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PM Modi speaks at 87th ICAR Foundation Day Celebrations in Patna
The country now needs a second Green Revolution which must come from eastern India: PM
Scientific innovations in agriculture sector should move from lab to land for benefit of farmers: PM
India must aim to become totally self-sufficient in the agriculture sector, says PM Modi

उपस्थित सभी महानुभाव

सभी महानुभाव, आज जिनका मुझे सम्‍मान करने का अवसर मिला है। जिन्‍होंने अपने-अपने क्षेत्रों के द्वारा देश के कृषि जगत को कुछ न कुछ मात्रा में सकारात्‍मक योगदान किया है। ऐसे पुरस्‍कार प्राप्‍त करने वाले सभी महानुभावों को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। बहुत-बहुत बधाई देता हूं।



ये समारोह हर वर्ष होता है और बड़े लंबे अरसे से होता है लेकिन दिल्‍ली में ही होता है। तो पिछली बार जब मैं गया था पहली बार तो मैंने कहा था भई हम जरा दिल्‍ली से बाहर निकलें और उसका आरंभ आज बिहार में पटना की धरती से हो रहा है। मैं राज्‍य सरकार का भी आभार व्‍यक्‍त करता हूं कि उन्‍होंने इस समारोह को सफल बनाने में योगदान दिया और मैं विभाग के मित्रों का भी आभारी हूं कि उन्‍होंने एक पहल की है। तो उसके कारण उस राज्‍य के अंदर भी कुछ दिन चर्चा चलती है, अनेक लोगों के सामने नई-नई बातें आती है। देशभर से ये कृषि वैज्ञानिक यहां आते है उनको भी स्‍थानीय लोगों से बातचीत करने के कारण अपने विषय में क्‍या-क्‍या नया चल रहा है, उसकी जानकारियां मिलती है। तो एक प्रकार से ये अलग-अलग स्‍थान पर जाने से हमें स्‍वाभाविक रूप से हमें अतिरिक्‍त लाभ होता है और उसका प्रारंभ आज यहां से हुआ है और मुझे ये भी खुशी है कि ये बिहार से प्रारंभ हो रहा है। क्‍योंकि पूसा का जन्‍म इसी धरती पर हुआ और एक विदेशी व्‍यक्ति ने गुलामी के कालखंड में भारत के कृषि सामर्थ्‍य को भांपा होगा, उसको अंदाज आया होगा और Phillip USA के द्वारा बनी हुई ये कामगिरी पूसा के नाम से प्रचलित हो गई। लेकिन उन्होंने बिहार क्‍यों चुना होगा, कोई अचानक तो हुआ नहीं होगा। जब वो सोचा गया होगा तब उनको ध्‍यान आया होगा ये सबसे ऊर्वरा जगह होगी, यहां के लोग प्रयोगशील होगें, प्रगतिशील होगें, कृषि क्षेत्र में नया करने की सोच रखते होगें। हिन्‍दुस्‍तान के अन्‍य भू-भागों से यहां की कृषि की कोई न कोई extra शक्ति होगी तभी जा करके उन्‍होंने उस काम को यहां प्रारंभ करना सोचा होगा, ऐसा मैं अनुमान करता हूं। अब करीब-करीब 100 साल होने जा रहे है। इसलिए मैं पूरे record न देखूं तब तक तो मैं कह नहीं सकता कि वो क्‍या है लेकिन मैं अनुमान करता हूं। इसका मतलब ये हुआ कि ये भू-भाग और यहां के नागरिक दोनों में कृषि क्षेत्र में नई सिद्धियां प्राप्‍त कराने का सामर्थ्‍य पड़ा हुआ है।

हम कभी-कभी अपनी चीजों को भूल जाते है। चीजें कोई अचानक शुरू नहीं होती होगी किसी-न-किसी कारण विशेष कारण से शुरू हुई होगी। उसके मूल में अगर जाते है तो ध्‍यान आता है और मैं राधामोहन सिंह जी को इस बात के लिए बधाई देता हूं कि आपदा ग्रस्‍त कारणों के साथ कारण पूछा यहां से दिल्‍ली चला गया। अब दिल्ली में तो खेती होती नहीं है लेकिन पूसा वहां है और जहां खेती होती थी जो देश का पेट भरता था वहां से पूसा चला गया। तो हमने वापिस लाने की कोशिश की है और मुझे विश्‍वास है कि भले 90 साल पहले किसी को विचार आया होगा उसमें जरूर कोई न कोई दम होगा, कोई ताकत होगी। मुझे फिर से एक बार उसको तलाशना है, देखना है और देश के वैज्ञानिक मेरी इस बात से सहमत होगें कि हम इन नए क्षेत्रों में पदार्पण कैसे करें। कुछ बातें आप लोगों ने आज अच्‍छी शुरूआत कर रहे है। मैं नहीं जानता हूं कि हमारे वैज्ञानिक मित्रों को कितना पसंद आया होगा या कितनी सुविधा होगी। क्‍योंकि वैज्ञानिक अपने काम में इतना खोया हुआ होता है। करीब जिदंगी का महत्‍वपूर्ण समय उसका lab में ही चला जाता है। न वो अपने परिवार को काम आता है, न वो खुद को काम आता है। वो उसमें डूब जाता है, पागल की तरह लगा रहता है और तभी जा करके आने वाली पीढि़यों का भला होता है। एक जब अपने सपनों को खपा देता है तब औरों के सपने बन पाते हैं और इसलिए वैज्ञानिकों का जितना मान-सम्‍मान होना चाहिए, वैज्ञानिकों के योगदान की जितनी सराहना होनी चाहिए, उसको जितना बल मिलेगा, उतनी भावी पीढि़यों का कल्‍याण होगा।

दुर्भाग्‍य से हमारे देश में, हमारी अपनी कठिनाइयां हैं देश की, गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ना है और इसलिए इन क्षेत्रों में जितना बजट देना चाहिए उतना दे नहीं पाते हैं। उसके बावजूद भी छोटी-छोटी lab में बैठ करके भी हमारे scientist लगातार काम करते रहते हैं और कोई न कोई नई चीजें देते रहते हैं।

लेकिन एक और कदम की ओर जाने का मैंने पिछली बार बात कही थी आपने उसको योजना के रूप में रखा, Lab To Land. laboratory में कितना ही yield आए, laboratory में चीकू नारियल जैसा बन जाए, लेकिन अगर धरती पर नहीं होता है तो वो काम नहीं आता है। इसलिए हमारी सच्‍ची कसौटी ये है कि ये जो हम सफलता पाई है lab में, उसको हमें धरती पर भी कसना चाहिए और किसानों के द्वारा कसना चाहिए। एक प्रकार से एक scientist का fellow traveler हमारा किसान बनना चाहिए। extension of the mind of the scientist should be a farmer. ये हमें व्‍यवस्‍था खड़ी करनी चाहिए और इसलिए इस योजना के तहत देश के जितने agriculture scientist है, उनकी टोली बनाकर के उनको एक-एक block गोद लेने की योजना है। उसकी lab कहीं पर भी होगी, लेकिन उसको लगेगा भई मैं जो research कर रहा हूं, उस इलाके के किसानों में उस प्रकार की रुचि है तो वो वहां उनके साथ जुड़ेगा, progressive farmer के साथ जुड़ेगा, किसानों के साथ जुड़ेगा और उसमें जो ज्ञान की संपदा है वो जमीन पर किसानों के माध्‍यम से।

