा हूं। ये परियोजनाएं इस दशक को उत्तराखंड का दशक बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी। इन सभी प्रोजेक्ट्स के लिए उत्तराखंड के लोगों का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं, बहुत-बहुत बधाई देता हूं। जो लोग पूछते हैं कि डबल इंजन की सरकार का फायदा क्या है, वो आज देख सकते हैं कि डबल इंजन की सरकार कैसे उत्तराखंड में विकास की गंगा बहा रही है।

भाइयों और बहनों,

इस शताब्दी की शुरुआत में, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत में कनेक्टिविटी बढ़ाने का अभियान शुरू किया था। लेकिन उनके बाद 10 साल देश में ऐसी सरकार रही, जिसने देश का, उत्तराखंड का, बहुमूल्य समय व्यर्थ कर दिया। 10 साल तक देश में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर घोटाले हुए, घपले हुए। इससे देश का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई के लिए हमने दोगुनी गति से मेहनत की और आज भी कर रहे हैं। आज भारत, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश के इरादे से आगे बढ़ रहा है, आज भारत की नीति, गतिशक्ति की है, दोगुनी-तीन गुनी तेजी से काम करने की है। सालों-साल अटकी रहने वाली परियोजनाओं, बिना तैयारी के फीता काट देने वाले तौर-तरीकों को पीछे छोड़कर आज भारत नव-निर्माण में जुटा है। 21वीं सदी के इस कालखंड में, भारत में कनेक्टिविटी का एक ऐसा महायज्ञ चल रहा है, जो भविष्य के भारत को विकसित देशों की श्रंखला में लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। इस महायज्ञ का ही एक यज्ञ आज यहां देवभूमि में हो रहा है।

भाइयों और बहनों,

इस देवभूमि में श्रद्धालु भी आते हैं, उद्यमी भी आते हैं, प्रकृति प्रेमी सैलानी भी आते हैं। इस भूमि का जो सामर्थ्य है, उसे बढ़ाने के लिए यहां आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर अभूतपूर्व काम किया जा रहा है। चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना के तहत आज देवप्रयाग से श्रीकोट और ब्रह्मपुरी से कौड़ियाला, वहां के प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण किया गया है। भगवान बद्रीनाथ तक पहुंचने में लाम-बगड़ लैंड स्लाइड के रूप में जो रुकावट थी, वो भी अब दूर हो चुकी है। इस लैंड स्लाइड ने देशभर के न जाने कितने तीर्थ यात्रियों को बद्रीनाथ जी की यात्रा करने से या तो रोका है या फिर घंटों इंतज़ार करवाया है और कुछ लोग तो थक कर के वापस भी चले गए। अब बद्रीनाथ जी की यात्रा, पहले से ज्यादा सुरक्षित और सुखद हो जाएगी। आज बद्रीनाथ जी, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में अनेक सुविधाओं से जुड़े नए प्रोजेक्ट्स पर भी काम आरंभ हुआ है।

भाइयों और बहनों,

बेहतर कनेक्टिविटी और सुविधाओं से पर्यटन और तीर्थाटन को कितना लाभ होता है, बीते वर्षों में केधारधाम में हमने अनुभव किया है। केदारनाथ त्रासदी से पहले, 2012 में 5 लाख 70 हजार लोगों ने दर्शन किया था और ये उस समय का एक रिकॉर्ड था, 2012 में यात्रियों की संख्या का एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड था। जबकि कोरोना काल शुरू होने से पहले, 2019 में 10 लाख से ज्यादा लोग केदारनाथ जी के दर्शन करने पहुंचे थे। यानि केदार धाम के पुनर्निर्माण ने ना सिर्फ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ाई बल्कि वहां के लोगों को रोजगार-स्वरोजगार के भी अनेकों अवसर उपलब्ध कराए हैं।

