Knowledge is immortal and is relevant in every era: PM Modi

Published By : Admin | May 14, 2016 | 13:13 IST
At Simhasth Kumbh convention, we are seeing birth of a new effort: PM
We belong to a tradition where even a Bhikshuk says, may good happen to every person: PM
We should tell the entire world about the organising capacity of an event like the Kumbh: PM
Lets hold Vichar Kumbh every year with devotees...discuss why we need to plant trees, educate girl child: PM

हम लोगों का एक स्वभाव दोष रहा है, एक समाज के नाते कि हम अपने आपको हमेशा परिस्थितियों के परे समझते हैं। हम उस सिद्धांतों में पले-बढ़े हैं कि जहां शरीर तो आता और जाता है। आत्मा के अमरत्व के साथ जुड़े हुए हम लोग हैं और उसके कारण हमारी आत्मा की सोच न हमें काल से बंधने देती है, न हमें काल का गुलाम बनने देती है लेकिन उसके कारण एक ऐसी स्थिति पैदा हुई कि हमारी इस महान परंपरा, ये हजारों साल पुरानी संस्कृति, इसके कई पहलू, वो परंपराए किस सामाजिक संदर्भ में शुरू हुई, किस काल के गर्भ में पैदा हुई, किस विचार मंथन में से बीजारोपण हुआ, वो करीब-करीब अलब्य है और उसके कारण ये कुंभ मेले की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई होगी उसके विषय में अनेक प्रकार के विभिन्न मत प्रचलित हैं, कालखंड भी बड़ा, बहुत बड़ा अंतराल वाला है।

कोई कहेगा हजार साल पहले, कोई कहेगा 2 हजार साल पहले लेकिन इतना निश्चित है कि ये परंपरा मानव जीवन की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्थाओं में से एक है। मैं अपने तरीक से जब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि कुंभ का मेला, वैसे 12 साल में एक बार होता है और नासिक हो, उज्जैन हो, हरिद्वार हो वहां 3 साल में एक बार होता है प्रयागराज में 12 साल में एक बार होता है। उस कालखंड को हम देखें तो मुझे लगता है कि एक प्रकार से ये विशाल भारत को अपने में समेटने का ये प्रयास ये कुंभ मेले के द्वारा होता था। मैं तर्क से और अनुमान से कह सकता हूं कि समाज वेदता, संत-महंत, ऋषि, मुनि जो हर पल समाज के सुख-दुख की चर्चा और चिंता करते थे। समाज के भाग्य और भविष्य के लिए नई-नई विधाओं का अन्वेषण करते थे, Innovation करते थे। इन्हें वे हमारे ऋषि जहां भी थे वे बाह्य जगत का भी रिसर्च करते थे और अंतर यात्रा को भी खोजने का प्रयास करते थे तो ये प्रक्रिया निरंतर चलती रही, सदियों तक चलती रही, हर पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही लेकिन संस्कार संक्रमण का काम विचारों के संकलन का काम कालानुरूप विचारों को तराजू पर तौलने की परंपरा ये सारी बातें इस युग की परंपरा में समहित थी, समाहित थी।

एक बार प्रयागराज के कुंभ मेले में बैठते थे, एक Final decision लिया जाता था सबके द्वारा मिलकर के कि पिछले 12 साल में समाज यहां-यहां गया, यहां पहुंचा। अब अगले 12 साल के लिए समाज के लिए दिशा क्या होगी, समाज की कार्यशैली क्या होगी किन चीजों की प्राथमिकता होगी और जब कुंभ से जाते थे तो लोग उस एजेंडा को लेकर के अपने-अपने स्थान पर पहुंचते थे और हर तीन साल के बाद जबकि कभी नासिक में, कभी उज्जैन में, कभी हरिद्वार में कुंभ का मेला लगता था तो उसका mid-term appraisal होता था कि भई प्रयागराज में जो निर्णय हम करके गए थे तीन साल में क्या अनुभव आया और हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोग आते थे।

30 दिन तक एक ही स्थान पर रहकर के समाज की गतिविधियों, समाज की आवश्यकताएं, बदलता हुआ युग, उसका चिंतन-मनन करके उसमें फिर एक बार 3 साल का करणीय एजेंडा तय होता था। In the light of main Mahakumbh प्रयागराज में होता था और फिर 3 साल के बाद दूसरा जब कुंभ लगता था तो फिर से Review होता था। एक अद्भुत सामाजिक रचना थी ये लेकिन धीरे-धीरे अनुभव ये आता है कि परंपरा तो रह जाती है, प्राण खो जाता है। हमारे यहां भी अनुभव ये आया कि परंपरा तो रह गई लेकिन समय का अभाव है, 30 दिन कौन रहेगा, 45 दिन कौन रहेगा। आओ भाई 15 मिनट जरा डुबकी लगा दें, पाप धुल जाए, पुण्य कमा ले और चले जाए।

ऐसे जैसे बदलाव आय उसमें से उज्जैन के इस कुंभ में संतों के आशीर्वाद से एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है और ये नया प्रयास एक प्रकार से उस सदियों पुरानी व्यवस्था का ही एक Modern edition है और जिसमें वर्तमान समझ में, वैश्विक संदर्भ में मानव जाति के लिए क्या चुनौतियां हैं, मानव कल्याण के मार्ग क्या हो सकते हैं। बदलते हुए युग में काल बाह्य चीजों को छोड़ने की हिम्मत कैसे आए, पुरानी चीजों को बोझ लेकर के चलकर के आदमी थक जाता है। उन पुरानी काल बाह्य चीजों को छोड़कर के एक नए विश्वास, नई ताजगी के साथ कैसे आगे बढ़ जाए, उसका एक छोटा सा प्रयास इस विचार महाकुंभ के अंदर हुआ है।

जो 51 बिंदु, अमृत बिंदु इसमें से फलित हुए हैं क्योंकि ये एक दिन का समारोह नहीं है। जैसे शिवराज जी ने बताया। देश औऱ दुनिया के इस विषय के जानकार लोगों ने 2 साल मंथन किया है, सालभर विचार-विमर्श किया है और पिछले 3 दिन से इसी पवित्र अवसर पर ऋषियों, मुनियों, संतों की परंपरा को निभाने वाले महान संतों के सानिध्य में इसका चिंतन-मनन हुआ है और उसमें से ये 51 अमृत बिंदु समाज के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। मैं नहीं मानता हूं कि हम राजनेताओं के लिए इस बात को लोगों के गले उतारना हमारे बस की बात है। हम नहीं मानते हैं लेकिन हम इतना जरूर मानते हैं कि समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग चाहे वो गेरुए वस्त्र में हो या न हो लेकिन त्याग और तपस्था के अधिष्ठान पर जीवन जीते हैं। चाहे एक वैज्ञानिक अपनी laboratory में खपा हुआ हो, चाहे एक किसान अपने खेत में खपा हुआ हो, चाहे एक मजदूर अपना पसीना बहा रहा हे, चाहे एक संत समाज का मार्गदर्शन करता हो ये सारी शक्तियां, एक दिशा में चल पड़ सकती हैं तो कितना बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं और उस दिशा में ये 51 अमृत बिंदु जो है आने वाले दिनों में भारत के जनमानस को और वैश्विक जनसमूह को भारत किस प्रकार से सोच सकता है और राजनीतिक मंच पर से किस प्रकार के विचार प्रभाग समयानुकूल हो सकते हैं इसकी चर्चा अगर आने वाले दिनों में चलेगी, तो मैं समझता हूं कि ये प्रयास सार्थक होगा।