और किसान का एक स्‍वभाव है, उसको भाषण-भाषण काम नहीं आते। वो तो जब तक अपनी आंख से देखता नहीं है, वो किसी चीज को मानता नहीं है। और एक बार उसने अपनी आंख से देखा तो वो फिर अपना risk लेने के लिए तैयार हो जाता है, वो संकट उठाने के लिए तैयार हो जाता है। और इसलिए आवश्‍यकता होती है कि हमने हमारी हर lab को, हर farm को lab में कैसे convert करना है, हर किसान को scientist के रूप में कैसे convert करना है। और उस यात्रा को मैं जानता हूं, आप जिस साधना को कर रहे हैं, जिस तपस्‍या को कर रहे हैं वहां से बाहर जाना थोड़ा कठिन है, लेकिन जिस दिन आप जाओगे। कोई scientist अच्‍छे से अच्‍छी दवाई की 100-100 खोज करे और परिवार को भी पता नहीं होता है कि इसने कहां काम किया है। उनको लगता है हां यार, रात देर से आते हैं अब खाना खाएंगे, सो जाएंगे। लेकिन जब पता चलता है कि फलां व्‍यक्‍ति जिंदगी से जूझ रहा था और उसकी दवाई काम आ गई, उसकी जिन्‍दगी बच गई और जब पता चलता है इस दवाई से आने वाले दिनों में ऐसे लाखों लोगों की भी जिन्‍दगी बचने वाली है तो वो परिवार भी सीना तान करके, हां हमारे उन लोगों ने किया है, मेरे पति ने किया है, मेरे भाई ने किया है। कब होता है, जब बाहर कोई उसका achievement दिखता है। आपको भी अपने lab में किया हुआ संतोष जब तक खेत में नहीं दिखता और किसान के हाथ में नहीं दिखता है, आपको संतोष नहीं हो सकता है। और वो व्‍यवस्‍था करने की दिशा में हम काम कर रहे हैं।

भारत ने first green revolution किया, उसका फायदा हमें मिला है। लेकिन अब देश second green revolution के लिए ज्‍यादा इंतजार नहीं कर सकता है। वैसे भी late हो चुके हैं। second green revolution के लिए हमें अपने आपको सज्‍ज करना होगा। किस क्षेत्र में जाना है, कैसे जाना है। first green revolution की पहली आवश्‍यकता थी कि देश को अन्‍न बाहर से लाना न पड़े, देश का पेट भरे। second green revolution का इतना मतलब नहीं हो सकता, उसका मकसद कुछ और भी हो सकता है। क्‍यों न हमारे देश के agro-economists, हमारे देश के agro-technicians, हमारे देश के agro-scientist, food security से जुड़े हुए scientist, ये सब मिलकर के workshop करें, हर level पर workshop करें। और design workout करें कि भई हां, second green revolution का model क्‍या है, priorities क्‍या हो, हमें किन चीजों के उत्‍पादन पर जाना चाहिए। उत्‍पादकता बढ़ानी है तो किस चीजों की बढ़नी चाहिए। सारे global परिवेश में, आज विश्‍व में क्‍या-क्‍या चीजों की आवश्‍यकता है और दुनिया के बहुत देश है, जिनको आर्थिक रूप से वो कुछ चीजें करना मुश्‍किल है तो वो कहते हैं कि बाहर से ले आओ भई, यहां नहीं करो। तो ऐसे कितने देश हैं जिनको ढूंढेंगे और हम बाहर से भेजेंगे।हमें एक विस्‍तृत सोच के साथ हमारे second green revolution को इस रूप में तैयार करना चाहिए।

हमारे architecture college बहुत कुछ पढ़ाती है। building के लिए तो काफी कुछ होता है, road कैसे बने उस पर भी होता है। मैं मानता हूं कि कभी इस agro scientists ने, progressive farmers ने, government ने, architecture colleges के साथ बैठकर के उनका भी syllabus बनाने की आवश्‍यकता है कि हमारे agriculture, infrastructure का architecture क्‍या हो? हमारी canal बनती हो तो कैसी आधुनिक canal बने, किस material से बने। road बनाने के लिए तो काफी research होते हैं लेकिन canal बनाने के लिए research बहुत कम होते हैं। ये मुझे पूरा paradigm shift करना है। एक मूलभूत चीजों में बदलाव लाना है और इसलिए हमारे जो architecture colleges है, उनका भी जिम्‍मा बनता है कि agro related हमारे infrastructure कैसे हो।

पुराने जमाने में, घर में हमारे गांव के अंदर, किसान परिवारों में मिट्टी की बड़ी-बड़ी कोठियां तैयार होती थीं और उसमें क्‍या material डालना है उसकी बड़ी विशेषता रहती थी। specific प्रकार का material डाल करके वो कोठी बनाई जाती थी और उस कोठी में अन्‍न भरा जाता था। वो सालों तक खराब नहीं होता था और निकालने की technique भी ऐसी होती थी, वो ऊपर से नहीं निकालते थे, नीचे से निकालते थे ताकि पुराना माल पहले निकलता था, नया माल ऊपर आता जाता था। देखिए सामान्‍य लोगों की बुद्धि कितनी कमाल की रहती थी। ये जो कोठार बनते थे या कोठी बनती थी जिसमें सामान भरा जाता था वो कौन सी चीजों का, उनको ज्ञान था कि जिसके कारण हमारे agro-product को इतने लंबे समय तक संभाल पाते थे। preservation के संबंध में हमारे यहां technically कितना काम हुआ है। हमारे यहां अचार, अचार की जो परंपरा है। उस समय ये technology कहां थी जी। गांव की गरीब महिला भी अचार इस प्रकार से preserve करती थी कि साल भर अचार खराब नहीं होता था। मतलब कि विज्ञान उस घर की गली तक पहुंचा हुआ था। हम बदले हुए युग में, इन चीजों को और अधिक अच्‍छे तरीके से कैसे करें, ताकि हमारे agriculture sector में।



क्योंकि आज wastage एक बहुत बड़ी चिन्‍ता का विषय है। value addition पर हमें जाना पड़ेगा। किसान इतनी मेहनत करे और उसकी पकाई हुई चीजें अगर बर्बाद होती है तो कितना बड़ा नुकसान होता है। मैं agro scientists से आग्रह करता हूं कि आप एक काम करके research कीजिए और मुझे छ महीने में एक report दे सकते हैं क्‍या ? मैं एक दिशा में आगे बढ़ना चाहता हूं।

हमारे किसान फल पैदा करते हैं लेकिन फल की उम्र बहुत कम होती है। बहुत ही कम समय में खराब हो जाते हैं। उसका packaging भी बड़ा महंगा होता है क्‍योंकि एक-एक चीज को संभालना पड़ता है। अगर दब गए तो और खराब हो जाते हैं। वो फल जिसमें से juice निकलता है। ये जितने aerated water बाजार में बिकते हैं। भांति-भांति का taste होता है। मुझे तो नाम भी पूरे याद नहीं है लेकिन कई प्रकार की bottles में लोग पीते रहते हैं। coca-cola और fanta और क्‍या-क्‍या नहीं, thums-up. क्‍या हम natural fruit, उसका 1 percent, 2 percent, 5 percent natural juice उसमें mix कर सकते हैं क्‍या। अगर ने natural fruit का juice उसमें mix होता है इस aerated water में। उसका market बहुत बड़ा है। मैं विश्‍वास से कहता हूं हिन्‍दुस्‍तान में जो किसान फल पैदा करता है उसको कभी wastage की नौबत नहीं आएगी, उसका माल खेत से ही बिक जाएगा और 5 percent अगर उसमें mix हो गया। उसका माल खेत से ही बिक जाएगा और 5% उसमें अगर mix हो मेरे फल पैदा करने वाला किसान कभी दु:खी नहीं होगा। लेकिन ये साइंटिस्‍ट जब तक खोज करके नहीं बताएंगे वो कंपनियों को मनवाना जरा कठिन हो जाता है। क्‍या हम इस प्रकार की research कर सकते है, हम समझा सकते है कि these are the results । आप अगर 5% उसके अंदर natural fruit juice डालते है तो आपके market को कोई तकलीफ नहीं होगी, आपकी चीज के test में कोई तकलीफ नहीं होगी आपकी product और अच्‍छी बनेगी और उसमें आपका nutrition value भी जाएगा, जो ultimately आपके business को benefit करेगा। हम किस प्रकार से नई चीजों को करें उस पर हमें सोचने की आवश्‍यकता है।

