NDA's 6 sutras for development of Bihar-for people: Education, Employment, Medical facilities; for state: Power, Water, Roads: PM
If hitting out at Modi develops Bihar, then I'm ready to take all allegations: PM Modi
For NDA biggest of the grounds seem minute while for 'Mahaswarthbandhan' even a small pandal becomes huge: PM Modi
People of Bihar do not spare the one's who betrays the state. Nitish Kumar would be wiped off in the elections: PM
Lies spread by Nitish & Lalu are unveiling the truth of reservation: PM Modi
People of Bihar would press the button of development. They would vote for the NDA: PM
The term 'Darbhanga Module' was used after blasts in Mumbai & Pune, innocent policewoman had to face consequences: PM

मंच पर विराजमान यहाँ के सभी वरिष्ठ नेतागण। चुनाव में कुशेश्वर स्थान से लोजपा के उम्मीदवार धनंजय कुमार, लोजपा के उम्मीदवार विनोद साहनी, बेनीपुर से भाजपा के उम्मीदवार गोपाल जी ठाकुर, अलीनगर से भाजपा के उम्मीदवार लाल जी यादव, दरभंगा ग्रामीण से हम पार्टी के उम्मीदवार नौशाद आलम जी, दरभंगा नगर से भाजपा के उम्मीदवार संजय जी, हयागढ़ से लोजपा के उम्मीदवार आर। के। चौधरी जी, बहादूरपुर से भाजपा के उम्मीदवार हरीश साहनी, और केवटी से भाजपा के उम्मीदवार अशोक यादव, झाले से भाजपा के उम्मीदवार द्विवेश कुमार मिश्रा, विशाल संख्या में पधारे हुए मेरे भाईयों एवं बहनों।

दरभंगा के ई पावन मिथिला भूमि के नमन करै छी। बाबा कुशेश्वर के ई पावन धरती पर आई के गौरवान्वित महसूस काय रहल छी। दरभंगा की जो पहचान है – पग-पग पोखर पान मखान, सरस बोल मुस्की मुस्कान; विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, ललित नगर मिथिला ठीक। आप सबके दिल से अभिनंदन करै छी।

आज मैं सबसे पहले अपने प्रिय मित्र कीर्ति आज़ाद के खिलाफ़ शिकायत करना चाहता हूँ। मेरी शिकायत ये है कि जब कीर्ति स्वयं चुनाव लड़ रहे थे, मैं लोकसभा का चुनाव लड़ रहा था, तब तो आधी भीड़ भी नहीं थी और आज क्या कमाल कर दिया आप लोगों ने। जहाँ भी मेरी नज़र पहुँचती है, लोग ही लोग नज़र आते हैं। दरभंगा का मैदान भी छोटा पड़ गया है, ये चुनाव ऐसा है कि एनडीए वालों के लिए मैदान छोटा पड़ता है और महास्वार्थबंधन वालों के लिए पंडाल भी बड़ा हो जाता है।

भाईयों-बहनों, इस चुनाव अभियान का ये मेरा आखिरी कार्यक्रम है। पिछली बार मैं जब दरभंगा आया था, समय-सीमा के कारण 12-15 मिनट ही बोल पाया था, मेरे मन में भी कसक थी कि जिस मिथिला की भूमि को अटल जी इतना प्यार करते थे, वहां इतनी कम देर लेकिन आज मैं आपसे जी भर कर मिलने आया हूँ। मुझे बिहार के हर कोने में जाने और एक से बढ़कर एक रैलियों को संबोधित करने का अवसर मिला। इसे क्या कहें, चुनाव सभा, जन सभा, रैली, रैला कहें, मुझे तो लगता है कि ये मेला है, परिवर्तन का मेला है।

दिल्ली में बैठकर पॉलिटिकल पंडित हिसाब लगाते हैं कि 2% इधर जाएगा तो ये होगा, 2% उधर जाएगा तो ये होगा। पंडित जी, अपने पुराने हिसाब-किताब बंद कर दो, बिहार नया इतिहास लिखने जा रहा है। ये पुराने समीकरण और नई गिनतियाँ अब नहीं चलेंगी। बिहार की जनता ने बिहार की तो सेवा की है, इस चुनाव के माध्यम से देश की बहुत बड़ी सेवा की है। जातिवाद और संप्रदायवाद का ज़हर हमारे लोकतंत्र में खरोच पैदा कर रहा है लेकिन इस चुनाव में बिहार का नौजवान नेतृत्व कर विकास के मुद्दे पर लड़ रहा है। इस चुनाव के बाद हिन्दुस्तान की सभी पॉलिटिकल पार्टियों को विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और इसका क्रेडिट बिहार के लोगों को जाता है। इस चुनाव में बिहार का माहौल देश के भविष्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।

