Knowledge is immortal and is relevant in every era: PM Modi

Published By : Admin | May 14, 2016 | 13:13 IST
At Simhasth Kumbh convention, we are seeing birth of a new effort: PM
We belong to a tradition where even a Bhikshuk says, may good happen to every person: PM
We should tell the entire world about the organising capacity of an event like the Kumbh: PM
Lets hold Vichar Kumbh every year with devotees...discuss why we need to plant trees, educate girl child: PM

हम लोगों का एक स्वभाव दोष रहा है, एक समाज के नाते कि हम अपने आपको हमेशा परिस्थितियों के परे समझते हैं। हम उस सिद्धांतों में पले-बढ़े हैं कि जहां शरीर तो आता और जाता है। आत्मा के अमरत्व के साथ जुड़े हुए हम लोग हैं और उसके कारण हमारी आत्मा की सोच न हमें काल से बंधने देती है, न हमें काल का गुलाम बनने देती है लेकिन उसके कारण एक ऐसी स्थिति पैदा हुई कि हमारी इस महान परंपरा, ये हजारों साल पुरानी संस्कृति, इसके कई पहलू, वो परंपराए किस सामाजिक संदर्भ में शुरू हुई, किस काल के गर्भ में पैदा हुई, किस विचार मंथन में से बीजारोपण हुआ, वो करीब-करीब अलब्य है और उसके कारण ये कुंभ मेले की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई होगी उसके विषय में अनेक प्रकार के विभिन्न मत प्रचलित हैं, कालखंड भी बड़ा, बहुत बड़ा अंतराल वाला है।

कोई कहेगा हजार साल पहले, कोई कहेगा 2 हजार साल पहले लेकिन इतना निश्चित है कि ये परंपरा मानव जीवन की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्थाओं में से एक है। मैं अपने तरीक से जब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि कुंभ का मेला, वैसे 12 साल में एक बार होता है और नासिक हो, उज्जैन हो, हरिद्वार हो वहां 3 साल में एक बार होता है प्रयागराज में 12 साल में एक बार होता है। उस कालखंड को हम देखें तो मुझे लगता है कि एक प्रकार से ये विशाल भारत को अपने में समेटने का ये प्रयास ये कुंभ मेले के द्वारा होता था। मैं तर्क से और अनुमान से कह सकता हूं कि समाज वेदता, संत-महंत, ऋषि, मुनि जो हर पल समाज के सुख-दुख की चर्चा और चिंता करते थे। समाज के भाग्य और भविष्य के लिए नई-नई विधाओं का अन्वेषण करते थे, Innovation करते थे। इन्हें वे हमारे ऋषि जहां भी थे वे बाह्य जगत का भी रिसर्च करते थे और अंतर यात्रा को भी खोजने का प्रयास करते थे तो ये प्रक्रिया निरंतर चलती रही, सदियों तक चलती रही, हर पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही लेकिन संस्कार संक्रमण का काम विचारों के संकलन का काम कालानुरूप विचारों को तराजू पर तौलने की परंपरा ये सारी बातें इस युग की परंपरा में समहित थी, समाहित थी।

एक बार प्रयागराज के कुंभ मेले में बैठते थे, एक Final decision लिया जाता था सबके द्वारा मिलकर के कि पिछले 12 साल में समाज यहां-यहां गया, यहां पहुंचा। अब अगले 12 साल के लिए समाज के लिए दिशा क्या होगी, समाज की कार्यशैली क्या होगी किन चीजों की प्राथमिकता होगी और जब कुंभ से जाते थे तो लोग उस एजेंडा को लेकर के अपने-अपने स्थान पर पहुंचते थे और हर तीन साल के बाद जबकि कभी नासिक में, कभी उज्जैन में, कभी हरिद्वार में कुंभ का मेला लगता था तो उसका mid-term appraisal होता था कि भई प्रयागराज में जो निर्णय हम करके गए थे तीन साल में क्या अनुभव आया और हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोग आते थे।

30 दिन तक एक ही स्थान पर रहकर के समाज की गतिविधियों, समाज की आवश्यकताएं, बदलता हुआ युग, उसका चिंतन-मनन करके उसमें फिर एक बार 3 साल का करणीय एजेंडा तय होता था। In the light of main Mahakumbh प्रयागराज में होता था और फिर 3 साल के बाद दूसरा जब कुंभ लगता था तो फिर से Review होता था। एक अद्भुत सामाजिक रचना थी ये लेकिन धीरे-धीरे अनुभव ये आता है कि परंपरा तो रह जाती है, प्राण खो जाता है। हमारे यहां भी अनुभव ये आया कि परंपरा तो रह गई लेकिन समय का अभाव है, 30 दिन कौन रहेगा, 45 दिन कौन रहेगा। आओ भाई 15 मिनट जरा डुबकी लगा दें, पाप धुल जाए, पुण्य कमा ले और चले जाए।

ऐसे जैसे बदलाव आय उसमें से उज्जैन के इस कुंभ में संतों के आशीर्वाद से एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है और ये नया प्रयास एक प्रकार से उस सदियों पुरानी व्यवस्था का ही एक Modern edition है और जिसमें वर्तमान समझ में, वैश्विक संदर्भ में मानव जाति के लिए क्या चुनौतियां हैं, मानव कल्याण के मार्ग क्या हो सकते हैं। बदलते हुए युग में काल बाह्य चीजों को छोड़ने की हिम्मत कैसे आए, पुरानी चीजों को बोझ लेकर के चलकर के आदमी थक जाता है। उन पुरानी काल बाह्य चीजों को छोड़कर के एक नए विश्वास, नई ताजगी के साथ कैसे आगे बढ़ जाए, उसका एक छोटा सा प्रयास इस विचार महाकुंभ के अंदर हुआ है।