हम वो लोग हैं, जहां हमारी छोटी-छोटी चीज बड़ी समझने जैसी है। हम उस संस्कार सरिता से निकले हुए लोग हैं। जहां एक भिक्षुक भी भिक्षा मांगने के लिए जाता है, तो भी उसके मिहिल मुंह से निकलता है ‘जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला’। ये छोटी बात नहीं है। ये एक वो संस्कार परम्परा का परिणाम है कि एक भिक्षुक मुंह से भी शब्द निकलता है ‘देगा उसका भी भला जो नहीं देगा उसका भी भला’। यानी मूल चिंतन तत्वभाव यह है कि सबका भला हो सबका कल्याण हो। ये हर प्रकार से हमारी रगों में भरा पड़ा है। हमी तो लोग हैं जिनको सिखाया गया है। तेन तत्तेन भूंजीथा। क्या तर के ही भोगेगा ये अप्रतीम आनन्द होता है। ये हमारी रगों में भरा पड़ा है। जो हमारी रगों में है, वो क्या हमारे जीवन आचरण से अछूता तो नहीं हो रहा है। इतनी महान परम्परा को कहीं हम खो तो नहीं दे रहे हैं। लेकिन कभी उसको जगजोड़ा किया जाए कि अनुभव आता है कि नहीं आज भी ये सामर्थ हमारे देश में पड़ा है।

किसी समय इस देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश को आहवान किया था कि सप्ताह में एक दिन शाम का खाना छोड़ दीजिए। देश को अन्न की जरूरत है। और इस देश के कोटी-कोटी लोगों ने तेन त्यक्तेन भुंजीथा इसको अपने जीवन में चरितार्थ करके, करके दिखाया था। और कुछ पीढ़ी तो लोग अभी भी जिन्दा हैं। जो लालबहादुर शास्त्री ने कहा था। सप्ताह में एक दिन खाना नहीं खाते हैं। ऐसे लोग आज भी हैं। तेन त्यक्तेन भुंजीथा का मंत्र हमारी रगों में पला है। पिछले दिनों में ऐसे ही बातों-बातों में मैंने पिछले मार्च महीने में देश के लोगों के सामने एक विषय रखा था। ऐसे ही रखा था। रखते समय मैंने भी नहीं सोचा था कि मेरे देश के जनसामान्य का मन इतनी ऊंचाइयों से भरा पड़ा है। कभी-कभी लगता है कि हम उन ऊंचाईयों को पहुंचने में कम पड़ जाते हैं। मैंने इतना ही कहा था। अगर आप सम्पन्न हैं, आप समर्थ हैं, तो आप रसोई गैस की सब्सिडी क्या जरूरत है छोड़ दीजिये न। हजार-पंद्रह सौ रुपये में क्या रखा है। इतना ही मैंने कहा था। और आज मैं मेरे देश के एक करोड़ से ज्यादा परिवारों के सामने सर झुका कर कहना चाहता हूं और दुनिया के सामने कहना चाहता हूं। एक करोड़ से ज्यादा परिवारों ने अपनी गैस सब्सिडी छोड़ दी। तेन त्यक्तेन भुंजीथा । और उसका परिणाम क्या है। परिणाम शासन व्यवस्था पर भी सीधा होता है। हमारे मन में विचार आया कि एक करोड़ परिवार गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ रहे हैं तो इसका हक़ सरकार की तिजोरी में भरने के लिये नहीं बनता है।

ये फिर से गरीब के घर में जाना चाहिए। जो मां लकड़ी का चूल्हा जला कर के एक दिन में चार सौ सिगरेट जितना धुआं अपने शरीर में ले जाती है। उस मां को लकड़ी के चूल्हे से मुक्त करा के रसोई गैस देना चाहिए और उसी में से संकल्प निकला कि तीन साल में पांच करोड़ परिवारों को गैस सिलेंडर दे कर के उनको इस धुएं वाले चूल्हे से मुक्ति दिला देंगे।

यहाँ एक चर्चा में पर्यावरण का मुद्दा है। मैं समझता हूं पांच करोड़ परिवारों में लकड़ी का चूल्हा न जलना ये जंगलों को भी बचाएगा, ये कार्बन को भी कम करेगा और हमारी माताओं को गरीब माताओं के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन लाएगा। यहां पर नारी की एम्पावरमेंट की बात हुई नारी की dignity की बात हुई है। ये गैस का चूल्हा उसकी dignity को कायम करता है। उसकी स्वास्थ्य की चिंता करता है और इस लिए मैं कहता हूं - तेन त्यक्तेन भुंजीथा । इस मंत्र में अगर हम भरोसा करें। सामान्य मानव को हम इसका विश्वास दिला दें तो हम किस प्रकार का परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं। ये अनुभव कर रहे हैं।

हमारा देश, मैं नहीं मानता हूं हमारे शास्त्रों में ऐसी कोई चीज है, जिसके कारण हम भटक जाएं। ये हमलोग हैं कि हमारी मतलब की चीजें उठाते रहते हैं और पूर्ण रूप से चीजों को देखने का स्वभाव छोड़ दिया है। हमारे यहां कहा गया है – नर करनी करे तो नारायण हो जाए - और ये हमारे ऋषियों ने मुनियों ने कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर भक्ति करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर कथा करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा। संतों ने भी कहा हैः नर करनी करे तो नारायण हो जाए और इसीलिए ये 51 अमृत बिन्दु हमारे सामने है। उसका एक संदेश यही है कि नर करनी करे तो नारायण हो जाए। और इसलिए हम करनी से बाध्य होने चाहिए और तभी तो अर्जुन को भी यही तो कहा था योगः कर्मसु कौशलम्। यही हमारा योग है, जिसमें कर्म की महानता को स्वीकार किया गया है और इसलिए इस पवित्र कार्य के अवसर पर हम उस विचार प्रवाह को फिर से एक बार पुनर्जीवित कर सकते हैं क्या तमसो मा ज्योतिरगमय। ये विचार छोटा नहीं है। और प्रकाश कौनसा वो कौनसी ज्योति ये ज्योति ज्ञान की है, ज्योति प्रकाश की है। और हमी तो लोग हैं जो कहते हैं कि ज्ञान को न पूरब होता है न पश्चिम होता है। ज्ञान को न बीती हुई कल होती है, ज्ञान को न आने वाली कल होती है। ज्ञान अजरा अमर होता है और हर काल में उपकारक होता है। ये हमारी परम्परा रही है और इसलिए विश्व में जो भी श्रेष्ठ है इसको लेना, पाना, पचाना internalize करना ये हमलोगों को सदियों से आदत रही है।