मैं आज सार्वजनिक रूप से प्रधान देवक के रूप में बिहार के नागरिकों का सर झुका कर अभिनंदन करता हूँ। मैं जहाँ-जहाँ गया, एनडीए के लोग जहाँ-जहाँ गए, बिहार की जनता ने पलकें बिछाकर हम सभी का स्वागत किया, इसलिए मैं आप सभी को सर झुका कर धन्यवाद करता हूँ। दूसरी बात कि पहले के मतदान के सारे रिकॉर्ड बिहार के चार चरणों ने तोड़ दिए, भारी मतदान किया, माओवादियों के बम-बंदूक की धमकी के बावजूद अभूतपूर्व मतदान किया। इससे लोकतंत्र में जो विश्वास बढ़ा है, इसके लिए मैं बिहार की जनता को नमन करता हूँ। तीसरी बात, पहले बिहार में जब भी चुनाव होता था तो ये ख़बर आती थी कि इतने पोलिंग बूथ लूटे गए, इतनी गोलीबारी हुई, इतनी हत्याएं हुईं लेकिन इस बार के शांतिपूर्ण चुनाव के लिए बिहार के मतदाताओं का ह्रदय से अभिनंदन करता हूँ।

भाईयों-बहनों, इस चुनाव में हम विकास का मुद्दा लेकर पहले दिन से चले, लोकसभा के चुनाव में भी हमारा मुद्दा विकास था लेकिन हम आशा करते थे कि जिन्होंने यहाँ 60 साल राज किया, मैडम सोनिया जी ने 35 साल राज किया, 15 साल तक लालू जी और 10 साल तक नीतीश जी ने राज किया; ये हमारे साथ विकास के मुद्दों पर चर्चा करते, बिहार की बर्बादी के कारण और बिहार से नौजवानों के पलायन का जवाब देते लेकिन अभी भी वे 1990 के कालखंड में जी रहे हैं। उन्हें पता नहीं है कि ये 21वीं सदी चल रही है और 1990 में पैदा हुआ बच्चा आज बिहार का भाग्य बदलने को लालायित है।

दो महीने से चुनाव का अभियान चल रहा है लेकिन लालू जी हो या नीतीश जी या मैडम सोनिया जी, ये लोग बिहार के विकास पर कुछ भी नहीं बोलते। बिहार के भविष्य की किसी योजना के बारे में बात नहीं करते। 25 साल इन्होंने सरकार चलाई, ये कोई कम समय नहीं होता। एक बालक में भी 25 साल के बाद अपने माँ-बाप का पेट भरने की ताक़त आ जाती है। आप मुझे बताईये, 25 साल की इनकी सरकार में किसी का भी कोई भला हुआ? मेरी सरकार को अभी 25 महीने नहीं हुए हैं और ये लोग मेरा हिसाब मांग रहे हैं। ख़ुद का 25 साल का हिसाब देने का तैयार नहीं हैं; और हमसे हिसाब मांग रहे हैं।

चुनाव लोकतंत्र का पर्व होता है और यह पर्व लोकतंत्र को ताक़तवर बनाता है। सभी राजनीतिक दलों को अपनी बात और अपनी नीतियां बतानी होती हैं और जो सरकार में हैं उन्हें अपना हिसाब देना होता है। 2019 में जब मैं लोकसभा चुनाव के लिए आपसे वोट मांगने आऊंगा, तो मेरा फ़र्ज बनता है कि मैं आपको अपने 5 सालों का हिसाब दूँ और आपका हक़ बनता है कि आप मुझसे हिसाब मांगें। लेकिन इन लोगों को देखो, इन्हें मोदी पर कीचड़ उछालने के सिवा और कोई काम ही नहीं है। रोज नए-नए आरोप और गालियां गढ़ी जाती है, क्या इससे बिहार का भला होगा क्या? लालू जी, नीतीश जी, अगर मोदी पर आरोप लगाने से या कीचड़ उछालने से बिहार का भला होता है तो मैं मौजूद हूँ, आपको जो कहना है कहिये। बिहार का भला हो तो मैं ये झेलने के लिए तैयार हूँ।

मेरा जीवन बिहार के काम आए, इससे बड़ा भाग्य मेरा क्या हो सकता है। लालू जी, नीतीश जी, कान खोलकर सुन लीजिये, अहंकार ने आपके आँखों पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि आप देख नहीं पाओगे, आप जितना कीचड़ उछालोगे, कमाल उतना ही ज्यादा खिलने वाला है। पहले चरण से लेकर चौथे चरण तक लगातार मतदान करने वालों की संख्या बढ़ी है और एक बात जो बाहर नहीं आई है, मुझे भी आश्चर्य लगा कि हर चरण के बाद 12-15 पोलिंग बूथ ऐसे थे जहाँ मतदान के बाद लालू जी और नीतीश जी के कार्यकर्ताओं के बीच झगड़े हुए, कहीं हाथापाई हुई, धमकियाँ हुई; मतदान पूरा होने के बाद अगर ये तुरंत लड़ना शुरू कर देते हैं तो आगे क्या होगा, आप समझ सकते हैं।