हमने जो initiatives लिए है कुछ चीजों पर हम ये मान के चले के दुनिया में, बहुत बड़ी मात्रा में उत्‍पादकता पर बल दिया जाता है। हमें भी जमीन कम होती जा रही है, परिवार विस्‍तृत होते जा रहे हैं, एक-एक परिवार में जमीन के टुकड़े बंटते चले जा रहे हैं। हमें पर एकड़ उत्‍पादकता कैसे बड़े, उस पर बल दिए बिना हमारा किसान सुखी नहीं हो सकता है। हमें वो देना पड़ेगा।

पिछली बार मैंने मेरे मन की बात में कहा था किसानों से कि देश को pulses और oil seeds की बड़ी आवश्‍यकता है। तिलहन और दलहन... देखिए मैं इस देश के किसानों को जितना नमन करूं उतना कम है। उस बात को उन्‍होंने माना और इस बार अभी तक जो खबर आई हैं कि record-break showing दलहन और तिलहन का हमारे किसानों ने दिया है। वरना वो crop change करने को तैयार नहीं था लेकिन उसने माना कि भई देश को जरूरत है चलिए हम बाकि छोड़ देते है इस बार दलहन और तिलहन में चले जाते है और बहुत बड़ी मात्रा में शायद मुझे लगता है डेढ़ गुना हो जाएगा, दो गुना अब ये-ये मैं समझता हूं कि अपने-आप में और भारत को import करना पड़ता है।

हमारे agriculture साइंटिस्‍टों ने और progressive farmers ने और government ने बैठ करके तय करना चाहिए। भारत चूंकि कृषि प्रधान देश है। हम तय करें कि agriculture sector की कितनी चीजें अभी भी हम import करते है और हम तय करें कि फलाने-फलाने वर्ष के बाद हमें agriculture sector में कम से कम कुछ भी import नहीं करना पड़ेगा। हम स्‍वयं आत्‍मनिर्भर बनेंगे, हमारे किसान को इस काम के लिए प्रेरित करना पडेगा। हमें targeted काम करना पड़ेगा जी तब जा करके हमारे किसान को आर्थिक रूप से लाभ होगा। अगर वो नहीं करेगे तो लाभ नहीं होगा। आज भी अगर कृषि प्रधान देश को five star होटलों में कुछ सब्जियां विदेश से मंगवानी पड़ती है। हमारा किसान भी तो तैयार कर सकता है, उसको जरा ज्ञान मिल जाए, पद्धति मिल जाए वो कर सकता है। देश की आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता किसान में है, आवश्‍यकता है कि ज्ञान का भंडार और किसान का सामर्थ्‍य इसको जोड़ना और उसको जोड़ने की दिशा में हमने प्रयास किया है। कुछ चीजें बड़ी सरल है जिसको हम कर सकते है और करना चाहिए।

कभी-कभार हमारे किसान को जीवन में ज्‍यादातर हमारे यहां कोई उतना irrigation network तो है नहीं ज्‍यादातर हमारा किसान परमात्‍मा की कृपा पर निर्भर है, बारिश हुई तो अच्‍छी बात ,है नहीं हुई तो मुसीबत है। उसकी extra income के जो रास्‍ते है। उसमें पशुपालन हो, poultry farm हो, मतस्‍य उद्योग हो ये थोड़ा बहुत प्रचलित है। लेकिन हमारा एक बात पर ध्‍यान नहीं गया है और वो है शहद पर.. honey bee.. globally बहुत बड़ा market है और कम-से-कम मेहनत वाला काम है और उसमें बिगड़ने का कोई chance नहीं है और उत्‍पादन भी बिकेगा अगर शहद bottle में भर दिया तो 2-5-10 साल तक तो उसको कुछ नहीं होता है। आज देश में, मुझे बताया गया शायद 5 लाख किसान शहद की activity से जुड़े हैं। ये हम target करके 5 करोड़ पर पहुंचा सकते हैं। एक साल, दो साल, तीन साल में। उसकी income कितनी बढ़ेंगी आप कल्‍पना नहीं कर सकते और दुनिया में market है। ऐसा नहीं कि market नहीं है। हमारे किसान को हम इस प्रकार से नई-नई चीजों के साथ कैसे.. और उसके खेत में वैसे ही होने वाला है।

मैं नहीं जानता हूं कि हमारे scientist मित्र मेरी इन बातों को स्‍वीकार करेंगे कि नहीं करेंगे क्‍योंकि मैं न तो ऐसे ही किसानों के साथ बैठते-उठते सुनी हुए बातें मैंने जो भी ज्ञान अर्जित किया है, उसी की बात मैं कर रहा हूं।

हमारे जिस इलाके में elephants, हाथियों के कारण खेती को बड़ा नुकसान होता है जिन-जिन इलाकों में हाथी है। मैंने सुना भी है, पढ़ा भी है और मेरा मानना है कि उसमें सच्‍चाई भी है। ऐसे खेतों में अगर honey bee हो तो honey bee की आवाज़ से हाथी भाग जाता है। वो आता नहीं है। अब मुझे बताइए farmer का protection होगा कि नहीं होगा। अब ये इसको कौन समझाएगा, उससे बात कौन करेगा और कम से कम investment से इतनी बड़ी चीज को बचाता है और international science magazine इस बात को स्‍वीकार कर चुके है कि हाथी उस आवाज़ को सहन नहीं कर सकता है तो वहीं से आते ही चला जाता है पीछे। हमारे कई इलाके ऐसे हैं जहां हाथियों के कारण किसानों को परेशानी हो रही है। हम ऐसे व्‍यवहार्य चीजें और उसके साथ-साथ उसको शहद का व्‍यापार भी मिल जाएगा, उसकी आर्थिक संपदा को भी फायदा होगा।

दूसरा काम है, जो मेरे स्‍वच्‍छ भारत मिशन से भी जुड़ा हुआ है और organic farming से भी जुड़ा हुआ है। अब ये मान के चलिए कि दुनिया में organic चीजों का एक बहुत बड़ा बाजार खुल गया है। holistic health care ये by and large समाज का स्‍वभाव बना है।

अभी हमने देखा योगा दिवस पर दुनिया ने क्‍या इसको महत्‍व दिया है। वो इसी बात का परिचायक है कि holistic health care की तरफ पूरी दुनिया जागरूक हुई, उसमें युवा पीढ़ी ज्‍यादा जागृत है। कुछ लोग तो यहां तक exchange ला रहे हैं कि वो chemical से color किए हुए कपड़े पहनने के बजाए colored cotton से बना हुआ कपड़ा ही पसंद करते हैं और अब तो cotton भी कई colors में आना शुरू हुआ है। natural grow हो रहा है, genetic engineering के कारण। लेकिन organic requirement दुनिया में बहुत बढ़ रही है। हमारा किसान जिस पैदावार से एक रुपया कमाता है अगर वो organic है तो उसका एक डॉलर मिल जाता है। economically बहुत viable हो रहा है। लेकिन, उसके कुछ नियम है, कुछ आवश्‍यकताएं हैं। लेकिन एक काम हम कर सकते हैं क्‍या? आज मान लीजिए देश में vermin-composting . मान लीजिए आज 50 मिलियन टन होता है।

