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At Simhasth Kumbh convention, we are seeing birth of a new effort: PM
We belong to a tradition where even a Bhikshuk says, may good happen to every person: PM
We should tell the entire world about the organising capacity of an event like the Kumbh: PM
Lets hold Vichar Kumbh every year with devotees...discuss why we need to plant trees, educate girl child: PM

हम लोगों का एक स्वभाव दोष रहा है, एक समाज के नाते कि हम अपने आपको हमेशा परिस्थितियों के परे समझते हैं। हम उस सिद्धांतों में पले-बढ़े हैं कि जहां शरीर तो आता और जाता है। आत्मा के अमरत्व के साथ जुड़े हुए हम लोग हैं और उसके कारण हमारी आत्मा की सोच न हमें काल से बंधने देती है, न हमें काल का गुलाम बनने देती है लेकिन उसके कारण एक ऐसी स्थिति पैदा हुई कि हमारी इस महान परंपरा, ये हजारों साल पुरानी संस्कृति, इसके कई पहलू, वो परंपराए किस सामाजिक संदर्भ में शुरू हुई, किस काल के गर्भ में पैदा हुई, किस विचार मंथन में से बीजारोपण हुआ, वो करीब-करीब अलब्य है और उसके कारण ये कुंभ मेले की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई होगी उसके विषय में अनेक प्रकार के विभिन्न मत प्रचलित हैं, कालखंड भी बड़ा, बहुत बड़ा अंतराल वाला है।

कोई कहेगा हजार साल पहले, कोई कहेगा 2 हजार साल पहले लेकिन इतना निश्चित है कि ये परंपरा मानव जीवन की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्थाओं में से एक है। मैं अपने तरीक से जब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि कुंभ का मेला, वैसे 12 साल में एक बार होता है और नासिक हो, उज्जैन हो, हरिद्वार हो वहां 3 साल में एक बार होता है प्रयागराज में 12 साल में एक बार होता है। उस कालखंड को हम देखें तो मुझे लगता है कि एक प्रकार से ये विशाल भारत को अपने में समेटने का ये प्रयास ये कुंभ मेले के द्वारा होता था। मैं तर्क से और अनुमान से कह सकता हूं कि समाज वेदता, संत-महंत, ऋषि, मुनि जो हर पल समाज के सुख-दुख की चर्चा और चिंता करते थे। समाज के भाग्य और भविष्य के लिए नई-नई विधाओं का अन्वेषण करते थे, Innovation करते थे। इन्हें वे हमारे ऋषि जहां भी थे वे बाह्य जगत का भी रिसर्च करते थे और अंतर यात्रा को भी खोजने का प्रयास करते थे तो ये प्रक्रिया निरंतर चलती रही, सदियों तक चलती रही, हर पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही लेकिन संस्कार संक्रमण का काम विचारों के संकलन का काम कालानुरूप विचारों को तराजू पर तौलने की परंपरा ये सारी बातें इस युग की परंपरा में समहित थी, समाहित थी।

एक बार प्रयागराज के कुंभ मेले में बैठते थे, एक Final decision लिया जाता था सबके द्वारा मिलकर के कि पिछले 12 साल में समाज यहां-यहां गया, यहां पहुंचा। अब अगले 12 साल के लिए समाज के लिए दिशा क्या होगी, समाज की कार्यशैली क्या होगी किन चीजों की प्राथमिकता होगी और जब कुंभ से जाते थे तो लोग उस एजेंडा को लेकर के अपने-अपने स्थान पर पहुंचते थे और हर तीन साल के बाद जबकि कभी नासिक में, कभी उज्जैन में, कभी हरिद्वार में कुंभ का मेला लगता था तो उसका mid-term appraisal होता था कि भई प्रयागराज में जो निर्णय हम करके गए थे तीन साल में क्या अनुभव आया और हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोग आते थे।

30 दिन तक एक ही स्थान पर रहकर के समाज की गतिविधियों, समाज की आवश्यकताएं, बदलता हुआ युग, उसका चिंतन-मनन करके उसमें फिर एक बार 3 साल का करणीय एजेंडा तय होता था। In the light of main Mahakumbh प्रयागराज में होता था और फिर 3 साल के बाद दूसरा जब कुंभ लगता था तो फिर से Review होता था। एक अद्भुत सामाजिक रचना थी ये लेकिन धीरे-धीरे अनुभव ये आता है कि परंपरा तो रह जाती है, प्राण खो जाता है। हमारे यहां भी अनुभव ये आया कि परंपरा तो रह गई लेकिन समय का अभाव है, 30 दिन कौन रहेगा, 45 दिन कौन रहेगा। आओ भाई 15 मिनट जरा डुबकी लगा दें, पाप धुल जाए, पुण्य कमा ले और चले जाए।

ऐसे जैसे बदलाव आय उसमें से उज्जैन के इस कुंभ में संतों के आशीर्वाद से एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है और ये नया प्रयास एक प्रकार से उस सदियों पुरानी व्यवस्था का ही एक Modern edition है और जिसमें वर्तमान समझ में, वैश्विक संदर्भ में मानव जाति के लिए क्या चुनौतियां हैं, मानव कल्याण के मार्ग क्या हो सकते हैं। बदलते हुए युग में काल बाह्य चीजों को छोड़ने की हिम्मत कैसे आए, पुरानी चीजों को बोझ लेकर के चलकर के आदमी थक जाता है। उन पुरानी काल बाह्य चीजों को छोड़कर के एक नए विश्वास, नई ताजगी के साथ कैसे आगे बढ़ जाए, उसका एक छोटा सा प्रयास इस विचार महाकुंभ के अंदर हुआ है।

जो 51 बिंदु, अमृत बिंदु इसमें से फलित हुए हैं क्योंकि ये एक दिन का समारोह नहीं है। जैसे शिवराज जी ने बताया। देश औऱ दुनिया के इस विषय के जानकार लोगों ने 2 साल मंथन किया है, सालभर विचार-विमर्श किया है और पिछले 3 दिन से इसी पवित्र अवसर पर ऋषियों, मुनियों, संतों की परंपरा को निभाने वाले महान संतों के सानिध्य में इसका चिंतन-मनन हुआ है और उसमें से ये 51 अमृत बिंदु समाज के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। मैं नहीं मानता हूं कि हम राजनेताओं के लिए इस बात को लोगों के गले उतारना हमारे बस की बात है। हम नहीं मानते हैं लेकिन हम इतना जरूर मानते हैं कि समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग चाहे वो गेरुए वस्त्र में हो या न हो लेकिन त्याग और तपस्था के अधिष्ठान पर जीवन जीते हैं। चाहे एक वैज्ञानिक अपनी laboratory में खपा हुआ हो, चाहे एक किसान अपने खेत में खपा हुआ हो, चाहे एक मजदूर अपना पसीना बहा रहा हे, चाहे एक संत समाज का मार्गदर्शन करता हो ये सारी शक्तियां, एक दिशा में चल पड़ सकती हैं तो कितना बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं और उस दिशा में ये 51 अमृत बिंदु जो है आने वाले दिनों में भारत के जनमानस को और वैश्विक जनसमूह को भारत किस प्रकार से सोच सकता है और राजनीतिक मंच पर से किस प्रकार के विचार प्रभाग समयानुकूल हो सकते हैं इसकी चर्चा अगर आने वाले दिनों में चलेगी, तो मैं समझता हूं कि ये प्रयास सार्थक होगा।


हम वो लोग हैं, जहां हमारी छोटी-छोटी चीज बड़ी समझने जैसी है। हम उस संस्कार सरिता से निकले हुए लोग हैं। जहां एक भिक्षुक भी भिक्षा मांगने के लिए जाता है, तो भी उसके मिहिल मुंह से निकलता है ‘जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला’। ये छोटी बात नहीं है। ये एक वो संस्कार परम्परा का परिणाम है कि एक भिक्षुक मुंह से भी शब्द निकलता है ‘देगा उसका भी भला जो नहीं देगा उसका भी भला’। यानी मूल चिंतन तत्वभाव यह है कि सबका भला हो सबका कल्याण हो। ये हर प्रकार से हमारी रगों में भरा पड़ा है। हमी तो लोग हैं जिनको सिखाया गया है। तेन तत्तेन भूंजीथा। क्या तर के ही भोगेगा ये अप्रतीम आनन्द होता है। ये हमारी रगों में भरा पड़ा है। जो हमारी रगों में है, वो क्या हमारे जीवन आचरण से अछूता तो नहीं हो रहा है। इतनी महान परम्परा को कहीं हम खो तो नहीं दे रहे हैं। लेकिन कभी उसको जगजोड़ा किया जाए कि अनुभव आता है कि नहीं आज भी ये सामर्थ हमारे देश में पड़ा है।