जो 51 बिंदु, अमृत बिंदु इसमें से फलित हुए हैं क्योंकि ये एक दिन का समारोह नहीं है। जैसे शिवराज जी ने बताया। देश औऱ दुनिया के इस विषय के जानकार लोगों ने 2 साल मंथन किया है, सालभर विचार-विमर्श किया है और पिछले 3 दिन से इसी पवित्र अवसर पर ऋषियों, मुनियों, संतों की परंपरा को निभाने वाले महान संतों के सानिध्य में इसका चिंतन-मनन हुआ है और उसमें से ये 51 अमृत बिंदु समाज के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। मैं नहीं मानता हूं कि हम राजनेताओं के लिए इस बात को लोगों के गले उतारना हमारे बस की बात है। हम नहीं मानते हैं लेकिन हम इतना जरूर मानते हैं कि समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग चाहे वो गेरुए वस्त्र में हो या न हो लेकिन त्याग और तपस्था के अधिष्ठान पर जीवन जीते हैं। चाहे एक वैज्ञानिक अपनी laboratory में खपा हुआ हो, चाहे एक किसान अपने खेत में खपा हुआ हो, चाहे एक मजदूर अपना पसीना बहा रहा हे, चाहे एक संत समाज का मार्गदर्शन करता हो ये सारी शक्तियां, एक दिशा में चल पड़ सकती हैं तो कितना बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं और उस दिशा में ये 51 अमृत बिंदु जो है आने वाले दिनों में भारत के जनमानस को और वैश्विक जनसमूह को भारत किस प्रकार से सोच सकता है और राजनीतिक मंच पर से किस प्रकार के विचार प्रभाग समयानुकूल हो सकते हैं इसकी चर्चा अगर आने वाले दिनों में चलेगी, तो मैं समझता हूं कि ये प्रयास सार्थक होगा।


हम वो लोग हैं, जहां हमारी छोटी-छोटी चीज बड़ी समझने जैसी है। हम उस संस्कार सरिता से निकले हुए लोग हैं। जहां एक भिक्षुक भी भिक्षा मांगने के लिए जाता है, तो भी उसके मिहिल मुंह से निकलता है ‘जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला’। ये छोटी बात नहीं है। ये एक वो संस्कार परम्परा का परिणाम है कि एक भिक्षुक मुंह से भी शब्द निकलता है ‘देगा उसका भी भला जो नहीं देगा उसका भी भला’। यानी मूल चिंतन तत्वभाव यह है कि सबका भला हो सबका कल्याण हो। ये हर प्रकार से हमारी रगों में भरा पड़ा है। हमी तो लोग हैं जिनको सिखाया गया है। तेन तत्तेन भूंजीथा। क्या तर के ही भोगेगा ये अप्रतीम आनन्द होता है। ये हमारी रगों में भरा पड़ा है। जो हमारी रगों में है, वो क्या हमारे जीवन आचरण से अछूता तो नहीं हो रहा है। इतनी महान परम्परा को कहीं हम खो तो नहीं दे रहे हैं। लेकिन कभी उसको जगजोड़ा किया जाए कि अनुभव आता है कि नहीं आज भी ये सामर्थ हमारे देश में पड़ा है।

किसी समय इस देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश को आहवान किया था कि सप्ताह में एक दिन शाम का खाना छोड़ दीजिए। देश को अन्न की जरूरत है। और इस देश के कोटी-कोटी लोगों ने तेन त्यक्तेन भुंजीथा इसको अपने जीवन में चरितार्थ करके, करके दिखाया था। और कुछ पीढ़ी तो लोग अभी भी जिन्दा हैं। जो लालबहादुर शास्त्री ने कहा था। सप्ताह में एक दिन खाना नहीं खाते हैं। ऐसे लोग आज भी हैं। तेन त्यक्तेन भुंजीथा का मंत्र हमारी रगों में पला है। पिछले दिनों में ऐसे ही बातों-बातों में मैंने पिछले मार्च महीने में देश के लोगों के सामने एक विषय रखा था। ऐसे ही रखा था। रखते समय मैंने भी नहीं सोचा था कि मेरे देश के जनसामान्य का मन इतनी ऊंचाइयों से भरा पड़ा है। कभी-कभी लगता है कि हम उन ऊंचाईयों को पहुंचने में कम पड़ जाते हैं। मैंने इतना ही कहा था। अगर आप सम्पन्न हैं, आप समर्थ हैं, तो आप रसोई गैस की सब्सिडी क्या जरूरत है छोड़ दीजिये न। हजार-पंद्रह सौ रुपये में क्या रखा है। इतना ही मैंने कहा था। और आज मैं मेरे देश के एक करोड़ से ज्यादा परिवारों के सामने सर झुका कर कहना चाहता हूं और दुनिया के सामने कहना चाहता हूं। एक करोड़ से ज्यादा परिवारों ने अपनी गैस सब्सिडी छोड़ दी। तेन त्यक्तेन भुंजीथा । और उसका परिणाम क्या है। परिणाम शासन व्यवस्था पर भी सीधा होता है। हमारे मन में विचार आया कि एक करोड़ परिवार गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ रहे हैं तो इसका हक़ सरकार की तिजोरी में भरने के लिये नहीं बनता है।

ये फिर से गरीब के घर में जाना चाहिए। जो मां लकड़ी का चूल्हा जला कर के एक दिन में चार सौ सिगरेट जितना धुआं अपने शरीर में ले जाती है। उस मां को लकड़ी के चूल्हे से मुक्त करा के रसोई गैस देना चाहिए और उसी में से संकल्प निकला कि तीन साल में पांच करोड़ परिवारों को गैस सिलेंडर दे कर के उनको इस धुएं वाले चूल्हे से मुक्ति दिला देंगे।

यहाँ एक चर्चा में पर्यावरण का मुद्दा है। मैं समझता हूं पांच करोड़ परिवारों में लकड़ी का चूल्हा न जलना ये जंगलों को भी बचाएगा, ये कार्बन को भी कम करेगा और हमारी माताओं को गरीब माताओं के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन लाएगा। यहां पर नारी की एम्पावरमेंट की बात हुई नारी की dignity की बात हुई है। ये गैस का चूल्हा उसकी dignity को कायम करता है। उसकी स्वास्थ्य की चिंता करता है और इस लिए मैं कहता हूं - तेन त्यक्तेन भुंजीथा । इस मंत्र में अगर हम भरोसा करें। सामान्य मानव को हम इसका विश्वास दिला दें तो हम किस प्रकार का परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं। ये अनुभव कर रहे हैं।