मैं आपको अनुमान कहता हूं। क्‍या vermin-composting हम 500 मिलियन टन कर सकते हैं क्‍या? आज अगर केंचुएं, earth warms . ये मान लीजिए देश में 10 मिलियन टन है। ये 100 मिलियन टन हो सकते हैं क्‍या। आपको कुछ नहीं करना है। सिर्फ लोगों को ज्ञान देना है, बाकी काम तो वो केंचुएं खुद कर लेंगे। और कोई भी छोटे नगर के बगल में ये काम चलता है, तो उस शहर आधा कूड़ा-कचरा वो ही साफ कर देंगे। स्वच्‍छता का काम भी चल जाएगा, composed fertilizer भी तैयार हो जाएगा और जो केंचुए का काम करते हैं उनके केंचुएं भी बिकते हैं। बहुत बड़ी मात्रा में केंचुएं बिकते हैं। एक ऐसा क्षेत्र है कि जो organic farming को बढ़ावा दे सकता है, हमारा कूड़ा-कचरा साफ हो सकता है, हमारे chemical fertilizer की requirement कम होती है, किसान की खेती सस्‍ती हो सकती है। इन चीजों को साथ लेकर के हम सब वैज्ञानिक जगत के लोग। क्‍योंकि ये बात आपके level पर आएगी तो गले उतरेगी और उसको स्‍वीकार करेगा। आप प्रयोग करके कहीं लगाओगे वो करेगा। कुछ लोग कर रहे हैं। स्‍वच्‍छता अभियान का सबसे बड़ा दूत केंचुआ बन सकता है और हमारा बहुत बड़ा काम वो कर सकता है और उससे organic farming को एक बहुत बड़ा बढ़ावा मिल सकता है। हमारी जमीन बर्बाद हो रही है। chemical के कारण उसकी उर्वरा ताकत कम होती रही है, उसकी हमें चिन्‍ता करने की आवश्‍यकता है। ये काम हो सकता है सहज रूप से। ये चीजें प्राकृतिक व्‍यवस्‍थाओं का उपयोग करते हुए की जा सकती हैं। मैं आग्रह करता हूं कि हम हमारे कृषि जीवन में जो second green revolution की ओर जा रहे है। उसको एक नए दायरे पर ले जा सकते है।

कई वर्षों से pulses में yield में भी बढ़ावा नहीं हो पा रहा है और pulses में सबसे बड़ी challenge है कि उसके protein content कैसे बढ़े? क्‍योंकि भारत जैसा देश जहां दलहन से ही protein प्राप्‍त होता है गरीब को, protein content ज्‍यादा हो इस प्रकार का दलहन का निर्माण कैसे हो? ये हमारे scientist lab के अंदर mission के रूप में काम करें। हम उसमें achieve कर सकते है परिणाम मिल सकता है।

हमारे देश का तिरंगा झंडा और उसमें blue colour का चक्र। मैं मानता हूं देश में चर्तुर क्रांति की आवश्‍यकता है। तिरंगें झंडे के तीन रंग जो है और blue colour का चक्र है उन चार रंगों की चर्तुर क्रांति की आवश्‍यकता है।



एक तो saffron revolution, अब saffron revolution का अर्थ पता है भांति-भांति के लोग अलग-अलग करेंगे। ऊर्जा का रंग है saffron और कहने का मेरा तात्‍पर्य है ऊर्जा क्रांति। ऊर्जा क्रांति बहुत आवश्‍यक है। अब आप देखिए बिहार इतना बड़ा प्रदेश। सिर्फ 250-300 मेगावाट बिजली का उत्‍पादन का होता है। अभी मैं भूटान गया, भूटान के अंदर hydropower project का मैंने काम शुरू किया है, उसकी maximum बिजली बिहार को मिलने वाली है...Maximum बिजली।

बिहार को आगे ले जाने के लिए आज मैंने अभी एक पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय ग्राम ज्‍योति योजना का आरंभ किया गांव में 24 घंटे बिजली। हमारे किसानों को भी अगर value addition के लिए जाना है तो उसको इस प्रकार की बिजली की सुविधा सबसे पहले चाहिए तब जा करके वो technology introduce करेगा और इसलिए हम भूटान से नेपाल से ऊर्जा के द्वारा कैसे बिजली बिहार को पहुंचे, बहुत बड़ी मात्रा में बिजली कैसे मिलें उस दिशा में काम में लगे है आज बिहार की अपनी बिजली है उसे तीन गुना का काम मैंने भूटान में जा करके कर दिया है। लेकिन उससे काम होने वाला नहीं है उसकी और जरूरत है।

दूसरा है green revolution जिसकी मैंने चर्चा की, हरा रंग है, तीसरा है white colour, white revolution और white revolution में हम जानते है। हमारा दूध उत्‍पादन, हमारे पशुओं की तुलना में दूध की quantity बहुत कम है। ये हमारी quantity कैसे बढ़े, पशुओं की संख्‍या बढ़ने से काम होना नहीं है। पशु के द्वारा ज्‍यादा दूध उत्‍पादन..... और हमारे पशुपालन को भी आधुनिक बनाना पड़ेगा। हमारे यहां जो sheeps है...भेड़े। मैंने एक छोटा प्रयोग किया था जब गुजरात में था। हमारा जो भेड़ पालने वाला होता है वो जब उसका ऊन निकालता है, उसके बाल निकालता है तो उसके पास एक कैंची होती है । उसके टुकड़े हो जाते है। टुकड़े होने के कारण जो income होती है वो इतनी income होती नहीं है। दाम कम हो जाता है। मैंने क्या किया ऐसे जितने भेड़ वाले थे उनको जो five star hotel में और नीतिश कुमार जी जिस मशीन का उपयोग करते है trimming का। मैंने सभी जो भेड़ पालक है उनको मशीन दिया और battery वाला दिया। तो आज वो क्‍या करता है साल में दो बार उस मशीन से उसके बाल निकालता है। उसकी लंबाई ज्‍यादा होने के कारण उसकी income बढ़ गई। छोटी-छोटी चीजे होती हैं जी, लेकिन सामन्‍य प्रयोगों से भी हम कितना बड़ा बदलाव ला सकते है।

हम हैरान है जी, हमारा देश इतनी सारी हम आज भी मैं नहीं मानता हूं कि हमारे यहां पशुओं के hospital में dentist की व्‍यवस्‍था नहीं होगी पशुओं के लिए। अगर हमारे दांत खराब होते हैं तो पशुओं के होते नहीं है। पशु खाता नहीं है या loose motion कर देता है। कोई पूछने को तैयार नहीं, देखने को तैयार नहीं कि उसका dental problem है। मैं जब गुजरात में था मैंने एक बड़ा अभियान चलाया था पशुओं की dental treatment का। हमारा मोतीबिंदु होता है पशु का मोतिबिंदु होता था मैं पशुओं का मोतिबिंदु का ऑपरेशन करता था बहुत बड़ी मात्रा में। मैंने अमेरिका हमारे कुछ डॉक्‍टरों को भेजा था lager technology सीखने के लिए और पशुओं का bloodless surgery कैसे हो और मैं पशुओं के bloodless surgery में सफलतापूर्वक हमारे यहां लोगों को काम पर लगाया था। हमारे पशुपालन को वैज्ञानिक तरीकों में हमें लाना पड़ेगा। उसकी भी पीड़ा को हमें समझना होगा और मैं मानता हूं, तब जा करके हम white revolution की ओर आगे बढ़ सकते हैं।

और मैंने चौथा कहा वो, blue revolution. आज भी बिहार में इतना पानी है, लेकिन बिहार, आंध्र से 400 करोड़ रुपए की मछली लाकर के खाता है। अगर हम blue revolution करें। गरीब से गरीब किसान, जहां छोटे-मोटे तालाब हैं। अगर हम उसको मत्‍स्‍य उद्योग और उसमें भी कई अब तो विशेषताएं हैं। even ornamental fish का revolution इतना बढ़ आया है। बहुत बड़ा market है, global market है, ornamental fish का। हम अगर इस blue revolution की ओर भी उतना ही ध्‍यान दें और ये सारी चीजें हैं जो ultimately गांव-गरीब किसान का भला करती है और इसलिए हम इन बातों को लेकर के हमारे वैज्ञानिक तौर-तरीकों के साथ ये जो हमारा तिरंगे झंडे का तीनों रंग है और चौथा हमारा blue अशोक चक्र है, उन चतुर्थ क्रान्‍ति की दिशा में कैसे आगे बढ़े और हमारे किसान भाइयों के भलाई के लिए और एक सुरक्षित आर्थिक व्‍यवस्‍था किसानों को मिले, उस दिशा में कैसे काम करे।