पिछले दो महीनों से चुनाव अभियान चल रहा है लेकिन क्या आपने लालू जी, नीतीश जी और राहुल जी को एक साथ मंच पर देखा, पत्रकार परिषद् में देखा, कार्यकर्ता की मीटिंग में देखा? आप उनसे सवाल पूछिये, उनके दरबारी तो पूछेंगे नहीं। जो तीन लोग चुनावी अभियान में एकसाथ नहीं आए, वो बाद में क्या साथ आएंगे और साथ में चलेंगे। जिन्हें ख़ुद पर विश्वास नहीं है, वो आपका भला नहीं कर सकते।

मुझे अपने विश्वस्त सूत्रों से पता चला, उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता ने उनसे पूछा कि क्या हमारा मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है, क्या आपका बेटा नहीं बन सकता है, लालू जी के मुंह में पानी आ गया, उनको ख़ुशी होने लगी कि हाँ, संभावना दिखती है; दूसरे ने पूछा कि अगर चुनाव हार जाते हैं तो विपक्ष का नेता कौन बनेगा; इस पर लालू जी ने जवाब दिया कि मैंने तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने पर समर्थन देने का वाद किया है न कि विपक्ष के नेता बनने का वादा। लालू जी ने कहा कि चुनाव हारने पर तो विपक्ष का नेता हमारा बेटा बनेगा। मैं सार्वजनिक रूप से मैं लालू जी से पूछना चाहता हूँ कि आप बिहार की जनता को बताओ कि विपक्ष का नेता कौन होगा, लालू जी का बेटा होगा या नीतीश बाबू होंगे, क्योंकि आपका चुनाव हारना तय है। ये मेरी मांग है आपसे।

मैं आपको एक पुरानी घटना याद कराना चाहता हूँ। जब मुंबई में बम धमाके हुए तो हमारे देश में आतंकी दुनिया के लिए एक शब्द चल पड़ा था - दरभंगा मॉड्युल, और कारण ये थे कि कुछ लोग यहाँ बैठ कर हिन्दुस्तान में आतंकवाद फ़ैलाने का षड़यंत्र रच रहे हैं। यहाँ पर एक जाबांज पुलिस अधिकारी महिला थी, दलित कन्या थी, उसने हिन्दुस्तान के निर्दोष नागरिकों की रक्षा के लिए आतंकवादी गतिविधि करने वाले लोगों की कार ढूंढने की कोशिश की। इस महास्वार्थबंधन के निकट के नेता के घर तक आतंकवाद के तार जाने लगे थे, तब सरकार में बैठे लोगों ने आतंकवाद से जुड़े नेताओं पर कदम नहीं उठाया लेकिन उस पुलिस अफसर को यहाँ से जाने और बिहार छोड़ने के लिए मज़बूर कर दिया। आप देश की रक्षा के साथ समझौता करने वाले और आतंकवादियों पर कृपा करने वाले लोगों को पटना में सरकार में बिठाएंगे क्या?

बिहार का भाग्य बदलने के लिए भाजपा, एनडीए का आप समर्थन करें, इसके लिए मैं आपके पास वोट मांगने आया हूँ। भाईयों-बहनों, मेरे पास एक जानकारी है, सही है या गलत पता नहीं क्योंकि समय के अभाव के कारण मैं वेरीफाई नहीं कर पाया, 1990 में लालू जी की सरकार ने बिहार के लोक सेवा आयोग से मैथिलि भाषा को निकाल दिया था, लालू जी ने मैथिलि भाषा का अपमान किया लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली में एनडीए की सरकार बनने के तुरंत बाद 2002 में संविधान की 8वीं सूची में इसे स्थान दिया गया। हम अपमानित करना नहीं बल्कि सम्मानित करना जानते हैं।  

हमने 1 लाख 25 हज़ार करोड़ का पैकेज और 40 हज़ार करोड़ पुराना वाला जो कागज़ पर पड़ा था जिसकी न कोई फाइल थी, न बजट था लेकिन बिहार के प्रति मेरा यह प्यार है, बिहार के लिए हमें कुछ करना है, हमने निर्णय लिया इसे देने का। हमने सब मिलाकर 1 लाख 65 हज़ार करोड़ का पैकेज दिया जो बिहार का भाग्य बदलने और यहाँ के लोगों का जीवन बदलने की ताकत रखता है। विकास के बिना बिहार की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। बिहार एक ज़माने में हिन्दुस्तान का सिरमौर हुआ करता था लेकिन 25 साल में जंगलराज और जंतर-मंतर ने बिहार को बर्बाद कर दिया। इन दोनों की जुगलबंदी वो भी बर्बाद कर देगी जो कुछ बिहार में अब बचा हुआ है।