हमारा देश, मैं नहीं मानता हूं हमारे शास्त्रों में ऐसी कोई चीज है, जिसके कारण हम भटक जाएं। ये हमलोग हैं कि हमारी मतलब की चीजें उठाते रहते हैं और पूर्ण रूप से चीजों को देखने का स्वभाव छोड़ दिया है। हमारे यहां कहा गया है – नर करनी करे तो नारायण हो जाए - और ये हमारे ऋषियों ने मुनियों ने कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर भक्ति करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर कथा करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा। संतों ने भी कहा हैः नर करनी करे तो नारायण हो जाए और इसीलिए ये 51 अमृत बिन्दु हमारे सामने है। उसका एक संदेश यही है कि नर करनी करे तो नारायण हो जाए। और इसलिए हम करनी से बाध्य होने चाहिए और तभी तो अर्जुन को भी यही तो कहा था योगः कर्मसु कौशलम्। यही हमारा योग है, जिसमें कर्म की महानता को स्वीकार किया गया है और इसलिए इस पवित्र कार्य के अवसर पर हम उस विचार प्रवाह को फिर से एक बार पुनर्जीवित कर सकते हैं क्या तमसो मा ज्योतिरगमय। ये विचार छोटा नहीं है। और प्रकाश कौनसा वो कौनसी ज्योति ये ज्योति ज्ञान की है, ज्योति प्रकाश की है। और हमी तो लोग हैं जो कहते हैं कि ज्ञान को न पूरब होता है न पश्चिम होता है। ज्ञान को न बीती हुई कल होती है, ज्ञान को न आने वाली कल होती है। ज्ञान अजरा अमर होता है और हर काल में उपकारक होता है। ये हमारी परम्परा रही है और इसलिए विश्व में जो भी श्रेष्ठ है इसको लेना, पाना, पचाना internalize करना ये हमलोगों को सदियों से आदत रही है।

हम एक ऐसे समाज के लोग हैं। जहां विविधताएं भी हैं और कभी-कभी बाहर वाले व्यक्ति को conflict भी नजर आता है। लेकिन दुनिया जो conflict management को लेकर के इतनी सैमिनार कर रही है, लेकिन रास्ते नहीं मिल रहे। हमलोग हैं inherent conflict management का हमें सिखाया गया है। वरना दो extreme हम कभी भी नहीं सोच सकते थे। हम भगवान राम की पूजा करते हैं, जिन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया था। और हम वो लोग हैं, जो प्रहलाद की भी पूजा करते हैं, जिसने पिता की आज्ञा की अवमानना की थी। इतना बड़ा conflict, एक वो महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा को माना वो भी हमारे पूजनीय और एक दूसरा महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा क का अनादर किया वो भी हमारा महापुरुष।

हम वो लोग हैं जिन्होंने माता सीता को प्रणाम करते हैं। जिसने पति और ससुर के इच्छा के अनुसार अपना जीवन दे दिया। और उसी प्रकार से हम उस मीरा की भी भक्ति करते हैं जिसने पति की आज्ञा की अवज्ञा कर दी थी। यानी हम किस प्रकार के conflict management को जानने वाले लोग हैं। ये हमारी स्थिति का कारण क्या है और कारण ये है कि हम हठबाधिता से बंधे हुए लोग नहीं हैं। हम दर्शन के जुड़े हुए लोग हैं। और दर्शन, दर्शन तपी तपाई विचारों की प्रक्रिया और जीवन शैली में से निचोड़ के रूप में निकलता रहता है। जो समयानुकूल उसका विस्तार होता जाता है। उसका एक व्यापक रूप समय में आता है। और इसलिए हम उस दर्शन की परम्पराओं से निकले हुए लोग हैं जो दर्शन आज भी हमें इस जीवन को जीने के लिए प्रेरणा देता है।

यहां पर विचार मंथन में एक विषय यह भी रहा – Values, Values कैसे बदलते हैं। आज दुनिया में अगर आप में से किसी को अध्ययन करने का स्वभाव हो तो अध्ययन करके देखिये। दुनिया के समृद्ध-समृद्ध देश जब वो चुनाव के मैदान में जाते हैं, तो वहां के राजनीतिक दल, वहां के राजनेता उनके चुनाव में एक बात बार-बार उल्लेख करते हैं। और वो कहते हैं – हम हमारे देश में families values को पुनःप्रस्थापित करेंगे। पूरा विश्व, परिवार संस्था, पारिवारिक जीवन के मूल्य उसका महत्व बहुत अच्छी तरह समझने लगा है। हम उसमें पले बड़े हैं। इसलिये कभी उसमें छोटी सी भी इधर-उधर हो जाता है तो पता नहीं चलता है कि कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। लेकिन हमारे सामने चुनौती है कि values और values यानी वो विषय नहीं है कि आपकी मान्यता और मेरी मान्यता। जो समय की कसौटी पर कस कर के खरे उतरे हैं, वही तो वैल्यूज़ होते हैं। और इसलिए हर समाज के अपने वैल्यूज़ होते हैं। उन values के प्रति हम जागरूक कैसे हों। इन दिनों मैं देखता हूं। अज्ञान के कारण कहो, या तो inferiority complex के कारण कहो, जब कोई बड़ा संकट आ जाता है, बड़ा विवाद आ जाता है तो हम ज्यादा से ज्यादा ये कह कर भाग जाते हैं कि ये तो हमारी परम्परा है। आज दुनिया इस प्रकार की बातों को मानने के लिए नहीं है।

हमने वैज्ञानिक आधार पर अपनी बातों को दुनिया के सामने रखना पड़ेगा। और इसलिये यही तो कुम्भ के काल में ये विचार-विमर्श आवश्यकता है, जो हमारे मूल्यों की, हमारे विचारों की धार निकाल सके।

हम जानते हैं कभी-कभी जिनके मुंह से परम्परा की बात सुनते हैं। यही देश ये मान्यता से ग्रस्त था कि हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने संतों ने समुद्र पार नहीं करना चाहिए। विदेश नहीं जाना चाहिए। ये हमलोग मानते थे। और एक समय था, जब समुद्र पार करना बुरा माना जाता था। वो भी एक परम्परा थी लेकिन काल बदल गया। वही संत अगर आज विश्व भ्रमण करते हैं, सातों समुद्र पार करके जाते हैं। परम्पराएं उनके लिए कोई रुकावट नहीं बनती हैं, तो और चीजों में परम्पराएं क्यों रुकावट बननी चाहिए। ये पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और इसलिए परम्पराओं के नाम पर अवैज्ञानिक तरीके से बदले हुए युग को, बदले हुए समाज को मूल्य के स्थान पर जीवित रखते हुए उसको मोड़ना, बदलना दिशा देना ये हम सबका कर्तव्य बनता है, हम सबका दायित्व बनता है। और उस दायित्व को अगर हम निभाते हैं तो मुझे विश्वास है कि हम समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं।