मैं फिर एक बार राधामोहन सिंह जी का अभिनन्‍दन करता हूं कि आज पटना में। क्‍योंकि मुझे लगता है जी हिन्‍दुस्‍तान का green revolution, second green revolution को पूर्वी उत्‍तर प्रदेश, बिहार, पश्‍चिम बंगाल, असम से ही आने वाला है। ये मैं साफ देख पा रहा हूं। और यही बिहार की धरती हिन्‍दुस्‍तान में कृषि क्रान्‍ति लाकर रहेगी और जिसका प्रारंभ आज इस कार्यक्रम से हो रहा है।

मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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وارانسی میں پی ایم آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچرمشن کے مبارک آغاز کے موقع پر وزیر اعظم کے خطاب کا بنیادی متن
October 25, 2021
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‘‘آزادی کے بعد کے ہندوستان میں صحت کے بنیادی ڈھانچے کو بہت طویل عرصے تک مطلوبہ توجہ نہیں مل سکی اور شہریوں کو مناسب علاج کے لیے ادھر سے ادھر بھاگنا پڑا، جس کی وجہ سے حالت خراب ہو گئی اور مالی بوجھ پڑا’’
‘’مرکز اور ریاست میں سرکار غریب، پسماندہ، مظلوم، پسماندہ اور متوسط طبقے کے درد کو سمجھتی ہے’’
‘‘وزیر اعظم آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن کے ذریعے ملک کے ہر کونے میں علاج سے لے کر اہم تحقیق تک خدمات کے لیے ایک مکمل ماحولیاتی نظام بنایا جائے گا’’
‘‘وزیر اعظم آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن صحت کے ساتھ ساتھ آتم نربھر بھارت کا ایک ذریعہ بھی ہے’’
‘‘کاشی کا دل وہی ہے، دماغ وہی ہے، لیکن جسم کو بہتر بنانے کی مخلصانہ کوششیں جاری ہیں’’
آج ٹیکنالوجی سے لے کر صحت تک بی ایچ یو میں بے مثال سہولتیں قائم کی جا رہی ہیں۔ ملک بھر سے نوجوان دوست یہاں تعلیم کے لیے آرہے ہیں

ہر-ہر ، مہادیو!

میں شروں کروں اب آپ لوگ اجازت دیں، تو میں بولنا شروع کروں۔ ہرہر مہادیو، بابا وشوناتھ ، ماتا انّا پورنا کی نگری کاشی کی پونیہ بھومی کے سبھی بندھو اور بھگنی لوگن کے پرنام با۔ دیوالی، دیو دیوالی، انّ کوٹ، بھیا دوج، پرکاش اتسو ار آوے والے ڈالا چھٹھ کا آپ سب لوگن کے بہت بہت شبھ کامنا۔ اترپردیش کی گورنر محترمہ آنندی بین پٹیل جی، اترپردیش کے توانائی سے بھرپور وزیر اعلیٰ یوگی آدتیہ ناتھ جی، مرکزی وزیر صحت منسکھ منڈاویا جی، اتر پردیش سرکار کے دیگر وزراء صاحبان ، مرکز کے کے ہمارے ایک اور ساتھی مہندر ناتھ پانڈے جی، ریاست کے ایک اور وزیر انل راجبھر جی، نیل کنٹھ تیواری جی، رویندر جیسوال جی،دیگر وزراء، پارلیمنٹ میں ہماری رفیق محترمہ سیما دویدی جی، بی  پی سروج جی، وارانسی کی میئر محترمہ مردُلا جیسوال جی، دیگر عوامی نمائندگان، ٹیکنالوجی کے توسط سے ملک کے کونے کونے سے جڑے ہیلتھ پروفیشنلز، ضلع اسپتال، میڈیکل ادارے اور یہاں موجود بنارس کے میرے بھائیوں اور بہنوں!

ملک کے کورونا وباء سے اپنی لڑائی میں 100کروڑ ویکسین خوراک کے بڑے پڑاؤ کو پورا کیا ہے۔ بابا وشوناتھ کے آشیرواد سے ، ماں گنگا کے اویرل پرتاپ سے، کاشی کے رہنے والوں کے وسیع اعتماد سے سب کو ویکسین –مفت ویکسین کی مہم کامیابی سے آگے بڑھ رہی ہے۔میں آپ سب لوگوں کا احترام کے ساتھ شکریہ ادا کرتا ہوں۔ آج ہی کچھ دیر پہلے ایک پروگرام میں مجھے اترپردیش کو 9نئے میڈیکل کالج وقف کرنے کی سعادت حاصل ہوئی ہے۔اس سے پوروانچل اور پورے یوپی کے کروڑوں غریبوِں، دلتوں-پسماندہ طبقات-محروم طبقات کو ایسے سماج کےتمام لوگوں کو بہت فائدہ ہوگا، دوسرے شہروں کے بڑے اسپتالوں کے لئے ان کی جو حصے داری ہوتی تھی، وہ کم ہوگی۔

ساتھیوں،

مانس میں ایک سورٹھا ہے-

مُکتی جنم مہی جانی، گیان کھانی اَدھ ہانی کر۔

جہاں بس سمبھو بھوانی، سو کاسی سیئی کسنا۔

یعنی کاشی میں تو شیو اور شکتی باضابطہ طورپر نِواس کرتے ہیں۔ علم کا ذخیرہ کاشی تو مصیبت اور پریشانی دونوں سے آزاد کرتی ہے۔پھر صحت سے جڑی اتنی بڑی یوجنا بیماریوں، پریشانیوں سے آزادی کا اتنا بڑا عہد ، اس کی شروعات کے لئے کاشی سے بہتر جگہ اور کیا ہوسکتی ہے؟ کاشی کے میرے بھائیوں اور بہنوں آج اس اسٹیج پر دو بڑے پروگرام ہورہے ہیں۔ ایک بھارت سرکار کا اور پورے بھارت کے لئے 64ہزارکروڑ روپے سے بھی زیادہ رقم کا یہ پروگرام آج کاشی کی مقدس سرزمین سے لانچ ہورہا ہے اور دوسرا کاشی اور پوروانچل کی ترقی کے ہزاروں کروڑ کے پروگراموں کا افتتاح اور ایک طرح سے میں کہوں کہ پہلے والا پروگرام اور یہاں کا پروگرام سب کو ملا کر آج قریب قریب 75ہزار کروڑ روپے کے کاموں کا یہاں فیصلہ یا وقف ہورہا ہے۔ کاشی سے شروع ہونے جارہی اِس یوجنا میں مہادیو کا آشیرواد بھی ہے اور جہاں مہادیو کا آشیرواد ہے، وہاں تو کلیان ہی کلیان ہے۔ کامیابی ہی کامیابی ہے اور جب مہادیو کا آشیرواد ہوتا ہے تو پریشانیوں سے آزادی بھی فطری ہے۔

ساتھیوں!

آج یوپی سمیت پورے ملک کے صحت بنیادی ڈھانچے کو طاقت دینے کےلئے ، مستقبل میں وباؤں سے بچاؤ کےلئے ہماری تیاری اعلیٰ سطح کی ہو۔ گاؤں اور بلاک سطح تک ہمارے صحت نظام میں خود اعتمادی اور خودکفالت آئے۔اس کے لئے آج کاشی سے مجھے 64ہزار کروڑ روپے کا آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن قوم کو وقف کرنے کی سعادت حاصل ہوئی ہے۔آج کے کاشی کے بنیادی ڈھانچے سے جڑے تقریباً 5ہزار کروڑ روپے کے منصوبوں کا بھی افتتاح کیا گیا ہے۔اس میں سڑکوں سے لے کر گھاٹوں کی خوبصورتی، گنگا جی اور ورونا کی صاف صفائی ، پُلوں ، پارکنگ مقامات ، بی ایچ یو میں متعدد سہولتوں سے جڑے متعدد منصوبے۔ تہواروں کے اس موسم میں زندگی کو آسان ، صحت مند اور خوشحال بنانے کےلئے کاشی میں ہورہے ترقیوں کا یہ تہوار ایک طرح سے پورے ملک کو نئی توانائی، نئی طاقت، نیا اعتماد دینے والا ہے۔ اس کے لئے کاشی سمیت آج میں کاشی کی سرزمین سے 130کروڑ ملک کے شہریوں کو ہندوستان کے کونے کونے کو ، ہندوستان کے گاؤں کو  ، ہندوستان کے شہر کو، ہر کسی کو بہت بہت مبارکباد۔

بھائیوں اور بہنوں!