किसी समय इस देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश को आहवान किया था कि सप्ताह में एक दिन शाम का खाना छोड़ दीजिए। देश को अन्न की जरूरत है। और इस देश के कोटी-कोटी लोगों ने तेन त्यक्तेन भुंजीथा इसको अपने जीवन में चरितार्थ करके, करके दिखाया था। और कुछ पीढ़ी तो लोग अभी भी जिन्दा हैं। जो लालबहादुर शास्त्री ने कहा था। सप्ताह में एक दिन खाना नहीं खाते हैं। ऐसे लोग आज भी हैं। तेन त्यक्तेन भुंजीथा का मंत्र हमारी रगों में पला है। पिछले दिनों में ऐसे ही बातों-बातों में मैंने पिछले मार्च महीने में देश के लोगों के सामने एक विषय रखा था। ऐसे ही रखा था। रखते समय मैंने भी नहीं सोचा था कि मेरे देश के जनसामान्य का मन इतनी ऊंचाइयों से भरा पड़ा है। कभी-कभी लगता है कि हम उन ऊंचाईयों को पहुंचने में कम पड़ जाते हैं। मैंने इतना ही कहा था। अगर आप सम्पन्न हैं, आप समर्थ हैं, तो आप रसोई गैस की सब्सिडी क्या जरूरत है छोड़ दीजिये न। हजार-पंद्रह सौ रुपये में क्या रखा है। इतना ही मैंने कहा था। और आज मैं मेरे देश के एक करोड़ से ज्यादा परिवारों के सामने सर झुका कर कहना चाहता हूं और दुनिया के सामने कहना चाहता हूं। एक करोड़ से ज्यादा परिवारों ने अपनी गैस सब्सिडी छोड़ दी। तेन त्यक्तेन भुंजीथा । और उसका परिणाम क्या है। परिणाम शासन व्यवस्था पर भी सीधा होता है। हमारे मन में विचार आया कि एक करोड़ परिवार गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ रहे हैं तो इसका हक़ सरकार की तिजोरी में भरने के लिये नहीं बनता है।

ये फिर से गरीब के घर में जाना चाहिए। जो मां लकड़ी का चूल्हा जला कर के एक दिन में चार सौ सिगरेट जितना धुआं अपने शरीर में ले जाती है। उस मां को लकड़ी के चूल्हे से मुक्त करा के रसोई गैस देना चाहिए और उसी में से संकल्प निकला कि तीन साल में पांच करोड़ परिवारों को गैस सिलेंडर दे कर के उनको इस धुएं वाले चूल्हे से मुक्ति दिला देंगे।

यहाँ एक चर्चा में पर्यावरण का मुद्दा है। मैं समझता हूं पांच करोड़ परिवारों में लकड़ी का चूल्हा न जलना ये जंगलों को भी बचाएगा, ये कार्बन को भी कम करेगा और हमारी माताओं को गरीब माताओं के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन लाएगा। यहां पर नारी की एम्पावरमेंट की बात हुई नारी की dignity की बात हुई है। ये गैस का चूल्हा उसकी dignity को कायम करता है। उसकी स्वास्थ्य की चिंता करता है और इस लिए मैं कहता हूं - तेन त्यक्तेन भुंजीथा । इस मंत्र में अगर हम भरोसा करें। सामान्य मानव को हम इसका विश्वास दिला दें तो हम किस प्रकार का परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं। ये अनुभव कर रहे हैं।

हमारा देश, मैं नहीं मानता हूं हमारे शास्त्रों में ऐसी कोई चीज है, जिसके कारण हम भटक जाएं। ये हमलोग हैं कि हमारी मतलब की चीजें उठाते रहते हैं और पूर्ण रूप से चीजों को देखने का स्वभाव छोड़ दिया है। हमारे यहां कहा गया है – नर करनी करे तो नारायण हो जाए - और ये हमारे ऋषियों ने मुनियों ने कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर भक्ति करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर कथा करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा। संतों ने भी कहा हैः नर करनी करे तो नारायण हो जाए और इसीलिए ये 51 अमृत बिन्दु हमारे सामने है। उसका एक संदेश यही है कि नर करनी करे तो नारायण हो जाए। और इसलिए हम करनी से बाध्य होने चाहिए और तभी तो अर्जुन को भी यही तो कहा था योगः कर्मसु कौशलम्। यही हमारा योग है, जिसमें कर्म की महानता को स्वीकार किया गया है और इसलिए इस पवित्र कार्य के अवसर पर हम उस विचार प्रवाह को फिर से एक बार पुनर्जीवित कर सकते हैं क्या तमसो मा ज्योतिरगमय। ये विचार छोटा नहीं है। और प्रकाश कौनसा वो कौनसी ज्योति ये ज्योति ज्ञान की है, ज्योति प्रकाश की है। और हमी तो लोग हैं जो कहते हैं कि ज्ञान को न पूरब होता है न पश्चिम होता है। ज्ञान को न बीती हुई कल होती है, ज्ञान को न आने वाली कल होती है। ज्ञान अजरा अमर होता है और हर काल में उपकारक होता है। ये हमारी परम्परा रही है और इसलिए विश्व में जो भी श्रेष्ठ है इसको लेना, पाना, पचाना internalize करना ये हमलोगों को सदियों से आदत रही है।

हम एक ऐसे समाज के लोग हैं। जहां विविधताएं भी हैं और कभी-कभी बाहर वाले व्यक्ति को conflict भी नजर आता है। लेकिन दुनिया जो conflict management को लेकर के इतनी सैमिनार कर रही है, लेकिन रास्ते नहीं मिल रहे। हमलोग हैं inherent conflict management का हमें सिखाया गया है। वरना दो extreme हम कभी भी नहीं सोच सकते थे। हम भगवान राम की पूजा करते हैं, जिन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया था। और हम वो लोग हैं, जो प्रहलाद की भी पूजा करते हैं, जिसने पिता की आज्ञा की अवमानना की थी। इतना बड़ा conflict, एक वो महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा को माना वो भी हमारे पूजनीय और एक दूसरा महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा क का अनादर किया वो भी हमारा महापुरुष।

हम वो लोग हैं जिन्होंने माता सीता को प्रणाम करते हैं। जिसने पति और ससुर के इच्छा के अनुसार अपना जीवन दे दिया। और उसी प्रकार से हम उस मीरा की भी भक्ति करते हैं जिसने पति की आज्ञा की अवज्ञा कर दी थी। यानी हम किस प्रकार के conflict management को जानने वाले लोग हैं। ये हमारी स्थिति का कारण क्या है और कारण ये है कि हम हठबाधिता से बंधे हुए लोग नहीं हैं। हम दर्शन के जुड़े हुए लोग हैं। और दर्शन, दर्शन तपी तपाई विचारों की प्रक्रिया और जीवन शैली में से निचोड़ के रूप में निकलता रहता है। जो समयानुकूल उसका विस्तार होता जाता है। उसका एक व्यापक रूप समय में आता है। और इसलिए हम उस दर्शन की परम्पराओं से निकले हुए लोग हैं जो दर्शन आज भी हमें इस जीवन को जीने के लिए प्रेरणा देता है।