आज विश्व दो संकटों से गुजर रहा है। एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग दूसरी तरफ आतंकवाद। क्या उपाय है इसका। आखिर इसके मूल पर कौन सी चीजें पड़ी हैं। holier than thou तेरे रास्ते से मेरा रास्ता ज्यादा सही है। यही तो भाव है जो conflict की ओर हमें घसीटता ले चला जा रहा है। विस्तारवाद यही तो है जो हमें conflict की ओर ले जा रहा है। युग बदल चुका है। विस्तारवाद समस्याओं का समाधान नहीं है। हम हॉरीजॉन्टल की तरह ही जाएं समस्याओं का समाधान नहीं है। हमें वर्टिकल जाने की आवश्यकता है अपने भीतर को ऊपर उठाने की आवश्यकता है, व्यवस्थाओं को आधुनिक करने की आवश्यकता है। नई ऊंचाइयों को पार करने के लिए उन मूल्यों को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है और इसलिये समय रहते हुए मूलभूत चिंतन के प्रकाश में, समय के संदर्भ में आवश्यकताओं की उपज के रूप में नई विधाओं को जन्म देना होगा। वेद सब कुछ है लेकिन उसके बाद भी हमी लोग हैं जिन्होंने वेद के प्रकाश में उपनिषदों का निर्माण किया। उपनिषद में बहुत कुछ है। लेकिन समय रहते हमने भी वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में समृति और स्रुति को जन्म दिया और समृति और स्रुतियां, जो उस कालखंड को दिशा देती है, उसके आधार पर हम चलें। आज हम में किसी को वेद के नाम भी मालूम नहीं होंगे। लेकिन वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में श्रुति और समृति वो आज भी हमें दिशा देती हैं। समय की मांग है कि अगर 21वीं सदी में मानव जाति का कल्याण करना है तो चाहे वेद के प्रकाश में उपनिषद रही हो, उपनिषद के प्रकाश में समृति और श्रुति रही हो, तो समृति और श्रुति के प्रकाश में 21वीं सदी के मानव के कल्याण के लिए किन चीजों की जरूरत है ये 51 अमृत बिन्दु शायद पूर्णतयः न हो कुछ कमियां उसमें भी हो सकती हैं। क्या हम कुम्भ के मेले में ऐसे अमृत बिन्दु निकाल कर के आ सकते हैं।

मुझे विश्वास है कि हमारा इतना बड़ा समागम। कभी – कभी मुझे लगता है, दुनिया हमे कहती है कि हम बहुत ही unorganised लोग हैं। बड़े ही विचित्र प्रकार का जीवन जीने वाले बाहर वालों के नजर में हमें देखते हैं। लेकिन हमें अपनी बात दुनिया के सामने सही तरीके से रखनी आती नहीं है। और जिनको रखने की जिम्मेवारी है और जिन्होंने इस प्रकार के काम को अपना प्रोफेशन स्वीकार किया है। वे भी समाज का जैसा स्वभाव बना है शॉर्टकट पर चले जाते हैं। हमने देखा है कुम्भ मेला यानी एक ही पहचान बना दी गई है नागा साधु। उनकी फोटो निकालना, उनका प्रचार करना, उनका प्रदर्शन के लिए जाना इसीके आसपास उसको सीमित कर दिया गया है। क्या दुनिया को हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारे देश के लोगों की कितनी बड़ी organizing capacity है। क्या ये कुम्भ मेले का कोई सर्कुलर निकला था क्या। निमंत्रण कार्ड गया था क्या।

हिन्दुस्तान के हर कोने में दुनिया में रहते हुए भारतीय मूल के लोगों को कोई इनविटेशन कार्ड गया था क्या। कोई फाइवस्टार होटलों का बुकिंग था क्या। एक सिपरा मां नदी के किनारे पर उसकी गोद में हर दिन यूरोप के किसी छोटे देश की जनसंख्या जितने लोग आते हों, 30 दिन तक आते हों। जब प्रयागराज में कुंभ का मेला हो तब गंगा मैया के किनारे पर यूरोप का एकाध देश daily इकट्ठा होता हो, रोज नए लोग आते हों और कोई भी संकट न आता हो, ये management की दुनिया की सबसे बड़ी घटना है लेकिन हम भारत का branding करने के लिए इस ताकत का परिचय नहीं करवा रहे हैं।

मैं कभी-कभी कहता हूं हमारे हिंदुस्तान का चुनाव दुनिया के लिए अजूबा है कि इतना बड़ा देश दुनिया के कई देशों से ज्यादा वोटर और हमारा Election Commission आधुनिक Technology का उपयोग करते हुए सुचारु रूप से पूरा चुनाव प्रबंधन करता है। विश्व के लिए, प्रबंधन के लिए ये सबसे बड़ा case study है, सबसे बड़ा case study है। मैं तो दुनिया की बड़ी-बड़ी Universities को कहता हूं कि हमारे इस कुंभ मेले की management को भी एक case study के रूप में दुनिया की Universities को study करना चाहिए।

हमने अपने वैश्विक रूप में अपने आप को प्रस्तुत करने के लिए दुनिया को जो भाषा समझती है, उस भाषा में रखने की आदत भी समय की मांग है, हम अपनी ही बात को अपने ही तरीके से कहते रहेंगे तो दुनिया के गले नहीं उतरेगी। विश्व जिस बात को जिस भाषा में समझता है, जिस तर्क से समझता है, जिस आधारों के आधार पर समझ पाता है, वो समझाने का प्रयास इस चिंतन-मनन के द्वारा तय करना पड़ेगा। ये जब हम करते हैं तो मुझे विश्वास है, इस महान देश की ये सदियों पुरानी विरासत वो सामाजिक चेतना का कारण बन सकती है, युवा पीढ़ी के आकर्षण का कारण बन सकती है और मैं जो 51 बिंदु हैं उसके बाहर एक बात मैं सभी अखाड़े के अधिष्ठाओं को, सभी परंपराओं से संत-महात्माओं को मैं आज एक निवेदन करना चाहता हूं, प्रार्थना करना चाहता हूं। क्या यहां से जाने के बाद हम सभी अपनी परंपराओं के अंदर एक सप्ताह का विचार कुंभ हर वर्ष अपने भक्तों के बीच कर सकते हैं क्या।

मोक्ष की बातें करें, जरूर करें लेकिन एक सप्ताह ऐसा हो कि जहां धरती की सच्चाइयों के साथ पेड़ क्यों उगाना चाहिए, नदी को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए, बेटी को क्यों पढ़ाना चाहिए, नारी का गौरव क्यों करना चाहिए वैज्ञानिक तरीके से और देश भर के विधिवत जनों बुलाकर के, जिनकी धर्म में आस्था न हो, जो परमात्मा में विश्वास न करता हो, उसको भी बुलाकर के जरा बताओ तो भाई और हमारा जो भक्त समुदाय है। उनके सामने विचार-विमर्श हर परंपरा में साल में एक बार 7 दिन अपने-अपने तरीके से अपने-अपने स्थान पर ज्ञानी-विज्ञानी को बुलाकर के विचार-विमर्श हो तो आप देखिए 3 साल के बाद अगला जब हमारा कुंभ का अवसर आएगा और 12 साल के बाद जो महाकुंभ आता है वो जब आएगा आप देखिए ये हमारी विचार-मंथन की प्रक्रिया इतनी sharpen हुई होगी, दुनिया हमारे विचारों को उठाने के लिए तैयार होगी।