हम एक ऐसे समाज के लोग हैं। जहां विविधताएं भी हैं और कभी-कभी बाहर वाले व्यक्ति को conflict भी नजर आता है। लेकिन दुनिया जो conflict management को लेकर के इतनी सैमिनार कर रही है, लेकिन रास्ते नहीं मिल रहे। हमलोग हैं inherent conflict management का हमें सिखाया गया है। वरना दो extreme हम कभी भी नहीं सोच सकते थे। हम भगवान राम की पूजा करते हैं, जिन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया था। और हम वो लोग हैं, जो प्रहलाद की भी पूजा करते हैं, जिसने पिता की आज्ञा की अवमानना की थी। इतना बड़ा conflict, एक वो महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा को माना वो भी हमारे पूजनीय और एक दूसरा महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा क का अनादर किया वो भी हमारा महापुरुष।

हम वो लोग हैं जिन्होंने माता सीता को प्रणाम करते हैं। जिसने पति और ससुर के इच्छा के अनुसार अपना जीवन दे दिया। और उसी प्रकार से हम उस मीरा की भी भक्ति करते हैं जिसने पति की आज्ञा की अवज्ञा कर दी थी। यानी हम किस प्रकार के conflict management को जानने वाले लोग हैं। ये हमारी स्थिति का कारण क्या है और कारण ये है कि हम हठबाधिता से बंधे हुए लोग नहीं हैं। हम दर्शन के जुड़े हुए लोग हैं। और दर्शन, दर्शन तपी तपाई विचारों की प्रक्रिया और जीवन शैली में से निचोड़ के रूप में निकलता रहता है। जो समयानुकूल उसका विस्तार होता जाता है। उसका एक व्यापक रूप समय में आता है। और इसलिए हम उस दर्शन की परम्पराओं से निकले हुए लोग हैं जो दर्शन आज भी हमें इस जीवन को जीने के लिए प्रेरणा देता है।

यहां पर विचार मंथन में एक विषय यह भी रहा – Values, Values कैसे बदलते हैं। आज दुनिया में अगर आप में से किसी को अध्ययन करने का स्वभाव हो तो अध्ययन करके देखिये। दुनिया के समृद्ध-समृद्ध देश जब वो चुनाव के मैदान में जाते हैं, तो वहां के राजनीतिक दल, वहां के राजनेता उनके चुनाव में एक बात बार-बार उल्लेख करते हैं। और वो कहते हैं – हम हमारे देश में families values को पुनःप्रस्थापित करेंगे। पूरा विश्व, परिवार संस्था, पारिवारिक जीवन के मूल्य उसका महत्व बहुत अच्छी तरह समझने लगा है। हम उसमें पले बड़े हैं। इसलिये कभी उसमें छोटी सी भी इधर-उधर हो जाता है तो पता नहीं चलता है कि कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। लेकिन हमारे सामने चुनौती है कि values और values यानी वो विषय नहीं है कि आपकी मान्यता और मेरी मान्यता। जो समय की कसौटी पर कस कर के खरे उतरे हैं, वही तो वैल्यूज़ होते हैं। और इसलिए हर समाज के अपने वैल्यूज़ होते हैं। उन values के प्रति हम जागरूक कैसे हों। इन दिनों मैं देखता हूं। अज्ञान के कारण कहो, या तो inferiority complex के कारण कहो, जब कोई बड़ा संकट आ जाता है, बड़ा विवाद आ जाता है तो हम ज्यादा से ज्यादा ये कह कर भाग जाते हैं कि ये तो हमारी परम्परा है। आज दुनिया इस प्रकार की बातों को मानने के लिए नहीं है।

हमने वैज्ञानिक आधार पर अपनी बातों को दुनिया के सामने रखना पड़ेगा। और इसलिये यही तो कुम्भ के काल में ये विचार-विमर्श आवश्यकता है, जो हमारे मूल्यों की, हमारे विचारों की धार निकाल सके।

हम जानते हैं कभी-कभी जिनके मुंह से परम्परा की बात सुनते हैं। यही देश ये मान्यता से ग्रस्त था कि हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने संतों ने समुद्र पार नहीं करना चाहिए। विदेश नहीं जाना चाहिए। ये हमलोग मानते थे। और एक समय था, जब समुद्र पार करना बुरा माना जाता था। वो भी एक परम्परा थी लेकिन काल बदल गया। वही संत अगर आज विश्व भ्रमण करते हैं, सातों समुद्र पार करके जाते हैं। परम्पराएं उनके लिए कोई रुकावट नहीं बनती हैं, तो और चीजों में परम्पराएं क्यों रुकावट बननी चाहिए। ये पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और इसलिए परम्पराओं के नाम पर अवैज्ञानिक तरीके से बदले हुए युग को, बदले हुए समाज को मूल्य के स्थान पर जीवित रखते हुए उसको मोड़ना, बदलना दिशा देना ये हम सबका कर्तव्य बनता है, हम सबका दायित्व बनता है। और उस दायित्व को अगर हम निभाते हैं तो मुझे विश्वास है कि हम समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं।

आज विश्व दो संकटों से गुजर रहा है। एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग दूसरी तरफ आतंकवाद। क्या उपाय है इसका। आखिर इसके मूल पर कौन सी चीजें पड़ी हैं। holier than thou तेरे रास्ते से मेरा रास्ता ज्यादा सही है। यही तो भाव है जो conflict की ओर हमें घसीटता ले चला जा रहा है। विस्तारवाद यही तो है जो हमें conflict की ओर ले जा रहा है। युग बदल चुका है। विस्तारवाद समस्याओं का समाधान नहीं है। हम हॉरीजॉन्टल की तरह ही जाएं समस्याओं का समाधान नहीं है। हमें वर्टिकल जाने की आवश्यकता है अपने भीतर को ऊपर उठाने की आवश्यकता है, व्यवस्थाओं को आधुनिक करने की आवश्यकता है। नई ऊंचाइयों को पार करने के लिए उन मूल्यों को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है और इसलिये समय रहते हुए मूलभूत चिंतन के प्रकाश में, समय के संदर्भ में आवश्यकताओं की उपज के रूप में नई विधाओं को जन्म देना होगा। वेद सब कुछ है लेकिन उसके बाद भी हमी लोग हैं जिन्होंने वेद के प्रकाश में उपनिषदों का निर्माण किया। उपनिषद में बहुत कुछ है। लेकिन समय रहते हमने भी वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में समृति और स्रुति को जन्म दिया और समृति और स्रुतियां, जो उस कालखंड को दिशा देती है, उसके आधार पर हम चलें। आज हम में किसी को वेद के नाम भी मालूम नहीं होंगे। लेकिन वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में श्रुति और समृति वो आज भी हमें दिशा देती हैं। समय की मांग है कि अगर 21वीं सदी में मानव जाति का कल्याण करना है तो चाहे वेद के प्रकाश में उपनिषद रही हो, उपनिषद के प्रकाश में समृति और श्रुति रही हो, तो समृति और श्रुति के प्रकाश में 21वीं सदी के मानव के कल्याण के लिए किन चीजों की जरूरत है ये 51 अमृत बिन्दु शायद पूर्णतयः न हो कुछ कमियां उसमें भी हो सकती हैं। क्या हम कुम्भ के मेले में ऐसे अमृत बिन्दु निकाल कर के आ सकते हैं।