कोई स्कूटर अगर छोटे से गड्ढ़े में फंस जाए तो 3-4 लोग निकालें तो निकल जाता है लेकिन अगर स्कूटर कुएं में गिरा हो तो उसको निकालने के लिए ट्रेक्टर की ज़रुरत होती है। 25 साल की इनकी सरकार ने बिहार को ऐसे गड्ढ़े में डाल दिया है जिसे निकालने के लिए दो-दो इंजन की जरुरत है। पटना और दिल्ली के दो इंजन लगेंगे तब यह बिहार गड्ढ़े में से बाहर आएगा। एक इंजन बिहार में जो नई सरकार बनेगी वो और दूसरा इंजन दिल्ली में मेरी सरकार जो आपने बनाई है।

भाईयों-बहनों, हम चुनाव के मैदान में विकास के मुद्दे को लेकर आए थे। लालू जी और नीतीश जी के पास विकास का ‘व’ बोलने की कोई जगह नहीं है और इसलिए उन्होंने चुनाव को जातिवाद के रंग में रंगने का नाटक किया। आरक्षण को लेकर महीने भर चीखते-चिल्लाते रहे, दिल्ली में उनके दरबारी भी इसी बात को बढ़ाते रहे। इन्होंने एक काल्पनिक भय पैदा किया और आरक्षण के नाम पर हौवा खड़ा किया। उनकी हर बात में बस आरक्षण था। जब एक दिन मुझे लगा कि इनका गुब्बारा बहुत बड़ा हो गया है तो मैंने एक छोटी सी सुई लगा दी और उनका पूरा गुब्बारा नीचे आ गया। उनकी सारी पोल खुल गई है।

यही लालू जी और नीतीश जी ने आरक्षण पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। उन्हें चिंता अपनी कुर्सी की थी और जब मैंने उनका वीडियो निकाल दिया तो पिछले एक हफ़्ते से आरक्षण का नाम लेना भूल गए। बिजली की तो वो कोई बात ही नहीं करते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर बोल दिया तो लोग उनसे हिसाब मांगेंगे क्योंकि 2010 में नीतीश जी ने कहा था कि अगर घर-घर बिजली नहीं पहुंचाऊंगा तो 2015 में अगले चुनाव में वोट मांगने नहीं आऊंगा। बिजली नहीं तो वोट नहीं, ऐसे उन्होंने कहा था कि नहीं? उन्होंने अपना वादा तोड़ा है, आपसे धोखा किया है। जो जनता से धोखा कर सकते हैं, जनता उन्हें कभी स्वीकार नहीं करती।

बिहार की जनता जब देती है तो छप्पर फाड़ कर देती है; कांग्रेस को 35 साल तक दिया और जब लेती है तो चुन-चुन कर साफ़ कर देती है। जब लालू जी को दिया तो जी भर दिया लेकिन जब लालू जी पर गुस्सा आया तो फ़िर किसी को बचने नहीं दिया। अब बारी आई अहंकार की, बिहार अहंकार को बर्दाश्त नहीं कर सकता और अब अहंकार की विदाई की बारी है। नीतीश बाबू ने कहा था कि अगर किसी का भ्रष्टाचार पकड़ा गया तो उसकी मिल्कियत जब्त कर ली जाएगी और उसके घर में स्कूल खोला जाएगा। नीतीश जी रोज इस बात का ढोल पीटते थे। लोगों को क्यों मूर्ख बना रहे हैं? जेडीयू के मंत्री कैमरा के सामने घूस लेते पकड़े गए। ये अभी से ऐसा काम कर रहे हैं तो चुनाव के बाद क्या करेंगे। बिहार बेचने का एडवांस लिया जा रहा है। अब नीतीश बाबू बताएं कि उनका घर कब्ज़े में किया क्या, उनके घर में स्कूल खोला?

भाईयों-बहनों, बिहार में आप लोगों के लिए मेरा तीन सूत्रीय कार्यक्रम है – पढ़ाई, कमाई और दवाई। बिहार के गरीब से गरीब बच्चे को अच्छी एवं सस्ती शिक्षा मिलनी चाहिए। हर मां अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती है, लेकिन बिहार में पढ़ाई की इतनी हालत खराब है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए माँ-बाप को अपनी ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है। ये हमें शोभा देता है क्या? इसलिए मेरा संकल्प है, बिहार के बच्चों को सस्ती एवं अच्छी पढ़ाई। मेरा दूसरा सपना है, कमाई; नौजवान के लिए रोजगार। बिहार में नौजवान को अपना राज्य और अपने माँ-बाप को छोड़ना पड़ता है। बिहार के नौजवान को यहीं पर रोजगार का अवसर मिलना चाहिए और ये पलायन बंद होना चाहिए। इसलिए मेरा दूसरा संकल्प है, बिहार के नौजवानों के लिए कमाई। मेरा तीसरा सपना है, दवाई; बुजुर्गों के लिए सस्ती दवाई, दवाखाना और डॉक्टर होना चाहिए।