यहां पर विचार मंथन में एक विषय यह भी रहा – Values, Values कैसे बदलते हैं। आज दुनिया में अगर आप में से किसी को अध्ययन करने का स्वभाव हो तो अध्ययन करके देखिये। दुनिया के समृद्ध-समृद्ध देश जब वो चुनाव के मैदान में जाते हैं, तो वहां के राजनीतिक दल, वहां के राजनेता उनके चुनाव में एक बात बार-बार उल्लेख करते हैं। और वो कहते हैं – हम हमारे देश में families values को पुनःप्रस्थापित करेंगे। पूरा विश्व, परिवार संस्था, पारिवारिक जीवन के मूल्य उसका महत्व बहुत अच्छी तरह समझने लगा है। हम उसमें पले बड़े हैं। इसलिये कभी उसमें छोटी सी भी इधर-उधर हो जाता है तो पता नहीं चलता है कि कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। लेकिन हमारे सामने चुनौती है कि values और values यानी वो विषय नहीं है कि आपकी मान्यता और मेरी मान्यता। जो समय की कसौटी पर कस कर के खरे उतरे हैं, वही तो वैल्यूज़ होते हैं। और इसलिए हर समाज के अपने वैल्यूज़ होते हैं। उन values के प्रति हम जागरूक कैसे हों। इन दिनों मैं देखता हूं। अज्ञान के कारण कहो, या तो inferiority complex के कारण कहो, जब कोई बड़ा संकट आ जाता है, बड़ा विवाद आ जाता है तो हम ज्यादा से ज्यादा ये कह कर भाग जाते हैं कि ये तो हमारी परम्परा है। आज दुनिया इस प्रकार की बातों को मानने के लिए नहीं है।

हमने वैज्ञानिक आधार पर अपनी बातों को दुनिया के सामने रखना पड़ेगा। और इसलिये यही तो कुम्भ के काल में ये विचार-विमर्श आवश्यकता है, जो हमारे मूल्यों की, हमारे विचारों की धार निकाल सके।

हम जानते हैं कभी-कभी जिनके मुंह से परम्परा की बात सुनते हैं। यही देश ये मान्यता से ग्रस्त था कि हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने संतों ने समुद्र पार नहीं करना चाहिए। विदेश नहीं जाना चाहिए। ये हमलोग मानते थे। और एक समय था, जब समुद्र पार करना बुरा माना जाता था। वो भी एक परम्परा थी लेकिन काल बदल गया। वही संत अगर आज विश्व भ्रमण करते हैं, सातों समुद्र पार करके जाते हैं। परम्पराएं उनके लिए कोई रुकावट नहीं बनती हैं, तो और चीजों में परम्पराएं क्यों रुकावट बननी चाहिए। ये पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और इसलिए परम्पराओं के नाम पर अवैज्ञानिक तरीके से बदले हुए युग को, बदले हुए समाज को मूल्य के स्थान पर जीवित रखते हुए उसको मोड़ना, बदलना दिशा देना ये हम सबका कर्तव्य बनता है, हम सबका दायित्व बनता है। और उस दायित्व को अगर हम निभाते हैं तो मुझे विश्वास है कि हम समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं।

आज विश्व दो संकटों से गुजर रहा है। एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग दूसरी तरफ आतंकवाद। क्या उपाय है इसका। आखिर इसके मूल पर कौन सी चीजें पड़ी हैं। holier than thou तेरे रास्ते से मेरा रास्ता ज्यादा सही है। यही तो भाव है जो conflict की ओर हमें घसीटता ले चला जा रहा है। विस्तारवाद यही तो है जो हमें conflict की ओर ले जा रहा है। युग बदल चुका है। विस्तारवाद समस्याओं का समाधान नहीं है। हम हॉरीजॉन्टल की तरह ही जाएं समस्याओं का समाधान नहीं है। हमें वर्टिकल जाने की आवश्यकता है अपने भीतर को ऊपर उठाने की आवश्यकता है, व्यवस्थाओं को आधुनिक करने की आवश्यकता है। नई ऊंचाइयों को पार करने के लिए उन मूल्यों को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है और इसलिये समय रहते हुए मूलभूत चिंतन के प्रकाश में, समय के संदर्भ में आवश्यकताओं की उपज के रूप में नई विधाओं को जन्म देना होगा। वेद सब कुछ है लेकिन उसके बाद भी हमी लोग हैं जिन्होंने वेद के प्रकाश में उपनिषदों का निर्माण किया। उपनिषद में बहुत कुछ है। लेकिन समय रहते हमने भी वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में समृति और स्रुति को जन्म दिया और समृति और स्रुतियां, जो उस कालखंड को दिशा देती है, उसके आधार पर हम चलें। आज हम में किसी को वेद के नाम भी मालूम नहीं होंगे। लेकिन वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में श्रुति और समृति वो आज भी हमें दिशा देती हैं। समय की मांग है कि अगर 21वीं सदी में मानव जाति का कल्याण करना है तो चाहे वेद के प्रकाश में उपनिषद रही हो, उपनिषद के प्रकाश में समृति और श्रुति रही हो, तो समृति और श्रुति के प्रकाश में 21वीं सदी के मानव के कल्याण के लिए किन चीजों की जरूरत है ये 51 अमृत बिन्दु शायद पूर्णतयः न हो कुछ कमियां उसमें भी हो सकती हैं। क्या हम कुम्भ के मेले में ऐसे अमृत बिन्दु निकाल कर के आ सकते हैं।

मुझे विश्वास है कि हमारा इतना बड़ा समागम। कभी – कभी मुझे लगता है, दुनिया हमे कहती है कि हम बहुत ही unorganised लोग हैं। बड़े ही विचित्र प्रकार का जीवन जीने वाले बाहर वालों के नजर में हमें देखते हैं। लेकिन हमें अपनी बात दुनिया के सामने सही तरीके से रखनी आती नहीं है। और जिनको रखने की जिम्मेवारी है और जिन्होंने इस प्रकार के काम को अपना प्रोफेशन स्वीकार किया है। वे भी समाज का जैसा स्वभाव बना है शॉर्टकट पर चले जाते हैं। हमने देखा है कुम्भ मेला यानी एक ही पहचान बना दी गई है नागा साधु। उनकी फोटो निकालना, उनका प्रचार करना, उनका प्रदर्शन के लिए जाना इसीके आसपास उसको सीमित कर दिया गया है। क्या दुनिया को हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारे देश के लोगों की कितनी बड़ी organizing capacity है। क्या ये कुम्भ मेले का कोई सर्कुलर निकला था क्या। निमंत्रण कार्ड गया था क्या।

हिन्दुस्तान के हर कोने में दुनिया में रहते हुए भारतीय मूल के लोगों को कोई इनविटेशन कार्ड गया था क्या। कोई फाइवस्टार होटलों का बुकिंग था क्या। एक सिपरा मां नदी के किनारे पर उसकी गोद में हर दिन यूरोप के किसी छोटे देश की जनसंख्या जितने लोग आते हों, 30 दिन तक आते हों। जब प्रयागराज में कुंभ का मेला हो तब गंगा मैया के किनारे पर यूरोप का एकाध देश daily इकट्ठा होता हो, रोज नए लोग आते हों और कोई भी संकट न आता हो, ये management की दुनिया की सबसे बड़ी घटना है लेकिन हम भारत का branding करने के लिए इस ताकत का परिचय नहीं करवा रहे हैं।

मैं कभी-कभी कहता हूं हमारे हिंदुस्तान का चुनाव दुनिया के लिए अजूबा है कि इतना बड़ा देश दुनिया के कई देशों से ज्यादा वोटर और हमारा Election Commission आधुनिक Technology का उपयोग करते हुए सुचारु रूप से पूरा चुनाव प्रबंधन करता है। विश्व के लिए, प्रबंधन के लिए ये सबसे बड़ा case study है, सबसे बड़ा case study है। मैं तो दुनिया की बड़ी-बड़ी Universities को कहता हूं कि हमारे इस कुंभ मेले की management को भी एक case study के रूप में दुनिया की Universities को study करना चाहिए।

हमने अपने वैश्विक रूप में अपने आप को प्रस्तुत करने के लिए दुनिया को जो भाषा समझती है, उस भाषा में रखने की आदत भी समय की मांग है, हम अपनी ही बात को अपने ही तरीके से कहते रहेंगे तो दुनिया के गले नहीं उतरेगी। विश्व जिस बात को जिस भाषा में समझता है, जिस तर्क से समझता है, जिस आधारों के आधार पर समझ पाता है, वो समझाने का प्रयास इस चिंतन-मनन के द्वारा तय करना पड़ेगा। ये जब हम करते हैं तो मुझे विश्वास है, इस महान देश की ये सदियों पुरानी विरासत वो सामाजिक चेतना का कारण बन सकती है, युवा पीढ़ी के आकर्षण का कारण बन सकती है और मैं जो 51 बिंदु हैं उसके बाहर एक बात मैं सभी अखाड़े के अधिष्ठाओं को, सभी परंपराओं से संत-महात्माओं को मैं आज एक निवेदन करना चाहता हूं, प्रार्थना करना चाहता हूं। क्या यहां से जाने के बाद हम सभी अपनी परंपराओं के अंदर एक सप्ताह का विचार कुंभ हर वर्ष अपने भक्तों के बीच कर सकते हैं क्या।