मुझे विश्वास है कि हमारा इतना बड़ा समागम। कभी – कभी मुझे लगता है, दुनिया हमे कहती है कि हम बहुत ही unorganised लोग हैं। बड़े ही विचित्र प्रकार का जीवन जीने वाले बाहर वालों के नजर में हमें देखते हैं। लेकिन हमें अपनी बात दुनिया के सामने सही तरीके से रखनी आती नहीं है। और जिनको रखने की जिम्मेवारी है और जिन्होंने इस प्रकार के काम को अपना प्रोफेशन स्वीकार किया है। वे भी समाज का जैसा स्वभाव बना है शॉर्टकट पर चले जाते हैं। हमने देखा है कुम्भ मेला यानी एक ही पहचान बना दी गई है नागा साधु। उनकी फोटो निकालना, उनका प्रचार करना, उनका प्रदर्शन के लिए जाना इसीके आसपास उसको सीमित कर दिया गया है। क्या दुनिया को हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारे देश के लोगों की कितनी बड़ी organizing capacity है। क्या ये कुम्भ मेले का कोई सर्कुलर निकला था क्या। निमंत्रण कार्ड गया था क्या।

हिन्दुस्तान के हर कोने में दुनिया में रहते हुए भारतीय मूल के लोगों को कोई इनविटेशन कार्ड गया था क्या। कोई फाइवस्टार होटलों का बुकिंग था क्या। एक सिपरा मां नदी के किनारे पर उसकी गोद में हर दिन यूरोप के किसी छोटे देश की जनसंख्या जितने लोग आते हों, 30 दिन तक आते हों। जब प्रयागराज में कुंभ का मेला हो तब गंगा मैया के किनारे पर यूरोप का एकाध देश daily इकट्ठा होता हो, रोज नए लोग आते हों और कोई भी संकट न आता हो, ये management की दुनिया की सबसे बड़ी घटना है लेकिन हम भारत का branding करने के लिए इस ताकत का परिचय नहीं करवा रहे हैं।

मैं कभी-कभी कहता हूं हमारे हिंदुस्तान का चुनाव दुनिया के लिए अजूबा है कि इतना बड़ा देश दुनिया के कई देशों से ज्यादा वोटर और हमारा Election Commission आधुनिक Technology का उपयोग करते हुए सुचारु रूप से पूरा चुनाव प्रबंधन करता है। विश्व के लिए, प्रबंधन के लिए ये सबसे बड़ा case study है, सबसे बड़ा case study है। मैं तो दुनिया की बड़ी-बड़ी Universities को कहता हूं कि हमारे इस कुंभ मेले की management को भी एक case study के रूप में दुनिया की Universities को study करना चाहिए।

हमने अपने वैश्विक रूप में अपने आप को प्रस्तुत करने के लिए दुनिया को जो भाषा समझती है, उस भाषा में रखने की आदत भी समय की मांग है, हम अपनी ही बात को अपने ही तरीके से कहते रहेंगे तो दुनिया के गले नहीं उतरेगी। विश्व जिस बात को जिस भाषा में समझता है, जिस तर्क से समझता है, जिस आधारों के आधार पर समझ पाता है, वो समझाने का प्रयास इस चिंतन-मनन के द्वारा तय करना पड़ेगा। ये जब हम करते हैं तो मुझे विश्वास है, इस महान देश की ये सदियों पुरानी विरासत वो सामाजिक चेतना का कारण बन सकती है, युवा पीढ़ी के आकर्षण का कारण बन सकती है और मैं जो 51 बिंदु हैं उसके बाहर एक बात मैं सभी अखाड़े के अधिष्ठाओं को, सभी परंपराओं से संत-महात्माओं को मैं आज एक निवेदन करना चाहता हूं, प्रार्थना करना चाहता हूं। क्या यहां से जाने के बाद हम सभी अपनी परंपराओं के अंदर एक सप्ताह का विचार कुंभ हर वर्ष अपने भक्तों के बीच कर सकते हैं क्या।

मोक्ष की बातें करें, जरूर करें लेकिन एक सप्ताह ऐसा हो कि जहां धरती की सच्चाइयों के साथ पेड़ क्यों उगाना चाहिए, नदी को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए, बेटी को क्यों पढ़ाना चाहिए, नारी का गौरव क्यों करना चाहिए वैज्ञानिक तरीके से और देश भर के विधिवत जनों बुलाकर के, जिनकी धर्म में आस्था न हो, जो परमात्मा में विश्वास न करता हो, उसको भी बुलाकर के जरा बताओ तो भाई और हमारा जो भक्त समुदाय है। उनके सामने विचार-विमर्श हर परंपरा में साल में एक बार 7 दिन अपने-अपने तरीके से अपने-अपने स्थान पर ज्ञानी-विज्ञानी को बुलाकर के विचार-विमर्श हो तो आप देखिए 3 साल के बाद अगला जब हमारा कुंभ का अवसर आएगा और 12 साल के बाद जो महाकुंभ आता है वो जब आएगा आप देखिए ये हमारी विचार-मंथन की प्रक्रिया इतनी sharpen हुई होगी, दुनिया हमारे विचारों को उठाने के लिए तैयार होगी।

जब अभी पेरिस में पुरा विश्व climate को लेकर के चिंतित था, भारत ने एक अहम भूमिका निभाई और भारत ने उन मूल्यों को प्रस्तावित करने का प्रयास किया। एक पुस्तक भी प्रसिद्ध हुई कि प्रकृति के प्रति प्रेम का धार्मिक जीवन में क्या-क्या महत्व रहा है और पेरिस के, दुनिया के सामने life style को बदलने पर बल दिया, ये पहली बार हुआ है।

हम वो लोग हैं जो पौधे में भी परमात्मा देखते हैं, हम वो लोग हैं जो जल में भी जीवन देखते हैं, हम वो लोग हैं जो चांद और सूरज में भी अपने परिवार का भाव देखते हैं, हम वो लोग हैं जिनको... आज शायद अंतरराष्ट्रीय Earth दिवस मनाया जाता होगा, पृथ्वी दिवास मनाया जाता होगा लेकिन देखिए हम तो वो लोग हैं जहां बालक सुबह उठकर के जमीन पर पैर रखता था तो मां कहती थी कि बेटा बिस्तर पर से जमीन पर जब पैर रखते हो तो पहले ये धरती मां को प्रणाम करो, माफी मांगों, कहीं तेरे से इस धरती मां को पीढ़ा न हो हो जाए। आज हम धरती दिवस मनाते हैं, हम तो सदियों से इस परंपरा को निभाते आए हैं।

हम ही तो लोग हैं जहां मां, बालक को बचपन में कहती है कि देखो ये पूरा ब्रहमांड तुम्हारा परिवार है, ये चाँद जो है न ये चाँद तेरा मामा है। ये सूरज तेरा दादा है। ये प्रकृति को अपना बनाना, ये हमारी विशेषता रही है।