बिहार राज्य के लिए तीन कार्यक्रम है - बिजली, पानी एवं सड़क। बिजली आएगी तो कारखाने लगेंगे, और इससे रोजगार मिलेगा। बिजली के लिए अकेले दरभंगा को मैंने पौने 400 करोड़ आवंटित कर दिये हैं। बिहार को जो सौभाग्य मिला है, वो किसी और राज्य को नहीं मिला है; बिहार की दो ताक़त है - बिहार का पानी और बिहार की जवानी। ये दोनों पूरे हिन्दुस्तान का भाग्य बदल सकती हैं। किसान को अगर पानी मिल जाए तो वो मिट्टी में से सोना पैदा कर सकता है। हमारा दूसरा संकल्प है - खेतों में पानी, उद्योगों को पानी और पीने का पानी पहुँचाना। तीसरा मेरा संकल्प है – सड़क; बिहार में सडकों का जाल हो। गाँव ज़िले से, ज़िला राज्य से, राज्य दिल्ली से जुड़ जाए, ऐसा नेटवर्क बनाना है ताकि बिहार का सीधा मार्ग विकास की ओर चल पड़े, इन कामों को लेकर मैं आगे बढ़ना चाहता हूँ।

विकास ही एक मंत्र है, विकास के लिए मैं आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ। मैं आपसे वोट विकास के लिए मांगता हूँ। पहले चरण से लेकर चौथे चरण तक लगातार मतदान करने वालों की संख्या बढ़ी है और अब पांचवे चरण में आप सारे रिकॉर्ड तोड़ दोगे न? आप सब दस-दस परिवारों से वोट कराओ, भाजपा, एनडीए को वोट कराओ।  मेरे साथ बोलिये –

भारत माता की जय! भारत माता की जय! भारत माता की जय!        

बहुत-बहुत धन्यवाद!

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প্রাক্তন রাষ্ট্রপতি শ্রী রামনাথ কোবিন্দের আত্মজীবনী প্রকাশকালে প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ
August 12, 2026
Today, we have the opportunity to release the autobiography of Shri Ram Nath Kovind ji; I am happy to be a part of this program: PM
His journey reflects a life dedicated to public service and the progress of our nation:PM
My prolonged acquaintance with Kovind Ji and his special affection and warmth towards me have been my greatest assets: PM
Mahatma Gandhi, Babasaheb Ambedkar, Jyotiba Phule, and Savitribai Phule dreamed of a new India where the poorest and the most disadvantaged could reach the top: PM
Individuals like Kovind Ji have transformed their own lives and also played a pivotal role in bringing their dream and vision for India to fruition: PM
Even after retiring as President; he is working on 'One Nation, One Election'; Its resolution can start a new chapter in Democracy: PM

আমাদের প্রাক্তন রাষ্ট্রপতি শ্রী রামনাথ কোবিন্দ, লোকসভার অধ্যক্ষ শ্রদ্ধেয় ওম বিরলা এবং শ্রীমতী সবিতা কোবিন্দ সহ সদনের সকল প্রবীণ সদস্য উপস্থিত আছেন। আমি তাঁদের সকলের নাম উল্লেখ করতে পারব না, কিন্তু এই অনুষ্ঠানটি একটি পারিবারিক অনুষ্ঠানের মতো মনে হচ্ছে এতে আমি অত্যন্ত আনন্দিত ।

ভাই ও বোনেরা,

আমরা আজ শ্রী রামনাথ কোবিন্দের আত্মজীবনী প্রকাশ করার সুযোগ পেয়েছি। এই অনুষ্ঠানের অংশ হতে পেরে আমি আনন্দিত। আমি শ্রী কোবিন্দকে দীর্ঘকাল ধরে চিনি এবং তাঁকে ঘনিষ্ঠভাবে জানার সুযোগ আমার হয়েছে। রাষ্ট্রপতি হিসেবে তাঁর নির্দেশনা, সেইসঙ্গে আমার প্রতি তাঁর বিশেষ স্নেহ ও অন্তরঙ্গতা আমার জন্য এক বিরাট সম্পদস্বরূপ। তাঁর জীবন ও কৃতিত্ব সম্পর্কে আমি যা বুঝেছি, তার ভিত্তিতে আমি আত্মবিশ্বাসের সঙ্গে বলতে পারি যে শ্রী রামনাথ কোবিন্দের আত্মজীবনী ভারতীয় গণতন্ত্র এবং ভারতীয় সমাজের জন্য একটি অমূল্য সম্পদ হয়ে উঠবে। কোবিন্দজীর জীবনযাত্রা, সমাজ ও দেশের প্রতি তাঁর অবদান নিয়ে আমি বিশদভাবে অনেক কিছুই বলতে পারতাম, কিন্তু বই প্রকাশ অনুষ্ঠানে শুধু একটি সূচনা পর্ব থাকা উচিত। আপনারা সবাই বইটি সম্পূর্ণ পড়লে সবচেয়ে ভালো হয়।
বন্ধুগণ,