साथियों,

पहले जब भी मैं उत्तराखंड आता था, या उत्तराखंड आने-जाने वालों से मिलता था, वो कहते थे- मोदी जी दिल्ली से देहरादून की यात्रा गणेशपुर तक तो बड़ी आसानी से हो जाती है, लेकिन गणेशपुर से देहरादून तक बड़ी मुश्किल होती है। आज मुझे बहुत खुशी है कि दिल्ली-देहरादून इकॉनॉमिक कॉरिडोर का शिलान्यास हो चुका है। जब ये बनकर तैयार हो जाएगा तो, दिल्ली से देहरादून आने-जाने में जो समय लगता है, वो करीब-करीब आधा हो जाएगा। इससे न केवल देहरादून के लोगों को फायदा पहुंचेगा बल्कि हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत और मेरठ जाने वालों को भी सुविधा होगी। ये आर्थिक गलियारा अब दिल्ली से हरिद्वार आने-जाने के समय को भी कम कर देगा। हरिद्वार रिंग रोड परियोजना से हरिद्वार शहर को जाम की बरसों पुरानी समस्या से मुक्ति मिलेगी। इससे कुमांऊ क्षेत्र के साथ संपर्क भी और आसान होगा। इसके अलावा ऋषिकेश की पहचान, हमारे लक्ष्मण झूला पुल के समीप, एक नए पुल का शिलान्यास भी आज हुआ है।

भाइयों और बहनों,

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर्यावरण सुरक्षा के साथ विकास के हमारे मॉडल का भी प्रमाण होगा। इसमें एक तरफ उद्योगों का कॉरिडोर होगा तो इसी में एशिया का सबसे बड़ा elevated wildlife corridor भी बनेगा। ये कॉरिडोर यातायात तो सरल करेगा ही, जंगली जीवों को भी सुरक्षित आने-जाने में मदद करेगा।

साथियों,

उत्तराखंड में औषधीय गुण वाली जो जड़ी-बूटिया हैं, जो प्राकृतिक उत्पाद हैं, उनकी मांग दुनिया भर में है। अभी उत्तराखंड के इस सामर्थ्य का भी पूरा उपयोग नहीं हो सका है। अब जो आधुनिक इत्र और सुगंध प्रयोगशाला बनी है, वो उत्तराखंड के सामर्थ्य को और बढ़ाएगी।

भाइयों और बहनों,

हमारे पहाड़, हमारी संस्कृति-हमारी आस्था के गढ़ तो हैं ही, ये हमारे देश की सुरक्षा के भी किले हैं। पहाड़ों में रहने वालों का जीवन सुगम बनाना देश की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है। लेकिन दुर्भाग्य से दशकों तक जो सरकार में रहे, उनकी नीति और रणनीति में दूर-दूर तक ये चिंतन कहीं नहीं था। उनके लिए उत्तराखंड हो या हिन्‍दुस्‍तान के और क्षेत्र, उनका एक ही इरादा रहता था, अपनी तिजोरी भरना, अपने घर भरना, अपनों का ही खयाल रखना।

भाईयों और बहनों,

हमारे लिए उत्तराखंड, तप और तपस्या का मार्ग है। साल 2007 से 2014 के बीच जो केंद्र की सरकार थी, उसने सात साल में उत्तराखंड में केवल, हमारे पहले जो सरकार थी उसने 7 साल में क्‍या काम किया? पहले की सरकार ने 7 साल में उत्तराखंड में केवल 288, 300 किलोमीटर भी नहीं, केवल 288 किलोमीटर नेशनल हाईवे बनाए थे। जबकि हमारी सरकार ने अपने सात साल में उत्तराखंड में 2 हजार किलोमीटर से अधिक लंबाई के नेशनल हाईवे का निर्माण किया है। आज बताइए भाईयों-बहनों, इसे आप काम मानते हैं या नहीं मानते हैं? क्‍या इसमें लोगों की भलाई है कि नहीं है? इससे उत्तराखंड का भला होगा कि नहीं होगा? आपकी भावी पीढ़ियों का भला होगा कि नहीं होगा? उत्तराखंड के नौजवानों का भाग्‍य खुलेगा कि नहीं खुलेगा? इतना ही नहीं, पहले की सरकार ने उत्तराखंड में नेशनल हाईवे पर 7 साल में 600 करोड़ के आसपास खर्च किया। अब जरा सुन लीजिए जबकि हमारी सरकार इन सात साढ़े सात साल में 12 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर चुकी है, कहां 600 करोड़ और कहां 12000 करोड़ रुपया। आप मुझे बताइए, हमारे लिये उत्तराखंड प्राथमिकता है कि नहीं है? आपको विश्‍वास हो रहा है कि नहीं हो रहा है? हमने करके दिखाया है कि नहीं दिखाया? हम जी-जान से उत्तराखंड के लिये काम करते हैं कि नहीं करते हैं?