जब अभी पेरिस में पुरा विश्व climate को लेकर के चिंतित था, भारत ने एक अहम भूमिका निभाई और भारत ने उन मूल्यों को प्रस्तावित करने का प्रयास किया। एक पुस्तक भी प्रसिद्ध हुई कि प्रकृति के प्रति प्रेम का धार्मिक जीवन में क्या-क्या महत्व रहा है और पेरिस के, दुनिया के सामने life style को बदलने पर बल दिया, ये पहली बार हुआ है।

हम वो लोग हैं जो पौधे में भी परमात्मा देखते हैं, हम वो लोग हैं जो जल में भी जीवन देखते हैं, हम वो लोग हैं जो चांद और सूरज में भी अपने परिवार का भाव देखते हैं, हम वो लोग हैं जिनको... आज शायद अंतरराष्ट्रीय Earth दिवस मनाया जाता होगा, पृथ्वी दिवास मनाया जाता होगा लेकिन देखिए हम तो वो लोग हैं जहां बालक सुबह उठकर के जमीन पर पैर रखता था तो मां कहती थी कि बेटा बिस्तर पर से जमीन पर जब पैर रखते हो तो पहले ये धरती मां को प्रणाम करो, माफी मांगों, कहीं तेरे से इस धरती मां को पीढ़ा न हो हो जाए। आज हम धरती दिवस मनाते हैं, हम तो सदियों से इस परंपरा को निभाते आए हैं।

हम ही तो लोग हैं जहां मां, बालक को बचपन में कहती है कि देखो ये पूरा ब्रहमांड तुम्हारा परिवार है, ये चाँद जो है न ये चाँद तेरा मामा है। ये सूरज तेरा दादा है। ये प्रकृति को अपना बनाना, ये हमारी विशेषता रही है।

सहज रूप से हमारे जीवन में प्रकृति का प्रेम, प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन के संस्कार हमें मिले हैं और इसलिए जिन बिंदुओं को लेकर के आज हम चलना चाहते हैं। उन बिंदुओं पर विश्वास रखते हुए और जो काल बाह्य है उसको छोड़ना पड़ेगा। हम काल बाह्य चीजों के बोझ के बीच जी नहीं सकते हैं और बदलाव कोई बड़ा संकट है, ये डर भी मैं नहीं मानता हूं कि हमारी ताकत का परिचय देता है। अरे बदलाव आने दो, बदलाव ही तो जीवन होता है। मरी पड़ी जिंदगी में बदलाव नहीं होता है, जिंदा दिल जीवन में ही तो बदलाव होता है, बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। हम सर्वसमावेशक लोग हैं, हम सबको जोड़ने वाले लोग हैं। ये सबको जोड़ने का हमारा सामर्थ्य है, ये कहीं कमजोर तो नहीं हो रहा अगर हम कमजोर हो गए तो हम जोड़ने का दायित्व नहीं निभा पाएंगे और शायद हमारे सिवा कोई जोड़ पाएगा कि नहीं पाएगा ये कहना कठिन है इसलिए हमारा वैश्विक दायित्व बनता है कि जोड़ने के लिए भी हमारे भीतर जो विशिष्ट गुणों की आवश्यकता है उन गुणों को हमें विकसित करना होगा क्योंकि संकट से भरे जन-जीवन को सुलभ बनाना हम लोगों ने दायित्व लिया हुआ है और हमारी इस ऋषियों-मुनियों की परंपरा ज्ञान के भंडार हैं, अनुभव की एक महान परंपरा रही है, उसके आधार पर हम इसको लेकर के चलेंगे तो मुझे पूरा विश्वास है कि जो अपेक्षाएं हैं, वो पूरी होंगी। आज ये समारोह संपन्न हो रहा है।

मैं शिवराज जी को और उनकी पूरी टीम को हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं इतने उत्तम योजना के लिए, बीच में प्रकृति ने कसौटी कर दी। अचानक आंधी आई, तूफान सा बारिश आई, कई भक्त जनों को जीवन अपना खोना पड़ा लेकिन कुछ ही घंटों में व्यवस्थाओं को फिर से ठीक कर दी। मैं उन सभी 40 हजार के करीब मध्य प्रदेश सरकार के छोटे-मोटे साथी सेवारत हैं, मैं विशेष रूप से उनको बधाई देना चाहता हूं कि आपके इस प्रयासों के कारण सिर्फ मेला संपन्न हुआ है, ऐसा नहीं है। आपके इन उत्तम प्रयासों के कारण विश्व में भारत की एक छवि भी बनी है। भारत के सामान्य मानव के मन में हमारा अपने ऊपर एक विश्वास बढ़ता है इस प्रकार के चीजों से और इसलिए जिन 40 हजार के करीब लोगों ने 30 दिन, दिन-रात मेहनत की है उनको भी मैं बधाई देना चाहता हूं, मैं उज्जैनवासियों का भी हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं, उन्होंने पूरे विश्व का यहां स्वागत किया, सम्मान किया, अपने मेहमान की तरह सम्मान किया और इसलिए उज्जैन के मध्य प्रदेश के नागरिक बंधु भी अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं, उनको भी हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और अगले कुंभ के मेले तक हम फिर एक बार अपनी विचार यात्रा को आगे बढ़ाएं इसी शुभकामनाओं के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, फिर एक बार सभी संतों को प्रणाम और उनका आशीर्वाद, उनका सामर्थ्य, उनकी व्यवस्थाएं इस चीज को आगे चलाएगी, इसी अपेक्षा के साथ सबको प्रणाम।

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भारत माता की जय
भारत माता की जय
भारत माता की जय

सब भइया बहिनी कै राम राम ! आप सभैं हमरे लिए हियां पै सुबहियैं से अगोरत हौ ! हम आप सभैं के करजा मा डूब गयन! आपके इस कर्ज को मैं और ज्यादा मेहनत करके चुकाउंगा...