আপনাদের কোবিন্দজীর জীবনযাত্রা তাঁর নিজের মুখেই জানা উচিত, দেশের নতুন প্রজন্ম তাঁর লেখা ও অভিজ্ঞতাগুলো পড়ুক। এ থেকে সবাই অনেক কিছু শিখবে। এই আত্মজীবনীর জন্য আমি রামনাথ কোবিন্দজীকে অভিনন্দন জানাই।

বন্ধুগণ,

কোবিন্দজী তাঁর বইটির যথার্থ নামকরণ করেছেন - "ভারতীয় গণতন্ত্রের বিজয়: আমার জীবন, আমার সংগ্রাম।" মূল কথা হলো, তাঁর জীবন এবং জীবনের সংগ্রামগুলো ব্যক্তিগত, কিন্তু সেই সংগ্রামের ফলস্বরূপ অর্জিত বিজয়টি ভারতের গণতন্ত্রের।

বন্ধুগণ,

আমরা সবাই প্রায়শই মানুষের একটি স্বভাবের সম্মুখীন হই। মানুষ তাদের সাফল্যের কৃতিত্ব নিজেদের দেয় এবং জীবনের অসুবিধা ও কষ্টের জন্য সমাজকে দোষারোপ করে। তবে, যখন কারও উদার হৃদয় এবং ভারতীয় মূল্যবোধ থাকে, তখন তিনি সমাজের দোষ খুঁজে সময় নষ্ট করেন না। তাঁরা এর ইতিবাচক দিকগুলোর উপর মনোযোগ দেন এবং সমাজকে নিজেদের সাফল্যের সমান অংশীদার হিসেবে বিবেচনা করেন। কোবিন্দজীর আত্মজীবনী এবং এর শিরোনাম এর উদাহরণ। তাঁর জীবনের কথা ভাবুন। তিনি কানপুরের এক অতি সাধারণ পরিবারে জন্মগ্রহণ করেন। কীভাবে এক গ্রীষ্মের দিনে তাঁদের বাড়িতে আগুন লেগেছিল সেইকথা কোবিন্দজী তাঁর বইয়ে লিখেছেন। তাঁর মা নিজের দুশ্চিন্তা ভুলে গিয়ে বাড়ির জিনিসপত্র বাঁচানোর চেষ্টা করছিলেন। কারণ, একটি সাধারণ পরিবারে, প্রতিটি জিনিসই একজন মায়ের কাছে তাঁর সন্তানদের বড় করার একটি মাধ্যম। সেই চেষ্টা করার সময় তাঁর মা আগুনে পুড়ে মারা যান। আপনি কল্পনা করতে পারেন, এত অল্প বয়সে এভাবে মাকে হারানোর মতো একটি ঘটনা কতটা বেদনাদায়ক ছিল। আমি ভাগ্যবান যে আমার মা ১০০ বছরেরও বেশি বেঁচে ছিলেন এবং আমাকে আশীর্বাদ করে গেছেন। তা সত্ত্বেও, আমি এখনও তাঁর অভাববোধ করি।

বন্ধুগণ,

এটি তাঁর জীবনের এক বেদনাদায়ক ঘটনা ছিল। এমন ঘটনায় যে কেউই ভেঙে পড়তে পারত। কিন্তু কোবিন্দজি সেই প্রতিকূলতার ফলে আরও শক্তিশালী হয়েছিলেন। পাড়ার এক মহিলা তাঁকে বড় হতে সাহায্য করেছিলেন। এটি তাঁকে সামাজিক ঐক্য ও সম্প্রীতির শক্তি বুঝতে সাহায্য করেছিল। এই ঘটনার পর কোবিন্দজির জীবনে তাঁর বাবার ভূমিকা আরও বেড়ে যায়। যেভাবে কোবিন্দজির বাবা তাঁর পরিবার পরিচালনা করতেন ও সন্তানদের মধ্যে মূল্যবোধ জাগিয়ে তুলতেন, তার জন্য কোবিন্দজি তাঁর বাবাকে তাঁর নায়ক বলে মনে করেন।