और भाइयों और बहनों,

ये सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है। जब इंफ्रास्ट्रक्चर के इतने बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम होता है, तो कितनी चीजों की जरूरत होती है। सीमेंट चाहिए, लोहा चाहिए, लकड़ी चाहिए, ईंट चाहिए, पत्‍थर चाहिए, मजदूरी करने वाले लोग चाहिए, उद्यमी लोग चाहिए, स्थानीय युवाओं को अनेक प्रकार का लाभ का अवसर पैदा होता है। इन कामों में जो श्रमिक लगते हैं, इंजीनियर लगते हैं, मैनेजमेंट लगता है, वो भी अधिकतर स्थानीय स्तर पर ही जुटाए जाते हैं। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर के ये प्रोजेक्ट, अपने साथ उत्तराखंड में रोजगार का एक नया इकोसिस्टम बना रहे हैं, हजारों युवाओं को रोजगार दे रहे हैं। आज मैं गर्व से कह सकता हूं, पांच साल पहले मैंने कहा था, जो कहा था उसको दोबारा याद कराने की ताकत राजनेताओं में जरा कम होती है, मुझ में है। याद कर लेना मैंने क्‍या कहा था और आज मैं गर्व से कह सकता हूं उत्तराखंड क पाणी और जवनि उत्तराखंड क काम ही आली !

साथियों,

सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी पहले की सरकारों ने उतनी गंभीरता से काम नहीं किया, जितना करना चाहिए था। बॉर्डर के पास सड़कें बनें, पुल बनें, इस ओर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वन रैंक वन पेंशन हो, आधुनिक अस्त्र-शस्त्र हो, या फिर आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देना हो, जैसे उन लोगों ने हर स्तर पर सेना को निराश करने की, हतोत्साहित करने की मानो कसम खा रखी थी। लेकिन आज जो सरकार है, वो दुनिया के किसी देश के दबाव में नहीं आ सकती। हम राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम के मंत्र पर चलने वाले लोग हैं। हमने सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में सैकड़ों किलोमीटर नई सड़कें बनाई हैं। मौसम और भूगोल की कठिन परिस्थितियों के बावजूद ये काम तेजी से किया जा रहा है। और ये काम कितना अहम है, ये उत्तराखंड का हर परिवार, फौज में अपने बच्चों को भेजने वाला परिवार, ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है।

साथियों,

एक समय पहाड़ पर रहने वाले लोग, विकास की मुख्य धारा से जुड़ने का सपना ही देखते रह जाते थे। पीढ़ियां बीत जाती थीं,वो यही सोचते थे हमें कब पर्याप्त बिजली मिलेगी, हमें कब पक्के घर बनकर मिलेंगे? हमारे गांव तक सड़क आएगी या नहीं? अच्छी मेडिकल सुविधा मिलेगी या नहीं और पलायन का सिलसिला आखिरकार कब रुकेगा? जाने कितने ही प्रश्न यहां के लोगों के मन में थे।

लेकिन साथियों,

जब कुछ करने का जूनून हो तो सूरत भी बदलती हैं और सीरत भी बदलती हैं। और आपका ये सपना पूरा करने के लिए हम दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। आज सरकार इस बात का इंतजार नहीं करती कि नागरिक उसके पास अपनी समस्या लेकर आएंगे तब सरकार कुछ सोचेगी और कदम उठाएगी। अब सरकार ऐसी है जो सीधे नागरिकों के पास जाती हैं। आप याद करिए, एक समय था जब उत्तराखंड में सवा लाख घरों में नल से जल पहुंचता था। आज साढ़े 7 लाख से भी अधिक घरों में नल से जल पहुंच रहा है। अब घर में किचन तक नल से जल आए हैं तो ये माताएं-बहनें मुझे आशीर्वाद देंगी कि नहीं देंगी? हम सबको आशीर्वाद देंगे कि नहीं देंगे? नल से जल आता है तो माताओं-बहनों का कष्ट दूर होता है कि नहीं होता है? उनको सुविधा मिलती है कि नहीं मिलती है? और ये काम, जल जीवन मिशन शुरू होने के दो साल के भीतर-भीतर हमने कर दिया है। इसका बहुत बड़ा लाभ उत्तराखंड की माताओं को बहनों को, यहां की महिलाओं को हुआ है। उत्तराखंड की माताओं-बहनों-बेटियों ने हमेशा हम सभी पर इतना स्नेह दिखाया है। हम सभी दिन रात परिश्रम करके, ईमानदारी से काम करके, हमारी इन माताओं-बहनों का जीवन आसान बनाकर, उनका ऋण चुकाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