साथियों,
4 जून बहुत दूर नहीं है। आज पूरा देश जानता है...पूरी दुनिया जानती है कि मोदी सरकार की हैट्रिक बनने जा रही है। नई सरकार में मुझे गरीबों के लिए, युवाओं-महिलाओं के लिए, किसानों के लिए बहुत सारे फैसले लेने हैं। इसलिए मैं बाराबंकी और मोहनलालगंज के लोगों से आशीर्वाद मांगने आया हूं।

साथियों,
आज आपके एक तरफ देशहित के लिए समर्पित BJP-NDA का गठबंधन है, तो दूसरी तरफ देश में अस्थिरता पैदा करने के लिए इंडी गठबंधन मैदान में है। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, ये इंडी वाले, ताश के पत्तों की तरफ बिखरना शुरू हो गए हैं। यहां जो बबुआ जी हैं... बबुआ जी यानि हमारे समाजवादी शहजादे...उन्होंने एक नई बुआ जी की शरण ली है। ये उनकी नई बुआ जी हैं बंगाल में...उन्होंने इंडी वालों को कह दिया है- मैं बाहर से सपोर्ट करूंगी। इंडी गठबंधन की एक और पार्टी ने दूसरी को कह दिया है...खबरदार जो हमारे खिलाफ पंजाब में बोला...पीएम पद को लेकर भी सबके सब मुंगेरी लाल को पीछे छोड़ रहे हैं। इनके सपनों की इंतेहा देखिए...कांग्रेस के एक नेता ने कह दिया कि रायबरेली के लोग प्रधानमंत्री चुनेंगे। ये सुनते ही समाजवादी शहजादे का दिल ही टूट गया...बस आंसू नहीं निकले, लेकिन दिल के सारे अरमा बह गए। अब आप बताइए…आप सब लोग इतने तेज तर्रार हैं कि सारी बात इशारों-इशारों में समझ लेते हैं।

अब आप बताइए, इस ऊंट-पटांग खिचड़ी को आप लोग वोट देकर अपना वोट बर्बाद करेंगे क्या? कोई भी आपना वोट बर्बाद करना चाहेगा क्या। अच्छा होगा यहां बाराबंकी में मोहनलालगंज में भाजपा का सांसद हो...भाजपा सांसद दिल्ली से और लखनऊ से आपके लिए ज्यादा से ज्यादा योजनाएं लेकर आएंगे...भाजपा सांसद यहां के विकास के लिए ज्यादा काम करेंगे...अगर इंडी गठबंधन वाला यहां से सांसद बनता है तो उसके पास क्या काम होगा। उसकी पार्टी उसको क्या काम देगी। उसका एक ही मापदंड होगा की तुमने मोदी को एक दिन में कितनी गालियां दी। तुमने मोदी को कितनी बड़ी गाली दी। तुम्हारी गाली में कोई ताकत थी क्या, ताकि मोदी परेशान हो जाए। अगर आपने इंडी गठबंधन के सांसद को चुना, तो उसको यही काम होगा, सुबह उठो मोदी को गाली दो, दोपहर में दो गाली दो, शाम को 4-6 और दे दो और फिर सो जाओ। आप मुझे बताइए भाई, आपको अपने घर में अगर किसी सहायक की जरूरत पड़ती है। आपके दुकान में आपके व्यापार में तो आप उसको लेंगे और कहेंगे कि ये 10 काम करने हैं, इतना तनख्वाह मिलेगा। मेरे ये काम तुम्हें पूरे करने हैं। कोई ऐसा आदमी रखेगा कि तुमको मेरे दुकान के बाहर खड़े रहना है और सामने वाले को बस गाली देते रहना है। इसके लिए कोई तनख्वाह देगा क्या ? इसके लिए कोई किसी को रखेगा क्या ? कोई समझदार आदमी ऐसा करेगा क्या ? क्या गाली देने के लिए हम किसी को रखते हैं क्या ? गाली देने वालों की जरूरत क्या है भाई, आपको तो काम करने वाले सांसद चाहिए। आपका भला करने वाले सांसद चाहिए। 5 साल मोदी को गाली देने वाले नहीं, क्षेत्र का विकास करने वाले सांसद चाहिए, तो इसके लिए आपके पास एक ही विकल्प है, ओनली कमल। इसलिए, बाराबंकी से राजरानी रावत जी और मोहनलालगंज से भाई कौशल किशोर को...को हर बूथ पर विजयी बनाना है।

साथियों,
जब देश में दमदार सरकार होती है...तो फर्क दिखता है। कमजोर सरकार का क्या है...आज है...कल नहीं है... कमजोर सरकार का पूरा फोकस इसी बात पर होता है कि किसी तरह गाड़ी चलती रहे, समय पूरा हो जाए। बस...आप मुझे बताइए...यहां नौजवान भी हैं, किसान भी हैं, बड़ी आसानी से समझ जाएंगे। आप मुझे बताइए 100 सीसी के इंजन से आप हजार सीसी की रफ्तार ले सकते हैं क्या... ले सकते हैं क्या...आपको विकास की तेज रफ्तार चाहिए, तो वो सिर्फ दमदार सरकार ही दे सकती है....बीजेपी सरकार ही दे सकती है।

साथियों,
भाजपा की दमदार सरकार का मतलब क्या होता है...ये अवध बेहतर जानता है, उससे भला अच्छा कौन जान सकता है ? यहां बाराबंकी से लोग राम नाम वाली ईंट लेकर, अयोध्या के लिए पैदल निकलते थे। जो पहली बार वोट डाल रहे हैं, जो युवा हैं...उन्हें बहुत पता नहीं होगा...500 साल के इंतजार के बाद, 500 साल का इंतजार, ये इतिहास की बहुत बड़ी घटना है ये। पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे पूर्वज संघर्ष करते रहे, बलिदान देते रहे, त्याग की पराकाष्ठा करते रहे। 500 साल के बाद, वो दिन याद कीजिए जब लोग हमारे राम लला को टैंट में देखते थे, उनके आंसू नहीं सूखते थे और लोग सरकार को जितनी भद्दी भाषा में गालियां दे सकें देते थे। आज 500 साल का इंतजार खत्म हुआ कि नहीं हुआ। 500 साल का इंतजार खत्म हुआ कि नहीं हुआ। राम लला भव्य मंदिर में विराजित हुए की नहीं हुए। किसके कारण... किसके कारण... किसके कारण...अरे भाई मोदी...मोदी मत करो..ये आपके एक वोट के कारण हुआ है। ये आपके एक वोट की ताकत है, जिसने ये दमदार सरकार बनाई। एक मजबूत सरकार बनाई और आपका 500 साल का इंतजार समाप्त हुआ। आपका वोट 500 साल का इंतजार खत्म कर सकता है। इसलिए भाइयों-बहनों कमल के निशान पर बटन दबाकर आगे भी ये दमदार सरकार बनानी है और दमदार फैसले भी लेने हैं।