ہمارے یہاں ہر کام کا بنیادی پیمانہ صحت مند ہونا مانا گیا ہے۔جسم کو صحت مند رکھنے کے لئے کیا گیا خرچ ، ہمیشہ بہترین خرچ مانا گیا ہے، لیکن آزادی کے بعد کے طویل عہد میں امراض پر ، صحت سہولتوں پر  اتنی توجہ نہیں دی گئی، جتنی ملک کو ضرورت تھی۔ملک میں جن کی طویل عرصے تک سرکاریں رہیں، انہوں نے ملک کے ہیلتھ کیئر سسٹم کی مجموعی ترقی کے بجائے اُسے سہولتوں سے محروم رکھا۔گاؤں میں یا تو اسپتال نہیں، اسپتال تھے تو علاج کرنے والا نہیں، بلاک کے اسپتال میں گئے تو ٹیسٹ کی سہولت نہیں، ٹیسٹ ہو بھی جائے تو نتیجے کو لے کر شکوک، درست ہونے کو لے کر شک ، ضلع اسپتال پہنچے تو پتہ چلا کہ جو خطرناک بیماری تشخیص ہوئی ہے، اس میں تو سرجری ہوگی، لیکن جو سرجری ہونی ہے، اس کی وہاں سہولت ہی نہیں ہے۔اس لئے پھر کسی بڑے اسپتال بھاگو، بڑے اسپتال میں اس سے زیادہ بھیڑ، طویل انتظار۔ ہم سب گواہ ہیں کہ مریض اور اس کا پورا خاندان ایسی ہی پریشانیوں سے الجھتا رہتا تھا۔زندگی دوڑ بھاگ میں چلی جاتی تھی۔ اس سے ایک تو خطرناک بیماری کئی بار اور زیادہ بگڑ جاتی ہے، اوپر سے غریب پر جو غیر ضروری اقتصادی بوجھ پڑتا ہے، وہ الگ۔

ساتھیوں!

ہمارے ہیلتھ کیئر سسٹم میں جو بڑی کمی رہی، اس نے غریب اور متوسط درجے میں علاج کو لے کر ہمیشہ بنی رہنے والی فکر پیدا کردی۔ آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن ملک  کے ہیلتھ کیئر سسٹم کی اس کمی کو دورکرنے کا ایک حل ہے۔ مستقبل میں کسی بھی وباء سے نمٹنے میں ہم تیار ہوں، اہل ہوں، اس کے لئے اپنے ہیلتھ سسٹم کو آج تیار کیا جارہا ہے۔کوشش یہ بھی ہے کہ بیماری جلد پکڑ میں آئے، جانچ میں تاخیر نہ ہو۔ ہدف یہ ہے کہ آنے والے 5-4سالوں میں ملک کے گاؤں سے لے کر بلاک، ضلع، ریجنل اور نیشنل سطح تک کریٹکل ہیلتھ کیئر نیٹ ورک کو طاقتور بنایاجائے۔ خاص طور سے جن ریاستوں میں صحت سہولتوں کا فقدان زیادہ ہے، جو ہماری پہاڑی اور شمال مشرق کی ریاستیں ہیں، اُن پر اور زیادہ توجہ مرکوز کی جارہی ہے۔جیسے اتراکھنڈ ہے، ہماچل ہے۔

ساتھیوں!

ملک کے ہیلتھ سیکٹر کے الگ الگ فاصلوں کو دور کرنے کےلئے آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن کے تین بڑے پہلو ہیں۔ پہلا ڈائیگناسٹک اور ٹریٹمنٹ کے لئے وسیع سہولتوں کی تعمیر سے جڑا ہے۔ اس کے تحت گاؤں اور شہروں میں ہیلتھ اینڈ ویلنس سینٹر کھولے جارہے ہیں۔ جہاں بیماریوں کی شروعات میں ہی تشخیص کرنے کی سہولت ہوگی۔ اِن سینٹروں میں فری طبی مشاورت ، مفت ٹیسٹ، مفت دوا جیسی سہولتیں ملیں گی۔وقت پر بیماری کا پتہ چلے گا تو بیماریوں کے خطرناک ہونے کا خطرہ کم ہوگا۔ خطرناک بیماری کی حالت میں اُس کے علاج کےلئے 600 سے زیادہ اضلاع میں کریٹکل کیئر سے جڑے 35ہزار سے زیادہ نئے بستر تیار کئے جائیں گے۔ باقی تقریباً 125 اضلاع میں ریفرل کی سہولت دی جائے گی۔ قومی سطح پر اس کے لئے تربیت اور دوسری نوعیت کی صلاحیت سازی کے لئے 12مرکزی اسپتالوں میں ضروری سہولیات مہیا کرنے پر بھی کام ہورہا ہے۔اس یوجنا کے تحت ریاستوں میں بھی سرجری سے جڑے نیٹ ورک کو طاقتور بنانے کےلئے 24x7چلنے والے 15ایمرجنسی آپریشن سینٹر بھی تیا رکئے جائیں گے۔

ساتھیوں!

یوجنا کا دوسرا پہلو امراض کی جانچ کے لئے ٹیسٹنگ نیٹ ورک سے جڑا ہے۔اس مشن کے تحت بیماریوں کی جانچ ، ان کی نگرانی کیسے ہو، اس کے لئے ضروری بنیادی ڈھانچے کو ترقی دی جائے گی۔ملک کے 730اضلاع میں اِنٹیگریٹیڈ پبلک ہیلتھ لیبس اور ملک میں نشان زد 3500بلاکوں میں بلاک پبلک ہیلتھ اِکائیاں بنائی جائیں گی۔5ریجنل نیشنل سینٹرس فارس ڈسیز کنٹرول ، 20 میٹروپولیٹن  اِکائیاں اور 15بی ایس ایل لیب بھی اِس نیٹ ورک کو اور طاقت فراہم کریں گے۔

بھائیوں اور بہنوں!

اس مشن کا تیسرا پہلو! وباء سے جڑے تحقیقی اداروں کی توسیع کا ہے۔ اُن کو طاقتور بنانے کا ہے۔ اِس وقت ملک میں 80وائرل ڈائیگناسٹک اور ریسرچ لیب ہیں۔ اِن کو اور بہتر بنایا جائے گا۔وباء میں بایو سیفٹی لیبل-3کی لیب چاہئے۔ ایسی 15نئی لیب کو آپریشنل کیا جائے گا۔اس کے علاوہ ملک میں 4نئے نیشنل انسٹی ٹیوٹ آف وائرو لوجی  اور ایک نیشنل انسٹی ٹیوٹ فار ون ہیلتھ بھی قائم کیا جارہا ہے۔جنوبی ایشیا کے لئے ڈبلیو ایچ او کا ریجنل ریسرچ پلیٹ فارم بھی ریسرچ کے اس نیٹ ورک کو طاقت فراہم کرے گا۔یعنی آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن کے توسط سے ملک کے کونے کونے میں علاج سے لے کر کریٹکل ریسرچ تک ایک پورا ایکو سسٹم وضع کیا جائے گا۔

ساتھیوں!