मोक्ष की बातें करें, जरूर करें लेकिन एक सप्ताह ऐसा हो कि जहां धरती की सच्चाइयों के साथ पेड़ क्यों उगाना चाहिए, नदी को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए, बेटी को क्यों पढ़ाना चाहिए, नारी का गौरव क्यों करना चाहिए वैज्ञानिक तरीके से और देश भर के विधिवत जनों बुलाकर के, जिनकी धर्म में आस्था न हो, जो परमात्मा में विश्वास न करता हो, उसको भी बुलाकर के जरा बताओ तो भाई और हमारा जो भक्त समुदाय है। उनके सामने विचार-विमर्श हर परंपरा में साल में एक बार 7 दिन अपने-अपने तरीके से अपने-अपने स्थान पर ज्ञानी-विज्ञानी को बुलाकर के विचार-विमर्श हो तो आप देखिए 3 साल के बाद अगला जब हमारा कुंभ का अवसर आएगा और 12 साल के बाद जो महाकुंभ आता है वो जब आएगा आप देखिए ये हमारी विचार-मंथन की प्रक्रिया इतनी sharpen हुई होगी, दुनिया हमारे विचारों को उठाने के लिए तैयार होगी।

जब अभी पेरिस में पुरा विश्व climate को लेकर के चिंतित था, भारत ने एक अहम भूमिका निभाई और भारत ने उन मूल्यों को प्रस्तावित करने का प्रयास किया। एक पुस्तक भी प्रसिद्ध हुई कि प्रकृति के प्रति प्रेम का धार्मिक जीवन में क्या-क्या महत्व रहा है और पेरिस के, दुनिया के सामने life style को बदलने पर बल दिया, ये पहली बार हुआ है।

हम वो लोग हैं जो पौधे में भी परमात्मा देखते हैं, हम वो लोग हैं जो जल में भी जीवन देखते हैं, हम वो लोग हैं जो चांद और सूरज में भी अपने परिवार का भाव देखते हैं, हम वो लोग हैं जिनको... आज शायद अंतरराष्ट्रीय Earth दिवस मनाया जाता होगा, पृथ्वी दिवास मनाया जाता होगा लेकिन देखिए हम तो वो लोग हैं जहां बालक सुबह उठकर के जमीन पर पैर रखता था तो मां कहती थी कि बेटा बिस्तर पर से जमीन पर जब पैर रखते हो तो पहले ये धरती मां को प्रणाम करो, माफी मांगों, कहीं तेरे से इस धरती मां को पीढ़ा न हो हो जाए। आज हम धरती दिवस मनाते हैं, हम तो सदियों से इस परंपरा को निभाते आए हैं।

हम ही तो लोग हैं जहां मां, बालक को बचपन में कहती है कि देखो ये पूरा ब्रहमांड तुम्हारा परिवार है, ये चाँद जो है न ये चाँद तेरा मामा है। ये सूरज तेरा दादा है। ये प्रकृति को अपना बनाना, ये हमारी विशेषता रही है।

सहज रूप से हमारे जीवन में प्रकृति का प्रेम, प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन के संस्कार हमें मिले हैं और इसलिए जिन बिंदुओं को लेकर के आज हम चलना चाहते हैं। उन बिंदुओं पर विश्वास रखते हुए और जो काल बाह्य है उसको छोड़ना पड़ेगा। हम काल बाह्य चीजों के बोझ के बीच जी नहीं सकते हैं और बदलाव कोई बड़ा संकट है, ये डर भी मैं नहीं मानता हूं कि हमारी ताकत का परिचय देता है। अरे बदलाव आने दो, बदलाव ही तो जीवन होता है। मरी पड़ी जिंदगी में बदलाव नहीं होता है, जिंदा दिल जीवन में ही तो बदलाव होता है, बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। हम सर्वसमावेशक लोग हैं, हम सबको जोड़ने वाले लोग हैं। ये सबको जोड़ने का हमारा सामर्थ्य है, ये कहीं कमजोर तो नहीं हो रहा अगर हम कमजोर हो गए तो हम जोड़ने का दायित्व नहीं निभा पाएंगे और शायद हमारे सिवा कोई जोड़ पाएगा कि नहीं पाएगा ये कहना कठिन है इसलिए हमारा वैश्विक दायित्व बनता है कि जोड़ने के लिए भी हमारे भीतर जो विशिष्ट गुणों की आवश्यकता है उन गुणों को हमें विकसित करना होगा क्योंकि संकट से भरे जन-जीवन को सुलभ बनाना हम लोगों ने दायित्व लिया हुआ है और हमारी इस ऋषियों-मुनियों की परंपरा ज्ञान के भंडार हैं, अनुभव की एक महान परंपरा रही है, उसके आधार पर हम इसको लेकर के चलेंगे तो मुझे पूरा विश्वास है कि जो अपेक्षाएं हैं, वो पूरी होंगी। आज ये समारोह संपन्न हो रहा है।

मैं शिवराज जी को और उनकी पूरी टीम को हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं इतने उत्तम योजना के लिए, बीच में प्रकृति ने कसौटी कर दी। अचानक आंधी आई, तूफान सा बारिश आई, कई भक्त जनों को जीवन अपना खोना पड़ा लेकिन कुछ ही घंटों में व्यवस्थाओं को फिर से ठीक कर दी। मैं उन सभी 40 हजार के करीब मध्य प्रदेश सरकार के छोटे-मोटे साथी सेवारत हैं, मैं विशेष रूप से उनको बधाई देना चाहता हूं कि आपके इस प्रयासों के कारण सिर्फ मेला संपन्न हुआ है, ऐसा नहीं है। आपके इन उत्तम प्रयासों के कारण विश्व में भारत की एक छवि भी बनी है। भारत के सामान्य मानव के मन में हमारा अपने ऊपर एक विश्वास बढ़ता है इस प्रकार के चीजों से और इसलिए जिन 40 हजार के करीब लोगों ने 30 दिन, दिन-रात मेहनत की है उनको भी मैं बधाई देना चाहता हूं, मैं उज्जैनवासियों का भी हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं, उन्होंने पूरे विश्व का यहां स्वागत किया, सम्मान किया, अपने मेहमान की तरह सम्मान किया और इसलिए उज्जैन के मध्य प्रदेश के नागरिक बंधु भी अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं, उनको भी हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और अगले कुंभ के मेले तक हम फिर एक बार अपनी विचार यात्रा को आगे बढ़ाएं इसी शुभकामनाओं के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, फिर एक बार सभी संतों को प्रणाम और उनका आशीर्वाद, उनका सामर्थ्य, उनकी व्यवस्थाएं इस चीज को आगे चलाएगी, इसी अपेक्षा के साथ सबको प्रणाम।