বন্ধুগণ,

শৈশবের এই সংগ্রামের মধ্যেও কোবিন্দজি তাঁর সম্ভাবনাকে বিকশিত করার পথ হিসেবে শিক্ষাকে বেছে নিয়েছিলেন। তিনি সম্পদের অভাবকে দুর্বলতা হতে দেননি তিনি কঠোর পরিশ্রম করেছিলেন । তিনি এমন এক অবস্থানে পৌঁছেছিলেন যা তৎকালীন মানুষ কল্পনাও করতে পারত না। তিনি ভারতের মতো বিশাল এক দেশের রাষ্ট্রপতি হয়েছিলেন।

বন্ধুগণ,

এত উচ্চ পদে পৌঁছানোর পরেও কোবিন্দজির নম্র ব্যক্তিত্ব এবং সরলতা অক্ষুণ্ণ ছিল। আমার মনে আছে, প্রধানমন্ত্রী হিসেবে আমি রাষ্ট্রপতি ভবনে তাঁর সঙ্গে দেখা করতে যেতাম। তিনি এমন সব বিষয় নিয়ে কথা বলতেন যা প্রটোকল অনুযায়ী আলোচনা করার অনুমতি ছিল না। প্রধানমন্ত্রীকে বিদায় জানাতে তিনি গাড়ির দরজা পর্যন্ত চলে আসতেন। প্রথমদিকে আমি তাঁর কাছে মিনতি করতাম, "দয়া করে এমনটা করবেন না," কিন্তু তিনি তাঁর সেই বিনয় ত্যাগ করেননি। রাষ্ট্রপতি হওয়ার পর, যখন তিনি তাঁর গ্রাম পারৌঙ্খ-এ গিয়েছিলেন, তখন তিনি তাঁর গুরুদের চরণে হাত দিয়ে প্রণাম করেছিলেন এবং তাঁদের প্রতি শ্রদ্ধা নিবেদন করেছিলেন। তিনি গ্রামের মাটিতে মাথা নত করে সাধারণ গ্রামবাসীদের ধন্যবাদ জানিয়েছিলেন। সমগ্র দেশ সেই আবেগঘন দৃশ্যের সাক্ষী হয়েছিল। তাঁর আচরণ বিশ্বের সামনে ভারতীয় মূল্যবোধের এমন এক চিত্র তুলে ধরেছিল, যা নিয়ে প্রত্যেক ভারতীয় গর্বিত।

বন্ধুগণ,

শত শত বছরের পরাধীনতায় আমাদের দেশ অর্থনৈতিক ও সামাজিকভাবে অনেক কিছু হারিয়েছিল। আমাদের পূর্বপুরুষেরা শতাব্দীর পর শতাব্দী ধরে সংগ্রাম করেছেন। মহাত্মা গান্ধী, বাবা সাহেব আম্বেদকর, জ্যোতিবা ফুলে, সাবিত্রীবাঈ ফুলে এবং আরও অগণিত মহান ব্যক্তিত্ব ভারতকে পুনর্গঠনের স্বপ্ন দেখেছিলেন। এমন এক ভারত, যেখানে দরিদ্রতম ও সবচেয়ে বঞ্চিতদেরও সাফল্যের শিখরে পৌঁছানোর সুযোগ থাকবে। কোবিন্দজীর মতো ব্যক্তিত্বরা কেবল তাঁদের কঠোর পরিশ্রম ও যোগ্যতার দ্বারা নিজেদের জীবনকেই বদলে দেননি, তাঁরা শত শত বছরের সেই স্বপ্ন, সেই দূরদৃষ্টিকে বাস্তবায়িত করতেও এক গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করেছেন। এই লক্ষ্যে আমাদের প্রচেষ্টা এখনও চলছে। ভবিষ্যতে আমাদের কোবিন্দজীর মতো এমন অনেক তরুণ প্রয়োজন, যাঁরা প্রতিকূলতার কাছে পরাজিত হন না, যাঁরা কঠিন পরিস্থিতিতে হতাশ হন না, বরং যাঁদের কঠোর পরিশ্রমের মাধ্যমে প্রতিটি লক্ষ্যকে সম্ভব করে তোলার সাহস রয়েছে। এই পরিবর্তনই একটি শক্তিশালী ভারত গড়ার সংকল্পকে পূর্ণতা দেবে। এখান থেকেই একটি আত্মনির্ভরশীল ও উন্নত ভারতের পথ প্রশস্ত হবে।

বন্ধুগণ,

এই ধরনের একটি যুবশক্তি গড়ে তোলার জন্য কোবিন্দজীর আত্মজীবনী এক গুরুত্বপূর্ণ অনুপ্রেরণার উৎস হতে পারে।