साथियों,

डबल इंजन की सरकार में उत्तराखंड के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी अभूतपूर्व काम हो रहा है। उत्तराखंड में 3 नए मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए गए हैं। इतने छोटे से राज्‍य में तीन नए मेडिकल कॉलेज आज हरिद्वार मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास भी किया गया है। ऋषिकेश एम्स तो सेवाएं दे ही रहा है, कुमाऊं में सैटेलाइट सेंटर भी जल्द ही सेवा देना शुरु कर देगा। टीकाकरण के मामले में भी उत्तराखंड आज देश के अग्रणी राज्यों में है और इसके लिये मैं धामी जी को, उनके साथियों को पूरी उत्तराखंड की सरकार को बधाई देता हूं। और इसके पीछे भी बेहतर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की बहुत बड़ी भूमिका है। इस कोरोना काल में उत्तराखंड में 50 से अधिक नए ऑक्सीजन प्लांट्स भी लगाए गए हैं।

साथियों,

बहुत से लोग चाहते हैं, आप में से सबके मन में विचार आता होगा, हर कोई चाहता होगा उसकी संतान डॉक्टर बने, उसकी संतान इंजीनियर बने, उनकी संतान मैनेजमेंट के क्षेत्र में जाए। लेकिन अगर नए संस्थान बने ही नहीं, सीटों की संख्या बढ़े ही नहीं, तो आपका सपना पूरा हो सकता है क्‍या, आपका बेटा डॉक्‍टर बन सकता है क्‍या, आपका बेटी डॉक्‍टर बन सकती है क्‍या? आज देश में बन रहे नए मेडिकल कॉलेज, नई IIT, नए IIM, विद्यार्थियों के लिए प्रोफेशनल कोर्स की बढ़ रही सीटें, देश की वर्तमान और भावी पीढ़ी के भविष्य को मजबूत करने का काम कर रही हैं। हम सामान्य मानवी के सामर्थ्य को बढ़ाकर, उसे सशक्त करके, उसकी क्षमता बढ़ाकर, उसे सम्मान के साथ जीने के नए अवसर दे रहे हैं।