ویسے یہ کام دہائیوں پہلے ہوجانے چاہئے تھے، لیکن حال کیا ہے ، اس کا ذکر کرنے کی مجھے ضرورت نہیں ہے۔ ہم   پچھلے 7سال سے لگاتار بہتری لانے کی کوشش کررہے ہیں، لیکن اب ایک بہت بڑے اسکیل پر بہت بڑے ایگریسیو ایپروچ کے ساتھ اِس کام کو کرنا ہے۔ کچھ دن پہلے آپ نے دیکھا ہوگا  میں نے دہلی میں پورے ملک کے لئے ایک گتی شکتی ، ایک بہت بڑا ملک گیر بنیادی ڈھانچے سے جڑے پروگرام کو لانچ کیا تھا۔ آج یہ دوسرا تقریباً 64ہزار کروڑ روپے کا ہیلتھ کو ہی لے کر، آروگ کو لے کر ، بیماری کے خلاف لڑائی لڑنے کے لئے ملک کے ہر شہری کو صحت مند رکھنے کے لئے اِتنا بڑا ایک مشن لے کر آج کاشی کی دھرتی سے ہم ملک بھر میں نکل رہے ہیں۔

ساتھیوں!

جب ایسا ہیلتھ انفراسٹرکچر بنتا ہے تو اِس سے ہیلتھ سروس تو بہتر ہوتی ہی ہے، اِس سے روزگار کا بھی ایک پورا ماحول تیار ہوتا ہے۔ ڈاکٹر، پیرا میڈکس، لیب، فارمیسی، صاف صفائی ، آفس، ٹریول ٹرانسپورٹ، خوردونوش، ایسے مختلف طرح کے روزگار اِس یوجنا سے بننے والے ہیں۔ ہم نے دیکھا ہے ایک بڑا اسپتال بنتا ہے تو اس کے آس پاس ایک پورا شہر آباد ہوجاتاہے۔ جو اسپتال سے جڑی سرگرمیوں کے روزی روٹی کا مرکز بن جاتاہے۔ بہت بڑی اقتصادی سرگرمیوں کا مرکز بن جاتاہے۔ اس لئے آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن صحت کے ساتھ ساتھ اقتصادی خود کفالت کا بھی ذریعہ ہے۔ یہ ایک ہولسٹک ہیلتھ کیئر کے لئے ہورہی کوششوں کی ایک کڑی ہے۔ ہولسٹک ہیلتھ کیئر یعنی جو سب کے لئے آسان ہو، سستا ہو اور سب کی پہنچ میں ہو۔ ہولسٹک ہیلتھ کیئر یعنی جہاں صحت کے ساتھ ہی ویلنس پر بھی فوکس ہو۔ سوچھ بھارت ابھیان ، جل جیون مشن، اوجولا یوجنا، پوشن ابھیان، مشن اندردھنش ایسی متعدد مہموں نے ملک کے کروڑوں غریبوں کو  بیماری سے بچایا ہے۔ اُنہیں بیمار ہونے سے بچایا ہے۔ آیوشمان بھارت یوجنا نے 2 کروڑ  سے زیادہ غریبوں کا اسپتال میں مفت علاج بھی کروایا ہے۔علاج سے جڑی مختلف پریشانیوں کو آیوشمان بھارت  ڈیجیٹل مشن کے ذریعے حل کیا جارہا ہے۔

بھائیوں اور بہنوں!

ہم سے پہلے برسوں تک جو سرکار میں رہے، ان کے لئے ہیلتھ سروس  پیسہ کمانے، گھپلے کا ذریعہ رہی ہے۔ غریب کی پریشانی دیکھ کر بھی وہ اُن سے دور بھاگتے رہے۔ آج مرکز اور ریاست میں وہ سرکار ہے، جو غریب ، دلت، محروم طبقات، پسماندہ برادریوں، متوسط طبقات، سب کا درد سمجھتی ہے۔ ملک میں صحت سہولتیں بہتر کرنے کےلئے ہم دن رات ایک کررہے ہیں۔ پہلے عوام کا پیسہ گھپلوں میں جاتا تھا، ایسے لوگوں کی تجوریوں میں جاتاتھا، آج بڑے بڑے منصوبوں میں پیسہ لگ رہا ہے۔ اس لئے آج تاریخ کی سب سے بڑی وباء سے بھی ملک نمٹ رہا ہے اور آتم نر بھر بھارت کے لئے لاکھوں کروڑ روپے کا بنیادی ڈھانچہ بھی تیار ہورہا ہے۔

ساتھیوں!

میڈیکل سہولتیں بڑھانے کےلئے بہت ضروری ہے کہ ڈاکٹروں اور پیرا میڈیکل اسٹاف کی تعداد بھی اُتنی ہی تیزی سے بڑھے۔ یوپی میں جس تیزی کے ساتھ نئے میڈیکل کالج کھولے جارہے ہیں، اُس کا بہت اچھااثر میڈیکل کی سیٹوں اور ڈاکٹروں کی تعداد پر پڑے گا۔ زیادہ سیٹیں ہونے کی وجہ سے اب غریب والدین کا بچہ بھی ڈاکٹر بننے کا خواب دیکھ سکے گا اور اُسے پورا کرسکے گا۔

بھائیوں اور بہنوں!

آزادی کے بعد 70 سال میں ملک میں جتنے ڈاکٹر  میڈیکل کالجوں سے پڑھ کر نکلے ہیں، اس سے زیادہ ڈاکٹر اگلے 12-10سالوں میں ملک کو ملنے جارہے ہیں۔ آپ تصور کرسکتے ہیں کہ میڈیکل شعبے میں کتنا بڑا کام ملک میں ہورہا ہے۔جب زیادہ ڈاکٹر ہوں گے، تو ملک کے کونے کونے میں، گاؤں گاؤں میں اتنے ہی آسانی ڈاکٹر دستیاب ہوں گے۔ یہی نیا بھارت ہے، جہاں فقدان سے آگے بڑھ کر ہر خواہش کی تکمیل کےلئے رات دن کام کیاجارہا ہے۔

بھائیوں اور بہنوں!

ماضی میں خواہ ملک میں ہویا اترپردیش میں جس طرح کام ہوا، اگر ویسے ہی کام ہوتا تو آج کاشی کی حالت کیا ہوتی؟ دنیا کے سب سے قدیم شہر کو بھارت کے ثقافتی اثاثے کی علامت کاشی کو اِنہوں نے اپنے حال پر چھوڑ رکھا تھا۔ لٹکتے بجلی کے تار، اُوبڑ کھابڑ سڑکیں، گھاٹوں اور گنگا میّا کی بری حالت ، جام، آلودگی اورمتزلزل  انتظامی صورتحال یہی سب کچھ چلتا رہا۔ آج کاشی کا دل وہی ہے، من وہی ہے، لیکن جسم کو سدھارنے کی ایمانداری سے کوشش ہورہی ہے۔جتنا کام وارانسی میں پچھلے سات سال میں ہوا ہے، اُتنا پچھلی کئی دہائیوں میں نہیں ہوا۔

بھائیوں اور بہنوں!

رِنگ روڈ کے نہ ہونے سے کاشی میں جام کی کیا حالت ہوتی تھی، اسے آپ نے سالہا سال محسوس کیا ہے۔ نو اِنٹری کے کھلنے کا انتظار  تو بنارس والوں کی عادت بن گئی تھی۔ اب رِنگ روڈ بننے سے پریاگ راج، لکھنؤ، سلطان پور، اعظم گڑھ، غازی  پور، گورکھپور، دہلی ، کولکاتہ کہیں بھی آنا جانا ہو تو شہر میں آکر شہر والوں کو پریشان کرنے کی ضرورت نہیں پڑے گی۔ یہی نہیں رِنگ روڈ اب غازی پور کے برنون تک فورلین نیشنل ہائی وے سے جڑ گیا ہے۔جگہ جگہ سروس روڈ کی سہولتیں بھی دی گئی ہیں۔ اِ س سے متعدد گاؤں کے ساتھ ساتھ پریاگ راج، لکھنؤ، گورکھپور، بہار اور نیپال تک آمدورفت آرام دہ ہوگئی ہے۔ اِس سے سفر تو آسان ہوگا ہی ، کاروبار کو بھی رفتار ملے گی۔ ٹرانسپورٹ کی قیمت کم ہوگی۔

بھائیوں اور بہنوں!