सहज रूप से हमारे जीवन में प्रकृति का प्रेम, प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन के संस्कार हमें मिले हैं और इसलिए जिन बिंदुओं को लेकर के आज हम चलना चाहते हैं। उन बिंदुओं पर विश्वास रखते हुए और जो काल बाह्य है उसको छोड़ना पड़ेगा। हम काल बाह्य चीजों के बोझ के बीच जी नहीं सकते हैं और बदलाव कोई बड़ा संकट है, ये डर भी मैं नहीं मानता हूं कि हमारी ताकत का परिचय देता है। अरे बदलाव आने दो, बदलाव ही तो जीवन होता है। मरी पड़ी जिंदगी में बदलाव नहीं होता है, जिंदा दिल जीवन में ही तो बदलाव होता है, बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। हम सर्वसमावेशक लोग हैं, हम सबको जोड़ने वाले लोग हैं। ये सबको जोड़ने का हमारा सामर्थ्य है, ये कहीं कमजोर तो नहीं हो रहा अगर हम कमजोर हो गए तो हम जोड़ने का दायित्व नहीं निभा पाएंगे और शायद हमारे सिवा कोई जोड़ पाएगा कि नहीं पाएगा ये कहना कठिन है इसलिए हमारा वैश्विक दायित्व बनता है कि जोड़ने के लिए भी हमारे भीतर जो विशिष्ट गुणों की आवश्यकता है उन गुणों को हमें विकसित करना होगा क्योंकि संकट से भरे जन-जीवन को सुलभ बनाना हम लोगों ने दायित्व लिया हुआ है और हमारी इस ऋषियों-मुनियों की परंपरा ज्ञान के भंडार हैं, अनुभव की एक महान परंपरा रही है, उसके आधार पर हम इसको लेकर के चलेंगे तो मुझे पूरा विश्वास है कि जो अपेक्षाएं हैं, वो पूरी होंगी। आज ये समारोह संपन्न हो रहा है।

मैं शिवराज जी को और उनकी पूरी टीम को हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं इतने उत्तम योजना के लिए, बीच में प्रकृति ने कसौटी कर दी। अचानक आंधी आई, तूफान सा बारिश आई, कई भक्त जनों को जीवन अपना खोना पड़ा लेकिन कुछ ही घंटों में व्यवस्थाओं को फिर से ठीक कर दी। मैं उन सभी 40 हजार के करीब मध्य प्रदेश सरकार के छोटे-मोटे साथी सेवारत हैं, मैं विशेष रूप से उनको बधाई देना चाहता हूं कि आपके इस प्रयासों के कारण सिर्फ मेला संपन्न हुआ है, ऐसा नहीं है। आपके इन उत्तम प्रयासों के कारण विश्व में भारत की एक छवि भी बनी है। भारत के सामान्य मानव के मन में हमारा अपने ऊपर एक विश्वास बढ़ता है इस प्रकार के चीजों से और इसलिए जिन 40 हजार के करीब लोगों ने 30 दिन, दिन-रात मेहनत की है उनको भी मैं बधाई देना चाहता हूं, मैं उज्जैनवासियों का भी हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं, उन्होंने पूरे विश्व का यहां स्वागत किया, सम्मान किया, अपने मेहमान की तरह सम्मान किया और इसलिए उज्जैन के मध्य प्रदेश के नागरिक बंधु भी अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं, उनको भी हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और अगले कुंभ के मेले तक हम फिर एक बार अपनी विचार यात्रा को आगे बढ़ाएं इसी शुभकामनाओं के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, फिर एक बार सभी संतों को प्रणाम और उनका आशीर्वाद, उनका सामर्थ्य, उनकी व्यवस्थाएं इस चीज को आगे चलाएगी, इसी अपेक्षा के साथ सबको प्रणाम।

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উত্তর প্রদেশের হরদোই-এ গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের উদ্বোধনী অনুষ্ঠানে প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ
April 29, 2026
This transformative infrastructure project will boost connectivity and drive progress across Uttar Pradesh: PM
Just as Maa Ganga has been the lifeline of UP and this country for thousands of years, similarly, in this era of modern progress, this expressway passing near her, will become the new lifeline of UP's development: PM
Recently, I had the opportunity to dedicate the Delhi-Dehradun Expressway to the nation.
I had then remarked that these emerging expressways are the lifelines shaping the destiny of a developing India, and these modern pathways are today heralding India's bright future: PM
Ganga Expressway will not only connect one end of UP to the other, it will also bring limitless possibilities of the NCR closer: PM

ভারত মাতার জয়।

 

মা গঙ্গার জয় ।

 

মা গঙ্গার জয় ।

 

মা গঙ্গার জয় । 

 

উত্তরপ্রদেশের রাজ্যপাল আনন্দীবেন প্যাটেল, মুখ্যমন্ত্রী শ্রী যোগী আদিত্যনাথজি, উপ-মুখ্যমন্ত্রী কেশব প্রসাদ মৌর্যজি, ব্রিজেশ পাঠকজি, কেন্দ্রীয় মন্ত্রিসভায় আমার সহকর্মী জিতিন প্রসাদজি, পঙ্কজ চৌধুরীজি, উত্তরপ্রদেশ সরকারের মন্ত্রী্রা, সাংসদ ও বিধায়করা, অন্যান্য জনপ্রতিনিধিরা এবং আমার প্রিয় ভাই ও বোনেরা, যাঁরা বিপুল সংখ্যায় এখানে সমবেত হয়েছেন। 

সবার প্রথমে, আমি ভগবান নরসিংহের এই পবিত্র ভূমিতে শ্রদ্ধা নিবেদন করি। মা গঙ্গা এখান দিয়ে বয়ে গেছেন। মাত্র কয়েক কিলোমিটার দূরেই তাঁর আশীর্বাদ বর্ষিত হচ্ছে। তাই, এই পুরো অঞ্চলটি কোনো তীর্থস্থানের চেয়ে কম নয়। আমি বিশ্বাস করি উত্তর প্রদেশকে দেওয়া এক্সপ্রেসওয়ের উপহারটিও মা গঙ্গারই একটি আশীর্বাদ। এখন, আপনারা মাত্র কয়েক ঘণ্টার মধ্যেই সঙ্গমে যেতে পারবেন এবং কাশীতে বাবার দর্শন সেরে ফিরেও আসতে পারবেন। 

 

বন্ধুগণ, 

 

হাজার হাজার বছর ধরে মা গঙ্গা যেমন উত্তর প্রদেশ এবং এই দেশের জীবনরেখার ভূমিকা পালন করছেন, তেমনি এই আধুনিক উন্নয়নের যুগে তাঁর পাশ দিয়ে যাওয়া এই এক্সপ্রেসওয়েটি উত্তর প্রদেশের বিকাশের জন্য একটি নতুন লাইফলাইন হয়ে উঠবে। কাকতালীয় ভাবে, গত চার-পাঁচ দিন ধরে আমি মা গঙ্গার সান্নিধ্যে রয়েছি। ২৪শে এপ্রিল, যখন আমি বাংলায় ছিলাম, তখন মা গঙ্গার দর্শন করেছিলাম, এবং তারপর গতকাল ছিলাম কাশীতে। আজ সকালে আবারও বাবা বিশ্বনাথ, মা অন্নপূর্ণা এবং মা গঙ্গার দর্শনের সৌভাগ্য আমার হয়েছে। আর এখন মা গঙ্গার নামাঙ্কিত এই এক্সপ্রেসওয়েটি উদ্বোধন করার সুযোগ পেয়েছি। উত্তর প্রদেশ সরকার এই এক্সপ্রেসওয়েটির নামকরণ মা গঙ্গার নামে করেছে, এর জন্য আমি আনন্দিত। এটি আমাদের উন্নয়নের স্বপ্নর প্রতিফলন। আমাদের ঐতিহ্যও এর মাধ্যমে প্রকাশিত হয়। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের জন্য আমি উত্তর প্রদেশের লক্ষ লক্ষ মানুষকে অভিনন্দন জানাই। 

 