साथियों,

समय के साथ हमारे देश की राजनीति में अनेक प्रकार की विकृतियां आ गई है और आज इस बारे में भी मैं उत्तराखंड की पवित्र धरती पर कुछ बात बताना चाहता हूं। कुछ राजनीतिक दलों द्वारा, समाज में भेद करके, सिर्फ एक तबके को, चाहे वो अपनी जाति का हो, किसी खास धर्म का हो, या अपने छोटे से इलाके के दायरे का हो, उसी की तरफ ध्‍यान देना। यही प्रयास हुए हैं और उसमें ही उनको वोटबैंक नजर आती है। इतना संभाल लो, वोटबैंक बना दो, गाड़ी चलती रहेगी। इन राजनीतिक दलों ने एक और तरीका भी अपनाया है। उनकी विकृतियों का एक रूप ये भी है और वो रास्‍ता है जनता को मजबूत नहीं होने देना, बराबर कोशिश करना कि जनता कभी मजबूत ना हो जाए। वे तो यही चाहते रहे, ये जनता-जनार्दन हमेशा मजबूर बनी रहे, मजबूर बनाओ, जनता को अपना मोहताज बनाओ ताकि उनका ताज सलामत रहे। इस विकृत राजनीति का आधार रहा कि लोगों की आवश्यकताएं पूरी ना करो। उन्‍हें आश्रित बनाकर रखो। इनके सारे प्रयास इसी दिशा में हुए कि जनता-जनार्दन को ताकतवर नहीं बनने देना है। दुर्भाग्य से, इन राजनीतिक दलों ने लोगों में ये सोच पैदा कर दी कि सरकार ही हमारी माई-बाप है, अब जो कुछ भी मिलेगा सरकार से ही मिलेगा, तभी हमारा गुजारा होगा। लोगों के मन में भी ये घर कर गया। यानि एक तरह से देश के सामान्य मानवी का स्वाभिमान, उसका गौरव सोची-समझी रणनीति के तहत कुचल दिया गया, उसे आश्रित बना दिया गया और दुखद ये कि ये सब करते रहे और कभी किसी को भनक तक नहीं आने दी। लेकिन इस सोच, इस अप्रोच से अलग, हमने एक नया रास्ता चुना है। हमने जो रास्‍ता चुना है वो मार्ग कठिन है, वो मार्ग मुश्किल है, लेकिन देशहित में है, देश के लोगों के हित में है। और हमारा मार्ग है - सबका साथ-सबका विकास। हमने कहा कि जो भी योजनाएं लाएंगे सबके लिए लाएंगे, बिना भेदभाव के लाएंगे। हमने वोटबैंक की राजनीति को आधार नहीं बनाया बल्कि लोगों की सेवा को प्राथमिकता दी। हमारी अप्रोच रही कि देश को मजबूती देनी है। हमारा देश कब मजबूत होगा? जब हर परिवार मजबूत होगा। हमने ऐसे समाधान निकाले, ऐसी योजनाएं बनाईं जो भले वोटबैंक के तराजू में ठीक नहीं बैठें लेकिन वो बिना भेदभाव आपका जीवन आसान बनाएंगी, आपको नए अवसर देंगी, आपको ताकतवर बनाएंगी। और आप भी नहीं चाहेंगे कि आप अपने बच्चों के लिए एक ऐसा वातावरण छोड़ें जिसमें आपके बच्चे भी हमेशा आश्रित जीवन जीएं। जो मुसीबतें आपको विरासत में मिलीं, जिन कठिनाइयों में आपको जिन्‍दगी गुजारनी पड़ी आप भी नहीं चाहेंगे कि आप वो विरासतें, वो मुसीबतें बच्चों को वैसे ही देकर के जाएं। हम आपको आश्रित नहीं, आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। जैसे हमने कहा था कि जो हमारा अन्नदाता है, वो ऊर्जादाता भी बने। तो इसके लिए हम खेत के किनारे मेढ पर सोलर पैनल लगाने की कुसुम योजना लेकर के आए। इससे किसान को खेत में ही बिजली पैदा करने की सुविधा हुई। ना तो हमने किसान को किसी पर आश्रित किया और ना ही उसके मन में ये भाव आया कि मैं मुफ्त की बिजली ले रहा हूं। और इस प्रयास में भी उसको बिजली भी मिली और देश पर भी भार नहीं आया और वो एक तरह से आत्मनिर्भर बना और ये योजना देश के कई जगह पर हमारे किसानों ने लागू की है। इसी तरह से हमने देशभर में उजाला योजना शुरू की थी। कोशिश थी कि घरों में बिजली का बिल कम आए। इसके लिए देशभर में और यहां उत्तराखंड में करोड़ों LED बल्ब दिए गए और पहले LED बल्ब, 300-400 रुपए के आते थे, हम उनको 40-50 रुपए तक लेकर के आ गए। आज लगभग हर घर में LED बल्ब इस्तेमाल हो रहे हैं और लोगों का बिजली का बिल भी कम हो रहा है। अनेकों घरों में जो मध्‍यम वर्ग, निम्‍न मध्‍यम वर्ग के परिवार हैं, हर महीने 500-600 रुपए तक बिजली बिल कम हुआ है।

साथियों,

इसी प्रकार से हमने मोबाइल फोन सस्ता किया, इंटरनेट सस्ता किया, गांव-गांव में कॉमन सर्विस सेंटर खोले जा रहे हैं, अनेक सुविधाएं गांव में पहुंची हैं। अब गांव के आदमी को रेलवे का रिजर्वेशन कराना हो तो उसे शहर नहीं आना पड़ता, एक दिन खराब नहीं करना पड़ता, 100-200-300 रुपया बस का किराया नहीं देना पड़ता। वो अपने गांव में ही कॉमन सर्विस सेंटर से ऑनलाइन रेलवे का बुकिंग करवा सकता है। उसी प्रकार से आपने देखा होगा अब उत्तराखंड में होम स्टे, लगभग हर गांव में उसकी बात पहुंच चुकी है। अभी कुछ समय पहले मुझे उत्तराखंड के लोगों से बात करने का मौका भी मिला था, जो बहुत सफलता के साथ होम स्टे चला रहे हैं। जब इतने यात्री आएंगे, पहले की तुलना में दोगुना-तीन गुना यात्री आना शुरू हुआ है। जब इतने यात्री आएंगे, तो होटल की उपलब्धता का सवाल भी स्वाभाविक है और रातों रात इतने होटल भी नहीं बन सकते लेकिन हर घर में एक कमरा बनाया जा सकता है अच्छी सुविधाओं के साथ बनाया जा सकता है। और मुझे विश्वास है, उत्तराखंड, होमस्टे बनाने में, सुविधाओं के विस्तार में, पूरे देश को एक नई दिशा दिखा सकता है।

साथियों,

इसी तरह का परिवर्तन हम देश के हर कोने में ला रहे हैं। इस तरह के परिवर्तन से देश 21वीं सदी में आगे बढ़ेगा, इसी तरह का परिवर्तन उत्तराखंड के लोगों को आत्मनिर्भर बनाएगा।