सेवा आणि समर्पणाची व्याख्या सांगणारी 20 छायाचित्रे
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वाराणसी इथे पीएम आयुष्मान भारत आरोग्यविषयक पायाभूत सुविधा अभियानाच्या उद्घाटनप्रसंगी पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी केलेले भाषण
October 25, 2021
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“स्वातंत्र्योत्तर भारतात, दीर्घ काळापर्यंत आरोग्य विषयक पायाभूत सुविधांकडे द्यायला हवे तसे लक्ष दिले गेले नाही आणि त्याकाळी नागरिकांना योग्य उपचारांसाठी धावपळ करावी लागल्यामुळे रुग्णाची परिस्थिती आणि आर्थिक ताण अधिकच वाढत जात असे”
“केंद्रातील तसेच राज्यातील सरकार यांना गरीब, पददलित, नाडलेले, मागास वर्गीय आणि मध्यम वर्गीय यांच्या वेदना समजत आहेत”
“पंतप्रधान आयुष्मान भारत आरोग्य विषयक पायाभूत सुविधा अभियानाच्या माध्यमातून देशातील प्रत्येक काना-कोपऱ्यात, उपचारांपासून महत्त्वाच्या संशोधनापर्यंतच्या सर्व सुविधांसाठी संपूर्ण परिसंस्था उभारण्यात येईल”
“पंतप्रधान आयुष्मान भारत आरोग्य विषयक पायाभूत सुविधा अभियान हे आरोग्यक्षेत्राच्या विकासासह आत्मनिर्भरतेचे देखील माध्यम आहे”
“काशी शहराचे हृदय होते तसेच आहे, मन देखील तेच आहे, पण शरीर सुधारण्यासाठी प्रामाणिक प्रयत्न केले जात आहेत”
“बनारस हिंदू विद्यापीठात आज तंत्रज्ञानापासून आरोग्य क्षेत्रापर्यंत सर्व बाबतीत अभूतपूर्व सुविधा निर्माण केल्या जात आहेत. संपूर्ण देशभरातून युवक मित्र येथे अभ्यासासाठी येत आहेत”

मला सुरुवात करू द्या, आता तुम्ही मला परवानगी द्या, मग मी बोलायला सुरुवात करीन.  हर हर महादेव, बाबा विश्वनाथ, काशी या पवित्र भूमीतल्या सर्व बंधू-भगिनींना, आई अन्नपूर्णेच्या नगरीतील सर्व बंधू आणि भगिनींना  विनम्र अभिवादन.  तुम्हा सर्वांना दिवाळी, देव दीपावली, अन्नकूट, भाऊबीज, प्रकाशोत्सव आणि दाला छठच्या हार्दिक शुभेच्छा.  उत्तर प्रदेशच्या राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेलजी, उत्तर प्रदेशचे ऊर्जावान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथजी, केंद्रीय आरोग्य मंत्री मनसुख मांडवियजी, उत्तर प्रदेश सरकारचे इतर मंत्री, केंद्रातील आमचे आणखी एक सहकारी महेंद्र नाथ पांडेजी, आणखी एक राज्यमंत्री अनिल राजभरजी. नीलकंठ तिवारीजी, श्री. रवींद्र जैस्वालजी, इतर मंत्री, संसदेतील आमच्या सहकारी श्रीमती सीमा द्विवेदीजी, बीपी सरोजजी, वाराणसीच्या महापौर श्रीमती मृदुला जैस्वालजी, इतर लोकप्रतिनिधी, तंत्रज्ञानाच्या माध्यमातून देशाच्या कानाकोपऱ्यातून जोडले गेलेले आरोग्य व्यावसायिक, जिल्हा रुग्णालय, वैद्यकीय संस्था आणि इथे उपस्थित बनारसचे माझे बंधू आणि भगिनी.

 

कोरोना महामारीविरुद्धच्या लढाईत देशाने 100 कोटी लसींच्या मात्रांचा मोठा टप्पा पूर्ण केला आहे.  बाबा विश्वनाथ यांच्या आशीर्वादाने, मा गंगेच्या अतूट महिमेने, काशीतील लोकांच्या अतूट विश्वासाने, सर्वांसाठी मोफत लसीची मोहीम यशस्वी होत आहे.  मी तुम्हा सर्व स्वजनांना नमन करतो.  आजच काही वेळापूर्वी, एका कार्यक्रमात, मला उत्तर प्रदेशला 9 नवीन वैद्यकीय महाविद्यालये समर्पित करण्याचा बहुमान मिळाला.  यामुळे पूर्वांचल आणि संपूर्ण उत्तर प्रदेशातील कोट्यवधी गरीब, दलित-मागास-शोषित-वंचित लोकांना, अशा समाजातील सर्व घटकांना, खूपच फायदा होईल. इतर शहरांमधील मोठ्या रुग्णालयांसाठी त्यांची धावपळ होत असे ती कमी होईल.

 

मित्रांनो,

 

मानसमधे  म्हटलं आहे –

मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानिअघ हानि कर।

जहं बस सम्भु भवानि, सो कासी सेइअ कस न।।

म्हणजेच शिव आणि शक्ती काशीमध्ये विराजमान आहेत.  ज्ञानाचे भांडार असलेली काशी आपल्याला कष्ट आणि क्लेश या दोन्हीपासून मुक्ती देते.  मग आरोग्याशी निगडित एवढी मोठी योजना, रोग-कष्टांपासून मुक्ती मिळवण्याचा एवढा मोठा संकल्प, ती सुरू करण्यासाठी काशीहून चांगली जागा कोणती असू शकते ?  काशीच्या माझ्या बंधू आणि भगिनींनो, आज या व्यासपीठावर दोन मोठे कार्यक्रम होत  आहेत.  एक भारत सरकारचा आणि संपूर्ण भारतासाठी 64 हजार कोटींहून अधिक खर्चाचा हा कार्यक्रम आज काशीच्या पवित्र भूमीतून सुरू होत आहे.  आणि दुसरे म्हणजे, काशी आणि पूर्वांचलच्या विकासासाठी हजारो कोटींच्या कार्यक्रमांचे उद्घाटन करण्यात आले. एक प्रकारे, मी असे म्हणू शकतो की येथे पहिला कार्यक्रम आणि इथला कार्यक्रम मिळून, मी असे म्हणू शकतो की आज सुमारे 75 हजार कोटी रुपयांच्या कामांचा निर्णय किंवा लोकार्पण आज इथे होत आहे.  काशीपासून सुरू होणाऱ्या या योजनेत महादेवाचा आशीर्वादही आहे.  आणि जिथे महादेवाचे आशीर्वाद आहेत, तिथे कल्याणच कल्याण आहे, यशच यश आहे.  आणि जेव्हा महादेवाचा आशीर्वाद असतो, तेव्हा दुःखापासून मुक्तीही स्वाभाविक असते.

मित्रांनो,

 

आज, उत्तर प्रदेशसह संपूर्ण देशाच्या आरोग्याच्या पायाभूत सुविधांना बळ देण्यासाठी, भविष्यातील साथीच्या आजारांना रोखण्यासाठी आपली तयारी उच्च पातळीची असली पाहिजे. गाव आणि विभाग पातळीपर्यंत आपल्या आरोग्य व्यवस्थेमध्ये आत्मविश्वास आणि आत्मनिर्भरता आणण्यासाठी आज मला काशीतून 64 हजार कोटी रुपयांचे आयुष्मान भारत आरोग्य पायाभूत सुविधा अभियान देशाला समर्पित करण्याचा बहुमान मिळाला आहे.  काशीच्या पायाभूत सुविधांशी संबंधित 5000 कोटी रुपयांच्या प्रकल्पांचे उद्घाटनही आज झाले आहे.  यामध्ये घाटांचे सौंदर्यीकरण, गंगाजी आणि वरुणाची स्वच्छता, पूल, पार्किंगची ठिकाणे, बीएचयूमधील अनेक सुविधांशी संबंधित अनेक प्रकल्प आहेत.  या सणासुदीच्या काळात, जीवन सुगम, निरोगी आणि समृद्ध करण्यासाठी काशीमध्ये होत असलेला हा विकास महोत्सव एक प्रकारे संपूर्ण देशाला नवी ऊर्जा, नवी ताकद, नवा आत्मविश्वास देणारा आहे.  त्यासाठी आज काशीसह 130 कोटी देशवासियांना काशीच्या भूमीपासून, भारताच्या प्रत्येक कानाकोपऱ्यापर्यंत, भारताच्या गावापासून भारताच्या शहरापर्यंत, सर्वांना खूप खूप शुभेच्छा!