বন্ধুরা,

 

গণতন্ত্রের উৎসবের নিরীখেও আজ একটি গুরুত্বপূর্ণ দিন। বাংলায় এখন দ্বিতীয় দফার ভোটগ্রহণ চলছে এবং যে খবর আমরা পাচ্ছি , তাতে জানা যাচ্ছে এবার ভোটারদের উপস্থিতি অনেক বেশি। প্রথম পর্বের মতোই, মানুষ দলে দলে ভোট দিতে বাড়ি থেকে আসছেন; সামাজিক মাধ্যমগুলিতে দীর্ঘ লাইনের ছবি ছড়িয়ে পড়ছে। বাংলায় ভোটগ্রহণ হচ্ছে এক ভয়মুক্ত পরিবেশে, যা গত ছয়-সাত দশকে অকল্পনীয় ছিল। মানুষ নির্ভয়ে ভোট দিচ্ছেন। এটি দেশের সংবিধান এবং শক্তিশালী গণতন্ত্রের পবিত্র প্রতীক। নিজেদের অধিকারের প্রতি সচেতন হয়ে বিপুল সংখ্যায় ভোট দেওয়ার জন্য আমি বাংলার মহান জনসাধারণকে কৃতজ্ঞতা জানাই। ভোটগ্রহণ শেষ হতে এখনও বেশ কয়েক ঘন্টা বাকি। আমি বাংলার জনগণকে গণতন্ত্রের এই উৎসবে সমান উৎসাহে অংশগ্রহণ করার জন্য আহ্বান জানাচ্ছি।

 

বন্ধুগণ,  

 

কিছুদিন আগে বিহারে অনুষ্ঠিত নির্বাচনে বিজেপি-এনডিএ বিপুল ভোটে জয়লাভ করে ইতিহাস সৃষ্টি করেছে। গতকালই গুজরাটের পুর নিগম, পৌরসভা, জেলা পঞ্চায়েত, টাউন কাউন্সিল এবং ব্লক স্তরে পঞ্চায়েত নির্বাচনের ফলাফল ঘোষিত হয়েছে। আর আপনারা, উত্তর প্রদেশে আমার সহনাগরিকরা, এটা জেনে আনন্দিত হবেন যে বিজেপি ৮০ থেকে ৮৫ শতাংশ পৌরসভা ও পঞ্চায়েতে জয়লাভ করেছে। এই পাঁচটি রাজ্য নির্বাচনেও বিজেপি ঐতিহাসিক বিজয়ের হ্যাটট্রিক অর্জন করবে সেই বিশ্বাস আমার রয়েছে। ৪ঠা মে-র ফলাফল বিকশিত ভারত গড়ার সংকল্পকে আরও শক্তিশালী করবে এবং দেশের উন্নয়নে নতুন উৎসাহের সঞ্চার করবে। 

 

বন্ধুগণ,  

দেশের দ্রুত উন্নয়নের জন্য আমাদের দ্রুততার সঙ্গে আধুনিক পরিকাঠামোও তৈরি করতে হবে। ২০২১ সালের ডিসেম্বরে আমি গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের শিলান্যাস করতে শাহজাহানপুরে এসেছিলাম। আপনারা দেখছেন, উত্তর প্রদেশের দীর্ঘতম গ্রিন করিডোর এক্সপ্রেসওয়ে, এবং দেশের অন্যতম বৃহত্তম এক্সপ্রেসওয়ে তৈরির কাজ, পাঁচ বছরের মধ্যেই শেষ হয়েছে। শীঘ্রই গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে মিরাট ছাড়িয়ে হরিদ্বার পর্যন্ত সম্প্রসারিত হবে। এর সুবিধা যাতে অন্যরাও পান, তার জন্য, ফারুখাবাদ লিঙ্ক এক্সপ্রেসওয়ে তৈরি করা হবে, যা এটিকে অন্যান্য এক্সপ্রেসওয়ের সঙ্গে যুক্ত করবে। এটিই ডাবল-ইঞ্জিন সরকারের স্বপ্ন! এই গতিতেই বিজেপি সরকার কাজ করে! এটিই বিজেপি সরকারের কাজ করার ধরণ! আজ হারদোইতে এর উদ্বোধন করা হচ্ছে। আবার গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের নির্মাণকাজ সম্পন্ন হওয়ার পাশাপাশি এর সম্প্রসারণ পরিকল্পনার কাজও শুরু হয়ে গেছে। 

ভাই ও বোনেরা, 

মাত্র কিছুদিন আগে দিল্লি-দেরাদুন এক্সপ্রেসওয়ে উদ্বোধন করার সুযোগ আমার হয়েছিল। আমি তখন বলেছিলাম , এই নবনির্মিত এক্সপ্রেসওয়েগুলো উন্নয়নশীল ভারতের হস্তরেখার মতো, এই আধুনিক হস্তরেখাগুলো ভারতের উজ্জ্বল ভবিষ্যতের সূচনা করছে। 

বন্ধুগণ, 

এখন আর সেই দিন আর নেই যখন একটা রাস্তার জন্য দশকের পর দশক অপেক্ষা করতে হতো! একবার ঘোষণা করা হলে, ফাইলগুলো বছরের পর বছর পড়ে থাকত! নির্বাচনের আগে শিলান্যাস হত, আর তারপর সরকার আসত আর যেত, কিন্তু কোনো কাজই হতো না। কখনও কখনও, পুরোনো ফাইল খুঁজে বের করতে ঊর্ধ্বতন কর্মকর্তাদের বছর দুয়েক লেগে যেত।  

 

বন্ধুগণ,  

 

ডাবল-ইঞ্জিন সরকারের সময়ে নির্ধারিত সময়ের মধ্যেই প্রকল্পের শিলান্যাস ও উদ্বোধন হয়। তাই, আজ যদি উত্তরপ্রদেশের এক্সপ্রেসওয়েগুলোর চেয়েও দ্রুতগামী কিছু থেকে থাকে, তবে তা হলো এই রাজ্যের উন্নয়নের গতি।

বন্ধুগণ,  

এই এক্সপ্রেসওয়েটি শুধু একটি হাইস্পিড রাস্তা নয়। এটি নতুন সম্ভাবনা, স্বপ্ন এবং সুযোগের প্রবেশদ্বার। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে প্রায় ৬০০ কিলোমিটার লম্বা। পশ্চিম উত্তর প্রদেশের মিরাট, বুলন্দশহর, হাপুর, আমরোহা, সম্ভল ও বাদাউন; মধ্য উত্তর প্রদেশের শাহজাহানপুর, হারদোই, উন্নাও ও রায়বেরেলি; এবং পূর্ব উত্তর প্রদেশের প্রতাপগড় ও প্রয়াগরাজসহ পার্শ্ববর্তী জেলাগুলিতে যোগাযোগ তৈরি করে গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে এই অঞ্চলের লক্ষ লক্ষ মানুষের জীবন বদলে দেবে।

 