साथियों,

समाज की जरूरत के लिए कुछ करना और वोटबैंक बनाने के लिए कुछ करना, दोनों में बहुत बड़ा फर्क होता है। जब हमारी सरकार गरीबों को मुफ्त घर बनाकर देती है, तो वो उसके जीवन की सबसे बड़ी चिंता दूर करती है। जब हमारी सरकार गरीबों को 5 लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा देती है, तो वो उसकी जमीन बिकने से बचाती है, उसे कर्ज के कुचक्र में फंसने से बचाती है। जब हमारी सरकार कोरोना काल में हर गरीब को मुफ्त अनाज सुनिश्चित करती है तो वो उसे भूख की मार से बचाने का काम करती है। मुझे पता है कि देश का गरीब, देश का मध्यम वर्ग, इस सच्चाई को समझता है। तभी हर क्षेत्र, हर राज्य से हमारे कार्यों को, हमारी योजनाओं को जनता जनार्दन का आशीर्वाद मिलता है और हमेशा मिलता रहेगा।

साथियों,

आज़ादी के इस अमृत काल में, देश ने जो प्रगति की रफ़्तार पकड़ी है वो अब रुकेगी नहीं, अब थमेगी नहीं और ये थकेगी भी नहीं, बल्कि और अधिक विश्वास और संकल्पों के साथ आगे बढ़ेगी। आने वाले 5 वर्ष उत्तराखंड को रजत जयंती की तरफ ले जाने वाले हैं। ऐसा कोई लक्ष्य नहीं जो उत्तराखंड हासिल नहीं कर सकता। ऐसा कोई संकल्प नहीं जो इस देवभूमि में सिद्ध नहीं हो सकता। आपके पास धामी जी के रूप में युवा नेतृत्व भी है, उनकी अनुभवी टीम भी है। हमारे पास वरिष्‍ठ नेताओं की बहुत बड़ी श्रृंखला है। 30-30 साल, 40-40 साल अनुभव से निकले हुए नेताओं की टीम है जो उत्तराखंड के उज्‍जवल भविष्‍य के लिए समर्पित है।

और मेरे प्‍यारे भाईयों-बहनों,

जो देशभर में बिखर रहे हैं, वो उत्तराखंड को निखार नहीं सकते हैं। आपके आशीर्वाद से विकास का ये डबल इंजन उत्तराखंड का तेज़ विकास करता रहेगा, इसी विश्वास के साथ, मैं फिर से आप सबको बधाई देता हूं। आज जब देव भूमि में आया हूँ, वीर माताओ की भूमि में आया हूँ, तो कुछ भाव पुष्प, कुछ श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ, मैं कुछ पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं-

जहाँ पवन बहे संकल्प लिए,

जहाँ पर्वत गर्व सिखाते हैं,

जहाँ ऊँचे नीचे सब रस्ते

बस भक्ति के सुर में गाते हैं

उस देव भूमि के ध्यान से ही

उस देव भूमि के ध्यान से ही

मैं सदा धन्य हो जाता हूँ

है भाग्य मेरा,

सौभाग्य मेरा,

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

और धन्य धन्य हो जाता हूँ।

तुम आँचल हो भारत माँ का

जीवन की धूप में छाँव हो तुम

बस छूने से ही तर जाएँ

सबसे पवित्र वो धरा हो तुम

बस लिए समर्पण तन मन से

मैं देव भूमि में आता हूँ

मैं देव भूमि में आता हूँ

है भाग्य मेरा

सौभाग्य मेरा

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

और धन्य धन्य हो जाता हूँ।

जहाँ अंजुली में गंगा जल हो

जहाँ हर एक मन बस निश्छल हो

जहाँ गाँव गाँव में देश भक्त

जहाँ नारी में सच्चा बल हो

उस देवभूमि का आशीर्वाद लिए

मैं चलता जाता हूँ

उस देवभूमि का आशीर्वाद लिए

मैं चलता जाता हूँ

है भाग्य मेरा

सौभाग्य मेरा

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मंडवे की रोटी

हुड़के की थाप

हर एक मन करता

शिवजी का जाप

ऋषि मुनियों की है

ये तपो भूमि

कितने वीरों की

ये जन्म भूमि

में देवभूमि में आता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मेरे साथ बोलिये, भारत माता की जय ! भारत माता की जय ! भारत माता की जय !

बहुत-बहुत धन्यवाद !