 बंधू आणि भगिनींनो,

 आरोग्य हा इथल्या प्रत्येक कृतीचा मूळ आधार मानला जातो.  शरीर निरोगी ठेवण्यासाठी केलेली गुंतवणूक ही नेहमीच उत्तम गुंतवणूक मानली गेली आहे.  पण स्वातंत्र्योत्तर प्रदीर्घ काळात आरोग्यावर, आरोग्य सुविधांकडे देशाला जेवढे हवे होते तेवढे लक्ष दिले गेले नाही.  देशात ज्यांची सरकारे प्रदीर्घकाळ होती, त्यांनी देशाची आरोग्य व्यवस्था पूर्णपणे विकसित करण्याऐवजी सुविधांपासून वंचित ठेवली.  गावात एकतर रुग्णालय नाही, रुग्णालय असतील तर उपचार करायला कोणी नव्हते. विभागातील रुग्णालयात  गेलो तर तेथे चाचणीची सोय नाही.  चाचणीची सोय असेल, चाचणी केली तरी निकालाबाबत संभ्रम, त्याच्या अचूकतेबद्दल शंका, जिल्हा रुग्णालयात पोहोचल्यावर कळते की, ज्या गंभीर आजाराचं निदान झालं आहे त्यावर शस्त्रक्रिया करावी लागणार. पण जी शस्त्रक्रिया करायची आहे त्यासाठी सोय नाही, मग मोठ्या रुग्णालयांत धाव घ्या, मोठ्या रुग्णालयात जास्त गर्दी, जास्त वेळ थांबा.  आपण सर्व साक्षीदार आहोत की रुग्ण आणि त्याच्या संपूर्ण कुटुंबाला अशाच समस्यांचा सामना करावा लागला.  जीवन संघर्षातच चालले होते, त्यामुळे एखादा गंभीर आजार अनेक वेळा बळावतो, वरून गरीबांवर अनावश्यक आर्थिक बोजा पडतो तो वेगळाच.

 

मित्रांनो,

 

आपल्या आरोग्यसेवा व्यवस्थेतील मोठ्या कमतरतेने गरीब आणि मध्यमवर्गीयांमध्ये उपचाराबाबत कायमची चिंता निर्माण केली आहे.  आयुष्मान भारत आरोग्य पायाभूत सुविधा अभियान हे देशाच्या आरोग्य व्यवस्थेतील या उणीवा दूर करण्यासाठीचा उपाय आहे.  आपण भविष्यात कोणत्याही साथीच्या रोगाचा सामना करण्यासाठी सज्ज असावं, सक्षम असावं यासाठी आपली आरोग्य यंत्रणा आज घडवली जात आहे.  आजाराचं लवकरात लवकर निदान व्हावं. तपासणीत दिरंगाई होऊ नये, यासाठीही प्रयत्न केले जात आहेत.  पुढील 4-5 वर्षात देशातील गावापासून ते विभाग, जिल्हा, प्रादेशिक आणि राष्ट्रीय पातळीपर्यंत  सक्षम आरोग्य सेवा जाळे मजबूत करण्याचे उद्दिष्ट आहे.  विशेषत: ज्या राज्यांमध्ये आरोग्य सुविधांचा अभाव आहे, जी आपली डोंगराळ आणि ईशान्येकडील राज्ये आहेत, त्यांच्यावर अधिक लक्ष केंद्रित केले जात आहे.  जसे की उत्तराखंड, हिमाचल आहे.

 

देशातील आरोग्य क्षेत्रातील कमतरता भरून काढण्यासाठी आयुष्मान  भारत आरोग्य विषयक पायाभूत सुविधा अभियानाचे 3 महत्वाचे पैलू आहेत. पहिला पैलू रोगनिदान आणि उपचारासाठी व्यापक सुविधांच्या उभारणीशी संबंधित आहे. याअंतर्गत गावांमध्ये आणि शहरांमध्ये आरोग्य आणि निरामयता केंद्र सुरु करण्यात येत आहेत, आजाराचे निदान लवकर आणि सुरुवातीलाच व्हावे यासाठीची सुविधा या  केंद्रांमध्ये असेल. या केंद्रांच्या माध्यमातून  विनामूल्य वैद्यकीय सल्ले,विनामूल्य चाचण्या, विनामूल्य औषधे यांसारख्या सुविधा उपलब्ध होतील. वेळेवर आजाराचे निदान झाले तर आजार गंभीर  होण्याची शक्यता कमी राहील. गंभीर आजाराच्या परिस्थितीत या आजारावर उपचार करण्यासाठी 600 हुन अधिक जिल्ह्यात, क्रिटिकल केअरशी संबंधित 35 हजारांहून अधिक खाटा  तयार केल्या जातील.  बाकी,सुमारे सव्वाशे जिल्ह्यांमध्ये संदर्भ सेवांची सुविधा दिली जाईल. यासाठी राष्ट्रीय स्तरावर प्रशिक्षण आणि दुसऱ्या क्षमता बांधणीसाठी 12 केंद्रीय रुग्णालयांमध्ये आवश्यक सुविधा विकसित करण्याबाबतही काम सुरु आहे. या योजनेअंतर्गत राज्यांमध्येही शास्त्रक्रियेशी निगडीत जाळ्याला सक्षम करण्यासाठी 24x7 चालणारी  15 आपत्कालीन शस्त्रक्रिया केंद्रही तयार केली जातील.

मित्रांनो,

या योजनेचा दुसरा पैलू, आजाराच्या निदानासाठी  चाचणी नेटवर्कशी संबंधित आहे. या अभियानाअंतर्गत आजारांचे निदान आणि निगराणीसाठी आवश्यक पायाभूत सुविधा विकसित केल्या जातील. देशातील 730 जिल्ह्यांमध्ये एकात्मिक सार्वजनिक आरोग्य प्रयोगशाळा आणि देशातील निश्चित केलेल्या 3,500  पंचायतींच्या कार्यक्षेत्रात पंचायत स्तरावरील  सार्वजनिक आरोग्य कक्षांची स्थापना केली जाईल.रोग नियंत्रणासाठी 5 प्रादेशिक राष्ट्रीय केंद्रे, 20 मेट्रोपॉलिटन युनिट्स आणि 15 बीएसएल प्रयोगशाळा  हे नेटवर्क आणखी बळकट करतील.

बंधू आणि भगिनींनो,

 

महामारीशी संबंधित संशोधन संस्थांचा विस्तार करून त्यांना सक्षम बनवणे हा या अभियानाचा तिसरा पैलू आहे. आताच्या घडीला देशात 80 विषाणूजन्य रोग  निदान आणि संशोधन प्रयोगशाळा आहेत, या अधिक बळकट  केल्या जातील. महामारीमध्ये  जैवसुरक्षा पातळी-3  स्तरावरील प्रयोगशाळांची गरज असते. अशा 15 जैवसुरक्षा स्तरीय प्रयोगशाळा कार्यरत केल्या जातील, याशिवाय, चार नव्या राष्ट्रीय विषाणूशास्त्र संस्था आणि वन हेल्थसाठी राष्ट्रीय संस्था स्थापन केली जात आहे. दक्षिण आशियासाठी जागतिक आरोग्य संघटनेचे  प्रादेशिक संशोधन व्यासपीठ देखील संशोधनाचे हे जाळे  मजबूत करेल.म्हणजेच आयुष्मान भारत आरोग्य विषयक पायाभूत सुविधा अभियानाच्या  माध्यमातून उपचारांपासून ते  महत्वाच्या संशोधनापर्यंत सर्वांचा समावेश असलेल्या अशा सुविधा,देशाच्या कानाकोपऱ्यात पोहोचण्याच्या दृष्टीने एक संपूर्ण कार्यक्षेत्र विकसित केले जाईल.

 

मित्रांनो,

खरे तर ,हे काम काही दशकांपूर्वीच  व्हायला हवे होते .पण परिस्थिती काय आहे याचे वर्णन करण्याची मला गरज नाही, गेल्या 7 वर्षांपासून आपण सातत्याने सुधारणा करत आहोत पण आता हे काम खूप मोठ्या प्रमाणावर, अत्यंत आक्रमक दृष्टिकोनासह  करावे लागणार आहे.काही दिवसांपूर्वी, तुम्ही पाहिले असेल की मी दिल्लीत संपूर्ण देशासाठी एक अतिशय मोठा देशव्यापी पायाभूत सुविधा कार्यक्रम 'गती-शक्ती'सुरु  केला. आज हा दुसरा कार्यक्रम, आरोग्यासाठी सुमारे  64 हजार कोटी रुपये खर्चाचा आरोगासाठीचा, रोगाविरुद्धच्या लढाईसाठी, देशातील प्रत्येक नागरिकाला निरोगी ठेवण्यासाठी इतके मोठे  अभियान  घेऊन आज आपण काशीच्या भूमीतून देशभरात निघालो आहोत.