साथियों,
दूसरी तरफ ये कांग्रेस वाले, ये सपा वाले क्या कह रहे हैं? पहले इन्होंने राम लला को टैंट में पहुंचाया…फिर अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए इन्होंने कहा कि मंदिर की जगह कोई धर्मशाला बना दो, स्कूल बना दो, अस्पताल बना दो...अब जब मंदिर बन गया...तो इनके पेट में इतना जहर भरा हुआ है। पता नहीं इनकी राम से क्या दुश्मनी है कि राम लला की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया। अब यहां सपा के बड़े नेता यहां तक कहते हैं, रामनवमी के दिन कहते हैं। राम मंदिर को बेकार बताते हैं, भद्दी-भद्दी बातें करते हैं। और कांग्रेस तो राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस के ही एक नेता ने कहा है कि वे लोग सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पलटना चाहते हैं। भ्रम में मत रहिए देश जब आजादी का आंदोलन कर रहा था ना और देश के टुकड़े करने की बात आती थी। तो देश का हर व्यक्ति कहता था कि देश के टुकड़े थोड़े होते हैं। हो गए की नहीं हो गए, इन्होंने कर दिया कि नहीं कर दिया। ये किसी भी हद तक जा सकते हैं जी। इनका ट्रैक रिकॉर्ड ही ऐसा है। इनके लिए देश-वेश कुछ नहीं है भाई। इनके लिए तो इनका परिवार और बाबर यही उनका खेल है। सपा-कांग्रेस वाले सरकार में आए तो राम लला को फिर से टेंट में भेजेंगे और मंदिर पर बुलडोजर चलवा देंगे। क्या योगी जी से यही सीखना है क्या। जरा योगी जी से ट्यूशन लो बुलडोजर कहां चलाना है, कहां नहीं चलाना।

साथियों,
चुनावी सभा के लिए मैं ये कहने के लिए नहीं आया हूं। मुझे चिंता है क्योंकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा है। यही इनकी साजिश है। आप ऐसे लोगों को वोट दे सकते हैं क्या। आप ऐसे लोगों को वोट दे सकते हैं क्या। ऐसे लोगों को वोट तो छोड़िए, ऐसी सजा करनी चाहिए, ऐसी सजा करनी चाहिए कि उनकी जमानत जब्त हो जाए।

साथियों,
सपा-कांग्रेस के लिए अपने वोटबैंक से बड़ा कुछ नहीं है। और जब मैं इनकी पोल खोलता हूं, तो ये बेचैन हो जाते हैं, नींद हराम हो जाती है, तो फिर क्या करते हैं, जैसे बहुत बुखार चढ़ जाए ना तो आदमी कुछ भी बोलता है, ये भी कुछ भी बोलना शुरू कर देते हैं। ऐसी गालियां देते हैं। आप मुझे बताइए...बाबासाहेब अम्बेडकर जब संविधान बन रहा था, तब धर्म के आधार पर आरक्षण के सबसे बड़े विरोधी थे। धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होगा ये संविधान सभा ने निर्णय किया था और बहुत सोच विचार करके किया था। इतना ही नहीं इनके परनाना ने भी धर्म के आधार पर आरक्षण का विरोध किया था। लेकिन 10 साल पहले यहां यूपी में इन लोगों ने धर्म के आधार पर आरक्षण देने की कोशिश की थी और कर्नाटक में तो कर दिया। कर्नाटक को इन्होंने अपनी लेबोरेटरी बनाया है। कर्नाटक में क्या किया...कर्नाटक में जितने मुसलमान थे, उन सब मुसलमानों को रातों-रात ओबीसी बना दिया। ठप्पा मार दिया कागज निकाल दिया। अब जो ओबीसी को आरक्षण मिला था उसका बहुत बड़ा हिस्सा ये लूट करके चले गए और लोग हाथ मलते रह गए। क्या यहां आपका आरक्षण कोई लूट जाए, आपको मंजूर है क्या? क्या आरक्षण लूटने देंगे क्या ? क्या ओबीसी का हक छीनने देंगे क्या? क्या एससी का हक छीनने देंगे क्या? क्या एसटी का हक छीनने देंगे क्या? अरे बाबासाहेब अम्बेडकर ने जो दिया है, उसको कोई भी हाथ नहीं लगा सकता है। बिहार के इनके चारा घोटाले के जो चैंपियन हैं ना, अदालत ने जिनको सजा फरमाई है। अभी जेल से तबीयत के बहाने बाहर घूम रहे हैं, वो तो यहां तक कहते हैं कि पूरा का पूरा आरक्षण अब मुसलमान को मिलना चाहिए। इसका मतलब दलित, आदिवासी, ओबीसी इनके पास कुछ बचेगा नहीं भाई। मैं आपकी रक्षा करने के लिए आपके अधिकारों की रक्षा करने के लिए 400 पार मांगता हूं आपसे।

कांग्रेस के शहजादे कहते हैं...ये नया ले आए भाई। वो कहते हैं कि आपकी कमाई का एक्स-रे करेंगे। मतलब आपके लॉकर में क्या है, जमीन कितनी है, गहनें कितने हैं, सोना कितना, चांदी कितनी, आपके मंगलसूत्र कहां है ? वो लूट चलाना चाहते हैं, वो कहते हैं आपके पास जो है। आपसे लेकर के जिसके पास नहीं है उसको दे दिया जाएगा। मतलब जो वोट जिहाद करेगा उनको दिया जाएगा।

भाइयों-बहनों,
ये इनका ट्रैक रिकॉर्ड है। सपा-कांग्रेस, तुष्टिकरण के आगे घुटने टेक चुकी हैं। और मोदी जब इनकी सच्चाई देश को बता रहा है....तो वो क्या कहते हैं और ये लंबे समय से उनकी कोशिश है। उनकी बेईमानी को अगर बेनकाब कर दो, उनकी घोर सांप्रदायिकता को अगर बेनकाब कर दो, उनकी वोट बैंक की राजनीति को बेनकाब कर दो, दिन-रात हिंदु-मुसलमान करने वाली उनकी सोच को बेनकाब कर दो। तो ये कहते हैं कि मोदी हिंदु-मुसलमान करता है। अरे मोदी को बोलना पड़ता है, तुम्हारे पापों का इतिहास देश को बताने के लिए।