বন্ধুগণ,  

এই অঞ্চল গঙ্গা নদী ও তার উপনদীগুলোর উর্বর মাটিতে আশীর্বাদপুষ্ট। কিন্তু পূর্ববর্তী সরকারগুলোর অবহেলার কারণে এখানকার কৃষকরা চরম দুর্দশার সম্মুখীন হতেন! তাদের ফসল প্রধান বাজারগুলোতে পৌঁছাতে পারছিল না। হিমঘরের অভাব ছিল, সরবরাহ ব্যবস্থা ছিল অপর্যাপ্ত, এবং কৃষকরা তাদের কঠোর পরিশ্রমের ন্যায্য মূল্য পেতেন না। এখন, সেই অসুবিধাগুলো দ্রুত সমাধান হয়ে যাবে। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের মাধ্যমে কম সময়ে প্রধান বাজারগুলোতে পৌছে যাবার সুযোগ তৈরি হবে। এখানে কৃষির জন্য প্রয়োজনীয় পরিকাঠামো গড়ে তোলা সম্ভব হবে। এতে আমাদের কৃষকদের আয় বাড়বে।  

বন্ধুগণ,  

গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে শুধু উত্তরপ্রদেশের এক প্রান্তকে অন্য প্রান্তের সঙ্গে যুক্ত করবে না, এটি এনসিআর অর্থাৎ জাতীয় রাজধানী অঞ্চলের বিপুল সম্ভাবনাকে আরও কাছে নিয়ে আসবে। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের ওপর দিয়ে গাড়ি চলাচল করবে এবং এর দুই পাশে নতুন শিল্পের সুযোগ তৈরি হবে। এর জন্য হারদোইয়ের মতো জেলাগুলিতে শিল্প করিডোর গড়ে তোলা হচ্ছে। হারদোই, শাহজাহানপুর, উন্নাও সহ ১২টি জেলাতেই নতুন শিল্প আসবে। ওষুধ, বস্ত্রের মতো বিভিন্ন শিল্পের ক্লাস্টার গড়ে উঠবে। যুবসম্প্রদায়ের জন্য কর্মসংস্থানের নতুন সুযোগও তৈরি হবে। 

 

বন্ধুগণ,

মুদ্রা যোজনা এবং ওডিওপি-র মতো প্রকল্পের ফলে আমাদের যুবসমাজ নতুন নতুন রেকর্ড গড়ছে। এখানে ক্ষুদ্র শিল্প এবং অতি ক্ষুদ্র, ক্ষুদ্র ও মাঝারী শিল্পোদ্যোগ-কে উৎসাহিত করা হচ্ছে। উন্নত যোগাযোগ ব্যবস্থার ফলে এই উদ্যোগগুলির জন্যও নতুন নতুন সুযোগ তৈরি হবে। মিরাটের ক্রীড়া শিল্প, সম্ভলের হস্তশিল্প, বুলন্দশহরের মৃৎশিল্প, হরদোইয়ের তাঁতশিল্প, উন্নাওয়ের চর্মশিল্প, প্রতাপগড়ের আমলকী থেকে উৎপাদিত সামগ্রী —এ সবই দেশ বিদেশের বাজারে পৌঁছাবে। এর ফলে লক্ষ লক্ষ পরিবারের আয় বাড়বে। বলুন তো, পূর্ববর্তী সমাজবাদী পার্টির সরকারের আমলে কেউ কি ভেবেছিলেন, হরদোই এবং উন্নাওয়ের মতো জেলায় শিল্প করিডোর তৈরি হবে? কেউ কি কখনো ভেবেছিলেন, আমাদের হরদোইয়ের মধ্যে দিয়ে একটি এক্সপ্রেসওয়ে যাবে? এই কাজ শুধুমাত্র বিজেপি সরকারের আমলেই সম্ভব।  

বন্ধুগণ, 

একসময় উত্তর প্রদেশকে একটি অনগ্রসর এবং “বিমারু” রাজ্য বলা হতো। সেই উত্তর প্রদেশই আজ ১ লক্ষ কোটি ডলারের অর্থনীতি হওয়ার পথে এগিয়ে চলেছে। এটি অনেক বড় এক লক্ষ্য। কিন্তু এর পেছনে রয়েছে সমানভাবে নানা উদ্যোগ গ্রহণ। কারণ উত্তর প্রদেশের রয়েছে বিপুল সম্ভাবনা। দেশের বিপুল যুবক যুবতীর সম্ভাবনা রয়েছে উত্তর প্রদেশে। আমরা এই শক্তিকে কাজে লাগিয়ে উত্তর প্রদেশকে একটি উৎপাদন কেন্দ্র হিসেবে গড়ে তুলছি। উত্তর প্রদেশে নতুন শিল্প ও কারখানা গড়ে উঠবে। যখন এখানে বড় আকারের বিনিয়োগ হবে, কেবল তখনই অর্থনৈতিক বিকাশের দরজা খুলবে এবং যুবসম্প্রদায়ের জন্য কর্মসংস্থানের সুযোগ তৈরি হবে। 

 

ভাই ও বোনেরা,   

এই পরিকল্পনাগুলি বাস্তবায়নের জন্য সাম্প্রতিক বছরগুলোতে নিরন্তর কাজ করা হচ্ছে। আপনারা নিজেরাই বুঝতে পারছেন, যে উত্তর প্রদেশ থেকে আগে সকলে কাজের খোজে অন্য জায়গায় চলে যেতেন, আজ তা বিনিয়োগকারীদের সম্মেলন এবং শিল্প করিডোরের জন্য পরিচিতি লাভ করছে। উত্তর প্রদেশে বিনিয়োগকারী সম্মেলনে দেশ ও বিশ্বের বিভিন্ন কোম্পানি আসে। উত্তর প্রদেশে হাজার হাজার কোটি টাকা বিনিয়োগ করা হচ্ছে। আজ যদি ভারত বিশ্বের দ্বিতীয় বৃহত্তম মোবাইল নির্মাতা হয়, তবে এতে উত্তর প্রদেশের বড় অবদান রয়েছে। ভারত আজ যত মোবাইল তৈরি করছে, তার অর্ধেকই আমাদের উত্তর প্রদেশে তৈরি হচ্ছে। মাত্র কয়েক সপ্তাহ আগে, আমি নয়ডায় একটি সেমিকন্ডাক্টর প্ল্যান্টের শিলান্যাস করেছি। 

 

বন্ধুগণ, 

আপনারা সকলেই জানেন, এআই-এর এই যুগে সেমিকন্ডাক্টর একটি বিরাট ক্ষেত্র হয়ে উঠছে। উত্তর প্রদেশ এক্ষেত্রেও নেতৃত্ব দিচ্ছে। ভবিষ্যতে এই রাজ্যের মানুষের জন্য প্রচুর সুযোগ-সুবিধা তৈরি হবে। 

 

বন্ধুগণ, 

আজ উত্তর প্রদেশের শিল্পোন্নয়ন ভারতের কৌশলগত শক্তিতে পরিণত হচ্ছে। বর্তমানে দেশের দুটি প্রতিরক্ষা করিডোরের মধ্যে একটি উত্তর প্রদেশে । বড় বড় প্রতিরক্ষা সরঞ্জাম উৎপাদনকারী সংস্থাগুলো এখানে তাদের কারখানা স্থাপন করছে। বিশ্বজুড়ে স্বীকৃত ব্রাহমোসের মতো ক্ষেপণাস্ত্র আজ উত্তর প্রদেশেই তৈরি হচ্ছে। প্রতিরক্ষা সরঞ্জাম তৈরির জন্য প্রয়োজনীয় ছোট ছোট যন্ত্রাংশ সরবরাহ করছে অতি ক্ষুদ্র, ক্ষুদ্র ও মাঝারি শিল্প উদ্যোগ বা এমএসএমই। এতে উত্তর প্রদেশের এমএসএমই ক্ষেত্র প্রভূত লাভবান হচ্ছে। এমনকি ছোট ছোট জেলার যুবসম্প্রদায়ও এখন বড় শিল্পের সঙ্গে যুক্ত হওয়ার স্বপ্ন দেখতে পারেন।  