मित्रांनो,

जेव्हा अशा आरोग्य पायाभूत सुविधा निर्माण होतात, तेव्हा त्यातून आरोग्य सेवेत सुधारणा तर होतेच, शिवाय संपूर्ण रोजगाराचे वातावरणही निर्माण होते.डॉक्टर्स, निमवैद्यक, प्रयोगशाळा, औषधालय, स्वच्छता, कार्यालय, प्रवास-वाहतूक, खाण्यापिण्याच्या क्षेत्रासारखे  अनेक रोजगार  या योजनेतून निर्माण होणार आहेत. एखादे मोठे  रुग्णालय बांधले  की त्याच्याभोवती संपूर्ण शहर वसते, हे आपण पाहिलं आहे.जे रुग्णालयाशी संबंधित उपक्रमांसाठी उपजीविकेचे केंद्र बनते. ते मोठ्या आर्थिक घडामोडीचे  केंद्र बनते.आणि म्हणूनच आयुष्मान भारत आरोग्यविषयक पायाभूत सुविधा अभियान  हे आरोग्यासह  आर्थिक आत्मनिर्भरतेचेही   माध्यम आहे.सर्वांगीण आरोग्य सेवेसाठी सुरू असलेल्या प्रयत्नांचा हा एक भाग आहे. सर्वांगीण आरोग्य सेवा म्हणजे जी सर्वांसाठी सुलभ, परवडणारी आणि सर्वांसाठी उपलब्ध असेल. सर्वांगीण आरोग्य सेवा म्हणजे  जिथे आरोग्य तसेच निरोगी राहण्यावरही  लक्ष केंद्रित केले जाते.स्वच्छ भारत अभियान, जल जीवन अभियान , उज्ज्वला योजना, पोषण अभियान, मिशन इंद्रधनुष, अशा अनेकअभियानांनी   देशातील कोट्यवधी गरीबांना रोगांपासून संरक्षण दिले आहे  आहे, त्यांना आजारी पडण्यापासून वाचवले आहे. आयुष्मान भारत योजनेच्या माध्यमातून  रुग्णालयांमध्ये दाखल दोन कोटींहून अधिक गरीबांवर मोफत उपचार केले आहेत.आयुष्मान भारत डिजिटल अभियानाच्या  माध्यमातून उपचारांशी संबंधित अनेक समस्या सोडवल्या जात आहेत.

 

बंधू आणि भगिनींनो,

 

आमच्या आधी वर्षानुवर्षे जे सरकारमध्ये होते त्यांच्यासाठी आरोग्यसेवा हे पैसे कमवण्याचे साधन, घोटाळे करण्याचे माध्यम राहिले आहे. गरिबांचे हाल पाहूनही ते  त्यांच्यापासून दूर पळत राहिले. आज केंद्रात आणि राज्यात गरीब, दलित, शोषित- वंचित , मागास, मध्यमवर्गीय अशा सर्वांच्या वेदना समजून घेणारे सरकार आहे.देशातील आरोग्य सुविधा सुधारण्यासाठी आम्ही रात्रंदिवस झटत आहोत. पूर्वी जनतेचा पैसा घोटाळ्यात जायचा, अशा लोकांच्या तिजोरीत जायचा, आज मोठमोठ्या प्रकल्पांमध्ये पैसा खर्च होत आहे.त्यामुळे आज देश इतिहासातील सर्वात मोठ्या महामारीचाही सामना करत आहे आणि आत्मनिर्भर भारतासाठी लाखो कोट्यवधींच्या  पायाभूत सुविधाही उभारत आहे.

मित्रांनो,

वैद्यकीय सुविधा वाढवण्यासाठी डॉक्टर आणि निमवैद्यकीय कर्मचाऱ्यांची  संख्याही तितक्याच वेगाने वाढणे अत्यंत आवश्यक आहे.उत्तरप्रदेशमध्ये ज्या वेगाने नवीन वैद्यकीय महाविद्यालये उघडली जात आहेत त्याचा चांगला परिणाम वैद्यकीय प्रवेशासाठीच्या आणि डॉक्टरांच्या संख्येवर होईल.अधिक जागांमुळे आता गरीब पालकांची  मूलेही डॉक्टर होण्याचे स्वप्न पाहू शकणार आहेत  आणि ते पूर्णही  करू शकणार आहेत .

 

बंधू आणि भगिनींनो,

 

स्वातंत्र्यानंतरच्या 70 वर्षात देशात जेवढे डॉक्टर वैद्यकीय महाविद्यालयातून अभ्यास करून बाहेर पडले आहेत, त्यापेक्षा जास्त डॉक्टर येत्या 10-12 वर्षात देशाला मिळणार आहेत. देशात वैद्यकीय क्षेत्रात किती मोठे काम सुरु आहे, याची तुम्ही कल्पना करू शकता.जेव्हा जास्त डॉक्टर असतील, तेव्हा देशाच्या कानाकोपऱ्यात तितक्याच सहजतेने डॉक्टर उपलब्ध होतील. हाच  नवा भारत आहे जिथे अभावाच्या पलीकडे जाऊन प्रत्येक आकांक्षा पूर्ण करण्यासाठी रात्रंदिवस काम केले जाते आहे. 

बंधू आणि भगिनींनो,

 

गतकाळात  देशात असो वा उत्तर प्रदेशात ,ज्या पद्धतीने काम झाले , जर त्याच पद्धतीने काम झाले असते, तर आज काशीची काय अवस्था झाली असती? भारताच्या सांस्कृतिक वारशाचे प्रतीक असलेले जगातील सर्वात जुने शहर काशीला त्यांनी वाऱ्यावर सोडले होते. त्या लोंबकळणाऱ्या विजेच्या तारा, खडबडीत रस्ते, घाट आणि गंगामैया यांची दुर्दशा, वाहतूक कोंडी , प्रदूषण, अनागोंदी, हेच सर्वकाही सूरु असायचे. आज काशीचे हृदय तेच आहे, मन तेच आहे, मात्र  शरीर सुधारण्यासाठी प्रामाणिक प्रयत्न सुरू आहेत.वाराणसीमध्ये जितके काम गेल्या ७ वर्षांत झाले, तितके काम गेल्या अनेक दशकांत झाले नाही.

 

बंधू आणि भगिनींनो,

रिंग रोड नसतांना काशी मध्ये वाहतूक कोंडीमुळे काय त्रास होत असेल, याचा आपण सर्वांनी वर्षानुवर्षे अनुभव घेतला आहे. ‘नो एन्ट्री’ उघडण्याची वाट बघणे हे तर आता बनारसच्या लोकांच्या सवयीचे झाले होते. पण आता रिंग रोड तयार झाल्यामुळे, प्रयागराज, लखनौ, आजमगढ, गाजीपूर, गोरखपूर, दिल्ली, कोलकाता कुठेही जायचे-यायचे असेल, तर शहरात येणाऱ्या लोकांना शहरांतल्या नागरिकांना त्रास देण्याची गरज पडणार नाही. केवळ हेच नाही, तर रिंग रोड आता गाजीपूर च्या बिरनोन पर्यंत चारपदरी राष्ट्रीय महामार्गाशी जोडण्यात आले आहे. जागोजागी सर्विस रोडच्या सुविधा देखील देण्यात आल्या आहेत. यामुळे, गावांसोबतच, प्रयागराज, लखनौ, गोरखपूर आणि बिहार, अगदी थेट नेपाळपर्यंतच्या वाहतुकीची  सुविधा  सोयीची झाली आहे. यामुळे, प्रवास तर सुलभ झालाच आहे, पण व्यापार-उद्योगधंद्यांनाही गती मिळेल आणि वाहतुकीची किंमत कमी होईल.