साथियों,
ये लोग, संविधान विरोधी हैं, दलित-पिछड़े विरोधी हैं। मोदी ने आर्टिकल-370 हटाया। इससे जम्मू-कश्मीर में भी संविधान लागू हुआ...वहां दलितों को भी अनेक अधिकार मिले। दो दिन पहले ही CAA कानून के तहत शरणार्थियों को नागरिकता मिलनी शुरु हुई है। बड़ी खुशी-खुशी वो कागज लेकर के फोटो निकलवा रहे है। ऐसे गरीब लोग निराधार पड़े थे देश में, कोई उनको पूछने वाला नहीं था। इसके जो लाभार्थी हैं, उनमें भी ज्यादातर दलित,पिछड़े समाज के लोग हैं। सपा-कांग्रेस के लोग इसका भी विरोध करते हैं। सपा के लोगों ने यूपी में दलितों के साथ कितना अन्याय किया है...ये बच्चा-बच्चा जानता है। जो मोदी देश के संविधान को सशक्त कर रहा है...उसको लेकर अफवाहें फैलाते हैं।

संस्कार देखिए साथियों...
भाजपा सरकार बाराबंकी के किसान रामशरण वर्मा जी को पद्म सम्मान देती है। कृषि में उनके योगदान को नमन करती है। और ये कांग्रेसी, बेनी बाबू जैसे वरिष्ठ नेता का डगर-डगर अपमान करते हैं और ये देखकर भी सपा के शहजादे चुप रहते हैं। वो बेनी बाबू, जिन्होंने देश और समाज की सेवा में पूरा जीवन खपा दिया। उनको इस तरह अपमानित किया है कांग्रेस-सपा ने।

साथियों,
भाजपा सरकार, सबका साथ-सबका विकास सबका विश्वास सबका प्रयास इस पवित्र मंत्र पर चलती है। मुफ्त अनाज हो, मुफ्त इलाज हो...पक्का घर हो या फिर सस्ता गैस का सिलेंडर हो या नल से जल हो ये बिना भेदभाव सबको दिया जाता है। आपको याद है ना सपा के शासन में क्या होता था? उस समय बिजली भी, जो वोट जिहाद करेगा उसके लिए रिजर्व रहती थी, बाकियों को बिजली नहीं मिलती थी और मैं आज एक और बात कह रहा हूं...जिस वोटबैंक के पीछे ये लोग भागते हैं...वो वोटबैंक भी अब इनकी सच्चाई समझने लगा है। तीन तलाक कानून से खुश हमारी माताएं-बहनें बीजेपी को लगातार आशीर्वाद दे रही हैं।

भाइयों और बहनों,
रामकाज से आगे अब राष्ट्रकाज का समय है। रामकाज की प्रेरणा अब राष्ट्रकाज के लिए है। यहां मेंथा की खेती बहुत होती है। ऐसी हर कृषि उपज से जुड़े प्रोसेसिंग उद्योग के लिए यहां अनंत संभावनाएं हैं। बाराबंकी-मोहनलालगंज के छोटे किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि के भी करीब-करीब 1600 करोड़ रुपए मिले हैं। यहां का गमछा जो मुझे भेंट दिया गया, अब ये गमछा बहुत प्रसिद्ध हो रहा है। हमारे योगी जी ने वन डिस्ट्रिक्ट- वन प्रोडक्ट का मिशन चलाया ना। आज मैं भी दुनिया में कहीं जाता हूं, तो मैं गिफ्ट क्या लेकर जाऊंगा मुझे दिमाग नहीं खपाना पड़ता है। मैं लखनऊ में उनकी सरकार की वेबसाइट पर जाता हूं, योगी जी का वन डिस्ट्रिक्ट- वन प्रोडक्ट देख लेता हूं और कहता हूं कि चलिए ये 6-7 चीजें ले लो वहां दे दूंगा लोगों को। योगी जी की सरकार ने जिस प्रकार इसे जीआई टैग दिया इसकी प्रसिद्धी की है।

साथियों,
आप तो जानते हैं, मैं 2014 से काम में लगा हूं। स्वच्छता अभियान, सफाई कर रहा हूं। देश साफ सुथरा होना चाहिए की नहीं होना चाहिए। स्वच्छता होनी चाहिए की नहीं होनी चाहिए। हमारे योगी जी भी सफाई कर रहे हैं। वो भी सफाई होनी चाहिए ना। दुर्गन्ध आती है तो नींद आती है क्या? तो दुर्गन्ध हटानी पड़ती है ना, तो योगी जी भी वो काम बहुत अच्छा कर रहे हैं। सफाई होने के कारण उत्तर प्रदेश में निवेश का माहौल बना है। लोग विश्वास के साथ उत्तर प्रदेश में उद्योग धंधे के लिए रुपये लगाने के लिए तैयार हैं।

साथियों,
जहां-जहां राम के निशान हैं, उन क्षेत्रों को रामायण सर्किट के तहत विकसित बनाने की योजना है। यहां तो सतरिख आश्रम है, जहां राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा हुई थी। महादेव कॉरिडोर के विकास का काम भी चल रहा है। ऐसे विकास कार्य हमारी विरासत को भी सशक्त करेंगे...और पर्यटन उद्योग से युवाओं को नए अवसर भी देंगे।

साथियों,
विकास और विरासत से विकसित भारत बनाने के लिए आपके आशीर्वाद मांगता हूं, आपको भारी मतदान करना है, ज्यादा से ज्यादा मतदान करेंगे... ज्यादा से ज्यादा मतदान करेंगे... ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान करने के लिए निकलेंगे, सुबह 10 बजे से पहले मतदान होगा। पहले मतदान फिर जलपान... पहले मतदान फिर जलपान...अब ऐसा तो नहीं होगा, ना कि जलपान याद रखोगे और मतदान भूल जाओगे। ऐसा नहीं होगा ना। अच्छा पोलिंग बूथ जीतोगे, सारे पोलिंग बूथ जीतोगे। पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ोगे। अच्छा मेरा एक काम करोगे... मेरा एक काम करोगे। जरा हाथ ऊपर करके बताइए मेरा एक काम करोगे क्या। ये चुनाव वाला काम नहीं है मेरा पर्सनल काम है करोगे। पक्का करोगे। अच्छा घर-घर जाइएगा...ज्यादा से ज्यादा परिवारों में जाइएगा, परिवार के मुखिया के साथ बैठिएगा। उनको कहिएगा कि मोदी आए थे और मोदी जी ने सबको राम-राम कहा है। मेरा राम-राम पहुंचा देंगे...हर घर में पहुंचा देंगे। बोलिए...

भारत माता की जय
भारत माता की जय
भारत माता की जय
बहुत-बहुत धन्यवाद !