 

বন্ধুগণ,   

আজ উত্তর প্রদেশ এত দ্রুত উন্নতি করছে কারণ ইউপি পুরনো রাজনীতি বদলে একটি নতুন পরিচয় তৈরি করেছে। মনে রাখবেন, একটা সময় ছিল যখন ইউপি মানেই ছিল রাস্তার গর্ত। আজ সেই ইউপিই দেশের সবচেয়ে বেশি এক্সপ্রেসওয়ের রাজ্যে পরিণত হয়েছে। আগে পার্শ্ববর্তী জেলাগুলিতে যাওয়াও খুব ঝামেলার ছিল। কিন্তু আজ উত্তর প্রদেশে ২১টি বিমানবন্দর রয়েছে, যার মধ্যে ৫টি আন্তর্জাতিক বিমানবন্দর। এখন নয়ডা আন্তর্জাতিক বিমানবন্দরেরও উদ্বোধন হয়ে গেছে। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে থেকে নয়ডা আন্তর্জাতিক বিমানবন্দর মাত্র কয়েক ঘণ্টার দূর।  

 

ভাই ও বোনেরা,  

আমাদের উত্তর প্রদেশ ভগবান রাম ও ভগবান কৃষ্ণের ভূমি। কিন্তু পূর্ববর্তী সরকারগুলির অপকর্মের জন্য উত্তর প্রদেশ অপরাধ ও জঙ্গলরাজের মাধ্যমে পরিচিত হত। উত্তর প্রদেশের মাফিয়াদের নিয়ে সিনেমা তৈরি হত। কিন্তু এখন উত্তর প্রদেশের আইন-শৃঙ্খলা পরিস্থিতি সারা দেশে উদাহরণ হিসেবে তুলে ধরা হয়।

 

ভাই ও বোনেরা, 

সমাজবাদী পার্টির সদস্যদের হাত থেকে সম্পদ বণ্টনের ক্ষমতা চলে গেছে, তাই তারা উত্তর প্রদেশের এই বিকাশ পছন্দ করছেন না। তারা উত্তর প্রদেশকে আবার পুরনো যুগে ফিরিয়ে নিয়ে যেতে চান। তারা আবারও সমাজকে বিভক্ত করতে চান।

 

বন্ধুগণ,  

 

সমাজবাদী পার্টি যেমন উন্নয়ন-বিরোধী, একই ভাবে মহিলা-বিরোধীও । সম্প্রতি দেশ আবারও এসপি এবং কংগ্রেসের মতো দলগুলোর আসল চেহারা দেখেছে। কেন্দ্রে এনডিএ সরকার সংসদে নারী শক্তি বন্দন সংশোধনী এনেছিল। এই সংশোধনীটি পাশ হলে, ২০২৯ সালের নির্বাচন থেকেই বিধানসভা এবং লোকসভায় মহিলাদের জন্য সংরক্ষণের সুযোগ তৈরি হত! আমাদের অনেক মা ও বোন দিল্লি এবং লখনৌতে পৌঁছে সাংসদ ও বিধায়ক হতেন। সেটিও আবার অন্য কোনো শ্রেণীর আসন না কমিয়েই! কিন্তু সমাজবাদী পার্টি —এসপি এই সংশোধনী বিলের বিরুদ্ধে ভোট দিয়েছে।    

 

বন্ধুগণ, 

 

এই বিলটি সব রাজ্যেও আসন সংখ্যা বাড়িয়ে দিত। আমরা সংসদে স্পষ্টভাবে বলেছিলাম , সব রাজ্যে আসন সংখ্যা একই অনুপাতে বাড়বে। কিন্তু ডিএমকে-র মতো দল, যারা উত্তরপ্রদেশকে কটু কথা বলে রাজনীতি করে, তারা আপত্তি জানিয়েছিল যে উত্তরপ্রদেশের আসন কেন বাড়বে। দেখুন, সমাজবাদী পার্টিও সংসদে একই সুরে কথা বলছিল। এই এসপি সদস্যরা এখান থেকে আপনাদের ভোট নেয়, আর সংসদে তাদের পক্ষ নেয় যারা উত্তরপ্রদেশের মানুষকে গালি দেয়। এই কারণেই উত্তরপ্রদেশের মানুষ বলেন, সমাজবাদী পার্টি কখনও উন্নতি করতে পারবে না। এই লোকেরা সবসময় মহিলা-বিরোধী রাজনীতি করবে। তারা সবসময় তোষণ এবং অপরাধীদের পক্ষ নেবে। এসপি কখনও পরিবারতন্ত্র এবং জাতপাতের রাজনীতির ঊর্ধ্বে উঠতে পারবে না। তারা সবসময় উন্নয়ন-বিরোধী রাজনীতি করবে। উত্তরপ্রদেশকে অবশ্যই এসপি এবং তার সহযোগীদের বিষয়ে সতর্ক থাকতে হবে। 

বন্ধুগণ, 

   

আজ দেশ একটি সংকল্প নিয়ে এগিয়ে চলেছে—বিকশিত ভারত গড়ার সংকল্প! এই সংকল্প পূরণে উত্তর প্রদেশের একটি অত্যন্ত বড় ভূমিকা রয়েছে। আপনারা দেখছেন, আজ সমগ্র বিশ্ব যুদ্ধ, অশান্তি এবং অস্থির এক পরিস্থিতির মধ্যে রয়েছে। বিশ্বের বড় বড় দেশগুলিতে অবস্থা বেশ খারাপ। কিন্তু ভারত ঠিক একই গতিতে উন্নয়নের পথে এগিয়ে চলেছে। বাইরের শত্রুদের জন্য এটা পছন্দের নয়। দেশের মধ্যে থাকা ক্ষমতালোভী কিছু মানুষও ভারতকে ছোট করার চেষ্টা করছে। তবুও, আমরা কেবল সুরক্ষিতই নই, উন্নয়নের নতুন রেকর্ডও তৈরি করছি। আমরা আত্মনির্ভর ভারতের অভিযানকে বাস্তবায়িত করছে। আমরা সবচেয়ে আধুনিক পরিকাঠামো নির্মাণ করছি। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে এই পথে আরও একটি শক্তিশালী পদক্ষেপ। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে আমাদের কাছে যে সম্ভাবনা নিয়ে আসবে, উত্তর প্রদেশের মানুষ তাদের কঠোর পরিশ্রম এবং প্রতিভা দিয়ে তাকে যে কাজে লাগাবেন, সে বিষয়ে আমি আত্মবিশ্বাসী। এই আশা রেখে, আমি আবারও আপনাদের সকলকে অনেক অভিনন্দন জানাই। অনেক ধন্যবাদ!     

 

ভারত মাতার জয়।

 

ভারত মাতার জয়।

 

বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম।

 

আপনাদের অনেক ধন্যবাদ!