 

बंधू आणि भगिनींनो,

 

जोपर्यंत देशात एका समर्पित पायाभूत सुविधांची निर्मिती होत नाही, तोपर्यंत विकासाचा वेगही अर्धवट राहतो. वरुणा नदीवर दोन पूल बनवण्यामुळे डझनभर गावांसाठी आता शहरात जाणे-येणे सुलभ झाले आहे. यामुळे विमानतळाकडे येण्या-जाण्यासाठी प्रयागराज, भादोही आणि मिर्झापूरच्या लोकांना अत्यंत सोयीचे होणार आहे. त्याशिवाय, गालिचा उद्योगांशी संबंधित कारागिरांना देखील  लाभ मिळणार आहेत. आणि मां विंध्यवासिनीच्या दर्शनासाठी विमानतळापासून थेट मिर्झापूर इथे जाण्यास इच्छुक मां भक्तांनाही सुविधा मिळणार आहे. रस्ते, पूल, पार्किंग अशा ठीकाणांशी संबंधित अनेक प्रकल्प आज वाराणसीच्या लोकांना समर्पित केले गेले आहेत. ज्यामुळे शहर आणि आसपासच्या लोकांची आयुष्ये अधिक सुगम होणार आहेत. रेल्वेस्थानकांवर तयार होणाऱ्या आधुनिक एक्झिक्युटिव्ह लाऊंजमुळे प्रवाशांना सोयीसुविधा अधिक वाढवण्यात आल्या आहेत.

मित्रांनो,

गंगानदीची स्वच्छता आणि निर्मळतेसाठी गेल्या काही वर्षांत व्यापक काम केले जात आहे, ज्याचे परिणाम आज आम्ही देखील अनुभवतो आहोत. घरांतील सांडपाणी गंगा नदीत जाऊ नये, यासाठी सातत्याने प्रयत्न केले जात आहेत. आता रामनगर इथे, पाच नाल्यातून वाहणाऱ्या सांडपाण्यावर प्रक्रिया करण्यासाठी आधुनिक प्रक्रिया केंद्रांचे काम सुरु झाले आहे. यामुळे आसपासच्या 50 हजार पेक्षा अधिक लोकसंख्येला थेट लाभ मिळणार आहे. गंगामाईच नाही, तर वरुणा नदीच्या स्वच्छतेविषयी देखील प्राधान्याने काम केले जात आहे. दीर्घकाळपर्यंत उपेक्षित राहिलेली वरुणा नदी, नामशेष होण्याच्या मार्गावर पोहोचली होती. वरुणा नदीच्या संवर्धनासाठी कालव्यांच्या योजनेवर काम केले जात आहे. आज वरुणा नदीत स्वच्छ जल देखील पोहोचत आहे. 13 छोट्या-मोठ्या नाल्यांमधील सांडपाण्यावर प्रक्रिया केली जात आहे. वरुणा नदीकिनारी पदपथ, रेलिंग, लाईटिंग, पक्के घाट, पायऱ्या  अशा अनेक सुविधांची निर्मिती देखील पूर्णत्वाच्या मार्गावर आहे.

मित्रांनो,

काशीनगरी अध्यात्मासोबतच ग्रामीण अर्थव्यवस्थेचे महत्वाचे केंद्र आहे. काशीसह, संपूर्ण पूर्वांचलच्या शेतकऱ्यांची उत्पादने, देशविदेशातील बाजारांमध्ये पोचवण्यासाठी, गेल्या अनेक वर्षात, अनेक सुविधा विकसित करण्यात आल्या आहेत. नाशवंत वस्तूंच्या मालवाहतुकीच्या केंद्रांपासून, पॅकेजिंग आणि प्रक्रिया उद्योगासाठीच्या आधुनिक पायाभूत सुविधा इथे विकसित केल्या गेल्या आहेत. याच मालिकेत, लाल बहादूर शास्त्री फळे आणि भाजीपाला बाजाराचे आधुनिकीकरण देखील झाले आहे, नूतनीकरण झाले आहे, यामुळे शेतकऱ्यांना उत्तम सुविधा निर्माण झाल्या आहेत. शहंशाहपूर इथे जैव-सीएनजी प्रकल्प तयार झाल्यामुळे, बायोगॅस तर मिळणार आहेच आणि हजारो मेट्रिक टन सेंद्रिय खत देखील, शेतकऱ्यांना उपलब्ध केले जाणार आहे.

बंधू आणि भगिनींनो,

गेल्या काही वर्षात वाराणसी शहराचे आणखी एक विशेष यश  असेल, तर ते म्हणजे बनारस हिंदू विद्यापीठाचे पुन्हा जगात श्रेष्ठत्वाच्या दिशेने अग्रेसर होणे. आज बनारस हिंदू विद्यापीठात तंत्रज्ञानापासून ते आरोग्यापर्यंत,अभूतपूर्व सुविधा निर्माण होत आहेत. देशभरातून इथे युवक अभ्यासासाठी इथे येत आहेत. इथे शेकडो विद्यार्थी-विद्यार्थिनीसाठी ज्या वसतिगृह सुविधा निर्माण झाल्या आहेत, त्या युवा सहकाऱ्यांसाठी अत्यंत उपयुक्त ठरणार आहेत. विशेषत: शेकडो विद्यार्थ्यांसाठी ज्या वसतिगृह सुविधा तयार झाल्या आहेत, त्यामुळे पंडित मदनमोहन मालवीय यांची स्वप्ने साकार होण्यास आणखी पाठबळ मिळणार आहे. मुलींना उच्च आणि आधुनिक शिक्षण देण्याच्या ज्या संकल्पाची पूर्तता करण्यासाठी त्यांनी आपले आयुष्य वेचले, त्यांचे संकल्प पूर्ण करण्यात आम्हाला मदत होणार आहे.

बंधू आणि भगिनींनो,

विकासाचे हे सर्व संकल्प, आत्मनिर्भरतेचा आपला संकल्प प्रत्यक्षात सिद्ध करणारे आहेत. काशी आणि हे संपूर्ण क्षेत्र आता मातीपासून विविध वस्तू तयार करणारे अद्भूत कलाकार, कारागीर आणि अप्रतिम वस्त्रे विणणाऱ्या विणकरांसाठी ओळखले जाते. सरकारच्या प्रयत्नांमुळे गेल्या पाच वर्षांत वाराणसी इथे खादी आणि इतर कुटीर उद्योगांच्या उत्पादनांत सुमारे 60 टक्के आणि विक्रीमध्ये सुमारे 90 टक्क्यांची वाढ झाली आहे.

यामुळेच, मी  पुन्हा एकदा इथल्या सर्व देशबांधवांना आग्रह करेन, की या दिवाळीत आपण आपल्या या मित्रांच्या दिवाळीची देखील आठवण ठेवायला हवी. आपल्या घराच्या सजावटीपासून ते आपले कपडे आणि दिवाळीच्या दिव्यांपर्यंत, स्थानिक उत्पादनांसाठी आपल्याला प्रचार, प्रसार करायचा आहे, त्यांची खरेदी करायची आहे. धनत्रयोदशीपासून ते दिवाळीपर्यत आपण स्थानिक वस्तूंची खरेदी केली, तर सर्वांचीच दिवाळी आनंदाने भरून जाईल. आणि जेव्हा मी लोकल फॉर व्होकलविषयी बोलतो, तेव्हा मी पहिले आहे, की आपले टीव्हीवाले लोक देखील केवळ मातीच्या पणत्याच दाखवतात. व्होकल फॉर लोकल केवळ मातीच्या पणत्यांइतके मर्यादित नाही हो, तर यात त्या प्रत्येक गोष्टीचा समावेश आहे, ज्यात आपल्या देशबांधवांचा घाम आहे, ज्या उत्पादनात माझ्या देशाच्या मातीचा सुगंध आहे, त्या सगळ्या वस्तू!

आणि एकदा का आपल्याला याची सवय झाली, तेव्हा देशातल्या वस्तूंची खरेदी केल्यामुळे उत्पादन तर वाढेलच, रोजगारातही वाढ होईल. गरिबातल्या गरिबाला काम मिळेल आणि हे काम आपण सर्व मिळून करू शकतो. सर्वांच्या प्रयत्नातून आपण सगळे खूप मोठे परिवर्तन घडवू शकतो.

मित्रांनो,

पुन्हा एकदा आयुष्मान भारत आरोग्य पायाभूत सुविधा अभियानासाठी, संपूर्ण देशाचे आणि विकासाच्या या प्रकल्पांसाठी काशी नगरीचे खूप खूप अभिनंदन ! आपल्या सर्वांना येणाऱ्या सर्व सण-उत्सवांसाठी अनेकानेक शुभेच्छा !

खूप खूप धन्यवाद !