جب تک ملک میں ایک ڈیڈیکیٹڈ انفراسٹرکچر کی تعمیر نہ ہو، تب تک ترقی کی رفتار ادھوری رہتی ہے۔ورونا ندی پر دو پُل بننے سے درجنوں گاؤں کے لئے اب شہر آنا جانا آسان ہوا ہے۔ اِس سے ایئر پورٹ آنے جانے والے پریاگ راج، بھدوہی اورمرزا پور کے لوگوں کو بہت سہولت ہوگی۔قالین صنعت سے جڑے ساتھیوں کو بھی بہت فائدہ ہوگااور ماں وِندھ واسنی  کے درشن کرنے کےلئے ایئر پورٹ سے سیدھے مرزا پور جانے کے خواہش مند ماں کے بھکتوں کوبھی سہولت ملے گی۔ سڑکوں، پُلوں، پارکنگ، جگہوں سے جڑے ایسے متعدد منصوبے آج کاشی کے رہنے والوں کو وقف کئے گئے ہیں۔ جس سے شہر اور آس پاس زندگی اور زیادہ آسان ہوگی۔ریلوے اسٹیشن پر تعمیر شدہ جدید ایگزیکیٹیو لاؤنج سے مسافروں کی سہولت اور بڑھے گی۔

ساتھیوں!

گنگا جی کی صفائی اور پاکیزگی کے لئے گزرے ہوئے سالوں میں وسیع پیمانے پر کام کیاجارہا ہے۔ جس کا نتیجہ ہم آج محسوس بھی کررہے ہیں۔ گھروں سے گندا پانی گنگا جی میں نہ جائے، اس کے لئے مسلسل کوششیں کی جارہی ہیں۔اب رام نگر میں 5نالوں سے بہنے والے سیویج کو ٹریٹ  کرنے کے لئے جدید ٹریٹمنٹ پلان کام کرنا شروع کرچکا ہے۔ اس سے آس پاس کی 50ہزار سے زیادہ آبادی کو براہ راست فائدہ ہورہا ہے۔ گنگا جی ہی نہیں، بلکہ ورونا کی صفائی کو لے کر بھی اولیت کی بنیاد پر کام ہورہاہے۔ طویل وقت تک نظر انداز کی گئی ورونا اپنا وجود کھونے کے قریب پہنچ چکی تھی۔ ورونا کو بچانے کےلئے ہی چینلائزیشن کے منصوبے پر کام کیا گیا۔آج صاف پانی بھی ورونا میں پہنچ رہا ہے۔ 13چھوٹے بڑے نالوں کو بھی ٹریٹ کیا جارہا ہے۔ورونا کے دونوں کنارے پاتھ وے ، ریلنگ، لائٹنگ، پختہ گھاٹ، سیڑھیاں ایسی متعدد سہولتوں کی بھی تعمیر پوری ہورہی ہے۔

ساتھیوں!

کاشی روحانیت کے ساتھ ساتھ دیہی معیشت کا بھی ایک اہم مرکز ہے۔ کاشی سمیت پورے پوروانچل کے کسانوں کی پیداوار کو ملک –غیر ملکی بازاروں تک پہنچانے کےلئے گزرے سالوں میں متعدد سہولتیں مہیا کی گئی ہیں۔پیری شیبل کارگو سینٹرز سے لے کر پیکیجنگ اور پروسیسنگ کا جدید انفراسٹرکچر یہاں تیا رکیا گیا ہے۔ اسی کڑی میں لال بہادر شاستری فروٹ اینڈ ویجیٹیبل  مارکیٹ کی جدید کاری ہوئی ہے۔ جو جدید کاری ہوئی  ہے، اس سے کسانوں کو بہت سہولت ہونے والی ہے۔شہنشاہ پور میں بایو-سی این جی پلانٹ کی تعمیر سے بایو گیس بھی ملے گی اور ہزاروں میٹرک ٹن آرگینک کھاد بھی کسانوں کو دستیاب ہوگی۔

بھائیوں اور بہنوں!

گزرے سالوں کی ایک اور بڑی حصولیابی اگر کاشی کی رہی ہے تو وہ ہے بی ایچ یو کا پھر سے دنیا میں اعلیٰ ترین ہونے کی طرف بڑھنا۔ آج ٹیکنالوجی سے لے  کر ہیلتھ تک بی ایچ یو میں غیر معمولی سہولتیں تیار ہورہی ہیں۔ ملک بھر سے یہاں نوجوان ساتھی یہاں پڑھائی کےلئے آرہے ہیں۔یہاں سینکڑوں طالب علم اور طالبات  کے لئے جو رہائشی  سہولتیں  تعمیر ہوئی ہیں، وہ نوجوان ساتھیوں کو بہتر کرنے میں مددگار ثابت ہوں گی۔ خاص طور سے سینکڑوں طالبات کے لئے جو ہاسٹل کی سہولت تیار ہوئی ہے، اُس سے مالویہ جی کے وژن کو پورا کرنے میں اور طاقت ملے گی۔ بیٹیوں کو اعلیٰ اور جدید تعلیم دینے کےلئے جس عہد کے ساتھ وہ زندہ رہے، اُس کو پورا کرنے میں ہمیں مدد ملے گی۔

بھائیوں اور بہنوں!

ترقی کے یہ سبھی منصوبے آتم نربھرتا کے ہمارے عہد کو ثابت کرنے والے ہیں۔ کاشی اور یہ پورا خطہ تو مٹی کے حیرت انگیز فنکاروں ، کاریگروں اور کپڑوں پر جادوگری بکھیرنے والے بُنکروں کے لئے جانا جاتاہے۔سرکار کی کوششوں سے پچھلے 5سال میں وارانسی میں کھادی اور دوسری گھریلوں صنعتوں کی پیداوار میں تقریباً 60 فیصد اور فروخت میں تقریباً 90 فیصد کا اضافہ ہوا ہے۔اِس لئے ایک بار پھر میں یہاں سے ملک کے تمام شہریوں سے درخواست کروں گا کہ اِس دیوالی ہمیں اپنے اِن ساتھیوں کی دیوالی کا بھی دھیان رکھنا ہے۔اپنے گھرکی سجاوٹ سے لے کر اپنے کپڑوں اور دیوالی کے دیوؤں تک لوکل کے لئے ہمیں ووکل رہنا ہے۔ دَھن تیرس سے لے کر دیوالی تک لوکل کی جم کر خریداری کریں گے، تو سب کی دیوالی خوشیوں سے بھر جائے گی اور جب میں لوکل سے ووکل کی بات کرتاہوں تو میں نے دیکھا ہے کہ ہمارے ٹی وی والے بھی صرف مٹی کے دیے دکھاتے ہیں۔ ووکل فار لوکل صرف دیے تک محدود نہیں ہیں، ہر چیز میں وہ مصنوعات ، جس میں میرے ملک کے شہریوں کا پسینہ ہے، جس مصنوعات میں میرے ملک کی مٹی کی  خوشبو ہے، وہ میرے لیے ہے اور ایک بار ہماری عادت بن جائے گی  ملک کی چیزیں خریدنے کی تو پیداوار بھی بڑھے گی ، روزگار بھی بڑھے گا ، غریب سے غریب کو کام بھی ملے گا اوریہ کام سب مل کر سکتے ہیں۔ سب کی کوشش سے بہت  بڑی تبدیلی ہم لوگ لا سکتے ہیں۔

ساتھیوں!

ایک بار پھر آیوشمان بھارت ہیلتھ انفراسٹرکچر مشن کے لئے پورے ملک کو اور ترقی سے جڑے متعدد منصوبوں کے لئے کاشی کو بہت بہت مبارکباد۔آپ سب کو آنےو الے تمام تہواروں کی ایک بار پھر بہت بہت پیشگی مبارکباد!بہت بہت شکریہ۔