বন্ধুগণ,

কোবিন্দজী তাঁর আত্মজীবনীতে মোরারজি দেশাইয়ের সঙ্গে তাঁর অভিজ্ঞতাগুলিও বিস্তারিতভাবে বর্ণনা করেছেন। কোবিন্দজীর মধ্যে যে দেশপ্রেমের চেতনা ছিল, মোরারজির সঙ্গে কাজ করে তিনি যে শিক্ষা লাভ করেছিলেন এবং যে পথ তিনি খুঁজে পেয়েছিলেন। কোবিন্দজী রাজনীতি এবং সমাজসেবাকে তাঁর পথ হিসেবে বেছে নিয়েছিলেন। তিনি তাঁর কর্তব্যের প্রতি নিবেদিতপ্রাণ ছিলেন। সেবাকে লক্ষ্য করে তিনি কাজ করেছেন। সংসদে তাঁর কার্যকালই এর সাক্ষ্য বহন করে। রাজ্যপাল হিসেবে তিনি একটি দৃষ্টান্ত স্থাপন করেছিলেন। রাষ্ট্রপতি হিসেবেও আমরা তাঁর এই একই নিষ্ঠা দেখেছি। রাষ্ট্রপতির সর্বোচ্চ পদ থেকে অবসর নেওয়ার পরেও তিনি বিশ্রাম নেননি। তিনি এখনও 'এক দেশ, এক নির্বাচন'-এর মতো গুরুত্বপূর্ণ বিষয় নিয়ে কাজ করছেন। তিনি দেশকে জাগ্রত করে তুলছেন। এটি এমন একটি বিষয় যার সমাধান দেশের গণতন্ত্রে একটি নতুন অধ্যায়ের সূচনা করতে পারে। আমি বিশ্বাস করি যে দেশের মানুষ কোবিন্দজীর নিষ্ঠা এবং সেবার মনোভাব থেকে অনেক কিছু শিখতে পারবে।

বন্ধুগণ,

সামাজিক জীবনে সক্রিয় থাকার কারণে আত্মজীবনী লেখার জন্য সময় বের করা খুব কঠিন। কোবিন্দ জি আমাদের সকলের জন্য এই কাজটি করেছেন। তাঁর জীবনে এমন অনেক কিছু আছে, যার মধ্যে দরিদ্র ও বঞ্চিত পরিবারের অনেক মানুষ তাদের নিজেদের জীবনের প্রতিচ্ছবি দেখতে পান। কীভাবে একটি সাধারণ পরিবার কঠিন পরিস্থিতিতেও জীবনের পবিত্রতা ও সততার সঙ্গে আপোস করে না, কীভাবে সেই আদর্শগুলো পরবর্তীকালে আমাদের জীবনের ভিত্তি হয়ে ওঠে, কীভাবে আমাদের কঠিন সময়ের মূল্যবোধগুলো সারা জীবন আমাদের আলোকিত করে, কীভাবে এই পবিত্রতা আমাদের দেশসেবার শক্তি জোগায়। বিভিন্ন পদে থেকেও কোবিন্দ জি এই বিষয়গুলো দিয়ে সমাজকে ক্রমাগত অনুপ্রাণিত করেছেন।

বন্ধুগণ,

আমি নিশ্চিত যে কোবিন্দ জি-র আত্মজীবনী শুধু তাঁর জীবনেরই নয়, আমাদের গণতন্ত্রেরও গুরুত্বপূর্ণ স্মৃতি সংরক্ষণ করবে। আমি তাঁর আত্মজীবনীর জন্য আবারও শুভকামনা জানাই। আমি বিশেষ করে তরুণ প্রজন্মকে অনুরোধ করছি, এটি রিলের যুগ, এবং সোশ্যাল মিডিয়ার ইনফ্লুয়েন্সাররা আপনাদের বিভিন্ন গন্তব্যে প্রলুব্ধ করতে পারে। এই শর্টকাটের যুগেও আমাদের একটি কথা মনে রাখতে হবে যে রেলস্টেশনগুলোতে একটি সাইনবোর্ডে লেখা থাকে, "কিছু মানুষের সেতু ব্যবহার না করে রেললাইনে ঝাঁপ দেওয়ার অভ্যাস আছে।" এর মানে হলো, "শর্টকাট আপনাকে বিপদে ফেলবে।" আর যদি শর্টকাট নিতেই হয়, আমি তরুণদের তাদের পছন্দের আত্মজীবনী পড়তে উৎসাহিত করব। আত্মজীবনীগুলো সেই সময়ের ঐতিহাসিক ঘটনাগুলোর উপর একটি অনন্য দৃষ্টিকোণ তুলে ধরে। জীবনীর যুগ ইতিহাসের খুব কাছাকাছি অবস্থান করে। আমি অবশ্যই আশা করি যে কোবিন্দজীর প্রচেষ্টা ভবিষ্যৎ প্রজন্ম, বিশেষ করে তরুণ প্রজন্মের উপকারে আসবে। আমার শুভকামনা রইল। আপনাকে অনেক ধন্যবাদ।